Friday, March 6, 2026

 महिला दिवस किसके लिए?

सास भी कभी बहू थी… या बहू भी कभी सास बनेगी?

टूटती हदें: जब सास-बहू का झगड़ा जानलेवा हो जाए

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बृज खंडेलवाल द्वारा

8 मार्च 2026

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अगर पुरानी फिल्मों वाली ललिता पवार टाइप सास आज की मॉडर्न बहू से टकरा जाए, तो मंजर कैसा होगा?

और अगर टीवी सीरियल “वसुधा” की सास-बहू की लड़ाई असल जिंदगी में उतर आए, तो घर की कहानी कुछ और ही होगी।

बरसों से सास-बहू का रिश्ता टीवी सीरियलों, बॉलीवुड फिल्मों और डिनर टेबल की गपशप का पसंदीदा विषय रहा है। आम तौर पर इसे हल्के-फुल्के मज़ाक या ड्रामे के तौर पर दिखाया जाता है: चालाक सास और बेचारी, सताई हुई बहू।

लेकिन पिछले कुछ सालों में देश के अलग-अलग हिस्सों से जो खबरें आई हैं, वे इस मज़ाकिया तस्वीर को बिल्कुल झुठला देती हैं।

अब यह रिश्ता सिर्फ तानों, शिकायतों और चुप्पी भरे झगड़ों तक सीमित नहीं रहा। कई जगह यह टकराव हिंसा और कत्ल तक पहुँच गया है।

महाराष्ट्र से तमिलनाडु तक, संयुक्त परिवार की जो चमकदार तस्वीर दिखाई जाती थी, उसके पीछे छिपे तनाव अब खुलकर सामने आने लगे हैं।

सबसे हैरान करने वाली बात है इन मामलों की बर्बरता।

अब यह सिर्फ दहेज उत्पीड़न या आत्महत्या के लिए उकसाने तक सीमित नहीं रहा। कई मामलों में सीधे-सीधे हत्या हो रही है।

जनवरी 2026 में महाराष्ट्र के ठाणे में 60 साल की एक सास पर आरोप लगा कि उसने अपनी बहू का गला घोंट कर उसे मार डाला। वजह कोई मामूली घरेलू झगड़ा नहीं था। असल लड़ाई सरकारी नौकरी के फायदे और मुआवज़े को लेकर थी।

सास को लगता था कि बेटे की मौत के बाद यह हक उसका है।

लेकिन कानून के मुताबिक वह रकम बेटे की विधवा पत्नी को मिलनी थी।

यानी दुख, आर्थिक डर और असुरक्षा ने मिलकर गुस्से को कातिलाना शक्ल दे दी।

ऐसे मामले पहले भी सामने आए हैं।

2016 में मुंबई के पास मुंब्रा में एक सास ने अपनी बहू और उसकी माँ की गला रेत कर हत्या कर दी। वजह सिर्फ इतनी थी कि उसका बेटा अपनी बीवी को ज्यादा तवज्जो देता था।

यह सास-बहू संघर्ष का सबसे पुराना और बुनियादी रूप है; बेटे या शौहर पर भावनात्मक कब्ज़े की जंग।

2019 में वसई में एक सास ने बहू को चाकू मार दिया। बाद में वह खुद खून से सने हाथों के साथ पुलिस स्टेशन पहुंच गई।

इससे साफ है कि घरेलू सत्ता की लड़ाई में कभी-कभी होश-ओ-हवास भी गायब हो जाते हैं।

ये घटनाएँ किसी एक प्रदेश तक सीमित नहीं हैं।

यह एक तरह से पूरे हिंदुस्तान की कहानी बनती जा रही है।

2025 में झारखंड में 60 साल की अनीता देवी को अपनी बहू को जहर देने के जुर्म में उम्रकैद की सज़ा हुई।

उत्तर प्रदेश में वजहें और भी दिलचस्प हैं।

2023 में अमरोहा में एक सास ने अपनी बहू को गोली मार दी। वजह बताई गई; उसका “मॉडर्न लाइफस्टाइल” और घर के कामों में दिलचस्पी न लेना।

यह दरअसल दो पीढ़ियों की टक्कर है। एक तरफ पारंपरिक सोच वाली सास, जिसे आज्ञाकारी गृहिणी चाहिए।

दूसरी तरफ नई पीढ़ी की औरत, जो अपने करियर, आज़ादी और जिंदगी के फैसले खुद करना चाहती है।

लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी है।

हर बार सास ही हमलावर नहीं होती।

अब कई मामलों में बहू भी पलटवार कर रही है: और वह भी बेहद खतरनाक तरीके से।

2025 में दिल्ली में एक गर्भवती महिला ने अपनी सास को चाकू मारकर हत्या कर दी। फिर लूट का नाटक रचा और सबूत मिटाने के लिए लाश को आग लगा दी।

हिमाचल प्रदेश के सिरमौर में भी बहू ने घरेलू सामान और जिम्मेदारियों को लेकर हुए झगड़े में अपनी बुजुर्ग सास पर तेज हथियार से हमला किया।

झांसी में जमीन के झगड़े और कथित अवैध रिश्तों के शक ने बहू को अपनी सास को जहर देने तक पहुंचा दिया।

इन घटनाओं से एक बात साफ हो जाती है।

“बेचारी बहू” और “जालिम सास” वाला पुराना स्टीरियोटाइप अब टूट रहा है।

असलियत कहीं ज्यादा जटिल और जहरीली है।

शायद सबसे सिहराने वाला मामला 2026 की शुरुआत में तमिलनाडु के कल्लाकुरिची से सामने आया।

यहां एक सास, मैरी, और उसकी बेटी एमिली ने मिलकर 25 साल की नंदिनी को कथित अवैध संबंधों के शक में बहला-फुसला कर मार डाला। बाद में उसकी लाश नदी किनारे फेंक दी गई।

यह घटना दिखाती है कि कई बार परिवार के लोग मिलकर “बाहरी” बहू के खिलाफ साजिश रच लेते हैं।

तो आखिर इन खौफनाक घटनाओं की जड़ क्या है?

असल वजह भारतीय परिवार की कुछ पुरानी कमजोरियां हैं।

संयुक्त परिवार, जो कभी सहारा और सुरक्षा का सिस्टम माना जाता था, अब कई बार प्रेशर कुकर बन जाता है।

सास, जो अक्सर विधवा होती है या जिसने पूरी जिंदगी परिवार के लिए कुर्बान कर दी, अपनी पहचान और सुरक्षा बेटे से जोड़ कर देखती है।

ऐसे में बहू का घर में आना उसे अपने रुतबे और जगह के लिए खतरा लगता है।

उधर बहू को हर वक्त की दखलअंदाजी और नियंत्रण घुटन जैसा महसूस होता है। पैसे, निजी जगह, बच्चों की परवरिश, हर मुद्दा ताकत की लड़ाई बन जाता है।

और जब बातचीत बंद हो जाए, और बेटा या पति चुप तमाशबीन बना रहे, तो छोटे-छोटे झगड़े कभी-कभी खूनी हादसों में बदल जाते हैं।

ये घटनाएँ एक कड़वी चेतावनी हैं।

सास-बहू का रिश्ता अब सिर्फ टीवी सीरियल का मसाला या पारिवारिक ड्रामा नहीं रहा।

यह मानसिक तनाव, आर्थिक असुरक्षा और पितृसत्तात्मक सोच का ऐसा संगम बनता जा रहा है जो कई घरों को क्राइम सीन में बदल रहा है।

अगर परिवारों ने समय रहते इज्ज़त, दूरी और समझदारी के नए उसूल नहीं अपनाए, तो ऐसे सुर्खियां शायद और आम होती जाएंगी।

Thursday, March 5, 2026

 भारत का शोर उत्सव: 

जब हर जश्न लाउडस्पीकर बन जाता है!

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

7 मार्च 2026

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भारत में एक चीज़ बहुत तेजी से विलुप्त हो रही है, खामोशी।

जैसे जंगलों से बाघ गायब होते हैं, वैसे ही शहरों से सन्नाटा।

यह देश त्योहारों का है, रस्मों का है, जुलूसों का है। लेकिन इन सबके बीच एक और चीज़ है, अखंड और असीम शोर।

शादी हो तो ऐसा लगता है मानो पूरा ब्रह्मांड नाचने बुलाया गया हो। घोड़ी पर बैठा दूल्हा, पीछे डीजे का ट्रक।बॉलीवुड के रीमिक्स 100 डेसिबल पर चीखते हुए। दूल्हे से ज्यादा थके हुए घोड़े के कान।

अजीब विडंबना है।

शादी प्यार का उत्सव है, लेकिन संगीत ऐसा कि दिल नहीं, कान फट जाएं।

और अगर आप सोचते हैं कि शोर सिर्फ खुशी का हिस्सा है, तो श्मशान घाट का चक्कर लगा लीजिए। अब तो उठावनी से भी शांति गायब हो चुकी है, प्रवचन बाज आ चुके हैं। वहाँ भी लाउडस्पीकर लगे मिलेंगे।

मृत्यु, जो कभी शांत, गंभीर और चिंतन का क्षण हुआ करती थी, अब एम्पलीफायर पर विदाई बन गई है।

भजन भी ऐसे बजते हैं जैसे स्वर्ग का दरवाज़ा खोलने के लिए भगवान को जगाना पड़ रहा हो।

भारत का त्योहार कैलेंडर किसी ध्वनि विस्फोट का टाइम टेबल जैसा है।होली आती है, ढोल, डीजे, चीखती भीड़। घिसे पिटे फिल्मी गाने। 

कई तरह की चतुर्थी, जयंती, भंडारे, रात्रि जागरण, जयकारे, मूर्ति विसर्जन,  बेचारे मच्छर भी बिलबिला जाते हैं! सड़कों पर जुलूस, ढोल-ताशे और सबवूफर। पूजा होती है, कोलकाता की गलियाँ थरथराती हैं।दीवाली पर आसमान पटाखों से नहीं, डेसिबल से भर जाता है। ऐसा लगता है जैसे हर त्योहार एक प्रतियोगिता हो रही है! कौन ज्यादा शोर मचा सकता है।

कागज पर नियम मौजूद हैं। 2000 के Noise Pollution Rules साफ कहते हैं कि रिहायशी इलाकों में दिन में 55 डेसिबल और रात में 45 डेसिबल की सीमा है। अस्पतालों और स्कूलों के पास तो इससे भी कम। लेकिन कागज की दुनिया और भारतीय सड़कों की दुनिया में जमीन-आसमान का फर्क है।

दिल्ली और मुंबई में ट्रैफिक का औसत शोर 80 डेसिबल के आसपास रहता है। पीक आवर में यह 100 तक पहुंच जाता है। यानी हम रोज़ाना लगभग जेट इंजन की आवाज़ में जी रहे हैं। कोई प्रेशर हॉर्न बजाता है, कोई साइलेंसर निकलकर पूरी कॉलोनी के कई चक्कर लगाता है!

सवाल उठता है, हम इतने शोर-प्रिय क्यों हैं? इतिहास कुछ संकेत देता है।

प्राचीन भारत में युद्ध और विजय के समय शंख और नगाड़े बजते थे। ध्वनि को शक्ति का प्रतीक माना जाता था।

मान्यता थी कि तेज आवाज़ बुरी आत्माओं को दूर भगाती है और देवताओं का ध्यान आकर्षित करती है।

लेकिन आज का शोर आध्यात्मिक कम और सामाजिक प्रदर्शन ज्यादा है।

राजनीति ने इसे और बढ़ाया।

चुनावी रैलियाँ, माइक, स्पीकर, नारे, गाड़ियों के काफिले।

ऐसा लगता है लोकतंत्र की ताकत वोट में नहीं, लाउडस्पीकर में है।

धार्मिक मंच भी पीछे नहीं हैं।

हर उपदेशक के हाथ में माइक्रोफोन।

ज्ञान कम, वॉल्यूम ज्यादा।

टीवी डिबेट्स से लेकर मंदिर प्रवचन तक; एक ही नियम है: जो सबसे जोर से बोलेगा, वही जीतेगा।

फिर आया तकनीक का चमत्कार या आविष्कार, लाउडस्पीकर देव।

1920 के दशक में यह उपकरण थिएटर और सभाओं में स्पष्ट आवाज़ के लिए बना था। लेकिन भारत में यह सांस्कृतिक विस्फोटक साबित हुआ है। आजकल एक ही जगह पर सौ सौ decks लगाए जाते हैं, कोई चैन से न जीए।

आज हर मंदिर, हर मस्जिद, हर जुलूस, हर सभा, सबके पास अपनी ध्वनि सेना है। जहाँ पहले घंटी बजती थी, अब बास स्पीकर गूंजते हैं।

कभी-कभी लगता है कि भगवान तक पहुँचने का रास्ता भक्ति से नहीं, वॉट्स से होकर जाता है।

दुनिया के सबसे शोर भरे शहरों की सूची में भारतीय शहर नियमित रूप से जगह बनाते हैं।

लगातार शोर का असर गंभीर है; हाई ब्लड प्रेशर, नींद की कमी, मानसिक तनाव, सुनने की क्षमता का ह्रास।

हर साल हजारों लोग समय से पहले बहरे हो जाते हैं; कारण कोई वायरस नहीं, डेसिबल।

लेकिन शोर का दायरा सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं। हिमालय की शांत घाटियाँ भी अब सुरक्षित नहीं रहीं।

त्योहारों और पर्यटन के मौसम में 90 डेसिबल तक शोर दर्ज किया गया है।

पक्षी घोंसले छोड़ देते हैं।

जानवर जंगलों में भाग जाते हैं।

प्रकृति, जिसे हमने ध्यान और योग की भूमि कहा था, अब लाउडस्पीकर के बीच ध्यान करने की कोशिश कर रही है।

विडंबना देखिए।

ऋषियों की भूमि में योग शिविर भी माइक्रोफोन पर चलते हैं। कोचिंग क्लासेज भी ! प्राणायाम की गहरी सांसें भी स्पीकर से गूंजती हैं।

खामोशी, जो आध्यात्मिक अनुभव की आत्मा है, अब एलिट शौक समझी जाती है। सच्चाई शायद थोड़ी असहज है।

यह शोर हमारी सांस्कृतिक ऊर्जा जितना ही हमारी सामूहिक बेचैनी का संकेत भी है। एक ऐसा समाज जहाँ हर कोई सुना जाना चाहता है। जहाँ ध्यान पाने का सबसे आसान तरीका है, आवाज़ बढ़ा देना।

इसलिए हर मंच पर माइक है।

हर जुलूस में स्पीकर।

हर गली में डीजे।

लेकिन सवाल अभी भी वही है? 

क्या भगवान सचमुच इतने दूर हैं कि उन्हें सुनाने के लिए हमें 100 डेसिबल चाहिए?

या हम अपनी ही खालीपन को आवाज़ से भरने की कोशिश कर रहे हैं?

भारत की असली ताकत उसकी विविधता है, उसकी संस्कृति है, उसका उत्सव है।

लेकिन उत्सव का मतलब कोलाहल नहीं होना चाहिए।

कभी-कभी सभ्यता की सबसे बड़ी पहचान शोर नहीं, संयम होती है।

शायद समय आ गया है कि हम जश्न मनाना सीखें:  बिना पड़ोसी के कान फाड़े। माइक थोड़ा कम।

ढोल थोड़ा धीमा। और शायद, बस शायद, भारत फिर से खामोशी की संगीत सुन सके।

 ताज के साये में सूखी यमुना: अब बैराज ही अंतिम उपाय

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

मार्च 2, 2026

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आगरा की पहचान ताजमहल है। पर ताज के पीछे बहती यमुना आज भीख माँगती नदी बन चुकी है।

पानी नहीं। प्रवाह नहीं। जीवन नहीं।

दशकों से एक प्रस्ताव फाइलों में धूल खा रहा है; ताजमहल से लगभग 1.5 किलोमीटर डाउनस्ट्रीम, नागला पेमा के पास यमुना पर एक बैराज का निर्माण। यह कोई नया विचार नहीं। यह 1986-87 से चली आ रही माँग है। कई बार शिलान्यास हुए। कई बार घोषणाएँ हुईं। पर यमुना आज भी सूखी है।

इस मुद्दे को फिर से उठाया है सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक, पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट, प्रेम प्रकाश ने। उन्होंने मुख्यमंत्री को लिखे अपने विस्तृत ज्ञापन में साफ शब्दों में कहा है: “शहर 1984 से इंतज़ार कर रहा है। अब और देरी आगरा के भविष्य के साथ अन्याय होगा।”

क्यों ज़रूरी है यह बैराज?

सबसे पहली और सीधी ज़रूरत, ताज के पीछे सालभर जल भंडारण।

आज सूखी यमुना ताजमहल की नींव और पर्यावरण दोनों के लिए खतरा है।

दूसरा, भूजल स्तर का लगातार गिरना।

प्रेम प्रकाश लिखते हैं, “अत्यधिक दोहन और अनियंत्रित खपत के कारण भूजल नीचे चला गया है। पानी की कमी और गुणवत्ता दोनों बिगड़ी हैं।”

तीसरा, वर्तमान जल संस्थान संरचनाएँ: जीवनी मंडी और सिकंदरा, अब शहर की ज़रूरतें पूरी नहीं कर पा रहीं।

“दोनों पुरानी हैं, विस्तार की गुंजाइश नहीं है,” वे कहते हैं। बैराज बनने पर दोनों किनारों पर नई जल परियोजनाएँ विकसित की जा सकती हैं। अभी तक अस्थायी समाधान के रूप में गंगा जल योजना से मथुरा के रास्ते पानी लाया जा रहा है। पर यह स्थायी इलाज नहीं।

आगरा को अपनी यमुना नदी चाहिए। वो भी स्वस्थ, जीवंत।

इतिहास गवाह है

1986-87 से यह प्रस्ताव सार्वजनिक विमर्श में है। कई गणमान्य व्यक्तियों ने इसकी नींव रखी। 2017 में विधानसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्वयं नागला पेमा स्थल का दौरा किया।

सिंचाई विभाग ने डीपीआर तैयार की। सुप्रीम कोर्ट और केंद्रीय जल मंत्री की सहमति भी मिली।

फिर भी काम आगे नहीं बढ़ा। फाइलें चलीं। समय बीता। नदी सूखती रही।

प्रेम प्रकाश अपने पत्र में लिखते हैं; “बैराज ओखला बैराज की तर्ज पर कंक्रीट का होना चाहिए, ताकि जल संकट का स्थायी समाधान हो सके और आपात स्थिति में सिंचाई के लिए भी पानी उपलब्ध रहे।”

विकास का व्यापक खाका

यह केवल पानी का सवाल नहीं। यह समग्र शहरी पुनर्जीवन की योजना है।बैराज के साथ “नेविगेशन” को राष्ट्रीय जलमार्ग (NW-110) का हिस्सा बनाया जा सकता है।

दोनों किनारों पर रिवर फ्रंट विकसित हो सकता है, ठीक साबरमती रिवर फ्रंट, अहमदाबाद की तर्ज पर।

प्रेम प्रकाश सुझाव देते हैं: “नया आगरा, साइबर सिटी के रूप में, दोनों तटों पर विकसित हो सकता है, आधुनिक पुल और सड़क सुविधाओं के साथ।”

ताज से लाल किले के बीच “आगरा चोपाटी” विकसित करने का विचार भी रखा गया है, मुंबई के जुहू चोपाटी की तर्ज पर।

बोटिंग। स्पीड बोट। पार्किंग। प्रवेश शुल्क। राजस्व। रोजगार।

अनुमान है कि कम से कम 1000 लोगों को सीधा रोजगार मिल सकता है।

शाहजहाँ गार्डन को भी इस हरित कॉरिडोर से जोड़ा जा सकता है।

सुबह-शाम सैर। शांत वातावरण।जीवंत नदी। पर्यटन को भी लाभ।

रात भर ठहरने वाले पर्यटकों की संख्या बढ़ेगी। स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी।

इस मुद्दे को जीवित रखा है “रिवर कनेक्ट” अभियान के कार्यकर्ताओं ने।

ये वे योद्धा हैं जो हर शाम यमुना आरती स्थल पर एकत्र होते हैं। भजन। मंत्र। दीपदान। दैनिक यमुना आरती अब केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं रही, कहते हैं पर्यावरणविद डॉ देवाशीष भट्टाचार्य। यह जन-जागरण का मंच बन चुकी है। आरती के बाद चर्चा होती है: बैराज क्यों ज़रूरी है।यमुना क्यों सूख रही है। सरकार को क्या करना चाहिए। युवाओं को जोड़ा जा रहा है। स्थानीय व्यापारियों को समझाया जा रहा है। पर्यावरण प्रेमियों को संगठित किया जा रहा है।

“नदी बचेगी तो ताज बचेगा,” यह हमारा नारा है।

अब निर्णय का समय

आगरा को मेट्रो मिली। एयर कनेक्टिविटी मिली। बेहतर सड़कें और कानून व्यवस्था मिली।

अब सबसे ज़रूरी अधोसंरचना बची है, यमुना पर बैराज।

प्रेम प्रकाश लिखते हैं; “यह समय राजनीतिक रूप से भी उपयुक्त है और नागरिकों की पीड़ा को देखते हुए नैतिक रूप से भी।”

बैराज को प्रधानमंत्री गति शक्ति मिशन का हिस्सा बनाया जा सकता है। समयबद्ध क्रियान्वयन।

स्पष्ट लक्ष्य। यह परियोजना केवल कंक्रीट की दीवार नहीं होगी। यह आगरा के आत्मविश्वास की पुनर्स्थापना होगी।

ताजमहल विश्व धरोहर है। पर उसके पीछे बहती नदी स्थानीय जीवनधारा है। अगर यमुना यूँ ही सूखी रही तो ताज की परछाईं भी फीकी पड़ जाएगी।

इतिहास हमें माफ़ नहीं करेगा।

आगरा 41 वर्षों से इंतज़ार कर रहा है।

अब इंतज़ार खत्म होना चाहिए।

यमुना को फिर से बहना है।

ताज के पीछे जल चमकना है।

और यह तभी संभव है जब नगला पेमा में बैराज बने

 प्यार किया तो 

पेरेंट्स से छिपाने वाली क्या बात है?

गार्ड रेल्स, जंजीरें नहीं: 

क्यों ज़रूरी है विवाह में एहतियात की एक परत

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

3 मार्च 2026

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रीना, 23 साल की। मध्यमवर्गीय परिवार की सीधी-सादी लड़की।छोटे शहर से महानगर आई थी नौकरी की तलाश में। सोशल मीडिया पर एक युवक से दोस्ती हुई। नाम कुछ और बताया। धर्म कुछ और। परिवार के बारे में अधूरी बातें। बड़े सपने। मीठी बातें। “मैं तुमसे शादी करूँगा… बस घरवालों को मत बताना अभी।”

रीना ने भरोसा किया। मोहब्बत में अक्सर तर्क पीछे छूट जाता है। कुछ ही दिनों में जल्दी-जल्दी अदालती शादी। परिवार को खबर तक नहीं। कागज़ी औपचारिकताएँ पूरी। फिर दबाव। “धर्म बदल लो… वरना रिश्ता नहीं चलेगा।” जिस्मानी और भावनात्मक ब्लैकमेल। निजी तस्वीरों की धमकी। दूसरे शहर भागे। जब तक रीना को सच्चाई समझ आई, बहुत देर हो चुकी थी। यह कहानी काल्पनिक लो सकती है, लेकिन आए दिन इस तरह की खबरें पढ़ने को मिल रही हैं, और ऐसे आरोपों वाले मामले देश के कई हिस्सों में दर्ज भी हुए हैं। 

बस यहीं से सवाल उठता है :  क्या विवाह जैसी गंभीर संस्था में एक न्यूनतम सूचना-प्रणाली, एक पारिवारिक सूचना, एक “पॉज़”, एक कूलिंग समयावधि ज़रूरी नहीं है?

भारत कोई प्रयोगशाला समाज नहीं है। यह तहज़ीबों, रिश्तों और भावनाओं से बुना देश है। तेज़ बदलाव के दौर में भी परिवार यहाँ एक अहम इकाई है।

इसी पृष्ठभूमि में गुजरात रजिस्ट्रेशन of Marriages Act, 2006 में प्रस्तावित संशोधन आजकल विवाद और चर्चा में है।

फरवरी 2026 में गुजरात के उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी ने घोषणा की कि विवाह पंजीकरण के समय जोड़े को यह बताना होगा कि क्या माता-पिता को सूचना दी गई है। उनके संपर्क विवरण दिए जाएँगे। रजिस्ट्रार दस कार्य दिवस में सूचना देगा। 30–40 दिन की अवधि सत्यापन और आपत्ति के लिए होगी।

विरोधी कहते हैं ये निजता पर हमला है। समर्थक कहते हैं ये पारदर्शिता और सुरक्षा का मंत्र है।

बहस का केंद्र अंतरधार्मिक प्रेम नहीं है। न ही यह वयस्कों की आज़ादी छीनने का प्रस्ताव है। संविधान हर बालिग को अपनी पसंद से विवाह और धर्म चुनने का अधिकार देता है।मगर समस्या वहाँ खड़ी होती है जहाँ प्रेम की आड़ में फ़रेब होता है।

झूठी पहचान। जबरन धर्म परिवर्तन के आरोप। कई बार नाबालिगों का शोषण।

जिन राज्यों में विशेष कानून बने, वहाँ कुछ आँकड़े सामने आए हैं।

Uttar Pradesh Prohibition of Unlawful Conversion of Religion Act 2020 के तहत 2021 से 2024 के बीच सैकड़ों मामले दर्ज हुए, अनेक गिरफ्तारियाँ हुईं। कुछ मामलों में अदालत में पीड़िताओं ने जबरन धर्म परिवर्तन का आरोप लगाया।

मध्य प्रदेश में Madhya Pradesh Freedom of Religion Act 2021 के अंतर्गत भी अनेक मामले दर्ज हुए, जिनमें नाबालिग लड़कियों के केस शामिल थे।

सज़ा कम होना यह साबित नहीं करता कि समस्या नहीं है। कई बार गवाह दबाव में मुकर जाते हैं। सुरक्षा नहीं मिलती। मुकदमे लंबित रहते हैं।

पहले ऐसे मामलों को सामान्य आपराधिक धाराओं में दर्ज किया जाता था। धर्म परिवर्तन का पहलू अलग से दर्ज ही नहीं होता था। अब कम से कम तस्वीर आंशिक रूप से साफ़ हो रही है।

सवाल यह है ; अगर कुछ रीना जैसी लड़कियाँ सचमुच धोखे का शिकार हो रही हैं, तो क्या राज्य चुप रहे?

भारत में विवाह सिर्फ़ दो व्यक्तियों का कॉन्ट्रैक्ट नहीं है। यह परिवारों का मिलन है। बैंड बाजा बारात। सामाजिक संतुलन से जुड़ा रिश्ता है। जब धोखा होता है, तो असर व्यापक होता है।

गुजरात का प्रस्ताव माता-पिता को वीटो पावर नहीं देता। यह सिर्फ सूचना देता है। एक दस्तावेज़ी रिकॉर्ड बनाता है। एक ठहराव देता है।

आज के डिजिटल दौर में फर्जी प्रोफाइल बनाना आसान है। पहचान छिपाना आसान है। ऐसे में सावधानी को “जंजीर” कहना शायद अतिशयोक्ति है।

साथ ही यह भी सच है कि किसी भी कानून का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। असली प्रेम करने वाले जोड़ों को परेशान नहीं किया जाना चाहिए। निगरानी और जवाबदेही ज़रूरी है।

देश स्तर पर भी एक समान नीति पर विचार हो सकता है। गवाह सुरक्षा तंत्र मजबूत होना चाहिए। संगठित अपराध पर कड़ी सज़ा होनी चाहिए।

लेकिन मूल प्रश्न वही है ; क्या राज्य की ज़िम्मेदारी नहीं कि वह कमजोरों की हिफ़ाज़त करे? रीना की काल्पनिक कहानी हमें भावुक कर सकती है। पर असली मुद्दा भावुकता नहीं, एहतियात है।

आज़ादी बेशक़ अज़ीज़ है। मगर सुरक्षा भी उतनी ही ज़रूरी है।

अगर विवाह पंजीकरण से पहले एक पारिवारिक सूचना किसी एक रीना को भी संभावित धोखे से बचा ले, तो क्या यह कदम पूरी तरह ग़लत कहा जा सकता है?

भारत जैसे संवेदनशील, विविध और जटिल समाज में, संतुलन ही असली सुशासन है।

 केंद्रीय बजट में घोषित

क्या ताज की छाया में जन्म लेगा भारत का आतिथ्य भविष्य?

आगरा का टाइम आ गया है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

5 मार्च 2026

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क्या यह सिर्फ एक और बजटीय घोषणा है?

या भारत के पर्यटन भविष्य की नींव रखने वाला फैसला?

फरवरी में केंद्र सरकार ने केंद्रीय बजट में राष्ट्रीय हॉस्पिटैलिटी अकादमी स्थापित करने की घोषणा की। बहुतों ने इसे एक और संस्थान समझकर आगे बढ़ा दिया। पर यह “एक और कॉलेज” नहीं है। यह उस सेक्टर को प्रोफेशनल बनाने का ब्लूप्रिंट है, जो चुपचाप भारत की अर्थव्यवस्था को सहारा देता है।

अब असली सवाल।

यह अकादमी बनेगी कहाँ?

जवाब भावनात्मक नहीं, व्यावहारिक होना चाहिए।

और व्यावहारिक जवाब है: आगरा।

आगरा कोई साधारण शहर नहीं। यह ताज महल का शहर है। दुनिया के सात अजूबों में शामिल यह स्मारक सिर्फ संगमरमर की इमारत नहीं, भारत की पहचान है। 2024-25 में करीब 69 लाख लोगों ने ताज देखा।

सोचिए, इतनी बड़ी, इतनी विविध और इतनी अंतरराष्ट्रीय भीड़ रोज कितने शहरों में उतरती है?

घरेलू पर्यटक। विदेशी मेहमान। राजनयिक। स्कॉलर। बैकपैकर। लक्ज़री ट्रैवलर।

आगरा हर दिन दुनिया का स्वागत करता है।

आतिथ्य की शिक्षा किताबों से नहीं आती। यह लोगों से आती है। अचानक आई भीड़ को संभालने से आती है। वीआईपी प्रोटोकॉल निभाने से आती है। विदेशी मेहमान की नज़ाकत समझने से आती है।

आगरा यह सब रोज करता है।

यह शहर एक जीवंत प्रयोगशाला है।

यहाँ हर दिन एक नया केस स्टडी है।

भौगोलिक दृष्टि से भी आगरा की स्थिति अद्वितीय है। यह देश के सबसे सफल पर्यटन सर्किट, Golden Triangle, का अहम हिस्सा है, जो दिल्ली, जयपुर और आगरा को जोड़ता है।

सड़क संपर्क मजबूत। रेल कनेक्टिविटी सुगम। दिल्ली-एनसीआर का अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा पास। जेवर एयरपोर्ट उभरता हुआ। दुनिया सीधे यहाँ पहुँच सकती है।

एक ही भूगोल में छात्रों को हेरिटेज टूरिज्म, लक्ज़री सर्किट, धार्मिक पर्यटन और वीकेंड ट्रैवल, सब देखने का मौका मिलेगा। ऐसा बहुआयामी exposure किसी isolated शहर में संभव नहीं।

पर सिर्फ भीड़ काफी नहीं। माहौल भी चाहिए।

आगरा ताज ट्रेपेजियम ज़ोन के भीतर आता है, एक नियंत्रित क्षेत्र, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने ताज की सुरक्षा के लिए बनाया। यहाँ प्रदूषण पर सख्ती है। औद्योगिक गतिविधियों पर नियंत्रण है।

यानी अकादमिक गतिविधियों के लिए आदर्श वातावरण। शांत कैंपस। सस्टेनेबल मॉडल। ग्रीन हॉस्पिटैलिटी पर शोध।

जब छात्र दुनिया की सबसे खूबसूरत धरोहर के संरक्षण के बीच पढ़ेंगे, तो “जिम्मेदार पर्यटन” उनके लिए किताब का अध्याय नहीं, जीवन का हिस्सा होगा।

अब बात इंडस्ट्री की। आगरा में एक दर्जन से अधिक फाइव-स्टार होटल हैं। The Oberoi Amarvilas। ITC Mughal। Taj Hotels।

साथ में सैकड़ों मध्यम और बुटीक होटल। गेस्ट हाउस। होमस्टे। पूरा इकोसिस्टम तैयार है। इंटर्नशिप के अवसर। लाइव होटल ऑपरेशन।इंडस्ट्री मेंटरशिप। मजबूत प्लेसमेंट नेटवर्क। यहाँ विद्यार्थियों को कृत्रिम लैब नहीं चाहिए। असली होटल उनकी प्रयोगशाला होंगे।

और ताज के इर्द-गिर्द सांस्कृतिक विरासत भी कम नहीं, आगरा किला, फतेहपुर सीकरी, केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान, मथुरा, वृंदावन। इतिहास। वन्यजीव। अध्यात्म। संस्कृति। पूरा क्लस्टर छात्रों को विविध भारत से रूबरू कराएगा। किताबी ज्ञान से आगे, ज़मीनी समझ देगा। प्रतीकात्मक महत्व भी कम नहीं।

हम दुनिया से कहते हैं—“अतिथि देवो भव:” तो क्या हमारी शीर्ष आतिथ्य अकादमी किसी ऐसे शहर में होनी चाहिए जहाँ विदेशी मेहमान कम आते हों? या फिर वहाँ, जहाँ दुनिया पहले से मौजूद है?

कल्पना कीजिए, कोई विदेशी पर्यटक ताज देखने आए और साथ ही जाने कि भारत ने यहीं विश्वस्तरीय हॉस्पिटैलिटी अकादमी बनाई है। संदेश साफ जाएगा, भारत सिर्फ स्मारक नहीं बनाता, वह सेवा संस्कृति भी गढ़ता है।

आर्थिक दृष्टि से भी यह निर्णय दूरगामी होगा। स्किल डेवलपमेंट बढ़ेगा। रोज़गार सृजन होगा। सेवा गुणवत्ता सुधरेगी।

उत्तर भारत में पर्यटन ज्ञान का केंद्र विकसित होगा। आगरा सिर्फ “पर्यटन शहर” नहीं रहेगा। वह “पर्यटन ज्ञान राजधानी” बनेगा। यह कोई पक्षपात की मांग नहीं। न सियासी तगादा।

यह तर्क है, तजुर्बे का। इन्फ्रास्ट्रक्चर का। प्रतीकात्मक ताकत का। और पैमाने का। फैसला अगर दूरदर्शिता से होगा, तो अकादमी ताज की छाया में ही बनेगी।

इतिहास गवाह रहेगा: जब भारत ने दुनिया का स्वागत और बेहतर करने का संकल्प लिया, तो उसने उसी शहर को चुना जो सदियों से दुनिया का स्वागत कर रहा है।

ताज सिटी तैयार है। अब फैसला दिल्ली को करना है।

 सिर्फ दौलत से सभ्यताएं नहीं बनतीं!

पेट्रोडॉलर का अभिशाप: जब तेल बन गया शक्ति, युद्ध और वैचारिक नफरत का स्रोत

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बृज खंडेलवाल द्वारा

6 मार्च 2026

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इतिहास कभी-कभी एक छोटे से वाल्व से ही पूरी दिशा बदल लेता है। मध्य पूर्व में वह वाल्व था—तेल।

१९७३ के तेल संकट ने दुनिया को झकझोर दिया। अरब देशों ने तेल पर प्रतिबंध (एम्बार्गो) लगा दिया, जिससे तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं। पश्चिमी अर्थव्यवस्थाएँ डगमगा गईं और खाड़ी के रेगिस्तानों में डॉलर की बाढ़ आने लगी; पेट्रोडॉलर की बाढ़।

१९७० के दशक से पहले खाड़ी के अधिकांश समाज सादगी भरे थे। ऊँटों की सवारी, व्यापार, मछली पकड़ना और धार्मिक यात्राएँ ही उनकी आजीविका के मुख्य साधन थे। तेल तो था, लेकिन उससे होने वाली आय सीमित थी। फिर १९७३ का संकट आया और सब कुछ बदल गया।

तेल की कीमतें चार गुना बढ़ गईं। खाड़ी देशों में धन का सैलाब आ गया। उदाहरण के लिए, सऊदी अरब की वार्षिक तेल आय १९७० के शुरुआती वर्षों में कुछ अरब डॉलर थी, जो कुछ ही वर्षों में २० अरब डॉलर से अधिक हो गई। देश की जीडीपी १९७३ में लगभग १५ अरब डॉलर से बढ़कर १९८१ तक करीब १८४ अरब डॉलर पहुँच गई। यह किसी चमत्कार से कम नहीं था, बल्कि एक आर्थिक जैकपॉट।

दुनिया में तेल का व्यापार अमेरिकी डॉलर में होता है। इसलिए तेल खरीदने वाले देशों को पहले डॉलर जमा करने पड़ते थे। खाड़ी देशों के पास डॉलर के विशाल भंडार जमा हो गए। ये डॉलर फिर पश्चिमी बैंकों, अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड्स और सबसे लाभदायक सौदों, खासकर हथियारों की खरीद, में वापस लौटने लगे।

अर्थशास्त्री इसे विनम्रता से पेट्रोडॉलर चक्र कहते हैं, लेकिन हर चक्र की अपनी कीमत होती है।

तेल की दौलत से मालामाल खाड़ी के शासक दुनिया के सबसे बड़े हथियार खरीदार बन गए। फाइटर जेट, मिसाइलें, टैंक, निगरानी प्रणालियाँ, जो भी पैसा खरीद सकता था, खरीदा गया। विडंबना यह कि छोटी आबादी वाले ये देश हथियारों के विशाल भंडार जमा करने लगे।

हाल के आंकड़ों के अनुसार, खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के देश वैश्विक हथियार आयात का लगभग २० प्रतिशत हिस्सा लेते हैं (२०२०-२४ के दौरान)। सऊदी अरब, कतर और कुवैत जैसे देश लंबे समय तक शीर्ष हथियार आयातकों में शामिल रहे।

लेकिन हथियार अक्सर अपना लक्ष्य खुद ढूंढ लेते हैं। मध्य पूर्व धीरे-धीरे लंबे संघर्षों का अखाड़ा बन गया; ईरान-इराक युद्ध, खाड़ी युद्ध, इराक युद्ध, कुवैत संकट, अफगानिस्तान, सीरिया का गृहयुद्ध और यमन का जारी संघर्ष। कई मामलों में पेट्रोडॉलर ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दोनों पक्षों को मजबूत किया।

तेल के पैसे से हथियार खरीदे गए।  

हथियारों ने युद्ध भड़काए।  

युद्धों ने तेल बाजार को अस्थिर किया।  

तेल महंगा हुआ।  

और फिर वही धन हथियारों में बह गया।

यह एक दर्दनाक चक्र था: तेल → हथियार → युद्ध → तेल।

जब यह क्षेत्र प्रॉक्सी युद्धों की आग में जल रहा था, उसी समय रेगिस्तान में चमक-दमक का एक नया नजारा उभर रहा था। दुबई जैसे शहर अरबपतियों के खेल का मैदान बन गए। रेत के टीले अब चमचमाते मॉल, कृत्रिम द्वीप और प्राइवेट जेटों से भरे हवाई अड्डों में बदल गए। बुर्ज खलीफा इस दौर का सबसे बड़ा प्रतीक है, यह सिर्फ इंजीनियरिंग का कमाल नहीं, बल्कि पेट्रो-दौलत का स्मारक है।

लेकिन इस चमक के पीछे कड़वी हकीकत भी थी। इन गगनचुंबी इमारतों को बनाने वाले हजारों प्रवासी मजदूर तंग शिविरों में रहते थे, जबकि महल और विलासिता बढ़ती जा रही थी। खाड़ी देशों में मानव विकास के कई संकेतक अच्छे हैं, लेकिन धन का वितरण बेहद असमान है, ज्यादातर संपत्ति शाही परिवारों और सत्ता संरचनाओं में केंद्रित है।

तेल ने समृद्धि तो दी, लेकिन न्याय अपने आप नहीं आया।

इससे भी अधिक चिंताजनक था वैचारिक प्रभाव। १९७० के दशक से अरबों पेट्रोडॉलर एशिया, अफ्रीका और यूरोप में धार्मिक संस्थानों में बहने लगे। कई जगहों पर इस्लाम की सख्त और कट्टर व्याख्याएँ फैलीं। धर्म, जो कभी आध्यात्मिक सहारा था, धीरे-धीरे भू-राजनीतिक हथियार बन गया। अल-कायदा जैसे चरमपंथी संगठनों को वैचारिक आधार मिला।

दूसरी ओर, ईरान ने भी अपने तेल राजस्व का उपयोग हिज्बुल्लाह, हमास जैसे समूहों को समर्थन देने में किया। इस तरह पेट्रोडॉलर आर्थिक मुद्रा से वैचारिक मुद्रा में बदल गया।

सबसे बड़ी विडंबना बौद्धिक और वैज्ञानिक विकास की है। इतनी अपार दौलत के बावजूद तेल-समृद्ध देशों का वैश्विक वैज्ञानिक शोध में योगदान बहुत कम है। पेटेंट और नोबेल पुरस्कार दुर्लभ हैं।

इसकी तुलना उन देशों से करें जिनके पास तेल नहीं था, लेकिन शिक्षा में निवेश किया, जैसे दक्षिण कोरिया और जापान। आज उनकी प्रयोगशालाएँ हजारों आविष्कार कर रही हैं।

खाड़ी में तेल ने इमारतें तेजी से खड़ी कीं, लेकिन विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय उसी गति से नहीं बने। ऊँटों की दौड़ को भरपूर फंडिंग मिली, लेकिन वैज्ञानिक ढांचा खड़ा करना चुनौतीपूर्ण रहा। दौलत ने स्थानीय प्रतिभा विकसित करने के बजाय विदेशी विशेषज्ञ खरीदना आसान बना दिया।

आर्थिक समृद्धि राजनीतिक खुलापन भी नहीं ला सकी। कई खाड़ी राजतंत्र आज भी दुनिया के सबसे कम राजनीतिक स्वतंत्र समाजों में गिने जाते हैं। प्रेस की आजादी सीमित है और असहमति को बर्दाश्त नहीं किया जाता।

महिलाओं के अधिकारों में सुधार आया है, सऊदी अरब में महिलाओं को ड्राइविंग और सार्वजनिक जीवन में अधिक भागीदारी मिली, लेकिन संरचनात्मक असमानताएँ बनी हुई हैं।

यह विरोधाभास है: दुनिया के सबसे अमीर देश, लेकिन राजनीतिक रूप से सबसे कम बहुलतावादी।

तेल की दौलत ने एक नाजुक सामाजिक समझौता बनाया, सरकारें उदार सब्सिडी और खर्च देती हैं, बदले में राजनीतिक भागीदारी सीमित रहती है।

अर्थशास्त्री इसे रिसोर्स कर्स (संसाधन अभिशाप) कहते हैं। प्राकृतिक संसाधनों से अचानक आसान धन आने पर सरकारें संस्थानों, नवाचार और जवाबदेही को अनदेखा कर देती हैं। मध्य पूर्व का पेट्रोडॉलर दौर इसका जीता-जागता उदाहरण है।

अब वही देश इस जाल से निकलने की कोशिश कर रहे हैं जो इस बात का संकेत हैं कि तेल का युग हमेशा नहीं रहेगा। ये देश खुद को विविधीकृत अर्थव्यवस्था में ढालने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

पिछले पचास वर्षों में पेट्रोडॉलर ने चमकदार शहर बनाए, हथियारों के भंडार खड़े किए और भू-राजनीतिक प्रभाव पैदा किया। लेकिन उसी ने युद्धों को हवा दी, चरमपंथ को फंड किया और सुधारों को टाला।

तेल ने रेगिस्तान को दौलत का साम्राज्य बना दिया।  मगर सिर्फ दौलत से सभ्यताएँ नहीं बनतीं।

Monday, December 23, 2024

 


Agra in the Grip of Linguistic Pollution: Why Do Agra's People Prefer to Target Women with Abuses?

By Brij Khandelwal

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December 23, 2024

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Education, culture, prosperity—these are no barriers when it comes to the use of foul and derogatory language spoken in Agra. From one angle, gender-targeted abuses add a distinct flavor and color to the language shamelessly used by the people of Agra. The residents are neither troubled nor compelled by linguistic pollution. Women, like men, are adept at using derogatory language. Age is also no barrier.

In the old days, people used idioms, proverbs, and couplets to embellish their expressions, but with the rising levels of anger and frustration, sexually oriented dialogue has become the order of the day.

Abuses and swear words serve as intriguing reflections of societal norms and frustrations, particularly among commoners in regions like Agra. It is notable that when eloquence falters, many resort to foul language as a means of expression, targeting mothers, sisters, and physical organs in every sentence to express their anger.

In rural Agra, as in many communities, the use of swearing or using abuses is often regarded as a legitimate outlet for angst and frustration. As people grapple with daily hardships and systemic injustices, swearing becomes a linguistic crutch that allows them to vent their emotions. However, it is worth questioning the targeting of women within these insults. A striking aspect of abusive language in this context is its gendered nature. The frequent invocation of mothers, sisters, and daughters in swears raises critical concerns about misogyny and the objectification of women. By employing familial references to insult someone, they not only demean their target but also project a disturbing view of women as commodities that can be dragged into disputes.

Public commentator Paras Nath Choudhary recently claimed that swearing serves as a non-violent tool for societal change. Although unconventional, it positions abuse as a form of expression that challenges the status quo. He suggests that while swearing may lack the refinement of idioms and proverbs, it embodies an authentic reaction against systemic oppression.

A recent research initiative by a university exploring the depths of abusive language underscores a pivotal moment in recognizing the role of such abusive expressions in sociolinguistic studies. This growing academic interest signals a shift towards understanding not just what is said, but why language—especially abusive language—remains an enduring facet of communication among common people.

In Agra, people keep on abusing, although abuses have become so common that their real meaning or thrust has been lost. Why are mother, sister, daughter targeted in every abuse? Brother-in-law is considered a polite abuse. Social thinker Srivastav says, "Society has to be changed not by bullets but by abuses. In a non-violence loving society like India, expressing anger through abuses is justified. There is a need to expand the abuses, especially LGBT community-friendly abuses should be produced." He reminds that abusing is also an accepted norm or ritual in Hindu society, like in weddings, women welcome the baraatis with abuses in a rhythmic manner, people enjoy, the mixed culture of streets and neighborhoods is adorned with abuses. If you want to work in the police, then it is necessary to be proficient in abuses.

Khusket Akbarabadi wrote years ago, "He who does not know how to abuse, his life is empty." Agra has been fortunate that instead of using weapons in fights, we make do with abuses.

In societies which are more educated, prosperous, and polite, only a bullet from a gun is successful to establish dominance or to prove one's madness. People of a sick society use pistols, members of cultured and civilized society express their irritation and anger through abuses.

Udham Pandit, an expert on the culture of Agra city, is pained that the western influence has caused a lot of damage to the abuse culture of the Taj City. The youth are only using "oh shit", perhaps the English vocabulary does not have much variety.

Nevertheless, abuses add current and boldness to the spoken language, so let it continue, say the wise people.