सात फेरे से पहले सात सवाल: बदलती पीढ़ी का ‘न’ जो सिर्फ इंकार नहीं, इकरार है अपने आप से
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बृज खंडेलवाल द्वारा
5 अप्रैल 2026
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दरवाज़ा आधा खुला था। भीतर पीली-सी रोशनी तैर रही थी। लैपटॉप की स्क्रीन पर एक लाइन चमक रही थी, “वन वे, पेरिस।”
फोन पर माँ की आवाज़ अटक कर रह गई, “बेटा, शादी कब…?”
उसने रुककर, जैसे अपने ही भीतर झाँककर कहा, “माँ, शायद… कभी नहीं।”
और फिर एक खामोशी। ऐसी, जैसे दीवार से पुरानी कील निकल जाए। तस्वीर अब भी टंगी है, पर सहारा बदल चुका है।
यह कहानी सिर्फ एक लड़की की नहीं है। यह उस पीढ़ी की कहानी है जो शादी को मंज़िल नहीं, विकल्प मानती है। और विकल्प भी ऐसा, जिसे टाल देना अब बगावत नहीं, सामान्य बात है।
कभी शादी जीवन का पासपोर्ट हुआ करती थी। समाज की मुहर। परिवार की गारंटी। इज़्ज़त का बीमा।
आज वही पासपोर्ट कई युवाओं को बेड़ियों जैसा लगता है।
बदलाव ने कोई शोर नहीं किया। वह दबे पांव आया। पहले करियर ने दरवाज़ा खटखटाया। फिर आत्मनिर्भरता भीतर आई। और फिर एक सवाल उठा, सीधा और असहज, “शादी क्यों?”
जब इस “क्यों” का जवाब ठोस नहीं मिला, तो परंपरा की दीवार में पहली दरार पड़ी।
आंकड़े भी अब कहानी कहने लगे हैं। 1993 में जहां 80 प्रतिशत किशोर शादी को अपना भविष्य मानते थे, आज यह संख्या 67 प्रतिशत पर आ गई है। महिलाओं में गिरावट और तेज़ है। यह सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं, सोच का भूकंप है।
आज की युवती कमाती है, निवेश करती है, अकेले दुनिया घूम आती है। उसे सहारे की ज़रूरत नहीं, साथ की तलाश है।
और फर्क यहीं है।
सहारा मजबूरी है। साथ चुनाव है।
दिल्ली की 29 साल की एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर। शानदार सैलरी। अपना घर। अपने फैसले। उसने अपने दोस्तों की शादियाँ देखीं। किसी ने करियर छोड़ा, किसी ने शहर, और किसी ने खुद को।
उसने तय किया, संबंध रहेंगे, पर बिना कागज़ के। बिना औपचारिक रिश्ते के।
वह मुस्कराकर कहती है, “रिश्ता दिल से होना चाहिए, दस्तावेज़ से नहीं।”
यह सोच अब किनारे की लहर नहीं रही। यह बीच धारा में उतर चुकी है। सहजीवन बढ़ रहा है। रिश्ते हैं, पर बिना स्थायी मुहर के। जैसे लोग ऐप डाउनलोड करते हैं। जरूरत हो तो रखें, नहीं तो डिलीट।
कठोर लगता है। पर यही सच्चाई है।
इस कहानी में पैसा भी एक बड़ा किरदार है। बच्चा पालना अब सिर्फ भावनात्मक नहीं, आर्थिक प्रोजेक्ट बन चुका है। अमेरिका में एक बच्चे पर 18 साल में करीब 3.8 करोड़ रुपये खर्च होते हैं। भारत में भी शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवनशैली की कीमतें आसमान छू रही हैं।
करीब 70 प्रतिशत लोग मानते हैं कि बच्चों की परवरिश अब बहुत महंगी हो गई है।
तो युवा खुद से पूछता है, “क्या मैं अपनी ज़िंदगी जी पाऊंगा?”
और जवाब अक्सर ‘नहीं’ की तरफ झुक जाता है।
इसके ऊपर अनिश्चितता का बादल है। महामारी की यादें अभी सूखी नहीं हैं। नौकरियों का बाज़ार भरोसेमंद नहीं रहा। जलवायु संकट भविष्य पर सवालिया निशान लगा रहा है।
ऐसे में स्थायी बंधन कई लोगों को जोखिम लगता है।
लेकिन सबसे गहरी दरार घर के भीतर से आती है।
बचपन में देखे गए रिश्ते। माँ-बाप की खामोश लड़ाइयाँ। बच्चों के नाम पर खिंचती लंबी चुप्पियाँ। “समझौता” जो प्यार बनकर पेश किया गया।
इन दृश्यों ने शादी की चमक फीकी कर दी।
एक युवा कहता है, “मैंने अपने घर में प्यार नहीं, समझौता देखा है।” और वहीं वह तय करता है कि वह वही कहानी दोहराएगा नहीं।
संयुक्त परिवार अब धीरे-धीरे किस्सों में सिमट रहे हैं। न दादी की गोद, न नानी का सहारा। आज के दादा-दादी भी अपनी जिंदगी जीना चाहते हैं। बच्चे अलग शहरों में, अलग दुनिया में।
बच्चा पालना अब अकेले का प्रोजेक्ट है। भारी। थकाने वाला। कभी-कभी डरावना।
तो युवा क्या करता है?
वह रुकता है। सोचता है। और कई बार साफ कह देता है, “नहीं।”
यह “नहीं” गुस्सा नहीं है। यह हिसाब है। जिंदगी की बैलेंस शीट।
शादी अब अनिवार्यता नहीं रही। वह विकल्प है। और हर विकल्प हर किसी के लिए जरूरी नहीं होता।
कुछ लोग अकेले खुश हैं। कुछ बिना शादी के रिश्तों में संतुष्ट हैं। कुछ अपने काम में ही अपना संसार ढूंढ लेते हैं। बिना शादी के प्रेम भी है, सेक्स संबंध भी हैं, और बिन फेरे हम तेरे की स्वीकृति भी बढ़ रही है।
समाज असहज है। माता-पिता बेचैन हैं। पर सवाल अब भी खड़ा है, क्या शादी सिर्फ इसलिए होनी चाहिए क्योंकि वह हमेशा से होती आई है?
परंपरा का सम्मान जरूरी है। लेकिन परंपरा का बोझ हर पीढ़ी को खुद तौलना होगा।
यह बदलाव डराता है। पर इसमें एक ईमानदारी भी है।
अब लोग शादी इसलिए नहीं कर रहे क्योंकि करनी है। वे इसलिए कर रहे हैं क्योंकि चाहते हैं।
और जब चाहत सच्ची होती है, तभी रिश्ता टिकता है।
दरवाज़ा अब भी आधा खुला है।
माँ अब भी इंतज़ार में है।
लेकिन बेटी अब अपराधबोध में नहीं, अपने फैसले में खड़ी है।
यही इस कहानी का असली मोड़ है।
शादी खत्म नहीं हो रही। वह अपना रूप बदल रही है।
और हर बदलाव, अंत नहीं होता। वह एक नई शुरुआत की दस्तक होता है।
बस फर्क इतना है कि अब सात फेरे लेने से पहले, लोग सात सवाल पूछ रहे हैं।