ब्रसेल्स: छात्र सड़क पर, कॉकरोच मैदान में और टॉयलेट का €2 का टिकट
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बृज खंडेलवाल द्वारा
ब्रसेल्स से
18 सितंबर, 2026
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ब्रसेल्स में छात्र सड़क पर उतर आए। दिल्ली में कॉकरोच राजनीति में उतर आए। और हम भारतीय पर्यटक टॉयलेट की तलाश में उतर गए।
यूरोप में शिक्षा महंगी हो रही है। भारत में शिक्षा पर राजनीति गरम है। और दोनों के बीच एक बेचारा पर्यटक खड़ा है, जिसे सिर्फ एक मुफ्त टॉयलेट चाहिए।
यही है आज का ग्लोबल विलेज!
ब्रसेल्स में छात्र कह रहे हैं, “पढ़ाई हमारा हक है।”
दिल्ली के कॉकरोच कह रहे हैं, “हम भी यहीं हैं!”
और भारतीय पर्यटक पूछ रहा है, “भाई, टॉयलेट किधर है?”
जब छात्र सड़क पर आए
16 सितंबर को फ्रेंच भाषी छात्रों ने ब्रसेल्स में मार्च निकाला। वे बढ़ती यूनिवर्सिटी फीस और पढ़ाई से जुड़े नए नियमों का विरोध कर रहे थे। पुलिस ने करीब 750 प्रदर्शनकारी गिने, जबकि आयोजकों ने संख्या लगभग 2,000 बताई।
यानी विरोध प्रदर्शन में भी आंकड़ों की अपनी राजनीति होती है।
छात्रों की शिकायत वाजिब थी। फीस बढ़ रही है, किराया महंगा है, खाना महंगा है और बस-ट्रेन भी जेब को सलाम ठोककर चलती है।
आयोजकों के अनुसार, आधे से ज्यादा छात्रों को अब करीब €1,200 तक की नामांकन फीस देनी पड़ सकती है। पढ़ाई और रहने का कुल सालाना खर्च €8,100 से €13,600 तक पहुंच सकता है।
इतना खर्च सुनकर भारतीय माता-पिता शायद तुरंत कहें,
“बेटा, सरकारी कॉलेज देख लो।”
छात्रों का पैगाम साफ है। पढ़ाई अमीरों का विशेषाधिकार नहीं बननी चाहिए।
और यह बात उन्होंने सड़क पर आकर कह दी।
दिल्ली ने भी कमाल कर दिया
उधर दिल्ली में आंदोलन का अंदाज ही अलग है।
यहां युवाओं के एक समूह ने Cockroach Janta Party के नाम से शिक्षा और युवा मुद्दों को लेकर आंदोलन खड़ा किया है। जून में इस समूह ने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन किया था।
नाम सुनकर पहले तो लगा कि यह कोई मजाक है।
फिर पता चला कि मजाक ने बाकायदा राजनीति का रूप ले लिया है।
ब्रसेल्स में छात्र पोस्टर लेकर निकले।
दिल्ली में कॉकरोच प्रतीक बन गए।
एक के हाथ में बैनर था।
दूसरे के पास एंटीना।
दोनों ने सिस्टम को संदेश दे दिया।
“हमें नजरअंदाज मत करो।”
लोकतंत्र की खूबसूरती भी यही है। जब इंसान की आवाज नहीं सुनी जाती, तो कभी-कभी कॉकरोच भी बोलने लगते हैं।
ब्रसेल्स के पास भी कम मसले नहीं
छात्र फीस से परेशान हैं। सुरक्षा भी बड़ा सवाल है। नशे से जुड़ी हिंसा और गोलीबारी ने राजधानी की फिक्र बढ़ाई है।
फिर रूसी संपत्तियों का मामला है।
यूरोक्लियर में करीब €200 अरब की रूसी संपत्तियां जमी हुई हैं। इन्हें यूक्रेन के लिए इस्तेमाल करने को लेकर यूरोप में कानूनी और कूटनीतिक बहस चल रही है।
यानी ब्रसेल्स में सवाल छोटे नहीं हैं।
अरबों यूरो के सवाल हैं।
लेकिन आम आदमी की मुश्किलें फिर भी वही हैं।
फीस कैसे भरें?
किराया कैसे दें?
सुरक्षा कैसे मिले?
और...
टॉयलेट कहां मिले?
यूरोप की राजधानी या राजनीति का चौराहा?
ब्रसेल्स की सड़क पर चलते हुए लगता है कि यह सिर्फ बेल्जियम की राजधानी नहीं है।
यह यूरोप का राजनीतिक चौराहा है।
यहीं यूरोपीय आयोग है। यहीं यूरोपीय परिषद है। यूरोपीय संघ की परिषद है। यूरोपीय संसद का हिस्सा है। नाटो का मुख्यालय भी यहीं है।
एक सड़क पर राजनयिक मिल सकता है।
दूसरी पर पत्रकार।
तीसरी पर लॉबिस्ट।
और चौथी पर ऐसा पर्यटक, जो वॉफल खाते-खाते पूछ रहा हो,
“भाई, यहां टॉयलेट फ्री है क्या?”
ब्रसेल्स की आबादी करीब 12 लाख है और यहां लगभग 180 राष्ट्रीयताओं के लोग रहते हैं।
यानी दुनिया यहां बसती है।
और दुनिया की सबसे बड़ी समस्याएं भी शायद यहीं बैठकर चाय पीती हैं।
फिर आया मिनी यूरोप
हमारी टूर लीडर मार्था गोम्स ने हमें समझाया कि ब्रसेल्स सिर्फ यूरोपीय आयोग, नाटो और गंभीर चेहरों का शहर नहीं है।
यह चॉकलेट का शहर भी है।
वॉफल का शहर भी है।
कॉमिक्स, कैफे, संग्रहालय और आर्ट नोव्यू का शहर भी है।
फिर हम पहुंचे मिनी यूरोप।
यहां यूरोप अपने सारे झगड़े भूलकर छोटा हो गया है।
फ्रांस छोटा।
इटली छोटा।
जर्मनी छोटा।
स्पेन छोटा।
और सीमाएं इतनी छोटी कि कोई नेता उन पर भाषण भी पूरा न कर पाए।
पद्मिनी ने इसे बहुत खूबसूरती से कहा,
“यहां यूरोप सीमाओं पर बहस करना बंद कर देता है और एक छोटे से बगीचे में बदल जाता है।”
करीब 350 यूरोपीय स्मारकों के छोटे मॉडल देखकर लगा कि यूरोप को समझने का यह शायद सबसे शांत तरीका है।
न कोई पासपोर्ट।
न इमिग्रेशन।
न सामान की चिंता।
न सीमा पर सवाल।
बस चलते रहिए और यूरोप आपकी जेब में।
फिर मिला ब्रसेल्स का सबसे मशहूर लड़का
लेकिन ब्रसेल्स में घूमते हुए हमारी मुलाकात एक ऐसे लड़के से भी हुई, जो सदियों से एक ही काम कर रहा है।
पेशाब!
यह है मशहूर Manneken Pis, यानी “पेशाब करता छोटा लड़का।”
छोटी-सी कांस्य मूर्ति, लेकिन शोहरत इतनी कि दुनिया भर के पर्यटक उसे देखने पहुंचते हैं।
हम भी पहुंचे।
लड़का निश्चिंत था।
न उसे €2 के टॉयलेट की चिंता थी, न छुट्टे पैसों की।
वह अपनी जगह खड़ा होकर खुलेआम अपना काम कर रहा था।
मैंने सोचा,
“भाई, तुम्हारी किस्मत अच्छी है। यहां कोई टॉयलेट टिकट नहीं मांगता।”
हम भारतीय पर्यटक दूसरी तरफ €1 या €2 देकर पेशाब करने की सुविधा खोज रहे थे और ब्रसेल्स का यह लड़का मुफ्त में अपना काम कर रहा था।
लोकतंत्र में बराबरी कहां है?
एक कांस्य लड़का मुफ्त में।
एक भारतीय पर्यटक €2 में!
Manneken Pis की एक और खासियत है। उसके कपड़े बदलते रहते हैं। दुनिया भर से लोग उसके लिए पोशाकें भेजते हैं। कभी वह सैनिक बनता है, कभी किसी देश का प्रतिनिधि और कभी किसी खास अवसर का मेहमान।
हमारे सामने वह बस ब्रसेल्स का सबसे प्रसिद्ध बच्चा था।
उसने कुछ कहा नहीं।
लेकिन उसका संदेश साफ था।
“भाई, ज्यादा सोचो मत। प्रकृति की पुकार का अपना संविधान होता है।”
और शायद इसी वजह से वह इस शहर की राजनीति से भी ज्यादा लोकप्रिय है।
लेकिन असली यूरोप टॉयलेट में मिला
Manneken Pis देखने के बाद हमें असली यूरोप का सबसे बड़ा सांस्कृतिक झटका मिला।
टॉयलेट।
हां, टॉयलेट!
€1 या €2 देकर पेशाब करने की सुविधा।
भारतीय पर्यटक के लिए यह किसी म्यूजियम की टिकट से कम अनुभव नहीं था।
€2 यानी करीब 220 रुपये।
भारत में इतने में चाय, समोसा और कभी-कभी नाश्ता भी हो जाए।
यहां प्रकृति की पुकार सुनते ही जेब पुकारने लगती है।
“भाई, पहले मुझे देखो!”
पद्मिनी को यह परेशानी दो बार झेलनी पड़ी। उनके पास €100 का नोट था, लेकिन छोटे सिक्के नहीं थे।
टॉयलेट को सिक्के चाहिए।
बैंक नोट नहीं।
यूरोप में बैंकिंग इतनी आधुनिक हो गई है कि कभी-कभी €100 का नोट भी बेकार लगता है।
और तब समझ आया कि असली यूरोपीय संकट रूस की संपत्ति नहीं है।
छुट्टे पैसे हैं।
हमने Manneken Pis को याद किया।
वह मुफ्त में काम कर रहा था।
हम €2 जुटाने में लगे थे।
इतिहास में पहली बार लगा कि एक छोटी-सी मूर्ति ने भारतीय पर्यटक को अर्थशास्त्र का सबसे बड़ा पाठ पढ़ा दिया।
मार्था बनीं हमारी टॉयलेट मंत्री
हमारी टूर लीडर मार्था धीरे-धीरे समूह की अनौपचारिक टॉयलेट मंत्री बन गईं।
उनकी सबसे जरूरी जानकारी कभी-कभी यह नहीं होती थी कि अगला महल कौन-सा है।
सवाल होता था,
“अगला वॉशरूम कहां है?”
महल बाद में देखा जा सकता है।
मूत्राशय लोकतंत्र की तरह इंतजार नहीं करता।
मार्था ने हमें यूरोप के महल दिखाए।
म्यूजियम दिखाए।
स्मारक दिखाए।
लेकिन सबसे बड़ी सेवा यह की कि हमारी किडनी को यूरोप यात्रा पूरी करवाई।
इसे कहते हैं असली टूर मैनेजमेंट।
भारत में मामला थोड़ा अलग है
भारत में पेट्रोल पंप है।
ढाबा है।
होटल है।
सुलभ शौचालय है।
और कुछ भारतीय पुरुषों के पास तो अपनी निजी ‘ओपन एयर व्यवस्था’ भी है।
बस दीवार देखी और काम खत्म।
यूरोप में ऐसा करना भारी पड़ सकता है।
यहां दीवार सरकारी हो सकती है।
कैमरा लगा हो सकता है।
और पुलिस भी लोकतंत्र की तरह हर जगह मौजूद हो सकती है।
इसलिए हमने तय किया कि यूरोप में संस्कृति का सम्मान करेंगे।
दीवारों को दीवार ही रहने देंगे।
ब्रसेल्स का असली सबक
ब्रसेल्स ने हमें कई चेहरे दिखाए।
यूरोपीय क्वार्टर में राजनीति है।
सड़कों पर प्रदर्शन है।
मिनी यूरोप में इतिहास है।
कैफे में चॉकलेट और वॉफल हैं।
Manneken Pis में हास्य है।
और टॉयलेट में अर्थशास्त्र है।
कभी लोकतंत्र पोस्टर लेकर मार्च करता है।
कभी कॉकरोच एंटीना लेकर मैदान में उतरता है।
कभी ब्रसेल्स का छोटा लड़का सदियों से पेशाब करता रहता है।
और कभी एक भारतीय पर्यटक €2 का सिक्का ढूंढता हुआ घूमता है।
ब्रसेल्स शायद यही सिखाता है।
दुनिया चाहे कितनी भी बड़ी समस्या पर बहस करे, आम आदमी की जरूरतें छोटी ही रहती हैं।
उसे पढ़ाई चाहिए।
सुरक्षा चाहिए।
सस्ती जिंदगी चाहिए।
और कभी-कभी...
बस एक मुफ्त टॉयलेट चाहिए।
यूरोप अरबों यूरो की राजनीति करता रहे।
कॉकरोच अपनी पार्टी बनाते रहें।
छात्र अपने पोस्टर उठाते रहें।
Manneken Pis अपनी ड्यूटी निभाता रहे।
हम भारतीय पर्यटक अपना नक्शा संभालकर चलते रहेंगे।
लेकिन अगली बार ब्रसेल्स आने से पहले एक बात जरूर याद रखूंगा।
पासपोर्ट से पहले टॉयलेट का पता पूछना है।