Saturday, August 15, 2026

 आंदोलन नहीं, आवेदन करो

बेरोजगारों की कतार: इनकी फिक्र किसे है?  

परिभाषाएं बदलीं, समस्या नहीं

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बृज खंडेलवाल  द्वारा 

16 अगस्त 2026

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पचास साल पहले बेरोजगार लोग एम्प्लॉयमेंट एक्सचेंज  के बाहर खड़े होते थे। आज वे कोचिंग सेंटरों, भर्ती वेबसाइटों और परीक्षा पोर्टलों के सामने खड़े हैं। जगह बदल गई है। इंतजार वही है। जॉब नहीं मिले, एम्प्लॉयमेंट news मिला।

तब कुछ क्लर्कों की नौकरियों के लिए हजारों आवेदन आते थे। आज भी हजारों,  अक्सर लाखों, उम्मीदवार कुछ सौ सरकारी पदों के लिए भिड़ते हैं। ग्रेजुएट चपरासी की नौकरी के लिए आवेदन करता है। पोस्ट ग्रेजुएट क्लर्क बनने की दौड़ में शामिल होता है। इंजीनियर ऐसी परीक्षा की तैयारी करता है जिसका उसके ज्ञान से कोई लेना-देना नहीं।

शिक्षा बढ़ी है। रोजगार उतनी तेजी से नहीं बढ़ा। और इन दोनों के बीच भारतीय युवा खड़ा है; एक हाथ में डिग्री और दूसरे में आवेदन-पत्र लेकर।


पुराना रोजगार कार्यालय अब इतिहास बन चुका है। उसकी जगह स्मार्टफोन ने ले ली है। युवा नौकरी पोर्टल पर रजिस्टर करता है, भर्ती ऐप डाउनलोड करता है, रिज्यूमे अपलोड करता है। रिजेक्शन भी अब डिजिटल हो गया है। इसे भी प्रगति ही कहिए।


सरकारी आंकड़ों में बेरोजगारी बेहतर दिखती है। लेकिन औसत आंकड़े बहुत कुछ छिपा लेते हैं। युवाओं में बेरोजगारी कहीं ज्यादा है। पढ़े-लिखे युवाओं के सामने समस्या और भी पेचीदा है।


मामला अब सिर्फ बेरोजगारी का नहीं। कम रोजगार, अधूरा रोजगार और अपनी योग्यता से नीचे का रोजगार भी बड़ा सवाल है। कोई काम कर रहा है, लेकिन कमाई इतनी नहीं कि अपने पैरों पर खड़ा हो सके। कोई नौकरी में है, लेकिन कल की गारंटी नहीं। कोई सालों से प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा है और परीक्षा बार-बार टल जाती है। भारतीय युवा ने इंतजार करने में शायद पीएचडी कर ली है।


भारत में सरकारी नौकरी का आकर्षण किसी धार्मिक आस्था से कम नहीं। नौकरी पक्की। इज्जत पक्की। छुट्टियां पक्की। भविष्य की चिंता कुछ कम। इसलिए 500 पदों पर लाखों आवेदन आ जाते हैं।


क्योंकि निजी नौकरी सिर्फ रोजगार देती है। सरकारी नौकरी रोजगार के साथ प्रतिष्ठा भी देती है। माता-पिता आज भी कहते हैं: “पहले सरकारी नौकरी की कोशिश करो।” मानो नियुक्ति-पत्र खानदानी विरासत हो।


युवा मामूली निजी नौकरी छोड़कर सरकारी परीक्षा की तैयारी में कई साल लगा देता है। उम्र बढ़ती है। प्रयास खत्म होते जाते हैं। एक दिन नौकरी की तैयारी ही उसका सबसे स्थायी रोजगार बन जाती है।


भारत ने करोड़ों पढ़े-लिखे युवाओं की फौज तैयार की है। डिग्रियां बढ़ीं। कॉलेज बढ़े। कोचिंग सेंटर और तेजी से बढ़े। हर कोई यूपीएससी, एसएससी, बैंकिंग, रेलवे, पुलिस या शिक्षक भर्ती की तैयारी कर रहा है।कई उम्मीदवार वर्षों लगा देते हैं ऐसी परीक्षाओं में, जहां पद ऊंट के मुंह में जीरा हैं।

कोचिंग उद्योग ने शानदार मॉडल खोज लिया है:  उम्मीद मत छोड़िए। फेल हुए? “अगली बार कोशिश कीजिए।”  फिर फेल? “रणनीति बदलिए।”  फिर भी फेल? “सफलता बस आने वाली है।”  सफलता जरूर आती है; अक्सर कोचिंग बेचने वाले की।

डिग्री नौकरी नहीं है। शिक्षा व्यवस्था की बड़ी विडंबना यह है कि उसने युवाओं को परीक्षा पास करना सिखाया है, समस्या हल करना नहीं। बच्चा परिभाषाएं याद करता है, उत्तर रटता है, प्रमाणपत्र जमा करता है। फिर कंपनी पूछती है: “आप बात कर सकते हैं? टीम के साथ काम कर सकते हैं? व्यावहारिक समस्या हल कर सकते हैं?”

सन्नाटा।


फिर गिग इकोनॉमी आई। कहा गया,मोबाइल उठाइए और डिलीवरी कीजिए, गाड़ी चलाइए, फ्रीलांस कीजिए। खूबी है लचीलापन। दिक्कत यह है कि लचीली आमदनी इतनी लचीली होती है कि अगले महीने का भरोसा नहीं रहता।


तकनीक ने नए अवसर पैदा किए हैं। उसने असुरक्षित रोजगार के लिए नई शब्दावली भी दी है। पहले अस्थायी या दिहाड़ी कहते थे। अब “गिग वर्क” कहते हैं। नाम आधुनिक हो गया। अनिश्चितता उतनी नहीं।


जब युवा नौकरियों के लिए संघर्ष सीख ही रहा था, एआई मैदान में उतर आया। नई नौकरियां पैदा करेगा, उत्पादकता बढ़ाएगा। लेकिन कई दोहराव वाले काम भी निगल सकता है।युवा अक्सर पहली सीढ़ी से शुरुआत करता है। वहीं अनुभव मिलता है। अगर एआई ने पहली सीढ़ी हटा दी तो ऊपर कौन पहुंचेगा?

कल के युवा को डिग्री, कौशल और एआई को सही आदेश देने की कला; तीनों चाहिए।


रोजगार की कहानी महिलाओं के बिना अधूरी है। शिक्षा और भागीदारी बढ़ी है, फिर भी बड़ा अंतर बना हुआ है। बाधाएं पुरानी हैं, बिना वेतन वाला घर का काम, सुरक्षा, बच्चों की देखभाल, सामाजिक दबाव।

विडंबना देखिए। हम कहते हैं: लड़कियों को पढ़ाओ। फिर पूछते हैं; नौकरी क्यों करनी है? हम कहते हैं; आत्मनिर्भर बनाओ। फिर पूछते हैं; घर कौन संभालेगा।


रोजगार योजनाओं की कमी नहीं: कौशल विकास, स्वरोजगार, उद्यमिता, अप्रेंटिसशिप, ग्रामीण रोजगार, ऋण, प्रशिक्षण, पोर्टल। कभी-कभी लगता है हर चीज के लिए योजना है, बस उसे सफल बनाने की योजना नहीं।

असली सवाल सीधा होना चाहिए: कितने लोगों को अच्छी नौकरी मिली? प्रशिक्षण और प्रमाणपत्र नहीं। स्थायी और सम्मानजनक रोजगार गिनिए। वहीं असली हिसाब होगा।


ग्रामीण बेरोजगारी ने रूप बदल लिया है। खेती सबको रोजगार नहीं दे सकती। युवा गांव छोड़कर शहर जा रहे हैं। सपने लेकर आते हैं। शहर किराया और ट्रैफिक का बिल थमा देता है।


प्रवास बुरा नहीं। मजबूरी में किया गया पलायन अलग बात है। युवा शहर इसलिए जाए कि वहां अवसर हैं; इसलिए नहीं कि गांव में कुछ बचा ही नहीं है। अगर गांव युवाओं को खो दें और शहर सम्मानजनक काम न दे पाएं, तो दोनों जगह हार होगी।


सरकारें योजनाएं घोषित करती हैं। विश्वविद्यालय डिग्रियां बांटते हैं। कंपनियां कौशल मांगती हैं। कोचिंग सेंटर उम्मीद बेचते हैं। माता-पिता फीस भरते हैं। युवा आवेदन करता रहता है।

भारत को एक और नारा नहीं, ईमानदार रोजगार नीति चाहिए। श्रम-प्रधान उद्योग बढ़ाने होंगे। अप्रेंटिसशिप मजबूत करनी होगी। व्यावसायिक शिक्षा बेहतर बनानी होगी। छोटे कारोबार को बढ़ने देना होगा। महिलाओं के लिए सुरक्षित रोजगार बढ़ाने होंगे।

सबसे जरूरी, प्रशिक्षण की संख्या नहीं, नौकरी की संख्या गिननी होगी। प्रमाणपत्र से किराया नहीं भरता। पोर्टल से घर नहीं चलता।

नौकरी मांगने वाला युवा बहुत बड़ी मांग नहीं कर रहा। वह चाहता है: एक काम, उचित वेतन और थोड़ी इज्जत।

कतार अब डिजिटल हो गई है। आवेदन एक क्लिक में चला जाता है। रिज्यूमे एआई बना देता है। लेकिन सवाल आज भी इंसानी है; जब एक पढ़ा-लिखा भारतीय युवा नौकरी मांगते हुए दरवाजे पर दस्तक देता है, तो दरवाजा खोलने की जिम्मेदारी किसकी है?  और अगर कोई दरवाजा नहीं खोलता, तो वह दस्तक कब तक देता रहेगा?

 लाल किले से मोदी का संदेश: आत्मनिर्भर भारत, युवा शक्ति और विकसित भारत

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

15 अगस्त 2026

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भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किला देशभक्ति के जज़्बे से सराबोर था। सेना के बैंड ने वंदे मातरम् की धुन छेड़ी और उसके बाद स्वदेशी 21 तोपों की सलामी दी गई। तिरंगे की छांव में Mi-17 हेलीकॉप्टरों ने पुष्पवर्षा की। ज्ञानपथ पर एनसीसी कैडेट और युवा स्वयंसेवक मौजूद थे। माहौल गंभीर भी था और उल्लासपूर्ण भी। हर तरफ राष्ट्रगौरव और विकसित भारत का संकल्प दिखाई दे रहा था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2026 को लाल किले से दिए अपने भाषण में मजबूत, आत्मनिर्भर और तकनीक के मामले में सक्षम भारत का खाका पेश किया। उनका मकसद साफ था: 2047 तक, यानी आजादी के 100 साल पूरे होने पर, भारत को विकसित राष्ट्र बनाना।

भाषण का सबसे अहम मुद्दा आत्मनिर्भर भारत रहा। मोदी ने मेक इन इंडिया, स्वदेशी और वोकल फॉर लोकल पर जोर दिया। उनका कहना था कि भारत को विदेशी निर्भरता कम करनी होगी। विनिर्माण, खेती, खाद्य प्रसंस्करण, तकनीक और नए आविष्कार देश की तरक्की के अहम आधार बन सकते हैं।

मोदी ने राष्ट्रीय ताकत की सात धाराओं की बात की, जिसे उन्होंने “शक्ति की सप्त धारा” कहा। इनमें विनिर्माण, कृषि और खाद्य प्रसंस्करण, तकनीक और नवाचार, संपर्क और कनेक्टिविटी, रक्षा, हरित और नीली अर्थव्यवस्था तथा भारत की सॉफ्ट पावर शामिल हैं। उनका मानना है कि इन सात क्षेत्रों को मजबूत करके देश की अर्थव्यवस्था को नई रफ्तार दी जा सकती है।

तकनीक को भाषण में खास जगह मिली। प्रधानमंत्री ने अगले एक साल में एक करोड़ युवाओं को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई का प्रशिक्षण देने की घोषणा की। सेमीकंडक्टर निर्माण पर भी जोर दिया गया। मकसद भारत को दुनिया की तकनीकी सप्लाई चेन का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनाना है।

छात्रों और नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए भी कुछ अहम घोषणाएं हुईं। मोदी ने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग की बात कही, खासकर गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के युवाओं के लिए। उनका संदेश था कि देश के बदलाव की धुरी युवा होने चाहिए। खेलों और नई खेल प्रतिभाओं को खोजने पर भी उन्होंने जोर दिया।

महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी भी भाषण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रही। मोदी ने विधानसभाओं और संसद में महिलाओं की 33 प्रतिशत भागीदारी की जरूरत पर जोर दिया। यह कदम महिलाओं को निर्णय लेने की प्रक्रिया में बराबर की जगह देने की दिशा में अहम माना जा सकता है।

ऊर्जा सुरक्षा को भी राष्ट्रीय विकास से जोड़ा गया। मोदी ने 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा पैदा करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा। उनके मुताबिक ऊर्जा में आत्मनिर्भरता आर्थिक विकास के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी जरूरी है।

राष्ट्रीय सुरक्षा पर भी प्रधानमंत्री का रुख सख्त रहा। उन्होंने सशस्त्र नक्सलवाद के साथ-साथ “दिमागी नक्सलवाद” से भी सावधान किया। उनका तर्क था कि विकास के लिए देश की एकता, अमन और आंतरिक सुरक्षा बेहद जरूरी है।

इस पूरे भाषण में वंदे मातरम् का विशेष महत्व रहा। राष्ट्रीय गीत के 150 साल पूरे होने के मौके पर लाल किले में उसका गूंजना इतिहास, संस्कृति और राष्ट्रभावना को एक साथ जोड़ गया।

कुल मिलाकर मोदी का भाषण आर्थिक महत्वाकांक्षा और राष्ट्रवाद का मेल था। आत्मनिर्भरता, तकनीक, युवा, ऊर्जा, विनिर्माण और राष्ट्रीय एकता इसके प्रमुख स्तंभ रहे।

लेकिन असली इम्तिहान घोषणाओं के बाद शुरू होगा। बड़े लक्ष्य तभी मायने रखते हैं जब वे नौकरी, आमदनी, अवसर और बेहतर जिंदगी में बदलें। 2047 का विकसित भारत सिर्फ आंकड़ों और नारों से नहीं बनेगा। उसे करोड़ों आम भारतीयों की जिंदगी में महसूस होना चाहिए।

Thursday, August 13, 2026

 शीला की जवानी बुढ़ापा बन गई; फैसला आना है, रेप हुआ या नहीं!

सार्वजनिक जीवन में यौन आरोपों और जवाबदेही की लंबी कहानी

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

15 अगस्त 2026

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कितनी बार एक औरत को बोलना पड़ेगा, तब जाकर व्यवस्था सुनेगी? कितनी सुर्खियाँ चीखेंगी, तब किसी ताकतवर आदमी से कथित यौन अपराध का हिसाब माँगा जाएगा?

भारत में यह दृश्य अब अनजाना नहीं रहा। किसी नेताजी पर आरोप लगता है। मीडिया में तूफान आता है। कार्यकर्ता सड़क पर उतरते हैं। हैशटैग ट्रेंड करते हैं। पीड़िता से कहा जाता है: बोलो, साबित करो, फिर बोलो और उस दर्द को बार-बार जीओ।

फिर कानून की गाड़ी चलती है। धीरे-धीरे, बेहद धीरे। इतनी धीमी कि हिम्मत चुकने लगती है, पैसा खत्म होने लगता है, गवाह थक जाते हैं और सबूत कमजोर पड़ने लगते हैं। उधर जनता का गुस्सा भी नई खबर की तलाश में निकल जाता है।

कल का आक्रोश आज की पुरानी खबर बन जाता है।

सामाजिक कार्यकर्ता पद्मिनी अय्यर सवाल उठाती हैं, “इंसाफ के लिए पीड़िता को ही हर बार इतना सब्र क्यों करना पड़ता है, जबकि सत्ता के पास वक्त भी है, रसूख भी और बच निकलने के रास्ते भी?”

जन टिप्पणीकार पारस नाथ चौधरी कहते हैं कि पिछले दो दशकों में भारत ने राजनीति, फिल्म, मीडिया और धार्मिक संस्थाओं में एक ही तरह का तमाशा बार-बार देखा है,: एक ताकतवर आदमी, कुछ गंभीर आरोप, मीडिया का शोर और कभी-कभी वर्षों बाद अदालत का फैसला। किसी को उम्रकैद मिली। कोई बरी हो गया। किसी ने चुपचाप इस्तीफा दिया। किसी ने खुलेआम आरोप नकार दिए। लेकिन इन तमाम मामलों ने एक बड़ा सवाल जरूर छोड़ा है: क्या ताकतवर लोगों के लिए कानून की चाल अलग होती है?


पूर्व सांसद और पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवगौड़ा के पोते प्रज्वल रेवन्ना का मामला हाल के सबसे सनसनीखेज मामलों में रहा।

अप्रैल 2024 में कर्नाटक के हासन में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले सैकड़ों कथित यौन वीडियो वाले पेन ड्राइव सामने आए। आरोप कई महिलाओं के यौन उत्पीड़न से जुड़े थे। रेवन्ना देश छोड़कर चले गए और मई 2024 में लौटने पर गिरफ्तार हुए।

चार मामलों में चार्जशीट दाखिल हुई। अगस्त 2025 में विशेष अदालत ने एक घरेलू कामगार से बार-बार बलात्कार के मामले में उन्हें दोषी ठहराया। वीडियो, डीएनए और फॉरेंसिक सबूतों पर भरोसा करते हुए अदालत ने प्राकृतिक जीवन के शेष समय तक जेल की सजा सुनाई। रेवन्ना ने अपील की है और मामला अभी आगे की कानूनी प्रक्रिया में है।


उत्तर प्रदेश के उन्नाव के पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को नाबालिग लड़की से बलात्कार के मामले में दोषी ठहराया गया।

मामले ने देश को झकझोर दिया। आरोप लगे कि पीड़िता के पिता की हिरासत में मौत और बाद में हुए सड़क हादसे में परिवार के सदस्यों तथा वकील की मौत के पीछे सेंगर के सहयोगियों का हाथ था।

सेंगर को उम्रकैद हुई। दिल्ली हाईकोर्ट ने 2025 के आखिर में सजा निलंबित की। लेकिन मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश को पलट दिया और मुख्य अपील पर जल्द फैसला करने को कहा। एक दूसरे मामले में मिली सजा के कारण सेंगर जेल में बने हुए हैं।


भाजपा सांसद और 2023 तक भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष रहे बृज भूषण शरण सिंह पर कई महिला पहलवानों ने यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए। इनमें ओलंपिक पदक विजेता भी शामिल थीं।

जंतर-मंतर पर पहलवानों का आंदोलन देशभर में चर्चा का विषय बना। एफआईआर दर्ज हुई। बृज भूषण ने आरोपों से इनकार किया।

अगस्त 2026 में दिल्ली की अदालत ने उन्हें और एक सह-आरोपी को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि आरोप संदेह से परे साबित नहीं हुए। आदेश के कुछ हिस्सों में आरोपों को राजनीतिक रूप से प्रेरित दिखाई देने की बात भी कही गई। शिकायतकर्ताओं ने फैसले के खिलाफ अपील करने की बात कही है।

यहाँ कानून ने अपना फैसला सुना दिया है। लेकिन बहस अभी खत्म नहीं हुई।


राजस्थान के पूर्व मंत्री महिपाल मदेरणा का नाम 2011 में एएनएम भंवरी देवी के लापता होने और कथित हत्या के मामले में सामने आया।

उन्होंने संबंध होने की बात स्वीकार की, लेकिन हत्या में शामिल होने से इनकार किया। इस कांड ने उनका राजनीतिक करियर खत्म कर दिया। मुकदमा वर्षों तक चलता रहा। देरी के आधार पर कई आरोपियों को जमानत मिली। 2021 में मदेरणा की मौत हो गई, जबकि मामला अभी लंबित था।

कानून की किताब में तारीखें होती हैं। पीड़ित की जिंदगी में इंतजार होता है।


आसाराम बापू और गुरमीत राम रहीम सिंह जैसे स्वयंभू धर्मगुरुओं के मामले भी इसी बहस का हिस्सा हैं।

आसाराम को आश्रम में नाबालिग से बलात्कार के मामले में उम्रकैद हुई। मई 2026 में राजस्थान हाईकोर्ट ने बलात्कार की सजा बरकरार रखी, हालांकि कुछ अन्य आरोपों में राहत दी। मामला सुप्रीम कोर्ट में है।

डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को 2017 में दो बलात्कार मामलों में दोषी ठहराया गया था। उन्हें 20 साल की सजा मिली। उन्हें कई बार पैरोल भी मिली। हाल में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पत्रकार की हत्या के मामले में उन्हें बरी किया, लेकिन उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।

यहीं एक और सवाल पैदा होता है; क्या जेल की सलाखें सबके लिए बराबर होती हैं?


भारत में #MeToo आंदोलन ने 2018 में जोर पकड़ा। अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने 2009 की फिल्म शूटिंग के दौरान अभिनेता नाना पाटेकर पर उत्पीड़न का आरोप लगाया। पाटेकर ने आरोपों से इनकार किया।

टीवी निर्माता विंटा नंदा ने अभिनेता आलोक नाथ पर 1990 के दशक में यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया। एफआईआर दर्ज हुई और नाथ ने आरोपों से इनकार किया।

आंदोलन धीरे-धीरे राजनीति और मीडिया तक भी पहुँचा।

तत्कालीन केंद्रीय मंत्री एम.जे. अकबर पर कई महिला पत्रकारों ने उत्पीड़न के आरोप लगाए। उन्होंने इस्तीफा दिया और पत्रकार प्रिया रमानी पर मानहानि का मुकदमा किया। 2021 में दिल्ली की अदालत ने रमानी के पक्ष में फैसला दिया।


#MeToo दौर का शायद सबसे लंबा कानूनी सफर तरुण तेजपाल का रहा।

तहलका के संस्थापक और पूर्व प्रधान संपादक पर 2013 में गोवा के एक होटल की लिफ्ट में एक युवा सहकर्मी के यौन उत्पीड़न का आरोप लगा।

2021 में ट्रायल कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया। फैसले में पीड़िता के घटना के बाद के व्यवहार पर की गई टिप्पणियों की काफी आलोचना हुई। गोवा सरकार ने फैसले को चुनौती दी।

और फिर आया 6 अगस्त 2026,

करीब तेरह साल बाद बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा बेंच ने निचली अदालत का फैसला पलट दिया। तेजपाल को बलात्कार और संबंधित अपराधों में दोषी ठहराया गया। उन्हें दस साल की कठोर कैद और पीड़िता को देने के लिए भारी जुर्माने की सजा सुनाई गई। तेजपाल ने सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही है।

तेरह साल।

एक मुकदमे के लिए शायद सिर्फ एक संख्या। एक पीड़िता के लिए जिंदगी का बड़ा हिस्सा।


सभी मामले बलात्कार या यौन उत्पीड़न के नहीं थे। कुछ मामलों में निजी वीडियो सामने आए और आरोपों से इनकार हुआ।

एन.डी. तिवारी का 2009 का सेक्स-वीडियो विवाद और बाद में डीएनए जांच से विवाहेतर बेटे की पुष्टि हुई। अभिषेक मनु सिंघवी का 2012 का वीडियो विवाद भी खूब उछला। अदालतों ने उसके प्रसार पर रोक लगाने की कोशिश की।

स्वामी नित्यानंद का वीडियो विवाद, अभिनेता शाइनी आहूजा की बलात्कार में सजा और 1970 के दशक का सुरेश राम से जुड़ा राजनीतिक सेक्स-फोटो विवाद बताते हैं कि यह बीमारी नई नहीं है।

नई सिर्फ कैमरे की ताकत है। सोशल मीडिया की रफ्तार है। और शायद समाज की याददाश्त भी थोड़ी तेज हुई है।

पैटर्न साफ दिखाई देता है

इन मामलों को साथ रखिए तो कुछ बातें साफ दिखती हैं।

आरोप और अंतिम कानूनी फैसले के बीच अक्सर बहुत लंबा फासला होता है। तेजपाल का मामला तेरह साल चला। कई मामलों में अपीलें वर्षों तक चलती रहती हैं।

नतीजे भी अलग-अलग रहे। कहीं दोषसिद्धि हुई। कहीं बरी किया गया। कहीं मामला अभी अदालतों में है। इसलिए आरोप को फैसला मानना भी गलत है और बरी होने को हर सवाल का अंत मान लेना भी।

कई मामलों में पीड़ित महिलाएँ उस व्यक्ति पर संस्थागत रूप से निर्भर थीं। घरेलू कामगार, नाबालिग लड़कियाँ और खेल संघों के अधीन रहने वाली महिला खिलाड़ी इसका उदाहरण हैं।

सामाजिक कार्यकर्ता मुक्ता गुप्ता कहती हैं, “सूची में आरोपी और दोषी सभी पुरुष हैं। महिलाएँ आरोप लगाने वाली, पीड़ित या सर्वाइवर के रूप में दिखाई देती हैं।”

उनका कहना है कि यह केवल भारत की कहानी नहीं है। दुनिया भर में सार्वजनिक जीवन के ताकतवर पुरुषों पर यौन दुर्व्यवहार के आरोप सामने आते रहे हैं। सत्ता, राजनीतिक पद, फिल्मी हैसियत और धार्मिक प्रभाव जैसे पद अक्सर एक असमान शक्ति-संबंध स्थापित करते हैं।

महिला सार्वजनिक हस्तियों पर भी विवाद होते हैं। लेकिन भारत में उनके खिलाफ मामले अधिकतर भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद या निजी जीवन से जुड़े विवादों के रूप में सामने आते हैं।

असली सवाल अभी बाकी है

मामले आते रहते हैं। अदालतें अपनी रफ्तार से चलती रहती हैं। वकील तारीखें लेते रहते हैं। गवाह थकते रहते हैं। पीड़ित इंतजार करते रहते हैं।

और जनता?

जनता कुछ दिन गुस्सा करती है। फिर अगली खबर पर चली जाती है।

यही शायद इस पूरी कहानी का सबसे कड़वा सच है।

कानून अंधा हो सकता है, लेकिन सत्ता कभी-कभी बहुत अच्छी तरह देखती है कि रास्ता कहाँ से निकलेगा।

तो सवाल फिर वही है: 

एक औरत को कितनी बार बोलना पड़ेगा, तब जाकर व्यवस्था सचमुच सुनेगी?


Tuesday, August 11, 2026

 अमेरिका में सपने टूटे, भारत में कहानी मिली

संतोष नायर की जिंदगी का कड़वा-मीठा सफर

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पुस्तक समीक्षा

Silver Linings in the Dark Sky

278 पृष्ठ | अंग्रेज़ी

प्रकाशक: Pink Lotus, Varanasi

उपलब्ध: Amazon

लेखक: Santosh Nayar

संपादक: Dr Alok Gupta, PhD

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

13 अगस्त 2026

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अमेरिका सपनों की धरती है। कम-से-कम विज्ञापन यही कहते हैं। वहाँ सपने डॉलर में आते हैं और कभी-कभी उनकी ईएमआई जिंदगी भर चुकानी पड़ती है।

संतोष नायर भी सपने लेकर अमेरिका गए थे। लेकिन जिंदगी ने उन्हें ऐसा पैकेज थमा दिया, जिसमें सफलता के साथ बीमारी, शराब, टूटते रिश्ते, अदालत, जेल और आखिर में भारत वापसी भी शामिल थी। कहानी में इतना मसाला है कि बॉलीवुड की कोई पटकथा पढ़कर भी कह सकती है: भाई, थोड़ा कम करो!

लेकिन यह फिल्म नहीं, एक असली जिंदगी थी। और असली जिंदगी की पटकथा सबसे ज्यादा निर्दयी होती है।

संतोष नायर को आखिरकार कुछ ठहराव मैसूर में मिला। मगर अंतिम वर्षों में खराब सेहत ने उन्हें फिर घेर लिया। 2024 में उनका निधन हो गया। पीछे रह गई एक अधूरी पांडुलिपि, और एक ऐसी जिंदगी, जिसमें जितने मोड़ थे, उतने शायद किसी हाईवे में भी नहीं होते।

यही पांडुलिपि बाद में Silver Linings in the Dark Sky बनी।

जिंदगी ने कोई सीधी सड़क नहीं दी

नायर पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट थे। महत्वाकांक्षी थे। प्रतिभाशाली थे। अमेरिका में बेहतर भविष्य का सपना था। शादी हुई। परिवार बना। पेशेवर सफलता मिली।

फिर जिंदगी ने अचानक गियर बदल दिया।

बाइपोलर डिसऑर्डर ने उनके जीवन में प्रवेश किया। मानसिक उन्माद के दौर आए। शराब ने मुश्किलों को और उलझाया। रिश्ते कमजोर हुए। गलत फैसले हुए। कानून सामने आया और अंततः जेल की सलाखें भी आ गईं।

तीन शादियाँ, पारिवारिक तनाव, कभी गजब का आत्मविश्वास और कभी बच्चों जैसी मासूमियत; नायर एक ही व्यक्ति में कई व्यक्तित्वों का चलता-फिरता संस्करण लगते हैं।

लेकिन यही बाइपोलर डिसऑर्डर की पेचीदगी भी है। यह बीमारी सिर्फ मूड बदलने का मामला नहीं है। इसमें व्यक्ति की सोच, ऊर्जा, निर्णय क्षमता और व्यवहार तक प्रभावित हो सकते हैं।

मेनिया के दौरान इंसान को अपने फैसले बिल्कुल सही लग सकते हैं। दिमाग एक्सप्रेस ट्रेन की रफ्तार से दौड़ता है और विवेक बेचारा अगले स्टेशन पर छूट जाता है।

फिर जिंदगी बिल भेजती है।

रिश्तों का बिल।

पैसों का बिल।

नौकरी का बिल।

परिवार की चिंता का बिल।

और अंत में कानून का बिल, जिसमें ब्याज सबसे ज्यादा होता है।

नायर कई बार दवा लेना भूल जाते थे। इसके बाद उनका व्यवहार बदल जाता था। वे चिड़चिड़े, रूखे या हिंसक हो सकते थे। उनके अनुभव से पता चलता है कि मानसिक बीमारी को समझे बिना केवल व्यवहार को देखना कितना खतरनाक हो सकता है।

लेकिन नायर सिर्फ अपनी बीमारी नहीं थे

यही इस किताब की सबसे महत्वपूर्ण बात है।

नायर को सिर्फ बाइपोलर डिसऑर्डर वाला व्यक्ति मान लेना उनके साथ नाइंसाफी होगी। वे बुद्धिमान थे। जिज्ञासु थे। महत्वाकांक्षी थे। उनमें हास्यबोध था। वे अच्छे पेशेवर, पति, पिता, मित्र और प्रवासी भी थे।

बीमारी उनकी कहानी का हिस्सा थी।

पूरी कहानी नहीं।

यही फर्क इस आत्मकथा को महज बीमारी की कहानी बनने से रोकता है।

नायर अपनी जिंदगी को चमकदार पैकेजिंग में बेचने की कोशिश नहीं करते। वे खुद को महान नायक नहीं बनाते। अपनी गलतियों पर पर्दा नहीं डालते। अपनी कमजोरियों को भी सामने रखते हैं।

कभी वे बेहद समझदार लगते हैं। कभी लापरवाह। कभी अजीब। कभी बेहद मासूम।

और कई बार इतने मजेदार कि पाठक सोचता है, यह आदमी अपनी जिंदगी का दुख भी स्टैंड-अप कॉमेडी में बदल सकता था।

अध्यायों के नाम भी चुगली करते हैं

नायर की किताब के अध्यायों के नाम उनके मिजाज की पूरी चुगली करते हैं।

पहली शादी का नाम है—“Made in Heaven, Deep Fried on Earth.”

दूसरी शादी—“Until Mania Do Us Apart.”

और जेल?

उसे उन्होंने अपनी “Favorite Alma Mater” बना दिया।

आम आदमी कॉलेज से डिग्री लेकर निकलता है।

नायर जेल से अनुभव लेकर निकले।

जिंदगी ने उन्हें शायद गलत जगह दाखिला दिया था, लेकिन उन्होंने वहाँ भी नोट्स बना लिए।

हँसी के पीछे हालांकि दर्द बहुत गहरा है।

बीमारी और अपराध के बीच की धुंध

नायर के जेल अनुभव अमेरिकी न्याय व्यवस्था पर असहज सवाल उठाते हैं।

मानसिक बीमारी से जूझता व्यक्ति जब कानून के सामने आता है, तो क्या सिस्टम उसके मन को समझता है या सिर्फ उसके व्यवहार को सजा देता है?

सवाल आसान हैं।

जवाब नहीं।

बीमारी कब व्यवहार बन जाती है?

व्यवहार कब गलती बनता है?

और गलती कब अपराध?

किताब इन सवालों का कोई आसान फार्मूला नहीं देती। शायद इसलिए कि जिंदगी भी ऐसा कोई फार्मूला नहीं देती।

मानसिक उन्माद में लिया गया फैसला बाद में पागलपन लग सकता है। लेकिन उस समय वही फैसला व्यक्ति को पूरी तरह सही लगता है।

आत्मविश्वास लापरवाही बन जाता है। ऊर्जा जुनून में बदल जाती है। विचार इतनी तेजी से दौड़ते हैं कि उनके परिणाम पीछे छूट जाते हैं।

और जब परिणाम आते हैं, तब तक ट्रेन काफी दूर निकल चुकी होती है।

अँधेरे में भी हास्य की एक खिड़की

नायर की सबसे बड़ी खूबियों में एक उनका हास्यबोध था।

वे अपनी जिंदगी के सबसे खराब अध्यायों में भी विडंबना खोज लेते थे। शायद यही उनकी मानसिक ताकत थी।

यह किताब इसलिए कोई मोटिवेशनल पोस्टर नहीं बनती।

यह वह किताब नहीं है जिसमें लिखा हो; “मुश्किलों से मैंने सीखे जीवन के दस महान सबक।”

न कोई बनावटी ज्ञान।

न हर पन्ने पर चमकदार जीवन-दर्शन।

बस एक आदमी है जो कहता है; मेरे साथ यह हुआ।

और फिर पाठक खुद तय करता है कि इससे क्या समझना है।

यही ईमानदारी किताब को असरदार बनाती है।

जेल में शुरू हुई कहानी

नायर ने जेल में रहते हुए अपनी आत्मकथा लिखना शुरू किया था। 2013 में उन्होंने पांडुलिपि डॉ. आलोक गुप्ता को भेजी।

भारत लौटने के बाद डॉ. गुप्ता ने उन्हें Glowtronics में काम करने का अवसर दिया। लगा कि शायद जिंदगी अब दूसरी पारी खेलने के लिए तैयार है।

लेकिन बीमारी ने फिर दस्तक दी।

नौकरी चली गई। पांडुलिपि भी जिंदगी की फाइलों में दब गई।

और जिंदगी, जैसा कि अक्सर करती है, आगे बढ़ गई।

फिर 2024 में नायर का निधन हो गया।

लेकिन कहानी खत्म नहीं हुई थी।

2026 में डॉ. गुप्ता को वह पुरानी पांडुलिपि फिर मिली।

एक भूली हुई आवाज ने अचानक दरवाजा खटखटाया।

नायर अब सफाई देने के लिए मौजूद नहीं थे। वे किसी घटना पर अपना पक्ष नहीं रख सकते थे। अपनी गलती को सही नहीं ठहरा सकते थे। किसी पुराने फैसले का संदर्भ नहीं समझा सकते थे।

इसलिए किताब में उनकी आवाज जैसी थी, वैसी ही बची रही।

कच्ची।

बेबाक।

मजेदार।

कभी गुस्सैल।

कभी कमजोर।

और सबसे बढ़कर: इंसानी।

किताब न बरी करती है, न सजा देती है

Silver Linings in the Dark Sky नायर को निर्दोष साबित करने की कोशिश करती है, न उन्हें कटघरे में खड़ा करती है।

वह सिर्फ हमसे थोड़ी समझ मांगती है।

और थोड़ी इंसानियत।

मानसिक बीमारी को लेकर हमारा समाज अभी भी अजीब तरह से असहज है। शारीरिक बीमारी हो तो हम दवा, डॉक्टर और आराम की सलाह देते हैं। मानसिक बीमारी हो तो सलाह देने वालों की पूरी बारात निकल आती है।

“हिम्मत रखो।”

“अपने आपको कंट्रोल करो।”

“ज्यादा मत सोचो।”

काश दिमाग भी रिमोट कंट्रोल से चलता!

बाइपोलर डिसऑर्डर गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्या है। इसमें मूड, ऊर्जा और व्यवहार में अत्यधिक उतार-चढ़ाव आ सकता है। समय पर उपचार, दवा, थेरेपी और परिवार का सहयोग व्यक्ति को स्थिर और सार्थक जीवन जीने में मदद कर सकते हैं।

नायर की कहानी इसी समझ की जरूरत को सामने लाती है।

जिंदगी ने सब कुछ दिया, लेकिन पूरा नहीं दिया

नायर की जिंदगी में उपलब्धियाँ थीं, लेकिन नुकसान भी कम नहीं थे।

प्रतिभा हमेशा सफलता में नहीं बदल सकी।

रिश्ते टूटे।

मौके हाथ से निकले।

बीमारी ने रास्ता रोका।

गलत फैसलों ने कीमत वसूली।

फिर भी कोशिश चलती रही।

अमेरिका से भारत तक।

कामयाबी से गिरावट तक।

जेल से नई शुरुआत तक।

और एक भूली हुई पांडुलिपि से प्रकाशित किताब तक।

यही इस कहानी की असली ताकत है।

आखिर में कहानी किसकी है?

Silver Linings in the Dark Sky अँधेरे पर विजय की कहानी नहीं है।

यह उस आदमी की कहानी है जिसने लंबे समय तक अँधेरे में जिंदगी गुजारी। कई बार रास्ता खोया। कई बार खुद से हारा। कई बार दूसरों को दुख दिया। लेकिन उसी अँधेरे में कभी-कभी हँसी की एक किरण भी खोज ली।

किताब पढ़ते हुए लगता है कि जिंदगी ने नायर को कोई आसान रास्ता नहीं दिया।

लेकिन शायद उन्होंने भी जिंदगी को आसानी से छोड़ने से इनकार कर दिया था।

और अंत में जिंदगी ने उन्हें एक आखिरी, बेहद विडंबनापूर्ण तोहफा दिया।

संतोष नायर शायद अपनी जिंदगी पूरी तरह वापस नहीं पा सके।

लेकिन अंततः उन्हें अपनी कहानी वापस मिल गई।

और कभी-कभी, शायद यही हमारी सबसे बड़ी silver lining होती है; जब जिंदगी की सारी रोशनियाँ बुझ जाएँ, तब भी हमारी कहानी कहीं बची रह जाए।

 सेहत के नए हकीमों ने छेड़ी वेलनेस की जंग 

अमीरों ने शांत सुबह को बना दिया स्टेडियम!

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

१३ अगस्त 2026

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आजकल  बड़े शहरों में चमचमाती ऊंची इमारतों में रहने वाले लोगों की जिंदगी बदल गई है। ग्रेनाइट, शीशे और एयर-कंडीशनर से सजे इन आलीशान घरों में अब सूरज निकलने के बाद आराम से सोना लगभग गुनाह समझा जाता है।

अपने शर्माजी, भोर सुबह, सज संवर के जिम के लिए ड्राइव करते हैं, जहां हूरों से मिलकर उनका रक्तचाप नॉर्मल हो जाता है। उधर चौधरी साहब अपने फ्लैट की खिड़की से नजारा ताक रहे होते हैं। वो बताते हैं, "सुबह साढ़े छह बजे से ही फिटनेस का युद्ध शुरू हो जाता है। कोई जिम की तरफ भाग रहा है, कोई तैराकी कर रहा है। योगा मैट अलग-अलग “माइंडफुलनेस ज़ोन” में ऐसे बिछाए जाते हैं, जैसे कोई धार्मिक अनुष्ठान होने वाला हो। कुछ लोग तेज़-तेज़ चलते हैं, कुछ जॉगिंग करते हैं। सबके चेहरों पर ऐसा भाव होता है, जैसे सुबह पसीना बहाना ही इंसानियत की सबसे बड़ी सेवा हो।"

जिम इतना भरा रहता है कि सांस लेना मुश्किल हो जाए। स्विमिंग पूल में इतनी हलचल होती है कि पानी भी शायद आराम मांगने लगे। ध्यान लगाने वाले लोग इतनी गंभीरता से आंखें बंद करते हैं कि लगता है, अभी संतोष और आत्ममुग्धता के सहारे हवा में उड़ने लगेंगे।

हर सुबह ग्रेटर नोएडा की एक पूरी सोसाइटी स्वास्थ्य सुधारने के एक बड़े अभियान में बदल जाती है। सवाल बस इतना है कि क्या इससे सचमुच स्वास्थ्य सुधर रहा है? कभी-कभी यह फिटनेस से ज्यादा एक महंगा जुनून लगता है।

मेरा एक दोस्त, जो खुद जिम भक्त है, कहता है कि इतनी योगा, प्राणायाम और माइंडफुलनेस के बावजूद दुनिया पहले से ज्यादा स्वस्थ नजर नहीं आती। अस्पताल बढ़ रहे हैं, निजी क्लीनिक बढ़ रहे हैं और वेलनेस सेंटर भी हर गली में खुल रहे हैं।

अगर योगा के दावे आधे भी सच होते, तो शहर के आधे हृदय रोग विशेषज्ञ बेरोजगार हो जाते और बाकी आधे प्राणायाम सिखा रहे होते।

उधर, पुराने विचारों वाले एक पंडित जी, इस मामले को बहुत सीधे शब्दों में समझाते हैं। उनका कहना है कि अपनी ताकत बचाने का फायदा, सुबह-सुबह उसे बेकार में खर्च करने से कहीं ज्यादा है। ट्रैफिक झेलना, दफ्तर की राजनीति सहना, बढ़ती महंगाई और कभी-कभी जीवन के अर्थ पर चिंता करना: ये सब अपने आप में काफी बड़ी एक्सरसाइज हैं।

वह कहते हैं, “सुबह-सुबह तंग छोटे गारमेंट्स पहनकर खुद को क्यों सताते हो? जिंदगी खुद ही कम कसरत नहीं कराती क्या ?”

बात में दम है। अमीर लोग सुबह अंधेरे में अपने शरीर को सज़ा देते हैं, ताकि बाद में गर्व से एवोकाडो टोस्ट खा सकें। शायद लंबी उम्र का असली राज जिम में नहीं, बल्कि आराम से सोने में हो। हाइ सोसाइटी के तमाम लोग सुबह वर्क आउट इसलिए करते हैं ताकि देर रात तक चलने वाली पार्टियों में मजे लें।

हो सकता है असली फिटनेस यह हो कि इंसान एक सभ्य समय तक बिस्तर में पड़ा रहे, अपनी ऊर्जा बचाए और उसे दुनिया की सबसे कठिन एक्सरसाइज के लिए इस्तेमाल करे, इस पागल होती दुनिया में थोड़ा-बहुत सामान्य बने रहने के लिए।

आज फिटनेस एक नया धर्म बन चुकी है। फर्क बस इतना है कि पहले लोग मोक्ष के लिए तपस्या करते थे, अब लोग सिक्स-पैक के लिए।

एक तरफ जॉगर्स हैं। दूसरी तरफ योगा योद्धा। तीसरी तरफ जिम के पहलवान। चौथी तरफ वे लोग हैं, जो हाथ में महंगी पानी की बोतल लेकर सिर्फ इसलिए घूम रहे हैं ताकि सबको पता चले: भाई साहब, ये आज भी “हाइड्रेटेड” हैं। अब सुबह सोना पुराने जमाने की आदत हो गई है। जो आठ बजे उठता है, उसे शक की निगाह से देखा जाता है। लोग सोचते हैं, “बेचारा जिंदगी में कितना पीछे रह गया!” जबकि आदमी बेचारा बस नींद पूरी कर रहा होता है। और उधर गेट पर कंपटीशन के नतीजे आने लगे हैं: 

“आज कितने कदम चले?”

“दस हजार।”

“बस? मैंने पंद्रह हजार किए।”

“मैंने बीस हजार।”

तभी एक सज्जन मोबाइल निकालकर कहते हैं, “मेरी स्मार्टवॉच कह रही है कि मैं आज बहुत स्ट्रेस में हूं।”

बाकी लोग गंभीर हो जाते हैं। इतनी दौड़-भाग, इतनी योगा, इतना ध्यान और इतना प्राणायाम करने के बाद भी घड़ी बता रही है कि आदमी तनाव में है। अब घड़ी से बहस कौन करे?

जिम में भी हालत कम मजेदार नहीं है। ट्रेडमिल पर लोग ऐसे दौड़ते हैं जैसे पीछे ईडी, सीबीआई और इनकम टैक्स विभाग तीनों लगे हों। मजे की बात यह है कि आधे घंटे बाद वही सज्जन लिफ्ट से ऊपर अपने फ्लैट में जाते हैं। सेकंड फ्लोर तक सीढ़ियों से जाने में कष्ट होता है।

स्विमिंग पूल में लोग पानी को इतना मथते हैं कि लगता है समुद्र मंथन का ट्रायल चल रहा है। योगा क्लास में सब आंखें बंद करके “मन की शांति” खोज रहे हैं। क्लास खत्म होते ही पार्किंग में कार खड़ी करने को लेकर दो लोगों में युद्ध शुरू हो जाता है।

एक सज्जन रोज सुबह ध्यान करते हैं।

दूसरे सज्जन पूछते हैं, “कितनी देर?”

“एक घंटा।”

“फायदा?”

“बहुत शांति मिलती है।”

इतने में उनकी मेड छुट्टी मांग लेती है। सज्जन की आध्यात्मिक शांति तुरंत व्हाट्सऐप कॉल पर चली जाती है।

आधुनिक जीवनशैली का सबसे बड़ा चमत्कार यही है। आदमी स्वास्थ्य पाने के लिए पहले खुद को बीमार करता है। सुबह अलार्म से नींद खराब करो। ठंडे पानी से नहाओ। जिम में शरीर तोड़ो। फिर प्रोटीन शेक पियो। उसके बाद ऑफिस जाकर आठ घंटे कुर्सी पर बैठो और शाम को डॉक्टर से पूछो, “डॉक्टर साहब, कमर दर्द क्यों रहता है?”

पहले इंसान खेत में काम करता था, पैदल चलता था, कुएं से पानी खींचता था। उसे फिटनेस ऐप की जरूरत नहीं पड़ती थी। आज आदमी एयर-कंडीशनर में बैठता है, कार से जिम जाता है, ट्रेडमिल पर पांच किलोमीटर दौड़ता है और फिर कार से घर लौट आता है।

इसे आधुनिक प्रगति कहते हैं।

अब खाना भी पेट भरने के लिए नहीं खाया जाता। पहले उसकी फोटो खींची जाती है। एवोकाडो टोस्ट, क्विनोआ सलाद और ग्रीन जूस के साथ सेल्फी जरूरी है। आखिर दुनिया को कैसे पता चलेगा कि आप स्वस्थ हैं?

स्वास्थ्य से ज्यादा जरूरी है: स्वस्थ दिखना।

सोशल मीडिया ने तो फिटनेस को पूरा तमाशा बना दिया है। कोई आसन कर रहा है, कोई प्रोटीन पी रहा है, कोई “नो शुगर चैलेंज” चला रहा है। अगले दिन वही आदमी आधी रात को फ्रिज खोलकर रसगुल्ले ढूंढ रहा होता है।

सच तो यह है कि आधुनिक इंसान ने हर चीज को प्रतियोगिता बना दिया है। पहले नौकरी की दौड़ थी। फिर पैसे की दौड़ हुई। अब नींद छोड़कर स्वस्थ होने की भी दौड़ शुरू हो गई है।

शायद असली वेलनेस का राज इतना ही है; थोड़ा कम भागिए, थोड़ा कम दिखाइए और कभी-कभी बिना अपराधबोध के देर तक सो जाइए।

क्योंकि इस दुनिया में जहां हर कोई फिटनेस का महर्षि बनने पर तुला है, सबसे बड़ा योगासन शायद यही है: 

आराम से करवट बदलो, चादर ओढ़ो और कहो; आज नहीं, कल से जिम पक्का

Monday, August 10, 2026

 


महिला नेता दिखी नहीं कि गाली शुरू! 

सियासत में मुद्दों से ज्यादा आसान क्यों है चरित्र पर हमला?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

12 अगस्त 2026

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कल्पना कीजिए, चुनावी मंच पर एक महिला नेता खड़ी होती है। वह सरकार से तीखे सवाल पूछती है। विपक्ष को चुनौती देती है। अपनी पार्टी का बचाव करती है। कुछ ही मिनटों में सोशल मीडिया का माहौल बदल जाता है। उसके तर्कों पर कम, कपड़ों पर ज्यादा चर्चा होने लगती है। उसकी नीतियों को छोड़कर उम्र, शादी, शक्ल और निजी जिंदगी की चीरफाड़ शुरू हो जाती है।

बस, यहीं हमारी राजनीति का सबसे बदसूरत चेहरा दिखाई देता है।

पुरुष नेता गरजे तो उसे दमदार कहा जाता है। महिला नेता उसी अंदाज में जवाब दे दे, तो उसे “अहंकारी” या “बदतमीज” बता दिया जाता है। पुरुष नेता महत्वाकांक्षी हो तो दूरदर्शी कहलाता है। महिला महत्वाकांक्षी हो तो उसके इरादों पर शक किया जाता है। जैसे राजनीति में महिला का सबसे बड़ा अपराध सिर्फ इतना हो कि उसने चुप रहने से इनकार कर दिया।

महिला चुनाव लड़ सकती है, जीत सकती है और सत्ता की कुर्सी तक पहुंच सकती है। लेकिन जैसे ही वह मुखर होती है, बहस अक्सर मुद्दों से भटक जाती है। फिर शुरू होता है कपड़ों, चरित्र, रिश्तों और निजी जिंदगी पर हमला।

मानो सियासत का कोई अनलिखा नियम हो, महिला को हराना मुश्किल लगे, तो पहले उसे ज़लील कर दो।

पुरुष नेताओं को चोर, भ्रष्ट, निकम्मा या नाकाम कहना “तीखी राजनीतिक बहस” माना जाता है। महिला नेता आंख में आंख डालकर जवाब दे दे, तो शब्दों की तलवार अचानक उसके विचारों को छोड़कर उसकी देह और निजी जिंदगी की तरफ मुड़ जाती है। नीति-विचार पीछे छूट जाते हैं। तर्क दम तोड़ देते हैं। गाली सबसे आसान हथियार बन जाती है।

यह बीमारी किसी एक पार्टी की नहीं है। अफसोस, पूरा राजनीतिक तंत्र इससे संक्रमित दिखाई देता है। अपनी पार्टी की महिला नेता पर फूहड़ टिप्पणी हो, तो बयान जारी होते हैं और आक्रोश उमड़ पड़ता है। लेकिन विरोधी दल की महिला पर वही कीचड़ उछले, तो कई चेहरे अचानक मौन साध लेते हैं।

महिला सम्मान अब सिद्धांत कम, सियासी स्विच ज्यादा बन गया है, अपने लिए ऑन, विरोधियों के लिए ऑफ।

सुनंदा पुष्कर के मामले में भी सार्वजनिक चर्चा कई बार उनकी पहचान से ज्यादा सनसनी के इर्द-गिर्द घूमती रही। जयललिता जैसी शक्तिशाली मुख्यमंत्री को भी कई मौकों पर सिर्फ एक महिला होने के चश्मे से देखा गया। बसपा सुप्रीमो बहन मायावती पर जाति और लिंग, दोनों को मिलाकर तंज कसे गए। उमा भारती को भी ऐसी निजी टिप्पणियां सुननी पड़ीं, जिनका उनकी नीतियों या राजनीतिक काम से कोई संबंध नहीं था।

कंगना रनौत के विचारों से असहमति हो सकती है। उनकी राजनीति और बयानों की आलोचना भी होनी चाहिए। लोकतंत्र में किसी को आलोचना से छूट नहीं मिलती। लेकिन असहमति का अर्थ यह नहीं कि महिला होने के कारण उस पर हर तरह की गाली और गंदगी फेंक दी जाए।

किसी महिला नेता की आलोचना लोकतंत्र है। उसकी निजी जिंदगी नोंचना बदतमीजी है।

दोनों में फर्क है। मगर हमारी राजनीति अक्सर यह फर्क जानबूझकर भूल जाती है।

हम महिलाओं को राजनीति में लाने की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। सम्मेलन होते हैं। मंच सजते हैं। “नारी शक्ति” के नारे गूंजते हैं। भाषणों में महिलाओं के लिए आसमान तक खोल दिया जाता है। फिर टिकट बांटने का वक्त आता है, तो कई दरवाजे बंद मिलते हैं।

महिला आरक्षण का कानून बनना निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन असली सवाल सिर्फ सीटों का नहीं है। सवाल उस माहौल का भी है, जिसमें महिला राजनीति करेगी।

मान लीजिए, किसी महिला को सीट मिल गई। वह चुनाव जीत गई। मंत्री भी बन गई। फिर क्या?

क्या उसे वही सम्मान मिलेगा, जो उसके पुरुष सहयोगी को मिलता है? या फिर उसके कपड़ों पर टीवी बहस होगी? शादी पर सवाल उठेंगे? उम्र पर तंज कसे जाएंगे? और उसकी निजी जिंदगी को व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी के हवाले कर दिया जाएगा?

यही वह दलदल है, जिसमें हमारी राजनीति फंसी हुई है।

इसका सबसे बड़ा नुकसान लोकतंत्र को होता है। कई काबिल महिलाएं शायद राजनीति की तरफ देखकर सोचती होंगी; “यह मैदान मेरे लिए बहुत महंगा पड़ सकता है। यहां काम कम और निजी जिंदगी की सफाई ज्यादा देनी पड़ेगी।”

पुरुष नेता को शायद ही रोज यह सोचना पड़ता हो कि चुनाव लड़ने के बाद उसकी शादी, शरीर या चरित्र राष्ट्रीय बहस का विषय बन जाएगा। यही असमानता है। और यही असली समस्या है।

हम अक्सर शिकायत करते हैं कि राजनीति में अच्छे लोग नहीं आते। शिकायत सही हो सकती है। लेकिन एक सवाल हमसे भी पूछना चाहिए, क्या हम अच्छे और काबिल लोगों के लिए राजनीति का माहौल आसान बनाते हैं?

खासकर महिलाओं के लिए?

जितनी अधिक महिलाएं राजनीति में आएंगी, उन्हें दो-चार गालियों से चुप कराना उतना ही मुश्किल होगा। संख्या ताकत है। संगठन ताकत है। और सबसे बड़ी ताकत आर्थिक आजादी है।

जिस महिला के पास अपनी कमाई, अपना काम और अपना मजबूत नेटवर्क है, उसे डराना आसान नहीं होता। देश भर में लाखों महिला उद्यमी आज यही साबित कर रही हैं। वे कारोबार खड़ा कर रही हैं। रोजगार दे रही हैं। फैसले ले रही हैं। उन्हें किसी नेता की कृपा का इंतजार नहीं।

वे अपने पैरों पर खड़ी हैं। यही असली सशक्तिकरण है।

सिर्फ मंच पर “नारी शक्ति जिंदाबाद” बोलने से कुछ नहीं बदलेगा। महिला को अच्छी शिक्षा चाहिए, तो दीजिए। बैंक लोन चाहिए, तो रास्ते आसान कीजिए। काम का मौका चाहिए, तो दीजिए। सुरक्षित माहौल चाहिए, तो सुनिश्चित कीजिए।

और अगर वह राजनीति में आकर आपसे असहमत हो जाए, तो उसके विचारों से लड़िए, उसके कपड़ों से नहीं।

उसके काम पर सवाल उठाइए, चरित्र पर कीचड़ मत फेंकिए।

उसकी नीति की आलोचना कीजिए, निजी जिंदगी को चुनावी पोस्टर मत बनाइए।

लोकतंत्र में कोई भी नेता आलोचना से ऊपर नहीं है। न पुरुष, न महिला। लेकिन आलोचना और गाली में फर्क होता है। बहस और बेहूदगी में फर्क होता है। सवाल और चरित्रहनन में फर्क होता है।

अफसोस, हमारी सियासत में यह फर्क तेजी से धुंधला होता जा रहा है।

सबसे बड़ा पाखंड तब दिखाई देता है, जब कोई नेता सुबह महिला सम्मान पर लंबा भाषण देता है और शाम तक उसकी पार्टी के समर्थक किसी महिला विरोधी पर सोशल मीडिया में गंदगी उछाल रहे होते हैं। फिर पार्टी कहती है, “हमने तो नहीं कहा।”

यह कोई जवाब नहीं है।

घर में आग लगी हो और मालिक कहे कि माचिस मैंने नहीं जलाई, तो क्या घर बच जाएगा?

राजनीतिक दलों को समझना होगा कि उनकी ट्रोल सेना उनसे पूरी तरह अलग नहीं है। लगातार गाली, धमकी और निजी हमले होते रहें और पार्टी चुप बनी रहे, तो वह चुप्पी भी समर्थन का संदेश देती है।

कई बार चुप रहना समर्थन की सबसे आरामदेह भाषा होता है।

महिलाओं को राजनीति में देवी बनाकर रखने की जरूरत नहीं है। उन्हें आलोचना से बचाने की भी जरूरत नहीं है। बस, उन्हें इंसान और बराबर का नागरिक मानने की जरूरत है।

बहुत बड़ी मांग नहीं है।

वे गलत हों, तो खुलकर आलोचना कीजिए। भ्रष्ट हों, तो जांच कीजिए। काम कमजोर हो, तो चुनाव में हराइए। लेकिन सिर्फ इसलिए हमला मत कीजिए कि वे महिला हैं और शायद जवाब नहीं देंगी।

अब वक्त बदल रहा है। महिलाएं जवाब दे रही हैं। अदालतों का दरवाजा खटखटा रही हैं। कारोबार खड़ा कर रही हैं। राजनीति में अपनी जगह बना रही हैं। धीरे-धीरे संदेश साफ हो रहा है कि पुरानी गाली-गलौज वाली सियासत हमेशा नहीं चलेगी।

महिला-विरोधी सोच कोई प्राकृतिक आपदा नहीं है। यह न मानसून है, न भूकंप। इसे इंसानों ने बनाया है। इसलिए इंसान ही इसे बदल सकते हैं।

शुरुआत उस सबसे आसान बहाने को छोड़कर करनी होगी, “अरे, राजनीति में तो यह सब चलता है।”

नहीं। बहुत चल लिया।

बहुत गालियां दे लीं। बहुत चरित्र उछाल लिए। बहुत निजी जिंदगियां नीलाम कर लीं। अब मुद्दों पर लौटिए।

किसी महिला नेता को सिर्फ मुखर, सक्रिय और महत्वाकांक्षी होने की सजा देना उसके साथ ही नहीं, लोकतंत्र के साथ भी नाइंसाफी है। सियासत की असली लड़ाई विचारों की होनी चाहिए, गालियों की नहीं। नीतियों की होनी चाहिए, निजी जिंदगी की नहीं।

और याद रखिए, जिस लोकतंत्र में आधी आबादी को बोलने से पहले गाली की कीमत सोचनी पड़े, वहां लोकतंत्र का माइक तो चालू है, लेकिन उसकी आवाज अभी भी आधी है।

Sunday, August 9, 2026

 राजनीति को चाहिए नया खून: छात्र संघों की वापसी अब क्यों जरूरी है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

11 अगस्त 2026

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कहते हैं, जब राजनीति में नया खून नहीं आता, तो पुरानी नसों में जंग लगने लगती है। वही चेहरे, वही नारे, वही वादे और वही कुर्सी की दौड़। देश की राजनीति आज कुछ ऐसी ही थकी हुई दिखाई देती है।

इधर एक अजीब-सी जेन-ज़ी मुहिम ने सबका ध्यान खींचा है। दावा किया जा रहा है कि “कॉकरोचों के नेतृत्व” में चल रही यह नई पीढ़ी की हलचल युवाओं की बेचैनी और बगावत का प्रतीक बन गई है। नाम भले ही मज़ाकिया हो, मगर सवाल गंभीर है। जब युवा अपनी बात कहने के लिए इतने अजीब प्रतीक खोज रहे हैं, तब हमारे कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में उनके अपने लोकतांत्रिक मंच आखिर कहाँ हैं?

जवाब साफ है: हमने छात्र राजनीति का दरवाज़ा ही बंद कर दिया।

छात्र संघ कभी विश्वविद्यालयों की जान हुआ करते थे। पढ़ाई के साथ बहस होती थी, चुनाव होते थे, भाषण होते थे, सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे। छात्र अपनी शिकायतें लेकर संगठित ढंग से प्रशासन के सामने जाते थे। नेतृत्व सीखते थे, हारना सीखते थे और जीत को संभालना भी सीखते थे।

आज हम चाहते हैं कि युवा सीधे आईएएस बनें, सीईओ बनें, वैज्ञानिक बनें और नेता भी बनें। मगर नेता बनने की नर्सरी बंद कर दी गई है। फिर हम शिकायत करते हैं कि राजनीति में अच्छे लोग क्यों नहीं आते। यह तो वही बात हुई: खेत को पानी न दो और फसल से शिकायत करो।

1960 के दशक में शिक्षा आयोग ने भी छात्र संघों को महत्वपूर्ण माना था। सोच यह थी कि संगठित छात्र गतिविधियाँ युवाओं में आत्म-अनुशासन, स्वशासन और नेतृत्व की भावना पैदा करती हैं। कई जगह छात्र संघ कैंटीन चलाते थे, सहकारी दुकानें संभालते थे और साहित्यिक व सांस्कृतिक कार्यक्रम कराते थे।

मतलब साफ था। विश्वविद्यालय केवल डिग्री बाँटने की फैक्टरी नहीं है। वह नागरिक तैयार करने की जगह भी है।

भारत के इतिहास में छात्र आंदोलनों ने कई बार राजनीति की दिशा बदल दी। 1965 का तमिलनाडु का हिंदी-विरोधी आंदोलन हो या 1974 का गुजरात का नवनिर्माण आंदोलन, छात्रों ने अपनी ताकत दिखाई। मामूली-सी मेस फीस बढ़ने से शुरू हुआ गुजरात का आंदोलन भ्रष्टाचार और महंगाई के खिलाफ बड़ा जनांदोलन बन गया।

बिहार में छात्र आंदोलन से जयप्रकाश नारायण की “संपूर्ण क्रांति” का नारा उठा। उसी दौर ने देश की राजनीति को झकझोर दिया। बाद में आपातकाल और 1977 के चुनावों ने भारतीय लोकतंत्र का नया अध्याय लिखा।

कई बड़े राष्ट्रीय नेता छात्र राजनीति की ही देन रहे हैं। अरुण जेटली ने दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति सीखी। लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार बिहार के छात्र आंदोलनों से उभरे। सीताराम येचुरी और प्रकाश करात ने जेएनयू की छात्र राजनीति में अपने कदम जमाए। ममता बनर्जी ने भी छात्र जीवन से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की।

नितिन गडकरी, राजनाथ सिंह और अशोक गहलोत जैसे अनेक नेताओं ने भी युवावस्था में संगठन और सार्वजनिक जीवन का अनुभव पाया।

आज सवाल यह है कि अगली पीढ़ी कहाँ से आएगी?

व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी से?

इंस्टाग्राम रील से?

या किसी “कॉकरोच आंदोलन” के वायरल मीम से?

युवा ऊर्जा को आप दबा सकते हैं, खत्म नहीं कर सकते। जब उसे लोकतांत्रिक रास्ता नहीं मिलता, वह किसी और रास्ते से बाहर आती है। कभी अचानक विरोध प्रदर्शन बनकर, कभी सोशल मीडिया के गुस्से में और कभी किसी अजीब प्रतीक के पीछे।

खाली जगह कभी खाली नहीं रहती। लोकतंत्र में भी नहीं।

छात्र संघों को खत्म करने का एक तर्क हमेशा दिया गया: हिंसा, गुटबाजी और बाहरी राजनीतिक दलों का दखल। यह बात पूरी तरह गलत नहीं थी। कई छात्र संघ सचमुच राजनीति के अखाड़े बन गए। पढ़ाई पीछे छूट गई और पोस्टरबाजी आगे आ गई। कैंपस में बहस की जगह कभी-कभी लाठी और धमकी ने ले ली।

मगर बीमारी के कारण मरीज को मार देना इलाज नहीं होता।

गलत छात्र राजनीति को सुधारना चाहिए था, छात्र राजनीति को दफन नहीं करना चाहिए था।

उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों और विश्वविद्यालयों में छात्र संघ चुनाव बंद या सीमित किए गए। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, लखनऊ विश्वविद्यालय और कई अन्य संस्थानों में निर्वाचित छात्र प्रतिनिधित्व कमजोर पड़ता गया या खत्म हो गया। प्रशासन ने शांति तो पा ली, मगर छात्रों की लोकतांत्रिक आवाज भी काफी हद तक खो गई।

अब हमें नई सोच के साथ छात्र संघों को वापस लाना चाहिए।

पुराने ढर्रे पर नहीं। नए संविधान और साफ नियमों के साथ।

छात्र संघों का मुख्य काम चुनावी राजनीति नहीं होना चाहिए। उनका ध्यान छात्रों की असली समस्याओं पर रहे: फीस, छात्रावास, पुस्तकालय, खेल, सुरक्षा, परिवहन और कैंपस सुविधाएँ। बहस, वाद-विवाद, सांस्कृतिक कार्यक्रम और खेलों को भी बढ़ावा दिया जाए।

हर चुने हुए छात्र प्रतिनिधि को नेतृत्व का प्रशिक्षण मिले। उसे बातचीत करना, बजट बनाना, विवाद सुलझाना और अलग राय रखने वालों को साथ लेकर चलना सिखाया जाए। चुनाव लड़ना आसान है, लोकतांत्रिक ढंग से काम करना मुश्किल है। यही हुनर सीखना जरूरी है।

विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्र प्रतिनिधियों की नियमित बैठकें हों। शिकायत सड़क पर पहुँचने से पहले बातचीत की मेज तक पहुँचे। अध्यापक मार्गदर्शन करें, मगर छात्रों की आवाज दबाएँ नहीं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राजनीति में नए लोगों की आमद का कोई विकल्प नहीं है। लोकतंत्र को हर पीढ़ी अपना नया नेतृत्व देती है। यदि युवाओं को कॉलेज में बोलने, बहस करने, हारने, जीतने और जिम्मेदारी लेने का मौका नहीं मिलेगा, तो राजनीति बूढ़ी होती जाएगी।

आज जेन-ज़ी अपनी भाषा खुद बना रही है। कभी मीम, कभी हैशटैग, कभी अजीबोगरीब प्रतीक और कभी “कॉकरोच” जैसा नाम। हमें इस पर केवल हँसना नहीं चाहिए। इसके पीछे छिपी बेचैनी को समझना चाहिए।

युवा कहना चाहते हैं: “हमें सुना जाए।”

कॉलेज और विश्वविद्यालय इस आवाज के लिए सबसे स्वाभाविक जगह हैं।

राजनीति को नया खून चाहिए। उसे किसी प्रयोगशाला से नहीं लाया जा सकता। वह कैंपस की बहसों, छात्र सभाओं, चुनावों और आंदोलनों से ही निकलेगा। छात्र संघ लोकतंत्र की वह पाठशाला हैं, जहाँ भविष्य के नेता पहली बार जनता का सामना करते हैं।

परीक्षा पास करने से नौकरी मिल सकती है। मगर समाज चलाने के लिए जिम्मेदारी, संवाद और नेतृत्व चाहिए।

इनकी कोई गाइडबुक नहीं होती।

इन्हें जीना पड़ता है।

छात्र संघों को फिर से जीवित कीजिए। उन्हें अनुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ चलाइए। बाहरी दलों की कठपुतली बनने से बचाइए। मगर युवाओं का लोकतांत्रिक मंच मत छीनिए।

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