Thursday, October 29, 2026

 हक़ की लड़ाई या रिश्तों की तबाही?

नारीवाद के नाम पर नौटंकी या इंसाफ़ की पुकार? बराबरी चाहिए, बदला नहीं!

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बृज खंडेलवाल द्वारा

30 अक्टूबर 2026

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एक कचौरी, दो समोसे, मर्दों का क्या भरोसा!

एक सिगरेट, दो चाय, मर्द जात हाय-हाय!

एक जीरा, दो अजवाइन, मर्द समाज इस्तीफा दे!

आलू लो, पूरी लो, मर्द जात से दूरी लो!

चाय गरम, दूध गरम, मर्द जात बेशरम!

हमारी स्कर्ट नहीं है छोटी, इन मर्दों की सोच है छोटी!

मेरे सिर में दर्द है, इसका कारण मर्द है!

शर्म नहीं है मर्दों में, औरत क्यों है पर्दों में?

दो कबाब, एक बिरयानी, हर मर्द की अलग कहानी!

एक पराठा, एक अचार, मर्द समाज बेकार!

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वाह! क्या क्रांति है! कचौरी से शुरू होकर बिरयानी पर खत्म! अगर यही नारी मुक्ति का नया घोषणापत्र है, तो इंसाफ़ की अदालत में समोसे तलने की तैयारी कर लीजिए। 

सवाल यह नहीं कि औरतें नारे क्यों लगा रही हैं। सवाल यह है कि बराबरी की लड़ाई में पूरे वर्ग को कटघरे में खड़ा करना कहाँ तक जायज़ है?

बराबरी चाहिए, बदला नहीं। अधिकार चाहिए, मगर जिम्मेदारी से मुँह मोड़कर नहीं।

ज़रा एक तस्वीर देखिए। रात के तीन बजे हैं। घर के दरवाज़े पर पुलिस दस्तक देती है। सत्तर साल के बुज़ुर्ग ससुर दिल के मरीज़ हैं। सास के हाथ काँप रहे हैं। तभी शादीशुदा ननद का फोन आता है। उसे पता चलता है कि उसके खिलाफ भी मुकदमा दर्ज हो गया है।

जिस परिवार ने बरसों में इज़्ज़त कमाई, उसकी साख एक झटके में मिट्टी में मिल जाती है। पड़ोसी कानाफूसी करने लगते हैं। रिश्तेदार फोन उठाना बंद कर देते हैं। अदालत के चक्कर शुरू होते हैं। पैसा, वक्त और सुकून, सबकी बलि चढ़ने लगती है।

यह किसी फिल्म की पटकथा नहीं, बल्कि वैवाहिक विवादों में सामने आने वाली कुछ शिकायतों की तस्वीर है। नारीवाद का मकसद औरत को बराबरी, सम्मान, सुरक्षा और अपने फैसले लेने की आज़ादी देना है। इस बुनियादी हक़ पर किसी को ऐतराज़ नहीं होना चाहिए। लेकिन आज़ादी का मतलब मनमानी हो जाए और सशक्तिकरण के नाम पर किसी को बेइज़्ज़त करना जायज़ मान लिया जाए, तो सवाल उठेंगे ही।

आखिर बराबरी का मतलब क्या है? अपने अधिकारों की सूची याद रखना और अपने फ़र्ज़ का पन्ना फाड़ देना? इंसाफ़ का तकाज़ा है कि हक़ भी मिले और जिम्मेदारी भी निभाई जाए।


घरेलू हिंसा और दहेज उत्पीड़न के खिलाफ कानून महिलाओं के लिए जरूरी सुरक्षा कवच हैं। इन कानूनों ने अनेक पीड़ित महिलाओं को इंसाफ़ पाने का रास्ता दिया है। मगर किसी भी कानून के दुरुपयोग की आशंका को अनदेखा नहीं किया जा सकता।

पहले भारतीय दंड संहिता की धारा 498A के तहत पति और उसके रिश्तेदारों पर क्रूरता के आरोपों से जुड़े मामले दर्ज होते थे। अब भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 85 और 86 इस विषय से संबंधित हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य मामले में गिरफ्तारी को लेकर अहम निर्देश दिए थे। अदालत ने साफ किया कि ऐसे मामलों में गिरफ्तारी अपने आप नहीं होनी चाहिए। कानून की शर्तों और जरूरी प्रक्रिया का पालन करना होगा।

कुछ वैवाहिक विवादों में पति के साथ सास-ससुर, भाई-बहन और दूसरे रिश्तेदार भी आरोपों के घेरे में आ जाते हैं। अदालतों ने कई मामलों में बेवजह रिश्तेदारों को घसीटने पर चिंता जताई है।


आजकल सड़क, मेट्रो और कॉलेजों में होने वाले झगड़ों के वीडियो सोशल मीडिया पर खूब घूमते हैं। कहीं थप्पड़ बरस रहे हैं, कहीं चप्पल चल रही है। फिर वीडियो वायरल होता है और कमेंटों की अदालत सज जाती है।

क्या किसी को थप्पड़ मार देना आज़ादी का प्रमाणपत्र है? क्या दूसरे को अपमानित करना अपने अधिकारों का इस्तेमाल है?

अगर पुरुष हाथ उठाए, तो उसे हिंसा कहते हैं। महिला हाथ उठाए, तो क्या उसे बहादुरी का तमगा मिलना चाहिए? 

बराबरी का मतलब यह नहीं कि महिलाओं को भी वही गलतियाँ करने की छूट मिले, जिनके लिए पुरुषों की आलोचना होती है।


तलाक और वैवाहिक विवादों में गुज़ारा भत्ता अक्सर बहस का बड़ा मुद्दा बन जाता है। अदालतें पति-पत्नी की आमदनी, जरूरतों, संपत्ति और दूसरी परिस्थितियों पर विचार करती हैं।

लेकिन जब किसी पक्ष को लगता है कि उसकी आर्थिक हालत का सही आकलन नहीं हुआ, तो नाराजगी बढ़ती है। पति को डर रहता है कि उसकी जिंदगी भर की कमाई और भविष्य की बचत खत्म हो जाएगी। पत्नी को चिंता होती है कि अलग होने के बाद उसका और बच्चों का खर्च कैसे चलेगा।

दोनों की चिंताएँ वास्तविक हो सकती हैं। इसलिए फैसला किसी एक पक्ष की कहानी सुनकर नहीं होना चाहिए। पत्नी की आमदनी और जरूरतें देखी जाएँ। पति की कमाई, जिम्मेदारियाँ और भुगतान की क्षमता भी परखी जाए।

गुज़ारा भत्ता न किसी को सजा देने का तरीका है, न जरूरतमंद को बेसहारा छोड़ने का बहाना। मकसद होना चाहिए कि अलग होने के बाद भी दोनों पक्ष सम्मान से जी सकें।

आखिर माता-पिता की लड़ाई में बच्चों का क्या कसूर?


मीटू (Me Too) आंदोलन ने यौन उत्पीड़न झेलने वाली अनेक महिलाओं को अपनी बात कहने का हौसला दिया। जिन मामलों में पीड़िताएँ डर, दबाव या बदनामी के कारण चुप रहती थीं, वहाँ इस आंदोलन ने बहस को नई दिशा दी।

यह उसकी बड़ी उपलब्धि है। लेकिन सोशल मीडिया पर किसी पर आरोप लगते ही उसे दोषी मान लेना भी खतरनाक है। कुछ मामलों में आरोपों को लेकर विवाद सामने आए हैं। इसलिए हर शिकायत की गंभीरता से जाँच होनी चाहिए।

किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा, नौकरी और परिवार दाँव पर लग सकते हैं। आरोप सही हों, तो कार्रवाई होनी चाहिए। आरोप गलत साबित हों, तो कानून के मुताबिक राहत का रास्ता भी खुला रहना चाहिए।

सोशल मीडिया की अदालत में फैसला सुनाना आसान है। लेकिन वहाँ न गवाहों की पूरी जाँच होती है, न बचाव का मुकम्मल मौका मिलता है। वायरल पोस्ट से किसी की जिंदगी पर मुहर लगा देना इंसाफ़ नहीं है।


पति-पत्नी के झगड़े में सबसे ज्यादा चोट बच्चों को लगती है। कभी उन्हें माँ और पिता के बीच चुनाव करने को मजबूर किया जाता है। कभी मिलने-जुलने पर रोक लगती है। कभी बच्चे को दूसरे पक्ष पर दबाव बनाने का जरिया बना दिया जाता है।

यह कैसी जीत है, जिसमें बच्चे का बचपन हार जाए?

आधुनिक जीवन में निजी आज़ादी और आत्मनिर्भरता की अहमियत बढ़ी है। मगर परिवार में जिम्मेदारी और आपसी सहयोग भी जरूरी हैं। 

परंपरा के नाम पर महिलाओं को दबाना गलत है। आज़ादी के नाम पर हर रिश्ते को बोझ समझ लेना भी समझदारी नहीं है। रिश्ते तभी टिकते हैं, जब उनमें सम्मान, संवाद और जिम्मेदारी हो।


कर्नाटक की सेवानिवृत्त स्कूल प्रिंसिपल शोभा कहती हैं, “घरेलू हिंसा की असली शिकायतों को हल्के में लेना उतना ही गलत है। जिस महिला पर जुल्म हुआ है, उसे इंसाफ़ जरूर मिलना चाहिए। लेकिन हर आरोप की निष्पक्ष जाँच भी जरूरी है। महिला आयोगों और अदालतों का काम न्याय दिलाना है, किसी एक पक्ष को आँख मूँदकर सही ठहराना नहीं।”

समाजसेवी पद्मिनी अय्यर कहती हैं कि पश्चिम की नकल करना आधुनिकता की शर्त नहीं है। “औरत की आज़ादी सिर्फ कपड़े पहनने, खानपान या शादी का फैसला करने तक सीमित नहीं है। पढ़ाई, नौकरी, आर्थिक आत्मनिर्भरता और अपनी पसंद की जिंदगी जीना भी उसका बुनियादी हक़ है। किसी दूसरे धर्म या समुदाय में शादी करने से कोई महिला संस्कारहीन नहीं हो जाती। असली कसौटी उसका किरदार, ईमानदारी और दूसरों के प्रति सम्मान है।”

उनकी बात में एक जरूरी सवाल छिपा है। हम महिलाओं की आज़ादी को आखिर किस तराजू पर तौलते हैं? कपड़ों से, खानपान से, शादी से या उनके हुनर, आत्मसम्मान और फैसले लेने की ताकत से?


पब्लिक कमेंटेटर प्रोफेसर पारसनाथ चौधरी कहते हैं, “दिक्कत नारीवाद में नहीं है। दिक्कत उस सोच में है, जो उसके नाम पर हिंसा, बेइज़्ज़ती, झूठे इल्ज़ाम और गैर-जिम्मेदारी को सही ठहराती है। इसी तरह, परंपरा बचाने के नाम पर महिलाओं की आज़ादी कुचलना भी गलत है।”

सामाजिक कार्यकर्ता मुक्ता का मानना है कि समाज को न अंधा नारीवाद चाहिए, न अंधी मर्दाना हुकूमत। उसे चाहिए बराबरी का हक़, आपसी इज़्ज़त और साझा जिम्मेदारी।

बात बिल्कुल सीधी है। मर्दों की हर गलती का ठीकरा पूरी मर्द जात पर फोड़ना कहाँ का इंसाफ़ है? और महिलाओं के हर आरोप को शक की निगाह से देखना भी कौन-सी समझदारी है?

नारीवाद का मतलब मर्दों से नफरत करना नहीं है। इसका मकसद उस व्यवस्था को बदलना है, जिसमें किसी महिला को सिर्फ महिला होने के कारण कमतर समझा जाता है। उसी तरह, पुरुष होने का मतलब किसी को दबाने का लाइसेंस नहीं है।


संस्कार भाषणों से नहीं, आचरण से झलकते हैं। इंसाफ़ का तराजू तभी संतुलित रहेगा, जब शिकायत की सुनवाई गंभीरता से हो, जाँच निष्पक्ष हो और दोष साबित होने पर कानून के मुताबिक कार्रवाई हो।

औरत को दबाना भी गलत है, मर्द को बिना सुने दोषी ठहराना भी।

कचौरी, समोसे और बिरयानी वाले नारे कुछ देर हँसा सकते हैं। मगर बराबरी की लड़ाई को ठोस मुद्दों, बेहतर कानून और जिम्मेदार व्यवहार की जरूरत है।

आखिर समाज को चाहिए क्या? आधी आबादी की आज़ादी या आधी दुनिया से दुश्मनी? पुरुषों का वर्चस्व या महिलाओं का पलटवार?




Tuesday, October 27, 2026

 आग से खेल रही कर्नाटक सरकार!

नौकरी स्थानीय को, तो बाकी भारतीय क्या पराये हैं?

‘भूमिपुत्र’ राजनीति से राष्ट्रीय एकता को खतरा। रोजगार की समस्या का हल क्षेत्रवाद नहीं!

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बृज खंडेलवाल द्वारा

28 अक्टूबर 2026

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बेंगलुरु आज आईटी क्षेत्र में प्रगति के शिखर पर है। इसमें पूरे भारत से आए प्रतिभाशाली युवाओं का बड़ा योगदान है, सिर्फ स्थानीय लोगों का नहीं।

जरा कल्पना कीजिए। बिहार का एक होनहार इंजीनियर बेंगलुरु की आईटी कंपनी में नौकरी मांगने पहुंचता है। उसके पास डिग्री, हुनर और काम करने का जज्बा है। लेकिन इंटरव्यू में अचानक सवाल उठता है, “आप कर्नाटक से हैं?”

बस, यहीं काबिलियत की परीक्षा खत्म और जन्मस्थान की जांच शुरू! डिग्री पीछे छूट जाती है, पहचान आगे निकल आती है। नौकरी की मंडी में अब हुनर से ज्यादा जन्मभूमि का भाव पूछा जा रहा है।

कर्नाटक में निजी कंपनियों, खासकर आईटी क्षेत्र में, स्थानीय युवाओं को तरजीह देने की मांग ने पुरानी बहस फिर सुलगा दी है। स्थानीय बेरोजगारों की चिंता जायज है। लेकिन क्या दूसरे राज्यों के नागरिक पराये हैं? क्या भारत एक देश सिर्फ तब तक है, जब तक कोई नौकरी मांगने नहीं निकलता?

‘भूमिपुत्र’ सिद्धांत का तर्क सीधा है। नौकरियों पर पहला हक स्थानीय लोगों का हो। दूसरे राज्यों से आए लोग कितने भी योग्य हों, उन्हें पीछे खड़ा रहना चाहिए।

चुनावी मौसम में यह नारा खूब बिकता है। नेताओं को तालियां मिलती हैं, भाषणों में जोश आता है और बेरोजगारी का सुविधाजनक दुश्मन भी मिल जाता है।

लेकिन ठहरिए! यह सामाजिक न्याय नहीं, कल्याण के मुखौटे में छिपा क्षेत्रवाद है।

बिहार का गरीब नौजवान भी उतना ही भारतीय है, जितना कर्नाटक का युवक। उत्तर प्रदेश के इंजीनियर के अधिकार बेंगलुरु में पैदा हुए इंजीनियर से कम नहीं हैं। संविधान हर नागरिक को देश में घूमने और बसने की आजादी देता है, हालांकि कुछ कानूनी सीमाएं भी हैं।

राज्य सरकारें शिक्षा सुधार सकती हैं, प्रशिक्षण दे सकती हैं और पिछड़े वर्गों को आगे बढ़ा सकती हैं। कंपनियों में भेदभाव की शिकायतों की जांच भी होनी चाहिए। लेकिन जन्मस्थान को नौकरी की अनिवार्य शर्त बनाना गंभीर संवैधानिक और आर्थिक सवाल खड़े करता है।

भारत पहले भी इस रास्ते पर चल चुका है। नतीजे बहुत सुखद नहीं रहे।

1960 के दशक में मुंबई में शिवसेना ने मराठी लोगों की नौकरियां छिनने के डर को राजनीतिक मुद्दा बनाया। दक्षिण भारत से आए कामगार निशाने पर आए। स्थानीय रोजगार की मांग धीरे-धीरे बाहरी लोगों के खिलाफ मुहिम में बदलने लगी।

2008 में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने उत्तर प्रदेश और बिहार से आए प्रवासियों को निशाना बनाया। रेलवे भर्ती, रोजगार और भाषा को लेकर तनाव बढ़ा। क्षेत्रीय अस्मिता का शोर राजनीति में गूंजने लगा।

लेकिन सवाल वही है। क्या इन अभियानों से नौकरियों की बरसात हुई? क्या महाराष्ट्र के बेरोजगार युवाओं की समस्याएं खत्म हो गईं? नहीं! डर बढ़ा, कामगार बंटे और मुंबई की बहुरंगी पहचान को चोट पहुंची।

1969 के तेलंगाना मुल्की आंदोलन में स्थानीय नौकरियों की सुरक्षा की मांग उठी। 1979 से 1985 तक असम आंदोलन में भी प्रवासन, नागरिकता और जनसंख्या में बदलाव को लेकर असंतोष उभरा। परिस्थितियां अलग थीं, लेकिन इन घटनाओं ने दिखाया कि पहचान की चिंता कैसे बहिष्कार की राजनीति बन सकती है।

सबक साफ है। जब नेता नागरिकों को स्थानीय और बाहरी खांचों में बांटते हैं, तो दीवार सिर्फ नौकरी तक सीमित नहीं रहती।

बेंगलुरु भारत का आईटी केंद्र इसलिए नहीं बना कि हर इंजीनियर से पहले क्षेत्रीय पहचान पत्र मांगा गया। उसकी ताकत देशभर से प्रतिभाओं को आकर्षित करने में रही है।

इंजीनियर, वैज्ञानिक, उद्यमी और कुशल कर्मचारी यहां आए। अवसर मिले, मेहनत हुई और सबने मिलकर आर्थिक कामयाबी की बड़ी कहानी लिखी।

अब सोचिए, यदि योग्य उम्मीदवारों पर क्षेत्रीय प्रतिबंधों का दबाव बढ़े, तो क्या होगा? कंपनियों को काबिल लोग चाहिए, ऐसे उम्मीदवार नहीं जिनका जन्मस्थान राजनीतिक कसौटी पर खरा उतरता हो।

भर्ती में योग्यता के बजाय क्षेत्रीय पहचान को तरजीह देने का दबाव बढ़ा, तो निवेशक दूसरे राज्यों का रुख कर सकते हैं। कंपनियां विस्तार कहीं और कर सकती हैं। स्थानीय युवा बेरोजगार रह सकते हैं और नौकरियां भी हाथ से निकल सकती हैं।

यह तो वही बात हुई कि रोजगार बचाने निकले थे और रोजगार देने वाली कंपनियों को ही विदा कर दिया!

कर्नाटक सरकार ने 2024 में निजी कंपनियों में स्थानीय उम्मीदवारों के लिए आरक्षण का प्रस्ताव रखा था। उद्योग जगत के विरोध के बाद इसे रोक दिया गया। दूसरे राज्यों में भी ऐसे प्रस्ताव सामने आए हैं।

एक राज्य में उठी चिंगारी दूसरे राज्यों में आग लगा सकती है।

स्थानीय युवाओं की बेरोजगारी वास्तविक समस्या है। बहुतों को आधुनिक उद्योगों के अनुरूप प्रशिक्षण नहीं मिलता। कमजोर शिक्षा व्यवस्था और कॉलेजों तथा कंपनियों के बीच तालमेल की कमी भी बड़ी बाधाएं हैं।

समाधान बाहरी लोगों के लिए दरवाजे बंद करना नहीं है। स्थानीय युवाओं को इतना सक्षम बनाइए कि वे मुकाबले में आगे निकलें। बेहतर हुनर दीजिए, नौकरियों पर एकाधिकार नहीं!

राष्ट्रवाद का मतलब सिर्फ झंडा लहराना और बड़े-बड़े नारे लगाना नहीं है। इसका असली मतलब हर भारतीय के सम्मान, अधिकार और आजादी की रक्षा करना है।

मुंबई में काम करने वाली मलयाली नर्स, बेंगलुरु का बिहारी इंजीनियर और दिल्ली का तमिल कामगार कोई बाहरी नहीं है। ये सभी भारत के नागरिक हैं और देश की अर्थव्यवस्था में योगदान देते हैं।

भारत की ताकत उसकी विविधता और एकता में है। रोजगार की लड़ाई को क्षेत्रीय नफरत में बदलना देश के भविष्य से खिलवाड़ है।



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Sunday, October 25, 2026

 लोकतंत्र या दंगल? सियासत में मुद्दे गायब, गालियों का जलवा!

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संसद में बहस होनी थी, अखाड़े में कुश्ती शुरू हो गई! जनता पूछ रही है, हुजूर, देश चलाना है या जुबानी पटखनी देनी है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

28 अक्टूबर, 2026

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विपक्षी नेताओं को क्या हो गया है? लोकतंत्र में सवाल उठते हैं, दलीलें दी जाती हैं और सरकारों को कठघरे में खड़ा किया जाता है। मगर भारतीय सियासत का नया तमाशा देखिए! यहां मुद्दों की जगह मुहावरों ने ले ली है। नीतियों की जगह निजी हमले हैं। बहस की जगह बदजुबानी का बाजार गर्म है। ऐसा लगता है कि संसद और चुनावी मंचों के बीच कहीं कोई कुश्ती का अखाड़ा खुल गया है। फर्क बस इतना है कि पहलवानों की जगह नेता हैं और तालियां बजाने वालों में जनता के साथ टीवी कैमरे भी शामिल हैं।

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच ताजा जुबानी जंग इसी गिरावट की एक मिसाल है। पटना में 25 अक्टूबर को खड़गे की टिप्पणी ने सियासी गलियारों में हंगामा खड़ा कर दिया। सभा में किसी ने कहा कि मोदी सत्ता नहीं छोड़ेंगे। जवाब में खड़गे ने कहा, “मोदी का बाप भी जाएगा।”

बस, फिर क्या था! सियासत का पारा चढ़ गया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इसे मर्यादा का उल्लंघन बताया। भाजपा नेताओं ने इसे गुंडों जैसी भाषा करार दिया। अब सवाल यह है कि सत्ता स्थायी नहीं होती, यह बताने के लिए दिवंगत पिता को मैदान में उतारना कितना जरूरी था? क्या लोकतंत्र में दलीलों का अकाल पड़ गया है कि रिश्तेदारों को भी चुनावी प्रचार में घसीटना पड़े?

सियासत में गाली का कारोबार नया नहीं है। मगर पुराने तमाशे को नई पैकिंग में बेचने से वह सिद्धांत नहीं बन जाता। आइए, इस सियासी दंगल के कुछ चर्चित पहलवानों की चालें देखें।

मुद्दों का जनाजा!

पहला नमूना प्रधानमंत्री की दिवंगत मां हीराबेन को निशाना बनाने वाली टिप्पणियां हैं। 2025 के बिहार चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस और राजद की वोट अधिकार यात्रा से जुड़े मंचों पर मोदी और उनकी मां को लेकर आपत्तिजनक भाषा इस्तेमाल किए जाने के आरोप लगे। विवाद बढ़ा तो सफाई और राजनीतिक पलटवार का दौर शुरू हुआ।

लेकिन सवाल सीधा है। किसी नेता की मां को अपमानित करके बेरोजगार नौजवान को नौकरी मिल जाएगी? महंगाई घट जाएगी? किसान की आमदनी बढ़ जाएगी? मां का अपमान जवाबदेही नहीं है। यह भावनाओं से तालियां बटोरने की कोशिश है। राजनीति में विरोध कीजिए, मगर परिवार को चुनावी पोस्टर मत बनाइए।

दूसरा नमूना है ऐसे जुमले, जो किसी नेता की पूरी राजनीति को एक ठप्पे में बंद कर देते हैं। मोदी के लिए कभी 'मौत का सौदागर' जैसे शब्द इस्तेमाल हुए। ऐसे नारे टीवी पर खूब चलते हैं, सोशल मीडिया पर दौड़ते हैं और समर्थकों की महफिल में वाहवाही लूटते हैं।

मगर सुरक्षा नीति, अर्थव्यवस्था या सरकारी फैसलों पर ठोस बहस कहां है? किसी को खलनायक घोषित कर देना आसान है। उसके मुकाबले बेहतर नीति पेश करना मुश्किल। गाली मुफ्त है, विकल्प तैयार करने में मेहनत लगती है!

तीसरा नमूना 'चायवाला' कहकर मोदी की पृष्ठभूमि का मजाक उड़ाना है। मेहनत करके रोजी कमाना हमारे समाज में शर्म की बात कब से हो गई? करोड़ों लोग चाय बेचते हैं, रेहड़ी लगाते हैं और पसीना बहाकर परिवार पालते हैं। उनकी मेहनत का मजाक उड़ाने वाले आखिर किस भारत की तस्वीर पेश करना चाहते हैं?

प्रधानमंत्री के कामकाज की आलोचना जरूर होनी चाहिए। रोजगार, महंगाई और विकास के आंकड़ों पर सवाल उठने चाहिए। मगर चाय बेचने के पुराने अनुभव को ताना बनाना, बहस नहीं, वर्गीय अहंकार की झलक है।

चौथा नमूना राहुल गांधी की शैली में दिखाई देता है। अगस्त 2026 में उन्होंने मोदी की कूटनीति पर तंज कसते हुए विदेशी नेताओं से गले मिलने की शैली का मजाक उड़ाया और मंच पर गले लगने का नाटकीय अभिनय किया।

राजनीति में व्यंग्य की जगह है। मगर व्यंग्य का निशाना नीतियां और उनके नतीजे हों, तो बात बने। विदेश नीति को सिर्फ गले मिलने तक सीमित कर देना उतना ही अधूरा है, जितना क्रिकेट का विश्लेषण केवल खिलाड़ियों की जर्सी देखकर करना।

नेता प्रतिपक्ष का काम सरकार से तीखे सवाल पूछना है। मगर हर गंभीर मुद्दे को कॉमेडी शो बना देने से जवाबदेही मजबूत नहीं होती। जनता को पंचलाइन से ज्यादा नतीजे चाहिए।


पांचवां मुद्दा है 'वोट चोरी' के आरोपों का। विपक्ष ने मतदाता सूची, फर्जी पते, दोहराए गए नामों और सामूहिक पंजीकरण जैसे मामलों पर सवाल उठाए हैं। ऐसे आरोपों की जांच जरूरी है। चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी हो, तो उसे सामने लाना लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है।

लेकिन बड़े आरोपों के साथ पुख्ता सबूत भी चाहिए। हर संदेह अपने आप साजिश का प्रमाण नहीं बन जाता। शिकायतों की जांच हो, दस्तावेज सामने आएं और जिम्मेदार संस्थाएं जवाब दें। नारेबाजी से चुनाव सुधार नहीं होता। भरोसा तथ्यों से बनता है, माइक की आवाज से नहीं।

आईना दोनों तरफ है!

यहां भाजपा को भी दूध का धुला मान लेने की जरूरत नहीं। पप्पू को पप्पू किसने बनाया? सत्तापक्ष की बयानबाजी, विरोधियों के लिए निजी ताने और संस्थाओं को लेकर उठते विवाद भी लोकतांत्रिक माहौल को प्रभावित करते हैं। सत्ता में बैठे लोगों की जिम्मेदारी कम नहीं, बल्कि ज्यादा है। आखिर जवाबदेही का पहला तकाजा है कि आलोचना सुनने का हौसला भी हो।

सामाजिक कार्यकर्ता पद्मिनी अय्यर का सवाल गौर करने लायक है। बेरोजगारी, केंद्र-राज्य संबंध, संस्थाओं की स्वतंत्रता और सामाजिक सद्भाव जैसे मुद्दों पर गंभीर बहस कम क्यों होती है? हर दिन नया अपमान सुर्खियां बटोरता है, जबकि जनता की परेशानियां अगले दिन फिर कतार में खड़ी मिलती हैं।

बिहार के राजनैतिक समीक्षक  टी. पी. श्रीवास्तव की बात भी मौजूं है। असहमति आजाद समाज की ताकत है, लेकिन तिरस्कार उसका जहर। जब मंचों पर परिवारों को घसीटा जाता है, पृष्ठभूमि पर तंज कसे जाते हैं और चुनावी प्रक्रिया पर बिना पर्याप्त प्रमाण के बड़े आरोप लगाए जाते हैं, तो विवेकपूर्ण बहस कमजोर पड़ जाती है।"

लोकतंत्र कोई दंगल नहीं, जहां विरोधी को चित करना ही जीत हो। यहां जीत तब है, जब जनता की जिंदगी बेहतर बने। विपक्ष सवाल पूछे, सरकार जवाब दे और दोनों अपने दावों के सबूत पेश करें।

पब्लिक कमेंटेटर प्रोफ पारस नाथ चौधरी फरमाते हैं, "नेताओं को याद रखना चाहिए कि जनता टिकट लेकर तमाशा देखने नहीं आई है। उसे रोजगार, अच्छी सड़कें, साफ हवा, बेहतर अस्पताल और सुरक्षित भविष्य चाहिए। वह संसद में नीतियों की कुश्ती देखना चाहती है, नेताओं के अहंकार की नहीं।"

आखिर में सवाल वही है: लोकतंत्र चलेगा या जुबानी दंगल? अगर नेताओं ने अपनी जुबान पर लगाम नहीं लगाई, तो अखाड़े में तालियां भले बजती रहें, मगर हार जनता की होगी।


 आगरा को चाहिए यमुना रिवरफ्रंट, बैराज और पानी की भरपूर धार!

साबरमती से लेकर टेम्स और सीन तक, दुनिया ने नदियों को संवारा। आगरा कब जागेगा?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

27 अक्टूबर 2026

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यमुना के किनारे बसा आगरा दुनिया के मशहूर शहरों में गिना जाता है। लेकिन विडंबना देखिए, जिस नदी के किनारे ताजमहल खड़ा है, वही यमुना आज बदहाली की मिसाल बन गई है। कहीं गंदगी, कहीं गाद, कहीं सूखी तलहटी और कहीं नालों का गंदा पानी! आखिर कब तक हम इस अनमोल नदी को यूँ ही मरने के लिए छोड़ते रहेंगे?

यमुना को सँवारने का वक्त आ गया है। आगरा को एक शानदार रिवरफ्रंट, मजबूत बैराज, नदी की सफाई और ऊपर से पर्याप्त पानी छोड़ने की ठोस व्यवस्था चाहिए। यह केवल पर्यटन का मामला नहीं है। इसका ताल्लुक शहर की खूबसूरती, पर्यावरण, रोजगार और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से भी है।

दस महीने सूखी नदी, आखिर कब तक?

दिल्ली और हरियाणा की ओर से आने वाले गंदे पानी और ऊपर बने बैराजों से होने वाले जल-विभाजन ने यमुना की हालत बिगाड़ दी है। राजस्थान और हरियाणा की नहरों के लिए पानी की निकासी तथा दूसरे जल-प्रबंधन फैसलों का असर नदी के बहाव पर भी पड़ता है।

नतीजा यह है कि आगरा में साल के बड़े हिस्से में यमुना का बहाव बेहद कम हो जाता है। कई जगह नदी सूखी या किसी पतली धारा जैसी नजर आती है। कभी जो नदी बरसात में उफनती थी, आज उसी की तलहटी पानी के लिए तरसती है।

यह हालात एक बड़ी चुनौती जरूर हैं, लेकिन इनमें सुधार की गुंजाइश भी है। कम बहाव का मतलब यह नहीं कि नदी को उसके हाल पर छोड़ दिया जाए। जरूरत है सही योजना, वैज्ञानिक अध्ययन और पक्के इरादे की।

आगरा को ऐसा रिवरफ्रंट चाहिए, जो नदी को सजाने के साथ उसे जीवित भी करे।

साबरमती ने दिखाई राह, आगरा क्यों पीछे रहे?

अहमदाबाद की साबरमती नदी के किनारे बने रिवरफ्रंट ने शहर को नई पहचान दी है। नदी के किनारे सैरगाह, पार्क, पैदल चलने के रास्ते और सार्वजनिक मनोरंजन के स्थान विकसित किए गए। इससे शहरवासियों को खुली जगह मिली और पर्यटन को भी नया आकर्षण मिला।

आगरा भी ऐसा कर सकता है। लेकिन साबरमती की नकल करना ही मकसद नहीं होना चाहिए। हमें उसकी उपलब्धियों से सीखना होगा और उसकी पर्यावरण संबंधी कमियों से भी सबक लेना होगा।

यमुना के किनारे व्यवस्थित सैरगाह, हरित क्षेत्र, साइकिल ट्रैक, बैठने की जगहें और सांस्कृतिक गतिविधियों के केंद्र बनाए जा सकते हैं। नदी में पर्याप्त गहराई और सुरक्षित जलस्तर होने पर नौका विहार तथा छोटी पर्यटक नौकाओं की संभावनाएँ भी तलाशी जा सकती हैं।

कल्पना कीजिए, शाम ढल रही हो, ताजमहल की संगमरमरी दीवारों पर सुनहरी रोशनी बिखर रही हो और यमुना की लहरों से उसका अक्स झिलमिला रहा हो। पर्यटक नाव से ताज का दीदार करें और स्थानीय लोगों को रोजगार के नए अवसर मिलें।

क्या यह नजारा आगरा की पहचान को नई ऊँचाई नहीं दे सकता?

यूरोप की नदियों से मिला बड़ा सबक

हाल ही में यूरोप की यात्रा के दौरान मुझे कई नदियों को करीब से देखने और उनका अध्ययन करने का अवसर मिला। लंदन की टेम्स और पेरिस की सीन से लेकर वेनिस की जलधाराओं और दूसरे यूरोपीय शहरों की नदियों तक, एक बात साफ नजर आई।

नदियों को शहरों से काटकर नहीं, शहरों की जिंदगी से जोड़कर रखा गया है।

टेम्स नदी के किनारे लंदन आई और सांस्कृतिक गतिविधियों से भरा साउथ बैंक क्षेत्र पर्यटकों को आकर्षित करता है। सीन नदी के किनारे बने रास्ते, कैफे, ऐतिहासिक पुल और खुले सार्वजनिक स्थान पेरिस की खूबसूरती में चार चाँद लगाते हैं।

इन शहरों ने नदियों के किनारों को केवल कंक्रीट की दीवारों और पत्थरों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने जल-प्रबंधन, सुरक्षा, सार्वजनिक सुविधाओं, पर्यटन और नदी की सफाई को साथ लेकर चलने की कोशिश की है।

यूरोप में भी समस्याएँ हैं। बाढ़ का खतरा, प्रदूषण और नदी के प्राकृतिक स्वरूप को लेकर बहस वहाँ भी होती है। लेकिन इन शहरों ने यह समझ लिया है कि नदी केवल पानी की धारा नहीं, बल्कि शहर की सांस्कृतिक और आर्थिक धड़कन भी है।

आगरा के पास तो ताजमहल जैसा विश्वविख्यात आकर्षण है। अगर यमुना को साफ-सुथरा और जीवंत बनाया जाए, तो नदी और ताज का रिश्ता पर्यटन की नई कहानी लिख सकता है।

आगरा को चाहिए बैराज और पर्याप्त पानी

रिवरफ्रंट का सपना तभी पूरा होगा, जब यमुना में पानी भी होगा। केवल किनारों पर पत्थर बिछाने, दीवारें खड़ी करने और रोशनी लगाने से नदी जीवित नहीं हो जाती।

आगरा में प्रस्तावित बैराज की जरूरत पर गंभीरता से आगे बढ़ना चाहिए। इसके लिए तकनीकी, पर्यावरणीय और आर्थिक पहलुओं का अध्ययन करके समयबद्ध कार्ययोजना बनाई जाए। बैराज का उद्देश्य नदी में उपयुक्त जलस्तर बनाए रखने, पानी के बेहतर प्रबंधन और शहर की जरूरतों को ध्यान में रखकर तय किया जाना चाहिए।

साथ ही, ऊपरी बैराजों से यमुना में पर्याप्त पानी छोड़े जाने की व्यवस्था होनी चाहिए। इसके लिए संबंधित राज्यों और जल-प्रबंधन एजेंसियों के बीच तालमेल जरूरी है। पानी का बँटवारा करते समय नदी के पर्यावरणीय प्रवाह को भी उसका जायज हिस्सा मिलना चाहिए।

यह माँग किसी एक शहर की जिद नहीं है। नदी का बहाव बनाए रखना पूरे यमुना तंत्र की सेहत के लिए जरूरी है।

यमुना की बदहाली दूर करने के लिए गाद निकालने और तल की सफाई की जरूरत का वैज्ञानिक आकलन होना चाहिए। जहाँ जरूरी हो, वहाँ ड्रेजिंग और डिसिल्टिंग कराई जाए।  नदी की प्राकृतिक बनावट, भूजल रिचार्ज और जलीय जीवन पर पड़ने वाले असर को ध्यान में रखना जरूरी है।

सबसे अहम सवाल गंदे पानी का है। जब तक नालों का सीवेज नदी में गिरता रहेगा, तब तक कोई भी रिवरफ्रंट स्थायी कामयाबी हासिल नहीं कर सकता। सीवेज को रोकने, उसका शोधन करने और गंदे पानी की निगरानी की पुख्ता व्यवस्था बनानी होगी।

नदी के किनारे हरियाली और ऐसे खुले क्षेत्र भी विकसित किए जाएँ, जहाँ जमीन की पानी सोखने की क्षमता बनी रहे। विकास का मतलब नदी को पूरी तरह कंक्रीट के शिकंजे में जकड़ना नहीं होना चाहिए।

आगरा को अब घोषणाओं से आगे बढ़ना होगा। राज्य सरकार, स्थानीय प्रशासन और संबंधित केंद्रीय एजेंसियों को मिलकर स्पष्ट समयसीमा तय करनी चाहिए।

रिवरफ्रंट की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार हो। बैराज और पर्याप्त जल-प्रवाह पर ठोस निर्णय लिया जाए। गाद की सफाई, सीवेज नियंत्रण और नदी के किनारे सार्वजनिक सुविधाओं का काम चरणबद्ध ढंग से शुरू हो। परियोजना की निगरानी में स्थानीय नागरिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों को भी शामिल किया जाए।

आगरा की यमुना केवल एक नदी नहीं है। यह ब्रज की संस्कृति, शहर के इतिहास और ताजमहल की खूबसूरती से जुड़ी हुई है। इसे गंदे नाले की तरह छोड़ देना हमारी सामूहिक लापरवाही होगी।

सवाल सीधा है: जब साबरमती, टेम्स और सीन के किनारे शहर अपनी नई पहचान बना सकते हैं, तो ताजमहल की यमुना क्यों नहीं?

आगरा को रिवरफ्रंट चाहिए, बैराज चाहिए, ऊपर से पर्याप्त पानी चाहिए और यमुना को प्रदूषण से मुक्ति चाहिए। अब वक्त आ गया है कि सरकार कागजी योजनाओं से बाहर निकले और नदी को उसका हक दिलाने के लिए काम शुरू करे।


Saturday, October 24, 2026

 योगी की हैट्रिक होगी या सत्ता का गणित बिगड़ेगा?

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बृज खंडेलवाल द्वारा  

26 अक्टूबर 2026

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उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ को चुनौती आखिर देगा कौन? चुनावी रणभेरी बजने से पहले ही सियासी गलियारों में यह सवाल गूंजने लगा है। न कोई बड़ा जनआक्रोश दिख रहा है, न विरोधियों के हाथ कोई ऐसा मुद्दा नजर आता है, जिस पर सत्ता-विरोधी लहर खड़ी हो सके। आम आदमी को सबसे पहले चाहिए अमन-चैन, कानून का राज और ऐसी सरकार, जो काम करती दिखाई दे। बाकी वादे और नारे बाद में आते हैं। योगी की सियासत की असली ताकत यही मानी जा रही है। उनकी सरकार का इकबाल कायम है। भ्रष्टाचार के बड़े आरोपों से उनकी निजी छवि पर कोई निर्णायक दाग नहीं लगा, हालांकि विपक्ष समय-समय पर शासन-शैली और चयनित कार्रवाई के सवाल उठाता रहता है। उनकी कार्यशैली ऐसी है कि मंत्री हों या अफसर, सबको अपनी कुर्सी हिलने का एहसास बना रहता है। दूसरे राज्यों में भी उनके शासन मॉडल की चर्चा होती है।

लेकिन क्या कानून-व्यवस्था, प्रशासनिक कसावट और मजबूत नेतृत्व का यह तिलिस्म 2027 में भाजपा को लगातार तीसरी जीत दिला पाएगा? या दस साल की सत्ता के बाद बदलाव की चाहत अचानक करवट लेगी? यही वह अग्निपरीक्षा है, जो योगी की हैट्रिक का रास्ता तय करेगी।

कभी उत्तर प्रदेश का नाम आते ही बदहाली, अपराध, भ्रष्टाचार और जातीय खींचतान की तस्वीर उभरती थी। उद्योगपति निवेश से कतराते थे। नौजवान रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों का रुख करते थे। सड़कों, बिजली और बुनियादी सुविधाओं की कमी ने विकास की रफ्तार रोक रखी थी। इसी वजह से उत्तर प्रदेश को लंबे समय तक BIMARU राज्यों की सूची में गिना जाता रहा।

फिर मार्च 2017 में योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली। करीब एक दशक बाद तस्वीर में कई बदलाव दिखाई देते हैं। एक्सप्रेसवे का जाल फैल रहा है, हवाई अड्डों की संख्या बढ़ी है, निवेश की कोशिशें तेज हुई हैं और कानून-व्यवस्था सरकार के एजेंडे में प्रमुख स्थान पर है।

क्या उत्तर प्रदेश पूरी तरह बदल चुका है? बिल्कुल नहीं। लेकिन 2017 के बाद हुए बदलावों को नजरअंदाज करना भी मुश्किल है।

पब्लिक कमेंटेटर प्रोफ पारस नाथ चौधरी कहते हैं, "उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ा बदलाव कानून-व्यवस्था को लेकर बनी धारणा में दिखाई देता है। 2017 से पहले अपराधी गिरोहों, बाहुबलियों और राजनीतिक संरक्षण की चर्चा आम थी। कारोबारियों को रंगदारी की चिंता सताती थी। आम नागरिक पुलिस की कार्यप्रणाली और राजनीतिक दखलंदाजी पर सवाल उठाते थे।"

योगी सरकार ने संगठित अपराध और माफिया नेटवर्क के खिलाफ सख्त कार्रवाई को अपनी पहचान बनाया। पुलिस भर्ती, आपातकालीन सहायता सेवाओं और अपराध नियंत्रण पर जोर दिया गया। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के हालिया आंकड़ों में उत्तर प्रदेश की दर्ज अपराध दर राष्ट्रीय औसत से लगभग 28 प्रतिशत कम रही है। राज्य का अपराध दर प्रति लाख जनसंख्या पर 180.2 रहा, जबकि राष्ट्रीय औसत 252.3 था।

सरकार सांप्रदायिक हिंसा पर नियंत्रण और सुरक्षा में सुधार को भी अपनी उपलब्धि बताती है। दूसरी ओर, मुठभेड़ों, बुलडोजर कार्रवाई और कानूनी प्रक्रिया के पालन पर सवाल उठते रहे हैं।

साफ है कि सुरक्षा आम आदमी और निवेशक, दोनों के लिए जरूरी है। लेकिन कानून का राज केवल सख्ती से नहीं चलता। उसमें निष्पक्षता, जवाबदेही और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा भी उतनी ही जरूरी है, कहती हैं सामाजिक कार्यकर्ता पद्मिनी अय्यर।

अगर कानून-व्यवस्था ने प्रदेश की छवि बदलने में भूमिका निभाई है, तो बुनियादी ढांचे ने उसके भूगोल को नई शक्ल दी है।

2017 से पहले उत्तर प्रदेश में एक्सप्रेसवे का नेटवर्क सीमित था। आज पूर्वांचल और बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे जैसी परियोजनाओं ने कई क्षेत्रों की कनेक्टिविटी बेहतर की है। सड़कों के विस्तार से औद्योगिक केंद्रों, कृषि मंडियों और छोटे शहरों को जोड़ने में मदद मिल रही है।

हवाई संपर्क बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है। कई हवाई अड्डे चालू हुए हैं और जेवर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों को गति मिलने की उम्मीद है।

सीतापुर के रिटायर्ड कॉलेज प्रिंसिपल त्रिपाठी जी कहते हैं, "बिजली आपूर्ति, ग्रामीण सड़कों और शहरी परिवहन में भी सुधार की कोशिशें हुई हैं। कई शहरों में मेट्रो सेवाओं का विस्तार हुआ है। सरकार की विकास रणनीति में बुनियादी ढांचे को खास जगह मिली है।"

2017 के बाद उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था का आकार काफी बढ़ा है। सरकारी अनुमानों के मुताबिक, सकल राज्य घरेलू उत्पाद 2016-17 के करीब 13.3 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 में लगभग 30.25 लाख करोड़ रुपये हो गया है, यानी दोगुना से अधिक।

सरकार ने निवेश सम्मेलन आयोजित किए, अलग-अलग उद्योगों के लिए नीतियां बनाईं और निवेश मित्र जैसी सिंगल-विंडो व्यवस्था को बढ़ावा दिया।

एक जिला, एक उत्पाद योजना का उद्देश्य स्थानीय हुनर और पारंपरिक कारोबार को नए बाजारों से जोड़ना है। हस्तशिल्प, कपड़ा उद्योग और खाद्य उत्पादों के जरिए स्थानीय रोजगार बढ़ाने की कोशिश हो रही है।

नीति आयोग के बहुआयामी गरीबी संबंधी अनुमानों में उत्तर प्रदेश ने उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है। 2013-14 से 2022-23 के बीच करीब 5.94 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर आए, देश में सबसे बड़ी संख्या।

2027 का चुनाव इसलिए उपलब्धियों और जवाबदेही, दोनों की परीक्षा होगा।

उत्तर प्रदेश का उभार एक बड़ी संभावना है। लेकिन इस संभावना को हर नागरिक की खुशहाली में बदलना ही असली सुशासन की कसौटी है।

Friday, October 23, 2026

 आज संयुक्त राष्ट्र संघ 81 का हुआ

संयुक्त राष्ट्र: जंग रोकने के लिए बना, जंग देखता रहा

रवांडा से यूक्रेन तक नाकामी की दास्तान, और ट्रंप की बेरुखी के पीछे छिपी असली बीमारी

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बृज खंडेलवाल द्वारा

24 अक्टूबर 2026

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जब भी संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) की नाकामियों पर सवाल उठते हैं, उसके पैरोकार यूनेस्को और दूसरी एजेंसियों की उपलब्धियाँ गिनाने लगते हैं। लेकिन सवाल उन एजेंसियों का नहीं, इसके बुनियादी मकसद का है। UNO बना था दुनिया को जंग से बचाने के लिए, या जंग के बाद राहत बाँटने, प्रस्ताव पारित करने और मातम मनाने के लिए?

1945 में दूसरे विश्व युद्ध की तबाही के बाद इसकी स्थापना आने वाली नस्लों को जंग की विभीषिका से बचाने के वादे के साथ हुई थी। आज 81 साल बाद भी बंदूकें खामोश नहीं हुईं, सरहदों पर तनाव कम नहीं हुआ और ताकतवर मुल्कों की मनमानी पर लगाम नहीं लगी। सवाल उठता है कि आखिर इस वैश्विक संस्था की उपयोगिता क्या है, अगर यह दुनिया को सबसे बड़े खतरों से बचा ही नहीं सकती?

रवांडा इसका सबसे शर्मनाक उदाहरण है। 1994 में महज सौ दिनों के भीतर करीब आठ लाख तुत्सी और दूसरे लोग मार डाले गए। संयुक्त राष्ट्र के शांति सैनिकों को नरसंहार की आशंका के संकेत मिल चुके थे। इसके बावजूद सुरक्षा परिषद ने फौज बढ़ाने के बजाय उसकी तादाद घटा दी। दुनिया देखती रही और इंसानियत का कत्ल होता रहा।

स्रेब्रेनित्सा में कहानी और कड़वी थी। UNO ने खुद इस इलाके को सुरक्षित क्षेत्र घोषित किया था। फिर भी 1995 में करीब आठ हजार बोस्नियाई मुस्लिम पुरुषों और लड़कों की हत्या कर दी गई। जब संयुक्त राष्ट्र का घोषित सुरक्षित क्षेत्र ही कब्रगाह बन जाए, तो उसके वादों की कीमत क्या रह जाती है? कागज पर सुरक्षा और जमीन पर कत्लेआम, यही इस संस्था की सबसे बड़ी त्रासदी रही है।

सूडान और कांगो में हिंसा और विस्थापन लंबे समय तक जारी रहे। सीरिया के गृहयुद्ध में रूस और चीन के वीटो ने बार-बार प्रभावी कार्रवाई रोकी। 2003 में अमेरिका ने सुरक्षा परिषद की स्पष्ट अनुमति के बिना इराक पर हमला कर दिया। UNO विरोध करता रहा, लेकिन युद्ध रोक नहीं सका। फिलिस्तीन पर दशकों से प्रस्ताव पारित होते रहे, मगर जमीन पर हालात नहीं बदले। अमेरिकी वीटो ने कई मौकों पर परिषद की कार्रवाई रोक दी। प्रस्तावों का ढेर बढ़ता गया, लेकिन शांति दूर ही रही।

यूक्रेन में यह विडंबना सबसे साफ दिखाई देती है। जिस रूस ने पड़ोसी देश पर हमला किया, वह खुद सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य है और उसके हाथ में वीटो की ताकत है। यानी चौकीदार की सीटी तो बजती है, लेकिन उसे रोकने का अधिकार भी उसी के पास है, जिसे पकड़ना था। ऐसी व्यवस्था में निष्पक्ष कार्रवाई की उम्मीद आखिर कैसे की जाए?

डोनाल्ड ट्रंप की बेरुखी और संयुक्त राष्ट्र के प्रति उनका सार्वजनिक तिरस्कार इस संस्था की साख पर नए सवाल खड़े करते हैं। जब दुनिया की सबसे बड़ी ताकत बहुपक्षीय संस्थाओं को नजरअंदाज करके राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि बताती है, तो UNO की सीमाएँ खुलकर सामने आती हैं। अमेरिका की प्राथमिकताएँ बदलती हैं, तो वैश्विक सहयोग की पूरी इमारत हिलने लगती है।

लेकिन सारा ठीकरा ट्रंप पर फोड़ना आसान रास्ता है। रवांडा, इराक और सीरिया के संकट उनकी राजनीति से पैदा नहीं हुए। असली बीमारी व्यवस्था में है। अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस वीटो के जरिए अपने हितों की हिफाजत करते हैं। जब उनकी सियासत इंसाफ के रास्ते में आती है, तो पूरी संस्था पंगु हो जाती है। छोटे देशों को अंतरराष्ट्रीय नियमों का पाठ पढ़ाया जाता है, लेकिन बड़े मुल्कों के लिए अक्सर अलग पैमाना दिखाई देता है।

अब क्या हो?

संयुक्त राष्ट्र को अप्रासंगिक होने से बचाना है, तो खोखले भाषणों से आगे बढ़ना होगा। सबसे पहले सुरक्षा परिषद का विस्तार जरूरी है, ताकि आज की दुनिया की वास्तविकता उसमें दिखाई दे। वीटो की ताकत पर भी लगाम लगनी चाहिए, खासकर नरसंहार और बड़े मानवीय संकटों के मामलों में। शांति सैनिकों को स्पष्ट अधिकार, पर्याप्त संसाधन और समय पर सहायता मिलनी चाहिए। गंभीर अपराधों के लिए जवाबदेही तय होनी चाहिए।

अंतरराष्ट्रीय कानून ताकतवरों पर भी उतना ही लागू होना चाहिए, जितना कमजोर मुल्कों पर। संयुक्त राष्ट्र की संस्थाओं को केवल बयान जारी करने के बजाय समयबद्ध कार्रवाई और उसके परिणामों का हिसाब भी देना चाहिए।

दुनिया को भाषणों, प्रस्तावों और सम्मेलनों की नहीं, ठोस नतीजों की जरूरत है। उसे ऐसी संस्था चाहिए, जो जंग के बाद सिर्फ मातम न मनाए, बल्कि जंग रोकने की ताकत भी रखे। वरना 81वीं वर्षगाँठ महज एक औपचारिक उत्सव बनकर रह जाएगी। इतिहास यही कहेगा: इरादे नेक थे, वादे बड़े थे, मगर व्यवस्था नाकाम रही।

Thursday, October 22, 2026

 पर्यावरण के रक्षक या विकास के दुश्मन?

नर्मदा से टिहरी और मथुरा रिफाइनरी तक: विरोध की राजनीति पर तीन बड़े सवाल

क्या पर्यावरण बचाने के नाम पर विकास रोकना जायज है? 

भारत की तीन बड़ी परियोजनाएं इस बहस की हकीकत को बयां करती हैं।

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बृज खंडेलवाल द्वारा

23 अक्टूबर 2026

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“हमें इस देश में एक भी ऐसी परियोजना दिखाइए, जिसका इन कथित पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने स्वागत किया हो... हर मामले को अदालत में घसीट लिया जाता है... इस देश में ऐसी याचिकाएं सिर्फ विकास परियोजनाओं को रोकने के लिए दाखिल की जाती हैं।”

11 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ ने ये तीखी टिप्पणियां कीं। पीठ की अगुवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत कर रहे थे। मामला गुजरात के पीपावाव बंदरगाह के विस्तार और आधुनिकीकरण की पर्यावरण मंजूरी को चुनौती देने वाली याचिका का था।

इन टिप्पणियों ने एक अहम सवाल खड़ा कर दिया। क्या कुछ स्वयंभू पर्यावरण रक्षक सचमुच प्रकृति बचा रहे हैं? या पर्यावरण की चिंताओं को आर्थिक तरक्की रोकने का हथियार बना रहे हैं?

भारत को साफ हवा, बहती नदियां और सुरक्षित जंगल चाहिए। लेकिन देश को बांध, बिजलीघर, बंदरगाह, सड़कें और उद्योग भी चाहिए। समस्या तब शुरू होती है, जब कुछ कार्यकर्ता बिना ठोस जांच के हर परियोजना को पर्यावरण के लिए खतरा बता देते हैं।

नर्मदा बांध, टिहरी बांध और मथुरा रिफाइनरी की कहानियां इस बहस को समझने में मदद करती हैं। ये तीनों उदाहरण बताते हैं कि पर्यावरण की हिफाजत और आर्थिक विकास के बीच संतुलन कितना जरूरी है।

पर्यावरण के नाम पर आंदोलन करना गलत नहीं है। लेकिन कुछ अभियानों में खतरे बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए जाते हैं। विशेषज्ञों की जांच पूरी होने से पहले ही विनाश की भविष्यवाणियां होने लगती हैं। फिर प्रचार, प्रदर्शन और अदालतों में मुकदमों का सिलसिला शुरू हो जाता है।

एक जाना-पहचाना चक्र बन गया है। पहले खतरे की घंटी बजाओ, फिर सुर्खियां बटोरों, अदालत पहुंचो, RTI लगाओ और परियोजना को लटका दो। इसके बाद अगली परियोजना के खिलाफ मोर्चा खोल दो।

क्या कुछ अभियानों के पीछे निहित स्वार्थ भी काम करते हैं? इस सवाल की जांच होनी चाहिए। राजनीतिक विरोधियों, कारोबारी प्रतिस्पर्धियों और दूसरे समूहों को किसी परियोजना के रुकने से फायदा हो सकता है। 

जब पर्यावरण संबंधी आपत्तियां सबूतों को मानने से इनकार करने लगें, तब आंदोलन और अड़ंगे के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है।

नर्मदा: विरोध के बीच विकास के फायदे

मेधा पाटकर और नर्मदा बचाओ आंदोलन ने दशकों तक नर्मदा घाटी की बड़ी बांध परियोजनाओं का विरोध किया। सरदार सरोवर बांध इस आंदोलन का प्रमुख निशाना बना।

आंदोलन ने विस्थापन, आदिवासी अधिकारों, पर्यावरण को नुकसान और पुनर्वास की कमियों पर सवाल उठाए। ये गंभीर मुद्दे थे और इनकी अनदेखी नहीं की जा सकती।

लेकिन एक दूसरा सवाल भी जरूरी है। क्या आंदोलन ने उन लाखों लोगों के संभावित फायदे पर पर्याप्त ध्यान दिया, जिन्हें इन परियोजनाओं से पानी और बिजली मिल सकती थी?

सरदार सरोवर बांध ने गुजरात के कई हिस्सों में पानी की उपलब्धता बढ़ाने में मदद की है। इसकी विशाल नहर व्यवस्था नर्मदा का पानी सौराष्ट्र और कच्छ जैसे सूखाग्रस्त इलाकों तक पहुंचाती है।

कई गांवों और कस्बों में पीने के पानी की समस्या लंबे समय से रही है। नर्मदा का पानी मिलने से अनेक इलाकों को अधिक भरोसेमंद जलापूर्ति का सहारा मिला है।

खेती को भी फायदा हुआ है। सिंचाई से किसानों की मानसून पर निर्भरता घटती है। फसलों को पानी मिलता है और ग्रामीण आमदनी बढ़ाने के अवसर बनते हैं। नहर व्यवस्था राजस्थान के कुछ हिस्सों तक भी लाभ पहुंचाती है।

गुजरात में पानी की कमी लंबे समय से विकास की राह में बड़ी बाधा रही है। ऐसे इलाकों तक पानी पहुंचाने के दूसरे विकल्प ज्यादा मुश्किल और महंगे साबित हो सकते थे।

मध्य प्रदेश को भी नर्मदा घाटी विकास परियोजना से लाभ मिला है। इंदिरा सागर बांध की बिजली उत्पादन क्षमता 1,000 मेगावाट है। यह सिंचाई और कृषि गतिविधियों को भी सहारा देता है।

ये फायदे केवल सरकारी कागजों पर लिखे वादे नहीं हैं। पानी, बिजली और सिंचाई की उपलब्धता लोगों की जिंदगी पर सीधा असर डालती है।

टिहरी बांध: इंजीनियरिंग की बड़ी चुनौती

उत्तराखंड का टिहरी बांध भी विकास और पर्यावरण के बीच लंबे संघर्ष का केंद्र रहा है।

चिपको आंदोलन के प्रसिद्ध नेता सुंदरलाल बहुगुणा ने इस परियोजना के खिलाफ जोरदार अभियान चलाया। भूख हड़ताल, प्रदर्शन और कानूनी लड़ाइयों ने वर्षों तक इस विवाद को जिंदा रखा।

टिहरी बांध 2006 में पूरा हुआ। इसकी ऊंचाई 260.5 मीटर है। इसके मुख्य बिजलीघर की क्षमता 1,000 मेगावाट है।

इससे जुड़ी व्यापक परियोजना में 400 मेगावाट की कोटेश्वर परियोजना और 1,000 मेगावाट की पंप्ड-स्टोरेज सुविधा भी शामिल है। अप्रैल 2026 तक यह पंप्ड-स्टोरेज सुविधा पूरी तरह चालू हो चुकी थी।

इस तरह पूरे परिसर की स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता 2,400 मेगावाट हो गई है।

यह भारत की बिजली व्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान है। परियोजना उत्तरी बिजली ग्रिड को सहारा देती है। निर्धारित व्यवस्थाओं के तहत उत्तराखंड को भी बिजली संबंधी लाभ मिलते हैं।

टिहरी झील से दिल्ली सहित बड़े आबादी वाले क्षेत्रों की पेयजल जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलती है। यह उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में सिंचाई के लिए भी उपयोगी है।

जलाशय में पानी जमा करने से बाढ़ के असर को कुछ हद तक कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इससे बाढ़ का खतरा पूरी तरह खत्म नहीं होता।

टिहरी झील ने पर्यटन, मनोरंजन और स्थानीय रोजगार के नए अवसर भी पैदा किए हैं।

लेकिन बांध टूटने और भारी तबाही की आशंकाओं का क्या हुआ?

बांध 2006 से काम कर रहा है। इस दौरान वैसी विनाशकारी टूटन नहीं हुई, जिसकी आशंका विरोधियों ने जताई थी। इसके मिट्टी और चट्टानों से बने ढांचे को क्षेत्र के भूकंपीय जोखिमों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था।

बड़ा सबक साफ है। परियोजनाओं का मूल्यांकन तकनीकी तथ्यों, वास्तविक जोखिमों, उनके प्रदर्शन और सामाजिक प्रभावों के आधार पर होना चाहिए। केवल विरोध की तीव्रता से किसी परियोजना का सही या गलत होना तय नहीं होता।

टिहरी दिखाता है कि बड़ी इंजीनियरिंग परियोजनाएं कठिन चुनौतियों के बावजूद सफल हो सकती हैं। साथ ही, सुरक्षा के मामले में कभी लापरवाही नहीं होनी चाहिए।

मथुरा रिफाइनरी: उद्योग बनाम ताजमहल

मथुरा की तेल रिफाइनरी ने विकास और पर्यावरण के बीच एक और कठिन सवाल खड़ा किया।

जब 1970 के दशक में इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन ने रिफाइनरी लगाने की योजना बनाई, तब संरक्षणवादियों ने चिंता जताई। सवाल था कि क्या इससे निकलने वाला प्रदूषण करीब 40 से 50 किलोमीटर दूर स्थित ताजमहल को नुकसान पहुंचा सकता है?

यह चिंता बेबुनियाद नहीं थी। सल्फर डाइऑक्साइड और दूसरे प्रदूषक अम्लीय जमाव का कारण बन सकते हैं। इससे संगमरमर और दूसरी संवेदनशील सतहों को नुकसान पहुंच सकता है।

ताजमहल की हिफाजत बेहद जरूरी है। इसलिए इस मामले में सावधानी बरतना स्वाभाविक था।

विरोध बढ़ा और विशेषज्ञ समितियों ने पर्यावरण पर संभावित असर की जांच की। आखिरकार जरूरी सुरक्षा उपायों के साथ रिफाइनरी को मंजूरी मिली। इसका संचालन 1982 में शुरू हुआ।

आलोचकों को आशंका थी कि प्रदूषण से ताजमहल धीरे-धीरे पीला पड़ जाएगा और पूरे इलाके की हवा खराब होगी।

फिर क्या हुआ?

इसका जवाब किसी एक नारे में नहीं मिल सकता।

ताजमहल के संगमरमर में पीलापन और सतह पर गिरावट देखी गई है। वायु प्रदूषण चिंता का एक कारण है। धूल, सूक्ष्म कण और दूसरे पर्यावरणीय दबाव भी असर डालते हैं। अलग-अलग प्रदूषण स्रोतों की भूमिका का सही आकलन करना जरूरी है।

समय के साथ रिफाइनरी में प्रदूषण नियंत्रण की व्यवस्थाएं बेहतर की गईं। इनमें सल्फर रिकवरी और स्वच्छ ईंधन बनाने की तकनीकें शामिल हैं।

ताजमहल की सुरक्षा के लिए व्यापक ताज ट्रेपेजियम जोन में भी कई तरह की पाबंदियां लागू की गई हैं।

इस विवाद ने औद्योगिक प्रदूषण और ऐतिहासिक धरोहरों की सुरक्षा पर ध्यान बढ़ाया। यह संदेश मजबूत हुआ कि विश्वप्रसिद्ध स्मारक के आसपास उद्योगों को कड़े पर्यावरणीय मानकों का पालन करना चाहिए।

दूसरी तरफ, रिफाइनरी का आर्थिक महत्व भी है।

यह उत्तरी भारत और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति करती है। इसकी क्षमता सालाना 60 लाख टन से बढ़कर 80 लाख टन हो गई है।

रिफाइनरी रोजगार, सरकारी राजस्व, औद्योगिक गतिविधियों और ईंधन की आपूर्ति में योगदान देती है। इसकी तकनीकी व्यवस्थाओं में सुधार से स्वच्छ ईंधन बनाने में भी मदद मिली है।

क्या ताजमहल की सुरक्षा से समझौता करके ये फायदे हासिल किए जा सकते थे? बिल्कुल नहीं।

लेकिन क्या प्रदूषण का जोखिम होने भर से यह निष्कर्ष निकाल लिया जाए कि रिफाइनरी बननी ही नहीं चाहिए थी?

इस निष्कर्ष के लिए भी ठोस सबूत चाहिए।

रिफाइनरी का संचालन और उसके साथ पर्यावरणीय पाबंदियों का बढ़ना बताता है कि उद्योग और धरोहर संरक्षण साथ चल सकते हैं। लेकिन इसके लिए सुरक्षा उपाय प्रभावी होने चाहिए और उनका लगातार पालन भी होना चाहिए।

सबक यह नहीं कि पर्यावरण संबंधी चेतावनियों को खारिज कर दिया जाए। सबक यह है कि चेतावनियों के जवाब में बेहतर नियम, स्वच्छ तकनीक और नतीजों की नियमित जांच होनी चाहिए। हर उद्योग को बिना सोचे-समझे खारिज कर देना समाधान नहीं है।

विकास को चाहिए सबूत, अंतहीन मुकदमे नहीं

गुजरात के पीपावाव बंदरगाह का मामला इस बहस को फिर सामने ले आया है।

11 मई 2026 की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण संरक्षण के नाम पर विकास परियोजनाओं को बार-बार चुनौती देने की प्रवृत्ति पर सवाल उठाए।

इस चिंता पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। जब बुनियादी ढांचे की परियोजनाएं लंबे मुकदमों में उलझ जाती हैं, तो नुकसान केवल सरकार या कंपनियों को नहीं होता।

परियोजनाओं में देरी से लागत बढ़ती है। रोजगार के अवसर टलते हैं। निवेशकों का भरोसा डगमगा सकता है। जरूरी सुविधाएं वर्षों तक अधूरी रह सकती हैं।

इसका सबसे ज्यादा नुकसान गरीब और पिछड़े इलाकों के लोगों को हो सकता है। उन्हें पानी, बिजली, सड़क और रोजगार की जरूरत सबसे अधिक होती है।

भारत को विकास और पर्यावरण में से किसी एक को चुनने की जरूरत नहीं है। जरूरत ऐसी व्यवस्था की है, जिसमें परियोजना बनाने वालों और उसका विरोध करने वालों, दोनों को अपने दावों के समर्थन में सबूत देने पड़ें। कानून तोड़ने पर अदालतों को हस्तक्षेप करना चाहिए। लेकिन मुकदमेबाजी तथ्यों पर आधारित फैसलों का विकल्प नहीं बननी चाहिए।

नर्मदा की परियोजनाएं बताती हैं कि बांध पानी और बिजली उपलब्ध कराने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। साथ ही, विस्थापन और पुनर्वास की जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता।

टिहरी दिखाता है कि बड़े इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट कितने उपयोगी हो सकते हैं। लेकिन उनकी सुरक्षा की लगातार निगरानी भी जरूरी है।

मथुरा रिफाइनरी बताती है कि उद्योग और ऐतिहासिक धरोहरों का संरक्षण साथ चल सकते हैं। शर्त यही है कि पर्यावरणीय नियमों का प्रभावी पालन हो।

इन उदाहरणों से एक बात साफ होती है। हर परियोजना का आंख मूंदकर विरोध करना सही रास्ता नहीं है। भारत को असली पर्यावरण रक्षक चाहिए, केवल बैठे-बिठाए खतरे गिनाने वाले नहीं। देश को सुरक्षा उपायों के साथ विकास चाहिए, बिना सबूत के अड़ंगे नहीं।

पर्यावरण संरक्षण बहुत गंभीर विषय है। इसे राजनीतिक हथियार नहीं बनना चाहिए। और विकास भी इतना जरूरी है कि उसे बिना प्रमाण के डर और आशंकाओं के हवाले नहीं छोड़ा जा सकता।