Saturday, October 10, 2026

 भारत में जन्मदिनों का मौसम!

 सितंबर-अक्टूबर में क्यों बरसते हैं जन्मदिन?


बृज खंडेलवाल द्वारा

10 अक्टूबर 2026


गाँवों में होली के आसपास बच्चों की किलकारियाँ ज्यादा सुनाई देती हैं, तो शहरों में मानसून के दौरान जन्मदिनों की बहार आती है! आखिर माजरा क्या है? क्या ग्रह-नक्षत्र बच्चों के जन्म की तारीख तय करते हैं, या फिर हमारी शादी-ब्याह की परंपराएँ इसके पीछे हैं? और क्या सरकारी बाबू भी इसमें कोई गुल खिला रहे हैं?


जरा अपने दोस्तों, रिश्तेदारों और दफ्तर के साथियों की जन्मतिथियों पर गौर कीजिए। सितंबर और अक्टूबर आते ही जन्मदिनों की झड़ी लग जाती है। व्हाट्सऐप पर बधाइयों की बाढ़ आ जाती है। केक कटते हैं, मोमबत्तियाँ बुझती हैं और तस्वीरें सोशल मीडिया पर चमकने लगती हैं। लगता है, मानो इन दो महीनों को ही जन्मदिन मनाने का ठेका मिला हो!


सितंबर-अक्टूबर में जन्म लेने वाली मशहूर हस्तियों की फेहरिस्त भी लंबी है। अमिताभ बच्चन, रेखा, शबाना आजमी, करीना कपूर, रणबीर कपूर और प्रभास जैसे फिल्मी सितारे इस सूची में शामिल हैं। राजनीति और सार्वजनिक जीवन की बात करें तो नरेंद्र मोदी, महात्मा गांधी, लाल बहादुर शास्त्री और ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जैसी हस्तियों की जन्मतिथियाँ भी इन्हीं महीनों में पड़ती हैं। लता मंगेशकर और आशा पारेख जैसे नाम भी इस चर्चा को दिलचस्प बनाते हैं। अगर आपका जन्मदिन भी इन महीनों में आता है, तो खुद को इस अनौपचारिक सितारा क्लब का सदस्य समझिए!


लेकिन इस जन्मदिन बहार का राज क्या है? ज्योतिष, संयोग या सामाजिक परंपराएँ?


ज्योतिष वेबसाइट एस्ट्रोसेज के आँकड़ों के अनुसार, उसके उपयोगकर्ताओं में 10 अक्टूबर जन्मदिन की सबसे आम तारीख बताई गई। इस तारीख को 1,40,091 लोगों ने दर्ज किया था। इसके बाद 15 अगस्त का नंबर आया। दस-दस की यह तारीख देखने में भी आकर्षक है। मगर सवाल है कि क्या इसके पीछे सितारों का हाथ है या इंसानी आदतों का?


एक ज्योतिषी ने इसकी वजह दिसंबर की शादियों को बताया। उनका तर्क सीधा है। दिसंबर में शादियाँ हुईं, तो नौ महीने बाद अक्टूबर में बच्चों की आमद बढ़ गई। बात में दम लगता है, लेकिन कहानी इतनी सीधी भी नहीं है।


भारत में जन्मतिथियों का सरकारी रिकॉर्ड हमेशा भरोसेमंद नहीं रहा। कई दशक पहले गाँवों और कस्बों में जन्म की सही तारीख दर्ज करना जरूरी नहीं समझा जाता था। कई माता-पिता सुविधा के लिए पहली, दसवीं या पंद्रहवीं तारीख लिखवा देते थे। स्कूल में दाखिले और कागजी काम के लिए भी ऐसी तारीखें सुविधाजनक थीं। यानी 10 अक्टूबर का जलवा कभी-कभी ज्योतिष का चमत्कार नहीं, बल्कि सरकारी रजिस्टर का कमाल भी हो सकता है!


वैज्ञानिक नजरिए से देखें तो भारत में सितंबर में जन्मों की संख्या अक्सर अधिक रहती है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के 2019-21 के आँकड़ों के मुताबिक, साल के कुल जन्मों में सितंबर की हिस्सेदारी लगभग 9.3 प्रतिशत थी। अगस्त से नवंबर तक के चार महीनों में करीब 37 प्रतिशत जन्म दर्ज हुए।


इसका संबंध हमारे शादी-ब्याह के कैलेंडर से भी है। भारत में नवंबर से फरवरी तक शादियों की धूम रहती है। मौसम सुहाना होता है, शुभ मुहूर्त मिलते हैं और बैंड-बाजे रात भर बजते हैं। इसके नौ-दस महीने बाद बच्चों की किलकारियाँ गूँजने लगती हैं। कह सकते हैं कि सर्दियों की शादियाँ मानसून के बच्चों की राह खोलती हैं!


शहरों में कहानी का एक नया मोड़ भी है। कुछ माता-पिता बच्चों के स्कूल में दाखिले को ध्यान में रखकर जन्म का समय तय करने की कोशिश करते हैं। उम्र की सीमा और दाखिले की तारीखों के कारण परिवारों में हिसाब-किताब चलता है। अब बच्चे केवल प्यार की निशानी नहीं, बल्कि दाखिले के कैलेंडर का हिस्सा भी बनते जा रहे हैं! हालाँकि, हर परिवार ऐसा करता है, यह मानना गलत होगा।


भारत अकेला नहीं है। अमेरिका में भी सितंबर में जन्मदिनों की संख्या अधिक देखी गई है। वहाँ क्रिसमस और नए साल की छुट्टियों के दौरान परिवारों के साथ बिताया गया समय इसकी एक संभावित वजह माना जाता है। भारत में शादी की शहनाई और पश्चिम में क्रिसमस की घंटियाँ, दोनों के बाद नौ महीने का हिसाब दिलचस्प नतीजे दिखा सकता है।


मगर इस हँसी-मजाक के पीछे एक गंभीर मसला भी छिपा है। जन्म का सही रिकॉर्ड न होने से सरकारी योजनाओं, कानूनी दस्तावेजों और जनसंख्या संबंधी अध्ययनों में परेशानी होती है। डिजिटल पंजीकरण और अस्पतालों में रिकॉर्ड रखने की व्यवस्था बेहतर हुई है, लेकिन हर जन्म का सटीक हिसाब रखना आज भी जरूरी है।


तो अगली बार कोई कहे कि उसका जन्मदिन 10 अक्टूबर को है, तो मुस्कराइए। हो सकता है सितारों की मेहरबानी हो, सर्दियों की किसी शादी का असर हो, या फिर पुराने जमाने के किसी बाबू ने तारीख गोल कर दी हो!


कारण जो भी हो, सितंबर भारत के जन्मदिन कैलेंडर का बड़ा खिलाड़ी दिखाई देता है। आखिर प्रकृति, परंपरा और सरकारी कागजों की इस मिली-जुली महफिल में केक तो किसी न किसी का कटना ही है!


Friday, October 9, 2026

 पापी तेल का सवाल है!

महान चक्कर: लड़ कौन रहा है, किससे?
एलिस अगर वंडरलैंड से युद्धभूमि में पहुँच जाए, तो शायद यही पूछे!
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By Ponga Pakhandi

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ज़रा ठहरो! दुनिया में आखिर लड़ कौन रहा है, और किससे? ईरान इजरायल से, रूस यूक्रेन से, अमेरिका रूस को सबक सिखा रहा है, और यूरोप शांति के भाषण दे रहा है। भारत क्रूड साफ कर रहा है। और तेल? वह सबके पहिए में ग्रीस लगा रहा है, ताकि कोई चरमराए नहीं, चाहे ग्लोबल वार्मिंग से दुनिया क्यों न उबल जाए।

एलिस आज वंडरलैंड से निकलकर इस तेल बाजार में पहुंची, तो उसका पहला सवाल था : “भाई, यहाँ दुश्मन कौन है? और दोस्त कौन, जो दुश्मन की कमाई से अपनी दोस्ती का बिल भर रहा है?” उसको बताया गया: रूस के किसी कुएँ से एक बैरल टैंकर पर चढ़ता है। बेचारे को क्या खबर कि उसका अगला सफर इतिहास की सबसे बड़ी नैतिक नौटंकी बनेगा ।

क्रूड का टैंकर पहुँचता है जामनगर। भारत उसे डिस्काउंट पर खरीदता है और कहता है, “यह हमारी रणनीतिक आजादी है।” ट्रंप कहते हैं, “यह तो पुतिन की जेब भरना है।” बैरल मन ही मन बुदबुदाता है, “हुजूर, मैं तो सिर्फ तेल हूँ। आप अपने उसूलों का भाव खुद तय कर लीजिए, मेरा तो बस मार्केट रेट है!”

फिर रिफाइनरी की भट्ठी में बैरल तपता है और बाहर निकलता है, भारतीय डीजल बनकर। रसायन वही, गंध वही, पर कागज़ों में मानो गंगा नहाकर आया हो। हर-हर गंगे, हर-हर लीटर!

यह दुनिया की सबसे अनोखी आध्यात्मिक यात्रा है। रिफाइनरी में तेल शुद्ध होता है, राजनीति में पाप पुण्य बन जाता है। प्रतिबंध गेट के बाहर चप्पल उतारकर खड़े रहते हैं, मुनाफा सबकी जेबों को गरम करके लौटता है।

अब यूरोप का कमाल देखिए। सुबह रूसी तेल पर प्रतिबंध की प्रेस कॉन्फ्रेंस होती है। दोपहर तक भारतीय डीजल के टैंकर उसके दरवाज़े पर होते हैं। शाम को भारत को नैतिकता की क्लास मिलती है, और क्लास की फीस भी डीजल में ही कटती है।

यूरोप सीना ठोककर कहता है, “हम रूसी तेल नहीं खरीदते!” बिल्कुल नहीं जनाब! वे तो भारतीय डीजल खरीदते हैं, जिसने रूस से निकलकर भारत में सभ्यता की तमीज़ सीख ली है, जैसे कोई गाँव का लड़का विदेश से लौटकर अंग्रेज़ी बोलने लगे।

तेल रूसी, मेहनत भारतीय, ग्राहक यूरोपीय, और नैतिकता का सर्टिफिकेट यूरोप ने खुद ही प्रिंट आउट निकल कर बाँट दिए। इसे कहते हैं आत्मनिर्भर पाखंड!

अमेरिका भी क्यों पीछे रहे? उसे गुस्सा आता है कि भारत रूस से तेल क्यों खरीदता है। वह टैरिफ की लाठी उठाता है और सिद्धांतों का पाठ शुरू करता है। लेकिन जब रूसी संवर्धित यूरेनियम के अमेरिकी आयात का ज़िक्र छिड़ता है, तो सिद्धांतों का वॉल्यूम अचानक म्यूट हो जाता है।

आखिर उसूल भी पेट्रोल जैसे हैं: इस्तेमाल से पहले अपनी सुविधा के हिसाब से रिफाइन करने पड़ते हैं!

रुको, कहानी अभी बाकी है!

यूक्रेन को युद्ध के लिए डीजल चाहिए, और डीजल बनता है रूसी तेल से भारत में। यूरोप यूक्रेन को मदद देता है, यूक्रेन उससे ईंधन खरीदता है, ईंधन का पैसा घूमकर रूसी तेल के अगले सौदे तक पहुँचता है, और रूस उसी पैसे से युद्ध चलाता रहता है। फिर यूक्रेन कहता है, “और मदद चाहिए!”

यानी एक हाथ से आग बुझाओ, दूसरे से पेट्रोल खरीदो, और तीसरे हाथ से अगले राहत पैकेज की अर्जी लिखो। वैश्विक कूटनीति में इसे “बहुआयामी संलग्नता” कहते हैं। आम भाषा में इसे बिना ब्रेक की मेरी-गो-राउंड कहा जाता है।
एलिस घबराकर पूछती है, “माफ कीजिए, क्या यहाँ कोई पागलखाना है?”

जवाब मिला, “नहीं बच्ची, वो तो आगरा में है। यहाँ तो अंतरराष्ट्रीय कूटनीति है। यहाँ पागलपन को रणनीति कहते हैं और विरोधाभास को राष्ट्रीय हित!”

रूस की विडंबना भी कम मज़ेदार नहीं। जिस दुश्मन से वह लड़ रहा है, उसकी गाड़ियाँ शायद उसी तेल की बूँदों से चल रही हों जो घूम-फिरकर वापस आई हों। 

खेल समझो बाबू! 

रूस: तेल बेचकर कमाई भी, युद्ध का खर्चा भी। दुश्मन से लड़ाई जारी, बाज़ार से उधारी बंद।
यूक्रेन: रूस से जंग, पर ईंधन की नब्ज़ उसी उलझी सप्लाई चेन में। दुश्मन की जेब पर वार करना है, पर टंकी भी भरवानी है।
यूरोप: मदद यूक्रेन की, प्रतिबंध रूस पर, और ज़रूरत पड़ी तो ईंधन भारतीय रिफाइनरी से। नैतिकता का झंडा ऊँचा, ऊर्जा की ज़रूरत उससे भी ऊँची।
अमेरिका: रूस पर सख्ती, भारत पर दबाव, अपने हितों पर लचीलापन। उसूलों का डंडा दूसरों के लिए, छूट का छाता खुद के लिए!

भारत: सस्ता क्रूड खरीदो, उपयोगी ईंधन बनाओ, रोज़गार और मुनाफा कमाओ। तर्क है: “फैसले राष्ट्रीय हित से होते हैं।” बाकी दुनिया इसे अपने-अपने चश्मे से देखती है, और चश्मे भी शायद उसी तेल के प्लास्टिक से बने हैं।
और तेल का बैरल? कन्फ्यूज़्ड! वह तो बस इतना जानता है कि वह जिस भी घाट पर रुका, वहाँ कोई न कोई उसे अपना बताकर बाकियों को उपदेश देने लगा।

तो आखिर में जीत किसकी हो रही है?
एलिस का आखिरी सवाल: “अगर रूस बेचकर कमाता है, भारत साफ करके कमाता है, यूरोप खरीदकर गाड़ियाँ चलाता है और यूक्रेन उसी से जंग लड़ता है, तो इस कहानी में हार कौन रहा है?”

खैर, हमें क्या? 

यह तेल का चक्कर उस जहाज़ जैसा है जो समुद्र में अपनी जगह टिके रहने के लिए ही ईंधन फूँकता रहता है। इंजन दहाड़ता है, खर्चा बढ़ता है, धुआँ उठता है, पर जहाज़ आगे बढ़ने के बजाय एक ही जगह गोल-गोल घूमता है। फिर भी कप्तान माइक पर घोषणा करते हैं: “सब कुछ नियंत्रण में है!”

यही तो असली वंडरलैंड है। और जब तेल का पैसा गोल-गोल घूम रहा है, तो सवाल सिर्फ एक बचता है: क्या युद्ध भी उसी चक्कर में घूमता रहेगा, या कभी टंकी खाली होगी?

Thursday, October 8, 2026

 मोदी सरकार की एक बेहतरीन कामयाबी

जीएसटी से पहले और आज: 

बदली तस्वीर, क्या आसान हुई व्यापार की राह?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

10 अक्टूबर 2026

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कितना बदला कारोबार का चेहरा?



कल्पना कीजिए, जुलाई 2017 से पहले का भारत। आगरा से दिल्ली जा रहा एक ट्रक रास्ते में बार बार रुकता है। कहीं चुंगी, कहीं प्रवेश कर, तो कहीं कागजों की जांच। घंटों की देरी से माल पहुंचता है और खर्च बढ़ जाता है। आखिरकार इस बोझ का कुछ हिस्सा ग्राहक की जेब से निकलता है।

दुकानदारों की मुश्किलें भी कम नहीं थीं। उत्तर प्रदेश में अलग टैक्स, दिल्ली में अलग नियम और दूसरे राज्यों में अलग हिसाब किताब। कागजात का ढेर, सरकारी दफ्तरों के चक्कर और एक टैक्स के ऊपर दूसरा टैक्स। कारोबार करना आसान नहीं था। टैक्स की दरों में अंतर का फायदा उठाकर कुछ लोग कर चोरी भी करते थे।

फिर आया जीएसटी का दौर।

1 जुलाई 2017 को नरेंद्र मोदी सरकार ने वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी लागू किया। इसका नारा था, ‘एक देश, एक कर’। मकसद साफ था। देश में टैक्स की बिखरी व्यवस्था को एक करना, कारोबार आसान बनाना और कर चोरी के रास्ते बंद करना।

पहले केंद्र सरकार कारखानों में बने सामान पर उत्पाद शुल्क और सेवाओं पर सेवा कर लगाती थी। राज्य सरकारें बिक्री कर, प्रवेश कर और चुंगी जैसे कई कर वसूलती थीं। हर राज्य के नियम अलग होने से व्यापारियों को परेशानी होती थी। कई बार पहले चुकाए गए टैक्स का पूरा फायदा भी नहीं मिलता था। इस तरह एक ही सामान पर बार बार टैक्स का बोझ बढ़ता जाता था।

जीएसटी ने इस व्यवस्था के बड़े हिस्से को एक ढांचे में ला दिया। अब राज्य के भीतर कारोबार पर केंद्र और राज्य का अपना अपना हिस्सा होता है। राज्यों के बीच बिक्री के लिए अलग व्यवस्था है। पहले खरीदे गए सामान पर चुकाए टैक्स का उचित हिसाब मिलने से टैक्स पर टैक्स का बोझ भी कम हुआ।

ऑनलाइन पंजीकरण, टैक्स रिटर्न और भुगतान की सुविधा ने कागजी कामकाज घटाने में मदद की। राज्यों की सीमाओं के पार माल भेजना भी पहले से आसान हुआ।

जीएसटी की एक बड़ी खासियत है कि इसमें लेनदेन का हिसाब रखना पहले से आसान हुआ है। ई वे बिल, ई इनवॉइस और ऑनलाइन रिकॉर्ड से माल की आवाजाही तथा टैक्स भुगतान पर नजर रखना आसान हुआ। टैक्स क्रेडिट के लिए भी खरीद और बिक्री का हिसाब जरूरी है। इससे फर्जी बिलों और टैक्स चोरी को पकड़ने में मदद मिली है।

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं कि कर चोरी पूरी तरह खत्म हो गई। फर्जी बिलिंग और नियमों से बचने के तरीके आज भी सामने आते हैं। लेकिन डिजिटल निगरानी ने ऐसे मामलों पर कार्रवाई के नए रास्ते खोले हैं।

जीएसटी के दायरे में आने वाले कारोबारियों की संख्या भी बढ़ी है। शुरुआती वर्षों में करीब 65 से 67 लाख पंजीकृत करदाता थे। जून 2026 तक यह संख्या लगभग 1.67 करोड़ बताई गई। इसका अर्थ है कि अधिक कारोबार अब टैक्स व्यवस्था के दायरे में आ रहे हैं। इसमें नए कारोबारों के साथ बेहतर पंजीकरण और अनुपालन की भी भूमिका है।

टैक्स संग्रह के आंकड़े भी बढ़ोतरी दिखाते हैं। सितंबर 2026 में सकल जीएसटी संग्रह 2,03,521 करोड़ रुपये रहा। यह पिछले साल के मुकाबले 14.7 प्रतिशत अधिक था। अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच कुल सकल संग्रह 12.46 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। बढ़ते संग्रह में आर्थिक गतिविधियों, बेहतर अनुपालन और कर चोरी रोकने के प्रयासों का योगदान हो सकता है।

जीएसटी लागू होने के बाद छोटे व्यापारियों को तकनीकी दिक्कतों, जटिल नियमों और रिटर्न भरने की परेशानियों का सामना करना पड़ा। कारोबारियों को कई बार समझ नहीं आता था कि कौन सा नियम कब लागू होगा। राज्यों को भी राजस्व में कमी की चिंता थी। केंद्र की मुआवजा व्यवस्था ने शुरुआती वर्षों में राज्यों को राहत दी।

समय के साथ नियमों और ऑनलाइन व्यवस्था में बदलाव किए गए। छोटे कारोबारियों के लिए कुछ आसान योजनाएं बनाई गईं। रिफंड की प्रक्रिया तेज करने और कागजी काम घटाने के प्रयास भी हुए। हालांकि, इन सुविधाओं का लाभ पात्रता और लागू नियमों पर निर्भर करता है।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के सामने अब भी यही चुनौती है कि व्यवस्था को सरल बनाया जाए। छोटे दुकानदारों, कारीगरों, महिला उद्यमियों और ग्रामीण कारोबारियों को अनावश्यक परेशानी से बचाना जरूरी है। ट्रकों को रास्ते में बेवजह रोकने के बजाय जांच ठोस सूचना और नियमों के आधार पर होनी चाहिए।

जीएसटी की कहानी सिर्फ एक नए टैक्स की कहानी नहीं है। इसने देश के अलग अलग बाजारों को जोड़ने और कारोबार के लिए साझा व्यवस्था बनाने में मदद की है। टैक्स संग्रह बढ़ा है और लेनदेन पर निगरानी मजबूत हुई है। लेकिन बढ़ते राजस्व का पूरा श्रेय केवल जीएसटी को देना भी सही नहीं होगा।

यही सबसे बड़ा सवाल है। व्यापारी का समय और पैसा बचना चाहिए। ट्रक कम रुकें, कारोबारियों को कम कागजी झंझट झेलना पड़े और कर चोरी पर लगाम लगे। साथ ही, टैक्स का फायदा आम ग्राहक तक भी पहुंचना चाहिए।

मित्तल साहब की बात गौर करने लायक है। वे कहते हैं, “सुधार तभी सफल माना जाएगा, जब ट्रक समय पर पहुंचे, व्यापारी बेवजह न उलझे और ग्राहक को उचित कीमत पर सामान मिले।”



 


बारह साल बाद भी मंज़िल दूर क्यों?

वादों और डिलीवरी के बीच बढ़ता फासला?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

9 अक्टूबर 2026

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2014 में दो करोड़ नौकरियां हर साल देने का वादा कहां गया?

क्या हमारी नदियां सचमुच साफ हो गईं?

क्या शहर स्मार्ट हो गए या सिर्फ स्मार्ट बोर्ड लग गए?

भ्रष्टाचार कम हुआ या हमने उसके साथ जीना सीख लिया?

और बारह साल बाद आखिर वादे और डिलीवरी के बीच कितनी दूरी तय हुई?

ये किसी विश्वविद्यालय के शोध के सवाल नहीं हैं। ये वे सवाल हैं जो लोग चाय की दुकानों पर, घरों में, दफ्तरों में और रेलवे प्लेटफॉर्म पर पूछते हैं।

2014 में नरेंद्र मोदी बदलाव के बड़े वादे के साथ सत्ता में आए थे। रोजगार, साफ-सुथरा शासन, बेहतर बुनियादी ढांचा, तेज विकास और नया भारत।

इसमें कोई शक नहीं कि इन बारह वर्षों में बहुत कुछ हुआ है। सड़कें बनीं। हवाई अड्डे बढ़े। डिजिटल सेवाओं का विस्तार हुआ। दुनिया में भारत की आवाज पहले से ज्यादा सुनाई देने लगी।

लेकिन राजनीति कोई पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन नहीं है।

एक समय के बाद आम आदमी सीधा सवाल करता है, "ठीक है, लेकिन मेरी जिंदगी में क्या बदला?"

यहीं से कहानी थोड़ी असहज हो जाती है।

स्वच्छ भारत: शौचालय बने, लेकिन आगे क्या हुआ?

स्वच्छ भारत अभियान सरकार की सबसे दिखाई देने वाली योजनाओं में था। लाखों शौचालय बने। यह निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि थी।

लेकिन शौचालय बन जाना और स्वच्छता आ जाना एक बात नहीं है।

कई शौचालय बंद पड़े हैं। कई में पानी नहीं है। कई गांवों को खुले में शौच से मुक्त घोषित कर दिया गया, लेकिन बाद में उनकी सही जांच नहीं हुई। कूड़ा और सीवेज प्रबंधन अब भी कमजोर है।

और एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि मैला ढोने की प्रथा पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।

हमने शौचालय तेजी से बनाए। लेकिन उनके इस्तेमाल और रखरखाव की आदत उतनी तेजी से नहीं बदली।

यही कहानी नमामि गंगे की भी है।

गंगा की सफाई पर हजारों करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बने। योजनाएं बनीं। उद्घाटन हुए। भाषण हुए।

लेकिन सीवेज आज भी नदी में पहुंच रहा है।

नदी दुर्भाग्य से सरकारी प्रेस विज्ञप्तियां नहीं पढ़ती।

उसे सिर्फ यह पता होता है कि पानी में आखिर जा क्या रहा है।

स्मार्ट सिटी और पुराने सवाल

फिर आया स्मार्ट सिटी मिशन।

विचार अच्छा था। आखिर कौन स्मार्ट शहर नहीं चाहता?

लेकिन कई जगह "स्मार्ट सिटी" का मतलब स्मार्ट मोहल्ला बनकर रह गया।

कुछ सड़कें चमका दी गईं। कैमरे लग गए। वाई-फाई आया। कमांड सेंटर बन गए।

उधर आम नागरिक नालियों, कूड़े, ट्रैफिक, टूटी फुटपाथों और कमजोर सार्वजनिक परिवहन से जूझता रहा। आगरा को ही देख लो! 

स्मार्ट सिटी की असली परीक्षा बहुत आसान है।

एक पैदल यात्री से पूछिए।

क्या वह सड़क सुरक्षित तरीके से पार कर सकता है?

एक साइकिल वाले से पूछिए।

क्या वह अपनी जान जोखिम में डाले बिना साइकिल चला सकता है?

एक रोज आने-जाने वाले से पूछिए।

क्या वह दो घंटे ट्रैफिक में फंसे बिना दफ्तर पहुंच सकता है?

अगर जवाब नहीं है तो शहर को अभी स्मार्ट होने में कुछ वक्त लगेगा।

वे सुधार जिनकी चर्चा कोई नहीं करना चाहता

सड़कें और पुल दिखाई देते हैं। संस्थागत सुधार दिखाई नहीं देते।

2006 में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस सुधार के निर्देश दिए थे। लेकिन उनका पूरा पालन अब तक नहीं हुआ। पुलिस में खाली पद, राजनीतिक हस्तक्षेप और हिरासत में अत्याचार जैसे सवाल बने हुए हैं।

शिक्षा व्यवस्था भी बार-बार परीक्षा पेपर लीक और बेरोजगार युवाओं के सवाल से घिरती है।

अदालतों में मुकदमों का बोझ बढ़ता जा रहा है। सरकारी अस्पतालों पर दबाव बना हुआ है।

इन समस्याओं का समाधान किसी भवन का उद्घाटन करके नहीं होता।

संस्थागत सुधार राजनीति का सबसे नीरस काम है।

न रिबन काटना है, न बड़ा पोस्टर लगाना है, न ड्रोन से तस्वीर खिंचवानी है।

लेकिन देश को सही ढंग से चलाने के लिए यही उबाऊ काम सबसे जरूरी है।

और नौकरियों का क्या हुआ?

शायद कोई दूसरा वादा इतना पीछा नहीं करता जितना रोजगार का सवाल।

2014 में देश के युवाओं में बड़ी उम्मीद जगी थी। हर साल करीब दो करोड़ नौकरियों का वादा राजनीतिक चर्चा का हिस्सा बन गया था।

बारह साल बाद भी बेरोजगारी और अधरोजगारी बड़ी चिंता हैं। पढ़े-लिखे युवाओं के लिए रोजगार का संकट और गंभीर है।

यहां आंकड़ों और जिंदगी का फर्क साफ दिखाई देता है।

डिग्री जीडीपी नहीं खाती। नौकरी चाहिए।

एक परिवार आर्थिक विकास की दर देखकर खुश नहीं होता। वह महीने का राशन, गैस सिलेंडर, स्कूल की फीस, बिजली का बिल और मकान का किराया देखता है।

इसीलिए बेरोजगारी और महंगाई बार-बार जनता की सबसे बड़ी चिंताओं में लौट आती हैं।

किसान अब भी इंतजार में

2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का वादा भी पूरा नहीं हुआ।

2020 के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों ने करीब एक साल तक आंदोलन किया। आखिरकार सरकार को कानून वापस लेने पड़े।

उन कानूनों के पक्ष या विपक्ष में अलग-अलग राय हो सकती है। लेकिन उस आंदोलन ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा किया।

क्या बड़े सुधार ऊपर से थोपे जाएंगे और जनता को बाद में समझाए जाएंगे?

लोकतंत्र में यह तरीका हमेशा सफल नहीं होता।

किसान को सहानुभूति के भाषण नहीं चाहिए। उसे भरोसेमंद आय चाहिए। उचित कीमत चाहिए। पानी और बिजली चाहिए। ऐसा बाजार चाहिए जो ज्यादा पैदा करने पर भी उसे सजा न दे।

विकास और पर्यावरण की लड़ाई

भारत को विकास चाहिए। इसमें किसी को आपत्ति नहीं हो सकती।

भारत के कई शहर आज भी दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में हैं। शहरी बाढ़ लगभग मौसमी समस्या बन गई है। ट्रैफिक बढ़ रहा है। तालाब और प्राकृतिक जल निकासी के रास्ते लगातार खत्म हो रहे हैं।

हम टिकाऊ विकास की बात बहुत करते हैं।

कभी-कभी लगता है कि हमें "विकास" शब्द तो याद रहता है, लेकिन "टिकाऊ" भूल जाते हैं।

भ्रष्टाचार का सवाल

कभी भ्रष्टाचार कांग्रेस के खिलाफ भाजपा का सबसे बड़ा हथियार था।

भाजपा एक साफ विकल्प बनकर सत्ता में आई थी।

लेकिन अब भ्रष्टाचार ने भारतीय राजनीति में एक नया शब्द पा लिया है।

"वॉशिंग मशीन।"

कोई नेता सीबीआई, ईडी या आयकर विभाग की जांच में घिरता है। फिर राजनीतिक समीकरण बदलते हैं। नेता पाला बदलता है। और देखते-देखते राजनीतिक माहौल बदल जाता है।

अजीत पवार का राजनीतिक सफर आलोचकों द्वारा अक्सर उदाहरण के रूप में पेश किया जाता है।

कल तक भ्रष्टाचार के आरोप।

आज राजनीतिक साझेदारी।

सवाल सीधा है।

क्या पार्टी बदलते ही आरोप भी धुल जाते हैं?

सच यह है कि भारतीय राजनीति में यह बीमारी नई नहीं है। पार्टियां दशकों से दलबदलुओं को खरीदती, उधार लेती और गले लगाती रही हैं।

लेकिन भाजपा ने कभी खुद को अलग बताया था।

इसीलिए यह आलोचना ज्यादा चुभती है।

अगर कल का कथित भ्रष्ट नेता आज सम्मानित सहयोगी बन जाता है तो कल के भ्रष्टाचार का क्या हुआ?

क्या वह खत्म हो गया?

या नेता ने सिर्फ वॉशिंग मशीन बदल ली?

वह पार्टी जो अलग होने का दावा करती थी

भाजपा की 2014 की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत यही थी कि वह खुद को अलग पार्टी बताती थी।

कम परिवारवाद। कम भ्रष्टाचार। बेहतर शासन। ज्यादा विकास।

आज आलोचक कहते हैं कि पार्टी ने उन्हीं राजनीतिक आदतों में से कुछ अपना ली हैं, जिनके खिलाफ वह कभी खड़ी थी।

सरकारें गिरीं। पार्टियां टूटीं। विधायक पाला बदलते रहे। राजनीतिक वफादारियां रातोंरात बदल गईं।

संविधान वही है।

राजनीतिक फर्नीचर लगातार बदल रहा है।

जब जांच एजेंसियों पर विपक्षी नेताओं के खिलाफ ज्यादा सक्रिय और सत्तापक्ष के नेताओं के प्रति नरम होने के आरोप लगते हैं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।

हर आरोप को सच मान लेना ठीक नहीं।

लेकिन हर आरोप को विपक्ष का प्रचार कहकर खारिज करना भी लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं।

इन सवालों के जवाब जरूरी हैं।

लोकतंत्र सिर्फ चुनावों से नहीं चलता। वह उन संस्थाओं पर भरोसे से चलता है जिन्हें जनता निष्पक्ष मानती है।

दुनिया में भारत की साख बढ़ी है

इस कहानी का दूसरा पहलू भी है।

दुनिया में भारत की स्थिति निश्चित रूप से मजबूत हुई है। बड़े अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन, प्रवासी भारतीयों से संपर्क और बढ़ता कूटनीतिक प्रभाव भारत को नई पहचान दे रहे हैं।

यह महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

लेकिन अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा घरेलू समस्याओं को हमेशा नहीं ढक सकती।

एक देश शानदार सम्मेलन कर सकता है और उसी सम्मेलन स्थल के बाहर टूटी फुटपाथ भी हो सकती है।

वह वैश्विक शक्ति बनने की बात कर सकता है और उसका नागरिक अदालत में वर्षों तक न्याय का इंतजार कर सकता है।

वह डिजिटल इंडिया पर गर्व कर सकता है और उसी समय कोई गांव बुनियादी स्वच्छता के लिए तरस सकता है।

दोनों तस्वीरें एक साथ सच हो सकती हैं।

तो रिपोर्ट कार्ड क्या कहता है?

बारह साल का हिसाब इस सवाल से नहीं लगाया जा सकता कि मोदी सरकार ने कुछ किया या नहीं।

निश्चित रूप से बहुत कुछ किया है।

सही सवाल यह है:

क्या काम का पैमाना उन वादों के पैमाने के बराबर है जो 2014 में किए गए थे?

यहीं संदेह पैदा होता है।

भारत ने शानदार बुनियादी ढांचा बनाया है। लेकिन संस्थाएं अब भी कमजोर हैं।

भारत ज्यादा डिजिटल हुआ है। लेकिन करोड़ों लोगों के लिए अच्छी नौकरी अब भी सपना है।

स्वच्छता की बात होती है। लेकिन नदियां और शहर अब भी प्रदूषित हैं।

भारत की वैश्विक ताकत बढ़ी है। लेकिन घर के बाहर सड़क पार करना अब भी कई जगह जान जोखिम में डालना है।

भ्रष्टाचार खत्म करने की बात होती है। लेकिन राजनीतिक अवसरवाद पूरी ताकत से जिंदा है।

और आम आदमी?

वह अब भी उस "अच्छे दिन" का इंतजार कर रहा है जो नारे से निकलकर रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन जाए।

बारह साल कम समय नहीं होता।

इतने समय में सड़कें बन सकती हैं। हवाई अड्डे बन सकते हैं। बड़े स्मारक खड़े हो सकते हैं।

इतने समय में यह भी पता चल जाता है कि उनकी नींव कितनी मजबूत है।

मोदी सरकार ने जो बनाया है, उसका श्रेय उसे मिलना चाहिए।

जो अधूरा रह गया है, उसके सवाल भी पूछे जाने चाहिए।

यह मोदी विरोध नहीं है।

यह लोकतंत्र है।

असल दूरी दिल्ली से मुंबई की नहीं है। न ही किसी एक्सप्रेसवे की लंबाई से इसे नापा जा सकता है।

असल दूरी है वादे और डिलीवरी के बीच की दूरी।

और बारह साल बाद भी यह सड़क निर्माणाधीन है।

मोदी ने लंबा सफर तय किया है। लेकिन करोड़ों भारतीयों के लिए अभी कई लंबे मील बाकी हैं।





Tuesday, October 6, 2026

 


फ्रांस फिर सड़कों पर

क्रांति के सपने छोटे क्यों हो गए?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

7 अक्टूबर 2026

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पेरिस और ब्रसेल्स की हाल की यात्रा अभी यादों में ताजा है। खूबसूरत इमारतों, साफ सड़कों और कैफे की रौनक के पीछे मुझे कुछ और भी दिखाई दिया था। 

Gen Z के युवाओं से बातचीत में एक बेचैनी महसूस हुई। वे व्यवस्था से पूरी तरह खुश नहीं थे। शिकायतें अलग-अलग थीं, लेकिन भीतर कोई खदबदाहट जरूर थी।

तब अंदाजा नहीं था कि यह बेचैनी इतनी जल्दी सड़कों पर दिखाई देगी।

अब फ्रांस सड़कों पर है।

जो आंदोलन शिक्षकों की कमी, भीड़भरी कक्षाओं और जर्जर स्कूलों से शुरू हुआ था, वह देखते-देखते राष्ट्रीय अशांति का बड़ा चेहरा बन गया है। सैकड़ों स्कूल प्रभावित हैं। हजारों लोग हिरासत में लिए गए हैं। छात्र, शिक्षक और पुलिसकर्मी घायल हुए हैं। 6 अक्टूबर तक 6,100 से अधिक गिरफ्तारियों की रिपोर्ट आ चुकी थी, जिनमें बड़ी संख्या नाबालिगों की है।

फ्रांस में स्कूल की समस्या कोई काल्पनिक कहानी नहीं है। कई जगह शिक्षक नहीं हैं, कक्षाएँ भरी हुई हैं और स्कूल भवनों की हालत खराब है। छात्रों की मांग है कि सरकार उन्हें केवल भाषण नहीं, बेहतर स्कूल दे।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।

पोप लियो चौदहवें 25 से 28 सितंबर तक फ्रांस आए थे। पेरिस में उन्होंने शांति, संवाद और सामाजिक एकता की बात की। फ्रांस के राष्ट्रपति के साथ उनकी बातचीत में मध्य-पूर्व की शांति और संवाद भी प्रमुख विषय थे।

अजीब संयोग था।

एक तरफ पेरिस में शांति और सद्भाव की प्रार्थना हो रही थी। दूसरी तरफ उसी शहर के किशोर स्कूलों के बाहर बैरिकेड लगा रहे थे।

और मुझे भारत का मौजूदा कॉकरोच आंदोलन याद आ गया।

भारत में Gen Z से जुड़ा यह नया राजनीतिक आंदोलन चुनावी व्यवस्था और मतदाता सूची में बदलाव के खिलाफ सड़कों पर है। 2 अक्टूबर को मुंबई और दिल्ली में इसके प्रदर्शन हुए। आंदोलन का नाम ही अपने आप में व्यंग्य है, जिस शब्द से युवाओं को अपमानित किया गया, उन्होंने उसी को अपना झंडा बना लिया।

थाईलैंड में भी युवाओं ने पिछले वर्षों में लोकतंत्र, राजनीतिक सुधार और संस्थागत बदलाव के सवाल उठाए। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में युवा पीढ़ी अपनी आवाज खोज रही है।

लेकिन यहीं एक बड़ा सवाल पैदा होता है।

क्या आज के छात्र आंदोलन वैसे ही हैं जैसे हमारे समय के आंदोलन थे?

मैं अपने छात्र जीवन में गुजरात के 1973-74 के दिनों को कैसे भूल सकता हूँ?

गुजरात में छात्रों का आंदोलन पहले मेस की बढ़ी फीस और महंगाई जैसे सवालों से शुरू हुआ। लेकिन धीरे-धीरे वह भ्रष्टाचार और शासन के खिलाफ व्यापक नवनिर्माण आंदोलन बना। मुख्यमंत्री को इस्तीफा देना पड़ा और विधानसभा भंग हुई। यही आंदोलन आगे चलकर जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन के लिए आधार भी।

जेपी आंदोलन में सपना बड़ा था।

सिर्फ सरकार बदलनी नहीं थी। व्यवस्था बदलनी थी।

हमारी पीढ़ी ने छात्र आंदोलनों में बड़े शब्द सुने थे: संपूर्ण क्रांति, सामाजिक न्याय, भ्रष्टाचार-मुक्त समाज, लोकतंत्र की रक्षा।

दुनिया के दूसरे हिस्सों में हिप्पी आंदोलन भी स्थापित जीवनशैली के खिलाफ विद्रोह था। युद्ध के खिलाफ आवाज थी। उपभोक्तावाद, सत्ता, नैतिकता और पारंपरिक सामाजिक ढांचे पर सवाल थे।

उन आंदोलनों में एक आदर्शवादी उन्माद था।

युवा कहते थे: दुनिया बदलनी है।

आज का युवा ज्यादा व्यावहारिक है।

फ्रांस का छात्र कहता है: मुझे शिक्षक चाहिए। मेरी कक्षा छोटी करो। स्कूल की छत ठीक करो। सुविधाएँ दो।

मांगें जायज हैं।

लेकिन सवाल यह है कि क्या इन मांगों के पीछे कोई बड़ा सामाजिक सपना भी है?

पुराने छात्र व्यवस्था को बदलना चाहते थे। आज के छात्र व्यवस्था से अपनी सुविधा का बेहतर हिस्सा मांग रहे हैं।

यही शायद हमारे समय का सबसे बड़ा फर्क है।

ब्रसेल्स में भी मैंने इसी तरह की बेचैनी देखी। सितंबर में सैकड़ों छात्रों ने बढ़ती फीस और शिक्षा के बढ़ते खर्च के खिलाफ प्रदर्शन किया। आयोजकों के अनुसार, कई छात्रों के लिए फीस करीब 1,200 यूरो तक पहुंच गई है और बड़ी संख्या में छात्र पढ़ाई के साथ काम करने को मजबूर हैं।

यूरोप के युवा पूछ रहे हैं: पढ़ाई इतनी महंगी क्यों हो रही है?

भारत के युवा पूछ रहे हैं: मेरी वोट की गारंटी कौन देगा?

फ्रांस का युवा पूछ रहा है: मेरा शिक्षक कहाँ है?

सवाल अलग हैं। बेचैनी एक है।

लेकिन फ्रांस की कहानी में एक और संवेदनशील परत है।

आव्रजन और राष्ट्रीय पहचान।

फ्रांस में उत्तरी अफ्रीका और दूसरे मुस्लिम देशों से आए लोगों की बड़ी आबादी है। लाखों लोग फ्रांसीसी समाज में पूरी तरह घुले-मिले हैं। लेकिन कुछ इलाकों में गरीबी, बेरोजगारी, सामाजिक अलगाव और सांस्कृतिक दूरी ने तनाव पैदा किया है।

इसी पृष्ठभूमि में पेरिस विश्वविद्यालय के एक फ्रांसीसी छात्र से भारत यात्रा के दौरान मेरी बातचीत हुई। उसने चिंता जताते हुए कहा कि फ्रांस की सबसे बड़ी समस्या ऐसे लोग हैं जिन्हें वह “गैर-जैविक फ्रांसीसी” कहता है और जिनके बारे में उसे लगता है कि वे देश पर कब्जा करना चाहते हैं।

उसकी बात चौंकाने वाली थी।

उसके चेहरे पर डर था।

लेकिन उसकी धारणा को पूरे फ्रांसीसी समाज की राय मान लेना भी गलत होगा। यह एक युवा व्यक्ति की चिंता है, जबकि आव्रजन, समायोजन और राष्ट्रीय पहचान पर फ्रांस में गहरी और विवादित राजनीतिक बहस चल रही है।

इसी तरह कुछ प्रदर्शनों में फिलिस्तीन और हमास के समर्थन से जुड़े नारे सुनाई देने की खबरें और आरोप सामने आए हैं। 

असल आंदोलन की शुरुआत स्कूलों से हुई थी।

टपकती छत से लेकर सांस्कृतिक पहचान तक की यात्रा बहुत लंबी है।

खतरा तब पैदा होता है जब किसी वास्तविक छात्र शिकायत को राजनीतिक या सांप्रदायिक ताकतें अपने एजेंडे के लिए इस्तेमाल करने लगती हैं।

फ्रांस के सामने इसलिए दो अलग लेकिन जुड़े हुए सवाल हैं।

पहला, क्या वह अपने युवाओं को अच्छी शिक्षा, समान अवसर और सम्मान दे पा रहा है?

दूसरा, क्या वह अलग-अलग समुदायों को एक साझा फ्रांसीसी नागरिक पहचान में जोड़ पा रहा है?

इन दोनों सवालों का जवाब केवल पुलिस से नहीं मिलेगा।

फ्रांस स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे का देश होने पर गर्व करता है। लेकिन जब एक बच्चा आधुनिक स्कूल में पढ़े और दूसरा जर्जर भवन में 35 बच्चों के साथ बैठे, तो समानता का नारा थोड़ा खोखला सुनाई देता है।

और जब युवा अपने देश से जुड़ाव महसूस न करे, तब केवल राष्ट्रवाद का भाषण भी काम नहीं करता।

पुरानी पीढ़ी के आंदोलनों में एक बड़ा सपना था।

आज के आंदोलनों में बड़ी मांगों की जगह छोटी-छोटी ठोस मांगें हैं।

शायद यही हमारे समय की त्रासदी है।

हमारे पास पहले सपने बड़े थे, साधन छोटे थे।

आज साधन बड़े हैं, लेकिन सपने छोटे होते जा रहे हैं।

फ्रांस की सड़कों से भारत के कॉकरोच आंदोलन तक, ब्रसेल्स से थाईलैंड तक Gen Z अपनी आवाज तलाश रही है।

अभी यह तय नहीं है कि यह आवाज केवल फीस, शिक्षक, नौकरी और सुविधाओं तक रहेगी या कोई बड़ा सामाजिक सपना भी जन्म लेगा।


Monday, October 5, 2026

 


नदियों को क्रांति का वादा था, मिला भाषणों का सैलाब

भारत को अब नारा नहीं, राष्ट्रीय नदी नीति चाहिए

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बृज खंडेलवाल द्वारा

8 अक्टूबर 2026

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क्या आपने कभी ऐसी व्यवस्था देखी है जो पवित्र नदियों को बचाने के लिए सबसे ज्यादा भाषण दे और नदियां फिर भी मरती रहें?

भारत ने यह प्रयोग करीब एक दशक से देख लिया है।

सत्ता में आने के बाद  एनडीए सरकार ने नदियों को लेकर बड़े सपने दिखाए। गंगा साफ होगी, यमुना बहेगी, नदियाँ जुड़ेंगी, जलमार्ग बनेंगे, नावें चलेंगी और नदी पर्यटन देश की नई तस्वीर बनाएगा।

सुनकर लगा था कि अब नदियों के अच्छे दिन आने वाले हैं।

लेकिन नदी की हालत देखकर लगता है कि अच्छे दिन शायद भाषण मंच पर ही आकर रुक गए।

सबसे दिलचस्प उदाहरण यमुना है।

केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने दिल्ली से आगरा तक यमुना में फेरी चलाने का सपना दिखाया था। पर्यटक नाव में बैठेंगे, यमुना की लहरों का आनंद लेंगे और आखिर में ताजमहल के सामने उतरेंगे।

क्या शानदार तस्वीर थी!

बस एक छोटी-सी समस्या रह गई।

नदी कहाँ थी?

नावें नहीं आईं। जलमार्ग नहीं बना। ताज वहीं है। दिल्ली भी वहीं है। आगरा भी वहीं है। लेकिन यमुना आज भी कई जगह पानी से ज्यादा सीवेज, झाग और कचरे का बोझ ढो रही है।

वादे खूब बहे। नदी नहीं बही।

यही भारत की नदी राजनीति का सबसे बड़ा मजाक है।

सरकारें सड़क बना सकती हैं, पुल बना सकती हैं, हवाई अड्डे बना सकती हैं। हजारों करोड़ की परियोजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन कर सकती हैं। लेकिन नदी को जीवित करने के मामले में देश अभी भी फाइलों, समितियों और घोषणाओं के दलदल में फँसा है।

दस साल किसी सरकार के लिए कम समय नहीं होता।

एक दशक में शहरों का नक्शा बदल सकता है। एक्सप्रेसवे बन सकते हैं। नए हवाई अड्डे खड़े हो सकते हैं। लेकिन नदी?

नदी अब भी “काम प्रगति पर है” की पट्टी लगाए बैठी है।

भाषण राष्ट्रीय, जिम्मेदारी किसी की नहीं

भारत के पास वैज्ञानिक हैं। इंजीनियर हैं। पैसा है। तकनीक है। मंत्रालय हैं। समितियाँ हैं। मिशन हैं। योजनाएँ हैं।

कमी सिर्फ एक चीज की दिखती है।

लगातार राजनीतिक इच्छाशक्ति की।

नदी की सफाई के नाम पर पैसा खर्च होता है। ट्रीटमेंट प्लांट बनते हैं। बैठकें होती हैं। रिपोर्टें तैयार होती हैं। फिर नई योजना आती है।

लेकिन मूल सवाल वहीं खड़ा रहता है।

नदी की सेहत का जिम्मेदार कौन है?

यही हमारी व्यवस्था का कमाल है। नदी राष्ट्रीय है, लेकिन उसकी जिम्मेदारी टुकड़ों में बँटी है।

एक राज्य पानी रोकता है। दूसरा सीवेज छोड़ता है। तीसरा बाँध बनाता है। चौथा कम प्रवाह की शिकायत करता है।

नदी सबकी है, इसलिए व्यवहार में वह किसी की नहीं है।

और नदी की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि वह वोट नहीं देती।

नदी नाली नहीं है

नदी में पानी भर देना ही नदी बचाना नहीं है।

नदी एक जीवित व्यवस्था है। उसके साथ भूजल है, तालाब हैं, आर्द्रभूमियाँ हैं, सहायक नदियाँ हैं, मछलियाँ हैं, जंगल हैं, बाढ़ क्षेत्र हैं और प्राकृतिक गाद का प्रवाह है।

इन सबको मारकर सिर्फ नदी के पानी की जांच कर लेना वैसा ही है जैसे मरीज का तापमान देखकर उसे स्वस्थ घोषित कर देना।

नदी का रंग साफ हो सकता है, लेकिन नदी फिर भी बीमार हो सकती है।

इसलिए देश को हर प्रमुख नदी के लिए राष्ट्रीय नदी स्वास्थ्य सूचकांक चाहिए।

हर साल सार्वजनिक रिपोर्ट आए।

कितना पानी है? कितना प्राकृतिक प्रवाह है? भूजल की स्थिति क्या है? मछलियाँ बची हैं या नहीं? आर्द्रभूमियाँ कितनी बची हैं? बाढ़ क्षेत्र पर कितना कब्जा है? कितना सीवेज गिर रहा है? उद्योग कितना प्रदूषण कर रहे हैं?

और रिपोर्ट सिर्फ पढ़ी न जाए।

उस पर कार्रवाई भी हो।

नदी प्रदूषित हो तो जिम्मेदार अधिकारी भी दिखे।

अब यह व्यवस्था बदलनी होगी।

जहाँ लगातार सीवेज नदी में जा रहा है, वहाँ जिम्मेदारी तय हो। जहाँ उद्योग नियम तोड़ रहे हैं, वहाँ सिर्फ मामूली जुर्माना नहीं, कठोर कार्रवाई हो। जहाँ बाढ़ क्षेत्र पर कब्जा हो रहा है, वहाँ अनुमति देने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय हो।

बिना जवाबदेही के नदी पुनर्जीवन सिर्फ सरकारी शब्दावली है।

नदी पर्यटन अच्छी बात है। नौवहन भी उपयोगी हो सकता है। लेकिन नाव चलाने से पहले नदी में पानी होना चाहिए।

सूखी या प्रदूषित नदी पर पर्यटन का सपना कागज पर ही अच्छा लगता है।

पहले नदी बचाइए।

फिर नाव चलाइए।

दिल्ली से आगरा की फेरी का सपना इसलिए याद रखने लायक है क्योंकि उसने सरकार की प्राथमिकता का एक मजेदार सच सामने रखा।

ताज तक नाव पहुँचाने का सपना था, लेकिन ताज के पास बहती यमुना को बचाने की कोई समयसीमा नहीं थी।

आस्था और नदी दोनों बच सकती हैं

भारत की नदियाँ करोड़ों लोगों की आस्था हैं। पूजा, स्नान और धार्मिक आयोजन हमारी सामाजिक परंपरा का हिस्सा हैं।

लेकिन आस्था का अर्थ नदी में कूड़ा डालना नहीं हो सकता।

सरकार घाटों पर सफाई, शौचालय, कूड़ा प्रबंधन और पूजा सामग्री के संग्रह की व्यवस्था करे। विसर्जन के लिए वैज्ञानिक और सुरक्षित स्थान बनाए जाएँ।

धर्म को नदी से लड़ाने की जरूरत नहीं है। व्यवस्था को ईमानदार बनाने की जरूरत है।

नदी का इलाज किनारे से शुरू नहीं होता

नदी बचाने का असली काम नदी से दूर शुरू होता है।

जंगल कट रहे हैं। तालाब गायब हो रहे हैं। भूजल निकाला जा रहा है। रेत खनन बढ़ रहा है। बाढ़ क्षेत्र में कॉलोनियाँ बन रही हैं। शहर प्राकृतिक नालों को निगल रहे हैं।

फिर हम नदी में जाकर कचरा निकालते हैं और घोषणा कर देते हैं कि नदी बच गई।

नदी का पूरा बेसिन बचाना होगा।

सहायक नदियाँ, तालाब, आर्द्रभूमियाँ, भूजल क्षेत्र, बाढ़ मैदान और प्राकृतिक जल निकासी सभी राष्ट्रीय नदी नीति का हिस्सा होने चाहिए।

अब राष्ट्रीय नदी नीति का समय है

भारत की बड़ी नदियाँ राज्यों की सीमाएँ नहीं पहचानतीं।

फिर नदी नीति राज्य की सीमाओं में क्यों कैद रहे?

गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी और दूसरी नदियों के लिए नदी बेसिन को योजना की मूल इकाई बनाना होगा।

देश को एक मजबूत राष्ट्रीय नदी नीति और राष्ट्रीय नदी कानून चाहिए।

इसके तहत एक प्रभावी राष्ट्रीय नदी प्राधिकरण हो। वैज्ञानिक पर्यावरणीय प्रवाह तय हो। अंतरराज्यीय जल बँटवारा पारदर्शी हो। नदी स्वास्थ्य की नियमित स्वतंत्र जांच हो। और नियम तोड़ने वालों की जिम्मेदारी तय हो।

जनता को भी इस व्यवस्था का हिस्सा बनाना होगा। नदी किनारे रहने वाले लोग सबसे पहले जानते हैं कि नदी कब कमजोर पड़ रही है। मछुआरे जानते हैं कि मछलियाँ कब गायब हुईं। किसान जानते हैं कि भूजल कब नीचे गया।

उनकी आवाज को सरकारी फाइलों में जगह मिलनी चाहिए।

अब भाषण नहीं, हिसाब चाहिए

एक दशक बीत गया।

नदियों के लिए बड़े-बड़े वादे हुए। मिशन बने। योजनाएँ आईं। पैसा खर्च हुआ। भाषण हुए। तस्वीरें खिंचीं।

लेकिन सवाल आज भी वही है।

भारत की नदियाँ वास्तव में कितनी स्वस्थ हुईं?

अब सरकार को यह बताने से काम नहीं चलेगा कि उसने कितने करोड़ खर्च किए।

उसे बताना होगा कि नदी में कितना पानी लौटा।

कितनी मछलियाँ लौटीं।

कितनी आर्द्रभूमियाँ बचीं।

कितना सीवेज रुका।

कितने अतिक्रमण हटे।

और कितने अधिकारियों से जवाब माँगा गया।

क्योंकि नदी कोई चुनावी घोषणा नहीं है।

नदी कोई मंत्रालय की फाइल नहीं है।

नदी कोई उद्घाटन पट्टिका नहीं है।

नदी जीवन है।

और अगर भारत विश्व शक्ति बनने का सपना देखता है, तो उसे अपनी नदियों को मरने नहीं देना होगा।

नावें बाद में चलेंगी।

पहले नदी बहने दीजिए।

नारे बहुत हो गए। भाषण बहुत हो गए। अब नदी को पानी चाहिए, जगह चाहिए, स्वच्छता चाहिए, जीवन चाहिए और भविष्य चाहिए।


Sunday, October 4, 2026

 पानी की लहरों में छिपा यूरोप का दिल!

जब नदियों ने शहरों को रूह और रंग दिए

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बृज खंडेलवाल द्वारा  

6 अक्टूबर 2026

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यूरोप की मेरी हाल की यात्रा को अगर एक शब्द में बाँधना हो, तो वह शब्द होगा :  पानी।  

मैंने वहाँ आधा दर्जन से ज़्यादा नदियाँ, नहरें और झीलें नज़दीक से देखीं। कभी क्रूज़ पर बैठकर, कभी फेरी में, कभी पुल से झाँककर और कभी किनारे बैठकर। नाविकों, फेरीवालों, क्रूज़ मैनेजरों और गोंडोला चलाने वालों से बातें कीं। किनारे बैठे आम लोग भी देखे , जो दोपहर की सुनहरी धूप में नदी को निहार रहे थे, बातें कर रहे थे या बस ज़िंदगी को थोड़ी देर आराम दे रहे थे।

धीरे-धीरे एक बात दिल में उतर गई ; 

नदी सिर्फ पानी से ज़िंदा नहीं रहती। नदी तब ज़िंदा रहती है, जब लोग उससे प्यार करते हैं।

लंदन की टेम्स ने सबसे पहले नज़र खींची।  

क्रूज़ पर बैठते ही लगा जैसे लंदन अपनी पूरी कहानी नदी के सामने खोल रहा हो। संसद भवन, पुरानी इमारतें, पुल, म्यूज़ियम, लंदन आई और चमकता आधुनिक शहर एक-एक करके सामने आते गए। किनारे लोग टहल रहे थे, फेरी दौड़ रही थीं, पर्यटक तस्वीरें खींच रहे थे और कुछ चुपचाप पानी की लहरों में खोए हुए थे।  

टेम्स सिर्फ नदी नहीं थी। वह लंदन की सड़क भी थी, सैरगाह भी, इतिहास की खुली किताब भी और शहर का आँगन भी।


फिर पेरिस की सीन नदी आई।  

अगर टेम्स लंदन का दरवाज़ा है, तो सीन पेरिस का आईना है।  

क्रूज़ पर बैठकर पेरिस को पानी से देखना अपने आप में एक जादू था। एफिल टावर की ऊंचाई से नीचे नदी को निहारना एक अद्भुत अनुभव था। पुलों के नीचे से नाव निकलती और अगले ही पल कोई शानदार इमारत, म्यूज़ियम या ऐतिहासिक स्मारक सामने आ जाता। किनारे लोग घूम रहे थे, बैठे थे, हँस-बोल रहे थे।  

पेरिस ने नदी को शहर के पीछे नहीं धकेला। उसने नदी को बीचों-बीच जगह दी है। सीन सिर्फ बहती नहीं बल्कि पेरिस उसके साथ जीता है।


एम्स्टर्डम: जहाँ पानी ही रास्ता है, पानी ही ज़िंदगी 

एम्स्टर्डम की नहरों ने कहानी को नया रंग दिया। यहाँ पानी कोई रुकावट नहीं, पानी ही राह है। छोटी-बड़ी नावें नहरों में तैरती रहती हैं। पुल एक-दूसरे को जोड़ते हैं। पुराने मकान पानी की ओर झुके लगते हैं। लोग किनारे बैठते हैं और पर्यटक नावों से शहर देखते हैं।  

डच लोगों ने पानी से एक प्यारा सा समझौता कर लिया है। पानी को हराने की बजाय उसके साथ रहना सीख लिया। नहरें यहाँ परिवहन भी हैं, सैर भी, इतिहास भी और दिल का सुकून भी।


वेनिस: पानी पर बसा शहर

वेनिस में तो बात ही अलग थी। यहाँ सड़क से ज़्यादा पानी दिखता है। गोंडोला, नावें और जल-टैक्सियाँ रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा हैं। गोंडोला चलाने वाला सिर्फ नाविक नहीं लगता;  वह चलता-फिरता कहानीकार लगता है। महलों और पुरानी इमारतों के बीच से गोंडोला गुज़रता है तो लगता है इतिहास अभी भी साँस ले रहा है।  

वेनिस ने एक बड़ी बात सिखाई ,  कभी-कभी प्रकृति को जीतने से बेहतर होता है, उसके साथ जीना सीखना।


हीडलबर्ग: नेकर और पुरानी यादें 

जर्मनी के हीडलबर्ग शहर, जो हायर एडुकेशन के लिए प्रख्यात है, में नेकर नदी का अपना जादू था। ऊपर पहाड़ी पर पुराना किला और नीचे बहती नदी। आसपास पुराने पुल, इमारतें और हरी-भरी वादियाँ। नाव पर बैठकर शहर देखना ऐसा लगा जैसे कोई पुरानी किताब धीरे-धीरे खुल रही हो।  

यही नदी-यात्रा का असली जादू है ; आप शहर को नहीं देखते, शहर खुद आपके सामने आ जाता है।


राइन: यूरोप की जल-धमनी

राइन ने यूरोप का दूसरा चेहरा दिखाया। यह सिर्फ सुंदर नहीं, व्यापार और आवागमन की बड़ी धुरी भी रही है। मालवाहक जहाज़, पर्यटक क्रूज़ और किनारे के कस्बे, किले और पुरानी इमारतें नदी की कहानी को और गहरा बना देते हैं।  

तब समझ आया :  यूरोप की नदियाँ सिर्फ सजावट नहीं हैं। वे शहरों की आर्थिक और सांस्कृतिक ज़िंदगी की रेखा हैं।


फ्लोरेंस की आर्नो और आल्प्स की इन   

फ्लोरेंस में आर्नो नदी ने अलग रंग दिखाया। मशहूर पोंटे वेक्कियो के नीचे बहती आर्नो और आसपास की पुरानी इमारतें ऐसी लगती हैं जैसे पूरा शहर नदी में अपना अतीत देख रहा हो। यहाँ नदी कला, संस्कृति और इतिहास से जुड़ी हुई है।  

फिर आल्प्स की 'इन'  नदी आई, जो ऑस्ट्रिया के इंसब्रुक जैसे शहरों से गुज़रती है। पहाड़ों के बीच बहती यह नदी दूर से चाँदी की चमकती लकीर जैसी लगती है। आसपास की खूबसूरती इतनी भव्य है कि नदी खुद भी उस नज़ारे की धड़कन बन जाती है। यहाँ नदी व्यापार से ज़्यादा प्रकृति और ज़िंदगी का अहसास कराती है।


इंटरलाकेन: जहाँ पहाड़ पानी में उतर आते हैं

स्विट्ज़रलैंड के इंटरलाकेन में थून और ब्रिएंज की विशाल झीलों ने दिल मोह लिया। चारों तरफ आल्प्स के पहाड़ और उनके बीच फैला नीला-शांत पानी। ऐसा लगा जैसे पहाड़ों ने अपने सामने दो बड़े आईने रख दिए हों। कोई शोर नहीं, बस पानी, पहाड़, हवा और दूर तक फैली हरियाली।  

कभी-कभी यात्रा में ऐसे नज़ारे मिलते हैं जहाँ कैमरा भी बेबस हो जाता है। आँख तस्वीर ले लेती है और दिल उसे हमेशा के लिए रख लेता है।


यूरोप के किनारे और हमारी नदियाँ

इन सैरों के दौरान एक बात बार-बार दिल में घूमती रही। यूरोप की नदियों के किनारे आमतौर पर गंदगी और प्लास्टिक के ढेर नहीं दिखे। लोग या मवेशी नदी में नहाते नहीं दिखे। हाँ, बतखें और पक्षी पानी में मस्ती करते ज़रूर दिखे।  

कई जगह मज़बूत तटबंध हैं, पत्थर-टाइलों के रास्ते हैं, चौड़े पैदल मार्ग हैं, लॉन हैं, फूलों की झाड़ियाँ हैं और सुंदर बुलेवार्ड हैं। और सबसे खास बात — नदी के किनारे ज़िंदगी है। संगीत, थिएटर, नावें, फेरी, रेस्तराँ, म्यूज़ियम, पर्यटन और सामुदायिक कार्यक्रम। लोग नदी के पास आते हैं और उसे अपना मानते हैं।  

नाविकों और क्रूज़ वालों से बातचीत में यही बात महसूस हुई । नदी तभी सुरक्षित रहती है जब लोग उसके पास आते हैं। लोग आएंगे तो देखेंगे, देखेंगे तो चिंता करेंगे, चिंता करेंगे तो सवाल पूछेंगे और सवाल पूछेंगे तो सरकारों को भी जवाब देना पड़ेगा।


तभी याद आई काहिरा की नील नदी 

इन यूरोपीय नदियों के बीच अचानक वर्षों पुरानी एक यात्रा याद आ गई :  काहिरा की नील पर क्रूज़। पानी पर चलती नाव, आसपास का शहर, शाम का माहौल और नदी से दिखाई देता काहिरा। नील ने भी वही अहसास दिया था कि नदी किसी शहर की रूह बन सकती है।


और फिर यमुना सामने आ गई 

लेकिन यूरोप की इन खूबसूरत नदियों के बीच मेरी नज़र बार-बार यमुना पर जाकर ठहर जाती। आगरा की यमुना ; वही नदी जिसके किनारे ताजमहल खड़ा है, वही नदी जिसने सदियों से आगरा का इतिहास देखा है।  

आज हम नदी को देखते हैं तो अक्सर पानी से ज़्यादा गंदगी, प्लास्टिक, कूड़ा, दुर्गंध और उपेक्षा दिखती है।  

सवाल यह है ,  क्या नदी को सिर्फ सफाई अभियान और सरकारी योजनाओं से बचाया जा सकता है?  

यूरोप से जवाब कुछ अलग मिला। नदी को पहले लोगों की ज़िंदगी में वापस लाना होगा।  

यमुना के किनारे साफ-सुथरे पैदल मार्ग हों, सुरक्षित घाट हों, हरियाली हो, फूल हों, नावें चलें, जहाँ संभव हो मछली पकड़ने की अनुमति हो, संगीत और सांस्कृतिक कार्यक्रम हों, स्थानीय समुदाय जुड़े और बच्चे नदी को करीब से देखें। नदी किनारे शाम की रौनक हो। लोग वहाँ बैठें और कहें : “चलो, आज यमुना किनारे चलते हैं।”  

बस यही एक वाक्य नदी को बदल सकता है।


नदी को फिर से शहर का आँगन बनाइए 

यूरोप की यात्रा से लौटकर एक बात और साफ हो गई। नदी को सिर्फ पानी की धारा समझना भूल है। नदी अर्थव्यवस्था है, संस्कृति है, इतिहास है, पर्यटन है, मनोरंजन है और स्मृति है। और सबसे बढ़कर :  नदी लोगों को जोड़ने वाली जगह है।  दुर्भाग्य से, आगरा में  यमुना को सीवेज कैनाल, नाला बनाकर छोड़ दिया है।

यूरोप की नदियों ने अपने शहरों को पहचान दी है। उन्होंने शहरों को पैसा भी दिया, पर्यटन भी दिया और इतिहास को ज़िंदा रखने का मंच भी दिया।  

तो फिर आगरा की यमुना क्यों नहीं? क्यों न यमुना को आगरा का सबसे बड़ा खुला सांस्कृतिक मंच बनाया जाए? क्यों न नदी के किनारे शाम को संगीत बजे, बच्चे खेलें, बुज़ुर्ग बैठें, पर्यटक नौका में शहर देखें और स्थानीय लोग गर्व से कहें : यह हमारी नदी है?  

नदी को बचाने का सबसे आसान रास्ता शायद यही है : लोगों को नदी से फिर प्यार करा दीजिए।


नदियाँ सिर्फ शहरों से होकर नहीं गुज़रतीं।  

जब शहर उनकी कद्र करते हैं, तो नदियाँ उन शहरों को रूह दे देती हैं।




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