प्रिय आगरा, हमारे फुटपाथ लौटा दो!
सड़कें सिर्फ़ गाड़ियों की नहीं, इंसानों की भी हैं
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बृज खंडेलवाल द्वारा
15 जुलाई 2026
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नेताओं और अफ़सरों से एक छोटी-सी गुज़ारिश है। एक दिन बिना लालबत्ती, बिना सरकारी गाड़ी और बिना सुरक्षा घेरे के आगरा की सड़कों पर पैदल चलकर दिखाइए। तब मालूम होगा कि इस शहर में पैदल चलना अब सफ़र नहीं, रोज़ का इम्तिहान बन चुका है।
आगरा का कोई एक इलाक़ा बता दीजिए, जहाँ आदमी निडर होकर फुटपाथ पर चल सके। योगी सरकार तेज़ रफ़्तार एक्सप्रेसवे बनाने में व्यस्त है, लेकिन पैदल चलने वालों की रफ़्तार और सुरक्षा जैसे किसी की प्राथमिकता ही नहीं रही।
ताजमहल दुनिया की शान है, मगर शहर की असली पहचान उसकी सड़कें होती हैं। और आगरा की सड़कें आज एक कड़वी हक़ीक़त बयान करती हैं: यह शहर पैदल चलने वालों का नहीं रहा।
फुटपाथ, जो आम लोगों के लिए बने थे, अब दुकानों के शो-रूम, ठेलों, पार्किंग और अतिक्रमण की जागीर बन चुके हैं। कहीं सामान फैला है, कहीं शेड खड़े हैं, कहीं मोटरसाइकिलें और कारें कब्ज़ा किए बैठी हैं। नतीजा साफ़ है। पैदल आदमी सड़क पर उतरता है और मौत के साथ चलने को मजबूर हो जाता है।
बेलनगंज, हॉस्पिटल रोड, लोहामंडी, राजा मंडी, किनारी बाज़ार, सदर और शहर के दर्जनों इलाक़ों में यही मंजर दिखाई देता है। कहीं फुटपाथ टूटे हैं, कहीं ग़ायब हैं और जहाँ बचे भी हैं, वहाँ अतिक्रमण ने उनका दम घोंट दिया है।
यह सिर्फ़ असुविधा नहीं, सार्वजनिक सुरक्षा का गंभीर संकट है। "सेफ़ स्ट्रीट्स फ़ॉर आगरा" रिपोर्ट बताती है कि शहर में सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली 88 प्रतिशत मौतें पैदल यात्रियों, साइकिल सवारों और दोपहिया वाहन चालकों जैसी सबसे कमज़ोर श्रेणी के लोगों की होती हैं। यानी जो सबसे कम सुरक्षित हैं, वही सबसे ज़्यादा जान गंवा रहे हैं।
देशभर में हर साल तीस हज़ार से अधिक पैदल यात्री सड़क हादसों में मारे जाते हैं। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार, कुल सड़क दुर्घटना मौतों में लगभग पाँचवाँ हिस्सा पैदल यात्रियों का है। आगरा में टूटे फुटपाथ, खुले मैनहोल, उखड़ी टाइलें और बरसात में पानी से छिपे गड्ढे इस ख़तरे को कई गुना बढ़ा देते हैं।
सबसे ज़्यादा तकलीफ़ बुज़ुर्गों, महिलाओं, बच्चों और दिव्यांग नागरिकों को होती है। रोज़ कोई न कोई गिरता है, घायल होता है। छोटी चोटें अब आम बात हो गई हैं। बड़े हादसे किसी भी दिन किसी के साथ हो सकते हैं।
विडम्बना देखिए। हर साल लाखों पर्यटक आगरा आते हैं। वे इस शहर को पैदल महसूस करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें भी ट्रैफ़िक के बीच जान हथेली पर रखकर चलना पड़ता है। विश्व धरोहर का शहर अगर पैदल यात्रियों के लिए असुरक्षित है, तो यह हमारी शहरी सोच की नाकामी है।
सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में साफ़ कहा है कि स्वच्छ, सुरक्षित और बाधारहित फुटपाथ पर चलना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों का मौलिक अधिकार है। सड़कों पर पहला हक़ पैदल चलने वालों का है, वाहनों का नहीं। मगर आगरा में यह अधिकार हर दिन कुचला जा रहा है।
नगर निगम को अब सिर्फ़ रंग-रोगन और सौंदर्यीकरण से बाहर निकलना होगा। फुटपाथों की मरम्मत, खुले मैनहोल बंद करना, जल निकासी दुरुस्त करना और अतिक्रमण हटाना उसकी पहली ज़िम्मेदारी होनी चाहिए। दुकानदार सार्वजनिक ज़मीन पर कब्ज़ा नहीं कर सकते। रेहड़ी-पटरी वालों के लिए व्यवस्थित वेंडिंग ज़ोन बनाए जाएँ, ताकि उनका रोज़गार भी सुरक्षित रहे और पैदल यात्रियों का रास्ता भी।
अब वक्त आ गया है कि "प्रिय आगरा, फुटपाथ वापस दो" अभियान शुरू किया जाए। नागरिक मोबाइल से टूटे फुटपाथ, खुले मैनहोल और अतिक्रमण की तस्वीरें भेजें। नगर निगम तय समय-सीमा में कार्रवाई करे और हर सप्ताह सार्वजनिक रिपोर्ट जारी करे। स्थानीय अख़बार भी नागरिक शिकायतों के लिए स्थायी कॉलम शुरू करें। जवाबदेही होगी, तभी बदलाव आएगा।
बेंगलुरु समेत कई शहरों ने सख़्ती से फुटपाथ अतिक्रमण हटाने की शुरुआत कर दी है। आगरा कब जागेगा? या फिर हमारे हुक्मरान रिप वैन विंकल की तरह सोते ही रहेंगे?
किसी शहर की पहचान उसकी चौड़ी सड़कों से नहीं होती। उसकी पहचान इस बात से होती है कि वहाँ एक बच्चा, एक बुज़ुर्ग, एक महिला, एक दिव्यांग और एक पर्यटक कितनी बेफ़िक्री से पैदल चल सकता है।
आगरा ने अपने स्मारकों पर करोड़ों रुपये खर्च किए हैं। अब अपने नागरिकों पर भी कुछ निवेश कीजिए।
हमें फुटपाथ वापस चाहिए।
क्योंकि शहर तभी सभ्य कहलाता है, जब सड़क पर सबसे कमज़ोर इंसान भी बिना डर के चल सके। ताजमहल की ख़ूबसूरती तभी मुकम्मल होगी, जब उसके शहर की सड़कें भी इंसानों के लिए सुरक्षित हों