Monday, November 2, 2026

 यमुना दम तोड़ रही है, वादों की नदी बह रही है!

यूपी विधानसभा चुनाव में योगी आदित्यनाथ से आगरा पूछेगा: यमुना और शहर से किए वादों का हिसाब कहाँ है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

3 नवंबर 2026

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उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों की आहट के साथ एक सवाल उठना लाजिमी है। क्या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से आगरा की जनता पूछेगी कि यमुना को साफ करने और शहर की समस्याएँ दूर करने के उनके वादों का क्या हुआ? क्या यमुना को निर्मल बनाने, पर्याप्त पानी दिलाने और आगरा में बैराज बनाने की घोषणाएँ जमीन पर उतरीं? या फिर ये वादे सरकारी फाइलों और चुनावी भाषणों में गुम हो गए?

आखिर आगरा कब तक इंतजार करेगा? ताजमहल के पीछे बहती यमुना कब नदी बनेगी, नाला नहीं? क्या चुनावी मंचों पर विकास की गंगा बहाने वाले नेता यमुना की बदहाली का जवाब भी देंगे?

भारत विकास की नई ऊँचाइयाँ छूने का दावा करता है। दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने के सपने देखता है। मगर अपनी नदियों की हालत भी देखिए! कहीं नाले बह रहे हैं, कहीं जहरीला पानी जमा है। कहीं कारखानों का कचरा है, तो कहीं सरकारी महकमों की बेरुखी। विकास की चमक के पीछे पर्यावरण की बदसूरत तस्वीर छिपी है।

ब्रज मंडल की यमुना इस संकट का सबसे शर्मनाक उदाहरण है। जिस नदी को हम माँ कहते हैं, उसी को नालों का खुला दरिया बना दिया है।

दिल्ली पहुँचते ही यमुना का दम घुटने लगता है!

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की 2025 की निगरानी रिपोर्ट नदी की असलियत बयान करती है। दिल्ली में प्रवेश करते समय पल्ला के पास यमुना की हालत अपेक्षाकृत बेहतर रहती है। पानी में घुली ऑक्सीजन का स्तर पाँच मिलीग्राम प्रति लीटर से ऊपर रहता है। लेकिन दिल्ली में दाखिल होते ही नदी की सांस फूलने लगती है।

ISBT, ITO, निजामुद्दीन और ओखला पहुँचते-पहुँचते पानी की हालत बेहद खराब हो जाती है। कई जगह ऑक्सीजन 0.3 मिलीग्राम प्रति लीटर तक गिर जाती है। जैविक प्रदूषण मापने वाला BOD स्तर 40 से 70 मिलीग्राम प्रति लीटर तक पहुँच जाता है। जबकि नहाने योग्य पानी के लिए यह तीन मिलीग्राम से कम होना चाहिए।

पानी में मल-मूत्र से जुड़े जीवाणुओं की संख्या लाखों से करोड़ों तक पहुँच जाती है। सुरक्षित सीमा मात्र 2,500 है। मथुरा और वृंदावन पहुँचने पर भी हालात नहीं सुधरते। यहाँ BOD आठ से पंद्रह मिलीग्राम प्रति लीटर तक दर्ज किया गया है। दिल्ली का प्रदूषण आखिर कब तक ब्रज की आस्था और सेहत को डुबोता रहेगा?

रोजाना हजारों लीटर गंदगी, सफाई के दावे!

दिल्ली हर दिन लगभग 3,596 मिलियन लीटर गंदा पानी पैदा करती है। शहर में 37 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) हैं। इनकी कुल क्षमता लगभग 3,474 MLD बताई जाती है। मगर क्षमता और वास्तविक सफाई में बड़ा फर्क है।

करीब 2,955 MLD पानी ही ट्रीट हो पाता है। लगभग 641 MLD गंदा पानी बिना पर्याप्त सफाई के नालों में बह जाता है। यही नाले आगे चलकर यमुना में जहर घोलते हैं।

मध्य 2025 के आकलन में केवल 23 प्लांट निर्धारित मानकों पर खरे उतरे। 14 प्लांट नियमों का पालन नहीं कर पाए। ऊपर से दिल्ली रोजाना 11 हजार टन से अधिक ठोस कचरा पैदा करती है। उसका पूरा निस्तारण नहीं होता। प्लास्टिक और गंदगी आखिरकार नदी तक पहुँचती है।

देशभर में गंदे पानी का कारोबार!

यह बीमारी केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है। भारत रोजाना लगभग 70 से 72 अरब लीटर गंदा पानी पैदा करता है। लेकिन इसका उपचार मुश्किल से 28 प्रतिशत हो पाता है। बाकी पानी नदियों, तालाबों और जलस्रोतों पर बोझ बनता है।

नमामि गंगे योजना के तहत हजारों करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। वर्ष 2026 के मध्य तक 4,200 MLD से अधिक नई या सुधारी गई क्षमता का दावा किया गया। सैकड़ों परियोजनाएँ पूरी हुईं। कुछ इलाकों में औद्योगिक प्रदूषण पर लगाम भी लगी।

लेकिन कागजों पर बनी क्षमता और जमीन पर चलने वाली सफाई में अंतर है। कई प्लांट नियमित नहीं चलते। सीवर नेटवर्क अधूरे हैं। गंदा पानी चोरी-छिपे नदियों में छोड़ दिया जाता है। आखिर निगरानी करने वाले विभाग किस मर्ज की दवा हैं?

ताजमहल भी भुगत रहा है यमुना की सजा!

ब्रज में यमुना की बदहाली केवल पर्यावरण का मामला नहीं है। यह हमारी विरासत, संस्कृति और पर्यटन पर भी चोट है।

आगरा में ठहरे हुए प्रदूषित पानी के कारण कीड़ों के झुंड पनपते हैं। Goeldichironomus नामक कीड़े ताजमहल के आसपास मंडराते हैं। उनकी बीट से संगमरमर पर हरे और काले धब्बे पड़ते हैं। वर्ष 2026 में भी ताजमहल के उत्तरी हिस्से पर ऐसे दाग दोबारा दिखाई दिए।

सड़ते जैविक कचरे से निकलने वाली हाइड्रोजन सल्फाइड गैस भी संगमरमर को नुकसान पहुँचाती है। एक अध्ययन में ताजमहल के पास यमुना की तलछट में प्रति किलोग्राम 800 तक माइक्रोप्लास्टिक कण मिले।

दुनिया ताजमहल की खूबसूरती देखने आती है। मगर उसके पीछे बहती यमुना की बदहाली देखकर क्या संदेश लेकर जाती होगी?

पानी नहीं होगा तो नदी कैसे बचेगी?

पर्यावरणविद डॉ देवाशीष भट्टाचार्य कहते हैं कि यमुना की सबसे बड़ी समस्या केवल गंदगी नहीं है। नदी में पर्याप्त पानी भी नहीं है। वजीराबाद बैराज के नीचे साल के अधिकांश समय नदी लगभग सूखी रहती है। राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान ने न्यूनतम 23 क्यूमेक पानी की सिफारिश की है। मगर वास्तविक प्रवाह इससे काफी कम रहता है।

पानी कम होगा तो गंदगी कैसे बहेगी? ऑक्सीजन कैसे बढ़ेगी? नदी अपने आपको साफ कैसे करेगी? ये प्रश्न करते हैं, डॉ हरेन्द्र गुप्ता, अध्यक्ष इंडियन मेडिकल एसोसिएशन, आगरा। पर्याप्त ताजा पानी नदी की जिंदगी है। उसके बिना सफाई के सारे प्रयास आधे-अधूरे रहेंगे।

सरकारें बदलती हैं, मगर घोषणाओं का सिलसिला नहीं बदलता। अक्टूबर 2026 में लगभग 9,000 करोड़ रुपये की परियोजनाएँ शुरू की गईं। लक्ष्य रखा गया कि 2029 तक यमुना साफ हो जाएगी।


यमुना को बचाने के लिए हर नाले का पानी साफ करना होगा। नदी में पर्याप्त ताजा पानी छोड़ना होगा। प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों और विभागों पर कार्रवाई करनी होगी। सभी राज्यों और एजेंसियों के बीच तालमेल बनाना होगा।

हर प्लांट की ऑनलाइन निगरानी हो। नियम तोड़ने वालों पर स्वतः जुर्माना लगे। अफसरों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। आखिर जनता के पैसे का हिसाब कौन देगा?

चुनाव आएँगे, सवाल भी उठेंगे!

रिवर कनेक्ट कैंपेन से जुड़ीं पद्मिनी अय्यर कहती हैं, "आगरा को केवल चमकते चौराहे और सजावटी रिवरफ्रंट नहीं चाहिए। शहर को जीवित यमुना चाहिए। उसे बैराज, पर्याप्त जलप्रवाह, गंदे नालों से मुक्ति और नदी की सफाई चाहिए।"

योगी सरकार से सवाल पूछना जनता का लोकतांत्रिक अधिकार है। चुनावी सभाओं में विकास की उपलब्धियाँ गिनाई जाएँगी। मगर यमुना की हालत भी उस विकास का हिस्सा है। आगरा को उम्मीद है कि इस बार घोषणाओं के बजाय ठोस काम का हिसाब मिलेगा।

विकास का मतलब केवल चौड़ी सड़कें, चमकती इमारतें और ऊँचे पुल नहीं हैं। असली तरक्की तब होगी, जब हमारी नदियाँ साफ बहेंगी और ताजमहल के पीछे यमुना बदबू नहीं, खूबसूरती बिखेरेगी।

अब बहुत हो चुका! वादों की नदी बहाना बंद कीजिए। यमुना में पानी बहाइए। सीवेज रोकिए, प्रदूषण पर लगाम लगाइए और जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह बनाइए।

क्योंकि नदी मरती है तो केवल पानी नहीं मरता, पूरी सभ्यता दम तोड़ती है!

Saturday, October 31, 2026

 ट्रैफिक प्रबंधन कोई रॉकेट साइंस नहीं है!

आगरा की सड़कें जाम, दिमाग भी जाम!

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गड्ढे, अतिक्रमण, बेतरतीब पार्किंग और बदहाल ट्रैफिक व्यवस्था ने सफर को बना दिया है सजा। मगर बीमारी सिर्फ सड़कों में नहीं, हमारी सोच में भी है!

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बृज खंडेलवाल द्वारा

2 नवंबर 2026

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आगरा चल रहा है या रेंग रहा है? यह सवाल उस हर आदमी से पूछिए, जो यमुना किनारा रोड,  एमजी रोड, भगवान टॉकीज या फतेहाबाद रोड पर जाम में फंसा है। दस मिनट का सफर एक घंटे में पूरा होता है। हॉर्न चीखते हैं, लोग झल्लाते हैं और गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच जाता है। फिर सारा इल्जाम ट्रैफिक पुलिस के सिर!

लेकिन क्या हर जाम के लिए पुलिस ही जिम्मेदार है? क्या बीमारी सिर्फ सड़कों में है? या हमारी सोच भी इसकी बड़ी वजह है? सच यह है कि आगरा का ट्रैफिक संकट सिर्फ खराब सड़कों और बढ़ती गाड़ियों का नतीजा नहीं है। यह हमारी बिगड़ती नागरिक समझ और बेतहाशा जल्दबाजी का आईना भी है।

सड़क पर जाम है, मगर असली जाम तो दिमाग में है भाई जान! यमुना आरती स्थल के पास, दो रोज पहले, पीछे रोंग साइड पर दनदनाते मोबाइक वाले ने मुझे गिरा दिया। विरोध करने पर बोला, रोड पर क्यों चलते हैं बुड्ढे लोग, घर बैठो! यानी चोरी और सीना जोरी, यही है जंगल का कानून!

आगरा की सड़कों पर निकलते ही अनुशासन की पोल खुल जाती है। किसी को रुकना मंजूर नहीं। कोई किसी को रास्ता नहीं देना चाहता। हर आदमी सबसे आगे निकलने की फिराक में है। गलत दिशा में गाड़ी चलाना, मनमाने यू-टर्न लेना, लेन बदलकर आगे निकलना और लाल बत्ती तोड़ना आम बात है। जेब्रा क्रॉसिंग पर पैदल चलने वालों को रास्ता देना तो जैसे शान के खिलाफ है। साइकिल सवार और राहगीर भगवान भरोसे हैं।

हॉर्न बजाना राष्ट्रीय शौक बन गया है। आगे सड़क बंद है, फिर भी हॉर्न बजता रहेगा। मानो आवाज से गाड़ियां अपने आप उड़ने लगेंगी!

मूल मंत्र बन गया है, पहले मैं निकलूं, बाकी दुनिया भाड़ में जाए!

माता-पिता भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। बच्चे बिना हेलमेट गाड़ी चलाएं, गलत दिशा में दौड़ाएं या सिग्नल तोड़ें, तो कई घरों में इसे शरारत समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। गाड़ियों की हालत भी देखिए। खराब ब्रेक, बंद लाइटें और बिना रखरखाव के वाहन सड़कों पर दौड़ते हैं। फिर हादसे होते हैं और हम किस्मत को कोसते हैं।

आगरा की ट्रैफिक समस्या के कई चेहरे हैं।

पहला गुनहगार है अवैध पार्किंग और अतिक्रमण। भगवान टॉकीज, रामबाग, बिजलीघर, सिकंदरा, शाहगंज, लोहामंडी और आईएसबीटी जैसे इलाकों में सड़कें पार्किंग स्थल बन चुकी हैं। दुकानदार, रेहड़ी वाले, ऑटो और ई-रिक्शा सड़क घेर लेते हैं। राह चलने वालों के लिए जगह बचती ही नहीं।

दूसरा संकट है मेट्रो और दूसरी निर्माण परियोजनाएं। एमजी रोड सहित कई प्रमुख रास्तों पर बैरिकेडिंग और खुदाई ने सड़कें सिकोड़ दी हैं। स्मार्ट सिटी, पाइपलाइन और मरम्मत के काम भी यातायात को प्रभावित करते हैं।

तीसरी वजह है पर्यटन का दबाव। ताजमहल, आगरा किला और दूसरे स्मारकों पर आने वाली पर्यटक बसें, टैक्सियां और निजी गाड़ियां सड़कों पर भीड़ बढ़ाती हैं। अंतरराष्ट्रीय पर्यटन नगरी में यातायात प्रबंधन का हाल देखकर शर्म आती है।

चौथी समस्या है कमजोर सार्वजनिक परिवहन। अच्छी बस सेवा नहीं होगी, तो हर परिवार अपनी गाड़ी निकालेगा। नतीजा, सड़क पर वाहनों की भीड़ बढ़ती जाएगी।

पांचवीं वजह हैं गड्ढे और बार-बार खुदाई। सड़क कभी पानी की पाइपलाइन के लिए खोदी जाती है, कभी मरम्मत के नाम पर। आज सड़क बनी, कल फिर खुद गई। सरकारी विभागों में तालमेल का हाल भी किसी से छिपा नहीं है।

छठी मुसीबत है स्कूलों की छुट्टी। दोपहर दो से चार बजे के बीच स्कूल बसों और अभिभावकों की गाड़ियां सड़कों पर उतरती हैं। कई इलाकों में जाम लगना तय है।

सातवीं समस्या है बेतरतीब मिला-जुला यातायात। कार, बाइक, बस, ऑटो, ई-रिक्शा, साइकिल और पैदल यात्री एक ही सड़क पर अपनी-अपनी मर्जी चलाते हैं।

आठवीं वजह हैं बसों और ऑटो के मनमाने ठहराव। आईएसबीटी और ट्रांसपोर्ट नगर के आसपास सड़कें इनके लिए निजी अड्डे बन जाती हैं।

नौवीं समस्या है पुराने शहर की तंग सड़कें। कटरा नील, पुरानी मंडी और नई की मंडी जैसे इलाकों की सड़कें आज के वाहन दबाव के लिए बनी ही नहीं थीं।

दसवीं आफत है त्योहारों की खरीदारी। रक्षाबंधन, दिवाली और दूसरे पर्वों पर बाजारों में भीड़ बढ़ती है। पहले से बेहाल सड़कें पूरी तरह दम तोड़ देती हैं।

इन कारणों का मेल जाम को कई गुना बढ़ा देता है। निर्माण कार्य सड़कें संकरी करते हैं, अतिक्रमण बची जगह निगल जाता है और कमजोर निगरानी अवैध पार्किंग को बढ़ावा देती है।

चालान से नहीं बदलेगी तकदीर

सवाल है, प्रशासन आखिर कर क्या रहा है? समय-समय पर चालान अभियान चलते हैं। कुछ दिन लोग डरते हैं, फिर पुराना ढर्रा लौट आता है। यह इलाज नहीं, महज दिखावा है।

आगरा को एक ठोस और दूरगामी ट्रैफिक योजना चाहिए। जहां जरूरी हो, एकतरफा यातायात लागू किया जाए। भीड़भाड़ वाले बाजारों में पीक आवर के दौरान निजी वाहनों का प्रवेश सीमित हो। पार्किंग के लिए अलग जगह बने। अवैध कब्जों पर बिना भेदभाव कार्रवाई हो।

स्कूलों की छुट्टी का समय अलग-अलग किया जा सकता है। पर्यटक बसों के लिए तय पार्किंग और शटल सेवा हो। ई-रिक्शा के लिए निर्धारित मार्ग और ठहराव तय हों।

ट्रैफिक सिग्नल दुरुस्त हों। जेब्रा क्रॉसिंग पर पैदल यात्रियों को प्राथमिकता मिले। साइकिल सवारों के लिए सुरक्षित जगह बने। गलत दिशा में वाहन चलाने और खतरनाक यू-टर्न लेने वालों पर सख्ती हो।

सड़क खोदने वाले विभागों में तालमेल जरूरी है। एक विभाग सड़क बनाए और दूसरा अगले दिन खोद दे, यह कैसी व्यवस्था है? निर्माण एजेंसियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए।

असली सुधार घर से शुरू होगा

लेकिन एक बात साफ है। चौड़ी सड़कें बना देने से समस्या खत्म नहीं होगी। अगर नागरिकों का रवैया नहीं बदला, तो नई सड़क भी जल्द पार्किंग स्थल बन जाएगी।

नागरिक अनुशासन पुलिस के डंडे से पैदा नहीं होता। इसकी शुरुआत घर और स्कूल से होती है। माता-पिता बच्चों को नियम सिखाएं। दुकानदार सड़क को अपनी जागीर न समझें। वाहन चालक पैदल यात्रियों का सम्मान करें।

आगरा कोई मामूली शहर नहीं है। यह इतिहास, संस्कृति और दुनिया के सात अजूबों में शामिल ताजमहल की पहचान वाला शहर है। यहां आने वाले पर्यटक शहर की खूबसूरती याद रखें, ट्रैफिक की बदहाली नहीं।

आखिर ट्रैफिक सुधार के लिए हर बार फ्लाईओवर, बुलडोजर और करोड़ों रुपये की जरूरत नहीं होती। कभी-कभी जरूरत सिर्फ समझदारी, सब्र और दूसरों के अधिकारों का सम्मान करने की होती है।

सड़क सबकी है, तो उस पर चलने का सलीका भी सबको सीखना होगा।

वरना आगरा की सड़कें यूं ही जाम रहेंगी। गाड़ियां आगे निकलने के लिए लड़ती रहेंगी और शहर अपनी ही बदइंतजामी में फंसा रहेगा।

Friday, October 30, 2026

 भारत की बड़ी छलांग, मगर मंजिल अभी दूर!

गरीबी पर चोट, विकास की रफ्तार और खुशहाली की अधूरी कहानी

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बृज खंडेलवाल द्वारा

1 नवंबर, 2026

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तीन पीढ़ियों का फासला, एक भारत की बदलती तकदीर!

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आगरा के पास उत्तर प्रदेश के एक छोटे कस्बे में 1970 के दशक में स्कूल मास्टर रघुनाथ प्रसाद सुबह अंधेरे में उठते थे। घर में न बिजली का भरोसा था, न नल में पानी आता था। लालटेन की रोशनी में बच्चे पढ़ते थे। राशन की दुकान पर लाइन लगती थी। साइकिल या बैलगाड़ी ही सफर का सहारा थी। बीमारी में डॉक्टर मिल जाए, तो गनीमत समझिए। टेलीफोन किसी बड़े साहब के घर दिखता था।

अब उनके तीस साल के पोते मोहन कुमार की दुनिया देखिए। हाथ में स्मार्टफोन, जेब में डिजिटल भुगतान, घर में एसी, रसोई में गैस और दरवाजे पर मोटरसाइकिल या कार। वह एक आईटी कंपनी में काम करता है। वीडियो कॉल पर  बात करता है। ऑनलाइन टिकट बुक करता है और कुछ सेकंड में पैसे भेज देता है। इलाज के लिए आधुनिक अस्पताल हैं। एक्सप्रेसवे और बेहतर सड़कों ने दूरियां घटा दी हैं।

दादा के लिए बैंक जाना, बिजली पाना और पक्का मकान बनाना जिंदगी की बड़ी उपलब्धियां थीं। पोते के लिए ये रोजमर्रा की सुविधाएं हैं। जिस दुनिया की कल्पना रघुनाथ प्रसाद नहीं कर सकते थे, उसमें मोहन कुमार सांस ले रहा है। यह केवल एक परिवार की कहानी नहीं, भारत के बदलते चेहरे की तस्वीर है। सत्तर साल में देश ने कितनी लंबी छलांग लगाई है!

अब सवाल उठता है क्या 140 करोड़ लोगों का देश एक पीढ़ी में अपनी तकदीर बदल सकता है? क्या गरीबी, भुखमरी और बदहाली से लड़ते हुए भारत दुनिया की बड़ी आर्थिक ताकत बन सकता है? भारत की हालिया यात्रा उम्मीद जगाती है। बदलाव की कहानी सामने है। मगर अभी जश्न मनाने के साथ आत्ममंथन भी जरूरी है।

विश्व बैंक के ताजा आंकड़े भारत के लिए बड़ी खुशखबरी लाए हैं। साल 2011 में देश की 27.1 प्रतिशत आबादी बेहद गरीब थी। 2023 तक यह आंकड़ा घटकर 2.6 प्रतिशत रह गया। रोजाना 4.20 डॉलर की ऊंची गरीबी सीमा पर भी तस्वीर बदली है। गरीबी 57.7 प्रतिशत से गिरकर 16.1 प्रतिशत पर आ गई। यानी बारह वर्षों में करीब 49.6 करोड़ लोग इस गरीबी रेखा से ऊपर उठे। विश्व बैंक इसे दुनिया में गरीबी घटने की सबसे तेज रफ्तार में गिनता है।

आजादी के समय लगभग 45 प्रतिशत भारतीय गरीबी में जी रहे थे। 2009-10 में सरकारी अनुमान 29.8 प्रतिशत था। 2011-12 में यह घटकर 21.9 प्रतिशत हुआ। 2014 में मोदी सरकार ने कमान संभाली। अर्थव्यवस्था में संभावनाएं थीं, लेकिन बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी थी। बैंकिंग, सड़क, बिजली, पानी और रोजगार की हालत सुधारना बड़ी चुनौती थी।

मोदी सरकार ने विकास की नई रणनीति अपनाई। बुनियादी ढांचे, डिजिटल तकनीक, बैंकिंग और जनकल्याण योजनाओं पर जोर दिया। सरकारी मदद सीधे लोगों तक पहुंचाने की कोशिश हुई।

पहले सरकारी सहायता कई दरवाजों से गुजरती थी। रास्ते में बिचौलिए अपना हिस्सा निकाल लेते थे। जनधन, आधार और मोबाइल की तिकड़ी ने इस व्यवस्था को बदलने की कोशिश की। करोड़ों गरीब बैंक खातों से जुड़े। प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण से सब्सिडी सीधे खातों में पहुंचने लगी।

डिजिटल भुगतान ने तो रोजमर्रा की जिंदगी बदल दी। सब्जीवाला, रिक्शा चालक और छोटी दुकान वाला भी मोबाइल से पैसा लेने लगा। यूपीआई ने आम आदमी को डिजिटल अर्थव्यवस्था का भागीदार बनाया। 2025-26 में इसके जरिए 24 हजार करोड़ से ज्यादा लेनदेन हुए। इनका कुल मूल्य करीब 314 लाख करोड़ रुपये रहा। यह केवल तकनीक की कामयाबी नहीं है। यह आर्थिक भागीदारी का नया दरवाजा है।

गरीबों की जिंदगी बदलने वाली कई योजनाओं ने भी अहम भूमिका निभाई। उज्ज्वला योजना के तहत 10.5 करोड़ से ज्यादा रसोई गैस कनेक्शन दिए गए। धुएं से भरे चूल्हों की जगह साफ ईंधन पहुंचा। स्वच्छ भारत मिशन ने 12 करोड़ से ज्यादा घरेलू शौचालय बनवाए।

जल जीवन मिशन के तहत गांवों में नल से पानी पहुंचाने का दायरा बढ़ा। 2019 में केवल 3.2 करोड़ ग्रामीण परिवारों को नल कनेक्शन मिले थे। मई 2026 तक यह संख्या 15.8 करोड़ से ऊपर पहुंच गई।

प्रधानमंत्री आवास योजना ने लाखों परिवारों को पक्की छत दी। इनमें कई मकान महिलाओं के नाम पर हैं। आयुष्मान भारत ने गरीब परिवारों को स्वास्थ्य सुरक्षा दी। अब 70 साल से ऊपर के बुजुर्ग भी इसके दायरे में हैं। मुफ्त अनाज योजना करीब 81 करोड़ लोगों को सहारा दे रही है।

अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने के लिए सड़कों, रेल, बिजली, बंदरगाहों और हवाई अड्डों का विस्तार जरूरी है। सरकार ने बुनियादी ढांचे पर खर्च बढ़ाया। एक्सप्रेसवे, मेट्रो, रेलवे स्टेशन, हवाई अड्डे और माल ढुलाई गलियारे देश की तस्वीर बदल रहे हैं। बेहतर सड़कें बाजारों को करीब लाती हैं। रेल विद्युतीकरण और नए माल गलियारे परिवहन को मजबूत बनाते हैं।

आर्थिक विकास की रफ्तार भी उत्साहजनक है। सरकारी अनुमानों के मुताबिक 2025-26 में वास्तविक जीडीपी वृद्धि 7.6 प्रतिशत रही। पिछले साल यह 7.1 प्रतिशत थी। घरेलू मांग, निवेश और सेवा क्षेत्र ने इसमें योगदान दिया।

लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी देखना होगा। 2023 में करीब 7.5 करोड़ भारतीय अब भी बेहद गरीब थे। 4.20 डॉलर वाली सीमा के नीचे रहने वालों की संख्या इससे कहीं ज्यादा थी। उत्तर प्रदेश से पश्चिम बंगाल तक कई इलाके आज भी बदहाली से जूझ रहे हैं।

अब नजर भारत से आगे पूरी दुनिया पर डालिए। विश्व बैंक के अनुसार दुनिया में आज भी 80 से 85 करोड़ लोग अत्यधिक गरीबी में जी रहे हैं। 1990 से अब तक करीब 150 करोड़ लोग गरीबी से बाहर आए हैं। लेकिन कोरोना महामारी, युद्ध, महंगाई और महंगी ऊर्जा ने प्रगति की रफ्तार रोक दी है।

भारत ने लंबी छलांग लगाई है। मगर विकसित राष्ट्र बनने की असली परीक्षा अभी बाकी है। एक्सप्रेसवे और योजनाएं जरूरी हैं, लेकिन इनके साथ शिक्षित नागरिक, स्वस्थ समाज, मजबूत उद्योग और सम्मानजनक रोजगार भी चाहिए।

विकास का असली पैमाना अमीरों की बढ़ती दौलत नहीं, गरीबों की घटती तादाद है। भारत को ही नहीं, पूरी दुनिया को ऐसा विकास चाहिए जिसमें कोई पीछे न छूटे। गरीबी से मुक्ति पहली मंजिल है। सम्मान, समान अवसर और खुशहाली असली मंजिल हैं।

 जीत के जश्न में खतरे की घंटी सुन पाएगी BJP?

वाराणसी से नागपुर तक विपक्ष की दस्तक। 2027 से पहले भाजपा के लिए आत्ममंथन का वक्त!

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बृज खंडेलवाल द्वारा

31 अक्टूबर 2026

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चुनाव जीते तो जश्न मनाइए, लेकिन जीत के नशे में चूर मत हो जाइए! राजनीति में आज का किला कल ढह भी सकता है। 

चार राज्यों के विधान परिषद चुनावों ने भाजपा और उसके सहयोगियों को यही पैगाम दिया है। एनडीए ने 28 में से 16 सीटें जीतकर बढ़त जरूर बनाई है, लेकिन इस जीत के भीतर कुछ ऐसे संकेत छिपे हैं, जिन्हें नजरअंदाज करना महंगा पड़ सकता है।

भाजपा ने अकेले 13 सीटें जीतीं। समाजवादी पार्टी को पांच, शरद पवार की एनसीपी को दो सीटें मिलीं। कांग्रेस, जेडीएस, जेडीयू, आरजेडी, शिवसेना और जन सुराज पार्टी ने एक-एक सीट हासिल की। दो निर्दलीय भी जीते। 

पहली नजर में यह भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए की कामयाबी है। लेकिन सियासत का हिसाब सिर्फ सीटों से नहीं लगाया जाता।

वाराणसी में मोदी के गढ़ को चुनौती मिलने से बेचैनी बढ़ी है।

उत्तर प्रदेश में भाजपा को 11 में से छह सीटें मिलीं, जबकि समाजवादी पार्टी ने पांच सीटें जीत लीं। सबसे चौंकाने वाली बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी की है। यहां सपा ने शिक्षक और स्नातक, दोनों सीटों पर जीत दर्ज की। आगरा-अलीगढ़ शिक्षक सीट पर भी सपा ने भाजपा को मात दी।

यह महज कुछ सीटों का मामला नहीं है। अखिलेश यादव के लिए यह मनोवैज्ञानिक बढ़त है। वे इसे अपने PDA समीकरण यानी पिछड़े, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक समुदायों की गोलबंदी की कामयाबी बता रहे हैं। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सपा को इससे नया हौसला मिलेगा। A से अब अग्रवाल मन जा रहा है। ब्राह्मण बनिये पहले ही रूष्ट हैं।

भाजपा को समझना होगा कि मोदी के नाम पर हर चुनाव जीतने की गारंटी नहीं मिलती। स्थानीय नाराजगी, उम्मीदवारों की साख और सामाजिक समीकरण भी मायने रखते हैं।

कर्नाटक में कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है।

कर्नाटक में भाजपा-जेडीएस गठबंधन ने चारों सीटें जीतकर कांग्रेस सरकार को करारा राजनीतिक झटका दिया। बेंगलुरु शिक्षक सीट पर जेडीएस के एपी रंगनाथ ने कांग्रेस के पुराने नेता पुट्टन्ना को हराया। इससे भाजपा-जेडीएस गठबंधन की साझा ताकत सामने आई है।

नागपुर ने  भाजपा के लिए असहज संदेश भेजा है।

महाराष्ट्र में कांग्रेस ने नागपुर स्नातक सीट बरकरार रखी। नागपुर सिर्फ एक शहर नहीं, भाजपा और संघ परिवार के लिए खास सियासी अहमियत रखता है। यहां कांग्रेस की जीत प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण है। इसे भाजपा के लिए आत्ममंथन का संकेत माना जा सकता है।

बिहार में नए खिलाड़ी की दस्तक साफ सुनी जा रही है।

बिहार में मुकाबला बिखरा हुआ रहा। भाजपा ने तीन सीटें जीतीं। जेडीयू, आरजेडी और जन सुराज को एक-एक सीट मिली। दो निर्दलीय भी विजयी हुए। प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने दरभंगा शिक्षक सीट जीतकर विधान परिषद में अपना खाता खोला। यह नए राजनीतिक विकल्पों के लिए खुलती जगह का संकेत है।

भाजपा का अति-आत्मविश्वास कहीं भारी न पड़ जाए!

भाजपा की एक बड़ी चुनौती उसका बढ़ता आत्मविश्वास भी है। लगातार चुनावी कामयाबी के बाद पार्टी के भीतर यह धारणा मजबूत हो सकती है कि मोदी का चेहरा, संगठन और चुनावी मशीनरी हर चुनौती को पार कर लेंगे। लेकिन लोकतंत्र में कोई भी पार्टी अपराजेय नहीं होती। सत्ता का अहंकार कार्यकर्ताओं और जनता के बीच दूरी बढ़ा सकता है। स्थानीय नेताओं की अनदेखी, टिकट वितरण में मनमानी और जनता की शिकायतों को हल्के में लेना भारी पड़ सकता है। विपक्ष की हर जीत को साजिश या संयोग बताकर खारिज करना भी समझदारी नहीं है। आखिरकार जनता को भाषण नहीं, काम चाहिए।

एक और दिलचस्प पहलू है। ये चुनाव बैलेट पेपर से हुए। भाजपा नेतृत्व ने इसे ईवीएम पर विपक्ष के सवालों का जवाब बताया है। लेकिन चुनावी भरोसे की बहस केवल एक चुनाव के नतीजे से खत्म नहीं होती।

विधान परिषद के शिक्षक और स्नातक मतदाता आम चुनावों के पूरे जनमत का प्रतिनिधित्व नहीं करते। फिर भी उनके रुझान कुछ सामाजिक और राजनीतिक बदलावों की आहट दे सकते हैं।

2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव सामने है। भाजपा के पास मजबूत संगठन और सत्ता का अनुभव है। लेकिन सपा ने चुनौती की जमीन तलाशनी शुरू कर दी है।

सवाल सिर्फ यह नहीं कि भाजपा कितनी सीटें जीती। सवाल यह है कि इन नतीजों से वह कितना सबक लेती है। क्योंकि सियासत में जीत का जश्न मनाने वाले अक्सर भूल जाते हैं कि जनता का मिजाज बदलते देर नहीं लगती।

आखिर लोकतंत्र में कोई भी गढ़ हमेशा के लिए अभेद्य नहीं होता।


Thursday, October 29, 2026

 हक़ की लड़ाई या रिश्तों की तबाही?

नारीवाद के नाम पर नौटंकी या इंसाफ़ की पुकार? बराबरी चाहिए, बदला नहीं!

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बृज खंडेलवाल द्वारा

30 अक्टूबर 2026

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एक कचौरी, दो समोसे, मर्दों का क्या भरोसा!

एक सिगरेट, दो चाय, मर्द जात हाय-हाय!

एक जीरा, दो अजवाइन, मर्द समाज इस्तीफा दे!

आलू लो, पूरी लो, मर्द जात से दूरी लो!

चाय गरम, दूध गरम, मर्द जात बेशरम!

हमारी स्कर्ट नहीं है छोटी, इन मर्दों की सोच है छोटी!

मेरे सिर में दर्द है, इसका कारण मर्द है!

शर्म नहीं है मर्दों में, औरत क्यों है पर्दों में?

दो कबाब, एक बिरयानी, हर मर्द की अलग कहानी!

एक पराठा, एक अचार, मर्द समाज बेकार!

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वाह! क्या क्रांति है! कचौरी से शुरू होकर बिरयानी पर खत्म! अगर यही नारी मुक्ति का नया घोषणापत्र है, तो इंसाफ़ की अदालत में समोसे तलने की तैयारी कर लीजिए। 

सवाल यह नहीं कि औरतें नारे क्यों लगा रही हैं। सवाल यह है कि बराबरी की लड़ाई में पूरे वर्ग को कटघरे में खड़ा करना कहाँ तक जायज़ है?

बराबरी चाहिए, बदला नहीं। अधिकार चाहिए, मगर जिम्मेदारी से मुँह मोड़कर नहीं।

ज़रा एक तस्वीर देखिए। रात के तीन बजे हैं। घर के दरवाज़े पर पुलिस दस्तक देती है। सत्तर साल के बुज़ुर्ग ससुर दिल के मरीज़ हैं। सास के हाथ काँप रहे हैं। तभी शादीशुदा ननद का फोन आता है। उसे पता चलता है कि उसके खिलाफ भी मुकदमा दर्ज हो गया है।

जिस परिवार ने बरसों में इज़्ज़त कमाई, उसकी साख एक झटके में मिट्टी में मिल जाती है। पड़ोसी कानाफूसी करने लगते हैं। रिश्तेदार फोन उठाना बंद कर देते हैं। अदालत के चक्कर शुरू होते हैं। पैसा, वक्त और सुकून, सबकी बलि चढ़ने लगती है।

यह किसी फिल्म की पटकथा नहीं, बल्कि वैवाहिक विवादों में सामने आने वाली कुछ शिकायतों की तस्वीर है। नारीवाद का मकसद औरत को बराबरी, सम्मान, सुरक्षा और अपने फैसले लेने की आज़ादी देना है। इस बुनियादी हक़ पर किसी को ऐतराज़ नहीं होना चाहिए। लेकिन आज़ादी का मतलब मनमानी हो जाए और सशक्तिकरण के नाम पर किसी को बेइज़्ज़त करना जायज़ मान लिया जाए, तो सवाल उठेंगे ही।

आखिर बराबरी का मतलब क्या है? अपने अधिकारों की सूची याद रखना और अपने फ़र्ज़ का पन्ना फाड़ देना? इंसाफ़ का तकाज़ा है कि हक़ भी मिले और जिम्मेदारी भी निभाई जाए।


घरेलू हिंसा और दहेज उत्पीड़न के खिलाफ कानून महिलाओं के लिए जरूरी सुरक्षा कवच हैं। इन कानूनों ने अनेक पीड़ित महिलाओं को इंसाफ़ पाने का रास्ता दिया है। मगर किसी भी कानून के दुरुपयोग की आशंका को अनदेखा नहीं किया जा सकता।

पहले भारतीय दंड संहिता की धारा 498A के तहत पति और उसके रिश्तेदारों पर क्रूरता के आरोपों से जुड़े मामले दर्ज होते थे। अब भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 85 और 86 इस विषय से संबंधित हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य मामले में गिरफ्तारी को लेकर अहम निर्देश दिए थे। अदालत ने साफ किया कि ऐसे मामलों में गिरफ्तारी अपने आप नहीं होनी चाहिए। कानून की शर्तों और जरूरी प्रक्रिया का पालन करना होगा।

कुछ वैवाहिक विवादों में पति के साथ सास-ससुर, भाई-बहन और दूसरे रिश्तेदार भी आरोपों के घेरे में आ जाते हैं। अदालतों ने कई मामलों में बेवजह रिश्तेदारों को घसीटने पर चिंता जताई है।


आजकल सड़क, मेट्रो और कॉलेजों में होने वाले झगड़ों के वीडियो सोशल मीडिया पर खूब घूमते हैं। कहीं थप्पड़ बरस रहे हैं, कहीं चप्पल चल रही है। फिर वीडियो वायरल होता है और कमेंटों की अदालत सज जाती है।

क्या किसी को थप्पड़ मार देना आज़ादी का प्रमाणपत्र है? क्या दूसरे को अपमानित करना अपने अधिकारों का इस्तेमाल है?

अगर पुरुष हाथ उठाए, तो उसे हिंसा कहते हैं। महिला हाथ उठाए, तो क्या उसे बहादुरी का तमगा मिलना चाहिए? 

बराबरी का मतलब यह नहीं कि महिलाओं को भी वही गलतियाँ करने की छूट मिले, जिनके लिए पुरुषों की आलोचना होती है।


तलाक और वैवाहिक विवादों में गुज़ारा भत्ता अक्सर बहस का बड़ा मुद्दा बन जाता है। अदालतें पति-पत्नी की आमदनी, जरूरतों, संपत्ति और दूसरी परिस्थितियों पर विचार करती हैं।

लेकिन जब किसी पक्ष को लगता है कि उसकी आर्थिक हालत का सही आकलन नहीं हुआ, तो नाराजगी बढ़ती है। पति को डर रहता है कि उसकी जिंदगी भर की कमाई और भविष्य की बचत खत्म हो जाएगी। पत्नी को चिंता होती है कि अलग होने के बाद उसका और बच्चों का खर्च कैसे चलेगा।

दोनों की चिंताएँ वास्तविक हो सकती हैं। इसलिए फैसला किसी एक पक्ष की कहानी सुनकर नहीं होना चाहिए। पत्नी की आमदनी और जरूरतें देखी जाएँ। पति की कमाई, जिम्मेदारियाँ और भुगतान की क्षमता भी परखी जाए।

गुज़ारा भत्ता न किसी को सजा देने का तरीका है, न जरूरतमंद को बेसहारा छोड़ने का बहाना। मकसद होना चाहिए कि अलग होने के बाद भी दोनों पक्ष सम्मान से जी सकें।

आखिर माता-पिता की लड़ाई में बच्चों का क्या कसूर?


मीटू (Me Too) आंदोलन ने यौन उत्पीड़न झेलने वाली अनेक महिलाओं को अपनी बात कहने का हौसला दिया। जिन मामलों में पीड़िताएँ डर, दबाव या बदनामी के कारण चुप रहती थीं, वहाँ इस आंदोलन ने बहस को नई दिशा दी।

यह उसकी बड़ी उपलब्धि है। लेकिन सोशल मीडिया पर किसी पर आरोप लगते ही उसे दोषी मान लेना भी खतरनाक है। कुछ मामलों में आरोपों को लेकर विवाद सामने आए हैं। इसलिए हर शिकायत की गंभीरता से जाँच होनी चाहिए।

किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा, नौकरी और परिवार दाँव पर लग सकते हैं। आरोप सही हों, तो कार्रवाई होनी चाहिए। आरोप गलत साबित हों, तो कानून के मुताबिक राहत का रास्ता भी खुला रहना चाहिए।

सोशल मीडिया की अदालत में फैसला सुनाना आसान है। लेकिन वहाँ न गवाहों की पूरी जाँच होती है, न बचाव का मुकम्मल मौका मिलता है। वायरल पोस्ट से किसी की जिंदगी पर मुहर लगा देना इंसाफ़ नहीं है।


पति-पत्नी के झगड़े में सबसे ज्यादा चोट बच्चों को लगती है। कभी उन्हें माँ और पिता के बीच चुनाव करने को मजबूर किया जाता है। कभी मिलने-जुलने पर रोक लगती है। कभी बच्चे को दूसरे पक्ष पर दबाव बनाने का जरिया बना दिया जाता है।

यह कैसी जीत है, जिसमें बच्चे का बचपन हार जाए?

आधुनिक जीवन में निजी आज़ादी और आत्मनिर्भरता की अहमियत बढ़ी है। मगर परिवार में जिम्मेदारी और आपसी सहयोग भी जरूरी हैं। 

परंपरा के नाम पर महिलाओं को दबाना गलत है। आज़ादी के नाम पर हर रिश्ते को बोझ समझ लेना भी समझदारी नहीं है। रिश्ते तभी टिकते हैं, जब उनमें सम्मान, संवाद और जिम्मेदारी हो।


कर्नाटक की सेवानिवृत्त स्कूल प्रिंसिपल शोभा कहती हैं, “घरेलू हिंसा की असली शिकायतों को हल्के में लेना उतना ही गलत है। जिस महिला पर जुल्म हुआ है, उसे इंसाफ़ जरूर मिलना चाहिए। लेकिन हर आरोप की निष्पक्ष जाँच भी जरूरी है। महिला आयोगों और अदालतों का काम न्याय दिलाना है, किसी एक पक्ष को आँख मूँदकर सही ठहराना नहीं।”

समाजसेवी पद्मिनी अय्यर कहती हैं कि पश्चिम की नकल करना आधुनिकता की शर्त नहीं है। “औरत की आज़ादी सिर्फ कपड़े पहनने, खानपान या शादी का फैसला करने तक सीमित नहीं है। पढ़ाई, नौकरी, आर्थिक आत्मनिर्भरता और अपनी पसंद की जिंदगी जीना भी उसका बुनियादी हक़ है। किसी दूसरे धर्म या समुदाय में शादी करने से कोई महिला संस्कारहीन नहीं हो जाती। असली कसौटी उसका किरदार, ईमानदारी और दूसरों के प्रति सम्मान है।”

उनकी बात में एक जरूरी सवाल छिपा है। हम महिलाओं की आज़ादी को आखिर किस तराजू पर तौलते हैं? कपड़ों से, खानपान से, शादी से या उनके हुनर, आत्मसम्मान और फैसले लेने की ताकत से?


पब्लिक कमेंटेटर प्रोफेसर पारसनाथ चौधरी कहते हैं, “दिक्कत नारीवाद में नहीं है। दिक्कत उस सोच में है, जो उसके नाम पर हिंसा, बेइज़्ज़ती, झूठे इल्ज़ाम और गैर-जिम्मेदारी को सही ठहराती है। इसी तरह, परंपरा बचाने के नाम पर महिलाओं की आज़ादी कुचलना भी गलत है।”

सामाजिक कार्यकर्ता मुक्ता का मानना है कि समाज को न अंधा नारीवाद चाहिए, न अंधी मर्दाना हुकूमत। उसे चाहिए बराबरी का हक़, आपसी इज़्ज़त और साझा जिम्मेदारी।

बात बिल्कुल सीधी है। मर्दों की हर गलती का ठीकरा पूरी मर्द जात पर फोड़ना कहाँ का इंसाफ़ है? और महिलाओं के हर आरोप को शक की निगाह से देखना भी कौन-सी समझदारी है?

नारीवाद का मतलब मर्दों से नफरत करना नहीं है। इसका मकसद उस व्यवस्था को बदलना है, जिसमें किसी महिला को सिर्फ महिला होने के कारण कमतर समझा जाता है। उसी तरह, पुरुष होने का मतलब किसी को दबाने का लाइसेंस नहीं है।


संस्कार भाषणों से नहीं, आचरण से झलकते हैं। इंसाफ़ का तराजू तभी संतुलित रहेगा, जब शिकायत की सुनवाई गंभीरता से हो, जाँच निष्पक्ष हो और दोष साबित होने पर कानून के मुताबिक कार्रवाई हो।

औरत को दबाना भी गलत है, मर्द को बिना सुने दोषी ठहराना भी।

कचौरी, समोसे और बिरयानी वाले नारे कुछ देर हँसा सकते हैं। मगर बराबरी की लड़ाई को ठोस मुद्दों, बेहतर कानून और जिम्मेदार व्यवहार की जरूरत है।

आखिर समाज को चाहिए क्या? आधी आबादी की आज़ादी या आधी दुनिया से दुश्मनी? पुरुषों का वर्चस्व या महिलाओं का पलटवार?




Tuesday, October 27, 2026

 आग से खेल रही कर्नाटक सरकार!

नौकरी स्थानीय को, तो बाकी भारतीय क्या पराये हैं?

‘भूमिपुत्र’ राजनीति से राष्ट्रीय एकता को खतरा। रोजगार की समस्या का हल क्षेत्रवाद नहीं!

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बृज खंडेलवाल द्वारा

28 अक्टूबर 2026

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बेंगलुरु आज आईटी क्षेत्र में प्रगति के शिखर पर है। इसमें पूरे भारत से आए प्रतिभाशाली युवाओं का बड़ा योगदान है, सिर्फ स्थानीय लोगों का नहीं।

जरा कल्पना कीजिए। बिहार का एक होनहार इंजीनियर बेंगलुरु की आईटी कंपनी में नौकरी मांगने पहुंचता है। उसके पास डिग्री, हुनर और काम करने का जज्बा है। लेकिन इंटरव्यू में अचानक सवाल उठता है, “आप कर्नाटक से हैं?”

बस, यहीं काबिलियत की परीक्षा खत्म और जन्मस्थान की जांच शुरू! डिग्री पीछे छूट जाती है, पहचान आगे निकल आती है। नौकरी की मंडी में अब हुनर से ज्यादा जन्मभूमि का भाव पूछा जा रहा है।

कर्नाटक में निजी कंपनियों, खासकर आईटी क्षेत्र में, स्थानीय युवाओं को तरजीह देने की मांग ने पुरानी बहस फिर सुलगा दी है। स्थानीय बेरोजगारों की चिंता जायज है। लेकिन क्या दूसरे राज्यों के नागरिक पराये हैं? क्या भारत एक देश सिर्फ तब तक है, जब तक कोई नौकरी मांगने नहीं निकलता?

‘भूमिपुत्र’ सिद्धांत का तर्क सीधा है। नौकरियों पर पहला हक स्थानीय लोगों का हो। दूसरे राज्यों से आए लोग कितने भी योग्य हों, उन्हें पीछे खड़ा रहना चाहिए।

चुनावी मौसम में यह नारा खूब बिकता है। नेताओं को तालियां मिलती हैं, भाषणों में जोश आता है और बेरोजगारी का सुविधाजनक दुश्मन भी मिल जाता है।

लेकिन ठहरिए! यह सामाजिक न्याय नहीं, कल्याण के मुखौटे में छिपा क्षेत्रवाद है।

बिहार का गरीब नौजवान भी उतना ही भारतीय है, जितना कर्नाटक का युवक। उत्तर प्रदेश के इंजीनियर के अधिकार बेंगलुरु में पैदा हुए इंजीनियर से कम नहीं हैं। संविधान हर नागरिक को देश में घूमने और बसने की आजादी देता है, हालांकि कुछ कानूनी सीमाएं भी हैं।

राज्य सरकारें शिक्षा सुधार सकती हैं, प्रशिक्षण दे सकती हैं और पिछड़े वर्गों को आगे बढ़ा सकती हैं। कंपनियों में भेदभाव की शिकायतों की जांच भी होनी चाहिए। लेकिन जन्मस्थान को नौकरी की अनिवार्य शर्त बनाना गंभीर संवैधानिक और आर्थिक सवाल खड़े करता है।

भारत पहले भी इस रास्ते पर चल चुका है। नतीजे बहुत सुखद नहीं रहे।

1960 के दशक में मुंबई में शिवसेना ने मराठी लोगों की नौकरियां छिनने के डर को राजनीतिक मुद्दा बनाया। दक्षिण भारत से आए कामगार निशाने पर आए। स्थानीय रोजगार की मांग धीरे-धीरे बाहरी लोगों के खिलाफ मुहिम में बदलने लगी।

2008 में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने उत्तर प्रदेश और बिहार से आए प्रवासियों को निशाना बनाया। रेलवे भर्ती, रोजगार और भाषा को लेकर तनाव बढ़ा। क्षेत्रीय अस्मिता का शोर राजनीति में गूंजने लगा।

लेकिन सवाल वही है। क्या इन अभियानों से नौकरियों की बरसात हुई? क्या महाराष्ट्र के बेरोजगार युवाओं की समस्याएं खत्म हो गईं? नहीं! डर बढ़ा, कामगार बंटे और मुंबई की बहुरंगी पहचान को चोट पहुंची।

1969 के तेलंगाना मुल्की आंदोलन में स्थानीय नौकरियों की सुरक्षा की मांग उठी। 1979 से 1985 तक असम आंदोलन में भी प्रवासन, नागरिकता और जनसंख्या में बदलाव को लेकर असंतोष उभरा। परिस्थितियां अलग थीं, लेकिन इन घटनाओं ने दिखाया कि पहचान की चिंता कैसे बहिष्कार की राजनीति बन सकती है।

सबक साफ है। जब नेता नागरिकों को स्थानीय और बाहरी खांचों में बांटते हैं, तो दीवार सिर्फ नौकरी तक सीमित नहीं रहती।

बेंगलुरु भारत का आईटी केंद्र इसलिए नहीं बना कि हर इंजीनियर से पहले क्षेत्रीय पहचान पत्र मांगा गया। उसकी ताकत देशभर से प्रतिभाओं को आकर्षित करने में रही है।

इंजीनियर, वैज्ञानिक, उद्यमी और कुशल कर्मचारी यहां आए। अवसर मिले, मेहनत हुई और सबने मिलकर आर्थिक कामयाबी की बड़ी कहानी लिखी।

अब सोचिए, यदि योग्य उम्मीदवारों पर क्षेत्रीय प्रतिबंधों का दबाव बढ़े, तो क्या होगा? कंपनियों को काबिल लोग चाहिए, ऐसे उम्मीदवार नहीं जिनका जन्मस्थान राजनीतिक कसौटी पर खरा उतरता हो।

भर्ती में योग्यता के बजाय क्षेत्रीय पहचान को तरजीह देने का दबाव बढ़ा, तो निवेशक दूसरे राज्यों का रुख कर सकते हैं। कंपनियां विस्तार कहीं और कर सकती हैं। स्थानीय युवा बेरोजगार रह सकते हैं और नौकरियां भी हाथ से निकल सकती हैं।

यह तो वही बात हुई कि रोजगार बचाने निकले थे और रोजगार देने वाली कंपनियों को ही विदा कर दिया!

कर्नाटक सरकार ने 2024 में निजी कंपनियों में स्थानीय उम्मीदवारों के लिए आरक्षण का प्रस्ताव रखा था। उद्योग जगत के विरोध के बाद इसे रोक दिया गया। दूसरे राज्यों में भी ऐसे प्रस्ताव सामने आए हैं।

एक राज्य में उठी चिंगारी दूसरे राज्यों में आग लगा सकती है।

स्थानीय युवाओं की बेरोजगारी वास्तविक समस्या है। बहुतों को आधुनिक उद्योगों के अनुरूप प्रशिक्षण नहीं मिलता। कमजोर शिक्षा व्यवस्था और कॉलेजों तथा कंपनियों के बीच तालमेल की कमी भी बड़ी बाधाएं हैं।

समाधान बाहरी लोगों के लिए दरवाजे बंद करना नहीं है। स्थानीय युवाओं को इतना सक्षम बनाइए कि वे मुकाबले में आगे निकलें। बेहतर हुनर दीजिए, नौकरियों पर एकाधिकार नहीं!

राष्ट्रवाद का मतलब सिर्फ झंडा लहराना और बड़े-बड़े नारे लगाना नहीं है। इसका असली मतलब हर भारतीय के सम्मान, अधिकार और आजादी की रक्षा करना है।

मुंबई में काम करने वाली मलयाली नर्स, बेंगलुरु का बिहारी इंजीनियर और दिल्ली का तमिल कामगार कोई बाहरी नहीं है। ये सभी भारत के नागरिक हैं और देश की अर्थव्यवस्था में योगदान देते हैं।

भारत की ताकत उसकी विविधता और एकता में है। रोजगार की लड़ाई को क्षेत्रीय नफरत में बदलना देश के भविष्य से खिलवाड़ है।



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Sunday, October 25, 2026

 लोकतंत्र या दंगल? सियासत में मुद्दे गायब, गालियों का जलवा!

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संसद में बहस होनी थी, अखाड़े में कुश्ती शुरू हो गई! जनता पूछ रही है, हुजूर, देश चलाना है या जुबानी पटखनी देनी है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

28 अक्टूबर, 2026

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विपक्षी नेताओं को क्या हो गया है? लोकतंत्र में सवाल उठते हैं, दलीलें दी जाती हैं और सरकारों को कठघरे में खड़ा किया जाता है। मगर भारतीय सियासत का नया तमाशा देखिए! यहां मुद्दों की जगह मुहावरों ने ले ली है। नीतियों की जगह निजी हमले हैं। बहस की जगह बदजुबानी का बाजार गर्म है। ऐसा लगता है कि संसद और चुनावी मंचों के बीच कहीं कोई कुश्ती का अखाड़ा खुल गया है। फर्क बस इतना है कि पहलवानों की जगह नेता हैं और तालियां बजाने वालों में जनता के साथ टीवी कैमरे भी शामिल हैं।

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच ताजा जुबानी जंग इसी गिरावट की एक मिसाल है। पटना में 25 अक्टूबर को खड़गे की टिप्पणी ने सियासी गलियारों में हंगामा खड़ा कर दिया। सभा में किसी ने कहा कि मोदी सत्ता नहीं छोड़ेंगे। जवाब में खड़गे ने कहा, “मोदी का बाप भी जाएगा।”

बस, फिर क्या था! सियासत का पारा चढ़ गया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इसे मर्यादा का उल्लंघन बताया। भाजपा नेताओं ने इसे गुंडों जैसी भाषा करार दिया। अब सवाल यह है कि सत्ता स्थायी नहीं होती, यह बताने के लिए दिवंगत पिता को मैदान में उतारना कितना जरूरी था? क्या लोकतंत्र में दलीलों का अकाल पड़ गया है कि रिश्तेदारों को भी चुनावी प्रचार में घसीटना पड़े?

सियासत में गाली का कारोबार नया नहीं है। मगर पुराने तमाशे को नई पैकिंग में बेचने से वह सिद्धांत नहीं बन जाता। आइए, इस सियासी दंगल के कुछ चर्चित पहलवानों की चालें देखें।

मुद्दों का जनाजा!

पहला नमूना प्रधानमंत्री की दिवंगत मां हीराबेन को निशाना बनाने वाली टिप्पणियां हैं। 2025 के बिहार चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस और राजद की वोट अधिकार यात्रा से जुड़े मंचों पर मोदी और उनकी मां को लेकर आपत्तिजनक भाषा इस्तेमाल किए जाने के आरोप लगे। विवाद बढ़ा तो सफाई और राजनीतिक पलटवार का दौर शुरू हुआ।

लेकिन सवाल सीधा है। किसी नेता की मां को अपमानित करके बेरोजगार नौजवान को नौकरी मिल जाएगी? महंगाई घट जाएगी? किसान की आमदनी बढ़ जाएगी? मां का अपमान जवाबदेही नहीं है। यह भावनाओं से तालियां बटोरने की कोशिश है। राजनीति में विरोध कीजिए, मगर परिवार को चुनावी पोस्टर मत बनाइए।

दूसरा नमूना है ऐसे जुमले, जो किसी नेता की पूरी राजनीति को एक ठप्पे में बंद कर देते हैं। मोदी के लिए कभी 'मौत का सौदागर' जैसे शब्द इस्तेमाल हुए। ऐसे नारे टीवी पर खूब चलते हैं, सोशल मीडिया पर दौड़ते हैं और समर्थकों की महफिल में वाहवाही लूटते हैं।

मगर सुरक्षा नीति, अर्थव्यवस्था या सरकारी फैसलों पर ठोस बहस कहां है? किसी को खलनायक घोषित कर देना आसान है। उसके मुकाबले बेहतर नीति पेश करना मुश्किल। गाली मुफ्त है, विकल्प तैयार करने में मेहनत लगती है!

तीसरा नमूना 'चायवाला' कहकर मोदी की पृष्ठभूमि का मजाक उड़ाना है। मेहनत करके रोजी कमाना हमारे समाज में शर्म की बात कब से हो गई? करोड़ों लोग चाय बेचते हैं, रेहड़ी लगाते हैं और पसीना बहाकर परिवार पालते हैं। उनकी मेहनत का मजाक उड़ाने वाले आखिर किस भारत की तस्वीर पेश करना चाहते हैं?

प्रधानमंत्री के कामकाज की आलोचना जरूर होनी चाहिए। रोजगार, महंगाई और विकास के आंकड़ों पर सवाल उठने चाहिए। मगर चाय बेचने के पुराने अनुभव को ताना बनाना, बहस नहीं, वर्गीय अहंकार की झलक है।

चौथा नमूना राहुल गांधी की शैली में दिखाई देता है। अगस्त 2026 में उन्होंने मोदी की कूटनीति पर तंज कसते हुए विदेशी नेताओं से गले मिलने की शैली का मजाक उड़ाया और मंच पर गले लगने का नाटकीय अभिनय किया।

राजनीति में व्यंग्य की जगह है। मगर व्यंग्य का निशाना नीतियां और उनके नतीजे हों, तो बात बने। विदेश नीति को सिर्फ गले मिलने तक सीमित कर देना उतना ही अधूरा है, जितना क्रिकेट का विश्लेषण केवल खिलाड़ियों की जर्सी देखकर करना।

नेता प्रतिपक्ष का काम सरकार से तीखे सवाल पूछना है। मगर हर गंभीर मुद्दे को कॉमेडी शो बना देने से जवाबदेही मजबूत नहीं होती। जनता को पंचलाइन से ज्यादा नतीजे चाहिए।


पांचवां मुद्दा है 'वोट चोरी' के आरोपों का। विपक्ष ने मतदाता सूची, फर्जी पते, दोहराए गए नामों और सामूहिक पंजीकरण जैसे मामलों पर सवाल उठाए हैं। ऐसे आरोपों की जांच जरूरी है। चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी हो, तो उसे सामने लाना लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है।

लेकिन बड़े आरोपों के साथ पुख्ता सबूत भी चाहिए। हर संदेह अपने आप साजिश का प्रमाण नहीं बन जाता। शिकायतों की जांच हो, दस्तावेज सामने आएं और जिम्मेदार संस्थाएं जवाब दें। नारेबाजी से चुनाव सुधार नहीं होता। भरोसा तथ्यों से बनता है, माइक की आवाज से नहीं।

आईना दोनों तरफ है!

यहां भाजपा को भी दूध का धुला मान लेने की जरूरत नहीं। पप्पू को पप्पू किसने बनाया? सत्तापक्ष की बयानबाजी, विरोधियों के लिए निजी ताने और संस्थाओं को लेकर उठते विवाद भी लोकतांत्रिक माहौल को प्रभावित करते हैं। सत्ता में बैठे लोगों की जिम्मेदारी कम नहीं, बल्कि ज्यादा है। आखिर जवाबदेही का पहला तकाजा है कि आलोचना सुनने का हौसला भी हो।

सामाजिक कार्यकर्ता पद्मिनी अय्यर का सवाल गौर करने लायक है। बेरोजगारी, केंद्र-राज्य संबंध, संस्थाओं की स्वतंत्रता और सामाजिक सद्भाव जैसे मुद्दों पर गंभीर बहस कम क्यों होती है? हर दिन नया अपमान सुर्खियां बटोरता है, जबकि जनता की परेशानियां अगले दिन फिर कतार में खड़ी मिलती हैं।

बिहार के राजनैतिक समीक्षक  टी. पी. श्रीवास्तव की बात भी मौजूं है। असहमति आजाद समाज की ताकत है, लेकिन तिरस्कार उसका जहर। जब मंचों पर परिवारों को घसीटा जाता है, पृष्ठभूमि पर तंज कसे जाते हैं और चुनावी प्रक्रिया पर बिना पर्याप्त प्रमाण के बड़े आरोप लगाए जाते हैं, तो विवेकपूर्ण बहस कमजोर पड़ जाती है।"

लोकतंत्र कोई दंगल नहीं, जहां विरोधी को चित करना ही जीत हो। यहां जीत तब है, जब जनता की जिंदगी बेहतर बने। विपक्ष सवाल पूछे, सरकार जवाब दे और दोनों अपने दावों के सबूत पेश करें।

पब्लिक कमेंटेटर प्रोफ पारस नाथ चौधरी फरमाते हैं, "नेताओं को याद रखना चाहिए कि जनता टिकट लेकर तमाशा देखने नहीं आई है। उसे रोजगार, अच्छी सड़कें, साफ हवा, बेहतर अस्पताल और सुरक्षित भविष्य चाहिए। वह संसद में नीतियों की कुश्ती देखना चाहती है, नेताओं के अहंकार की नहीं।"

आखिर में सवाल वही है: लोकतंत्र चलेगा या जुबानी दंगल? अगर नेताओं ने अपनी जुबान पर लगाम नहीं लगाई, तो अखाड़े में तालियां भले बजती रहें, मगर हार जनता की होगी।