Friday, August 21, 2026

 रेगिस्तान की रेत से बोर्डरूम तक: शेखावाटी के मारवाड़ियों ने कैसे खड़े किए भारत के कारोबारी साम्राज्य

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बृज खंडेलवाल द्वारा

22 अगस्त 2026

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कैमरा घूमता है। पर्दे पर एक भव्य हवेली दिखाई देती है। मोटे-से सेठजी अपनी गद्दी पर बैठे हैं। आसपास बही-खाते, तिजोरियां और रुपयों के बक्से रखे हैं। पास में पुराने हिन्दी सिनेमा के परिचित मुनीमजी खड़े हैं, एक्टर कन्हैया लाल, चेहरे पर चालाक मुस्कान और हाथ में मोटा हिसाब-किताब।

कोई मदद मांगता है, तो पहले खर्च का हिसाब होता है। कोई कर्ज मांगता है, तो ब्याज की नई दर खुल जाती है। दशकों तक हिन्दी फिल्मों ने मारवाड़ी व्यापारी की एक ऐसी छवि बनाई; चतुर, कंजूस और हर समय मुनाफे के पीछे भागने वाला।

लेकिन पूरी सच्चाई इतनी भर नहीं थी।

यह छवि दर्शकों का मनोरंजन जरूर करती रही, मगर एक जीवंत और कर्मठ समुदाय को मजाकिया या खलनायक जैसे किरदारों तक सीमित कर दिया गया। मारवाड़ियों ने केवल दौलत नहीं कमाई। उन्होंने कारखाने लगाए, रोजगार पैदा किए, स्कूल और अस्पताल बनाए और आधुनिक भारत के उद्योगों की बुनियाद मजबूत की।

इस कहानी की शुरुआत राजस्थान के शेखावाटी इलाके से होती है; चूरू, सीकर और झुंझुनूं का सूखा और कठिन भूभाग। यहां पानी कम था, खेती अनिश्चित थी और गर्मियों में धरती अंगारों जैसी तपती थी। इस इलाके ने लोगों को वह सब सिखाया, जो उपजाऊ मैदान शायद ही सिखा पाते हैं; मुश्किल हालात में जीना और कमी को अवसर में बदलना।

इन्हीं धूल भरे कस्बों से भारत के कई बड़े कारोबारी घराने निकले: बिड़ला, बजाज, डालमिया, गोयनका, सिंघानिया, पोद्दार, रूइया, पीरामल और अनेक अन्य। पीढ़ी-दर-पीढ़ी इन परिवारों ने देश के उद्योग, व्यापार और वित्तीय दुनिया की तस्वीर बदली।

मगर शेखावाटी का योगदान केवल कारोबार तक सीमित नहीं रहा। झुंझुनूं को शहीदों की नगरी भी कहा जाता है। यहां के गांवों से पीढ़ियों से नौजवान सेना में जाते रहे हैं। एक तरफ सीमा पर देश की रक्षा करने वाला जवान था, दूसरी तरफ देश की आर्थिक ताकत बढ़ाने वाला उद्यमी। दोनों को हिम्मत, अनुशासन और सब्र की जरूरत थी।

नक्शे को गौर से देखिए, तो व्यापार का इतिहास एकदम निजी और जीवंत लगने लगता है।

पिलानी का नाम बिड़ला परिवार से जुड़ा है। उन्नीसवीं सदी में शिव नारायण बिड़ला बंबई गए और उनके वंशजों ने भारत के सबसे बड़े औद्योगिक घरानों में से एक खड़ा किया। चिड़ावा डालमियाओं से जुड़ा रहा। नवलगढ़ ने गोयनका, पोद्दार, केड़िया, सेक्सारिया और मोरारका जैसे कारोबारी परिवारों को जन्म दिया। रामगढ़ का रिश्ता रूइया और पोद्दार परिवारों से है, जबकि बगर पीरामल परिवार से जुड़ा है।

सीकर के पास काशी का बास में जमनालाल बजाज का जन्म हुआ। आगे चलकर वे बड़े उद्योगपति ही नहीं, बल्कि आजादी की लड़ाई के प्रमुख समर्थक भी बने। चूरू के सादुलपुर ने लक्ष्मी मित्तल को जन्म दिया, जिन्होंने दुनिया भर में इस्पात का विशाल साम्राज्य खड़ा किया। सिंघानिया, सर्राफ, मोदी और अनेक परिवारों ने भी अपने-अपने ढंग से ऐसी ही राह तय की।

दिलचस्प बात यह है कि इनमें से अधिकतर दौलत शेखावाटी में नहीं बनी। रेगिस्तान ने उन्हें जड़ें दीं, जबकि कोलकाता, बंबई और दूसरे व्यापारिक शहरों ने उन्हें बड़ा मंच दिया।

मारवाड़ियों की सफलता केवल मितव्ययिता या बचत का नतीजा नहीं थी। इसके पीछे भरोसा, अनुशासन और बदलते समय के साथ ढलने की क्षमता थी। आर्थिक इतिहासकार थॉमस ए. टिम्बर्ग ने इस सफलता के कई महत्वपूर्ण कारण बताए हैं।

सबसे पहले था समुदाय का मजबूत नेटवर्क। शेखावाटी से निकलने वाला कोई युवा आर्थिक मायने में कभी अकेला नहीं होता था। रिश्तेदार उसे व्यापारियों से मिलवाते, रहने की जगह देते, उधार दिलाते और कारोबार की तालीम का इंतजाम करते। एक व्यापारी की सफलता दूसरे के लिए रास्ता खोलती। गांव और परिवार के रिश्ते धीरे-धीरे देशव्यापी कारोबारी नेटवर्क बन गए।

दूसरी बड़ी चीज थी साख।

नकद पैसा जरूरी था, लेकिन आदमी का वचन अक्सर उससे भी ज्यादा कीमती माना जाता था। व्यापारी पैसा खोकर फिर संभल सकता था, लेकिन साख खोने पर कारोबार के दरवाजे बंद हो सकते थे।

टिम्बर्ग ने मारवाड़ी व्यापारियों के कड़े वित्तीय अनुशासन पर भी जोर दिया। पारंपरिक बही-खाता केवल हिसाब लिखने की किताब नहीं था। वह रोजाना मुनाफे, नुकसान और जिम्मेदारियों पर नजर रखने की पूरी संस्कृति थी। साथ ही, जरूरत पड़ने पर सोच-समझकर जोखिम उठाने का साहस भी था, खासकर वस्तुओं के व्यापार और सट्टे में।

सबसे बड़ी खूबी थी उनकी अनुकूलन क्षमता।

मुगल दौर में मारवाड़ी वित्तदाता और साहूकार बने। अंग्रेजों के समय वे दलाल, ब्रोकर और व्यापारिक मध्यस्थ बने। बाद में उन्होंने तेजी से उद्योगों की तरफ कदम बढ़ाया। संयुक्त परिवार और आपसी भरोसे की पुरानी व्यवस्था आधुनिकता के रास्ते में रुकावट नहीं बनी। उलटे, इनसे पूंजी जुटाने, जोखिम बांटने और लंबे कारोबारी रिश्ते निभाने में मदद मिली।

भूगोल ने भी इस सफलता में अपना हिस्सा निभाया। अठारहवीं सदी में स्थानीय शासकों ने रास्ते के कर कम किए और व्यापार को बढ़ावा दिया। कपास, ऊन और मसालों से भरे काफिले इस इलाके से गुजरते थे। उन्नीसवीं सदी में रेलवे के आने से व्यापार की दुनिया बदल गई। कोलकाता और बंबई नए आकर्षण केंद्र बन गए।

शेखावाटी के व्यापारी वहां पहुंचे। पहले व्यापारी और वित्तदाता के रूप में, फिर मिलों, कारखानों और बड़े औद्योगिक घरानों के मालिक के रूप में। बीसवीं सदी तक वे कपड़ा, जूट, इस्पात, सीमेंट, मोटर उद्योग और वित्त की दुनिया के बड़े खिलाड़ी बन चुके थे।

रेगिस्तान ने उन्हें चलना सिखाया, बाजार ने उन्हें विस्तार करना सिखाया।

कमी एक सख्त उस्ताद थी। अनिश्चित बारिश, कीमती पानी और स्थानीय अवसरों की कमी ने लोगों को बाहर निकलने के लिए मजबूर किया। सेना की परंपरा को मजबूत करने वाला अनुशासन और धैर्य ही कारोबारियों के भी काम आया।

धर्म और सामुदायिक संस्थाओं ने भी सामाजिक रिश्तों को मजबूत रखा। रानी सती, खाटू श्यामजी और सालासर बालाजी जैसे तीर्थ आज भी आस्था के बड़े केंद्र हैं। मंडावा, नवलगढ़, फतेहपुर और रामगढ़ की रंगीन हवेलियां एक और कहानी कहती हैं। ये उन परिवारों की निशानियां हैं, जिन्होंने दूर-दराज के शहरों में दौलत कमाई, लेकिन अपने रेगिस्तान को सजाने के लिए लौट आए।

शेखावाटी की कहानी को केवल जाति या व्यापार की कहानी नहीं कहा जा सकता। राजपूत समुदायों ने मजबूत सैन्य और जमींदारी परंपराएं विकसित कीं। अग्रवाल, माहेश्वरी, ओसवाल और दूसरे व्यापारी समुदायों ने शक्तिशाली कारोबारी नेटवर्क बनाए।

दोनों ने देश को अलग-अलग तरह की ताकत दी; एक ने सरहदों की हिफाजत की, दूसरे ने देश की आर्थिक मांसपेशियां मजबूत कीं।

एक पुरानी कहावत इस जज्बे को खूब बयान करती है; जहां बैलगाड़ी पहुंच सकती है, वहां आखिरकार मारवाड़ी भी पहुंच जाएगा।

कुदरत ने इस इलाके को बहुत कम दिया था। मगर इसके लोगों ने भरोसे, साख, अनुशासन, गतिशीलता और लगातार मेहनत से मौके पैदा किए।

रेगिस्तान ने न तो जादू से अरबपति पैदा किए, न सैनिक। उसने बस ऐसे हालात पैदा किए, जिनमें संघर्ष करने की क्षमता आदत बनी ; और वही आदत, वक्त के साथ, इतिहास बन गई।

Thursday, August 20, 2026

 

तिब्बती भारत में: क्या वे कभी लौटेंगे, या हमेशा के मेहमान बन जाएंगे?


बृज खंडेलवाल द्वारा
20 अगस्त, 2026


एक मातृभूमि रोज़मर्रा की जिंदगी से दूर हो सकती है, लेकिन यादों से नहीं मिटती। भारत में रह रहे हजारों तिब्बतियों के लिए तिब्बत आज भी एक सपना भी है और एक ज़ख्म भी—एक ऐसी धरती, जिसे उनमें से बहुतों ने कभी देखा तक नहीं, फिर भी अपना घर मानते हैं।

तिब्बतियों के बड़े पलायन को छह दशक से अधिक समय बीत चुका है। लेकिन एक कठिन सवाल आज भी पीछा नहीं छोड़ता—क्या तिब्बती कभी अपनी मातृभूमि लौट पाएंगे, या अस्थायी निर्वासन चुपचाप एक स्थायी बसावट में बदल चुका है?

इस सप्ताह कर्नाटक में यह सवाल फिर चर्चा में आया। तिब्बती प्रतिनिधियों ने राज्य के वरिष्ठ राजनीतिक नेताओं से मुलाकात की और अपने समुदाय के लिए अधिक सहयोग तथा तिब्बती मुद्दे पर नए सिरे से ध्यान देने की मांग की।

बेंगलुरु में नवनिर्वाचित तिब्बती सांसद चोपेल ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार से मुलाकात की। उन्होंने कल्याण, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और तिब्बती संस्कृति के संरक्षण के लिए राज्य सरकार से सहायता मांगी। विशेष रूप से दक्षिण भारत की सबसे बड़ी तिब्बती बस्तियों में से एक, बायलाकुप्पे के तिब्बतियों की समस्याएं उठाई गईं।

बताया जाता है कि शिवकुमार ने सहयोग का भरोसा दिया। उन्होंने तिब्बती संस्कृति को अधिक स्थान देने और मैसूरु दशहरा समारोह में तिब्बती समुदाय की भागीदारी बढ़ाने का भी आश्वासन दिया।

मैसूरु में, हुंसूर के निकट गुरुपुरा तिब्बती बस्ती के एक अन्य प्रतिनिधिमंडल ने सांसद यदुवीर वाडियार से मुलाकात की। उन्होंने उनसे संसद और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तिब्बती मुद्दा उठाने का आग्रह किया।

प्रतिनिधिमंडल ने 2 जुलाई को न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के बाहर तिब्बती कार्यकर्ता लोबगा रंगजेन के आत्मदाह का मुद्दा भी उठाया। यह दर्दनाक घटना याद दिलाती है कि तिब्बत का सवाल आज भी जिंदा है और लोगों की भावनाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है।

तिब्बती नेताओं की मांगें केवल राजनीति तक सीमित नहीं थीं। उन्होंने स्कूलों, स्वास्थ्य सेवाओं, कल्याणकारी योजनाओं तथा तिब्बती भाषा, धर्म और संस्कृति के संरक्षण के लिए भी सहायता मांगी।

लेकिन इन तात्कालिक मांगों के पीछे एक और बड़ा सवाल छिपा है—जब निर्वासन पीढ़ियों तक चलने लगे, तो आखिर उसका भविष्य क्या होता है?

भारत में तिब्बती निर्वासन की कहानी 1959 में शुरू हुई। चीन के शासन के खिलाफ विद्रोह के बाद दलाई लामा तिब्बत से निकल आए। हजारों तिब्बती खतरनाक हिमालयी दर्रों को पार करते हुए उनके पीछे भारत पहुंचे। वे अपने घर, परिवार और सदियों पुरानी जीवन-पद्धति पीछे छोड़ आए थे।

तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में भारत ने उन्हें शरण दी। बस्तियां बसाने, मठ बनाने और स्कूल खोलने के लिए जमीन उपलब्ध कराई गई। धीरे-धीरे और बड़ी मुश्किलों के बीच एक उजड़ा हुआ समुदाय फिर से अपनी जिंदगी बनाने लगा।

धर्मशाला तिब्बती निर्वासित समुदाय का आध्यात्मिक और राजनीतिक केंद्र बन गया। वहीं से केंद्रीय तिब्बती प्रशासन आज भी काम करता है। यह संस्था शिक्षा, कल्याण, संस्कृति और विदेशों में रह रहे तिब्बतियों के लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व से जुड़े कार्यों को संभालती है।

समय के साथ भारत के अनेक हिस्सों में तिब्बती बस्तियां बस गईं। कर्नाटक में बायलाकुप्पे, मुंडगोड और गुरुपुरा जैसी बड़ी बस्तियां विकसित हुईं। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में भी महत्वपूर्ण तिब्बती समुदाय बस गए।

पहली पीढ़ी के शरणार्थियों ने भारी कठिनाइयां झेलीं। उन्होंने जमीन साफ की, खेती शुरू की और लगभग शून्य से अपने घर बसाए। मठ फिर खड़े हुए। स्कूलों में तिब्बती भाषा और इतिहास पढ़ाया जाने लगा। हस्तशिल्प, खेती, रेस्तरां और छोटे कारोबारों ने परिवारों को सहारा दिया।

जो शुरुआत में शरणार्थियों के अस्थायी शिविर थे, वे धीरे-धीरे एक संगठित समुदायों के नेटवर्क में बदल गए।

भारत वह पनाहगाह था, जिसकी तिब्बतियों को सख्त जरूरत थी। लेकिन वक्त गुजरने के साथ वही पनाहगाह धीरे-धीरे घर जैसा लगने लगा।

यहीं से असली विरोधाभास शुरू होता है।

भारत में जन्मे अनेक युवा तिब्बतियों ने कभी तिब्बत देखा ही नहीं। वे भारतीय भाषाएं बोलते हैं, भारतीय स्कूलों और विश्वविद्यालयों में पढ़ते हैं तथा भारतीय दोस्तों और पड़ोसियों के बीच बड़े होते हैं। फिर भी उनकी पहचान में तिब्बत की जगह बेहद गहरी है।

तिब्बत उनकी प्रार्थनाओं में बसता है। उनके गीतों, मठों और परिवारों की कहानियों में तिब्बत जिंदा रहता है।

एक युवा तिब्बती शायद ल्हासा की गलियों से ज्यादा मैसूरु की सड़कों को जानता हो। फिर भी तिब्बत की स्मृति उसके अपनेपन और पहचान की भावना को तय करती रहती है।

इस बीच निर्वासित समुदाय भी बदल रहा है। कड़े सीमा नियंत्रण के कारण तिब्बत से नए लोगों का आना काफी कम हो गया है। दूसरी ओर, कई युवा तिब्बती उच्च शिक्षा और बेहतर करियर के लिए अमेरिका, कनाडा, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया जा रहे हैं।

नतीजा एक अजीब और दर्दनाक विडंबना है।

जो समुदाय तिब्बत से कभी वापस लौटने की उम्मीद लेकर निकला था, वह अब दुनिया भर में बिखर गया है। हर नई पीढ़ी के साथ तिब्बत से उसकी भौतिक दूरी और बढ़ती जा रही है।

निकट भविष्य में बड़े पैमाने पर तिब्बतियों की वापसी की संभावना धुंधली दिखाई देती है। तिब्बती आकांक्षाओं और बीजिंग की नीतियों के बीच राजनीतिक मतभेद अभी तक सुलझे नहीं हैं। निर्वासन में रह रहे अनेक तिब्बतियों को चीन के शासन में धर्म, भाषा और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति पर प्रतिबंधों की चिंता है।

फिर भी उम्मीद बड़ी ज़िद्दी चीज़ है।

बुजुर्ग तिब्बतियों के लिए वापसी आज भी एक पवित्र सपना है। युवा पीढ़ी के लिए यह सपना व्यावहारिक सवालों से जुड़ गया है—शिक्षा, रोजगार, नागरिकता, पहचान और अनिश्चित भविष्य।

इस पूरी कहानी में भारत की जगह बहुत खास है। भारत तिब्बत नहीं है। फिर भी अनेक तिब्बतियों के लिए भारत ही एकमात्र घर है, जिसे उन्होंने अपनी आंखों से जाना है।

शायद लंबे निर्वासन की सबसे बड़ी त्रासदी यही है। एक अस्थायी पनाहगाह बिना किसी औपचारिक फैसले के स्थायी घर बन सकता है।

वापसी की प्रार्थना आज भी जारी है। निर्वासित बस्तियों में तिब्बती झंडा अब भी लहराता है। मठ पुरानी परंपराओं को संभाले हुए हैं। बच्चे उस मातृभूमि की भाषा सीख रहे हैं, जो उनकी पहुंच से बहुत दूर है।

लेकिन इतिहास अपनी चाल चलता रहता है।

क्या तिब्बती कभी तिब्बत लौटेंगे? इसका जवाब कोई निश्चित रूप से नहीं दे सकता।

फिलहाल वे स्मृति और हकीकत के बीच जी रहे हैं—एक घर को दिल में संभाले हुए और दूसरे घर में अपनी जिंदगी बनाते हुए।

भारत ने कभी मजबूर और बेघर शरणार्थियों के लिए अपने दरवाजे खोले थे। साठ साल से अधिक समय बाद वे मेहमान अब पड़ोसी, सहकर्मी, विद्यार्थी, भिक्षु, कारोबारी और भारत के व्यापक सामाजिक परिदृश्य का हिस्सा बन चुके हैं।

तिब्बत का सपना आज भी जिंदा है। लेकिन हर गुजरती पीढ़ी के साथ भारत थोड़ा कम निर्वासन और थोड़ा ज्यादा घर बनता जा रहा है।

Wednesday, August 19, 2026

 विश्व फोटोग्राफी डे: 

ताज कैमरे की आंख में कैद होती एक अनंत कहानी

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बृज खंडेलवाल द्वारा

19 अगस्त 2026

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एक क्लिक होता है और सदियों पुरानी इमारत अचानक जिंदा हो उठती है। संगमरमर पर ठहरी रोशनी बदलती है, यमुना की लहरें करवट लेती हैं और ताजमहल एक नए चेहरे के साथ कैमरे में उतर जाता है। 

सवाल यह है कि आखिर इस इमारत में ऐसा क्या है, जो लाखों तस्वीरों के बाद भी कैमरे को फिर से क्लिक करने के लिए मजबूर करता है?

यही ताज का जादू है। सदियां गुजर गईं, कैमरे बदल गए, तकनीक आसमान छू गई, लेकिन ताज की तस्वीर का आकर्षण कम नहीं हुआ।

विश्व फोटोग्राफी दिवस, 19 अगस्त, पर ताजमहल एक बार फिर कैमरे की दुनिया के केंद्र में है। 17वीं सदी का यह मकबरा फोटोग्राफी की कई पीढ़ियों का गवाह रहा है। भारी लकड़ी के कैमरों और कांच की प्लेटों से शुरू हुई कहानी आज स्मार्टफोन, ड्रोन और हाई-रिजॉल्यूशन कैमरों तक पहुंच चुकी है।

आगरा में फोटोग्राफी की यह दास्तान भी कम दिलचस्प नहीं है। एमजी रोड का प्रिया लाल एंड सन्स फोटो स्टूडियो इसका जिंदा सबूत है। वर्ष 1878 में शुरू हुआ यह स्टूडियो आज भी मौजूद है और परिवार की छठी पीढ़ी इस विरासत को आगे बढ़ा रही है।

उस दौर में तस्वीर खींचना चुटकी का खेल नहीं था। बिजली आम नहीं थी। कैमरे भारी थे और तस्वीर तैयार करने के लिए अंधेरे कमरे में घंटों मेहनत करनी पड़ती थी। प्रिया लाल के डार्करूम में प्राकृतिक रोशनी को पर्दों और शीशों की मदद से नियंत्रित किया जाता था। फोटोग्राफी तब तकनीक से ज्यादा सब्र, हुनर और बारीक नजर का इम्तिहान थी।

प्रिया लाल खंडेलवाल ने ताजमहल और आगरा के दूसरे ऐतिहासिक स्मारकों की अनेक तस्वीरें तैयार कीं। उनकी तस्वीरें इंग्लैंड की महारानी तक पहुंचीं और उन्हें स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया। उनकी पुस्तक ‘Pictorial Agra’ में आगरा के स्मारकों की 25 हाफ-टोन तस्वीरें और उनका संक्षिप्त इतिहास दर्ज है। यह सिर्फ तस्वीरों की किताब नहीं, बल्कि उस दौर के आगरा की एक दृश्य स्मृति है।

लेकिन आगरा और ताज की फोटोग्राफी की कहानी राजा दीन दयाल के बिना अधूरी है। 1844 में जन्मे दीन दयाल ने 19वीं सदी के भारत को कैमरे की नजर से दुनिया के सामने रखा। वे हैदराबाद के निजाम के दरबारी फोटोग्राफर बने और उन्हें ‘राजा मुसव्विर जंग’ की उपाधि मिली।

उनका कैमरा आज के मोबाइल फोन की तरह जेब में नहीं समाता था। विशाल लकड़ी के कैमरे, कांच की प्लेटें और भारी ट्राइपॉड लेकर वे बैलगाड़ियों और सहायकों के साथ लंबी यात्राएं करते थे। महल, किले, मंदिर, मस्जिदें, स्मारक, राजसी जुलूस, हाथी और शिकार; उन्होंने भारत की पूरी शानो-शौकत को अपने लेंस में समेटने की कोशिश की।

हैदराबाद में उनके कैमरे ने केवल इमारतों की खूबसूरती नहीं दिखाई। उसने रियासती जिंदगी, पहनावे, रस्मों, दरबारों और शाही ठाठ को भी हमेशा के लिए दर्ज कर दिया। आज उनके भारी कैमरे और कांच की नेगेटिव प्लेटें किसी संग्रहालय की वस्तु लग सकती हैं, लेकिन उन तस्वीरों में उन्नीसवीं सदी का भारत आज भी सांस लेता दिखाई देता है।

दीन दयाल की तस्वीरें एक अहम बात सिखाती हैं; बेहतरीन तस्वीर कैमरा नहीं, नजर बनाती है।

ताजमहल इस कहावत को हर रोज सही साबित करता है। फोटोग्राफर के सामने यहां केवल एक इमारत नहीं होती। रोशनी, पानी, आसमान, बादल, पेड़ और छाया मिलकर हर पल नया फ्रेम बनाते हैं।

सुबह की नरम धूप संगमरमर को गुलाबी और सुनहरा कर देती है। दोपहर में उसकी सफेदी तेज चमकती है। शाम ढलते ही ताज किसी पुराने ख्वाब की तरह नजर आता है। पूर्णिमा की रात वही इमारत चांदनी में तैरती हुई लगती है।

यमुना इस दृश्य की खामोश साझेदार है। पानी में ताज का प्रतिबिंब तस्वीर को एक अलग गहराई देता है। धुंध आए तो रहस्य बढ़ जाता है। बादल घिरें तो दृश्य में नाटकीयता उतर आती है। मेहताब बाग से नदी पार का दृश्य हो या मुख्य द्वार से लिया गया क्लासिक फ्रेम, हर कोण अपनी अलग कहानी कहता है।

ताज की तस्वीरों की लोकप्रियता को डायना बेंच ने भी नया आयाम दिया। 1992 में राजकुमारी डायना की यहां खींची गई तस्वीर ने इस जगह को दुनिया के सबसे चर्चित फोटो स्पॉट्स में शामिल कर दिया।

ताजमहल 1983 से यूनेस्को विश्व धरोहर है और 2007 में न्यू सेवन वंडर्स ऑफ द वर्ल्ड में शामिल हुआ। हर साल लाखों पर्यटक आगरा आते हैं। आज लगभग हर हाथ में स्मार्टफोन है। लिहाजा ताज की तस्वीरें अब सिर्फ पेशेवर कैमरों से नहीं, मोबाइल स्क्रीन से भी पैदा होती हैं।

सेल्फी, रील और सोशल मीडिया ने ताज को एक नया डिजिटल जीवन दिया है। कभी फोटोग्राफर घंटों एक सही फ्रेम का इंतजार करता था। आज पर्यटक कुछ सेकंड में दर्जनों तस्वीरें खींच लेते हैं।

फिर भी सवाल अपनी जगह कायम है: लाखों तस्वीरों के बाद भी ताज पुराना क्यों नहीं पड़ता?

शायद इसलिए कि ताज सिर्फ पत्थर का स्मारक नहीं, एहसास का स्मारक है। हर आंख उसे अलग ढंग से देखती है और हर फोटोग्राफर उसमें कोई नया कोण खोज लेता है।

राजा दीन दयाल के भारी कैमरे से लेकर आज के स्मार्टफोन तक तकनीक ने लंबा सफर तय किया है। कैमरा छोटा होता गया, तस्वीर ज्यादा साफ होती गई, शूटिंग आसान होती गई। मगर ताज के सामने खड़ी हैरत आज भी वैसी ही है।

विश्व फोटोग्राफी दिवस पर ताज का पैगाम साफ है; कैमरा छोटा हो सकता है, मगर नजर बड़ी होनी चाहिए।

 राखी के धागे में देशभक्ति का रंग, बाजार में ‘स्वदेशी’ की धूम

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

20 अगस्त 2026

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ढोलक की थाप, रंग-बिरंगी राखियां और मिठाइयों की खुशबू से बाजार गुलजार हैं। दुकानों पर बहनें राखियां चुन रही हैं, बच्चे उत्साह में हैं और भाई भी इस बार कलाई पर सिर्फ प्यार नहीं, देशभक्ति का धागा बांधने को तैयार हैं।

28 अगस्त को मनाए जाने वाले रक्षाबंधन से पहले देशभर के बाजारों में स्वदेशी राखियों की मांग तेजी से बढ़ी है। इस बार राखी का त्योहार भाई-बहन के रिश्ते के साथ आत्मनिर्भर भारत के संदेश का भी वाहक बनता दिख रहा है।

कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAIT) के मुताबिक, इस साल राखी से जुड़े कारोबार का अनुमान करीब 25 हजार करोड़ रुपये है। पिछले साल यह आंकड़ा करीब 17 हजार करोड़ रुपये था। मिठाई, कपड़े, उपहार और पैकेजिंग को जोड़ दें तो त्योहार का कुल कारोबार 30 हजार करोड़ रुपये से ऊपर जाने की उम्मीद है।

राखी में ‘विकसित भारत’ का संदेश

बाजार में पारंपरिक राखियों के साथ कई थीम आधारित राखियां भी खूब पसंद की जा रही हैं। इनमें ‘विकसित भारत’, ‘मोदी गारंटी’, ‘आत्मनिर्भर भारत’, ‘वोकल फॉर लोकल’, ‘भारत गौरव’, ‘ब्रह्मोस’, ‘राष्ट्र रक्षा सूत्र’ और ‘अमृत काल’ जैसी राखियां शामिल हैं।

‘नारी वंदन’, ‘लखपति दीदी’ और ‘नमामि गंगे’ जैसी राखियां भी लोगों का ध्यान खींच रही हैं। बच्चों और युवाओं में खास तौर पर ब्रह्मोस, राष्ट्र रक्षा सूत्र और विकसित भारत वाली राखियों को लेकर उत्साह दिखाई दे रहा है।

CAIT के महासचिव और चांदनी चौक के सांसद प्रवीण खंडेलवाल के मुताबिक, ‘वोकल फॉर लोकल’, ‘लोकल फॉर ग्लोबल’ और आत्मनिर्भर भारत की सोच ने ग्राहकों का भरोसा बढ़ाया है। उनके अनुसार, स्वदेशी राखी अब सिर्फ एक सामान नहीं, बल्कि देश के प्रति गर्व का प्रतीक बन रही है।

CAIT के राष्ट्रीय अध्यक्ष बी.सी. भरतिया का कहना है कि इन राखियों के जरिए बहनें केवल कलाई पर पवित्र धागा नहीं बांध रहीं। वे राष्ट्र निर्माण, महिला सशक्तीकरण, स्वदेशी आंदोलन, पर्यावरण संरक्षण और राष्ट्रीय सुरक्षा का संदेश भी दे रही हैं।

राखी में भारत की कारीगरी

इस बार राखियों का बाजार सिर्फ देशभक्ति तक सीमित नहीं है। इसमें भारत की विविध लोक कला और कारीगरी भी खूब नजर आ रही है।

नागपुर की खादी राखियां, जयपुर की सांगानेरी कला, पुणे की बीज राखियां और असम की चाय-पत्ती से बनी राखियां ग्राहकों को आकर्षित कर रही हैं। कोलकाता की जूट, मुंबई की रेशम, बिहार की मधुबनी कला और बेंगलुरु की फूलों वाली राखियां भी खूब बिक रही हैं।

आदिवासी कारीगरों की बांस से बनी राखियों और कानपुर की मोती राखियों की भी मांग बढ़ी है। इन राखियों ने छोटे कारीगरों, स्वयं सहायता समूहों और महिला उद्यमियों के लिए कमाई के नए दरवाजे खोले हैं।

CAIT के राष्ट्रीय चेयरमैन बृजमोहन अग्रवाल ने व्यापारियों और ग्राहकों से त्योहारों में भारतीय उत्पादों को प्राथमिकता देने की अपील की है। उनका संदेश है—‘स्वदेशी अपनाएं, भारत मजबूत बनाएं।’

चीनी राखियां बाजार से बाहर

पिछले कुछ वर्षों में जिस बदलाव की आहट सुनाई दे रही थी, वह अब बाजार में साफ दिखाई दे रही है। चीनी राखियों की मांग लगभग खत्म हो चुकी है और दुकानों पर भारतीय राखियों ने उनकी जगह ले ली है।

CAIT अब देश के अलग-अलग शहरों में विशेष स्वदेशी मेले लगाने की तैयारी कर रहा है। इन मेलों में महिला उद्यमियों, स्वयं सहायता समूहों और स्थानीय कारीगरों को अपने हाथ से बनाए उत्पाद बेचने का मौका मिलेगा।

इस बदलाव का सीधा फायदा छोटे कारोबारियों और कुटीर उद्योगों को मिल रहा है। राखी का छोटा-सा धागा अब रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था से भी जुड़ गया है।

वृंदावन की विधवाओं की खास राखियां

इस साल एक भावुक पहल ने भी लोगों का ध्यान खींचा है। वृंदावन की विधवाओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए 1,100 से अधिक विशेष राखियां तैयार की हैं।

इन राखियों में सिर्फ धागा नहीं, बल्कि अपनापन, उम्मीद और सामाजिक जुड़ाव का संदेश भी है। यह परंपरा कई वर्षों से स्नेह और एकजुटता की मिसाल बनी हुई है।

राखी भेजने के लिए डाक विभाग ने भी बड़े शहरों में विशेष काउंटर लगाए हैं, ताकि दूर रहने वाले भाइयों तक समय पर राखियां पहुंच सकें।

रक्षाबंधन अभी एक सप्ताह से अधिक दूर है, लेकिन बाजारों में त्योहार का रंग चढ़ चुका है। इस बार राखी की कलाई पर प्यार के साथ स्वदेशी, कारीगरी, रोजगार और राष्ट्र गौरव का धागा भी बंधता नजर आ रहा है।

कहने को राखी कुछ इंच का धागा है, लेकिन इस बार उसका संदेश काफी लंबा है—अपना खरीदिए, स्थानीय को बढ़ाइए और भारत को आत्मनिर्भर बनाइए।

Monday, August 17, 2026

 


नई पीढ़ी को भा रही है धर्म की राह:

पहले बुढ़ापे में होती थी तीर्थ यात्रा, और अब, चाहे जब! 


नव _पुरातन वाद का उत्थान?

“The Resurgence of Neo-Traditionalism”

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बृज खंडेलवाल द्वारा

18 अगस्त 2026

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सुबह की ठंडी हवा में घंटियों की आवाज गूंजती है। दूर तक युवाओं के जत्थे दिखाई देते हैं। किसी के कंधे पर कांवर है, कोई नंगे पांव परिक्रमा कर रहा है, तो कोई दोस्तों के साथ भजन गाते हुए पहाड़ चढ़ रहा है। मोबाइल जेब में है, सेल्फी भी चल रही है और भगवान का नाम भी।

यही भारत की नई तीर्थयात्रा है।

धर्म अब केवल बुजुर्गों की चिंता नहीं रहा। आज का युवा मंदिर जा रहा है, परिक्रमा कर रहा है, कांवर उठा रहा है और कठिन यात्राओं में शामिल हो रहा है। मगर उसकी यात्रा का मकसद केवल पूजा नहीं है। इसमें आध्यात्मिक सुकून, सांस्कृतिक पहचान, दोस्ती, रोमांच और घूमने-फिरने का आनंद भी शामिल है।

यानी आस्था और पर्यटन का नया मेल सामने आ रहा है। बीयर के साथ भांग भी!

चारधाम, अमरनाथ, वैष्णो देवी, करौली माता यात्रा, श्री बांके बिहारी, नाथद्वारा दर्शन, सबरीमाला, वृंदावन और गोवर्धन की परिक्रमा में युवाओं की मौजूदगी अब आम बात है। सावन में गंगा जल लेकर शिव मंदिरों की ओर बढ़ते कांवरियों के जत्थों में बड़ी संख्या युवा चेहरों की होती है। लड़कियां भी शामिल हो रहीं हैं। मैसूर, ऋषिकेश के योग केंद्रों में गोरे विदेशियों के साथ भारतीय युवजन भी आस्था और नव_पुरातन संस्कृति में डुबकी लगा रहे हैं! 

इसे केवल धार्मिक उत्साह कहकर नजरअंदाज करना आसान होगा। मगर तस्वीर इससे कहीं बड़ी है।

धर्म की ओर क्यों लौट रहा है युवा?

आधुनिक जीवन ने सुविधाएं तो खूब दी हैं, लेकिन सुकून कम कर दिया है। नौकरी का दबाव, प्रतियोगिता, सोशल मीडिया की लगातार हलचल, रिश्तों में दूरी और अकेलापन युवा मन को थका रहे हैं।

ऐसे में मंदिर, आश्रम और तीर्थस्थल एक अलग दुनिया देते हैं। कुछ दिन मोबाइल और दफ्तर से दूरी, सुबह जल्दी उठना, पैदल चलना, भजन सुनना और हजारों लोगों के साथ समय बिताना मन को राहत देता है।

धर्म का यह नया आकर्षण युवाओं की पहचान से भी जुड़ रहा है। अपनी जड़ों, परंपराओं और संस्कृति को करीब से देखने की इच्छा बढ़ी है। सोशल मीडिया ने भी इसे हवा दी है। यात्रा की तस्वीरें, रील और वीडियो दूसरे युवाओं को भी इन रास्तों पर खींच रहे हैं।

एक तरह से धार्मिक यात्रा अब आस्था के साथ अनुभव की यात्रा बन रही है।

तीर्थ या थेरेपी?

लंबी पैदल यात्रा शरीर को सक्रिय रखती है। नियमित दिनचर्या मन को कुछ अनुशासन देती है। सामूहिक भजन और प्रार्थना अकेलेपन को कम कर सकते हैं।

गोवर्धन की 21 किलोमीटर परिक्रमा हो या सबरीमाला की कठिन चढ़ाई, शरीर पसीना बहाता है और मन एक लक्ष्य पर टिकता है। यात्रा पूरी होने के बाद मिलने वाला संतोष कई यात्रियों के लिए खास अनुभव बन जाता है।

कुंभ, माघ मेला और बड़े धार्मिक आयोजनों में भी सामूहिक स्नान, ध्यान, हवन, उपवास और भजन जैसी गतिविधियां लोगों को एक साझा माहौल देती हैं। कई लोगों को ऐसी यात्राओं के बाद मन हल्का और अधिक शांत महसूस होता है।

इसीलिए ‘पिलग्रिमेज थेरेपी’ की बात होने लगी है। हालांकि इसे किसी बीमारी का इलाज मानना सही नहीं होगा। मानसिक बीमारी होने पर डॉक्टर की सलाह और उपचार जरूरी है। लेकिन तनाव और रोजमर्रा की मानसिक थकान से राहत के लिए आध्यात्मिक वातावरण मददगार हो सकता है।


युवाओं की बढ़ती धार्मिक भागीदारी भारतीय समाज में एक बड़े बदलाव का संकेत भी है। धर्म अब निजी पूजा तक सीमित नहीं है। वह पहचान, सामाजिक जुड़ाव और सामूहिक उत्सव का हिस्सा बन रहा है।

कांवर यात्रा इसका बड़ा उदाहरण है। हजारों युवा एक साथ चलते हैं। रास्ते में संगीत है, नारे हैं, भोजन और सेवा शिविर हैं। दोस्ती है और सामूहिक जोश भी है।

इसी तरह वृंदावन और गोवर्धन में युवा भक्ति के साथ यात्रा का आनंद लेते हैं। मंदिर दर्शन के बाद बाजार, स्थानीय भोजन, संगीत और सांस्कृतिक स्थलों का अनुभव भी यात्रा का हिस्सा बन जाता है।

इंस्टा रील बनाने की धुन ने भी इस ट्रेंड को लोकप्रिय बनाया है। सोशल मीडिया पर धर्म, आस्था से जुड़े विडियोज की बाढ़ आ गई है। हर त्यौहार एक महा सेलिब्रेशन, अक्रॉस इंडिया बन चुका है।


तीर्थयात्रा अब बड़ा कारोबार भी है। होटल, धर्मशालाएं, टैक्सी, बसें, फूल, प्रसाद, पूजा सामग्री, स्थानीय भोजन और हस्तशिल्प से हजारों लोगों की रोजी जुड़ी है।

तिरुमला तिरुपति, वैष्णो देवी, शिरडी, काशी, वृंदावन और अयोध्या जैसे केंद्रों ने आसपास की अर्थव्यवस्था को नई रफ्तार दी है। बड़े धार्मिक आयोजनों में रेलवे, परिवहन, होटल और छोटे दुकानदारों को भी फायदा मिलता है।

डिजिटल दुनिया ने इसे और आसान बना दिया है। ऑनलाइन दर्शन, डिजिटल दान, पूजा बुकिंग और धार्मिक ऐप युवाओं को सुविधा दे रहे हैं।

सरकार भी धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा दे रही है। PRASAD जैसी योजनाओं का उद्देश्य तीर्थस्थलों की सुविधाएं और बुनियादी ढांचा बेहतर करना है।

लेकिन विकास का मतलब केवल चमकदार गलियां और बड़े कॉरिडोर नहीं होना चाहिए। साफ पानी, स्वच्छ शौचालय, सस्ता ठहराव, सुरक्षित रास्ते और कचरा प्रबंधन भी उतने ही जरूरी हैं।


बढ़ती धर्मयात्राओं का एक दूसरा पहलू भी है। जब आस्था पर्यटन और बाजार से जुड़ती है, तो खतरा रहता है कि श्रद्धा कहीं केवल कारोबार न बन जाए।

युवाओं को धार्मिक यात्रा में जगह मिलना अच्छी बात है। लेकिन धर्म के नाम पर नफरत, दिखावा और अंधविश्वास बढ़ना चिंता की बात होगी।

तीर्थ का मतलब केवल भीड़ बढ़ाना नहीं है। इसका मतलब मनुष्य को भीतर से बेहतर बनाना भी है।

युवा अगर मंदिर जा रहा है, तो उसे करुणा, सहिष्णुता और सेवा भी सीखनी चाहिए। अगर वह परिक्रमा कर रहा है, तो रास्ते में पड़े कूड़े को देखकर आंखें नहीं मूंदनी चाहिए। अगर वह नदी में स्नान कर रहा है, तो उसी नदी को गंदा करने से भी बचना चाहिए।

यही असली धार्मिकता होगी।

मंदिर तक जाने वाला रास्ता भीतर भी जाता है

भारत में तीर्थयात्रा का पुराना रास्ता फिर जवान हो रहा है। कांवर उठाते कंधे, पहाड़ चढ़ते कदम और परिक्रमा करते युवा इसके गवाह हैं।

आज का युवा शायद मोक्ष की तलाश में नहीं निकला है। वह सुकून खोज रहा है। वह अपनी जड़ों को समझना चाहता है। दोस्तों के साथ यात्रा करना चाहता है। कुछ दिन जिंदगी की भागदौड़ से दूर रहना चाहता है।

और हां, वह घूमना भी चाहता है।

इसलिए नई तीर्थयात्रा में धर्म भी है, पर्यटन भी; आस्था भी है और आनंद भी; शरीर की मेहनत भी है और मन की तलाश भी।

सवाल यह नहीं कि युवा धर्म की ओर क्यों लौट रहा है। बड़ा सवाल यह है कि धर्म उसे किस दिशा में ले जा रहा है।

अगर यह यात्रा उसे अधिक संवेदनशील, स्वस्थ, अनुशासित और सहिष्णु बनाती है, तो शायद तीर्थ सचमुच एक तरह की देसी थेरेपी बन सकता है।

पुरानी कहावत है: चलते रहो, रास्ता खुद रास्ता दिखाएगा।

शायद भारत के ये प्राचीन तीर्थमार्ग आज के युवा को यही रास्ता दिखा रहे हैं; भगवान तक पहुंचने का ही नहीं, बल्कि खुद तक लौटने का भी।

Saturday, August 15, 2026

 दक्षिण में आज़ादी का जश्न: विजय के संदेश से बदली तमिलनाडु की तस्वीर

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

चेन्नई, 16 अगस्त 2026

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भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस पर दक्षिण भारत देशभक्ति के रंग में रंगा नजर आया। तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक में तिरंगा फहराया गया, सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए और स्वतंत्रता सेनानियों को याद किया गया। 

लेकिन इस बार तमिलनाडु का समारोह खास रहा। वजह थी मुख्यमंत्री और अभिनेता से नेता बने विजय का पहला स्वतंत्रता दिवस संबोधन।

चेन्नई के ऐतिहासिक फोर्ट सेंट जॉर्ज में विजय ने राष्ट्रीय ध्वज फहराया और परेड की सलामी ली। खुली गाड़ी में परेड का निरीक्षण करते हुए उनका अंदाज किसी फिल्मी दृश्य से कम नहीं लगा। लेकिन असली ध्यान उनके भाषण पर रहा।

विजय ने कहा कि आज की असली आज़ादी केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं है। भ्रष्टाचार से मुक्ति भी उतनी ही जरूरी है। उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी सरकार के ‘मिशन मोड’ में काम करने की बात कही और साफ संदेश दिया कि सुशासन से कोई समझौता नहीं होगा।

उनका संदेश युवाओं पर भी केंद्रित था। विजय ने तमिलनाडु के युवाओं और दुनिया भर में बसे तमिल लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि राज्य के हितों की रक्षा उनकी प्राथमिकता है। जाति और धर्म की दीवारों से ऊपर उठकर समानता और सामाजिक न्याय को असली आज़ादी बताया।

समारोह में अभिनेत्री त्रिशा कृष्णन की मौजूदगी ने भी खूब सुर्खियां बटोरीं। वह विजय के माता-पिता के साथ अग्रिम पंक्ति में बैठी दिखाई दीं। विजय ने उन्हें और अपने माता-पिता को सलाम किया। यह भावुक दृश्य सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ।

तमिलनाडु से बाहर भी स्वतंत्रता दिवस पूरे उत्साह से मनाया गया। केरल में स्कूलों, सरकारी संस्थानों और विश्वविद्यालयों में ध्वजारोहण तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए। राज्य के स्कूलों के लिए जारी निर्देशों में विद्यार्थियों और कर्मचारियों की अधिकतम भागीदारी पर जोर दिया गया।

कर्नाटक में बेंगलुरु सहित विभिन्न शहरों में तिरंगा फहराया गया। विधानसभा और सरकारी इमारतों पर रोशनी की गई तथा देशभक्ति से जुड़े सांस्कृतिक आयोजन हुए। बेंगलुरु का प्रसिद्ध फ्रीडम जैम भी स्वतंत्रता दिवस की संगीत परंपरा का हिस्सा रहा है।

फिर भी दक्षिण के इस पूरे जश्न में तमिलनाडु और विजय सबसे ज्यादा चर्चा में रहे। अभिनेता से मुख्यमंत्री बने विजय के लिए यह केवल रस्मी परेड और भाषण नहीं था। यह उनके राजनीतिक सफर की नई पारी का सार्वजनिक ऐलान भी था।

उनकी भाषा में तमिल अस्मिता, युवा उम्मीद और भ्रष्टाचार के खिलाफ तेवर साफ दिखाई दिए। सवाल अब यही है कि मंच पर दिया गया यह जोशीला पैगाम ज़मीन पर कितनी तेजी से अमल में आता है।

केरल और कर्नाटक में भी 80वें स्वतंत्रता दिवस को देशभक्ति के जोश के साथ मनाया गया। कर्नाटक में मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने पहली बार मुख्यमंत्री के रूप में तिरंगा फहराया, बेंगलुरु में विधान सौध के सामने भव्य ‘फ्रीडम हब्बा’ का आयोजन हुआ जिसमें विविध सांस्कृतिक परंपराओं (यक्षगान, गरबा, ढोल-ताशा आदि) की परेड और कार्यक्रम शामिल थे, जबकि उत्तर कर्नाटक समेत विभिन्न जिलों में परेड, सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ और उपलब्धि हासिल करने वालों का सम्मान किया गया। केरल में मुख्यमंत्री वीडी सतीशन ने तिरुवनंतपुरम के सेंट्रल स्टेडियम में राष्ट्रीय ध्वज फहराया, जिला स्तर पर परेड और सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए, कोझिकोड में 10,000 आवाजों वाला गायन कार्यक्रम तथा महिलाओं की सुरक्षा को लेकर ‘रिसर्ज’ जैसी पहलें भी हुईं, हालांकि रिपोर्ट्स के मुताबिक, राज्य-स्तरीय समारोह में वंदे मातरम् नहीं गाया गया जिससे राजनीतिक चर्चा भी हुई।

 आंदोलन नहीं, आवेदन करो

बेरोजगारों की कतार: इनकी फिक्र किसे है?  

परिभाषाएं बदलीं, समस्या नहीं

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बृज खंडेलवाल  द्वारा 

16 अगस्त 2026

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पचास साल पहले बेरोजगार लोग एम्प्लॉयमेंट एक्सचेंज  के बाहर खड़े होते थे। आज वे कोचिंग सेंटरों, भर्ती वेबसाइटों और परीक्षा पोर्टलों के सामने खड़े हैं। जगह बदल गई है। इंतजार वही है। जॉब नहीं मिले, एम्प्लॉयमेंट news मिला।

तब कुछ क्लर्कों की नौकरियों के लिए हजारों आवेदन आते थे। आज भी हजारों,  अक्सर लाखों, उम्मीदवार कुछ सौ सरकारी पदों के लिए भिड़ते हैं। ग्रेजुएट चपरासी की नौकरी के लिए आवेदन करता है। पोस्ट ग्रेजुएट क्लर्क बनने की दौड़ में शामिल होता है। इंजीनियर ऐसी परीक्षा की तैयारी करता है जिसका उसके ज्ञान से कोई लेना-देना नहीं।

शिक्षा बढ़ी है। रोजगार उतनी तेजी से नहीं बढ़ा। और इन दोनों के बीच भारतीय युवा खड़ा है; एक हाथ में डिग्री और दूसरे में आवेदन-पत्र लेकर।


पुराना रोजगार कार्यालय अब इतिहास बन चुका है। उसकी जगह स्मार्टफोन ने ले ली है। युवा नौकरी पोर्टल पर रजिस्टर करता है, भर्ती ऐप डाउनलोड करता है, रिज्यूमे अपलोड करता है। रिजेक्शन भी अब डिजिटल हो गया है। इसे भी प्रगति ही कहिए।


सरकारी आंकड़ों में बेरोजगारी बेहतर दिखती है। लेकिन औसत आंकड़े बहुत कुछ छिपा लेते हैं। युवाओं में बेरोजगारी कहीं ज्यादा है। पढ़े-लिखे युवाओं के सामने समस्या और भी पेचीदा है।


मामला अब सिर्फ बेरोजगारी का नहीं। कम रोजगार, अधूरा रोजगार और अपनी योग्यता से नीचे का रोजगार भी बड़ा सवाल है। कोई काम कर रहा है, लेकिन कमाई इतनी नहीं कि अपने पैरों पर खड़ा हो सके। कोई नौकरी में है, लेकिन कल की गारंटी नहीं। कोई सालों से प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा है और परीक्षा बार-बार टल जाती है। भारतीय युवा ने इंतजार करने में शायद पीएचडी कर ली है।


भारत में सरकारी नौकरी का आकर्षण किसी धार्मिक आस्था से कम नहीं। नौकरी पक्की। इज्जत पक्की। छुट्टियां पक्की। भविष्य की चिंता कुछ कम। इसलिए 500 पदों पर लाखों आवेदन आ जाते हैं।


क्योंकि निजी नौकरी सिर्फ रोजगार देती है। सरकारी नौकरी रोजगार के साथ प्रतिष्ठा भी देती है। माता-पिता आज भी कहते हैं: “पहले सरकारी नौकरी की कोशिश करो।” मानो नियुक्ति-पत्र खानदानी विरासत हो।


युवा मामूली निजी नौकरी छोड़कर सरकारी परीक्षा की तैयारी में कई साल लगा देता है। उम्र बढ़ती है। प्रयास खत्म होते जाते हैं। एक दिन नौकरी की तैयारी ही उसका सबसे स्थायी रोजगार बन जाती है।


भारत ने करोड़ों पढ़े-लिखे युवाओं की फौज तैयार की है। डिग्रियां बढ़ीं। कॉलेज बढ़े। कोचिंग सेंटर और तेजी से बढ़े। हर कोई यूपीएससी, एसएससी, बैंकिंग, रेलवे, पुलिस या शिक्षक भर्ती की तैयारी कर रहा है।कई उम्मीदवार वर्षों लगा देते हैं ऐसी परीक्षाओं में, जहां पद ऊंट के मुंह में जीरा हैं।

कोचिंग उद्योग ने शानदार मॉडल खोज लिया है:  उम्मीद मत छोड़िए। फेल हुए? “अगली बार कोशिश कीजिए।”  फिर फेल? “रणनीति बदलिए।”  फिर भी फेल? “सफलता बस आने वाली है।”  सफलता जरूर आती है; अक्सर कोचिंग बेचने वाले की।

डिग्री नौकरी नहीं है। शिक्षा व्यवस्था की बड़ी विडंबना यह है कि उसने युवाओं को परीक्षा पास करना सिखाया है, समस्या हल करना नहीं। बच्चा परिभाषाएं याद करता है, उत्तर रटता है, प्रमाणपत्र जमा करता है। फिर कंपनी पूछती है: “आप बात कर सकते हैं? टीम के साथ काम कर सकते हैं? व्यावहारिक समस्या हल कर सकते हैं?”

सन्नाटा।


फिर गिग इकोनॉमी आई। कहा गया,मोबाइल उठाइए और डिलीवरी कीजिए, गाड़ी चलाइए, फ्रीलांस कीजिए। खूबी है लचीलापन। दिक्कत यह है कि लचीली आमदनी इतनी लचीली होती है कि अगले महीने का भरोसा नहीं रहता।


तकनीक ने नए अवसर पैदा किए हैं। उसने असुरक्षित रोजगार के लिए नई शब्दावली भी दी है। पहले अस्थायी या दिहाड़ी कहते थे। अब “गिग वर्क” कहते हैं। नाम आधुनिक हो गया। अनिश्चितता उतनी नहीं।


जब युवा नौकरियों के लिए संघर्ष सीख ही रहा था, एआई मैदान में उतर आया। नई नौकरियां पैदा करेगा, उत्पादकता बढ़ाएगा। लेकिन कई दोहराव वाले काम भी निगल सकता है।युवा अक्सर पहली सीढ़ी से शुरुआत करता है। वहीं अनुभव मिलता है। अगर एआई ने पहली सीढ़ी हटा दी तो ऊपर कौन पहुंचेगा?

कल के युवा को डिग्री, कौशल और एआई को सही आदेश देने की कला; तीनों चाहिए।


रोजगार की कहानी महिलाओं के बिना अधूरी है। शिक्षा और भागीदारी बढ़ी है, फिर भी बड़ा अंतर बना हुआ है। बाधाएं पुरानी हैं, बिना वेतन वाला घर का काम, सुरक्षा, बच्चों की देखभाल, सामाजिक दबाव।

विडंबना देखिए। हम कहते हैं: लड़कियों को पढ़ाओ। फिर पूछते हैं; नौकरी क्यों करनी है? हम कहते हैं; आत्मनिर्भर बनाओ। फिर पूछते हैं; घर कौन संभालेगा।


रोजगार योजनाओं की कमी नहीं: कौशल विकास, स्वरोजगार, उद्यमिता, अप्रेंटिसशिप, ग्रामीण रोजगार, ऋण, प्रशिक्षण, पोर्टल। कभी-कभी लगता है हर चीज के लिए योजना है, बस उसे सफल बनाने की योजना नहीं।

असली सवाल सीधा होना चाहिए: कितने लोगों को अच्छी नौकरी मिली? प्रशिक्षण और प्रमाणपत्र नहीं। स्थायी और सम्मानजनक रोजगार गिनिए। वहीं असली हिसाब होगा।


ग्रामीण बेरोजगारी ने रूप बदल लिया है। खेती सबको रोजगार नहीं दे सकती। युवा गांव छोड़कर शहर जा रहे हैं। सपने लेकर आते हैं। शहर किराया और ट्रैफिक का बिल थमा देता है।


प्रवास बुरा नहीं। मजबूरी में किया गया पलायन अलग बात है। युवा शहर इसलिए जाए कि वहां अवसर हैं; इसलिए नहीं कि गांव में कुछ बचा ही नहीं है। अगर गांव युवाओं को खो दें और शहर सम्मानजनक काम न दे पाएं, तो दोनों जगह हार होगी।


सरकारें योजनाएं घोषित करती हैं। विश्वविद्यालय डिग्रियां बांटते हैं। कंपनियां कौशल मांगती हैं। कोचिंग सेंटर उम्मीद बेचते हैं। माता-पिता फीस भरते हैं। युवा आवेदन करता रहता है।

भारत को एक और नारा नहीं, ईमानदार रोजगार नीति चाहिए। श्रम-प्रधान उद्योग बढ़ाने होंगे। अप्रेंटिसशिप मजबूत करनी होगी। व्यावसायिक शिक्षा बेहतर बनानी होगी। छोटे कारोबार को बढ़ने देना होगा। महिलाओं के लिए सुरक्षित रोजगार बढ़ाने होंगे।

सबसे जरूरी, प्रशिक्षण की संख्या नहीं, नौकरी की संख्या गिननी होगी। प्रमाणपत्र से किराया नहीं भरता। पोर्टल से घर नहीं चलता।

नौकरी मांगने वाला युवा बहुत बड़ी मांग नहीं कर रहा। वह चाहता है: एक काम, उचित वेतन और थोड़ी इज्जत।

कतार अब डिजिटल हो गई है। आवेदन एक क्लिक में चला जाता है। रिज्यूमे एआई बना देता है। लेकिन सवाल आज भी इंसानी है; जब एक पढ़ा-लिखा भारतीय युवा नौकरी मांगते हुए दरवाजे पर दस्तक देता है, तो दरवाजा खोलने की जिम्मेदारी किसकी है?  और अगर कोई दरवाजा नहीं खोलता, तो वह दस्तक कब तक देता रहेगा?