Wednesday, June 10, 2026

 


धार्मिक स्थलों को उन्मादी भीड़ से बचाओ

तीर्थ स्थान या थीम पार्क?

रीलबाज़ों, सेल्फीबाज़ों और धार्मिक पर्यटन की भीड़ ने पवित्र स्थलों का क्या हाल कर दिया है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

12 जून 2026

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क्या भगवान अब भक्तों से मिलते हैं या कैमरे के लेंस से?

क्या तीर्थयात्रा अब आत्मा की यात्रा है या इंस्टाग्राम की स्टोरी?

इन दिनों किसी भी पवित्र धाम का दृश्य देख लीजिए। वृंदावन हो, केदारनाथ हो, बद्रीनाथ हो या वैष्णो देवी। ऐसा लगता है जैसे किसी धार्मिक स्थल पर नहीं, बल्कि किसी मेले, पिकनिक स्पॉट या मनोरंजन पार्क में पहुँच गए हों। हाथ में माला कम, मोबाइल ज्यादा हैं। भक्ति कम, रील ज्यादा है। श्रद्धा कम, प्रदर्शन ज्यादा है।

भारत की प्राचीन परंपरा में तीर्थयात्रा जीवन के उत्तरार्ध का विषय मानी जाती थी। जब व्यक्ति संसार के मोह-माया, दौड़-धूप और महत्वाकांक्षाओं से कुछ दूरी बनाता था, तब वह ईश्वर की ओर मुड़ता था। साठ वर्ष की आयु के बाद वानप्रस्थ और आध्यात्मिक जीवन की परिकल्पना यूँ ही नहीं की गई थी। इसके पीछे गहरा सामाजिक और मनोवैज्ञानिक अनुभव था।

लेकिन आज तस्वीर उलट गई है।

कॉलेज से छुट्टी मिली नहीं कि चलो वृंदावन। नई कार खरीदी नहीं कि चलो चारधाम। शादी की सालगिरह है तो केदारनाथ।  हनीमून, चलो तिरुपति जी के दर्शन से शुरू करें, वेरी गुड idea!! जन्मदिन है तो महाकाल। मंदिर अब मन की शांति के स्थान नहीं रहे, बल्कि "चेक-इन" करने और सोशल मीडिया पर दिखाने के मंच बनते जा रहे हैं।

इन धार्मिक स्थलों पर पहुँचने वाली विशाल युवा भीड़ अपने साथ क्या ला रही है?

प्लास्टिक की बोतलें। चिप्स के पैकेट। डिस्पोज़ेबल कप। लाउडस्पीकर जैसी आवाजें। सड़क किनारे फैला कचरा। शराब की खाली बोतलें। सेल्फी के लिए धक्का-मुक्की। ऊँची आवाज में फिल्मी गाने। और सबसे बढ़कर, पवित्रता के प्रति उदासीनता।

हिमालय के नाज़ुक पारिस्थितिकी तंत्र पर इसका असर साफ दिख रहा है। पहाड़ कूड़ेदान बन रहे हैं। नदियाँ प्लास्टिक से भर रही हैं। तीर्थ मार्गों पर कूड़े के ढेर लग रहे हैं। जहाँ कभी घंटियों और मंत्रों की ध्वनि सुनाई देती थी, वहाँ अब मोबाइल नोटिफिकेशन और रीलों का शोर गूँजता है।

भक्ति अब एक उपभोक्ता उत्पाद बन गई है।

एक पैकेज टूर खरीदिए। हेलीकॉप्टर से दर्शन कीजिए। पाँच मिनट मंदिर में बिताइए। दस सेल्फियाँ लीजिए। फिर लौटकर घोषणा कर दीजिए कि आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त हो गया।

यह आध्यात्मिकता नहीं है। यह धार्मिक उपभोक्तावाद है।

कड़वा लग सकता है, लेकिन शायद समय आ गया है कि हम एक असहज प्रश्न पूछें। क्या सभी तीर्थस्थल पर्यटन के लिए खुले रहने चाहिए? क्या हर धार्मिक स्थल को मनोरंजन और अवकाश उद्योग का हिस्सा बना देना चाहिए?

शायद नहीं।

देश के प्रमुख तीर्थस्थलों पर आयु-आधारित प्रतिबंधों पर गंभीर बहस होनी चाहिए। कम से कम पचास या साठ वर्ष से कम आयु के लोगों की सामान्य पर्यटक एंट्री सीमित की जा सकती है। विशेष धार्मिक, शैक्षिक या पारिवारिक कारणों को छोड़कर तीर्थस्थलों को वरिष्ठ नागरिकों और वास्तविक साधकों के लिए प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

यह किसी पीढ़ी के खिलाफ युद्ध नहीं होगा। बल्कि पवित्र स्थलों की गरिमा बचाने का प्रयास होगा।

युवाओं के लिए घूमने-फिरने के हजार विकल्प हैं। पहाड़ हैं। समुद्र तट हैं। ट्रैकिंग है। खेल हैं। सांस्कृतिक यात्राएँ हैं। रोमांचक पर्यटन है। जीवन का आनंद लीजिए। दुनिया देखिए। काम कीजिए। सपने पूरे कीजिए।

लेकिन हर जगह को पर्यटन स्थल बना देना बुद्धिमानी नहीं है।

कुछ स्थान ऐसे भी होने चाहिए जहाँ शांति हो। मौन हो। ध्यान हो। अनुशासन हो। जहाँ लोग फोटो खिंचवाने नहीं, आत्मचिंतन करने जाएँ।

आज वृंदावन की गलियाँ, गंगा के घाट, हिमालय के धाम और अनेक मंदिर उस भीड़ के बोझ तले कराह रहे हैं जो दर्शन से अधिक प्रदर्शन में विश्वास करती है। यह "टच एंड गो" संस्कृति तीर्थों को आध्यात्मिक केंद्रों से मनोरंजन केंद्रों में बदल रही है।

यदि अभी नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ियाँ मंदिर तो देखेंगी, लेकिन उनकी आत्मा खो चुकी होगी।

तीर्थ यात्रा कोई वीकेंड पिकनिक नहीं है। यह मन की तैयारी, अनुशासन, संयम और श्रद्धा की यात्रा है।

जब तक हम इस अंतर को नहीं समझेंगे, तब तक हमारे पवित्र स्थल भीड़ तो जुटाएँगे, लेकिन भक्ति नहीं। श्रद्धालु तो आएँगे, लेकिन शांति नहीं। मंदिर तो बचेंगे, मगर उनकी मर्यादा धीरे-धीरे भीड़ के पैरों तले कुचलती चली जाएगी।

 10 जून 2026

बैडमिंटन लंदन में 

जब माई लार्ड बैडमिंटन खेलने विलायत गए!!!


बृज खंडेलवाल द्वारा 


भारत की न्याय व्यवस्था का पेंडिंग, लंबित मामलों का पहाड़ किसी अजूबे से कम नहीं। पांच करोड़ से अधिक मुकदमे अदालतों की अलमारियों और कंप्यूटरों में धूल फांक रहे हैं।


विचाराधीन कैदी अपनी संभावित सजा से भी ज्यादा समय जेलों में काट देते हैं। किसान, मजदूर, पीड़ित महिलाएं और आम नागरिक एक तारीख से दूसरी तारीख तक भटकते रहते हैं। कई मामलों में न्याय तब मिलता है, जब पीड़ित के बाल सफेद हो चुके होते हैं और अगली पीढ़ी जवान हो जाती है।


लेकिन इस विशाल बोझ तले दबे देश के मुख्य न्यायाधीश लंदन में हैं। बैडमिंटन कोर्ट पर। रैकेट हाथ में, शटलकॉक हवा में, पांच लाख रुपये की पुरस्कार राशि दांव पर, और पूरा आयोजन पूरे शबाब पर।


वही न्यायपालिका, जिसने कभी बेरोजगार युवाओं को "कॉकरोच" कहकर संबोधित किया था, अब न्याय की हथौड़ी छोड़ रैकेट थामे हुए है। अदालतों की फाइलें धूल खाती रहें, लेकिन स्मैश शानदार होने चाहिए।

दृश्य वाकई मनमोहक है। चतुर गुणी जन कहते हैं हमारी महान  न्यायपालिका पूरी तरह स्वतंत्र दिखाई देती है: जवाबदेही से, तात्कालिकता से, और कभी-कभी तो भारतीय धरती से भी। लगभग डेढ़ सौ न्यायाधीश और वरिष्ठ वकील लंदन पहुंच गए। किसी न्यायिक सुधार सम्मेलन के लिए नहीं। लंबित मामलों के एवरेस्ट जैसे संकट पर मंथन करने के लिए नहीं। बल्कि शटलकॉक कूटनीति के लिए।

और कानून मंत्री किरेन रिजिजू? उनका काम न्याय व्यवस्था की चरमराती मशीनरी को दुरुस्त करना है। मगर वे भी इस खेल महोत्सव का हिस्सा बने। लंदन पहुंचे, टूर्नामेंट का उद्घाटन किया, और शामें भारत को "विश्वगुरु" बनाने की चर्चाओं में बिताईं। रैलियों, स्वागत समारोहों और सौहार्दपूर्ण मुलाकातों के बीच भविष्य के भारत का खाका भी खींचा गया।

ज़रा कल्पना कीजिए। दिन में बैडमिंटन, रात में नेटवर्किंग। कार्यपालिका और न्यायपालिका विदेशी धरती पर इतने आत्मीय भाव से साथ दिख रही हैं कि शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत भी शायद दर्शक दीर्घा में बैठकर असहज महसूस कर रहा हो।

न्याय भले ही आंखों पर पट्टी बांधता हो, लेकिन वह फिटनेस के मामले में पूरी तरह सजग दिखाई देता है। चुस्त, फुर्तीला और पांच करोड़ लंबित मामलों की मूक पुकारों को अनसुना करने की अद्भुत क्षमता से लैस।

इस भव्य रंगमंच में असली विजेता कौन हैं? शटलकॉक।

और पराजित? वे करोड़ों भारतीय जो अब भी यह भोली उम्मीद लगाए बैठे हैं कि अदालतों में न्याय सिर्फ मिलेगा ही नहीं, समय पर भी मिलेगा।

खेल खत्म। सेट पूरा। और जीत एक बार फिर बैकलॉग के नाम।


Tuesday, June 9, 2026

 क्या भारत की एग्जाम फैक्ट्री कॉकरोच पैदा कर रही है!

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भारत का 58,000 करोड़ रुपये का कोचिंग उद्योग बच्चों को बचा भी रहा है और बर्बाद भी.....

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

10 जून 2026

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पहले जमाने में, कमजोर बच्चों को प्राइवेट ट्यूशन की जरूरत पड़ती थी, अब हर किसी को......

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भारत की शिक्षा व्यवस्था के अंधेरे गलियारों में आखिर रेंगता क्या है?

सपने? महत्वाकांक्षाएं? उम्मीदें?

या फिर कुछ और?

आधी रात को मेज पर झुका एक टीनएजर । लाल आंखें। थका हुआ शरीर। सामने बिखरे टेस्ट पेपर। दूसरी ओर माता-पिता, जो कोचिंग की फीस भरने के लिए कर्ज़ और कुर्बानियों का हिसाब लगा रहे हैं। बच्चे, जो खुद को इंसान नहीं, बल्कि एक रैंक और प्रतिशत के रूप में देखने लगे हैं।

कोचिंग उद्योग इसे तैयारी कहता है।

बहुत से छात्र इसे जद्दोजहद और जीवित रहने की लड़ाई कहते हैं।

जून 2026 में पटना की सड़कों पर जो कुछ हुआ, उसने इस विरोधाभास को नंगा कर दिया। खान ग्लोबल स्टडीज़ के बाहर विरोध प्रदर्शन, तोड़फोड़, आरोप और प्रत्यारोपों का तूफान उठ खड़ा हुआ। सोशल मीडिया गरज उठा। नेता भी मैदान में कूद पड़े।

और उधर दिल्ली के जंतर मंतर पर कॉकरोचों का अजीब प्रदर्शन!

यह सिर्फ एक स्थानीय विवाद नहीं था। यह भारत के कोचिंग उद्योग की आत्मा की एक झलक थी।

एक ऐसी दुनिया, जहां कुछ शिक्षक फिल्मी सितारों जैसी लोकप्रियता रखते हैं। जहां शैक्षणिक संस्थान कॉरपोरेट साम्राज्य की तरह काम करते हैं। जहां प्रतिस्पर्धा, मुनाफा और जवाबदेही की कमी आपस में टकराती है। और जहां सबसे बड़ी कीमत अक्सर छात्रों को चुकानी पड़ती है।

सवाल असहज है।

कैसा है ये समाज जो अपने सोलह साल के बच्चे से कहता है कि अगले दो साल उसकी पूरी जिंदगी की कीमत तय करेंगे?

कैसे कुछ लोग इस विश्वास के इर्द-गिर्द 58,000 करोड़ रुपये का उद्योग खड़ा कर देते हैं?

कोचिंग अब शिक्षा का सहायक साधन नहीं रही। यह समानांतर शिक्षा व्यवस्था बन चुकी है। सात करोड़ से अधिक छात्र किसी न किसी रूप में कोचिंग से जुड़े हुए हैं। अनुमान है कि अगले कुछ वर्षों में यह उद्योग 1.3 लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा पार कर सकता है।

आंकड़े इस दीवानगी की वजह बताते हैं।

हर साल 11 लाख से अधिक छात्र जेईई की परीक्षा देते हैं। करीब 20 लाख छात्र नीट में बैठते हैं। देश के प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश पाने की संभावना कई बार पांच प्रतिशत से भी कम होती है।

जब मुकाबला इतना बेरहम हो, तो माता-पिता केवल स्कूलों पर भरोसा करना छोड़ देते हैं।

वे अपने बच्चों को कोटा भेजते हैं। पटना भेजते हैं। सीकर भेजते हैं। हैदराबाद भेजते हैं। ऐसे छात्रावासों में, जहां जिंदगी व्हाइटबोर्ड, रैंकिंग, टेस्ट और प्रदर्शन चार्ट के बीच सिमट जाती है।

कोचिंग उद्योग का उभार कोई हादसा नहीं था। यह उस शिक्षा व्यवस्था का स्वाभाविक नतीजा है जो योग्यता का वादा तो करती है, मगर कई बार लॉटरी जैसी महसूस होती है। करोड़ों मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए आईआईटी या एम्स का प्रवेश पत्र आर्थिक असुरक्षा से मुक्ति का सुनहरा टिकट माना जाता है।

स्कूल अब भी रटने को पुरस्कृत करते हैं। प्रतियोगी परीक्षाएं तेजी, रणनीति और विशेष कौशल मांगती हैं। कक्षा और परीक्षा कक्ष के बीच एक विशाल खाई मौजूद है।

कोचिंग उद्योग उस खाई को भरने आया था। फिर उसे एहसास हुआ कि यही खाई उसकी सबसे बड़ी कमाई बन सकती है।

तकनीक ने इस कारोबार को और विस्तार दिया है। ऑनलाइन कक्षाएं, रिकॉर्डेड लेक्चर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और व्यक्तिगत शिक्षण उपकरणों ने कोचिंग को महानगरों की सीमाओं से बाहर पहुंचा दिया है। अब छोटे शहर का छात्र भी वही व्याख्यान सुन सकता है जो दिल्ली या मुंबई का छात्र सुनता है।

उद्योग इसे लोकतंत्रीकरण कहता है।

आलोचक इसे बाज़ारीकरण कहते हैं।

दोनों में कुछ न कुछ सच्चाई है।

लेकिन इस उद्योग के सबसे काले अध्याय तब सामने आते हैं जब भारी दबाव और भारी पैसा एक साथ मिलते हैं।

नीट पेपर लीक कांड पूरे देश को झकझोर गया। जांच में ऐसे नेटवर्क सामने आए जो परीक्षा केंद्रों से कहीं आगे तक फैले थे। वर्षों से मेहनत कर रहे छात्रों को अचानक महसूस हुआ कि जिस व्यवस्था पर उन्होंने भरोसा किया था, वह भीतर से खोखली भी हो सकती है।

नुकसान केवल प्रश्नपत्र लीक होने का नहीं था।

भरोसा भी लीक हो गया था।

सुर्खियों से दूर कुछ और त्रासदियां भी हैं।

'डमी एडमिशन' अब आम बात बन चुकी है। छात्र स्कूलों में सिर्फ कागजों पर नामांकित रहते हैं, जबकि उनका अधिकांश समय कोचिंग संस्थानों में गुजरता है। कक्षाएं खाली होती जाती हैं। स्कूलों की भूमिका कमजोर पड़ती जाती है।

फिर आती है मानसिक स्वास्थ्य की समस्या।

चिंता। अवसाद। अकेलापन। थकान।

छात्र समीकरण हल करना सीखते हैं।

निराशा से निपटना नहीं।

असमानता का पहलू भी कम चिंताजनक नहीं है। संपन्न परिवार महंगी कोचिंग, निजी मार्गदर्शन और अनगिनत टेस्ट सीरीज़ खरीद सकते हैं। गरीब परिवारों के बच्चे वही लड़ाई कहीं कम संसाधनों के साथ लड़ते हैं।

कागज पर दौड़ सबके लिए समान है।

हकीकत में कुछ धावकों के पैरों में पहले से ही बोझ बंधा होता है।

समाधान कोचिंग संस्थानों को खलनायक घोषित करने में नहीं है। वे इसलिए पैदा हुए क्योंकि व्यवस्था ने उनकी जरूरत पैदा की।

असली सुधार कहीं और है।

आईआईटी, एम्स और अच्छे सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में सीटें बढ़ाई जाएं। प्रवेश परीक्षाओं को रटंत प्रणाली से हटाकर समझ और विश्लेषण पर आधारित बनाया जाए। कोचिंग संस्थानों को अपनी वास्तविक सफलता दर सार्वजनिक करने के लिए बाध्य किया जाए। स्कूलों को इतना मजबूत बनाया जाए कि कोचिंग शिक्षा का विकल्प नहीं, सहयोगी बने।

सबसे महत्वपूर्ण बात, छात्र के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को नीति के केंद्र में रखा जाए।

भारत का कोचिंग उद्योग जल्द खत्म होने वाला नहीं है। जिन आकांक्षाओं को वह पोषित करता है, वे वास्तविक हैं। जिस प्रतिस्पर्धा से वह छात्रों को लड़ने में मदद करता है, वह भी वास्तविक है।

लेकिन एक ऐसा देश, जो अपने बच्चों के सपनों को 58,000 करोड़ रुपये की परीक्षा मशीन के हवाले कर देता है, उसे खुद से एक कठिन सवाल पूछना चाहिए।

क्या सफलता की हमारी परिभाषा इतनी संकरी हो गई है कि पूरी एक पीढ़ी यह मान बैठी है कि जिंदगी एक रैंक से शुरू होती है और उसी पर खत्म?

शिक्षा का उद्देश्य नागरिक, चिंतक और नवप्रवर्तक तैयार करना था।

अगर हम सावधान नहीं हुए, तो यह व्यवस्था ऐसे लाखों थके हुए युवाओं को जन्म देगी जो परीक्षा की भूलभुलैया में दौड़ना तो जानते हैं, मगर जीवन का रास्ता भूल चुके होंगे।


Monday, June 8, 2026

 पेड़ों की आवाज़ कौन बनेगा जब प्रगति दस्तक देगी?

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 लंबे समय से हरित प्रहरी लड़ रहे हैं, और कई जंगें जीत भी चुके हैं, लेकिन अब अदालतों को पर्यावरणविद खटकते हैं!

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

9 जून, 2026

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जब जेसीबी और  बुलडोज़र तरक्की का परचम लेकर आएं ,  तब नदियों, जंगलों, वन्यजीवों और आने वाली नस्लों की तरफ़ से कौन बोलेगा?

और अगर पर्यावरण की हिफाज़त करने वालों को ही तरक्की का दुश्मन समझ लिया जाए, तो फिर प्रकृति की पैरवी कौन करेगा?

ये सवाल आज इसलिए और अहम हो गए हैं क्योंकि 11 मई 2026 को प्रस्तावित पीपावाव बंदरगाह विस्तार परियोजना की सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत ने पर्यावरण कार्यकर्ताओं की भूमिका पर सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि क्या पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने कभी किसी विकास परियोजना का स्वागत किया है? साथ ही यह चिंता भी जताई कि मुकदमेबाज़ी विकास की रफ्तार रोक रही है।

इन टिप्पणियों पर देशभर के 600 से अधिक नागरिकों, पर्यावरण संगठनों, शिक्षाविदों और सेवानिवृत्त अधिकारियों ने एतराज़ जताया। उन्होंने इन टिप्पणियों को परेशान करने वाला बताया और उन्हें वापस लेने की मांग की।

उनकी चिंता वाजिब है।

पर्यावरण आंदोलन कुछ पेशेवर प्रदर्शनकारियों का शौक नहीं है। इसकी जड़ें भारत के संविधान और लोकतांत्रिक परंपराओं में गहराई तक मौजूद हैं। संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को जीवन का अधिकार देता है, जिसमें स्वच्छ और स्वस्थ पर्यावरण का अधिकार भी शामिल है। संविधान राज्य और नागरिकों दोनों को देश की प्राकृतिक विरासत की रक्षा करने का दायित्व भी सौंपता है।

इतिहास गवाह है कि कई बार पर्यावरण कार्यकर्ता सही साबित हुए हैं।

सत्तर के दशक में हिमालयी क्षेत्र में चला चिपको आंदोलन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। गांवों की महिलाओं ने पेड़ों से लिपटकर उनकी कटाई रोकी। उस समय उन्हें विकास विरोधी कहा गया था। आज वही लोग पर्यावरण संरक्षण के अग्रदूत माने जाते हैं। उनके संघर्ष ने भारत की वन नीति को नई दिशा दी।

कर्नाटक में अप्पिको आंदोलन ने भी यही संदेश दिया। स्थानीय समुदायों ने अंधाधुंध कटाई का विरोध किया और टिकाऊ वन प्रबंधन की पैरवी की। केरल में साइलेंट वैली वर्षावन को बचाने के लिए नागरिकों, वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों ने लंबी लड़ाई लड़ी। अगर वे हार जाते, तो भारत की सबसे समृद्ध जैव विविधता वाली धरोहरों में से एक हमेशा के लिए मिट सकती थी।

भारत के आदिवासी समुदायों ने भी प्रकृति की हिफाज़त में अहम भूमिका निभाई है। उन्होंने देश को याद दिलाया कि जंगल सिर्फ़ लकड़ी और खनिजों के भंडार नहीं हैं। वे जीवित संसार हैं, जो समाज, संस्कृति और पारिस्थितिकी को सहारा देते हैं।

नर्मदा बचाओ आंदोलन सभी बांध परियोजनाओं को नहीं रोक सका, लेकिन उसने विस्थापन, पुनर्वास और पर्यावरणीय प्रभाव जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बना दिया।

पर्यावरण आंदोलनों ने कई बार कॉरपोरेट लापरवाही का भी पर्दाफाश किया है।

केरल के प्लाचीमाडा में ग्रामीणों ने कोका-कोला के बॉटलिंग प्लांट पर भूजल के दोहन और स्थानीय संसाधनों को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया। वर्षों के संघर्ष के बाद संयंत्र बंद हुआ।

तमिलनाडु के तूतीकोरिन में लोगों ने स्टरलाइट कॉपर संयंत्र के खिलाफ प्रदूषण को लेकर आंदोलन किया। बाद की जांचों और अदालती कार्यवाहियों ने उनकी कई आशंकाओं को सही साबित किया।

हाथियों के संरक्षण के लिए दायर एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के ऊटी क्षेत्र में स्थित सिगुर पठार हाथी गलियारे को बचाने का ऐतिहासिक फैसला दिया। रिसॉर्टों और अवैध निर्माणों से घिरे इस मार्ग को अदालत ने हाथियों का "आवागमन का अधिकार" मानते हुए अतिक्रमण हटाने के आदेश दिए। यह फैसला पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण के इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाता है।

वृंदावन में भी पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने कई विवादास्पद परियोजनाओं के खिलाफ अदालतों में सफल लड़ाइयां लड़ी हैं।

शायद भारत की सबसे प्रसिद्ध पर्यावरणीय कानूनी जीत ताजमहल से जुड़ी है।

सत्तर के दशक में मथुरा में तेल रिफाइनरी लगाने के प्रस्ताव का पर्यावरणविदों ने विरोध किया था। उन्हें डर था कि इससे ताजमहल को नुकसान पहुंचेगा। बाद में पर्यावरण वकील एम.सी. मेहता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। उन्होंने दलील दी कि आगरा के आसपास का औद्योगिक प्रदूषण ताजमहल के संगमरमर को नुकसान पहुंचा रहा है।

वैज्ञानिक अध्ययनों ने उनकी बात की तस्दीक की। अदालत ने ताज ट्रेपेजियम ज़ोन का गठन किया, उद्योगों को स्वच्छ ईंधन अपनाने के निर्देश दिए और कई प्रदूषणकारी इकाइयों को स्थानांतरित कराया।

आज शायद ही कोई कहे कि ताजमहल को बचाना विकास विरोधी कदम था। इसे भारत की सबसे बड़ी पर्यावरणीय सफलताओं में गिना जाता है।

मैसूर की चामुंडी पहाड़ियों का मामला भी ऐसा ही है। वहां प्रस्तावित रोपवे परियोजना का पर्यावरणविदों, विरासत विशेषज्ञों, स्थानीय निवासियों और सांस्कृतिक संगठनों ने विरोध किया। उनकी चिंताएं वनों की कटाई, मिट्टी के कटाव और धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत के व्यावसायीकरण को लेकर थीं। जनविरोध के चलते सरकारों को कई बार अपने फैसले पर पुनर्विचार करना पड़ा।

बार-बार पर्यावरण आंदोलनों ने एक शुरुआती चेतावनी प्रणाली का काम किया है।

उन्होंने कुएं सूखने से पहले भूजल संकट की चेतावनी दी। उन्होंने स्वास्थ्य संकट पैदा होने से पहले प्रदूषण के खतरे बताए। उन्होंने आपदा आने से पहले पारिस्थितिक जोखिमों की ओर ध्यान दिलाया।

असल खतरा तब पैदा होता है जब हर पर्यावरणीय चिंता को विकास का दुश्मन बताकर खारिज कर दिया जाता है। इससे वैज्ञानिकों, नागरिकों, वकीलों और स्थानीय समुदायों की आवाज़ दब सकती है। सवाल पूछने का लोकतांत्रिक हक़ कमज़ोर पड़ सकता है।

भारत का पर्यावरणीय इतिहास हमें एक सीधी-सी सीख देता है।

विकास और पर्यावरण दुश्मन नहीं हैं। दोनों एक-दूसरे के साझेदार हैं। सबसे सफल परियोजनाएं वही होती हैं जो प्रकृति की सीमाओं का सम्मान करती हैं, स्थानीय समुदायों की रक्षा करती हैं और दूरगामी सोच के साथ आगे बढ़ती हैं।

जलवायु परिवर्तन, जल संकट और प्रदूषण के बढ़ते दौर में भारत को पर्यावरणीय सतर्कता की ज़रूरत पहले से कहीं ज़्यादा है।

कठिन सवाल पूछने वालों को चुप नहीं कराया जाना चाहिए। उनकी बात सुनी जानी चाहिए।

भारत की सबसे बड़ी पर्यावरणीय जीतें इसलिए संभव हुईं क्योंकि आम नागरिक खामोश नहीं बैठे। उन्होंने ताकतवर हितों को चुनौती दी, सरकारी फैसलों पर सवाल उठाए और यह आग्रह किया कि विकास की कीमत अपूरणीय विनाश नहीं हो सकती।

यह रुकावट नहीं है।

यही लोकतंत्र का असली काम है।

Saturday, June 6, 2026

 मौत का लाइसेंस

ये हादसे नहीं, हस्ताक्षरित हत्याएँ हैं 

मौत आती नहीं, बुलाई जाती है निगरानी की नाकामी और जवाबदेही की कब्र पर खड़ा भारत

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"ये हादसे नहीं, प्रशासनिक हत्याएँ हैं"

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

8 जून 2026

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आगरा चौपाटी पर झूले का जिप लॉक खुला, एक नौजवान ने स्वर्ग की यात्रा शुरू की। बेलनगंज क्षेत्र में मकान खुदाई में पूरी बैंक धंस गई।आए दिन जूता फैक्ट्रियों में आग लग रही है, घटिया मेंटिनेंस से लिफ्टों में लोग फंस रहे हैं। एक्सप्रेसवे पर डेली हादसों की संख्या गिनती से बाहर हो चली है। इस क्रूर व्यवस्था के चंगुल से बाहर सिर्फ नेता हैं, जो इत्तेफाकन हमेशा उठावनी या मृत्यु भोज में ही पहुंचते हैं।

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रात गहरी होती है। शहर सो जाता है। लेकिन कहीं न कहीं एक इमारत ऐसी होती है जो आग का इंतजार कर रही होती है। कोई पुल होता है जो अपने आख़िरी सहारे पर टिका होता है। किसी फैक्ट्री का बॉयलर अपनी सीमा पार कर चुका होता है। किसी गोदाम में नियमों की धज्जियाँ उड़ रही होती हैं। और किसी सरकारी फाइल पर वह आखिरी हस्ताक्षर हो चुका होता है जो सुनिश्चित करता है कि हादसा होने पर भी जिम्मेदार कोई नहीं होगा।

फिर सुबह अखबारों में खबर छपती है।

हम उसे "दुर्घटना" कहते हैं।

लेकिन सच यह है कि यह दुर्घटना नहीं होती। यह एक लंबी प्रक्रिया का अंतिम दृश्य होता है। एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें लालच, लापरवाही और मिलीभगत वर्षों तक साथ-साथ चलते हैं।

चार दशक पहले भोपाल गैस त्रासदी ने दुनिया को झकझोर दिया था। हजारों लोग जहरीली गैस के बादलों में घुटकर मर गए। दुनिया ने उस त्रासदी से सबक लिया। सुरक्षा नियम मजबूत हुए। कॉर्पोरेट जवाबदेही पर नए मानदंड बने।

भारत ने क्या सीखा?

यह सवाल आज भी उतना ही असहज है जितना 1984 में था।

मौत कभी अचानक नहीं आती

दिल्ली के एक होटल में इक्कीस लोग जिंदा जल गए। बाद में पता चला कि छह कमरों के लाइसेंस पर पच्चीस कमरे चल रहे थे। फायर एनओसी नहीं थी। निकास द्वार अवरुद्ध थे। खिड़कियां बंद थीं। निरीक्षण भी हुए थे। कागज भी पूरे थे। फाइलें भी चलती रहीं।

बस सुरक्षा कहीं नहीं थी।

जब आग लगी तो लोगों के पास बचने का रास्ता नहीं था।

इसे दुर्घटना कहना सच्चाई से भागना है। यह मौत को पहले से दिया गया निमंत्रण था।

छत्तीसगढ़ के बिजली संयंत्र में बॉयलर फटा। मजदूर मारे गए। गुजरात के मोरबी में मरम्मत के बाद खोला गया पुल टूट गया और 135 लोग नदी में समा गए। राजकोट के गेमिंग ज़ोन में आग लगी तो अवैध निर्माण की परतें खुलने लगीं। महाराष्ट्र और पंजाब में जहरीली शराब गरीबों की जान लेती रही।

घटनाएं अलग-अलग थीं।

कारण एक ही था।

नियमों को बोझ समझने वाली व्यवस्था।

इतिहास बार-बार चेतावनी देता है

1995 में हरियाणा के डबवाली में स्कूल समारोह के दौरान पंडाल में आग लगी। तीन सौ से अधिक लोग मारे गए। अधिकांश बच्चे थे।

1997 में दिल्ली के उपहार सिनेमा में 59 लोग फिल्म देखने गए थे। वे लौटकर घर नहीं आए। बंद निकास, अवैध निर्माण और सुरक्षा नियमों की अनदेखी ने उन्हें मौत के हवाले कर दिया।

2001 में तमिलनाडु के एरवाडी में मानसिक रोगियों को जंजीरों से बांधकर रखा गया था। आग लगी तो वे भाग भी नहीं सके। 28 लोग जिंदा जल गए।

2004 में कुंभकोणम के स्कूल में फूस की छत और संकरी सीढ़ियां 94 बच्चों की चिता बन गईं।

2011 में कोलकाता का एएमआरआई अस्पताल, जो जीवन बचाने के लिए बना था, खुद मौत का जाल बन गया। 95 लोगों की दम घुटने से मौत हुई।

हर बार जांच बैठी।

हर बार रिपोर्ट आई।

हर बार वादे किए गए।

और हर बार कुछ महीनों बाद सब कुछ सामान्य हो गया, मानो कुछ हुआ ही न हो।

सिवाकासी की पटाखा फैक्ट्रियां आज भी समय-समय पर फटती हैं। अखबारों में तस्वीरें छपती हैं। नेता संवेदना व्यक्त करते हैं। मुआवजे घोषित होते हैं। फिर वही पुराना खेल शुरू हो जाता है।

एक राष्ट्रीय बीमारी

इसे मैं "भोपाल त्रासदी सिंड्रोम" कहता हूं।

यह कोई चिकित्सकीय बीमारी नहीं है। यह हमारी प्रशासनिक संस्कृति का स्थायी रोग है।

इसके लक्षण बेहद परिचित हैं।

नियमों को विकास विरोधी बताओ।

निरीक्षण को आय का स्रोत बना दो।

शिकायतों को फाइलों में दबा दो।

चेतावनियों को नजरअंदाज करो।

हादसा होने दो।

फिर जांच समिति बना दो।

कुछ छोटे अधिकारियों को निलंबित कर दो।

मुआवजे की घोषणा कर दो।

और अगले हादसे का इंतजार करो।

इस पूरी प्रक्रिया में वे लोग शायद ही कभी पकड़े जाते हैं जिन्होंने अवैध निर्माण को संरक्षण दिया, जिन्होंने एनओसी को व्यापार बना दिया, जिन्होंने जहरीली शराब या असुरक्षित फैक्ट्रियों को राजनीतिक और प्रशासनिक छतरी प्रदान की।

व्यवस्था के बड़े खिलाड़ी अक्सर बच निकलते हैं।

बलि हमेशा छोटे लोग चढ़ते हैं।

बयान कभी नहीं बदलते

देश बदल गया।

तकनीक बदल गई।

सरकारें बदल गईं।

लेकिन हर त्रासदी के बाद सुनाई देने वाले वाक्य नहीं बदले।

"दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।"

"उच्च स्तरीय जांच के आदेश दे दिए गए हैं।"

"मृतकों के परिजनों को उचित मुआवजा दिया जाएगा।"

इन वाक्यों को सुनते-सुनते देश की कई पीढ़ियां बड़ी हो चुकी हैं।

भोपाल ने दुनिया को सिखाया था कि सुरक्षा पर खर्च किया गया पैसा कभी व्यर्थ नहीं जाता।

हमने उससे शायद एक अलग ही सबक सीखा।

कि समय सबसे बड़ा क्लीनर है।

कुछ साल बीत जाएंगे।

जनता भूल जाएगी।

मीडिया नया विषय ढूंढ लेगा।

फाइलों पर धूल जम जाएगी।

और दोषी फिर किसी नई फाइल पर हस्ताक्षर कर रहे होंगे।

आखिर कब तक?

जब बिना फायर एनओसी के होटल चलते हैं, जब अवैध मंजिलें खड़ी होती हैं, जब पुलों का निरीक्षण केवल कागजों पर होता है, जब फैक्ट्रियां सुरक्षा नियमों को मजाक समझती हैं, तब मौत अचानक नहीं आती।

उसे बुलाया जाता है।

उसके लिए रास्ता बनाया जाता है।

इन मौतों को "दुर्घटना" कहना एक राष्ट्रीय आत्म-छल है।

इनके जन्म प्रमाण पत्र पर पहले से ही लालच, भ्रष्टाचार और मिलीभगत के हस्ताक्षर दर्ज होते हैं।

जब तक बड़े संरक्षक बचते रहेंगे और छोटे कर्मचारी बलि के बकरे बनते रहेंगे, तब तक हर आग, हर ढहती इमारत, हर जहरीली बोतल और हर टूटा पुल हमें एक ही बात याद दिलाता रहेगा: 

मौत नई होती है।

लापरवाही पुरानी होती है।

शव बदल जाते हैं।

व्यवस्था नहीं।

और शायद यही इस देश की सबसे बड़ी त्रासदी है कि भोपाल कभी गया ही नहीं।


Friday, June 5, 2026

 


भगवा लहर या सभ्यतागत बदलाव?

असम और बंगाल की जीत ने बदल दी भारतीय राजनीति की दिशा

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

6 जून 2026

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इतिहास हर रोज़ नहीं बदलता। कभी-कभी एक चुनाव ऐसा मोड़ लेकर आता है जो आने वाले दशकों की दिशा तय कर देता है। 2026 के विधानसभा चुनावों में असम और पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की बड़ी जीत को उसके समर्थक ऐसे ही एक मोड़ के रूप में देख रहे हैं।

उनका मानना है कि यह सिर्फ सरकार बदलने की कहानी नहीं है। यह उस लंबे राजनीतिक और सांस्कृतिक सफर का नया पड़ाव है जो सदियों पहले शुरू हुआ था।

भारत ने लगभग आठ सौ वर्षों तक पहले मुस्लिम सल्तनतों और बाद में ब्रिटिश हुकूमत का दौर देखा। आज़ादी के बाद सत्ता भारतीय हाथों में आई, लेकिन राजनीति का केंद्र लंबे समय तक कांग्रेस के इर्द-गिर्द रहा। भाजपा और उसके समर्थकों का आरोप रहा है कि समय के साथ धर्मनिरपेक्षता का मतलब संतुलन नहीं, बल्कि अल्पसंख्यक तुष्टीकरण बन गया। उनका कहना है कि बहुसंख्यक समाज की सांस्कृतिक पहचान को अक्सर संकोच और अपराधबोध के साथ देखने की कोशिश की गई।

असम और बंगाल के नतीजे इस सोच के खिलाफ जनता के फैसले के रूप में पेश किए जा रहे हैं।

पश्चिम बंगाल में भाजपा ने अभूतपूर्व प्रदर्शन करते हुए दो सौ से अधिक सीटें जीत लीं। एक दशक पहले तक राज्य में उसकी मौजूदगी लगभग नगण्य थी। दूसरी ओर, ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस, जो वर्षों से बंगाल की राजनीति पर छाई हुई थी, बुरी तरह सिमट गई।

असम में भी भाजपा ने लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल की। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा के नेतृत्व में पार्टी ने अपना जनाधार और मजबूत किया। यह जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि असम में पहचान, घुसपैठ और स्थानीय संस्कृति जैसे मुद्दे लंबे समय से राजनीतिक बहस के केंद्र में रहे हैं।

इन चुनाव परिणामों ने 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद उभरी उस धारणा को भी कमजोर किया है जिसमें कहा जा रहा था कि भाजपा का प्रभाव घट रहा है। भले ही पार्टी को लोकसभा में पहले से कम सीटें मिली थीं, लेकिन उसके बाद हुए कई राज्यों के चुनावों ने दिखाया कि उसका संगठन और जनाधार अब भी मजबूत है।

भाजपा की सफलता के पीछे केवल सांस्कृतिक मुद्दे ही नहीं हैं। पार्टी ने पिछले वर्षों में गरीबों के लिए आवास, गैस कनेक्शन, शौचालय, स्वास्थ्य बीमा और बुनियादी सुविधाओं की योजनाओं को भी बड़े पैमाने पर आगे बढ़ाया। समर्थकों का तर्क है कि सांस्कृतिक आत्मविश्वास और विकास की राजनीति का यह मेल भाजपा की सबसे बड़ी ताकत बन गया है।

वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी ने बंगाल के परिणाम को "वैचारिक भूकंप" बताया है। उनके अनुसार यह चुनाव दिखाता है कि हिंदू पहचान और सनातन परंपराओं को अब राजनीतिक विमर्श के केंद्र से बाहर नहीं रखा जा सकता। उनका कहना है कि केवल भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही इस विचारधारा का विश्वसनीय प्रतिनिधित्व करते हैं।

हालांकि आलोचक इस दावे से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि लोकतंत्र में किसी भी एक विचारधारा का वर्चस्व स्वस्थ नहीं माना जा सकता। लेकिन यह भी सच है कि आज भारतीय राजनीति में सांस्कृतिक पहचान का सवाल पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।

दक्षिण भारत में भी राजनीतिक बदलाव के संकेत दिखाई दे रहे हैं। तमिलनाडु में द्रविड़ राजनीति को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जबकि केरल में भी पारंपरिक राजनीतिक समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं। भले ही भाजपा अभी वहां सत्ता से दूर हो, लेकिन उसकी मौजूदगी पहले की तुलना में कहीं अधिक दिखाई देने लगी है।

भारत की राजनीति अब पहले जैसी नहीं रही। जाति, वर्ग और क्षेत्रीय समीकरणों के साथ-साथ धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान भी चुनावी फैसलों को प्रभावित कर रही है। यही वजह है कि भाजपा का संदेश देश के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग रूपों में असर डाल रहा है।

बंगाल की जीत का असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ सकता है। यह राज्य लंबे समय से विपक्ष का एक बड़ा गढ़ माना जाता था। यदि भाजपा वहां स्थायी रूप से अपनी जड़ें जमा लेती है, तो विपक्षी गठबंधनों की रणनीति पर गहरा असर पड़ सकता है।

लेकिन इतना तय है कि असम और बंगाल के चुनावों ने एक नया संदेश दिया है। भारत का एक बड़ा वर्ग अब अपनी सांस्कृतिक पहचान को खुलकर राजनीतिक अभिव्यक्ति देने लगा है। भाजपा के समर्थक इसे सभ्यतागत पुनर्जागरण कहते हैं, जबकि आलोचक इसे राजनीतिक ध्रुवीकरण का परिणाम मानते हैं।

सच जो भी हो, भारतीय राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है। और फिलहाल ऐसा लगता है कि भगवा राजनीति केवल चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि एक लंबी वैचारिक यात्रा का हिस्सा बन चुकी है

Thursday, June 4, 2026

 वो रात जब रोशनी टिकी रही

अंधेरे से आत्मनिर्भरता तक: भारत की सौर क्रांति की गाथा

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

5 जून 2026

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सावित्री देवी को वह शाम आज भी याद है जब उनकी बेटी ने किताब पढ़ते समय आंखें सिकोड़ना बंद कर दिया था।

उत्तराखंड के एक छोटे से पहाड़ी गांव में वर्षों तक बारह साल की प्रिया मिट्टी के तेल की ढिबरी के सामने बैठकर पढ़ती थी। पीली, कांपती हुई लौ। धुएं से भरा कमरा। आंखों में जलन। कई बार तेल खत्म हो जाता और पढ़ाई भी।

फिर पिछले साल उनकी छत पर एक सौर पैनल लग गया।

"पहली रात वह बल्ब को ही देखती रह गई," सावित्री हंसते हुए बताती हैं। "उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि रोशनी यूं ही बनी रहेगी।"

रोशनी बनी रही।

आज प्रिया अपनी कक्षा में अव्वल आई है और डॉक्टर बनने का सपना देख रही है।

यह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं है। यह उस भारत की कहानी है जहां कभी अंधेरा ही उस की पहचान थी और अब उजाला बदलाव का प्रतीक बन रहा है।

हिमालय की दुर्गम घाटियों से लेकर राजस्थान के तपते रेगिस्तान तक, गांवों की तस्वीर बदल रही है। छतों पर चमकते सौर पैनल दिखाई देते हैं। पंचायत भवनों के बाहर सौर लाइटें जगमगाती हैं। स्वास्थ्य केंद्र, स्कूल, आंगनबाड़ी और सामुदायिक भवन सौर ऊर्जा से रोशन हो रहे हैं। घरों में इन्वर्टर, बैटरियां और सोलर लैम्प आम होते जा रहे हैं।

जहां कभी शाम ढलते ही जिंदगी ठहर जाती थी, वहां अब रात भी काम और पढ़ाई का समय बन रही है।

कर्नाटक के नांजानगुड़ कस्बे के पास एक गांव में मीरा नाम की दर्जिन पहले सूर्यास्त के साथ अपना काम समेट देती थीं। बिजली का कोई भरोसा नहीं था। कभी आती, कभी नहीं। कई बार वोल्टेज इतना तेज होता कि मशीन खराब हो जाती। फिर सरकारी योजना के तहत उन्हें सोलर इन्वर्टर और बैटरी सिस्टम मिला।

अब वह रात नौ-दस बजे तक सिलाई करती हैं। उनकी आमदनी लगभग दोगुनी हो गई है। उन्होंने अपनी भतीजी को भी काम पर रख लिया है।

वह मुस्कुराकर कहती हैं, "पहले मैं सूरज के पीछे भागती थी, अब सूरज मेरे लिए काम करता है।"

यह एक साधारण-सा मजाक है, लेकिन इसके पीछे भारत की बड़ी ऊर्जा कहानी छिपी है।

दशकों तक भारत की अर्थव्यवस्था आयातित तेल और गैस पर निर्भर रही। आज भी देश अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। दुनिया में कहीं युद्ध छिड़े या तेल उत्पादक देशों में संकट आए, असर भारत के पेट्रोल पंपों और रसोईघरों तक पहुंच जाता है।

यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने ऊर्जा आत्मनिर्भरता को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया है।

इस बदलाव का सबसे विशाल प्रतीक गुजरात के कच्छ के रण में दिखाई देता है।

जहां कभी केवल नमक, रेत और वीरानी थी, वहां आज दुनिया की सबसे बड़ी नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं में से एक आकार ले रही है। लगभग 72,600 हेक्टेयर में फैला खावड़ा रिन्यूएबल एनर्जी पार्क भविष्य में 30 गीगावाट बिजली उत्पादन करने की क्षमता रखेगा।

यह इतनी बिजली होगी कि लगभग डेढ़ से दो करोड़ घर रोशन हो सकें।

सौर पैनलों की अंतहीन कतारें। दूर-दूर तक घूमती पवन चक्कियां। और उनके बीच बहती रेगिस्तानी हवा।

एक इंजीनियर ने वहां काम करते हुए कहा था, "ऐसा लगता है जैसे भविष्य यहां बाकी दुनिया से पहले आ गया हो।"

लेकिन इस क्रांति का असली अर्थ उन लोगों की जिंदगी में दिखाई देता है जिनके लिए बिजली कभी एक विलासिता थी।

बिहार के किसान मिथलेश की समस्या रोशनी नहीं, पानी थी। डीजल पंप चलाने में खर्च बहुत आता था। कभी सिंचाई करते, कभी खर्च बचाते। दोनों साथ संभव नहीं थे।

सरकारी सहायता से उन्होंने अपने खेत में सोलर पंप लगवाया।

आज उनकी सिंचाई लगभग मुफ्त है। इस वर्ष उन्होंने दूसरी फसल भी उगाई है। हरे-भरे खेत को देखते हुए वह कहते हैं, "मुझे लगा था यह भी किसी सरकारी वादे जैसा होगा। लेकिन यह चल रहा है, और अच्छी तरह चल रहा है।"

देशभर में ऐसी लाखों कहानियां जन्म ले रही हैं।

आंध्र के रमेश रेड्डी जो एक इंजीनियर हैं, कहते हैं, "लद्दाख में विशाल सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाएं विकसित हो रही हैं। राजस्थान अपनी सौर क्षमता बढ़ा रहा है। तमिलनाडु, कर्नाटक और मध्य प्रदेश में बड़े नवीकरणीय ऊर्जा पार्क बन रहे हैं। गुजरात और तमिलनाडु के समुद्री तटों पर अपतटीय पवन ऊर्जा परियोजनाओं की तैयारी चल रही है।"

ऊर्जा विशेषज्ञ बताते हैं कि भारत अब हरित हाइड्रोजन के क्षेत्र में भी बड़ा दांव लगा रहा है। 2030 तक प्रतिवर्ष 50 लाख टन ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। रिलायंस, अडानी, एनटीपीसी और ओएनजीसी जैसी कंपनियां इस दिशा में भारी निवेश कर रही हैं।

नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता 190 गीगावाट से आगे निकल चुकी है। पीएम सूर्य घर और पीएम-कुसुम जैसी योजनाएं लाखों परिवारों और किसानों तक सौर ऊर्जा पहुंचा रही हैं।

चुनौतियां अभी भी हैं। भंडारण तकनीक महंगी है। कई क्षेत्रों में बिजली ग्रिड कमजोर है। हर गांव तक चौबीसों घंटे भरोसेमंद बिजली पहुंचाने का सफर अभी अधूरा है।

लेकिन बदलाव शुरू हो चुका है।

दूरस्थ स्वास्थ्य केंद्रों में अब टीके सुरक्षित रखे जा सकते हैं। दुकानदार देर तक दुकानें खोलते हैं। बच्चे रात में पढ़ते हैं। महिलाएं अतिरिक्त काम कर आय बढ़ा रही हैं। किसान कम लागत में अधिक उत्पादन कर रहे हैं।

और उत्तराखंड की वह लड़की, प्रिया?

वह अब रात के खाने के बाद पढ़ती है। एक ऐसे बल्ब की रोशनी में जो कांपता नहीं। जो बुझता नहीं। जो हर शाम उसे यह भरोसा देता है कि उसके सपनों का रास्ता अब अंधेरे में नहीं खोएगा।

भारत की सौर क्रांति की असली कहानी शायद गीगावाट, निवेश और सरकारी योजनाओं में नहीं छिपी है।

वह उस स्थिर रोशनी में दिखाई देती है जो पहली बार करोड़ों लोगों के घरों, खेतों और सपनों में टिक गई है।