Wednesday, May 13, 2026

 क्यों डूब रहे हैं यमुना में लोग?

लापरवाही या साजिश? 

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

15 मई 2026

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गर्मियों की शाम को यमुना किनारे का माहौल बेहद आकर्षक होता है। ठंडी हवा, परिवारों की चहल-पहल, बच्चों की हँसी-खिलखिलाहट और नदी का शांत बहाव: सब कुछ मन को सुकून देता है। 

लेकिन यही यमुना अचानक अपना रौद्र रूप दिखा देती है। ऊपर से शांत दिखता पानी नीचे तेज़ धारा और खतरनाक भंवर छिपाए रखता है। 

12 मई 2026 को आगरा के एक घाट पर ठीक यही हुआ। एक परिवार जन्मदिन की खुशी मना रहा था। छह युवा नदी में नहाने उतरे। शुरू में पानी घुटनों तक था, सब हँस रहे थे, वीडियो बना रहे थे। लेकिन कुछ कदम आगे बढ़ते ही पैर फिसले, पानी गहरा हो गया और तेज़ धारा ने चार जिंदगियों को निगल लिया।

मृतकों में 22 वर्षीय कन्हा सिंह, 19 वर्षीय महक कुमारी, 17 वर्षीय रिया और मात्र 13 वर्षीय विक्की सिंह शामिल थे। दो लोग बच गए—उनमें महक और अंशु भाई-बहन थे। एक भाई अपनी बहन को डूबते देख रहा हो, यह दृश्य कल्पना से परे है। पुलिस और गोताखोरों ने दो घंटे तक रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया, लेकिन परिवार की खुशियाँ लौट नहीं सकीं।

यह कोई पहली घटना नहीं है। कुछ हफ्ते पहले अप्रैल 2026 में वृंदावन के केशी घाट के पास एक बड़ा नाव हादसा हुआ। पंजाब से आए तीर्थयात्रियों से भरी नाव (लगभग 30-37 लोग) पोंटून पुल से टकराकर पलट गई। क्षमता से ज्यादा सवारियाँ, लाइफ जैकेट्स की कमी: इन सबके चलते 15-16 लोगों की जान चली गई। कई शव घंटों बाद मिले। ऐसे हादसे आगरा, मथुरा और वृंदावन के इलाके में हर गर्मी में दोहराते रहते हैं—नहाते समय, सेल्फी लेते समय या नाव पलटने से।

क्यों बार-बार होती हैं ये त्रासदियाँ?

पहला बड़ा कारण: घाटों पर सुरक्षा की भयानक कमी। चेतावनी बोर्ड अक्सर टूटे या फीके पड़े रहते हैं। लाइफगार्ड की तैनाती न के बराबर। बैरिकेडिंग अधूरी, गहरे पानी की सही मार्किंग नहीं। पुलिस गश्त अनियमित। कई घाटों पर कोई सिस्टम नहीं जो नदी की अचानक बदलती धारा के बारे में लोगों को सचेत कर सके। बल्केश्वर घाट पर भी यही हुआ: शुरुआती उथला पानी लोगों को गुमराह कर गया।

दूसरा कारण: नदी का बदला हुआ स्वरूप। यमुना अब अपनी पुरानी प्राकृतिक अवस्था में नहीं है। अनियंत्रित रेत खनन (sand mining) ने नदी के तल को गहरा और अनियमित बना दिया है। अचानक गड्ढे बन गए हैं, कटाव बढ़ा है और रेत खिसकती रहती है। बैराजों (जैसे हथनीकुंड, वजीराबाद आदि) से अचानक पानी छोड़े जाने से धारा तेज़ हो जाती है। ऊपर शांत दिखने वाला पानी नीचे बहुत तेज़ गति से बहता है। अध्ययनों में पाया गया है कि रेत खनन नदी के flow regime को बदल देता है, जिससे localized high-velocity currents बनते हैं, जो तैराकों के लिए घातक साबित होते हैं।

तीसरा कारण: मानवीय लापरवाही।शराब पीकर नदी में उतरना, बच्चों को बिना निगरानी छोड़ देना, गहराई का अंदाज़ा न लगाना और सबसे बड़ा, सेल्फी का खतरनाक जुनून। युवा अक्सर उथले पानी से आगे बढ़ जाते हैं, बिना यह सोचे कि नीचे क्या छिपा है। नावों में भी क्षमता से ज्यादा भीड़, लाइफ जैकेट न पहनना और बोटमैन की लापरवाही आम है। केशी घाट हादसे में यही देखा गया; नाव पोंटून से टकराई क्योंकि नियंत्रण नहीं था।

चौथा कारण: विकास बनाम सुरक्षा का असंतुलन। आगरा-मथुरा-वृंदावन धार्मिक पर्यटन के बड़े केंद्र हैं। करोड़ों रुपये घाटों को सजाने, लाइटें लगाने और पर्यटकों को आकर्षित करने में खर्च हो रहे हैं। लेकिन सुरक्षा इंतजाम अभी भी भगवान भरोसे हैं। श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ रही है, पर उनकी जान-माल की सुरक्षा पर पर्याप्त ध्यान नहीं। हर हादसे के बाद “जांच होगी, सुरक्षा बढ़ेगी” जैसे बयान आते हैं, लेकिन कुछ दिनों बाद सब भूल जाता है।

क्या कहते हैं आंकड़े और वास्तविकता?

इस इलाके में हर साल गर्मियों में कई मौतें होती हैं। कुछ मामलों में अचानक पानी बढ़ने या कीचड़,  sludge में फंसने से भी हादसे हुए हैं। राष्ट्रीय स्तर पर भारत में डूबने से होने वाली मौतों में बच्चों और युवाओं का बड़ा हिस्सा होता है, और नदियों के किनारे की लापरवाही इसका प्रमुख कारण है। यमुना में प्रदूषण तो अलग मुद्दा है, लेकिन safety के लिहाज से यह “मौत का दरवाजा” बन चुकी है।

सरकारी स्तर पर तत्काल कदम जरूरी हैं:

- हर घाट पर मजबूत बैरिकेडिंग, स्पष्ट गहराई मार्किंग और रियल-टाइम धारा चेतावनी सिस्टम।

- प्रशिक्षित लाइफगार्ड और गोताखोरों की स्थायी तैनाती।

- नाव संचालन के लिए सख्त नियम: क्षमता सीमा, लाइफ जैकेट अनिवार्य, बोट फिटनेस सर्टिफिकेट और CCTV निगरानी।

- रेत खनन पर सख्त नियंत्रण और नदी तल का वैज्ञानिक अध्ययन।

लेकिन सिर्फ सरकारी कार्रवाई काफी नहीं। सामाजिक जागरूकता भी उतनी ही जरूरी है। नदी कोई पिकनिक स्पॉट नहीं है। परिवारों को बच्चों को अकेले पानी में नहीं जाने देना चाहिए। गहराई जांचे बिना न उतरें। स्थानीय चेतावनियों को नजरअंदाज न करें। नाव में हमेशा लाइफ जैकेट पहनें।

यमुना हमारी संस्कृति और आस्था का अभिन्न अंग है। भगवान कृष्ण की लीला से जुड़ी यह नदी श्रद्धा का प्रतीक है। लेकिन आस्था का मतलब आँखें बंद करके खतरे में कूदना नहीं। सावधानी भी श्रद्धा का ही हिस्सा है। जब तक हम व्यक्तिगत जिम्मेदारी और सामूहिक सतर्कता नहीं अपनाएंगे, यमुना का पानी दर्पण की जगह मौत का आईना बनता रहेगा।

ये त्रासदियाँ हमें याद दिलाती हैं कि प्रकृति के साथ खिलवाड़ और लापरवाही की कीमत इंसान को अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है। अब वक्त है कि हम सिर्फ शोक व्यक्त न करें, बल्कि ठोस बदलाव लाएँ—ताकि कोई और परिवार इस यमुना के छलावे का शिकार न बने।

Tuesday, May 12, 2026

 


आगरा: सभ्यता का शहर या अव्यवस्था का दलदल?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

14 मई 2026

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तीन सांसद, एक दर्जन विधायक, सौ पार्षद और एक मेयर बताएं, "कैसे एक ऐसा शहर, जिसने दुनिया को ताजमहल जैसा अजूबा दिया, खुद इंसानों के लिए सज़ा बनता जा रहा है?"

कैसे मुगल तहज़ीब, नफ़ासत और खूबसूरती का प्रतीक शहर आज धुएँ, शोर, ट्रैफिक जाम, टूटी सड़कों, कब्ज़ों, आवारा पशुओं और प्रशासनिक लापरवाही के नीचे दम तोड़ रहा है?

और क्या यह हमारे दौर की सबसे बड़ी विडंबना नहीं कि दुनिया भर से लोग ताजमहल देखने आते हैं, लेकिन आगरा की सड़कों पर चलना  पानीपत की युद्धभूमि पार करने जैसा अनुभव बन जाता है?

लोकल सिविल सोसाइटी लीडर्स मानते हैं कि आगरा अब केवल भीड़भाड़ वाला शहर नहीं रहा। यह धीरे धीरे एक सभ्यतागत दलदल में बदलता जा रहा है। ऐसा शहर, जहाँ विकास का मतलब केवल गाड़ियाँ बढ़ाना, फ्लाईओवर बनाना और इंसानों को किनारे करना रह गया है।

दिक्कत यह नहीं कि शहर बढ़ रहा है। हर शहर बढ़ता है। असली त्रासदी यह है कि आगरा बिना सोच, बिना योजना और बिना इंसानी संवेदनाओं के फैल रहा है।

हर सुबह लाखों लोग ऐसी सड़कों पर निकलते हैं जहाँ पैदल चलना किसी जोखिम से कम नहीं। फुटपाथ या तो हैं नहीं, या टूटे पड़े हैं, या दुकानदारों और ठेलों ने कब्ज़ा कर रखा है। जहाँ थोड़ी जगह बचती है, वहाँ मोटरसाइकिलें और कारें पार्क मिलती हैं। मजबूर होकर लोग सड़क पर चलते हैं, जहाँ बसें, ट्रक, ई रिक्शा, बाइक और तेज रफ्तार कारें हर पल उन्हें निगलने को तैयार रहती हैं।

"कमज़ोर आदमी यहाँ ट्रैफिक में नहीं चलता, बस बचने की कोशिश करता है," पद्मिनी अय्यर, एक सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा।

बुज़ुर्ग घर से निकलने से डरते हैं। बच्चे सड़क पार करना सीखने से पहले खतरा पहचानना सीख जाते हैं। महिलाओं के लिए रास्ता केवल सफर नहीं, संघर्ष बन चुका है। साइकिल चलाने वाला आदमी तो मानो शहर की नज़रों में गुनहगार हो, एक जूता फैक्ट्री वर्कर ने कहा। 

यह शहरीकरण नहीं, संगठित अव्यवस्था है।

सुप्रीम कोर्ट ने मई 2025 में साफ कहा कि बाधारहित और दिव्यांग अनुकूल फुटपाथ नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है। लेकिन आगरा जैसे शहरों में यह फैसला भी दीवार पर टंगे एक और सरकारी नारे की तरह रह गया। स्थानीय प्रशासन अब भी फुटपाथ को इंसानों की जरूरत नहीं, खाली पड़ी ज़मीन मानता है।

विडंबना देखिए। विदेशों से आने वाले पर्यटक उन शहरों से आते हैं जहाँ पैदल चलना सभ्यता की निशानी माना जाता है। आगरा में पैदल चलना जान जोखिम में डालने जैसा है। एक विदेशी पर्यटक ने कहा कि यहाँ केवल बेलगाम वाहन ही नहीं, बल्कि आवारा कुत्ते और पशु भी सड़कों को खतरनाक बनाते हैं। 

आगरा की हालत अचानक नहीं बिगड़ी। यह दशकों की गलत नीतियों और लापरवाही का नतीजा है।

जनसंख्या पचास लाख के करीब पहुँच रही है। दो मिलियन से ज्यादा वाहन सड़कों पर दौड़ रहे हैं। लेकिन सड़कें वही पुरानी, संकरी और थकी हुई हैं। ऊपर से मेट्रो निर्माण, टूटे पुल, अवैध पार्किंग, अतिक्रमण, अव्यवस्थित बाजार और बेतरतीब ट्रैफिक ने शहर को स्थायी जाम में बदल दिया है।

सिकंदरा का इलाका हर दिन घुटता है। बेलनगंज क्षेत्र के बाजारों में आधी सड़क पार्किंग निगल जाती है। हॉर्न अब आगरा की नई भाषा बन चुका है। धुआँ और धूल शहर की पहचान बनते जा रहे हैं।

सबसे दुखद बात यह है कि समाधान भी वही पुराने हैं। सड़क चौड़ी करो। फ्लाईओवर बना दो। और गाड़ियाँ आने दो। फिर अगला जाम झेलो।

असल बीमारी सोच में है। शहर अब इंसानों के लिए नहीं, वाहनों के लिए डिज़ाइन हो रहे हैं। नगर नियोजन का मकसद इंसानी गरिमा नहीं, ट्रैफिक का बहाव और ठेकेदारी बचा है।

यमुना किनारा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। ताजमहल से वाटर वर्क्स तक का इलाका दुनिया के सबसे खूबसूरत वॉकिंग कॉरिडोर में बदल सकता था। पेड़ों से घिरे रास्ते, साइकिल ट्रैक, घाट, सांस्कृतिक स्थल और नदी के मनोरम दृश्य आगरा की पहचान बन सकते थे। लेकिन वहाँ धूल, कब्ज़े, टूटे फुटपाथ और प्रशासनिक उदासीनता पसरी हुई है। ट्रांसपोर्ट कंपनीज ने हालत और खराब कर दी है।

जिस सभ्यता ने कभी नदी किनारे बेमिसाल वास्तुकला खड़ी की, वही आज एक ढंग का फुटपाथ बनाने में नाकाम रहे है।

और शायद सबसे बड़ा खतरा यही है कि लोग अब इस अव्यवस्था के आदी हो चुके हैं। ट्रैफिक जाम मौसम की तरह स्वीकार कर लिया गया है। प्रदूषण किस्मत बन चुका है। अवैध कब्ज़े सामान्य बात लगते हैं। अराजकता अब संस्कृति बनती जा रही है।

यही असली पतन है।

सिर्फ सड़कों का नहीं, सोच का पतन।

आगरा आज उस भारतीय शहरी संकट का प्रतीक बन गया है जहाँ नगर निगम, विकास प्राधिकरण, ट्रैफिक पुलिस, पर्यटन विभाग और पर्यावरण एजेंसियाँ सब मौजूद हैं, लेकिन जवाबदेही कहीं नहीं है। हर संस्था के पास थोड़ी ताकत है, मगर पूरी जिम्मेदारी किसी के पास नहीं।

फिर भी उम्मीद बाकी है।

जो नागरिक पैदल चलने वालों के अधिकार की बात कर रहे हैं, वे सही हैं। जो लोग साइकिल और फुटपाथ को प्राथमिकता देने की मांग कर रहे हैं, वे सही हैं। शहर का भविष्य और फ्लाईओवर, और कारें, और कंक्रीट नहीं बचा सकते।

एक सभ्य शहर की पहचान उसकी ऊँची इमारतें नहीं होतीं। असली पहचान यह होती है कि क्या एक बुज़ुर्ग महिला सुरक्षित सड़क पार कर सकती है। क्या एक बच्चा बिना डर साइकिल चला सकता है। क्या हवा सांस लेने लायक है। क्या सार्वजनिक जगहों पर इंसानों का हक बचा है।

आगरा कभी सुंदरता, संतुलन और तहज़ीब का प्रतीक था। आज खतरा यह है कि वह गलत विकास मॉडल, लालच, उदासीनता और अव्यवस्था का प्रतीक बनता जा रहा है।

ताजमहल आज भी खामोश खड़ा है।

लेकिन उसके आसपास का शहर चीख रहा है।

 मुद्दों के मेले ,  हम हैं अकेले !!

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

13 मई 2026

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मेला देखकर लौट रहे हम लोग,  एक अजीब चौराहे पर अटके हुए हैं।

जनता पूछ रही है, “रोजगार कहाँ है?”

सत्ता पूछ रही है, “वंदे मातरम् बोला कि नहीं?”

विपक्ष पूछ रहा है, “EVM का प्लग निकाला कि नहीं!”

और मीडिया पूछ रहा है, “आम चूसकर खाना चाहिए या काटकर?”

वाह रे तांत्रिक लोकतंत्र। जिस घर में चूल्हा ठंडा हो, वहां टीवी पर बहस गरम है।

एक तरफ बेरोजगार डिग्रियां लेकर धूप में लाइन लगा रहे हैं। दूसरी तरफ नेता माइक्रोफोन लेकर इतिहास की कब्रें खोद रहे हैं।

किसी को अस्पताल की बदहाली नहीं दिखती। पर कौन किस धर्म का है, यह सबको एक्स-रे मशीन की तरह साफ दिख जाता है।

गरीब आदमी महंगाई से पिस रहा है।

आम जरूरत की चीजों के भाव सुनकर  BP  की गोलियों की सेल बढ़ती  है। गैस सिलेंडर देखकर सांस फूलती है, अस्थमा अटैक हो रहे हैं।

लेकिन टीवी पर अर्बन ज्ञाणी द्वारा राष्ट्रवाद का ऑक्सीजन मुफ्त बांटा जा रहा है।

इसी बीच त्याग और सादगी की नदियों बहने लगी हैं।   मितव्ययिता मंत्र दिया गया है। कम खर्च करो।फिजूलखर्ची छोड़ो। सादगी अपनाओ।

पूरा देश  ये सुनकर भावुक हो गया है। कइयों ने विदेश यात्रा स्थगित कर दी हैं।  सरकारी बाबुओं ने AC की हवा में बैठकर त्याग पर सेमिनार किया। कुछ नेताओं ने पांच सितारा होटल में “सादगी सम्मेलन” रखा। किसी ने कहा, “विदेश यात्रा जरूरी है, आखिर मितव्ययिता का वैश्विक संदेश देना है।”

नई राजनीति का नया योग सूत्र है।जनता कटौती करे। सरकार प्रेरणा दे।

कहा गया, शादी समारोह सादगी से हों। वाह! यह बात उन लोगों ने कही जिनके काफिले निकलते समय ट्रैफिक खुद लोकतंत्र को सलाम करता है।

कहा गया, सरकारी खर्च कम हो।

और उसी शाम नई LED स्क्रीन पर “ऐतिहासिक उपलब्धियों” का विज्ञापन चमक उठा।

कहा गया, अनावश्यक यात्राएं बंद हों।

देश मुस्कुराया। एयरपोर्ट थोड़ा घबराया। त्याग का ऐसा अलौकिक वातावरण बना कि मध्यम वर्ग ने चाय में चीनी आधी कर दी। गरीब ने दाल में पानी बढ़ा दिया। और अमीर ने ट्वीट कर दिया, “Nation First.”

व्यवस्था तंत्र के पास मुद्दों की पूरी जादुई पोटली है। जनता फिर पांच किलो मुफ्त राशन और पंद्रह सेकंड के गुस्से में सब भूल जाती है।

उधर विपक्ष भी कम कलाकार नहीं।

देश जल रहा हो, पर उनकी प्राथमिकता EVM का पोस्टमार्टम है।

हार गए तो मशीन चोर। कुछ नहीं तो इनको हटाओ, उनको हटाओ। जीत गए तो लोकतंत्र जिंदाबाद। हार गए तो लोगों  को डेमोक्रेसी खतरे में दिखती है।

इस बीच पूरा देश एक दूसरे की गिनती करने में लगा है। जाति जनगणना से अगले कुंभ तक गरीबी भाग जाएगी।

विपक्ष कहता है इतने खतरे तो पुराने जमाने में डाकुओं से भरे जंगल में भी नहीं थे।

और मीडिया! अरे मीडिया तो इस महान लोकतांत्रिक सर्कस का रिंग मास्टर है। देश में किसान आत्महत्या करे, नदी सूख जाए, बच्चे कुपोषण से मर जाएं, कोई फर्क नहीं। ज्योतिषियों की चांदी कट रही है, सब कुछ सितारों के हवाले। हम क्या साथ लाए थे, क्या ले जाएंगे!

वर्ल्ड बेस्ट टीवी एंकर्स भारत में हैं, उनके रहते सरकारी प्रवक्ताओं की कोई जरूरत ही नहीं। अगर किसी ने कहा कि आम काटकर खाना चाहिए या चूसकर, तो तीन घंटे की “राष्ट्रव्यापी बहस” तय है।

“सीमा हैदर का छठा बच्चा।”

“ जेल में बेटी हुई।”

“फिल्म स्टार ने किस रंग की चप्पल या चड्डी पहनी?”

ब्रेकिंग न्यूज ऐसे दौड़ती है जैसे रॉकेट चांद पर नहीं, पाताल में उतर चुका हो।

पत्रकारिता अब सवाल नहीं पूछती।

TRP की भिक्षा मांगती है।

एंकर ऐसे चिल्लाते हैं जैसे देश की सारी समस्याएं डेसिबल से हल होंगी।

स्क्रीन पर आठ खिड़कियां खुलती हैं।

आठ लोग एक साथ चीखते हैं।

और दर्शक सोचता है, शायद यही लोकतंत्र का नया राष्ट्रीय गीत है।

शिक्षा?

उसकी हालत उस रिश्तेदार जैसी हो गई है जिसे शादी में कोई पूछता नहीं।

स्वास्थ्य व्यवस्था ICU में पड़ी है।

रोजगार फाइलों में लटका है।

गरीबी आंकड़ों में छिपी बैठी है।

लेकिन चुनाव आते ही सबको मंदिर, मस्जिद, भाषा, लोकल अस्मिता, पाकिस्तान और जाति याद आ जाती है।

मानो देश नहीं, कोई अनंतकालीन टीवी सीरियल चल रहा हो।

सब अपना अपना धंधा चमका रहे हैं।

जनता सिर्फ ताली बजाने वाली ऑडियंस है।

देश के असली मुद्दे फुटपाथ पर बैठे हैं।

और नकली मुद्दे लाल बत्ती वाली गाड़ियों में घूम रहे हैं।

कभी कभी लगता है भारत समस्याओं से नहीं, “प्रायोजित बहसों” से चल रहा है।

फिर भी उम्मीद जिंदा है।

क्योंकि इस देश का आम आदमी बहुत सहनशील है।

वह हर पांच साल बाद फिर लाइन में खड़ा हो जाता है।

उसे लगता है, शायद इस बार कोई रोटी, रोजगार और राहत की बात करेगा।

लेकिन सिस्टम को पक्ष, विपक्ष के बाजीगर ही चलते हैं। टोपी से कभी धर्म निकालता है। कभी डर। कभी दुश्मन। कभी मितव्ययिता का नया मंत्र। और जनता? वह फिर ताली बजाती है। क्योंकि असली मुद्दों की आवाज अब शोर में दब चुकी है

Sunday, May 10, 2026

 फर्क है पश्चिम बंगाल और तमिल नाडु में सत्ता परिवर्तन में। एक में हिंदुत्व बदलाव का जरिया बना। दूसरे में  नई राजनैतिक दिशा को पंख लगे। आजाद भारत में एक ऐतिहासिक दिशा परिवर्तन जिससे लोकतंत्र और मजबूत हुआ है।

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क्यों और कैसे एक एक्टर से नेता बने विजय ने मचाया सियासी तूफान 

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

12 मई 2026

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एक फिल्म स्टार ने तमिलनाडु की राजनीति का खेल ही बदल दिया

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साठ के दशक में कामराज को मात देने वाले अन्ना दुरई से लेकर टीवीके के नायक विजय तक, तमिलनाडु की राजनीति हमेशा से फिल्मों जैसी रही है। बड़े बड़े कटआउट। जोशीले नारे। भावुक भाषण। हीरो की पूजा। 

लेकिन इस बार  विजय का उभार कुछ अलग ही कहानी बन गया है। दो साल पहले तक वह सिर्फ सुपरस्टार अभिनेता थे। फिर अचानक राजनीति में आए और देखते ही देखते मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गए। डीएमके और एआईएडीएमके जैसी पुरानी ताकतों का किला डोल गया।

शुरू में बहुत लोगों ने उनका मजाक उड़ाया। कहा, “एक और अभिनेता राजनीति में आ गया।” तमिलनाडु में यह नया नहीं था। पहले भी कई सितारे राजनीति में आए। कुछ बीच रास्ते गायब हो गए। कुछ जनता से जुड़ नहीं पाए। लेकिन विजय ने लोगों का मूड सही समय पर समझ लिया।

तमिलनाडु की जनता पुराने नेताओं और पुरानी राजनीति से थक चुकी थी। डीएमके पर परिवारवाद और भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे थे। एआईएडीएमके जयललिता जी के बाद कमजोर हो चुकी थी। लोगों को नया चेहरा चाहिए था। विजय ने खुद को उसी “नई उम्मीद” के रूप में पेश किया।

उनकी सबसे बड़ी ताकत उनकी भाषा और बोलने का अंदाज बना। बाकी नेताओं की तरह लंबे, भारी भरकम भाषण नहीं। छोटी, सीधी, दिल को छूने वाली बातें। ऐसा लगता था जैसे कोई आम आदमी गुस्सा और उम्मीद दोनों साथ लेकर बोल रहा हो।

उनकी एक लाइन बहुत मशहूर हुई:

 “सत्ता किसी परिवार की जागीर नहीं है। सरकार जनता की है।”

यह बात लोगों के दिल में उतर गई। तमिलनाडु में परिवारवादी राजनीति से लोग परेशान थे। विजय ने सीधे उसी नस पर हाथ रखा।

एक और भाषण में उन्होंने कहा:

 “मैं कुर्सी के लिए राजनीति में नहीं आया। मैं इसलिए आया हूं क्योंकि अब चुप रहना खतरनाक हो गया है।”

इसमें फिल्मी ड्रामा भी था और सच्चाई का एहसास भी। खासकर युवाओं को यह लाइन बहुत पसंद आई। उन्हें लगा कि विजय सिर्फ नेता बनने नहीं, कुछ बदलने आए हैं।

एक और बयान ने खूब तालियां बटोरीं:

 “जनता को नेताओं से डरना नहीं चाहिए। नेताओं को जनता से डरना चाहिए।”

सीधी बात। लेकिन असरदार। विजय खुद को जनता का आदमी दिखाना चाहते थे, ऊपर बैठा शासक नहीं।

युवाओं के लिए उनका संदेश भी बहुत असरदार रहा:

 “आपका भविष्य अगली पीढ़ी तक टाला नहीं जा सकता।”

चेन्नई के रिटायर्ड टीचर कृष्णस्वामी बताते हैं, "बेरोजगारी, महंगाई और नौकरी की चिंता में फंसे युवाओं को लगा कि कोई उनकी भाषा बोल रहा है। यही वजह रही कि पहली बार वोट डालने वाले लाखों युवा विजय के पीछे खड़े हो गए।"

उनकी सबसे बड़ी खासियत यह रही कि उन्होंने फिल्मों को पूरी तरह छोड़ दिया। यह कदम बहुत बड़ा संदेश बन गया। लोगों को लगा कि विजय राजनीति को गंभीरता से ले रहे हैं। सिर्फ टाइमपास नहीं कर रहे।

उनके पुराने फैन क्लब भी बड़ी ताकत बने। सालों से ये लोग रक्तदान शिविर, बाढ़ राहत, गरीबों की मदद और सामाजिक काम करते रहे थे। राजनीति में आने से पहले ही विजय के पास जमीनी नेटवर्क तैयार था। यही उनकी असली ताकत बनी।

अब सवाल उठता है कि रजनीकांत और कमल हासन क्यों सफल नहीं हुए?

कोयंबटूर के एक्टिविस्ट गोपाल कृष्णन कहते हैं, "रजनीकांत के पास जबरदस्त स्टार पावर थी। शायद विजय से भी ज्यादा। लेकिन उन्होंने बहुत देर कर दी। सालों तक राजनीति में आने के संकेत देते रहे, फिर पीछे हटते रहे। जनता कन्फ्यूज हो गई। लोगों को लगा कि वह खुद तय नहीं कर पा रहे कि राजनीति करनी है या नहीं। राजनीति में हिचकिचाहट बहुत महंगी पड़ती है।"

उधर, कमल हासन पढ़े लिखे, समझदार और गंभीर नेता दिखे। लेकिन उनकी राजनीति आम जनता से थोड़ी दूर नजर आई। उनके भाषण कई बार बहुत बौद्धिक और शहरी लगते थे। गांव और छोटे शहरों के वोटरों से भावनात्मक रिश्ता नहीं बन पाया। लोग उनका सम्मान करते थे, लेकिन उनके पीछे जुनून से नहीं जुटे।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं,"विजय ने यही फर्क पैदा किया। वह बड़े विचारक की तरह नहीं, बदलाव लाने वाले आम आदमी की तरह सामने आए। उनकी भाषा आसान थी। अंदाज अपनापन वाला था। और सबसे बड़ी बात, वह सही समय पर मैदान में उतरे।"

तमिल राजनीति के जानकर वेंकट सुब्रमनियन के मुताबिक, "तमिलनाडु की राजनीति में फिल्मी सितारे पहले भी आए हैं। लेकिन विजय ने स्टारडम, युवा ऊर्जा, साफ छवि, मजबूत संगठन और जनता की नाराजगी, सबको जोड़कर एक बड़ा सियासी तूफान खड़ा कर दिया।"

यह सिर्फ चुनाव जीतने की कहानी नहीं थी। यह उस जनता की कहानी थी जो नए हीरो का इंतजार कर रही थी।

Saturday, May 9, 2026

 बंद करो यूपी को बीमारू कहना!

उत्तर प्रदेश है भारत की धड़कन, कोई बोझ नहीं

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बिन काशी, मथुरा, अयोध्या, हिन्दू धर्म में क्या?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

11 मई 2026

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जब दूसरे राज्य अपनी क्षेत्रीय शान का ढोल पीटते हैं, (तमिल प्राइड, मराठा गौरव, पंजाबियत, कश्मीरियत, बंगाली अस्मिता) तब उत्तर प्रदेश हमेशा “एक भारत” की बात करता है। पश्चिम और दक्षिण भारत के कुछ लोग जब यूपी को पिछड़ा बताकर उसकी जीडीपी या राष्ट्र निर्माण में योगदान पर सवाल उठाते हैं, तब वे एक बड़ी सच्चाई भूल जाते हैं। उत्तर प्रदेश सिर्फ नक्शे पर बना एक राज्य नहीं है। यह भारत की रूह, दिल, तहज़ीब और सियासत की धड़कन है।

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उत्तर प्रदेश के प्राचीन घाटों से लेकर ताज महल की संगमरमरी शायरी तक, उत्तर प्रदेश, मां भारती के माथे पर सजे चमकते मुकुट जैसा दिखाई देता है। यहां गंगा, यमुना और सरयू की पवित्र धाराएं संतों, क्रांतिकारियों, कवियों और बादशाहों की कहानियां सुनाती हैं। यही वह धरती है जहां तुलसीदास ने अमर रामचरितमानस लिखी, जहां कबीर ने पाखंड पर करारी चोट की, और जहां मुंशी प्रेमचंद ने गांव, गरीब और भूले हुए इंसानों की आवाज़ दुनिया तक पहुंचाई। अयोध्या की घंटियों से लेकर वाराणसी की अनंत आरती तक, लखनऊ की तहज़ीब से प्रयागराज की सियासी विरासत तक, उत्तर प्रदेश कोई मामूली सूबा नहीं। यह भारत की सभ्यता की धड़कन है।

दशकों तक उत्तर प्रदेश को “बीमारू राज्य” कहकर हिकारत  से देखा गया। इसे ऐसा बोझ बताया गया जो भारत की तरक्की रोक रहा है। टीवी बहसों, अखबारों और ड्रॉइंग रूम की चर्चाओं में यह शब्द फैशन बन गया। लेकिन जिन्होंने यह तमगा चिपकाया, उन्होंने कभी समझने की कोशिश नहीं की कि यूपी आखिर है क्या। उत्तर प्रदेश को सिर्फ गरीबी या आंकड़ों से मापना, हमारी सभ्यता को न समझ पाने जैसा है।

आज भारत में एक अजीब रुझान बढ़ रहा है। क्षेत्रीय पहचान अब संकीर्ण सोच में बदलती जा रही है। हर राज्य अपनी अलग दीवार खड़ी करता दिखाई देता है। पहले भारत की बात होती थी, अब क्षेत्रों की।

लेकिन यूपी ने हमेशा अलग रास्ता चुना। उसने खुद को सिर्फ अपनी सीमाओं तक सीमित नहीं किया। यहां “बाहरी” और “भीतरी” की राजनीति कम हुई। उत्तर प्रदेश ने हमेशा जोड़ने का काम किया, तोड़ने का नहीं। उसकी पहचान भारत से अलग नहीं, बल्कि भारत के भीतर घुली हुई है।

गंगा जमुनी तहज़ीब कोई किताबों का जुमला नहीं। यह सदियों की साझी जिंदगी का नतीजा है। यहां हिंदू, मुस्लिम, जैन, बौद्ध और सिख परंपराएं साथ साथ सांस लेती रहीं। त्योहार साझा हुए, खानपान मिला, शायरी और संगीत ने दिलों को जोड़ा। अवध में अदब संस्कृति बन गया। बनारस में आस्था दर्शन बन गई। मथुरा और वृंदावन में भक्ति उत्सव बन गई।

यूपी की नदियां सिर्फ नदियां नहीं हैं। गंगा, यमुना और सरयू बहती हुई पवित्र कथाएं हैं। इनके किनारों ने संत, फकीर, सुधारक, बागी और सपने देखने वाले पैदा किए। आदि शंकराचार्य ने काशी में ज्ञान की बहसों को नई जान दी। चैतन्य महाप्रभु वृंदावन की भक्ति में डूब गए। सूफी संतों ने इंसानियत का पैगाम फैलाया। बौद्ध भिक्षु इन्हीं रास्तों से एशिया तक ज्ञान ले गए। सल्तनतें आईं और चली गईं, मगर सभ्यता की यह धारा बहती रही।

भारत के दो सबसे लोकप्रिय आराध्य भी इसी मिट्टी से जुड़े हैं। भगवान राम अयोध्या के हैं। भगवान कृष्ण मथुरा और वृंदावन के। करोड़ों भारतीयों की नैतिकता, भक्ति और कल्पना इन दोनों से आकार लेती है। यही वजह है कि उत्तर प्रदेश को भारत की आत्मा का केंद्र माना जाता है।

आजादी की लड़ाई में भी यूपी सबसे आगे रहा। 1857 की क्रांति मेरठ से ज्वालामुखी की तरह फूटी। कानपुर, लखनऊ और झांसी तक आग फैल गई। बेगम हजरत महल अंग्रेजों के सामने डटकर खड़ी रहीं। नाना साहब ने संघर्ष किया। हजारों गुमनाम गांव वालों ने बिना किसी इनाम की उम्मीद के अपनी जान दे दी। बाद में महात्मा गांधी के नेतृत्व में भी यूपी राष्ट्रीय आंदोलन का दिल बना रहा।

साहित्य की दुनिया में भी यूपी की विरासत बेमिसाल है। मीर तकी मीर, मिर्जा गालिब, नज़ीर अकबराबादी, हरिवंश राय बच्चन, महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और प्रेमचंद ने सिर्फ यूपी के लिए नहीं लिखा। उन्होंने पूरे हिंदुस्तान की आत्मा को शब्द दिए।

वास्तुकला में भी उत्तर प्रदेश किसी खुले संग्रहालय जैसा है। ताजमहल आज भी संगमरमर में जमी मोहब्बत की धुन लगता है। आगरा किला, फतेहपुर सीकरी, सारनाथ और अनगिनत मंदिर, मस्जिदें और मठ बताते हैं कि यहां कितनी सभ्यताएं आकर मिलीं। हिंदू, बौद्ध, जैन, फारसी, इस्लामी और लोक परंपराओं ने यहां एक दूसरे को अपनाया और नया रंग दिया।

राजनीति में भी उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है। सबसे ज्यादा सांसद यहीं से संसद पहुंचते हैं। ज्यादातर प्रधानमंत्री या तो यूपी से निकले या यूपी की जनता के सहारे दिल्ली पहुंचे। दिल्ली की सत्ता की सांसें आज भी यूपी से जुड़ी हैं।

अब “बीमारू” शब्द पुराना, खोखला और नासमझी भरा लगता है। उत्तर प्रदेश कोई बीमार मरीज नहीं जो अपनी अहमियत बचाने के लिए जूझ रहा हो। यह एक विशाल, जीवंत, आध्यात्मिक और जुझारू प्रदेश है, जो अपनी ताकत फिर पहचान रहा है। यहां समस्याएं हैं, भीड़ है, विरोधाभास हैं, मगर जिंदगी भी है, ऊर्जा भी है और अद्भुत सहनशक्ति भी।

असल में उत्तर प्रदेश भारत का छोटा रूप है। यहां भारत का दर्द भी है, गरीबी भी, आस्था भी, विविधता भी, संघर्ष भी और उम्मीद भी। यूपी को समझना, भारत को समझना है। शायद इसी कारण, तमाम आलोचनाओं के बावजूद, उत्तर प्रदेश आज भी भारत पर बोझ नहीं, बल्कि उसकी धड़कन बनकर खड़ा है।

Friday, May 8, 2026

 सेल्फी की बीमारी!!!

एक तस्वीर के लिए मौत का खेल

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

10 मई 2026

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डेली यमुना किनारे, आरती स्थल के पास लड्डू गोपाल की विशाल मूर्ति के इर्द गिर्द, तमाम लोग सेल्फी लेते हैं, अजीब डांस करते हुए रील बनाते हैं। रोड पर कोई गिर जाए तो पहले वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हैं, बाद में हाल चल पूछते हैं। मैं और मेरा मोबाइल फोन, बस, और कुछ नहीं!

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दूर से ट्रेन की सीटी सुनाई देती है। चार लड़के मुस्कराते हुए मोबाइल कैमरे की तरफ देखते हैं। एक लड़का हाथ और आगे बढ़ाता है ताकि “परफेक्ट सेल्फी” आ सके। अगले ही पल तेज रफ्तार ट्रेन उन्हें कुचल देती है। उनकी तस्वीर कभी सोशल मीडिया तक नहीं पहुंचती।

भारत में सेल्फी का जुनून अब सिर्फ एक मासूम शौक नहीं रहा। यह एक खतरनाक सामाजिक बीमारी बन चुका है। रेलवे ट्रैक, नदी किनारे, पहाड़, झरने, पानी की टंकियां, चलती ट्रेनें, सब अब “रील” और “वायरल वीडियो” के मंच बन गए हैं। लाइक्स और व्यूज़ की भूख ने युवाओं को मौत से खेलना सिखा दिया है।

भारत को अब दुनिया की “सेल्फी रिपब्लिक” कहा जाने लगा है। कुछ लोग इसे “किलफी” संस्कृति भी कहते हैं, यानी ऐसी सेल्फी जो जान ले ले।

घटनाएं दिल दहला देती हैं।

2015 में मथुरा के पास तीन कॉलेज छात्र ताजमहल जाते समय रेलवे ट्रैक पर रुक गए। उन्हें पीछे आती ट्रेन के साथ एक “डेरिंग सेल्फी” चाहिए थी। ट्रेन नहीं रुकी। उनकी जिंदगी रुक गई।

2017 में दिल्ली में दो किशोर रेलवे ट्रैक पर सेल्फी लेते हुए ट्रेन की चपेट में आ गए। उन्हें लगा कि आखिरी पल में हट जाएंगे। मगर मौत ज्यादा तेज निकली।

2019 में पानीपत में तीन युवक एक ट्रेन से बचने के लिए दूसरे ट्रैक पर कूद गए। वहां दूसरी ट्रेन आ रही थी। तीनों की मौके पर मौत हो गई।

कानपुर में 2016 में सात छात्र गंगा में डूब गए। एक लड़का बांध के किनारे सेल्फी लेते समय फिसल गया। बाकी दोस्त उसे बचाने कूद पड़े। कोई वापस नहीं लौटा।

हाल ही में उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर में पांच किशोर वायरल रील बनाने के लिए पानी की ऊंची टंकी पर चढ़ गए। उतरते समय जंग लगी सीढ़ी टूट गई। एक की मौत हो गई, कई गंभीर घायल हुए।

फिर भी लोग नहीं संभल रहे।

आखिर क्यों?

मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि यह डिजिटल दौर की नई बीमारी है। सोशल मीडिया के एल्गोरिद्म (तरीके) सनसनी, खतरा और ड्रामा पसंद करते हैं। जितना खतरनाक वीडियो, उतने ज्यादा व्यूज़। मोबाइल स्क्रीन पर मिलने वाला हर “लाइक” दिमाग को छोटी सी खुशी देता है। धीरे धीरे यही आदत नशा बन जाती है।

आज का युवा सिर्फ जिंदगी नहीं जी रहा, वह हर पल “परफॉर्म” कर रहा है। हर किसी को वायरल होना है। हर कोई इंटरनेट का सितारा बनना चाहता है।

दोस्त भी उकसाते हैं।

“भाई, ये रील फाड़ देगी।”

“थोड़ा और आगे जा।”

“ट्रेन के पास खड़े हो, मजा आएगा।”

बस, यहीं हादसा जन्म लेता है।

सबसे दुखद बात यह है कि संवेदनाएं  भी कमजोर पड़ रही हैं। सड़क हादसों में घायल लोगों की मदद करने के बजाय लोग वीडियो बनाते हैं। बाढ़, आग, अंतिम संस्कार, अस्पताल, यहां तक कि मौत के पास भी लोग सेल्फी लेते नजर आते हैं।

दुनिया अब दर्द को भी “कंटेंट” बना रही है।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं: "यह सिर्फ भारत की समस्या नहीं है। अमेरिका में लोग खाई और पहाड़ों से गिरकर मरे हैं। रूस में सरकार को “सेफ सेल्फी कैंपेन” चलाना पड़ा क्योंकि लोग हथियारों और चलती गाड़ियों के साथ तस्वीरें लेते हुए मर रहे थे। स्पेन और ऑस्ट्रेलिया में भी समुद्र किनारे और चट्टानों पर सेल्फी लेते हुए कई पर्यटकों की मौत हुई। मगर भारत की हालत ज्यादा गंभीर है।"

एक अरब से ज्यादा मोबाइल फोन। सस्ता इंटरनेट। युवा आबादी। सोशल मीडिया की अंधी दौड़। और कमजोर कानून व्यवस्था। यह मिश्रण बेहद खतरनाक है।

सरकार ने कई जगह “नो सेल्फी ज़ोन” बनाए हैं। रेलवे स्टेशन और झरनों के पास चेतावनी बोर्ड लगाए गए हैं। पुलिस जागरूकता अभियान चलाती है। मगर असर बहुत कम दिखता है।

सिर्फ बोर्ड लगाने से नशा नहीं रुकता।

असल सवाल कहीं ज्यादा गहरा है। क्या आज का इंसान “अनदेखा” होने से डरने लगा है? क्या हर खुशी, हर सफर, हर दुख, हर खाना, हर पल दुनिया को दिखाना जरूरी हो गया है?

अब जिंदगी जीने से ज्यादा उसे पोस्ट करना जरूरी लगता है।

मोबाइल कैमरा नया आईना बन चुका है। लोग खुद को दूसरों की नजर से देखने लगे हैं।

और इस “सेल्फी रिपब्लिक” की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि लोग जिंदगी रिकॉर्ड करते करते जिंदगी खो रहे हैं।

कोई भी सेल्फी इतनी जरूरी नहीं कि उसके बदले जनाज़ा  उठे। कोई भी सेल्फी इतनी खूबसूरत नहीं कि उसकी कीमत एक मौत हो।

फिल्टर चेहरे बदल सकता है। कब्र नहीं।


 द ग्रेट इंडियन जुमला ओलंपिक्स

जब लोकतंत्र एक रंगमंच बन जाए


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बृज खंडेलवाल द्वारा

9 मई 2026


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भारत सिर्फ दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र नहीं है, यह दुनिया का सबसे बड़ा खुला रंगमंच भी है।

हमारे खूबसूरत मुल्क में चुनाव ऐसे आते हैं जैसे शादी, क्रिकेट फाइनल और पौराणिक धारावाहिक सबको मिलाकर एक विशाल सर्कस बना दिया गया हो। लाउडस्पीकर चीखते हैं। हेलिकॉप्टर फूल बरसाते हैं। टीवी एंकर अपनी आवाज़ खो बैठते हैं। और नेता लोग वादे ऐसे बांटते हैं जैसे भंडारे में हलवा पूरी।

सैलानियों के लिए भारत एक शानदार तमाशा पेश करता है, जिसका नाम है “द ग्रेट जुमला ओलंपिक्स।”

हर पांच साल में हर पार्टी के नेता इस पवित्र खेल प्रतियोगिता में जुटते हैं। किसी स्टेडियम की जरूरत नहीं। धूल वाला मैदान, प्लास्टिक की कुर्सियां और मुफ्त खाने के पैकेट काफी हैं। प्रतियोगी कई कठिन मुकाबलों में हिस्सा लेते हैं। स्पीच मैराथन, ब्लेम रिले, इमोशनल कुश्ती, यू टर्न जिम्नास्टिक और सबसे कठिन प्रतियोगिता “सिंक्रोनाइज्ड भूलने की कला।”

इस खेल की निर्विवाद दादा  या नानी चैंपियन थीं इंदिरा गांधी,  जिनका नारा था “गरीबी हटाओ।” गरीबी ने यह ऐलान सुना, हल्की मुस्कान दी और भारत में स्थायी किराये का मकान लेकर आराम से बैठी रही। पचास साल बाद भी गरीबी जिंदा है, तंदरुस्त है और कभी कभी खुद चुनाव भी लड़ लेती है।

फिर आया आधुनिक दौर का सबसे चर्चित जुमला “अच्छे दिन आने वाले हैं।” आह, भारतीय इतिहास के सबसे ज्यादा इंतजार किए गए मेहमान। भारतीय जनता अच्छे दिनों का इंतजार वैसे करती है जैसे यात्री छह घंटे लेट ट्रेन का करते हैं। हर साल कोई घोषणा करता है, “बस आने ही वाले हैं!” और भीड़ फिर तालियां बजा देती है।

एक और स्वर्ण पदक वाला प्रदर्शन था “इंडिया शाइनिंग” अभियान। शहरी भारत ने गर्व से सिर हिलाया, जबकि गांव का भारत सिर खुजलाकर पूछ बैठा, “शाइनिंग कहां हो रहा है भाई?” नारा इतना चमका कि मतदाताओं ने बैलेट बॉक्स की ही लाइट बंद कर दी।

ओलंपिक्स व्यक्तिगत प्रतिभा के बिना पूरे नहीं होते। मुलायम सिंह यादव ने अपने मशहूर बयान “लड़के हैं, लड़कों से गलती हो जाती है” से पूरे देश को हैरान कर दिया। उस बयान ने सिर्फ स्तर नहीं गिराया, बल्कि उसे सामान्य समझदारी के साथ जमीन के नीचे दफना दिया।

फिर कुछ नेताओं और खाप दर्शनशास्त्रियों की वैज्ञानिक खोज आई कि चाउमीन बलात्कार की वजह है। आखिरकार देश को असली खलनायक मिल गया। न पितृसत्ता, न अपराधी मानसिकता, न कमजोर पुलिस व्यवस्था। दोषी निकले नूडल्स! चीन में कोई नूडल बनाने वाला यह सुनकर शायद बेहोश हो गया होगा।

उधर नेता लोग गंगा यमुना सफाई का वादा करते रहे। अब हालत यह है कि नदी की मछलियां भी चुनावी नारे पहचानने लगी हैं। यमुना शायद दुनिया की इकलौती नदी है जिसे भाषणों में रोज साफ किया जाता है और हकीकत में हर घंटे गंदा। गडकरी का भला हो, उसने तो दिल्ली आगरा के बीच स्टीमर ही चलवा दिया होता, अगर नदी में जल होता! 

हर पार्टी के पास अपने अपने जुमलों का डिब्बा है। गुलाबी सपनों से भरा डिब्बा। जैसे आम आदमी पार्टी का भ्रष्टाचार मुक्त भारत या ममता बनर्जी का “खेला होबे।” लोकतंत्र चुनावों पर चलता है। उसे भावनात्मक तूफान चाहिए, ऐसी लहर जो तर्क और सामान्य समझ को बहाकर ले जाए। अक्सर कहानियों में सिर्फ शोर और गुस्सा होता है, सार बहुत कम।

और वह जादुई “15 लाख रुपये” वाला वादा कौन भूल सकता है? काले धन की वापसी का सपना। करोड़ों भारतीयों ने अपने बैंक खाते वैसे जांचे जैसे बच्चे परीक्षा का रिजल्ट देखते हैं। कुछ लोगों ने तो पासबुक उतनी बार अपडेट कराई जितनी बार लोग व्हाट्सऐप स्टेटस बदलते हैं। बैंक शांत रहे। ये जुमला था, अफवाह थी, गलत रिपोर्टिंग थी, आज तक स्पष्ट नहीं है।

लेकिन असली ओलंपिक चैंपियन हैं यू टर्न जिम्नास्टिक टीम के खिलाड़ी। एक दिन नेता पूरी छाती ठोककर बयान देता है। अगले हफ्ते सफाई आती है।  नया मतलब निकाला जाता है। फिर मीडिया पर दोष मढ़ा जाता है। और अंत में आता है भारतीय राजनीति का सबसे लोकप्रिय योगासन, “मेरा मतलब वह नहीं था।”

भारतीय नेताओं की रीढ़ की लचक देखकर सर्कस के बाजीगर भी जलन से रो पड़ते हैं।

लेकिन मतदाता भी भागीदारी पदक के हकदार हैं। हम शिकायतें करते हैं। राजनीतिक चुटकुले आगे भेजते हैं। मीम्स पर हंसते हैं। चाय की दुकान पर नेताओं को गालियां देते हैं। और फिर मुफ्त टोपी, बिरयानी और भावनात्मक भाषणों के लिए रैलियों में पहुंच जाते हैं। भारत में लोकतंत्र सिर्फ शासन नहीं है। यह जन मनोरंजन है।

और इस तरह जुमला ओलंपिक्स जारी रहते हैं। नए नारे आएंगे। पुराने वादे नए रंग रोगन के साथ लौटेंगे। घोषणापत्र पतंगों की तरह उड़ेंगे। टीवी बहसें बरसाती मौसम की सब्जी मंडी जैसी लगेंगी।

लेकिन एक बात तय है।

भारत में सरकारें बदल सकती हैं। पार्टियां टूट सकती हैं। विचारधाराएं कलाबाजी खा सकती हैं। मगर जुमले अमर हैं।

एक दिन सूरज ठंडा पड़ सकता है। चांद रिटायर हो सकता है। लेकिन कहीं न कहीं, किसी मंच पर, किसी विशाल कटआउट के नीचे, कोई नेता अब भी चिल्ला रहा होगा

“मित्रों… बस पांच साल और!”