Monday, March 9, 2026

 नृत्य में धड़कता ब्रज: रास, भक्ति और संस्कृति पर डॉ. ज्योति का शोध

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बृज खंडेलवाल द्वारा

10 मार्च 2026

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भारत की सांस्कृतिक धरती पर यदि किसी क्षेत्र को उत्सव, संगीत और भक्ति का जीवंत रंगमंच कहा जाए, तो वह श्री कृष्ण की लीला भूमि, ब्रज है। यहाँ जीवन साधारण नहीं, उत्सव है। यहाँ धर्म केवल आस्था नहीं, लोकजीवन की धड़कन है।

ब्रज की गलियों में चलते हुए लगता है जैसे समय ठहर गया हो। मंदिरों की घंटियाँ, कुंजों की शांति, यमुना के घाट और रासलीलाओं की गूँज: सब मिलकर एक ऐसा सांस्कृतिक संसार रचते हैं जहाँ श्रीकृष्ण की लीलाएँ आज भी सांस लेती प्रतीत होती हैं।

सदियों से कवियों, संतों और कलाकारों ने इन लीलाओं को शब्द, स्वर और नृत्य में ढाला है। माखन चोरी की शरारत, गोपियों के साथ रास का अलौकिक आनंद, और बांसुरी की मोहक धुन: ये सब केवल कथाएँ नहीं, ब्रज की सामूहिक स्मृति का हिस्सा हैं।

लेकिन ब्रज संस्कृति, कृष्ण दर्शन और नृत्य के इस गहरे संबंध को अकादमिक दृष्टि से बहुत कम समझा गया था। इसी कमी को भरने का महत्वपूर्ण प्रयास किया है डॉ. ज्योति खंडेलवाल ने।

उनके शोध कार्य पर उन्हें पीएचडी की उपाधि मिली है। आगरा में कथक को लोकप्रिय बनाने के लिए सक्रिय “नृत्य ज्योति कथक केंद्र” की निदेशक और स्वयं एक प्रतिष्ठित नृत्यांगना के रूप में डॉ. ज्योति पिछले दो दशकों से कला साधना में रत हैं।

उनका शोध केवल नृत्य का अध्ययन नहीं है। यह ब्रज की आत्मा को समझने की एक कोशिश है।

नृत्य: मनोरंजन नहीं, साधना

डॉ. ज्योति के शोध की शुरुआत एक मूल प्रश्न से होती है: नृत्य आखिर है क्या?

आज हम नृत्य को अक्सर मंचीय कला या मनोरंजन के रूप में देखते हैं। लेकिन भारतीय परंपरा में नृत्य का जन्म ही भक्ति और पूजा से हुआ था।

प्राचीन मंदिरों में नृत्य देवताओं की आराधना का माध्यम था। भाव, ताल और लय के माध्यम से कलाकार अपनी भक्ति व्यक्त करता था।

समय के साथ यह परंपरा विकसित होती गई। शास्त्रीय नृत्य पद्धतियाँ बनीं: जिनके अपने नियम, मुद्राएँ, ताल और अभिनय शैली हैं।

भारत के प्रमुख शास्त्रीय नृत्यों—कथक, भरतनाट्यम, मणिपुरी और कुचिपुड़ी: सभी में कथा कहने की समृद्ध परंपरा है।

इन कथाओं के केंद्र में अक्सर श्रीकृष्ण ही होते हैं।

कभी राधा के साथ प्रेम संवाद, कभी कालिया नाग का दमन, तो कभी गोवर्धन उठाने की लीला: ये प्रसंग नृत्य के माध्यम से जीवंत हो उठते हैं।

डॉ. ज्योति ने अपने शोध में नृत्य के तकनीकी पक्ष, ताल, लय, भाव, अभिनय और अभिव्यक्ति, का भी विस्तार से अध्ययन किया है।

ब्रज: भूगोल नहीं, भावलोक

शोध का एक बड़ा हिस्सा ब्रज की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को समझने में लगा है।

ब्रज केवल नक्शे पर अंकित क्षेत्र नहीं है। यह आस्था का भावलोक है।

वृंदावन, गोवर्धन, बरसाना, नंदगाँव और यमुना, ये स्थान केवल तीर्थ नहीं, कृष्ण कथा के जीवित मंच हैं।

ब्रज संस्कृति में यमुना का स्थान विशेष है।

यहाँ यमुना केवल नदी नहीं। वह कृष्ण की सखी है, जीवनदायिनी शक्ति है।

ब्रज के गीतों, लोककथाओं और नृत्यों में यमुना बार-बार प्रकट होती है।

डॉ. ज्योति के अध्ययन में यह स्पष्ट होता है कि ब्रज की सांस्कृतिक कल्पना में यमुना एक भावात्मक प्रतीक है, प्रेम, पवित्रता और जीवन का प्रतीक।

कृष्ण की लीलाएँ: जीवन के संदेश

डॉ. ज्योति खंडेलवाल का शोध एक और महत्वपूर्ण दृष्टि प्रस्तुत करता है।

उन्होंने कृष्ण की लीलाओं को केवल धार्मिक कथा के रूप में नहीं देखा।

उन्होंने उन्हें जीवन के प्रतीकों के रूप में समझने की कोशिश की।

जैसे; गोवर्धन लीला हमें प्रकृति संरक्षण का संदेश देती है। गायों के प्रति कृष्ण का स्नेह जीव-जंतुओं के प्रति करुणा का प्रतीक है। और बांसुरी की धुन प्रेम, आकर्षण और आंतरिक शांति का संकेत है।

डॉ. ज्योति का मानना है कि नृत्य और संगीत इन संदेशों को लोगों तक सरल और प्रभावशाली तरीके से पहुँचाते हैं।

लोकनृत्य: ब्रज की असली धड़कन

शास्त्रीय नृत्य पर अक्सर अधिक चर्चा होती है। लेकिन ब्रज की असली आत्मा उसके लोकनृत्यों और लोकनाट्यों में बसती है।

गाँवों में होने वाली रासलीलाएँ, उत्सवों के दौरान सामूहिक नृत्य, और कृष्ण कथा पर आधारित नाटकीय प्रस्तुतियाँ; ये सब ब्रज की सांस्कृतिक पहचान हैं।

इन प्रस्तुतियों में कलाकार कृष्ण की बाल लीलाओं, गोपियों के साथ रास और माखन चोरी के प्रसंगों को जीवंत बना देते हैं।

दर्शक केवल दर्शक नहीं रहते; वे इस सांस्कृतिक अनुभव का हिस्सा बन जाते हैं।

यह केवल मनोरंजन नहीं होता। इसके माध्यम से समाज को नैतिक और आध्यात्मिक संदेश भी मिलते हैं।

संगीत और नृत्य का अनोखा मेल

ब्रज संस्कृति में संगीत और नृत्य एक-दूसरे से अलग नहीं हैं।

हर उत्सव, हर कथा, हर लीला में संगीत की केंद्रीय भूमिका है।

कृष्ण स्वयं बांसुरी वादक के रूप में जाने जाते हैं। उनकी बांसुरी की धुन प्रेम, आकर्षण और आध्यात्मिक आनंद का प्रतीक बन चुकी है।

ब्रज के पद, भजन और कविताएँ जब नृत्य के साथ जुड़ते हैं, तो एक सम्पूर्ण सांस्कृतिक अनुभव बन जाता है।

तांडव और रास: दो दृष्टियाँ

भारतीय परंपरा में नृत्य की चर्चा होती है तो अक्सर शिव के तांडव का उल्लेख आता है।

तांडव शक्ति, सृजन और विनाश की ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रतीक है।

लेकिन डॉ. ज्योति का शोध एक अलग दृष्टिकोण सामने रखता है।

उनके अनुसार कृष्ण का रास नृत्य आनंद, प्रेम और सामूहिक उत्सव का प्रतीक है।

जहाँ तांडव ब्रह्मांडीय शक्ति की अभिव्यक्ति है, वहीं रास जीवन की खुशियों का उत्सव है।

एक नई अकादमिक पहल

इस शोध का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि आगरा की एक शोधकर्ता ने पहली बार ब्रज संस्कृति और नृत्य के इस संबंध को इतने विस्तार से अकादमिक रूप में प्रस्तुत किया है।

डॉ. ज्योति खंडेलवाल का काम केवल एक शोध प्रबंध नहीं है।

यह ब्रज की जीवंत परंपराओं, लोककला और आध्यात्मिक विरासत को समझने का एक नया दरवाजा खोलता है।

ब्रज में नृत्य केवल कला नहीं।

यह भक्ति है।

यह जीवन का उत्सव है।

यह दर्शन का माध्यम है।

यमुना के किनारे जन्मी यह परंपरा आज भी लोगों को प्रेम, आनंद और आध्यात्मिकता का संदेश देती है।

और शायद यही इस शोध का सबसे बड़ा निष्कर्ष है;  जब कला, संस्कृति और आस्था एक साथ बहती हैं, तब सभ्यता केवल जीवित नहीं रहती, बल्कि पीढ़ियों तक चमकती रहती है।

Saturday, March 7, 2026

औरतों का सम्मान करना है तो गालियों में उनका जिक्र न कीजिए!

ताज नगरी की ज़बानी गंदगी: आखिर हर गाली में औरत ही क्यों?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

9 मार्च 2026

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आगरा ताजमहल के लिए मशहूर है।

मोहब्बत की निशानी। लेकिन ज़रा शहर की गलियों में घूमिए। एक और “स्मारक” नज़र आएगा।

गालियों का स्मारक।

यहाँ तालीम मायने नहीं रखती।

तहज़ीब भी नहीं। दौलत भी नहीं।

आगरा में एक लोकतांत्रिक ज़बान है;

गालियों की ज़बान।

सब्ज़ी बेचने वाला। स्कूटर मिस्त्री।कॉलेज का छात्र। पान की दुकान पर बैठे बुज़ुर्ग। गुटके की पीक बौछार के साथ गालियों का मधुर रस! 

लेकिन इस कहानी में एक अजीब मोड़ है।

ज़्यादातर गालियाँ औरतों के नाम पर टिकती हैं। माँ। बहन। बेटी ।

झगड़ा चाहे पार्किंग का हो या बिजली बिल का; इज़्ज़त किसी की माँ-बहन की ही उछलती है।

आगरा की हवा में भाषाई प्रदूषण तैरता है। लेकिन किसी को तकलीफ़ नहीं। लोगों को इसकी आदत पड़ चुकी है। जैसे सड़क का शोर।

औरतें भी पीछे नहीं। वे भी इस कला में कम उस्ताद नहीं। उम्र की कोई पाबंदी नहीं। दादी-नानी भी ऐसी शब्दावली चला सकती हैं कि ट्रक ड्राइवर भी शर्मा जाए।

एक ज़माना था जब बातों में नज़ाकत होती थी। मुहावरों से बात सजती थी।कहावतों से तर्क मजबूत होते थे।शेर-ओ-शायरी से बात में नूर आ जाता था।

आजकल ग़ुस्सा बढ़ा है। सब्र घटा है।और ज़बान गरीब हो गई है। जब लफ़्ज़ कम पड़ते हैं; गाली हाज़िर हो जाती है।

हर वाक्य में जिस्मानी इशारे। हर झगड़े में माँ-बहन का जिक्र। असल ग़ुस्सा ट्रैफिक पर होता है; लेकिन निशाना औरत बनती है।

यह सवाल शायद ही किसी को परेशान करता है। ग्रामीण आगरा हो या शहर, गाली कई लोगों के लिए ग़ुस्सा निकालने का सबसे आसान ज़रिया है।

ज़िंदगी मुश्किल है। नाइंसाफ़ी बहुत है। दिल में भड़ास भरी है। तो लोग गाली देते हैं। न खून-खराबा। न पुलिस केस। बस ज़बानी आतिशबाज़ी।

कुछ लोग तो इसे सामाजिक हथियार भी बताते हैं। "गाली एक तरह का अहिंसक विरोध है। गोली नहीं चलती। बस ज़बान चलती है।"

अजीब ख्याल है।

लेकिन पूरी तरह बेबुनियाद भी नहीं।

गालियाँ अक्सर उस ग़ुस्से की आवाज़ होती हैं जो व्यवस्था से निराश आम आदमी के भीतर जमा होता रहता है।

फिर भी एक सवाल बार-बार उठता है। हर गाली औरत के इर्द-गिर्द ही क्यों घूमती है? माँ। बहन। बेटी।

यह कैसी मानसिकता है जिसमें औरत को इज़्ज़त का बर्तन बना दिया गया है?

सामाजिक विश्लेषक श्रीवास्तव तो और आगे जाते हैं। उनका कहना है; समाज में बदलाव गोलियों से नहीं, गालियों से आता है। भारत जैसे अहिंसा-प्रिय समाज में गाली ग़ुस्से का वैध इज़हार है। वे तो यहाँ तक कहते हैं कि गालियों का दायरा बढ़ना चाहिए।

नई तरह की, एलजीबीटी-दोस्त गालियाँ भी बननी चाहिए।

बात चौंकाने वाली है। लेकिन हमारी परंपरा भी कम अजीब नहीं।

उत्तर भारत की शादियों में दूल्हे की बारात का स्वागत औरतें लयबद्ध गालियों से करती हैं। सब हँसते हैं।मज़ा लेते हैं। एक सांस्कृतिक रस्म।

गली-मुहल्लों की मिली-जुली संस्कृति में भी गाली का अपना मुकाम है। चाय की दुकान। बाज़ार। बस अड्डा। हर जगह यह खुरदुरी भाषा सुनाई देती है।

पुलिस की नौकरी करनी हो तो शायद गाली-शास्त्र में पारंगत होना भी ज़रूरी है।

कवि खुसकेट अकबराबादी ने बरसों पहले लिखा था “जिसे गाली देना नहीं आता, उसकी ज़िंदगी अधूरी है।”

आगरा इस बात को पूरी शिद्दत से साबित करता है। यहाँ लोग लड़ाई में हथियार कम निकालते हैं। गालियाँ ज़्यादा। 

जहाँ समाज बीमार होता है; वहाँ पिस्तौल चलती है।

जहाँ लोग थोड़े सभ्य होते हैं; वहाँ गाली से काम चल जाता है।

लेकिन आगरा की गाली संस्कृति पर एक नया खतरा मंडरा रहा है।

पश्चिमी असर। शहर संस्कृति के जानकार एक पंडित दुखी हैं। उनका कहना है कि आज के नौजवानों ने गालियों की पूरी विरासत बरबाद कर दी। उनकी पूरी शब्दावली बस दो अंग्रेज़ी लफ़्ज़ों में सिमट गई है; 

“ओह शिट।”

बस। न कोई तर्ज़। न कोई रंग।

आगरा की पुरानी गालियों में रचनात्मकता थी। लय थी। अदायगी थी। अब सब कुछ ग्लोबलाइजेशन की भेंट चढ़ रहा है।

फिर भी शहर चलता जा रहा है।

ताजमहल में दुनिया मोहब्बत देखने आती है। और बाहर गलियों में लोग ग़ुस्सा निकालते रहते हैं।

शायद बुज़ुर्ग ठीक ही कहते हैं; गालियां भाषा का श्रृंगार हैं। गालियाँ ज़बान में करंट भर देती हैं। बात में बेबाकी लाती हैं। 

बस एक छोटी-सी गुज़ारिश है। अगली बार ग़ुस्सा आए:  किसी की माँ को बख्श दीजिए। बेचारी भाषा में बहुत पहले ही शहीद हो चुकी है।

 विदेश नीति कोई सियासी खिलौना नहीं

राष्ट्रीय हित को दलीय शोर-शराबे से ऊपर उठना होगा

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बृज खंडेलवाल द्वारा

9 मार्च, 2026

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विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने हाल ही में एक बुनियादी सच्चाई को दोहराया है: भारत की तक़दीर  उसकी अपनी अंदरूनी ताक़त से तय होगी, दूसरों की मेहरबानी या गलतियों से नहीं। आज की बदलती दुनिया में, उन्होंने एक आत्मनिर्भर भारत पर ज़ोर दिया है, एक ऐसा भारत जो हिंद महासागर को सिर्फ एक रास्ता नहीं, बल्कि वैश्विक स्थिरता के लिए एक ज़रूरी हिस्सा मानता है। कोच्चि में ईरानी जहाज़ का रुकना भी इसी नीति का हिस्सा था, जिसे सरकार ने क्षेत्रीय उथल-पुथल के बीच एक 'मानवीय कदम'  बताया।

लेकिन, घरेलू राजनीति की तस्वीर कुछ अलग है। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने अमेरिकी सेना द्वारा ईरानी युद्धपोत IRIS देना को डुबोए जाने पर सरकार की "खामोशी" पर कड़े सवाल उठाए हैं। उन्होंने इसे भारत के बैक यार्ड,  में लगी आग करार दिया और पूछा कि क्या हमने अपनी रणनीतिक संप्रभुता  गिरवी रख दी है? उन्होंने तेल की सप्लाई और ऊर्जा सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई।

रक्षा और अंतरराष्ट्रीय मामलों में संजीदगी और संयम की ज़रूरत होती है। ये ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ राजनीतिक दलों को रोज़ाना की तू-तू मैं-मैं से ऊपर उठकर एक सुर में बोलना चाहिए। दुनिया किसी देश को सिर्फ उसकी सेना या जीडीपी से नहीं, बल्कि उसकी राजनीतिक बातचीत के तेवरों (standard/level) से आंकती है।

अफ़सोस की बात है कि यह अनुशासन  भारत की घरेलू बहस से गायब होता जा रहा है। विदेश नीति कोई टीवी की चिल्लाने वाली बहस नहीं है; यह एक बारीक महारत  है जहाँ हर शब्द का अपना कूटनीतिक वज़न होता है। जब अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को केवल राजनीतिक अंक बटोरने का ज़रिया बनाया जाता है, तो इससे दुनिया भर में गलत संदेश जाता है।

आज़ादी के बाद से भारत ने 'रणनीतिक स्वायत्तता' (strategic autonomy) की एक मज़बूत परंपरा निभाई है। नेहरू और इंदिरा गांधी से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी तक, एक ही उसूल  कायम रहा है: भारत हर शक्ति के साथ जुड़ेगा, लेकिन किसी का ताबेदार follower नहीं बनेगा। आज जब दुनिया महाशक्तियों की आपसी खींचतान और ऊर्जा संकट से गुज़र रही है, नई दिल्ली एक मुश्किल संतुलन बना रही है। हम वाशिंगटन से रिश्ते गहरे कर रहे हैं, मॉस्को के साथ पुरानी दोस्ती निभा रहे हैं और 'ग्लोबल साउथ' की आवाज़ बन रहे हैं।

लोकतंत्र में बहस ज़रूरी है, लेकिन जब अंदरूनी झगड़े विदेशी मंचों पर दिखने लगते हैं, तो देश की छवि को खामियाजा  भुगतना पड़ता है। 2020 के चीन सीमा विवाद का उदाहरण लीजिए। लद्दाख में ज़मीन खोने के आरोपों और सरकार के जवाबों के बीच जो शोर मचता है, उसका फायदा उठाकर चीन हमारी अंदरूनी एकता में कमी होने का दावा कर सकता है।

इसी तरह, 2025 में पाकिस्तान के खिलाफ की गई सैन्य कार्रवाई (ऑपरेशन सिंदूर) भी राजनीति की भेंट चढ़ गई। विपक्ष ने इसे विदेशी नीति की नाकामी बताया, जबकि सरकार ने इसे सेना का मनोबल गिराने वाला बयान कहा। सच जो भी हो, संकट के समय 'बंटा हुआ घर' दिखना देश के हित में नहीं होता।

चाहे विदेशी दौरों पर विवादित नेताओं से मिलना हो या रूस से तेल खरीदने का मामला, हर चीज़ को सियासी चश्मे से देखना हमारी साख  को कमज़ोर करता है।

भारत की ऐतिहासिक सफलताएं हमेशा आम सहमति  पर आधारित रही हैं। शीत युद्ध  के दौरान भी हमारे नेताओं ने दुनिया के सामने भारत के रुख को कमज़ोर नहीं होने दिया।

आज चुनौतियां और भी बड़ी हैं। दुनिया के समीकरण पल-पल बदल रहे हैं। ऐसे में भारत की स्थिरता और स्पष्टता ही हमारी सबसे बड़ी ताक़त है।

सरकार की आलोचना करना लोकतंत्र का हक है, लेकिन विदेशी मंच पर यह आलोचना रचनात्मक और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर होनी चाहिए।

हमारे राजनयिक और सैनिक बेहद कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं, हिमालय की बर्फीली चोटियों से लेकर संयुक्त राष्ट्र की मेजों तक। जब हमारी घरेलू राजनीति अलग-अलग संकेत देती है, तो उनका काम और भी मुश्किल हो जाता है।

विदेश नीति कोई 'स्प्रिंट' (100 मीटर की तेज़ दौड़) नहीं, बल्कि एक 'मैराथन' (लंबी दौड़) है। सरकारें आएंगी और जाएंगी, लेकिन राष्ट्र का हित शाश्वत, परमानेंट है। भारत की राजनीतिक जमात को यह याद रखना होगा कि जब देश दुनिया से मुखातिब  हो, तो उसकी आवाज़ में गरिमा, स्पष्टता और एकता होनी चाहिए।

Friday, March 6, 2026

 महिला दिवस किसके लिए?

सास भी कभी बहू थी… या बहू भी कभी सास बनेगी?

टूटती हदें: जब सास-बहू का झगड़ा जानलेवा हो जाए

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बृज खंडेलवाल द्वारा

8 मार्च 2026

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अगर पुरानी फिल्मों वाली ललिता पवार टाइप सास आज की मॉडर्न बहू से टकरा जाए, तो मंजर कैसा होगा?

और अगर टीवी सीरियल “वसुधा” की सास-बहू की लड़ाई असल जिंदगी में उतर आए, तो घर की कहानी कुछ और ही होगी।

बरसों से सास-बहू का रिश्ता टीवी सीरियलों, बॉलीवुड फिल्मों और डिनर टेबल की गपशप का पसंदीदा विषय रहा है। आम तौर पर इसे हल्के-फुल्के मज़ाक या ड्रामे के तौर पर दिखाया जाता है: चालाक सास और बेचारी, सताई हुई बहू।

लेकिन पिछले कुछ सालों में देश के अलग-अलग हिस्सों से जो खबरें आई हैं, वे इस मज़ाकिया तस्वीर को बिल्कुल झुठला देती हैं।

अब यह रिश्ता सिर्फ तानों, शिकायतों और चुप्पी भरे झगड़ों तक सीमित नहीं रहा। कई जगह यह टकराव हिंसा और कत्ल तक पहुँच गया है।

महाराष्ट्र से तमिलनाडु तक, संयुक्त परिवार की जो चमकदार तस्वीर दिखाई जाती थी, उसके पीछे छिपे तनाव अब खुलकर सामने आने लगे हैं।

सबसे हैरान करने वाली बात है इन मामलों की बर्बरता।

अब यह सिर्फ दहेज उत्पीड़न या आत्महत्या के लिए उकसाने तक सीमित नहीं रहा। कई मामलों में सीधे-सीधे हत्या हो रही है।

जनवरी 2026 में महाराष्ट्र के ठाणे में 60 साल की एक सास पर आरोप लगा कि उसने अपनी बहू का गला घोंट कर उसे मार डाला। वजह कोई मामूली घरेलू झगड़ा नहीं था। असल लड़ाई सरकारी नौकरी के फायदे और मुआवज़े को लेकर थी।

सास को लगता था कि बेटे की मौत के बाद यह हक उसका है।

लेकिन कानून के मुताबिक वह रकम बेटे की विधवा पत्नी को मिलनी थी।

यानी दुख, आर्थिक डर और असुरक्षा ने मिलकर गुस्से को कातिलाना शक्ल दे दी।

ऐसे मामले पहले भी सामने आए हैं।

2016 में मुंबई के पास मुंब्रा में एक सास ने अपनी बहू और उसकी माँ की गला रेत कर हत्या कर दी। वजह सिर्फ इतनी थी कि उसका बेटा अपनी बीवी को ज्यादा तवज्जो देता था।

यह सास-बहू संघर्ष का सबसे पुराना और बुनियादी रूप है; बेटे या शौहर पर भावनात्मक कब्ज़े की जंग।

2019 में वसई में एक सास ने बहू को चाकू मार दिया। बाद में वह खुद खून से सने हाथों के साथ पुलिस स्टेशन पहुंच गई।

इससे साफ है कि घरेलू सत्ता की लड़ाई में कभी-कभी होश-ओ-हवास भी गायब हो जाते हैं।

ये घटनाएँ किसी एक प्रदेश तक सीमित नहीं हैं।

यह एक तरह से पूरे हिंदुस्तान की कहानी बनती जा रही है।

2025 में झारखंड में 60 साल की अनीता देवी को अपनी बहू को जहर देने के जुर्म में उम्रकैद की सज़ा हुई।

उत्तर प्रदेश में वजहें और भी दिलचस्प हैं।

2023 में अमरोहा में एक सास ने अपनी बहू को गोली मार दी। वजह बताई गई; उसका “मॉडर्न लाइफस्टाइल” और घर के कामों में दिलचस्पी न लेना।

यह दरअसल दो पीढ़ियों की टक्कर है। एक तरफ पारंपरिक सोच वाली सास, जिसे आज्ञाकारी गृहिणी चाहिए।

दूसरी तरफ नई पीढ़ी की औरत, जो अपने करियर, आज़ादी और जिंदगी के फैसले खुद करना चाहती है।

लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी है।

हर बार सास ही हमलावर नहीं होती।

अब कई मामलों में बहू भी पलटवार कर रही है: और वह भी बेहद खतरनाक तरीके से।

2025 में दिल्ली में एक गर्भवती महिला ने अपनी सास को चाकू मारकर हत्या कर दी। फिर लूट का नाटक रचा और सबूत मिटाने के लिए लाश को आग लगा दी।

हिमाचल प्रदेश के सिरमौर में भी बहू ने घरेलू सामान और जिम्मेदारियों को लेकर हुए झगड़े में अपनी बुजुर्ग सास पर तेज हथियार से हमला किया।

झांसी में जमीन के झगड़े और कथित अवैध रिश्तों के शक ने बहू को अपनी सास को जहर देने तक पहुंचा दिया।

इन घटनाओं से एक बात साफ हो जाती है।

“बेचारी बहू” और “जालिम सास” वाला पुराना स्टीरियोटाइप अब टूट रहा है।

असलियत कहीं ज्यादा जटिल और जहरीली है।

शायद सबसे सिहराने वाला मामला 2026 की शुरुआत में तमिलनाडु के कल्लाकुरिची से सामने आया।

यहां एक सास, मैरी, और उसकी बेटी एमिली ने मिलकर 25 साल की नंदिनी को कथित अवैध संबंधों के शक में बहला-फुसला कर मार डाला। बाद में उसकी लाश नदी किनारे फेंक दी गई।

यह घटना दिखाती है कि कई बार परिवार के लोग मिलकर “बाहरी” बहू के खिलाफ साजिश रच लेते हैं।

तो आखिर इन खौफनाक घटनाओं की जड़ क्या है?

असल वजह भारतीय परिवार की कुछ पुरानी कमजोरियां हैं।

संयुक्त परिवार, जो कभी सहारा और सुरक्षा का सिस्टम माना जाता था, अब कई बार प्रेशर कुकर बन जाता है।

सास, जो अक्सर विधवा होती है या जिसने पूरी जिंदगी परिवार के लिए कुर्बान कर दी, अपनी पहचान और सुरक्षा बेटे से जोड़ कर देखती है।

ऐसे में बहू का घर में आना उसे अपने रुतबे और जगह के लिए खतरा लगता है।

उधर बहू को हर वक्त की दखलअंदाजी और नियंत्रण घुटन जैसा महसूस होता है। पैसे, निजी जगह, बच्चों की परवरिश, हर मुद्दा ताकत की लड़ाई बन जाता है।

और जब बातचीत बंद हो जाए, और बेटा या पति चुप तमाशबीन बना रहे, तो छोटे-छोटे झगड़े कभी-कभी खूनी हादसों में बदल जाते हैं।

ये घटनाएँ एक कड़वी चेतावनी हैं।

सास-बहू का रिश्ता अब सिर्फ टीवी सीरियल का मसाला या पारिवारिक ड्रामा नहीं रहा।

यह मानसिक तनाव, आर्थिक असुरक्षा और पितृसत्तात्मक सोच का ऐसा संगम बनता जा रहा है जो कई घरों को क्राइम सीन में बदल रहा है।

अगर परिवारों ने समय रहते इज्ज़त, दूरी और समझदारी के नए उसूल नहीं अपनाए, तो ऐसे सुर्खियां शायद और आम होती जाएंगी।

Thursday, March 5, 2026

 भारत का शोर उत्सव: 

जब हर जश्न लाउडस्पीकर बन जाता है!

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

7 मार्च 2026

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भारत में एक चीज़ बहुत तेजी से विलुप्त हो रही है, खामोशी।

जैसे जंगलों से बाघ गायब होते हैं, वैसे ही शहरों से सन्नाटा।

यह देश त्योहारों का है, रस्मों का है, जुलूसों का है। लेकिन इन सबके बीच एक और चीज़ है, अखंड और असीम शोर।

शादी हो तो ऐसा लगता है मानो पूरा ब्रह्मांड नाचने बुलाया गया हो। घोड़ी पर बैठा दूल्हा, पीछे डीजे का ट्रक।बॉलीवुड के रीमिक्स 100 डेसिबल पर चीखते हुए। दूल्हे से ज्यादा थके हुए घोड़े के कान।

अजीब विडंबना है।

शादी प्यार का उत्सव है, लेकिन संगीत ऐसा कि दिल नहीं, कान फट जाएं।

और अगर आप सोचते हैं कि शोर सिर्फ खुशी का हिस्सा है, तो श्मशान घाट का चक्कर लगा लीजिए। अब तो उठावनी से भी शांति गायब हो चुकी है, प्रवचन बाज आ चुके हैं। वहाँ भी लाउडस्पीकर लगे मिलेंगे।

मृत्यु, जो कभी शांत, गंभीर और चिंतन का क्षण हुआ करती थी, अब एम्पलीफायर पर विदाई बन गई है।

भजन भी ऐसे बजते हैं जैसे स्वर्ग का दरवाज़ा खोलने के लिए भगवान को जगाना पड़ रहा हो।

भारत का त्योहार कैलेंडर किसी ध्वनि विस्फोट का टाइम टेबल जैसा है।होली आती है, ढोल, डीजे, चीखती भीड़। घिसे पिटे फिल्मी गाने। 

कई तरह की चतुर्थी, जयंती, भंडारे, रात्रि जागरण, जयकारे, मूर्ति विसर्जन,  बेचारे मच्छर भी बिलबिला जाते हैं! सड़कों पर जुलूस, ढोल-ताशे और सबवूफर। पूजा होती है, कोलकाता की गलियाँ थरथराती हैं।दीवाली पर आसमान पटाखों से नहीं, डेसिबल से भर जाता है। ऐसा लगता है जैसे हर त्योहार एक प्रतियोगिता हो रही है! कौन ज्यादा शोर मचा सकता है।

कागज पर नियम मौजूद हैं। 2000 के Noise Pollution Rules साफ कहते हैं कि रिहायशी इलाकों में दिन में 55 डेसिबल और रात में 45 डेसिबल की सीमा है। अस्पतालों और स्कूलों के पास तो इससे भी कम। लेकिन कागज की दुनिया और भारतीय सड़कों की दुनिया में जमीन-आसमान का फर्क है।

दिल्ली और मुंबई में ट्रैफिक का औसत शोर 80 डेसिबल के आसपास रहता है। पीक आवर में यह 100 तक पहुंच जाता है। यानी हम रोज़ाना लगभग जेट इंजन की आवाज़ में जी रहे हैं। कोई प्रेशर हॉर्न बजाता है, कोई साइलेंसर निकलकर पूरी कॉलोनी के कई चक्कर लगाता है!

सवाल उठता है, हम इतने शोर-प्रिय क्यों हैं? इतिहास कुछ संकेत देता है।

प्राचीन भारत में युद्ध और विजय के समय शंख और नगाड़े बजते थे। ध्वनि को शक्ति का प्रतीक माना जाता था।

मान्यता थी कि तेज आवाज़ बुरी आत्माओं को दूर भगाती है और देवताओं का ध्यान आकर्षित करती है।

लेकिन आज का शोर आध्यात्मिक कम और सामाजिक प्रदर्शन ज्यादा है।

राजनीति ने इसे और बढ़ाया।

चुनावी रैलियाँ, माइक, स्पीकर, नारे, गाड़ियों के काफिले।

ऐसा लगता है लोकतंत्र की ताकत वोट में नहीं, लाउडस्पीकर में है।

धार्मिक मंच भी पीछे नहीं हैं।

हर उपदेशक के हाथ में माइक्रोफोन।

ज्ञान कम, वॉल्यूम ज्यादा।

टीवी डिबेट्स से लेकर मंदिर प्रवचन तक; एक ही नियम है: जो सबसे जोर से बोलेगा, वही जीतेगा।

फिर आया तकनीक का चमत्कार या आविष्कार, लाउडस्पीकर देव।

1920 के दशक में यह उपकरण थिएटर और सभाओं में स्पष्ट आवाज़ के लिए बना था। लेकिन भारत में यह सांस्कृतिक विस्फोटक साबित हुआ है। आजकल एक ही जगह पर सौ सौ decks लगाए जाते हैं, कोई चैन से न जीए।

आज हर मंदिर, हर मस्जिद, हर जुलूस, हर सभा, सबके पास अपनी ध्वनि सेना है। जहाँ पहले घंटी बजती थी, अब बास स्पीकर गूंजते हैं।

कभी-कभी लगता है कि भगवान तक पहुँचने का रास्ता भक्ति से नहीं, वॉट्स से होकर जाता है।

दुनिया के सबसे शोर भरे शहरों की सूची में भारतीय शहर नियमित रूप से जगह बनाते हैं।

लगातार शोर का असर गंभीर है; हाई ब्लड प्रेशर, नींद की कमी, मानसिक तनाव, सुनने की क्षमता का ह्रास।

हर साल हजारों लोग समय से पहले बहरे हो जाते हैं; कारण कोई वायरस नहीं, डेसिबल।

लेकिन शोर का दायरा सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं। हिमालय की शांत घाटियाँ भी अब सुरक्षित नहीं रहीं।

त्योहारों और पर्यटन के मौसम में 90 डेसिबल तक शोर दर्ज किया गया है।

पक्षी घोंसले छोड़ देते हैं।

जानवर जंगलों में भाग जाते हैं।

प्रकृति, जिसे हमने ध्यान और योग की भूमि कहा था, अब लाउडस्पीकर के बीच ध्यान करने की कोशिश कर रही है।

विडंबना देखिए।

ऋषियों की भूमि में योग शिविर भी माइक्रोफोन पर चलते हैं। कोचिंग क्लासेज भी ! प्राणायाम की गहरी सांसें भी स्पीकर से गूंजती हैं।

खामोशी, जो आध्यात्मिक अनुभव की आत्मा है, अब एलिट शौक समझी जाती है। सच्चाई शायद थोड़ी असहज है।

यह शोर हमारी सांस्कृतिक ऊर्जा जितना ही हमारी सामूहिक बेचैनी का संकेत भी है। एक ऐसा समाज जहाँ हर कोई सुना जाना चाहता है। जहाँ ध्यान पाने का सबसे आसान तरीका है, आवाज़ बढ़ा देना।

इसलिए हर मंच पर माइक है।

हर जुलूस में स्पीकर।

हर गली में डीजे।

लेकिन सवाल अभी भी वही है? 

क्या भगवान सचमुच इतने दूर हैं कि उन्हें सुनाने के लिए हमें 100 डेसिबल चाहिए?

या हम अपनी ही खालीपन को आवाज़ से भरने की कोशिश कर रहे हैं?

भारत की असली ताकत उसकी विविधता है, उसकी संस्कृति है, उसका उत्सव है।

लेकिन उत्सव का मतलब कोलाहल नहीं होना चाहिए।

कभी-कभी सभ्यता की सबसे बड़ी पहचान शोर नहीं, संयम होती है।

शायद समय आ गया है कि हम जश्न मनाना सीखें:  बिना पड़ोसी के कान फाड़े। माइक थोड़ा कम।

ढोल थोड़ा धीमा। और शायद, बस शायद, भारत फिर से खामोशी की संगीत सुन सके।

 ताज के साये में सूखी यमुना: अब बैराज ही अंतिम उपाय

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

मार्च 2, 2026

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आगरा की पहचान ताजमहल है। पर ताज के पीछे बहती यमुना आज भीख माँगती नदी बन चुकी है।

पानी नहीं। प्रवाह नहीं। जीवन नहीं।

दशकों से एक प्रस्ताव फाइलों में धूल खा रहा है; ताजमहल से लगभग 1.5 किलोमीटर डाउनस्ट्रीम, नागला पेमा के पास यमुना पर एक बैराज का निर्माण। यह कोई नया विचार नहीं। यह 1986-87 से चली आ रही माँग है। कई बार शिलान्यास हुए। कई बार घोषणाएँ हुईं। पर यमुना आज भी सूखी है।

इस मुद्दे को फिर से उठाया है सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक, पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट, प्रेम प्रकाश ने। उन्होंने मुख्यमंत्री को लिखे अपने विस्तृत ज्ञापन में साफ शब्दों में कहा है: “शहर 1984 से इंतज़ार कर रहा है। अब और देरी आगरा के भविष्य के साथ अन्याय होगा।”

क्यों ज़रूरी है यह बैराज?

सबसे पहली और सीधी ज़रूरत, ताज के पीछे सालभर जल भंडारण।

आज सूखी यमुना ताजमहल की नींव और पर्यावरण दोनों के लिए खतरा है।

दूसरा, भूजल स्तर का लगातार गिरना।

प्रेम प्रकाश लिखते हैं, “अत्यधिक दोहन और अनियंत्रित खपत के कारण भूजल नीचे चला गया है। पानी की कमी और गुणवत्ता दोनों बिगड़ी हैं।”

तीसरा, वर्तमान जल संस्थान संरचनाएँ: जीवनी मंडी और सिकंदरा, अब शहर की ज़रूरतें पूरी नहीं कर पा रहीं।

“दोनों पुरानी हैं, विस्तार की गुंजाइश नहीं है,” वे कहते हैं। बैराज बनने पर दोनों किनारों पर नई जल परियोजनाएँ विकसित की जा सकती हैं। अभी तक अस्थायी समाधान के रूप में गंगा जल योजना से मथुरा के रास्ते पानी लाया जा रहा है। पर यह स्थायी इलाज नहीं।

आगरा को अपनी यमुना नदी चाहिए। वो भी स्वस्थ, जीवंत।

इतिहास गवाह है

1986-87 से यह प्रस्ताव सार्वजनिक विमर्श में है। कई गणमान्य व्यक्तियों ने इसकी नींव रखी। 2017 में विधानसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्वयं नागला पेमा स्थल का दौरा किया।

सिंचाई विभाग ने डीपीआर तैयार की। सुप्रीम कोर्ट और केंद्रीय जल मंत्री की सहमति भी मिली।

फिर भी काम आगे नहीं बढ़ा। फाइलें चलीं। समय बीता। नदी सूखती रही।

प्रेम प्रकाश अपने पत्र में लिखते हैं; “बैराज ओखला बैराज की तर्ज पर कंक्रीट का होना चाहिए, ताकि जल संकट का स्थायी समाधान हो सके और आपात स्थिति में सिंचाई के लिए भी पानी उपलब्ध रहे।”

विकास का व्यापक खाका

यह केवल पानी का सवाल नहीं। यह समग्र शहरी पुनर्जीवन की योजना है।बैराज के साथ “नेविगेशन” को राष्ट्रीय जलमार्ग (NW-110) का हिस्सा बनाया जा सकता है।

दोनों किनारों पर रिवर फ्रंट विकसित हो सकता है, ठीक साबरमती रिवर फ्रंट, अहमदाबाद की तर्ज पर।

प्रेम प्रकाश सुझाव देते हैं: “नया आगरा, साइबर सिटी के रूप में, दोनों तटों पर विकसित हो सकता है, आधुनिक पुल और सड़क सुविधाओं के साथ।”

ताज से लाल किले के बीच “आगरा चोपाटी” विकसित करने का विचार भी रखा गया है, मुंबई के जुहू चोपाटी की तर्ज पर।

बोटिंग। स्पीड बोट। पार्किंग। प्रवेश शुल्क। राजस्व। रोजगार।

अनुमान है कि कम से कम 1000 लोगों को सीधा रोजगार मिल सकता है।

शाहजहाँ गार्डन को भी इस हरित कॉरिडोर से जोड़ा जा सकता है।

सुबह-शाम सैर। शांत वातावरण।जीवंत नदी। पर्यटन को भी लाभ।

रात भर ठहरने वाले पर्यटकों की संख्या बढ़ेगी। स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी।

इस मुद्दे को जीवित रखा है “रिवर कनेक्ट” अभियान के कार्यकर्ताओं ने।

ये वे योद्धा हैं जो हर शाम यमुना आरती स्थल पर एकत्र होते हैं। भजन। मंत्र। दीपदान। दैनिक यमुना आरती अब केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं रही, कहते हैं पर्यावरणविद डॉ देवाशीष भट्टाचार्य। यह जन-जागरण का मंच बन चुकी है। आरती के बाद चर्चा होती है: बैराज क्यों ज़रूरी है।यमुना क्यों सूख रही है। सरकार को क्या करना चाहिए। युवाओं को जोड़ा जा रहा है। स्थानीय व्यापारियों को समझाया जा रहा है। पर्यावरण प्रेमियों को संगठित किया जा रहा है।

“नदी बचेगी तो ताज बचेगा,” यह हमारा नारा है।

अब निर्णय का समय

आगरा को मेट्रो मिली। एयर कनेक्टिविटी मिली। बेहतर सड़कें और कानून व्यवस्था मिली।

अब सबसे ज़रूरी अधोसंरचना बची है, यमुना पर बैराज।

प्रेम प्रकाश लिखते हैं; “यह समय राजनीतिक रूप से भी उपयुक्त है और नागरिकों की पीड़ा को देखते हुए नैतिक रूप से भी।”

बैराज को प्रधानमंत्री गति शक्ति मिशन का हिस्सा बनाया जा सकता है। समयबद्ध क्रियान्वयन।

स्पष्ट लक्ष्य। यह परियोजना केवल कंक्रीट की दीवार नहीं होगी। यह आगरा के आत्मविश्वास की पुनर्स्थापना होगी।

ताजमहल विश्व धरोहर है। पर उसके पीछे बहती नदी स्थानीय जीवनधारा है। अगर यमुना यूँ ही सूखी रही तो ताज की परछाईं भी फीकी पड़ जाएगी।

इतिहास हमें माफ़ नहीं करेगा।

आगरा 41 वर्षों से इंतज़ार कर रहा है।

अब इंतज़ार खत्म होना चाहिए।

यमुना को फिर से बहना है।

ताज के पीछे जल चमकना है।

और यह तभी संभव है जब नगला पेमा में बैराज बने

 प्यार किया तो 

पेरेंट्स से छिपाने वाली क्या बात है?

गार्ड रेल्स, जंजीरें नहीं: 

क्यों ज़रूरी है विवाह में एहतियात की एक परत

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

3 मार्च 2026

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रीना, 23 साल की। मध्यमवर्गीय परिवार की सीधी-सादी लड़की।छोटे शहर से महानगर आई थी नौकरी की तलाश में। सोशल मीडिया पर एक युवक से दोस्ती हुई। नाम कुछ और बताया। धर्म कुछ और। परिवार के बारे में अधूरी बातें। बड़े सपने। मीठी बातें। “मैं तुमसे शादी करूँगा… बस घरवालों को मत बताना अभी।”

रीना ने भरोसा किया। मोहब्बत में अक्सर तर्क पीछे छूट जाता है। कुछ ही दिनों में जल्दी-जल्दी अदालती शादी। परिवार को खबर तक नहीं। कागज़ी औपचारिकताएँ पूरी। फिर दबाव। “धर्म बदल लो… वरना रिश्ता नहीं चलेगा।” जिस्मानी और भावनात्मक ब्लैकमेल। निजी तस्वीरों की धमकी। दूसरे शहर भागे। जब तक रीना को सच्चाई समझ आई, बहुत देर हो चुकी थी। यह कहानी काल्पनिक लो सकती है, लेकिन आए दिन इस तरह की खबरें पढ़ने को मिल रही हैं, और ऐसे आरोपों वाले मामले देश के कई हिस्सों में दर्ज भी हुए हैं। 

बस यहीं से सवाल उठता है :  क्या विवाह जैसी गंभीर संस्था में एक न्यूनतम सूचना-प्रणाली, एक पारिवारिक सूचना, एक “पॉज़”, एक कूलिंग समयावधि ज़रूरी नहीं है?

भारत कोई प्रयोगशाला समाज नहीं है। यह तहज़ीबों, रिश्तों और भावनाओं से बुना देश है। तेज़ बदलाव के दौर में भी परिवार यहाँ एक अहम इकाई है।

इसी पृष्ठभूमि में गुजरात रजिस्ट्रेशन of Marriages Act, 2006 में प्रस्तावित संशोधन आजकल विवाद और चर्चा में है।

फरवरी 2026 में गुजरात के उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी ने घोषणा की कि विवाह पंजीकरण के समय जोड़े को यह बताना होगा कि क्या माता-पिता को सूचना दी गई है। उनके संपर्क विवरण दिए जाएँगे। रजिस्ट्रार दस कार्य दिवस में सूचना देगा। 30–40 दिन की अवधि सत्यापन और आपत्ति के लिए होगी।

विरोधी कहते हैं ये निजता पर हमला है। समर्थक कहते हैं ये पारदर्शिता और सुरक्षा का मंत्र है।

बहस का केंद्र अंतरधार्मिक प्रेम नहीं है। न ही यह वयस्कों की आज़ादी छीनने का प्रस्ताव है। संविधान हर बालिग को अपनी पसंद से विवाह और धर्म चुनने का अधिकार देता है।मगर समस्या वहाँ खड़ी होती है जहाँ प्रेम की आड़ में फ़रेब होता है।

झूठी पहचान। जबरन धर्म परिवर्तन के आरोप। कई बार नाबालिगों का शोषण।

जिन राज्यों में विशेष कानून बने, वहाँ कुछ आँकड़े सामने आए हैं।

Uttar Pradesh Prohibition of Unlawful Conversion of Religion Act 2020 के तहत 2021 से 2024 के बीच सैकड़ों मामले दर्ज हुए, अनेक गिरफ्तारियाँ हुईं। कुछ मामलों में अदालत में पीड़िताओं ने जबरन धर्म परिवर्तन का आरोप लगाया।

मध्य प्रदेश में Madhya Pradesh Freedom of Religion Act 2021 के अंतर्गत भी अनेक मामले दर्ज हुए, जिनमें नाबालिग लड़कियों के केस शामिल थे।

सज़ा कम होना यह साबित नहीं करता कि समस्या नहीं है। कई बार गवाह दबाव में मुकर जाते हैं। सुरक्षा नहीं मिलती। मुकदमे लंबित रहते हैं।

पहले ऐसे मामलों को सामान्य आपराधिक धाराओं में दर्ज किया जाता था। धर्म परिवर्तन का पहलू अलग से दर्ज ही नहीं होता था। अब कम से कम तस्वीर आंशिक रूप से साफ़ हो रही है।

सवाल यह है ; अगर कुछ रीना जैसी लड़कियाँ सचमुच धोखे का शिकार हो रही हैं, तो क्या राज्य चुप रहे?

भारत में विवाह सिर्फ़ दो व्यक्तियों का कॉन्ट्रैक्ट नहीं है। यह परिवारों का मिलन है। बैंड बाजा बारात। सामाजिक संतुलन से जुड़ा रिश्ता है। जब धोखा होता है, तो असर व्यापक होता है।

गुजरात का प्रस्ताव माता-पिता को वीटो पावर नहीं देता। यह सिर्फ सूचना देता है। एक दस्तावेज़ी रिकॉर्ड बनाता है। एक ठहराव देता है।

आज के डिजिटल दौर में फर्जी प्रोफाइल बनाना आसान है। पहचान छिपाना आसान है। ऐसे में सावधानी को “जंजीर” कहना शायद अतिशयोक्ति है।

साथ ही यह भी सच है कि किसी भी कानून का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। असली प्रेम करने वाले जोड़ों को परेशान नहीं किया जाना चाहिए। निगरानी और जवाबदेही ज़रूरी है।

देश स्तर पर भी एक समान नीति पर विचार हो सकता है। गवाह सुरक्षा तंत्र मजबूत होना चाहिए। संगठित अपराध पर कड़ी सज़ा होनी चाहिए।

लेकिन मूल प्रश्न वही है ; क्या राज्य की ज़िम्मेदारी नहीं कि वह कमजोरों की हिफ़ाज़त करे? रीना की काल्पनिक कहानी हमें भावुक कर सकती है। पर असली मुद्दा भावुकता नहीं, एहतियात है।

आज़ादी बेशक़ अज़ीज़ है। मगर सुरक्षा भी उतनी ही ज़रूरी है।

अगर विवाह पंजीकरण से पहले एक पारिवारिक सूचना किसी एक रीना को भी संभावित धोखे से बचा ले, तो क्या यह कदम पूरी तरह ग़लत कहा जा सकता है?

भारत जैसे संवेदनशील, विविध और जटिल समाज में, संतुलन ही असली सुशासन है।