Tuesday, August 11, 2026

 अमेरिका में सपने टूटे, भारत में कहानी मिली

संतोष नायर की जिंदगी का कड़वा-मीठा सफर

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पुस्तक समीक्षा

Silver Linings in the Dark Sky

278 पृष्ठ | अंग्रेज़ी

प्रकाशक: Pink Lotus, Varanasi

उपलब्ध: Amazon

लेखक: Santosh Nayar

संपादक: Dr Alok Gupta, PhD

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

13 अगस्त 2026

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अमेरिका सपनों की धरती है। कम-से-कम विज्ञापन यही कहते हैं। वहाँ सपने डॉलर में आते हैं और कभी-कभी उनकी ईएमआई जिंदगी भर चुकानी पड़ती है।

संतोष नायर भी सपने लेकर अमेरिका गए थे। लेकिन जिंदगी ने उन्हें ऐसा पैकेज थमा दिया, जिसमें सफलता के साथ बीमारी, शराब, टूटते रिश्ते, अदालत, जेल और आखिर में भारत वापसी भी शामिल थी। कहानी में इतना मसाला है कि बॉलीवुड की कोई पटकथा पढ़कर भी कह सकती है: भाई, थोड़ा कम करो!

लेकिन यह फिल्म नहीं, एक असली जिंदगी थी। और असली जिंदगी की पटकथा सबसे ज्यादा निर्दयी होती है।

संतोष नायर को आखिरकार कुछ ठहराव मैसूर में मिला। मगर अंतिम वर्षों में खराब सेहत ने उन्हें फिर घेर लिया। 2024 में उनका निधन हो गया। पीछे रह गई एक अधूरी पांडुलिपि, और एक ऐसी जिंदगी, जिसमें जितने मोड़ थे, उतने शायद किसी हाईवे में भी नहीं होते।

यही पांडुलिपि बाद में Silver Linings in the Dark Sky बनी।

जिंदगी ने कोई सीधी सड़क नहीं दी

नायर पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट थे। महत्वाकांक्षी थे। प्रतिभाशाली थे। अमेरिका में बेहतर भविष्य का सपना था। शादी हुई। परिवार बना। पेशेवर सफलता मिली।

फिर जिंदगी ने अचानक गियर बदल दिया।

बाइपोलर डिसऑर्डर ने उनके जीवन में प्रवेश किया। मानसिक उन्माद के दौर आए। शराब ने मुश्किलों को और उलझाया। रिश्ते कमजोर हुए। गलत फैसले हुए। कानून सामने आया और अंततः जेल की सलाखें भी आ गईं।

तीन शादियाँ, पारिवारिक तनाव, कभी गजब का आत्मविश्वास और कभी बच्चों जैसी मासूमियत; नायर एक ही व्यक्ति में कई व्यक्तित्वों का चलता-फिरता संस्करण लगते हैं।

लेकिन यही बाइपोलर डिसऑर्डर की पेचीदगी भी है। यह बीमारी सिर्फ मूड बदलने का मामला नहीं है। इसमें व्यक्ति की सोच, ऊर्जा, निर्णय क्षमता और व्यवहार तक प्रभावित हो सकते हैं।

मेनिया के दौरान इंसान को अपने फैसले बिल्कुल सही लग सकते हैं। दिमाग एक्सप्रेस ट्रेन की रफ्तार से दौड़ता है और विवेक बेचारा अगले स्टेशन पर छूट जाता है।

फिर जिंदगी बिल भेजती है।

रिश्तों का बिल।

पैसों का बिल।

नौकरी का बिल।

परिवार की चिंता का बिल।

और अंत में कानून का बिल, जिसमें ब्याज सबसे ज्यादा होता है।

नायर कई बार दवा लेना भूल जाते थे। इसके बाद उनका व्यवहार बदल जाता था। वे चिड़चिड़े, रूखे या हिंसक हो सकते थे। उनके अनुभव से पता चलता है कि मानसिक बीमारी को समझे बिना केवल व्यवहार को देखना कितना खतरनाक हो सकता है।

लेकिन नायर सिर्फ अपनी बीमारी नहीं थे

यही इस किताब की सबसे महत्वपूर्ण बात है।

नायर को सिर्फ बाइपोलर डिसऑर्डर वाला व्यक्ति मान लेना उनके साथ नाइंसाफी होगी। वे बुद्धिमान थे। जिज्ञासु थे। महत्वाकांक्षी थे। उनमें हास्यबोध था। वे अच्छे पेशेवर, पति, पिता, मित्र और प्रवासी भी थे।

बीमारी उनकी कहानी का हिस्सा थी।

पूरी कहानी नहीं।

यही फर्क इस आत्मकथा को महज बीमारी की कहानी बनने से रोकता है।

नायर अपनी जिंदगी को चमकदार पैकेजिंग में बेचने की कोशिश नहीं करते। वे खुद को महान नायक नहीं बनाते। अपनी गलतियों पर पर्दा नहीं डालते। अपनी कमजोरियों को भी सामने रखते हैं।

कभी वे बेहद समझदार लगते हैं। कभी लापरवाह। कभी अजीब। कभी बेहद मासूम।

और कई बार इतने मजेदार कि पाठक सोचता है, यह आदमी अपनी जिंदगी का दुख भी स्टैंड-अप कॉमेडी में बदल सकता था।

अध्यायों के नाम भी चुगली करते हैं

नायर की किताब के अध्यायों के नाम उनके मिजाज की पूरी चुगली करते हैं।

पहली शादी का नाम है—“Made in Heaven, Deep Fried on Earth.”

दूसरी शादी—“Until Mania Do Us Apart.”

और जेल?

उसे उन्होंने अपनी “Favorite Alma Mater” बना दिया।

आम आदमी कॉलेज से डिग्री लेकर निकलता है।

नायर जेल से अनुभव लेकर निकले।

जिंदगी ने उन्हें शायद गलत जगह दाखिला दिया था, लेकिन उन्होंने वहाँ भी नोट्स बना लिए।

हँसी के पीछे हालांकि दर्द बहुत गहरा है।

बीमारी और अपराध के बीच की धुंध

नायर के जेल अनुभव अमेरिकी न्याय व्यवस्था पर असहज सवाल उठाते हैं।

मानसिक बीमारी से जूझता व्यक्ति जब कानून के सामने आता है, तो क्या सिस्टम उसके मन को समझता है या सिर्फ उसके व्यवहार को सजा देता है?

सवाल आसान हैं।

जवाब नहीं।

बीमारी कब व्यवहार बन जाती है?

व्यवहार कब गलती बनता है?

और गलती कब अपराध?

किताब इन सवालों का कोई आसान फार्मूला नहीं देती। शायद इसलिए कि जिंदगी भी ऐसा कोई फार्मूला नहीं देती।

मानसिक उन्माद में लिया गया फैसला बाद में पागलपन लग सकता है। लेकिन उस समय वही फैसला व्यक्ति को पूरी तरह सही लगता है।

आत्मविश्वास लापरवाही बन जाता है। ऊर्जा जुनून में बदल जाती है। विचार इतनी तेजी से दौड़ते हैं कि उनके परिणाम पीछे छूट जाते हैं।

और जब परिणाम आते हैं, तब तक ट्रेन काफी दूर निकल चुकी होती है।

अँधेरे में भी हास्य की एक खिड़की

नायर की सबसे बड़ी खूबियों में एक उनका हास्यबोध था।

वे अपनी जिंदगी के सबसे खराब अध्यायों में भी विडंबना खोज लेते थे। शायद यही उनकी मानसिक ताकत थी।

यह किताब इसलिए कोई मोटिवेशनल पोस्टर नहीं बनती।

यह वह किताब नहीं है जिसमें लिखा हो; “मुश्किलों से मैंने सीखे जीवन के दस महान सबक।”

न कोई बनावटी ज्ञान।

न हर पन्ने पर चमकदार जीवन-दर्शन।

बस एक आदमी है जो कहता है; मेरे साथ यह हुआ।

और फिर पाठक खुद तय करता है कि इससे क्या समझना है।

यही ईमानदारी किताब को असरदार बनाती है।

जेल में शुरू हुई कहानी

नायर ने जेल में रहते हुए अपनी आत्मकथा लिखना शुरू किया था। 2013 में उन्होंने पांडुलिपि डॉ. आलोक गुप्ता को भेजी।

भारत लौटने के बाद डॉ. गुप्ता ने उन्हें Glowtronics में काम करने का अवसर दिया। लगा कि शायद जिंदगी अब दूसरी पारी खेलने के लिए तैयार है।

लेकिन बीमारी ने फिर दस्तक दी।

नौकरी चली गई। पांडुलिपि भी जिंदगी की फाइलों में दब गई।

और जिंदगी, जैसा कि अक्सर करती है, आगे बढ़ गई।

फिर 2024 में नायर का निधन हो गया।

लेकिन कहानी खत्म नहीं हुई थी।

2026 में डॉ. गुप्ता को वह पुरानी पांडुलिपि फिर मिली।

एक भूली हुई आवाज ने अचानक दरवाजा खटखटाया।

नायर अब सफाई देने के लिए मौजूद नहीं थे। वे किसी घटना पर अपना पक्ष नहीं रख सकते थे। अपनी गलती को सही नहीं ठहरा सकते थे। किसी पुराने फैसले का संदर्भ नहीं समझा सकते थे।

इसलिए किताब में उनकी आवाज जैसी थी, वैसी ही बची रही।

कच्ची।

बेबाक।

मजेदार।

कभी गुस्सैल।

कभी कमजोर।

और सबसे बढ़कर: इंसानी।

किताब न बरी करती है, न सजा देती है

Silver Linings in the Dark Sky नायर को निर्दोष साबित करने की कोशिश करती है, न उन्हें कटघरे में खड़ा करती है।

वह सिर्फ हमसे थोड़ी समझ मांगती है।

और थोड़ी इंसानियत।

मानसिक बीमारी को लेकर हमारा समाज अभी भी अजीब तरह से असहज है। शारीरिक बीमारी हो तो हम दवा, डॉक्टर और आराम की सलाह देते हैं। मानसिक बीमारी हो तो सलाह देने वालों की पूरी बारात निकल आती है।

“हिम्मत रखो।”

“अपने आपको कंट्रोल करो।”

“ज्यादा मत सोचो।”

काश दिमाग भी रिमोट कंट्रोल से चलता!

बाइपोलर डिसऑर्डर गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्या है। इसमें मूड, ऊर्जा और व्यवहार में अत्यधिक उतार-चढ़ाव आ सकता है। समय पर उपचार, दवा, थेरेपी और परिवार का सहयोग व्यक्ति को स्थिर और सार्थक जीवन जीने में मदद कर सकते हैं।

नायर की कहानी इसी समझ की जरूरत को सामने लाती है।

जिंदगी ने सब कुछ दिया, लेकिन पूरा नहीं दिया

नायर की जिंदगी में उपलब्धियाँ थीं, लेकिन नुकसान भी कम नहीं थे।

प्रतिभा हमेशा सफलता में नहीं बदल सकी।

रिश्ते टूटे।

मौके हाथ से निकले।

बीमारी ने रास्ता रोका।

गलत फैसलों ने कीमत वसूली।

फिर भी कोशिश चलती रही।

अमेरिका से भारत तक।

कामयाबी से गिरावट तक।

जेल से नई शुरुआत तक।

और एक भूली हुई पांडुलिपि से प्रकाशित किताब तक।

यही इस कहानी की असली ताकत है।

आखिर में कहानी किसकी है?

Silver Linings in the Dark Sky अँधेरे पर विजय की कहानी नहीं है।

यह उस आदमी की कहानी है जिसने लंबे समय तक अँधेरे में जिंदगी गुजारी। कई बार रास्ता खोया। कई बार खुद से हारा। कई बार दूसरों को दुख दिया। लेकिन उसी अँधेरे में कभी-कभी हँसी की एक किरण भी खोज ली।

किताब पढ़ते हुए लगता है कि जिंदगी ने नायर को कोई आसान रास्ता नहीं दिया।

लेकिन शायद उन्होंने भी जिंदगी को आसानी से छोड़ने से इनकार कर दिया था।

और अंत में जिंदगी ने उन्हें एक आखिरी, बेहद विडंबनापूर्ण तोहफा दिया।

संतोष नायर शायद अपनी जिंदगी पूरी तरह वापस नहीं पा सके।

लेकिन अंततः उन्हें अपनी कहानी वापस मिल गई।

और कभी-कभी, शायद यही हमारी सबसे बड़ी silver lining होती है; जब जिंदगी की सारी रोशनियाँ बुझ जाएँ, तब भी हमारी कहानी कहीं बची रह जाए।

 सेहत के नए हकीमों ने छेड़ी वेलनेस की जंग 

अमीरों ने शांत सुबह को बना दिया स्टेडियम!

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

१३ अगस्त 2026

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आजकल  बड़े शहरों में चमचमाती ऊंची इमारतों में रहने वाले लोगों की जिंदगी बदल गई है। ग्रेनाइट, शीशे और एयर-कंडीशनर से सजे इन आलीशान घरों में अब सूरज निकलने के बाद आराम से सोना लगभग गुनाह समझा जाता है।

अपने शर्माजी, भोर सुबह, सज संवर के जिम के लिए ड्राइव करते हैं, जहां हूरों से मिलकर उनका रक्तचाप नॉर्मल हो जाता है। उधर चौधरी साहब अपने फ्लैट की खिड़की से नजारा ताक रहे होते हैं। वो बताते हैं, "सुबह साढ़े छह बजे से ही फिटनेस का युद्ध शुरू हो जाता है। कोई जिम की तरफ भाग रहा है, कोई तैराकी कर रहा है। योगा मैट अलग-अलग “माइंडफुलनेस ज़ोन” में ऐसे बिछाए जाते हैं, जैसे कोई धार्मिक अनुष्ठान होने वाला हो। कुछ लोग तेज़-तेज़ चलते हैं, कुछ जॉगिंग करते हैं। सबके चेहरों पर ऐसा भाव होता है, जैसे सुबह पसीना बहाना ही इंसानियत की सबसे बड़ी सेवा हो।"

जिम इतना भरा रहता है कि सांस लेना मुश्किल हो जाए। स्विमिंग पूल में इतनी हलचल होती है कि पानी भी शायद आराम मांगने लगे। ध्यान लगाने वाले लोग इतनी गंभीरता से आंखें बंद करते हैं कि लगता है, अभी संतोष और आत्ममुग्धता के सहारे हवा में उड़ने लगेंगे।

हर सुबह ग्रेटर नोएडा की एक पूरी सोसाइटी स्वास्थ्य सुधारने के एक बड़े अभियान में बदल जाती है। सवाल बस इतना है कि क्या इससे सचमुच स्वास्थ्य सुधर रहा है? कभी-कभी यह फिटनेस से ज्यादा एक महंगा जुनून लगता है।

मेरा एक दोस्त, जो खुद जिम भक्त है, कहता है कि इतनी योगा, प्राणायाम और माइंडफुलनेस के बावजूद दुनिया पहले से ज्यादा स्वस्थ नजर नहीं आती। अस्पताल बढ़ रहे हैं, निजी क्लीनिक बढ़ रहे हैं और वेलनेस सेंटर भी हर गली में खुल रहे हैं।

अगर योगा के दावे आधे भी सच होते, तो शहर के आधे हृदय रोग विशेषज्ञ बेरोजगार हो जाते और बाकी आधे प्राणायाम सिखा रहे होते।

उधर, पुराने विचारों वाले एक पंडित जी, इस मामले को बहुत सीधे शब्दों में समझाते हैं। उनका कहना है कि अपनी ताकत बचाने का फायदा, सुबह-सुबह उसे बेकार में खर्च करने से कहीं ज्यादा है। ट्रैफिक झेलना, दफ्तर की राजनीति सहना, बढ़ती महंगाई और कभी-कभी जीवन के अर्थ पर चिंता करना: ये सब अपने आप में काफी बड़ी एक्सरसाइज हैं।

वह कहते हैं, “सुबह-सुबह तंग छोटे गारमेंट्स पहनकर खुद को क्यों सताते हो? जिंदगी खुद ही कम कसरत नहीं कराती क्या ?”

बात में दम है। अमीर लोग सुबह अंधेरे में अपने शरीर को सज़ा देते हैं, ताकि बाद में गर्व से एवोकाडो टोस्ट खा सकें। शायद लंबी उम्र का असली राज जिम में नहीं, बल्कि आराम से सोने में हो। हाइ सोसाइटी के तमाम लोग सुबह वर्क आउट इसलिए करते हैं ताकि देर रात तक चलने वाली पार्टियों में मजे लें।

हो सकता है असली फिटनेस यह हो कि इंसान एक सभ्य समय तक बिस्तर में पड़ा रहे, अपनी ऊर्जा बचाए और उसे दुनिया की सबसे कठिन एक्सरसाइज के लिए इस्तेमाल करे, इस पागल होती दुनिया में थोड़ा-बहुत सामान्य बने रहने के लिए।

आज फिटनेस एक नया धर्म बन चुकी है। फर्क बस इतना है कि पहले लोग मोक्ष के लिए तपस्या करते थे, अब लोग सिक्स-पैक के लिए।

एक तरफ जॉगर्स हैं। दूसरी तरफ योगा योद्धा। तीसरी तरफ जिम के पहलवान। चौथी तरफ वे लोग हैं, जो हाथ में महंगी पानी की बोतल लेकर सिर्फ इसलिए घूम रहे हैं ताकि सबको पता चले: भाई साहब, ये आज भी “हाइड्रेटेड” हैं। अब सुबह सोना पुराने जमाने की आदत हो गई है। जो आठ बजे उठता है, उसे शक की निगाह से देखा जाता है। लोग सोचते हैं, “बेचारा जिंदगी में कितना पीछे रह गया!” जबकि आदमी बेचारा बस नींद पूरी कर रहा होता है। और उधर गेट पर कंपटीशन के नतीजे आने लगे हैं: 

“आज कितने कदम चले?”

“दस हजार।”

“बस? मैंने पंद्रह हजार किए।”

“मैंने बीस हजार।”

तभी एक सज्जन मोबाइल निकालकर कहते हैं, “मेरी स्मार्टवॉच कह रही है कि मैं आज बहुत स्ट्रेस में हूं।”

बाकी लोग गंभीर हो जाते हैं। इतनी दौड़-भाग, इतनी योगा, इतना ध्यान और इतना प्राणायाम करने के बाद भी घड़ी बता रही है कि आदमी तनाव में है। अब घड़ी से बहस कौन करे?

जिम में भी हालत कम मजेदार नहीं है। ट्रेडमिल पर लोग ऐसे दौड़ते हैं जैसे पीछे ईडी, सीबीआई और इनकम टैक्स विभाग तीनों लगे हों। मजे की बात यह है कि आधे घंटे बाद वही सज्जन लिफ्ट से ऊपर अपने फ्लैट में जाते हैं। सेकंड फ्लोर तक सीढ़ियों से जाने में कष्ट होता है।

स्विमिंग पूल में लोग पानी को इतना मथते हैं कि लगता है समुद्र मंथन का ट्रायल चल रहा है। योगा क्लास में सब आंखें बंद करके “मन की शांति” खोज रहे हैं। क्लास खत्म होते ही पार्किंग में कार खड़ी करने को लेकर दो लोगों में युद्ध शुरू हो जाता है।

एक सज्जन रोज सुबह ध्यान करते हैं।

दूसरे सज्जन पूछते हैं, “कितनी देर?”

“एक घंटा।”

“फायदा?”

“बहुत शांति मिलती है।”

इतने में उनकी मेड छुट्टी मांग लेती है। सज्जन की आध्यात्मिक शांति तुरंत व्हाट्सऐप कॉल पर चली जाती है।

आधुनिक जीवनशैली का सबसे बड़ा चमत्कार यही है। आदमी स्वास्थ्य पाने के लिए पहले खुद को बीमार करता है। सुबह अलार्म से नींद खराब करो। ठंडे पानी से नहाओ। जिम में शरीर तोड़ो। फिर प्रोटीन शेक पियो। उसके बाद ऑफिस जाकर आठ घंटे कुर्सी पर बैठो और शाम को डॉक्टर से पूछो, “डॉक्टर साहब, कमर दर्द क्यों रहता है?”

पहले इंसान खेत में काम करता था, पैदल चलता था, कुएं से पानी खींचता था। उसे फिटनेस ऐप की जरूरत नहीं पड़ती थी। आज आदमी एयर-कंडीशनर में बैठता है, कार से जिम जाता है, ट्रेडमिल पर पांच किलोमीटर दौड़ता है और फिर कार से घर लौट आता है।

इसे आधुनिक प्रगति कहते हैं।

अब खाना भी पेट भरने के लिए नहीं खाया जाता। पहले उसकी फोटो खींची जाती है। एवोकाडो टोस्ट, क्विनोआ सलाद और ग्रीन जूस के साथ सेल्फी जरूरी है। आखिर दुनिया को कैसे पता चलेगा कि आप स्वस्थ हैं?

स्वास्थ्य से ज्यादा जरूरी है: स्वस्थ दिखना।

सोशल मीडिया ने तो फिटनेस को पूरा तमाशा बना दिया है। कोई आसन कर रहा है, कोई प्रोटीन पी रहा है, कोई “नो शुगर चैलेंज” चला रहा है। अगले दिन वही आदमी आधी रात को फ्रिज खोलकर रसगुल्ले ढूंढ रहा होता है।

सच तो यह है कि आधुनिक इंसान ने हर चीज को प्रतियोगिता बना दिया है। पहले नौकरी की दौड़ थी। फिर पैसे की दौड़ हुई। अब नींद छोड़कर स्वस्थ होने की भी दौड़ शुरू हो गई है।

शायद असली वेलनेस का राज इतना ही है; थोड़ा कम भागिए, थोड़ा कम दिखाइए और कभी-कभी बिना अपराधबोध के देर तक सो जाइए।

क्योंकि इस दुनिया में जहां हर कोई फिटनेस का महर्षि बनने पर तुला है, सबसे बड़ा योगासन शायद यही है: 

आराम से करवट बदलो, चादर ओढ़ो और कहो; आज नहीं, कल से जिम पक्का

Monday, August 10, 2026

 


महिला नेता दिखी नहीं कि गाली शुरू! 

सियासत में मुद्दों से ज्यादा आसान क्यों है चरित्र पर हमला?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

12 अगस्त 2026

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कल्पना कीजिए, चुनावी मंच पर एक महिला नेता खड़ी होती है। वह सरकार से तीखे सवाल पूछती है। विपक्ष को चुनौती देती है। अपनी पार्टी का बचाव करती है। कुछ ही मिनटों में सोशल मीडिया का माहौल बदल जाता है। उसके तर्कों पर कम, कपड़ों पर ज्यादा चर्चा होने लगती है। उसकी नीतियों को छोड़कर उम्र, शादी, शक्ल और निजी जिंदगी की चीरफाड़ शुरू हो जाती है।

बस, यहीं हमारी राजनीति का सबसे बदसूरत चेहरा दिखाई देता है।

पुरुष नेता गरजे तो उसे दमदार कहा जाता है। महिला नेता उसी अंदाज में जवाब दे दे, तो उसे “अहंकारी” या “बदतमीज” बता दिया जाता है। पुरुष नेता महत्वाकांक्षी हो तो दूरदर्शी कहलाता है। महिला महत्वाकांक्षी हो तो उसके इरादों पर शक किया जाता है। जैसे राजनीति में महिला का सबसे बड़ा अपराध सिर्फ इतना हो कि उसने चुप रहने से इनकार कर दिया।

महिला चुनाव लड़ सकती है, जीत सकती है और सत्ता की कुर्सी तक पहुंच सकती है। लेकिन जैसे ही वह मुखर होती है, बहस अक्सर मुद्दों से भटक जाती है। फिर शुरू होता है कपड़ों, चरित्र, रिश्तों और निजी जिंदगी पर हमला।

मानो सियासत का कोई अनलिखा नियम हो, महिला को हराना मुश्किल लगे, तो पहले उसे ज़लील कर दो।

पुरुष नेताओं को चोर, भ्रष्ट, निकम्मा या नाकाम कहना “तीखी राजनीतिक बहस” माना जाता है। महिला नेता आंख में आंख डालकर जवाब दे दे, तो शब्दों की तलवार अचानक उसके विचारों को छोड़कर उसकी देह और निजी जिंदगी की तरफ मुड़ जाती है। नीति-विचार पीछे छूट जाते हैं। तर्क दम तोड़ देते हैं। गाली सबसे आसान हथियार बन जाती है।

यह बीमारी किसी एक पार्टी की नहीं है। अफसोस, पूरा राजनीतिक तंत्र इससे संक्रमित दिखाई देता है। अपनी पार्टी की महिला नेता पर फूहड़ टिप्पणी हो, तो बयान जारी होते हैं और आक्रोश उमड़ पड़ता है। लेकिन विरोधी दल की महिला पर वही कीचड़ उछले, तो कई चेहरे अचानक मौन साध लेते हैं।

महिला सम्मान अब सिद्धांत कम, सियासी स्विच ज्यादा बन गया है, अपने लिए ऑन, विरोधियों के लिए ऑफ।

सुनंदा पुष्कर के मामले में भी सार्वजनिक चर्चा कई बार उनकी पहचान से ज्यादा सनसनी के इर्द-गिर्द घूमती रही। जयललिता जैसी शक्तिशाली मुख्यमंत्री को भी कई मौकों पर सिर्फ एक महिला होने के चश्मे से देखा गया। बसपा सुप्रीमो बहन मायावती पर जाति और लिंग, दोनों को मिलाकर तंज कसे गए। उमा भारती को भी ऐसी निजी टिप्पणियां सुननी पड़ीं, जिनका उनकी नीतियों या राजनीतिक काम से कोई संबंध नहीं था।

कंगना रनौत के विचारों से असहमति हो सकती है। उनकी राजनीति और बयानों की आलोचना भी होनी चाहिए। लोकतंत्र में किसी को आलोचना से छूट नहीं मिलती। लेकिन असहमति का अर्थ यह नहीं कि महिला होने के कारण उस पर हर तरह की गाली और गंदगी फेंक दी जाए।

किसी महिला नेता की आलोचना लोकतंत्र है। उसकी निजी जिंदगी नोंचना बदतमीजी है।

दोनों में फर्क है। मगर हमारी राजनीति अक्सर यह फर्क जानबूझकर भूल जाती है।

हम महिलाओं को राजनीति में लाने की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। सम्मेलन होते हैं। मंच सजते हैं। “नारी शक्ति” के नारे गूंजते हैं। भाषणों में महिलाओं के लिए आसमान तक खोल दिया जाता है। फिर टिकट बांटने का वक्त आता है, तो कई दरवाजे बंद मिलते हैं।

महिला आरक्षण का कानून बनना निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन असली सवाल सिर्फ सीटों का नहीं है। सवाल उस माहौल का भी है, जिसमें महिला राजनीति करेगी।

मान लीजिए, किसी महिला को सीट मिल गई। वह चुनाव जीत गई। मंत्री भी बन गई। फिर क्या?

क्या उसे वही सम्मान मिलेगा, जो उसके पुरुष सहयोगी को मिलता है? या फिर उसके कपड़ों पर टीवी बहस होगी? शादी पर सवाल उठेंगे? उम्र पर तंज कसे जाएंगे? और उसकी निजी जिंदगी को व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी के हवाले कर दिया जाएगा?

यही वह दलदल है, जिसमें हमारी राजनीति फंसी हुई है।

इसका सबसे बड़ा नुकसान लोकतंत्र को होता है। कई काबिल महिलाएं शायद राजनीति की तरफ देखकर सोचती होंगी; “यह मैदान मेरे लिए बहुत महंगा पड़ सकता है। यहां काम कम और निजी जिंदगी की सफाई ज्यादा देनी पड़ेगी।”

पुरुष नेता को शायद ही रोज यह सोचना पड़ता हो कि चुनाव लड़ने के बाद उसकी शादी, शरीर या चरित्र राष्ट्रीय बहस का विषय बन जाएगा। यही असमानता है। और यही असली समस्या है।

हम अक्सर शिकायत करते हैं कि राजनीति में अच्छे लोग नहीं आते। शिकायत सही हो सकती है। लेकिन एक सवाल हमसे भी पूछना चाहिए, क्या हम अच्छे और काबिल लोगों के लिए राजनीति का माहौल आसान बनाते हैं?

खासकर महिलाओं के लिए?

जितनी अधिक महिलाएं राजनीति में आएंगी, उन्हें दो-चार गालियों से चुप कराना उतना ही मुश्किल होगा। संख्या ताकत है। संगठन ताकत है। और सबसे बड़ी ताकत आर्थिक आजादी है।

जिस महिला के पास अपनी कमाई, अपना काम और अपना मजबूत नेटवर्क है, उसे डराना आसान नहीं होता। देश भर में लाखों महिला उद्यमी आज यही साबित कर रही हैं। वे कारोबार खड़ा कर रही हैं। रोजगार दे रही हैं। फैसले ले रही हैं। उन्हें किसी नेता की कृपा का इंतजार नहीं।

वे अपने पैरों पर खड़ी हैं। यही असली सशक्तिकरण है।

सिर्फ मंच पर “नारी शक्ति जिंदाबाद” बोलने से कुछ नहीं बदलेगा। महिला को अच्छी शिक्षा चाहिए, तो दीजिए। बैंक लोन चाहिए, तो रास्ते आसान कीजिए। काम का मौका चाहिए, तो दीजिए। सुरक्षित माहौल चाहिए, तो सुनिश्चित कीजिए।

और अगर वह राजनीति में आकर आपसे असहमत हो जाए, तो उसके विचारों से लड़िए, उसके कपड़ों से नहीं।

उसके काम पर सवाल उठाइए, चरित्र पर कीचड़ मत फेंकिए।

उसकी नीति की आलोचना कीजिए, निजी जिंदगी को चुनावी पोस्टर मत बनाइए।

लोकतंत्र में कोई भी नेता आलोचना से ऊपर नहीं है। न पुरुष, न महिला। लेकिन आलोचना और गाली में फर्क होता है। बहस और बेहूदगी में फर्क होता है। सवाल और चरित्रहनन में फर्क होता है।

अफसोस, हमारी सियासत में यह फर्क तेजी से धुंधला होता जा रहा है।

सबसे बड़ा पाखंड तब दिखाई देता है, जब कोई नेता सुबह महिला सम्मान पर लंबा भाषण देता है और शाम तक उसकी पार्टी के समर्थक किसी महिला विरोधी पर सोशल मीडिया में गंदगी उछाल रहे होते हैं। फिर पार्टी कहती है, “हमने तो नहीं कहा।”

यह कोई जवाब नहीं है।

घर में आग लगी हो और मालिक कहे कि माचिस मैंने नहीं जलाई, तो क्या घर बच जाएगा?

राजनीतिक दलों को समझना होगा कि उनकी ट्रोल सेना उनसे पूरी तरह अलग नहीं है। लगातार गाली, धमकी और निजी हमले होते रहें और पार्टी चुप बनी रहे, तो वह चुप्पी भी समर्थन का संदेश देती है।

कई बार चुप रहना समर्थन की सबसे आरामदेह भाषा होता है।

महिलाओं को राजनीति में देवी बनाकर रखने की जरूरत नहीं है। उन्हें आलोचना से बचाने की भी जरूरत नहीं है। बस, उन्हें इंसान और बराबर का नागरिक मानने की जरूरत है।

बहुत बड़ी मांग नहीं है।

वे गलत हों, तो खुलकर आलोचना कीजिए। भ्रष्ट हों, तो जांच कीजिए। काम कमजोर हो, तो चुनाव में हराइए। लेकिन सिर्फ इसलिए हमला मत कीजिए कि वे महिला हैं और शायद जवाब नहीं देंगी।

अब वक्त बदल रहा है। महिलाएं जवाब दे रही हैं। अदालतों का दरवाजा खटखटा रही हैं। कारोबार खड़ा कर रही हैं। राजनीति में अपनी जगह बना रही हैं। धीरे-धीरे संदेश साफ हो रहा है कि पुरानी गाली-गलौज वाली सियासत हमेशा नहीं चलेगी।

महिला-विरोधी सोच कोई प्राकृतिक आपदा नहीं है। यह न मानसून है, न भूकंप। इसे इंसानों ने बनाया है। इसलिए इंसान ही इसे बदल सकते हैं।

शुरुआत उस सबसे आसान बहाने को छोड़कर करनी होगी, “अरे, राजनीति में तो यह सब चलता है।”

नहीं। बहुत चल लिया।

बहुत गालियां दे लीं। बहुत चरित्र उछाल लिए। बहुत निजी जिंदगियां नीलाम कर लीं। अब मुद्दों पर लौटिए।

किसी महिला नेता को सिर्फ मुखर, सक्रिय और महत्वाकांक्षी होने की सजा देना उसके साथ ही नहीं, लोकतंत्र के साथ भी नाइंसाफी है। सियासत की असली लड़ाई विचारों की होनी चाहिए, गालियों की नहीं। नीतियों की होनी चाहिए, निजी जिंदगी की नहीं।

और याद रखिए, जिस लोकतंत्र में आधी आबादी को बोलने से पहले गाली की कीमत सोचनी पड़े, वहां लोकतंत्र का माइक तो चालू है, लेकिन उसकी आवाज अभी भी आधी है।

Sunday, August 9, 2026

 राजनीति को चाहिए नया खून: छात्र संघों की वापसी अब क्यों जरूरी है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

11 अगस्त 2026

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कहते हैं, जब राजनीति में नया खून नहीं आता, तो पुरानी नसों में जंग लगने लगती है। वही चेहरे, वही नारे, वही वादे और वही कुर्सी की दौड़। देश की राजनीति आज कुछ ऐसी ही थकी हुई दिखाई देती है।

इधर एक अजीब-सी जेन-ज़ी मुहिम ने सबका ध्यान खींचा है। दावा किया जा रहा है कि “कॉकरोचों के नेतृत्व” में चल रही यह नई पीढ़ी की हलचल युवाओं की बेचैनी और बगावत का प्रतीक बन गई है। नाम भले ही मज़ाकिया हो, मगर सवाल गंभीर है। जब युवा अपनी बात कहने के लिए इतने अजीब प्रतीक खोज रहे हैं, तब हमारे कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में उनके अपने लोकतांत्रिक मंच आखिर कहाँ हैं?

जवाब साफ है: हमने छात्र राजनीति का दरवाज़ा ही बंद कर दिया।

छात्र संघ कभी विश्वविद्यालयों की जान हुआ करते थे। पढ़ाई के साथ बहस होती थी, चुनाव होते थे, भाषण होते थे, सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे। छात्र अपनी शिकायतें लेकर संगठित ढंग से प्रशासन के सामने जाते थे। नेतृत्व सीखते थे, हारना सीखते थे और जीत को संभालना भी सीखते थे।

आज हम चाहते हैं कि युवा सीधे आईएएस बनें, सीईओ बनें, वैज्ञानिक बनें और नेता भी बनें। मगर नेता बनने की नर्सरी बंद कर दी गई है। फिर हम शिकायत करते हैं कि राजनीति में अच्छे लोग क्यों नहीं आते। यह तो वही बात हुई: खेत को पानी न दो और फसल से शिकायत करो।

1960 के दशक में शिक्षा आयोग ने भी छात्र संघों को महत्वपूर्ण माना था। सोच यह थी कि संगठित छात्र गतिविधियाँ युवाओं में आत्म-अनुशासन, स्वशासन और नेतृत्व की भावना पैदा करती हैं। कई जगह छात्र संघ कैंटीन चलाते थे, सहकारी दुकानें संभालते थे और साहित्यिक व सांस्कृतिक कार्यक्रम कराते थे।

मतलब साफ था। विश्वविद्यालय केवल डिग्री बाँटने की फैक्टरी नहीं है। वह नागरिक तैयार करने की जगह भी है।

भारत के इतिहास में छात्र आंदोलनों ने कई बार राजनीति की दिशा बदल दी। 1965 का तमिलनाडु का हिंदी-विरोधी आंदोलन हो या 1974 का गुजरात का नवनिर्माण आंदोलन, छात्रों ने अपनी ताकत दिखाई। मामूली-सी मेस फीस बढ़ने से शुरू हुआ गुजरात का आंदोलन भ्रष्टाचार और महंगाई के खिलाफ बड़ा जनांदोलन बन गया।

बिहार में छात्र आंदोलन से जयप्रकाश नारायण की “संपूर्ण क्रांति” का नारा उठा। उसी दौर ने देश की राजनीति को झकझोर दिया। बाद में आपातकाल और 1977 के चुनावों ने भारतीय लोकतंत्र का नया अध्याय लिखा।

कई बड़े राष्ट्रीय नेता छात्र राजनीति की ही देन रहे हैं। अरुण जेटली ने दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति सीखी। लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार बिहार के छात्र आंदोलनों से उभरे। सीताराम येचुरी और प्रकाश करात ने जेएनयू की छात्र राजनीति में अपने कदम जमाए। ममता बनर्जी ने भी छात्र जीवन से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की।

नितिन गडकरी, राजनाथ सिंह और अशोक गहलोत जैसे अनेक नेताओं ने भी युवावस्था में संगठन और सार्वजनिक जीवन का अनुभव पाया।

आज सवाल यह है कि अगली पीढ़ी कहाँ से आएगी?

व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी से?

इंस्टाग्राम रील से?

या किसी “कॉकरोच आंदोलन” के वायरल मीम से?

युवा ऊर्जा को आप दबा सकते हैं, खत्म नहीं कर सकते। जब उसे लोकतांत्रिक रास्ता नहीं मिलता, वह किसी और रास्ते से बाहर आती है। कभी अचानक विरोध प्रदर्शन बनकर, कभी सोशल मीडिया के गुस्से में और कभी किसी अजीब प्रतीक के पीछे।

खाली जगह कभी खाली नहीं रहती। लोकतंत्र में भी नहीं।

छात्र संघों को खत्म करने का एक तर्क हमेशा दिया गया: हिंसा, गुटबाजी और बाहरी राजनीतिक दलों का दखल। यह बात पूरी तरह गलत नहीं थी। कई छात्र संघ सचमुच राजनीति के अखाड़े बन गए। पढ़ाई पीछे छूट गई और पोस्टरबाजी आगे आ गई। कैंपस में बहस की जगह कभी-कभी लाठी और धमकी ने ले ली।

मगर बीमारी के कारण मरीज को मार देना इलाज नहीं होता।

गलत छात्र राजनीति को सुधारना चाहिए था, छात्र राजनीति को दफन नहीं करना चाहिए था।

उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों और विश्वविद्यालयों में छात्र संघ चुनाव बंद या सीमित किए गए। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, लखनऊ विश्वविद्यालय और कई अन्य संस्थानों में निर्वाचित छात्र प्रतिनिधित्व कमजोर पड़ता गया या खत्म हो गया। प्रशासन ने शांति तो पा ली, मगर छात्रों की लोकतांत्रिक आवाज भी काफी हद तक खो गई।

अब हमें नई सोच के साथ छात्र संघों को वापस लाना चाहिए।

पुराने ढर्रे पर नहीं। नए संविधान और साफ नियमों के साथ।

छात्र संघों का मुख्य काम चुनावी राजनीति नहीं होना चाहिए। उनका ध्यान छात्रों की असली समस्याओं पर रहे: फीस, छात्रावास, पुस्तकालय, खेल, सुरक्षा, परिवहन और कैंपस सुविधाएँ। बहस, वाद-विवाद, सांस्कृतिक कार्यक्रम और खेलों को भी बढ़ावा दिया जाए।

हर चुने हुए छात्र प्रतिनिधि को नेतृत्व का प्रशिक्षण मिले। उसे बातचीत करना, बजट बनाना, विवाद सुलझाना और अलग राय रखने वालों को साथ लेकर चलना सिखाया जाए। चुनाव लड़ना आसान है, लोकतांत्रिक ढंग से काम करना मुश्किल है। यही हुनर सीखना जरूरी है।

विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्र प्रतिनिधियों की नियमित बैठकें हों। शिकायत सड़क पर पहुँचने से पहले बातचीत की मेज तक पहुँचे। अध्यापक मार्गदर्शन करें, मगर छात्रों की आवाज दबाएँ नहीं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राजनीति में नए लोगों की आमद का कोई विकल्प नहीं है। लोकतंत्र को हर पीढ़ी अपना नया नेतृत्व देती है। यदि युवाओं को कॉलेज में बोलने, बहस करने, हारने, जीतने और जिम्मेदारी लेने का मौका नहीं मिलेगा, तो राजनीति बूढ़ी होती जाएगी।

आज जेन-ज़ी अपनी भाषा खुद बना रही है। कभी मीम, कभी हैशटैग, कभी अजीबोगरीब प्रतीक और कभी “कॉकरोच” जैसा नाम। हमें इस पर केवल हँसना नहीं चाहिए। इसके पीछे छिपी बेचैनी को समझना चाहिए।

युवा कहना चाहते हैं: “हमें सुना जाए।”

कॉलेज और विश्वविद्यालय इस आवाज के लिए सबसे स्वाभाविक जगह हैं।

राजनीति को नया खून चाहिए। उसे किसी प्रयोगशाला से नहीं लाया जा सकता। वह कैंपस की बहसों, छात्र सभाओं, चुनावों और आंदोलनों से ही निकलेगा। छात्र संघ लोकतंत्र की वह पाठशाला हैं, जहाँ भविष्य के नेता पहली बार जनता का सामना करते हैं।

परीक्षा पास करने से नौकरी मिल सकती है। मगर समाज चलाने के लिए जिम्मेदारी, संवाद और नेतृत्व चाहिए।

इनकी कोई गाइडबुक नहीं होती।

इन्हें जीना पड़ता है।

छात्र संघों को फिर से जीवित कीजिए। उन्हें अनुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ चलाइए। बाहरी दलों की कठपुतली बनने से बचाइए। मगर युवाओं का लोकतांत्रिक मंच मत छीनिए।

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Syndicated by NPA


Saturday, August 8, 2026

 


कुर्सी जनता की, तिजोरी अपनी? 

भ्रष्ट अफसरशाही के लालच का कड़वा सच

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बृज खंडेलवाल द्वारा

10 अगस्त 2026

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दिल्ली के कोचिंग सेंटरों के बाहर खड़े युवाओं से पूछिए: क्या कर रहे हो? जवाब लगभग एक जैसा मिलेगा: “UPSC की तैयारी कर रहे हैं।”

क्यों?

“देश की सेवा करनी है। समाज बदलना है। संविधान की रक्षा करनी है।”

इरादे नेक हैं। सपने बड़े हैं। मगर कहानी का अगला अध्याय हमेशा इतना खूबसूरत नहीं होता।

कुर्सी मिलते ही कुछ लोगों की सेवा का दायरा बदल जाता है। देश पीछे छूट जाता है और खुद आगे आ जाता है।

सरकारी अफसर को तनख्वाह मिलती है। सरकारी मकान मिलता है। गाड़ी मिलती है। चिकित्सा सुविधा मिलती है। भत्ते मिलते हैं। रुतबा मिलता है। नौकरी के बाद पेंशन भी मिलती है।

तो फिर सवाल सीधा है; 

साहब को और क्या चाहिए?

यही सवाल उन अधिकारियों से पूछा जाना चाहिए जिन पर रिश्वत, कमीशन, सरकारी धन की हेराफेरी या पद के दुरुपयोग के आरोप लगते रहे हैं।

IAS और IPS कोई मामूली नौकरी नहीं है। UPSC की कठिन परीक्षा पास करके अधिकारी प्रशासन और शासन की सबसे ताकतवर गलियों तक पहुंचते हैं। उनके हाथ में फैसले होते हैं। फाइलें होती हैं। ठेके होते हैं। नीतियों को लागू करने की ताकत होती है।

कभी भारतीय नौकरशाही को “Steel Frame of India” कहा गया था।

लेकिन लोहे का फ्रेम भी जंग खा सकता है।

खतरा वहीं शुरू होता है जहां ताकत बहुत हो और निगरानी कम। विवेकाधिकार बड़ा हो और जवाबदेही छोटी। फाइल रोकने की ताकत हो, लेकिन जवाब देने की मजबूरी न हो।

फिर तनख्वाह कम नहीं पड़ती।

नीयत छोटी पड़ जाती है।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी भ्रष्टाचार के पीछे कई कारण गिनाते हैं: अत्यधिक विवेकाधिकार, पारदर्शिता की कमी, राजनीतिक-नौकरशाही गठजोड़, कमजोर जवाबदेही, धीमी न्याय प्रक्रिया, कम सजा दर और व्यक्तिगत लालच। इन सबके मेल से पद सेवा का माध्यम न रहकर निजी लाभ का जरिया बन सकता है।

भ्रष्टाचार के लिए अक्सर कम वेतन, महंगाई और आर्थिक मजबूरी का बहाना दिया जाता है। लेकिन वरिष्ठ नौकरशाहों के मामले में यह दलील ज्यादा दूर तक नहीं जाती।

जिस अधिकारी को सम्मानजनक वेतन, सरकारी आवास, वाहन, चिकित्सा सुविधा और दूसरी सुविधाएं मिल रही हों, उसके लिए रिश्वतखोरी को मजबूरी कहना जनता के जख्म पर नमक छिड़कना है।

सोशल एक्टिविस्ट पद्मिनी अय्यर इसे ज्यादा कड़वे अंदाज में कहती हैं:

“झोला लेकर सिस्टम में दाखिल होते हैं, ट्रकों का काफिला लेकर निजी महल के लिए विदा होते हैं।”

बात कड़वी है, लेकिन सवाल जरूरी है।

नाम बड़े हैं। मामले पुराने हैं। और पैटर्न बार-बार सामने आता है।

पूर्व कोयला सचिव एच.सी. गुप्ता को कोयला आवंटन से जुड़े कई मामलों में अदालत ने दोषी ठहराया। झारखंड की IAS अधिकारी पूजा सिंघल पर मनरेगा धन और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े गंभीर आरोप लगे। छत्तीसगढ़ के अनिल टुटेजा का नाम कथित शराब सिंडिकेट मामले में सामने आया।

हरियाणा में पंकज अग्रवाल और प्रदीप कुमार से जुड़े मामलों में बैंक फंड की कथित हेराफेरी और फर्जी दस्तावेजों के आरोप सामने आए। राजस्थान के सुबोध अग्रवाल का नाम जल जीवन मिशन की टेंडर प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं से जोड़ा गया। उत्तर प्रदेश के अभिषेक प्रकाश पर रिश्वत और कमीशन से जुड़े आरोप लगे। झारखंड के छवि रंजन भूमि से जुड़े मामलों में जांच के घेरे में आए।

इनमें से जहां अदालत का अंतिम फैसला नहीं आया है, वहां आरोप को दोषसिद्धि कहना नाइंसाफी होगी।

लेकिन सवाल फिर भी खड़ा होता है; 

आखिर इतने मामले क्यों सामने आते हैं?

क्या सरकारी कुर्सी सचमुच सेवा का माध्यम है?

या कुछ लोगों के लिए वह कमाई का सबसे सुरक्षित रास्ता बन चुकी है?

भ्रष्टाचार का कोई जेंडर नहीं होता

भ्रष्टाचार को भी अब जेंडर की नजर से देखने की जरूरत नहीं।

भ्रष्टाचार न पुरुष होता है, न महिला।

जिस तरह कोई पुरुष अधिकारी कानून तोड़ सकता है, उसी तरह महिला अधिकारी भी जांच और कानून के दायरे में आ सकती है। पूजा सिंघल का मामला इसका चर्चित उदाहरण है।

NEET-UG पेपर लीक की जांच में भी महिलाओं समेत कई लोगों के नाम सामने आए। कुछ विशेषज्ञों और अन्य आरोपियों पर प्रश्न याद करने, साझा करने या पैसे के बदले उपलब्ध कराने जैसे आरोप लगे।

संदेश साफ है:

ईमानदारी का कोई जेंडर नहीं। बेईमानी का भी नहीं।

हर भ्रष्टाचार कांड के बाद वही राजनीतिक तमाशा शुरू होता है।

विपक्ष कहता है: सरकार नाकाम है।

सरकार कहती है: हमने कार्रवाई की।

फिर प्रेस कॉन्फ्रेंस होती है। बयान आते हैं। जांच एजेंसियां सक्रिय होती हैं। गिरफ्तारियां होती हैं। चार्जशीट दाखिल होती है।

और उसके बाद?

मामला अदालत पहुंचता है।

फिर तारीख पर तारीख।

गिरफ्तारी खबर बन जाती है, लेकिन सजा इतिहास बन जाती है।

CBI और ED जैसी एजेंसियों ने भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामलों में जांच और कार्रवाई की है। राज्य सरकारों ने भी अधिकारियों को निलंबित किया और विभागीय जांच शुरू की।

लेकिन छापा, गिरफ्तारी या चार्जशीट अपने आप में भ्रष्टाचार का इलाज नहीं है।

अंतिम कसौटी अदालत का फैसला है।

और फैसला जितना देर से आएगा, व्यवस्था की कमजोरी पर भ्रष्टाचारी का भरोसा उतना ही बढ़ेगा।

सिर्फ वेतन बढ़ाने से भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा।

अधिकारी को अच्छा वेतन दीजिए। सम्मान दीजिए। सुविधाएं दीजिए। लेकिन अगर नीयत में खोट है, तो लालच का पेट कभी नहीं भरता।

लालच की कोई सैलरी स्लिप नहीं होती।

सरकारी अधिकारी जनता के पैसे और अधिकारों के रखवाले हैं। वे सरकारी कुर्सी के मालिक नहीं हैं। सरकारी पद निजी जागीर नहीं है।

इसलिए भ्रष्टाचार रोकना है तो सिर्फ भाषण नहीं, नतीजे चाहिए।

तेज सुनवाई चाहिए।

संपत्ति की सख्त जांच चाहिए।

फैसलों में पारदर्शिता चाहिए।

जहां जरूरत हो, विवेकाधिकार सीमित करना होगा।

और सबसे जरूरी: कानून की नजर में कोई बड़ा नहीं होना चाहिए।

न IAS।

न IPS।

न नेता।

न कोई रसूखदार।

कुर्सी चाहे कितनी भी ऊंची हो, कानून उससे ऊंचा होना चाहिए।

क्योंकि कुर्सी जनता देती है।

कुर्सी के साथ तिजोरी नहीं देती।

और जिस दिन अफसर यह फर्क भूल जाएगा, उसी दिन लोकसेवा, निजी सेवा में बदल जाएगी।

Friday, August 7, 2026

 


आरटीआई या रंगदारी का नया धंधा?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

8 अगस्त 2026

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सूचना का अधिकार कानून कभी भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार माना जाता था। इसे जनता की आंख और कान कहा गया। उम्मीद थी कि सरकारी फाइलों में छिपे सच बाहर आएंगे और अफसर जवाबदेह बनेंगे। लेकिन आज तस्वीर बदलती दिख रही है। कई जगह आरटीआई जनहित का नहीं, बल्कि निजी फायदे, ब्लैकमेल और उगाही का औजार बन चुकी है। कानून की आड़ में कुछ लोगों ने पूरा कारोबार खड़ा कर लिया है।

मैसूर विश्वविद्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम में कर्नाटक के पूर्व सूचना आयुक्त डॉ. एल. कृष्णमूर्ति ने इसी खतरे की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि फर्जी आरटीआई कार्यकर्ताओं की बढ़ती संख्या इस कानून की आत्मा को खत्म कर रही है। उनके अनुसार, जिस कानून ने 2जी जैसे बड़े घोटाले उजागर किए, उसी का इस्तेमाल अब सरकारी दफ्तरों को परेशान करने और बेवजह हजारों पन्नों की सूचनाएं मांगने में हो रहा है।

देशभर से सामने आए मामले इस चिंता को और बढ़ा रहे हैं।

हिमाचल प्रदेश के ऊना में एक स्वयंभू आरटीआई कार्यकर्ता पर आरोप लगा कि उसने पत्थर खदान संचालकों से 75 लाख रुपये की मांग की। आरटीआई से दस्तावेज जुटाए गए और फिर शिकायत करने की धमकी देकर रकम मांगी गई। सतर्कता विभाग ने जाल बिछाकर उसे पहली किश्त लेते हुए गिरफ्तार किया।

असम में दुलाल बोरा का मामला और भी चौंकाने वाला है। उस पर उगाही और धोखाधड़ी के दर्जनों मुकदमे दर्ज हुए। बताया गया कि उसने दो हजार से अधिक दूसरी अपीलें दायर कीं और कई बार एक ही दिन में सौ से ज्यादा आरटीआई आवेदन भेज दिए। आरोप था कि बाद में अधिकारियों और ठेकेदारों से पैसे लेकर मामलों को ठंडे बस्ते में डालने का खेल चलता था।

हरियाणा के गुरुग्राम में एक आरटीआई कार्यकर्ता और एक यूट्यूबर पर स्कूल प्रबंधन से लाखों रुपये की उगाही का आरोप लगा। पहले लगातार आरटीआई लगाई गईं, फिर अदालत और आयकर विभाग की कार्रवाई का डर दिखाया गया। अंत में शिकायतें वापस लेने के बदले मोटी रकम मांगी गई।

गुजरात के सूरत में तो यह पूरा नेटवर्क बन गया। पुलिस ने दर्जनों मुकदमे दर्ज किए। आरोप था कि कुछ लोग नगर निगम से भवनों की जानकारी आरटीआई के जरिए हासिल करते, फिर मापने वाली फीता लेकर खुद को निरीक्षक बताकर निर्माण स्थलों पर पहुंच जाते। बिल्डरों और मकान मालिकों को कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर हजारों से लेकर लाखों रुपये तक वसूले जाते।

आंध्र प्रदेश में दो लोगों पर सूचना आयोग ने आगे आरटीआई लगाने तक पर रोक लगा दी। आयोग ने पाया कि वे एक के बाद एक दर्जनों अपीलें और शिकायतें दायर कर सरकारी अधिकारियों को लगातार परेशान कर रहे थे। कई आवेदन वर्षों पुराने रिकॉर्ड मांगते थे, जिनका जनहित से कोई सीधा संबंध नहीं था।

तमिलनाडु के थेनी में एक व्यक्ति ने 781 आरटीआई आवेदन केवल जिला न्यायालय के खिलाफ दायर कर दिए। नतीजा यह हुआ कि सरकारी कामकाज प्रभावित होने लगा। सूचना आयोग ने उस पर जुर्माना लगाया और इसे कानून के खुले दुरुपयोग का मामला बताया।

यह केवल कुछ अलग-थलग घटनाएं नहीं हैं। इन मामलों का तरीका लगभग एक जैसा है। पहले आरटीआई डालो। फिर दस्तावेज जुटाओ। उसके बाद शिकायत, जांच या मीडिया में बदनामी का डर दिखाओ। आखिर में समझौते के नाम पर पैसे मांगो। कई जगह निजी दुश्मनी निकालने के लिए भी आरटीआई का इस्तेमाल किया गया। कहीं एक ही विषय पर सैकड़ों आवेदन भेजे गए, तो कहीं पूरे विभाग को कागजों के ढेर में दबा दिया गया।

सर्वोच्च न्यायालय भी कई बार ऐसी प्रवृत्ति पर चिंता जता चुका है। अदालत ने कहा कि आरटीआई का इस्तेमाल ईमानदार अधिकारियों को डराने या सरकारी कामकाज रोकने के लिए नहीं होना चाहिए। एक अन्य टिप्पणी में अदालत ने यहां तक कहा कि आरटीआई एक्टिविज्म कुछ मामलों में नया कारोबार बनता जा रहा है।

सबसे दुखद बात यह है कि ऐसे लोग खुद को समाजसेवी और भ्रष्टाचार विरोधी योद्धा बताकर कानून की साख को चोट पहुंचाते हैं। जनता का भरोसा कमजोर होता है। सरकारी दफ्तर हर आवेदक को शक की नजर से देखने लगते हैं। असली और नकली के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है।

आरटीआई कानून का जन्म जनता को ताकत देने के लिए हुआ था, लेकिन कुछ स्वार्थी तत्वों ने इसे दबाव, धमकी और वसूली के हथियार में बदलने की कोशिश की है। जब अधिकार की आड़ में कारोबार शुरू हो जाए, तो सबसे बड़ा नुकसान उसी कानून की विश्वसनीयता को होता है। आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि सूचना मांगने का अधिकार कहीं कुछ लोगों के लिए डर और सौदेबाजी का लाइसेंस तो नहीं बनता जा रहा।

Monday, August 3, 2026

 अंग दान, महा दान

बीस हज़ार नई ज़िंदगियाँ: अंगदान ने बदली भारत की तस्वीर

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

5 अगस्त 2026

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आगरा का सरोजिनी नायडू मेडिकल कॉलेज अब अंग प्रत्यारोपण सेवाओं के विस्तार की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। सुपर स्पेशियलिटी विंग में किडनी प्रत्यारोपण की सभी प्रमुख तैयारियां पूरी हो चुकी हैं और जल्द नियमित प्रत्यारोपण शुरू होने की उम्मीद है। यहां कॉर्निया प्रत्यारोपण की सुविधा पहले से उपलब्ध है, जबकि भविष्य में लिवर, हृदय और फेफड़ों के प्रत्यारोपण की भी योजना है। मेडिकल कॉलेज का एनाटॉमी विभाग देहदान (कैडवर डोनेशन) भी स्वीकार करता है। दान किए गए शरीरों का उपयोग एमबीबीएस और पीजी छात्रों के प्रशिक्षण, एनाटॉमी अध्ययन तथा सर्जिकल शिक्षा में किया जाता है। देहदान के लिए इच्छुक व्यक्ति एनाटॉमी विभाग में पंजीकरण करा सकते हैं।

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हाल ही में गुजरात में वंदे भारत एक्सप्रेस ने ग्रीन कॉरिडोर की मदद से जीवित हृदय समय पर पहुँचाकर इतिहास रचा।

एक परिवार अपने प्रियजन को हमेशा के लिए विदा कर रहा था। उसी समय, किसी दूसरे अस्पताल में एक मरीज नई जिंदगी की उम्मीद से ऑपरेशन थिएटर में ले जाया जा रहा था। एक घर का ग़म, दूसरे घर की खुशी बन गया। 

अंगदान की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि इंसान इस दुनिया से जाने के बाद भी कई लोगों की धड़कनों में ज़िंदा रह सकता है।

भारत ने वर्ष 2025 में अंग प्रत्यारोपण के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की। पहली बार देश में 20,138 अंग प्रत्यारोपण किए गए। यह पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 6-7 प्रतिशत अधिक है। वर्ष 2013 में यह संख्या केवल 4,990 थी। यानी एक दशक में अंग प्रत्यारोपण चार गुना से भी अधिक बढ़ गया। दिल्ली-एनसीआर सबसे आगे रहा, जहाँ 4,500 से अधिक प्रत्यारोपण हुए। इसके बाद तमिलनाडु, महाराष्ट्र, तेलंगाना और केरल का स्थान रहा। मृत्यु के बाद अंगदान करने वालों में तमिलनाडु ने फिर मिसाल पेश की। महाराष्ट्र, तेलंगाना और कर्नाटक भी इस दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं।

आज भारत जीवित दाताओं से अंग प्रत्यारोपण में दुनिया का अग्रणी देश है। कुल प्रत्यारोपण की संख्या के मामले में भारत अब केवल अमेरिका और चीन से पीछे है। यह उपलब्धि देश के डॉक्टरों, सर्जनों, नर्सों और स्वास्थ्यकर्मियों की मेहनत का नतीजा है। साथ ही, यह उन परिवारों की संवेदनशील सोच को भी सलाम है, जिन्होंने अपने दुःख के बीच किसी अनजान व्यक्ति को जीवन देने का फैसला किया।

एक दाता परिवार के सदस्य ने कहा, “हमारा बेटा तो चला गया, लेकिन उसकी किडनी और लीवर अब दो और परिवारों में धड़क रहे हैं। हमें लग रहा है कि वो अब भी कहीं ज़िंदा है।” एक लाभार्थी, जो कई साल से डायलिसिस पर था, भावुक होकर बोला, “जब डॉक्टर ने कहा कि अंग मिल गया है, तो लगता था जैसे मौत के मुँह से वापस लौट आया हूँ। अब मैं बच्चों के साथ खेल सकता हूँ। दाता परिवार का शुक्रिया अदा करने के शब्द नहीं हैं।”

विशेषज्ञ भी इस बदलाव को सराहते हैं। प्रसिद्ध ट्रांसप्लांट सर्जन  कहते हैं, “अंगदान सबसे बड़ा उपहार है। कृपया अपने अंग स्वर्ग न ले जाएँ; स्वर्ग को पता है कि हमें यहाँ उनकी ज़रूरत है।” 

राष्ट्रीय डिजिटल पोर्टल पर 2023 से अब तक पाँच लाख से अधिक लोगों ने अंगदान का संकल्प लिया है। ‘जुग-जुग जियो अभियान’, NOTTO मोबाइल ऐप और ‘वन नेशन, वन पॉलिसी’ ने प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया है। कई नए एम्स में किडनी और लीवर प्रत्यारोपण की सुविधाएँ बढ़ी हैं। 

फिर भी चुनौती बाकी है। हर साल लाखों मरीज अंगों की प्रतीक्षा में हैं। बहुत से लोग समय पर अंग न मिलने से जान गँवा देते हैं। 

यही कमी ग्रे मार्केट को बढ़ावा देती है। ग़रीबों से किडनी चुराकर या जबरदस्ती बेचने के मामले समय-समय पर सामने आते रहते हैं। दलाल ग़रीब किसानों, मजदूरों और कर्ज में डूबे लोगों को फुसलाते हैं। नकली रिश्ते, फर्जी दस्तावेज़ बनाकर अवैध प्रत्यारोपण कराए जाते हैं। महाराष्ट्र, तमिलनाडु, दिल्ली-एनसीआर और यहाँ तक कि बांग्लादेश-कम्बोडिया से जुड़े अंतरराष्ट्रीय रैकेट भी पकड़े गए हैं। ग़रीब दाता को थोड़े पैसे मिलते हैं, जबकि मरीज से लाखों वसूले जाते हैं। कई बार किडनी चुरा ली जाती है या धोखे से निकाल ली जाती है। यह काला व्यापार मानवीय गरिमा का घोर अपमान है।

कानून सख्त है, लेकिन जागरूकता और पारदर्शिता बढ़ाकर ही इस ग्रे मार्केट पर अंकुश लगाया जा सकता है। 

जब मृत्यु के बाद अंगदान समाज की स्वाभाविक संस्कृति बनेगी, तभी असली सफलता मिलेगी। आख़िरकार, इंसान की सबसे बड़ी विरासत उसकी दौलत नहीं, बल्कि वह जीवन है जो वह दूसरों को देकर जाता है। अंगदान सचमुच मृत्यु के बाद भी जीवन का सबसे सुंदर उत्सव है।