Saturday, May 23, 2026

 चौराहे पर खड़ी कांग्रेस: राहुल गांधी नेतृत्व कर रहे हैं या पार्टी को गर्त में धकेल रहे हैं?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

25 मई 2026

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कांग्रेस की राजनीति आज जंगल में भटकते कारवां जैसी लगती है। रास्ता भी धुंधला। रहबर भी असमंजस में।

राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी बार-बार ऐसी राजनीतिक “कौवा-भोज” करती दिखती है, जहां हर अधूरा बयान, हर जल्दबाजी और हर कमजोर रणनीति उसकी साख को थोड़ा और खोखला कर देती है। 

देश मजबूत विपक्ष चाहता है, मगर कांग्रेस अक्सर घायल मुसाफिर जैसी नजर आती है, जो मंजिल से ज्यादा बहानों की तलाश में है।

सबसे बड़ा संकट नेतृत्व का नहीं, भरोसे का है। कांग्रेस के पास अब वैसी दमदार, ईमानदार और ज़मीनी क्षेत्रीय फौज नहीं बची, जो अपने बूते जनाधार खड़ा कर सके। पुराने चेहरे थक चुके हैं। नए चेहरों को उभरने नहीं दिया जाता। अंदरूनी लोकतंत्र बंद कमरे में कैद है। परिवारवाद की धूल इतनी मोटी जम चुकी है कि प्रतिभा की पौध धूप तक नहीं देख पाती।

कांग्रेस की मौजूदा राजनीति भी अजीब प्रतीक्षा में फंसी दिखती है। कभी उम्मीद कि सरकार किसी संकट में फंस जाए। कभी आस कि महंगाई जनता को भड़का दे। कभी भरोसा कि विदेश नीति की उलझनें सत्ता को कमजोर कर देंगी। लेकिन राजनीति केवल विरोध का खेल नहीं है। जनता विकल्प चाहती है। विजन चाहती है। भरोसा चाहती है।

राजनीति के जानकार कहते हैं कि राहुल गांधी के आक्रामक बयान सुर्खियां जरूर बटोरते हैं, लेकिन बिना मजबूत संगठन, बिना बूथ नेटवर्क और बिना स्पष्ट आर्थिक सोच के वे हवा में छोड़े गए तीर लगते हैं। कांग्रेस आज तक तय नहीं कर पाई कि वह गरीबों की पार्टी है, उदार बाजार की समर्थक है या सिर्फ भाजपा विरोध का मंच।

अगर पार्टी ने जल्द नेतृत्व संस्कृति नहीं बदली, साफ छवि वाले युवा नेताओं को आगे नहीं लाया और नई आर्थिक तथा संघीय सोच पेश नहीं की, तो उसका राष्ट्रीय आधार और सिकुड़ जाएगा। कुछ राज्यों में छिटपुट जीत मिल सकती है, मगर राष्ट्रीय राजनीति में उसकी जगह क्षेत्रीय दल तेजी से भर देंगे।

साल 2026 आते-आते खतरे की घंटियां अब धीमे नहीं बज रहीं। वे किसी जलती इमारत के फायर अलार्म की तरह चीख रही हैं। जिस पार्टी ने दशकों तक भारतीय राजनीति पर राज किया, वही आज थके हुए हाथी जैसी दिखती है, जो चढ़ाई पर हांफ रही है, जबकि उसके प्रतिद्वंद्वी तेज रफ्तार घोड़ों की तरह आगे निकल चुके हैं।

पश्चिम बंगाल चुनावों ने कांग्रेस की हालत को और बेरहमी से उजागर कर दिया। भाजपा ने मजबूत प्रदर्शन किया, जबकि कांग्रेस तस्वीर से लगभग गायब रही। कभी कांग्रेस भारतीय राजनीति का बरगद थी। आज कई राज्यों में वह धूल खाए पुराने साइनबोर्ड जैसी लगती है, जिसे लोग देखते तो हैं, मगर पढ़ते नहीं।

कांग्रेस के सामने फिलहाल चार रास्ते दिखाई देते हैं।

पहला रास्ता है धीरे-धीरे क्षेत्रीय अप्रासंगिकता की ओर फिसलना। पार्टी खत्म नहीं होगी, मगर लगातार सिमटती जाएगी। कर्नाटक, हिमाचल, तेलंगाना या केरल जैसे कुछ जेबनुमा इलाकों तक सीमित रह सकती है। बाकी राज्यों में उसे क्षेत्रीय दलों की बैसाखियों पर चलना पड़ेगा। उत्तर प्रदेश, बंगाल, ओडिशा और दिल्ली में कांग्रेस पहले ही दर्शक दीर्घा की पार्टी बनती जा रही है।

दूसरा रास्ता पुनर्निर्माण का है। कठिन, मगर संभव। इसके लिए गांधी परिवार को रोजमर्रा की पकड़ ढीली करनी होगी। पार्टी में वास्तविक लोकतंत्र लाना होगा। राज्यों के नेताओं को ताकत देनी होगी। गैर वंशवादी युवा चेहरों को आगे बढ़ाना होगा। सबसे महत्वपूर्ण, कांग्रेस को अपनी वैचारिक पहचान साफ करनी होगी। फिलहाल उसका संदेश कभी इधर, कभी उधर झूलते पुराने रेडियो जैसा लगता है।

भाजपा ने हिंदू पहचान और कल्याणकारी राष्ट्रवाद को एक साथ जोड़ दिया है। कांग्रेस उसके मुकाबले कोई भावनात्मक और विश्वसनीय कथा खड़ी नहीं कर पाई। केवल सेक्युलरिज्म अब चुनावी जादू नहीं पैदा करता। केवल कल्याणकारी वादे भी काफी नहीं। आज का मतदाता पहचान, राष्ट्रवाद, विकास और आकांक्षा सब कुछ एक ही पैकेज में चाहता है।

तीसरा रास्ता सबसे खतरनाक है : आंतरिक टूट और बिखराव। इतिहास इसके संकेत पहले ही दे चुका है। तृणमूल कांग्रेस और एनसीपी जैसी पार्टियां कांग्रेस से टूटकर निकलीं। राज्यों में कई नेताओं को लगता है कि दिल्ली का हाईकमान उनकी राजनीतिक सांसें रोक रहा है। जब योग्यता से ज्यादा वफादारी मायने रखने लगे, तो असंतोष धीरे-धीरे विस्फोट बन जाता है।

अगर हार का सिलसिला जारी रहा, तो और नेता भाजपा या क्षेत्रीय दलों की ओर जा सकते हैं। राजनीति डूबते जहाज पर ज्यादा देर खड़े रहने का खेल नहीं है। कार्यकर्ता सत्ता की तरफ भागते हैं। नेता अवसर की तरफ। विचारधारा अक्सर बाद में प्रेस कॉन्फ्रेंस में आती है।

चौथा रास्ता है लंबी मगर फीकी राजनीतिक जिंदगी। इस स्थिति में कांग्रेस खत्म नहीं होगी, मगर दोबारा शिखर पर भी नहीं पहुंचेगी। वह विपक्षी गठबंधनों की धुरी बनी रहेगी। संसद में इतनी सीटें लाती रहेगी कि उसकी उपयोगिता बनी रहे। कुछ राज्यों में सरकारें भी बना सकती है। कभी-कभी गठबंधन राजनीति में किंगमेकर भी बन सकती है। शायद यही सबसे यथार्थवादी संभावना है। लेकिन केवल जीवित रहना किसी राजनीतिक आंदोलन को प्रेरित नहीं करता।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं: "आज कांग्रेस उस पुराने थिएटर समूह जैसी लगती है, जो अब भी पुराने नाटक खेल रहा है, जबकि दर्शक डिजिटल मंचों पर जा चुके हैं। युवा मतदाता कांग्रेस को उसके वर्तमान कामों से कम, सोशल मीडिया के मजाक, पुराने घोटालों और वंशवाद की बहसों से ज्यादा पहचानते हैं। यह बेहद खतरनाक संकेत है।"

फिर भी कांग्रेस को पूरी तरह खत्म मान लेना जल्दबाजी होगी। भारतीय राजनीति में कई बार मृत घोषित खिलाड़ी वापसी कर चुके हैं। लेकिन वापसी विरासत के सहारे नहीं होती। वापसी भूख, अनुशासन, विनम्रता और पुनर्निर्माण से होती है, दक्षिण भारत की राजनीति के विश्लेषक वेंकट सुब्रमनियन ने कहा।

आखिरकार कांग्रेस की सबसे बड़ी लड़ाई चुनावी नहीं, मानसिक है। क्या पार्टी अब भी खुद को भारत का नेतृत्व करने योग्य मानती है? या उसने भीतर ही भीतर स्थायी विपक्ष बनने को स्वीकार कर लिया है?

सच में, जिस राजनीतिक दल के भीतर विश्वास ही खत्म हो जाए, वह बिना हवा की पतंग बन जाता है। कुछ देर आसमान में जरूर दिखता है, मगर अंत में गुरुत्वाकर्षण ही जीतता है।

Friday, May 22, 2026

 डिग्रियों का ढेर, ज्ञान का अकाल: भारत के क्लासरूम में आखिर हो क्या रहा है?

रिपोर्ट कार्ड चमक रहे हैं, शिक्षा दम तोड़ रही है

जब शिक्षक ही तैयार नहीं, तो बच्चे क्या सीखेंगे?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

24 मई 2026

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एक पुराना किस्सा आज भी भारतीय शिक्षा व्यवस्था का आईना लगता है।

स्कूल इंस्पेक्टर अचानक क्लास में पहुंचा। मास्टरजी बच्चों को स्पेलिंग पढ़ा रहे थे :  “Girl बोलो… ग्रिल्ड।” इंस्पेक्टर भड़क गया, “ये क्या पढ़ा रहे हो?”

मास्टरजी ने भी तल्ख़ी से जवाब दिया, “तीन महीने से तनख्वाह नहीं मिली। जब तक वेतन नहीं मिलेगा, गर्ल को ग्रिल्ड ही पढ़ाऊंगा।”

यह सिर्फ मज़ाक नहीं। यह उस टूटती हुई व्यवस्था की कहानी है, जहां शिक्षक भी हताश है और छात्र भी भटक रहा है।

एक अंग्रेज़ी शिक्षक खुद ढंग से अंग्रेज़ी नहीं बोल पाता, लेकिन बच्चों को ग्रामर पढ़ा रहा है।

मई की तपती दोपहर में साठ बच्चों की क्लास में पंखा बंद पड़ा है। बच्चे कॉपियों से हवा कर रहे हैं।

बी.एड. में टॉप करने वाला नया शिक्षक पहली ही क्लास में शोर मचाते बच्चों के सामने घबरा जाता है।

मां-बाप शादी में गुरुजनों के पैर छूते हैं, लेकिन स्कूल में टीचर की सैलरी पर ऐसे मोलभाव करते हैं जैसे सब्ज़ी खरीद रहे हों।

यही है आज की भारतीय शिक्षा व्यवस्था का कड़वा विरोधाभास।

जिस देश में सरस्वती की पूजा होती है, वहीं शिक्षक धीरे-धीरे हाशिये पर धकेला जा रहा है।

डिग्रियां बढ़ रही हैं। कोचिंग सेंटर हर गली में उग रहे हैं। चमचमाते स्कूलों के विज्ञापन आसमान छू रहे हैं। लेकिन असली शिक्षा जेठ की धूप में सूखते तालाब की तरह सिकुड़ती जा रही है।

कभी भारत में शिक्षक सिर्फ नौकरीपेशा कर्मचारी नहीं था। गांव का “मास्टरजी” समाज का नैतिक स्तंभ माना जाता था। बच्चे उनसे डरते भी थे और सम्मान भी करते थे। मां-बाप अपने बच्चों की पढ़ाई ही नहीं, संस्कार भी शिक्षक के भरोसे छोड़ देते थे।

आज वह सम्मान चॉक की धूल की तरह हवा में उड़ रहा है।

भारत एक गहरे शैक्षणिक संकट से गुजर रहा है। कमजोर शिक्षक प्रशिक्षण, रटंत शिक्षा, गिरता स्तर, घटती सामाजिक प्रतिष्ठा और प्रेरणाहीन कक्षाओं ने शिक्षण पेशे को भीतर से खोखला कर दिया है। यह अब सिर्फ शिक्षा विभाग की समस्या नहीं रही। यह देश के भविष्य का संकट बन चुकी है।

सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि देश में लाखों शिक्षक भारी-भरकम डिग्रियां लेकर घूम रहे हैं : बी.एड., एम.एड., डिप्लोमा, सर्टिफिकेट , लेकिन उनमें से कई के पास न विषय की गहराई है, न पढ़ाने की कला, न आत्मविश्वास, न संवाद क्षमता।

डिग्रियां दीवार पर टंगी रहती हैं, लेकिन क्लासरूम में शिक्षक असहाय दिखता है।

सिर्फ डिग्री हासिल कर लेना किसी को अच्छा शिक्षक नहीं बना देता। मगर हमारी व्यवस्था इसी भ्रम में जी रही है।

सरकारी स्कूलों की हालत कई जगह बेहद चिंताजनक है। अंग्रेज़ी पढ़ाने वाले कई शिक्षक खुद धाराप्रवाह अंग्रेज़ी नहीं बोल पाते। उच्चारण कमजोर है। शब्दावली सीमित है। साहित्य पढ़ने की आदत लगभग खत्म हो चुकी है।

बच्चे तोते की तरह उत्तर रट लेते हैं, लेकिन सामान्य सवालों पर चुप हो जाते हैं।

उत्तर प्रदेश के एक ग्रामीण स्कूल का निरीक्षण करने गए एक रिटायर्ड अफसर ने बताया कि वहां का अंग्रेज़ी शिक्षक खुद सामान्य बातचीत तक नहीं कर पा रहा था। बच्चे पूरे पैराग्राफ याद करके सुना रहे थे, लेकिन अपने दम पर दो वाक्य नहीं बना पा रहे थे।

यह शिक्षा नहीं। यह रटी हुई नकल का कारखाना है।

समस्या सिर्फ सरकारी स्कूलों तक सीमित नहीं। बड़े-बड़े “इंटरनेशनल” और “स्मार्ट” स्कूल भी कई बार चमकदार पैकेजिंग भर साबित होते हैं। वहां कम वेतन पाने वाले, अनुभवहीन और असुरक्षित शिक्षक काम कर रहे हैं। कई शिक्षकों की तनख्वाह मॉल कर्मचारियों या डिलीवरी बॉय से भी कम है।

जिस पेशे में सम्मान और आर्थिक सुरक्षा दोनों न हों, वहां प्रतिभाशाली लोग क्यों आएंगे?

कभी शिक्षक बनना गर्व की बात थी। आज कई लोग मजबूरी में इस पेशे में आते हैं, क्योंकि दूसरी नौकरी नहीं मिली।

सबसे गहरी बीमारी हमारी शिक्षण पद्धति में है।

भारतीय शिक्षा व्यवस्था में आज भी जिज्ञासा को अनुशासनहीनता समझ लिया जाता है। रचनात्मकता परीक्षा के ढांचे में फिट नहीं बैठती।

शिक्षक बोलता रहता है। छात्र कॉपी करते रहते हैं। परीक्षा याददाश्त को मापती है, समझ को नहीं।

नतीजा यह है कि बच्चे डिग्रियां तो ले आते हैं, लेकिन आत्मविश्वास, संवाद क्षमता और स्वतंत्र सोच विकसित नहीं हो पाती। कई पढ़े-लिखे युवा ठीक से ईमेल नहीं लिख पाते, इंटरव्यू में बात नहीं कर पाते और व्यावहारिक समस्याओं का हल नहीं ढूंढ पाते।

त्रासदी की शुरुआत तो शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों से ही हो जाती है।

बी.एड. कॉलेजों में आज भी फाइलें भरने और सैद्धांतिक बातें रटाने पर ज़ोर है। वास्तविक क्लासरूम की चुनौतियों पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है।

दिल्ली की एक प्रशिक्षु शिक्षिका ने कहा, “बी.एड. ने मुझे लेसन प्लान बनाना सिखाया, लेकिन कमजोर बच्चे को पढ़ाना या शोरगुल वाली क्लास संभालना नहीं सिखाया।”

यही एक वाक्य पूरे संकट की तस्वीर पेश कर देता है।

इंटर्नशिप कई जगह सिर्फ औपचारिकता बन चुकी है। अनुभवी शिक्षकों से मार्गदर्शन कमजोर है। नए शिक्षक बिना तैयारी के क्लास में पहुंच जाते हैं।

उधर स्कूलों का बुनियादी ढांचा भी हालात बिगाड़ रहा है। भीड़भाड़ वाली कक्षाएं। टूटी बेंचें। खाली लाइब्रेरियां। इंटरनेट की कमी। शिक्षकों की भारी कमी। एक ही शिक्षक कई क्लासें संभाल रहा है।

ऐसे माहौल में व्यक्तिगत शिक्षा संभव ही नहीं।

सामाजिक बदलावों ने भी स्थिति को उलझाया है।

पश्चिमी सोच की नकल करते हुए हमने कई जगह शिक्षक और छात्र के रिश्ते में अनुशासन का महत्व ही कम कर दिया। “टीचर सिर्फ दोस्त हो” वाली सोच ने सम्मान और जवाबदेही दोनों को कमजोर किया है।

कई शिक्षक निजी बातचीत में मानते हैं कि आज छात्रों में शिक्षकों और यहां तक कि माता-पिता के प्रति भी सम्मान घटता जा रहा है। मोबाइल की लत, घटती पढ़ने की आदत और सिकुड़ती ध्यान क्षमता ने समस्या और बढ़ा दी है।

गांव का वह सख्त लेकिन समर्पित “मास्टरजी” अब धीरे-धीरे सार्वजनिक जीवन से गायब हो रहा है।

और जब शिक्षक का अधिकार कमजोर पड़ता है, तो क्लासरूम दिशा खो देता है।

समाधान मुश्किल नहीं, लेकिन राजनीतिक भाषणों से नहीं आएंगे।

शिक्षक प्रशिक्षण को फाइलों और औपचारिक भाषणों से निकालकर वास्तविक क्लासरूम से जोड़ना होगा। लंबी इंटर्नशिप, अनुभवी शिक्षकों की मेंटरशिप, नियमित प्रशिक्षण और व्यावहारिक अभ्यास जरूरी हैं।

भर्ती में सिर्फ परीक्षा अंक नहीं, बल्कि संवाद क्षमता, विषय ज्ञान, भावनात्मक समझ और पढ़ाने की प्रतिभा को महत्व देना होगा।

शिक्षकों को बेहतर वेतन, सामाजिक सम्मान और स्पष्ट करियर रास्ते देने होंगे। स्कूलों में लाइब्रेरी, डिजिटल सुविधाएं और बेहतर शिक्षण संसाधन उपलब्ध कराने होंगे।

सबसे जरूरी बात यह है कि भारत को शिक्षा को सिर्फ आंकड़ों और योजनाओं का खेल समझना बंद करना होगा। शिक्षा आखिरकार इंसानों द्वारा इंसानों को गढ़ने की प्रक्रिया है।

कोई भी देश अपने शिक्षकों की गुणवत्ता से ऊपर नहीं उठ सकता।

अगर भारत ने अपने शिक्षक, अपनी शिक्षण पद्धति और अपने क्लासरूम को बचाने की गंभीर कोशिश नहीं की, तो “शिक्षा महाशक्ति” बनने का सपना सरकारी फाइलों और भाषणों तक ही सीमित रह जाएगा, जबकि देश की असली कक्षाएं चुपचाप टूटती रहेंगी।

 चौंकाने वाला सच!!!

भारत के असली निर्माता चमचमाते एलीट स्कूल नहीं, साधारण स्कूल हैं

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बृज खंडेलवाल द्वारा

23 मई 2026

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आगरा में ही आधा दर्जन एलीट एक्सक्लूसिव स्कूल्स खुल चुके हैं जहां का खर्चा मां बाप से पूछिए

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आख़िर इंसान को कामयाब क्या बनाता है?

एयर कंडीशन्ड स्मार्ट क्लासरूम, विदेशी सिलेबस और चमकदार कैंपस?

या फिर संघर्ष, मेहनत, भूख और आगे बढ़ने का जुनून?

आज भारत में एक अजीब मानसिकता घर कर गई है। महंगे, हाई प्रोफाइल और “इंटरनेशनल” स्कूलों को सफलता की गारंटी माना जाने लगा है। लाखों रुपये फीस। अंग्रेज़ी लहजे पर गर्व। स्कूल कम, फाइव स्टार होटल ज़्यादा लगते हैं। माता-पिता भी अक्सर स्कूल नहीं, “स्टेटस सिंबल” खरीदते दिखाई देते हैं।

लेकिन भारत का इतिहास कुछ और कहानी सुनाता है।

आज़ाद भारत के असली निर्माता : प्रधानमंत्री, वैज्ञानिक, सैनिक, डॉक्टर, अफसर, उद्योगपति और खिलाड़ी , ज़्यादातर साधारण सरकारी स्कूलों, केन्द्रीय विद्यालयों, नगर निगम स्कूलों और सामान्य प्राइवेट स्कूलों से निकले हैं। देश की रीढ़ एलीट बोर्डिंग स्कूलों ने नहीं, आम स्कूलों ने तैयार की है।

गुजरात के वडनगर में एक साधारण स्कूल में पढ़ने वाला एक लड़का आगे चलकर भारत का प्रधानमंत्री बना। उसका नाम था नरेंद्र मोदी। न कोई स्मार्ट क्लास। न आलीशान कैंपस। न विदेशी सिलेबस।

ऐसी कहानियां पूरे भारत में बिखरी पड़ी हैं।

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने तमिलनाडु के साधारण स्कूल में पढ़ाई की। लाल बहादुर शास्त्री सामान्य स्कूलों से निकलकर देश के प्रधानमंत्री बने। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और रामनाथ कोविंद भी सरकारी और स्थानीय शिक्षा व्यवस्था से आगे बढ़े।

इन लोगों को विरासत में सुविधाएं नहीं मिलीं। इन्होंने भारत को करीब से देखा। गरीबी देखी। संघर्ष देखा। असमानता देखी। इन्हीं अनुभवों ने इन्हें मजबूत बनाया। इन्हें जमीन से जोड़े रखा।

बड़े एलीट स्कूलों से पढ़े लोग भी सफल होते हैं। उनमें आत्मविश्वास, नेटवर्क और एक्सपोजर होता है। लेकिन जब देश निर्माण की बात आती है, तब तस्वीर बदल जाती है।

कारोबारी दुनिया को ही देख लीजिए।

धीरूभाई अंबानी ने गुजरात के एक साधारण स्कूल से पढ़ाई की और फिर रिलायंस जैसा साम्राज्य खड़ा किया। इन्फोसिस के नारायण मूर्ति सरकारी स्कूलों में पढ़े। गौतम अडानी, शिव नाडर और सुनील मित्तल भी किसी शाही बोर्डिंग स्कूल की पैदाइश नहीं थे।

इन लोगों ने संघर्ष से सीख हासिल की। अभाव ने इन्हें जुगाड़, धैर्य और जोखिम उठाना सिखाया। यही असली बिजनेस स्कूल था।

भारतीय सेना की कहानी भी यही कहती है।

कारगिल के हीरो कैप्टन विक्रम बत्रा साधारण स्कूलों में पढ़े। फील्ड मार्शल करियप्पा सामान्य शिक्षा पृष्ठभूमि से आए। आज भी भारत की सीमाओं पर खड़े हजारों सैनिक और अफसर सरकारी स्कूलों, सैनिक स्कूलों और केन्द्रीय विद्यालयों से निकलते हैं।

जंग के मैदान में गोली यह नहीं पूछती कि सैनिक किस “इंटरनेशनल स्कूल” से पढ़ा है।

सेना में साहस, अनुशासन और प्रदर्शन मायने रखता है।

UPSC की परीक्षा तो इस मिथक को पूरी तरह तोड़ देती है।

हर साल IAS, IPS और IFS के टॉपर छोटे शहरों, गांवों, केन्द्रीय विद्यालयों, नवोदय विद्यालयों और सामान्य स्कूलों से निकलते हैं। कई हिंदी माध्यम से पढ़े होते हैं। कई बेहद साधारण परिवारों से आते हैं।

उनकी सफलता साबित करती है कि भारत में अब भी मेहनत, लगन और अनुशासन स्कूल के ब्रांड नाम से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।

डॉक्टरों और वैज्ञानिकों की दुनिया में भी यही तस्वीर दिखती है।

AIIMS के कई डॉक्टर, वैज्ञानिक और सर्जन साधारण स्कूलों से आए हैं। NEET के टॉपर भी अक्सर सरकारी या सामान्य स्कूलों से निकलते हैं। उनकी सफलता महंगे कैंपस नहीं, घंटों की पढ़ाई और अथक मेहनत से बनती है।

खेल जगत को देखिए।

सचिन तेंदुलकर शारदाश्रम विद्यालय से पढ़े। महेंद्र सिंह धोनी जवाहर विद्या मंदिर से निकले। पी.टी. ऊषा ने सरकारी स्कूल में पढ़ाई की। इनकी प्रतिभा एयर कंडीशनर में नहीं, संघर्ष में निखरी।

फिर भी समाज महंगे स्कूलों का इतना दीवाना क्यों है?

क्योंकि हमारे भीतर अब भी औपनिवेशिक मानसिकता जिंदा है। अंग्रेज़ी बोलने, चमकदार यूनिफॉर्म पहनने और महंगे स्कूल में पढ़ने को लोग श्रेष्ठता समझते हैं।

आज स्कूल शिक्षा का मंदिर कम, सामाजिक दिखावे का मंच ज्यादा बन गए हैं।

लेकिन शिक्षा फैशन शो नहीं है।

बच्चे की सफलता इस बात पर ज्यादा निर्भर करती है कि उसमें अनुशासन कितना है, मेहनत कितनी है, जिज्ञासा कितनी है, और परिवार व शिक्षक उसे कितनी सही दिशा देते हैं।

साधारण स्कूल एक और बड़ी चीज़ सिखाते हैं , जीवन से लड़ना।

वहां पढ़ने वाले बच्चे अक्सर बिजली कटौती में पढ़ते हैं। भीड़भाड़ वाली बसों में सफर करते हैं। किताबें बांटकर पढ़ते हैं। सीमित संसाधनों में सपने देखते हैं। यही संघर्ष उन्हें मानसिक रूप से मजबूत बनाता है।

यही कारण है कि मुख्यधारा के स्कूल भारत की असली ताकत हैं।

वे करोड़ों बच्चों को सपने देखने का अधिकार देते हैं। वे पहली पीढ़ी के अफसर, इंजीनियर, डॉक्टर और उद्यमी पैदा करते हैं। वे अवसरों की सीढ़ी को खुला रखते हैं।

भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था भी बराबरी का मौका देती है। IIT, AIIMS, NDA और UPSC जैसी परीक्षाएं गांव के बच्चे को भी राष्ट्रीय स्तर पर मुकाबला करने का अवसर देती हैं।

यही भारत की असली खूबसूरती है।

इसका मतलब यह नहीं कि सरकारी स्कूलों में समस्याएं नहीं हैं। वहां शिक्षक की कमी है। बुनियादी सुविधाओं की दिक्कत है। पुरानी पढ़ाई पद्धति है। इन कमियों को दूर करना बेहद जरूरी है।

लेकिन समाधान यह नहीं कि सिर्फ कुछ चमकदार एलीट स्कूल बना दिए जाएं।

समाधान यह है कि हर बच्चे को अच्छी शिक्षा मिले।

जब ओडिशा के किसी गांव का स्कूल अगला कलाम पैदा करता है, जब हिमाचल का साधारण स्कूल अगला विक्रम बत्रा देता है, तब भारत जीतता है।

आधुनिक भारत की कहानी एलीट स्कूलों की नहीं, साधारण स्कूलों की कहानी है।

यहीं भारत की असली प्रतिभा तैयार होती है।

यहीं से देश के असली निर्माता निकलते हैं।

Wednesday, May 20, 2026

 


यमुना नदी में सीवेज, मलबा, इंडस्ट्रियल वेस्ट और लाशें बह रही हैं, और सरकारी तंत्र मूक दर्शक बना खड़ा है

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बृज खंडेलवाल द्वारा

21 मई 2026

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यमुना छठ पर विशेष रिपोर्ट

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12 मई 2026 की शाम आगरा के एक घाट पर जो हुआ, वह कोई संयोग या महज़ दुर्भाग्य नहीं था। जन्मदिन मनाने आए छह युवा यमुना में उतरे। दो घंटे तक उन्हें बचाने की कोशिशें चलती रहीं, लेकिन अंततः चार बच्चों के शव बाहर निकाले गए। आए दिन ये दुर्घटनाएं हो रही हैं। पुलिस ने घाटों पर होर्डिंग्स लगाए हैं, सावधान किया है, पर लोग हैं कि मानते नहीं। वाकई, परिवारों का दुख शब्दों से परे है। वही यमुना, जिसके किनारे हमारी आस्था, इतिहास और सभ्यता सांस लेती आई है, आज मौत की गवाह बनती जा रही है।

इस घटना से कुछ ही सप्ताह पहले वृंदावन के केशी घाट पर नाव पलटने से 15 से अधिक तीर्थयात्रियों की मौत हुई थी। नाव में क्षमता से अधिक सवारियाँ थीं। लाइफ जैकेट नहीं थीं। निगरानी लगभग नदारद थी। सवाल यह है कि आखिर हर हादसे के बाद केवल शोक और मुआवज़े की रस्म क्यों निभाई जाती है?

इन घटनाओं को केवल “दुर्घटना” कहना सच्चाई से आँख चुराना होगा। यह प्रशासनिक विफलता, सरकारी लापरवाही और टूटी हुई व्यवस्था का नतीजा है। जब नदी जहरीली हो, उसका प्राकृतिक बहाव सिकुड़ चुका हो, सुरक्षा इंतज़ाम कागज़ों में सिमट जाएँ और निगरानी तंत्र सोया रहे, तब मौतें केवल समय का इंतज़ार बन जाती हैं। अरबों रुपये खर्च होने के दावों के बावजूद ज़मीनी हालात जस के तस हैं।

यमुना की हालत किसी से छिपी नहीं। लगभग 1,376 किलोमीटर लंबी यह नदी हिमालय से निकलकर हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश से गुजरती है। लेकिन दिल्ली के बाद इसका बड़ा हिस्सा एक बहती हुई नाली में बदल जाता है। करोड़ों लीटर बिना शोधन का सीवेज प्रतिदिन नदी में गिरता है। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट या तो अधूरे हैं, या उनकी क्षमता कम है, या फिर वे ठीक से चल ही नहीं रहे। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और अन्य पर्यावरणीय रिपोर्टें बार-बार बता चुकी हैं कि नदी में बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड और फीकल कॉलिफॉर्म का स्तर सुरक्षित सीमा से कई गुना ऊपर है। कई जगह पानी नहाने लायक भी नहीं बचा।

दिल्ली का प्रदूषण मथुरा, वृंदावन और आगरा तक पहुँचता है। धार्मिक नगरी होने के कारण इन शहरों के घाटों पर हर दिन भारी भीड़ उमड़ती है, लेकिन दूसरी ओर नाले सीधे नदी में गिरते रहते हैं। आगरा में ताजमहल के पीछे बहती यमुना अक्सर झाग, काले पानी और बदबू के कारण चर्चा में रहती है। यह केवल सौंदर्य का प्रश्न नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरणीय आपदा का संकेत है।

समस्या यहीं खत्म नहीं होती। यमुना की बाढ़ पट्टी पर तेजी से अतिक्रमण हुआ है। वृंदावन और मथुरा क्षेत्र में ड्रोन सर्वेक्षणों में सैकड़ों अवैध निर्माण सामने आए। नदी का प्राकृतिक फैलाव सिकुड़ता गया। जहाँ पानी फैलकर खुद को साफ करता था, वहाँ अब कंक्रीट और अवैध कॉलोनियाँ खड़ी हैं। नतीजा साफ है : जल ठहराव बढ़ा, प्रदूषण जमा हुआ और नदी का दम घुटने लगा। दुखद यह है कि ऐसे अतिक्रमण अक्सर प्रभावशाली लोगों के संरक्षण में पनपते हैं।

तीन दशक से योजनाएँ बन रही हैं। यमुना एक्शन प्लान आया। राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के तहत परियोजनाएँ चलीं। हजारों करोड़ रुपये खर्च होने के दावे किए गए। लेकिन सवाल वही है : अगर इतना पैसा लगा, तो नदी अब भी ज़हरीली क्यों है? अधूरी पाइपलाइनें, बंद पड़े प्लांट, कमजोर निगरानी और भ्रष्ट तंत्र ने योजनाओं को कागज़ी सफलता में बदल दिया। जनता को यह जानने का अधिकार है कि पैसा कहाँ गया, किसने निगरानी की और जवाबदेही किसकी तय हुई।

घाटों पर सुरक्षा व्यवस्था भी बेहद कमजोर है। आगरा के बल्केश्वर घाट सहित कई स्थानों पर न तो पर्याप्त लाइफगार्ड हैं, न गहराई के स्पष्ट संकेत, न मजबूत बैरियर और न ही आपातकालीन बचाव तंत्र। नाव संचालन में भी भारी लापरवाही है। क्षमता से अधिक यात्रियों को बैठाना आम बात है। फिटनेस सर्टिफिकेट और लाइफ जैकेट जैसे नियम केवल औपचारिकता बन चुके हैं।

रेत खनन ने स्थिति को और खतरनाक बना दिया है। अवैध खनन से नदी तल में गहरे गड्ढे और अदृश्य भंवर बन गए हैं। ऊपर से शांत दिखने वाला पानी अचानक किसी को निगल लेता है। यह केवल पर्यावरणीय अपराध नहीं, बल्कि सीधे-सीधे मानव जीवन से खिलवाड़ है।

सबसे बड़ी विफलता विभागों के बीच तालमेल की कमी है। जल शक्ति मंत्रालय, नगर निगम, विकास प्राधिकरण, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य सरकार :  सबकी जिम्मेदारियाँ अलग-अलग बंटी हैं, लेकिन समन्वय लगभग गायब है। हर हादसे के बाद फाइलें चलती हैं, बैठकें होती हैं, बयान दिए जाते हैं, फिर सब ठंडा पड़ जाता है।

न्यायालयों और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने समय-समय पर सख्त निर्देश दिए हैं। सीवेज रोकने, अतिक्रमण हटाने और नदी संरक्षण के आदेश जारी हुए। लेकिन अधिकतर आदेश कागज़ों तक सीमित रह गए। बिना सख्त निगरानी और जवाबदेही के आदेश केवल सरकारी फाइलों की शोभा बन जाते हैं।

अब केवल भाषणों से काम नहीं चलेगा। ठोस और तत्काल कार्रवाई की जरूरत है।

सबसे पहले, नदी में गिरने वाले सभी नालों को तत्काल ट्रीटमेंट प्लांट से जोड़ा जाए और बंद पड़े प्लांट 30 दिनों के भीतर चालू किए जाएँ। घाटों पर प्रशिक्षित लाइफगार्ड, गहराई संकेतक, चेतावनी बोर्ड और आपातकालीन बचाव व्यवस्था अनिवार्य हो। नाव संचालन पर सख्ती से नियम लागू किए जाएँ और हर नाव में लाइफ जैकेट अनिवार्य हो।

वृंदावन, मथुरा और आगरा की बाढ़ पट्टी में बने अवैध निर्माणों को चिन्हित कर पारदर्शी तरीके से हटाया जाए। अवैध रेत खनन पर तत्काल रोक लगे और दोषी अधिकारियों तथा माफिया पर आपराधिक कार्रवाई हो। यमुना में न्यूनतम जल प्रवाह सुनिश्चित करने के लिए जल प्रबंधन नीतियों की समीक्षा जरूरी है। सबसे महत्वपूर्ण, हर परियोजना का सार्वजनिक ऑडिट हो और उसकी प्रगति रिपोर्ट जनता के सामने रखी जाए।

ये माँगें कठोर जरूर हैं, लेकिन हालात उससे कहीं अधिक भयावह हैं। राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना कोई बदलाव संभव नहीं। जब तक प्रशासनिक अधिकारियों और राजनीतिक नेतृत्व की व्यक्तिगत जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक योजनाएँ केवल घोषणाओं में ही जीवित रहेंगी।

यमुना केवल एक नदी नहीं है। यह ब्रज की स्मृति, संस्कृति और जनजीवन की धड़कन है। इसके किनारे पीढ़ियाँ पली हैं। अगर यह नदी मरती है, तो केवल पर्यावरण नहीं मरता : समाज, संस्कृति और भविष्य भी घायल होते हैं।

कन्हा, महक, रिया और विक्की केवल चार नाम नहीं हैं। वे हमारी सामूहिक उदासीनता की कीमत हैं। केशी घाट और आगरा के हादसे चेतावनी हैं कि अब भी अगर हमने आँखें बंद रखीं, तो आने वाले वर्षों में ऐसी त्रासदियाँ और बढ़ेंगी।

सरकार के पास अभी भी अवसर है। पारदर्शिता दिखाई जाए, जवाबदेही तय की जाए और जनता को साझेदार बनाकर यमुना को पुनर्जीवित करने की गंभीर शुरुआत की जाए। नागरिकों को भी जागना होगा। सवाल पूछने होंगे। रिपोर्ट माँगनी होगी। स्थानीय निगरानी में भाग लेना होगा।

क्योंकि जब नदियाँ मरती हैं, तब सभ्यताएँ भी धीरे-धीरे दम तोड़ने लगती हैं। यमुना को बचाना केवल एक नदी को बचाना नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति, अपनी स्मृतियों और आने वाली पीढ़ियों को बचाना है।

आज भी समय है। फैसला हमें करना है : क्या हम यमुना को किस्मत के हवाले छोड़ देंगे, या समझदारी, संवेदनशीलता और कार्रवाई से उसका भविष्य बचाएँगे?


 


यमुना नदी में, सीवेज, मलवा, इंडस्ट्रियल वेस्ट और लाशें बह रही हैं, और सरकारी तंत्र मूक,  लाचार चश्मदीद बना खड़ा है

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

21 मई 2026

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12 मई 2026 की शाम आगरा के एक घाट पर जो हुआ, वह संयोग या दुर्भाग्य नहीं था। जन्मदिन मनाने आए छह युवा नदी में उतरे; दो घंटे तक बचाने की कोशिशें चलीं, पर चार बच्चों के शव निकले। पीड़ित परिवारों का शोक अपूरणीय है। वही यमुना, जिसके किनारे हमारी इतिहास‑कथाएँ, आरतियाँ और आस्थाएँ जुड़ी हैं, आज मौत की गवाही दे रही है। इस घटना के ठीक कुछ हफ्ते पहले वृंदावन के केशी घाट पर भी एक नाव पलटी थी, जिसमें 15‑16 तीर्थयात्रियों की मौत हुई, नाव में अधिक सवारियाँ, बिना लाइफ जैकेट के संचालन और निगरानी का अभाव मुख्य कारण बताया गया।

इन हादसों को केवल दुर्घटना कहना कानूनी और नैतिक दोनों तरह से हर्ज़ है। यह प्रणालीगत विफलता और व्यापक लापरवाही का परिणाम है, न सिर्फ स्थानीय प्रशासन की, बल्कि राज्य और केंद्रीय संस्थाओं की भी। जब नदी ही जहरीली है, संरक्षण का दायरा सिकुड़ चुका है और सुरक्षा मानक सिर्फ घोषणाओं में रह गए हैं, तब मानव जीवन का जोखिम बढ़ना स्वाभाविक है। सरकारों के वादों और खर्चों के बावजूद जमीन पर स्थितियाँ नहीं बदलीं।

यमुना की मौजूदा हालत समझने के लिए कुछ ठोस तथ्य देखें। यमुना की कुल लंबाई लगभग 1,376 किलोमीटर है और यह हिमालय की पिघलती चोटियों से उठकर उत्तर प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली होते हुए पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में बहती है। एनवायरनमेंटल मॉनिटर्स और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली के पास के हिस्से में कुल प्रदूषण का बहुत बड़ा हिस्सा उत्पन्न होता है। दिल्ली से प्रतिदिन करोड़ों लीटर सीवेज का रिसाव यमुना में होता रहा है; कई ट्रीटमेंट प्लांट हैं, पर पाइपलाइन अधूरी, प्लांट की क्षमता सीमित या संचालन ठप मिलती है। सीपीसीबी और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्टों में बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड और फीकल कॉलिफॉर्म के उच्च स्तर दर्ज हैं, जो नहाने के काबिल पानी से बहुत ऊपर हैं। उदाहरण के तौर पर दिल्ली के कुछ नापों में फीकल कॉलिफॉर्म हजारों से लेकर लाखों MPN प्रति 100 मिलीलीटर पाए गए, सुरक्षित मानक से कई गुना अधिक। ये आँकड़े सार्वजनिक रिपोर्टों और सर्वे रिपोर्टों में दर्ज हैं।

प्रदूषण दिल्ली से शुरू होकर आगरा, मथुरा और वृंदावन तक पहुँचता है। मथुरा और वृंदावन में धार्मिक गतिविधियों के चलते घाटों पर जनसैलाब होता है; वहीँ बिना उपचार के नाले सीधे नदी में गिरते हैं। आगरा में ताजमहल के पास यमुना का पानी झाग और गंदगी के कारण अक्सर चर्चा में रहता है। स्थानीय नागरिक और पर्यावरणविद यह कहते रहे हैं कि किसी ऐतिहासिक धरोहर के पास बहने वाली नदी का ऐसा हाल न सिर्फ पर्यटन के लिए नुकसानदेह है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा है।

अतिक्रमण और अवैध निर्माण समस्या को और बढ़ाते हैं। ड्रोन सर्वे और अन्य भू‑अवलोकन ने वृंदावन के बाढ़ पट्टी और किनारों पर सैकड़ों अवैध निर्माण दर्शाए हैं। 2025 के कुछ सर्वे में वृंदावन के बाढ़ क्षेत्र में कई सौ अवैध संरचनाएँ सामने आईं। जब नदी का प्राकृतिक दायरा सिकुड़ता है, बहाव बाधित होता है और जल का ठहराव बढ़ता है; इससे पानी का स्वच्छता स्तर गिरता है और प्लास्टिक, सीवेज व औद्योगिक अपशिष्ट का जमाव बढ़ता है। अतिक्रमण अक्सर स्थानीय शक्तिशाली वर्गों के संरक्षण में होता है, जिससे उचित कार्रवाई नहीं हो पाती।

सरकारी योजनाएँ और खर्च भी यहाँ संदिग्धता पैदा करते हैं। 1990 के दशक से अलग‑अलग योजनाएँ चलीं: यमुना एक्शन प्लान, राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन से जुड़े कार्यक्रम और अन्य परियोजनाएँ। अरबों रुपये खर्च किए जाने का दावा है, पर कई जगहों पर ट्रीटमेंट प्लांट अधूरी पाइपलाइन, बंद इकाइयाँ या अपर्याप्त संचालन के कारण प्रभावी नहीं रहे। इस असंगति का असर साफ दिखता है: निवेश जहाँ होना चाहिए था, वहाँ परिणाम कम दिखे। इससे नागरिकों में सवाल उठते हैं, वित्त कहाँ गया, परियोजनाओं की निगरानी और ऑडिट किसने की, जवाबदेही किसकी है।

जीवित निगरानी और आपदा प्रबंधन के अभाव ने कई मौतों को आम बना दिया है। आगरा के बल्केश्वर घाट जैसी जगहों पर घाट का डिजाइन, गहराई‑मार्किंग, बेरियर, लाइफगार्ड की नियुक्ति और आकस्मिक बचाव व्यवस्था की कमी थी। वाहन या नाव संचालन की मानक गतिविधियाँ: लाइफ जैकेट का अनिवार्य इस्तेमाल, नावों का फिटनेस सर्टिफिकेट, क्षमता नियंत्रण और सीसीटीवी निगरानी: इनका अनुपालन अक्सर नहीं किया जाता। रेत खनन ने नदी तल को असमान कर दिया है; अनियंत्रित खनन से तल में गहरे गड्ढे और भंवर बन गए हैं जो सतह से अप्रकट होते हैं और तैरने वाले लोगों के लिए जानलेवा सिद्ध होते हैं। इन सबका दायरा सिर्फ तकनीकी नहीं, बल्कि प्रशासनिक और कानूनी भी है।

प्रमुख समस्या कई विभागों के बीच समन्वय की कमी है। जल शक्ति मन्त्रालय, राज्य सरकार, नगर निगम, विकास प्राधिकरण और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड: ये सभी अलग जिम्मेदारियाँ निभाते हैं, पर अंतर्निहित तालमेल की कमी से कार्य अक्सर ढीला पड़ जाता है। यमुना जैसे पारिस्थितिक तंत्र को बचाने के लिए एक संयुक्त प्रशासनिक फ्रेमवर्क चाहिए, जिसमें समयबद्ध लक्ष्यों, पारदर्शी फंडिंग और सार्वजनिक ऑडिट का स्पष्ट तंत्र हो। राजनीति में इस मुद्दे का इस्तेमाल चुनावी वादों के लिए होता है, पर चुनावों के बाद दीर्घकालिक नीतियाँ और निगरानी गायब रहती है।

न्यायालयों और पर्यावरण ट्रिब्यूनलों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल और उच्च न्यायालय ने समय‑समय पर निर्देश जारी किए हैं: सीवेज ट्रीटमेंट बढ़ाने, अतिक्रमण हटाने और नदियों की बहाल व्यवस्था के आदेश दिए गए हैं। पर समस्या यह है कि कई बार ये आदेश प्रकृति में कागजी ही रह जाते हैं; आदेशों का पालन सुनिश्चित करने के लिए नियमित निगरानी, अनुशासनात्मक कार्रवाई और समय सीमा का पालन जरूरी है। बिना कठोर पालन के नोटिस भी रिक्त घोषणाएँ बनकर रह जाते हैं।

अब समय है मांगों का, न सिर्फ नारेबाजी का। यमुना और उससे जुड़े समुदायों की सुरक्षा और नदी‑पुनरुद्धार के लिए ठोस उपाय तत्काल लागू होने चाहिए। कुछ तत्काल और व्यावहारिक कदम जो लागू होने चाहिए, वे निम्न हैं:

1. नदी किनारे के सभी नालों और सीवरेज आउटलेट को प्राथमिकता के आधार पर ट्रीटमेंट प्लांट से जोड़ा जाए और 30 दिनों के भीतर बंद प्लांट को चालू किया जाए। इसके लिये केंद्रीय और राज्य स्तर पर संयुक्त निगरानी टीम गठित की जाए और सार्वजनिक रिपोर्टिंग अनिवार्य हो।

2. घाटों पर जीवनरक्षक सुविधाएँ अनिवार्य की जाएँ: प्रशिक्षित लाइफगार्ड, स्पष्ट गहराई‑मार्किंग, दृढ़ बेरियर और रियल‑टाइम धारा चेतावनी प्रणाली। घाटों का संरचनात्मक निरीक्षण रेलवे जैसी नियमितता से किया जाए।

3. नाव संचालन पर सख्त नियम लागू हों—प्रत्यक्ष क्षमता सीमाएँ, हर नाव पर लाइफ जैकेट अनिवार्य, फिटनेस सर्टिफिकेट अनिवार्य और उल्लंघन पर लाइसेंस रद्द एवं दंडात्मक कार्रवाई। यात्रियों की संख्या पर कठोर निगरानी रखी जाए।

4. वृंदावन‑मथुरा‑आगरा के बाढ़ पट्टी में पाए गए अवैध निर्माणों की स्वतः पहचान के लिए उपग्रह और ड्रोन सर्वे नियमित रूप से हो और अनुमत समयसीमा के भीतर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई पारदर्शी ढंग से की जाए। किसी भी तरह का राजनीतिक प्रोटेक्शन स्वीकार नहीं किया जाएगा।

5. रेत खनन पर तत्काल प्रतिबंध और जो अवैध खनन पाया जाए, उसके खिलाफ कड़ी आपराधिक और आर्थिक कार्रवाई की जाए। जिन अधिकारियों की मिलीभगत पाई जाए उनकी संपत्ति जब्त करने और मुकदमा चलाने जैसी रोक‑थाम की व्यवस्था लागू हो।

6. यमुना को पारिस्थितिक दृष्टि से सुदृढ़ करने के लिये न्यूनतम निर्बाध जलप्रवाह सुनिश्चित करने के उद्देश्य से जलप्रबंधन नीतियाँ लागू की जाएं। सहायक नदियों एवं धाराओं के बहाव को बहाल करने के लिए जल आवंटन और सिंचाई नीतियों में समन्वय अत्यावश्यक है।

7. सार्वजनिक पारदर्शिता और जवाबदेही के लिये हर परियोजना का आर्थिक ऑडिट सार्वजनिक किया जाए और परियोजना के समय‑समय पर प्रगति‑रिपोर्ट नागरिक मंचों पर उपलब्ध कराई जाए। कोई भी खर्च बिना स्वतंत्र ऑडिट के स्वीकृत नहीं किया जाए।

ये मांगें कठोर हैं, पर आवश्यक भी। राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना कोई भी नीति टिकाऊ नहीं होती। जब तक प्रशासनिक अधिकारियों और राजनीतिक नेतृत्व की व्यक्तिगत जवाबदेही तय नहीं की जाती, तब तक प्रक्रियाएँ अधूरी रहेंगी। जिन्हें जनता का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुना गया है, उन्हें उन्हें मिलने वाली जवाबदेही का बोझ वहन करना होगा।

यमुना सिर्फ पानी नहीं है; यह ब्रज की स्मृति है, संस्कृति है और जन‑जीवन का स्रोत है। यह हमारे इतिहास का वह धागा है जो पीढ़ियों से जुड़ा हुआ है। अगर हम इसे न बचाएंगे तो न केवल पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ेगा, बल्कि सामाजिक और आर्थिक तबाही भी गहरी होगी। बच्चों की हँसी खत्म नहीं हो सकती; किन्तु अगर नदी को बचाने के लिए हम आज कदम नहीं उठाएंगे, तो भविष्य में और अधिक प्राण जाएंगे।

कन्हा, महक, रिया और विक्की ; ये नाम सिर्फ चार परिवारों के सदस्यों के नहीं हैं; वे हमारी उदासीनता की वह तस्वीर हैं जिसे हम अब और नकार नहीं सकते। केशी घाट और आगरा के घाट की इन घटनाओं का अर्थ केवल व्यक्तिगत दुख नहीं है; यह चेतावनी है कि शासन और समाज ने मिलकर जो जिम्मेदारियाँ ठानी थीं, उन्हें पूरा करना अब जीवन और मृत्यु का प्रश्न बन गया है।

सरकार के पास अभी भी मौका है, कदम उठाइए, पारदर्शिता दिखाइए, और जनता के साथ साझेदारी में यमुना को पुनः जीवित कीजिए। और नागरिकों को भी जागृत होना होगा: सवाल पूछिए, रिपोर्ट माँगिए, स्थानीय निगरानी में भाग लीजिए। अगर नदियाँ मरती हैं तो हमारी सभ्यता का भी दम घुटने लगता है। यमुना बचाने का अर्थ सिर्फ नदी को नहीं बचाना है; यह अपने आप को, अपनी संस्कृति को और आने वाली पीढ़ियों को बचाने का काम है।

अगर आज हम इन मांगों को गंभीरता से लागू कर दें तो और मौतों को रोका जा सकता है। अगर नहीं तो इतिहास और जनता दोनों ही उन लोगों से हिसाब सवाल करेंगे जिन्होंने जानबूझकर आंखें बंद कर रखीं। यमुना को बचाना अब किसी दल विशेष का मुद्दा नहीं रह गया; यह हर नागरिक और हर संवेदनशील संस्थान की नैतिक आवश्यकता बन गया है।

यमुना की रक्षा की लड़ाई अभी बाकी है। और यह लड़ाई जितनी ज़रूरी है, उतनी ही अविलंब भी है। हमें चुनना होगा: किस्मत के हवाले कर देना, या समझदारी और कार्रवाई से अपने भविष्य को सुरक्षित करना।

 दोहरा मापदंड: भारत पर सख़्त, चीन पर नरम क्यों है पश्चिमी मीडिया?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

21 मई 2026

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मई 2026 में जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नॉर्वे दौरे पर गए, तो एक नॉर्वेजियन पत्रकार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस खत्म होने के बाद उनसे सवाल उछाल दिया। सवाल था :  भारत प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में नॉर्वे से बहुत नीचे क्यों है?

वीडियो वायरल हो गया। पश्चिमी मीडिया ने इसे भारत में लोकतंत्र के “गिरते स्तर” की मिसाल बना दिया।

लेकिन ज़रा ठहरिए। आख़िरी बार कब किसी पश्चिमी पत्रकार ने चीन के प्रेस फ्रीडम रिकॉर्ड पर इसी तरह सार्वजनिक तमाशा खड़ा किया था?

चीन उन्हीं सूचियों में सबसे नीचे बैठा है। फिर भी उसकी आलोचना वैसी सुर्खियां नहीं बनाती जैसी भारत की बनती हैं।

यहीं से दोहरे मापदंड की कहानी शुरू होती है। पश्चिमी मीडिया भारत की कमियों को अक्सर तेज़ रोशनी में दिखाता है।

सीएए को मुसलमानों के खिलाफ़ कदम बताया गया। किसान आंदोलन को “तानाशाही प्रवृत्ति” का सबूत कहा गया। कोविड की दूसरी लहर की भयावह तस्वीरें पूरी दुनिया में दिखाई गईं। चुनावों की कवरेज में “हिंदू राष्ट्रवाद” और बहुसंख्यकवाद पर लगातार सवाल उठे।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी पूछते हैं, "इन मुद्दों पर रिपोर्टिंग होना गलत नहीं है। पत्रकारिता का काम ही सवाल पूछना है। मगर सवाल यह है कि भारत के लिए इस्तेमाल होने वाला लहजा इतना कड़ा क्यों होता है, जबकि चीन के मामले में वही तीखापन अक्सर गायब दिखता है?"

चीन पर आरोप हैं कि उसने शिनजियांग में लाखों उइगर मुसलमानों को कैंपों में रखा। यह खबरें भी छपती हैं। लेकिन चीन को लेकर पश्चिमी मीडिया में वैसा लगातार नैरेटिव नहीं बनता कि “लोकतंत्र खतरे में है” या “सिस्टम टूट रहा है।”

क्यों?

क्योंकि दुनिया ने चीन से लोकतंत्र की उम्मीद ही नहीं की।

भारत लोकतांत्रिक देश है, इसलिए उससे ऊंचे आदर्शों की उम्मीद की जाती है। और जब वह उन आदर्शों पर पूरी तरह खरा नहीं उतरता, तो आलोचना कहीं ज्यादा कठोर हो जाती है।

शब्दों की राजनीति बहुत कुछ कहती है । मीडिया सिर्फ खबरों से नहीं, शब्दों से भी धारणा बनाता है, कहते हैं वरिष्ठ पत्रकार  जोज़फ।

भारत के लिए अक्सर शब्द सुनाई देते हैं ;  “बैकस्लाइडिंग”, “मेजॉरिटेरियन”, “हिंदू नेशनलिज्म”। हिंदू-मुस्लिम तनाव की रिपोर्टिंग में कई बार वही पुरानी औपनिवेशिक सोच झलकती है कि भारत एक बंटा हुआ, भावनात्मक और अव्यवस्थित समाज है।

दूसरी तरफ चीन के लिए “स्थिरता”, “कुशल प्रशासन” और “विकास” जैसे शब्द इस्तेमाल होते हैं। उसकी सख़्त सरकारी कार्रवाइयों को कभी-कभी “मजबूत शासन” कहकर पेश किया जाता है। आर्थिक विकास की तारीफ होती है, जबकि मानवाधिकार का मुद्दा पीछे छूट जाता है।

यह सिर्फ मीडिया बायस नहीं, इतिहास की परछाईं भी है।

ब्रिटिश औपनिवेशिक दौर में भारत को अक्सर अंधविश्वासी, अव्यवस्थित और “पश्चिमी मार्गदर्शन” का मोहताज बताकर शासन को जायज़ ठहराया गया था। आज वही सोच नए और अधिक परिष्कृत रूप में कई रिपोर्टों में दिखाई देती है।

खुलापन भी बनता है वजह; एक बड़ा कारण व्यावहारिक भी है।

भारत में प्रेस अपेक्षाकृत खुला है, आजाद है। विदेशी पत्रकार यहां घूम सकते हैं, लोगों से मिल सकते हैं, विवादित मुद्दों पर रिपोर्ट कर सकते हैं। इसलिए भारत की कमियां ज्यादा बाहर आती हैं।

चीन में विदेशी मीडिया पर सख़्त नियंत्रण है। वहां रिपोर्टिंग आसान नहीं। नतीजा यह कि कम खबरें बाहर निकलती हैं।

इसका मतलब यह नहीं कि भारत बदतर है। कई बार इसका मतलब सिर्फ इतना होता है कि भारत ज्यादा खुला समाज है।

पश्चिमी देशों के चीन से बड़े कारोबारी और रणनीतिक रिश्ते हैं। यह हक़ीक़त मीडिया के माहौल को भी प्रभावित करती है, चाहे खुलकर हो या परोक्ष रूप से।

चीन पर बहुत आक्रामक आलोचना कूटनीतिक तनाव बढ़ा सकती है।

भारत पर सवाल उठाना अपेक्षाकृत आसान है, क्योंकि भारत लोकतांत्रिक साझेदार माना जाता है और वहां आलोचना की कुछ गुंजाइश मौजूद है।

यह फर्क क्यों मायने रखता है

मीडिया की छवि सिर्फ अखबार तक सीमित नहीं रहती।

यह निवेशकों, नीति निर्माताओं और आम लोगों की सोच को प्रभावित करती है। व्यापार, विदेश नीति और वैश्विक जनमत पर इसका असर पड़ता है।

1.4 अरब लोगों का देश, जो करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकाल रहा है, दुनिया की सबसे बड़ी चुनावी प्रक्रिया चला रहा है और तेजी से टेक्नोलॉजी शक्ति बन रहा है ;  उसे अगर लगातार नकारात्मक चश्मे से दिखाया जाए, तो तस्वीर अधूरी बन जाती है।

अगर पश्चिमी मीडिया अपनी सारी नैतिक नाराज़गी सिर्फ खुले लोकतंत्रों पर खर्च कर देगा, तो बंद और कठोर व्यवस्थाओं पर जवाबदेही का दबाव कम हो जाएगा।

पश्चिमी न्यूज़रूम में भारत और ग्लोबल साउथ की आवाज़ों को ज्यादा जगह मिलनी चाहिए।

भारत की तुलना सिर्फ  पश्चिमी मॉडल से नहीं, बल्कि समान सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों वाले देशों से भी होनी चाहिए।

भारत में समस्याएं हैं। प्रेस फ्रीडम, सांप्रदायिक तनाव और राजनीतिक ध्रुवीकरण पर सवाल उठने चाहिए। लेकिन वही कसौटी चीन समेत हर देश पर भी बराबरी से लागू होनी चाहिए।

फिलहाल ऐसा नहीं दिखता।

और भारत तथा चीन की कवरेज में यही फर्क पश्चिमी मीडिया के नजरिए के बारे में उतना ही बताता है, जितना इन दोनों देशों के बारे में।


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Tuesday, May 19, 2026

 ज्योतिष, विज्ञान है या कला?

सत्ता के सौदागरों का सबसे बड़ा “कॉस्मिक झांसा”

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बृज खंडेलवाल द्वारा

20 मई 2026

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तमिलनाडु के नए मुख्यमंत्री C. जोसफ विजय ने हाल ही में अपने निजी ज्योतिषी को मुख्यमंत्री कार्यालय में OSD नियुक्त कर दिया। खबर जंगल की आग की तरह फैली। कहा गया कि इसी ज्योतिषी ने वर्षों पहले “भविष्यवाणी” की थी कि विजय एक दिन सत्ता की कुर्सी तक पहुंचेंगे। कुछ ही घंटों में राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई। सहयोगी दलों ने सवाल उठाए। तर्कवाद, वैज्ञानिक सोच और संविधान की दुहाई दी जाने लगी। आखिरकार सरकार को कदम पीछे खींचना पड़ा।

लेकिन असली सवाल अब भी हवा में गूंज रहा है। क्या लोकतंत्र  ग्रहों की चाल से चलेगा? क्या करोड़ों लोगों की किस्मत शनि, राहु और मंगल तय करेंगे? या फिर यह डर, असुरक्षा और सत्ता का वही पुराना कारोबार है, जिसे हर दौर में नया रंग-रोगन लगाकर बेच दिया जाता है?

भारत में सत्ता और ज्योतिष का रिश्ता नया नहीं है। सदियों से राजा-महाराजा युद्ध से पहले राज ज्योतिषियों से सलाह लेते रहे। ज्यादातर लोग कुंडलियों को मिलकर शादियां करते हैं, फिर भी बिगड़ते रिश्तों की संख्या बढ़ रही है।  व्यापारी लंबी यात्राओं से पहले कुंडली दिखाते थे।  सुबह की चाय के साथ राशिफल पढ़ना लगभग सामाजिक आदत बन चुका है। मानो आसमान से हर दिन कोई गुप्त फरमान उतरता हो।

लेकिन चुनाव आते ही यह कारोबार अचानक रॉकेट की रफ्तार पकड़ लेता है। टीवी स्टूडियो किसी “कॉस्मिक कंट्रोल रूम” में बदल जाते हैं। हर चैनल पर कोई “सितारों का विशेषज्ञ” मौजूद रहता है। कोई शनि देखकर सरकार गिरा देता है। कोई राहु के सहारे चुनाव जिता देता है। कोई बुध की चाल से गठबंधन की उम्र बता देता है। लोकतंत्र कम, ग्रहों का रियलिटी शो ज्यादा दिखने लगता है।

राजनीतिक दल भी इस तमाशे में पीछे नहीं रहते। उम्मीदवार “शुभ मुहूर्त” देखकर नामांकन भरते हैं। रैलियों की तारीखें ग्रहों की चाल से तय होती हैं। पार्टी दफ्तरों में रत्न बेचने वाले, अंकशास्त्री और भविष्यवक्ता ऐसे घूमते हैं, जैसे लोकतंत्र नहीं, कोई तांत्रिक मेला लगा हो।

असल में चुनाव डर और बेचैनी का मौसम होते हैं। नेता सत्ता के लिए बेताब रहते हैं। टीवी चैनलों को टीआरपी चाहिए। जनता महंगाई, बेरोजगारी और तनाव से परेशान रहती है। ऐसे माहौल में  लोग तर्क नहीं, तसल्ली खोजने लगते हैं।

मीडिया की भूमिका भी कम दिलचस्प नहीं। कई चैनल सेलिब्रिटी ज्योतिषियों को वैज्ञानिकों जैसी गंभीरता से पेश करते हैं। कोई आर्थिक तबाही की भविष्यवाणी करता है। कोई राजनीतिक भूचाल की चेतावनी देता है। कोई “देश पर संकट” का ऐलान कर देता है। अगर कुछ नहीं होता, तो कोई जवाबदेही नहीं। अगले हफ्ते वही चेहरा नई चमक के साथ फिर स्क्रीन पर लौट आता है।

सबसे खतरनाक वे “कयामत वाले बाबा” हैं, जो डर बेचते हैं। वे ग्रहों के बहाने युद्ध, महामारी, बर्बादी और राष्ट्रीय संकट की बातें फैलाते हैं। डर हमेशा बिकता है। ठंडी समझदारी नहीं।

भारत की आध्यात्मिक परंपरा बेहद समृद्ध रही है। यहां दर्शन, चिंतन और आत्ममंथन की लंबी विरासत है। लेकिन टीवी पर परोसी जा रही अंधभक्ति और सनसनीखेज भविष्यवाणियों पर आंख मूंदकर भरोसा करना समाज की तार्किक सोच को कमजोर कर रहा है। लोकतंत्र को जागरूक नागरिक चाहिए, डरे हुए राशिफल भक्त नहीं।

सच यह है कि ज्योतिष हर बड़े वैज्ञानिक परीक्षण में कमजोर साबित हुआ है। दावा किया जाता है कि ग्रह-नक्षत्र इंसान के स्वभाव, रिश्तों और भविष्य को प्रभावित करते हैं। मगर आज तक कोई वैज्ञानिक यह नहीं समझा पाया कि करोड़ों किलोमीटर दूर मौजूद मंगल या शनि किसी की नौकरी, शादी या चुनावी किस्मत कैसे तय कर सकते हैं।

भौतिक विज्ञान के अनुसार ग्रहों का गुरुत्वाकर्षण असर तो होता है, लेकिन वह इतना सूक्ष्म है कि जन्म के समय पास खड़े अस्पताल के उपकरणों का प्रभाव कई बार उससे अधिक हो सकता है। फिर भी लोग विश्वास क्यों करते हैं?

क्योंकि ज्योतिष का धंधा विज्ञान से ज्यादा मनोविज्ञान पर चलता है। इंसान स्वभाव से पैटर्न खोजता है। हम अव्यवस्था में अर्थ तलाशते हैं। मुश्किल वक्त में उम्मीद और सहारा चाहते हैं। ज्योतिष वही देता है, रहस्यमयी शब्दों और चमकीली भाषा में।

राशिफल अक्सर इतने धुंधले होते हैं कि हर किसी पर फिट बैठ जाएं।

“आज कोई चुनौती आ सकती है।”

“पुराना संबंध फिर सामने आ सकता है।”

“धन के मामलों में सावधानी रखें।”

ऐसी बातें लगभग हर इंसान पर लागू हो सकती हैं। मनोविज्ञान में इसे “बार्नम इफेक्ट” कहा जाता है, जहां सामान्य बातें भी हमें अपनी निजी सच्चाई लगने लगती हैं।

1985 में वैज्ञानिक पत्रिका Nature में प्रकाशित एक चर्चित प्रयोग और बाद के कई अध्ययनों ने दिखाया कि पेशेवर ज्योतिषियों की भविष्यवाणियां अनुमान से बेहतर नहीं थीं। अलग-अलग ज्योतिषी एक ही कुंडली की अलग व्याख्या करते मिले।  कई चर्चित ज्योतिषियों की भविष्यवाणियां बार-बार गलत साबित हुईं। सही निकले कुछ तुक्कों को खूब प्रचार मिलता है, लेकिन असफल भविष्यवाणियां जल्दी भुला दी जाती हैं।

सुबह चाय के साथ राशिफल पढ़ लेना कोई गुनाह नहीं। समस्या तब शुरू होती है जब लोग जिंदगी के बड़े फैसले तर्क और जानकारी की जगह ग्रहों के भरोसे लेने लगते हैं। कोई व्यापारी निवेश टाल देता है क्योंकि “बुध वक्री” है। कोई परिवार अच्छा रिश्ता ठुकरा देता है क्योंकि कुंडली नहीं मिली। कोई मरीज इलाज छोड़ देता है क्योंकि “शनि भारी” है। कोई नेता जनता की जरूरत नहीं, ज्योतिषी की सलाह सुनने लगता है।

रात का आसमान बेहद खूबसूरत है। तारों को देखकर हैरत होती है। ग्रह कल्पना को उड़ान देते हैं। लेकिन खूबसूरती सबूत नहीं होती। रहस्य हमेशा सच नहीं होता।