यूपी की हवा में कौन-सा रुख? तिलचट्टों का शोर या योगी की हैट्रिक?
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बृज खंडेलवाल द्वारा
31 अगस्त 2026
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एक तरफ योगी की मजबूत सत्ता, सख्त कानून-व्यवस्था और चमकते एक्सप्रेसवे हैं। दूसरी तरफ बेरोजगार युवा, पेपर लीक और सोशल मीडिया पर गरजता एक अजीब नारा: “हम कॉकरोच हैं!”
चुनावी बिगुल अभी बजा भी नहीं है, लेकिन उत्तर प्रदेश की सियासी गलियों में सवाल गूंज रहा है: हवा किस तरफ है?
2027 की गर्मियों में 403 विधानसभा सीटों पर फैसला होगा। बहुमत के लिए 202 सीटें चाहिए। अगस्त 2026 के उपलब्ध सर्वेक्षणों में मुकाबला फिलहाल कांटे का दिखता है। भाजपा-एनडीए और सपा के नेतृत्व वाला विपक्षी गठबंधन लगभग बराबरी की जमीन पर खड़े नजर आते हैं।
लेकिन एक दिलचस्प फर्क है। मुख्यमंत्री पद की पसंद में योगी आदित्यनाथ अभी भी अखिलेश यादव से काफी आगे दिखाई देते हैं। यानी पार्टी बनाम पार्टी मुकाबला कड़ा है, मगर चेहरे की लड़ाई में योगी का पलड़ा भारी है।
2012 में सपा ने 224 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। 2017 में भाजपा ने 312 सीटों के साथ ऐतिहासिक जीत दर्ज की। 2022 में भाजपा 255 सीटों पर सिमटी, जबकि सपा 111 सीटों के साथ मजबूत विपक्ष बनकर उभरी।
यूपी की राजनीति अब काफी हद तक भाजपा बनाम सपा हो चुकी है। बसपा कमजोर जरूर हुई है, लेकिन उसका वोट बैंक पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। दो अंकों में रहने वाला उसका वोट प्रतिशत कई सीटों पर नतीजों का गणित बदल सकता है।
बूढ़ा हाथी अब अकेले युद्ध नहीं जीत सकता, लेकिन उसकी चिंघाड़ अभी भी कई मैदान हिला सकती है।
और अब मैदान में एक नया जीव चर्चा में है: कॉकरोच।
नाम सुनते ही मुस्कान आती है। मगर राजनीति में कभी-कभी मजाक भी गंभीर संकेत बन जाता है।
“हम कॉकरोच हैं”; यह नारा पहली नजर में हास्यास्पद लगता है। लेकिन इसके भीतर युवाओं की गहरी बेचैनी छिपी है। 18 से 25 वर्ष के लाखों मतदाता डिजिटल दुनिया में जीते हैं। उन्हें लंबे भाषणों से ज्यादा मीम, रील और वायरल वीडियो प्रभावित करते हैं।
उनके सामने सवाल बहुत असली हैं, नौकरी कहां है? भर्ती कब होगी? पेपर लीक क्यों होते हैं? परीक्षा होगी तो परिणाम कब आएगा?
यहीं से “कॉकरोच जनता पार्टी” जैसा व्यंग्यात्मक नैरेटिव गंभीर हो जाता है। संदेश सीधा है: अगर व्यवस्था हमें बार-बार कुचलती है, तो हम कॉकरोच की तरह फिर उठ खड़े होंगे।
इस नैरेटिव की खासियत यह है कि इसमें जाति का झंडा नहीं है। इसमें हिंदुत्व का नारा भी नहीं है। यह सीधे रोजगार, शिक्षा और भर्ती व्यवस्था की नाकामी पर चोट करता है।
अगर यह आंदोलन सड़क से सोशल मीडिया तक फैलता है, तो भाजपा के युवा वोट में हलचल पैदा कर सकता है। तीन से पांच प्रतिशत वोट का मामूली झटका भी करीबी मुकाबलों वाली दर्जनों सीटों पर फर्क डाल सकता है।
राजनीति में जीत हमेशा अपने वोट बढ़ाने से नहीं मिलती। कभी-कभी सामने वाले के वोटर को घर बैठा देना ही काफी होता है।
फिर भी योगी सरकार की जमीन कमजोर नहीं है।
कानून-व्यवस्था उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी है। एक्सप्रेसवे, सड़कें, एयरपोर्ट, बिजली, राशन, आवास और निवेश जैसे मुद्दों ने सरकार को डिलीवरी और विकास की छवि दी है। राम मंदिर ने सांस्कृतिक राजनीति को भी नई ऊर्जा दी।
सबसे महत्वपूर्ण बात: भाजपा का संगठन मजबूत है। बूथ स्तर तक उसकी पकड़ है। कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों का बड़ा वर्ग भी उसके साथ खड़ा दिखाई देता है।
लेकिन दो कार्यकाल के बाद सवाल भी बदलते हैं।
अब आगे क्या?
यही भाजपा की असली परीक्षा है।
बेरोजगारी, पेपर लीक, भर्ती में देरी, महंगाई, किसान, शिक्षा और स्वास्थ्य चुनावी बहस के बड़े मुद्दे बन सकते हैं। युवा अब भाषण नहीं, नियुक्ति चाहता है।
स्थानीय विधायकों के प्रति नाराजगी भी भाजपा के लिए सिरदर्द बन सकती है। मतदाता सरकार से संतुष्ट हो सकता है, लेकिन अपने विधायक से नहीं।
मतदाता की भाषा में कहें तो; “लखनऊ ठीक है साहब, लेकिन हमारे मोहल्ले का विधायक बदलना चाहिए!” आगरा में यही स्थिति है। जनता विधायकों से नाराज है, मगर झुकाव भाजपा की तरफ है।
कुछ ब्राह्मण वर्गों में नाराजगी की चर्चाएं भी तेज हैं। “ठाकुर राज” जैसी शिकायतें सुनाई देती हैं। प्रतिनिधित्व और प्रशासनिक प्रभाव को लेकर असंतोष के स्वर हैं।
अखिलेश यादव इस मौके को भुनाना चाहते हैं। PDA की राजनीति में ‘P’ को पंडित तक ले जाने की कोशिश इसका संकेत है।
लेकिन नाराजगी का अर्थ वोट का पूरा हस्तांतरण नहीं होता। ब्राह्मणों का भाजपा से रिश्ता कई दशकों पुराना है। सपा की पुरानी यादव-केंद्रित छवि और कानून-व्यवस्था की पुरानी स्मृतियां भी उसके रास्ते में हैं।
अखिलेश ने 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा को नई ऊर्जा दी। PDA के जरिए दलितों और गैर-यादव पिछड़ों तक पहुंच बढ़ी। लेकिन विधानसभा का चुनाव अलग खेल है।
यहां उम्मीदवार, बूथ प्रबंधन, स्थानीय समीकरण और छोटे सामाजिक गठजोड़ बहुत मायने रखते हैं। कांग्रेस अभी जूनियर पार्टनर है। छोटे दल और AIMIM जैसे खिलाड़ी कुछ सीटों पर वोट काट सकते हैं।
विपक्ष के पास मुद्दे हैं। संगठन भी धीरे-धीरे मजबूत हो रहा है। लेकिन अभी लहर दिखाई नहीं देती।
और मुद्दा होना तथा लहर होना; दो अलग चीजें हैं।
तो फिर हवा किस तरफ है?
अगस्त 2026 की तस्वीर में हवा किसी एक दिशा में तूफानी रफ्तार से नहीं बह रही। मुकाबला पिछली बार से निश्चित रूप से कठिन है। सत्ता विरोधी भावना मौजूद है, लेकिन अभी वह सुनामी नहीं बनी है।
कॉकरोच आंदोलन भाजपा के युवा वोट को प्रभावित कर सकता है। लेकिन उसका गैर-दलीय चरित्र विपक्ष के लिए भी जोखिम है। वह वोट में बदलेगा, मतदान से दूरी बनाएगा या केवल सोशल मीडिया का शोर रहेगा; यह कहना अभी जल्दबाजी होगी।
आखिरकार चुनाव अभी दूर है। अगले दस महीनों में उम्मीदवार, गठबंधन, जातीय समीकरण और अंतिम समय का नैरेटिव बहुत कुछ बदल सकते हैं।
फिलहाल भाजपा के पास कई ठोस फायदे हैं, योगी की लोकप्रियता, मजबूत संगठन, कानून-व्यवस्था की छवि, कल्याणकारी योजनाएं और दिखाई देने वाला विकास।
इसलिए शुरुआती तस्वीर साफ है:
मुकाबला कड़ा है, मगर हवा पूरी तरह बदली नहीं है।
अगर योगी सरकार बेरोजगारी और भर्ती की समस्या पर निर्णायक कदम उठाती है, युवाओं की नाराजगी कम करती है, स्थानीय विधायकों के खिलाफ असंतोष साधती है और सामाजिक संतुलन बनाए रखती है, तो भाजपा की बढ़त कायम रह सकती है।
2027 की कहानी अभी खुली किताब है। मगर शुरुआती पन्नों पर योगी का नाम साफ दिखाई देता है।
कॉकरोच शोर मचा सकते हैं। विपक्ष चुनौती दे सकता है। लेकिन चुनाव का फैसला अंततः काम, भरोसे और मतदाता के मूड से होगा।
और अगर अगले दस महीनों में सरकार प्रदर्शन मजबूत करती है, संगठन एकजुट रहता है और युवा असंतोष को समय रहते साध लिया जाता है, तो उत्तर प्रदेश में फिर इतिहास लिखा जा सकता है;
योगी आदित्यनाथ की हैट्रिक।
क्योंकि चुनाव में नारा कुछ दिनों तक चलता है।
काम का हिसाब पांच साल तक चलता है।