Monday, August 31, 2026

 बहुतों को नहीं पता !!

किसने की थी साज़िश? 

संस्कृत का वो गीत जो नहीं बन सका राष्ट्र गान!!

जब भारत माता संस्कृत में गाने लगीं, तो दिल्ली ने कान क्यों बंद कर लिए?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

3 सितंबर 2026

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जयति जयति भारत माता!

कितना सरल, कितना मधुर और कितना भारतीय उद्घोष है। 

फिर सवाल उठता है, आज़ादी के बाद जब देश अपनी नई पहचान तलाश रहा था, तब ऐसा सुंदर संस्कृत गीत राष्ट्रीय मंच तक क्यों नहीं पहुंच पाया?

यह गीत दक्षिण भारत के महान कर्नाटक संगीतकार मयूरम विश्वनाथ शास्त्री (1893–1958) ने रचा था। आजादी के आसपास उन्होंने भारत माता और महात्मा गांधी की प्रशंसा में संस्कृत गीतों का संग्रह भारत भजन तैयार किया था जिसमें 18 गीत थे।

जयति जयति भारत माता उन्हीं गीतों में से एक था। इसकी धुन राग खमास में है। शब्द सरल हैं और भाव बहुत व्यापक है। भारत माता सभी की माता हैं। वह किसी जाति, भाषा या क्षेत्र में भेद नहीं करतीं। वह सज्जनों की रक्षा करती हैं और गिरे हुए लोगों को भी अपनाती हैं।

यानी आज के भारत की 'एकता में अनेकता' वाली भावना इसमें खूब दिखाई देती है।

फिर यह गीत राष्ट्रीय गीत क्यों नहीं बना?

यहीं से कहानी थोड़ी दिलचस्प हो जाती है।

आज़ादी के बाद राष्ट्रीय पहचान के प्रतीकों को लेकर काफी विचार-विमर्श हुआ। अंततः जन गण मन को राष्ट्रगान बनाया गया और वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत का सम्मान मिला।

दोनों के पीछे लंबा स्वतंत्रता आंदोलन था। जन गण मन को देशभर में पहचान मिल चुकी थी। वंदे मातरम् तो आजादी की लड़ाई का जोशीला नारा बन चुका था।

जयति जयति भारत माता की स्थिति अलग थी। यह अपेक्षाकृत नया गीत था। इसका प्रसार मुख्यतः दक्षिण भारत और कर्नाटक संगीत की दुनिया में था। दिल्ली की राजनीतिक गलियों में इसकी उतनी पहुंच नहीं थी।

लेकिन यहीं एक सवाल पैदा होता है।

क्या आजादी के शुरुआती वर्षों में कांग्रेस नेतृत्व, नेहरू सरकार और सांस्कृतिक संस्थाओं को भारत की दूसरी भाषाई और संगीत परंपराओं को राष्ट्रीय मंच देने की ज्यादा कोशिश नहीं करनी चाहिए थी?

नेहरू और उस दौर के नेताओं के सामने एक विशाल और जटिल देश था। राष्ट्रगान चुनना कोई संगीत प्रतियोगिता नहीं थी। उसमें इतिहास, स्वतंत्रता आंदोलन, सामूहिक स्वीकार्यता और सरकारी समारोहों में प्रस्तुति जैसे कई सवाल जुड़े थे।

फिर भी, दक्षिण भारत से आए इस संस्कृत गीत को राष्ट्रीय स्तर पर ज्यादा प्रचार क्यों नहीं मिला, यह सवाल पूछने में कोई हर्ज नहीं है।

संस्कृत होने का भी सवाल है

संस्कृत भारत की प्राचीन भाषा है। वह उत्तर की भी है और दक्षिण की भी। मंदिरों, दर्शन, साहित्य और शास्त्रीय संगीत की विशाल परंपरा उससे जुड़ी है।

फिर भी आजादी के बाद राष्ट्र निर्माण की राजनीति में भाषा का सवाल बेहद संवेदनशील था। हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी और क्षेत्रीय भाषाओं के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं था।

ऐसे माहौल में संस्कृत के किसी गीत को राष्ट्रीय प्रतीक बनाना शायद राजनीतिक रूप से आसान विकल्प नहीं माना गया।

लेकिन अगर ऐसा था, तो सवाल और बड़ा हो जाता है: 

क्या भारत की प्राचीन भाषाई विरासत को राजनीति के डर से पीछे कर दिया गया?

इसका सीधा दोष केवल जवाहरलाल नेहरू पर डालना इतिहास को कुछ ज्यादा सरल बना देना होगा। लेकिन नेहरू और तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व से यह सवाल जरूर पूछा जा सकता है कि उन्होंने भारत की विविध सांस्कृतिक परंपराओं को राष्ट्रीय मंच पर लाने के लिए कितना प्रयास किया।

गीत बच गया, लेकिन इतिहास की किताब में नहीं आया।

दिलचस्प बात यह है कि जयति जयति भारत माता , मरा नहीं। दक्षिण भारत के कर्नाटक संगीत जगत ने इसे अपने दिल में बचाए रखा।

महान गायक जी. एन. बालसुब्रमण्यम, जिन्हें संगीत की दुनिया में असाधारण स्थान प्राप्त था, ने इसे गाया। मदुरै मणि अय्यर और दूसरे कलाकारों ने भी इसे लोकप्रिय बनाया।

आज भी स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के अवसर पर यह गीत सुनाई देता है।

लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर इसकी पहचान अभी भी सीमित है।

भारत में अक्सर ऐसा होता है।

दिल्ली में जो गूंजता है, वह पूरे देश का गीत बन जाता है। जो चेन्नई, मैसूर, तंजावुर या मदुरै में गूंजता है, उसे 'क्षेत्रीय' कहकर छोड़ दिया जाता है।

शायद यही इस गीत की सबसे बड़ी विडंबना है।

भारत माता की स्तुति संस्कृत में हुई, धुन दक्षिण भारत से आई, भाव पूरे भारत का था, लेकिन राष्ट्रीय मंच ने उसे पूरी तरह अपना नहीं पाया।

आज, आजादी के इतने वर्षों बाद, इस गीत को फिर से सुनने की जरूरत है।

राष्ट्रगान बदलने की जरूरत नहीं है। राष्ट्रीय गीत की गरिमा भी अपनी जगह है।

लेकिन भारत की सांस्कृतिक विरासत कोई सरकारी फाइल नहीं है, जिसमें केवल दो-चार नाम दर्ज हों।

भारत माता के गीत जितने ज्यादा होंगे, भारत की आवाज उतनी ही समृद्ध होगी।

और शायद आज फिर कोई पूछ सकता है: 

जयति जयति भारत माता तो तब भी थीं, आज भी हैं।

फिर हमने उनकी यह आवाज इतनी देर से क्यों सुनी?

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जयति जयति भारत माता

जयति जयति भारत-माता बुध-गीता।

निखिल-माता वन-निरता नत-जन-सुहिता॥

सरल अर्थ:

भारत माता की जय हो, जय हो। विद्वान लोग उनका गुणगान करते हैं। वे सभी की माता हैं और प्रकृति तथा वनों से प्रेम करने वाली हैं। जो लोग उनके सामने श्रद्धा से झुकते हैं, उनका वे कल्याण करती हैं।

सकल-जीव-समता साधु-साधु-विदिता।

अखिल-लोक-पृथिता परमानन्द-समुदिता॥

सरल अर्थ:

भारत माता सभी जीवों को समान मानती हैं। सज्जन उनके गुणों को जानते और पहचानते हैं। उनकी ख्याति पूरे संसार में फैली है और वे परम आनंद से भरी हुई हैं।

अगणित-गुण-शीला अति-दयाल-बाला।

प्रकटित-शुभ-जाला पतित-प्राण-लोला॥

सरल अर्थ:

भारत माता अनगिनत गुणों से सम्पन्न हैं। वे अत्यंत दयालु हैं। उनके भीतर शुभ और मंगलकारी गुणों का प्रकाश है। गिरे हुए और दुखी लोगों के प्रति भी उनका हृदय करुणा से भर जाता है।

पण्डित-परिपूजिता पाप-सङ्ग-विवर्जिता।

खण्डित-खल-चेष्टिता अखण्ड-देश-वेष्टिता॥

सरल अर्थ:

विद्वान लोग भारत माता की पूजा और सम्मान करते हैं। वे पाप और बुराई से दूर हैं। वे दुष्टों की बुरी कोशिशों को विफल करती हैं और पूरे अखंड भारत को अपने आँचल में समेटे हुए हैं।

गीत का मूल भाव

इस गीत की सबसे सुंदर बात यह है कि इसमें भारत माता को किसी एक धर्म, जाति या क्षेत्र की माता नहीं, बल्कि सभी की माता के रूप में देखा गया है। समानता, करुणा, प्रकृति-प्रेम, सद्गुण और अखंडता इसके प्रमुख भाव हैं।

और शायद यही बात इसे आज भी प्रासंगिक बनाती है: भारत की कल्पना केवल एक भूगोल के रूप में नहीं, बल्कि एक करुणामयी और सबको साथ लेकर चलने वाली माता के रूप में की गई है।

 कब तक पुकारें?

प्रिय आगरा के नेताओं, 

कुछ तो शर्म करो


अब ताज की आड़ में मत छिपिए!

नया टूरिस्ट सीजन शुरू होने को है।

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

2 सितंबर 2026

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ताजमहल बेशक चमक रहा है। मगर आगरा परेशान है। दुनिया ताज की तस्वीरें खींचती है। आगरा के लोग गड्ढों, जाम, गंदे नालों, सीवर, जलभराव और धूल की तस्वीरें खींच रहे हैं।

प्रिय आगरा के नेताओं और शहरी नियोजकों, अब फैसला आपको करना है: आप ताज को बचा रहे हैं या सिर्फ ताज की चमक को बेच रहे हैं?

अक्टूबर से पर्यटन सीजन शुरू होगा। देश-विदेश से लाखों लोग आगरा आएंगे। उन्हें ताजमहल तो शानदार मिलेगा। लेकिन उसके आसपास का शहर क्या उन्हें शर्मिंदा करेगा?

आप के पास बहाने नहीं, सत्ता है।

2022 में भाजपा ने आगरा की सभी नौ विधानसभा सीटें जीतीं। दोनों लोकसभा सीटें भी भाजपा के पास हैं। नगर निगम में भी भाजपा का नेतृत्व है।

इतना मजबूत राजनीतिक जनादेश किसी भी शहर को बदलने के लिए पर्याप्त होना चाहिए।

फिर सवाल उठता है:

यमुना अब भी गंदी क्यों है?

सड़कें बार-बार क्यों धंसती हैं?

हर बारिश में शहर क्यों डूबता है?

ट्रैफिक रोज क्यों रेंगता है?

जनादेश सिर्फ कुर्सी नहीं देता।

जनादेश जवाबदेही भी देता है।

यमुना: घोषणाओं की नदी

यमुना के नाम पर योजनाएं बनती रही हैं। करोड़ों रुपये स्वीकृत होते रहे हैं। एसटीपी बनते रहे हैं। नालों की टैपिंग के निर्देश जारी होते रहे हैं।

लेकिन नदी आज भी सीवर ढो रही है।

आगरा रोज करीब 280-300 एमएलडी सीवेज पैदा करता है। नई उपचार क्षमता जुड़ रही है। फिर भी सभी नालों का पूरा इंटरसेप्शन और एसटीपी का लगातार मानकों के अनुसार संचालन अभी अधूरा है।

तो सवाल सीधा है?

पैसा कहां गया, काम कितना हुआ और नदी कब साफ होगी?

यमुना को एक और योजना नहीं चाहिए। उसे परिणाम चाहिए।

जब पार्षद को नाले में उतरना पड़े

जून में एक  पार्षद ने गंदे नाले में खड़े होकर अपना जन्मदिन मनाया। उनका दावा था कि तीन साल में 30 से ज्यादा शिकायतें देने के बावजूद समस्या जस की तस रही।

तस्वीर वायरल हुई। सवाल भी उठा।

लेकिन असली सवाल यह है: 

क्या किसी निर्वाचित प्रतिनिधि को अपनी ही व्यवस्था जगाने के लिए नाले में उतरना चाहिए?

अगर पार्षद की शिकायत नहीं सुनी गई, तो आम आदमी किस उम्मीद से दरवाजा खटखटाए?

सड़कें विकास की परीक्षा हैं

अगस्त की बारिश में कई जगह सड़कें धंस गईं। कहीं विशाल गड्ढे बने। कहीं एक महीने में दूसरी या तीसरी बार सड़क बैठ गई।

अधिकारी कभी सीवर लीकेज, कभी पाइपलाइन को कारण बताते हैं।

लेकिन जनता पूछ रही है:

सड़क बनाने से पहले नीचे की जमीन और पाइपलाइन किसने जांची?

किसने डिजाइन मंजूर किया?

किसने गुणवत्ता प्रमाणित की?

किस ठेकेदार ने काम किया?

गारंटी क्या थी?

और सड़क टूटने पर जिम्मेदारी किसकी तय हुई?

हर बार सड़क बनाना समाधान नहीं है।

पहले यह पता लगाइए कि सड़क बार-बार टूट क्यों रही है।

हर मानसून शहर क्यों डूबता है?

बालूगंज से दयालबाग तक। शास्त्रीपुरम से आईएसबीटी तक। यमुना किनारे से वीआईपी रोड तक।

बारिश होते ही कई सड़कें तालाब बन जाती हैं।

फिर वही दृश्य: जाम, डूबे वाहन, दुकानों में पानी और परेशान नागरिक।

क्या बारिश अचानक होती है?

नहीं।

मानसून हर साल आता है।

फिर तैयारी हर साल अधूरी क्यों रहती है?

यह मौसम की समस्या कम और शहरी नियोजन की विफलता ज्यादा है।

ट्रैफिक: डायवर्जन कोई नीति नहीं

आगरा में ट्रैफिक प्रबंधन अक्सर डायवर्जन के भरोसे चलता है।

त्योहार आया: डायवर्जन।

धार्मिक आयोजन हुआ: डायवर्जन।

भारी वाहन बढ़े: डायवर्जन।

पर्यटक बढ़े: फिर डायवर्जन।

लेकिन कब बनेगा स्थायी समाधान?

आगरा को चाहिए: 

एक दीर्घकालिक मोबिलिटी प्लान।

बेहतर सार्वजनिक परिवहन।

व्यवस्थित पार्किंग।

सुरक्षित फुटपाथ।

पैदल पर्यटकों के लिए रास्ते।

बेहतर ट्रैफिक सिग्नल समन्वय।

एक विश्वस्तरीय पर्यटन शहर जुगाड़ से नहीं चलता।

वह योजना से चलता है।

शहरी नियोजकों से भी हिसाब चाहिए

सारी जिम्मेदारी नेताओं की नहीं है।

नगर नियोजक, इंजीनियर, आर्किटेक्ट और संबंधित विभाग भी उतने ही जवाबदेह हैं।

क्या मास्टर प्लान आज की आबादी और वाहनों के हिसाब से तैयार है?

क्या नए निर्माण से पहले जलनिकासी की क्षमता देखी जाती है?

क्या तालाब, प्राकृतिक नाले और जलमार्ग सुरक्षित हैं?

क्या फुटपाथ वास्तव में पैदल चलने वालों के लिए हैं?

क्या शहर कारों के लिए बनाया जा रहा है या नागरिकों के लिए?

अगर इन सवालों के जवाब नहीं हैं, तो विकास किस दिशा में जा रहा है?

स्मार्ट सिटी या स्मार्ट मेकअप?

नई दीवार। नया रंग। नया गेट। नया उद्घाटन।

फोटो खिंचती है। खबर छपती है। फीता कटता है।

लेकिन क्या इससे सीवर रुकता है?

क्या इससे जलभराव खत्म होता है?

क्या इससे ट्रैफिक कम होता है?

क्या इससे सड़क मजबूत होती है?

सजावट विकास नहीं है।

आगरा को फोटो के लिए सुंदर नहीं, जीवन के लिए बेहतर बनाना होगा।

अब हर नेता से एक सवाल

अक्टूबर में पर्यटक आएंगे।

इसलिए आगरा के हर सांसद, विधायक, मेयर और पार्षद से पूछिये।

एक अक्टूबर तक क्या बदलेगा?

कौन-से नाले पूरी तरह टैप होंगे?

कौन-से एसटीपी पूरी क्षमता से चलेंगे?

कौन-सी सड़कें स्थायी रूप से ठीक होंगी?

कहां जलभराव खत्म होगा?

ट्रैफिक के लिए क्या स्थायी कदम उठेंगे?

कितने पार्क और तालाब बचेंगे?

हर घोषणा के साथ समयसीमा हो। जिम्मेदार अधिकारी का नाम हो। प्रगति की सार्वजनिक रिपोर्ट हो।

और अगर काम नहीं हुआ?

तो जिम्मेदारी भी सार्वजनिक हो।

व्हाट्सऐप से आगे बढ़िए

आगरा के नागरिक भी अब सिर्फ शिकायतकर्ता न रहें।

हर गड्ढे की तस्वीर डालना काफी नहीं है। हर बारिश में वीडियो बनाना काफी नहीं है। हर बार व्हाट्सऐप पर गुस्सा निकालना भी काफी नहीं है।

सवाल पूछिए।

जनसुनवाई मांगिए।

समयसीमा मांगिए।

प्रगति रिपोर्ट मांगिए।

लोकतंत्र में वोट पांच साल में एक बार पड़ता है। सवाल हर दिन पूछा जा सकता है।

ताजमहल को किसी प्रचार की जरूरत नहीं है।

उसे बनाने वाले लोग सदियों पहले चले गए। उसकी खूबसूरती आज भी कायम है।

अब आज के नेताओं की बारी है।

वे इतिहास में क्या छोड़ेंगे?

एक और उद्घाटन पट्टिका?

या ऐसा आगरा, जहां यमुना साफ हो, सड़कें मजबूत हों, बारिश में शहर न डूबे, ट्रैफिक चले और नागरिक सम्मान से जी सकें?

ताज दुनिया की धरोहर है।

आगरा यहां के लोगों का घर है।

ताज को दुनिया बचा लेगी।

आगरा को उसके नेताओं और नागरिकों को बचाना होगा।

अब ताज की चमक के पीछे छिपने का वक्त खत्म हुआ।

प्रिय नेताओं,

ताज की तस्वीरें बहुत हो गईं।

अब आगरा का रिपोर्ट कार्ड दिखाइए।

Sunday, August 30, 2026

 


सितंबर आते ही बज उठती थी Come September 

पूरा इंडिया नचा था हॉलीवुड की इस फिल्मी टयून पर

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

1 September 2026

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जरा आंखें बंद कीजिए। धूल भरी सड़क है, आगे घोड़ी पर दूल्हा है, पीछे बारातियों की भीड़। अचानक बैंड वाला अपनी तुरही उठाता है और ऐसी धुन छेड़ देता है कि बूढ़े की मूंछ भी फड़कने लगे और जवान के पैर अपने-आप थिरकने लगें। 

यही था वह दौर, जब ‘Come September’ की धुन ने भारत की शादियों, पिकनिकों और महफिलों में ऐसी दस्तक दी कि वह विदेशी होकर भी बिल्कुल अपनी लगने लगी।

साठ के दशक में हॉलीवुड फिल्म Come September  भारत पहुंची और देखते ही देखते उसकी धुन दिलों पर छा गई।

इस धुन को बॉबी डैरिन ने रचा था। फिल्म में उनके साथ रॉक हडसन, जीना लोलोब्रिजिडा और सैंड्रा डी जैसे सितारे थे। डैरिन ने बारह-तार वाले गिटार पर इसकी शुरुआती धुन तैयार की थी। मकसद था: रोमांस भी हो, लय भी हो और उसमें थोड़ी शरारत भी। नतीजा ऐसा निकला कि गिटार, मैंडोलिन, एकॉर्डियन और बोंगो की आवाजें मिलकर ऐसी दिलकश रवानी पैदा कर गईं, कि बस हर कोई ट्विस्ट करने को आतुर।

भारत में इस धुन को किसी तर्जुमे की जरूरत नहीं पड़ी। इसमें बोल नहीं थे, लेकिन कहानी पूरी थी। उसमें जवानी थी, आजादी का अहसास था और जिंदगी को थोड़ा खुलकर जीने की गुंजाइश भी। मोहल्लों में बारात निकलती तो बैंड वाले फिल्मी गीतों के साथ पश्चिमी धुनों का भी तड़का लगा देते। ‘Come September’ बजते ही बारात का अनुशासन अक्सर छुट्टी पर चला जाता था। दूल्हे के रिश्तेदार, पड़ोसी और रास्ते के तमाशबीन, सबके पैर अपनी-अपनी पॉलिटिक्स करने लगते थे।

फिर बहुत सालों बाद आई: दूसरी कमाल की धुन, ब्राजील। आर्य बारोसो की मशहूर ब्राजीली रचना Aquarela do Brasil, जिसे दुनिया ने अलग-अलग वाद्य और ऑर्केस्ट्रा संस्करणों में जाना, भारत में भी एक खास पहचान बना चुकी थी। खासकर बैंड बाजों और ऑर्केस्ट्रा की दुनिया में इसकी लय ऐसी घुसी कि शहर ही नहीं, दूरदराज के कस्बों और गांवों की शादियों तक में इसकी गूंज सुनाई देती थी। कई बार बारातियों को यह भी मालूम नहीं होता था कि धुन ब्राज़ील की है। उनके लिए वह बस ‘बैंड वाले की जबरदस्त धुन’ थी।

यही तो संगीत का कमाल है। पासपोर्ट उसका अपना होता है, लेकिन दिलों पर कोई वीजा नहीं लगता।

‘Come September’ और ‘Brazil’ जैसी धुनों ने भारत में एक अजीब सांस्कृतिक घालमेल पैदा किया। ब्राज़ील की लय, हॉलीवुड की धुन और भारतीय बारात, तीनों एक ही सड़क पर मिल गए।  शादी की रौनक में ऐसा घुल जाता था जैसे समोसे में चटनी।

‘Come September’ की सबसे बड़ी ताकत उसकी सादगी थी। धुन ऊपर जाती, नीचे आती और कानों में अटक जाती।  उस समय के ‘ट्विस्ट’ और आज के ‘फ्री स्टाइल’ के बीच शायद कोई औपचारिक समझौता नहीं था, लेकिन पैर अपना फैसला खुद कर लेते थे। विदेशी धुन भारतीय शादी के लिए तैयार थी, बस उसमें ढोल, नगाड़ा और थोड़ी देसी बेफिक्री जोड़नी थी।

बॉलीवुड भी भला पीछे कैसे रहता?

भारतीय संगीतकारों ने ‘Come September’ की लय और सुरों से प्रेरणा ली। इसकी छाप कई गीतों और बैकग्राउंड स्कोर में दिखाई दी। Hamraaz जैसी फिल्मों में इसकी गूंज महसूस हुई। बाद के दशकों में भी इसकी धुन नए रूपों में लौटती रही। राजा का ‘नजरें मिलीं, दिल धड़का’ और दूसरे लोकप्रिय गीतों में भी इस तरह की पश्चिमी लय का असर सुनाई दिया। भारतीय संगीतकार विदेशी धुनों को सुनते, उनमें से कोई टुकड़ा पकड़ते और उसे अपनी मिट्टी में रोप देते। फिर उससे एक नया पौधा निकलता, जिसमें विदेशी खुशबू भी होती और देसी रंग भी।


साठ और सत्तर के दशक की शादियों को याद कीजिए। न डीजे था, न लेजर लाइट, न कान फोड़ने वाले स्पीकर। एक बैंड था, कुछ चमकती तुरहियां थीं, ढोल था और उत्साहित बाराती थे। फिर भी मजा कम नहीं था। बल्कि शायद ज्यादा था।

आज बारात में डीजे होता है और गाने की आवाज इतनी तेज होती है कि दूल्हे को भी पता नहीं चलता कि उसकी शादी हो रही है या चुनाव प्रचार। उस जमाने में एक अच्छी धुन ही काफी थी।

‘Come September’ इसलिए याद रह गई क्योंकि उसने संगीत को केवल सुनने की चीज नहीं रहने दिया। उसने लोगों को चलाया, झुमाया और कुछ देर के लिए सामाजिक लिहाज की जंजीरें ढीली कर दीं।

‘Brazil’ ने भी यही काम अपनी अलग लय में किया। उसकी मस्ती भरी चाल ने भारतीय बारातों को बताया कि दुनिया बहुत बड़ी है, लेकिन नाचने के लिए जगह हर जगह मिल सकती है।

साठ साल से ज्यादा गुजर गए। लेकिन कभी-कभी किसी पुराने विवाह समारोह में वह धुन सुनाई पड़ जाती है तो बीता हुआ जमाना अचानक लौट आता है।

धूल उड़ती सड़क, रंगीन कपड़े, घोड़ी पर बैठा दूल्हा, हाथ में फूलों की माला और आगे-आगे उछलता बाराती।

तुरही बजती है: ‘Come September…’

और कहीं दूर से ‘Brazil’ की लय मिल जाती है।

तब समझ आता है कि संगीत की कोई सरहद नहीं होती। हॉलीवुड की धुन हो या ब्राज़ील की लय; भारत की बारात उसे अपना बना लेती है।

Saturday, August 29, 2026

 


यूपी की हवा में कौन-सा रुख? तिलचट्टों का शोर या योगी की हैट्रिक?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

31 अगस्त 2026

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एक तरफ योगी की मजबूत सत्ता, सख्त कानून-व्यवस्था और चमकते एक्सप्रेसवे हैं। दूसरी तरफ बेरोजगार युवा, पेपर लीक और सोशल मीडिया पर गरजता एक अजीब नारा: “हम कॉकरोच हैं!”

चुनावी बिगुल अभी बजा भी नहीं है, लेकिन उत्तर प्रदेश की सियासी गलियों में सवाल गूंज रहा है: हवा किस तरफ है?

2027 की गर्मियों में 403 विधानसभा सीटों पर फैसला होगा। बहुमत के लिए 202 सीटें चाहिए। अगस्त 2026 के उपलब्ध सर्वेक्षणों में मुकाबला फिलहाल कांटे का दिखता है। भाजपा-एनडीए और सपा के नेतृत्व वाला विपक्षी गठबंधन लगभग बराबरी की जमीन पर खड़े नजर आते हैं।

लेकिन एक दिलचस्प फर्क है। मुख्यमंत्री पद की पसंद में योगी आदित्यनाथ अभी भी अखिलेश यादव से काफी आगे दिखाई देते हैं। यानी पार्टी बनाम पार्टी मुकाबला कड़ा है, मगर चेहरे की लड़ाई में योगी का पलड़ा भारी है।

2012 में सपा ने 224 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। 2017 में भाजपा ने 312 सीटों के साथ ऐतिहासिक जीत दर्ज की। 2022 में भाजपा 255 सीटों पर सिमटी, जबकि सपा 111 सीटों के साथ मजबूत विपक्ष बनकर उभरी।

यूपी की राजनीति अब काफी हद तक भाजपा बनाम सपा हो चुकी है। बसपा कमजोर जरूर हुई है, लेकिन उसका वोट बैंक पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। दो अंकों में रहने वाला उसका वोट प्रतिशत कई सीटों पर नतीजों का गणित बदल सकता है।

बूढ़ा हाथी अब अकेले युद्ध नहीं जीत सकता, लेकिन उसकी चिंघाड़ अभी भी कई मैदान हिला सकती है।

और अब मैदान में एक नया जीव चर्चा में है: कॉकरोच।

नाम सुनते ही मुस्कान आती है। मगर राजनीति में कभी-कभी मजाक भी गंभीर संकेत बन जाता है।

“हम कॉकरोच हैं”; यह नारा पहली नजर में हास्यास्पद लगता है। लेकिन इसके भीतर युवाओं की गहरी बेचैनी छिपी है। 18 से 25 वर्ष के लाखों मतदाता डिजिटल दुनिया में जीते हैं। उन्हें लंबे भाषणों से ज्यादा मीम, रील और वायरल वीडियो प्रभावित करते हैं।

उनके सामने सवाल बहुत असली हैं, नौकरी कहां है? भर्ती कब होगी? पेपर लीक क्यों होते हैं? परीक्षा होगी तो परिणाम कब आएगा?

यहीं से “कॉकरोच जनता पार्टी” जैसा व्यंग्यात्मक नैरेटिव गंभीर हो जाता है। संदेश सीधा है: अगर व्यवस्था हमें बार-बार कुचलती है, तो हम कॉकरोच की तरह फिर उठ खड़े होंगे।

इस नैरेटिव की खासियत यह है कि इसमें जाति का झंडा नहीं है। इसमें हिंदुत्व का नारा भी नहीं है। यह सीधे रोजगार, शिक्षा और भर्ती व्यवस्था की नाकामी पर चोट करता है।

अगर यह आंदोलन सड़क से सोशल मीडिया तक फैलता है, तो भाजपा के युवा वोट में हलचल पैदा कर सकता है। तीन से पांच प्रतिशत वोट का मामूली झटका भी करीबी मुकाबलों वाली दर्जनों सीटों पर फर्क डाल सकता है।

राजनीति में जीत हमेशा अपने वोट बढ़ाने से नहीं मिलती। कभी-कभी सामने वाले के वोटर को घर बैठा देना ही काफी होता है।

फिर भी योगी सरकार की जमीन कमजोर नहीं है।

कानून-व्यवस्था उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी है। एक्सप्रेसवे, सड़कें, एयरपोर्ट, बिजली, राशन, आवास और निवेश जैसे मुद्दों ने सरकार को डिलीवरी और विकास की छवि दी है। राम मंदिर ने सांस्कृतिक राजनीति को भी नई ऊर्जा दी।

सबसे महत्वपूर्ण बात: भाजपा का संगठन मजबूत है। बूथ स्तर तक उसकी पकड़ है। कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों का बड़ा वर्ग भी उसके साथ खड़ा दिखाई देता है।

लेकिन दो कार्यकाल के बाद सवाल भी बदलते हैं।

अब आगे क्या?

यही भाजपा की असली परीक्षा है।

बेरोजगारी, पेपर लीक, भर्ती में देरी, महंगाई, किसान, शिक्षा और स्वास्थ्य चुनावी बहस के बड़े मुद्दे बन सकते हैं। युवा अब भाषण नहीं, नियुक्ति चाहता है।

स्थानीय विधायकों के प्रति नाराजगी भी भाजपा के लिए सिरदर्द बन सकती है। मतदाता सरकार से संतुष्ट हो सकता है, लेकिन अपने विधायक से नहीं।

मतदाता की भाषा में कहें तो; “लखनऊ ठीक है साहब, लेकिन हमारे मोहल्ले का विधायक बदलना चाहिए!” आगरा में यही स्थिति है। जनता विधायकों से नाराज है, मगर झुकाव भाजपा की तरफ है। 

कुछ ब्राह्मण वर्गों में नाराजगी की चर्चाएं भी तेज हैं। “ठाकुर राज” जैसी शिकायतें सुनाई देती हैं। प्रतिनिधित्व और प्रशासनिक प्रभाव को लेकर असंतोष के स्वर हैं।

अखिलेश यादव इस मौके को भुनाना चाहते हैं। PDA की राजनीति में ‘P’ को पंडित तक ले जाने की कोशिश इसका संकेत है।

लेकिन नाराजगी का अर्थ वोट का पूरा हस्तांतरण नहीं होता। ब्राह्मणों का भाजपा से रिश्ता कई दशकों पुराना है। सपा की पुरानी यादव-केंद्रित छवि और कानून-व्यवस्था की पुरानी स्मृतियां भी उसके रास्ते में हैं।

अखिलेश ने 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा को नई ऊर्जा दी। PDA के जरिए दलितों और गैर-यादव पिछड़ों तक पहुंच बढ़ी। लेकिन विधानसभा का चुनाव अलग खेल है।

यहां उम्मीदवार, बूथ प्रबंधन, स्थानीय समीकरण और छोटे सामाजिक गठजोड़ बहुत मायने रखते हैं। कांग्रेस अभी जूनियर पार्टनर है। छोटे दल और AIMIM जैसे खिलाड़ी कुछ सीटों पर वोट काट सकते हैं।

विपक्ष के पास मुद्दे हैं। संगठन भी धीरे-धीरे मजबूत हो रहा है। लेकिन अभी लहर दिखाई नहीं देती।

और मुद्दा होना तथा लहर होना; दो अलग चीजें हैं।

तो फिर हवा किस तरफ है?

अगस्त 2026 की तस्वीर में हवा किसी एक दिशा में तूफानी रफ्तार से नहीं बह रही। मुकाबला पिछली बार से निश्चित रूप से कठिन है। सत्ता विरोधी भावना मौजूद है, लेकिन अभी वह सुनामी नहीं बनी है।

कॉकरोच आंदोलन भाजपा के युवा वोट को प्रभावित कर सकता है। लेकिन उसका गैर-दलीय चरित्र विपक्ष के लिए भी जोखिम है। वह वोट में बदलेगा, मतदान से दूरी बनाएगा या केवल सोशल मीडिया का शोर रहेगा; यह कहना अभी जल्दबाजी होगी।

आखिरकार चुनाव अभी दूर है। अगले दस महीनों में उम्मीदवार, गठबंधन, जातीय समीकरण और अंतिम समय का नैरेटिव बहुत कुछ बदल सकते हैं।

फिलहाल भाजपा के पास कई ठोस फायदे हैं, योगी की लोकप्रियता, मजबूत संगठन, कानून-व्यवस्था की छवि, कल्याणकारी योजनाएं और दिखाई देने वाला विकास।

इसलिए शुरुआती तस्वीर साफ है:

मुकाबला कड़ा है, मगर हवा पूरी तरह बदली नहीं है।

अगर योगी सरकार बेरोजगारी और भर्ती की समस्या पर निर्णायक कदम उठाती है, युवाओं की नाराजगी कम करती है, स्थानीय विधायकों के खिलाफ असंतोष साधती है और सामाजिक संतुलन बनाए रखती है, तो भाजपा की बढ़त कायम रह सकती है।

2027 की कहानी अभी खुली किताब है। मगर शुरुआती पन्नों पर योगी का नाम साफ दिखाई देता है।

कॉकरोच शोर मचा सकते हैं। विपक्ष चुनौती दे सकता है। लेकिन चुनाव का फैसला अंततः काम, भरोसे और मतदाता के मूड से होगा।

और अगर अगले दस महीनों में सरकार प्रदर्शन मजबूत करती है, संगठन एकजुट रहता है और युवा असंतोष को समय रहते साध लिया जाता है, तो उत्तर प्रदेश में फिर इतिहास लिखा जा सकता है; 

योगी आदित्यनाथ की हैट्रिक।

क्योंकि चुनाव में नारा कुछ दिनों तक चलता है।

काम का हिसाब पांच साल तक चलता है।

 जब पूरा हिंदुस्तान गाता था: दूरदर्शन के यादगार विज्ञापन जिंगल

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

31 अगस्त 2026

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एक ज़माना था जब हिंदुस्तान में टीवी का मतलब दूरदर्शन था। चैनल एक था, बातचीत एक थी और शाम को पूरा परिवार एक ही कमरे में बैठकर टीवी देखता था।

रिमोट का आतंक नहीं था। मोबाइल की घंटी नहीं थी। रील्स और शॉर्ट्स नाम की कोई आफ़त नहीं थी। विज्ञापन आते थे तो लोग उठकर पानी लेने नहीं जाते थे। कई बार विज्ञापन ही कार्यक्रम से ज़्यादा याद रह जाते थे।

सत्तर से अस्सी और नब्बे के दशक,  भारतीय टेलीविजन विज्ञापन का सुनहरा दौर था। केबल टीवी ने अभी दस्तक नहीं दी थी। इंटरनेट तो किसी साइंस-फिक्शन कहानी का हिस्सा लगता था।

विज्ञापन छोटे थे, मगर उनका असर लंबा था। धुन सीधी थी, बोल आसान थे और संदेश दिल में उतर जाता था। आज के करोड़ों रुपये वाले विज्ञापन देखकर कभी-कभी लगता है, तब विज्ञापन बनाए जाते थे, आज विज्ञापन बनाए जाते हैं ताकि विज्ञापन बनते हुए दिखाई दें!

आइए, उन दिनों के कुछ दिलचस्प,  यादगार जिंगल याद करें।

निरमा — कानों में बस जाने वाला जिंगल

“Washing powder Nirma…”

इसके आगे किसी परिचय की जरूरत नहीं।

सफेद कपड़ों में घूमती लड़कियां, झाग और दूध जैसी सफेदी का दावा। निरमा का जिंगल घर-घर की धुन बन गया था।

मां गुनगुनाती थीं, बच्चे गुनगुनाते थे और पिताजी भी बोल भूलने का नाटक करते हुए पूरा जिंगल जानते थे।

निरमा ने साबित किया कि विज्ञापन में शेक्सपियर नहीं चाहिए। एक आसान धुन, कुछ सीधे शब्द और भरपूर दोहराव: बस, काम तमाम।

हमारा बजाज :  मध्यमवर्ग का राष्ट्रगीत

“बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर, हमारा बजाज।”

यह सिर्फ स्कूटर का विज्ञापन नहीं था। यह उभरते हुए भारतीय मध्यमवर्ग का सपना था।

स्कूटर पर बच्चे, पत्नी, पति और कभी-कभी रिश्तेदार भी। वही स्कूटर दफ्तर जाता था, बच्चों को स्कूल छोड़ता था और रविवार को पूरा परिवार पिकनिक पर ले जाता था।

बजाज ने वाहन नहीं बेचा। उसने आकांक्षा बेची।

लिरिल :  झरने के नीचे आज़ादी

“ला ला ला ला… लिरिल।”

झरना, झाग, ताजगी और बेफिक्री।

लिरिल ने साबुन को नहाने की चीज़ से उठाकर आज़ादी का प्रतीक बना दिया। नहाना अचानक एक रोमांचक अनुभव लगने लगा।

विज्ञापन ने साबुन कम बेचा, कल्पना ज्यादा बेची।

लाइफबॉय :  सेहत की पहरेदारी

“तंदुरुस्ती की रक्षा करता है लाइफबॉय।”

लाइफबॉय का अंदाज़ सीधा था। बीमारी और कीटाणुओं के खिलाफ मोर्चा खोलो और साबुन का इस्तेमाल करो।

न कोई बड़ी फिल्मी कहानी, न लंबा भाषण। बस समस्या, समाधान और याद रह जाने वाली धुन।

विक्स:  खिच-खिच का इलाज

“विक्स की गोली लो, खिच-खिच दूर करो।”

क्या शानदार सादगी थी!

गले में खिच-खिच हुई, विक्स की गोली आई और समस्या गई।

आज के विज्ञापन में पहले समस्या खोजी जाती है, फिर उपभोक्ता की मनोवैज्ञानिक प्रोफाइल बनाई जाती है और अंत में उत्पाद आता है। विक्स ने मामला दो पंक्तियों में निपटा दिया।

विको टर्मरिक :  छह शब्दों की बाज़ीगरी

“Vicco Turmeric, नहीं cosmetic.”

बस छह शब्द।

परंपरा, आयुर्वेद और भारतीयता को आधुनिक विज्ञापन भाषा में पैक कर दिया गया।

पीली ट्यूब घर-घर पहचानी जाने लगी। आज भी उसका नाम सुनते ही पुराना दूरदर्शन सामने आ जाता है।

रसना :  बचपन का स्वाद

“I love you, Rasna.”

रसना सिर्फ पेय नहीं था। वह गर्मियों की छुट्टियां थीं। घर में आए रिश्तेदार थे। रसोई में तैयार होता ठंडा शरबत था। बच्चों की खुशी थी।

उस छोटी-सी बच्ची की आवाज़ ने एक पाउडर को बचपन की याद बना दिया।

मैगी :  “मम्मी, मैं भूखा हूं!”

मैगी ने भारतीय रसोई में समय की नई परिभाषा लिखी।

“Fast to cook, good to eat.”

बच्चा भूखा है। मां व्यस्त है। समाधान सामने है, दो मिनट की मैगी।

बाद में दो मिनट पर बहस हो सकती है। लेकिन भारतीय मां और बच्चे के बीच मैगी की दोस्ती पर बहस की जरूरत नहीं।

पान पराग :  स्वागत में क्या है?

“पान पराग से स्वागत कीजिए।”

शम्मी कपूर, अशोक कुमार, बाराती और शादी का पूरा फिल्मी माहौल।

पान पराग ने भारतीय मेहमाननवाज़ी को विज्ञापन में बदल दिया। थोड़ा नाच, थोड़ा गाना, थोड़ा दिखावा और खूब सारा उत्सव।

भारतीय शादी में जितना ड्रामा होता है, विज्ञापन ने उतना ही स्क्रीन पर डाल दिया।

ओनिडा :  पड़ोसी की जलन

“Neighbour’s envy, owner’s pride.”

और वह शैतान!

ओनिडा ने टीवी को मनोरंजन के साधन से उठाकर प्रतिष्ठा का प्रतीक बना दिया।

आपके घर में टीवी है? तो पड़ोसी को जलना चाहिए!

यह उस बदलते भारत की निशानी थी, जहां उपभोक्तावाद धीरे-धीरे दरवाजे पर दस्तक दे रहा था।

और भी बहुत कुछ था

लिज्जत पापड़ का “कुर्रम कुर्रम”, अमूल के चुटीले विज्ञापन, बजाज के भावुक अभियान और सबसे बढ़कर “मिले सुर मेरा तुम्हारा”, ये सब सिर्फ विज्ञापन नहीं थे। ये उस दौर की सामूहिक याददाश्त का हिस्सा थे।

पियूष पांडे, प्रह्लाद कक्कड़ और कई दूसरे रचनात्मक लोगों ने भारतीय विज्ञापन को एक अलग ज़बान दी। उसमें हास्य था, भावना थी, संगीत था और सबसे बड़ी बात, भारतीय मिट्टी की खुशबू थी।

आज विज्ञापन की दुनिया बहुत बड़ी हो गई है। टीवी के साथ यूट्यूब, इंस्टाग्राम, फेसबुक, रील्स और शॉर्ट्स की पूरी फौज खड़ी है।

ध्यान की अवधि घट गई है। हर कोई अगले तीन सेकंड में दर्शक को पकड़ लेना चाहता है। रचनात्मकता भी जैसे इंस्टेंट नूडल बन गई है, डालो, पकाओ और भूल जाओ।

आज का मोबाइल वह नया घरेलू तानाशाह है, जिसके सामने पूरा परिवार अलग-अलग स्क्रीन पर झुका बैठा है। रील्स और शॉर्ट्स हमारी जेबों में ऐसे घुस आए हैं जैसे बरसात में कॉकरोच।

शोर ज्यादा है। सनसनी ज्यादा है। उत्तेजना ज्यादा है। लेकिन याद रहने वाली रचनात्मकता शायद कम है।

तब एक जिंगल सालों चलता था। आज कई विज्ञापन एक सप्ताह में कूड़ेदान में चले जाते हैं।

शायद हमें दूरदर्शन के विज्ञापन नहीं, वह हिंदुस्तान याद आता है जो उनके साथ जुड़ा था।

एक चैनल था।

एक ड्राइंग रूम था।

पूरा परिवार था।

एक जिंगल बजता था।

और देखते-देखते पूरा हिंदुस्तान गाने लगता था:

“वॉशिंग पाउडर निरमा…”

क्या वह सचमुच बेहतर दौर था?

शायद नहीं।

लेकिन यकीनन वह ज्यादा अपना था।

Friday, August 28, 2026

 


छिपकलियों, कॉकरोचों और मेंढकों को भी समझना होगा: मौजूदा निज़ाम की निरंतरता क्यों ज़रूरी है

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

30 अगस्त, 2026

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किसी भी मुल्क की सियासत में बदलाव ज़रूरी है, लेकिन हर बदलाव बेहतर हो, यह ज़रूरी नहीं। कभी-कभी जो व्यवस्था मुश्किलों के बावजूद स्थिर हो गई हो, उसे अचानक बदलना खुद एक बड़ा जोखिम बन जाता है। भारत के लिए 2014 के बाद का दौर इसी सवाल को बार बार उठाता है। क्या निरंतरता को सिर्फ इसलिए छोड़ दिया जाए कि बदलाव आकर्षक लगता है?

2014 के बाद भारत के राजनीतिक सफर की सबसे बड़ी खूबी सियासी स्थिरता रही है। सरकारें अपना कार्यकाल पूरा कर रही हैं और नीतियों को समय मिल रहा है। पहले की तरह बार-बार सत्ता बदलने और नीतियों के पलटने की बेचैनी अपेक्षाकृत कम हुई है।

निरंतरता का सबसे बड़ा फायदा यह है कि किसी नीति को नतीजा देने का मौका मिलता है। हर नई सरकार अगर पुरानी लकीर मिटाकर नई लकीर खींचे, तो देश आगे बढ़ने के बजाय फाइलों में ही उलझा रहेगा।


भारत जैसे विशाल और विविध देश में केंद्र और राज्यों के रिश्ते बेहद अहम हैं। पिछले बारह वर्षों में विपक्षी दलों की सरकार वाले राज्यों के साथ केंद्र के रिश्तों को लेकर बहस और आरोप जरूर हुए हैं, लेकिन राष्ट्रपति शासन को सामान्य राजनीतिक हथियार बनाने की कोई परंपरा नहीं बनी।

संवैधानिक संस्थाओं ने भी अपनी भूमिका निभाई है। संसद, अदालतें, चुनाव व्यवस्था और पंचायतों से लेकर राज्यों तक लोकतांत्रिक संस्थाएं लगातार काम करती रही हैं। असहमति भी रही, विरोध भी हुआ और सड़कों पर आंदोलन भी हुए। मगर लोकतंत्र का पहिया चलता रहा।

यही किसी लोकतंत्र की असली परीक्षा है। सरकार से सहमत होना लोकतंत्र नहीं है। असहमति के बावजूद व्यवस्था का चलते रहना लोकतंत्र है।


पिछले बारह साल फूलों की सेज नहीं रहे। आतंकवादी हमले हुए, नागरिक आंदोलनों ने सरकार को चुनौती दी और विपक्ष ने कई मुद्दों पर तीखा विरोध किया। संसद में भी खूब हंगामा हुआ और सियासी बयानबाज़ी ने कई बार मर्यादा की सीमा छुई।

फिर भी व्यवस्था बिखरी नहीं। विरोध अपनी जगह रहा और शासन अपनी जगह। आंदोलन हुए, लेकिन देश चलता रहा। यही सिस्टम की सहनशक्ति है।

लोकतंत्र कोई ऐसा पंखा नहीं है जिसे स्विच दबाते ही चलना शुरू कर दें। इसे चलाए रखने के लिए संस्थाओं, परंपराओं और जनता के भरोसे की जरूरत होती है।


अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी भारत की हैसियत बदली है। Brand India को लेकर आत्मविश्वास बढ़ा है। विदेशों में बसे भारतीयों ने स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं और समाजों में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई है।

बड़ी ताकतों के दबाव के बीच भारत ने अपने हितों को प्राथमिकता देने की कोशिश की है। अमेरिका हो, रूस हो या कोई और ताकत; नई दुनिया में भारत ने किसी एक खेमे का पिछलग्गू बनने के बजाय अपने विकल्प खुले रखने की नीति अपनाई है।

बहुध्रुवीय दुनिया में यही रणनीतिक स्वायत्तता है। कभी दोस्ती, कभी दूरी और कभी दो टूक बात; कूटनीति में यही तो हुनर है।


अर्थव्यवस्था में चुनौतियां कम नहीं हैं। निर्यात पर दबाव है, वैश्विक बाजार अनिश्चित है और रोजगार से लेकर महंगाई तक कई सवाल हैं। फिर भी भारतीय अर्थव्यवस्था ने झटकों को झेलने की क्षमता दिखाई है।

कारोबार को आसान बनाने, उद्यमिता को बढ़ावा देने और नए कारोबारियों को अवसर देने की कोशिशों के नतीजे दिखाई देने लगे हैं। करोड़ों युवाओं की महत्वाकांक्षाएं भी अब नौकरी से आगे बढ़कर कारोबार और स्टार्टअप की ओर देख रही हैं।

अर्थव्यवस्था को सबसे ज्यादा जरूरत होती है भरोसे और स्थिर माहौल की। कारोबारी यह नहीं चाहते कि आज बनाई गई नीति कल किसी नए राजनीतिक प्रयोग के साथ कूड़ेदान में चली जाए।

इसका मतलब यह नहीं कि सब कुछ ठीक है

मौजूदा व्यवस्था को बनाए रखने की बात का अर्थ यह कतई नहीं कि सरकार से सवाल न पूछे जाएं। लोकतंत्र में आलोचना जरूरी है। गलत नीतियों पर सवाल उठना चाहिए और जहां सुधार की जरूरत हो, वहां सुधार होना चाहिए।

सरकार कोई दूध की धुली संस्था नहीं होती। सत्ता में रहते हुए गलतियां भी होती हैं और फैसलों पर बहस भी होनी चाहिए। मगर आलोचना और अराजकता में फर्क है।

देश को मजबूत विपक्ष भी चाहिए और जवाबदेह सरकार भी। लेकिन सिर्फ सरकार बदलने के लिए सरकार बदलना कोई नीति नहीं हो सकती।


सियासत में कुछ लोग हर पांच साल बाद नई बोतल में पुरानी शराब बेचने निकल पड़ते हैं। कोई कहता है सब बदल दो, कोई कहता है पूरा सिस्टम उलट दो। छिपकलियां दीवार पर चढ़ती-उतरती रहें, कॉकरोच इधर-उधर भागते रहें और मेंढक तालाब में टर्राते रहें; देश को आखिर आगे तो बढ़ना है।

बदलाव लोकतंत्र की खूबसूरती है, लेकिन बदलाव अपने आप में उपलब्धि नहीं है। सवाल यह होना चाहिए कि बदलाव से देश मजबूत होगा या कमजोर।

बारह साल में कोई व्यवस्था परिपूर्ण नहीं हो जाती। लेकिन अगर संस्थाएं काम कर रही हों, चुनाव हो रहे हों, सत्ता संवैधानिक दायरे में चल रही हो, अर्थव्यवस्था झटके झेल रही हो और दुनिया में भारत की आवाज पहले से ज्यादा सुनी जा रही हो, तो अचानक सब कुछ दांव पर लगाने की जरूरत क्या है?


मौजूदा निज़ाम को जारी रखने का तर्क किसी पार्टी के प्रति अंधभक्ति नहीं, बल्कि व्यावहारिक सोच का सवाल है। निरंतरता का अर्थ यह नहीं कि सरकार को खुली छूट दे दी जाए। इसका अर्थ है: जो अच्छा हुआ है, उसे आगे बढ़ाया जाए; जो गलत है, उसे सुधारा जाए।

देश बनाना कोई पांच साल का प्रोजेक्ट नहीं। यह पीढ़ियों का काम है। संस्थाएं और नीतियां बनने में साल लगते हैं, लेकिन उन्हें बिगाड़ने में ज्यादा वक्त नहीं लगता।

इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं कि कौन आएगा? सवाल यह भी है कि जो व्यवस्था बनी है, उसे कौन संभालेगा?

भारत को प्रयोगशाला बनाने से पहले यह देखना होगा कि प्रयोग की कीमत कौन चुकाएगा।

स्थिरता को बचाना जड़ता नहीं है। कभी-कभी यही सबसे समझदार बदलाव होता है; बिना व्यवस्था बदले, व्यवस्था को बेहतर बनाना

 हिमालय में  मंडराता खतरा

चीन की हरकतों से सावधान रहना होगा

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

29 अगस्त 2026

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26 अगस्त 2026 को नेपाल-तिब्बत (चीन) सीमा पर एक भयंकर बाढ़ और मिट्टी का सैलाब आया। ऊँचाई पर स्थित एक ग्लेशियर का हिस्सा टूटकर गिर गया। करीब 5,200 मीटर की ऊँचाई से बर्फ और चट्टान का बड़ा हिस्सा नीचे गिरा और ल्हेंदे नदी (नेपाल में भोटेकोशी) में जा गिरा। यह जगह रसुवागढ़ी-ग्यीरोंग सीमा चौकी से करीब 20 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में है। मलबा नदी को कुछ देर के लिए रोक दिया। फिर पानी, कीचड़ और पत्थरों का तेज सैलाब नीचे की तरफ दौड़ पड़ा।

इस आपदा ने नेपाल के रसुवा और नuwाकोट जिलों (जिसमें स्याब्रुबेसी शामिल है) और चीन के ग्यीरोंग काउंटी को प्रभावित किया। अब तक 160 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं और आंकड़ा बढ़ रहा है। दोनों तरफ सैकड़ों से लेकर एक हजार से ज्यादा लोग लापता बताए जा रहे हैं। इनमें कई विदेशी पर्यटक और तीर्थयात्री भी शामिल हैं। गाँव, पुल, सड़कें और कई निर्माण नष्ट हो गए। बचाव कार्य जारी है, लेकिन आगे बाढ़ का खतरा बना हुआ है।

यह सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा नहीं है। यह एक चेतावनी है। हिमालय दुनिया के सबसे कमजोर पहाड़ी क्षेत्रों में से एक है। चीन ने भारत और नेपाल की सीमा पर सड़कें, सैन्य ठिकाने, सुरंगें, बाँध और बिजली परियोजनाएँ बड़े पैमाने पर बनाई हैं। इन कामों से पहाड़ों की ढलानें, नदियों का रास्ता और मिट्टी का संतुलन बिगड़ा है। चीन ने वैज्ञानिकों की चेतावनियों और नीचे रहने वाले देशों पर पड़ने वाले असर को बार-बार कम करके आँका है।

1978 में मैंने टिहरी बाँध के विवाद पर लिखा था और हिमालय में बड़े बाँध बनाने के खतरों के बारे में चेतावनी दी थी। पानी, बिजली और विकास के फायदे तो हैं। लेकिन भूकंप वाले इलाके में और चीन की सीमा के पास इतने बड़े निर्माण के खतरे भी बहुत हैं। आलोचकों ने कहा था कि बड़ा भूकंप या कोई हादसा होने पर बाढ़ उत्तर भारत के मैदानों तक पहुँच सकती है। वही सवाल आज भी खड़ा है: क्या फायदे इतने बड़े खतरे के लायक हैं?

भूवैज्ञानिक लंबे समय से कहते आए हैं कि हिमालय पृथ्वी की पपड़ी का कमजोर और सक्रिय हिस्सा है। यहाँ लगातार उठान, दरारें और दबाव चल रहे हैं। ऊपरी शिवालिक की ढलानें चिकनी मिट्टी और रेत की वजह से अस्थिर हैं। बड़े निर्माण पहाड़ी पर्यावरण को नुकसान पहुँचा सकते हैं। पहाड़ों का तेज उठना और भूकंप की गतिविधि उनकी अस्थिरता को साफ दिखाती है। इसलिए इस इलाके में बड़े बाँध और जलाशय खास तौर पर खतरनाक हैं। ये बातें नई नहीं हैं। दशकों से वैज्ञानिक यही चेतावनी देते आए हैं।

चीन ने इन चेतावनियों को ज्यादातर नजरअंदाज किया है। शोधकर्ताओं ने बार-बार कहा है कि बाँध टूटने या ग्लेशियर झीलों के फटने से बड़ी तबाही हो सकती है। खुदाई, सुरंगें और बड़े जलाशय ढलानों को कमजोर कर सकते हैं और पानी के सिस्टम को बिगाड़ सकते हैं। फिर भी निर्माण काम चलते रहे, और नीचे वाले देशों को पूरी जानकारी कम ही दी गई। इस हफ्ते ग्लेशियर टूटा तो सैलाब ऐसे इलाके से गुजरा जहाँ पहले से काफी बदलाव हो चुके थे। तात्कालिक कारण प्राकृतिक लगता है: बर्फ और चट्टान का गिरना। लेकिन इतने बड़े निर्माण से पूरे इलाके का खतरा बढ़ जाता है। छोटे बदलाव भी यहाँ बड़ी तबाही ला सकते हैं।

पूर्व में भी यही रवैया दिखता है। चीन ब्रह्मपुत्र (यारलुंग त्सांगपो) पर एक बहुत बड़ा बाँध बना रहा है, जो थ्री गॉर्जेस बाँध से भी बड़ा होगा। उस जगह के पास सक्रिय दरार भी पाई गई है। अगर भूकंप या कोई और हादसा हुआ तो पूर्वोत्तर भारत और बांग्लादेश के बड़े हिस्से बाढ़ की चपेट में आ सकते हैं। नीचे वाले देशों ने चिंता जताई है, लेकिन चीन निर्माण जारी रखे हुए है और खतरों की बात को कम करके बता रहा है।

26 अगस्त की यह आपदा सिर्फ स्थानीय घटना नहीं है। यह एक साफ चेतावनी है। चीन की तेज रफ्तार वाली ऊँचाई वाली परियोजनाओं ने इस कमजोर पहाड़ी क्षेत्र में खतरा बढ़ा दिया है। वैज्ञानिकों और नीचे रहने वाले लोगों की चेतावनियों को कम आँककर, और अपनी महत्वाकांक्षा को प्राथमिकता देकर, चीन ने और बड़ी घटनाओं की संभावना बढ़ा दी है। जलवायु परिवर्तन से ग्लेशियर पहले से कमजोर हो रहे हैं। गलत जगह पर भारी निर्माण इस खतरे को और बढ़ा देता है।

क्षेत्रीय सरकारों, वैज्ञानिक संस्थाओं और नीचे रहने वाले लोगों को चीन की परियोजनाओं की पूरी जानकारी चाहिए। ग्लेशियर झीलों और कमजोर ढलानों की स्वतंत्र निगरानी जरूरी है। सबसे ज्यादा खतरे वाले इलाकों में और बड़े निर्माण पर लगाम लगानी होगी। वरना ऐसी तबाही बार-बार हो सकती है। इस हफ्ते मारे गए लोगों और उजड़े गाँवों को सिर्फ प्राकृतिक हादसा मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। ये उन फैसलों का नतीजा हैं जो ऐसे पहाड़ों में लिए गए जहाँ अस्थिरता की चेतावनी पीढ़ियों से दी जा रही है; और जिन्हें अभी भी नजरअंदाज किया जा रहा है।