Friday, May 1, 2026

 कब तक तेल के भरोसे? अब सूरज से चलेगा भारत

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पश्चिम एशिया के संकट के बीच, सोलर एनर्जी की चमक से भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिखी जा रही है

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

3 मई 2026

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पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष। दूर जल रही आग की तपिश भारत तक साफ महसूस हो रही है। तेल और गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव, आपूर्ति की अनिश्चितता और आयात पर बढ़ती निर्भरता भारत के लिए गंभीर खतरे हैं। देश अभी भी अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयातित ईंधन से पूरा करता है। ऐसे में वैश्विक तनाव सीधे हमारे ऊर्जा बिल पर असर डालते हैं।

हर संकट अवसर भी लेकर आता है।  एक रिपोर्ट

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धूप में नहाया, उत्तर प्रदेश का एक छोटा सा गांव। सरसों के पीले खेतों के बीच से गुजरती कच्ची पगडंडी। दूर कहीं एक घर की छत पर चमकते सोलर पैनल। आंगन में धीरे-धीरे घूमता पंखा, मोबाइल चार्ज हो रहा है, और शाम ढलते ही बच्चों की किताबों पर स्थिर, चमकदार रोशनी फैल रही है, टिमटिमाती ढिबरी या लालटेन की जगह।

यकीन करना मुश्किल है, लेकिन यही वो भारत है जो महज 25 साल पहले अंधेरे से जूझ रहा था। तब सूरज ढलते ही गांव सिमट जाता था। दीए की कांपती लौ में रात कटती, और बिजली एक  मेहमान की तरह आती-जाती रहती। इन्वर्टर अमीरों की शान था, जनरेटर शोर मचाता और डीजल की तेज गंध हवा में घुली रहती। 

आज तस्वीर पूरी तरह पलट चुकी है। छतों पर सोलर पैनल चमक रहे हैं, खेतों के किनारे मिनी ग्रिड काम कर रहे हैं, और गांव खुद अपनी ऊर्जा गढ़ रहा है। 

भारत आज ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक स्थिर लेकिन निर्णायक यात्रा पर है। यह कोई अचानक छलांग नहीं, बल्कि निरंतर प्रयासों की कहानी है। 

वित्तीय वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही में देश की बिजली मांग ने नया रिकॉर्ड बनाया। 25 अप्रैल 2026 को दोपहर करीब 3:38 बजे पीक डिमांड 256.1 गीगावॉट तक पहुंच गई। गर्मी की लहर और बढ़ती आर्थिक गतिविधियों ने इस मांग को और तेज किया। बढ़ती अर्थव्यवस्था, हर घर बिजली पहुंचाने के प्रयास, शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन से तेज होती गर्मी; सब मिलकर ऊर्जा की भूख को बढ़ा रहे हैं। 

सोलर ऊर्जा का उत्पादन साल-दर-साल 24 प्रतिशत बढ़ा है। कुल बिजली उत्पादन में करीब 3 प्रतिशत की वृद्धि हुई, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से गैर-जीवाश्म स्रोतों से आई। कोयला और लिग्नाइट आधारित उत्पादन में 1 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। यानी विकास और प्रदूषण के पुराने रिश्ते में अब दरार पड़ रही है। 

संकेत और भी साफ हैं। पिछले 90 दिनों में से 88 दिन ऐसे रहे जब बिजली की सबसे ज्यादा मांग दिन के समय दर्ज हुई, जब सूरज चरम पर होता है। इसका मतलब है कि सोलर ऊर्जा अब महज विकल्प नहीं रह गई है, बल्कि मुख्यधारा बनती जा रही है।

इसी बदलाव को घर-घर तक पहुंचाने वाली एक बड़ी पहल है पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना। इस योजना का उद्देश्य साधारण परिवारों की छतों को छोटे-छोटे पावर प्लांट में बदलना है। सरकार सब्सिडी मुहैया करा रही है, आसान ऋण की व्यवस्था कर रही है और लोगों को अपनी बिजली खुद उत्पन्न करने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। अब तक इस योजना के तहत 31 लाख से ज्यादा घरों को फायदा पहुंच चुका है, जबकि लाखों आवेदन लंबित हैं।

गांवों में जहां कभी बिजली आने का इंतजार किया जाता था, वहां अब लोग खुद बिजली पैदा कर रहे हैं। बिजली का बिल काफी कम हो रहा है, और अतिरिक्त ऊर्जा को ग्रिड में बेचकर अतिरिक्त आय का नया जरिया भी बन रहा है। यह सिर्फ एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि ऊर्जा के लोकतंत्रीकरण की दिशा में एक सामाजिक बदलाव है। आम आदमी अब ऊर्जा का उपभोक्ता नहीं, बल्कि उत्पादक भी बन रहा है।

महंगे आयातित तेल-गैस के मुकाबले सोलर और पवन ऊर्जा अब केवल पर्यावरणीय विकल्प नहीं, बल्कि आर्थिक मजबूरी भी बन गई है। जब वैश्विक बाजार अस्थिर हों, तब सूरज की रोशनी और हवा की ताकत सबसे भरोसेमंद साथी साबित होते हैं।

इसलिए सरकार सोलर पार्क, विंड एनर्जी कॉरिडोर और ग्रीन हाइड्रोजन जैसी परियोजनाओं पर तेजी से काम कर रही है। निजी क्षेत्र का निवेश भी बढ़ रहा है, क्योंकि साफ ऊर्जा अब भविष्य की बात नहीं, तुरंत की जरूरत बन गई है। ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु लक्ष्य दोनों एक ही रास्ते पर दिख रहे हैं।

हालांकि सोलर और पवन ऊर्जा की क्षमता तेजी से बढ़ रही है, लेकिन इसका पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा। “कर्टेलमेंट”; यानी पैदा हुई साफ ऊर्जा को व्यर्थ जाना, एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। चौथी तिमाही में करीब 27 गीगावॉट सोलर और 4 गीगावॉट पवन ऊर्जा को सीधे कर्टेल किया गया, जबकि ट्रांसमिशन रिजर्व के तहत और भी बड़ी मात्रा प्रभावित हुई।

यह विडंबना है, एक ओर देश प्रदूषण कम करने की कोशिश कर रहा है, दूसरी ओर साफ ऊर्जा को मजबूरी में रोकना पड़ रहा है। समस्या उत्पादन की नहीं, बल्कि व्यवस्था की है। हमने सोलर प्लांट तो तेजी से लगाए, लेकिन बिजली को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने वाले ट्रांसमिशन नेटवर्क की गति उससे मेल नहीं खा पाई। राजस्थान, गुजरात और तमिलनाडु जैसे राज्यों में सूरज और हवा से भरपूर ऊर्जा पैदा हो रही है, लेकिन उसे उपभोक्ता केंद्रों तक पहुंचाने में अड़चनें बनी हुई हैं।

भंडारण की कमी भी एक बड़ी बाधा है। दिन में पैदा हुई अतिरिक्त सोलर ऊर्जा को शाम या रात के लिए संग्रहित करने की क्षमता अभी सीमित है। बैटरी स्टोरेज और पंप्ड स्टोरेज हाइड्रो जैसी तकनीकें अभी शुरुआती चरण में हैं। नतीजा यह होता है कि दोपहर में बिजली की अधिकता और शाम को फिर वही दबाव।

कोयला आधारित प्लांट्स की कहानी भी बदल रही है। प्लांट लोड फैक्टर 72 प्रतिशत से घटकर 69 प्रतिशत रह गया है। कोयला अब “राजा” की जगह बैकअप की भूमिका निभा रहा है। पर्यावरण की दृष्टि से यह सकारात्मक है, लेकिन पुराने प्लांट्स की कार्यक्षमता और लागत पर नए सवाल खड़े हो रहे हैं।

तो क्या भारत की ऊर्जा स्वतंत्रता की राह रुक गई है? बिल्कुल नहीं। रुकावटें जरूर हैं: ट्रांसमिशन नेटवर्क की कमी, भंडारण की चुनौती, नीतिगत स्पष्टता की जरूरत और राज्यों के बीच समन्वय की कमी। लेकिन राह बंद नहीं है।

असल जरूरत संतुलित विकास की है। उत्पादन के साथ-साथ वितरण, भंडारण और स्मार्ट ग्रिड पर बराबर ध्यान देना होगा। ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर को तेजी से पूरा करना, बैटरी स्टोरेज में बड़े पैमाने पर निवेश और टाइम-ऑफ-डे टैरिफ जैसी व्यवस्थाएं इस संक्रमण को आसान बना सकती हैं। अगर निवेशकों को नीतिगत निश्चितता और समय पर भुगतान मिले, तो निजी क्षेत्र और तेजी से आगे आएगा।

आज गांव की छत पर चमकता सोलर पैनल सिर्फ बिजली नहीं दे रहा। वह आत्मनिर्भरता, पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक सशक्तिकरण का प्रतीक बन गया है। जहां कभी अंधेरा स्थायी लगता था, वहां अब रोशनी अपने दम पर जल रही है।

भारत की यह यात्रा अभी अधूरी है। बढ़ते भारत की यह “ग्रोइंग पेन” की कहानी है; पुरानी ऊर्जा से नई, स्वच्छ और आत्मनिर्भर ऊर्जा की ओर एक साहसिक संक्रमण की।

 चुनाव संपन्न: अब चार तक, काटे नहीं कटते दिन और रात

बदलाव की आहट ने बढ़ाई सियासी हलचल

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

2 मई 2026

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चार मई को तय हो जाएगा ;  दीदी लौटेंगी या दादा के हाथ आएगी पश्चिम बंगाल की कमान। लेकिन तब तक बड़े-बड़े नेताओं के दिलों की धड़कनें बगावत पर उतारू हैं, और दिल्ली से कोलकाता तक सियासी गलियारों में बेचैनी का आलम है।

चुनाव तो कई प्रांतों में हुए हैं ;  पश्चिम बंगाल, केरल, असम, तमिलनाडु और पुदुचेरी , लेकिन सबकी निगाहें बंगाल पर टिकी हैं। 294 सीटों वाली इस विधानसभा में बहुमत का जादुई आंकड़ा 148 है, और इस बार की लड़ाई इसी आंकड़े के इर्द-गिर्द घूम रही है।

इस बार पश्चिम बंगाल में कुल 68,251,008 पंजीकृत मतदाताओं में से दोनों चरणों में औसत मतदान लगभग 91.57 प्रतिशत रहा। पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं: "इतनी बड़ी भागीदारी यह इशारा करती है कि जनता इस बार कुछ नया सोचकर आई है , शायद बदलाव की ओर।"

राज्य की राजनीति में इस बार सीधा मुकाबला सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच रहा। टीएमसी ने अपनी सामाजिक योजनाओं, महिला मतदाताओं, अल्पसंख्यक समर्थन और 'बंगाली अस्मिता' को ढाल बनाया। भाजपा ने भ्रष्टाचार, कानून-व्यवस्था, बेरोजगारी और 15 साल की सत्ता के विरुद्ध उठी थकान को अपना हथियार बनाया। वामपंथी दल और कांग्रेस इस बार हाशिये पर नज़र आए । 2021 में इनके संयुक्त मोर्चे को महज़ एक सीट मिली थी, हालाँकि उनका वोट-शेयर 117 सीटों पर जीत के अंतर से अधिक रहा था।

चुनाव प्रचार के दौरान एक बड़ा विवाद मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (SIR) को लेकर उठा, जिसमें अक्टूबर 2025 के बाद से लगभग 91 लाख मतदाताओं के नाम काटे गए — यानी कुल मतदाताओं का करीब 12 प्रतिशत। टीएमसी ने इसे राजनीतिक षड्यंत्र बताया, जबकि भाजपा ने इसे अवैध घुसपैठियों की सफाई करार दिया।


मतदान के बाद जारी एग्जिट पोल्स ने तस्वीर को और रोमांचक बना दिया है। रिपब्लिक टीवी के 'पोल ऑफ पोल्स' में भाजपा को 155 से 158 सीटें मिलती दिख रही हैं , बहुमत के आंकड़े से साफ ऊपर। अधिकांश एजेंसियाँ भाजपा को 146 से 175 सीटों के बीच रख रही हैं, जबकि टीएमसी 120 से 140 सीटों पर सिमटती नजर आ रही है। कुछ सर्वे टीएमसी को 177 से 195 सीटें भी देते हैं, जिससे साफ है कि सर्वे एकमत नहीं हैं।

उल्लेखनीय यह भी है कि एक्सिस माई इंडिया जैसी बड़ी एजेंसी ने इस बार बंगाल का एग्जिट पोल जारी नहीं किया, जिससे अटकलों का बाजार और गर्म है।

ममता बनर्जी ने सभी सर्वे खारिज करते हुए कहा कि उनकी पार्टी 226 से ज्यादा सीटें जीतेगी। दूसरी ओर भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी 180 से अधिक सीटों का दावा कर रहे हैं।

हालाँकि एग्जिट पोल्स हमेशा सही नहीं होते। 2021 में कई सर्वे गलत साबित हुए थे, जब भाजपा को बड़ी बढ़त दिखाने के बावजूद टीएमसी ने 215 सीटें जीती थीं। इस बार त्रिशंकु विधानसभा की संभावना पूरी तरह नकारी नहीं जा सकती।


उधर, असम में सत्तारूढ़ भाजपा गठबंधन के पक्ष में रुझान हैं। ज्यादातर सर्वे मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा की सरकार की वापसी के संकेत दे रहे हैं।

केरल में इस बार पारंपरिक ढर्रा टूटता दिख रहा है। मनोरमा न्यूज़-सीवोटर सर्वे में यूडीएफ को 82 से 94 सीटें और एलडीएफ को 44 से 56 सीटें मिलती दिख रही हैं। टुडेज़ चाणक्य का अनुमान है कि यूडीएफ 69, एलडीएफ 64 और भाजपा 7 सीटों के आसपास रहेगी। अगर ये रुझान सही निकले तो पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाला वाम मोर्चा लगातार दूसरी बार सत्ता में आने का रिकॉर्ड नहीं बना पाएगा।

तमिलनाडु में लोकल एक्टिविस्ट गोपाल कृष्णन के मुताबिक अधिकांश सर्वे डीएमके गठबंधन को बढ़त दे रहे हैं और मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन की वापसी की संभावना मजबूत दिखाई दे रही है। पुदुचेरी में एनडीए के पक्ष में संकेत हैं।

4 मई का इंतज़ार

4 मई की सुबह 8 बजे से मतगणना शुरू होगी। अगर बंगाल में भाजपा सत्ता में आई, तो यह 2011 के बाद पहली बार होगा जब ममता बनर्जी की पार्टी सत्ता से बाहर जाएगी। और अगर टीएमसी वापसी करती है, तो यह उन तमाम सर्वेक्षणों के मुँह पर एक और तमाचा होगा जो बंगाल की जनता को समझने का दावा करते हैं।

सस्पेंस अपने चरम पर है। चार मई का इंतज़ार है।

Thursday, April 30, 2026

 क्या कभी जूते भी सांस लेते हैं?

जंग की आंच से आगरा के जूतों की अटकने लगीं धड़कनें! 

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

1 मई, 2026

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आगरा का विश्वप्रसिद्ध फुटवियर हब इन दिनों एक ऐसे अभूतपूर्व संकट की चपेट में है, जिसने इस ऐतिहासिक शहर की आर्थिक रीढ़ को हिलाकर रख दिया है। पश्चिम एशिया के सुलगते मैदानों से उठी युद्ध की लपटें अब सात समंदर पार आगरा की उन तंग गलियों तक पहुँच चुकी हैं, जहाँ सदियों से जूतों के निर्माण की कला फलती-फूलती रही है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के छिन्न-भिन्न होने से निर्यात का पहिया थम सा गया है और अंतरराष्ट्रीय बाजारों से मिलने वाले नए ऑर्डर प्रभावित हो रहे हैं। इस भू-राजनीतिक अस्थिरता ने न केवल व्यापारिक मुनाफे को चोट पहुँचाई है, बल्कि उन लाखों हाथों को भी अनिश्चितता के अंधेरे में धकेल दिया है, जो हर सुबह उम्मीद के साथ कारखानों का रुख करते थे।

उद्योग के जानकारों और अनुभवी निर्यातकों का मानना है कि वर्तमान तनाव के कारण माल की आवाजाही लंबी देरी हो रही है। समुद्री रास्तों के असुरक्षित होने से माल ढुलाई की लागत में  वृद्धि हुई है, जिसने वैश्विक खरीदारों के बीच एक गहरा अविश्वास पैदा कर दिया है। सबसे गंभीर मार कच्चे माल की कीमतों पर पड़ी है। पेट्रोलियम उत्पादों से तैयार होने वाले कृत्रिम चमड़े और विभिन्न प्रकार के तलवों जैसे सिंथेटिक सामग्री की कीमतों में तीस प्रतिशत तक का उछाल आया है। यह वृद्धि उस उद्योग के लिए कमर तोड़ने वाली साबित हो रही है, जो पहले से ही अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के कारण बहुत ही कम मार्जिन पर काम करने को मजबूर था। अब स्थिति यह है कि उत्पादन की लागत और बिक्री मूल्य के बीच का संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका है।

आर्थिक आंकड़ों के आइने में देखें तो आगरा का फुटवियर उद्योग प्रतिवर्ष लगभग चार से पांच हजार करोड़ रुपये का विदेशी मुद्रा भंडार देश के लिए जुटाता है। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए कारोबारियों में इस बात का भारी भय व्याप्त है कि व्यापार में बीस से पच्चीस प्रतिशत की सीधी गिरावट आ सकती है। यदि युद्ध की यह स्थिति लंबी खिंचती है, तो नुकसान का यह आंकड़ा चालीस प्रतिशत तक भी पहुँच सकता है। यूरोप और अमेरिका जैसे संपन्न बाजारों तक पहुँचने में लगने वाले अतिरिक्त समय ने उत्पादन के पूरे चक्र को ही अस्त-व्यस्त कर दिया है। जब समय पर माल नहीं पहुँचता, तो विदेशी खरीदार अपने ऑर्डर रद्द कर देते हैं, जिससे न केवल आर्थिक क्षति होती है बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में आगरा की साख पर भी बट्टा लगता है।

इस संकट का सबसे मार्मिक और मानवीय पक्ष उन सूक्ष्म एवं लघु इकाइयों से जुड़ा है, जो इस पूरे उद्योग का आधार हैं। आगरा की लगभग पांच हजार छोटी इकाइयाँ आज अपनी उत्पादन क्षमता के न्यूनतम स्तर पर काम कर रही हैं। इन कारखानों में काम करने वाले साढ़े तीन से चार लाख श्रमिक आज असमंजस में हैं। सुबह की पहली किरण के साथ जिस शहर में मशीनों की घरघराहट और हथौड़ों की गूँज सुनाई देती थी, वहाँ अब एक अजीब सा सन्नाटा पसरने लगा है। कई छोटी कार्यशालाओं में काम आधा हो चुका है और मजदूरों को मजबूरी में छुट्टी पर भेजा जा रहा है। दूर देश में छिड़ी जंग की लहरें यहाँ के कारीगरों की रसोई तक पहुँच गई हैं, जिससे उनकी दैनिक आजीविका पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।

आगरा का जूता उद्योग केवल ईंट-पत्थर की फैक्ट्रियां नहीं, बल्कि एक जीवंत विरासत है जो मुगल काल से निरंतर चली आ रही है। पीढ़ी दर पीढ़ी कारीगरों ने अपने खून-पसीने से इस हुनर को सींचा है। भारत के कुल फुटवियर निर्यात में लगभग अट्ठाइस से तीस प्रतिशत का योगदान देने वाला यह शहर घरेलू बाजार की भी पैंसठ प्रतिशत मांग को पूरा करता है। आधुनिकता की दौड़ में यहाँ के कारीगरों ने खुद को बदला भी है और मशीनी तकनीक को हाथ की सफाई के साथ जोड़ा है। चीन और वियतनाम जैसे देशों के दबाव के बावजूद आगरा अपनी रचनात्मकता और छोटे ऑर्डरों को कुशलता से पूरा करने की क्षमता के कारण टिका हुआ है। भौगोलिक संकेतक अर्थात जीआई टैग मिलने से इस शहर की पहचान को एक नई संजीवनी मिली थी, लेकिन युद्ध के इस दौर ने उन तमाम कोशिशों पर पानी फेरने की चुनौती पेश की है।

आज जब हम भविष्य की ओर देखते हैं, तो जेवर के पास बन रहे नए हवाई अड्डे और प्रस्तावित फुटवियर पार्क जैसी बुनियादी ढांचागत योजनाएं उम्मीद तो जगाती हैं, लेकिन तात्कालिक चुनौतियां कहीं अधिक विकराल हैं। महंगे कर्ज, जटिल नियम और पर्यावरण संबंधी चिंताओं के बीच अब युद्ध की यह मार इस उद्योग के लिए 'करेला और नीम चढ़ा' वाली स्थिति बन गई है। फिर भी, इस शहर की मिट्टी में संघर्ष और सृजन का अद्भुत संगम है। यहाँ के युवा डिजाइनर और महिलाएं अब नए प्रयोगों के साथ इस संकट से निकलने की राह खोज रहे हैं। सवाल अब केवल आर्थिक लाभ का नहीं, बल्कि उस हुनर को बचाने का है जिसने सदियों से आगरा को दुनिया के नक्शे पर चमकाया है। ताजमहल को निहारने आने वाली दुनिया को शायद अब उन कारीगरों के हाथों के छालों और उनकी मेहनत को भी पहचानना होगा, क्योंकि हर जूते की जोड़ी के पीछे एक परिवार की जीवटता और संघर्ष की अनकही कहानी छिपी होती है।


Wednesday, April 29, 2026

 स्कूलों की दहलीज़ पर खून: जब मासूमियत हथियारों से हारने लगे

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

30 अप्रैल 2026

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एक खूनी लोहे का मुक्का… बस एक। और बचपन टूटकर बिखर गया।

स्कूल का गलियारा था, कोई जंग का मैदान नहीं। मगर उस दिन, सन्नाटा चीखों में बदल गया। भरोसा टूटा, और मासूमियत ज़मीन पर बिखर गई।

हम स्कूलों को सुरक्षित पनाहगाह समझते हैं। तहज़ीब और तालीम का घर। मगर 25 अप्रैल 2026 को आगरा के शास्त्रीपुरम स्थित दिल्ली पब्लिक स्कूल में जो हुआ, उसने इस  कल्पना को चूर-चूर  कर दिया। हिंसा ने दरवाज़ा नहीं खटखटाया, वो अंदर आई, और बेरहमी  से वार किया।

15 साल का एक लड़का। जबड़ा टूट गया। तीन दांत गिर गए। और जो सबसे ज्यादा ख़ौफ़नाक  है; हमले में कथित तौर पर मेटल नकल्स का इस्तेमाल हुआ। ये कोई अचानक भड़की हुई झड़प नहीं थी। ये सोचा-समझा हमला था। हथियार चुना गया, साथ लाया गया, और इस्तेमाल किया गया।

सवाल उठता है; क्या ये सिर्फ एक हादसा है? या फिर एक खतरनाक रुझान का इशारा?

हर बार की तरह, मामला अब फाइलों में दौड़ेगा। किशोर न्याय बोर्ड, सीसीटीवी फुटेज, जांच कमेटियां, सिस्टम अपनी रफ्तार से चलेगा। मगर आंकड़े कुछ और ही कहानी कहते हैं।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक, 2017 से 2022 के बीच कानून से टकराने वाले किशोरों की कुल संख्या घटी है। सुनने में राहत मिलती है। लेकिन असल हकीकत कहीं ज्यादा स्याह  है। इन मामलों में हिंसक अपराधों का हिस्सा लगभग दोगुना हो गया है—2016 में 32.5% से बढ़कर 2022 में 49.5%।

मतलब साफ है। अपराधी बच्चे कम हो रहे हैं, मगर जो हैं, वो ज्यादा खतरनाक हो गए हैं।

2025 तक ऐसे मामलों की संख्या 17,000 के पार जाने का अंदेशा  है। अब ये छोटी-मोटी शरारत नहीं रही। अब बात कत्ल, हथियारों से हमले और गंभीर जख्मों तक पहुंच चुकी है।

ये सिलसिला न इत्तेफाक  है, न ही कोई अपवाद । देशभर में क्लासरूम अब धीरे-धीरे संघर्ष के मैदान जैसे लगने लगे हैं।

कर्नाटक, मार्च 2026: 15 साल का छात्र, हॉस्टल में हमला। एक की मौत, कई घायल।

सूरत: क्लास 9 के छात्र को मामूली विवाद में चाकू मार दिया गया।

जमशेदपुर: 13 साल का बच्चा हथियार के साथ पकड़ा गया। वोट देने की उम्र नहीं, मगर हथियार उठाने का जज़्बा  पैदा हो चुका था।

दिल्ली: 18 साल का लड़का देशी पिस्तौल लेकर स्कूल पहुंचा, “बुलीज़ को डराने” के लिए।

भुवनेश्वर से लेकर उत्तराखंड तक, तस्वीर एक सी है। उम्र घट रही है, हिंसा बढ़ रही है। और नीयत ? वो और ज्यादा संगीन  हो रही है।

आख़िर ऐसा क्यों हो रहा है?

जवाब शायद उस  भावनात्मक खालीपन” में छिपा है, जिसमें आज का बच्चा पल रहा है। मां-बाप व्यस्त हैं। स्कूल दबाव में हैं। और असली बातचीत; वो गुम हो गई है।

जब बच्चा अपनी बात कह नहीं पाता, तो गुस्सा अंदर ही अंदर सड़ता है। और फिर एक दिन… वो फट पड़ता है।

आगरा का वो लड़का जिसने मेटल नकल्स इस्तेमाल किए; उसने अचानक फैसला नहीं लिया। उसने तैयारी की।

ये बदलाव डराता है। “बच्चे हैं, गलती हो गई” वाली बात अब पुरानी हो गई है। अब ये सोची-समझी क्रूरता है।

स्कूल अब सिर्फ पढ़ाने की जगह नहीं रह गए। शिक्षक अब गुरु कम, संकट प्रबंधक ज्यादा बनते जा रहे हैं। हर दिन एक नया खतरा, एक नई फिक्र।

और सिस्टम? हमेशा की तरह, रिएक्टिव।

कानून हैं; जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, पॉक्सो। मगर शुरुआती हस्तक्षेप की कोई मज़बूत व्यवस्था नहीं।

स्कूलों में काउंसलिंग? नाम मात्र। मानसिक स्वास्थ्य? एक खामोश  मुद्दा।

हमें उस गुस्से को समझना होगा, जो हथियार बनने से पहले पलता है।

ये जो दरारें हैं; ये एक्स-रे में नहीं दिखतीं।

आगरा का वो बच्चा शायद शारीरिक रूप से ठीक हो जाएगा। जबड़ा जुड़ जाएगा, दांत लग जाएंगे।

मगर अंदर जो टूटा है? उसका इलाज कौन करेगा?

जब स्कूल में डर बसने लगे, तो सीखने की जगह सिकुड़ जाती है। भरोसा उड़ जाता है।

हर आवाज़ पर चौंकना, हर चेहरे में शक देखना; ये जख्म बहुत गहरे होते हैं।

हमें इन घटनाओं को “अलग-अलग केस” समझना बंद करना होगा। ये एक बढ़ते हुए पैटर्न के टुकड़े हैं।

अगर हमने जड़ों को नहीं पकड़ा, हमदर्दी  की कमी, मानसिक सहारे की गैरमौजूदगी, और झगड़े सुलझाने की कला का खत्म होना; तो ये सिलसिला थमेगा नहीं।

असल सवाल ये नहीं कि “ये कैसे हुआ?”

असल सवाल ये है; हम कैसी दुनिया बना रहे हैं, जहां बच्चों को किताबों के बजाय हथियार उठाने की जरूरत महसूस हो रही है?

क्योंकि जब स्कूल सुरक्षित नहीं रहेंगे… तो फिर बचपन कहां बचेगा?

 आओ डांस करें

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नृत्य दिवस, 29 अप्रैल

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सीटी, पायल और सिनेमा: जब बॉलीवुड ने नृत्य को दी नई ज़िंदगी

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सीटी बजाती रेल दूर अंधेरे में गुम हो रही है। धुएं की लकीर हवा में तैरती है। कोठे की रोशनी में पायल छनकती है, और मीना कुमारी धीमे-धीमे थिरक उठती हैं।

पाकीज़ा का “यूँ ही कोई मिल गया था”: यह सिर्फ एक गीत नहीं, दर्द, नज़ाकत और तड़प का नृत्य है। जैसे हर कदम में एक अधूरी मोहब्बत सांस ले रही हो।

यहीं से समझ आता है; नृत्य केवल शरीर की गति नहीं, आत्मा की अभिव्यक्ति है।

इंसान नाचता है, जब खुशी छलकती है। और तब भी, जब भीतर कुछ टूटता है।

भारत में नृत्य भक्ति है, साधना है, तड़पन है, विरक्ति है। तांडव डराता है, रास लीला लुभाती है। हर नृत्य का रंग  गहरा है। नृत्य जीवन का हिस्सा है। और इस जीवन को सबसे ज्यादा गति, सबसे ज्यादा ऑक्सीजन, अगर किसी ने दी है, तो वह है बॉलीवुड, जहां हर कदम कहानी कहता है, हर थिरकन में भाव है, संदेश है। बॉलीवुड  में हर इशारा एक संवाद है। हर ठुमका एक कथानक।

फिल्म दिल से का “छैयां छैयां”, चलती ट्रेन पर शाहरुख खान का नृत्य, सिनेमा की सबसे साहसी कल्पनाओं में से एक है।

वहीं देवदास का “ढोला रे ढोला”, माधुरी दीक्षित और ऐश्वर्या राय के साथ शास्त्रीय सौंदर्य की जीवंत तस्वीर बन जाता है।

बॉलीवुड ने नृत्य को सिर्फ दिखाया नहीं, उसे जिया है, उसे कहानी का हिस्सा बनाया है। शास्त्रीय और लोक को नई सांस दी है।

एक समय था जब भरतनाट्यम, कथक और ओडिसी मंदिरों और विशेष मंचों तक सीमित थे।

फिल्मों ने इन्हें घर-घर पहुंचाया। अब ये सिर्फ परंपरा नहीं, लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा हैं।

लोक नृत्य भी फिल्मों में खिल उठे। घूमर, गरबा और भांगड़ा; इनकी मिट्टी की खुशबू अब दुनिया भर में महसूस होती है।

पद्मावत का घूमर हो या बाजीराव मस्तानी का “पिंगा”, बॉलीवुड ने लोक को ग्लैमर और पहचान दी।

भावनाओं का सबसे सच्चा रूप होता है नृत्य। नृत्य तब जन्म लेता है जब शब्द कम पड़ जाते हैं।

एक दूजे के लिए में कमल हासन का नृत्य, गुस्से और हताशा का विस्फोट है। हर हरकत में बेचैनी है।

वहीं गाइड में वहीदा रहमान का “आज फिर जीने की तमन्ना”, जैसे आत्मा को आज़ादी मिल गई हो।

बॉलीवुड ने इन भावनाओं को दृश्य बना दिया। उन्हें एक चेहरा दिया, एक लय दी।

और आजकल, कंटेंपरेरी शैलियां तो कमाल कर रही हैं।

बॉलीवुड नृत्य की सबसे बड़ी ताकत है उसका फ्यूजन।

यह परंपरा और आधुनिकता का संगम है, जहां कथक के चक्कर, भरतनाट्यम की मुद्राएं और लोक की ऊर्जा, ट्विस्ट, रॉक एंड रोल और हिप-हॉप के साथ मिलकर कुछ नया रचते हैं। मिथुन दा का डिस्को डांसर एक नए युग का आगाज था। 

तेज़ाब का “एक दो तीन”, इस फ्यूजन का क्लासिक उदाहरण है।

और आरआरआर का “नाटू नाटू”, जिसने ऑस्कर जीतकर दुनिया को भारतीय नृत्य की ताकत दिखाई।

टीवी शो जैसे डांस इंडिया डांस ने इस क्रांति को और गति दी। अब हर गली, हर शहर से नर्तक उभर रहे हैं।

नृत्य जो कभी थमता नहीं

बॉलीवुड ने नृत्य को सिर्फ मंच नहीं दिया, उसे जीवन दिया।

हर फिल्म, हर गीत, एक नई सांस है, एक नया विस्तार।

और शायद यही इसकी सबसे बड़ी खूबसूरती है; यह बदलता है, लेकिन अपनी जड़ों को नहीं छोड़ता। जब भी कहीं संगीत बजता है, जब भी दिल में कोई लहर उठती है; नृत्य जन्म लेता है। क्योंकि नृत्य…सिर्फ देखा नहीं जाता, महसूस किया जाता है।

Tuesday, April 28, 2026

 जामनगर दूर गुजरात में है, पर जाम-ए-फजीहत ताज नगरी में!

लाइफ इन आगरा,  अपनी ही सड़कों में कैद

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

29 अप्रैल 2026

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ताज की चमक धुंधली क्यों है? जवाब हवा में नहीं, सड़कों पर अटका है। आगरा आज किसी शहर से ज़्यादा एक लंबा, अंतहीन जाम लगता है; जहाँ समय भी रेड लाइट पर खड़ा-खड़ा दम तोड़ देता है।

यह वही शहर है जहाँ कभी तांगे की टापें थीं, जहाँ सफर का मतलब सुकून था। आज वही आगरा अपनी ही रफ्तार के बोझ तले कराह रहा है। ताज महल की परछाई में खड़ा यह शहर अब पर्यटकों को इतिहास नहीं, हताशा का अनुभव देता है।

पाँच मिलियन से ऊपर जाती आबादी। बीस लाख से ज्यादा वाहन। ऊपर से एक्सप्रेसवे का ट्रैफिक। नतीजा? शहर नहीं, धड़कन रुकती हुई एक मशीन।

एमजी रोड से लेकर भगवान टॉकीज चौराहा। यमुना किनारा रोड से सुल्तानगंज पुलिया। हर रास्ता एक ही कहानी कहता है: “आगे जाम है।” यह जाम अब अस्थायी समस्या नहीं, स्थायी पहचान बन चुका है।

और यह सिर्फ गाड़ियों का जमावड़ा नहीं। यह समय की चोरी है। रोज़ाना की लूट।

स्कूल के बच्चे बसों में बैठकर धुएँ को फेफड़ों में भरते हैं। ऑफिस जाने वाले लोग अपनी आधी ऊर्जा सड़क पर ही गंवा देते हैं। एक किलोमीटर का सफर, आधे घंटे का संघर्ष बन जाता है।

विडंबना देखिए। आगरा को आधुनिक बनाने के लिए बनाए गए यमुना एक्सप्रेसवे और Agra–Lucknow Expressway अब शहर के लिए आफत बन गए हैं। ये हाई-स्पीड रास्ते ट्रैफिक को सीधे शहर के दिल में उगल देते हैं, उस दिल में जो पहले ही बीमार है।

समस्या सिर्फ गाड़ियों की संख्या नहीं है। समस्या सोच की है।

शहर की सड़कों को इंसानों के लिए नहीं, मशीनों के लिए डिजाइन किया गया। फुटपाथ? या तो हैं ही नहीं, या फिर दुकानों और ठेलों के कब्जे में हैं। पैदल चलना यहाँ साहस का काम है।

और अगर आप साइकिल चला रहे हैं, तो खुद को भाग्यशाली समझिए अगर घर सुरक्षित लौट आएं।

इस अराजकता में ट्रैफिक प्लानिंग मज़ाक बन चुकी है। कहीं भी यू-टर्न। कहीं भी कट। कोई स्पष्ट वन-वे सिस्टम नहीं। हर मोड़ एक जाल है, हर चौराहा एक जंग का मैदान।

ऊपर से “पार्किंग संस्कृति”।

गाड़ी खरीदना आसान। उसे रखने की जगह? कोई पूछने वाला नहीं। सड़कें अब सार्वजनिक नहीं रहीं। वे निजी गैरेज बन चुकी हैं।

और जब व्यवस्था की बात आती है, तो तस्वीर और भयावह हो जाती है।

चौराहों पर पुलिस गायब। जहाँ है, वहाँ व्यस्त, मोबाइल स्क्रीन में। ट्रैफिक खुद को संभालने के लिए छोड़ दिया गया है, जैसे कोई अनाथ बच्चा।

इस शहर की त्रासदी यहीं खत्म नहीं होती।

यहाँ ट्रैफिक सिर्फ इंसानों का नहीं है। बंदर, कुत्ते, गाय: सब सड़क के खिलाड़ी हैं। नियम? किसी के लिए नहीं। पैदल चलने वाला नागरिक दोहरी मार झेलता है; एक तरफ बेकाबू गाड़ियाँ, दूसरी तरफ अनियंत्रित जानवर।

बुजुर्गों के लिए यह शहर अब डर का पर्याय बन गया है। बिना गाड़ी के निकलना, जैसे किसी युद्ध क्षेत्र में प्रवेश करना।

सबसे बड़ा दोषी कौन? जवाब भी उतना ही उलझा हुआ है जितना ट्रैफिक।

नगर निगम, विकास प्राधिकरण, टीटीजेड: हर संस्था अपनी दिशा में खींच रही है। कोई एकीकृत योजना नहीं। कोई स्पष्ट नेतृत्व नहीं। परिणाम: नीतिगत लकवा।

शहर की सड़कों पर जो अराजकता दिखती है, वह दरअसल प्रशासनिक विफलता का आईना है।

और इस सबके बीच, सबसे बड़ा सवाल खड़ा है: क्या आगरा सिर्फ कारों के लिए जिएगा या इंसानों के लिए?

आज प्राथमिकता गाड़ियों को दी जा रही है। इंसान पीछे छूट गया है।

पैदल चलने वाला, साइकिल चलाने वाला; ये इस शहर के “अदृश्य नागरिक” बन चुके हैं।

अगर यही हाल रहा, तो आगरा सिर्फ जाम का शहर बनकर रह जाएगा, जहाँ इतिहास धुएँ में घुटता है और भविष्य हॉर्न की आवाज़ में खो जाता है।

समाधान क्या है?

पहला कदम: सोच बदलना। ट्रैफिक नहीं, मोबिलिटी की बात करनी होगी।

फुटपाथ वापस लेने होंगे। पब्लिक ट्रांसपोर्ट को मजबूत करना होगा।

गाड़ियों पर नियंत्रण। पार्किंग नियम सख्त।

और सबसे जरूरी, इंसान को केंद्र में रखना होगा। क्योंकि शहर गाड़ियों से नहीं बनते। शहर लोगों से बनते हैं।

 ब्रह्मांड का लोकप्रिय संत: नारद मुनि की लीला और हलचल की राजनीति

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बृज खंडेलवाल द्वारा

29 अप्रैल 2026

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कहानी शुरू होती है एक मुस्कान से।

हाथ में तंबूरा, होंठों पर “नारायण, नारायण”, और आंखों में चमक, जैसे कोई राज़ अभी-अभी जन्मा हो।

नारद मुनि, देवताओं के बीच संवाददाता, ऋषियों के बीच सलाहकार, और कथाओं के भीतर वह चिंगारी, जो आग भी लगाती है और उजाला भी करती है। उन्हें यूँ ही “ब्रह्मांड का पहला पत्रकार” नहीं कहा जाता। वे खबर नहीं सुनाते, खबर बनाते हैं।

और कमाल देखिए, बिना तलवार उठाए, बिना युद्ध छेड़े।

सिर्फ शब्दों से।

नारद मुनि की असली ताकत उनका संवाद है। वे जानते हैं, कब क्या कहना है, किससे क्या छिपाना है, और किस बात में कितना “मसाला” डालना है। वे झूठ नहीं बोलते, बस सच को इस अंदाज़ में पेश करते हैं कि सामने वाला बेचैन हो उठे। एक आधा-सच, एक हल्की चिंगारी, और फिर घटनाओं की ऐसी श्रृंखला शुरू होती है, जिसे रोकना किसी के बस में नहीं रहता।

राजा को धैर्य की सलाह भी इस तरह देंगे कि वह घबरा जाए।

देवी को किसी और के गहनों की तारीफ इस तरह बताएंगे कि तुलना की आग सुलग उठे।

ये शरारत नहीं, रणनीति है।

नारद मुनि उस “पुश-नोटिफिकेशन” की तरह हैं, जो समय पर आकर पूरी कहानी का रुख बदल देता है। वे सिर्फ संदेशवाहक नहीं, वे उत्प्रेरक हैं, कहानी को धक्का देने वाले, पात्रों को आईना दिखाने वाले।

कभी-कभी वे अराजकता भी पैदा करते हैं।

लेकिन वह अराजकता अंधेरी नहीं होती; उसमें बदलाव की रोशनी छिपी होती है।

उनका मशहूर “नारायण, नारायण” सिर्फ एक जप नहीं, एक ढाल है। जैसे कोई मासूम बनकर कह रहा हो; “मैं तो बस कह गया, अब आप जानें।” और फिर वे किनारे बैठकर पूरे घटनाक्रम को ऐसे देखते हैं, जैसे कोई अनुभवी समीक्षक फिल्म का क्लाइमैक्स देख रहा हो।

यही कारण है कि कथाओं में नारद मुनि न तो खलनायक हैं, न ही नायक।

वे उस बीच की जगह पर खड़े हैं, जहां से कहानी जन्म लेती है।

बॉलीवुड ने भी इस किरदार की ताकत को जल्दी पहचान लिया।

हर पौराणिक फिल्म में एक ऐसा चरित्र चाहिए होता है, जो कहानी को आगे बढ़ाए, जो नायक को मुश्किल में डाले, ताकि वह कुछ सीख सके। नारद मुनि वही “इनसाइडर” हैं, जो हल्की सी ठोकर देकर नायक को रास्ता दिखाते हैं।

वे साज़िश नहीं रचते, वे परिस्थितियाँ गढ़ते हैं।

वे टकराव पैदा करते हैं, लेकिन उस टकराव से ही समाधान जन्म लेता है।

सोचिए, अगर नारद न होते, तो कितनी कथाएं अधूरी रह जातीं?

कितने प्रेम, कितनी ईर्ष्याएं, कितने युद्ध, शायद कभी घटित ही न होते।

उनकी सबसे बड़ी खासियत उनकी नीयत है।

वे उथल-पुथल मचाते हैं, पर अंत में संतुलन लाते हैं। वे रिश्तों को उलझाते हैं, ताकि वे और मजबूत बन सकें।

आज के दौर में, जब शब्द हथियार बन चुके हैं, नारद मुनि एक आईना भी हैं और चेतावनी भी।

वे बताते हैं, एक वाक्य, एक संकेत, एक अफवाह… कितना बड़ा तूफान खड़ा कर सकती है।

और फिर मुस्कुराते हुए याद दिलाते हैं, 

कभी-कभी, थोड़ा सा व्यवधान ही सबसे बड़ा सुधार लाता है।

नारद मुनि इसलिए अमर हैं।

क्योंकि वे हमें सिखाते हैं, कहानी चलाने के लिए,

थोड़ी शरारत…

और बहुत समझदारी चाहिए।