नाचने वाली से रियासत की मलिका तक: बेगम समरू की हैरतअंगेज़ दास्तान
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बृज खंडेलवाल द्वारा
17 जून 2026
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इतिहास कभी-कभी ऐसी कहानियां रचता है जिन पर यकीन करना मुश्किल हो जाता है। एक किशोरी नाचने वाली, जो हालात के थपेड़ों में बहती हुई सत्ता के गलियारों तक पहुंच जाए, हजारों सैनिकों की कमान संभाले, बादशाहों, मराठों और अंग्रेजों से बराबरी की बातचीत करे और लगभग छह दशक तक एक समृद्ध रियासत पर राज करे। यह कहानी है बेगम समरू की।
लगभग 1753 में फ़र्ज़ाना ज़ेब-उन-निसा के रूप में जन्मी इस महिला ने भारतीय इतिहास में वह मुकाम हासिल किया, जिसकी कल्पना भी उस दौर में किसी महिला के लिए आसान नहीं थी। मुगल साम्राज्य बिखर रहा था। मराठा शक्ति उभर रही थी। अंग्रेज अपनी जड़ें मजबूत कर रहे थे। ऐसे उथल-पुथल भरे दौर में बेगम समरू ने अपनी अक्ल, हिम्मत और सियासी दूरदर्शिता के बल पर खुद को स्थापित किया।
उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी तथा इतिहास शोधकर्ता राज गोपाल सिंह वर्मा अपनी पुस्तक "बेगम समरू का सच" में लिखते हैं, "यह एक साधारण-सी प्रतीत होने वाली नाचने वाली लड़की की असाधारण कहानी है, जिसने लगभग अट्ठावन वर्षों तक सरधना पर शासन किया।"
फ़र्ज़ाना की जिंदगी तब बदली जब उनकी मुलाकात यूरोपीय भाड़े के सैनिक वाल्टर रेनहार्ट समरू से हुई। रेनहार्ट एक साहसी लेकिन विवादास्पद सैनिक था, जिसने उत्तर भारत की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई थी। उसका उपनाम "सम्ब्रे" था, जो भारतीय बोलचाल में बदलकर "समरू" हो गया।
फ़र्ज़ाना और रेनहार्ट केवल जीवनसाथी नहीं बने, बल्कि राजनीतिक और सैन्य साझेदार भी बने। मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय ने रेनहार्ट को मेरठ के निकट सरधना की जागीर प्रदान की थी। यह उपजाऊ और समृद्ध इलाका था, जिससे अच्छी आय होती थी। धीरे-धीरे फ़र्ज़ाना भी प्रशासन और सैन्य मामलों में सक्रिय भूमिका निभाने लगीं।
4 मई 1778 को आगरा में वाल्टर रेनहार्ट की अचानक मृत्यु हो गई। बहुतों को लगा कि अब फ़र्ज़ाना का प्रभाव समाप्त हो जाएगा। लेकिन इतिहास ने दूसरा मोड़ लिया। फ़र्ज़ाना ने न केवल सरधना की जागीर संभाली, बल्कि लगभग चार हजार सैनिकों वाली प्रशिक्षित फौज की कमान भी अपने हाथों में ले ली। यही वह क्षण था जब वे "बेगम समरू" के रूप में उभरीं।
आगरा से बेगम समरू का रिश्ता बेहद गहरा था। राज गोपाल सिंह वर्मा के शोध के अनुसार, शाहगंज क्षेत्र में रेनहार्ट समरू का विशाल आवास और बाग था। आज उसके अवशेष इतिहास की खामोश कहानी सुनाते हैं। रेनहार्ट को पहले वहीं दफनाया गया और बाद में उनका मकबरा आगरा के रोमन कैथोलिक कब्रिस्तान में बनाया गया। यह मकबरा आज भी मौजूद है और उस दौर की याद दिलाता है।
बेगम समरू अक्सर आगरा आती थीं। उन्होंने चर्चों और धार्मिक संस्थानों को आर्थिक सहायता दी। शाहगंज और भोगीपुरा क्षेत्र में उनकी संपत्तियां थीं। उनके सौतेले पुत्र ज़फ़र याब खान का मकबरा भी आगरा में ही स्थित है। इस तरह आगरा उनके जीवन और विरासत का अहम हिस्सा बना रहा।
पति की मृत्यु के बाद बेगम समरू ने जिस कुशलता से सत्ता संभाली, वह अपने आप में अनोखी मिसाल है। उन्होंने मुगल दरबार से संबंध बनाए रखे। मराठा सरदार महादजी सिंधिया के साथ भी उनके मधुर संबंध रहे। दूसरी ओर अंग्रेज ईस्ट इंडिया कंपनी से भी टकराव के बजाय समझदारी भरा व्यवहार किया। यही संतुलन उनकी सबसे बड़ी ताकत बना।
राज गोपाल सिंह वर्मा अपनी पुस्तक में बताते हैं कि बेगम समरू केवल नाम की शासक नहीं थीं। वे फैसले स्वयं लेती थीं, सैन्य अभियानों का नेतृत्व करती थीं और राजनीतिक रणनीतियां तैयार करती थीं। उस दौर में जब महिलाओं को सार्वजनिक जीवन से दूर रखा जाता था, बेगम समरू सत्ता के केंद्र में खड़ी दिखाई देती हैं।
1781 में उन्होंने ईसाई धर्म स्वीकार किया और जोआना नोबिलिस समरू नाम धारण किया। हालांकि धर्म परिवर्तन के बाद भी उन्होंने स्थानीय संस्कृति और परंपराओं से दूरी नहीं बनाई। उनकी पहचान भारतीय और यूरोपीय प्रभावों के अद्भुत संगम के रूप में बनी रही।
उनकी सबसे बड़ी धरोहरों में से एक है सरधना का भव्य चर्च, बेसिलिका ऑफ आवर लेडी ऑफ ग्रेसेज़। 1829 में पूर्ण हुआ यह चर्च उत्तर भारत के सबसे सुंदर और विशाल गिरजाघरों में गिना जाता है। इसके अलावा उन्होंने आगरा, कलकत्ता, बंबई और मद्रास के चर्चों को भी उदारतापूर्वक सहायता दी। सड़कें, भवन, बाग और जनकल्याण के अनेक कार्य उनके शासनकाल की पहचान बने।
हालांकि उनका जीवन संघर्षों से मुक्त नहीं था। उन्हें अपने ही परिवार से विरोध झेलना पड़ा। एक समय ऐसा भी आया जब उनके सौतेले पुत्र ने उन्हें सत्ता से हटाकर नजरबंद कर दिया। लेकिन उनकी लोकप्रियता और प्रभाव इतने मजबूत थे कि वे फिर सत्ता में लौट आईं। इस वापसी में महादजी सिंधिया और उनके अन्य सहयोगियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
बेगम समरू के जीवन से जुड़ी अनेक किंवदंतियां भी प्रचलित हैं। कुछ कथाएं उन्हें बेहद कठोर और निर्मम शासक के रूप में पेश करती हैं। लेकिन राज गोपाल सिंह वर्मा स्पष्ट करते हैं कि ऐसी कई कहानियां लोककथाओं और अफवाहों पर आधारित हैं। उनके समर्थन में ठोस ऐतिहासिक प्रमाण बहुत कम मिलते हैं। इसलिए इतिहास और किंवदंती के बीच अंतर करना जरूरी है।
27 जनवरी 1836 को सरधना में बेगम समरू का निधन हो गया। उन्हें उसी भव्य चर्च में दफनाया गया जिसे उन्होंने स्वयं बनवाया था। उनके निधन के साथ भारतीय इतिहास का एक अनोखा अध्याय समाप्त हुआ।
अपनी 272 पृष्ठों की पुस्तक "बेगम समरू का सच" में राज गोपाल सिंह वर्मा लिखते हैं, "यह पुस्तक पाठकों को बेगम समरू और उनके पति वाल्टर रेनहार्ट समरू के जीवन की उस ऐतिहासिक यात्रा से परिचित कराती है, जिसने उत्तर भारत की राजनीति को गहरे स्तर पर प्रभावित किया।"
वास्तव में, बेगम समरू की कहानी केवल एक महिला शासक की कहानी नहीं है। यह साहस, महत्वाकांक्षा, कूटनीति और नेतृत्व की कहानी है। यह उस महिला की दास्तान है जिसने अपने समय की सभी सामाजिक सीमाओं को तोड़ा और इतिहास में अपना नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज कराया। मुगल साम्राज्य के पतन और अंग्रेजी सत्ता के उदय के बीच चमकता हुआ यह सितारा आज भी इतिहास प्रेमियों को आकर्षित करता है और याद दिलाता है कि असाधारण लोग अक्सर साधारण परिस्थितियों से ही जन्म लेते हैं।