गांधी तो मर गए, पर उनके सवाल जिंदा हैं
क्या हिंसा, लालच और तपती ज़मीन से जूझती यह दुनिया महात्मा गांधी को अनदेखा कर सकती है?
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बृज खंडेलवाल द्वारा
1 अक्टूबर, 2026
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वर्तमान दौर के भारत में महात्मा गांधी आउट ऑफ फैशन हैं। ये अलग बात है कि विदेशों में भारत की पहचान महात्मा गांधी से ही है। विदेशी मेहमानों को आज भी सबसे पहले राज घाट स्मारक पर ले जाया जाता है।
तो क्या गांधी गलत थे, या दुनिया के लालची इरादे ही सही थे?
वह आदमी जिसने लाठी हाथ में लेकर नहीं बल्कि अहिंसा की ताकत दिखाकर रास्ता बताया था, आज की मिसाइलों, परमाणु हथियारों, लड़ाकू विमानों और अरबों डॉलर की दौलत वाली दुनिया में अजीब लगने लगा है। उनका चरखा अब स्मार्टफोन से बदल गया है, चिट्ठियों की जगह व्हाट्सऐप ने ले ली है, और सादगी के बदले “ज्यादा पाने, ज्यादा दिखाने” की होड़ लगी है।
फिर भी विडंबना देखिए: जितनी तेजी से दुनिया आधुनिक हो रही है, उतनी ही बेचैनी से उसे गांधी के मूल्यों की ज़रूरत महसूस हो रही है।
दुनिया बाहर और अंदर दोनों तरह से जल रही है। ग्लोबल वार्मिंग मौसम बदल रही है। युद्ध शहरों को खंडहर बना रहे हैं। नफ़रत आतंक को ताकत दे रही है। असमानता बढ़ रही है, जबकि कुछ लोग अकूत दौलत जमा कर रहे हैं। करोड़ों लोग तनाव और अकेलेपन से जूझ रहे हैं, और सोशल मीडिया पर फ़रेब और शोर के पिरामिड खड़े हो रहे हैं।
इन सब के बीच गांधी एक असुविधाजनक सवाल पूछते दिखते हैं: आखिर कितना काफ़ी है?
गांधी का दर्शन सिर्फ़ चरखा, उपवास या अंग्रेजों के ख़िलाफ़़ लड़ाई नहीं था। उसके बीच में थे सत्य, अहिंसा, आत्मसंयम, सादगी, निर्भीकता, समानता, स्थानीय आत्मनिर्भरता और हर इंसान के इज़्ज़त का ख़्याल।
उनके व्रतों में सत्य और अहिंसा सबसे आगे थे; साथ में अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य (इंद्रिय संयम), अपरिग्रह (ज़रूरत से ज़्यादा न जमा करना), शरीरिक श्रम, स्वाद पर क़ाबू, सभी धर्मों का इज़्ज़त और अस्पृश्यता का उन्मूलन भी शामिल था।
पहली नज़र में ये किसी आश्रम के नियम लग सकते हैं। पर सोचिये: क्या यह सभ्य समाज के लिए भी ज़रूरी नहीं है, जो अपनी ही बनाई समस्याओं के दल दल में फँसता जा रहा है?
सत्य की बात लीजिए। जब राजनीति में प्रचार-प्रपंच और झूठ बढ़ जाए, विज्ञापन हमारी ज़रूरतों को इच्छाओं में बदल दें और झूठ सच से तेज़ी से फैले, तो गांधी का सत्य बहुत आधुनिक लगता है।
अहिंसा को देखिए। जब किसी राष्ट्र के पास लाखों लोगों को नष्ट करने की ताकत हो, तब गांधी का सवाल और भी ज़्यादा चुनौती देता है, क्या हिंसा से स्थायी शांति मिल सकती है?
गांधी का उत्तर था सत्याग्रह: सत्य की ताकत, अहिंसक प्रतिरोध, सविनय अवज्ञा और आत्मबल: दोषी को मिटाने की बजाय उसके अंदर की समझ को जगाना। आज की बदले की राजनीति में यह विचार सबसे कठिन और शायद सबसे ज़रूरी है। हम किसी ग़लती पर उसे गलत से ज़्यादा बदले में टुकड़े करना चाहते हैं, और इसे हम रणनीति कह देते हैं। गांधी इसे जाल कहते थे।
आर्थिक सोच में भी गांधी आज के उपभोक्तावादी तंत्र को बेचैन करते हैं। उन्होंने कहा कि अर्थशास्त्र को नैतिकता से अलग नहीं रखा जा सकता। ज़्यादा दौलत रखने वाले को इसे समाज की अमानत समझना चाहिए, यही उनका ट्रस्टिशिप सिद्धांत था। सर्वोदय का मतलब सबका कल्याण, पर शुरुआत सबसे कमज़ोर से।
उनका यह वाक्य शायद हर कंपनी की दीवार पर होना चाहिए:
“धरती हर व्यक्ति की ज़रूरतें पूरी करने के लिये काफ़ी है, पर हर व्यक्ति के लालच के लिये नहीं।”
जलवायु संकट ने इस बात को और कड़ा कर दिया है। हम ज़्यादा खोदते हैं, ज़्यादा बनाते हैं, ज़्यादा फेंकते हैं, और आश्चर्य करते हैं कि धरती हांफ क्यों रही है। हमने उपभोग को सफलता का पैमाना बना लिया है। गांधी पूछते, क्या हमारी यह सफलता धीरे-धीरे हमारी विफलता बन रही है?
उनका अपरिग्रह हमें यह नहीं कहता कि आधुनिकता छोड़ दो; वह बस पूछता है: क्या हर इच्छा को खरीदकर पूरा करना ज़रूरी है? उनका स्वदेशी दरवाज़े बंद करने की बात नहीं करता था, बल्कि स्थानीय हुनर और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने की सलाह देता था। और शरीर श्रम यह सिखाता था कि इज़्ज़त सिर्फ़ कुर्सी पर बैठे लोगों की बात नहीं है।
शायद आज गांधी की सबसे बड़ी चुनौती हमारी अपनी ज़िन्दगी है:
क्या हम कम ख़पत कर सकते हैं? कम नफ़रत? कम भंडार? कम डर? ज़्यादा सुनना? ज़्यादा बाँटना?
आधुनिक सभ्यता ने अद्भुत ताकत पा ली है, पर आत्मसंयम खो रहा है। हम दूसरे ग्रह भेज सकते हैं, पर अपना गुस्सा काबू में लाना अब भी मुश्किल लगता है। हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बना रहे हैं, पर मानवीय पारखी समझ तलाश रहे हैं। यही गांधी की विडंबना है: दूरियाँ घट गईं, मगर नफ़रत नहीं; परमाणु हासिल कर लिए, पर क्रोध नहीं; बीमारी से लड़ लिए, पर लालच पर जीत नहीं।
तो क्या गांधीवाद अप्रासंगिक है? नहीं।
दुनिया को गांधी की पूजा करने की ज़रूरत नहीं, न ही उनकी मूर्ति पर सवाल उठाना पाप घोषित करने की। ज़रूरत है उन असुविधाजनक सवालों को सुनने की जो गांधी ने छोड़े हैं:
- अगर धरती रहने लायक ही न रहे तो विकास का क्या मतलब?
- अगर करोड़ों लोग पीछे छूट जाएँ तो समृद्धि किस काम की?
- अगर शांति के नाम पर हमेशा युद्ध की तैयारी करनी पड़ी तो वह शांति कैसी?
- अगर डर हमारे फ़ैसले तय करने लगे तो आज़ादी कैसी?
- और अगर खुश रहने के लिये हमें लगातार और खरीदारी करनी पड़े तो यह कैसी सभ्यता है?
गांधी ने कोई जादू की छड़ी नहीं दी थी। उन्होंने एक मुश्किल चीज दी थी: नैतिक दिशा-निर्देश। दुनिया गांधी को अनदेखा कर सकती है: यह उसका हक़ है। मगर सत्य, संयम, करुणा और अहिंसा की अनदेखी करने के नतीजों से बचना सम्भव नहीं।