दिल्ली-हरियाणा की गंदगी का बोझ, भुगत रहे आगरा और ब्रज मंडल
यमुना कब तक राजधानी और उसके पड़ोसी राज्यों का सीवर बनी रहेगी?
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बृज खंडेलवाल द्वारा
3 अगस्त 2026
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नदियाँ कभी सरहदें नहीं मानतीं। वे जीवन, संस्कृति और सभ्यता को एक जगह से दूसरी जगह ले जाती हैं। लेकिन जब कोई शहर या राज्य अपनी गंदगी नदी में उड़ेल देता है, तो वह ज़हर भी सीमाएँ नहीं मानता। वह भी बहते-बहते दूर तक पहुँचता है। आज यमुना इसी राष्ट्रीय शर्म की सबसे बड़ी मिसाल बन गई है।
हाल ही में तमिलनाडु ने कर्नाटक पर आरोप लगाया कि बेंगलुरु का सीवर मिला पानी लगातार दक्षिण पिनाकिनी (थेनपेन्नई) नदी में छोड़ा जा रहा है। जल परीक्षण में भारी जैविक प्रदूषण, अमोनिया, फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया और रासायनिक कचरे की पुष्टि हुई। तमिलनाडु ने न केवल सख़्त एतराज़ जताया, बल्कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) से तत्काल दख़ल देने की मांग भी की।
सवाल है, जब दक्षिण भारत की एक नदी के लिए इतना शोर उठ सकता है, तो यमुना के लिए यह ख़ामोशी क्यों?
यमुना दिल्ली पहुँचने से पहले ही हरियाणा में बीमार हो चुकी होती है। हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आँकड़े बताते हैं कि राज्य के 11 बड़े नाले लगातार गंदगी यमुना में उँडेल रहे हैं। इनमें पानीपत-सोनीपत का ड्रेन नंबर-6, फरीदाबाद का बुढ़िया नाला, बल्लभगढ़-पालवल का गौंछी ड्रेन और गुरुग्राम के कई बड़े ड्रेन शामिल हैं।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि हरियाणा से यमुना में पहुँचने वाले प्रदूषण का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा अकेला गुरुग्राम छोड़ता है। पानीपत और सोनीपत में हर दिन लगभग 42 मिलियन लीटर अनुपचारित सीवेज नदी में जा रहा है। फरीदाबाद की अवैध डाइंग इकाइयाँ रासायनिक और रंगीन कचरा खुलेआम बुढ़िया नाले में छोड़ती हैं। बल्लभगढ़ और पलवल से भी बिना शोधन का सीवेज सीधे यमुना में गिरता है।
दिल्ली पहुँचते-पहुँचते हालात और बदतर हो जाते हैं। वज़ीराबाद से ओखला तक केवल 22 किलोमीटर का हिस्सा यमुना के लिए सबसे बड़ा अभिशाप बन चुका है। नजफ़गढ़ नाला समेत कई बड़े नाले रोज़ करोड़ों लीटर सीवेज और औद्योगिक कचरा नदी में गिराते हैं। दिल्ली जल बोर्ड के ताज़ा अनुमान बताते हैं कि इन नालों का प्रवाह पहले के आकलन से कहीं अधिक है। नतीजा यह है कि कई स्थानों पर पानी में घुली ऑक्सीजन शून्य हो जाती है और फीकल कोलीफॉर्म सुरक्षित सीमा से सैकड़ों गुना ऊपर पहुँच जाता है। यहाँ यमुना नदी नहीं, एक बदहाल नाला दिखाई देती है।
सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि दिल्ली और हरियाणा की यह साझा गंदगी नीचे आगरा, मथुरा, वृंदावन और पूरे ब्रज मंडल के हिस्से आती है। ऊपर वालों की लापरवाही, नीचे रहने वालों की सज़ा बन जाती है।
आगरा केवल एक शहर नहीं, ताजमहल का नगर है। यह विश्व धरोहर और भारत की पहचान है। लेकिन ताजमहल के सामने बहने वाली यमुना अब जीवन नहीं, बीमारियाँ लेकर आती है। ज़हरीला पानी भूजल को दूषित कर रहा है। जलीय जीव समाप्त हो रहे हैं। नदी का प्राकृतिक प्रवाह दम तोड़ रहा है। एक मृतप्राय नदी के किनारे दुनिया की सबसे खूबसूरत इमारत भी उदास दिखाई देती है।
इस पूरे संकट में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की भूमिका भी कठघरे में है। उनका काम केवल पानी की जाँच करना नहीं, बल्कि प्रदूषण रोकना भी है। यदि दशकों से यमुना की यही हालत है, तो सवाल उठना लाज़िमी है कि प्रभावी कार्रवाई अब तक क्यों नहीं हुई? क्या रिपोर्टें केवल फाइलों की ज़ीनत बढ़ाने के लिए बनती हैं? क्या कानून सिर्फ़ छोटे लोगों पर लागू होते हैं? बड़े शहरों, उद्योगों और सरकारी एजेंसियों पर नहीं?
हरियाणा सरकार ने 2027 तक बिना शोधन के पानी को पूरी तरह रोकने और नालों के बीओडी स्तर को 10 मिलीग्राम प्रति लीटर से नीचे लाने का लक्ष्य रखा है। नए एसटीपी, सीईटीपी और ड्रेन टैपिंग की योजनाएँ भी बनाई गई हैं। दिल्ली सरकार भी सीवेज शोधन क्षमता बढ़ाने के दावे कर रही है।
लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और ही कहानी कहती है। पानीपत, फरीदाबाद, गुरुग्राम, बल्लभगढ़ और पलवल से प्रदूषण आज भी लगातार यमुना में पहुँच रहा है। अवैध इकाइयाँ फिर से चालू हो जाती हैं और नालों में सीधा डिस्चार्ज रुकने का नाम नहीं लेता।
यमुना किसी एक राज्य की जागीर नहीं है। यह करोड़ों लोगों की जीवनरेखा है। संविधान हर नागरिक को स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार देता है। फिर आगरा और ब्रज के लोगों को प्रदूषित पानी क्यों मिले? ब्रज की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को इस लापरवाही की क़ीमत क्यों चुकानी पड़े?
अब वक़्त आ गया है कि दिल्ली और हरियाणा दोनों सरकारें अपनी साझा ज़िम्मेदारी स्वीकार करें। राजधानी और उसके औद्योगिक शहरों का विकास तभी मायने रखेगा, जब उसकी गंदगी दूसरे राज्यों की तक़दीर न बने। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य बोर्डों को भी अपनी निष्क्रियता छोड़नी होगी। केवल नोटिस जारी करना या नए लक्ष्य घोषित करना काफ़ी नहीं है। दोषी एजेंसियों और उद्योगों पर सख़्त कार्रवाई होनी चाहिए। यह सुनिश्चित किया जाए कि बिना शोधन का एक भी लीटर सीवेज या औद्योगिक कचरा यमुना में न गिरे।
यमुना सिर्फ़ पानी की धारा नहीं, हमारी सभ्यता की धड़कन है। यदि हम इसे बचाने में नाकाम रहे, तो इतिहास यह नहीं पूछेगा कि कितनी योजनाएँ बनीं या कितने वादे किए गए। वह सिर्फ़ इतना लिखेगा कि एक राष्ट्र अपनी सबसे पवित्र नदियों में से एक को दिल्ली, फरीदाबाद, पानीपत, गुरुग्राम, बल्लभगढ़ और पलवल के सीवर में बदलने से नहीं बचा सका। यही हमारी सबसे बड़ी पर्यावरणीय और नैतिक नाकामी होगी।