Wednesday, April 29, 2026

 आओ डांस करें

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नृत्य दिवस, 29 अप्रैल

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सीटी, पायल और सिनेमा: जब बॉलीवुड ने नृत्य को दी नई ज़िंदगी

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सीटी बजाती रेल दूर अंधेरे में गुम हो रही है। धुएं की लकीर हवा में तैरती है। कोठे की रोशनी में पायल छनकती है, और मीना कुमारी धीमे-धीमे थिरक उठती हैं।

पाकीज़ा का “यूँ ही कोई मिल गया था”: यह सिर्फ एक गीत नहीं, दर्द, नज़ाकत और तड़प का नृत्य है। जैसे हर कदम में एक अधूरी मोहब्बत सांस ले रही हो।

यहीं से समझ आता है; नृत्य केवल शरीर की गति नहीं, आत्मा की अभिव्यक्ति है।

इंसान नाचता है, जब खुशी छलकती है। और तब भी, जब भीतर कुछ टूटता है।

भारत में नृत्य भक्ति है, साधना है, तड़पन है, विरक्ति है। तांडव डराता है, रास लीला लुभाती है। हर नृत्य का रंग  गहरा है। नृत्य जीवन का हिस्सा है। और इस जीवन को सबसे ज्यादा गति, सबसे ज्यादा ऑक्सीजन, अगर किसी ने दी है, तो वह है बॉलीवुड, जहां हर कदम कहानी कहता है, हर थिरकन में भाव है, संदेश है। बॉलीवुड  में हर इशारा एक संवाद है। हर ठुमका एक कथानक।

फिल्म दिल से का “छैयां छैयां”, चलती ट्रेन पर शाहरुख खान का नृत्य, सिनेमा की सबसे साहसी कल्पनाओं में से एक है।

वहीं देवदास का “ढोला रे ढोला”, माधुरी दीक्षित और ऐश्वर्या राय के साथ शास्त्रीय सौंदर्य की जीवंत तस्वीर बन जाता है।

बॉलीवुड ने नृत्य को सिर्फ दिखाया नहीं, उसे जिया है, उसे कहानी का हिस्सा बनाया है। शास्त्रीय और लोक को नई सांस दी है।

एक समय था जब भरतनाट्यम, कथक और ओडिसी मंदिरों और विशेष मंचों तक सीमित थे।

फिल्मों ने इन्हें घर-घर पहुंचाया। अब ये सिर्फ परंपरा नहीं, लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा हैं।

लोक नृत्य भी फिल्मों में खिल उठे। घूमर, गरबा और भांगड़ा; इनकी मिट्टी की खुशबू अब दुनिया भर में महसूस होती है।

पद्मावत का घूमर हो या बाजीराव मस्तानी का “पिंगा”, बॉलीवुड ने लोक को ग्लैमर और पहचान दी।

भावनाओं का सबसे सच्चा रूप होता है नृत्य। नृत्य तब जन्म लेता है जब शब्द कम पड़ जाते हैं।

एक दूजे के लिए में कमल हासन का नृत्य, गुस्से और हताशा का विस्फोट है। हर हरकत में बेचैनी है।

वहीं गाइड में वहीदा रहमान का “आज फिर जीने की तमन्ना”, जैसे आत्मा को आज़ादी मिल गई हो।

बॉलीवुड ने इन भावनाओं को दृश्य बना दिया। उन्हें एक चेहरा दिया, एक लय दी।

और आजकल, कंटेंपरेरी शैलियां तो कमाल कर रही हैं।

बॉलीवुड नृत्य की सबसे बड़ी ताकत है उसका फ्यूजन।

यह परंपरा और आधुनिकता का संगम है, जहां कथक के चक्कर, भरतनाट्यम की मुद्राएं और लोक की ऊर्जा, ट्विस्ट, रॉक एंड रोल और हिप-हॉप के साथ मिलकर कुछ नया रचते हैं। मिथुन दा का डिस्को डांसर एक नए युग का आगाज था। 

तेज़ाब का “एक दो तीन”, इस फ्यूजन का क्लासिक उदाहरण है।

और आरआरआर का “नाटू नाटू”, जिसने ऑस्कर जीतकर दुनिया को भारतीय नृत्य की ताकत दिखाई।

टीवी शो जैसे डांस इंडिया डांस ने इस क्रांति को और गति दी। अब हर गली, हर शहर से नर्तक उभर रहे हैं।

नृत्य जो कभी थमता नहीं

बॉलीवुड ने नृत्य को सिर्फ मंच नहीं दिया, उसे जीवन दिया।

हर फिल्म, हर गीत, एक नई सांस है, एक नया विस्तार।

और शायद यही इसकी सबसे बड़ी खूबसूरती है; यह बदलता है, लेकिन अपनी जड़ों को नहीं छोड़ता। जब भी कहीं संगीत बजता है, जब भी दिल में कोई लहर उठती है; नृत्य जन्म लेता है। क्योंकि नृत्य…सिर्फ देखा नहीं जाता, महसूस किया जाता है।

Tuesday, April 28, 2026

 जामनगर दूर गुजरात में है, पर जाम-ए-फजीहत ताज नगरी में!

लाइफ इन आगरा,  अपनी ही सड़कों में कैद

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

29 अप्रैल 2026

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ताज की चमक धुंधली क्यों है? जवाब हवा में नहीं, सड़कों पर अटका है। आगरा आज किसी शहर से ज़्यादा एक लंबा, अंतहीन जाम लगता है; जहाँ समय भी रेड लाइट पर खड़ा-खड़ा दम तोड़ देता है।

यह वही शहर है जहाँ कभी तांगे की टापें थीं, जहाँ सफर का मतलब सुकून था। आज वही आगरा अपनी ही रफ्तार के बोझ तले कराह रहा है। ताज महल की परछाई में खड़ा यह शहर अब पर्यटकों को इतिहास नहीं, हताशा का अनुभव देता है।

पाँच मिलियन से ऊपर जाती आबादी। बीस लाख से ज्यादा वाहन। ऊपर से एक्सप्रेसवे का ट्रैफिक। नतीजा? शहर नहीं, धड़कन रुकती हुई एक मशीन।

एमजी रोड से लेकर भगवान टॉकीज चौराहा। यमुना किनारा रोड से सुल्तानगंज पुलिया। हर रास्ता एक ही कहानी कहता है: “आगे जाम है।” यह जाम अब अस्थायी समस्या नहीं, स्थायी पहचान बन चुका है।

और यह सिर्फ गाड़ियों का जमावड़ा नहीं। यह समय की चोरी है। रोज़ाना की लूट।

स्कूल के बच्चे बसों में बैठकर धुएँ को फेफड़ों में भरते हैं। ऑफिस जाने वाले लोग अपनी आधी ऊर्जा सड़क पर ही गंवा देते हैं। एक किलोमीटर का सफर, आधे घंटे का संघर्ष बन जाता है।

विडंबना देखिए। आगरा को आधुनिक बनाने के लिए बनाए गए यमुना एक्सप्रेसवे और Agra–Lucknow Expressway अब शहर के लिए आफत बन गए हैं। ये हाई-स्पीड रास्ते ट्रैफिक को सीधे शहर के दिल में उगल देते हैं, उस दिल में जो पहले ही बीमार है।

समस्या सिर्फ गाड़ियों की संख्या नहीं है। समस्या सोच की है।

शहर की सड़कों को इंसानों के लिए नहीं, मशीनों के लिए डिजाइन किया गया। फुटपाथ? या तो हैं ही नहीं, या फिर दुकानों और ठेलों के कब्जे में हैं। पैदल चलना यहाँ साहस का काम है।

और अगर आप साइकिल चला रहे हैं, तो खुद को भाग्यशाली समझिए अगर घर सुरक्षित लौट आएं।

इस अराजकता में ट्रैफिक प्लानिंग मज़ाक बन चुकी है। कहीं भी यू-टर्न। कहीं भी कट। कोई स्पष्ट वन-वे सिस्टम नहीं। हर मोड़ एक जाल है, हर चौराहा एक जंग का मैदान।

ऊपर से “पार्किंग संस्कृति”।

गाड़ी खरीदना आसान। उसे रखने की जगह? कोई पूछने वाला नहीं। सड़कें अब सार्वजनिक नहीं रहीं। वे निजी गैरेज बन चुकी हैं।

और जब व्यवस्था की बात आती है, तो तस्वीर और भयावह हो जाती है।

चौराहों पर पुलिस गायब। जहाँ है, वहाँ व्यस्त, मोबाइल स्क्रीन में। ट्रैफिक खुद को संभालने के लिए छोड़ दिया गया है, जैसे कोई अनाथ बच्चा।

इस शहर की त्रासदी यहीं खत्म नहीं होती।

यहाँ ट्रैफिक सिर्फ इंसानों का नहीं है। बंदर, कुत्ते, गाय: सब सड़क के खिलाड़ी हैं। नियम? किसी के लिए नहीं। पैदल चलने वाला नागरिक दोहरी मार झेलता है; एक तरफ बेकाबू गाड़ियाँ, दूसरी तरफ अनियंत्रित जानवर।

बुजुर्गों के लिए यह शहर अब डर का पर्याय बन गया है। बिना गाड़ी के निकलना, जैसे किसी युद्ध क्षेत्र में प्रवेश करना।

सबसे बड़ा दोषी कौन? जवाब भी उतना ही उलझा हुआ है जितना ट्रैफिक।

नगर निगम, विकास प्राधिकरण, टीटीजेड: हर संस्था अपनी दिशा में खींच रही है। कोई एकीकृत योजना नहीं। कोई स्पष्ट नेतृत्व नहीं। परिणाम: नीतिगत लकवा।

शहर की सड़कों पर जो अराजकता दिखती है, वह दरअसल प्रशासनिक विफलता का आईना है।

और इस सबके बीच, सबसे बड़ा सवाल खड़ा है: क्या आगरा सिर्फ कारों के लिए जिएगा या इंसानों के लिए?

आज प्राथमिकता गाड़ियों को दी जा रही है। इंसान पीछे छूट गया है।

पैदल चलने वाला, साइकिल चलाने वाला; ये इस शहर के “अदृश्य नागरिक” बन चुके हैं।

अगर यही हाल रहा, तो आगरा सिर्फ जाम का शहर बनकर रह जाएगा, जहाँ इतिहास धुएँ में घुटता है और भविष्य हॉर्न की आवाज़ में खो जाता है।

समाधान क्या है?

पहला कदम: सोच बदलना। ट्रैफिक नहीं, मोबिलिटी की बात करनी होगी।

फुटपाथ वापस लेने होंगे। पब्लिक ट्रांसपोर्ट को मजबूत करना होगा।

गाड़ियों पर नियंत्रण। पार्किंग नियम सख्त।

और सबसे जरूरी, इंसान को केंद्र में रखना होगा। क्योंकि शहर गाड़ियों से नहीं बनते। शहर लोगों से बनते हैं।

 ब्रह्मांड का लोकप्रिय संत: नारद मुनि की लीला और हलचल की राजनीति

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बृज खंडेलवाल द्वारा

29 अप्रैल 2026

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कहानी शुरू होती है एक मुस्कान से।

हाथ में तंबूरा, होंठों पर “नारायण, नारायण”, और आंखों में चमक, जैसे कोई राज़ अभी-अभी जन्मा हो।

नारद मुनि, देवताओं के बीच संवाददाता, ऋषियों के बीच सलाहकार, और कथाओं के भीतर वह चिंगारी, जो आग भी लगाती है और उजाला भी करती है। उन्हें यूँ ही “ब्रह्मांड का पहला पत्रकार” नहीं कहा जाता। वे खबर नहीं सुनाते, खबर बनाते हैं।

और कमाल देखिए, बिना तलवार उठाए, बिना युद्ध छेड़े।

सिर्फ शब्दों से।

नारद मुनि की असली ताकत उनका संवाद है। वे जानते हैं, कब क्या कहना है, किससे क्या छिपाना है, और किस बात में कितना “मसाला” डालना है। वे झूठ नहीं बोलते, बस सच को इस अंदाज़ में पेश करते हैं कि सामने वाला बेचैन हो उठे। एक आधा-सच, एक हल्की चिंगारी, और फिर घटनाओं की ऐसी श्रृंखला शुरू होती है, जिसे रोकना किसी के बस में नहीं रहता।

राजा को धैर्य की सलाह भी इस तरह देंगे कि वह घबरा जाए।

देवी को किसी और के गहनों की तारीफ इस तरह बताएंगे कि तुलना की आग सुलग उठे।

ये शरारत नहीं, रणनीति है।

नारद मुनि उस “पुश-नोटिफिकेशन” की तरह हैं, जो समय पर आकर पूरी कहानी का रुख बदल देता है। वे सिर्फ संदेशवाहक नहीं, वे उत्प्रेरक हैं, कहानी को धक्का देने वाले, पात्रों को आईना दिखाने वाले।

कभी-कभी वे अराजकता भी पैदा करते हैं।

लेकिन वह अराजकता अंधेरी नहीं होती; उसमें बदलाव की रोशनी छिपी होती है।

उनका मशहूर “नारायण, नारायण” सिर्फ एक जप नहीं, एक ढाल है। जैसे कोई मासूम बनकर कह रहा हो; “मैं तो बस कह गया, अब आप जानें।” और फिर वे किनारे बैठकर पूरे घटनाक्रम को ऐसे देखते हैं, जैसे कोई अनुभवी समीक्षक फिल्म का क्लाइमैक्स देख रहा हो।

यही कारण है कि कथाओं में नारद मुनि न तो खलनायक हैं, न ही नायक।

वे उस बीच की जगह पर खड़े हैं, जहां से कहानी जन्म लेती है।

बॉलीवुड ने भी इस किरदार की ताकत को जल्दी पहचान लिया।

हर पौराणिक फिल्म में एक ऐसा चरित्र चाहिए होता है, जो कहानी को आगे बढ़ाए, जो नायक को मुश्किल में डाले, ताकि वह कुछ सीख सके। नारद मुनि वही “इनसाइडर” हैं, जो हल्की सी ठोकर देकर नायक को रास्ता दिखाते हैं।

वे साज़िश नहीं रचते, वे परिस्थितियाँ गढ़ते हैं।

वे टकराव पैदा करते हैं, लेकिन उस टकराव से ही समाधान जन्म लेता है।

सोचिए, अगर नारद न होते, तो कितनी कथाएं अधूरी रह जातीं?

कितने प्रेम, कितनी ईर्ष्याएं, कितने युद्ध, शायद कभी घटित ही न होते।

उनकी सबसे बड़ी खासियत उनकी नीयत है।

वे उथल-पुथल मचाते हैं, पर अंत में संतुलन लाते हैं। वे रिश्तों को उलझाते हैं, ताकि वे और मजबूत बन सकें।

आज के दौर में, जब शब्द हथियार बन चुके हैं, नारद मुनि एक आईना भी हैं और चेतावनी भी।

वे बताते हैं, एक वाक्य, एक संकेत, एक अफवाह… कितना बड़ा तूफान खड़ा कर सकती है।

और फिर मुस्कुराते हुए याद दिलाते हैं, 

कभी-कभी, थोड़ा सा व्यवधान ही सबसे बड़ा सुधार लाता है।

नारद मुनि इसलिए अमर हैं।

क्योंकि वे हमें सिखाते हैं, कहानी चलाने के लिए,

थोड़ी शरारत…

और बहुत समझदारी चाहिए।

 

Monday, April 27, 2026

 ग्रीन से ब्राऊन हो रही ब्रज भूमि!

काग़ज़ी जंगलों के साए में सुलगता भारत

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बृज खंडेलवाल द्वारा

28 अप्रैल 2026

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श्री कृष्ण राधा की लीलाभूमि हरे से भूरी, काली, क्यों हो रही है? पक्षियों का कलरव बेसुरा क्यों लग रहा है? नदी, तालाब, कुएं गुमसुम क्यों हैं?

सुबह की पहली रोशनी जब यमुना के खामोश सतह पर या सूर सरोवर (कीठम झील) पर उतरती है, तो पानी में अजीब सी बेचैनी की कशिश का एहसास होता है। पक्षियों की आवाज़ें कम हैं, पेड़ों की छाँव पतली है, और हवा में एक अदृश्य घुटन है। दूर से सब हरा दिखता है। पास जाइए तो हरियाली के भीतर एक धीमी तबाही साँस ले रही होती है। यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं। यह इंसानी उदासीनता का दस्तावेज़ है; हरे काग़ज़ पर लिखा हुआ, मगर ज़मीन पर जलता हुआ।

जब पर्यावरणविद् डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य ने इस क्षेत्र से विलायती बबूल हटाने की माँग को लेकर  कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया, तो उन्होंने केवल एक पौधे का सवाल नहीं उठाया। उन्होंने उस सुस्त, सुन्न और सुविधाजनक शासन-व्यवस्था को कटघरे में खड़ा किया, जिसने एक विदेशी आक्रामक प्रजाति को हमारी सबसे संवेदनशील आर्द्रभूमियों में जड़ें जमाने दीं। सालों तक सब देखते रहे। कोई हिला नहीं। एक नागरिक अदालत पहुँचा, तब आशा है कहीं फाइलें खुलेगी, सवाल पूछे जाएंगे, और शायद एक्शन भी होगा।

विलायती बबूल, नाम भले विदेशी लगे, इसका असर विनाशकारी है। यह पेड़ नहीं, एक पारिस्थितिक हमलावर है। यह भूजल को बेरहमी से खींचता है, देशी पौधों को दबा देता है, और पक्षियों के घर उजाड़ देता है। जो ज़मीन कभी विविधता से भरी थी, वहाँ अब एकरूपता की वीरानी पसरी है। रामसर सूची में दर्ज यह आर्द्रभूमि किसी बाढ़ या सूखे से नहीं, बल्कि फाइलों में सोती सरकार से मर रही है।

लेकिन यह कहानी सिर्फ एक झील की नहीं। यह उस बड़े छल की कहानी है, जो पिछले दो दशकों से देश को सुनाया जा रहा है; हरियाली का भ्रम, विकास का मुखौटा।

साल 2001 में एक खामोश बदलाव हुआ। “वन” की परिभाषा बदल दी गई। अब कोई भी ज़मीन, जहाँ 10 प्रतिशत पेड़ हों; चाहे वह बाग हो, व्यावसायिक प्लांटेशन हो या सजावटी हरियाली: उसे “वन” माना जाने लगा। बस, यहीं से खेल शुरू हुआ। काग़ज़ों पर जंगल बढ़ने लगे। रिपोर्टें चमकने लगीं। सरकारें, चाहे कांग्रेस की हों या भाजपा की, इन आँकड़ों को ढाल बनाकर पर्यावरण-रक्षक होने का दावा करती रहीं।

ज़मीन पर क्या हुआ? असली जंगल चुपचाप कटते रहे। सड़कें बढ़ीं, रेल लाइनें बिछीं, शहर फैले। और बदले में जो उगा, वह जंगल नहीं था; वह हरियाली का एक सस्ता विकल्प था। नीलगिरी के कतारबद्ध यूकेलिप्टस पेड़, या विलायती बबूल के झुंड, ये जंगल नहीं होते। इनमें न छाया की गहराई होती है, न जीवन की परतें। ये नदियों को नहीं बचाते, हवा को नहीं ठंडा करते, न ही जीव-जंतुओं को घर देते हैं। लेकिन स्प्रेडशीट में ये हरे दिखते हैं। और सरकार को श्रेय मिल जाता है।

इस भ्रम का सबसे खतरनाक पड़ाव 2023 में आया, जब “डीम्ड फॉरेस्ट्स” से कानूनी सुरक्षा हटा दी गई। एक झटके में, वे ज़मीनें जो वर्षों से अदालतों के आदेशों से सुरक्षित थीं, खुली छूट में आ गईं। नतीजा, कटाई तेज़ हुई, हरे गलियारे टूटे, और प्रकृति का संतुलन और डगमगाया।

क्या यह संयोग है कि उत्तर भारत अब हर साल रिकॉर्ड तोड़ गर्मी झेल रहा है? क्या यह महज़ मौसम का खेल है कि बाढ़ और सूखा एक ही भूगोल में बारी-बारी से दस्तक देते हैं? या यह उसी “काग़ज़ी हरियाली” का परिणाम है, जिसने असली जंगलों की जगह ले ली?

जल संकट इस आग में घी का काम कर रहा है। नदियों के कैचमेंट सिकुड़ रहे हैं। बारिश का पानी ज़मीन में उतर नहीं पा रहा। भूजल खाली हो रहा है: तेज़, लगातार। और विलायती बबूल जैसी प्रजातियाँ इस संकट को और गहरा कर रही हैं। उनकी जड़ें धरती के भीतर तक जाकर पानी खींच लेती हैं, जैसे कोई प्यासा आख़िरी बूंद तक चूस ले। शहरों के नल सूख रहे हैं। गाँवों के कुएँ जवाब दे रहे हैं।

लेकिन नीतियाँ? वही पुराना राग: और निर्माण करो, और प्लांटेशन लगाओ, और काग़ज़ हरा करो।

पर्यटन ने इस जख्म को और चौड़ा कर दिया है। जहाँ कभी नियंत्रित, संवेदनशील पर्यटन होता था, वहाँ अब भीड़ का मेला है। मथुरा वृंदावन में पर्यटक वाहनों की संख्या सौ गुना बढ़ चुकी है। प्रकृति के नाम पर व्यापार फल-फूल रहा है। स्थानीय ठेकेदार, आतिथ्य उद्योग और राजनीतिक दलाल, सब इस खामोश लूट में हिस्सेदार हैं। और प्रशासन? वह दर्शक बना बैठा है।

डॉ. भट्टाचार्य की याचिका कोई असंभव माँग नहीं रखती। वह कहती है, विलायती बबूल को वैज्ञानिक तरीके से हटाओ, देशी प्रजातियाँ लगाओ, और एक स्वतंत्र निगरानी तंत्र बनाओ। यह न्यूनतम है। यह बुनियादी है। लेकिन असल सवाल इससे बड़ा है: क्या सरकार सच को स्वीकार करेगी? क्या वह आँकड़ों के इस खेल से बाहर आएगी?

क्योंकि अगर नहीं, तो आने वाली पीढ़ियाँ एक अजीब विरासत पाएँगी। उनके पास रिपोर्टें होंगी, ग्राफ होंगे, उपलब्धियों के दावे होंगे। लेकिन जब वे पेड़ के नीचे खड़े होंगे, तो छाँव नहीं मिलेगी। जब वे नदी के किनारे जाएँगे, तो पानी नहीं मिलेगा।

उनके पास “वन क्षेत्र” होगा; पर जंगल नहीं। और तब शायद वे पूछेंगे, क्या हमने सचमुच विकास किया था, या सिर्फ़ काग़ज़ हरा किया था?

Saturday, April 25, 2026

 क्या यह सिर्फ़ चुनावी जीत है, या भारत में हिंदू चेतना का पुनर्जागरण?

गैर-हिंदी राज्यों में बढ़ता वोट-प्रतिशत क्या किसी बड़े बदलाव की दस्तक है?

विभाजन के खून से ‘भगवा उभार’ तक: बदलते भारत की सियासी कहानी

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

26 अप्रैल, 2026

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1947 :  एक लकीर खिंची। नक्शे पर भी, दिलों पर भी। भारत का विभाजन ने उपमहाद्वीप को धर्म के नाम पर दो टुकड़ों में बाँट दिया। मुहम्मद अली जिन्ना की दो-राष्ट्र की सोच ने साफ़ कहा: हिंदू और मुसलमान दो अलग सभ्यताएँ हैं। नतीजा भयावह था। खून-खराबा। अफरा-तफरी। लाखों लाशें। करोड़ों बेघर।

लेकिन आज़ादी के बाद एक दूसरी कहानी गढ़ी गई। सत्ता ने धर्म को निजी मामला घोषित कर दिया; कम से कम बहुसंख्यक हिंदुओं के लिए।

वहीं, अल्पसंख्यकों के लिए धर्म धीरे-धीरे सार्वजनिक नीति और राजनीति का हिस्सा बन गया।

यहीं से शुरू हुआ वह दौर जिसे आलोचक “छद्म-धर्मनिरपेक्षता” कहते हैं। बराबरी का तराजू था, मगर अक्सर वोट-बैंक के बोझ से झुका हुआ।

1985 में यह सच खुलकर सामने आया। शाह बानो मामला ने एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला को गुज़ारा भत्ता देने का रास्ता खोला। अदालत ने संविधान की बात की, इंसाफ़ की बात की।

फिर राजनीति ने दस्तक दी। राजीव गांधी की सरकार ने कानून बदल दिया। 

सवाल उठे। 

क्या कानून सबके लिए बराबर है?

या वह चुनावी गणित के हिसाब से बदलता है?

इसी बीच, अयोध्या धीरे-धीरे एक प्रतीक बनता गया। 1949 में मूर्तियाँ प्रकट हुईं। 1986 में ताले खुले। फिर शुरू हुई लंबी कानूनी जंग। 1990 के दशक में यह मुद्दा जन-आंदोलन बन गया। लाल कृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा ने इसे देश के कोने-कोने तक पहुँचा दिया।

और 6 दिसंबर 1992। बाबरी मस्जिद विध्वंस ने देश की राजनीति को झकझोर दिया। हिंसा हुई। बहस हुई। लेकिन एक बात साफ़ हो गई; हिंदू पहचान अब दबकर नहीं रहेगी।

राजनीति ने करवट ली। भारतीय जनता पार्टी धीरे-धीरे हाशिए से निकलकर मुख्यधारा में आ गई।

1984 में 2 सीटें। 1989 में 88 सीटें।

फिर लगातार विस्तार।

2014 में निर्णायक बदलाव आया।

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत।

नारा था; “सबका साथ, सबका विकास।” लेकिन इसके पीछे एक और परत थी: सांस्कृतिक आत्मविश्वास।

2019 में अनुच्छेद 370 का निरसन।

उसी वर्ष नागरिकता संशोधन अधिनियम।

और 2024 में राम मंदिर का उद्घाटन।

समर्थकों के लिए यह ऐतिहासिक न्याय है। आलोचकों के लिए यह बहुसंख्यक वर्चस्व का संकेत।

सच शायद दोनों के बीच कहीं खड़ा है।

लेकिन असली कहानी अब उत्तर भारत से बाहर लिखी जा रही है: गैर-हिंदी राज्यों में।

पश्चिम बंगाल में भाजपा का वोट-प्रतिशत लगातार बढ़ रहा है।

असम में उसने अपनी पकड़ मजबूत की है।

यह सिर्फ़ सीटों का खेल नहीं है।

यह सामाजिक बदलाव का संकेत है।

दक्षिण भारत में तस्वीर अलग जरूर है, लेकिन स्थिर नहीं।

तमिलनाडु और केरल में भाजपा बढ़त ले चुकी  है,  युवा मतदाताओं में उसकी स्वीकार्यता धीरे-धीरे बढ़ रही है।

यह बदलाव क्यों?

एक वजह है: उभरता हुआ मध्यम वर्ग। वह अब सिर्फ़ रोज़गार नहीं चाहता। वह पहचान और आत्मसम्मान भी चाहता है।

दूसरी वजह: सुरक्षा और स्थिरता का वादा।

तीसरी: सांस्कृतिक पुनर्प्रस्तुति।

मंदिर, त्योहार, प्रतीक: अब सिर्फ़ परंपरा नहीं, राजनीति का हिस्सा बन चुके हैं।

और सबसे अहम: “पीड़ित बहुसंख्यक” की भावना का क्षरण।उसकी जगह ले रहा है एक नया आत्मविश्वास।

क्या यह सचमुच हिंदू पुनर्जागरण है?

इतिहास बताता है, पुनर्जागरण सिर्फ़ धर्म का नहीं होता।

वह पहचान, सत्ता और मनोविज्ञान का संगम होता है। भारत में जो हो रहा है, वह कुछ वैसा ही दिखता है। धर्म अब सिर्फ़ आस्था नहीं रहा; वह राजनीतिक ऊर्जा में बदल चुका है।

लेकिन हर उभार अपने साथ जोखिम भी लाता है। क्या यह समावेशी रहेगा? या नई दीवारें खड़ी करेगा?

आज का भारत एक चौराहे पर खड़ा है।

एक रास्ता: सांस्कृतिक आत्मविश्वास के साथ समावेश।

दूसरा: पहचान की टकराहट और ध्रुवीकरण।

फैसला जनता करेगी। लेकिन संकेत साफ़ हैं। हवा बदल रही है।

और इस बार उसकी दिशा सिर्फ़ दिल्ली तय नहीं कर रही, कोलकाता, गुवाहाटी, चेन्नई और तिरुवनंतपुरम भी इस नई हवा को आकार दे रहे हैं।


Friday, April 24, 2026

 AI का तूफ़ान या बाज़ार का बहाना? असली चोट कहाँ लगी है।

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बाज़ार में सन्नाटा है, पर शोर बहुत है।

कहीं कंपनियाँ गिर रही हैं, कहीं कहानियाँ गढ़ी जा रही हैं।

और इस पूरे खेल में एक नाम बार-बार उछलता है: AI.

पर सच यह है कि हर गिरती दीवार के पीछे तूफ़ान नहीं होता… कभी-कभी नींव ही कमजोर होती है।

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

25 अप्रैल 2026 

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एक दावा हवा में तैर रहा है,  बहुत सारी व्यावसायिक कंपनियाँ मर रही हैं, और कातिल है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, यानी AI.

कहा जा रहा है कि Chegg (एक ट्यूशन, होमवर्क कराने वाली संस्था) लगभग खत्म है। अपने चरम (2021 में ~$108 प्रति शेयर) से 99% नीचे गिर चुका है। 2025 में कंपनी ने 45% कर्मचारियों (388 लोगों) की छंटनी की और “new realities of AI” को वजह बताया। छात्र अब ChatGPT जैसे फ्री टूल्स से होमवर्क सॉल्यूशन ले रहे हैं। Chegg की Q4 2025 राजस्व 49% गिरकर $72.7 मिलियन रह गया। पहले जो टेक्स्टबुक किराए, Chegg Study, एक्सपर्ट जवाब और ट्यूटरिंग का बिज़नेस था, वह अब AI के सस्ते-तेज़ विकल्पों से दबाव में है।

सुनने में सीधा-सपाट। पर सच इतना सीधा कब होता है?

सूची लंबी है। Fiverr का स्टॉक 2026 में 35-49% तक गिरा, AI के कारण लो-एंड गिग वर्क पर दबाव बढ़ने से। Duolingo अपने पीक से 83% नीचे आया, क्योंकि AI भाषा सीखने के कुछ हिस्सों को आसान बना रहा है। Getty Images और Shutterstock भी हिले, AI इमेज जेनरेटर (जैसे DALL-E, Midjourney) के आने से क्रिएटिव सेगमेंट पर असर पड़ा, जिसके जवाब में दोनों कंपनियाँ 2025 में $3.7 बिलियन के मर्जर की बात कर रही हैं और खुद AI टूल्स लॉन्च कर रही हैं। Pearson और अन्य edtech प्लेयर्स के शेयर भी 30-40% तक गिरे।

तो क्या यह सब “AI का कत्लेआम” है?

सच थोड़ा कड़वा है। और थोड़ा पेचीदा भी।

पहली बात :  शेयर गिरना और कंपनी मरना दो अलग बातें हैं। बाज़ार डर से चलता है। निवेशक भविष्य सूंघते हैं ,  कभी सही, कभी हवा में। Chegg अब स्किलिंग और प्रोफेशनल कोर्सेज की तरफ मुड़  रहा है, उम्मीद है कि यह नया क्षेत्र डबल-डिजिट ग्रोथ देगा।

दूसरी बात: AI ने दरवाज़ा ज़रूर तोड़ा है। जानकारी अब जेब में है। पहले जो “पेड नॉलेज” था, वह अब “फ्री कन्वर्सेशन” बन गया। होमवर्क हेल्प, बेसिक कंटेंट राइटिंग, ट्रांसलेशन और सिंपल इमेज क्रिएशन पर दबाव है।

पर क्या इससे बिज़नेस हमेशा के लिए खत्म हो जाते हैं? या सिर्फ बदल जाते हैं?

समय के साथ रास्ते और दिशाएं बदलती हैं।

जब Google आया, तो क्या किताबें खत्म हो गईं? नहीं। जब कैमरा फोन (2007 में iPhone) आया, तो क्या प्रोफेशनल फोटोग्राफर गायब हो गए? नहीं। Kodak जैसी कंपनियाँ जो पुराने मॉडल पर अड़ी रहीं, वे टूटीं। लेकिन जो अनुकूलित हुए, वे मजबूत बने। फोटोग्राफी आज भी फल-फूल रही है ;  सिर्फ फॉर्म बदल गया।

Chegg की मुश्किल सिर्फ AI नहीं है। उसका मूल मॉडल ,  रेडीमेड जवाब और परीक्षा-केंद्रित संस्कृति ,  पहले से ही सवालों में था। AI की लहर ने सिर्फ दीवारें हिला दीं।

फ्रीलांस प्लेटफॉर्म्स (Fiverr, Upwork) की कहानी भी यही है। सस्ता, रूटीन काम AI कर सकता है। लेकिन गहरी समझ, क्रिएटिविटी, रणनीति, कल्चरल कॉन्टेक्स्ट और जटिल प्रोजेक्ट्स अभी भी मानवीय ताकत मांगते हैं। Fiverr खुद अब हाई-वैल्यू वर्क और AI-native टूल्स पर फोकस कर रहा है।

स्टॉक इमेज कंपनियाँ क्यों हिलीं? क्योंकि AI अब तस्वीर बना सकता है। लेकिन ब्रांडेड, लाइसेंस्ड, लीगल रूप से सुरक्षित, इंडेम्निफाइड कंटेंट की ज़रूरत खत्म नहीं हुई। Getty और Shutterstock अब खुद AI जनरेशन ऑफर कर रहे हैं ;  लेकिन ट्रेनिंग उनके ही लाइसेंस्ड डेटा पर, ताकि कमर्शियल यूज सुरक्षित रहे।

यहाँ असली खेल “वैल्यू” का है। जो सिर्फ जानकारी बेच रहा था → फिसलेगा।  जो समझ, अनुभव, भरोसा, संदर्भ और मानवीय स्पर्श बेचता है → टिकेगा और बढ़ेगा।

यहीं भारत के लिए एक बड़ा मौका छिपा है। सस्ती, समझदार और स्थानीय समाधान देने में भारत का कोई सानी नहीं।  लेकिन शॉर्ट नोट्स, कुंजियां, guess papers, guide बनाने वाले प्रकाशकों के लिए खतरे की घंटी बज चुकी है। ट्यूशन बाजार भी ढीला पड़ेगा। बहुत से डॉक्टर्स की पोल खुलने को धरी है। AI prescriptions जांचेगा, tests की जरूरत भी मॉनिटर करेगा। पुराने नए पर्चों की मिलान करेगा।

टेलीमेडिसिन, किफायती हेल्थ काउंसलिंग, AI-सहायता प्राप्त शिक्षा (खासकर हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं में), और छोटे निवेशकों के लिए सरल वित्तीय सलाह :  ये क्षेत्र हैं जहाँ भारतीय प्रोफेशनल्स कम लागत में हाई-रिलेवेंस मॉडल बना सकते हैं। IndiaAI Mission के तहत हेल्थकेयर और एजुकेशन में sovereign AI मॉडल्स पर काम चल रहा है, जो लोकल डेटा और भाषाओं पर ट्रेन हो रहे हैं। AI यहाँ दुश्मन नहीं, साझेदार है,  डॉक्टर, शिक्षक और सलाहकार को और सक्षम बनाता है, उन्हें बदलने के बजाय उनके हाथ मजबूत करता है। छोटे शहरों से वैश्विक बाज़ार तक “लो-कॉस्ट, हाई-रिलेवेंस” सेवाएँ हमारी ताकत बन सकती हैं।

डर का धंधा खूब चलता है। “AI सब खा जाएगा” ,  यह हेडलाइन बिकती है। पर ज़मीन पर तस्वीर अलग है। AI एक औज़ार है। हथौड़ा है। घर भी बना सकता है, उंगली भी कुचल सकता है।

सवाल यह नहीं कि AI आएगा या नहीं।  

सवाल यह है: आप क्या बेच रहे हैं?

अगर जवाब है “सिर्फ जानकारी”, तो खतरा सामने खड़ा है।  

अगर जवाब है “समझ, संदर्भ, अनुभव और मानवीय स्पर्श”, तो खेल अभी बाकी है।

तकनीक तूफान है।  

पर हर तूफान के बाद, कुछ पेड़ और मज़बूत खड़े मिलते हैं।

अब देखना यह है: आप पेड़ हैं या पत्ते।

Thursday, April 23, 2026

 यमुना की कराह: ब्रज में आस्था पर गंदगी का साया

NGT का सख्त कदम

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

24 अप्रैल 2026

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हाल ही में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने आखिरकार नींद तोड़ी। उसने जल शक्ति मंत्रालय, उत्तर प्रदेश सरकार, मथुरा-वृंदावन नगर निगम, विकास प्राधिकरण और प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को नोटिस थमाया। वजह साफ है: यमुना की बिगड़ती हालत। यह कदम देर से आया, मगर जरूरी था।

यह मामला विजय किशोर गोस्वामी की याचिका से उठा। वे ब्रज वृंदावन देवालय समिति के संयुक्त सचिव हैं और श्री राधा मदन मोहन मंदिर के मुख्य सेवायत भी। उन्होंने साफ कहा; 17 दिसंबर 2021 के आदेशों की खुलेआम अवहेलना हुई है। तब ट्रिब्यूनल ने सीवेज ट्रीटमेंट सुधारने, अतिक्रमण हटाने और किनारों पर हरियाली बढ़ाने का हुक्म दिया था। लेकिन हकीकत वही ढाक के तीन पात। गंदा पानी आज भी बेखौफ बह रहा है। यमुना का दम घुट रहा है।

यह सिर्फ पर्यावरण का मसला नहीं है। यह तहज़ीब का सवाल है। करोड़ों लोगों के लिए यमुना सिर्फ नदी नहीं, “माँ यमुना” है। यही ब्रज की रगों में बहती है। यहीं श्रीकृष्ण की लीलाएं हुईं। भक्त आज भी आचमन करते हैं, आरती उतारते हैं। मगर आज का पानी नहाने लायक भी नहीं रहा। पवित्रता तो दूर की बात है।

विशेषज्ञों ने भी खतरे की घंटी बजाई है। यमुना का पानी केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ‘क्लास D’ श्रेणी में है। यानी यह पानी केवल जलीय जीवों के लिए ठीक है, इंसानों के लिए नहीं। इसमें घुलित ऑक्सीजन कम है। बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड ज्यादा है। और सबसे खतरनाक—फीकल कॉलिफॉर्म की मात्रा हजारों गुना ऊपर।

दिल्ली का हाल तो और भी बदतर है। यमुना की कुल लंबाई 1376 किलोमीटर है, लेकिन सिर्फ 22 किलोमीटर का दिल्ली हिस्सा 80 फीसदी प्रदूषण ढोता है। यहां फीकल कॉलिफॉर्म 92,000 MPN/100ml तक पहुंच चुका है, जबकि नहाने के लिए सीमा 2,500 है। कई जगहों पर ऑक्सीजन लगभग शून्य है। पानी जिंदा नहीं, सड़ा हुआ लगता है।

दिल्ली रोजाना करोड़ों लीटर गंदा पानी यमुना में उड़ेलती है। 37 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट होने के बावजूद हालात जस के तस हैं। कहीं पाइपलाइन अधूरी है, कहीं मशीनें बंद हैं। नतीजा: अधपका या कच्चा सीवेज सीधे नदी में गिरता है। यही जहर मथुरा-वृंदावन तक पहुंचता है।

ब्रज में भी हालत कुछ कम नहीं। दर्जनों नाले यमुना में गिरते हैं। कई बिना ट्रीटमेंट के। ऊपर से अतिक्रमण की मार। 2025 के ड्रोन सर्वे में वृंदावन के बाढ़ क्षेत्र में 1,266 अवैध निर्माण मिले। ये न सिर्फ नदी के बहाव को रोकते हैं, बल्कि प्रदूषण को भी बढ़ाते हैं। रेत खनन, गाद जमाव और बंद हो चुकी सहायक नदियां: सब मिलकर यमुना को बीमार बना रहे हैं।

बरसात के अलावा महीनों में यमुना का प्रवाह बेहद कम हो जाता है। पानी ठहर जाता है। सड़ांध बढ़ती है। नदी नाला बन जाती है। विशेषज्ञ कहते हैं कि न्यूनतम जल प्रवाह तय होना चाहिए, ताकि नदी जिंदा रहे। मगर इस पर अमल ढीला है।

अधिवक्ता आकाश वशिष्ठ पूछते हैं, "सवाल उठता है; इतनी योजनाओं का क्या हुआ? 1990 के दशक से यमुना एक्शन प्लान चल रहा है। फिर राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन आया। अरबों रुपये खर्च हुए। घाट बने, पाइप बिछे, प्लांट लगे। लेकिन जमीन पर नतीजा नदारद। यह सब कागजी घोड़े लगते हैं।"

आगरा में इसका असर साफ दिखता है। यमुना का गंदा पानी ताजमहल तक पहुंचता है। झाग, बदरंग पानी और मछलियों की मौत आम बात है। शाम की आरती में दीये तो जलते हैं, मगर पानी मुस्कुराता नहीं। उसकी चमक कहीं खो गई है।

रिवर कनेक्ट से जुड़े एक्टिविस्ट्स कहते हैं, असल बीमारी सिस्टम में है। विभाग अलग-अलग दिशा में भाग रहे हैं। तालमेल गायब है। कानून का डर नहीं। विकास के नाम पर कंक्रीट जंगल उग रहे हैं। नदी का सीना सिकुड़ रहा है।

ब्रज वृंदावन देवालय समिति ने भी साफ कहा; “निर्मल यमुना जल” मंदिर परंपराओं के लिए जरूरी है। मगर हुकूमत के कानों पर जूं नहीं रेंगती। आदेश आते हैं, फाइलों में दब जाते हैं। अतिक्रमण हटाने की बातें होती हैं, मगर बुलडोजर नहीं चलता।

अब रास्ता क्या है? जवाब आसान नहीं, मगर जरूरी है।

पहला कदम; मथुरा-वृंदावन के सभी नालों को तुरंत ट्रीटमेंट प्लांट से जोड़ा जाए। प्लांट की क्षमता बढ़े और निगरानी सख्त हो।

दूसरा: बाढ़ क्षेत्र से अवैध निर्माण हटाने की समयबद्ध मुहिम चले। 1,266 निर्माण सिर्फ आंकड़ा नहीं, खतरे की घंटी हैं।

तीसरा: साल भर न्यूनतम जल प्रवाह सुनिश्चित हो। ऊपर के बैराज से पानी छोड़ा जाए। सहायक नदियों को जिंदा किया जाए।

चौथा: नदी को “जीवित इकाई” मानकर सख्त कानून बने। उल्लंघन पर भारी जुर्माना हो।

साथ ही, समाज को भी आगे आना होगा।  आगरा में हालात पर रिवर कनेक्ट अभियान के कार्यकर्ताओं का दर्द छलकता है। डॉ देवाशीष भट्टाचार्य ने तल्ख़ लहजे में कहा, “आगरा में यमुना अब नदी नहीं, ज़हरीली नाली बन चुकी है। यह गंदा पानी इंसानों की सेहत के लिए ख़तरा है और ताजमहल जैसे ऐतिहासिक स्मारकों पर भी असर डाल रहा है।" 

यमुना भक्त डॉ ज्योति खंडेलवाल और विशाल झा कहते हैं, "हमने बरसों से यमुना बैराज की मांग उठाई है, ताकि पानी का स्तर सुधरे और प्रवाह बना रहे, मगर सरकार की रफ़्तार कछुए से भी धीमी है। हर साल वादे होते हैं, हर साल फाइलें घूमती हैं, मगर ज़मीन पर कुछ नहीं बदलता। अगर अब भी हुकूमत ने होश नहीं लिया, तो आने वाली नस्लें हमें माफ़ नहीं करेंगी।”

रिवर एक्टिविस्ट पद्मिनी अय्यर कहती हैं, "NGT का नोटिस एक चेतावनी है। आखिरी नहीं, मगर अहम। अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह भी कागज बनकर रह जाएगा।"

यमुना ब्रज की धड़कन है। अगर यह धड़कन थम गई, तो ब्रज की रूह सूख जाएगी। बात साफ है; यमुना को बचाइए, वरना इतिहास हमें माफ नहीं करेगा।

अब वक्त है। फैसले का। इरादे का। और असली कार्रवाई का।