Sunday, August 23, 2026

 (A Mass communication study)

मोदी के मैजिक मंत्र: 

कैसे एक माहिर संचारक (कम्युनिकेटर) विचारों को राष्ट्रीय मिशन में बदल देता है

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बृज खंडेलवाल द्वारा

25 अगस्त, 2026

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देश अपने घरों में बंद था। सड़कें सुनसान थीं, बाजार खामोश थे और कारखानों के पहिए थम गए थे। कोरोना का अदृश्य खौफ लगभग हर घर में दाखिल हो चुका था। किसी को नहीं मालूम था कि यह संकट कब खत्म होगा।

तभी टेलीविजन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आवाज गूंजी।

शाम के पांच बजे ताली बजाइए। घंटी बजाइए। थाली बजाइए। डॉक्टरों, नर्सों, सफाईकर्मियों, पुलिसकर्मियों और कोरोना योद्धाओं का शुक्रिया अदा कीजिए।

कुछ दिन बाद एक और अपील आई।

रात नौ बजे घर की बत्तियां बुझाइए। दरवाजे या बालकनी में खड़े होकर नौ मिनट तक दिया, मोमबत्ती या मोबाइल की रोशनी जलाइए।

निर्देश आसान थे। समय तय था। काम सबके लिए एक था। लाखों लोगों ने उसका पालन किया।

कोई इन प्रतीकों से सहमत था, कोई असहमत। उनके व्यावहारिक असर पर भी बहस हुई। मगर एक बात साफ थी, संप्रेषण बेहद स्पष्ट था।


यही शायद नरेंद्र मोदी की राजनीतिक संचार शैली का सबसे दिलचस्प पहलू है। पिछले एक दशक से ज्यादा समय में उन्होंने कठिन नीतियों, आर्थिक रणनीतियों और राष्ट्रीय लक्ष्यों को छोटे-छोटे सूत्रों, मंत्रों, नारों और याद रह जाने वाले वाक्यों में बदलने की कला विकसित की है।

तीन शब्द। पांच बिंदु। सात संकल्प।

3S, 5T, 5F, पंच प्रण और सप्तधारा।

इनमें वैज्ञानिक स्पष्टता भी है और संचार की समझ भी। ग्रामीण विकास हो, आर्थिक तरक्की हो, युवाओं के कौशल की बात हो, आत्मनिर्भर भारत का सपना हो या 2047 तक विकसित भारत बनाने का लक्ष्य; संदेश में अक्सर लक्ष्य साफ होता है, रास्ता बताया जाता है और नागरिक की भूमिका भी तय की जाती है। कई बार लगता है किसी कॉरपोरेट कंपनी के हेड का प्रेजेंटेशन चल रहा है: यह लक्ष्य है। यह रणनीति है। यह आपकी भूमिका है। और यह समय सीमा है।


रेडियो पर मन की बात हो, संसद में भाषण हो, चुनावी सभा हो या लाल किले से स्वतंत्रता दिवस का संबोधन, मोदी की भाषा में आम तौर पर बहुत कम अस्पष्टता दिखाई देती है।

हंसी-मजाक, दोहरे अर्थ वाले वाक्य और बेवजह की हल्की-फुल्की टिप्पणियां उनकी शैली का मुख्य हिस्सा नहीं हैं। इसके बजाय वे अक्सर ऐसे दिखाई देते हैं जैसे कोई विश्वविद्यालय का प्रोफेसर पूरी तैयारी के साथ कक्षा में आया हो। नोट्स तैयार हैं। विषय स्पष्ट है। और विद्यार्थियों के लिए संदेश भी। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां विद्यार्थी पूरा देश है।

तीन, पांच और सात का जादू

मोदी के शुरुआती सूत्रों में एक था 5T—Talent, Tradition, Tourism, Trade और Technology।

इन पांच शब्दों में भारत की एक पूरी तस्वीर खींच दी गई। परंपरा के साथ तकनीक। पर्यटन के साथ व्यापार। पुरानी सभ्यता के साथ नई अर्थव्यवस्था।

संदेश साफ है: भारत को अपने अतीत और भविष्य में से किसी एक को चुनने की जरूरत नहीं है।

फिर आया 3S: Speed, Skill और Scale।

विकास तेज होना चाहिए। युवाओं के पास कौशल होना चाहिए। काम बड़े पैमाने पर होना चाहिए।

तीन शब्दों में आर्थिक नीति का एक बड़ा खाका सामने आ जाता है।

5F भी इसी शैली का शानदार उदाहरण है: Farm, Fibre, Fabric, Fashion और Foreign।

खेत से फाइबर, फाइबर से कपड़ा, कपड़े से फैशन और फैशन से विदेशी बाजार।

पूरी वैल्यू चेन पांच शब्दों में।

फिर आया एक ऐसा सूत्र जो स्कूल की ब्लैकबोर्ड पर लिखे किसी समीकरण जैसा लगता है: 

IT + IT = IT

यानी Indian Talent + Information Technology = India Tomorrow.

लोग समीकरण याद रखते हैं। शायद इसीलिए यह सूत्र भी याद रह गया।

मोदी की भाषा में यही संचार-कला बार-बार दिखाई देती है।

नारे नहीं, याद रखने की तकनीक

Reform, Perform, Transform: 

पहले सुधार, फिर बेहतर प्रदर्शन और अंत में बदलाव।

Per Drop More Crop; हर बूंद से ज्यादा फसल।

कृषि, सिंचाई और जल संरक्षण जैसे जटिल विषय को चार शब्दों में समेट दिया गया।

इसी तरह Make in India, Atmanirbhar Bharat, Vocal for Local और Swadeshi एक-दूसरे को मजबूत करते हैं।

एक ही विचार अलग-अलग नारों के जरिए बार-बार सामने आता है।

और यही दोहराव संदेश को सार्वजनिक भाषा का हिस्सा बना देता है।

मोदी की सबसे लोकप्रिय राजनीतिक पंक्तियों में से एक है; 

सबका साथ, सबका विकास।

बाद में इसमें दो और शब्द जुड़ गए: 

सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास।

साथ, विकास, विश्वास और प्रयास।

चार शब्द, लेकिन एक पूरी राजनीतिक सोच।

यही शैली पार्टी संगठन तक भी पहुंचती है। भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए बताए गए सात मंत्र: सेवाभाव, संतुलन, संयम, समन्वय, सकारात्मकता, संवेदना और संवाद; सिर्फ विचार नहीं हैं। समान ध्वनि वाले शब्दों के कारण वे आसानी से याद भी रहते हैं। यहां भाषा केवल सूचना नहीं देती। भाषा स्मृति बनाती है।


कोविड-19 महामारी ने मोदी की संचार शैली को सबसे नाटकीय तरीके से सामने रखा।

देश डरा हुआ था। अस्पतालों पर दबाव था। कारोबार बंद हो रहे थे। करोड़ों लोगों के रोजगार और भविष्य को लेकर चिंता थी। ऐसे समय में संचार खुद शासन का एक महत्वपूर्ण औजार बन गया।

पहले आया जनता कर्फ्यू।

फिर शाम पांच बजे कोरोना योद्धाओं के सम्मान में ताली, घंटी और थाली बजाने की अपील हुई।

इस प्रतीक पर बहस हुई। आलोचना भी हुई। लेकिन संचार की दृष्टि से इसका एक असर जरूर हुआ।

डॉक्टर, नर्स, सफाईकर्मी और दूसरे फ्रंटलाइन वर्कर अचानक राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में आ गए।

इसके बाद आया 21 दिन का लॉकडाउन।

मोदी ने इसे समझाने के लिए भारतीय सांस्कृतिक स्मृति से एक जाना-पहचाना रूपक निकाला: लक्ष्मण रेखा।

आपका घर आपकी सीमा है।

बेवजह बाहर मत निकलो।

घर में रहो।

संक्रमण की कड़ी तोड़ो।

फिर आया रात नौ बजे, नौ मिनट का संदेश।

बत्तियां बुझाइए।

दीया जलाइए।

मोमबत्ती जलाइए।

मोबाइल की रोशनी जलाइए।

नौ मिनट तक एक साझा प्रतीक बनाइए।

इसके बाद सात बिंदुओं वाली अपील में बुजुर्गों की रक्षा करने, सामाजिक दूरी रखने, प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, आरोग्य सेतु का इस्तेमाल करने, गरीब परिवारों की मदद करने, कर्मचारियों की चिंता करने और कोरोना योद्धाओं का सम्मान करने की बात कही गई।

पूरे अभियान का सबसे महत्वपूर्ण संदेश शायद यही था: सरकार अकेली कोरोना से नहीं लड़ रही है। आप भी इस लड़ाई का हिस्सा हैं।

यही सहभागी संप्रेषण है।

घर में बंद डरा हुआ नागरिक भी किसी काम का हिस्सा बन गया।

संकट के समय एक छोटा-सा साझा काम भी लोगों में सामूहिकता और भरोसे की भावना पैदा कर सकता है।

संकट से 2047 तक

कोरोना के बाद यही संचार शैली तत्काल संकट से निकलकर भारत के दीर्घकालीन सपने तक पहुंची।

2022 में आया पंच प्रण।

2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाना। औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति। अपनी विरासत पर गर्व। एकता को मजबूत करना। नागरिक कर्तव्यों को निभाना।

2047 बहुत दूर का सपना है।

लेकिन पांच संकल्प उसे समझने योग्य बना देते हैं।

इसके बाद डेमोग्राफी, डेमोक्रेसी और डायवर्सिटी यानी जनसांख्यिकी, लोकतंत्र और विविधता का त्रिफलक सामने आया।

दूसरी तरफ भ्रष्टाचार, परिवारवाद और तुष्टीकरण जैसे मुद्दों को भी तीन के ढांचे में पेश किया गया।

फिर आया सप्तधारा का विचार।

विकसित भारत के रास्ते में सात बड़ी धाराएं: मैन्युफैक्चरिंग, कृषि और खाद्य प्रसंस्करण, तकनीक और नवाचार, गति शक्ति और कनेक्टिविटी, रक्षा शक्ति, ग्रीन और ब्लू इकोनॉमी तथा भारत की सॉफ्ट पावर।

यहां प्रतीक और आधुनिकता का अनोखा मेल दिखाई देता है।

प्राचीन भारत में सप्त सिंधु की कल्पना थी।

आज के भारत के सामने सप्तधारा है।

एक तरफ कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम टेक्नोलॉजी, रोबोटिक्स, ग्रीन हाइड्रोजन और आधुनिक लॉजिस्टिक्स हैं। दूसरी तरफ योग, आयुर्वेद, संस्कृति और पर्यटन।

एक पैर सभ्यतागत स्मृति में है।

दूसरा 2047 में।

यह शैली मोदी तक सीमित नहीं

यह संचार शैली अब दूसरे वरिष्ठ मंत्रियों में भी दिखाई देती है।

विदेश मंत्री एस. जयशंकर का उदाहरण लिया जा सकता है। उन्होंने बदलती दुनिया को 3 Cs: Competition, Conflict और Choke Points, के जरिए समझाया है।

जवाब के लिए 4 Ds: Derisking, Diversification, distortions से निपटना और सुरक्षा का एक मार्जिन बनाए रखना, जैसी शब्दावली सामने आती है। पुरानी सोच थी: Just in Time। नई दुनिया कह रही है: Just in Case। जटिल भू-राजनीति भी कुछ याद रहने वाले शब्दों में बदल जाती है।

मगर नारा शासन नहीं है

यहां एक जरूरी सवाल भी है।

सूत्र और नारे प्रभावशाली हो सकते हैं, लेकिन वे शासन का विकल्प नहीं हैं।

सिर्फ नारे से कारखाना नहीं बनता।

मंत्र से रोजगार पैदा नहीं होता।

दिया जलाने से बीमारी ठीक नहीं होती।

कोई आकर्षक वाक्य नदी को साफ नहीं कर सकता।

अंततः असली परीक्षा काम की है।

नीतियों के परिणामों को आंकना जरूरी है। सरकार के दावों को जांचना जरूरी है। नागरिकों, अर्थशास्त्रियों, पत्रकारों और विपक्षी दलों को सवाल पूछने का पूरा अधिकार है।

राजनीतिक संचार लोगों को जोड़ सकता है।

लेकिन परिणाम ही उसकी अंतिम कसौटी हैं।

फिर भी संचार को कम करके नहीं आंका जा सकता।

1.4 अरब से ज्यादा लोगों के देश में कोई नीति अगर सरकारी फाइलों में बंद रह जाए तो वह जनभागीदारी का अभियान नहीं बन सकती।

पहले लोगों को बात समझनी होगी।

फिर वे उससे जुड़ेंगे।

यहीं मोदी की संचार शक्ति सबसे दिलचस्प बन जाती है।

वे जानते हैं कि लोग तीन शब्द तीस पैराग्राफ से ज्यादा आसानी से याद रखते हैं।

लोग लंबे भाषण से ज्यादा आसानी से कोई ठोस काम याद रखते हैं।

और अस्पष्ट वादे से ज्यादा आसानी से एक तय समय सीमा याद रखते हैं।


भारत के राजनीतिक इतिहास में संक्षिप्त और ताकतवर नारों की परंपरा पुरानी है।

महात्मा गांधी के दौर में "भारत छोड़ो" और "करो या मरो" जैसे छोटे वाक्यों ने विशाल जनसमूह को आंदोलित किया था।

समय बदल गया है।

माइक की जगह टेलीविजन, मोबाइल, यूट्यूब और सोशल मीडिया ने ले ली है।

लेकिन संचार का मूल सिद्धांत आज भी वही है।

लोगों को एक वाक्य दीजिए।

एक उद्देश्य दीजिए।

और उसमें उनकी भूमिका तय कर दीजिए।

मोदी के 3S, 5T, 5F, पंच प्रण, सप्तधारा और Per Drop More Crop जैसे सूत्र इसी आधुनिक संचार परंपरा के अध्ययन का विषय बन सकते हैं।

ये सिर्फ नारे नहीं हैं। ये याद रखने की तकनीक हैं।

इनके जरिए जटिल नीतियों को सरल बनाया जाता है, भावनात्मक जुड़ाव पैदा किया जाता है और लोगों को किसी बड़े राष्ट्रीय अभियान का हिस्सा बनने के लिए प्रेरित किया जाता है।

आखिर असली कमाल केवल आकर्षक नारा गढ़ने में नहीं है।

कमाल है किसी विचार को साझी जिम्मेदारी में बदल देने में।

पानी बचाइए।

स्थानीय सामान खरीदिए।

नई स्किल सीखिए।

बुजुर्गों की रक्षा कीजिए।

गरीब की मदद कीजिए।

कोरोना योद्धाओं का सम्मान कीजिए।

और विकसित भारत बनाने में अपना योगदान दीजिए।

भाषा छोटी है।

मगर लक्ष्य बहुत बड़ा है।

भाषण खत्म होता है।

कैमरे बंद हो जाते हैं।

लेकिन संदेश का सफर शुरू हो जाता है।

वह अखबार की हेडलाइन बनता है। टीवी की पट्टी बनता है। गांव की सभा में दोहराया जाता है। व्हाट्सऐप पर घूमता है। घर की बातचीत में पहुंचता है।

यही है नारे के पीछे का विज्ञान।

एक अच्छा वक्ता लोगों को सोचने के लिए कुछ देता है।

एक माहिर संचारक उन्हें याद रखने और कुछ करने के लिए देता है।

Saturday, August 22, 2026

 इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों की दुकानदारी: 

जब शिक्षा से ज्यादा जरूरी हो जाए मुनाफा

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बृज खंडेलवाल द्वारा

24 अगस्त, 2026

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नई इमारत तैयार है। चमचमाता बोर्ड लग गया है। रंगीन ब्रोशर छप चुके हैं।

"एडमिशन शुरू हैं!"

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस। डेटा साइंस। साइबर सिक्योरिटी। मशीन लर्निंग। रोबोटिक्स।

नाम सुनकर लगता है, बस दाखिला लो और भविष्य जेब में डाल लो। मगर कई कॉलेजों के भीतर जाइए। खाली कुर्सियां आपका स्वागत करती मिलेंगी।

यही भारतीय उच्च शिक्षा की सबसे बड़ी विडम्बना है।

कर्नाटक के उच्च शिक्षा मंत्री ने हाल में कहा कि राज्य अब नए सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज नहीं खोलेगा। पहली नजर में यह फैसला पीछे हटने जैसा लग सकता है। असल में, यह देर से आया हुआ एक समझदार फैसला है।


पिछले तीन दशकों में प्रोफेशनल शिक्षा का ऐसा विस्तार हुआ कि हर शहर और कस्बे में कॉलेज कुकुरमुत्तों की तरह उग आए। इंजीनियरिंग, मेडिकल, डेंटल, फार्मेसी, मैनेजमेंट और होम्योपैथी कॉलेजों की बाढ़ आ गई।

शिक्षा धीरे-धीरे कारोबार बन गई।कॉलेज की सीट एक उत्पाद बन गई। छात्र ग्राहक बन गया।

कर्नाटक में हर साल करीब 28 से 30 हजार इंजीनियरिंग सीटें खाली रह जाती हैं। देश भर में इंजीनियरिंग की लगभग 30 से 40 प्रतिशत सीटों पर दाखिला नहीं हो पाता। यानी हर साल तीन से पांच लाख सीटें खाली रह सकती हैं।

तमिलनाडु की तस्वीर भी कम परेशान करने वाली नहीं है। टीएनईए काउंसलिंग के तीसरे दौर के बाद भी करीब 37,943 इंजीनियरिंग सीटें खाली थीं। लगभग 1,57,570 सीटें भर गईं, लेकिन बड़ी संख्या में सीटें फिर भी खाली रह गईं। राज्य में करीब 418 इंजीनियरिंग कॉलेज हैं।

सवाल यह नहीं कि छात्रों ने इंजीनियरिंग छोड़ दी है। असली बात यह है कि छात्र अब हर कॉलेज में दाखिला लेने को तैयार नहीं हैं।

अच्छे और पुराने संस्थानों में आज भी भीड़ है। शहरों के प्रतिष्ठित कॉलेज, जहां पढ़ाई और प्लेसमेंट बेहतर हैं, छात्रों की पहली पसंद बने हुए हैं।

लेकिन छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों के कई निजी कॉलेजों की हालत पतली है। कुछ कॉलेजों में एक भी छात्र नहीं पहुंचा। कुछ को गिनती के विद्यार्थी मिले।

संदेश साफ है। सीटें बढ़ा देने से मांग पैदा नहीं होती।

निजी कॉलेजों ने एक नया नुस्खा खोज लिया है। पुराने कंप्यूटर साइंस कोर्स के नाम के साथ कोई फैशनेबल शब्द जोड़ दीजिए। नया कोर्स तैयार।

एआई एंड मशीन लर्निंग। एआई एंड डेटा साइंस। साइबर सिक्योरिटी।इंटरनेट ऑफ थिंग्स। डेटा एनालिटिक्स। नाम अलग-अलग हैं। कई बार पढ़ाई का बड़ा हिस्सा लगभग एक जैसा होता है।

ब्रोशर नया है, सीटें नई हैं और फीस भी नई।

मुश्किल यह नहीं कि एआई पढ़ाई जा रही है। मुश्किल यह है कि कई जगह एआई सिर्फ एक चमकदार लेबल बन गया है। अच्छी लैब बनाना महंगा है। योग्य शिक्षक रखना महंगा है। रिसर्च कराना महंगा है। ब्रोशर बदलना सस्ता है। मुनाफे की दुनिया अक्सर आसान रास्ता चुनती है।

दूसरी तरफ मैकेनिकल, सिविल और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की सीटें खाली रह रही हैं। यह एक अजीब विरोधाभास है।

देश मैन्युफैक्चरिंग की बात करता है। बड़े-बड़े कारखानों की बात करता है। नई सड़कें, पुल, बिजली, सेमीकंडक्टर और ग्रीन एनर्जी की बातें होती हैं।

मगर युवाओं को एक ही दिशा में धकेला जा रहा है। सॉफ्टवेयर की तरफ।

कल को हमारे पास कोड लिखने वाले बहुत होंगे, लेकिन मशीन बनाने वाले कम। पुल बनाने वाले कम। बिजली और ऊर्जा व्यवस्था संभालने वाले कम।

इसे शिक्षा नीति नहीं, शैक्षिक सट्टेबाजी कहना ज्यादा ठीक होगा।


आईआईआईटी-बेंगलुरु के पूर्व निदेशक एस. सदागोपन की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति ने एक बेहद चिंताजनक तस्वीर पेश की।अनुमान यह था कि इंजीनियरिंग ग्रेजुएट्स में केवल करीब 17 प्रतिशत ही सीधे नौकरी के लिए तैयार माने जा सकते हैं।

जरा सोचिए। मां-बाप लाखों रुपये खर्च करते हैं। बच्चा चार साल पढ़ता है। डिग्री हाथ में आती है। फिर नौकरी का दरवाजा कहता है: अभी आप तैयार नहीं हैं।


समिति ने कंप्यूटर साइंस सीटों में कमी, एक जैसे कोर्सों पर रोक और एआई को अलग-अलग शाखाओं में शामिल करने की सिफारिश की।

बात बिल्कुल वाजिब है।



निजीकरण के समर्थकों ने कहा था कि इससे प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। गुणवत्ता सुधरेगी। दक्षता आएगी। लेकिन शिक्षा के एक बड़े हिस्से में हुआ कुछ और।

अगर एक कॉलेज मुनाफा कमा सकता है, तो दूसरा खोलो। अगर 60 सीटें बिकती हैं, तो 120 कर दो।कंप्यूटर साइंस चल रहा है, तो उसके पांच नए संस्करण निकाल दो। दाखिले कम हों, तो विज्ञापन बढ़ा दो।


मगर बड़ी तस्वीर से आंखें नहीं मूंदी जा सकतीं।

शिक्षा के विस्तार में राजनीतिक रसूख, ट्रस्ट, सोसायटी और कारोबारी हितों की भूमिका लगातार बढ़ती गई।हर सरकार ने कॉलेज खोलने को विकास का तमगा बना दिया। मगर किसी ने ठीक से नहीं पूछा: क्या हमें सचमुच एक और कॉलेज चाहिए?

उत्तर प्रदेश में 2026 में निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों में मांग और सीटों के बीच बड़ा असंतुलन दिखाई दे रहा है। AKTU की UPTAC काउंसलिंग के बाद करीब 74,000 बीटेक सीटें खाली रह गईं, जिनमें अधिकांश निजी कॉलेजों की हैं। लोकप्रिय CSE में भी 22,000 से अधिक सीटें खाली रहीं। छात्र नोएडा, गाजियाबाद और ग्रेटर नोएडा के प्रतिष्ठित कॉलेजों को तरजीह दे रहे हैं। कई निजी संस्थानों में JEE Main के बिना 12वीं के अंकों पर सीधे दाखिले की व्यवस्था करनी पड़ी। जरूरत से ज्यादा सीटें बढ़ने से कई कॉलेज आर्थिक दबाव और भविष्य के संकट से जूझ रहे हैं।

यही कहानी मेडिकल शिक्षा में भी दिखाई देती है। नए मेडिकल कॉलेजों की घोषणाएं बड़ी सुर्खियां बनती हैं। लेकिन मेडिकल कॉलेज केवल एक इमारत का नाम नहीं है।

उसे अनुभवी डॉक्टर चाहिए। शिक्षक चाहिए। लैब चाहिए। अस्पताल चाहिए। मरीज चाहिए। क्लीनिकल ट्रेनिंग चाहिए।

इनके बिना मेडिकल कॉलेज सिर्फ एक बड़ा भवन और चमकदार नामपट्ट बनकर रह सकता है।

होम्योपैथी और दूसरे प्रोफेशनल कोर्सों में भी कई संस्थान सीटें भरने के लिए जूझ रहे हैं। फिर भी नए संस्थान खोलने की होड़ खत्म नहीं होती।

यह कैसी तरक्की है?

जब पुरानी दुकान में ग्राहक नहीं हैं, तब नई दुकान क्यों खोली जा रही है?


हर साल नई इमारतें खड़ी करना बंद कीजिए। मौजूदा कॉलेजों को मजबूत बनाइए। खाली पड़े परिसरों का बेहतर इस्तेमाल कीजिए। उन्हें स्किलिंग और री-स्किलिंग सेंटर बनाइए। अच्छे शिक्षक लाइए। लैब सुधारिए। उद्योगों से सीधा रिश्ता जोड़िए।

और सबसे जरूरी बात; जितनी वास्तविक जरूरत है, उतनी ही सीटें रखिए। देश को 500 कमजोर इंजीनियरिंग कॉलेजों की जरूरत नहीं है। 100 अच्छे संस्थान शायद ज्यादा बेहतर काम कर सकते हैं।


खाली सीटें केवल दाखिले की समस्या नहीं हैं। वे व्यवस्था के खिलाफ छात्रों का खामोश फैसला हैं।


कई वर्षों से उच्च शिक्षा को समाज सेवा का लिबास पहनाकर एक बड़े कारोबार की तरह चलाया जा रहा है।

कॉलेज खोलने वालों को फायदा हुआ। राजनीतिक रसूख बढ़ा। इमारतें बनती गईं। सीटें बढ़ती गईं। मगर बेरोजगार डिग्रीधारियों की फौज भी बढ़ती गई।

समस्या निजी संस्थानों के होने की नहीं है। समस्या यह है कि शिक्षा को केवल मुनाफे की नजर से नहीं देखा जा सकता। कॉलेज इसलिए नहीं चलना चाहिए कि वह सीटें बेच सकता है। सरकार को तय करना होगा कि देश को किस तरह के पेशेवर चाहिए। कितने इंजीनियर चाहिए। कितने डॉक्टर चाहिए। किस इलाके में कॉलेज की जरूरत है।

सिर्फ वोट, जमीन और मुनाफे के लिए कॉलेज नहीं खुलने चाहिए।


Friday, August 21, 2026

 जब बड़े सो रहे थे, बच्चों ने घंटी बजा दी!  

जंतर-मंतर से यूपी के गांवों तक उठती आवाज़

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

23 अगस्त, 2026

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कल्पना कीजिए, श्याम बेनेगल की मशहूर फिल्म अंकुर का वह आखिरी दृश्य। गांव का एक छोटा लड़का सब कुछ चुपचाप देख रहा है: जमींदार की हुकूमत, गरीबों की बेबसी और अन्याय का खेल।

फिर अचानक वह एक पत्थर उठाता है।

पत्थर हवेली की ओर उछलता है। स्क्रीन लाल हो जाती है। एक छोटा-सा पत्थर, मगर उसके भीतर बगावत का एक बड़ा बीज छिपा है।

आज 2026 के भारत में वही दृश्य फिर याद आता है।

इस बार पत्थर असली नहीं है। कभी वह परीक्षा में पेपर लीक के खिलाफ नारा बनता है। कभी सोशल मीडिया का मीम बनता है। कभी जंतर-मंतर पर छात्रों की भीड़ बन जाता है। और अब वही आवाज उत्तर प्रदेश के गांवों के स्कूलों तक पहुंच रही है।

उन्नाव, लखनऊ, कन्नौज और हमीरपुर में बच्चे सवाल पूछ रहे हैं। खाना ठीक क्यों नहीं? पीने का पानी कहां है? शिक्षक पूरे क्यों नहीं हैं? स्कूल तक पहुंचने के लिए सड़क क्यों नहीं है?

हमीरपुर के चंदूपुर और आसपास के गांवों में सैकड़ों बच्चे अपनी मांग लेकर कलेक्ट्रेट तक पहुंच गए। उनकी मांग कोई आसमान से तारे तोड़ने वाली नहीं थी। बस स्कूल तक जाने के लिए एक ठीक सड़क चाहिए थी।

बच्चों को समझाने और दबाव डालने की कोशिशें हुईं। मगर इस बार बच्चे चुप रहने को तैयार नहीं थे। 


असल में यह आग कहीं और भड़की थी।

दिल्ली के जंतर-मंतर पर।

शुरुआत हुई परीक्षा के पेपर लीक से। खासकर NEET-UG जैसी बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा ने लाखों युवाओं का भरोसा हिला दिया। छात्रों को लगा कि वे सालों पढ़ें, कोचिंग में लाखों खर्च करें और आखिर में कोई पेपर चुरा ले जाए; तो मेहनत का मतलब क्या रह जाता है?

कुछ युवा प्रदर्शनकारियों ने अपने समूह को मजाकिया अंदाज में “कॉकरोच जनता पार्टी” कहा। नाम अजीब था, तरीका भी नया था। पुराने छात्र संगठनों और लंबे-लंबे भाषणों की जगह मीम थे, इंस्टाग्राम था, वीडियो थे और सोशल मीडिया का शोर था।

मगर धीरे-धीरे हंसी के पीछे का गुस्सा साफ दिखाई देने लगा।

सोनम वांगचुक भूख हड़ताल पर बैठे। 20 जुलाई को संसद की ओर बढ़ रहे प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच तनाव पैदा हुआ। पुलिस ने रोका, प्रदर्शनकारियों ने दबाव बनाए रखा।

और फिर हुआ वह, जिसकी शायद किसी ने उम्मीद नहीं की थी।

सड़क का दबाव सत्ता के दरवाजे तक पहुंच गया।

25 जुलाई को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। यह मोदी दौर की राजनीति में एक असाधारण घटना मानी गई। पहली बार लगा कि सड़क पर खड़े साधारण छात्रों की आवाज किसी बड़े मंत्री की कुर्सी तक पहुंच सकती है।

इसके बाद कार्रवाई का सिलसिला शुरू हुआ। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी से जुड़े करीब 600 अधिकारियों को हटाया गया। परीक्षा प्रश्नपत्रों की जांच के लिए नई चार-स्तरीय व्यवस्था बनाई गई। परीक्षा केंद्रों और गोपनीयता की सुरक्षा और कड़ी की गई।

15 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं के लिए मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग और एक करोड़ युवाओं को एआई प्रशिक्षण देने की घोषणा की। इसके बाद मंत्री विश्वविद्यालय परिसरों में सीधे पहुंचने लगे। “वन डे, वन यूनिवर्सिटी” जैसे कार्यक्रम शुरू हुए।

सवाल यह है कि यह सब किसने कराया?

न कोई बड़ा विपक्षी आंदोलन।

न कोई अनुभवी राजनीतिक दल।

न कोई स्थापित छात्र यूनियन।

यह काम उन युवाओं ने किया, जिन्हें राजनीति अक्सर नासमझ समझती रही है।

दिलचस्प बात यह भी रही कि जिस विपक्ष से सरकार को चुनौती देने की उम्मीद थी, वह लंबे समय से दिशा खोजता नजर आया। राहुल गांधी के नेतृत्व वाला विपक्ष लगातार चुनावी हार और संगठनात्मक कमजोरियों से जूझता रहा। INDIA गठबंधन भी कोई ऐसी साफ कहानी नहीं बना पाया, जो आम मतदाता को एक मजबूत विकल्प दिखाई दे।

संसद में हंगामा हुआ, विरोध हुआ, नारे लगे। मगर सत्ता की चमक पर कोई खास खरोंच नहीं आई।

फिर अचानक जंतर-मंतर पर यह अजीब-सी हलचल शुरू हुई।

“कॉकरोच” वाला तमाशा, तीखी भाषा, गालियां और निजी हमले:  कुछ  लोगों को भद्दा लगा लड़कियों द्वारा गालियां बकना; लड़के तो लड़के होते हैं!  मगर राजनीति के ठहरे हुए तालाब में किसी ने पत्थर जरूर फेंक दिया था।

लहरें उठीं।

इसे 1970 के दशक के जयप्रकाश नारायण आंदोलन से मिलाना आसान है। तब भी छात्र फीस, भ्रष्टाचार और व्यवस्था से परेशान थे। बाद में आंदोलन “संपूर्ण क्रांति” तक पहुंच गया। लोकनायक जयप्रकाश नारायण एक नैतिक चेहरा बने। इस बार सोनम वांगचुक ने भी युवाओं के गुस्से को एक नैतिक ताकत देने की अधूरी कोशिश की।

मगर दोनों आंदोलनों में बड़ा फर्क है।

जेपी आंदोलन पूरी व्यवस्था बदलना चाहता था। 2026 के छात्रों की मांगें ज्यादा सीधी थीं: पेपर लीक बंद करो, जिम्मेदारों को हटाओ, परीक्षा व्यवस्था ठीक करो।

और सबसे बड़ी बात, इनकी राजनीति व्हाट्सऐप, मीम और इंस्टाग्राम पर बनी।

यह यूनियन के दफ्तरों की राजनीति नहीं थी।

यह मोबाइल फोन की राजनीति थी।

लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई है।

जंतर-मंतर का छोटा पत्थर अब उत्तर प्रदेश के गांवों तक पहुंच गया है। अब बच्चे पेपर लीक के खिलाफ ही नहीं, स्कूल पहुंचने की सड़क, साफ पानी, अच्छा खाना और शिक्षक की मांग कर रहे हैं।

यही असली इम्तिहान है।

मंत्री का इस्तीफा हो जाना आसान है। कुछ अफसरों को हटाना भी आसान है। नई नीति की घोषणा करना तो सबसे आसान काम है।

मुश्किल काम है व्यवस्था को बदलना।

भारत की कोचिंग संस्कृति अभी भी जवान है। परीक्षा का जुनून अभी भी बेकाबू है। गांवों के स्कूलों की हालत कई जगह खराब है। डिग्री और रोजगार के बीच की खाई भी जस की तस है।

फिर भी एक बात साफ हो गई है।

जब बड़े लोग सो जाते हैं, कभी-कभी बच्चे घंटी बजा देते हैं।

अंकुर के उस बच्चे ने एक पत्थर फेंका था।

2026 के बच्चों ने भी पत्थर फेंका है।

अब देखना यह है कि सत्ता पक्ष उस पत्थर को सिर्फ एक शरारत समझती है, या उसके भीतर उगते नए अंकुर को पहचानती है। गनीमत है कि केंद्र सरकार ने इसे पॉजिटिव दृष्टि से लिया है, और तत्परता से आवश्यक पहलें  की हैं।


 रेगिस्तान की रेत से बोर्डरूम तक: शेखावाटी के मारवाड़ियों ने कैसे खड़े किए भारत के कारोबारी साम्राज्य

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बृज खंडेलवाल द्वारा

22 अगस्त 2026

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कैमरा घूमता है। पर्दे पर एक भव्य हवेली दिखाई देती है। मोटे-से सेठजी अपनी गद्दी पर बैठे हैं। आसपास बही-खाते, तिजोरियां और रुपयों के बक्से रखे हैं। पास में पुराने हिन्दी सिनेमा के परिचित मुनीमजी खड़े हैं, एक्टर कन्हैया लाल, चेहरे पर चालाक मुस्कान और हाथ में मोटा हिसाब-किताब।

कोई मदद मांगता है, तो पहले खर्च का हिसाब होता है। कोई कर्ज मांगता है, तो ब्याज की नई दर खुल जाती है। दशकों तक हिन्दी फिल्मों ने मारवाड़ी व्यापारी की एक ऐसी छवि बनाई; चतुर, कंजूस और हर समय मुनाफे के पीछे भागने वाला।

लेकिन पूरी सच्चाई इतनी भर नहीं थी।

यह छवि दर्शकों का मनोरंजन जरूर करती रही, मगर एक जीवंत और कर्मठ समुदाय को मजाकिया या खलनायक जैसे किरदारों तक सीमित कर दिया गया। मारवाड़ियों ने केवल दौलत नहीं कमाई। उन्होंने कारखाने लगाए, रोजगार पैदा किए, स्कूल और अस्पताल बनाए और आधुनिक भारत के उद्योगों की बुनियाद मजबूत की।

इस कहानी की शुरुआत राजस्थान के शेखावाटी इलाके से होती है; चूरू, सीकर और झुंझुनूं का सूखा और कठिन भूभाग। यहां पानी कम था, खेती अनिश्चित थी और गर्मियों में धरती अंगारों जैसी तपती थी। इस इलाके ने लोगों को वह सब सिखाया, जो उपजाऊ मैदान शायद ही सिखा पाते हैं; मुश्किल हालात में जीना और कमी को अवसर में बदलना।

इन्हीं धूल भरे कस्बों से भारत के कई बड़े कारोबारी घराने निकले: बिड़ला, बजाज, डालमिया, गोयनका, सिंघानिया, पोद्दार, रूइया, पीरामल और अनेक अन्य। पीढ़ी-दर-पीढ़ी इन परिवारों ने देश के उद्योग, व्यापार और वित्तीय दुनिया की तस्वीर बदली।

मगर शेखावाटी का योगदान केवल कारोबार तक सीमित नहीं रहा। झुंझुनूं को शहीदों की नगरी भी कहा जाता है। यहां के गांवों से पीढ़ियों से नौजवान सेना में जाते रहे हैं। एक तरफ सीमा पर देश की रक्षा करने वाला जवान था, दूसरी तरफ देश की आर्थिक ताकत बढ़ाने वाला उद्यमी। दोनों को हिम्मत, अनुशासन और सब्र की जरूरत थी।

नक्शे को गौर से देखिए, तो व्यापार का इतिहास एकदम निजी और जीवंत लगने लगता है।

पिलानी का नाम बिड़ला परिवार से जुड़ा है। उन्नीसवीं सदी में शिव नारायण बिड़ला बंबई गए और उनके वंशजों ने भारत के सबसे बड़े औद्योगिक घरानों में से एक खड़ा किया। चिड़ावा डालमियाओं से जुड़ा रहा। नवलगढ़ ने गोयनका, पोद्दार, केड़िया, सेक्सारिया और मोरारका जैसे कारोबारी परिवारों को जन्म दिया। रामगढ़ का रिश्ता रूइया और पोद्दार परिवारों से है, जबकि बगर पीरामल परिवार से जुड़ा है।

सीकर के पास काशी का बास में जमनालाल बजाज का जन्म हुआ। आगे चलकर वे बड़े उद्योगपति ही नहीं, बल्कि आजादी की लड़ाई के प्रमुख समर्थक भी बने। चूरू के सादुलपुर ने लक्ष्मी मित्तल को जन्म दिया, जिन्होंने दुनिया भर में इस्पात का विशाल साम्राज्य खड़ा किया। सिंघानिया, सर्राफ, मोदी और अनेक परिवारों ने भी अपने-अपने ढंग से ऐसी ही राह तय की।

दिलचस्प बात यह है कि इनमें से अधिकतर दौलत शेखावाटी में नहीं बनी। रेगिस्तान ने उन्हें जड़ें दीं, जबकि कोलकाता, बंबई और दूसरे व्यापारिक शहरों ने उन्हें बड़ा मंच दिया।

मारवाड़ियों की सफलता केवल मितव्ययिता या बचत का नतीजा नहीं थी। इसके पीछे भरोसा, अनुशासन और बदलते समय के साथ ढलने की क्षमता थी। आर्थिक इतिहासकार थॉमस ए. टिम्बर्ग ने इस सफलता के कई महत्वपूर्ण कारण बताए हैं।

सबसे पहले था समुदाय का मजबूत नेटवर्क। शेखावाटी से निकलने वाला कोई युवा आर्थिक मायने में कभी अकेला नहीं होता था। रिश्तेदार उसे व्यापारियों से मिलवाते, रहने की जगह देते, उधार दिलाते और कारोबार की तालीम का इंतजाम करते। एक व्यापारी की सफलता दूसरे के लिए रास्ता खोलती। गांव और परिवार के रिश्ते धीरे-धीरे देशव्यापी कारोबारी नेटवर्क बन गए।

दूसरी बड़ी चीज थी साख।

नकद पैसा जरूरी था, लेकिन आदमी का वचन अक्सर उससे भी ज्यादा कीमती माना जाता था। व्यापारी पैसा खोकर फिर संभल सकता था, लेकिन साख खोने पर कारोबार के दरवाजे बंद हो सकते थे।

टिम्बर्ग ने मारवाड़ी व्यापारियों के कड़े वित्तीय अनुशासन पर भी जोर दिया। पारंपरिक बही-खाता केवल हिसाब लिखने की किताब नहीं था। वह रोजाना मुनाफे, नुकसान और जिम्मेदारियों पर नजर रखने की पूरी संस्कृति थी। साथ ही, जरूरत पड़ने पर सोच-समझकर जोखिम उठाने का साहस भी था, खासकर वस्तुओं के व्यापार और सट्टे में।

सबसे बड़ी खूबी थी उनकी अनुकूलन क्षमता।

मुगल दौर में मारवाड़ी वित्तदाता और साहूकार बने। अंग्रेजों के समय वे दलाल, ब्रोकर और व्यापारिक मध्यस्थ बने। बाद में उन्होंने तेजी से उद्योगों की तरफ कदम बढ़ाया। संयुक्त परिवार और आपसी भरोसे की पुरानी व्यवस्था आधुनिकता के रास्ते में रुकावट नहीं बनी। उलटे, इनसे पूंजी जुटाने, जोखिम बांटने और लंबे कारोबारी रिश्ते निभाने में मदद मिली।

भूगोल ने भी इस सफलता में अपना हिस्सा निभाया। अठारहवीं सदी में स्थानीय शासकों ने रास्ते के कर कम किए और व्यापार को बढ़ावा दिया। कपास, ऊन और मसालों से भरे काफिले इस इलाके से गुजरते थे। उन्नीसवीं सदी में रेलवे के आने से व्यापार की दुनिया बदल गई। कोलकाता और बंबई नए आकर्षण केंद्र बन गए।

शेखावाटी के व्यापारी वहां पहुंचे। पहले व्यापारी और वित्तदाता के रूप में, फिर मिलों, कारखानों और बड़े औद्योगिक घरानों के मालिक के रूप में। बीसवीं सदी तक वे कपड़ा, जूट, इस्पात, सीमेंट, मोटर उद्योग और वित्त की दुनिया के बड़े खिलाड़ी बन चुके थे।

रेगिस्तान ने उन्हें चलना सिखाया, बाजार ने उन्हें विस्तार करना सिखाया।

कमी एक सख्त उस्ताद थी। अनिश्चित बारिश, कीमती पानी और स्थानीय अवसरों की कमी ने लोगों को बाहर निकलने के लिए मजबूर किया। सेना की परंपरा को मजबूत करने वाला अनुशासन और धैर्य ही कारोबारियों के भी काम आया।

धर्म और सामुदायिक संस्थाओं ने भी सामाजिक रिश्तों को मजबूत रखा। रानी सती, खाटू श्यामजी और सालासर बालाजी जैसे तीर्थ आज भी आस्था के बड़े केंद्र हैं। मंडावा, नवलगढ़, फतेहपुर और रामगढ़ की रंगीन हवेलियां एक और कहानी कहती हैं। ये उन परिवारों की निशानियां हैं, जिन्होंने दूर-दराज के शहरों में दौलत कमाई, लेकिन अपने रेगिस्तान को सजाने के लिए लौट आए।

शेखावाटी की कहानी को केवल जाति या व्यापार की कहानी नहीं कहा जा सकता। राजपूत समुदायों ने मजबूत सैन्य और जमींदारी परंपराएं विकसित कीं। अग्रवाल, माहेश्वरी, ओसवाल और दूसरे व्यापारी समुदायों ने शक्तिशाली कारोबारी नेटवर्क बनाए।

दोनों ने देश को अलग-अलग तरह की ताकत दी; एक ने सरहदों की हिफाजत की, दूसरे ने देश की आर्थिक मांसपेशियां मजबूत कीं।

एक पुरानी कहावत इस जज्बे को खूब बयान करती है; जहां बैलगाड़ी पहुंच सकती है, वहां आखिरकार मारवाड़ी भी पहुंच जाएगा।

कुदरत ने इस इलाके को बहुत कम दिया था। मगर इसके लोगों ने भरोसे, साख, अनुशासन, गतिशीलता और लगातार मेहनत से मौके पैदा किए।

रेगिस्तान ने न तो जादू से अरबपति पैदा किए, न सैनिक। उसने बस ऐसे हालात पैदा किए, जिनमें संघर्ष करने की क्षमता आदत बनी ; और वही आदत, वक्त के साथ, इतिहास बन गई।

Thursday, August 20, 2026

 

तिब्बती भारत में: क्या वे कभी लौटेंगे, या हमेशा के मेहमान बन जाएंगे?


बृज खंडेलवाल द्वारा
20 अगस्त, 2026


एक मातृभूमि रोज़मर्रा की जिंदगी से दूर हो सकती है, लेकिन यादों से नहीं मिटती। भारत में रह रहे हजारों तिब्बतियों के लिए तिब्बत आज भी एक सपना भी है और एक ज़ख्म भी—एक ऐसी धरती, जिसे उनमें से बहुतों ने कभी देखा तक नहीं, फिर भी अपना घर मानते हैं।

तिब्बतियों के बड़े पलायन को छह दशक से अधिक समय बीत चुका है। लेकिन एक कठिन सवाल आज भी पीछा नहीं छोड़ता—क्या तिब्बती कभी अपनी मातृभूमि लौट पाएंगे, या अस्थायी निर्वासन चुपचाप एक स्थायी बसावट में बदल चुका है?

इस सप्ताह कर्नाटक में यह सवाल फिर चर्चा में आया। तिब्बती प्रतिनिधियों ने राज्य के वरिष्ठ राजनीतिक नेताओं से मुलाकात की और अपने समुदाय के लिए अधिक सहयोग तथा तिब्बती मुद्दे पर नए सिरे से ध्यान देने की मांग की।

बेंगलुरु में नवनिर्वाचित तिब्बती सांसद चोपेल ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार से मुलाकात की। उन्होंने कल्याण, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और तिब्बती संस्कृति के संरक्षण के लिए राज्य सरकार से सहायता मांगी। विशेष रूप से दक्षिण भारत की सबसे बड़ी तिब्बती बस्तियों में से एक, बायलाकुप्पे के तिब्बतियों की समस्याएं उठाई गईं।

बताया जाता है कि शिवकुमार ने सहयोग का भरोसा दिया। उन्होंने तिब्बती संस्कृति को अधिक स्थान देने और मैसूरु दशहरा समारोह में तिब्बती समुदाय की भागीदारी बढ़ाने का भी आश्वासन दिया।

मैसूरु में, हुंसूर के निकट गुरुपुरा तिब्बती बस्ती के एक अन्य प्रतिनिधिमंडल ने सांसद यदुवीर वाडियार से मुलाकात की। उन्होंने उनसे संसद और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तिब्बती मुद्दा उठाने का आग्रह किया।

प्रतिनिधिमंडल ने 2 जुलाई को न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के बाहर तिब्बती कार्यकर्ता लोबगा रंगजेन के आत्मदाह का मुद्दा भी उठाया। यह दर्दनाक घटना याद दिलाती है कि तिब्बत का सवाल आज भी जिंदा है और लोगों की भावनाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है।

तिब्बती नेताओं की मांगें केवल राजनीति तक सीमित नहीं थीं। उन्होंने स्कूलों, स्वास्थ्य सेवाओं, कल्याणकारी योजनाओं तथा तिब्बती भाषा, धर्म और संस्कृति के संरक्षण के लिए भी सहायता मांगी।

लेकिन इन तात्कालिक मांगों के पीछे एक और बड़ा सवाल छिपा है—जब निर्वासन पीढ़ियों तक चलने लगे, तो आखिर उसका भविष्य क्या होता है?

भारत में तिब्बती निर्वासन की कहानी 1959 में शुरू हुई। चीन के शासन के खिलाफ विद्रोह के बाद दलाई लामा तिब्बत से निकल आए। हजारों तिब्बती खतरनाक हिमालयी दर्रों को पार करते हुए उनके पीछे भारत पहुंचे। वे अपने घर, परिवार और सदियों पुरानी जीवन-पद्धति पीछे छोड़ आए थे।

तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में भारत ने उन्हें शरण दी। बस्तियां बसाने, मठ बनाने और स्कूल खोलने के लिए जमीन उपलब्ध कराई गई। धीरे-धीरे और बड़ी मुश्किलों के बीच एक उजड़ा हुआ समुदाय फिर से अपनी जिंदगी बनाने लगा।

धर्मशाला तिब्बती निर्वासित समुदाय का आध्यात्मिक और राजनीतिक केंद्र बन गया। वहीं से केंद्रीय तिब्बती प्रशासन आज भी काम करता है। यह संस्था शिक्षा, कल्याण, संस्कृति और विदेशों में रह रहे तिब्बतियों के लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व से जुड़े कार्यों को संभालती है।

समय के साथ भारत के अनेक हिस्सों में तिब्बती बस्तियां बस गईं। कर्नाटक में बायलाकुप्पे, मुंडगोड और गुरुपुरा जैसी बड़ी बस्तियां विकसित हुईं। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में भी महत्वपूर्ण तिब्बती समुदाय बस गए।

पहली पीढ़ी के शरणार्थियों ने भारी कठिनाइयां झेलीं। उन्होंने जमीन साफ की, खेती शुरू की और लगभग शून्य से अपने घर बसाए। मठ फिर खड़े हुए। स्कूलों में तिब्बती भाषा और इतिहास पढ़ाया जाने लगा। हस्तशिल्प, खेती, रेस्तरां और छोटे कारोबारों ने परिवारों को सहारा दिया।

जो शुरुआत में शरणार्थियों के अस्थायी शिविर थे, वे धीरे-धीरे एक संगठित समुदायों के नेटवर्क में बदल गए।

भारत वह पनाहगाह था, जिसकी तिब्बतियों को सख्त जरूरत थी। लेकिन वक्त गुजरने के साथ वही पनाहगाह धीरे-धीरे घर जैसा लगने लगा।

यहीं से असली विरोधाभास शुरू होता है।

भारत में जन्मे अनेक युवा तिब्बतियों ने कभी तिब्बत देखा ही नहीं। वे भारतीय भाषाएं बोलते हैं, भारतीय स्कूलों और विश्वविद्यालयों में पढ़ते हैं तथा भारतीय दोस्तों और पड़ोसियों के बीच बड़े होते हैं। फिर भी उनकी पहचान में तिब्बत की जगह बेहद गहरी है।

तिब्बत उनकी प्रार्थनाओं में बसता है। उनके गीतों, मठों और परिवारों की कहानियों में तिब्बत जिंदा रहता है।

एक युवा तिब्बती शायद ल्हासा की गलियों से ज्यादा मैसूरु की सड़कों को जानता हो। फिर भी तिब्बत की स्मृति उसके अपनेपन और पहचान की भावना को तय करती रहती है।

इस बीच निर्वासित समुदाय भी बदल रहा है। कड़े सीमा नियंत्रण के कारण तिब्बत से नए लोगों का आना काफी कम हो गया है। दूसरी ओर, कई युवा तिब्बती उच्च शिक्षा और बेहतर करियर के लिए अमेरिका, कनाडा, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया जा रहे हैं।

नतीजा एक अजीब और दर्दनाक विडंबना है।

जो समुदाय तिब्बत से कभी वापस लौटने की उम्मीद लेकर निकला था, वह अब दुनिया भर में बिखर गया है। हर नई पीढ़ी के साथ तिब्बत से उसकी भौतिक दूरी और बढ़ती जा रही है।

निकट भविष्य में बड़े पैमाने पर तिब्बतियों की वापसी की संभावना धुंधली दिखाई देती है। तिब्बती आकांक्षाओं और बीजिंग की नीतियों के बीच राजनीतिक मतभेद अभी तक सुलझे नहीं हैं। निर्वासन में रह रहे अनेक तिब्बतियों को चीन के शासन में धर्म, भाषा और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति पर प्रतिबंधों की चिंता है।

फिर भी उम्मीद बड़ी ज़िद्दी चीज़ है।

बुजुर्ग तिब्बतियों के लिए वापसी आज भी एक पवित्र सपना है। युवा पीढ़ी के लिए यह सपना व्यावहारिक सवालों से जुड़ गया है—शिक्षा, रोजगार, नागरिकता, पहचान और अनिश्चित भविष्य।

इस पूरी कहानी में भारत की जगह बहुत खास है। भारत तिब्बत नहीं है। फिर भी अनेक तिब्बतियों के लिए भारत ही एकमात्र घर है, जिसे उन्होंने अपनी आंखों से जाना है।

शायद लंबे निर्वासन की सबसे बड़ी त्रासदी यही है। एक अस्थायी पनाहगाह बिना किसी औपचारिक फैसले के स्थायी घर बन सकता है।

वापसी की प्रार्थना आज भी जारी है। निर्वासित बस्तियों में तिब्बती झंडा अब भी लहराता है। मठ पुरानी परंपराओं को संभाले हुए हैं। बच्चे उस मातृभूमि की भाषा सीख रहे हैं, जो उनकी पहुंच से बहुत दूर है।

लेकिन इतिहास अपनी चाल चलता रहता है।

क्या तिब्बती कभी तिब्बत लौटेंगे? इसका जवाब कोई निश्चित रूप से नहीं दे सकता।

फिलहाल वे स्मृति और हकीकत के बीच जी रहे हैं—एक घर को दिल में संभाले हुए और दूसरे घर में अपनी जिंदगी बनाते हुए।

भारत ने कभी मजबूर और बेघर शरणार्थियों के लिए अपने दरवाजे खोले थे। साठ साल से अधिक समय बाद वे मेहमान अब पड़ोसी, सहकर्मी, विद्यार्थी, भिक्षु, कारोबारी और भारत के व्यापक सामाजिक परिदृश्य का हिस्सा बन चुके हैं।

तिब्बत का सपना आज भी जिंदा है। लेकिन हर गुजरती पीढ़ी के साथ भारत थोड़ा कम निर्वासन और थोड़ा ज्यादा घर बनता जा रहा है।

Wednesday, August 19, 2026

 विश्व फोटोग्राफी डे: 

ताज कैमरे की आंख में कैद होती एक अनंत कहानी

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बृज खंडेलवाल द्वारा

19 अगस्त 2026

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एक क्लिक होता है और सदियों पुरानी इमारत अचानक जिंदा हो उठती है। संगमरमर पर ठहरी रोशनी बदलती है, यमुना की लहरें करवट लेती हैं और ताजमहल एक नए चेहरे के साथ कैमरे में उतर जाता है। 

सवाल यह है कि आखिर इस इमारत में ऐसा क्या है, जो लाखों तस्वीरों के बाद भी कैमरे को फिर से क्लिक करने के लिए मजबूर करता है?

यही ताज का जादू है। सदियां गुजर गईं, कैमरे बदल गए, तकनीक आसमान छू गई, लेकिन ताज की तस्वीर का आकर्षण कम नहीं हुआ।

विश्व फोटोग्राफी दिवस, 19 अगस्त, पर ताजमहल एक बार फिर कैमरे की दुनिया के केंद्र में है। 17वीं सदी का यह मकबरा फोटोग्राफी की कई पीढ़ियों का गवाह रहा है। भारी लकड़ी के कैमरों और कांच की प्लेटों से शुरू हुई कहानी आज स्मार्टफोन, ड्रोन और हाई-रिजॉल्यूशन कैमरों तक पहुंच चुकी है।

आगरा में फोटोग्राफी की यह दास्तान भी कम दिलचस्प नहीं है। एमजी रोड का प्रिया लाल एंड सन्स फोटो स्टूडियो इसका जिंदा सबूत है। वर्ष 1878 में शुरू हुआ यह स्टूडियो आज भी मौजूद है और परिवार की छठी पीढ़ी इस विरासत को आगे बढ़ा रही है।

उस दौर में तस्वीर खींचना चुटकी का खेल नहीं था। बिजली आम नहीं थी। कैमरे भारी थे और तस्वीर तैयार करने के लिए अंधेरे कमरे में घंटों मेहनत करनी पड़ती थी। प्रिया लाल के डार्करूम में प्राकृतिक रोशनी को पर्दों और शीशों की मदद से नियंत्रित किया जाता था। फोटोग्राफी तब तकनीक से ज्यादा सब्र, हुनर और बारीक नजर का इम्तिहान थी।

प्रिया लाल खंडेलवाल ने ताजमहल और आगरा के दूसरे ऐतिहासिक स्मारकों की अनेक तस्वीरें तैयार कीं। उनकी तस्वीरें इंग्लैंड की महारानी तक पहुंचीं और उन्हें स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया। उनकी पुस्तक ‘Pictorial Agra’ में आगरा के स्मारकों की 25 हाफ-टोन तस्वीरें और उनका संक्षिप्त इतिहास दर्ज है। यह सिर्फ तस्वीरों की किताब नहीं, बल्कि उस दौर के आगरा की एक दृश्य स्मृति है।

लेकिन आगरा और ताज की फोटोग्राफी की कहानी राजा दीन दयाल के बिना अधूरी है। 1844 में जन्मे दीन दयाल ने 19वीं सदी के भारत को कैमरे की नजर से दुनिया के सामने रखा। वे हैदराबाद के निजाम के दरबारी फोटोग्राफर बने और उन्हें ‘राजा मुसव्विर जंग’ की उपाधि मिली।

उनका कैमरा आज के मोबाइल फोन की तरह जेब में नहीं समाता था। विशाल लकड़ी के कैमरे, कांच की प्लेटें और भारी ट्राइपॉड लेकर वे बैलगाड़ियों और सहायकों के साथ लंबी यात्राएं करते थे। महल, किले, मंदिर, मस्जिदें, स्मारक, राजसी जुलूस, हाथी और शिकार; उन्होंने भारत की पूरी शानो-शौकत को अपने लेंस में समेटने की कोशिश की।

हैदराबाद में उनके कैमरे ने केवल इमारतों की खूबसूरती नहीं दिखाई। उसने रियासती जिंदगी, पहनावे, रस्मों, दरबारों और शाही ठाठ को भी हमेशा के लिए दर्ज कर दिया। आज उनके भारी कैमरे और कांच की नेगेटिव प्लेटें किसी संग्रहालय की वस्तु लग सकती हैं, लेकिन उन तस्वीरों में उन्नीसवीं सदी का भारत आज भी सांस लेता दिखाई देता है।

दीन दयाल की तस्वीरें एक अहम बात सिखाती हैं; बेहतरीन तस्वीर कैमरा नहीं, नजर बनाती है।

ताजमहल इस कहावत को हर रोज सही साबित करता है। फोटोग्राफर के सामने यहां केवल एक इमारत नहीं होती। रोशनी, पानी, आसमान, बादल, पेड़ और छाया मिलकर हर पल नया फ्रेम बनाते हैं।

सुबह की नरम धूप संगमरमर को गुलाबी और सुनहरा कर देती है। दोपहर में उसकी सफेदी तेज चमकती है। शाम ढलते ही ताज किसी पुराने ख्वाब की तरह नजर आता है। पूर्णिमा की रात वही इमारत चांदनी में तैरती हुई लगती है।

यमुना इस दृश्य की खामोश साझेदार है। पानी में ताज का प्रतिबिंब तस्वीर को एक अलग गहराई देता है। धुंध आए तो रहस्य बढ़ जाता है। बादल घिरें तो दृश्य में नाटकीयता उतर आती है। मेहताब बाग से नदी पार का दृश्य हो या मुख्य द्वार से लिया गया क्लासिक फ्रेम, हर कोण अपनी अलग कहानी कहता है।

ताज की तस्वीरों की लोकप्रियता को डायना बेंच ने भी नया आयाम दिया। 1992 में राजकुमारी डायना की यहां खींची गई तस्वीर ने इस जगह को दुनिया के सबसे चर्चित फोटो स्पॉट्स में शामिल कर दिया।

ताजमहल 1983 से यूनेस्को विश्व धरोहर है और 2007 में न्यू सेवन वंडर्स ऑफ द वर्ल्ड में शामिल हुआ। हर साल लाखों पर्यटक आगरा आते हैं। आज लगभग हर हाथ में स्मार्टफोन है। लिहाजा ताज की तस्वीरें अब सिर्फ पेशेवर कैमरों से नहीं, मोबाइल स्क्रीन से भी पैदा होती हैं।

सेल्फी, रील और सोशल मीडिया ने ताज को एक नया डिजिटल जीवन दिया है। कभी फोटोग्राफर घंटों एक सही फ्रेम का इंतजार करता था। आज पर्यटक कुछ सेकंड में दर्जनों तस्वीरें खींच लेते हैं।

फिर भी सवाल अपनी जगह कायम है: लाखों तस्वीरों के बाद भी ताज पुराना क्यों नहीं पड़ता?

शायद इसलिए कि ताज सिर्फ पत्थर का स्मारक नहीं, एहसास का स्मारक है। हर आंख उसे अलग ढंग से देखती है और हर फोटोग्राफर उसमें कोई नया कोण खोज लेता है।

राजा दीन दयाल के भारी कैमरे से लेकर आज के स्मार्टफोन तक तकनीक ने लंबा सफर तय किया है। कैमरा छोटा होता गया, तस्वीर ज्यादा साफ होती गई, शूटिंग आसान होती गई। मगर ताज के सामने खड़ी हैरत आज भी वैसी ही है।

विश्व फोटोग्राफी दिवस पर ताज का पैगाम साफ है; कैमरा छोटा हो सकता है, मगर नजर बड़ी होनी चाहिए।

 राखी के धागे में देशभक्ति का रंग, बाजार में ‘स्वदेशी’ की धूम

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

20 अगस्त 2026

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ढोलक की थाप, रंग-बिरंगी राखियां और मिठाइयों की खुशबू से बाजार गुलजार हैं। दुकानों पर बहनें राखियां चुन रही हैं, बच्चे उत्साह में हैं और भाई भी इस बार कलाई पर सिर्फ प्यार नहीं, देशभक्ति का धागा बांधने को तैयार हैं।

28 अगस्त को मनाए जाने वाले रक्षाबंधन से पहले देशभर के बाजारों में स्वदेशी राखियों की मांग तेजी से बढ़ी है। इस बार राखी का त्योहार भाई-बहन के रिश्ते के साथ आत्मनिर्भर भारत के संदेश का भी वाहक बनता दिख रहा है।

कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAIT) के मुताबिक, इस साल राखी से जुड़े कारोबार का अनुमान करीब 25 हजार करोड़ रुपये है। पिछले साल यह आंकड़ा करीब 17 हजार करोड़ रुपये था। मिठाई, कपड़े, उपहार और पैकेजिंग को जोड़ दें तो त्योहार का कुल कारोबार 30 हजार करोड़ रुपये से ऊपर जाने की उम्मीद है।

राखी में ‘विकसित भारत’ का संदेश

बाजार में पारंपरिक राखियों के साथ कई थीम आधारित राखियां भी खूब पसंद की जा रही हैं। इनमें ‘विकसित भारत’, ‘मोदी गारंटी’, ‘आत्मनिर्भर भारत’, ‘वोकल फॉर लोकल’, ‘भारत गौरव’, ‘ब्रह्मोस’, ‘राष्ट्र रक्षा सूत्र’ और ‘अमृत काल’ जैसी राखियां शामिल हैं।

‘नारी वंदन’, ‘लखपति दीदी’ और ‘नमामि गंगे’ जैसी राखियां भी लोगों का ध्यान खींच रही हैं। बच्चों और युवाओं में खास तौर पर ब्रह्मोस, राष्ट्र रक्षा सूत्र और विकसित भारत वाली राखियों को लेकर उत्साह दिखाई दे रहा है।

CAIT के महासचिव और चांदनी चौक के सांसद प्रवीण खंडेलवाल के मुताबिक, ‘वोकल फॉर लोकल’, ‘लोकल फॉर ग्लोबल’ और आत्मनिर्भर भारत की सोच ने ग्राहकों का भरोसा बढ़ाया है। उनके अनुसार, स्वदेशी राखी अब सिर्फ एक सामान नहीं, बल्कि देश के प्रति गर्व का प्रतीक बन रही है।

CAIT के राष्ट्रीय अध्यक्ष बी.सी. भरतिया का कहना है कि इन राखियों के जरिए बहनें केवल कलाई पर पवित्र धागा नहीं बांध रहीं। वे राष्ट्र निर्माण, महिला सशक्तीकरण, स्वदेशी आंदोलन, पर्यावरण संरक्षण और राष्ट्रीय सुरक्षा का संदेश भी दे रही हैं।

राखी में भारत की कारीगरी

इस बार राखियों का बाजार सिर्फ देशभक्ति तक सीमित नहीं है। इसमें भारत की विविध लोक कला और कारीगरी भी खूब नजर आ रही है।

नागपुर की खादी राखियां, जयपुर की सांगानेरी कला, पुणे की बीज राखियां और असम की चाय-पत्ती से बनी राखियां ग्राहकों को आकर्षित कर रही हैं। कोलकाता की जूट, मुंबई की रेशम, बिहार की मधुबनी कला और बेंगलुरु की फूलों वाली राखियां भी खूब बिक रही हैं।

आदिवासी कारीगरों की बांस से बनी राखियों और कानपुर की मोती राखियों की भी मांग बढ़ी है। इन राखियों ने छोटे कारीगरों, स्वयं सहायता समूहों और महिला उद्यमियों के लिए कमाई के नए दरवाजे खोले हैं।

CAIT के राष्ट्रीय चेयरमैन बृजमोहन अग्रवाल ने व्यापारियों और ग्राहकों से त्योहारों में भारतीय उत्पादों को प्राथमिकता देने की अपील की है। उनका संदेश है—‘स्वदेशी अपनाएं, भारत मजबूत बनाएं।’

चीनी राखियां बाजार से बाहर

पिछले कुछ वर्षों में जिस बदलाव की आहट सुनाई दे रही थी, वह अब बाजार में साफ दिखाई दे रही है। चीनी राखियों की मांग लगभग खत्म हो चुकी है और दुकानों पर भारतीय राखियों ने उनकी जगह ले ली है।

CAIT अब देश के अलग-अलग शहरों में विशेष स्वदेशी मेले लगाने की तैयारी कर रहा है। इन मेलों में महिला उद्यमियों, स्वयं सहायता समूहों और स्थानीय कारीगरों को अपने हाथ से बनाए उत्पाद बेचने का मौका मिलेगा।

इस बदलाव का सीधा फायदा छोटे कारोबारियों और कुटीर उद्योगों को मिल रहा है। राखी का छोटा-सा धागा अब रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था से भी जुड़ गया है।

वृंदावन की विधवाओं की खास राखियां

इस साल एक भावुक पहल ने भी लोगों का ध्यान खींचा है। वृंदावन की विधवाओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए 1,100 से अधिक विशेष राखियां तैयार की हैं।

इन राखियों में सिर्फ धागा नहीं, बल्कि अपनापन, उम्मीद और सामाजिक जुड़ाव का संदेश भी है। यह परंपरा कई वर्षों से स्नेह और एकजुटता की मिसाल बनी हुई है।

राखी भेजने के लिए डाक विभाग ने भी बड़े शहरों में विशेष काउंटर लगाए हैं, ताकि दूर रहने वाले भाइयों तक समय पर राखियां पहुंच सकें।

रक्षाबंधन अभी एक सप्ताह से अधिक दूर है, लेकिन बाजारों में त्योहार का रंग चढ़ चुका है। इस बार राखी की कलाई पर प्यार के साथ स्वदेशी, कारीगरी, रोजगार और राष्ट्र गौरव का धागा भी बंधता नजर आ रहा है।

कहने को राखी कुछ इंच का धागा है, लेकिन इस बार उसका संदेश काफी लंबा है—अपना खरीदिए, स्थानीय को बढ़ाइए और भारत को आत्मनिर्भर बनाइए।