Friday, May 8, 2026

 द ग्रेट इंडियन जुमला ओलंपिक्स

जब लोकतंत्र एक रंगमंच बन जाए


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बृज खंडेलवाल द्वारा

9 मई 2026


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भारत सिर्फ दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र नहीं है, यह दुनिया का सबसे बड़ा खुला रंगमंच भी है।

हमारे खूबसूरत मुल्क में चुनाव ऐसे आते हैं जैसे शादी, क्रिकेट फाइनल और पौराणिक धारावाहिक सबको मिलाकर एक विशाल सर्कस बना दिया गया हो। लाउडस्पीकर चीखते हैं। हेलिकॉप्टर फूल बरसाते हैं। टीवी एंकर अपनी आवाज़ खो बैठते हैं। और नेता लोग वादे ऐसे बांटते हैं जैसे भंडारे में हलवा पूरी।

सैलानियों के लिए भारत एक शानदार तमाशा पेश करता है, जिसका नाम है “द ग्रेट जुमला ओलंपिक्स।”

हर पांच साल में हर पार्टी के नेता इस पवित्र खेल प्रतियोगिता में जुटते हैं। किसी स्टेडियम की जरूरत नहीं। धूल वाला मैदान, प्लास्टिक की कुर्सियां और मुफ्त खाने के पैकेट काफी हैं। प्रतियोगी कई कठिन मुकाबलों में हिस्सा लेते हैं। स्पीच मैराथन, ब्लेम रिले, इमोशनल कुश्ती, यू टर्न जिम्नास्टिक और सबसे कठिन प्रतियोगिता “सिंक्रोनाइज्ड भूलने की कला।”

इस खेल की निर्विवाद दादा  या नानी चैंपियन थीं इंदिरा गांधी,  जिनका नारा था “गरीबी हटाओ।” गरीबी ने यह ऐलान सुना, हल्की मुस्कान दी और भारत में स्थायी किराये का मकान लेकर आराम से बैठी रही। पचास साल बाद भी गरीबी जिंदा है, तंदरुस्त है और कभी कभी खुद चुनाव भी लड़ लेती है।

फिर आया आधुनिक दौर का सबसे चर्चित जुमला “अच्छे दिन आने वाले हैं।” आह, भारतीय इतिहास के सबसे ज्यादा इंतजार किए गए मेहमान। भारतीय जनता अच्छे दिनों का इंतजार वैसे करती है जैसे यात्री छह घंटे लेट ट्रेन का करते हैं। हर साल कोई घोषणा करता है, “बस आने ही वाले हैं!” और भीड़ फिर तालियां बजा देती है।

एक और स्वर्ण पदक वाला प्रदर्शन था “इंडिया शाइनिंग” अभियान। शहरी भारत ने गर्व से सिर हिलाया, जबकि गांव का भारत सिर खुजलाकर पूछ बैठा, “शाइनिंग कहां हो रहा है भाई?” नारा इतना चमका कि मतदाताओं ने बैलेट बॉक्स की ही लाइट बंद कर दी।

ओलंपिक्स व्यक्तिगत प्रतिभा के बिना पूरे नहीं होते। मुलायम सिंह यादव ने अपने मशहूर बयान “लड़के हैं, लड़कों से गलती हो जाती है” से पूरे देश को हैरान कर दिया। उस बयान ने सिर्फ स्तर नहीं गिराया, बल्कि उसे सामान्य समझदारी के साथ जमीन के नीचे दफना दिया।

फिर कुछ नेताओं और खाप दर्शनशास्त्रियों की वैज्ञानिक खोज आई कि चाउमीन बलात्कार की वजह है। आखिरकार देश को असली खलनायक मिल गया। न पितृसत्ता, न अपराधी मानसिकता, न कमजोर पुलिस व्यवस्था। दोषी निकले नूडल्स! चीन में कोई नूडल बनाने वाला यह सुनकर शायद बेहोश हो गया होगा।

उधर नेता लोग गंगा यमुना सफाई का वादा करते रहे। अब हालत यह है कि नदी की मछलियां भी चुनावी नारे पहचानने लगी हैं। यमुना शायद दुनिया की इकलौती नदी है जिसे भाषणों में रोज साफ किया जाता है और हकीकत में हर घंटे गंदा। गडकरी का भला हो, उसने तो दिल्ली आगरा के बीच स्टीमर ही चलवा दिया होता, अगर नदी में जल होता! 

हर पार्टी के पास अपने अपने जुमलों का डिब्बा है। गुलाबी सपनों से भरा डिब्बा। जैसे आम आदमी पार्टी का भ्रष्टाचार मुक्त भारत या ममता बनर्जी का “खेला होबे।” लोकतंत्र चुनावों पर चलता है। उसे भावनात्मक तूफान चाहिए, ऐसी लहर जो तर्क और सामान्य समझ को बहाकर ले जाए। अक्सर कहानियों में सिर्फ शोर और गुस्सा होता है, सार बहुत कम।

और वह जादुई “15 लाख रुपये” वाला वादा कौन भूल सकता है? काले धन की वापसी का सपना। करोड़ों भारतीयों ने अपने बैंक खाते वैसे जांचे जैसे बच्चे परीक्षा का रिजल्ट देखते हैं। कुछ लोगों ने तो पासबुक उतनी बार अपडेट कराई जितनी बार लोग व्हाट्सऐप स्टेटस बदलते हैं। बैंक शांत रहे। ये जुमला था, अफवाह थी, गलत रिपोर्टिंग थी, आज तक स्पष्ट नहीं है।

लेकिन असली ओलंपिक चैंपियन हैं यू टर्न जिम्नास्टिक टीम के खिलाड़ी। एक दिन नेता पूरी छाती ठोककर बयान देता है। अगले हफ्ते सफाई आती है।  नया मतलब निकाला जाता है। फिर मीडिया पर दोष मढ़ा जाता है। और अंत में आता है भारतीय राजनीति का सबसे लोकप्रिय योगासन, “मेरा मतलब वह नहीं था।”

भारतीय नेताओं की रीढ़ की लचक देखकर सर्कस के बाजीगर भी जलन से रो पड़ते हैं।

लेकिन मतदाता भी भागीदारी पदक के हकदार हैं। हम शिकायतें करते हैं। राजनीतिक चुटकुले आगे भेजते हैं। मीम्स पर हंसते हैं। चाय की दुकान पर नेताओं को गालियां देते हैं। और फिर मुफ्त टोपी, बिरयानी और भावनात्मक भाषणों के लिए रैलियों में पहुंच जाते हैं। भारत में लोकतंत्र सिर्फ शासन नहीं है। यह जन मनोरंजन है।

और इस तरह जुमला ओलंपिक्स जारी रहते हैं। नए नारे आएंगे। पुराने वादे नए रंग रोगन के साथ लौटेंगे। घोषणापत्र पतंगों की तरह उड़ेंगे। टीवी बहसें बरसाती मौसम की सब्जी मंडी जैसी लगेंगी।

लेकिन एक बात तय है।

भारत में सरकारें बदल सकती हैं। पार्टियां टूट सकती हैं। विचारधाराएं कलाबाजी खा सकती हैं। मगर जुमले अमर हैं।

एक दिन सूरज ठंडा पड़ सकता है। चांद रिटायर हो सकता है। लेकिन कहीं न कहीं, किसी मंच पर, किसी विशाल कटआउट के नीचे, कोई नेता अब भी चिल्ला रहा होगा

“मित्रों… बस पांच साल और!”

Thursday, May 7, 2026

 दो हारने वालों की कहानी: एक ने हार पचाई, दूसरे ने हार से लड़ाई छेड़ी

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बृज खंडेलवाल द्वारा

8 मई 2026

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हार भी अजीब चीज़ होती है।

किसी को समझदार बना देती है। किसी को और ज़्यादा गुस्सैल।

कोई हारकर चुपचाप अपने टूटे घर की ईंटें जोड़ता है। कोई हार के बाद भी चौराहे पर खड़े होकर दुनिया को गालियाँ देता रहता है।

मई 2026 के चुनावों ने भारत को दो ऐसे “हारने वाले” दिखाए, जिनकी हार से ज्यादा दिलचस्प उनका बर्ताव था। एक तरफ तमिलनाडु में एम.के. स्टालिन। दूसरी तरफ बंगाल में ममता बनर्जी। दोनों सत्ता से बाहर हुए। दोनों को जनता ने झटका दिया। लेकिन दोनों ने हार का मतलब अलग-अलग समझा।

स्टालिन ने कहा, “जनादेश (लोकमत) स्वीकार है।”

ममता बोलीं, “जनादेश नहीं, साज़िश हुई है।”

बस, यहीं से दो रास्ते अलग हो गए।

तमिल राजनीति का पुराना उसूल है, “सत्ता आती-जाती है, संगठन बचा रहना चाहिए।” द्रविड़ राजनीति केवल तमिल अस्मिता का नारा नहीं रही। यह सामाजिक न्याय, भाषा के सम्मान और केंद्र के अति नियंत्रण के खिलाफ एक लंबा आंदोलन रहा है। स्टालिन उसी परंपरा के वारिस हैं। इसलिए हार के बाद भी उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को सड़क पर रोने नहीं भेजा। उन्होंने उन्हें अगले चुनाव की तैयारी में लगा दिया।

यह राजनीति कम और शतरंज ज्यादा लगती है। राजा गिरा है, खेल खत्म नहीं हुआ। स्टालिन जानते हैं कि जनता कभी-कभी गुस्से में सरकार बदल देती है, लेकिन वह स्थिर और गंभीर विपक्ष को पूरी तरह खारिज नहीं करती। हार को गरिमा  से स्वीकार करना भी एक राजनीतिक पूंजी होती है।

उधर बंगाल में ममता बनर्जी का अंदाज़ बिल्कुल अलग रहा।

उन्होंने हार को फैसला नहीं माना, बल्कि लड़ाई का अगला दौर समझ लिया। चुनाव आयोग पर सवाल। संस्थाओं पर आरोप। साज़िश की बातें। समर्थकों को जोश में रखने की कोशिश।

यह रणनीति भी नई नहीं है। भारतीय राजनीति में कई नेता हार के बाद “शहीद” बनने की कोशिश करते हैं। क्योंकि कभी-कभी पीड़ित दिखना, पराजित दिखने से आसान होता है।

लेकिन इसमें खतरा बड़ा है।

अगर हर हार मशीन, संस्था, आयोग और दुश्मनों की चाल बन जाए, तो फिर आत्ममंथन  कौन करेगा?

राजनीति में आईना सबसे खतरनाक चीज़ होता है। बहुत से नेता आईना तोड़ देना पसंद करते हैं।

ममता की राजनीति लंबे समय तक संघर्ष और सड़क की राजनीति पर टिकी रही। उन्होंने वामपंथ को हराया। भाजपा को चुनौती दी। खुद को “दीदी” बनाकर जनता से भावनात्मक रिश्ता जोड़ा। लेकिन हर आंदोलनकारी नेता की सबसे बड़ी मुश्किल यह होती है कि वह सत्ता में रहते हुए भी आंदोलनकारी मुद्रा छोड़ नहीं पाता।

यही बंगाल की मौजूदा त्रासदी है। हार के बाद भी तलवार म्यान में नहीं गई।

स्टालिन की राजनीति संस्था बचाने वाली दिखती है।

ममता की राजनीति व्यक्तित्व बचाने वाली।

फर्क छोटा लगता है, लेकिन लोकतंत्र की दिशा तय करता है।

तमिलनाडु की राजनीति दशकों से विचारधारा के सहारे चलती रही है। वहाँ पार्टियाँ केवल चेहरे पर नहीं टिकतीं। द्रविड़ आंदोलन ने संगठन को व्यक्ति से ऊपर रखा। शायद यही कारण है कि डीएमके हारकर भी बिखरी हुई नहीं दिखती।

बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का चेहरा ही पार्टी बन गया। जब चेहरा घायल होता है, पूरी पार्टी बेचैन दिखने लगती है।

यह केवल दो राज्यों की कहानी नहीं। यह भारतीय क्षेत्रीय राजनीति का आईना है। दिल्ली से लड़ना आसान है। खुद से लड़ना मुश्किल।

स्टालिन अभी विपक्ष में रहकर अगली सरकार बनने की तैयारी कर रहे हैं।

ममता अभी भी पिछली हार से मुकदमा लड़ रही हैं।

जनता दोनों को देख रही है।

एक नेता कह रहा है, “हम लौटेंगे।”

दूसरा कह रहा है, “हमें हराया ही नहीं गया।”

लोकतंत्र में शोर हमेशा ताकत नहीं होता। कई बार खामोशी ज्यादा खतरनाक तैयारी होती है।

भारतीय राजनीति का पुराना मुहावरा है, “हारने वाला वही नहीं जो चुनाव हार जाए, हारने वाला वह है जो सीखना छोड़ दे।”

2026 की राजनीति में दोनों हार गए।

लेकिन शायद असली सवाल यह नहीं कि कौन हारा। असल सवाल यह है कि कौन हार से बड़ा निकला।

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Wednesday, May 6, 2026

 न पत्थर का बनेगा, न रबड़ का बनेगा;

वायदों से बना है, हवाई बांध बनेगा

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शिलान्यास पर शिलान्यास, बैराज अब भी लापता !!

ताज के साए में यमुना सूखती रही, फाइलें चलती रहीं, वादे हर बार हुए, लेकिन काम हर बार अटक गया।

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बृज खंडेलवाल द्वारा

7 मई, 2026

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एक बैराज  बनाने के लिए कितने शिलान्यास पत्थर चाहिए?

और कोई दरिया  कितनी देर तक इंतज़ार कर सकता है, इससे पहले कि वह बहना ही भूल जाए?

आगरा में इन सवालों के जवाब गर्मियों की धूल की तरह हवा में तैर रहे हैं। तीन शिलान्यास। बरसों की घोषणाएँ। अनगिनत भरोसे। लेकिन ताजमहल के नीचे यमुना पर अब तक एक भी चालू बैराज नहीं।

नदी आज भी लाचार-सी बह रही है। ताज आज भी खामोश तमाशबीन बना खड़ा है। और वादों और हकीकत के बीच की खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है।

बरसों से यमुना बैराज परियोजना  एक अजीब दोहरी ज़िंदगी जी रही है। कागज़ों में यह फाइलों, प्रस्तावों और सियासी भाषणों में ज़िंदा है। ज़मीन पर इसका कहीं कोई वजूद  नहीं है।

यह उस ट्रेन की तरह है जिसकी अनाउंसमेंट  तो बार-बार होती है, मगर जो कभी प्लेटफॉर्म पर पहुँचती ही नहीं।

यह सिर्फ देरी नहीं है। यह ढीलापन है। सुस्त रफ्तार, जिद्दी ठहराव, और हैरत की बात यह कि सब इसे सामान्य मान बैठे हैं।

भारत रिकॉर्ड समय में एक्सप्रेसवे बना सकता है। जहाँ कभी नदियाँ दूरी बनाती थीं, वहाँ पुल खड़े हो जाते हैं। जहाँ खेत थे, वहाँ एयरपोर्ट उग आते हैं।

लेकिन दुनिया के सबसे मशहूर स्मारक ताजमहल के पास एक अहम और अपेक्षाकृत सीधी नदी परियोजना आज भी न्यूट्रल गियर में अटकी है।

क्यों?

क्योंकि हमारे निज़ाम  को अक्सर काम पूरा करने से ज्यादा रस्म-अदायगी  पसंद है। पहले ऐलान करो। जोरदार तालियाँ बटोर लो। बाद में सफाई देते रहो। और जब सवाल उठें तो कह दो:  “प्रक्रिया चल रही है।”

ताज के पास बैराज से कई उम्मीदें जुड़ी हैं। यमुना को फिर से जिंदा करना। ताज के आसपास का माहौल बेहतर बनाना। भूजल (groundwater) को रिचार्ज करना। पर्यावरणीय दबाव कम करना। शहर को कुछ राहत देना।

जहाँ नदी कई बार किसी सुस्त नाले जैसी लगती है, वहाँ यह कोई शौकिया परियोजना नहीं, बल्कि ज़रूरत है।

लेकिन खयाल से अमल  तक का सफर बेहद ऊबड़-खाबड़ रहा है।फाइलें चलीं। फिर रुक गईं। डिज़ाइन बदले। फिर दोबारा बदले। विभागों ने हामी भरी। फिर एतराज़  जता दिया। और वही पुराना हिंदुस्तानी राग गूँजता रहा; “यह मेरी फाइल नहीं है।” सो, परियोजना इंतज़ार करती रही। और करती रही।

एक दौर में रबर चेक डैम (अस्थायी लचीला बाँध) का प्रस्ताव आया। इसे तेज़ और लचीला हल बताया गया। सुनने में यह मुनासिब लगा। उम्मीद भी जगी।

लेकिन अब इसे चुपचाप किनारे रखकर चिनाई वाले पक्के बाँध  पर जोर दिया जा रहा है।

कागज़ों पर यह तरक्की लगती है। हकीकत में यह घड़ी की सुई फिर शून्य पर ले आई है। नया डिज़ाइन मतलब नई स्टडी। नई स्टडी मतलब नई मंज़ूरियाँ। नई मंज़ूरियाँ मतलब नई देरी। चक्र फिर वहीं से शुरू। जैसे कीचड़ में फँसा पहिया, घूम तो रहा हो मगर आगे न बढ़ रहा हो।

इस बीच यमुना लगातार पीछे हट रही है। कुछ हिस्सों में वह इतनी पतली हो जाती है कि लगता है जैसे अफसर और जनता अलग-अलग नदियाँ देख रहे हों। दाँव पर क्या लगा है, इस पर कोई बहस नहीं।

ताजमहल सिर्फ संगमरमर और यादों का ढांचा नहीं है। यह एक जीवित परिदृश्य (living landscape) है। इसकी खूबसूरती सिर्फ इसकी इमारत में नहीं, बल्कि उसके आसपास की नदी, हवा, रोशनी और पर्यावरणीय संतुलन में भी बसती है।

मरती हुई यमुना सिर्फ बदनुमा दाग नहीं। यह चेतावनी है।

कमज़ोर पड़ती नदी स्थानीय मौसम पर असर डालती है। भूजल को प्रभावित करती है। पूरे इलाके की पारिस्थितिकी  की लय बिगाड़ देती है। और धीरे-धीरे स्मारक के प्राकृतिक परिवेश को भी खतरे में डालती है।

इसीलिए सामाजिक कार्यकर्ता, पर्यावरणविद् और जागरूक नागरिक वर्षों से आवाज़ उठा रहे हैं।

रिवर कनेक्ट कैंपेन जैसे अभियान मुद्दे को जिंदा रखने की कोशिश करते रहे हैं।

आवाज़ें उठीं। रिपोर्टें लिखी गईं। अपीलें की गईं। लेकिन चिंता और प्रतिबद्धता  के बीच कहीं रफ्तार गुम हो जाती है। अब एक नया मोड़ आया है। चिनाई वाले बाँध के फैसले के बाद परियोजना को फिर नई जांचों से गुजरना होगा।

पर्यावरण प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment)। प्रदूषण नियंत्रण मंज़ूरी। भूजल मूल्यांकन। ताज की नज़दीकी के कारण विरासत संरक्षण मंज़ूरी। इनमें से कोई भी गैरज़रूरी नहीं। बल्कि सब बेहद ज़रूरी हैं।

ताज जैसे वैश्विक धरोहर (heritage) के पास कोई भी परियोजना शॉर्टकट नहीं अपना सकती।

मगर असली मसला सुरक्षा उपाय नहीं, उनकी रफ्तार है। भारत में अक्सर सुरक्षा उपाय स्पीड ब्रेकर बन जाते हैं। जो प्रक्रिया समयबद्ध और समन्वित  होनी चाहिए, वह ऐसी रिले रेस बन जाती है जिसमें बैटन बार-बार गिरती रहती है। ऐसी परियोजना को साफ समयसीमा चाहिए।

एक सशक्त प्राधिकरण (authority)।स्पष्ट जवाबदेही। और जनता को नियमित जानकारी।

लेकिन यहाँ यह फाइल किसी धूल भरी मेज़ पर पड़ी भूली हुई याद की तरह विभागों में भटकती रहती है।

असल मसला तकनीकी नहीं। सियासी है। जब ताज सुर्खियों में आता है, यमुना याद आ जाती है। जब खबरें बदलती हैं, फोकस भी बदल जाता है। नतीजा वही पुराना पैटर्न: घोषणा करो। देरी करो। दिलासा दो।दोहराओ। यह गूँजती हुई हुकूमत  है।

और फिर आती है सबसे कड़वी विडंबना । शिलान्यास हो चुके हैं। एक बार नहीं, कई बार। फीते कटे। फोटो खिंचे। भाषण हुए। लेकिन बैराज औपचारिक फावड़ों से नहीं बनता। वह लगातार मेहनत, अनुशासन और फॉलो-थ्रू  से बनता है। वही बेजान मगर असरदार प्रशासनिक मशक्कत , जो सुर्खियाँ भले न बटोरे, मगर नतीजे देती है।

साफ कहें:  यह कोई दिखावटी परियोजना नहीं। एक चालू बैराज जलस्तर स्थिर कर सकता है। ताज के पास नदी की मौजूदगी को बेहतर बना सकता है। भूजल को सहारा दे सकता है।

क्या इससे आगरा की हर पर्यावरणीय समस्या हल हो जाएगी? नहीं।

लेकिन यह एक अहम कदम होगा। और कई बार सही दिशा में उठाया गया छोटा कदम किसी बड़े ख्वाब से ज्यादा मायने रखता है।

इंतज़ार की भी कीमत होती है। हर साल की देरी जनता के भरोसे को थोड़ा और खोखला करती है। यह खामोश संदेश देती है कि अहम परियोजनाएँ भी बिना किसी जवाबदेही के अनंतकाल तक लटक सकती हैं।

और नदी? वह लगातार सिमटती रहती है। चुपचाप। सब्र के साथ।बेरहम ढंग से।

तो आगरा कहाँ खड़ा है? एक और दोराहे पर। शहर को अब नई घोषणा नहीं चाहिए। न नया शिलान्यास।न उम्मीदों में लिपटा कोई और वादा। उसे अमल चाहिए। ऐसी परियोजना चाहिए जो भाषणों से आगे निकले।फोटो-ऑप्स से बचे। सियासी मौसमों से ऊपर उठे। क्योंकि आखिर में यमुना फाइलें नहीं पढ़ती। बैठकों में शामिल नहीं होती। मंज़ूरियों का अनंत इंतज़ार नहीं करती। वह बस बहती है। या फिर रुक जाती है।

Tuesday, May 5, 2026

 क्या यह वही वृन्दावन है… या कोई और शहर?

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वृन्दावन को टूरिस्ट स्पॉट बनाने का पाप: ब्रज की आत्मा पर हमला और सांस्कृतिक हत्या

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बृज खंडेलवाल द्वारा

6 मई 2026

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एक तरफ वह पुराना ब्रज; धूल भरी पगडंडियाँ, कदम्ब की छाँव, यमुना की धीमी लहरें, मुरली की अनसुनी धुन। दूसरी तरफ आज का वृन्दावन; हॉर्न, होटल, भीड़ और सेल्फी स्टिक का जंगल। 

तब भक्ति बहती थी, अब भीड़ बहती है। तब साधु मिलते थे, अब पैकेज टूर। तब शांति थी, अब शोर का मेला। क्या हमने आध्यात्मिकता को मनोरंजन में बदल दिया है? क्या यह वही भूमि है जहाँ राधा-कृष्ण की लीलाएँ सांस लेती थीं? या फिर यह एक ऐसा बाज़ार बन चुका है जहाँ आस्था भी बिकने लगी है?

वृन्दावन को व्यावसायिक टूरिज्म का हब बनाने का मॉडल न केवल गलत है, बल्कि श्री कृष्ण-राधा की पावन भक्ति संस्कृति पर सीधा आघात है। यह आस्था की भावनाओं से खिलवाड़ है, प्राचीन बृज विरासत पर हमला है। पुराणों, ग्रंथों और वैष्णव परंपरा में बृज भूमि को वन-उपवन, कुंज-वाटिका, तालाब-कुंड और यमुना घाटों से भरी एक पवित्र, शांत, गौ-पालन और रास-लीला की भूमि के रूप में वर्णित किया गया है। लेकिन आज का “विकास” मॉडल इस वर्णन का घोर विरोधाभास है।

तथ्य चौंकाने वाले हैं। अध्ययनों के अनुसार वृन्दावन में सालाना 60 लाख से अधिक पर्यटक आते हैं, जो त्योहारों के समय बढ़कर लाखों प्रतिदिन हो जाते हैं। इस भीड़ ने समूची ब्रज भूमि की काया विकृत कर दी है। ठोस कचरा, प्लास्टिक की बोतलें, प्रसाद पैकेटिंग और पूजा सामग्री का ढेर कुंडों, घाटों और यमुना में गिर रहा है। यमुना की स्थिति तो और भी भयावह है, उच्च BOD स्तर, फीकल कोलीफॉर्म की भारी मात्रा और अनुपचारित सीवेज के कारण नदी स्नान योग्य भी नहीं रही। 2026 के आंकड़ों में केशी घाट, विश्राम घाट जैसे स्थानों पर प्रदूषण का स्तर खतरनाक दर्ज किया गया। बोट टूरिज्म के नाम पर चल रही नावों ने प्रदूषण को और बढ़ाया है, 2026 में वृन्दावन के पास यमुना में नाव पलटने की घटनाएं हुईं, जिसमें दर्जनों श्रद्धालु मारे गए। शुद्धिकरण की जगह सौंदर्यीकरण का ढोंग चल रहा है, जिससे पावन ब्रज रज दुर्लभ हो गई है।

पर्यावरणीय विनाश के आंकड़े स्पष्ट हैं। वन, हरियाली, तालाब और कुंड तेजी से गायब हो रहे हैं। कुंज गलियां, जो राधा-कृष्ण की लीला स्थलियाँ हैं, अब कंक्रीट की ऊंची अट्टालिकाओं से घिर गई हैं। 5500 से अधिक मंदिरों वाले इस छोटे से क्षेत्र में कैरिंग कैपेसिटी पार हो चुकी है। ट्रैफिक, शोर और वायु प्रदूषण ने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। लोकल निवासियों का कहना है कि पहले की शांत वातावरण अब इतिहास बन चुका है। बिल्डर्स लॉबी का मॉडल हावी है: 2020-2025 के बीच प्राइम एरिया में भूमि की कीमतें तीन गुना से अधिक बढ़ गई हैं, कुछ जगहों पर 22-29% CAGR के साथ। स्थानीय वाशिंदे हाशिए पर धकेल दिए गए हैं, जबकि बाहरी डेवलपर्स और फ्रॉड बाबाओं का राज चल रहा है। मठाधीश बनकर भावनाओं का व्यापार करने वाले अज्ञान के अंधेरे का फायदा उठा रहे हैं। भक्ति अब कमोडिटी बन गई है; इंस्टेंट मोक्ष की तलाश में आने वाली भीड़ असली आस्था को कुचल रही है।

सांस्कृतिक विनाश और भी गहरा है। बृज भाषा लगभग विलुप्त होने की कगार पर है। गुरुकुलों की जगह अंग्रेजी स्कूलों का बोलबाला है। पारंपरिक गायन, नृत्य, भोजन और वेशभूषा बदल चुके हैं। चैतन्य महाप्रभु, सूरदास और वल्लभाचार्य की भूमि अब पहचान में नहीं आती। चारों तरफ ऐश-ऐय्याशी के केंद्र बन चुके हैं, जहां भक्ति की जगह व्यावसायिकता हावी है। बृज संस्कृति के संरक्षण में जीरो प्रयास दिखाई देता है। विकास संस्थाएं भ्रष्टाचार के अड्डे बन गई हैं। बिना शुद्ध जल की व्यवस्था बढ़ाए रिवर फ्रंट प्रोजेक्ट चलाए जा रहे हैं, जो यमुना को और प्रदूषित कर रहे हैं।

यह “विकास” ब्रज भूमि की मूल आत्मा को कुचल रहा है। प्राचीन ग्रंथों में बृज का विकास उसके पिछड़ेपन को सहेजने, गौ-रक्षा, वन-संरक्षण और सादगी में निहित था, कंक्रीटाइजेशन में नहीं। आज की अट्टालिकाएं, मॉल जैसी संरचनाएं और हाईवे ब्रज की पावनता को नष्ट कर रहे हैं। स्थानीय ज्ञान प्रणाली, पारंपरिक जल संरक्षण और जैव विविधता खतरे में है। पर्यटन अर्थव्यवस्था के नाम पर जो रोजगार पैदा हो रहा है, वह मौसमी और असमान है; स्थानीय महिलाएं और पिछड़े वर्ग हाशिए पर हैं।

ब्रज की रक्षा जरूरी है। विकास का नाम लेकर इस पवित्र भूमि की आत्मा को कुचलना अपराध है। श्री कृष्ण की लीला भूमि को सौंदर्यीकरण की नहीं, असली शुद्धिकरण की जरूरत है; यमुना की सफाई, कुंडों का संरक्षण, वनों का पुनरुद्धार, भीड़ नियंत्रण, स्थानीय संस्कृति का संवर्धन और बिल्डर्स लॉबी पर लगाम। बिना इनके कोई भी विकास मॉडल ब्रज के साथ छलावा है।

आस्था के केंद्र को व्यावसायिक हब बनाने वाले सोचें; क्या हम श्री कृष्ण को बेच रहे हैं? क्या हम राधा की वाटिकाओं को कंक्रीट के नीचे दफना रहे हैं? ब्रज की रक्षा करना सिर्फ पर्यावरण या संस्कृति की रक्षा नहीं, बल्कि सनातन धारा की रक्षा है। अगर आज नहीं रोका गया, तो आने वाली पीढ़ियां सिर्फ प्लास्टिक और कंक्रीट के बीच “इंस्टेंट भक्ति” का मजाक देखेंगी, असली ब्रज कभी नहीं जान पाएंगी।

यह घोर अन्याय है। ब्रज को बचाओ, उसकी आत्मा को बचाओ। विकास का ढोंग बंद करो, शुद्धिकरण और संरक्षण अपनाओ।

Monday, May 4, 2026

 कब तक 80 प्रतिशत आबादी खुद को कमजोर समझती रहेगी? कब तक बहुसंख्यक होकर भी राजनीतिक रूप से बिखरे रहेंगे? क्या सच में यह देश अपने ही मूल समाज से कटता जा रहा था? और सबसे बड़ा सवाल; क्या ‘सेक्युलरिज्म’ के नाम पर एक खामोश अन्याय चल रहा था? दशकों तक यह सवाल हवा में तैरते रहे, लेकिन जवाब किसी ने नहीं दिया। फिर अचानक कुछ बदल गया। एक खामोशी टूटी। एक गुस्सा फूटा। और जो समाज सदियों से सहनशीलता का प्रतीक था, वही अब सवाल पूछने लगा। क्या यह सिर्फ राजनीति का बदलाव है, या एक सोया हुआ शेर सच में जाग उठा है?

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हिंदू बहुमत: वो सोए हुए शेर जो जाग उठे

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बृज खंडेलवाल द्वारा

5 मई, 2026

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2014 से पहले, भारत में हिंदू बहुसंख्यक एक बेहद अजीब और विरोधाभासी स्थिति में थे। करीब 80 प्रतिशत आबादी होने के बावजूद, यह समाज राजनीतिक रूप से बंटा हुआ, वैचारिक रूप से कमजोर और अपनी सामूहिक ताकत को लेकर उदासीन था।

उस दौर में समाजवादी और कम्युनिस्ट विचारधारा के नेताओं ने ‘सेक्युलरिज्म’ को एक चादर की तरह ओढ़ रखा था। मगर इसके नीचे सच्चाई कुछ और थी। हिंदू समाज को जातियों और क्षेत्रों में उलझाए रखना ही उनकी राजनीति का मूल था।

कांग्रेस और परिवारवादी पार्टियों ने इस बिखराव को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया। उनका गणित सीधा था; अल्पसंख्यकों और चुनिंदा जातियों का गठजोड़ बनाओ, सत्ता पाओ। यह खेल दशकों तक चला। मगर हर खेल की एक सीमा होती है।

धीरे-धीरे यह ‘तुष्टीकरण’ एक चुभन बन गया। एक ऐसा जख्म, जो दिखता नहीं था, मगर दर्द देता था। यही दर्द आगे चलकर विस्फोट बना।

आज़ादी के बाद भारत ने खुद को आधुनिक राष्ट्र बनाने की कोशिश की। 1950 के दशक में जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने हिंदू कोड बिल लागू किया। यह सुधार जरूरी था। इससे महिलाओं को अधिकार मिले, समाज में बदलाव आया।

लेकिन सवाल यहीं खड़ा होता है, क्या यही साहस मुस्लिम पर्सनल लॉ में दिखाया गया? जवाब साफ है; नहीं।

यहां से एक असमानता शुरू हुई। सरकार हिंदुओं के लिए सुधारक बनी, और अल्पसंख्यकों के लिए रक्षक।

संविधान का अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यकों को अपने शिक्षण संस्थान चलाने की आजादी देता है। मगर बहुसंख्यकों को यह अधिकार नहीं मिला।

फिर आया 1991 का पूजा स्थल कानून। इसने 1947 की स्थिति को स्थिर कर दिया। काशी और मथुरा जैसे विवादों के रास्ते कानूनी तौर पर बंद हो गए।

दूसरी ओर, हिंदू मंदिर सरकारी नियंत्रण में आ गए। तिरुपति जैसे मंदिरों की आय सरकार के अधीन हो गई।

यह एक विचित्र स्थिति थी। दुनिया में शायद ही कोई ऐसा देश होगा जहां बहुसंख्यकों के धार्मिक संस्थानों पर सरकार का नियंत्रण हो, और अल्पसंख्यकों के संस्थान पूरी तरह स्वतंत्र हों।

अगर इस पूरी कहानी का ‘टर्निंग पॉइंट’ तलाशना हो, तो वह 1985 का शाहबानो केस था।

एक 62 वर्षीय महिला, जिसे उसके पति ने तीन तलाक देकर छोड़ दिया। सुप्रीम कोर्ट ने उसके पक्ष में फैसला दिया। उसे गुजारा भत्ता मिलना चाहिए।

मगर तब के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने बहुमत होने के बावजूद पीछे कदम खींच लिया। उन्होंने संसद में नया कानून बनाकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट दिया।

यह सिर्फ एक फैसला नहीं था। यह एक संदेश था। यह संदेश साफ था; राजनीति न्याय से बड़ी है।

यहीं से लोगों को समझ आया कि ‘सेक्युलरिज्म’ का अर्थ बराबरी नहीं, बल्कि झुकाव है। यही वह क्षण था जब हिंदू समाज को अपनी राजनीतिक कमजोरी का अहसास हुआ।

1990 में V. P. सिंह ने मंडल आयोग लागू किया। उद्देश्य था पिछड़ों को आरक्षण देना। मगर इसके पीछे राजनीति का गहरा खेल था। यह उस हिंदू एकता को तोड़ने की कोशिश थी जो राम मंदिर आंदोलन से बन रही थी।

देश में उबाल आया। विरोध प्रदर्शन हुए। युवाओं ने आत्मदाह तक किया।

इसके जवाब में लाल कृष्ण आडवाणी ने रथ यात्रा निकाली। सोमनाथ से अयोध्या तक की यह यात्रा सिर्फ एक यात्रा नहीं थी। यह एक प्रतीक थी।

इसने जातियों में बंटे हिंदुओं को एक सूत्र में बांधना शुरू किया।

यहीं से ‘हिंदू वोट’ की अवधारणा जन्मी। जिसे पहले असंभव माना जाता था।

UPA सरकार के समय तुष्टीकरण एक नीति बन गया। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट आई। उसने मुसलमानों की आर्थिक स्थिति को उजागर किया। मगर इसका इस्तेमाल समाधान के लिए नहीं, बल्कि राजनीति के लिए हुआ।

मनमोहन सिंह का बयान: “देश के संसाधनों पर अल्पसंख्यकों का पहला हक है”, एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया।

इसके साथ ही ‘भगवा आतंकवाद’ का नैरेटिव गढ़ा गया। हिंदू संगठनों को आतंकी गतिविधियों से जोड़ने की कोशिश हुई।

बाद में अदालतों में ये दावे कमजोर साबित हुए।

लेकिन तब तक एक धारणा बन चुकी थी, सरकार बहुसंख्यकों के साथ खड़ी नहीं है।

2014 में जो हुआ, वह अचानक नहीं था। यह दशकों की नाराजगी का परिणाम था।

यह किसी एक पार्टी की रणनीति नहीं थी। यह समाज के भीतर पनप रही भावना थी।

हिंदू समाज अब खुद को सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि शक्ति के रूप में देखने लगा।

2026 के पश्चिम बंगाल चुनाव इसका ताजा उदाहरण हैं। जो राज्य कभी वामपंथी और बौद्धिक राजनीति का गढ़ था, वहां भी यह बदलाव दिख रहा है।

यह बदलाव सिर्फ वोट का नहीं है। यह सोच का है।

जो लोग यह मानकर बैठे थे कि बहुसंख्यक समाज हमेशा बंटा रहेगा, उनकी गणना अब गलत साबित हो रही है।

सोए हुए शेर अब जाग चुके हैं।

और जब शेर जागता है, तो जंगल का संतुलन बदलता है।

आज का हिंदू समाज सवाल पूछ रहा है। जवाब मांग रहा है।

वह अब सिर्फ सहनशील नहीं, सजग भी है।

राजनीति अब बदल रही है। वोट बैंक का गणित कमजोर पड़ रहा है।

उसकी जगह एक नई सोच उभर रही है, राष्ट्रवाद की। भारत और भारतीयता की। तमिल राजनीति भी इस से प्रभावित हो रही है।

यह बदलाव स्थायी होगा या अस्थायी, यह भविष्य बताएगा।

लेकिन इतना तय है; अब बहुसंख्यक समाज को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। शेर की दहाड़ गूंज चुकी है। अब सन्नाटा पहले जैसा नहीं रहेगा।


Sunday, May 3, 2026

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पूंजीवाद का कुरूप चेहरा:

लोकतांत्रिक समाजवाद की वापसी की पुकार

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

4 मई 2026

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लाल झंडे अब कम दिखते हैं। मई दिवस की रौनक भी फीकी पड़ गई है। कभी जो दिन मेहनतकशों की  एकता का पैग़ाम देता था, आज वह बस एक रस्म सा लगता है। मगर सच यह है कि ज़मीन के नीचे अंगारे अब भी सुलग रहे हैं। सवाल वही है; क्या तरक़्क़ी सिर्फ कुछ लोगों के लिए है, या सबके लिए?

तीन दशकों से भारत में उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण का निज़ाम  चला। कहा गया कि विकास होगा, दौलत बढ़ेगी, सबका भला होगा। हुआ क्या? अमीर और अमीर हो गए। ग़रीब वहीं खड़े रह गए, कई जगह और पीछे चले गए। शहर चमक उठे, लेकिन गाँव सूने हो गए। अमीरी-गरीबी का फासला अब खाई बन चुका है।

दुनिया के मंच पर यह पूंजीवाद अब और भी बेनक़ाब हो चुका है। डोनाल्ड ट्रंप इस सिस्टम का सबसे बदसूरत चेहरा बनकर उभरे। उनकी सियासत में तहज़ीब  कम, घमंड ज़्यादा दिखाई दिया है। व्यापार युद्ध, ऊँचे टैरिफ, कमज़ोर देशों को “hell hole” कहना; यह सब सिर्फ लफ्ज़ नहीं, बल्कि उस सोच की झलक है जहाँ ताक़त ही सच बन जाती है।

यह पूंजीवाद का वही चेहरा है, जो इंसान को इंसान नहीं, माल (commodity) समझता है। कामगार एक नंबर बन जाता है। मज़दूर एक लागत बन जाता है। और इंसानियत? वह कहीं गुम हो जाती है।

कार्ल मार्क्स ने बहुत पहले चेतावनी दी थी: यह सिस्टम इंसान के रिश्तों को सिर्फ पैसे के लेन-देन में बदल देगा। आज गिग इकॉनमी, ठेके पर काम, और प्रवासी मज़दूरों की हालत देखिए। सब कुछ वही कहानी कह रहे हैं।

रोजा लक्जेमबर्ग ने कहा था, या तो समाजवाद आएगा, या बर्बरता। आज दुनिया जिस मोड़ पर खड़ी है, यह बात और भी सच्ची लगती है। नफ़रत की राजनीति, धर्म और नस्ल के नाम पर बँटवारा; यह सब उसी बर्बरता की आहट है।

भारत में समाजवाद की सोच कोई पराई चीज़ नहीं है। डॉ राम मनोहर लोहिया ने साफ कहा था: बराबरी के बिना भाईचारा एक झूठ है। जब तक आर्थिक समानता नहीं होगी, तब तक समाज में सच्ची मोहब्बत नहीं पनपेगी।

आचार्य नरेंद्र देव ने लोकतंत्र और समाजवाद को एक-दूसरे का पूरक माना। उनका मानना था कि पूंजीवाद के तहत लोकतंत्र सिर्फ दिखावा है, असल ताक़त कुछ लोगों के हाथ में सिमट जाती है।

आज भारत में यह सच्चाई साफ दिखती है। शहरों में ऊँची-ऊँची इमारतें हैं, लेकिन उनके साये में झुग्गियाँ भी हैं। कॉर्पोरेट मुनाफा आसमान छू रहा है, लेकिन किसान कर्ज़ में डूबकर जान दे रहा है। नौजवान पढ़-लिखकर भी बेरोज़गार है। यह कैसी तरक़्क़ी है?

दुनिया में भी हालात कुछ अलग नहीं। ट्रंप की नीतियों ने दिखा दिया कि पूंजीवाद अब सिर्फ बाज़ार नहीं, बल्कि ताक़त का खेल बन चुका है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ कमज़ोर हो रही हैं। नियमों की जगह मनमानी चल रही है।

ऐसे में लोकतांत्रिक समाजवाद एक उम्मीद बनकर उभरता है। यह कोई ख़याली पुलाव नहीं है। यह एक संतुलित रास्ता है, जहाँ लोकतंत्र भी हो, और आर्थिक न्याय भी।

समाजवाद का मतलब सिर्फ सरकार का नियंत्रण नहीं। इसका मतलब है; हर इंसान को इज़्ज़त से जीने का हक़ मिले। अच्छी शिक्षा, सस्ती स्वास्थ्य सेवा, और रोजगार के मौके सबको मिलें।

नॉर्डिक देशों का मॉडल सामने है। वहाँ बाज़ार भी है, लेकिन मज़बूत यूनियन भी हैं। अमीर टैक्स देते हैं, और ग़रीबों को सहारा मिलता है। यही संतुलन समाज को स्थिर बनाता है।

भारत में भी कुछ कोशिशें हुई हैं। मनरेगा, मिड-डे मील जैसी योजनाओं ने राहत दी है। लेकिन ये आधे-अधूरे कदम हैं। ज़रूरत है एक बड़े बदलाव की: नीतियों में, सोच में, और सियासत में।

आज सबसे ज़रूरी है इंसान को केंद्र में रखना। मुनाफा नहीं, इंसानियत अहम हो। विकास का मतलब सिर्फ जीडीपी नहीं, बल्कि लोगों की खुशहाली हो।

मई दिवस भले फीका पड़ गया हो, लेकिन उसका पैग़ाम आज भी ज़िंदा है। यह हमें याद दिलाता है कि हक़ माँगने से नहीं, लड़ने से मिलते हैं।

पूंजीवाद ने हमें बहुत कुछ दिया, लेकिन बहुत कुछ छीन भी लिया। अब वक़्त है सोचने का; क्या हम उसी रास्ते पर चलते रहेंगे, या कोई नया रास्ता चुनेंगे?

लोकतांत्रिक समाजवाद कोई पुरानी किताब का सपना नहीं। यह आज की ज़रूरत है। यह वह रास्ता है, जहाँ इंसान, इंसान बना रहता है, न कि सिर्फ एक ग्राहक या मजदूर।

और शायद यही सबसे बड़ी लड़ाई है: इंसान को इंसान बनाए रखने की।

Saturday, May 2, 2026

 ख़ऊओं का शहर आगरा!  

बृज मंडल की मिठास की अनंत परंपरा  

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बृज खंडेलवाल द्वारा  

3 मई 2026  

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बृज मंडल: आगरा, मथुरा और हाथरस का यह पवित्र त्रिकोण कृष्ण प्रेम की मीठी धुन पर थिरकता है। यमुना की लहरों और ब्रज की धूल में दूध, घी और खोए की महक आज भी घुली हुई है। 

यहां की मिठाइयां सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि भक्ति, संस्कृति और सदियों पुरानी विरासत का संगम हैं। मंदिरों में “लाल कू मीठी खीर भौत भावे” कहकर भोग चढ़ाया जाता है, जहां मठरी, लड्डू, ठौर, पेड़ा और रबड़ी, मोहन थाल जैसे प्रसाद कृष्ण भक्ति को और मिठास देते हैं।  वृन्दावन में ठंडी दही लस्सी के बिना यात्रा अधूरी मानी जाती है, तो मथुरा में खुरचन और मेवा-युक्त खौलते दूध का कुल्लड़ चटकाए बिना मनोकामना पूरी नहीं होती।

बृज क्षेत्र की मिठाइयां सांस्कृतिक धरोहर हैं। इनमें मुगल काल की समृद्धि और ब्रज की सादगी का अनोखा मेल दिखता है। आगरा का विश्व प्रसिद्ध पेठा तो गरीब- अमीर सभी का पसंदीदा है, लेकिन घेवर, कलाकंद, बर्फी, गुलाब जामुन, खुरमी, बालूशाही, पेड़ा, रबड़ी, सोन पपड़ी और दूध की मलाई जैसी रचनाएं ब्रज की आत्मा को छूती हैं। घी और खोया इन मिठाइयों की जान हैं, जबकि बंगाल चेना पर और दक्षिण भारत नारियल पर निर्भर रहता है। यहां गोंद जैसे पौष्टिक तत्व और मुगल शाही रबड़ी की गाढ़ापन ब्रज की खास पहचान है।

भारत में मिठाइयों का इतिहास वैदिक काल से जुड़ा है, लेकिन आगरा की भगत हलवाई इसे जीवंत उदाहरण बनाती है। 1795 में लेख राज भगत द्वारा यमुना किनारे बेलंगंज में स्थापित यह दुकान भारत की सबसे पुरानी मिठाई की दुकानों में से एक मानी जाती है। लगभग 231 वर्ष पुरानी इस संस्था ने पीढ़ी दर पीढ़ी पारंपरिक रेसिपी और बनाने के तरीके संभालकर रखे हैं। शुरू में बेड़इं, जलेबी, लड्डू और साधारण मिठाइयों से सफर शुरू करने वाली यह संस्थान आज सैकड़ों आइटम्स, मिठाई, चाट, बेकरी और कन्फेक्शनरी, तक पहुंच चुकी है। NDTV समेत कई मीडिया संस्थानों ने इसे भारत की सबसे पुरानी मिठाई दुकान के रूप में मान्यता दी है। मक्खन का समोसा, पिस्ते की बर्फी, खास हैं।

बेलनगंज में भगत हलवाई के सामने एक जमाने में राजनीतिक सभाएं होती थीं और बड़े-बड़े राष्ट्रीय नेता यहां नाश्ता करते थे। आज इसके 7-8 आउटलेट्स हैं, लेकिन स्वाद वही पुराना, शुद्ध घी-खोया वाला बना हुआ है। 

कई दुकानों पर आज भी दोपहर को कढ़ाई में पका गाढ़ा दूध पीना आगरा की अनोखी शान है।

आगरा में तिकोनिया इलाके की दुकानें भी कम प्रसिद्ध नहीं। शहर के विभिन्न हिस्सों में हीरा लाल मिष्ठान, गोपाल दास पेठे वाले, देवी राम, दाऊजी, गोपिका और GMB जैसे ब्रांड्स लंबे समय  से स्वाद की सेवा कर रहे हैं। गोपाल दास तो पेठा और दालमोठ के लिए मशहूर है। रबड़ी इतनी गाढ़ी होती है कि चम्मच उसमें खड़ा रह जाता है। धीमी आंच पर घंटों पकाई जाने वाली यह रबड़ी ब्रज की धैर्यपूर्ण परंपरा का प्रतीक है।

मथुरा में पेड़ा कृष्ण भक्ति का प्रतीक है। यहां का पारंपरिक पेड़ा खोए, शुद्ध घी और सूखे मेवों से बना नरम, हल्का पीला गोला मुंह में घुल जाता है। कान्हा स्वीट्स और बसंती मिठाई की रबड़ी दूध को उबाल-उबालकर बनाई जाती है, जिसमें पिस्ता की बारीक कतरनें स्वाद बढ़ाती हैं। मक्खन संदेश मक्खन की मलाई में फल-मेवे मिलाकर ब्रज का अनूठा स्वाद प्रस्तुत करता है। खुरचन भी यहां लोकप्रिय है, दूध की मलाई को रगड़कर बनाया गया चिपचिपा, इलायची-केसर युक्त आनंद।

हाथरस हींग कचौड़ी के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन मिठाइयों में भी पीछे नहीं। यहां का घेवर मेवों से भरा आता है। सोन पपड़ी पतली-कुरकुरी चादरों वाली, लंबे समय तक टिकने वाली मिठाई है। हाथरस के हलवाई पारंपरिक चूल्हों पर घी डालकर स्वाद को और गहराई देते हैं। खुरचन यहां भी चिपचिपी और सुगंधित बनती है।

बृज के छोटे कस्बे भी अपनी विशेषताएं रखते हैं। पिनाहट की खोए की गुजियां त्योहारों में खास होती हैं, खोया भरी कुरकुरी परतें, गुड़ या चीनी से मीठी। किरावली के पेड़े छोटे, घने खोए वाले और बेहद स्वादिष्ट होते हैं। ये छोटी जगहें ब्रज की गहरी सांस्कृतिक जड़ों को दर्शाती हैं।

बृज मिठाइयों की सबसे बड़ी खूबी उनकी सादगी और पौष्टिकता है। शुद्ध घी, ताजा खोया और मेवों से बनी ये मिठाइयां न सिर्फ स्वाद देती हैं बल्कि ऊर्जा भी। आज के दौर में जब पैकेटबंद मिठाइयां बाजार में छाई हुई हैं, तब भी बृज मंडल के हलवाई पुरानी परंपराओं को जीवित रखे हुए हैं।

ताजमहल देखने आने वाले पर्यटक अब सिर्फ पत्थर की सुंदरता नहीं, बल्कि ब्रज की मीठी विरासत का भी रसास्वादन जरूर करें। आगरा, मथुरा और हाथरस की गलियों में घूमते हुए एक कौर पेड़ा, एक चम्मच रबड़ी या एक टुकड़ा सोन पपड़ी मुंह में रखें, तो महसूस होगा कि कृष्ण की लीला अभी भी यहां जीवंत है। 

बृज मंडल की मिठास अनंत है, ठीक उसी तरह जैसे कान्हा का प्रेम। एक बार चख लो, तो बार-बार याद आएगी।