Monday, October 5, 2026

 


नदियों को क्रांति का वादा था, मिला भाषणों का सैलाब

भारत को अब नारा नहीं, राष्ट्रीय नदी नीति चाहिए

__________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा

8 अक्टूबर 2026

____________________________

क्या आपने कभी ऐसी व्यवस्था देखी है जो पवित्र नदियों को बचाने के लिए सबसे ज्यादा भाषण दे और नदियां फिर भी मरती रहें?

भारत ने यह प्रयोग करीब एक दशक से देख लिया है।

सत्ता में आने के बाद  एनडीए सरकार ने नदियों को लेकर बड़े सपने दिखाए। गंगा साफ होगी, यमुना बहेगी, नदियाँ जुड़ेंगी, जलमार्ग बनेंगे, नावें चलेंगी और नदी पर्यटन देश की नई तस्वीर बनाएगा।

सुनकर लगा था कि अब नदियों के अच्छे दिन आने वाले हैं।

लेकिन नदी की हालत देखकर लगता है कि अच्छे दिन शायद भाषण मंच पर ही आकर रुक गए।

सबसे दिलचस्प उदाहरण यमुना है।

केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने दिल्ली से आगरा तक यमुना में फेरी चलाने का सपना दिखाया था। पर्यटक नाव में बैठेंगे, यमुना की लहरों का आनंद लेंगे और आखिर में ताजमहल के सामने उतरेंगे।

क्या शानदार तस्वीर थी!

बस एक छोटी-सी समस्या रह गई।

नदी कहाँ थी?

नावें नहीं आईं। जलमार्ग नहीं बना। ताज वहीं है। दिल्ली भी वहीं है। आगरा भी वहीं है। लेकिन यमुना आज भी कई जगह पानी से ज्यादा सीवेज, झाग और कचरे का बोझ ढो रही है।

वादे खूब बहे। नदी नहीं बही।

यही भारत की नदी राजनीति का सबसे बड़ा मजाक है।

सरकारें सड़क बना सकती हैं, पुल बना सकती हैं, हवाई अड्डे बना सकती हैं। हजारों करोड़ की परियोजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन कर सकती हैं। लेकिन नदी को जीवित करने के मामले में देश अभी भी फाइलों, समितियों और घोषणाओं के दलदल में फँसा है।

दस साल किसी सरकार के लिए कम समय नहीं होता।

एक दशक में शहरों का नक्शा बदल सकता है। एक्सप्रेसवे बन सकते हैं। नए हवाई अड्डे खड़े हो सकते हैं। लेकिन नदी?

नदी अब भी “काम प्रगति पर है” की पट्टी लगाए बैठी है।

भाषण राष्ट्रीय, जिम्मेदारी किसी की नहीं

भारत के पास वैज्ञानिक हैं। इंजीनियर हैं। पैसा है। तकनीक है। मंत्रालय हैं। समितियाँ हैं। मिशन हैं। योजनाएँ हैं।

कमी सिर्फ एक चीज की दिखती है।

लगातार राजनीतिक इच्छाशक्ति की।

नदी की सफाई के नाम पर पैसा खर्च होता है। ट्रीटमेंट प्लांट बनते हैं। बैठकें होती हैं। रिपोर्टें तैयार होती हैं। फिर नई योजना आती है।

लेकिन मूल सवाल वहीं खड़ा रहता है।

नदी की सेहत का जिम्मेदार कौन है?

यही हमारी व्यवस्था का कमाल है। नदी राष्ट्रीय है, लेकिन उसकी जिम्मेदारी टुकड़ों में बँटी है।

एक राज्य पानी रोकता है। दूसरा सीवेज छोड़ता है। तीसरा बाँध बनाता है। चौथा कम प्रवाह की शिकायत करता है।

नदी सबकी है, इसलिए व्यवहार में वह किसी की नहीं है।

और नदी की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि वह वोट नहीं देती।

नदी नाली नहीं है

नदी में पानी भर देना ही नदी बचाना नहीं है।

नदी एक जीवित व्यवस्था है। उसके साथ भूजल है, तालाब हैं, आर्द्रभूमियाँ हैं, सहायक नदियाँ हैं, मछलियाँ हैं, जंगल हैं, बाढ़ क्षेत्र हैं और प्राकृतिक गाद का प्रवाह है।

इन सबको मारकर सिर्फ नदी के पानी की जांच कर लेना वैसा ही है जैसे मरीज का तापमान देखकर उसे स्वस्थ घोषित कर देना।

नदी का रंग साफ हो सकता है, लेकिन नदी फिर भी बीमार हो सकती है।

इसलिए देश को हर प्रमुख नदी के लिए राष्ट्रीय नदी स्वास्थ्य सूचकांक चाहिए।

हर साल सार्वजनिक रिपोर्ट आए।

कितना पानी है? कितना प्राकृतिक प्रवाह है? भूजल की स्थिति क्या है? मछलियाँ बची हैं या नहीं? आर्द्रभूमियाँ कितनी बची हैं? बाढ़ क्षेत्र पर कितना कब्जा है? कितना सीवेज गिर रहा है? उद्योग कितना प्रदूषण कर रहे हैं?

और रिपोर्ट सिर्फ पढ़ी न जाए।

उस पर कार्रवाई भी हो।

नदी प्रदूषित हो तो जिम्मेदार अधिकारी भी दिखे।

अब यह व्यवस्था बदलनी होगी।

जहाँ लगातार सीवेज नदी में जा रहा है, वहाँ जिम्मेदारी तय हो। जहाँ उद्योग नियम तोड़ रहे हैं, वहाँ सिर्फ मामूली जुर्माना नहीं, कठोर कार्रवाई हो। जहाँ बाढ़ क्षेत्र पर कब्जा हो रहा है, वहाँ अनुमति देने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय हो।

बिना जवाबदेही के नदी पुनर्जीवन सिर्फ सरकारी शब्दावली है।

नदी पर्यटन अच्छी बात है। नौवहन भी उपयोगी हो सकता है। लेकिन नाव चलाने से पहले नदी में पानी होना चाहिए।

सूखी या प्रदूषित नदी पर पर्यटन का सपना कागज पर ही अच्छा लगता है।

पहले नदी बचाइए।

फिर नाव चलाइए।

दिल्ली से आगरा की फेरी का सपना इसलिए याद रखने लायक है क्योंकि उसने सरकार की प्राथमिकता का एक मजेदार सच सामने रखा।

ताज तक नाव पहुँचाने का सपना था, लेकिन ताज के पास बहती यमुना को बचाने की कोई समयसीमा नहीं थी।

आस्था और नदी दोनों बच सकती हैं

भारत की नदियाँ करोड़ों लोगों की आस्था हैं। पूजा, स्नान और धार्मिक आयोजन हमारी सामाजिक परंपरा का हिस्सा हैं।

लेकिन आस्था का अर्थ नदी में कूड़ा डालना नहीं हो सकता।

सरकार घाटों पर सफाई, शौचालय, कूड़ा प्रबंधन और पूजा सामग्री के संग्रह की व्यवस्था करे। विसर्जन के लिए वैज्ञानिक और सुरक्षित स्थान बनाए जाएँ।

धर्म को नदी से लड़ाने की जरूरत नहीं है। व्यवस्था को ईमानदार बनाने की जरूरत है।

नदी का इलाज किनारे से शुरू नहीं होता

नदी बचाने का असली काम नदी से दूर शुरू होता है।

जंगल कट रहे हैं। तालाब गायब हो रहे हैं। भूजल निकाला जा रहा है। रेत खनन बढ़ रहा है। बाढ़ क्षेत्र में कॉलोनियाँ बन रही हैं। शहर प्राकृतिक नालों को निगल रहे हैं।

फिर हम नदी में जाकर कचरा निकालते हैं और घोषणा कर देते हैं कि नदी बच गई।

नदी का पूरा बेसिन बचाना होगा।

सहायक नदियाँ, तालाब, आर्द्रभूमियाँ, भूजल क्षेत्र, बाढ़ मैदान और प्राकृतिक जल निकासी सभी राष्ट्रीय नदी नीति का हिस्सा होने चाहिए।

अब राष्ट्रीय नदी नीति का समय है

भारत की बड़ी नदियाँ राज्यों की सीमाएँ नहीं पहचानतीं।

फिर नदी नीति राज्य की सीमाओं में क्यों कैद रहे?

गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी और दूसरी नदियों के लिए नदी बेसिन को योजना की मूल इकाई बनाना होगा।

देश को एक मजबूत राष्ट्रीय नदी नीति और राष्ट्रीय नदी कानून चाहिए।

इसके तहत एक प्रभावी राष्ट्रीय नदी प्राधिकरण हो। वैज्ञानिक पर्यावरणीय प्रवाह तय हो। अंतरराज्यीय जल बँटवारा पारदर्शी हो। नदी स्वास्थ्य की नियमित स्वतंत्र जांच हो। और नियम तोड़ने वालों की जिम्मेदारी तय हो।

जनता को भी इस व्यवस्था का हिस्सा बनाना होगा। नदी किनारे रहने वाले लोग सबसे पहले जानते हैं कि नदी कब कमजोर पड़ रही है। मछुआरे जानते हैं कि मछलियाँ कब गायब हुईं। किसान जानते हैं कि भूजल कब नीचे गया।

उनकी आवाज को सरकारी फाइलों में जगह मिलनी चाहिए।

अब भाषण नहीं, हिसाब चाहिए

एक दशक बीत गया।

नदियों के लिए बड़े-बड़े वादे हुए। मिशन बने। योजनाएँ आईं। पैसा खर्च हुआ। भाषण हुए। तस्वीरें खिंचीं।

लेकिन सवाल आज भी वही है।

भारत की नदियाँ वास्तव में कितनी स्वस्थ हुईं?

अब सरकार को यह बताने से काम नहीं चलेगा कि उसने कितने करोड़ खर्च किए।

उसे बताना होगा कि नदी में कितना पानी लौटा।

कितनी मछलियाँ लौटीं।

कितनी आर्द्रभूमियाँ बचीं।

कितना सीवेज रुका।

कितने अतिक्रमण हटे।

और कितने अधिकारियों से जवाब माँगा गया।

क्योंकि नदी कोई चुनावी घोषणा नहीं है।

नदी कोई मंत्रालय की फाइल नहीं है।

नदी कोई उद्घाटन पट्टिका नहीं है।

नदी जीवन है।

और अगर भारत विश्व शक्ति बनने का सपना देखता है, तो उसे अपनी नदियों को मरने नहीं देना होगा।

नावें बाद में चलेंगी।

पहले नदी बहने दीजिए।

नारे बहुत हो गए। भाषण बहुत हो गए। अब नदी को पानी चाहिए, जगह चाहिए, स्वच्छता चाहिए, जीवन चाहिए और भविष्य चाहिए।


Sunday, October 4, 2026

 पानी की लहरों में छिपा यूरोप का दिल!

जब नदियों ने शहरों को रूह और रंग दिए

_________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा  

6 अक्टूबर 2026

_________________________________

यूरोप की मेरी हाल की यात्रा को अगर एक शब्द में बाँधना हो, तो वह शब्द होगा :  पानी।  

मैंने वहाँ आधा दर्जन से ज़्यादा नदियाँ, नहरें और झीलें नज़दीक से देखीं। कभी क्रूज़ पर बैठकर, कभी फेरी में, कभी पुल से झाँककर और कभी किनारे बैठकर। नाविकों, फेरीवालों, क्रूज़ मैनेजरों और गोंडोला चलाने वालों से बातें कीं। किनारे बैठे आम लोग भी देखे , जो दोपहर की सुनहरी धूप में नदी को निहार रहे थे, बातें कर रहे थे या बस ज़िंदगी को थोड़ी देर आराम दे रहे थे।

धीरे-धीरे एक बात दिल में उतर गई ; 

नदी सिर्फ पानी से ज़िंदा नहीं रहती। नदी तब ज़िंदा रहती है, जब लोग उससे प्यार करते हैं।

लंदन की टेम्स ने सबसे पहले नज़र खींची।  

क्रूज़ पर बैठते ही लगा जैसे लंदन अपनी पूरी कहानी नदी के सामने खोल रहा हो। संसद भवन, पुरानी इमारतें, पुल, म्यूज़ियम, लंदन आई और चमकता आधुनिक शहर एक-एक करके सामने आते गए। किनारे लोग टहल रहे थे, फेरी दौड़ रही थीं, पर्यटक तस्वीरें खींच रहे थे और कुछ चुपचाप पानी की लहरों में खोए हुए थे।  

टेम्स सिर्फ नदी नहीं थी। वह लंदन की सड़क भी थी, सैरगाह भी, इतिहास की खुली किताब भी और शहर का आँगन भी।


फिर पेरिस की सीन नदी आई।  

अगर टेम्स लंदन का दरवाज़ा है, तो सीन पेरिस का आईना है।  

क्रूज़ पर बैठकर पेरिस को पानी से देखना अपने आप में एक जादू था। एफिल टावर की ऊंचाई से नीचे नदी को निहारना एक अद्भुत अनुभव था। पुलों के नीचे से नाव निकलती और अगले ही पल कोई शानदार इमारत, म्यूज़ियम या ऐतिहासिक स्मारक सामने आ जाता। किनारे लोग घूम रहे थे, बैठे थे, हँस-बोल रहे थे।  

पेरिस ने नदी को शहर के पीछे नहीं धकेला। उसने नदी को बीचों-बीच जगह दी है। सीन सिर्फ बहती नहीं बल्कि पेरिस उसके साथ जीता है।


एम्स्टर्डम: जहाँ पानी ही रास्ता है, पानी ही ज़िंदगी 

एम्स्टर्डम की नहरों ने कहानी को नया रंग दिया। यहाँ पानी कोई रुकावट नहीं, पानी ही राह है। छोटी-बड़ी नावें नहरों में तैरती रहती हैं। पुल एक-दूसरे को जोड़ते हैं। पुराने मकान पानी की ओर झुके लगते हैं। लोग किनारे बैठते हैं और पर्यटक नावों से शहर देखते हैं।  

डच लोगों ने पानी से एक प्यारा सा समझौता कर लिया है। पानी को हराने की बजाय उसके साथ रहना सीख लिया। नहरें यहाँ परिवहन भी हैं, सैर भी, इतिहास भी और दिल का सुकून भी।


वेनिस: पानी पर बसा शहर

वेनिस में तो बात ही अलग थी। यहाँ सड़क से ज़्यादा पानी दिखता है। गोंडोला, नावें और जल-टैक्सियाँ रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा हैं। गोंडोला चलाने वाला सिर्फ नाविक नहीं लगता;  वह चलता-फिरता कहानीकार लगता है। महलों और पुरानी इमारतों के बीच से गोंडोला गुज़रता है तो लगता है इतिहास अभी भी साँस ले रहा है।  

वेनिस ने एक बड़ी बात सिखाई ,  कभी-कभी प्रकृति को जीतने से बेहतर होता है, उसके साथ जीना सीखना।


हीडलबर्ग: नेकर और पुरानी यादें 

जर्मनी के हीडलबर्ग शहर, जो हायर एडुकेशन के लिए प्रख्यात है, में नेकर नदी का अपना जादू था। ऊपर पहाड़ी पर पुराना किला और नीचे बहती नदी। आसपास पुराने पुल, इमारतें और हरी-भरी वादियाँ। नाव पर बैठकर शहर देखना ऐसा लगा जैसे कोई पुरानी किताब धीरे-धीरे खुल रही हो।  

यही नदी-यात्रा का असली जादू है ; आप शहर को नहीं देखते, शहर खुद आपके सामने आ जाता है।


राइन: यूरोप की जल-धमनी

राइन ने यूरोप का दूसरा चेहरा दिखाया। यह सिर्फ सुंदर नहीं, व्यापार और आवागमन की बड़ी धुरी भी रही है। मालवाहक जहाज़, पर्यटक क्रूज़ और किनारे के कस्बे, किले और पुरानी इमारतें नदी की कहानी को और गहरा बना देते हैं।  

तब समझ आया :  यूरोप की नदियाँ सिर्फ सजावट नहीं हैं। वे शहरों की आर्थिक और सांस्कृतिक ज़िंदगी की रेखा हैं।


फ्लोरेंस की आर्नो और आल्प्स की इन   

फ्लोरेंस में आर्नो नदी ने अलग रंग दिखाया। मशहूर पोंटे वेक्कियो के नीचे बहती आर्नो और आसपास की पुरानी इमारतें ऐसी लगती हैं जैसे पूरा शहर नदी में अपना अतीत देख रहा हो। यहाँ नदी कला, संस्कृति और इतिहास से जुड़ी हुई है।  

फिर आल्प्स की 'इन'  नदी आई, जो ऑस्ट्रिया के इंसब्रुक जैसे शहरों से गुज़रती है। पहाड़ों के बीच बहती यह नदी दूर से चाँदी की चमकती लकीर जैसी लगती है। आसपास की खूबसूरती इतनी भव्य है कि नदी खुद भी उस नज़ारे की धड़कन बन जाती है। यहाँ नदी व्यापार से ज़्यादा प्रकृति और ज़िंदगी का अहसास कराती है।


इंटरलाकेन: जहाँ पहाड़ पानी में उतर आते हैं

स्विट्ज़रलैंड के इंटरलाकेन में थून और ब्रिएंज की विशाल झीलों ने दिल मोह लिया। चारों तरफ आल्प्स के पहाड़ और उनके बीच फैला नीला-शांत पानी। ऐसा लगा जैसे पहाड़ों ने अपने सामने दो बड़े आईने रख दिए हों। कोई शोर नहीं, बस पानी, पहाड़, हवा और दूर तक फैली हरियाली।  

कभी-कभी यात्रा में ऐसे नज़ारे मिलते हैं जहाँ कैमरा भी बेबस हो जाता है। आँख तस्वीर ले लेती है और दिल उसे हमेशा के लिए रख लेता है।


यूरोप के किनारे और हमारी नदियाँ

इन सैरों के दौरान एक बात बार-बार दिल में घूमती रही। यूरोप की नदियों के किनारे आमतौर पर गंदगी और प्लास्टिक के ढेर नहीं दिखे। लोग या मवेशी नदी में नहाते नहीं दिखे। हाँ, बतखें और पक्षी पानी में मस्ती करते ज़रूर दिखे।  

कई जगह मज़बूत तटबंध हैं, पत्थर-टाइलों के रास्ते हैं, चौड़े पैदल मार्ग हैं, लॉन हैं, फूलों की झाड़ियाँ हैं और सुंदर बुलेवार्ड हैं। और सबसे खास बात — नदी के किनारे ज़िंदगी है। संगीत, थिएटर, नावें, फेरी, रेस्तराँ, म्यूज़ियम, पर्यटन और सामुदायिक कार्यक्रम। लोग नदी के पास आते हैं और उसे अपना मानते हैं।  

नाविकों और क्रूज़ वालों से बातचीत में यही बात महसूस हुई । नदी तभी सुरक्षित रहती है जब लोग उसके पास आते हैं। लोग आएंगे तो देखेंगे, देखेंगे तो चिंता करेंगे, चिंता करेंगे तो सवाल पूछेंगे और सवाल पूछेंगे तो सरकारों को भी जवाब देना पड़ेगा।


तभी याद आई काहिरा की नील नदी 

इन यूरोपीय नदियों के बीच अचानक वर्षों पुरानी एक यात्रा याद आ गई :  काहिरा की नील पर क्रूज़। पानी पर चलती नाव, आसपास का शहर, शाम का माहौल और नदी से दिखाई देता काहिरा। नील ने भी वही अहसास दिया था कि नदी किसी शहर की रूह बन सकती है।


और फिर यमुना सामने आ गई 

लेकिन यूरोप की इन खूबसूरत नदियों के बीच मेरी नज़र बार-बार यमुना पर जाकर ठहर जाती। आगरा की यमुना ; वही नदी जिसके किनारे ताजमहल खड़ा है, वही नदी जिसने सदियों से आगरा का इतिहास देखा है।  

आज हम नदी को देखते हैं तो अक्सर पानी से ज़्यादा गंदगी, प्लास्टिक, कूड़ा, दुर्गंध और उपेक्षा दिखती है।  

सवाल यह है ,  क्या नदी को सिर्फ सफाई अभियान और सरकारी योजनाओं से बचाया जा सकता है?  

यूरोप से जवाब कुछ अलग मिला। नदी को पहले लोगों की ज़िंदगी में वापस लाना होगा।  

यमुना के किनारे साफ-सुथरे पैदल मार्ग हों, सुरक्षित घाट हों, हरियाली हो, फूल हों, नावें चलें, जहाँ संभव हो मछली पकड़ने की अनुमति हो, संगीत और सांस्कृतिक कार्यक्रम हों, स्थानीय समुदाय जुड़े और बच्चे नदी को करीब से देखें। नदी किनारे शाम की रौनक हो। लोग वहाँ बैठें और कहें : “चलो, आज यमुना किनारे चलते हैं।”  

बस यही एक वाक्य नदी को बदल सकता है।


नदी को फिर से शहर का आँगन बनाइए 

यूरोप की यात्रा से लौटकर एक बात और साफ हो गई। नदी को सिर्फ पानी की धारा समझना भूल है। नदी अर्थव्यवस्था है, संस्कृति है, इतिहास है, पर्यटन है, मनोरंजन है और स्मृति है। और सबसे बढ़कर :  नदी लोगों को जोड़ने वाली जगह है।  दुर्भाग्य से, आगरा में  यमुना को सीवेज कैनाल, नाला बनाकर छोड़ दिया है।

यूरोप की नदियों ने अपने शहरों को पहचान दी है। उन्होंने शहरों को पैसा भी दिया, पर्यटन भी दिया और इतिहास को ज़िंदा रखने का मंच भी दिया।  

तो फिर आगरा की यमुना क्यों नहीं? क्यों न यमुना को आगरा का सबसे बड़ा खुला सांस्कृतिक मंच बनाया जाए? क्यों न नदी के किनारे शाम को संगीत बजे, बच्चे खेलें, बुज़ुर्ग बैठें, पर्यटक नौका में शहर देखें और स्थानीय लोग गर्व से कहें : यह हमारी नदी है?  

नदी को बचाने का सबसे आसान रास्ता शायद यही है : लोगों को नदी से फिर प्यार करा दीजिए।


नदियाँ सिर्फ शहरों से होकर नहीं गुज़रतीं।  

जब शहर उनकी कद्र करते हैं, तो नदियाँ उन शहरों को रूह दे देती हैं।




____________________




 


उत्तर प्रदेश: भगवा चोले से विकास की दौड़ तक

क्या बदल रहा है प्रदेश का चेहरा, और कितनी दूर है मंजिल?

____________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा

5 अक्टूबर 2026

___________________________


अगले साल विधानसभा चुनाव हैं और सियासी बिसात बिछनी शुरू हो गई है। टिकटों के लिए घेराबंदी तेज है, विपक्षी दल तालमेल की गांठें कस रहे हैं और भाजपा नेता पूरे भरोसे से कह रहे हैं, “हमारा काम बोलेगा।”

लेकिन इस बार असली सवाल वोटर पूछ रहा है। क्या सिर्फ जातीय गणित से चुनाव जीता जाएगा? वह पूछ रहा है, योगी सरकार ने ऐसा क्या बुरा किया है कि उसे सत्ता से बाहर किया जाए? और दूसरी तरफ विपक्ष के पास आखिर ऐसा नया क्या है, जिसके भरोसे जनता उसे एक और मौका दे?


कभी उत्तर प्रदेश का नाम सुनते ही जेहन में अपराध, रंगदारी, माफिया और राजनीतिक उठापटक की तस्वीर उभरती थी। शाम ढलते ही परिवारों की चिंता बढ़ जाती थी और गांव का नौजवान अक्सर एक ही सवाल पूछता था, “यहां काम मिलेगा या दिल्ली की ट्रेन पकड़नी पड़ेगी?”

आज तस्वीर कुछ अलग है। सड़कों पर पहले जैसी बेचैनी नहीं दिखती। कानून व्यवस्था को लेकर भरोसा बढ़ा है। एक्सप्रेसवे दौड़ रहे हैं, एयरपोर्ट चमक रहे हैं और निवेश के बड़े-बड़े ऐलान हो रहे हैं। लेकिन असली सवाल फिर भी वहीं खड़ा है। क्या यह सिर्फ तस्वीर बदलने का मामला है, या उत्तर प्रदेश सचमुच छलांग लगा रहा है?

यही सवाल इस समय सबसे दिलचस्प है।

योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में पिछले नौ वर्षों में उत्तर प्रदेश ने कई मोर्चों पर बड़ा बदलाव देखा है। राज्य का सकल राज्य घरेलू उत्पाद करीब 13 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर लगभग 36 लाख करोड़ रुपये बताया जा रहा है। प्रति व्यक्ति आय भी तीन गुने से ज्यादा बढ़कर 1.20 लाख रुपये के पार पहुंच गई है।

यूपी अब देश की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में गिना जा रहा है।

लेकिन आंकड़ों की अपनी जुबान होती है और जिंदगी की अपनी।

आगरा के किसी छोटे दुकानदार से पूछिए कि उसे बदलाव कैसा लगा। बुंदेलखंड के किसी नौजवान से पूछिए कि क्या उसे अपने गांव के पास नौकरी मिली। फिरोजाबाद के किसी कांच कारीगर से पूछिए कि उसकी मेहनत की कीमत बढ़ी या नहीं। इन जवाबों में शायद विकास की असली कहानी छिपी मिलेगी।


2017 से पहले उत्तर प्रदेश की छवि अपराध, रंगदारी और राजनीतिक संरक्षण पाने वाले माफिया से गहराई से जुड़ी थी। कई परिवारों के लिए पुलिस और प्रशासन भरोसे का नहीं, मजबूरी का नाम था।

योगी सरकार ने कानून व्यवस्था को अपनी प्राथमिकता बनाया। सरकार के अनुसार हजारों इनामी अपराधी गिरफ्तार किए गए और माफिया की अरबों रुपये की संपत्तियों पर कार्रवाई हुई। अपराध में गिरावट और माफिया पर कार्रवाई को सरकार अपनी सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनाती है।

इसका एक मनोवैज्ञानिक असर जरूर दिखाई देता है। निवेशक के लिए सड़क और बिजली जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी यह भरोसा भी है कि उसका कारोबार किसी बाहुबली की जेब में नहीं जाएगा।

लेकिन यहां भी एक सवाल बाकी है।

क्या पुलिस कार्रवाई के साथ नागरिक अधिकार भी उतने ही मजबूत हुए हैं? क्या गरीब और कमजोर आदमी को भी वही इंसाफ मिलता है जो ताकतवर आदमी को मिलता है? बुलडोजर की तस्वीर प्रभावशाली हो सकती है, मगर लोकतंत्र की असली कसौटी निष्पक्ष कानून है।


योगी आदित्यनाथ जब पहली बार मुख्यमंत्री बने तो उनके भगवा वस्त्र भी चर्चा का विषय बने थे। आलोचक पूछते थे, “एक संन्यासी अर्थव्यवस्था क्या चलाएगा?”

समय ने इस सवाल का एक जवाब जरूर दिया है।

संन्यास का मतलब हमेशा निष्क्रियता नहीं होता। निजी मोह से दूरी कभी-कभी प्रशासन में कठोर फैसले लेने की ताकत भी दे सकती है। समर्थकों का कहना है कि योगी सरकार ने मंदिर और मठ की राजनीति से आगे बढ़कर सड़क, उद्योग, निवेश और राजस्व को भी शासन के एजेंडे में रखा।

लेकिन सरकार की असली परीक्षा मठ में नहीं होती।

वह बाजार में होती है। कारखाने में होती है। खेत में होती है। स्कूल में होती है। अस्पताल में होती है। और सबसे ज्यादा उस घर में होती है, जहां बेरोजगार बेटा मां से पूछता है, “अम्मा, अब बाहर जाने की जरूरत तो नहीं पड़ेगी?”


2023 के ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में करीब 40 लाख करोड़ रुपये के निवेश प्रस्तावों की घोषणा हुई थी। बाद में सरकार ने 2017 के बाद प्रस्तावित निवेश का आंकड़ा लगभग 45 से 50 लाख करोड़ रुपये तक बताया।

इनमें से करीब 12 से 15 लाख करोड़ रुपये की परियोजनाओं के जमीन पर उतरने या ग्राउंड-ब्रेकिंग होने का दावा किया गया है।

इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा, फार्मा, अक्षय ऊर्जा और डेटा सेंटर जैसे क्षेत्रों में बड़े निवेश की योजनाएं सामने आई हैं।

सरकार का सपना 2029-30 तक यूपी को एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाना है।

सपना बड़ा है। हौसला भी बड़ा चाहिए।

लेकिन निवेश प्रस्ताव और चलती हुई फैक्ट्री के बीच वही फर्क है जो शादी के कार्ड और बारात में होता है। कार्ड छपना आसान है, बारात का पहुंचना थोड़ा मुश्किल।

इसलिए अब असली सवाल है। कितने कारखाने चालू हुए? कितने लोगों को स्थायी रोजगार मिला? कितने स्थानीय युवाओं को नौकरी मिली? और कितने निवेशक सरकारी फाइलों के जंगल से निकलकर उत्पादन की जमीन तक पहुंचे?


उत्तर प्रदेश डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर इस बदलाव का दिलचस्प उदाहरण है। कानपुर, झांसी, चित्रकूट, लखनऊ, अलीगढ़ और आगरा इसके प्रमुख केंद्र हैं।

बुंदेलखंड कभी सूखे, गरीबी और पलायन के लिए जाना जाता था। वहां का नौजवान अक्सर गांव छोड़कर दिल्ली, सूरत या मुंबई की ओर निकल जाता था।

अब उसी इलाके में रक्षा उत्पादन और औद्योगिक निवेश की बातें हो रही हैं।

लखनऊ में ब्रह्मोस एयरोस्पेस की सुविधा शुरू होना भी इस नई तस्वीर का हिस्सा है। रक्षा उद्योग बढ़ता है तो उसके साथ छोटे कारखाने, तकनीकी प्रशिक्षण, परिवहन और स्थानीय कारोबार भी बढ़ सकते हैं।

लेकिन इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण किरदार मिसाइल नहीं, स्थानीय नौजवान है।

अगर बुंदेलखंड के लड़के और लड़कियों को अपने ही इलाके में सम्मानजनक रोजगार मिलता है, तभी यह बदलाव सचमुच ऐतिहासिक कहलाएगा।

खजाना भर रहा है, मगर घर कितना सुधरा?

राज्य की अपनी कर आय में भी बड़ा इजाफा हुआ है। 2016-17 में अपना कर राजस्व करीब 86 हजार करोड़ रुपये था। अब यह दो लाख करोड़ रुपये से अधिक बताया जा रहा है।

जीएसटी, आबकारी और स्टांप शुल्क से भी राजस्व बढ़ा है।

सरकार इसे बढ़ती आर्थिक गतिविधियों और वित्तीय अनुशासन का परिणाम बताती है। बात सही भी हो सकती है।

लेकिन आम आदमी का सवाल बड़ा सीधा है।

“हुजूर, खजाना भर रहा है तो हमारी जिंदगी कितनी सुधरी?”

कर राजस्व तभी सार्थक है जब उससे अच्छी सड़क, साफ पानी, बेहतर अस्पताल, मजबूत स्कूल और सम्मानजनक रोजगार मिले। सरकारी खजाने की चमक तभी जनता के चेहरे पर दिखाई देगी।


उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था केवल बड़े उद्योगपतियों से नहीं बनती। इसे बनाने वाले हजारों छोटे हाथ हैं।

बनारस का बुनकर, मुरादाबाद का पीतल कारीगर, फिरोजाबाद का कांच मजदूर, आगरा का जूता कारीगर और लखनऊ का चिकनकारी कामगार। इनके हाथों में यूपी की पुरानी तहजीब भी है और नई अर्थव्यवस्था की उम्मीद भी।

वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट यानी ओडीओपी ने इन स्थानीय उत्पादों को नई पहचान देने की कोशिश की है। सरकार के अनुसार लाखों कारीगरों को प्रशिक्षण और बाजार से जोड़ने का काम हुआ है।

मगर कारीगर की असली खुशी तब होगी जब उसके हुनर की कीमत बिचौलिये की जेब में नहीं, उसके अपने घर में पहुंचेगी।

उसे उचित दाम चाहिए। सस्ता कच्चा माल चाहिए। बाजार चाहिए। और सबसे बढ़कर अपने काम पर भरोसा चाहिए।


जेवर का नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट, यमुना एक्सप्रेसवे, गंगा एक्सप्रेसवे और दूसरे बड़े संपर्क मार्ग उत्तर प्रदेश के बदलते ढांचे की तस्वीर पेश कर रहे हैं।

सड़कें बेहतर होंगी तो उद्योग आएंगे। एयरपोर्ट बढ़ेंगे तो कारोबार बढ़ेगा। माल तेजी से पहुंचेगा तो यूपी का बाजार देश और दुनिया से ज्यादा जुड़ सकेगा।

लेकिन केवल सड़क बना देने से विकास नहीं आता।

बिजली चाहिए। पानी चाहिए। कुशल श्रमिक चाहिए। साफ-सुथरा प्रशासन चाहिए। पर्यावरण की हिफाजत चाहिए।

वरना एक्सप्रेसवे चमकता रहेगा और उसके किनारे का गांव रोजगार की तलाश में धूल फांकता रहेगा।

असली फैसला अभी बाकी है

योगी सरकार के समर्थक कहते हैं कि उत्तर प्रदेश ने अपनी पुरानी छवि को पीछे छोड़ दिया है। उनके पास कानून व्यवस्था, एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट, निवेश, राजस्व और रक्षा उत्पादन के आंकड़े हैं।

विपक्ष और आलोचक दूसरी तस्वीर दिखाते हैं। उनका सवाल है कि रोजगार कहां है? महंगाई से राहत कितनी मिली? सरकारी स्कूल और अस्पताल कितने बदले? किसान, मजदूर, छोटे दुकानदार और बेरोजगार युवा इस नई अर्थव्यवस्था में कहां खड़े हैं?

शायद सच इन दोनों तस्वीरों के बीच कहीं है।

उत्तर प्रदेश बदल रहा है। यह बदलाव पूरी तरह काल्पनिक नहीं है। सड़कें, एयरपोर्ट, उद्योग और प्रशासनिक संस्कृति में फर्क दिखाई देता है। कानून व्यवस्था को लेकर भी पहले की तुलना में एक नया आत्मविश्वास नजर आता है।

लेकिन मंजिल अभी दूर है।

क्योंकि विकास की असली पहचान बड़े होर्डिंग नहीं होते। विकास तब दिखाई देता है जब गांव का नौजवान मजबूरी में नहीं, अपनी पसंद से बाहर जाए। जब कारीगर को अपने हुनर की पूरी कीमत मिले। जब किसान को बाजार मिले। जब शहर में पैदल चलने वाला भी सुरक्षित महसूस करे। जब उद्योग आए तो नदी और हवा साथ-साथ बचें।

उत्तर प्रदेश की असली छलांग तब होगी जब विकास का स्वाद लखनऊ और नोएडा से निकलकर बुंदेलखंड, पूर्वांचल, ब्रज और गांव की चौपाल तक पहुंचेगा।

तब कोई मां अपने बेटे से यह नहीं पूछेगी, “कब लौटोगे?”

वह शायद पहली बार पूछेगी, “बेटा, अब यहीं काम मिल गया है न?”

यही वह दिन होगा जब भगवा चोले से विकास की दौड़ तक पहुंची उत्तर प्रदेश की कहानी सचमुच पूरी होगी।




Saturday, October 3, 2026

 


एयरपोर्ट के न्यू रिच जॉम्बीज़

अंग्रेजी, आईफोन और अकड़ की उड़ान


बृज खंडेलवाल द्वारा




बेंगलुरु एयरपोर्ट पर मैंने एक अजीब बाइपोलर मानसिकता देखी।

लोगों को विमान पकड़ना था, लेकिन कई लोग अचानक अपनी औकात से बहुत ऊपर उड़ने लगे थे।

घर से निकलते समय वही लोग साधारण इंसान होते हैं। पत्नी से कहते हैं, “चाय बना देना।” बच्चे से कहते हैं, “बैग उठा ले।” पड़ोसी से पूछते हैं, “भैया, बाजार जा रहे हो?”

लेकिन एयरपोर्ट का गेट पार करते ही कायापलट!

अचानक आवाज में ऑक्सफोर्ड उतर आता है।

“डियर, प्लीज टेक केयर।”

“ओह माय गॉड!”

“Actually, I was thinking…”

“यू नो, वी ट्रैवल अ लॉट!”

मैंने सोचा, यह एयरपोर्ट है या अंग्रेजी बोलने वालों का पुनर्जन्म केंद्र?

मेरे साथ बेंगलुरु से आगरा की फ्लाइट में ऐसे कई नमूने थे। महंगे चश्मे, चमचमाते जूते, आईफोन, ब्रांडेड बैग और चेहरे पर ऐसा गुरूर, जैसे हवाई जहाज इनके खानदान की जागीर हो।

एक महिला ने बच्चे को दूध का गिलास पकड़ाते हुए कहा, “बेटा, मिल्क हॉट है। केयरफुली पकड़ो।”

फिर पति की तरफ मुड़ीं।

“डियर, स्विट्जरलैंड वाले होटल का नाम क्या था?”

पति ने गर्दन झटका।

“द ग्रैंड... कुछ।”

महिला ने माथे पर हाथ मारा।

“ओह माय गॉड! लिटिल डोगी को बाय कहना भूल गई!”

मोबाइल निकला।

“हेलो मेड? प्लीज टेल हिम फ्रॉम माय साइड... आई मिस हिम!”

कुत्ता घर पर था।

मगर उसकी विदाई अंतरराष्ट्रीय स्तर की थी।

यही है हमारा नया अमीर।

कुत्ता देसी, नौकरानी देसी, दूध देसी, मगर बातचीत इंटरनेशनल।

एयरपोर्ट नवाबों का पहला इम्तिहान

सिक्योरिटी चेक पर इनकी असली परीक्षा शुरू होती है।

लाइन लंबी है।

सब अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं।

लेकिन हमारे एक भाई साहब की आत्मा बेचैन है।

वे बार-बार आगे झांकते हैं।

फिर ट्रे आगे रखते हैं।

फिर पीछे वाले की ट्रे भी अपनी ट्रे के आगे कर देते हैं।

पीछे से आवाज आती है, “भाई साहब, लाइन है।”

वह मुस्कराते हैं।

“ओह, सॉरी!”

सॉरी के साथ आधा कदम और आगे।

यह खास भारतीय कला है।

माफी भी मांगो और गलती भी जारी रखो।

सिक्योरिटी अधिकारी कहता है, “सर, हाथ ऊपर कीजिए।”

सज्जन हाथ ऐसे उठाते हैं जैसे अधिकारी ने उनसे योगासन करवाने की मांग कर दी हो।

चेहरा बता रहा है, “आपको पता है मैं कौन हूं?”

अधिकारी शायद रोज ऐसे सवालों से मिलता है।

वह शांत रहता है।

न्यू रिच जॉम्बी बेचैन हो जाता है।

कुर्सी भी हमारी, हवा भी हमारी

वेटिंग लाउंज में पहुंचते ही दूसरा अभियान शुरू।

एक साहब ने तीन कुर्सियां कब्जे में कर लीं।

एक पर खुद बैठे।

दूसरी पर बैग।

तीसरी पर जैकेट, चश्मा और खाने का डिब्बा।

एक बुजुर्ग महिला खड़ी थीं।

उन्होंने पूछा, “बेटा, यह सीट खाली है?”

साहब ने बैग देखा।

फिर महिला को देखा।

फिर बैग को देखा।

“Actually, my wife is coming.”

बीस मिनट बाद पत्नी आईं।

बैग वाली सीट खाली हुई।

महिला के लिए नहीं।

पत्नी के लिए।

मैंने सोचा, आजकल सीट पर बैठने के लिए इंसान नहीं, सामान होना जरूरी है।

एक दूसरे सज्जन ने तो अपना छोटा बैग सामने वाली कुर्सी पर रख दिया।

किसी ने पूछा, “यह सीट खाली है?”

उन्होंने कहा, “No, occupied.”

मैंने पूछा, “कौन बैठा है?”

उन्होंने कहा, “My stuff.”

अब “मेरा सामान” भी इंसान से ज्यादा अधिकार रखने लगा है।

बोर्डिंग का महाभारत

घोषणा हुई।

“Passengers travelling in Zone 3 may now board.”

Zone 3 वाले उठे।

लेकिन Zone 1 वाले पहले से लाइन में थे।

Zone 2 वाले Zone 1 में घुसे हुए थे।

Zone 5 वाले सबसे आगे खड़े थे।

मैंने एक से पूछा, “आपका जोन क्या है?”

उन्होंने कहा, “Five.”

“फिर यहां?”

“बस ऐसे ही।”

बस ऐसे ही!

भारत की बहुत सी समस्याओं का यही राष्ट्रीय उत्तर है।

स्टाफ ने कहा, “Sir, please wait for your zone.”

जवाब आया, “But I am already here.”

मानो एयरलाइन ने नियम नहीं बनाया, व्यक्तिगत निमंत्रण भेजा था।

एक महिला ने तो स्टाफ से कहा, “Can you please allow us? We are travelling with children.”

स्टाफ ने विनम्रता से कहा, “Ma’am, there are other families also.”

महिला का चेहरा उतर गया।

उन्हें पहली बार पता चला कि दुनिया में और भी परिवार हैं।

विमान में प्रवेश और सोशल मीडिया दरबार

सीट पर पहुंचते ही फोन निकलता है।

पहली सेल्फी।

फिर दूसरी।

फिर खिड़की की फोटो।

फिर सीट की फोटो।

फिर बोर्डिंग पास की फोटो।

फिर कॉफी की फोटो।

फिर परिवार को वीडियो कॉल।

“हेलो मम्मी! हम फ्लाइट में हैं।”

“हां, बेटा, कहां जा रहे हो?”

“आगरा।”

“क्यों?”

“बस, बिजनेस मीटिंग है।”

मैं बगल में बैठा मुस्करा रहा था।

मुझे मालूम था कि आगरा में कोई मीटिंग नहीं थी।

एक नई दुकान का उद्घाटन था।

लेकिन “दुकान” में वह रुतबा कहां?

“बिजनेस मीटिंग” बोलो।

बात में वजन आता है।

न्यू रिच की दुनिया में काम छोटा हो सकता है, नाम बड़ा होना चाहिए।

व्हाट्सऐप पर पड़ोसी को जलाना

एक सज्जन ने वीडियो कॉल पर अपना कैमरा सीट की तरफ घुमाया।

“देख रहे हो? बिजनेस क्लास जैसा है!”

वह इकोनॉमी में थे।

पीछे बैठे यात्री ने पूछा, “भाई साहब, बिजनेस क्लास कहां है?”

उन्होंने कहा, “Actually, this is premium economy.”

टिकट देखकर पता चला कि वह साधारण इकोनॉमी थी।

लेकिन सोशल मीडिया में सत्य का किराया बहुत कम है।

वहां सब कुछ अपग्रेड हो सकता है।

घर की रसोई “मॉडर्न किचन”।

स्कूटर “माई राइड”।

दुकान “बिजनेस हब”।

और मामूली यात्रा “यूरोपियन स्टाइल ट्रैवल”।

उड़ान में भी नवाबी

घोषणा हुई कि इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बंद रखें।

एक साहब फोन पर लगे रहे।

“हेलो... आवाज आ रही है?”

भाई साहब, विमान हवा में था।

आवाज नहीं, शायद धरती भी मुश्किल से आ रही थी।

एयर होस्टेस ने विनम्रता से कहा, “Sir, please switch off the phone.”

साहब ने फोन नीचे किया।

और धीरे से बोले, “You know, I am on an important call.”

मैंने सोचा, देश की अर्थव्यवस्था शायद इसी फोन पर टिकी है।

दस मिनट बाद वही साहब झपकी ले रहे थे।

महत्वपूर्ण कॉल खत्म।

देश बच गया।

अंग्रेजी का कमाल

इन लोगों की अंग्रेजी भी कमाल है।

शब्द गलत हों तो कोई बात नहीं।

उच्चारण गलत हो तो भी कोई बात नहीं।

लेकिन आत्मविश्वास में कोई कमी नहीं।

एक साहब ने एयर होस्टेस से पूछा, “Can I have one veg vegetarian?”

मैंने सोचा, यह शायद शाकाहारी का अंतरराष्ट्रीय संस्करण है।

दूसरे ने कहा, “I want hot water, but little hot.”

तीसरे ने पूछा, “Where is the washroom toilet?”

चौथे ने कहा, “I am feeling very hungry stomach.”

अंग्रेजी अपनी जगह।

भूख अपनी जगह।

व्याकरण को कौन पूछता है?

लैंडिंग का लट्ठमार अध्याय

सबसे बड़ा तमाशा लैंडिंग के बाद होता है।

विमान अभी रनवे पर दौड़ रहा है।

सीट बेल्ट का संकेत अभी जल रहा है।

लेकिन तीन महानुभाव खड़े हो चुके हैं।

एक ने लॉकर खोल दिया।

दूसरा बैग खींच रहा है।

तीसरा फोन पर लाइव वीडियो बना रहा है।

घोषणा हो रही है, “Please remain seated.”

लेकिन शायद उन्होंने सुना, “Please stand immediately.”

एक यात्री ने दूसरे से कहा, “बैठ जाइए।”

जवाब आया, “बस सामान लेना है।”

“विमान अभी रुका नहीं है।”

“अरे, कुछ नहीं होगा।”

यही वाक्य हमारे देश में बहुत से हादसों की शुरुआत है।

कुछ नहीं होगा।

फिर कुछ हो जाता है।

असली बीमारी क्या है?

बेंगलुरु से आगरा तक की इस यात्रा में मुझे लगा कि समस्या अंग्रेजी नहीं है।

समस्या पैसा भी नहीं है।

समस्या महंगे कपड़े या आईफोन भी नहीं हैं।

समस्या है दिखावा और ठहराव की कमी।

पैसा आया तो ठीक है।

नई कार खरीदी तो बहुत अच्छा।

विदेश घूम आए तो और अच्छा।

बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ाया तो शानदार।

लेकिन अगर पैसे के साथ तहजीब नहीं आई, तो मामला अधूरा है।

अगर महंगे चश्मे के पीछे नजर संकरी है, तो चश्मा किस काम का?

अगर आईफोन हाथ में है और दूसरे के लिए सम्मान नहीं है, तो स्मार्टफोन है, स्मार्टनेस नहीं।

अगर अंग्रेजी जुबान पर है और सब्र दिल में नहीं है, तो यह सिर्फ लहजा है, शख्सियत नहीं।

और मजे की बात यह है कि हम सबमें थोड़ा-बहुत न्यू रिच छिपा बैठा है।

बस मौका चाहिए।

एयरपोर्ट वह मौका दे देता है।

वहां आदमी का असली चरित्र ट्रॉली, ट्रे, सीट और बोर्डिंग लाइन में दिखाई देता है।

किसी का पैसा उसकी हैसियत बता सकता है, लेकिन उसका व्यवहार उसकी परवरिश बताता है।

आखिर में मैंने अपना बैग उठाया और आगरा की तरफ चल पड़ा।

मेरे आसपास आईफोन थे।

महंगे चश्मे थे।

ब्रांडेड बैग थे।

फर्राटेदार अंग्रेजी थी।

और बीच-बीच में वही पुरानी भारतीय धक्का-मुक्की भी थी।

मैं मुस्कराया।

हम चांद पर पहुंचने की तैयारी कर रहे हैं।

लेकिन बोर्डिंग लाइन में अपनी बारी का इंतजार अभी नहीं सीख पाए।

शायद अगली उड़ान में एयरलाइन टिकट के साथ एक छोटा-सा पैकेट भी देगी।

उस पर लिखा होगा:

“एक यात्री के लिए एक अदद तहजीब।

उपयोग से पहले खोलें।

दिखावे के लिए नहीं, व्यवहार के लिए इस्तेमाल करें।”

Friday, October 2, 2026

 


पश्चिमी दुनिया का आकर्षण

झटके, अचंभे और अविश्वास! 

__________________________

हरियाली देखकर दिल भर आया, 

समोसा याद आया तो घर लौट आया

_________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा

3 अक्टूबर, 2026

____________________________

पश्चिमी यूरोप में उतरते ही मेरा पहला सवाल था, “कूड़ा गया कहां?”

सड़क साफ। फुटपाथ साफ। पार्क साफ। नदी साफ। कूड़ेदान तक ऐसे खड़े जैसे गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल होने आए हों।

घास इतनी करीने से कटी कि लगा, हर सुबह कोई अधिकारी उसकी हाजिरी लगाता होगा।

मैंने सोचा, “अरे वाह! यहां तो घास भी अनुशासन का पालन करती है।”

भारत से आया आदमी पहले प्रभावित होता है। फिर थोड़ा शर्मिंदा। फिर सोचता है, “आखिर हमसे ऐसा क्यों नहीं होता?”

यहां कोई चलती कार से चिप्स का पैकेट बाहर नहीं फेंकता। कोई सड़क को अपनी निजी पार्किंग नहीं समझता। कोई गाड़ी आड़ी खड़ी करके नहीं कहता, “भाई, थोड़ा एडजस्ट कर लो।”

‘जुगाड़’ यहां शायद किसी संग्रहालय में संरक्षित भारतीय विरासत है।

मैंने यूरोप से लौटते समय दिमाग में एक लंबी सूची बनाई।

“भारत को इनसे यह सीखना चाहिए।”

फिर किसी ने पूछा,

“तो फिर यहीं बस क्यों नहीं जाते?”

मैंने कहा, “क्यों नहीं?”

लेकिन जिंदगी में कई बड़े फैसले पेट से होकर गुजरते हैं।

और मेरा पेट लोकतंत्र की तरह स्वतंत्र है।

समोसा बनाम सलाद

पहले ही कुछ दिनों में मुझे यूरोपीय भोजन की खूबसूरती समझ आ गई।

प्लेट शानदार। खाना नपा-तुला। सब्जियां सजी हुईं। मसाला इतना कम कि वह शायद खाने से पहले माफी मांगता हो।

फिर एक दिन मुझे समोसा याद आया।

ऐसा समोसा जो जीभ को जला दे, पेट को चुनौती दे और घर की याद को स्थायी बना दे।

मुझे सड़क किनारे की चाट याद आई।

वह गोलगप्पे वाली चाट जिसके सामने कोई स्वास्थ्य अधिकारी खड़ा हो जाए तो शायद उसकी नौकरी खतरे में पड़ जाए, लेकिन ग्राहक चटखारे लेकर खाए और कहे, “भैया, थोड़ा और तीखा लगाना।”

तब समझ आया कि सभ्यता की भी कई परिभाषाएं हैं।

एक है खूबसूरत लॉन।

दूसरी है अच्छा समोसा कहां मिलता है, यह पता होना।

यूरोप में मशीन आपकी सबसे करीबी रिश्तेदार है

यूरोप में हर चीज का सिस्टम है।

सिस्टम के पीछे प्रक्रिया है। प्रक्रिया के पीछे नियम है। नियम के पीछे मशीन है।

और मशीन के पीछे कोई इंसान है या नहीं, AI के ज़माने में यह हमेशा साफ नहीं होता।

एक जगह मैंने मुस्कुराकर कहा, “हैलो, कैसे हैं?”

सामने वाली महिला ने मशीन की ओर इशारा कर दिया।

मैं मशीन को देखता रहा।

मशीन मुझे देखती रही।

दोनों में कोई बातचीत नहीं हुई।

मुझे लगा, इंसान से बात करने वाला फीचर नए सॉफ्टवेयर अपडेट में हटा दिया गया है।

कहीं नकद पैसे निकालिए तो ऐसा लगता है जैसे आपने कोई पुरानी बीमारी पाल रखी हो।

कार्ड दीजिए।

बटन दबाइए।

मशीन चलाइए।

अपना सामान उठाइए।

और आगे बढ़ जाइए।

भारत में ऐसा नहीं है।

आप दुकान में बिस्कुट खरीदने जाते हैं।

दुकानदार पूछता है, “कहां से आए?”

आप बताते हैं।

फिर वह पूछता है, “बच्चे क्या करते हैं?”

फिर राजनीति।

फिर महंगाई।

फिर क्रिकेट।

फिर पड़ोसी।

और अगर समय ज्यादा हो तो ब्लड प्रेशर भी।

अंत में चाय।

यूरोप आपको सामान देता है।

भारत सामान के साथ कहानी भी देता है।

अंग्रेजी भी बेचारी हो जाती है

भारत में हम भाषाई दीवारों से परेशान रहते हैं।

फिर फ्रांस, जर्मनी या इटली पहुंच जाइए।

अचानक अंग्रेजी भी अनाथ लगने लगती है।

आप पर्यटक हैं। जेब में पैसा है। कैमरा है। नक्शा है।

लेकिन सामने वाला अपनी भाषा में ही खुश है।

कभी-कभी संदेश साफ महसूस होता है:

“आपके पैसे का स्वागत है। आपकी अंग्रेजी एक अलग मामला है।”

बेशक, यह हर जगह सच नहीं है। 

लेकिन भारतीय आदमी को यह अंतर जरूर महसूस होता है।

भारत में बातचीत के लिए विषय की जरूरत नहीं होती।

कह दीजिए,

“आज गर्मी बहुत है।”

पांच मिनट बाद आपको सामने वाले का गांव, नौकरी, परिवार, राजनीतिक पसंद और कभी-कभी ब्लड प्रेशर तक मालूम हो सकता है।

यूरोप में सामने वाला शायद सोच रहा हो,

“इस आदमी को मेरे ब्लड प्रेशर से क्या मतलब?”

आत्मनिर्भरता या आत्म-सेवा?

यूरोप में सेल्फ सर्विस का बोलबाला है।

अपना सामान खुद उठाइए।

अपना खाना खुद लीजिए।

मशीन खुद चलाइए।

चेक-इन खुद कीजिए।

रास्ता खुद खोजिए।

कभी-कभी लगता है कि पर्यटन नहीं, जीवन-कौशल की परीक्षा चल रही है।

इसे श्रम की गरिमा कह सकते हैं।

लेकिन कभी-कभी मन कहता है,

“भाई, गरिमा अपनी जगह, कोई मेरा सूटकेस भी उठा दे!”

मजेदार बात यह है कि इसमें आम आदमी का दोष नहीं।

जहां इंसानी श्रम महंगा होता है, वहां मशीन का इस्तेमाल बढ़ता है।

दक्षता आती है।

समय बचता है।

खर्च घटता है।

लेकिन उसके साथ कुछ और भी घट सकता है।

इंसानी संपर्क।

होटल में गांधीजी अभी भी जिंदा हैं!

एक होटल की लिफ्ट में एक यूरोपीय सज्जन से भारत की बात छिड़ी।

उन्होंने बड़ी मासूमियत से पूछा,

“क्या वह डंडे वाला बूढ़ा अभी भी अंग्रेजों से लड़ रहा है?”

मैं कुछ पल उन्हें देखता रहा।

उनकी पत्नी ने धीरे से समझाया कि अंग्रेज कुछ समय पहले जा चुके हैं।

मैं कहना चाहता था, “ढेर सारे नए गांधी भी आ चुके  हैं, साहब।”

लेकिन लिफ्ट हमारी मंजिल पर पहुंच गई।

इतिहास वहीं समाप्त हो गया।

रात नौ बजे होटल पहुंचिए, फिर भगवान मालिक

यूरोप की असली परीक्षा तब होती है जब टूरिस्ट बस आपको होटल से सौ मीटर पहले उतार दे।

सामने अंधेरा रास्ता।

हाथ में सूटकेस।

ड्राइवर का इशारा,

“पहाड़ी पर होटल उधर है।”

भारत में ऐसी स्थिति में कोई न कोई आदमी तुरंत प्रकट हो जाता।

“लाइए साहब, मैं उठा देता हूं।”

यूरोप में आप अपना सामान खुद उठाते हैं।

होटल पहुंचिए।

रिसेप्शन पर एक व्यक्ति।

चाबी लीजिए।

फिर लिफ्ट।

इतनी छोटी कि उसमें या तो आप जा सकते हैं या आपका सूटकेस।

दोनों साथ जाएं तो यूरोपीय इंजीनियरिंग की परीक्षा शुरू हो सकती है।

कमरे में पहुंचे।

पानी की बोतल नहीं।

अब अगला सांस्कृतिक प्रश्न।

बाथरूम में पानी कहां है?

यूरोप कहता है, “टिश्यू है।”

भारत कहता है, “पानी है।”

मैंने सोचा, सभ्यता की बहस बाद में करेंगे। पहले नल ढूंढते हैं।

यूरोप में सार्वजनिक शौचालयों के लिए शुल्क देना भी कई जगह सामान्य है।

भारत में आदमी कह सकता है,

“पहले काम निपटाओ, पैसे कहीं भी, कैसे भी, आजादी है।”

यूरोप की रात: शहर सोता नहीं, बस घर चला जाता है

रात होते ही कई यूरोपीय शहरों में ऐसा सन्नाटा उतरता है कि भारतीय पर्यटक घड़ी देखकर परेशान हो जाए।

हमारे यहां रात के दस बजे भी चाय की दुकान पर राष्ट्रीय राजनीति का भविष्य तय हो रहा होता है।

वहां कई जगहों पर ऐसा लगता है कि शहर ने सामूहिक रूप से घोषणा कर दी है,

“भाइयो, अब कल मिलेंगे।”

सड़कें शांत।

दुकानें बंद।

रोशनी सीमित।

और पर्यटक सोचता है,

“अब करें क्या?”

भारत में इस समय तक कोई न कोई आवाज जरूर आती है।

“चाय?”

यही दो अक्षर भारतीय सभ्यता की रीढ़ हैं।

कूड़ेदान भी हमसे आगे निकल गया

यूरोप की सबसे बड़ी सीख सफाई है।

कचरा अलग।

डिब्बे अलग।

जिम्मेदारी अलग।

और कई देशों में रीसाइक्लिंग की व्यवस्था काफी विकसित है। 2023 में यूरोपीय संघ में औसतन 48 प्रतिशत नगरपालिका कचरे का पुनर्चक्रण हुआ। जर्मनी में यह दर 69 प्रतिशत थी।

भारत में समस्या सिर्फ कूड़े की नहीं है।

कई बार समस्या यह है कि कूड़ेदान कहां है, यह ही पता नहीं चलता।

और कूड़ेदान मिल जाए तो उसके बाहर कचरे का छोटा-मोटा गणतंत्र बस चुका होता है।

इस मामले में मजाक नहीं होना चाहिए।

हमें यूरोप से सीखना ही होगा।

लेकिन यूरोप कोई स्वर्ग भी नहीं

यात्रा के दौरान एक बात समझ आई।

हर समाज की अपनी खूबियां हैं और अपनी कमियां।

यूरोप व्यवस्थित है, लेकिन हर यूरोपीय शहर एक जैसा नहीं।

कहीं व्यवस्था शानदार है, कहीं समस्याएं भी हैं।

कहीं भाषा की दूरी है।

कहीं महंगाई है।

कहीं आवास का संकट है।

कहीं अकेलापन है।

इसलिए दूर से चमकती तस्वीर को पूरा सच मान लेना भी ठीक नहीं।

लेकिन इतना जरूर है कि सार्वजनिक व्यवस्था को गंभीरता से लेने की यूरोपीय आदत हमें प्रभावित करती है।

तो क्या मैं वहां बसूंगा?

अब मेरा जवाब साफ है।

घूमने के लिए यूरोप शानदार है।

बसने के लिए...

थोड़ा सोचूंगा।

क्योंकि मुझे सड़कें पसंद आईं।

मुझे ट्रेनें पसंद आईं।

मुझे साफ पार्क पसंद आए।

मुझे नदियां पसंद आईं।

मुझे सार्वजनिक व्यवस्था पसंद आई।

लेकिन घर लौटकर कुछ और भी याद आया।

सड़क किनारे की चाय।

गरम समोसा।

बिना बुलाए बातचीत।

दुकानदार का सवाल,

“कहां से आए हो?”

वेटर का आग्रह,

“साहब, यह भी चखिए।”

पोर्टर का कहना,

“आप रहने दीजिए, मैं उठा देता हूं।”

और सबसे ज्यादा याद आया भारत का शोर।

भारत की अफरातफरी।

भारत का जुगाड़।

भारत की बहस।

भारत की हंसी।

भारत का वह अजीब-सा अपनापन जो कभी-कभी बिना टिकट आपके कमरे में भी पहुंच जाता है।

यूरोप में मशीन आपको बताती है कि क्या करना है।

भारत में बगल वाला आदमी बताता है।

मशीन ज्यादा कुशल है।

आदमी ज्यादा मजेदार है।

और शायद यही फर्क सिस्टम और समाज के बीच है।

यूरोप से भी सीखेंगे, भारत को भी नहीं छोड़ेंगे

भारत को यूरोप से बहुत कुछ सीखना चाहिए।

सफाई।

नागरिक अनुशासन।

कचरा प्रबंधन।

सार्वजनिक परिवहन।

शहरी योजना।

ऊर्जा की बचत।

सार्वजनिक संपत्ति का सम्मान।

लेकिन आधुनिकता का मतलब यह नहीं कि इंसान को मशीन में बदल दिया जाए।

थोड़ी गर्मजोशी बची रहनी चाहिए।

थोड़ी बेवकूफी भी।

थोड़ी बातचीत।

थोड़ी बहस।

थोड़ी गुंजाइश गलती की।

और कभी-कभी किसी अजनबी से दोस्ती की गुंजाइश।

मैं यूरोप से दो स्मृतियां लेकर लौटा हूं।

पहली, यूरोपीय व्यवस्था के लिए गहरा सम्मान।

दूसरी, भारतीय अव्यवस्था के लिए उससे भी गहरा प्यार।

वहां लॉन ज्यादा सुंदर हैं।

सड़कें ज्यादा चिकनी हैं।

सिस्टम ज्यादा मजबूत हैं।

लेकिन मुझे एक गरमागरम समोसा दे दीजिए।

सड़क किनारे की चाय पिला दीजिए।

और पास में कोई अजनबी बैठा दीजिए जो क्रिकेट, राजनीति, मौसम और महंगाई पर बहस करने को तैयार हो।

फिर पूछिए,

“कहां रहना पसंद करेंगे?”

मेरा जवाब शायद होगा:

“यूरोप घूमने के लिए बहुत अच्छा है।

घर के लिए भारत ही ठीक है।”

क्योंकि भारत परफेक्ट नहीं है।

शायद कभी होगा ।

लेकिन उसकी खामियों में भी लोग हैं।

उनकी आवाजें हैं।

उनकी हंसी है।

उनकी बहसें हैं।

उनकी शिकायतें हैं।

उनका अपनापन है।

और शायद घर वहीं होता है, जहां कोई आपको देखकर पूछे:

“चाय पियोगे?”

Tuesday, September 29, 2026

 गांधी तो मर गए, पर उनके सवाल जिंदा हैं  

क्या हिंसा, लालच और तपती ज़मीन से जूझती यह दुनिया महात्मा गांधी को अनदेखा कर सकती है?

______________________________

बृज खंडेलवाल  द्वारा

1 अक्टूबर, 2026

_________________________________

वर्तमान दौर के भारत में महात्मा गांधी आउट ऑफ फैशन हैं। ये अलग बात है कि विदेशों में भारत की पहचान महात्मा गांधी से ही है। विदेशी मेहमानों को आज भी सबसे पहले राज घाट स्मारक पर ले जाया जाता है।

तो क्या गांधी गलत थे, या दुनिया के लालची इरादे ही सही थे?  

वह आदमी जिसने लाठी हाथ में लेकर नहीं बल्कि अहिंसा की ताकत दिखाकर रास्ता बताया था, आज की मिसाइलों, परमाणु हथियारों, लड़ाकू विमानों और अरबों डॉलर की दौलत वाली दुनिया में अजीब लगने लगा है। उनका चरखा अब स्मार्टफोन से बदल गया है, चिट्ठियों की जगह व्हाट्सऐप ने ले ली है, और सादगी के बदले “ज्यादा पाने, ज्यादा दिखाने” की होड़ लगी है।

फिर भी विडंबना देखिए: जितनी तेजी से दुनिया आधुनिक हो रही है, उतनी ही बेचैनी से उसे गांधी के मूल्यों की ज़रूरत महसूस हो रही है।  

दुनिया बाहर और अंदर दोनों तरह से जल रही है। ग्लोबल वार्मिंग मौसम बदल रही है।  युद्ध शहरों को खंडहर बना रहे हैं। नफ़रत आतंक को ताकत दे रही है। असमानता बढ़ रही है, जबकि कुछ लोग अकूत दौलत जमा कर रहे हैं। करोड़ों लोग तनाव और अकेलेपन से जूझ रहे हैं, और सोशल मीडिया पर फ़रेब और शोर के पिरामिड खड़े हो रहे हैं।  

इन सब के बीच गांधी एक असुविधाजनक सवाल पूछते दिखते हैं: आखिर कितना काफ़ी है?  

गांधी का दर्शन सिर्फ़ चरखा, उपवास या अंग्रेजों के ख़िलाफ़़ लड़ाई नहीं था। उसके बीच में थे सत्य, अहिंसा, आत्मसंयम, सादगी, निर्भीकता, समानता, स्थानीय आत्मनिर्भरता और हर इंसान के इज़्ज़त का ख़्याल।  

उनके व्रतों में सत्य और अहिंसा सबसे आगे थे; साथ में अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य (इंद्रिय संयम), अपरिग्रह (ज़रूरत से ज़्यादा न जमा करना), शरीरिक श्रम, स्वाद पर क़ाबू, सभी धर्मों का इज़्ज़त और अस्पृश्यता का उन्मूलन भी शामिल था।

पहली नज़र में ये किसी आश्रम के नियम लग सकते हैं। पर सोचिये: क्या यह सभ्य समाज के लिए भी ज़रूरी नहीं है, जो अपनी ही बनाई समस्याओं के दल दल में फँसता जा रहा है?

सत्य की बात लीजिए। जब राजनीति में प्रचार-प्रपंच और झूठ बढ़ जाए, विज्ञापन हमारी ज़रूरतों को इच्छाओं में बदल दें और झूठ सच से तेज़ी से फैले, तो गांधी का सत्य बहुत आधुनिक लगता है।  

अहिंसा को देखिए। जब किसी राष्ट्र के पास लाखों लोगों को नष्ट करने की ताकत हो, तब गांधी का सवाल और भी ज़्यादा चुनौती देता है, क्या हिंसा से स्थायी शांति मिल सकती है?

गांधी का उत्तर था सत्याग्रह: सत्य की ताकत, अहिंसक प्रतिरोध, सविनय अवज्ञा और आत्मबल: दोषी को मिटाने की बजाय उसके अंदर की समझ को जगाना। आज की बदले की राजनीति में यह विचार सबसे कठिन और शायद सबसे ज़रूरी है। हम किसी ग़लती पर उसे गलत से ज़्यादा बदले में टुकड़े करना चाहते हैं, और इसे हम रणनीति कह देते हैं। गांधी इसे जाल कहते थे।

आर्थिक सोच में भी गांधी आज के उपभोक्तावादी तंत्र को बेचैन करते हैं। उन्होंने कहा कि अर्थशास्त्र को नैतिकता से अलग नहीं रखा जा सकता। ज़्यादा दौलत रखने वाले को इसे समाज की अमानत समझना चाहिए, यही उनका ट्रस्टिशिप सिद्धांत था। सर्वोदय का मतलब सबका कल्याण, पर शुरुआत सबसे कमज़ोर से।

उनका यह वाक्य शायद हर कंपनी की दीवार पर होना चाहिए:  

“धरती हर व्यक्ति की ज़रूरतें पूरी करने के लिये काफ़ी है, पर हर व्यक्ति के लालच के लिये नहीं।”  

जलवायु संकट ने इस बात को और कड़ा कर दिया है। हम ज़्यादा खोदते हैं, ज़्यादा बनाते हैं, ज़्यादा फेंकते हैं, और आश्चर्य करते हैं कि धरती हांफ क्यों रही है। हमने उपभोग को सफलता का पैमाना बना लिया है। गांधी पूछते, क्या हमारी यह सफलता धीरे-धीरे हमारी विफलता बन रही है?

उनका अपरिग्रह हमें यह नहीं कहता कि आधुनिकता छोड़ दो; वह बस पूछता है: क्या हर इच्छा को खरीदकर पूरा करना ज़रूरी है? उनका स्वदेशी दरवाज़े बंद करने की बात नहीं करता था, बल्कि स्थानीय हुनर और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने की सलाह देता था। और शरीर श्रम यह सिखाता था कि इज़्ज़त सिर्फ़ कुर्सी पर बैठे लोगों की बात नहीं है।

शायद आज गांधी की सबसे बड़ी चुनौती हमारी अपनी ज़िन्दगी है:  

क्या हम कम ख़पत कर सकते हैं? कम नफ़रत? कम भंडार? कम डर? ज़्यादा सुनना? ज़्यादा बाँटना?

आधुनिक सभ्यता ने अद्भुत ताकत पा ली है, पर आत्मसंयम खो रहा है। हम दूसरे ग्रह भेज सकते हैं, पर अपना गुस्सा काबू में लाना अब भी मुश्किल लगता है। हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बना रहे हैं, पर मानवीय पारखी समझ तलाश रहे हैं। यही गांधी की विडंबना है: दूरियाँ घट गईं, मगर नफ़रत नहीं; परमाणु हासिल कर लिए, पर क्रोध नहीं; बीमारी से लड़ लिए, पर लालच पर जीत नहीं।

तो क्या गांधीवाद अप्रासंगिक है? नहीं।

दुनिया को गांधी की पूजा करने की ज़रूरत नहीं, न ही उनकी मूर्ति पर सवाल उठाना पाप घोषित करने की। ज़रूरत है उन असुविधाजनक सवालों को सुनने की जो गांधी ने छोड़े हैं:

- अगर धरती रहने लायक ही न रहे तो विकास का क्या मतलब?  

- अगर करोड़ों लोग पीछे छूट जाएँ तो समृद्धि किस काम की?  

- अगर शांति के नाम पर हमेशा युद्ध की तैयारी करनी पड़ी तो वह शांति कैसी?  

- अगर डर हमारे फ़ैसले तय करने लगे तो आज़ादी कैसी?  

- और अगर खुश रहने के लिये हमें लगातार और खरीदारी करनी पड़े तो यह कैसी सभ्यता है?

गांधी ने कोई जादू की छड़ी नहीं दी थी। उन्होंने एक मुश्किल चीज दी थी: नैतिक दिशा-निर्देश। दुनिया गांधी को अनदेखा कर सकती है: यह उसका हक़ है। मगर सत्य, संयम, करुणा और अहिंसा की अनदेखी करने के नतीजों से बचना सम्भव नहीं।  


Monday, September 28, 2026

 


नदियाँ बचेंगी, तभी जीवन बचेगा

सुप्रीम कोर्ट ने फिर दिखाया आईना

__________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा

29 सितंबर 2026

_____________________________


सुप्रीम कोर्ट ने नदियों को लेकर सरकारों को फिर आईना दिखाया है। यमुना प्रदूषण से शुरू हुई अदालत की स्वतः संज्ञान वाली कार्यवाही अब देश की नदियों में बह रहे सीवेज और प्रदूषण के व्यापक संकट तक पहुंच चुकी है। फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि स्वच्छ पर्यावरण और साफ पानी में जीवन का अधिकार निहित है।

इसी बीच सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर तैयार यमुना एक्शन प्लान ने एक और कड़वी तस्वीर सामने रखी है। यमुना बेसिन में रोज करीब 7,999.63 मिलियन लीटर घरेलू सीवेज पैदा होता है। इसमें से लगभग 1,755.80 एमएलडी के उपचार की व्यवस्था अभी भी नहीं है। उत्तर प्रदेश में अकेले शहरी क्षेत्रों का सीवेज ट्रीटमेंट गैप करीब 940 एमएलडी बताया गया है। आगरा और मथुरा भी उन प्रमुख इलाकों में हैं, जहां बड़ी मात्रा में अनुपचारित गंदा पानी यमुना तंत्र में पहुंच रहा है।

पर्यावरणविद डॉ देवाशीष भट्टाचार्य कहते हैं, "सवाल अब केवल यह नहीं है कि यमुना कितनी प्रदूषित है। सवाल यह है कि हम नदियों को आखिर कब तक कागजों पर बचाते रहेंगे? क्या हम नदियों के बिना भारत की कल्पना कर सकते हैं?"

नदियाँ केवल बहता हुआ पानी नहीं हैं। वे हमारी सभ्यता, संस्कृति, खेती, अर्थव्यवस्था और आने वाली पीढ़ियों की जीवनरेखा हैं। गंगा हो, यमुना हो, नर्मदा हो, कावेरी हो या किसी गांव की छोटी नदी, हर नदी अपने साथ जीवन लेकर चलती है।

लेकिन आज हमारी नदियाँ संकट में हैं।

कहीं पानी कम हो रहा है। कहीं नदी का प्राकृतिक प्रवाह रोक दिया गया है। कहीं शहरों का सीवर और उद्योगों का जहरीला पानी नदी में गिर रहा है। कहीं बाढ़ क्षेत्र पर कब्जे हो रहे हैं। कहीं नदी की तलहटी गाद, प्लास्टिक और कचरे से भर रही है।

हमने नदी को जीवित धारा मानने के बजाय कभी नाला और कभी जमीन का टुकड़ा समझ लिया है।

यमुना इसका सबसे दर्दनाक उदाहरण है।

आगरा के लिए यमुना केवल एक नदी नहीं है। यह शहर की आत्मा है। यह ब्रज की संस्कृति, आस्था और इतिहास का हिस्सा है। इसके किनारे घाट बने, मंदिर बसे, बस्तियां विकसित हुईं और लोक परंपराओं ने जन्म लिया। ताजमहल भी इसी नदी के किनारे खड़ा होकर सदियों से इसकी कहानी कह रहा है।

लेकिन आज ताजमहल के सामने सवाल सिर्फ उसकी खूबसूरती का नहीं है। सवाल उस नदी का है, जिसकी गोद में ताज का प्रतिबिंब दिखाई देता था।

अगर नदी में स्वच्छ और पर्याप्त पानी ही नहीं रहेगा, तो घाटों की सजावट और रोशनी किस काम की?

नदी को सजाने से पहले उसे बचाना होगा।

नदी का मतलब केवल पानी नहीं है। नदी का मतलब है उसका प्राकृतिक प्रवाह, साफ पानी, जीवंत तल और अपना बाढ़ क्षेत्र। नदी को सांस लेने की जगह चाहिए। उसका रास्ता रोककर, उसके किनारे कब्जा करके और उसमें गंदा पानी डालकर हम नदी को जिंदा नहीं रख सकते।

यही सवाल रिवर कनेक्ट कैंपेन वर्षों से उठा रहा है।

हमारी मांग साफ है। यमुना की तलहटी से गाद, कचरा और प्रदूषक निकाले जाएं। जरूरत के अनुसार डीसिल्टिंग और ड्रेजिंग हो। सभी नालों को टैप किया जाए। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट कागजों पर नहीं, पूरी क्षमता से जमीन पर चलें। औद्योगिक प्रदूषण पर सख्त निगरानी हो और जिम्मेदारी तय की जाए।

आगरा में यमुना पर बैराज की मांग भी लंबे समय से उठती रही है। यह मुद्दा बार बार सामने आता है, लेकिन फिर फाइलों और आश्वासनों के बीच कहीं खो जाता है। आगरा की जल जरूरतों और यमुना के पर्यावरणीय हितों को साथ रखकर इसका गंभीरता से अध्ययन और निर्णय होना चाहिए।

अब समय आ गया है कि केंद्र और राज्य सरकारें नदियों को अलग अलग योजनाओं की नजर से देखना बंद करें।

भारत को एक व्यापक राष्ट्रीय नदी नीति चाहिए।

ऐसी नीति में हर नदी के लिए न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह सुनिश्चित हो। प्राकृतिक बाढ़ क्षेत्र सुरक्षित हों। सीवर और औद्योगिक प्रदूषण की जिम्मेदारी स्पष्ट हो। भूजल, बांध, बैराज, रेत, जलग्रहण क्षेत्र और नदी किनारे की जमीन को एक समग्र व्यवस्था में देखा जाए।

नदी नीति केवल सरकारी फाइल न बने। इसमें वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों, किसानों, मछुआरों, नदी किनारे रहने वाले लोगों और नागरिक संगठनों की भागीदारी हो।

क्योंकि नदी केवल सरकार की नहीं होती। नदी समाज की होती है।

रिवर कनेक्ट अभियान का संकल्प साफ है। नदी बचेगी तो खेत बचेंगे। खेत बचेंगे तो किसान बचेंगे। पानी बचेगा तो शहर बचेंगे। नदी बचेगी तो संस्कृति बचेगी।

यमुना को अविरल और निर्मल बनाना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। सरकार की जवाबदेही जरूर है, लेकिन समाज की भागीदारी भी जरूरी है।

हमें नदी को नाला बनने से रोकना होगा।

नदी को जमीन बनने से रोकना होगा।

नदी को कूड़ेदान बनने से रोकना होगा।

और सबसे बढ़कर, नदी को फिर से नदी बनाना होगा।

क्योंकि आने वाली पीढ़ियां हमसे पूछेंगी कि जब नदियां मर रही थीं, तब हमने क्या किया था?