Sunday, August 9, 2026

 राजनीति को चाहिए नया खून: छात्र संघों की वापसी अब क्यों जरूरी है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

11 अगस्त 2026

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कहते हैं, जब राजनीति में नया खून नहीं आता, तो पुरानी नसों में जंग लगने लगती है। वही चेहरे, वही नारे, वही वादे और वही कुर्सी की दौड़। देश की राजनीति आज कुछ ऐसी ही थकी हुई दिखाई देती है।

इधर एक अजीब-सी जेन-ज़ी मुहिम ने सबका ध्यान खींचा है। दावा किया जा रहा है कि “कॉकरोचों के नेतृत्व” में चल रही यह नई पीढ़ी की हलचल युवाओं की बेचैनी और बगावत का प्रतीक बन गई है। नाम भले ही मज़ाकिया हो, मगर सवाल गंभीर है। जब युवा अपनी बात कहने के लिए इतने अजीब प्रतीक खोज रहे हैं, तब हमारे कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में उनके अपने लोकतांत्रिक मंच आखिर कहाँ हैं?

जवाब साफ है: हमने छात्र राजनीति का दरवाज़ा ही बंद कर दिया।

छात्र संघ कभी विश्वविद्यालयों की जान हुआ करते थे। पढ़ाई के साथ बहस होती थी, चुनाव होते थे, भाषण होते थे, सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे। छात्र अपनी शिकायतें लेकर संगठित ढंग से प्रशासन के सामने जाते थे। नेतृत्व सीखते थे, हारना सीखते थे और जीत को संभालना भी सीखते थे।

आज हम चाहते हैं कि युवा सीधे आईएएस बनें, सीईओ बनें, वैज्ञानिक बनें और नेता भी बनें। मगर नेता बनने की नर्सरी बंद कर दी गई है। फिर हम शिकायत करते हैं कि राजनीति में अच्छे लोग क्यों नहीं आते। यह तो वही बात हुई: खेत को पानी न दो और फसल से शिकायत करो।

1960 के दशक में शिक्षा आयोग ने भी छात्र संघों को महत्वपूर्ण माना था। सोच यह थी कि संगठित छात्र गतिविधियाँ युवाओं में आत्म-अनुशासन, स्वशासन और नेतृत्व की भावना पैदा करती हैं। कई जगह छात्र संघ कैंटीन चलाते थे, सहकारी दुकानें संभालते थे और साहित्यिक व सांस्कृतिक कार्यक्रम कराते थे।

मतलब साफ था। विश्वविद्यालय केवल डिग्री बाँटने की फैक्टरी नहीं है। वह नागरिक तैयार करने की जगह भी है।

भारत के इतिहास में छात्र आंदोलनों ने कई बार राजनीति की दिशा बदल दी। 1965 का तमिलनाडु का हिंदी-विरोधी आंदोलन हो या 1974 का गुजरात का नवनिर्माण आंदोलन, छात्रों ने अपनी ताकत दिखाई। मामूली-सी मेस फीस बढ़ने से शुरू हुआ गुजरात का आंदोलन भ्रष्टाचार और महंगाई के खिलाफ बड़ा जनांदोलन बन गया।

बिहार में छात्र आंदोलन से जयप्रकाश नारायण की “संपूर्ण क्रांति” का नारा उठा। उसी दौर ने देश की राजनीति को झकझोर दिया। बाद में आपातकाल और 1977 के चुनावों ने भारतीय लोकतंत्र का नया अध्याय लिखा।

कई बड़े राष्ट्रीय नेता छात्र राजनीति की ही देन रहे हैं। अरुण जेटली ने दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति सीखी। लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार बिहार के छात्र आंदोलनों से उभरे। सीताराम येचुरी और प्रकाश करात ने जेएनयू की छात्र राजनीति में अपने कदम जमाए। ममता बनर्जी ने भी छात्र जीवन से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की।

नितिन गडकरी, राजनाथ सिंह और अशोक गहलोत जैसे अनेक नेताओं ने भी युवावस्था में संगठन और सार्वजनिक जीवन का अनुभव पाया।

आज सवाल यह है कि अगली पीढ़ी कहाँ से आएगी?

व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी से?

इंस्टाग्राम रील से?

या किसी “कॉकरोच आंदोलन” के वायरल मीम से?

युवा ऊर्जा को आप दबा सकते हैं, खत्म नहीं कर सकते। जब उसे लोकतांत्रिक रास्ता नहीं मिलता, वह किसी और रास्ते से बाहर आती है। कभी अचानक विरोध प्रदर्शन बनकर, कभी सोशल मीडिया के गुस्से में और कभी किसी अजीब प्रतीक के पीछे।

खाली जगह कभी खाली नहीं रहती। लोकतंत्र में भी नहीं।

छात्र संघों को खत्म करने का एक तर्क हमेशा दिया गया: हिंसा, गुटबाजी और बाहरी राजनीतिक दलों का दखल। यह बात पूरी तरह गलत नहीं थी। कई छात्र संघ सचमुच राजनीति के अखाड़े बन गए। पढ़ाई पीछे छूट गई और पोस्टरबाजी आगे आ गई। कैंपस में बहस की जगह कभी-कभी लाठी और धमकी ने ले ली।

मगर बीमारी के कारण मरीज को मार देना इलाज नहीं होता।

गलत छात्र राजनीति को सुधारना चाहिए था, छात्र राजनीति को दफन नहीं करना चाहिए था।

उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों और विश्वविद्यालयों में छात्र संघ चुनाव बंद या सीमित किए गए। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, लखनऊ विश्वविद्यालय और कई अन्य संस्थानों में निर्वाचित छात्र प्रतिनिधित्व कमजोर पड़ता गया या खत्म हो गया। प्रशासन ने शांति तो पा ली, मगर छात्रों की लोकतांत्रिक आवाज भी काफी हद तक खो गई।

अब हमें नई सोच के साथ छात्र संघों को वापस लाना चाहिए।

पुराने ढर्रे पर नहीं। नए संविधान और साफ नियमों के साथ।

छात्र संघों का मुख्य काम चुनावी राजनीति नहीं होना चाहिए। उनका ध्यान छात्रों की असली समस्याओं पर रहे: फीस, छात्रावास, पुस्तकालय, खेल, सुरक्षा, परिवहन और कैंपस सुविधाएँ। बहस, वाद-विवाद, सांस्कृतिक कार्यक्रम और खेलों को भी बढ़ावा दिया जाए।

हर चुने हुए छात्र प्रतिनिधि को नेतृत्व का प्रशिक्षण मिले। उसे बातचीत करना, बजट बनाना, विवाद सुलझाना और अलग राय रखने वालों को साथ लेकर चलना सिखाया जाए। चुनाव लड़ना आसान है, लोकतांत्रिक ढंग से काम करना मुश्किल है। यही हुनर सीखना जरूरी है।

विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्र प्रतिनिधियों की नियमित बैठकें हों। शिकायत सड़क पर पहुँचने से पहले बातचीत की मेज तक पहुँचे। अध्यापक मार्गदर्शन करें, मगर छात्रों की आवाज दबाएँ नहीं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राजनीति में नए लोगों की आमद का कोई विकल्प नहीं है। लोकतंत्र को हर पीढ़ी अपना नया नेतृत्व देती है। यदि युवाओं को कॉलेज में बोलने, बहस करने, हारने, जीतने और जिम्मेदारी लेने का मौका नहीं मिलेगा, तो राजनीति बूढ़ी होती जाएगी।

आज जेन-ज़ी अपनी भाषा खुद बना रही है। कभी मीम, कभी हैशटैग, कभी अजीबोगरीब प्रतीक और कभी “कॉकरोच” जैसा नाम। हमें इस पर केवल हँसना नहीं चाहिए। इसके पीछे छिपी बेचैनी को समझना चाहिए।

युवा कहना चाहते हैं: “हमें सुना जाए।”

कॉलेज और विश्वविद्यालय इस आवाज के लिए सबसे स्वाभाविक जगह हैं।

राजनीति को नया खून चाहिए। उसे किसी प्रयोगशाला से नहीं लाया जा सकता। वह कैंपस की बहसों, छात्र सभाओं, चुनावों और आंदोलनों से ही निकलेगा। छात्र संघ लोकतंत्र की वह पाठशाला हैं, जहाँ भविष्य के नेता पहली बार जनता का सामना करते हैं।

परीक्षा पास करने से नौकरी मिल सकती है। मगर समाज चलाने के लिए जिम्मेदारी, संवाद और नेतृत्व चाहिए।

इनकी कोई गाइडबुक नहीं होती।

इन्हें जीना पड़ता है।

छात्र संघों को फिर से जीवित कीजिए। उन्हें अनुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ चलाइए। बाहरी दलों की कठपुतली बनने से बचाइए। मगर युवाओं का लोकतांत्रिक मंच मत छीनिए।

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Syndicated by NPA


Saturday, August 8, 2026

 


कुर्सी जनता की, तिजोरी अपनी? 

भ्रष्ट अफसरशाही के लालच का कड़वा सच

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बृज खंडेलवाल द्वारा

10 अगस्त 2026

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दिल्ली के कोचिंग सेंटरों के बाहर खड़े युवाओं से पूछिए: क्या कर रहे हो? जवाब लगभग एक जैसा मिलेगा: “UPSC की तैयारी कर रहे हैं।”

क्यों?

“देश की सेवा करनी है। समाज बदलना है। संविधान की रक्षा करनी है।”

इरादे नेक हैं। सपने बड़े हैं। मगर कहानी का अगला अध्याय हमेशा इतना खूबसूरत नहीं होता।

कुर्सी मिलते ही कुछ लोगों की सेवा का दायरा बदल जाता है। देश पीछे छूट जाता है और खुद आगे आ जाता है।

सरकारी अफसर को तनख्वाह मिलती है। सरकारी मकान मिलता है। गाड़ी मिलती है। चिकित्सा सुविधा मिलती है। भत्ते मिलते हैं। रुतबा मिलता है। नौकरी के बाद पेंशन भी मिलती है।

तो फिर सवाल सीधा है; 

साहब को और क्या चाहिए?

यही सवाल उन अधिकारियों से पूछा जाना चाहिए जिन पर रिश्वत, कमीशन, सरकारी धन की हेराफेरी या पद के दुरुपयोग के आरोप लगते रहे हैं।

IAS और IPS कोई मामूली नौकरी नहीं है। UPSC की कठिन परीक्षा पास करके अधिकारी प्रशासन और शासन की सबसे ताकतवर गलियों तक पहुंचते हैं। उनके हाथ में फैसले होते हैं। फाइलें होती हैं। ठेके होते हैं। नीतियों को लागू करने की ताकत होती है।

कभी भारतीय नौकरशाही को “Steel Frame of India” कहा गया था।

लेकिन लोहे का फ्रेम भी जंग खा सकता है।

खतरा वहीं शुरू होता है जहां ताकत बहुत हो और निगरानी कम। विवेकाधिकार बड़ा हो और जवाबदेही छोटी। फाइल रोकने की ताकत हो, लेकिन जवाब देने की मजबूरी न हो।

फिर तनख्वाह कम नहीं पड़ती।

नीयत छोटी पड़ जाती है।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी भ्रष्टाचार के पीछे कई कारण गिनाते हैं: अत्यधिक विवेकाधिकार, पारदर्शिता की कमी, राजनीतिक-नौकरशाही गठजोड़, कमजोर जवाबदेही, धीमी न्याय प्रक्रिया, कम सजा दर और व्यक्तिगत लालच। इन सबके मेल से पद सेवा का माध्यम न रहकर निजी लाभ का जरिया बन सकता है।

भ्रष्टाचार के लिए अक्सर कम वेतन, महंगाई और आर्थिक मजबूरी का बहाना दिया जाता है। लेकिन वरिष्ठ नौकरशाहों के मामले में यह दलील ज्यादा दूर तक नहीं जाती।

जिस अधिकारी को सम्मानजनक वेतन, सरकारी आवास, वाहन, चिकित्सा सुविधा और दूसरी सुविधाएं मिल रही हों, उसके लिए रिश्वतखोरी को मजबूरी कहना जनता के जख्म पर नमक छिड़कना है।

सोशल एक्टिविस्ट पद्मिनी अय्यर इसे ज्यादा कड़वे अंदाज में कहती हैं:

“झोला लेकर सिस्टम में दाखिल होते हैं, ट्रकों का काफिला लेकर निजी महल के लिए विदा होते हैं।”

बात कड़वी है, लेकिन सवाल जरूरी है।

नाम बड़े हैं। मामले पुराने हैं। और पैटर्न बार-बार सामने आता है।

पूर्व कोयला सचिव एच.सी. गुप्ता को कोयला आवंटन से जुड़े कई मामलों में अदालत ने दोषी ठहराया। झारखंड की IAS अधिकारी पूजा सिंघल पर मनरेगा धन और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े गंभीर आरोप लगे। छत्तीसगढ़ के अनिल टुटेजा का नाम कथित शराब सिंडिकेट मामले में सामने आया।

हरियाणा में पंकज अग्रवाल और प्रदीप कुमार से जुड़े मामलों में बैंक फंड की कथित हेराफेरी और फर्जी दस्तावेजों के आरोप सामने आए। राजस्थान के सुबोध अग्रवाल का नाम जल जीवन मिशन की टेंडर प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं से जोड़ा गया। उत्तर प्रदेश के अभिषेक प्रकाश पर रिश्वत और कमीशन से जुड़े आरोप लगे। झारखंड के छवि रंजन भूमि से जुड़े मामलों में जांच के घेरे में आए।

इनमें से जहां अदालत का अंतिम फैसला नहीं आया है, वहां आरोप को दोषसिद्धि कहना नाइंसाफी होगी।

लेकिन सवाल फिर भी खड़ा होता है; 

आखिर इतने मामले क्यों सामने आते हैं?

क्या सरकारी कुर्सी सचमुच सेवा का माध्यम है?

या कुछ लोगों के लिए वह कमाई का सबसे सुरक्षित रास्ता बन चुकी है?

भ्रष्टाचार का कोई जेंडर नहीं होता

भ्रष्टाचार को भी अब जेंडर की नजर से देखने की जरूरत नहीं।

भ्रष्टाचार न पुरुष होता है, न महिला।

जिस तरह कोई पुरुष अधिकारी कानून तोड़ सकता है, उसी तरह महिला अधिकारी भी जांच और कानून के दायरे में आ सकती है। पूजा सिंघल का मामला इसका चर्चित उदाहरण है।

NEET-UG पेपर लीक की जांच में भी महिलाओं समेत कई लोगों के नाम सामने आए। कुछ विशेषज्ञों और अन्य आरोपियों पर प्रश्न याद करने, साझा करने या पैसे के बदले उपलब्ध कराने जैसे आरोप लगे।

संदेश साफ है:

ईमानदारी का कोई जेंडर नहीं। बेईमानी का भी नहीं।

हर भ्रष्टाचार कांड के बाद वही राजनीतिक तमाशा शुरू होता है।

विपक्ष कहता है: सरकार नाकाम है।

सरकार कहती है: हमने कार्रवाई की।

फिर प्रेस कॉन्फ्रेंस होती है। बयान आते हैं। जांच एजेंसियां सक्रिय होती हैं। गिरफ्तारियां होती हैं। चार्जशीट दाखिल होती है।

और उसके बाद?

मामला अदालत पहुंचता है।

फिर तारीख पर तारीख।

गिरफ्तारी खबर बन जाती है, लेकिन सजा इतिहास बन जाती है।

CBI और ED जैसी एजेंसियों ने भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामलों में जांच और कार्रवाई की है। राज्य सरकारों ने भी अधिकारियों को निलंबित किया और विभागीय जांच शुरू की।

लेकिन छापा, गिरफ्तारी या चार्जशीट अपने आप में भ्रष्टाचार का इलाज नहीं है।

अंतिम कसौटी अदालत का फैसला है।

और फैसला जितना देर से आएगा, व्यवस्था की कमजोरी पर भ्रष्टाचारी का भरोसा उतना ही बढ़ेगा।

सिर्फ वेतन बढ़ाने से भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा।

अधिकारी को अच्छा वेतन दीजिए। सम्मान दीजिए। सुविधाएं दीजिए। लेकिन अगर नीयत में खोट है, तो लालच का पेट कभी नहीं भरता।

लालच की कोई सैलरी स्लिप नहीं होती।

सरकारी अधिकारी जनता के पैसे और अधिकारों के रखवाले हैं। वे सरकारी कुर्सी के मालिक नहीं हैं। सरकारी पद निजी जागीर नहीं है।

इसलिए भ्रष्टाचार रोकना है तो सिर्फ भाषण नहीं, नतीजे चाहिए।

तेज सुनवाई चाहिए।

संपत्ति की सख्त जांच चाहिए।

फैसलों में पारदर्शिता चाहिए।

जहां जरूरत हो, विवेकाधिकार सीमित करना होगा।

और सबसे जरूरी: कानून की नजर में कोई बड़ा नहीं होना चाहिए।

न IAS।

न IPS।

न नेता।

न कोई रसूखदार।

कुर्सी चाहे कितनी भी ऊंची हो, कानून उससे ऊंचा होना चाहिए।

क्योंकि कुर्सी जनता देती है।

कुर्सी के साथ तिजोरी नहीं देती।

और जिस दिन अफसर यह फर्क भूल जाएगा, उसी दिन लोकसेवा, निजी सेवा में बदल जाएगी।

Friday, August 7, 2026

 


आरटीआई या रंगदारी का नया धंधा?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

8 अगस्त 2026

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सूचना का अधिकार कानून कभी भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार माना जाता था। इसे जनता की आंख और कान कहा गया। उम्मीद थी कि सरकारी फाइलों में छिपे सच बाहर आएंगे और अफसर जवाबदेह बनेंगे। लेकिन आज तस्वीर बदलती दिख रही है। कई जगह आरटीआई जनहित का नहीं, बल्कि निजी फायदे, ब्लैकमेल और उगाही का औजार बन चुकी है। कानून की आड़ में कुछ लोगों ने पूरा कारोबार खड़ा कर लिया है।

मैसूर विश्वविद्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम में कर्नाटक के पूर्व सूचना आयुक्त डॉ. एल. कृष्णमूर्ति ने इसी खतरे की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि फर्जी आरटीआई कार्यकर्ताओं की बढ़ती संख्या इस कानून की आत्मा को खत्म कर रही है। उनके अनुसार, जिस कानून ने 2जी जैसे बड़े घोटाले उजागर किए, उसी का इस्तेमाल अब सरकारी दफ्तरों को परेशान करने और बेवजह हजारों पन्नों की सूचनाएं मांगने में हो रहा है।

देशभर से सामने आए मामले इस चिंता को और बढ़ा रहे हैं।

हिमाचल प्रदेश के ऊना में एक स्वयंभू आरटीआई कार्यकर्ता पर आरोप लगा कि उसने पत्थर खदान संचालकों से 75 लाख रुपये की मांग की। आरटीआई से दस्तावेज जुटाए गए और फिर शिकायत करने की धमकी देकर रकम मांगी गई। सतर्कता विभाग ने जाल बिछाकर उसे पहली किश्त लेते हुए गिरफ्तार किया।

असम में दुलाल बोरा का मामला और भी चौंकाने वाला है। उस पर उगाही और धोखाधड़ी के दर्जनों मुकदमे दर्ज हुए। बताया गया कि उसने दो हजार से अधिक दूसरी अपीलें दायर कीं और कई बार एक ही दिन में सौ से ज्यादा आरटीआई आवेदन भेज दिए। आरोप था कि बाद में अधिकारियों और ठेकेदारों से पैसे लेकर मामलों को ठंडे बस्ते में डालने का खेल चलता था।

हरियाणा के गुरुग्राम में एक आरटीआई कार्यकर्ता और एक यूट्यूबर पर स्कूल प्रबंधन से लाखों रुपये की उगाही का आरोप लगा। पहले लगातार आरटीआई लगाई गईं, फिर अदालत और आयकर विभाग की कार्रवाई का डर दिखाया गया। अंत में शिकायतें वापस लेने के बदले मोटी रकम मांगी गई।

गुजरात के सूरत में तो यह पूरा नेटवर्क बन गया। पुलिस ने दर्जनों मुकदमे दर्ज किए। आरोप था कि कुछ लोग नगर निगम से भवनों की जानकारी आरटीआई के जरिए हासिल करते, फिर मापने वाली फीता लेकर खुद को निरीक्षक बताकर निर्माण स्थलों पर पहुंच जाते। बिल्डरों और मकान मालिकों को कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर हजारों से लेकर लाखों रुपये तक वसूले जाते।

आंध्र प्रदेश में दो लोगों पर सूचना आयोग ने आगे आरटीआई लगाने तक पर रोक लगा दी। आयोग ने पाया कि वे एक के बाद एक दर्जनों अपीलें और शिकायतें दायर कर सरकारी अधिकारियों को लगातार परेशान कर रहे थे। कई आवेदन वर्षों पुराने रिकॉर्ड मांगते थे, जिनका जनहित से कोई सीधा संबंध नहीं था।

तमिलनाडु के थेनी में एक व्यक्ति ने 781 आरटीआई आवेदन केवल जिला न्यायालय के खिलाफ दायर कर दिए। नतीजा यह हुआ कि सरकारी कामकाज प्रभावित होने लगा। सूचना आयोग ने उस पर जुर्माना लगाया और इसे कानून के खुले दुरुपयोग का मामला बताया।

यह केवल कुछ अलग-थलग घटनाएं नहीं हैं। इन मामलों का तरीका लगभग एक जैसा है। पहले आरटीआई डालो। फिर दस्तावेज जुटाओ। उसके बाद शिकायत, जांच या मीडिया में बदनामी का डर दिखाओ। आखिर में समझौते के नाम पर पैसे मांगो। कई जगह निजी दुश्मनी निकालने के लिए भी आरटीआई का इस्तेमाल किया गया। कहीं एक ही विषय पर सैकड़ों आवेदन भेजे गए, तो कहीं पूरे विभाग को कागजों के ढेर में दबा दिया गया।

सर्वोच्च न्यायालय भी कई बार ऐसी प्रवृत्ति पर चिंता जता चुका है। अदालत ने कहा कि आरटीआई का इस्तेमाल ईमानदार अधिकारियों को डराने या सरकारी कामकाज रोकने के लिए नहीं होना चाहिए। एक अन्य टिप्पणी में अदालत ने यहां तक कहा कि आरटीआई एक्टिविज्म कुछ मामलों में नया कारोबार बनता जा रहा है।

सबसे दुखद बात यह है कि ऐसे लोग खुद को समाजसेवी और भ्रष्टाचार विरोधी योद्धा बताकर कानून की साख को चोट पहुंचाते हैं। जनता का भरोसा कमजोर होता है। सरकारी दफ्तर हर आवेदक को शक की नजर से देखने लगते हैं। असली और नकली के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है।

आरटीआई कानून का जन्म जनता को ताकत देने के लिए हुआ था, लेकिन कुछ स्वार्थी तत्वों ने इसे दबाव, धमकी और वसूली के हथियार में बदलने की कोशिश की है। जब अधिकार की आड़ में कारोबार शुरू हो जाए, तो सबसे बड़ा नुकसान उसी कानून की विश्वसनीयता को होता है। आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि सूचना मांगने का अधिकार कहीं कुछ लोगों के लिए डर और सौदेबाजी का लाइसेंस तो नहीं बनता जा रहा।

Monday, August 3, 2026

 अंग दान, महा दान

बीस हज़ार नई ज़िंदगियाँ: अंगदान ने बदली भारत की तस्वीर

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

5 अगस्त 2026

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आगरा का सरोजिनी नायडू मेडिकल कॉलेज अब अंग प्रत्यारोपण सेवाओं के विस्तार की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। सुपर स्पेशियलिटी विंग में किडनी प्रत्यारोपण की सभी प्रमुख तैयारियां पूरी हो चुकी हैं और जल्द नियमित प्रत्यारोपण शुरू होने की उम्मीद है। यहां कॉर्निया प्रत्यारोपण की सुविधा पहले से उपलब्ध है, जबकि भविष्य में लिवर, हृदय और फेफड़ों के प्रत्यारोपण की भी योजना है। मेडिकल कॉलेज का एनाटॉमी विभाग देहदान (कैडवर डोनेशन) भी स्वीकार करता है। दान किए गए शरीरों का उपयोग एमबीबीएस और पीजी छात्रों के प्रशिक्षण, एनाटॉमी अध्ययन तथा सर्जिकल शिक्षा में किया जाता है। देहदान के लिए इच्छुक व्यक्ति एनाटॉमी विभाग में पंजीकरण करा सकते हैं।

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हाल ही में गुजरात में वंदे भारत एक्सप्रेस ने ग्रीन कॉरिडोर की मदद से जीवित हृदय समय पर पहुँचाकर इतिहास रचा।

एक परिवार अपने प्रियजन को हमेशा के लिए विदा कर रहा था। उसी समय, किसी दूसरे अस्पताल में एक मरीज नई जिंदगी की उम्मीद से ऑपरेशन थिएटर में ले जाया जा रहा था। एक घर का ग़म, दूसरे घर की खुशी बन गया। 

अंगदान की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि इंसान इस दुनिया से जाने के बाद भी कई लोगों की धड़कनों में ज़िंदा रह सकता है।

भारत ने वर्ष 2025 में अंग प्रत्यारोपण के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की। पहली बार देश में 20,138 अंग प्रत्यारोपण किए गए। यह पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 6-7 प्रतिशत अधिक है। वर्ष 2013 में यह संख्या केवल 4,990 थी। यानी एक दशक में अंग प्रत्यारोपण चार गुना से भी अधिक बढ़ गया। दिल्ली-एनसीआर सबसे आगे रहा, जहाँ 4,500 से अधिक प्रत्यारोपण हुए। इसके बाद तमिलनाडु, महाराष्ट्र, तेलंगाना और केरल का स्थान रहा। मृत्यु के बाद अंगदान करने वालों में तमिलनाडु ने फिर मिसाल पेश की। महाराष्ट्र, तेलंगाना और कर्नाटक भी इस दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं।

आज भारत जीवित दाताओं से अंग प्रत्यारोपण में दुनिया का अग्रणी देश है। कुल प्रत्यारोपण की संख्या के मामले में भारत अब केवल अमेरिका और चीन से पीछे है। यह उपलब्धि देश के डॉक्टरों, सर्जनों, नर्सों और स्वास्थ्यकर्मियों की मेहनत का नतीजा है। साथ ही, यह उन परिवारों की संवेदनशील सोच को भी सलाम है, जिन्होंने अपने दुःख के बीच किसी अनजान व्यक्ति को जीवन देने का फैसला किया।

एक दाता परिवार के सदस्य ने कहा, “हमारा बेटा तो चला गया, लेकिन उसकी किडनी और लीवर अब दो और परिवारों में धड़क रहे हैं। हमें लग रहा है कि वो अब भी कहीं ज़िंदा है।” एक लाभार्थी, जो कई साल से डायलिसिस पर था, भावुक होकर बोला, “जब डॉक्टर ने कहा कि अंग मिल गया है, तो लगता था जैसे मौत के मुँह से वापस लौट आया हूँ। अब मैं बच्चों के साथ खेल सकता हूँ। दाता परिवार का शुक्रिया अदा करने के शब्द नहीं हैं।”

विशेषज्ञ भी इस बदलाव को सराहते हैं। प्रसिद्ध ट्रांसप्लांट सर्जन  कहते हैं, “अंगदान सबसे बड़ा उपहार है। कृपया अपने अंग स्वर्ग न ले जाएँ; स्वर्ग को पता है कि हमें यहाँ उनकी ज़रूरत है।” 

राष्ट्रीय डिजिटल पोर्टल पर 2023 से अब तक पाँच लाख से अधिक लोगों ने अंगदान का संकल्प लिया है। ‘जुग-जुग जियो अभियान’, NOTTO मोबाइल ऐप और ‘वन नेशन, वन पॉलिसी’ ने प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया है। कई नए एम्स में किडनी और लीवर प्रत्यारोपण की सुविधाएँ बढ़ी हैं। 

फिर भी चुनौती बाकी है। हर साल लाखों मरीज अंगों की प्रतीक्षा में हैं। बहुत से लोग समय पर अंग न मिलने से जान गँवा देते हैं। 

यही कमी ग्रे मार्केट को बढ़ावा देती है। ग़रीबों से किडनी चुराकर या जबरदस्ती बेचने के मामले समय-समय पर सामने आते रहते हैं। दलाल ग़रीब किसानों, मजदूरों और कर्ज में डूबे लोगों को फुसलाते हैं। नकली रिश्ते, फर्जी दस्तावेज़ बनाकर अवैध प्रत्यारोपण कराए जाते हैं। महाराष्ट्र, तमिलनाडु, दिल्ली-एनसीआर और यहाँ तक कि बांग्लादेश-कम्बोडिया से जुड़े अंतरराष्ट्रीय रैकेट भी पकड़े गए हैं। ग़रीब दाता को थोड़े पैसे मिलते हैं, जबकि मरीज से लाखों वसूले जाते हैं। कई बार किडनी चुरा ली जाती है या धोखे से निकाल ली जाती है। यह काला व्यापार मानवीय गरिमा का घोर अपमान है।

कानून सख्त है, लेकिन जागरूकता और पारदर्शिता बढ़ाकर ही इस ग्रे मार्केट पर अंकुश लगाया जा सकता है। 

जब मृत्यु के बाद अंगदान समाज की स्वाभाविक संस्कृति बनेगी, तभी असली सफलता मिलेगी। आख़िरकार, इंसान की सबसे बड़ी विरासत उसकी दौलत नहीं, बल्कि वह जीवन है जो वह दूसरों को देकर जाता है। अंगदान सचमुच मृत्यु के बाद भी जीवन का सबसे सुंदर उत्सव है।

 गेट कीपर्स का दौर खत्म: सेल्फ पब्लिशिंग ने बदल दी है किताबों की दुनिया

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

5 अगस्त 2026

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सन् 1455 में योहानेस गुटेनबर्ग ने जब चल अक्षरों वाली मुद्रण मशीन का आविष्कार किया, तब शायद उन्हें भी अंदाज़ा नहीं रहा होगा कि एक दिन किताबें छापना इतना आसान हो जाएगा कि हर लेखक अपना स्वयं का प्रकाशक बन सकेगा। गुटेनबर्ग की छापाखाने ने ज्ञान को राजमहलों और मठों की दीवारों से निकालकर आम लोगों तक पहुंचाया। अब, लगभग साढ़े पांच सौ वर्ष बाद, सेल्फ पब्लिशिंग उसी क्रांति को एक नए मुकाम पर ले गई है।

आज हालात यह हैं कि जहां देखिए, वहां सेल्फ पब्लिशिंग कंपनियों की भरमार है। सोशल मीडिया, गूगल और यूट्यूब पर हर दिन दर्जनों विज्ञापन दिखाई देते हैं: "अपनी किताब छपवाइए", "बेस्टसेलर लेखक बनिए", "सिर्फ कुछ दिनों में अपनी पुस्तक प्रकाशित कराइए।" ये कंपनियां पांडुलिपि तैयार करने, संपादन, कवर डिजाइन, ISBN, ई-बुक, प्रिंटिंग, अमेज़न लिस्टिंग और प्रचार तक की हर सुविधा एक ही छत के नीचे उपलब्ध करा रही हैं। पैकेज लगभग ₹2,999 से शुरू होकर ₹50,000 या उससे अधिक तक जाते हैं। इतनी किफायती और आसान प्रक्रिया देखकर कोई भी व्यक्ति यह सोच सकता है: "क्यों न मैं भी अपनी किताब प्रकाशित करूं?"

एक समय था जब किताब लिखना ही काफी नहीं था। असली इम्तिहान किसी प्रकाशक को यह विश्वास दिलाना होता था कि आपकी पांडुलिपि छपने लायक है। लेखक वर्षों तक शोध करते, लिखते, बार-बार संशोधन करते और फिर भी अक्सर उनके हिस्से में केवल अस्वीकृति या खामोशी आती थी। न जाने कितनी उत्कृष्ट रचनाएं पाठकों तक पहुंचने से पहले ही प्रकाशकों की मेज पर दम तोड़ देती थीं।

सदियों तक किताब लिखना ही सबसे बड़ी चुनौती नहीं था। असली इम्तिहान था किसी प्रकाशक को यह यकीन दिलाना कि आपकी किताब छपने लायक है। लेखक बरसों तक मेहनत करते, रिसर्च करते, कई-कई बार पांडुलिपि लिखते और सुधारते। फिर भी जवाब में या तो एक शालीन-सा "अफसोस" मिलता, या फिर बिल्कुल खामोशी। न जाने कितनी शानदार किताबें सिर्फ इसलिए पाठकों तक नहीं पहुंच सकीं क्योंकि वे कुछ प्रकाशकों की कारोबारी सोच या निजी पसंद पर खरी नहीं उतरीं।

पारंपरिक प्रकाशन ने साहित्य को बहुत कुछ दिया है। बड़े-बड़े लेखकों को पहचान मिली और अनगिनत कालजयी रचनाएं दुनिया तक पहुंचीं। लेकिन यह भी सच है कि प्रकाशकों ने लंबे समय तक साहित्य के "दरबान" की भूमिका निभाई। वही तय करते थे कि किस लेखक की आवाज़ लोगों तक पहुंचेगी और किसकी नहीं।

सोचिए, अगर किसी जमाने में शेक्सपीयर, कालिदास, प्रेमचंद या एमिली डिकिंसन जैसे रचनाकारों की पांडुलिपियां किसी प्रकाशक की मेज पर ही ठुकरा दी जातीं, तो दुनिया कितना बड़ा साहित्यिक ख़ज़ाना खो देती। शायद ऐसे न जाने कितने प्रतिभाशाली लेखक इतिहास के अंधेरे में गुम हो गए, जिनकी रचनाएं कभी छप ही नहीं सकीं।

लेकिन अब तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है।

डिजिटल तकनीक, सस्ती प्रिंटिंग, प्रिंट-ऑन-डिमांड, ई-बुक्स और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म ने प्रकाशन की दुनिया में एक नई इंकलाबी हवा चला दी है। अब किसी लेखक को अपनी बात दुनिया तक पहुंचाने के लिए किसी प्रकाशक की इजाज़त का इंतजार नहीं करना पड़ता। वह अपनी किताब खुद प्रकाशित कर सकता है, उसकी कीमत तय कर सकता है, डिजाइन चुन सकता है और सीधे पाठकों तक पहुंच सकता है। साहित्य पर कुछ गिने-चुने लोगों का एकाधिकार अब टूट रहा है।

इसके आंकड़े भी इसी बदलाव की गवाही देते हैं। अमेरिका में 2025 के दौरान चार मिलियन से अधिक किताबें प्रकाशित हुईं। इनमें लगभग साढ़े तीन मिलियन किताबें सेल्फ पब्लिशिंग के जरिए आईं। पारंपरिक प्रकाशकों की तुलना में अब स्वतंत्र रूप से प्रकाशित किताबों की संख्या पांच गुना से भी ज्यादा हो चुकी है। पिछले कुछ वर्षों में जहां पारंपरिक प्रकाशन की रफ्तार बेहद धीमी रही, वहीं सेल्फ पब्लिशिंग तेज़ी से आगे बढ़ी है।

पिछले कुछ महीनों में मेरी मुलाकात एक दर्जन से अधिक ऐसे लेखकों से हुई जिन्होंने अपनी किताबें स्वयं प्रकाशित कीं। उन्होंने मुझे अपने हस्ताक्षर वाली प्रतियां बड़े गर्व से भेंट कीं। उनके चेहरे पर आत्मविश्वास साफ झलक रहा था। वे किसी प्रकाशक की मंजूरी के मोहताज नहीं थे। उन्होंने अपनी रचनात्मक तकदीर खुद अपने हाथों में ले ली थी।

आज सेल्फ पब्लिशिंग केवल एक विकल्प नहीं रही, बल्कि हजारों लेखकों की पहली पसंद बनती जा रही है। कुछ वर्ष पहले तक लेखक किताब छपवाने, बाजार तक पहुंचाने और उसके प्रचार के लिए पूरी तरह प्रकाशकों पर निर्भर रहते थे। अब यह तस्वीर बदल चुकी है।

अमेज़न किंडल डायरेक्ट पब्लिशिंग (KDP), Amazon, Kobo और Google Play Books जैसे प्लेटफॉर्म ने पूरी दुनिया को एक खुला बाज़ार बना दिया है। अब आगरा, मैसूर या कोच्चि में बैठा कोई लेखक अपनी किताब अपलोड करता है और कुछ ही मिनटों में न्यूयॉर्क, लंदन या सिडनी का पाठक उसे खरीद सकता है।

प्रिंट-ऑन-डिमांड तकनीक ने प्रकाशन का खर्च भी काफी कम कर दिया है। अब हजारों प्रतियां पहले से छापकर गोदाम भरने की जरूरत नहीं पड़ती। जब कोई पाठक ऑर्डर देता है, तभी उसकी प्रति छपती है। इससे आर्थिक जोखिम लगभग खत्म हो जाता है।

किताबों के प्रचार का तरीका भी पूरी तरह बदल गया है। पहले लेखक अपने प्रकाशक की मेहरबानी पर निर्भर रहते थे। आज सोशल मीडिया हर लेखक का अपना मंच बन चुका है। किसी किताब की अच्छी समीक्षा, एक पॉडकास्ट, यूट्यूब इंटरव्यू, इंस्टाग्राम रील या वायरल पोस्ट रातों-रात हजारों पाठकों तक पहुंच सकती है। आज मुंहज़बानी प्रचार एक क्लिक की रफ्तार से पूरी दुनिया में फैल जाता है।

इस पूरी क्रांति में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ने भी नई जान फूंक दी है। अब AI लेखक की जगह नहीं लेता, बल्कि उसका मददगार बन गया है। शोध, विचारों की रूपरेखा, भाषा सुधार, संपादन, प्रूफरीडिंग, किताब की सज्जा, कवर डिजाइन, चित्र, अनुवाद और प्रचार सामग्री तैयार करने जैसे कई काम AI कुछ ही मिनटों में आसान कर देता है। इससे समय और खर्च दोनों बचते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि नए लेखक अब तकनीकी झंझटों से डरते नहीं हैं और आत्मविश्वास के साथ अपनी किताब प्रकाशित कर पा रहे हैं।

बेशक, AI कल्पनाशक्ति, संवेदनाएं और जीवन के अनुभवों की जगह कभी नहीं ले सकता। एक अच्छी कहानी, गहरी सोच और सच्ची भावनाएं अब भी इंसान ही रच सकता है। लेकिन AI उस सफर को कहीं ज्यादा आसान जरूर बना देता है।

कई दशक पहले, जब फोटोकॉपी मशीनें नई-नई आई थीं, तब ज़ेरॉक्स कंपनी के एक अधिकारी ने कहा था, "एक दिन हर व्यक्ति अपना खुद का प्रकाशक होगा।" उस समय यह बात किसी ख्वाब जैसी लगती थी। आज वह भविष्यवाणी सच साबित हो चुकी है।

फिर भी यह समझना जरूरी है कि सेल्फ पब्लिशिंग कोई जादू की छड़ी नहीं है। अगर किताब कमजोर है तो केवल खुद प्रकाशित कर देने से वह बेहतरीन नहीं बन जाएगी। अच्छी संपादन प्रक्रिया, आकर्षक डिजाइन, सावधानी से की गई प्रूफरीडिंग और लगातार प्रचार आज भी उतने ही जरूरी हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि अब लेखक इन सेवाओं को अपनी पसंद से चुन सकता है। उसे अपनी रचना का पूरा नियंत्रण किसी और के हवाले नहीं करना पड़ता।

सेल्फ पब्लिशिंग की सबसे बड़ी कामयाबी सिर्फ ज्यादा किताबें छापना नहीं है। इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है रचनात्मक आज़ादी। अब क्षेत्रीय भाषाओं के लेखक, छोटे विषयों पर लिखने वाले लोग, भूले-बिसरे इतिहास, नए प्रयोग और अलग सोच रखने वाले रचनाकार भी बिना किसी रुकावट के अपनी बात दुनिया के सामने रख सकते हैं।

इतिहास में पहली बार किसी लेखक की सफलता इस बात पर कम निर्भर है कि कोई प्रकाशक उसे पसंद करता है या नहीं। अब फैसला सीधे पाठक करते हैं। अगर रचना दमदार है तो वह अपनी जगह बना ही लेती है।

छापाखाने ने किताबों को जन्म दिया था। इंटरनेट ने उन्हें हर घर तक पहुंचा दिया। और सेल्फ पब्लिशिंग ने उन्हें सचमुच लोकतांत्रिक बना दिया है। शायद यही इक्कीसवीं सदी की सबसे बड़ी साहित्यिक क्रांति है।

Sunday, August 2, 2026

 दिल्ली-हरियाणा की गंदगी का बोझ, भुगत रहे आगरा और ब्रज मंडल

यमुना कब तक राजधानी और उसके पड़ोसी राज्यों का सीवर बनी रहेगी?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

3 अगस्त 2026

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नदियाँ कभी सरहदें नहीं मानतीं। वे जीवन, संस्कृति और सभ्यता को एक जगह से दूसरी जगह ले जाती हैं। लेकिन जब कोई शहर या राज्य अपनी गंदगी नदी में उड़ेल देता है, तो वह ज़हर भी सीमाएँ नहीं मानता। वह भी बहते-बहते दूर तक पहुँचता है। आज यमुना इसी राष्ट्रीय शर्म की सबसे बड़ी मिसाल बन गई है।

हाल ही में तमिलनाडु ने कर्नाटक पर आरोप लगाया कि बेंगलुरु का सीवर मिला पानी लगातार दक्षिण पिनाकिनी (थेनपेन्नई) नदी में छोड़ा जा रहा है। जल परीक्षण में भारी जैविक प्रदूषण, अमोनिया, फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया और रासायनिक कचरे की पुष्टि हुई। तमिलनाडु ने न केवल सख़्त एतराज़ जताया, बल्कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) से तत्काल दख़ल देने की मांग भी की।

सवाल है, जब दक्षिण भारत की एक नदी के लिए इतना शोर उठ सकता है, तो यमुना के लिए यह ख़ामोशी क्यों?

यमुना दिल्ली पहुँचने से पहले ही हरियाणा में बीमार हो चुकी होती है। हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आँकड़े बताते हैं कि राज्य के 11 बड़े नाले लगातार गंदगी यमुना में उँडेल रहे हैं। इनमें पानीपत-सोनीपत का ड्रेन नंबर-6, फरीदाबाद का बुढ़िया नाला, बल्लभगढ़-पालवल का गौंछी ड्रेन और गुरुग्राम के कई बड़े ड्रेन शामिल हैं।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि हरियाणा से यमुना में पहुँचने वाले प्रदूषण का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा अकेला गुरुग्राम छोड़ता है। पानीपत और सोनीपत में हर दिन लगभग 42 मिलियन लीटर अनुपचारित सीवेज नदी में जा रहा है। फरीदाबाद की अवैध डाइंग इकाइयाँ रासायनिक और रंगीन कचरा खुलेआम बुढ़िया नाले में छोड़ती हैं। बल्लभगढ़ और पलवल से भी बिना शोधन का सीवेज सीधे यमुना में गिरता है।

दिल्ली पहुँचते-पहुँचते हालात और बदतर हो जाते हैं। वज़ीराबाद से ओखला तक केवल 22 किलोमीटर का हिस्सा यमुना के लिए सबसे बड़ा अभिशाप बन चुका है। नजफ़गढ़ नाला समेत कई बड़े नाले रोज़ करोड़ों लीटर सीवेज और औद्योगिक कचरा नदी में गिराते हैं। दिल्ली जल बोर्ड के ताज़ा अनुमान बताते हैं कि इन नालों का प्रवाह पहले के आकलन से कहीं अधिक है। नतीजा यह है कि कई स्थानों पर पानी में घुली ऑक्सीजन शून्य हो जाती है और फीकल कोलीफॉर्म सुरक्षित सीमा से सैकड़ों गुना ऊपर पहुँच जाता है। यहाँ यमुना नदी नहीं, एक बदहाल नाला दिखाई देती है।

सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि दिल्ली और हरियाणा की यह साझा गंदगी नीचे आगरा, मथुरा, वृंदावन और पूरे ब्रज मंडल के हिस्से आती है। ऊपर वालों की लापरवाही, नीचे रहने वालों की सज़ा बन जाती है।

आगरा केवल एक शहर नहीं, ताजमहल का नगर है। यह विश्व धरोहर और भारत की पहचान है। लेकिन ताजमहल के सामने बहने वाली यमुना अब जीवन नहीं, बीमारियाँ लेकर आती है। ज़हरीला पानी भूजल को दूषित कर रहा है। जलीय जीव समाप्त हो रहे हैं। नदी का प्राकृतिक प्रवाह दम तोड़ रहा है। एक मृतप्राय नदी के किनारे दुनिया की सबसे खूबसूरत इमारत भी उदास दिखाई देती है।

इस पूरे संकट में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की भूमिका भी कठघरे में है। उनका काम केवल पानी की जाँच करना नहीं, बल्कि प्रदूषण रोकना भी है। यदि दशकों से यमुना की यही हालत है, तो सवाल उठना लाज़िमी है कि प्रभावी कार्रवाई अब तक क्यों नहीं हुई? क्या रिपोर्टें केवल फाइलों की ज़ीनत बढ़ाने के लिए बनती हैं? क्या कानून सिर्फ़ छोटे लोगों पर लागू होते हैं? बड़े शहरों, उद्योगों और सरकारी एजेंसियों पर नहीं?

हरियाणा सरकार ने 2027 तक बिना शोधन के पानी को पूरी तरह रोकने और नालों के बीओडी स्तर को 10 मिलीग्राम प्रति लीटर से नीचे लाने का लक्ष्य रखा है। नए एसटीपी, सीईटीपी और ड्रेन टैपिंग की योजनाएँ भी बनाई गई हैं। दिल्ली सरकार भी सीवेज शोधन क्षमता बढ़ाने के दावे कर रही है।

लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और ही कहानी कहती है। पानीपत, फरीदाबाद, गुरुग्राम, बल्लभगढ़ और पलवल से प्रदूषण आज भी लगातार यमुना में पहुँच रहा है। अवैध इकाइयाँ फिर से चालू हो जाती हैं और नालों में सीधा डिस्चार्ज रुकने का नाम नहीं लेता।

यमुना किसी एक राज्य की जागीर नहीं है। यह करोड़ों लोगों की जीवनरेखा है। संविधान हर नागरिक को स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार देता है। फिर आगरा और ब्रज के लोगों को प्रदूषित पानी क्यों मिले? ब्रज की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को इस लापरवाही की क़ीमत क्यों चुकानी पड़े?

अब वक़्त आ गया है कि दिल्ली और हरियाणा दोनों सरकारें अपनी साझा ज़िम्मेदारी स्वीकार करें। राजधानी और उसके औद्योगिक शहरों का विकास तभी मायने रखेगा, जब उसकी गंदगी दूसरे राज्यों की तक़दीर न बने। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य बोर्डों को भी अपनी निष्क्रियता छोड़नी होगी। केवल नोटिस जारी करना या नए लक्ष्य घोषित करना काफ़ी नहीं है। दोषी एजेंसियों और उद्योगों पर सख़्त कार्रवाई होनी चाहिए। यह सुनिश्चित किया जाए कि बिना शोधन का एक भी लीटर सीवेज या औद्योगिक कचरा यमुना में न गिरे।

यमुना सिर्फ़ पानी की धारा नहीं, हमारी सभ्यता की धड़कन है। यदि हम इसे बचाने में नाकाम रहे, तो इतिहास यह नहीं पूछेगा कि कितनी योजनाएँ बनीं या कितने वादे किए गए। वह सिर्फ़ इतना लिखेगा कि एक राष्ट्र अपनी सबसे पवित्र नदियों में से एक को दिल्ली, फरीदाबाद, पानीपत, गुरुग्राम, बल्लभगढ़ और पलवल के सीवर में बदलने से नहीं बचा सका। यही हमारी सबसे बड़ी पर्यावरणीय और नैतिक नाकामी होगी।

Saturday, August 1, 2026

 


ताज ट्रेपेज़ियम ज़ोन में उद्योगों को अनुमति देने में जल्दबाज़ी न हो।

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

2 अगस्त 2026

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क्या हम ताजमहल को बचा रहे हैं, या धीरे-धीरे उसे धूल, धुंध और धुएँ में दफ़न कर रहे हैं?

आगरा की हवा साल के अधिकांश दिनों में ज़हरीली बनी रहती है। हर दिन उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम जाने वाले हज़ारों ट्रक, डंपर, बसें और भारी वाहन इस शहर की साँसों पर नया बोझ डालते हैं। यमुना और उसकी सहायक नदियाँ सूख रही हैं, तालाब और झीलें ग़ायब हो चुके हैं, पेड़ों की हरियाली सिमटती जा रही है और सड़कों पर बेकाबू ट्रैफिक दम घोंट रहा है। ऐसे नाज़ुक हालात में ताज ट्रेपेज़ियम ज़ोन में नए उद्योगों को अनुमति देने से पहले उसके हर फ़ायदे और हर संभावित नुक़सान का बेहद गहराई और वैज्ञानिक नज़रिए से आकलन करना ज़रूरी है। कहीं ऐसा न हो कि आज का छोटा-सा फ़ैसला आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बड़ी पर्यावरणीय त्रासदी बन जाए।

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ताज महल के आसपास के संरक्षित क्षेत्र TTZ (लगभग 10,400 वर्ग किमी, जिसमें आगरा और आसपास के जिले शामिल हैं) में 1990 के दशक की शुरुआत से वाहनों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। 1990 के आसपास या 1990 के दशक के मध्य-अंत में आगरा क्षेत्र में लगभग 1.9–2.1 लाख वाहन थे। 2026 के मध्य तक आगरा जिले में निजी वाहनों की संख्या लगभग 8.5 लाख पहुँच गई है (एक आधिकारिक रिपोर्ट में आगरा आरटीओ का कुल आँकड़ा करीब 16.9 लाख बताया गया है)। यह लगभग 35 वर्षों में 4 से 8 गुना या उससे भी अधिक की वृद्धि है।

स्थानीय वाहनों की यह वृद्धि पारगमन यातायात से और बढ़ जाती है। आगरा यमुना एक्सप्रेसवे (रोज़ाना 50,000 से अधिक वाहन) और आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे (2020 से 2025 के बीच दैनिक यातायात लगभग दोगुना) जैसे प्रमुख मार्गों पर स्थित है। राष्ट्रीय राजमार्गों और एक्सप्रेसवे कनेक्शनों से भी हज़ारों ट्रक, पर्यटक बसें और कारें गुज़रती रहती हैं। स्थानीय वाहनों और बढ़ते पारगमन/पर्यटक यातायात से ज़ोन के अंदर वाहन-किलोमीटर लगातार बढ़ रहे हैं। वाहनों की इतनी बड़ी वृद्धि ने कई उपलब्धियों को बेअसर कर दिया है, जिससे प्रदूषण स्तर सुरक्षित सीमा तक  नहीं आ पा रहा। अध्ययन और आधिकारिक आकलन बार-बार वाहनों (स्थानीय + पारगमन) को ताजमहल और पूरे TTZ के लिए हवा की गुणवत्ता की समस्या का प्रमुख कारण बताते हैं। “वाहन विस्फोट” अभी भी प्रदूषण की चुनौती को बनाए रखे हुए है।

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में 2024 में लगाए गए पूर्ण प्रतिबंध में कुछ राहत देते हुए ताज ट्रेपेज़ियम ज़ोन (TTZ) में लगभग 400 लंबित गैर-प्रदूषणकारी सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों (एमएसएमई) के आवेदनों पर विचार करने की इजाज़त दी है। लेकिन इसे उद्योगों के लिए खुला निमंत्रण नहीं समझना चाहिए। अदालत ने रोज़गार और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है। हर आवेदन को नीरी (NEERI) और केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (CEC) के विशेषज्ञों की सर्वसम्मति से मंज़ूरी लेनी होगी। किसी विवाद की स्थिति में अंतिम फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट करेगा। इसके बावजूद भविष्य में किसी भी तरह की और ढील बेहद एहतियात के साथ ही दी जानी चाहिए। इस पूरे क्षेत्र की हवा अब भी चिंताजनक है और पर्यावरण पर मंडरा रहे खतरे अभी टले नहीं हैं।

साल 1996 में सुप्रीम कोर्ट ने कोयला और कोक से चलने वाले सैकड़ों उद्योगों, खासकर फाउंड्रियों, को प्राकृतिक गैस अपनाने या बंद करने का आदेश दिया था। उस समय सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) का स्तर 17 से 22 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था और हवा में धूल-कण (SPM) 400 से 750 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुँच जाते थे। यही प्रदूषण ताजमहल के संगमरमर को पीला कर रहा था और अम्लीय वर्षा का कारण बन रहा था।

अदालत के उस फैसले से बड़ा फ़ायदा हुआ। सल्फर डाइऑक्साइड का स्तर घटकर 4 से 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रह गया। नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO₂) में भी कमी आई। इससे ताजमहल को सबसे ज़्यादा नुकसान पहुँचाने वाली जहरीली गैसों से काफी हद तक राहत मिली।

लेकिन पूरी तस्वीर अभी भी तसल्लीबख्श नहीं है। हवा में मौजूद बारीक धूल-कण अब भी बेहद ज़्यादा हैं। पीएम-10 (PM₁₀) का स्तर कई स्थानों पर 120 से 180 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर या उससे भी अधिक दर्ज किया जाता है, जबकि संवेदनशील क्षेत्रों के लिए तय सीमा केवल 60 है। पीएम-2.5 (PM₂.₅) का वार्षिक औसत भी अक्सर 80 से 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर या उससे अधिक रहता है। सर्दियों में यह और खतरनाक हो जाता है। मानसून में वायु गुणवत्ता कभी-कभी सामान्य रहती है, लेकिन सर्दियों में अक्सर "खराब", "बहुत खराब" या "गंभीर" श्रेणी में पहुँच जाती है। यही बारीक धूल ताजमहल पर जमती है और लोगों की सेहत पर भी बुरा असर डालती है। पिछले तीस वर्षों में सुधार तो हुआ है, लेकिन मंज़िल अभी दूर है।

इस लगातार बने हुए प्रदूषण का कारण केवल उद्योग नहीं हैं। इसके पीछे कई गहरे पर्यावरणीय संकट भी हैं। यमुना नदी लगभग सूख चुकी है और उसका पानी बुरी तरह प्रदूषित है। नदी अब वह नमी और ठंडक नहीं दे पाती, जो कभी ताजमहल के आसपास का प्राकृतिक वातावरण बनाए रखती थी। आसपास की ज़मीन तेज़ी से बंजर होती जा रही है। मिट्टी का कटाव बढ़ रहा है और हरियाली लगातार घट रही है। ज़िले के कुछ हिस्सों में हरित क्षेत्र केवल लगभग 7 प्रतिशत रह गया है। पेड़-पौधे कम होने से धूल को रोकने की प्राकृतिक क्षमता घट गई है। सड़कों की धूल, निर्माण कार्य, छोटे उद्योग, वाहनों का धुआँ और दूसरे राज्यों में पराली व बायोमास जलाने का धुआँ भी इस संकट को और बढ़ा रहा है।

ऐसी हालत में पूरे टीटीज़ेड को उद्योगों के लिए और खोलना, चाहे वे "गैर-प्रदूषणकारी" ही क्यों न हों, ख़तरे से खाली नहीं है। अभी तक इस क्षेत्र की पर्यावरणीय वहन क्षमता (Carrying Capacity) का पूरा अध्ययन भी नहीं हुआ है और लंबे समय से लंबित विज़न डॉक्यूमेंट भी तैयार नहीं हो पाया है। एक बार उद्योग लग जाने के बाद ईंधन और उत्सर्जन के नियमों का सख़्ती से पालन कराना हमेशा आसान नहीं रहा है। नए उद्योगों से यातायात, निर्माण और ऊर्जा की माँग बढ़ेगी, जिससे अब तक मिले पर्यावरणीय लाभ कमज़ोर पड़ सकते हैं।

इसलिए आगे बढ़ने का रास्ता बेहद सोच-समझकर तय करना होगा। केवल उन्हीं व्हाइट और ग्रीन श्रेणी के एमएसएमई को अनुमति मिले, जो बिजली या प्राकृतिक गैस का उपयोग करें और जिनकी हर आवेदन पर विशेषज्ञों द्वारा अलग-अलग गहराई से जाँच हो। पूरी प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए।

इसके साथ-साथ यमुना में पर्याप्त स्वच्छ जल प्रवाह बहाल करना, बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण करना, मिट्टी संरक्षण के उपाय अपनाना, सड़कों की धूल और वाहनों से होने वाले प्रदूषण पर सख़्त नियंत्रण रखना तथा वायु गुणवत्ता की लगातार निगरानी कर उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक करना भी उतना ही ज़रूरी है। जब तक हवा में धूल-कणों का स्तर लगातार और स्पष्ट रूप से कम न हो जाए तथा क्षेत्र की पर्यावरणीय क्षमता मज़बूत न हो जाए, तब तक उद्योगों के लिए और छूट देने पर विचार नहीं किया जाना चाहिए।

ताजमहल केवल एक इमारत नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के पर्यावरण की सेहत का आईना है। 1996 में सुप्रीम कोर्ट ने साबित किया था कि सख़्त नियमों से प्रदूषण पर काबू पाया जा सकता है।