हर पाँचवाँ भारतीय होगा बुजुर्ग: क्या भारत तैयार है इस नई चुनौती के लिए?
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बृज खंडेलवाल द्वारा
26 जुलाई 2026
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एक सुबह घर में अजीब-सी ख़ामोशी उतर आती है। बच्चे अपने-अपने शहरों में खो चुके हैं। फ़ोन की घंटी अब कम ही बजती है। घुटनों का दर्द बढ़ता है, यादें धुंधली पड़ने लगती हैं और तन्हाई बिना दस्तक दिए घर की स्थायी मेहमान बन जाती है। यह सिर्फ़ कुछ बुज़ुर्गों की कहानी नहीं, बल्कि उस भारत की तस्वीर है, जहाँ हर पाँचवाँ नागरिक जल्द ही बुज़ुर्ग होगा।
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भारत अब एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां उसकी सबसे बड़ी ताकत ही उसकी सबसे बड़ी चुनौती बनने जा रही है। दुनिया लंबे समय तक भारत को "यंग इंडिया" के नाम से जानती रही, लेकिन आने वाले वर्षों में तस्वीर बदलने वाली है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) की 2023 की रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2050 तक देश में 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की संख्या बढ़कर लगभग 34.7 करोड़ हो जाएगी। यानी हर पांचवां भारतीय वरिष्ठ नागरिक होगा। आज यह संख्या लगभग 15 करोड़ है। यह केवल जनसंख्या का बदलाव नहीं, बल्कि समाज, अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाओं और पारिवारिक व्यवस्था में आने वाले बड़े परिवर्तन का संकेत है।
लोग पहले से अधिक लंबा जीवन जी रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या वे स्वस्थ, सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन भी जी पाएंगे?
यही वह चुनौती है, जिसके समाधान की दिशा में हेल्पएज इंडिया ने नई दिल्ली में इंस्टीट्यूट फॉर लॉन्गेविटी एंड एजिंग रिसर्च (ILAR) की स्थापना की है। 22 जुलाई 2026 को इसका उद्घाटन नीति आयोग के पूर्व सदस्य (स्वास्थ्य) डॉ. विनोद कुमार पॉल ने किया। उन्होंने कहा कि भारत को वृद्धावस्था के लिए अपना ऐसा मॉडल विकसित करना होगा, जिसमें भारतीय पारिवारिक मूल्यों, सामुदायिक सहयोग और आधुनिक विज्ञान का संतुलित समावेश हो।
भारत में औसत आयु लगातार बढ़ रही है, लेकिन स्वस्थ जीवन की अवधि अब भी सीमित है। बड़ी संख्या में बुजुर्ग मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, गठिया और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे हैं। दूसरी ओर, संयुक्त परिवारों का टूटना, युवाओं का रोज़गार के लिए बड़े शहरों की ओर पलायन और बढ़ता अकेलापन बुजुर्गों के जीवन को और कठिन बना रहा है। महिलाओं की स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण है। विधवा होने की अधिक संभावना और आर्थिक निर्भरता उन्हें अतिरिक्त असुरक्षा की ओर धकेल देती है।
हालांकि इस बदलती तस्वीर का एक सकारात्मक पक्ष भी है। तेजी से बढ़ती वरिष्ठ नागरिक आबादी "सिल्वर इकोनॉमी" के रूप में एक नया अवसर लेकर आ रही है। स्वास्थ्य सेवाएं, दवाइयां, सहायक तकनीक, वरिष्ठ नागरिकों के लिए अनुकूल आवास, बीमा और वित्तीय सेवाओं जैसे क्षेत्रों में बड़ी संभावनाएं उभर रही हैं। लेकिन इन अवसरों का लाभ तभी मिलेगा, जब देश समय रहते अपनी नीतियों और व्यवस्थाओं को तैयार करेगा।
इसी सोच के साथ ILAR को केवल एक शोध संस्थान नहीं, बल्कि नीति निर्माण, अनुसंधान, नवाचार और व्यावहारिक समाधान का राष्ट्रीय मंच बनाया गया है। संस्थान के निदेशक प्रो. अनिल कुमार इंदिरा कृष्णन का कहना है कि लंबी उम्र का अर्थ केवल जीवन के वर्षों में वृद्धि नहीं, बल्कि उन वर्षों में स्वास्थ्य, सम्मान और खुशहाली जोड़ना है। उनका मानना है कि भविष्य की नीतियां तभी प्रभावी होंगी, जब उनके केंद्र में स्वयं बुजुर्गों के अनुभव और उनकी जरूरतें हों।
संस्थान स्वस्थ वृद्धावस्था, सिल्वर इकोनॉमी, वरिष्ठ नागरिकों के अधिकार, उम्र-अनुकूल तकनीक और वृद्धावस्था से जुड़ी सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों पर व्यापक शोध करेगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, टेलीमेडिसिन और स्मार्ट उपकरणों के बेहतर उपयोग से लेकर अकेलेपन, देखभाल और सामुदायिक सहयोग जैसे विषय भी इसकी प्राथमिकताओं में शामिल होंगे। हर वर्ष "स्टेट ऑफ एजिंग इन इंडिया" रिपोर्ट प्रकाशित करने, सिल्वर टेक इनोवेशन लैब स्थापित करने, स्वास्थ्य वेधशाला विकसित करने और युवा शोधकर्ताओं के लिए फेलोशिप कार्यक्रम शुरू करने की भी योजना है।
हेल्पएज इंडिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी रोहित प्रसाद का मानना है कि आने वाले दो दशकों में वृद्धावस्था देश के सामने सबसे बड़ी सामाजिक चुनौतियों में होगी। उनका कहना है कि केवल सरकार के प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे। विश्वविद्यालयों, उद्योग जगत, कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) संस्थाओं और नागरिक समाज को मिलकर काम करना होगा। साक्ष्य-आधारित नीतियों और पर्याप्त निवेश के बिना भविष्य की इस चुनौती का सामना करना कठिन होगा।
हेल्पएज इंडिया स्वयं इस क्षेत्र में कोई नया नाम नहीं है। वर्ष 1978 से संस्था वरिष्ठ नागरिकों के स्वास्थ्य, आजीविका, अधिकारों की रक्षा और आपदा राहत के क्षेत्र में लगातार काम कर रही है। पिछले लगभग पांच दशकों में उसे संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या पुरस्कार और भारत सरकार के वयोश्रेष्ठ सम्मान सहित कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं। ILAR उसी लंबे अनुभव और विशेषज्ञता का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव है।
अब समय आ गया है कि भारत वृद्धावस्था को केवल सामाजिक बोझ के रूप में देखने की मानसिकता बदले। वरिष्ठ नागरिक अनुभव, ज्ञान और सामाजिक पूंजी का महत्वपूर्ण स्रोत हैं। उनके लिए उम्र-अनुकूल शहर, बेहतर सार्वजनिक परिवहन, सामुदायिक देखभाल केंद्र, मजबूत पेंशन व्यवस्था, व्यापक बीमा कवरेज, डिजिटल साक्षरता और ऐसी पीढ़ीगत पहलें विकसित करनी होंगी, जिनसे युवा और बुजुर्ग एक-दूसरे के अनुभवों से सीख सकें।
वर्ष 2050 का भारत आज लिए गए फैसलों पर निर्भर करेगा। यदि अभी दूरदर्शी नीतियां बनाई गईं और पर्याप्त निवेश किया गया, तो देश केवल अधिक आयु वाला समाज नहीं बनेगा, बल्कि ऐसा समाज बनेगा जहां बुजुर्ग स्वस्थ, सक्रिय, आत्मनिर्भर और सम्मानजनक जीवन जी सकेंगे। किसी भी सभ्य समाज की असली पहचान इस बात से होती है कि वह अपने वरिष्ठ नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है। ILAR ने इस दिशा में एक महत्वपूर्ण शुरुआत कर दी है। अब जरूरत है कि सरकार, निजी क्षेत्र और समाज मिलकर इसे राष्ट्रीय जनआंदोलन का रूप दें, ताकि बढ़ती उम्र भारत के लिए चुनौती नहीं, बल्कि नई ताकत बन सके।