Monday, April 20, 2026

 स्वच्छता मिशन की कामयाबी पर सवाल?

कब सीखेंगे "सफाई सबकी ज़िम्मेदारी है"

आगरा के हालात बदले हैं, पर मंजिल अभी दूर है

_____________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा 

21 अप्रैल, 2026

___________________________

कभी आगरा में कदम रखते ही नाक सिकुड़ जाती थी। हवा में बदबू का एक ऐसा साया था, जो हर गली, हर मोड़ पर पीछा करता था। नालियां जैसे सड़ांध की दास्तान सुनाती थीं।

बड़े नाले, मंटोला, भैरों, नदी में खुलते हैं  और यमुना, जो कभी शाही अक्स का आईना थी, को एक बीमार, सुस्त दरिया में तब्दील कर दिया हैं।।

कुछ वर्षों पहले तक, कूड़े के पहाड़ शहर की तक़दीर पर तंज कसते खड़े रहते थे। लगता था, ये गंदगी कभी नहीं हटेगी। शहर जैसे अपने ही बोझ तले दबा हुआ था।

आज वही आगरा कुछ और दिखता है। हवा में एक अजीब सी साफ़गोई है। सड़कें झाड़ू की लय में पहले की अपेक्षा साफ दिखती हैं। और कुबेरपुर का कूड़ा घर, जो कभी शहर की शर्म था, अब सुधरा दिखता है, कूड़े से खाद बनने लगी है। यमुना किनारा रोड पर भैंसों के विचरण पर प्रभावी रोक ने मदद की है। आगरा नगर निगम ने इस क्षेत्र में अच्छा कार्य किया है। लेकिन यह बदलाव यूं ही नहीं आया। यह एक लंबे संघर्ष की कहानी है, जिसे स्वच्छ भारत मिशन ने आकार दिया।

आगरा कोई मामूली शहर नहीं। यह दुनिया का एक अब्बल टूरिस्ट डेस्टिनेशन है, जहां हर साल लाखों सैलानी आते हैं। करीब 44 लाख की आबादी वाला यह शहर दोहरी ज़िम्मेदारी उठाता है। एक तरफ अपने बाशिंदों के लिए साफ़ रहना, दूसरी तरफ दुनिया के सामने अपनी सूरत पेश करना।

साल 2014 से 2019 तक की शुरुआत इज़्ज़त से जुड़ी थी। घर-घर शौचालय बने। मोहल्लों में सामुदायिक टॉयलेट खड़े हुए। खुले में शौच की मजबूरी धीरे-धीरे कम हुई। 2019 तक आगरा ने खुद को खुले में शौच से मुक्त घोषित कर दिया। यह एक बड़ी कामयाबी थी, मगर मंज़िल नहीं। एक वक्त था जब यमुना आरती स्थल के सामने ही लोग खुले में बेशर्मी से निपटते थे, अब सफाई कर्मी अलर्ट रहते हैं।

आगरा शहर की असल जंग तो कूड़े के साथ थी। कुबेरपुर इसका सबसे बड़ा ज़ख्म था। करीब 19 लाख मीट्रिक टन कूड़ा वहां सालों से सड़ रहा था। बायोमाइनिंग और बायोरेमेडिएशन के जरिए उस ज़मीन को वापस हासिल किया गया। आज वहीं दस एकड़ में मियावाकी जंगल लहलहा रहा है। पास ही  प्रोसेसिंग प्लांट लगे हैं। यानी जो कचरा कभी मुसीबत था, वही अब उपयोगी उत्पाद बन रहा है।

शहर का ढांचा भी बदला। हर वार्ड में डोर-टू-डोर कलेक्शन शुरू हुआ। बड़े-बड़े मटेरियल रिकवरी सेंटर रोज़ सैकड़ों टन कचरा छांटते हैं। सीवर और ट्रीटमेंट प्लांट के लिए “वन सिटी, वन ऑपरेटर” मॉडल लागू हुआ। सिस्टम में एक तरह की रवानी आई।

आंकड़े भी गवाही देते हैं। 2024-25 के स्वच्छ सर्वेक्षण में आगरा ने 12,500 में से 11,532 अंक हासिल किए। शहर को 5-स्टार गार्बेज फ्री का दर्जा मिला।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।

चमकती सड़कों से हटकर जब आप पुराने शहर की तंग गलियों में जाते हैं, तो तस्वीर  धुंधली हो जाती है। कागज़ों में भले 100% कचरा अलग-अलग करने का दावा हो, हकीकत में गीला-सूखा कचरा अक्सर एक साथ ही फेंका जाता है। प्रोसेसिंग प्लांट हैं, मगर उनकी पूरी क्षमता का इस्तेमाल हमेशा नहीं हो पाता।

और यमुना अब भी चुपचाप सब देख रही है। गंदा पानी आज भी उसमें गिरता है। किनारे साफ़ हैं, मगर दरिया अब भी बीमार है। यह एक अधूरी कहानी का सबसे दर्दनाक हिस्सा है।

सार्वजनिक शौचालय बने जरूर, मगर कई जगह उनकी हालत ठीक नहीं। झुग्गी बस्तियों में सफाई का इंतज़ाम डगमगाता रहता है। सफाई कर्मचारी, जो इस पूरी व्यवस्था की रीढ़ हैं, उन्हें अक्सर सुरक्षा के पूरे साधन नहीं मिलते। तनख्वाह में देरी भी एक आम शिकायत है।

सबसे बड़ा मसला शायद सिस्टम नहीं, लोगों का रवैया है। सफाई को आज भी ज़्यादातर लोग सरकारी काम समझते हैं, अपना नहीं। घर के अंदर चमक-दमक, मगर कचरा चुपचाप बाहर सड़क पर सरका देना; यह दोहरी सोच अब भी ज़िंदा है। मोहल्लों में बैठकर शिकायतें तो खूब होती हैं, मगर जब हाथ बंटाने की बात आए, तो खामोशी छा जाती है। जागरूकता की बातें सुनने में अच्छी लगती हैं, मगर अमल के वक्त लोग किनारा कर लेते हैं। यह बेपरवाही, यह उदासीनता, पूरी मेहनत पर पानी फेर देती है।

यह तस्वीर सिर्फ आगरा की नहीं, पूरे मुल्क की झलक है। 2014 के बाद देश में कचरा प्रोसेसिंग 16% से बढ़कर 80% से ऊपर पहुंची। यह छोटी बात नहीं।

मगर दूसरी पारी, 2021 से 2026, थोड़ी मुश्किल दिख रही है। पूरे देश में कचरे का सही बंटवारा अभी भी 60% से नीचे है। और आने वाले साल में बजट में कटौती की बात एक नया सवाल खड़ा करती है। क्या यह मिशन अपनी रफ्तार बनाए रख पाएगा?

शुरुआत में गांधी जी के चश्मे वाला प्रतीक लोगों को जोड़ता था। एक जज़्बा था। मगर अब खतरा यह है कि अगर सिर्फ ढांचा बने और आदतें न बदलें, तो लोग इस मुहिम से दूर हो सकते हैं।

आगे का रास्ता साफ़ है, मगर आसान नहीं। अब जरूरत बड़े अभियानों की नहीं, रोज़ की आदतों की है।

हर वार्ड में कचरे का निपटान हो, तो लैंडफिल पर दबाव कम होगा। सफाई कर्मचारियों को इज़्ज़त, सुरक्षा और वक्त पर मेहनताना मिले, तो व्यवस्था मजबूत होगी। फंडिंग ऐसे हो, जिसमें नतीजों को अहमियत मिले, सिर्फ गिनती को नहीं।

सबसे अहम बात, सफाई सरकार का काम नहीं, लोगों की आदत बने।

आगरा ने साबित किया है कि बदलाव मुमकिन है।  मगर असली इम्तिहान अब है।

2014 का आगरा और आज का आगरा।  फर्क तो दिखता है। मगर आज का आगरा और एक पूरी तरह से स्वस्थ, टिकाऊ शहर; इस फासले को पाटना अभी बाकी है।

शहर एक दिन में साफ़ नहीं होता। यह रोज़ के छोटे-छोटे अमल से चमकता है। अगर ये सिलसिला टूटा, तो बदबू फिर लौट आएगी।

और इस बार, जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की नहीं होगी। यह हर उस हाथ की होगी, जिसने कचरा फेंका और मुंह फेर लिया।


Sunday, April 19, 2026

 क्या भारत में चुनाव जीतने का असली पासपोर्ट आज भी जाति का प्रमाणपत्र है?

क्यों जाति गणना ?

_____________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा 

20, अप्रैल 2026

______________________________

क्या सचमुच भारत में चुनाव जीतने के लिए जाति का प्रमाण पत्र ही असली पासपोर्ट है। सवाल चुभता है, पर जवाब बहुतों को मालूम है। सच यह है कि हाँ, आज भी काफी हद तक यही हकीकत है। लोकतंत्र का मैदान खुला है, पर खेल के नियम अब भी पुरानी पहचानें तय करती हैं।

हमारे संविधान ने उम्मीद का दरवाजा खोला था। मंशा साफ थी। सदियों के अन्याय को तोड़ना था, बराबरी की राह बनानी थी। आरक्षण को एक अस्थायी सहारे की तरह सोचा गया था। जैसे टूटी टांग पर प्लास्टर। ठीक होते ही हट जाना चाहिए। संविधान सभा की बहसों में यह भावना बार बार झलकी। अनुच्छेद 15(4) और 16(4) ने पिछड़ों को आगे लाने का रास्ता दिया। पर समय सीमा तय नहीं हुई। शायद भरोसा था कि समाज खुद बदल जाएगा। सर्वोच्च न्यायालय ने भी कई बार संकेत दिया कि यह व्यवस्था हमेशा के लिए नहीं हो सकती। पर राजनीति ने इस भरोसे को धीरे धीरे अपनी जरूरत के हिसाब से ढाल लिया।

राजनीति की भाषा आदर्शों से नहीं, अंकों से चलती है। यहाँ दर्द भी गिना जाता है, उम्मीद भी तौली जाती है। जो एक पुल होना था, वह मोर्चा बन गया। जो एक उपचार था, वह पहचान बन गया। पढ़ा लिखा शहरी मतदाता भी इस जाल से बाहर नहीं निकल पाया। फर्क बस इतना है कि अब जाति की गणित और ज्यादा परिष्कृत हो गई है। डेटा शीट में दर्ज है। एक्सेल फाइल में सजी है। भावनाएं भी अब कैलकुलेट होती हैं।

शुरुआत में सोच कुछ और थी। सुधारकों ने इसे एक तेज सर्जरी की तरह देखा। एक ऐसा वार जो बराबरी का रास्ता साफ कर दे। लक्ष्य था कि जाति धीरे धीरे अप्रासंगिक हो जाए। पर जमीन पर आते ही कहानी बदल गई। राजनीति ने इस औजार को हथियार बना दिया। वोट बैंक की फैक्ट्री चल पड़ी। पहचानें संगठित हुईं। गुस्सा दिशा पा गया।

राम मनोहर लोहिया ने पिछड़ों की राजनीति को विचार दिया। उनका नारा पिछड़ा पावे सौ में साठ केवल शब्द नहीं था। यह सामाजिक संतुलन का खाका था। पर जैसे ही यह जमीन पर उतरा, वोट की भाषा में बदल गया। आदर्श पीछे छूट गए। गणित आगे आ गया।

फिर आया वह मोड़ जिसने देश की राजनीति की धुरी ही बदल दी। वी.पी. सिंह की सरकार ने 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू कीं। अन्य पिछड़ा वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण मिला। देश सड़कों पर उतर आया। विरोध हुआ। आत्मदाह तक हुए। सरकार गिरी। पर एक नया राजनीतिक युग जन्म ले चुका था। उत्तर भारत की राजनीति ने नई करवट ली। क्षेत्रीय दल उभरे। जाति अब सिर्फ पहचान नहीं रही, सत्ता की सीढ़ी बन गई।

इसी सीढ़ी पर चढ़कर मायावती ने 2007 में उत्तर प्रदेश में इतिहास रचा। दलित, ब्राह्मण, मुस्लिम, कई धाराएं एक साथ आईं। 206 सीटों का बहुमत मिला। संदेश साफ था। जाति को जोड़कर भी सत्ता पाई जा सकती है। यह राजनीति का नया व्याकरण था।

दक्षिण भारत में कहानी का रंग अलग दिखता है, पर धागा वही है। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने गैर ब्राह्मण राजनीति को संस्थागत रूप दिया। तमिलनाडु में 69 प्रतिशत आरक्षण दशकों पुराने सामाजिक समझौते की तरह है। सत्ता का चक्र वहीं घूमता है। कर्नाटक में लिंगायत और वोक्कालिगा समीकरण ने दशकों तक राजनीति की चाबी थामे रखी। एच.डी. देवेगौड़ा का उदय इसी गणित का नतीजा था।

आज चुनाव विचारों से कम, आंकड़ों से ज्यादा तय होते हैं। हर पार्टी के पास जाति का पूरा नक्शा है। किस सीट पर कौन भारी है, किसे टिकट देना है, किसे क्या वादा करना है। उत्तर प्रदेश इसका सबसे खुला उदाहरण है। यादव बहुल इलाके, दलित बहुल क्षेत्र, हर जगह अलग रणनीति। विचारधारा अक्सर परदे के पीछे चली जाती है। मंच पर जाति खड़ी रहती है।

कम्युनिस्टों ने वर्ग संघर्ष का सपना देखा था। लगा था कि आर्थिक बराबरी आएगी तो जाति खुद मिट जाएगी। पर बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में उनके आंदोलन भी जातियों में बंट गए। केरल और पश्चिम बंगाल में कुछ सफलता मिली, पर जाति की छाया पूरी तरह कभी नहीं हटी। भारतीय समाज में जाति रोजमर्रा का सच है। शादी से लेकर जमीन तक, रिश्तों से लेकर अवसर तक, हर जगह इसकी मौजूदगी है। वर्ग की लड़ाई, ठोस लाभ के सामने कमजोर पड़ गई।

आज की तस्वीर साफ है। शिक्षा बढ़ी है। शहर फैले हैं। नौकरियों का स्वरूप बदला है। पर जाति अब भी जिंदा है। क्योंकि यह सीधे लाभ से जुड़ी है। डिग्री के साथ साथ जाति का प्रमाण पत्र अब भी जरूरी है। राजनीति के लिए यह सोने की खान है। हर चुनाव से पहले नई मांगें उठती हैं। नए वादे किए जाते हैं। नया ध्रुवीकरण होता है।

कहानी यहीं नहीं रुकती। एक ही जाति के भीतर भी असमानता है। कुछ उप समूह सारे लाभ ले जाते हैं। बाकी पीछे छूट जाते हैं। यह एक चक्र है जो खुद को पोषित करता है। जाति वोट देती है। वोट सत्ता देता है। सत्ता जाति को बनाए रखती है।

अब सवाल यह नहीं कि आरक्षण सही है या गलत। सवाल यह है कि क्या यह साधन रहा या लक्ष्य बन बैठा। क्या हम मंजिल तक पहुंचे या रास्ते में ही डेरा डाल दिया।

जाति की गणना की मांग इसी उलझन से निकली है। 2023 में बिहार के सर्वेक्षण ने तस्वीर का एक हिस्सा दिखाया। पिछड़े और अति पिछड़े मिलाकर करीब 63 प्रतिशत निकले। अब केंद्र भी अगली जनगणना में जाति आंकड़े शामिल करने की तैयारी में है। यह डेटा नीति बनाने में मदद कर सकता है। पर खतरा भी उतना ही बड़ा है। अगर इसे केवल नए आरक्षण की मांग और नए विभाजन के लिए इस्तेमाल किया गया, तो दरार और गहरी होगी।

भारतीय लोकतंत्र आज भी एक नई भाषा की तलाश में है। एक ऐसा भरोसा जो जाति से ऊपर उठ सके। जब तक वह भाषा नहीं मिलती, मतपत्र पर जाति की स्याही सबसे गहरी रहेगी। यह स्याही आसानी से नहीं धुलेगी। पर इसे धोए बिना तस्वीर साफ भी नहीं होगी।

सवाल फिर वही खड़ा है। पासपोर्ट बदलना है या सिर्फ कवर। जवाब हमें ही लिखना है।

Saturday, April 18, 2026

 हेरिटेज डे हर साल 18 अप्रैल को मनाया जाता है। इसे International Day for Monuments and Sites भी कहते हैं। इसका उद्देश्य दुनिया भर की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और प्राकृतिक धरोहरों ;  स्मारकों, पुरातत्व स्थलों और साइटों ,  के संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाना है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हमारी विरासत कितनी मूल्यवान है, लेकिन कितनी नाजुक और कमजोर भी। खासकर 2026 में, जब थीम living heritage और आपातकालीन संरक्षण पर केंद्रित है, तो यह और भी प्रासंगिक हो जाता है।

______________________

हेरिटेज डे: संगमरमर से आगे, आगरा की रूह पुकारती है

_____________________

बृज खंडेलवाल द्वारा 

18 अप्रैल 2026

______________________

आगरा की दास्तान संगमरमर से शुरू नहीं होती। और न ही वहीं खत्म होती है।  

यह कहानी तंग गलियों में सांस लेती है, मंदिरों की घंटियों में गूंजती है, हुनरमंदों की उंगलियों में चमकती है और बाजारों की भीड़ में जीवंत हो उठती है। हेरिटेज डे पर वक्त आ गया है कि इस शहर से पर्दा उठाया जाए। आगरा कोई एक स्मारक का शहर नहीं है, बल्कि सदियों की तहज़ीब का जीवंत संगम है।  

दुनिया इसे अक्सर एक ही तस्वीर में कैद कर लेती है ; सफेद संगमरमर की वह अनुपम इमारत, ताज महल, मोहब्बत की निशानी और भारत की पहचान। कोई मुसाफिर पूछे तो जवाब फौरन आता है: “ताज महल।” दिल्ली से सैलानी आते हैं, सेल्फी लेते हैं और लौट जाते हैं। इस तरह सदियों का शहर एक लम्हे में सिमट जाता है। एक ठहराव बन जाता है, कोई पूरी कहानी नहीं।  

यह तंग नज़र एक गहरी सच्चाई को छुपाती है। आगरा सिर्फ मुगल राजधानी नहीं था। यह एक सांस्कृतिक संगम था; जहाँ फ़ारसी नज़ाकत हिंदुस्तानी रूह से मिली, इबादत हुनर से टकराई और ताकत शायरी बन गई। जो बना, वह सिर्फ इमारतें नहीं थीं ; एक पूरी तहज़ीब थी, जो आज भी जीवित है, लेकिन अक्सर अनसुनी रह जाती है।


ताजगंज की तंग गलियों में जाइए। ज़रा कान लगाकर सुनिए ,  पत्थर पर चलती छैनी की धीमी, लयबद्ध आवाज़ आएगी। यह है पच्चीकारी (पार्चिन कारी या pietra dura)  पत्थरों में सांस भरने का जादुई हुनर। शाहजहाँ के ज़माने में जन्मा यह फन सब्र और सटीकता की इबादत है। लैपिस लाजुली, कार्नेलियन, मलाकाइट, जेड और अन्य बारीक पत्थरों को तराशा जाता है, जड़ा जाता है और इतनी महीन चमक दी जाती है कि वे फूलों और लताओं की तरह जीवंत लगने लगते हैं।  

यह फैक्ट्री का काम नहीं। यह खानदानी विरासत है। बाप-बेटे, मां-बेटी, पीढ़ी दर पीढ़ी यह हुनर संभाला जाता है। कारखाने मदरसों में बदल जाते हैं, जहां वक़्त ठहर सा जाता है। लेकिन चुनौतियां कम नहीं। नई पीढ़ी तेज़ कमाई की ओर खिंच रही है। पुराना हुनर फीका पड़ रहा है। फिर भी कई कारीगर डटे हुए हैं, क्योंकि उनके लिए विरासत सिर्फ याद नहीं ,  रोज़ी-रोटी और आत्मसम्मान है।

इसी तरह करघों पर कालीन बुनते हैं। फ़ारसी नक्शे हिंदुस्तानी रंगों में ढलते हैं। हर गांठ अतीत को वर्तमान से जोड़ती है। साथ ही ज़री-ज़र्दोज़ी, संगमरमर की नक्काशी और अन्य शिल्प भी जीवित हैं।


अगर स्मारक जमी हुई तारीख़ हैं, तो आगरा के बाजार उसके जीवंत रंगमंच हैं। सदर बाजार में कदम रखिए  हवा में कबाब और मुगलई व्यंजनों की खुशबू, सौदेबाज़ी की आवाज़ें और हंसी की गूंज। फिर किनारी बाजार की तंग गलियों में खो जाइए ,  रंग-बिरंगे कपड़े, छनकती ज्वेलरी, मसालों की महक और चमड़े के जूतों की दुकानें।  

यहां विरासत दिखाई नहीं जाती ;  जी जाती है। दुकानदार दो ग्राहकों के बीच इतिहास सुना देते हैं। कारीगर अपने हुनर का राज़ खोल देते हैं। ये बाजार म्यूज़ियम नहीं, दिल की धड़कन हैं।


आगरा की रूह सिर्फ रौनक में नहीं, इबादत में भी बसी है। मनकामेश्वर मंदिर (Rawatpara, आगरा किला के पास) में घंटियां सदियों की दुआएं दोहराती हैं। यह शहर के चार प्राचीन शिव मंदिरों में से एक है, जिसकी कथा द्वापर युग से जुड़ी है ,  भगवान शिव ने यहां विश्राम किया था, जब कृष्ण मथुरा में जन्मे थे। भक्त शिव से मनोकामनाएं मांगते हैं।

करीब 70 किमी दूर यमुना किनारे बटेश्वर मंदिर समूह है ,  100 से अधिक शिव मंदिरों का प्राचीन परिसर (कई अब भी खड़े हैं), जो गुरजरा-प्रतिहार काल से जुड़ा है और ASI द्वारा पत्थर दर पत्थर पुनर्स्थापित किया गया है। यह जगह शांति और आस्था का अनूठा संगम है।

और फिर राधा स्वामी समाधि (सोमी बाग) ; संगमरमर में ढली एक शांत, आधुनिक आस्था। खामोशी यहां शब्दों से ज़्यादा बोलती है। यहां विरासत सिर्फ देखी नहीं जाती, महसूस की जाती है।


लेकिन सच्चाई थोड़ी कड़वी है। आगरा की कहानी अधूरी सुनाई जाती है। एक स्मारक चमकता है, बाकी साए में रह जाते हैं। ताज के संरक्षण के नियम ज़रूरी हैं, लेकिन इन्होंने आसपास की सांसें भी थाम ली हैं। ताजगंज के कारखाने सिमट गए, होटल ठहर गए, स्थानीय कारीगरों के मौके कम हो गए। शाम ढलते ही शहर जैसे सो जाता है।

सबसे बड़ा खतरा अपनापन का खत्म होना है। कई स्थानीय लोग इन धरोहरों को अब “अपना” नहीं मानते। जब रिश्ता टूटता है, तो हिफाजत भी कमज़ोर पड़ती है। विरासत बोझ बन जाती है, नेमत नहीं रहती। पर्यटन के दबाव से हुनर प्रभावित हो रहा है ;  बाजार कमजोर, कच्चा माल महंगा, स्वास्थ्य जोखिम और युवा पीढ़ी का पलायन।


इस हेरिटेज डे पर आगरा को नई कहानी चाहिए। छोटे-छोटे कदम बड़े बदलाव ला सकते हैं:

- कारीगरी के ट्रेल्स और वर्कशॉप्स बनें, जहां सैलानी खुद पच्चीकारी सीख सकें।

- आध्यात्मिक सर्किट विकसित हों — मनकामेश्वर, बटेश्वर, यमुना घाट और सोमी बाग एक धागे में पिरोए जाएं।

- शाम के बाजार सांस्कृतिक मेलों में बदलें, जहां हुनर, खानपान और कहानियां एक साथ जी सकें।

- स्कूलों में स्थानीय इतिहास पढ़ाया जाए। युवा अपनी कहानियां दर्ज करें। समुदाय खुद संरक्षण की कमान संभाले।

- सैलानियों को भी बदलना होगा — जल्दबाजी कम, गहराई ज़्यादा। स्थानीय हुनर, खानपान (पेठा, दालमोठ) और उत्पाद (चमड़े के जूते, हैंडीक्राफ्ट्स, फाउंड्री, ग्लास) खरीदें।

आगरा के उद्योग भी विरासत का हिस्सा हैं ; चमड़े और जूते का विश्व प्रसिद्ध कारोबार, पेठा-दालमोठ, हैंडीक्राफ्ट्स, फाउंड्री और ग्लास वर्क। ये सब मिलकर आगरा को पूरा बनाते हैं।

आगरा एक कहानी नहीं ;  कई किस्सों का शहर है। यह झुके हुए कारीगर का सब्र है, मंदिर की घंटी की गूंज है, बाजार की पुकार है। यह शोर भी है, सुकून भी है। यह सिलसिला है, जो सदियों से चल रहा है।

इस हेरिटेज डे पर सवाल सीधा है:  

क्या हम सिर्फ दिखावे के पीछे भागते रहेंगे? या पूरी तस्वीर देखेंगे?  

क्योंकि आगरा ध्यान नहीं मांगता। समझ मांगता है।  

जब आप इसे समझ लेते हैं, तो आगरा सिर्फ देखा नहीं जाता ;  दिल में बस जाता है।

यह शहर पत्थर से ज़्यादा अपनी कहानियों, हुनर, खानपान और रूह से बना है। इसे पूरा देखिए, पूरा जीिए। विरासत सेल्फी नहीं, एक गहरा रिश्ता है।

Friday, April 17, 2026

 उत्तर भारत की लुप्त हो रही छत संस्कृति:

वो गर्मी की रातें!

छतों का आसमान: जब रातें इश्क़ लिखती थीं और मोहल्ले एक जान हो जाते थे

________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा

19 अप्रैल 2026

________________________

शाम ढलती नहीं थी। बस ऊपर खिसक जाती थी। घर की धड़कन सीढ़ियाँ चढ़कर छत पर आ बैठती थीं।

दिन भर की लू बदन को झुलसा देती। दीवारें तवे की तरह तपतीं। हवा भी जैसे रूठ जाती। मगर जैसे ही सूरज थककर ढलता, आसमान बैंगनी चादर ओढ़ लेता। और उसी पल, उम्मीद का एक दरवाज़ा खुलता; छत का दरवाज़ा। वो छत सिर्फ छत नहीं थी। वो जिंदगी का खुला कमरा थी।

तैयारियाँ किसी छोटे त्योहार जैसी होतीं। बाल्टियों में पानी भरा जाता। लोटे से छिड़काव शुरू होता। गरम फर्श “छssss” की आवाज़ के साथ ठंडा पड़ता। मिट्टी की सोंधी खुशबू उठती, जैसे धरती ने इत्र लगा लिया हो। बिना बारिश की बरसात।

फिर चारपाइयाँ निकलतीं। डोरी से बुनी, हल्की, मगर भरोसेमंद। उन पर सफेद सूती चादरें बिछतीं। तकियों के नीचे पंखे दबे रहते, एहतियातन। अगर हवा फिर से नाराज़ हो जाए तो?

अँधेरा उतरते ही छत बदल जाती। जगह से एहसास बन जाती। न टीवी। न मोबाइल। बस लोग… और आसमान। बच्चे पीठ के बल लेट जाते। तारे गिनते।

“देखो, वो सप्तऋषि!”

“अरे, वो टूटता तारा!”

हँसी हवा में उछलती। कोई आकाशगंगा जोड़ने में लगा। कोई दुआ माँग रहा। और दादी की आवाज़, धीमी, मगर जादुई, रात को कहानी में बदल देती। जिन्न आते। राजा जाते। भूत हँसते। और हम, नींद और ख्वाब के बीच झूलते रहते।

नीचे कमरों में घुटन थी। ऊपर छत पर राहत। नीचे सन्नाटा था। ऊपर गुफ़्तगू।

सबसे खूबसूरत रिश्ता था, छतों का रिश्ता। दीवारें थीं, मगर बस नाम की। एक छत से दूसरी छत, बस एक आवाज़ की दूरी पर।

“भाभी, ज़रा नमक देना!” “आज क्या बना?” “अरे सुनो तो…”

आवाज़ें उड़तीं। हँसी पार जाती। पूरा मोहल्ला एक साँस में जीता। जैसे हर घर, एक ही घर हो।

खाना भी छत पर ही। सादा, मगर दिल का। और फिर असली सितारे; आम और खरबूजे। घंटों पानी में डूबे फल। ठंडे, मीठे, रस से भरे। फाँकें कटतीं। रस टपकता। हाथ चिपचिपे। दिल खुश।

कोई औपचारिकता नहीं। कोई दूरी नहीं। बस बाँटना… और साथ होना।

कहीं कोने में ट्रांजिस्टर खड़खड़ाता। कभी आकाशवाणी। कभी मोहम्मद रफ़ी। गाना एक घर से उठता, पूरे मोहल्ले का हो जाता। कहीं दूर मंदिर की घंटी। बीच में बच्चों की हँसी। यही था असली संगीत।

हर रात हल्की नहीं होती थी। कुछ रातें भारी भी होतीं। बंटवारे की यादें। बिछड़े घरों की कसक।

कोई नानी आसमान को ताकती रहती। जैसे पुराने घर की छत वहीं कहीं छुपी हो। खुले आकाश में उसे सुकून मिलता। चार दीवारें उसे कैद लगतीं।

मगर ज़्यादातर रातें जिंदा थीं। नंगे पैर दौड़ते बच्चे। जुगनू पकड़ते हाथ। और जवान दिल… उनके लिए छत सबसे प्यारी जगह थी। नीची मुँडेर। ऊँचे अरमान। एक नज़र उधर। एक मुस्कान इधर।

चारपाई ठीक करने का बहाना। आसमान देखने का बहाना। मोहब्बत अपनी राह खुद बना लेती। ज़्यादा जगह नहीं चाहिए होती उसे। बस एक छत… और थोड़ी सी हवा।

सिनेमा ने भी इन छतों के जादू को खूब पकड़ा। Garam Hawa की उदास छतें, जहाँ यादें भी सोती थीं और दर्द भी जागता था। Delhi-6 की जुड़ी छतें, जहाँ दोस्ती और मोहब्बत एक ही हवा में सांस लेते थे। Vicky Donor की हल्की-फुल्की रातें, जहाँ नजरें चुपके से मिलती थीं। और Manmarziyaan के बेचैन दिल, जिन्हें छतों पर खुला आसमान मिलता था। फिल्मों ने जो दिखाया, वो कोई कल्पना नहीं थी। वो हमारे मोहल्लों की रोज़मर्रा की हकीकत थी। वो सिनेमा नहीं था। वो हमारी जिंदगी थी। हर मोहल्ला एक कहानी था। हर छत, एक राज़।

रिटायर्ड मास्साब विश्वास सर कहते हैं, “खाने के बाद सब ऊपर आ जाते थे। नानी पंखा झलतीं। अब्बा किस्से सुनाते। अम्मा लोरी गाती। कहीं से चमेली की खुशबू आती। और कोई आशिक़… चुपके से दिल की बात कह जाता।”

उषा दादी हँसकर जोड़ती हैं, “छत हर घर को थिएटर बना देती थी। जहाँ खुशी भी खेलती, ग़म भी… और रिश्ते भी।”

उन रातों में जादू था। न स्क्रीन की नीली रोशनी। न मशीनों का शोर। बस तारे। कभी टूटते हुए। और सबकी एक साथ निकली आवाज़: “ओह!” दिन की लू, रात में लोरी बन जाती। हवा थपकी देती। नींद आ जाती।

फिर वक्त बदला। छतें खाली होने लगीं। एसी आ गया। दरवाज़े बंद। खिड़कियाँ सील। हवा भी अब मशीन से आने लगी। मुँडेरें ऊँची हो गईं। रिश्ते नीचले। पड़ोसी दिखते नहीं। आवाज़ें सुनाई नहीं देतीं।

और हाँ, बंदरों ने भी कब्ज़ा कर लिया।

छत अब सुकून नहीं, जोखिम लगती है। अब कोई चारपाई नहीं बिछाता।कोई तारे नहीं गिनता। कोई दादी की कहानी नहीं सुनता।

बस स्क्रीन है। और स्क्रीन के पीछे… एक लंबी खामोशी। मगर यादें जिंदा हैं। गरम हवा जब चलती है, कुछ फुसफुसाती है: “याद है वो रातें? जब आसमान अपना था?”


Thursday, April 16, 2026

 भोर की हल्की गुलाबी रोशनी जैसे ही गोवर्धन परिक्रमा मार्ग को छूती है, घंटियों की ध्वनि और “राधे-राधे” की गूंज हवा में तैरती है। पर उसी हवा में एक कड़वी सच्चाई भी घुली होती है,  तीखी बदबू, जो श्रद्धा के इस पवित्र अनुभव को झकझोर देती है। भक्ति और बेबसी यहाँ साथ-साथ चलती हैं।

___________________

ज्यादातर तीर्थ स्थलों की सबसे बड़ी समस्या है: हंगना

पर्याप्त संख्या में जब पब्लिक शौचालय हैं ही नहीं, तो जाएं तो जाएं कहां?

बृज का स्वच्छता संकट: हर साल 10 करोड़ श्रद्धालु, पर न के बराबर उपयोगी शौचालय

_________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा

18 अप्रैल, 2026

________________________


श्री कृष्ण और राधा रानी के प्रति अटूट आस्था लेकर हर दिन हजारों श्रद्धालु वृंदावन, मथुरा, गोवर्धन, बरसाना, गोकुल और नंदगांव की ओर खिंचे चले आते हैं। त्योहारों पर यह संख्या सैलाब बन जाती है। आस्था का यह समुद्र हर साल और गहरा होता जा रहा है।

आंकड़े भी यही कहानी कहते हैं। 2023 में मथुरा-वृंदावन में लगभग 7.9 करोड़ पर्यटक आए। 2024 में यह आंकड़ा 9 करोड़ पार कर गया। 2025 तक पूरे बृज क्षेत्र में श्रद्धालुओं की संख्या 10 करोड़ से अधिक हो गई। लेकिन इस बढ़ती भीड़ के साथ जो नहीं बढ़ा, वह है बुनियादी स्वच्छता ढांचा। साफ-सुथरे और चालू सार्वजनिक शौचालय आज भी गिनती के हैं, और जो हैं, वे अक्सर बदहाल।

अब यह समस्या केवल असुविधा नहीं रही। यह जन-स्वास्थ्य का गंभीर खतरा बन चुकी है। खुले में शौच से न केवल बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है, बल्कि पवित्र यमुना और घाट भी प्रदूषित हो रहे हैं। आस्था की यह भूमि अब गंदगी के बोझ तले कराह रही है।

गोवर्धन और मानसी गंगा क्षेत्र इसका सबसे सटीक उदाहरण हैं। 21 किलोमीटर की परिक्रमा मार्ग पर लाखों श्रद्धालु दिन-रात चलते हैं। लेकिन शौचालय की सुविधा न के बराबर है। सुबह का दृश्य चौंकाने वाला होता है, लोग खेतों और रास्तों के किनारे मजबूरी में शौच करते दिखते हैं।

गोवर्धन के बुजुर्ग पंडा बिरजो बाबा कहते हैं, “यह दृश्य बहुत अपवित्र है। धर्मशालाओं में कुछ शौचालय हैं, पर उनकी हालत खराब है। प्रशासन केवल तमाशा देख रहा है।”

मानसी गंगा और अन्य पवित्र कुंडों की स्थिति भी बेहतर नहीं। खुले में शौच से इनका जल दूषित हो रहा है। यह प्रदूषण अंततः यमुना तक पहुंचता है, जिससे समस्या और विकराल हो जाती है।

सबसे ज्यादा मार महिलाओं पर पड़ रही है। मथुरा के बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन के पास दीवारों के किनारे खड़ी कतारें इस मजबूरी की गवाही देती हैं। मौजूदा शौचालय इतने गंदे और असुरक्षित हैं कि लोग उनका इस्तेमाल करने से कतराते हैं।

महिलाओं के लिए यह स्थिति और भी भयावह है। या तो शौचालय हैं ही नहीं, या इतने असुरक्षित कि जाना खतरे से खाली नहीं। डॉक्टर चेतावनी देते हैं कि लंबे समय तक शौच रोकने से महिलाओं में यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन (UTI) का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। यह केवल असुविधा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य संकट है।

वृंदावन में वर्षों पहले बने सुलभ शौचालय अब जर्जर हो चुके हैं। सामाजिक कार्यकर्ता जॉय बताते हैं कि रखरखाव की भारी कमी है। सफाई, पानी और निगरानी, तीनों का अभाव है।

बरसाना, नंदगांव और गोकुल जैसे छोटे तीर्थस्थलों की स्थिति तो और भी खराब है। स्थानीय गाइड गोविंद शर्मा कहते हैं, “यहाँ शौचालय ऊँट के मुँह में जीरे के समान हैं। जो हैं भी, उनकी गंदगी सड़कों तक फैलती है।”

व्यापारी वर्ग भी अब खुलकर सामने आ रहा है। वृंदावन के व्यवसायी अंशु गोपाल का कहना है कि सरकार को भव्य परियोजनाओं के बजाय बुनियादी सुविधाओं पर ध्यान देना चाहिए। वहीं राजेंद्र अग्रवाल का मानना है कि केवल नए शौचालय बनाना काफी नहीं, उनका नियमित रखरखाव ज्यादा जरूरी है।

व्यापारी कन्हाई लाल सुझाव देते हैं कि मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण को हर नए निर्माण के साथ शौचालय और सीवर कनेक्शन अनिवार्य करना चाहिए। जब तक यह नियम सख्ती से लागू नहीं होगा, समस्या जस की तस रहेगी।

सच यह है कि बृज में स्वच्छता का संकट केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक प्राथमिकताओं का आईना है। मंदिरों के लिए करोड़ों का दान आता है, भव्य गलियारे बनते हैं, लेकिन शौचालय जैसी बुनियादी जरूरत आज भी हाशिये पर है।

सवाल सीधा है, क्या भक्ति केवल मंदिर की देहरी तक सीमित है? क्या पवित्रता का अर्थ केवल पूजा है, स्वच्छता नहीं?

श्री कृष्ण और राधा की यह पावन भूमि इससे कहीं बेहतर की हकदार है। 10 करोड़ श्रद्धालुओं की आस्था का सम्मान तभी होगा, जब उन्हें सम्मानजनक और स्वच्छ सुविधाएं मिलें।

अब समय आ गया है कि हर मंदिर, हर घाट और हर परिक्रमा मार्ग पर साफ, सुरक्षित और सुलभ शौचालयों का मजबूत नेटवर्क बनाया जाए। क्योंकि जहां स्वच्छता नहीं, वहां पवित्रता अधूरी है।

Wednesday, April 15, 2026

 


लुप्त हुए ट्रंक और कनस्तर: जब घरों में यादें ताला लगाकर रखी जाती थीं

________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा 

17 अप्रैल 2026

_________________________

कभी घर सिर्फ ईंट और छत नहीं होते थे, यादों के गोदाम होते थे। उन यादों की रखवाली करते थे: कई भारी-भरकम ट्रंक और  खनखनाते कनस्तर।

दिल की गहराइयों में आज भी वो पुराना  ट्रंक चुपके से साँस लेता है। भारी, जिसके ऊपर पेंट से परिवार का नाम लिखा होता था “शर्मा परिवार, दिल्ली”। उसकी सलवटें, उसकी जंग लगी कुंडियाँ और वो मीठी-सी पुरानी  खुशबू… हर बार ढक्कन खोलते ही बचपन की गर्मियाँ लौट आती थीं। फौजी और रेलवही के गार्ड बाबू अभी भी काले चद्दर के बक्से उपयोग करते हैं।

घर के अंदर बड़े संदूकों में कपूर की सफेद गोलियाँ नीम के पत्तों के साथ सोई रहतीं। गर्मियों के हल्के सूती कपड़े एक तरफ, सर्दियों की ऊनी रजाइयाँ और गद्दे दूसरी तरफ। शादी-ब्याह के मौके पर वो ट्रंक जादू की तरह खुलता;  चादरें, गद्दे, रजाइयाँ निकलतीं और पूरा संयुक्त परिवार एक साथ हँसता-बोलता सज जाता। ट्रंक कभी पढ़ने की मेज बन जाता, कभी सोफा, कभी रेडियो का सिंहासन।

ट्रेन की छुट्टियों में जब पूरा कुनबा स्टेशन पहुँचता, कुली सिर पर होल्डॉल और ट्रंक रखे, कंधे पर बैग, हाथ में सुराही लिए आगे-आगे चलता। सीट न मिलने पर बच्चे ट्रंक पर ही बैठकर खिड़की से बाहर उड़ते बादलों को गिनते। दादी माँ उसी ट्रंक में खोया-पाया, पुरानी चिट्ठियाँ, थैले और हर जुगाड़ संभाल कर रखतीं। हर बच्चे का अपना छोटा ट्रंक;  लड़कियों के अंदर गुड़िया, चूड़ियाँ और गुप्त डायरी।

फिर आता कनस्तर। चमकता हुआ टिन का, जिसमें दादी छिपाकर लड्डू-मठरी रखतीं। चूहे डर के मारे भागते। गेहूँ, आटा, गुड़, चीनी… कई महीनों का वारदाना उसमें सोया रहता। इमरतबान में आम का मीठा आचार और नींबू की खट्टी खुशबू घर भर में फैलती।

आज अलमारी और पहिए वाले सूटकेस आ गए। दिल छोटे हो गए। न ट्रंक की वो गरिमा बची, न कनस्तर की वो मासूमियत। बच्चे अब बिस्तरबंद और होल्डॉल का नाम भी नहीं जानते। 

ट्रंक… लोहे का, हरे या नीले रंग का, ऊपर सफेद पेंट से लिखा नाम। जैसे कोई पहचान पत्र। हर घर में एक नहीं, कई ट्रंक। छोटा, बड़ा, दहेज वाला, बच्चों वाला। खोलते ही  खुशबू उड़ती थी। सर्दियों के स्वेटर, गर्मियों की मलमल, तह करके रखी साड़ियाँ, जैसे मौसम भी उनमें सांस लेता हो।

पुराने ज़माने के सख्त मास्साब रघुनाथ प्रसाद यादों के समंदर में खो जाते हैं: "संयुक्त परिवार की धड़कन थे ये ट्रंक। शादी-ब्याह का मौसम आता, तो वही ट्रंक गद्दे, रजाई, चादरों से भर उठते। मेहमान आते, तो वही ट्रंक मेज बन जाता। रेडियो उस पर सजता, बच्चे उस पर उछलते, और बड़े उस पर बैठकर किस्से बुनते। ट्रंक कोई चीज़ नहीं था, घर का चुपचाप खड़ा बुजुर्ग था।"

सुशीला ताई कहती हैं: "छुट्टियाँ आतीं, तो ट्रंक का असली सफर शुरू होता। ट्रेन की सीट कम पड़ जाए, तो बच्चे उसी पर बैठ जाते। साथ में होल्डोल, कसकर बांधा हुआ बिस्तरबंद, और एक सुराही, जिसका पानी रास्ते भर मीठा लगता था। स्टेशन पर कुली सिर पर ट्रंक, कंधे पर बैग, हाथ में सुराही, और पीछे हमारा भरपूर परिवार, जैसे कोई चलता-फिरता जुलूस हो।"

दादी का ट्रंक तो जैसे खजाना था। खोया-पाया, पुराने खत, टूटे खिलौने, और अचानक जरूरत पड़ने पर निकल आने वाले थैले: सब उसी में। हर सवाल का जवाब, हर कमी का जुगाड़, उसी ट्रंक के भीतर छिपा होता था।

और उधर, रसोई का सम्राट था: कनस्तर। टीन का, मोटा, ढक्कन पर कुंडी लगी हुई। उसमें घी की खुशबू बसती थी, तेल की चमक झलकती थी। चूहों से बचाने का किला था वह। लड्डू, मठरी, सेव, सब उसमें छिपाकर रखे जाते, दादी की गुप्त तिजोरी।

कनस्तर में महीनों का राशन सांस लेता था। गेहूं, आटा, दाल, चीनी, गुड़, सब। इमरतबान में आम और नींबू का अचार धूप में पकता था। कुछ घरों में टेंटी और लिसौड़े का भी स्वाद बसता था। साइकिल पर कनस्तर रखकर चक्की जाना, वह भी एक छोटा सा उत्सव था।

आज घर बड़े हैं, पर जगह छोटी। अलमारी और कपबोर्ड ने ट्रंक को बेदखल कर दिया। पहियों वाले सूटकेस और बैकपैक ने सफर का रोमांस चुरा लिया है। बच्चों को पता भी नहीं कि बिस्तरबंद कैसे कसते हैं, होल्डोल क्या होता है।

और कनस्तर? वह तो जैसे कहानी बन गया। अब सब कुछ छोटे पैकेट में आता है। जरूरत जितनी, खरीद उतनी। न भंडारण, न इंतजार, न वो धैर्य।

कभी-कभी लगता है, उन ट्रंकों में सिर्फ कपड़े नहीं, रिश्ते तह करके रखे जाते थे। कनस्तर में सिर्फ अनाज नहीं, घर की खुशहाली बंद होती थी। आज सब खुला है, सब उपलब्ध है, फिर भी कुछ कमी सी है।

शायद सच यही है: घर सिकुड़ गए, सामान सिमट गया, और दिल भी थोड़े छोटे हो गए।

ट्रंक , कनस्तर और इमरतबान चले गए… और साथ ले गए एक पूरा जमाना, जो अब सिर्फ यादों में धीरे-धीरे खनकता है।

Tuesday, April 14, 2026

 ईरान का आत्मघाती रास्ता: शांति से इनकार और पश्चिम एशिया की तबाही को निमंत्रण

___________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा 

16 अप्रैल 2026

_________________________

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से शिष्टाचार और दया की उम्मीद करना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है। बड़बोला ट्रंप न खुदा से डरता हैं, न विश्व जनमत से। नैतिकता और अंतरराष्ट्रीय कानून का खुला मजाक उड़ा रहा है, विश्व संगठनों का अपमान कर रहा है। ऐसे कपटी और मूर्ख नेता से उलझने से किसी को कोई लाभ नहीं मिलेगा। 

प्रश्न ये है कि ईरान और उसके समर्थक देश आत्मघाती कदम उठाकर खाड़ी देशों और तमाम विकासशील राष्ट्रों को तबाही का न्योता क्यों दे रहे हैं? ऊर्जा संकट से भारत समेत कई देशों की अर्थव्यवस्था को घातक झटके लगेंगे, जबकि इस संघर्ष में पीड़ितों की कोई भूमिका नहीं है।

2026 की तपती सियासत में, जब पूरा क्षेत्र बारूद के ढेर पर बैठा है, तेहरान की सरकार ने सुलह के दरवाजे बंद कर दिए हैं और टकराव जारी रखने की जिद जताई है। शांति की पेशकश आई भी, लेकिन जवाब मिला: खामोशी, तना हुआ लहजा और संघर्ष का इरादा। यह जिद अब सिर्फ राजनीति नहीं रही; यह सीधा आत्मघाती रास्ता बन चुकी है।

ईरान की आर्थिक स्थिति पहले ही डांवाडोल है। मुद्रास्फीति 40 प्रतिशत से ऊपर है, कुछ अनुमानों के अनुसार 42-48 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। रियाल की कीमत जमीन में गड़ चुकी है, एक डॉलर के लिए 10 लाख से 17 लाख रियाल तक। अर्थव्यवस्था सिकुड़ रही है, प्रतिबंधों की मार पड़ रही है और अंदरूनी असंतोष बढ़ रहा है। अगर फारस की खाड़ी में नौसैनिक नाकाबंदी लंबी खिंची, तो ईरान की सांस की नली दब जाएगी।

सच कड़वा है, लेकिन कहना जरूरी है। ईरान अपनी जरूरत का ज्यादातर सामान समुद्री रास्तों से मंगाता है। अगर यह रास्ता बंद हुआ, तो फैक्टरियां ठप पड़ जाएंगी, दवाइयां गायब हो जाएंगी, बिजली व्यवस्था लड़खड़ा जाएगी और जनता बेबस होकर सड़कों पर उतर आएगी। यह सब अचानक नहीं हुआ है। यह सालों की गलत नीतियों का हिसाब है।

ईरान ने अपनी विदेश नीति को जिद में बदल दिया। क्रांतिकारी नारे, परमाणु महत्वाकांक्षा, मिसाइलों का जुनून और प्रॉक्सी युद्ध का खेल: इन सबका नतीजा दुनिया से अलगाव, एकाकीपन और आर्थिक घुटन है। चीन के साथ दोस्ती को सहारा समझा गया, लेकिन यह बैसाखी साबित हुई। तेहरान ने सस्ता तेल बेचा; बदले में कुछ निवेश और थोड़ी राहत मिली, लेकिन भारी निर्भरता बढ़ गई। 80-90 प्रतिशत तेल एक ही खरीदार (चीन) को बेचना मजबूरी है, रणनीति नहीं। चीन ने अपने फायदे देखे, जबकि ईरान ने अपनी स्वतंत्रता गिरवी रख दी।

अब जब हालात बिगड़ रहे हैं, तो वही पुरानी जिद। सवाल उठता है: ईरान ऐसा क्यों कर रहा है? क्या तेहरान को इराक का अंजाम याद नहीं? 1990 के दशक में नाकाबंदी ने इराक को तोड़ दिया था; भूख, बीमारी, बेरोजगारी और समाज का चरमरा जाना। क्या ईरान उसी रास्ते पर चलना चाहता है?

आज ईरान के प्रमुख क्षेत्र पहले ही कमजोर हैं। दुनिया का सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस क्षेत्र; साउथ पार्स, हमलों से क्षतिग्रस्त हो चुका है। तेल निर्यात खतरे में है। उद्योग आयात पर निर्भर हैं। अगर आपूर्ति रुकी, तो उत्पादन ठप पड़ जाएगा। कारखाने बंद, नौकरियां गायब, रियाल और गिरेगा, मुद्रास्फीति आग बन जाएगी और सड़कों पर गुस्सा फूट पड़ेगा।

यह सिर्फ आर्थिक कहानी नहीं है। यह क्षेत्रीय शांति-अमान की भी कहानी है। ईरान के प्रॉक्सी गुट: हिजबुल्लाह, हूती विद्रोही और विभिन्न मिलिशिया, पहले ही दबाव में हैं। पैसा कम हुआ तो बौखलाहट बढ़ेगी। बौखलाहट बढ़ने पर गोलियां चलेंगी। खाड़ी में जहाजों पर खतरा मंडराएगा। दुनिया का करीब 20 प्रतिशत तेल इसी रास्ते से गुजरता है। जरा सी चिंगारी पूरी दुनिया में आग लगा सकती है।

तेहरान की नीति अब अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रही है। दोस्त कम, दुश्मन ज्यादा। और जो दोस्त बचे हैं, वे भी अपने स्वार्थ के। हकीकत यह है कि ईरान के पास अभी भी मौका है। ट्रंप ने समय सीमा बढ़ाई है, लेकिन वक्त तेजी से फिसल रहा है।

जरूरत है जिद छोड़ने की, बातचीत की मेज पर लौटने की, परमाणु मुद्दे पर समझौता करने की, खाड़ी देशों से रिश्ते सुधारने की और सबसे महत्वपूर्ण; अपने लोगों के भविष्य के बारे में सोचने की। मुल्क सिर्फ मिसाइलों और नारों से नहीं चलता। मुल्क चलता है रोजगार से, बिजली से, दवाइयों से और उम्मीद से।

अगर सरकार अब भी आंखें मूंदे रखी, तो अंजाम साफ है; लंबी नाकाबंदी, गिरती अर्थव्यवस्था और अंदरूनी बगावत। इतिहास गवाह है: जो देश समय पर नहीं झुकते, वे टूट जाते हैं।

ईरान के सामने दो रास्ते हैं। पहला: शांति, समझदारी और सुधार का रास्ता। दूसरा: टकराव, एकाकीपन और तबाही का रास्ता। चुनाव उनकी है, लेकिन इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा, खासकर भारत जैसे ऊर्जा आयातक देशों पर। ऊर्जा कीमतों में उछाल से मुद्रास्फीति बढ़ेगी, औद्योगिक उत्पादन प्रभावित होगा और विकासशील अर्थव्यवस्थाएं झटके खाएंगी।

ईरान को समझना चाहिए कि जिद से कोई फायदा नहीं। परमाणु कार्यक्रम की जिद ने उसे अलग-थलग कर दिया है। प्रॉक्सी युद्ध ने संसाधनों को बर्बाद किया है। अब समय है कि तेहरान अपनी जनता की भलाई को प्राथमिकता दे। बातचीत से ही समाधान निकल सकता है; परमाणु संयम, प्रतिबंधों में राहत और क्षेत्रीय स्थिरता।

पश्चिम एशिया की स्थिरता न सिर्फ क्षेत्रीय देशों के लिए, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी है। भारत जैसे देश, जो खाड़ी से तेल आयात करते हैं, इस अस्थिरता का सबसे बड़ा शिकार हो सकते हैं। ईरान को आत्मघाती रास्ते से मुड़ना चाहिए, वरना इतिहास उसे एक और इराक के रूप में याद रखेगा; जिसकी जिद ने पूरे देश को तबाह कर दिया।

शांति की राह चुनना ही एकमात्र समझदारी भरा कदम है। जिद छोड़ो, बात करो, और अपने लोगों को बचाओ। वरना तबाही का निमंत्रण न सिर्फ ईरान को, बल्कि पूरे क्षेत्र को बर्बाद कर देगा।