Monday, May 25, 2026

 क्या यही वह गौरवशाली, पूजनीय श्रीकृष्ण की भूमि है, जो आज बूंद-बूंद पानी के लिए तड़प रही है?

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प्यासा ब्रज: तालाबों-कुंडों की धरती श्रीकृष्ण नगरी आखिर पानी को क्यों तरस रही है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

28 मई 2026

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ब्रज मंडल की प्रकृति, यमुना तट, कुंज गलियों, मोरों, गायों और कृष्ण लीलाओं का सुंदर वर्णन अनेक लोकप्रिय भजनों और गीतों में मिलता है। “श्याम तेरी बंसी पुकारे,” “राधे राधे बरसाने वाली,” “मैया मोरी,” और “जय राधा माधव” जैसे भजन वृंदावन, बरसाना और गोकुल की आध्यात्मिक सुंदरता को जीवंत करते हैं। सूरदास और रसखान के पद विशेष रूप से प्रकृति का मार्मिक वर्णन करते हैं।

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कभी यह धरती बांसुरी की तान पर झूमती थी। यमुना किनारे कदंब की छांव थी। कुंडों में कमल खिलते थे।तालाब गांवों की धड़कन होते थे।

आज उसी ब्रज मंडल में सुबह का पहला दृश्य क्या है? हाथों में बाल्टियां लिए महिलाएं। सूखे नलों के नीचे टकटकी लगाए बच्चे। और पानी के टैंकर के पीछे भागती भीड़।

यह वही ब्रज है, जहां श्रीकृष्ण ने गोपियों संग रास रचाया था। वही भूमि, जिसे संतों ने “धरा पर स्वर्ग” कहा। लेकिन अब यह स्वर्ग प्यास से फटे होंठों वाला मरुस्थल बनता जा रहा है। विडंबना देखिए । यमुना किनारे बसे शहरों में लोग पीने के पानी के लिए जूझ रहे हैं।

कभी ब्रज का हर गांव एक छोटे जल-संसार जैसा था। कुंड थे। पोखर थे। बावड़ियां थीं। बरसात का पानी सहेजने की अद्भुत लोक-व्यवस्था थी।

बूढ़े लोग बताते हैं कि मथुरा और वृंदावन में बीस तीस फीट खोदो तो मीठा पानी मिल जाता था। अब डेढ़ सौ फीट नीचे भी कई बार सिर्फ गाद या हवा निकलती है। धरती का सीना खाली हो चुका है। जैसे किसी ने भीतर का सारा जीवन चूस लिया हो।

गर्मियों में हालात और भयावह हो जाते हैं। मोहल्लों में,  गांवों में पानी के लिए रोज छोटे-छोटे युद्ध होते हैं। टैंकर आता है तो ऐसा लगता है जैसे रेगिस्तान में बादल उतर आया हो। 

यह संकट अचानक नहीं आया। यह वर्षों की लापरवाही का नतीजा है।

ब्रज के तालाब और सरोवर सिर्फ सजावट नहीं थे। वे धरती के बैंक थे। बरसात का पानी जमा करते थे, भूजल रिचार्ज करते थे, गर्मी कम करते थे। लेकिन विकास के नाम पर इन जलाशयों को मिटा दिया गया। कहीं कॉलोनियां उग आईं। कहीं पार्किंग बन गई। कई कुंड कूड़ाघर में बदल गए।

कंक्रीट ने मिट्टी की सांस रोक दी।

धरती पानी पीना भूल गई।

राजनीति ने भी अपना खेल खेला। चुनावों में बड़े-बड़े वादे हुए। यमुना सफाई की बातें हुईं। हर घर जल पहुंचाने के दावे हुए। घाट चमकाए गए। रंगीन लाइटें लगीं। पर्यटन को बढ़ावा मिला। लेकिन गांवों के सूखे हैंडपंप किसी भाषण का हिस्सा नहीं बने।

मथुरा से सांसद बनीं हेमा मालिनी ने भी यमुना और जल संकट पर कई घोषणाएं कीं। करोड़ों रुपये योजनाओं में खर्च हुए। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बने। “नमामि गंगे” और “जल जीवन मिशन” जैसे अभियानों का खूब प्रचार हुआ। मगर जमीन पर तस्वीर अब भी अधूरी है। शहर के कुछ हिस्सों में पाइपलाइन पहुंची, लेकिन बाहरी बस्तियां और गांव अब भी भूजल के भरोसे हैं।

सबसे दुखद हालत यमुना की है।

जिस नदी को ब्रज की मां कहा जाता था, वह कई जगहों पर नाले जैसी दिखती है। दिल्ली और दूसरे शहरों का प्रदूषण बहता हुआ यहां पहुंचता है। काले झाग, बदबू और गंदगी ने नदी की आत्मा को घायल कर दिया है। श्रद्धालु आरती उतारते हैं, लेकिन नदी खुद जैसे मदद की गुहार लगा रही हो।

एक समय था जब बच्चे यमुना में छलांग लगाकर तैरना सीखते थे। आज माता-पिता बच्चों को नदी के पास जाने से डरते हैं। पानी में बीमारी है। जहरीले रसायन हैं। गांवों के कई इलाकों में भूजल में फ्लोराइड और TDS की मात्रा खतरनाक स्तर तक पहुंच चुकी है। लोग धीरे-धीरे बीमार हो रहे हैं। दांत खराब हो रहे हैं। किडनी रोग बढ़ रहे हैं। टाइफाइड और हेपेटाइटिस आम बात बनते जा रहे हैं।

पर्यटन ने भी दबाव बढ़ाया है।

हर साल करोड़ों श्रद्धालु ब्रज पहुंच रहे हैं। होटल, धर्मशालाएं, रेस्टोरेंट और नई कॉलोनियां तेजी से बढ़ रही हैं। पानी की मांग आसमान छू रही है। लेकिन जल संरक्षण की रफ्तार घोंघे जैसी है। विकास हो रहा है या विनाश? 

स्थानीय नेतृत्व की विफलता अब खुली किताब है।

भव्य परियोजनाओं पर ध्यान रहा। फोटो खिंचवाने पर ध्यान रहा। लेकिन तालाब बचाने, वर्षा जल संचयन लागू करने और अतिक्रमण हटाने जैसे बुनियादी काम पीछे छूट गए। विकास का ढोल बजता रहा, मगर धरती भीतर से सूखती रही।

फिर भी उम्मीद पूरी तरह मरी नहीं है।

कुछ गांवों में लोग खुद चंदा इकट्ठा कर तालाब साफ करा रहे हैं। कुछ पर्यावरण कार्यकर्ता पुराने कुंडों को पुनर्जीवित करने में जुटे हैं। युवा वृक्षारोपण अभियान चला रहे हैं। कुछ NGO वर्षा जल संचयन और चेक डैम बनाने की मांग उठा रहे हैं।

असल लड़ाई पाइपलाइन की नहीं, सोच की है।

जब तक विकास और प्रकृति साथ नहीं चलेंगे, तब तक कोई योजना स्थायी नहीं होगी। चमचमाती सड़कें प्यास नहीं बुझातीं। रंगीन घाट सूखे भूजल को नहीं भरते।

ब्रज आज पूरे देश को चेतावनी दे रहा है।

यदि श्रीकृष्ण की भूमि प्यास से तड़प सकती है, तो कोई शहर सुरक्षित नहीं। प्रकृति देर से हिसाब करती है, मगर बहुत सख्ती से करती है।

अब समय आ गया है कि नेता भाषणों से आगे बढ़ें।

तालाब बचाए जाएं।

कुंड पुनर्जीवित हों।

वर्षा जल संचयन अनिवार्य बने।

यमुना में गिरता गंदा पानी रोका जाए।

क्योंकि आखिर सवाल सिर्फ विकास का नहीं है। सवाल जीवन का है।

ब्रज की पुकार आज बहुत साफ सुनाई दे रही है :

“भव्य चमकीली परियोजनाएं बाद में बनाना, पहले हमारे कुंड, तालाब, वन, बगीचे, नदी सुरक्षित करो।

 

Who Hijacked India’s Mindspace?

The smartphone has not merely replaced newspapers and television; it has transformed how Indians think, read, interact, and remember. Once, mornings began with newspapers and evenings united families around television screens, creating shared conversations and collective experiences. Today, billions of scrolling thumbs have replaced deep reading with instant consumption.

With over 800 million smartphone users, India’s attention economy now runs on reels, viral clips, and algorithm-driven outrage. Traditional newspapers struggle to survive, while television loses viewers to endless digital content. Algorithms feed users only what excites, angers, or entertains them, shrinking attention spans and weakening thoughtful reflection.

The result is a society flooded with information but starved of wisdom. Families sit together yet live in separate digital worlds. The smartphone has become the new emperor of attention, raising an unsettling question: are humans controlling screens, or are screens controlling humans?

Sunday, May 24, 2026

 गायब होता अख़बार, फीकी पड़ती टीवी की चमक और मुट्ठीभर स्क्रीन का साम्राज्य

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क्या स्मार्टफोन बन चुका है भारत की नई ‘ध्यान सत्ता’ का सम्राट?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

27 मई 2026

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एक जमाना था सुबह का अखबार पढ़े बिना लोग निच्चू नहीं हो पाते थे, शाम को हम लोग, या महाभारत देखे बगैर सो नहीं पाते थे। घंटों तक बच्चे टीवी जिसे इलेक्ट्रॉनिक निप्पल कहा जाता था, चिपके रहते थे। क्रिकेट मैच मोहल्लों को जोड़ देते थे। धारावाहिक घर-घर की बातचीत बन जाते थे। समाचार चैनल देश की राजनीतिक धड़कन तय करते थे। मीडिया सिर्फ सूचना का माध्यम नहीं था, वह सामाजिक संस्कृति का हिस्सा था।

और अब?

क्या आपने गौर किया है कि  घरों में अख़बार की सरसराहट कम सुनाई देती है और टीवी के सामने परिवारों की भीड़ भी पहले जैसी नहीं रही?

एक खामोश क्रांति हमारे सामने घट रही है। बिना शोर। बिना मातम। बिना किसी औपचारिक घोषणा के। भारत में पारंपरिक मीडिया, खासकर प्रिंट और टेलीविजन, धीरे-धीरे अपनी पकड़ खोते जा रहे हैं। उनकी जगह अब स्मार्टफोन ने ले ली है। वही छोटा-सा चमकता पर्दा, जिसने दुनिया को हथेली में समेट लिया है और इंसानी ध्यान को अपनी गिरफ्त में कर लिया है।

कम्युनिकेशन क्रांति के गुरु मार्शल मैकलुहान ने ठीक ही कहा था:  “मीडियम ही संदेश है।”

आज वह संदेश बदल चुका है।

तेज़। छोटा। उत्तेजक। और बेहद नशे की तरह असर करने वाला।

स्मार्टफोन ने केवल टीवी या अख़बार को चुनौती नहीं दी, उसने इंसानी व्यवहार ही बदल दिया।

आंकड़े कहानी साफ़ बताते हैं। भारत में टीवी दर्शकों की संख्या धीरे-धीरे घट रही है। करोड़ों लोग डीटीएच कनेक्शन छोड़ चुके हैं। विज्ञापन आय ठहर गई है। कभी मनोरंजन का बादशाह रहा टीवी उद्योग अब असुरक्षा के दौर से गुजर रहा है।

लेकिन असली चिंता टीवी नहीं, अख़बारों की गिरती हालत है।

प्रिंट पत्रकारिता, जो लोकतंत्र की रीढ़ मानी जाती थी, डिजिटल तूफान में हांफती नजर आ रही है। नई पीढ़ी अब खबरें अख़बार में नहीं, इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब शॉर्ट्स, व्हाट्सऐप फॉरवर्ड और एल्गोरिदम से चलने वाली सोशल मीडिया फीड्स में ढूंढती है। लंबी रिपोर्ट पढ़ने का धैर्य घटता जा रहा है। लोग अब खबर को “समझना” नहीं, “स्क्रॉल” करना चाहते हैं।

सुबह का अख़बार अब किसी दूसरे अख़बार से नहीं, बल्कि मोबाइल की लगातार बजती नोटिफिकेशनों से लड़ रहा है।

यह बदलाव केवल तकनीकी नहीं, सामाजिक भी है।

अख़बार पाठक को ठहरना सिखाते थे। सोचने का समय देते थे। अलग-अलग विचारों से परिचय कराते थे। संपादकीय, विश्लेषण और खोजी रिपोर्टें समाज को गहराई देती थीं। दूसरी ओर स्मार्टफोन की दुनिया तेज़ प्रतिक्रिया, सनसनी और तात्कालिक उत्तेजना पर चलती है। सूचना अब टूटी हुई कांच के टुकड़ों की तरह बिखरकर आती है। लोग सब कुछ जानते हुए भी बहुत कम समझ पा रहे हैं।

माध्यम बदला है, इसलिए संदेश भी बदल गया है।

आज भारत में 80 करोड़ से अधिक स्मार्टफोन उपयोगकर्ता हैं और यह संख्या लगातार बढ़ रही है। सस्ते इंटरनेट ने डिजिटल दुनिया को हर हाथ तक पहुंचा दिया। सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने मनोरंजन को पूरी तरह व्यक्तिगत बना दिया है। अब हर व्यक्ति अपनी अलग डिजिटल दुनिया में जी रहा है।

टीवी सामूहिक अनुभव था। स्मार्टफोन व्यक्तिगत कैदखाना बन गया।

पहले पूरा परिवार एक कार्यक्रम साथ देखता था। अब एक ही कमरे में बैठे चार लोग चार अलग-अलग स्क्रीन पर अलग-अलग दुनिया देख रहे होते हैं। साझा सामाजिक संवाद बिखर रहा है। राष्ट्रीय बहसें अब स्वतः नहीं बनतीं, उन्हें एल्गोरिदम गढ़ते हैं।

आज की सबसे बड़ी पूंजी है : इंसानी ध्यान।

विज्ञापन कंपनियों ने यह बदलाव सबसे पहले समझ लिया। बड़े ब्रांड अब टीवी से ज्यादा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर पैसा लगा रहे हैं, जहां हर क्लिक, हर स्क्रॉल और हर सेकंड का हिसाब मिलता है। डिजिटल विज्ञापन तेजी से बढ़ रहा है जबकि टीवी और प्रिंट की विज्ञापन आय सिकुड़ती जा रही है।

और अख़बार?

वे चुपचाप लहूलुहान हो रहे हैं।

कई शहरों में प्रसार घट रहा है। विज्ञापन ऑनलाइन चले गए हैं। न्यूजप्रिंट की लागत बढ़ती जा रही है। छोटे और क्षेत्रीय अख़बार अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। अनुभवी पत्रकारों को डर है कि समाज केवल एक उद्योग नहीं खो रहा, बल्कि पढ़ने और गहराई से सोचने की आदत भी खो रहा है।

विडंबना देखिए : सूचना बढ़ी है, लेकिन ध्यान घट गया है।

तीस सेकंड की रील अब हजार शब्दों के विश्लेषण पर भारी पड़ रही है। वायरल कंटेंट बनाने वाले कई बार स्थापित न्यूज़रूम से ज्यादा प्रभावशाली हो गए हैं। इस डिजिटल जंगल में विश्वसनीयता से ज्यादा दृश्यता मायने रखती है।

असल लड़ाई अब टीवी बनाम डिजिटल की नहीं रही।

यह लड़ाई है इंसानी ध्यान पर कब्जे की।

और फिलहाल यह जंग सबसे छोटी स्क्रीन जीत रही है।

मैकलुहान की बात आज पहले से ज्यादा सच लगती है। माध्यम केवल संदेश नहीं देता, वह समाज की सोच, व्यवहार और रिश्तों को भी आकार देता है। स्मार्टफोन ने अभिव्यक्ति को लोकतांत्रिक बनाया, लेकिन साथ ही ध्यान भंग, ध्रुवीकरण और मानसिक बेचैनी भी बढ़ाई।

उत्तर प्रदेश के किसी गांव का युवा अब रातोंरात वायरल स्टार बन सकता है। किसान लाखों लोगों तक अपनी बात पहुंचा सकता है। यह बदलाव क्रांतिकारी भी है और खतरनाक भी।

सवाल यह है कि क्या समाज बिना गहराई से पढ़े स्वस्थ लोकतंत्र बचा पाएगा?

क्या लोग केवल स्क्रॉल करते-करते सोचने की क्षमता खो देंगे?

पारंपरिक मीडिया अब चौराहे पर खड़ा है।

अख़बारों और टीवी चैनलों को पुराने ढांचे से बाहर निकलना होगा। डिजिटल पत्रकारिता, क्षेत्रीय भाषाओं की ताकत, मल्टीमीडिया स्टोरीटेलिंग और विश्वसनीय कंटेंट ही उनका भविष्य तय करेंगे।

लेकिन एक सच्चाई साफ़ दिख रही है।

मीडिया के अधिकार का युग समाप्त हो रहा है।

एल्गोरिदम के प्रभाव का युग शुरू हो चुका है।

परिवार अब भी एक ही छत के नीचे रहते हैं, लेकिन मानसिक रूप से अलग-अलग डिजिटल दुनियाओं में बंट चुके हैं। टीवी अब भी जलता है। अख़बार अब भी कुछ दरवाजों तक पहुंचते हैं। मगर समाज का केंद्र अब हथेली में चमकती उस छोटी स्क्रीन पर खिसक चुका है।

ध्यान का नया सम्राट अब स्मार्टफोन है।

और हर अंतहीन स्क्रॉल के साथ, पुरानी मीडिया दुनिया थोड़ा और धुंधली पड़ती जा रही है।

 छोटे परिवार, टूटते रिश्ते: क्या परिवार नियोजन ने भारत की संयुक्त परिवार व्यवस्था को कमजोर कर दिया है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

26 मई 2026

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मदर्स डे पर बेटे ने अपनी ही मां को गोली मार दी।

भाई खेत के टुकड़े के लिए एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए।

बुजुर्ग मां फ्लैट के एक कोने में पड़ी रही, जैसे घर का कोई बेकार सामान।

एक युवा प्रोफेशनल अकेलेपन से टूटकर आत्महत्या की कोशिश कर बैठा।

यह किसी अपराध फिल्म की पटकथा नहीं। यह बदलते भारत की भयावह सामाजिक तस्वीर है। वही भारत, जिसने कभी पूरे उत्साह से “हम दो, हमारे दो” का नारा अपनाया था।

देश ने जनसंख्या नियंत्रण में उल्लेखनीय सफलता हासिल की। लेकिन इस सफलता की छाया में रिश्तों की जमीन धीरे-धीरे बंजर होती चली गई। सदियों तक भारतीय समाज को सहारा देने वाली संयुक्त परिवार व्यवस्था अब तेजी से दरक रही है। और इस बदलाव के पीछे परिवार नियोजन कार्यक्रमों की सफलता भी एक महत्वपूर्ण, मगर कम चर्चित कारण बनकर उभरी है।

दशकों तक सरकारों ने छोटे परिवार को आदर्श बताया। तर्क भी मजबूत था; कम बच्चे होंगे तो गरीबी घटेगी, शिक्षा बेहतर होगी, स्वास्थ्य सुधरेगा और आर्थिक विकास तेज होगा। अभियान सफल रहा।

NFHS-5 (2019-21) के अनुसार भारत की कुल प्रजनन दर घटकर 2.0 रह गई है, जो प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से भी नीचे है। 1960 के दशक में यही दर लगभग 5.7 थी। शहरों में एक या दो बच्चों का चलन सामान्य हो चुका है। गांव भी उसी दिशा में बढ़ रहे हैं।

NFHS-5 डेटा बताता है कि देश में 58.2% घरेलू इकाइयां अब न्यूक्लियर फैमिली हैं। औसत परिवार का आकार 1999 के 5.2 से घटकर 2021 में 4.4 रह गया है।

लेकिन हर सफलता की एक सामाजिक कीमत होती है। भारत अब वही कीमत चुका रहा है।

हाल की घटनाएं इस संकट का दर्दनाक चेहरा दिखाती हैं।

उत्तर प्रदेश में पुश्तैनी जमीन के विवाद में एक किसान ने अपनी मां और छोटे भाई की हत्या कर दी।

मध्य प्रदेश में सात एकड़ खेत के बंटवारे को लेकर भाइयों की लड़ाई खून-खराबे में बदल गई।

दिल्ली में पढ़ा-लिखा दंपती तलाक, दहेज और बच्चे की कस्टडी के मुकदमों में वर्षों से उलझा है।

हरियाणा में दहेज के लिए नई बहू को प्रताड़ित किया गया, क्योंकि छोटे परिवार में रोकने-टोकने वाला कोई बुजुर्ग नहीं था।

बेंगलुरु में बुजुर्ग मां बेटे के फ्लैट में उपेक्षा की शिकार हुई।

पंजाब में दो भाई दस वर्षों से अदालतों के चक्कर काट रहे हैं।

चेन्नई में एक युवक पारिवारिक अलगाव और अकेलेपन से टूटकर आत्महत्या का प्रयास कर बैठा।

ये सिर्फ घटनाएं नहीं हैं। ये बदलते भारत का सामाजिक एक्स-रे हैं।

संयुक्त परिवार कभी आदर्श व्यवस्था नहीं था। उसमें पितृसत्ता भी थी, दबाव भी थे, झगड़े भी होते थे। लेकिन उसके भीतर एक सुरक्षा कवच भी मौजूद था। दादा-दादी बच्चों को संभालते थे। चाचा-ताऊ संकट में साथ खड़े रहते थे। विधवाओं को सहारा मिलता था। घर के बड़े विवाद सुलझा देते थे। अकेलापन इतना गहरा नहीं होता था कि जानलेवा बन जाए।

आज वही ढांचा बिखर रहा है।

शहरीकरण, पलायन, बढ़ती महत्वाकांक्षाएं, उपभोक्तावाद और महिलाओं की शिक्षा-आर्थिक स्वतंत्रता ने इस प्रक्रिया को तेज किया। लेकिन परिवार नियोजन ने रिश्तों की पूरी गणित बदल दी।

पहले बड़े परिवारों में जिम्मेदारियां बंट जाती थीं। चार भाई खेत संभालते थे। कई बच्चे बुजुर्ग माता-पिता का सहारा बनते थे। चचेरे भाई-बहन भी सगे रिश्तों की तरह साथ पलते थे। परिवार सिर्फ खून का रिश्ता नहीं, सामाजिक बीमा भी था।

अब कई घरों में सिर्फ एक या दो बच्चे हैं। ऐसे में विवाद पैदा हो तो बीच-बचाव कौन करे?

एक तलाक पूरे व्यक्ति को अकेला कर देता है।

एक बेटा जिम्मेदारी छोड़ दे तो बुजुर्ग माता-पिता बेसहारा हो जाते हैं।

दो भाइयों का झगड़ा सीधे हत्या तक पहुंच जाता है।

छोटे परिवारों ने संपत्ति विवाद भी अधिक तीखे बना दिए हैं। खेती की जमीन छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटती गई। शहरों में मकान सोने की खान बन गए। जहां वारिस कम हों, वहां लालच और टकराव ज्यादा विस्फोटक हो जाते हैं। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स भी बताती हैं कि भारत में जमीन और संपत्ति विवाद हिंसक अपराधों का बड़ा कारण बनते जा रहे हैं।

UN Global Study on Homicide जैसे रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत में संपत्ति-जमीन विवाद हत्याओं का बड़ा कारण हैं।

आज अदालतें पारिवारिक मुकदमों से भरी पड़ी हैं। तलाक, गुजारा भत्ता, घरेलू हिंसा, संपत्ति विवाद और बुजुर्ग उपेक्षा के मामले न्याय तंत्र पर भारी पड़ रहे हैं। केरल जैसे राज्यों में रोज औसतन 75 तलाक के मामले दर्ज होते हैं। पुलिस थाने अब आधे पारिवारिक पंचायत बन चुके हैं।

आज अदालतें पारिवारिक मुकदमों से भरी पड़ी हैं। तलाक, गुजारा भत्ता, घरेलू हिंसा, संपत्ति विवाद और बुजुर्ग उपेक्षा के मामलों ने न्याय व्यवस्था पर भारी दबाव डाल दिया है। पुलिस थाने धीरे-धीरे पारिवारिक पंचायतों में बदलते जा रहे हैं।

लेकिन सबसे बड़ा संकट मानसिक है।

अकेलापन बढ़ रहा है। अवसाद बढ़ रहा है। बुजुर्ग भावनात्मक उपेक्षा झेल रहे हैं। न्यूक्लियर फैमिली कई बार छोटे द्वीपों जैसी बन गई है। एक रिश्ता टूटा नहीं कि पूरा भावनात्मक ढांचा ढह जाता है।

भारत की पारंपरिक सामाजिक समझ कहती थी कि इंसान अकेले नहीं, साथ रहकर बचता है। आधुनिक जीवन ने व्यक्ति को केंद्र में रख दिया और समुदाय को धीरे-धीरे पीछे धकेल दिया।

यह भी सच है कि परिवार नियोजन ने भारत को जनसंख्या विस्फोट से बचाया। मातृ स्वास्थ्य सुधरा। शिक्षा के अवसर बढ़े। गरीबी पर कुछ नियंत्रण हुआ। इन उपलब्धियों को नकारा नहीं जा सकता। लेकिन नीति निर्माताओं ने शायद इसके सामाजिक और मनोवैज्ञानिक दुष्प्रभावों का पूरा आकलन नहीं किया।

पश्चिमी देशों ने संयुक्त परिवार छोड़े तो बदले में मजबूत सामाजिक सुरक्षा, बुजुर्ग देखभाल और काउंसलिंग सिस्टम विकसित किए। भारत ने पुरानी व्यवस्था को कमजोर तो कर दिया, मगर नई सुरक्षा दीवारें समय पर खड़ी नहीं कर पाया।

नतीजा सामने है: 

छोटे घर।

छोटे परिवार।

छोटे रिश्ते।

और बड़ा अकेलापन।

अब चुनौती परिवार नियोजन को उलटने की नहीं है। असली चुनौती टूटते सामाजिक ताने-बाने को फिर से जोड़ने की है। भारत को पारिवारिक मध्यस्थता तंत्र, बुजुर्ग देखभाल योजनाएं, मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं और सामुदायिक सहयोग मॉडल मजबूत करने होंगे। स्कूलों और समाज को भी रिश्तों की सामूहिक जिम्मेदारी का महत्व फिर सिखाना होगा।

वरना आने वाले समय में भारत के पास मकान तो होंगे, मगर घर नहीं बचेंगे।


Saturday, May 23, 2026

 चौराहे पर खड़ी कांग्रेस: राहुल गांधी नेतृत्व कर रहे हैं या पार्टी को गर्त में धकेल रहे हैं?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

25 मई 2026

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कांग्रेस की राजनीति आज जंगल में भटकते कारवां जैसी लगती है। रास्ता भी धुंधला। रहबर भी असमंजस में।

राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी बार-बार ऐसी राजनीतिक “कौवा-भोज” करती दिखती है, जहां हर अधूरा बयान, हर जल्दबाजी और हर कमजोर रणनीति उसकी साख को थोड़ा और खोखला कर देती है। 

देश मजबूत विपक्ष चाहता है, मगर कांग्रेस अक्सर घायल मुसाफिर जैसी नजर आती है, जो मंजिल से ज्यादा बहानों की तलाश में है।

सबसे बड़ा संकट नेतृत्व का नहीं, भरोसे का है। कांग्रेस के पास अब वैसी दमदार, ईमानदार और ज़मीनी क्षेत्रीय फौज नहीं बची, जो अपने बूते जनाधार खड़ा कर सके। पुराने चेहरे थक चुके हैं। नए चेहरों को उभरने नहीं दिया जाता। अंदरूनी लोकतंत्र बंद कमरे में कैद है। परिवारवाद की धूल इतनी मोटी जम चुकी है कि प्रतिभा की पौध धूप तक नहीं देख पाती।

कांग्रेस की मौजूदा राजनीति भी अजीब प्रतीक्षा में फंसी दिखती है। कभी उम्मीद कि सरकार किसी संकट में फंस जाए। कभी आस कि महंगाई जनता को भड़का दे। कभी भरोसा कि विदेश नीति की उलझनें सत्ता को कमजोर कर देंगी। लेकिन राजनीति केवल विरोध का खेल नहीं है। जनता विकल्प चाहती है। विजन चाहती है। भरोसा चाहती है।

राजनीति के जानकार कहते हैं कि राहुल गांधी के आक्रामक बयान सुर्खियां जरूर बटोरते हैं, लेकिन बिना मजबूत संगठन, बिना बूथ नेटवर्क और बिना स्पष्ट आर्थिक सोच के वे हवा में छोड़े गए तीर लगते हैं। कांग्रेस आज तक तय नहीं कर पाई कि वह गरीबों की पार्टी है, उदार बाजार की समर्थक है या सिर्फ भाजपा विरोध का मंच।

अगर पार्टी ने जल्द नेतृत्व संस्कृति नहीं बदली, साफ छवि वाले युवा नेताओं को आगे नहीं लाया और नई आर्थिक तथा संघीय सोच पेश नहीं की, तो उसका राष्ट्रीय आधार और सिकुड़ जाएगा। कुछ राज्यों में छिटपुट जीत मिल सकती है, मगर राष्ट्रीय राजनीति में उसकी जगह क्षेत्रीय दल तेजी से भर देंगे।

साल 2026 आते-आते खतरे की घंटियां अब धीमे नहीं बज रहीं। वे किसी जलती इमारत के फायर अलार्म की तरह चीख रही हैं। जिस पार्टी ने दशकों तक भारतीय राजनीति पर राज किया, वही आज थके हुए हाथी जैसी दिखती है, जो चढ़ाई पर हांफ रही है, जबकि उसके प्रतिद्वंद्वी तेज रफ्तार घोड़ों की तरह आगे निकल चुके हैं।

पश्चिम बंगाल चुनावों ने कांग्रेस की हालत को और बेरहमी से उजागर कर दिया। भाजपा ने मजबूत प्रदर्शन किया, जबकि कांग्रेस तस्वीर से लगभग गायब रही। कभी कांग्रेस भारतीय राजनीति का बरगद थी। आज कई राज्यों में वह धूल खाए पुराने साइनबोर्ड जैसी लगती है, जिसे लोग देखते तो हैं, मगर पढ़ते नहीं।

कांग्रेस के सामने फिलहाल चार रास्ते दिखाई देते हैं।

पहला रास्ता है धीरे-धीरे क्षेत्रीय अप्रासंगिकता की ओर फिसलना। पार्टी खत्म नहीं होगी, मगर लगातार सिमटती जाएगी। कर्नाटक, हिमाचल, तेलंगाना या केरल जैसे कुछ जेबनुमा इलाकों तक सीमित रह सकती है। बाकी राज्यों में उसे क्षेत्रीय दलों की बैसाखियों पर चलना पड़ेगा। उत्तर प्रदेश, बंगाल, ओडिशा और दिल्ली में कांग्रेस पहले ही दर्शक दीर्घा की पार्टी बनती जा रही है।

दूसरा रास्ता पुनर्निर्माण का है। कठिन, मगर संभव। इसके लिए गांधी परिवार को रोजमर्रा की पकड़ ढीली करनी होगी। पार्टी में वास्तविक लोकतंत्र लाना होगा। राज्यों के नेताओं को ताकत देनी होगी। गैर वंशवादी युवा चेहरों को आगे बढ़ाना होगा। सबसे महत्वपूर्ण, कांग्रेस को अपनी वैचारिक पहचान साफ करनी होगी। फिलहाल उसका संदेश कभी इधर, कभी उधर झूलते पुराने रेडियो जैसा लगता है।

भाजपा ने हिंदू पहचान और कल्याणकारी राष्ट्रवाद को एक साथ जोड़ दिया है। कांग्रेस उसके मुकाबले कोई भावनात्मक और विश्वसनीय कथा खड़ी नहीं कर पाई। केवल सेक्युलरिज्म अब चुनावी जादू नहीं पैदा करता। केवल कल्याणकारी वादे भी काफी नहीं। आज का मतदाता पहचान, राष्ट्रवाद, विकास और आकांक्षा सब कुछ एक ही पैकेज में चाहता है।

तीसरा रास्ता सबसे खतरनाक है : आंतरिक टूट और बिखराव। इतिहास इसके संकेत पहले ही दे चुका है। तृणमूल कांग्रेस और एनसीपी जैसी पार्टियां कांग्रेस से टूटकर निकलीं। राज्यों में कई नेताओं को लगता है कि दिल्ली का हाईकमान उनकी राजनीतिक सांसें रोक रहा है। जब योग्यता से ज्यादा वफादारी मायने रखने लगे, तो असंतोष धीरे-धीरे विस्फोट बन जाता है।

अगर हार का सिलसिला जारी रहा, तो और नेता भाजपा या क्षेत्रीय दलों की ओर जा सकते हैं। राजनीति डूबते जहाज पर ज्यादा देर खड़े रहने का खेल नहीं है। कार्यकर्ता सत्ता की तरफ भागते हैं। नेता अवसर की तरफ। विचारधारा अक्सर बाद में प्रेस कॉन्फ्रेंस में आती है।

चौथा रास्ता है लंबी मगर फीकी राजनीतिक जिंदगी। इस स्थिति में कांग्रेस खत्म नहीं होगी, मगर दोबारा शिखर पर भी नहीं पहुंचेगी। वह विपक्षी गठबंधनों की धुरी बनी रहेगी। संसद में इतनी सीटें लाती रहेगी कि उसकी उपयोगिता बनी रहे। कुछ राज्यों में सरकारें भी बना सकती है। कभी-कभी गठबंधन राजनीति में किंगमेकर भी बन सकती है। शायद यही सबसे यथार्थवादी संभावना है। लेकिन केवल जीवित रहना किसी राजनीतिक आंदोलन को प्रेरित नहीं करता।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं: "आज कांग्रेस उस पुराने थिएटर समूह जैसी लगती है, जो अब भी पुराने नाटक खेल रहा है, जबकि दर्शक डिजिटल मंचों पर जा चुके हैं। युवा मतदाता कांग्रेस को उसके वर्तमान कामों से कम, सोशल मीडिया के मजाक, पुराने घोटालों और वंशवाद की बहसों से ज्यादा पहचानते हैं। यह बेहद खतरनाक संकेत है।"

फिर भी कांग्रेस को पूरी तरह खत्म मान लेना जल्दबाजी होगी। भारतीय राजनीति में कई बार मृत घोषित खिलाड़ी वापसी कर चुके हैं। लेकिन वापसी विरासत के सहारे नहीं होती। वापसी भूख, अनुशासन, विनम्रता और पुनर्निर्माण से होती है, दक्षिण भारत की राजनीति के विश्लेषक वेंकट सुब्रमनियन ने कहा।

आखिरकार कांग्रेस की सबसे बड़ी लड़ाई चुनावी नहीं, मानसिक है। क्या पार्टी अब भी खुद को भारत का नेतृत्व करने योग्य मानती है? या उसने भीतर ही भीतर स्थायी विपक्ष बनने को स्वीकार कर लिया है?

सच में, जिस राजनीतिक दल के भीतर विश्वास ही खत्म हो जाए, वह बिना हवा की पतंग बन जाता है। कुछ देर आसमान में जरूर दिखता है, मगर अंत में गुरुत्वाकर्षण ही जीतता है।

Friday, May 22, 2026

 डिग्रियों का ढेर, ज्ञान का अकाल: भारत के क्लासरूम में आखिर हो क्या रहा है?

रिपोर्ट कार्ड चमक रहे हैं, शिक्षा दम तोड़ रही है

जब शिक्षक ही तैयार नहीं, तो बच्चे क्या सीखेंगे?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

24 मई 2026

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एक पुराना किस्सा आज भी भारतीय शिक्षा व्यवस्था का आईना लगता है।

स्कूल इंस्पेक्टर अचानक क्लास में पहुंचा। मास्टरजी बच्चों को स्पेलिंग पढ़ा रहे थे :  “Girl बोलो… ग्रिल्ड।” इंस्पेक्टर भड़क गया, “ये क्या पढ़ा रहे हो?”

मास्टरजी ने भी तल्ख़ी से जवाब दिया, “तीन महीने से तनख्वाह नहीं मिली। जब तक वेतन नहीं मिलेगा, गर्ल को ग्रिल्ड ही पढ़ाऊंगा।”

यह सिर्फ मज़ाक नहीं। यह उस टूटती हुई व्यवस्था की कहानी है, जहां शिक्षक भी हताश है और छात्र भी भटक रहा है।

एक अंग्रेज़ी शिक्षक खुद ढंग से अंग्रेज़ी नहीं बोल पाता, लेकिन बच्चों को ग्रामर पढ़ा रहा है।

मई की तपती दोपहर में साठ बच्चों की क्लास में पंखा बंद पड़ा है। बच्चे कॉपियों से हवा कर रहे हैं।

बी.एड. में टॉप करने वाला नया शिक्षक पहली ही क्लास में शोर मचाते बच्चों के सामने घबरा जाता है।

मां-बाप शादी में गुरुजनों के पैर छूते हैं, लेकिन स्कूल में टीचर की सैलरी पर ऐसे मोलभाव करते हैं जैसे सब्ज़ी खरीद रहे हों।

यही है आज की भारतीय शिक्षा व्यवस्था का कड़वा विरोधाभास।

जिस देश में सरस्वती की पूजा होती है, वहीं शिक्षक धीरे-धीरे हाशिये पर धकेला जा रहा है।

डिग्रियां बढ़ रही हैं। कोचिंग सेंटर हर गली में उग रहे हैं। चमचमाते स्कूलों के विज्ञापन आसमान छू रहे हैं। लेकिन असली शिक्षा जेठ की धूप में सूखते तालाब की तरह सिकुड़ती जा रही है।

कभी भारत में शिक्षक सिर्फ नौकरीपेशा कर्मचारी नहीं था। गांव का “मास्टरजी” समाज का नैतिक स्तंभ माना जाता था। बच्चे उनसे डरते भी थे और सम्मान भी करते थे। मां-बाप अपने बच्चों की पढ़ाई ही नहीं, संस्कार भी शिक्षक के भरोसे छोड़ देते थे।

आज वह सम्मान चॉक की धूल की तरह हवा में उड़ रहा है।

भारत एक गहरे शैक्षणिक संकट से गुजर रहा है। कमजोर शिक्षक प्रशिक्षण, रटंत शिक्षा, गिरता स्तर, घटती सामाजिक प्रतिष्ठा और प्रेरणाहीन कक्षाओं ने शिक्षण पेशे को भीतर से खोखला कर दिया है। यह अब सिर्फ शिक्षा विभाग की समस्या नहीं रही। यह देश के भविष्य का संकट बन चुकी है।

सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि देश में लाखों शिक्षक भारी-भरकम डिग्रियां लेकर घूम रहे हैं : बी.एड., एम.एड., डिप्लोमा, सर्टिफिकेट , लेकिन उनमें से कई के पास न विषय की गहराई है, न पढ़ाने की कला, न आत्मविश्वास, न संवाद क्षमता।

डिग्रियां दीवार पर टंगी रहती हैं, लेकिन क्लासरूम में शिक्षक असहाय दिखता है।

सिर्फ डिग्री हासिल कर लेना किसी को अच्छा शिक्षक नहीं बना देता। मगर हमारी व्यवस्था इसी भ्रम में जी रही है।

सरकारी स्कूलों की हालत कई जगह बेहद चिंताजनक है। अंग्रेज़ी पढ़ाने वाले कई शिक्षक खुद धाराप्रवाह अंग्रेज़ी नहीं बोल पाते। उच्चारण कमजोर है। शब्दावली सीमित है। साहित्य पढ़ने की आदत लगभग खत्म हो चुकी है।

बच्चे तोते की तरह उत्तर रट लेते हैं, लेकिन सामान्य सवालों पर चुप हो जाते हैं।

उत्तर प्रदेश के एक ग्रामीण स्कूल का निरीक्षण करने गए एक रिटायर्ड अफसर ने बताया कि वहां का अंग्रेज़ी शिक्षक खुद सामान्य बातचीत तक नहीं कर पा रहा था। बच्चे पूरे पैराग्राफ याद करके सुना रहे थे, लेकिन अपने दम पर दो वाक्य नहीं बना पा रहे थे।

यह शिक्षा नहीं। यह रटी हुई नकल का कारखाना है।

समस्या सिर्फ सरकारी स्कूलों तक सीमित नहीं। बड़े-बड़े “इंटरनेशनल” और “स्मार्ट” स्कूल भी कई बार चमकदार पैकेजिंग भर साबित होते हैं। वहां कम वेतन पाने वाले, अनुभवहीन और असुरक्षित शिक्षक काम कर रहे हैं। कई शिक्षकों की तनख्वाह मॉल कर्मचारियों या डिलीवरी बॉय से भी कम है।

जिस पेशे में सम्मान और आर्थिक सुरक्षा दोनों न हों, वहां प्रतिभाशाली लोग क्यों आएंगे?

कभी शिक्षक बनना गर्व की बात थी। आज कई लोग मजबूरी में इस पेशे में आते हैं, क्योंकि दूसरी नौकरी नहीं मिली।

सबसे गहरी बीमारी हमारी शिक्षण पद्धति में है।

भारतीय शिक्षा व्यवस्था में आज भी जिज्ञासा को अनुशासनहीनता समझ लिया जाता है। रचनात्मकता परीक्षा के ढांचे में फिट नहीं बैठती।

शिक्षक बोलता रहता है। छात्र कॉपी करते रहते हैं। परीक्षा याददाश्त को मापती है, समझ को नहीं।

नतीजा यह है कि बच्चे डिग्रियां तो ले आते हैं, लेकिन आत्मविश्वास, संवाद क्षमता और स्वतंत्र सोच विकसित नहीं हो पाती। कई पढ़े-लिखे युवा ठीक से ईमेल नहीं लिख पाते, इंटरव्यू में बात नहीं कर पाते और व्यावहारिक समस्याओं का हल नहीं ढूंढ पाते।

त्रासदी की शुरुआत तो शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों से ही हो जाती है।

बी.एड. कॉलेजों में आज भी फाइलें भरने और सैद्धांतिक बातें रटाने पर ज़ोर है। वास्तविक क्लासरूम की चुनौतियों पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है।

दिल्ली की एक प्रशिक्षु शिक्षिका ने कहा, “बी.एड. ने मुझे लेसन प्लान बनाना सिखाया, लेकिन कमजोर बच्चे को पढ़ाना या शोरगुल वाली क्लास संभालना नहीं सिखाया।”

यही एक वाक्य पूरे संकट की तस्वीर पेश कर देता है।

इंटर्नशिप कई जगह सिर्फ औपचारिकता बन चुकी है। अनुभवी शिक्षकों से मार्गदर्शन कमजोर है। नए शिक्षक बिना तैयारी के क्लास में पहुंच जाते हैं।

उधर स्कूलों का बुनियादी ढांचा भी हालात बिगाड़ रहा है। भीड़भाड़ वाली कक्षाएं। टूटी बेंचें। खाली लाइब्रेरियां। इंटरनेट की कमी। शिक्षकों की भारी कमी। एक ही शिक्षक कई क्लासें संभाल रहा है।

ऐसे माहौल में व्यक्तिगत शिक्षा संभव ही नहीं।

सामाजिक बदलावों ने भी स्थिति को उलझाया है।

पश्चिमी सोच की नकल करते हुए हमने कई जगह शिक्षक और छात्र के रिश्ते में अनुशासन का महत्व ही कम कर दिया। “टीचर सिर्फ दोस्त हो” वाली सोच ने सम्मान और जवाबदेही दोनों को कमजोर किया है।

कई शिक्षक निजी बातचीत में मानते हैं कि आज छात्रों में शिक्षकों और यहां तक कि माता-पिता के प्रति भी सम्मान घटता जा रहा है। मोबाइल की लत, घटती पढ़ने की आदत और सिकुड़ती ध्यान क्षमता ने समस्या और बढ़ा दी है।

गांव का वह सख्त लेकिन समर्पित “मास्टरजी” अब धीरे-धीरे सार्वजनिक जीवन से गायब हो रहा है।

और जब शिक्षक का अधिकार कमजोर पड़ता है, तो क्लासरूम दिशा खो देता है।

समाधान मुश्किल नहीं, लेकिन राजनीतिक भाषणों से नहीं आएंगे।

शिक्षक प्रशिक्षण को फाइलों और औपचारिक भाषणों से निकालकर वास्तविक क्लासरूम से जोड़ना होगा। लंबी इंटर्नशिप, अनुभवी शिक्षकों की मेंटरशिप, नियमित प्रशिक्षण और व्यावहारिक अभ्यास जरूरी हैं।

भर्ती में सिर्फ परीक्षा अंक नहीं, बल्कि संवाद क्षमता, विषय ज्ञान, भावनात्मक समझ और पढ़ाने की प्रतिभा को महत्व देना होगा।

शिक्षकों को बेहतर वेतन, सामाजिक सम्मान और स्पष्ट करियर रास्ते देने होंगे। स्कूलों में लाइब्रेरी, डिजिटल सुविधाएं और बेहतर शिक्षण संसाधन उपलब्ध कराने होंगे।

सबसे जरूरी बात यह है कि भारत को शिक्षा को सिर्फ आंकड़ों और योजनाओं का खेल समझना बंद करना होगा। शिक्षा आखिरकार इंसानों द्वारा इंसानों को गढ़ने की प्रक्रिया है।

कोई भी देश अपने शिक्षकों की गुणवत्ता से ऊपर नहीं उठ सकता।

अगर भारत ने अपने शिक्षक, अपनी शिक्षण पद्धति और अपने क्लासरूम को बचाने की गंभीर कोशिश नहीं की, तो “शिक्षा महाशक्ति” बनने का सपना सरकारी फाइलों और भाषणों तक ही सीमित रह जाएगा, जबकि देश की असली कक्षाएं चुपचाप टूटती रहेंगी।

 चौंकाने वाला सच!!!

भारत के असली निर्माता चमचमाते एलीट स्कूल नहीं, साधारण स्कूल हैं

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बृज खंडेलवाल द्वारा

23 मई 2026

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आगरा में ही आधा दर्जन एलीट एक्सक्लूसिव स्कूल्स खुल चुके हैं जहां का खर्चा मां बाप से पूछिए

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आख़िर इंसान को कामयाब क्या बनाता है?

एयर कंडीशन्ड स्मार्ट क्लासरूम, विदेशी सिलेबस और चमकदार कैंपस?

या फिर संघर्ष, मेहनत, भूख और आगे बढ़ने का जुनून?

आज भारत में एक अजीब मानसिकता घर कर गई है। महंगे, हाई प्रोफाइल और “इंटरनेशनल” स्कूलों को सफलता की गारंटी माना जाने लगा है। लाखों रुपये फीस। अंग्रेज़ी लहजे पर गर्व। स्कूल कम, फाइव स्टार होटल ज़्यादा लगते हैं। माता-पिता भी अक्सर स्कूल नहीं, “स्टेटस सिंबल” खरीदते दिखाई देते हैं।

लेकिन भारत का इतिहास कुछ और कहानी सुनाता है।

आज़ाद भारत के असली निर्माता : प्रधानमंत्री, वैज्ञानिक, सैनिक, डॉक्टर, अफसर, उद्योगपति और खिलाड़ी , ज़्यादातर साधारण सरकारी स्कूलों, केन्द्रीय विद्यालयों, नगर निगम स्कूलों और सामान्य प्राइवेट स्कूलों से निकले हैं। देश की रीढ़ एलीट बोर्डिंग स्कूलों ने नहीं, आम स्कूलों ने तैयार की है।

गुजरात के वडनगर में एक साधारण स्कूल में पढ़ने वाला एक लड़का आगे चलकर भारत का प्रधानमंत्री बना। उसका नाम था नरेंद्र मोदी। न कोई स्मार्ट क्लास। न आलीशान कैंपस। न विदेशी सिलेबस।

ऐसी कहानियां पूरे भारत में बिखरी पड़ी हैं।

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने तमिलनाडु के साधारण स्कूल में पढ़ाई की। लाल बहादुर शास्त्री सामान्य स्कूलों से निकलकर देश के प्रधानमंत्री बने। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और रामनाथ कोविंद भी सरकारी और स्थानीय शिक्षा व्यवस्था से आगे बढ़े।

इन लोगों को विरासत में सुविधाएं नहीं मिलीं। इन्होंने भारत को करीब से देखा। गरीबी देखी। संघर्ष देखा। असमानता देखी। इन्हीं अनुभवों ने इन्हें मजबूत बनाया। इन्हें जमीन से जोड़े रखा।

बड़े एलीट स्कूलों से पढ़े लोग भी सफल होते हैं। उनमें आत्मविश्वास, नेटवर्क और एक्सपोजर होता है। लेकिन जब देश निर्माण की बात आती है, तब तस्वीर बदल जाती है।

कारोबारी दुनिया को ही देख लीजिए।

धीरूभाई अंबानी ने गुजरात के एक साधारण स्कूल से पढ़ाई की और फिर रिलायंस जैसा साम्राज्य खड़ा किया। इन्फोसिस के नारायण मूर्ति सरकारी स्कूलों में पढ़े। गौतम अडानी, शिव नाडर और सुनील मित्तल भी किसी शाही बोर्डिंग स्कूल की पैदाइश नहीं थे।

इन लोगों ने संघर्ष से सीख हासिल की। अभाव ने इन्हें जुगाड़, धैर्य और जोखिम उठाना सिखाया। यही असली बिजनेस स्कूल था।

भारतीय सेना की कहानी भी यही कहती है।

कारगिल के हीरो कैप्टन विक्रम बत्रा साधारण स्कूलों में पढ़े। फील्ड मार्शल करियप्पा सामान्य शिक्षा पृष्ठभूमि से आए। आज भी भारत की सीमाओं पर खड़े हजारों सैनिक और अफसर सरकारी स्कूलों, सैनिक स्कूलों और केन्द्रीय विद्यालयों से निकलते हैं।

जंग के मैदान में गोली यह नहीं पूछती कि सैनिक किस “इंटरनेशनल स्कूल” से पढ़ा है।

सेना में साहस, अनुशासन और प्रदर्शन मायने रखता है।

UPSC की परीक्षा तो इस मिथक को पूरी तरह तोड़ देती है।

हर साल IAS, IPS और IFS के टॉपर छोटे शहरों, गांवों, केन्द्रीय विद्यालयों, नवोदय विद्यालयों और सामान्य स्कूलों से निकलते हैं। कई हिंदी माध्यम से पढ़े होते हैं। कई बेहद साधारण परिवारों से आते हैं।

उनकी सफलता साबित करती है कि भारत में अब भी मेहनत, लगन और अनुशासन स्कूल के ब्रांड नाम से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।

डॉक्टरों और वैज्ञानिकों की दुनिया में भी यही तस्वीर दिखती है।

AIIMS के कई डॉक्टर, वैज्ञानिक और सर्जन साधारण स्कूलों से आए हैं। NEET के टॉपर भी अक्सर सरकारी या सामान्य स्कूलों से निकलते हैं। उनकी सफलता महंगे कैंपस नहीं, घंटों की पढ़ाई और अथक मेहनत से बनती है।

खेल जगत को देखिए।

सचिन तेंदुलकर शारदाश्रम विद्यालय से पढ़े। महेंद्र सिंह धोनी जवाहर विद्या मंदिर से निकले। पी.टी. ऊषा ने सरकारी स्कूल में पढ़ाई की। इनकी प्रतिभा एयर कंडीशनर में नहीं, संघर्ष में निखरी।

फिर भी समाज महंगे स्कूलों का इतना दीवाना क्यों है?

क्योंकि हमारे भीतर अब भी औपनिवेशिक मानसिकता जिंदा है। अंग्रेज़ी बोलने, चमकदार यूनिफॉर्म पहनने और महंगे स्कूल में पढ़ने को लोग श्रेष्ठता समझते हैं।

आज स्कूल शिक्षा का मंदिर कम, सामाजिक दिखावे का मंच ज्यादा बन गए हैं।

लेकिन शिक्षा फैशन शो नहीं है।

बच्चे की सफलता इस बात पर ज्यादा निर्भर करती है कि उसमें अनुशासन कितना है, मेहनत कितनी है, जिज्ञासा कितनी है, और परिवार व शिक्षक उसे कितनी सही दिशा देते हैं।

साधारण स्कूल एक और बड़ी चीज़ सिखाते हैं , जीवन से लड़ना।

वहां पढ़ने वाले बच्चे अक्सर बिजली कटौती में पढ़ते हैं। भीड़भाड़ वाली बसों में सफर करते हैं। किताबें बांटकर पढ़ते हैं। सीमित संसाधनों में सपने देखते हैं। यही संघर्ष उन्हें मानसिक रूप से मजबूत बनाता है।

यही कारण है कि मुख्यधारा के स्कूल भारत की असली ताकत हैं।

वे करोड़ों बच्चों को सपने देखने का अधिकार देते हैं। वे पहली पीढ़ी के अफसर, इंजीनियर, डॉक्टर और उद्यमी पैदा करते हैं। वे अवसरों की सीढ़ी को खुला रखते हैं।

भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था भी बराबरी का मौका देती है। IIT, AIIMS, NDA और UPSC जैसी परीक्षाएं गांव के बच्चे को भी राष्ट्रीय स्तर पर मुकाबला करने का अवसर देती हैं।

यही भारत की असली खूबसूरती है।

इसका मतलब यह नहीं कि सरकारी स्कूलों में समस्याएं नहीं हैं। वहां शिक्षक की कमी है। बुनियादी सुविधाओं की दिक्कत है। पुरानी पढ़ाई पद्धति है। इन कमियों को दूर करना बेहद जरूरी है।

लेकिन समाधान यह नहीं कि सिर्फ कुछ चमकदार एलीट स्कूल बना दिए जाएं।

समाधान यह है कि हर बच्चे को अच्छी शिक्षा मिले।

जब ओडिशा के किसी गांव का स्कूल अगला कलाम पैदा करता है, जब हिमाचल का साधारण स्कूल अगला विक्रम बत्रा देता है, तब भारत जीतता है।

आधुनिक भारत की कहानी एलीट स्कूलों की नहीं, साधारण स्कूलों की कहानी है।

यहीं भारत की असली प्रतिभा तैयार होती है।

यहीं से देश के असली निर्माता निकलते हैं।