Tuesday, June 16, 2026

 क्या 1947 का विभाजन एक सही निर्णय था? 

___________________________

एक दर्दनाक फैसले ने भारत की सभ्यतागत धारा को बचाए रखा

_______________________

बृज खंडेलवाल द्वारा

17 जून 2026

___________________________

1947 का विभाजन भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा ज़ख्म है। लाखों लोग बेघर हुए। अनगिनत परिवार बिछड़ गए। नफ़रत की आग में पूरा उपमहाद्वीप झुलस गया। आज भी उस दौर की कहानियाँ सुनकर रूह काँप उठती है।

लेकिन इतिहास केवल आँसुओं से नहीं लिखा जाता। कभी-कभी मुल्कों को दिल नहीं, दिमाग से फैसले लेने पड़ते हैं। कई बार हालात ऐसे बन जाते हैं कि चुनना अच्छे और बुरे के बीच नहीं, बल्कि बुरे और उससे भी बुरे के बीच पड़ता है।

1947 का विभाजन ऐसा ही फैसला था।

आज, लगभग अस्सी साल बाद, यह सवाल फिर उठता है कि अगर भारत अखंड रहता, तो क्या वह एक स्थिर और मजबूत राष्ट्र बन पाता? क्या वह अपनी सांस्कृतिक पहचान और सभ्यतागत विरासत को सुरक्षित रख पाता? या फिर वह लगातार सांप्रदायिक टकराव, राजनीतिक खींचतान और संवैधानिक गतिरोध में उलझा रहता?

सच यह है कि विभाजन किसी जश्न का नतीजा नहीं था। यह राजनीतिक हक़ीक़त को स्वीकार करने का फैसला था।

जून 1947 में कांग्रेस ने माउंटबेटन योजना को मंजूरी दी। तब तक हालात हाथ से निकल चुके थे। मुस्लिम लीग अलग देश की मांग पर अड़ी थी। उसने बार-बार साफ कर दिया था कि हिंदू और मुसलमान दो अलग राजनीतिक क़ौमें हैं।

साझा सत्ता, संघीय ढाँचे और समझौते के कई प्रस्ताव सामने आए, लेकिन बात नहीं बनी। 1946 के "डायरेक्ट एक्शन डे" के बाद भड़की हिंसा ने साफ संकेत दे दिया कि सत्ता का हस्तांतरण शांतिपूर्ण नहीं होगा।

बंगाल से पंजाब तक दंगे फैल गए। खून-खराबा बढ़ता गया। कांग्रेस नेतृत्व के सामने सवाल था—क्या देश को गृहयुद्ध की आग में झोंक दिया जाए या एक कड़वा फैसला लेकर आगे बढ़ा जाए?

कहावत है, "नासूर बन चुके घाव का इलाज कभी-कभी सर्जरी ही होती है।"

विभाजन उसी सर्जरी जैसा था।

1941 की जनगणना के मुताबिक, ब्रिटिश भारत की लगभग एक-चौथाई आबादी मुस्लिम थी और कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में उनका बहुमत था। ऐसे में अखंड भारत में सत्ता साझेदारी, प्रांतीय अधिकार और धार्मिक पहचान के मुद्दे लगातार टकराव का कारण बन सकते थे।

यह कहना मुश्किल है कि ऐसा भारत कितना स्थिर रहता। लेकिन आज़ादी से पहले के हालात देखकर इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि साझा शासन की राह दिन-ब-दिन कठिन होती जा रही थी।

विभाजन के बाद भारत एक स्पष्ट बहुसंख्यक जनसंख्या और मजबूत राजनीतिक केंद्र के साथ उभरा। नए गणराज्य ने धर्मनिरपेक्ष संविधान अपनाया, लेकिन उसकी सांस्कृतिक जड़ें हजारों साल पुरानी भारतीय परंपराओं में गहराई से जुड़ी रहीं।

आलोचक कह सकते हैं कि यह केवल एक अनुमान है, लेकिन यह भी सच है कि अखंड भारत में पहचान आधारित राजनीति और ज़्यादा तीखी हो सकती थी। संवैधानिक सौदेबाज़ी, क्षेत्रीय असंतोष और अलगाववादी दबाव लोकतंत्र को लगातार अस्थिर कर सकते थे।

दूसरे शब्दों में कहें तो विभाजन ने एक बड़ा संघर्ष पैदा किया, लेकिन शायद कई और बड़े संघर्षों को टाल भी दिया।

पाकिस्तान और बाद में बांग्लादेश में हिंदू और सिख आबादी में आई तेज़ गिरावट भी इस बहस को नया आयाम देती है। कई इतिहासकार मानते हैं कि किसी भी सभ्यता की निरंतरता के लिए जनसांख्यिकीय संतुलन अहम भूमिका निभाता है।

उधर भारत ने अपनी विविधता को बनाए रखते हुए लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत किया। यही स्थिरता आगे चलकर हरित क्रांति, आर्थिक उदारीकरण, तकनीकी प्रगति और मजबूत लोकतंत्र की नींव बनी।

यह भी एक विचारधारा का पक्ष है कि आज जिस तरह हिंदू सांस्कृतिक पुनर्जागरण और सांस्कृतिक आत्मविश्वास की चर्चा होती है, उसका स्वरूप अखंड भारत में अलग हो सकता था।

इतना जरूर कहा जा सकता है कि विभाजन कोई जीत नहीं था। वह एक सुरक्षा कवच था। उसने उस राजनीतिक हक़ीक़त को स्वीकार किया, जिसे लंबे समय तक नज़रअंदाज़ करना मुमकिन नहीं रह गया था।

जो लोग भारत को हिंदू सभ्यता की ऐतिहासिक मातृभूमि मानते हैं, उनके लिए विभाजन ने यह सुनिश्चित किया कि बहुसंख्यक समाज को अपनी सांस्कृतिक पहचान बचाने के लिए निरंतर राजनीतिक संघर्ष न करना पड़े।

विभाजन के घाव आज भी हरे हैं। उसकी पीड़ा कभी भुलाई नहीं जा सकती।

लेकिन इतिहास का एक कठोर सच यह भी हो सकता है कि उस दौर में उपलब्ध विकल्पों में विभाजन सबसे कम विनाशकारी फैसला था।

कभी-कभी मुल्कों को ज़िंदा रहने के लिए अपने दिल पर पत्थर रखना पड़ता है।

 


"जानते नहीं, मैं कौन हूँ?" : तमीज़ हार रही है, रसूख जीत रहा है

________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा

18 जून 2026

__________________________

"घट गए इंसाँ, बढ़ गए साए।"

हमारे शहर बड़े हो गए हैं। इमारतें आसमान छू रही हैं। गाड़ियाँ चमक रही हैं। जेबें भर रही हैं। लेकिन दिल सिकुड़ते जा रहे हैं।

सवाल सीधा है। क्या तरक़्क़ी का मतलब सिर्फ़ दौलत, ओहदा और शोहरत है? या फिर तमीज़, तहज़ीब और इंसानियत भी उसकी पहचान हैं?

लखनऊ के एक सरकारी अस्पताल का मंज़र याद आता है।

ओपीडी के बाहर एक महिला घंटों से अपनी बारी का इंतज़ार कर रही थी। हाथ में रेफ़रल पर्ची थी। चेहरे पर थकान थी। आँखों में उम्मीद।

तभी एक साहब आए। झकाझक कुर्ता। साथ में दो लोग। उन्होंने अटेंडेंट से कुछ कहा और सीधे डॉक्टर के कमरे में दाख़िल हो गए।

लाइन में खड़े एक व्यक्ति ने एतराज़ किया।

जवाब आया, "जानते नहीं, मैं कौन हूँ?"

महिला चुपचाप फिर अपनी कुर्सी पर बैठ गई।

यह सिर्फ़ एक अस्पताल की कहानी नहीं है। यह आज के समाज का आईना है।

अस्पताल हो, हवाई अड्डा हो, स्कूल हो या सरकारी दफ़्तर। हर जगह एक अनकहा नियम चलता दिखता है। क़ानून सबके लिए बराबर है, लेकिन कुछ लोग ख़ुद को क़ानून से ऊपर समझते हैं।

आज हैसियत सिर्फ़ पैसे से तय नहीं होती। पहचान, रसूख, संपर्क, उपनाम और दिखावा मिलकर एक ऐसा नशा पैदा करते हैं, जिसमें इंसान अपनी असल औक़ात भूल जाता है।

हमने एक नया जुमला गढ़ लिया है: "जुगाड़ है तो सब मुमकिन है।"

वीआईपी संस्कृति इसी सोच का सबसे बदसूरत चेहरा है।

सड़क पर किसी काफ़िले की सायरन बजाती गाड़ी दिखते ही ट्रैफ़िक थम जाता है। एम्बुलेंस रास्ता तलाशती रह जाती है। सड़क, जो सबकी है, कुछ लोगों की जागीर बन जाती है।

आलीशान सोसायटियों में घरेलू कामगारों के लिए अलग गेट होते हैं। अलग लिफ्ट होती है। आने-जाने के अलग नियम होते हैं। इसे सुरक्षा का नाम दिया जाता है, लेकिन सच यह है कि यह भेदभाव का नया लिबास है।

विडंबना देखिए। जिन हाथों से हमारा घर चलता है, हम उन्हीं हाथों को सम्मान देने में कतराते हैं।

स्कूलों में दाख़िला भी अब कई बार योग्यता से ज़्यादा पहुँच और पहचान का खेल बन गया है। सिफ़ारिशी ख़त, ऊँची जान-पहचान और मोटे दान के दम पर सीटें हासिल की जाती हैं।

बच्चे बहुत जल्दी सीख जाते हैं कि नियम कमज़ोरों के लिए होते हैं।

हम अक्सर मान लेते हैं कि अच्छी शिक्षा इंसान को बेहतर बना देती है। लेकिन क्या सचमुच ऐसा है?

ऊँची डिग्रियाँ तहज़ीब की गारंटी नहीं होतीं। फ़र्राटेदार अंग्रेज़ी, अच्छे व्यवहार का प्रमाणपत्र नहीं है।

हम सबने ऐसे पढ़े-लिखे लोग देखे हैं जो ड्राइवर से बदतमीज़ी करते हैं, फुटपाथ पर गाड़ी चढ़ा देते हैं और सफ़ाई कर्मचारियों को नाम से नहीं, इशारों से बुलाते हैं।

हमारे स्कूल और कॉलेज प्रतियोगिता तो सिखाते हैं, मगर हमदर्दी नहीं। आगे निकलना सिखाते हैं, साथ लेकर चलना नहीं।

सच तो यह है कि बराबरी का एहसास छोटी-छोटी बातों से पैदा होता है।

लाइन में लगना।

अपनी बारी का इंतज़ार करना।

सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करना।

दूसरों की सुविधा का ख़याल रखना।

तहज़ीब की शुरुआत यहीं से होती है।

जब लोग यह मान लेते हैं कि व्यवस्था ताक़तवरों के आगे झुक जाती है, तब उनका भरोसा टूटने लगता है।

अस्पताल की लाइन में खड़ा व्यक्ति अगली बार किसी अजनबी की मदद करने से पहले सोचेगा। कॉलोनी के गेट पर रोकी गई घरेलू सहायिका ख़ुद को अपमानित महसूस करेगी।

बदतमीज़ी संक्रामक होती है।

एक बुरा व्यवहार, कई और बुरे व्यवहारों को जन्म देता है।

कहा भी गया है, "अदब इंसान का सबसे ख़ूबसूरत ज़ेवर है।"

बदलाव की शुरुआत घर से होगी।

बच्चों को सिखाइए कि सफ़ाई कर्मचारी, चौकीदार, ड्राइवर और घरेलू सहायिका सिर्फ़ सेवा देने वाले लोग नहीं, बल्कि सम्मान के हक़दार इंसान हैं।

उन्हें लाइन में लगना सिखाइए। अपनी बारी का इंतज़ार करना सिखाइए। हर किसी से आँख मिलाकर बात करना और शुक्रिया कहना सिखाइए।

याद रखिए, किसी समाज की पहचान उसकी ऊँची इमारतों से नहीं, बल्कि उसके लोगों के बर्ताव से होती है।

जिस समाज में दौलत, इंसानियत से बड़ी हो जाए, वहाँ दीवारें तो बहुत खड़ी होती हैं, लेकिन दिलों के बीच पुल नहीं बन पाते।

तमीज़ कमज़ोरी नहीं है।

तहज़ीब दिखावा नहीं है।

विनम्रता किसी ओहदे की मोहताज नहीं होती।

असल हैसियत आपके बैंक बैलेंस से नहीं, आपके व्यवहार से झलकती है।

और शायद यही सबक हम सबसे ज़्यादा भूलते जा रहे हैं।

Monday, June 15, 2026

 नाचने वाली से रियासत की मलिका तक: बेगम समरू की हैरतअंगेज़ दास्तान

___________________

बृज खंडेलवाल द्वारा 

17 जून 2026

_______________________

इतिहास कभी-कभी ऐसी कहानियां रचता है जिन पर यकीन करना मुश्किल हो जाता है। एक किशोरी नाचने वाली, जो हालात के थपेड़ों में बहती हुई सत्ता के गलियारों तक पहुंच जाए, हजारों सैनिकों की कमान संभाले, बादशाहों, मराठों और अंग्रेजों से बराबरी की बातचीत करे और लगभग छह दशक तक एक समृद्ध रियासत पर राज करे। यह कहानी है बेगम समरू की।

लगभग 1753 में फ़र्ज़ाना ज़ेब-उन-निसा के रूप में जन्मी इस महिला ने भारतीय इतिहास में वह मुकाम हासिल किया, जिसकी कल्पना भी उस दौर में किसी महिला के लिए आसान नहीं थी। मुगल साम्राज्य बिखर रहा था। मराठा शक्ति उभर रही थी। अंग्रेज अपनी जड़ें मजबूत कर रहे थे। ऐसे उथल-पुथल भरे दौर में बेगम समरू ने अपनी अक्ल, हिम्मत और सियासी दूरदर्शिता के बल पर खुद को स्थापित किया।

उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी तथा इतिहास शोधकर्ता राज गोपाल सिंह वर्मा अपनी पुस्तक "बेगम समरू का सच" में लिखते हैं, "यह एक साधारण-सी प्रतीत होने वाली नाचने वाली लड़की की असाधारण कहानी है, जिसने लगभग अट्ठावन वर्षों तक सरधना पर शासन किया।"

फ़र्ज़ाना की जिंदगी तब बदली जब उनकी मुलाकात यूरोपीय भाड़े के सैनिक वाल्टर रेनहार्ट समरू से हुई। रेनहार्ट एक साहसी लेकिन विवादास्पद सैनिक था, जिसने उत्तर भारत की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई थी। उसका उपनाम "सम्ब्रे" था, जो भारतीय बोलचाल में बदलकर "समरू" हो गया।

फ़र्ज़ाना और रेनहार्ट केवल जीवनसाथी नहीं बने, बल्कि राजनीतिक और सैन्य साझेदार भी बने। मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय ने रेनहार्ट को मेरठ के निकट सरधना की जागीर प्रदान की थी। यह उपजाऊ और समृद्ध इलाका था, जिससे अच्छी आय होती थी। धीरे-धीरे फ़र्ज़ाना भी प्रशासन और सैन्य मामलों में सक्रिय भूमिका निभाने लगीं।

4 मई 1778 को आगरा में वाल्टर रेनहार्ट की अचानक मृत्यु हो गई। बहुतों को लगा कि अब फ़र्ज़ाना का प्रभाव समाप्त हो जाएगा। लेकिन इतिहास ने दूसरा मोड़ लिया। फ़र्ज़ाना ने न केवल सरधना की जागीर संभाली, बल्कि लगभग चार हजार सैनिकों वाली प्रशिक्षित फौज की कमान भी अपने हाथों में ले ली। यही वह क्षण था जब वे "बेगम समरू" के रूप में उभरीं।

आगरा से बेगम समरू का रिश्ता बेहद गहरा था। राज गोपाल सिंह वर्मा के शोध के अनुसार, शाहगंज क्षेत्र में रेनहार्ट समरू का विशाल आवास और बाग था। आज उसके अवशेष इतिहास की खामोश कहानी सुनाते हैं। रेनहार्ट को पहले वहीं दफनाया गया और बाद में उनका मकबरा आगरा के रोमन कैथोलिक कब्रिस्तान में बनाया गया। यह मकबरा आज भी मौजूद है और उस दौर की याद दिलाता है।

बेगम समरू अक्सर आगरा आती थीं। उन्होंने चर्चों और धार्मिक संस्थानों को आर्थिक सहायता दी। शाहगंज और भोगीपुरा क्षेत्र में उनकी संपत्तियां थीं। उनके सौतेले पुत्र ज़फ़र याब खान का मकबरा भी आगरा में ही स्थित है। इस तरह आगरा उनके जीवन और विरासत का अहम हिस्सा बना रहा।

पति की मृत्यु के बाद बेगम समरू ने जिस कुशलता से सत्ता संभाली, वह अपने आप में अनोखी मिसाल है। उन्होंने मुगल दरबार से संबंध बनाए रखे। मराठा सरदार महादजी सिंधिया के साथ भी उनके मधुर संबंध रहे। दूसरी ओर अंग्रेज ईस्ट इंडिया कंपनी से भी टकराव के बजाय समझदारी भरा व्यवहार किया। यही संतुलन उनकी सबसे बड़ी ताकत बना।

राज गोपाल सिंह वर्मा अपनी पुस्तक में बताते हैं कि बेगम समरू केवल नाम की शासक नहीं थीं। वे फैसले स्वयं लेती थीं, सैन्य अभियानों का नेतृत्व करती थीं और राजनीतिक रणनीतियां तैयार करती थीं। उस दौर में जब महिलाओं को सार्वजनिक जीवन से दूर रखा जाता था, बेगम समरू सत्ता के केंद्र में खड़ी दिखाई देती हैं।

1781 में उन्होंने ईसाई धर्म स्वीकार किया और जोआना नोबिलिस समरू नाम धारण किया। हालांकि धर्म परिवर्तन के बाद भी उन्होंने स्थानीय संस्कृति और परंपराओं से दूरी नहीं बनाई। उनकी पहचान भारतीय और यूरोपीय प्रभावों के अद्भुत संगम के रूप में बनी रही।

उनकी सबसे बड़ी धरोहरों में से एक है सरधना का भव्य चर्च, बेसिलिका ऑफ आवर लेडी ऑफ ग्रेसेज़। 1829 में पूर्ण हुआ यह चर्च उत्तर भारत के सबसे सुंदर और विशाल गिरजाघरों में गिना जाता है। इसके अलावा उन्होंने आगरा, कलकत्ता, बंबई और मद्रास के चर्चों को भी उदारतापूर्वक सहायता दी। सड़कें, भवन, बाग और जनकल्याण के अनेक कार्य उनके शासनकाल की पहचान बने।

हालांकि उनका जीवन संघर्षों से मुक्त नहीं था। उन्हें अपने ही परिवार से विरोध झेलना पड़ा। एक समय ऐसा भी आया जब उनके सौतेले पुत्र ने उन्हें सत्ता से हटाकर नजरबंद कर दिया। लेकिन उनकी लोकप्रियता और प्रभाव इतने मजबूत थे कि वे फिर सत्ता में लौट आईं। इस वापसी में महादजी सिंधिया और उनके अन्य सहयोगियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

बेगम समरू के जीवन से जुड़ी अनेक किंवदंतियां भी प्रचलित हैं। कुछ कथाएं उन्हें बेहद कठोर और निर्मम शासक के रूप में पेश करती हैं। लेकिन राज गोपाल सिंह वर्मा स्पष्ट करते हैं कि ऐसी कई कहानियां लोककथाओं और अफवाहों पर आधारित हैं। उनके समर्थन में ठोस ऐतिहासिक प्रमाण बहुत कम मिलते हैं। इसलिए इतिहास और किंवदंती के बीच अंतर करना जरूरी है।

27 जनवरी 1836 को सरधना में बेगम समरू का निधन हो गया। उन्हें उसी भव्य चर्च में दफनाया गया जिसे उन्होंने स्वयं बनवाया था। उनके निधन के साथ भारतीय इतिहास का एक अनोखा अध्याय समाप्त हुआ।

अपनी 272 पृष्ठों की पुस्तक "बेगम समरू का सच" में राज गोपाल सिंह वर्मा लिखते हैं, "यह पुस्तक पाठकों को बेगम समरू और उनके पति वाल्टर रेनहार्ट समरू के जीवन की उस ऐतिहासिक यात्रा से परिचित कराती है, जिसने उत्तर भारत की राजनीति को गहरे स्तर पर प्रभावित किया।"

वास्तव में, बेगम समरू की कहानी केवल एक महिला शासक की कहानी नहीं है। यह साहस, महत्वाकांक्षा, कूटनीति और नेतृत्व की कहानी है। यह उस महिला की दास्तान है जिसने अपने समय की सभी सामाजिक सीमाओं को तोड़ा और इतिहास में अपना नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज कराया। मुगल साम्राज्य के पतन और अंग्रेजी सत्ता के उदय के बीच चमकता हुआ यह सितारा आज भी इतिहास प्रेमियों को आकर्षित करता है और याद दिलाता है कि असाधारण लोग अक्सर साधारण परिस्थितियों से ही जन्म लेते हैं।

Saturday, June 13, 2026

 भारत की सबसे बड़ी ताकत: यहां अच्छी ज़िंदगी अभी भी आम आदमी की पहुंच में है

_________________________

माना कि ग़म बहुत हैं जमाने में,

पर दिल बहलाने के बहाने भी बहुत हैं

_________________________

अक्सर यात्रा करने वालों को हकीकत, यानी ग्राउंड रियलिटीज से नजदीकी रिश्ता हो जाता है, जो नेताओं के बयानों, या अखबारी संपादकीयों से भिन्न होता है। दो घंटे पड़ोसी यात्री,  जो अमेरिका से हाल ही में लौटा है, से बतिया के, बंगलौर के नए बने एयर टर्मिनल पर उतरते ही नए भारत की एक आकर्षक तस्वीर से सामना हुआ। 

___________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा

15 जून 2026

__________________________

सुबह दूध वाला घंटी बजाता है।

अख़बार दरवाज़े पर आ गिरता है।

मोबाइल पर एक क्लिक करते ही सब्ज़ी, दवा और खाना घर पहुंच जाता है। डॉक्टर उसी दिन मिल जाता है। घर की सफाई हो चुकी होती है।

भारत में करोड़ों लोगों के लिए यह कोई विलासिता नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा है। सर्विस सेक्टर का चौंकाने वाला विस्तार हुआ है, हर तरह की सेवा, किसी ऐप के द्वारा, फटाफट उपलब्ध है।

यही वजह है कि आज भारत दुनिया के सबसे आकर्षक देशों में से एक बनकर उभर रहा है।

दशकों तक भारतीयों की निगाहें पश्चिम की ओर लगी रहीं। अमेरिका अवसरों की धरती माना गया। यूरोप समृद्धि का प्रतीक था। विदेशी नौकरी और पासपोर्ट सफलता का पर्याय समझे जाते थे। यह सपना आज भी बहुतों को आकर्षित करता है। लेकिन विदेशों में बसे अनेक भारतीय अब एक नई सच्चाई को समझ रहे हैं। अच्छी ज़िंदगी केवल ऊंची तनख्वाह से नहीं मिलती।

कई बार उसकी असली पहचान रोज़मर्रा की सुविधाओं से होती है।

मोबाइल इंटरनेट इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। भारत ने डिजिटल क्रांति को आम आदमी तक पहुंचा दिया है। दुनिया में सबसे सस्ते डेटा प्लान यहीं मिलते हैं। कुछ सौ रुपये में महीने भर वीडियो कॉल, ऑनलाइन पढ़ाई, मनोरंजन और कारोबार चल सकता है। जिन सुविधाओं पर पश्चिमी देशों में हजारों रुपये खर्च होते हैं, वे भारत में बेहद सुलभ हैं।

फिर आती है यूपीआई की कहानी।

चाय वाला हो या सब्ज़ी बेचने वाला, रिक्शा चालक हो या बड़ा शोरूम, हर कोई एक ही डिजिटल भुगतान व्यवस्था से जुड़ा है। न छुट्टे पैसे की चिंता, न बैंक के चक्कर। मोबाइल का एक स्कैन और भुगतान पूरा। भारत ने डिजिटल भुगतान का ऐसा मॉडल बनाया है जिसकी चर्चा दुनिया भर में हो रही है।

विदेशी पर्यटक अक्सर हैरान रह जाते हैं जब सड़क किनारे नारियल बेचने वाला भी क्यूआर कोड से भुगतान स्वीकार करता है।

स्वास्थ्य सेवाओं की तस्वीर भी कम दिलचस्प नहीं है।

दुनिया के कई देशों में डॉक्टर के पास जाना जेब पर भारी पड़ सकता है। भारत में अब भी बड़ी आबादी के लिए चिकित्सा अपेक्षाकृत सुलभ और किफायती है। आधुनिक अस्पतालों में दुनिया भर से मरीज इलाज कराने आते हैं। वहीं मोहल्लों के क्लीनिक आज भी लाखों लोगों की जरूरतें पूरी कर रहे हैं।

भारत का मेडिकल टूरिज्म उद्योग केवल कम लागत की वजह से नहीं, बल्कि बेहतर चिकित्सा सुविधाओं के कारण भी तेजी से बढ़ रहा है।

लेकिन शायद भारत की सबसे बड़ी सुविधा समय है।

मध्यम वर्ग का परिवार भी घरेलू सहायक, रसोइया, ड्राइवर या देखभाल करने वाले कर्मचारी की मदद ले सकता है। इससे कामकाजी लोगों को परिवार, करियर और अपने शौक के लिए अधिक समय मिलता है।

पश्चिमी देशों में ऐसी सेवाएं अक्सर केवल अमीरों तक सीमित रहती हैं।

भारत में किफायत और सुविधा मिलकर जीवन को आसान बनाती हैं।

ट्रांसपोर्ट भी इस कहानी का अहम हिस्सा है।

मेट्रो, बस, ऑटो और रेल आज भी आम आदमी की पहुंच में हैं। नई एक्सप्रेसवे परियोजनाएं, आधुनिक हवाई अड्डे, मेट्रो नेटवर्क और तेज़ रेल सेवाएं देश को पहले से कहीं बेहतर तरीके से जोड़ रही हैं।

यह बदलाव किसी चमत्कार से कम नहीं।

जिस देश को कभी लालफीताशाही और धीमी व्यवस्था के लिए जाना जाता था, वही आज डिजिटल प्रशासन और बुनियादी ढांचे के विकास का उदाहरण बनता जा रहा है।

लेकिन भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि न तो इंटरनेट है, न यूपीआई और न ही सड़कें।

उसकी सबसे बड़ी ताकत है यहां की जीवंत जीवनशैली।

कहां मिलेगा ऐसा देश जहां शहरों  में दिवाली, ईद, क्रिसमस, गुरुपर्व और होली की रौनक दिखाई दे? कहां मिलेगा ऐसा देश जहां बर्फीले पहाड़, रेगिस्तान, समुद्र तट, वर्षावन और महानगर एक ही राष्ट्र की पहचान हों?

भारत केवल एक देश नहीं है।

यह अनेक संसारों का संगम है।

यहां त्योहार सड़कों पर उतर आते हैं। शादियां पूरे समाज का उत्सव बन जाती हैं। पड़ोसी परिवार जैसे लगते हैं। दादा-दादी और नाना-नानी बच्चों के जीवन का हिस्सा बने रहते हैं। दोस्तियां दशकों तक चलती हैं।

दुनिया के कई हिस्सों में यह सामाजिक ताना-बाना धीरे-धीरे कमजोर पड़ रहा है।

बेशक भारत के सामने चुनौतियां भी हैं। यातायात की अव्यवस्था है। प्रदूषण चिंता का विषय है। बुनियादी सुविधाओं में असमानता है। 

लेकिन इन सबके बावजूद भारत एक अनमोल चीज़ देता है। कम खर्च में बेहतर जीवन।

इसीलिए कई प्रवासी भारतीय वापस लौट रहे हैं। इसीलिए विदेशी पेशेवर भारत को अपना ठिकाना बना रहे हैं।

इसीलिए उद्यमी, डिजिटल नोमैड, सेवानिवृत्त लोग और युवा परिवार भारत को नए नजरिए से देखने लगे हैं।

आधुनिक भारत की कहानी केवल आर्थिक विकास या तकनीकी प्रगति की कहानी नहीं है।

यह उस देश की कहानी है जहां जीवन अब भी रिश्तों से चलता है। जहां छोटी-छोटी खुशियां बड़ी दौलत मानी जाती हैं। जहां घर, परिवार और समुदाय आज भी सबसे बड़ी पूंजी हैं।

अच्छी ज़िंदगी जीने के लिए हमेशा अमीर होना जरूरी नहीं। और शायद यही भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

Thursday, June 11, 2026

 गर्मियों की छुट्टी का मजा, रोमांच हुआ गायब

_____________________


नानी तेरी मोरनी को...

बचपन बिकाऊ है!

नानी के घर से स्पोर्ट्स कोचिंग तक का सफर

____________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा 

13 जून 2026

____________________________

वे भी क्या दिन थे।

गर्मी की छुट्टियां शुरू होते ही बच्चों की दुनिया बदल जाती थी। कोई नानी के घर भागता था, कोई दादा-दादी के गांव। कोई पहाड़ों में ट्रेकिंग करता, कोई आम के बागों में चढ़ जाता। दोपहरें कॉमिक्स पढ़ते गुजरती थीं। शामें गिल्ली-डंडा, पतंगबाजी और बेवजह की शरारतों में बीतती थीं।

घड़ी का कोई महत्व नहीं था। कोई लक्ष्य नहीं था। कोई प्रदर्शन नहीं था। छुट्टियां आत्मा की मरम्मत का मौसम थीं।

फिर भारत बदल गया।

अब गर्मी की छुट्टियां भी बच्चों की नहीं रहीं।

सुबह स्विमिंग क्लास। फिर क्रिकेट अकादमी। फिर गिटार सीखना। फिर डांस क्लास। फिर कोडिंग कोर्स। फिर स्पोकन इंग्लिश। शाम को ऑनलाइन वर्कशॉप।

बच्चा स्कूल से छुट्टी पाता है, लेकिन बचपन से नहीं।

आज भारत में जन्म लेते ही प्रतिस्पर्धा शुरू हो जाती है। डेढ़-दो साल के बच्चों को प्ले स्कूल भेजा जा रहा है, जब वे ठीक से बोलना भी नहीं सीख पाए होते। मध्यमवर्गीय परिवार सालाना पचास हजार से एक लाख रुपये तक फीस भर रहे हैं। माता-पिता को डर है कि कहीं उनका बच्चा दौड़ में पीछे न रह जाए।

और यह डर काल्पनिक नहीं है।

भारत में अवसर सीमित हैं और दावेदार करोड़ों। अच्छी नौकरियां कम हैं। सरकारी नौकरियां और भी कम। प्रतिष्ठित कॉलेजों में सीटें मुट्ठी भर हैं। यही वजह है कि कोचिंग संस्कृति एक समानांतर शिक्षा व्यवस्था बन चुकी है। बच्चा स्कूल में पढ़ता है, फिर कोचिंग में पढ़ता है, फिर टेस्ट सीरीज में बैठता है। उसकी पूरी किशोरावस्था प्रतियोगिता की प्रयोगशाला बन जाती है।

लेकिन अब यह होड़ केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं है।

खेल भी कमाई का नया टिकट बन गए हैं।

माता-पिता क्रिकेटरों की करोड़ों की नीलामी देखते हैं। ओलंपिक पदक विजेताओं को मिलने वाले नकद पुरस्कार देखते हैं। सरकारी नौकरियां और विज्ञापन अनुबंध देखते हैं। फिर वे अपने बच्चों को खेल अकादमियों में भेज देते हैं। खेल अब स्वास्थ्य, आनंद और मित्रता का माध्यम कम, करियर की रणनीति अधिक बनता जा रहा है।

सच यह है कि कुछ बच्चे सितारे बनेंगे, लेकिन लाखों नहीं। हर सफल खिलाड़ी के पीछे हजारों ऐसे बच्चे होंगे जो वर्षों का समय, मेहनत और उम्मीदें लगाकर भी मंजिल तक नहीं पहुंच पाएंगे।

इसी बीच मनोरंजन उद्योग ने भी बचपन को बाजार में उतार दिया है।

गायन प्रतियोगिताएं, नृत्य प्रतियोगिताएं, टैलेंट शो और क्विज कार्यक्रम बच्चों को सफलता के शॉर्टकट के रूप में बेच रहे हैं। माता-पिता ऑडिशन दर ऑडिशन भटक रहे हैं। बच्चे कैमरों, जजों और वोटिंग के दबाव में बड़े हो रहे हैं।

कुछ को शोहरत मिलती है। कुछ को पुरस्कार मिलते हैं। लेकिन अधिकांश बच्चे कुछ वर्षों बाद गुमनामी में लौट आते हैं। पीछे छूट जाती है थकान, निराशा और खोया हुआ बचपन।

सबसे दुखद बात यह है कि बच्चों के पास अब खाली समय नहीं बचा।

खाली समय, जिसे आधुनिक समाज लगभग अपराध मानने लगा है।

किताबें पढ़ना समय की बर्बादी समझा जाता है। पेड़ों पर चढ़ना अनुपयोगी गतिविधि बन गया है। दादा-दादी और नाना-नानी की कहानियां किसी पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं हैं। गांव की गलियां, खेतों की पगडंडियां, रिश्तेदारों के घरों की चहल-पहल और बेफिक्र आवारागर्दी अब धीरे-धीरे स्मृतियों का हिस्सा बनती जा रही हैं। जिन बच्चों को कुछ नहीं करना वो मोबाइल वाचिंग करते हैं, या रील बनाते हैं।

हर शौक को करियर में बदला जा रहा है। गाना सीखो ताकि स्टार बनो। नाचो ताकि टीवी पर आ सको। खेलो ताकि करोड़पति बन सको। कोडिंग सीखो ताकि नौकरी मिल सके। अंग्रेजी सीखो ताकि इंटरव्यू निकल जाए।

मानो जीवन का हर क्षण किसी भविष्य की कमाई में निवेश किया जाना चाहिए।

पैसे की चमक इतनी तेज हो गई है कि बचपन उसकी रोशनी में धुंधला पड़ गया है।

समस्या खेल, संगीत, पढ़ाई या प्रतियोगिताओं में नहीं है। समस्या उस मानसिकता में है जो हर बच्चे को एक परियोजना, एक निवेश और एक संभावित आय स्रोत की तरह देखने लगी है।

माता-पिता दोषी नहीं हैं। वे डरे हुए हैं। महंगाई बढ़ रही है। रोजगार अनिश्चित हैं। भविष्य धुंधला है। वे अपने बच्चों के लिए सुरक्षा चाहते हैं।

लेकिन इस प्रक्रिया में एक बड़ा सवाल अनुत्तरित रह जाता है।

यदि बच्चा बचपन में ही थक गया, तो वह जीवन कब जिएगा?

यदि छुट्टियां भी प्रशिक्षण शिविर बन गईं, तो यादें कहां बनेंगी?

यदि हर प्रतिभा का मूल्य रुपये में तय होगा, तो खुशी का मूल्य कौन तय करेगा?

शायद हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी यही है।

हम बच्चों को भविष्य के लिए तैयार करते-करते उनका वर्तमान छीन रहे हैं।

और एक दिन जब वे सफल होकर पीछे मुड़कर देखेंगे, तो शायद पूछेंगे: 

वे गर्मियां कहां चली गईं, जिनमें जिंदगी कमाई नहीं, खुशियां हुआ करती थी?

Wednesday, June 10, 2026

 


धार्मिक स्थलों को उन्मादी भीड़ से बचाओ

तीर्थ स्थान या थीम पार्क?

रीलबाज़ों, सेल्फीबाज़ों और धार्मिक पर्यटन की भीड़ ने पवित्र स्थलों का क्या हाल कर दिया है?

__________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा 

12 जून 2026

___________________________

क्या भगवान अब भक्तों से मिलते हैं या कैमरे के लेंस से?

क्या तीर्थयात्रा अब आत्मा की यात्रा है या इंस्टाग्राम की स्टोरी?

इन दिनों किसी भी पवित्र धाम का दृश्य देख लीजिए। वृंदावन हो, केदारनाथ हो, बद्रीनाथ हो या वैष्णो देवी। ऐसा लगता है जैसे किसी धार्मिक स्थल पर नहीं, बल्कि किसी मेले, पिकनिक स्पॉट या मनोरंजन पार्क में पहुँच गए हों। हाथ में माला कम, मोबाइल ज्यादा हैं। भक्ति कम, रील ज्यादा है। श्रद्धा कम, प्रदर्शन ज्यादा है।

भारत की प्राचीन परंपरा में तीर्थयात्रा जीवन के उत्तरार्ध का विषय मानी जाती थी। जब व्यक्ति संसार के मोह-माया, दौड़-धूप और महत्वाकांक्षाओं से कुछ दूरी बनाता था, तब वह ईश्वर की ओर मुड़ता था। साठ वर्ष की आयु के बाद वानप्रस्थ और आध्यात्मिक जीवन की परिकल्पना यूँ ही नहीं की गई थी। इसके पीछे गहरा सामाजिक और मनोवैज्ञानिक अनुभव था।

लेकिन आज तस्वीर उलट गई है।

कॉलेज से छुट्टी मिली नहीं कि चलो वृंदावन। नई कार खरीदी नहीं कि चलो चारधाम। शादी की सालगिरह है तो केदारनाथ।  हनीमून, चलो तिरुपति जी के दर्शन से शुरू करें, वेरी गुड idea!! जन्मदिन है तो महाकाल। मंदिर अब मन की शांति के स्थान नहीं रहे, बल्कि "चेक-इन" करने और सोशल मीडिया पर दिखाने के मंच बनते जा रहे हैं।

इन धार्मिक स्थलों पर पहुँचने वाली विशाल युवा भीड़ अपने साथ क्या ला रही है?

प्लास्टिक की बोतलें। चिप्स के पैकेट। डिस्पोज़ेबल कप। लाउडस्पीकर जैसी आवाजें। सड़क किनारे फैला कचरा। शराब की खाली बोतलें। सेल्फी के लिए धक्का-मुक्की। ऊँची आवाज में फिल्मी गाने। और सबसे बढ़कर, पवित्रता के प्रति उदासीनता।

हिमालय के नाज़ुक पारिस्थितिकी तंत्र पर इसका असर साफ दिख रहा है। पहाड़ कूड़ेदान बन रहे हैं। नदियाँ प्लास्टिक से भर रही हैं। तीर्थ मार्गों पर कूड़े के ढेर लग रहे हैं। जहाँ कभी घंटियों और मंत्रों की ध्वनि सुनाई देती थी, वहाँ अब मोबाइल नोटिफिकेशन और रीलों का शोर गूँजता है।

भक्ति अब एक उपभोक्ता उत्पाद बन गई है।

एक पैकेज टूर खरीदिए। हेलीकॉप्टर से दर्शन कीजिए। पाँच मिनट मंदिर में बिताइए। दस सेल्फियाँ लीजिए। फिर लौटकर घोषणा कर दीजिए कि आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त हो गया।

यह आध्यात्मिकता नहीं है। यह धार्मिक उपभोक्तावाद है।

कड़वा लग सकता है, लेकिन शायद समय आ गया है कि हम एक असहज प्रश्न पूछें। क्या सभी तीर्थस्थल पर्यटन के लिए खुले रहने चाहिए? क्या हर धार्मिक स्थल को मनोरंजन और अवकाश उद्योग का हिस्सा बना देना चाहिए?

शायद नहीं।

देश के प्रमुख तीर्थस्थलों पर आयु-आधारित प्रतिबंधों पर गंभीर बहस होनी चाहिए। कम से कम पचास या साठ वर्ष से कम आयु के लोगों की सामान्य पर्यटक एंट्री सीमित की जा सकती है। विशेष धार्मिक, शैक्षिक या पारिवारिक कारणों को छोड़कर तीर्थस्थलों को वरिष्ठ नागरिकों और वास्तविक साधकों के लिए प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

यह किसी पीढ़ी के खिलाफ युद्ध नहीं होगा। बल्कि पवित्र स्थलों की गरिमा बचाने का प्रयास होगा।

युवाओं के लिए घूमने-फिरने के हजार विकल्प हैं। पहाड़ हैं। समुद्र तट हैं। ट्रैकिंग है। खेल हैं। सांस्कृतिक यात्राएँ हैं। रोमांचक पर्यटन है। जीवन का आनंद लीजिए। दुनिया देखिए। काम कीजिए। सपने पूरे कीजिए।

लेकिन हर जगह को पर्यटन स्थल बना देना बुद्धिमानी नहीं है।

कुछ स्थान ऐसे भी होने चाहिए जहाँ शांति हो। मौन हो। ध्यान हो। अनुशासन हो। जहाँ लोग फोटो खिंचवाने नहीं, आत्मचिंतन करने जाएँ।

आज वृंदावन की गलियाँ, गंगा के घाट, हिमालय के धाम और अनेक मंदिर उस भीड़ के बोझ तले कराह रहे हैं जो दर्शन से अधिक प्रदर्शन में विश्वास करती है। यह "टच एंड गो" संस्कृति तीर्थों को आध्यात्मिक केंद्रों से मनोरंजन केंद्रों में बदल रही है।

यदि अभी नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ियाँ मंदिर तो देखेंगी, लेकिन उनकी आत्मा खो चुकी होगी।

तीर्थ यात्रा कोई वीकेंड पिकनिक नहीं है। यह मन की तैयारी, अनुशासन, संयम और श्रद्धा की यात्रा है।

जब तक हम इस अंतर को नहीं समझेंगे, तब तक हमारे पवित्र स्थल भीड़ तो जुटाएँगे, लेकिन भक्ति नहीं। श्रद्धालु तो आएँगे, लेकिन शांति नहीं। मंदिर तो बचेंगे, मगर उनकी मर्यादा धीरे-धीरे भीड़ के पैरों तले कुचलती चली जाएगी।

 10 जून 2026

बैडमिंटन लंदन में 

जब माई लार्ड बैडमिंटन खेलने विलायत गए!!!


बृज खंडेलवाल द्वारा 


भारत की न्याय व्यवस्था का पेंडिंग, लंबित मामलों का पहाड़ किसी अजूबे से कम नहीं। पांच करोड़ से अधिक मुकदमे अदालतों की अलमारियों और कंप्यूटरों में धूल फांक रहे हैं।


विचाराधीन कैदी अपनी संभावित सजा से भी ज्यादा समय जेलों में काट देते हैं। किसान, मजदूर, पीड़ित महिलाएं और आम नागरिक एक तारीख से दूसरी तारीख तक भटकते रहते हैं। कई मामलों में न्याय तब मिलता है, जब पीड़ित के बाल सफेद हो चुके होते हैं और अगली पीढ़ी जवान हो जाती है।


लेकिन इस विशाल बोझ तले दबे देश के मुख्य न्यायाधीश लंदन में हैं। बैडमिंटन कोर्ट पर। रैकेट हाथ में, शटलकॉक हवा में, पांच लाख रुपये की पुरस्कार राशि दांव पर, और पूरा आयोजन पूरे शबाब पर।


वही न्यायपालिका, जिसने कभी बेरोजगार युवाओं को "कॉकरोच" कहकर संबोधित किया था, अब न्याय की हथौड़ी छोड़ रैकेट थामे हुए है। अदालतों की फाइलें धूल खाती रहें, लेकिन स्मैश शानदार होने चाहिए।

दृश्य वाकई मनमोहक है। चतुर गुणी जन कहते हैं हमारी महान  न्यायपालिका पूरी तरह स्वतंत्र दिखाई देती है: जवाबदेही से, तात्कालिकता से, और कभी-कभी तो भारतीय धरती से भी। लगभग डेढ़ सौ न्यायाधीश और वरिष्ठ वकील लंदन पहुंच गए। किसी न्यायिक सुधार सम्मेलन के लिए नहीं। लंबित मामलों के एवरेस्ट जैसे संकट पर मंथन करने के लिए नहीं। बल्कि शटलकॉक कूटनीति के लिए।

और कानून मंत्री किरेन रिजिजू? उनका काम न्याय व्यवस्था की चरमराती मशीनरी को दुरुस्त करना है। मगर वे भी इस खेल महोत्सव का हिस्सा बने। लंदन पहुंचे, टूर्नामेंट का उद्घाटन किया, और शामें भारत को "विश्वगुरु" बनाने की चर्चाओं में बिताईं। रैलियों, स्वागत समारोहों और सौहार्दपूर्ण मुलाकातों के बीच भविष्य के भारत का खाका भी खींचा गया।

ज़रा कल्पना कीजिए। दिन में बैडमिंटन, रात में नेटवर्किंग। कार्यपालिका और न्यायपालिका विदेशी धरती पर इतने आत्मीय भाव से साथ दिख रही हैं कि शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत भी शायद दर्शक दीर्घा में बैठकर असहज महसूस कर रहा हो।

न्याय भले ही आंखों पर पट्टी बांधता हो, लेकिन वह फिटनेस के मामले में पूरी तरह सजग दिखाई देता है। चुस्त, फुर्तीला और पांच करोड़ लंबित मामलों की मूक पुकारों को अनसुना करने की अद्भुत क्षमता से लैस।

इस भव्य रंगमंच में असली विजेता कौन हैं? शटलकॉक।

और पराजित? वे करोड़ों भारतीय जो अब भी यह भोली उम्मीद लगाए बैठे हैं कि अदालतों में न्याय सिर्फ मिलेगा ही नहीं, समय पर भी मिलेगा।

खेल खत्म। सेट पूरा। और जीत एक बार फिर बैकलॉग के नाम।