Wednesday, July 8, 2026

 


करोड़ों पौधे, फिर भी सूनी धरती! आखिर हर साल हरियाली जाती कहाँ है?

12 जुलाई को आगरा में 61.88 लाख पौधे लगाने का लक्ष्य,

पर्यावरणविदों ने मांगा स्वतंत्र सामाजिक और वैज्ञानिक ऑडिट

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ब्रज खंडेलवाल द्वारा

10 जुलाई 2026

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बारिश की पहली फुहार पड़ते ही सरकारी दफ्तरों में हलचल बढ़ जाती है। पौधों से भरे ट्रक निकल पड़ते हैं। अफसर हाथ में फावड़ा लेकर कैमरों के सामने मुस्कुराते हैं। नेता पौधे लगाते हैं। रिकॉर्ड बनते हैं। प्रेस विज्ञप्तियां जारी होती हैं। हर साल करोड़ों पौधे लगाने के नए दावे किए जाते हैं।

लेकिन कुछ महीने बाद वही धरती फिर सूनी दिखाई देती है। धूप पहले से ज्यादा चुभती है। सड़कों पर छांव कम होती जाती है। तब एक सवाल हर बार हवा में तैरता है, अगर हर साल करोड़ों पौधे लगाए जा रहे हैं, तो हरियाली आखिर गायब कहां हो रही है? क्या पेड़ धरती पर उग रहे हैं या सिर्फ सरकारी फाइलों में?

उत्तर प्रदेश सरकार ने 12 जुलाई को महावृक्षारोपण अभियान के तहत 35 करोड़ से अधिक पौधे लगाने का लक्ष्य रखा है। लगभग 30 सरकारी विभाग इसमें भाग लेंगे। उपमुख्यमंत्री ने प्रदेश के सभी जिलों में 150 हाईटेक नर्सरियां स्थापित करने की घोषणा की है, जिन पर करीब 150 करोड़ रुपये खर्च होंगे। सरकार का दावा है कि इस अभियान से नया गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनेगा।

आगरा भी इस मुहिम का बड़ा हिस्सा है। जिलाधिकारी मनीष बंसल ने सभी विभागों को इसे जन आंदोलन बनाने के निर्देश दिए हैं। 12 जुलाई को सुबह सात बजे से शाम छह बजे तक पूरे जिले में वृक्षारोपण होगा। स्कूलों, कॉलेजों, ग्राम पंचायतों और कॉलोनियों में "एक स्कूल-एक गांव" थीम पर पौधे लगाए जाएंगे। स्वयंसेवी संस्थाएं, एनएसएस, रोटरी क्लब, लायंस क्लब, महिला समूह और हजारों विद्यार्थी भी इसमें शामिल होंगे।

इस वर्ष आगरा को 61 लाख 88 हजार पौधे लगाने का लक्ष्य मिला है। इनमें वन विभाग 19.68 लाख और अन्य विभाग 42.20 लाख पौधे लगाएंगे। इससे पहले 5 जून, विश्व पर्यावरण दिवस पर भी लगभग 7.94 लाख पौधे लगाने का दावा किया गया था।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक आगरा में 2018 में 20 लाख, 2019 में 28 लाख, 2020 में 38 लाख और 2021 में 45 लाख पौधे लगाए गए। वन विभाग का दावा है कि इनमें लगभग 70 प्रतिशत पौधे जीवित हैं।

यहीं से सवाल शुरू होता है।

अगर इतने पौधे सचमुच जीवित हैं, तो आगरा पहले से ज्यादा हरा-भरा क्यों नहीं दिखता? शहर का तापमान लगातार क्यों बढ़ रहा है? सड़कों के किनारे छायादार पेड़ क्यों कम होते जा रहे हैं? हर मानसून के बाद नया अभियान शुरू करने की जरूरत आखिर क्यों पड़ती है?

रिवर कनेक्ट कैंपेन से जुड़े पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि पेड़ जमीन पर कम और सरकारी कागजों में ज्यादा दिखाई देते हैं। उनका कहना है कि वृक्षारोपण की सफलता पौधे लगाने से नहीं, बल्कि तीन-चार साल बाद उनके जीवित रहने से मापी जानी चाहिए।

कुछ वर्ष पूर्व यमुना किनारे हुई घटना आज भी लोगों को याद है। तत्कालीन महापौर नवीन जैन ने नदी की तलहटी  में लगभग 12 हजार पौधे लगवाए थे। अगस्त में यमुना का जलस्तर बढ़ा और सभी पौधे बह गए। करोड़ों रुपये की मेहनत कुछ दिनों में पानी में समा गई। इस मामले की जांच आज तक पूरी नहीं हो सकी।

रिवर कनेक्ट कैंपेन की पद्मिनी अय्यर कहती हैं कि पौधे लगाना आसान है, लेकिन उन्हें बचाना मुश्किल। तीन वर्षों तक नियमित सिंचाई, सुरक्षा, खाद और निगरानी के बिना अधिकांश पौधे शुरुआती दौर में ही नष्ट हो जाते हैं। पौधे लगाने के बाद उनकी देखभाल अक्सर भगवान भरोसे छोड़ दी जाती है।

वरिष्ठ पर्यावरणविद् डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य कहते हैं कि ताज ट्रेपेजियम जोन में विकास के नाम पर हरियाली लगातार घटती गई है। यमुना एक्सप्रेसवे, आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे, रिंग रोड, फ्लाईओवर, राष्ट्रीय राजमार्गों का चौड़ीकरण और नई कॉलोनियों ने हजारों पेड़ों की बलि ले ली। इसका असर केवल पर्यावरण पर नहीं, बल्कि ताजमहल की सुरक्षा पर भी पड़ रहा है। राजस्थान की ओर से आने वाली धूल भरी हवाओं को रोकने वाली प्राकृतिक हरित पट्टी कमजोर होती जा रही है।

विडंबना यह है कि ताज ट्रेपेजियम जोन का गठन ही ताजमहल और पर्यावरण की रक्षा के लिए किया गया था। 1996 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद टीटीजेड में प्रदूषण रोकने, उद्योगों को स्थानांतरित करने और बड़े पैमाने पर ग्रीन बेल्ट विकसित करने की योजना बनी। राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (NEERI) ने भी हरित क्षेत्र बढ़ाने की सिफारिश की थी। उस समय उम्मीद जगी थी कि आगरा फिर से हरियाली की चादर ओढ़ेगा।

लेकिन तीन दशक बाद तस्वीर निराशाजनक है। टीटीजेड में वन और हरित आवरण घटकर लगभग छह प्रतिशत या उससे भी कम रह गया है, जबकि राष्ट्रीय लक्ष्य 33 प्रतिशत है। 2021 की रिपोर्ट के अनुसार 2017 से 2019 के बीच वन क्षेत्र सिकुड़कर केवल 657.71 वर्ग किलोमीटर रह गया। कई तालाब और जलाशय सूख गए या प्रदूषण की चपेट में आ गए।

2015 में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को पेड़ लगाने के बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावों पर फटकार भी लगाई थी। दूसरी ओर अवैध पेड़ कटाई लगातार जारी रही। कई मामलों में अदालतों ने प्रति पेड़ 25 हजार रुपये तक का जुर्माना लगाया। इसके बावजूद विकास परियोजनाओं ने हरियाली को लगातार निगल लिया। इसी वर्ष राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने भी टीटीजेड में पर्यावरणीय उल्लंघनों पर नोटिस जारी किया। हवा की गुणवत्ता में अपेक्षित सुधार नहीं आया। नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और सूक्ष्म धूल कणों का स्तर बढ़ता गया। कई पर्यावरण विशेषज्ञ अब टीटीजेड प्राधिकरण की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठा रहे हैं।

वृंदावन के पर्यावरण कार्यकर्ता जगन्नाथ पोद्दार कहते हैं कि कभी पूरे ब्रज में बारह बड़े वन हुआ करते थे। आज उनकी पहचान केवल धार्मिक ग्रंथों और स्थानों के नाम तक सीमित रह गई है। जंगलों की जगह अब सीमेंट और कंक्रीट का जंगल खड़ा हो गया है।

पर्यावरण प्रेमी एक और अहम सवाल उठाते हैं। जब हर साल एक्सप्रेसवे, नई सड़कें, हवाई अड्डे, टाउनशिप, मॉल और औद्योगिक परियोजनाएं हजारों एकड़ जमीन घेर रही हैं, तब हर साल करोड़ों नए पौधे लगाने के लिए इतनी खाली जमीन आखिर आती कहां से है?

एक और मुश्किल बंदरों की है। शहर और गांवों में लगाए गए हजारों पौधे बंदर उखाड़ देते हैं। कई जगह पशु भी पौधों को नुकसान पहुंचाते हैं। पौधों के चारों ओर सुरक्षा जाली, नियमित सिंचाई और निगरानी के बिना उनकी जिंदगी ज्यादा लंबी नहीं होती।

ब्रज मंडल के पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने अब तक हुए सभी वृक्षारोपण अभियानों का स्वतंत्र सामाजिक और वैज्ञानिक ऑडिट कराने की मांग की है। उनका कहना है कि केवल पौधे लगाने की संख्या गिनना काफी नहीं है। हर पौधे को जियो-टैग किया जाए, उसकी तीन साल तक निगरानी हो और जीवित पौधों की सार्वजनिक रिपोर्ट जारी की जाए। तभी जनता को असली तस्वीर मालूम होगी।

पेड़ लगाना आसान है। पेड़ बनाना मुश्किल। एक पौधे को विशाल वृक्ष बनने में वर्षों लगते हैं। उसे पानी, सुरक्षा और देखभाल चाहिए। यही जिम्मेदारी सबसे ज्यादा नदारद दिखाई देती है।

इस मानसून भी लाखों पौधे धरती में रोपे जाएंगे। कैमरे फिर चमकेंगे। रिकॉर्ड फिर बनेंगे। भाषण फिर होंगे। लेकिन असली परीक्षा अगले मानसून में होगी।

तब देश फिर वही सवाल पूछेगा; क्या इस बार पौधे सचमुच पेड़ बनेंगे, या हरियाली एक बार फिर सरकारी फाइलों की हरी स्याही तक ही महदूद रह जाएगी?

Tuesday, July 7, 2026

 अंजीर का पत्ता: क्या हम अपने इतिहास से शर्मिंदा हैं?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

8 जुलाई 2026

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देश इस समय महंगाई, बेरोजगारी, प्रदूषण और बुनियादी ढांचे जैसी बड़ी चुनौतियों से जूझ रहा है। लेकिन इसी बीच  की कक्षा 9 की कला शिक्षा की पुस्तक मधुरिमा ने एक ऐसा विवाद खड़ा कर दिया, जिसने शिक्षा, इतिहास और संस्कृति पर नई बहस छेड़ दी।

मामला मोहनजोदड़ो की विश्वप्रसिद्ध “डांसिंग गर्ल” कांस्य प्रतिमा का है। यह साढ़े चार हजार वर्ष पुरानी कलाकृति भारतीय पुरातत्व की सबसे महत्वपूर्ण धरोहरों में से एक है। वर्षों से यह अपने मूल स्वरूप में पाठ्यपुस्तकों में प्रकाशित होती रही, लेकिन इस बार इसके धड़ पर डिजिटल छाया डालकर उसे ढक दिया गया। इतिहासकारों और शिक्षाविदों ने इसे ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ बताया। बढ़ते विवाद के बाद एनसीईआरटी ने मूल चित्र बहाल करने का फैसला लिया।

इतिहासकार  ने कहा, “यह एक काल्पनिक कलाकृति बनाने जैसा है। माइकलएंजेलो की डेविड प्रतिमा पर गिरजाघर द्वारा अंजीर का पत्ता चिपकाने जैसा।” यह टिप्पणी केवल एक उपमा नहीं थी। उसने पूरे विवाद का सार सामने रख दिया।

यह केवल एक तस्वीर का विवाद नहीं, बल्कि उस सोच का सवाल है जो इतिहास को उसकी असल शक्ल में देखने से हिचकती है। अगर किसी ऐतिहासिक कलाकृति को आज के नैतिक चश्मे से बदलना शुरू कर दिया जाए, तो कल किसी मूर्ति का हाथ, किसी चित्र का चेहरा या किसी शिलालेख की पंक्तियां भी बदली जा सकती हैं। तब इतिहास तथ्य नहीं रहेगा, बल्कि हमारी सुविधानुसार गढ़ी गई कहानी बन जाएगा।

दुनिया का अनुभव भी यही बताता है। यूरोप में कभी अनेक मूर्तियों और चित्रों को नैतिकता के नाम पर ढक दिया गया था। बाद में विद्वानों ने माना कि इससे कला और इतिहास दोनों के साथ अन्याय हुआ। संग्रहालयों ने मूल स्वरूप को फिर से अपनाया और यह स्वीकार किया कि इतिहास को बदलने के बजाय उसे समझाना ही बेहतर रास्ता है।

स्कूल की किताबों में बच्चों की उम्र और संवेदनशीलता का ध्यान रखना निश्चित रूप से ज़रूरी है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि प्रमाणिक ऐतिहासिक वस्तुओं को ही बदल दिया जाए। अगर किसी कलाकृति के बारे में अतिरिक्त व्याख्या की आवश्यकता है, तो वह पाठ, टिप्पणी या शिक्षक के माध्यम से दी जा सकती है। शिक्षा का उद्देश्य सच से परिचित कराना है, सच पर पर्दा डालना नहीं।

एक प्रमुख अखबार ने इस पूरे घटनाक्रम को “इतिहास पर फ़ोटोशॉप” कहा। यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि डिजिटल संपादन केवल तस्वीर नहीं बदलता, बल्कि देखने वाले की समझ भी बदल देता है। विद्यार्थी वही सच मानते हैं जो उनकी पाठ्यपुस्तक में छपा होता है। इसलिए पाठ्यपुस्तकों में तथ्य और प्रमाणिकता की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।

भारतीय सभ्यता ने मानव शरीर को कभी शर्म का विषय नहीं माना।  और  के मंदिर,  और  की भित्तिचित्र कला और मूर्तियां इसी सोच की गवाह हैं। इनमें शरीर को वासना नहीं, बल्कि जीवन, सौंदर्य, सृजन और प्रकृति के प्रतीक के रूप में देखा गया। यही हमारी सांस्कृतिक विरासत की सबसे बड़ी खूबी रही है।

विडंबना यह है कि हम दुनिया भर में योग, आयुर्वेद और अपनी प्राचीन सभ्यता पर फ़ख्र करते हैं, लेकिन उसी विरासत की कलात्मक अभिव्यक्तियों को देखकर असहज हो जाते हैं। यह विरोधाभास हमारी सांस्कृतिक समझ पर भी सवाल खड़ा करता है।

एक हिस्टोरियन ने सही  कहा, “अगर नृत्यांगना को अपनी असली शक्ल में नहीं दिखाया जा सकता, तो भारतीय कला का अध्ययन कैसे होगा?” यह प्रश्न केवल एक प्रतिमा का नहीं, बल्कि पूरे इतिहास बोध का है।

पाठ्यपुस्तकें केवल परीक्षा पास कराने का साधन नहीं होतीं। वे आने वाली पीढ़ियों की सोच, समझ और दृष्टि का निर्माण करती हैं। अधूरा या संशोधित इतिहास अंततः अधूरी समझ ही पैदा करता है। हमारी सभ्यता हजारों वर्षों तक इसलिए जीवित रही क्योंकि उसमें आत्मविश्वास था, जिज्ञासा थी और सच का सामना करने का साहस था।

इसलिए इतिहास को अंजीर के पत्ते से ढकने के बजाय उसकी मूल गरिमा के साथ प्रस्तुत करना चाहिए। संवेदनशीलता आवश्यक है, लेकिन सत्य उससे भी अधिक आवश्यक है। सच से आँखें चुराने वाली शिक्षा कभी आत्मविश्वासी समाज का निर्माण नहीं कर सकती।

Monday, July 6, 2026

 जब खबर बिक गई, और सच हार गया!

सत्ता बाजार के आगे घुटने टेकती  पत्रकारिता 

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

5 जुलाई 2026

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मीडिया की दुनिया में अब सबसे बड़ी खबर क्या है?

यह कि खबर अब खबर नहीं रही।

वह एक उत्पाद बन गई है। बिकती है। पैक होकर आती है। सजती है। चमकती है। और फिर दर्शकों के सामने परोस दी जाती है। सच कहीं पीछे छूट जाता है। उसकी जगह ले लेते हैं प्रचार, सनसनी और कारोबार।

कभी पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कही जाती थी। पत्रकार सत्ता की आंखों में आंखें डालकर सवाल पूछते थे। जेल जाते थे। मुकदमे झेलते थे। धमकियां सहते थे। लेकिन कलम नहीं झुकाते थे।

आज तस्वीर बदल गई है। खबर और प्रचार के बीच की दीवार गिर चुकी है। जनसंपर्क यानी पीआर और पत्रकारिता अब कई जगह एक ही सिक्के के दो पहलू दिखाई देते हैं। सत्ता जो कहना चाहती है, वही सुर्खियां बन जाती हैं। जो सवाल पूछता है, उसे अक्सर किनारे कर दिया जाता है।

आज न्यूज़रूम का सबसे ताकतवर आदमी संपादक नहीं, विज्ञापनदाता है। वही तय करता है कि कौन-सी खबर चलेगी और कौन-सी दब जाएगी। अगर किसी खबर से बड़े कारोबारी या राजनीतिक हित प्रभावित होते हों, तो कई बार वह खबर पैदा होने से पहले ही दम तोड़ देती है।

भारत में मीडिया का बड़ा हिस्सा अब कुछ गिने-चुने हाथों में सिमट चुका है। हिंदी के चार बड़े अखबार अधिकांश पाठकों तक पहुंचते हैं। कई बड़े टीवी नेटवर्क भी विशाल कॉरपोरेट घरानों के नियंत्रण में हैं। ऐसे माहौल में पूरी तरह स्वतंत्र पत्रकारिता करना आसान नहीं रह जाता। मालिक का कारोबार और संपादक की कलम हमेशा एक ही दिशा में नहीं चल सकते।

इधर पीआर एजेंसियों ने भी पत्रकारिता का चेहरा बदल दिया है। तैयार प्रेस विज्ञप्तियां, चमकदार तस्वीरें, पहले से लिखे बयान और वीडियो सीधे न्यूज़रूम में पहुंच जाते हैं। समय की कमी और लागत बचाने की मजबूरी में कई संस्थान इन्हें लगभग ज्यों का त्यों खबर बना देते हैं।

नतीजा सामने है। किसान की तकलीफ पीछे छूट जाती है। बेरोज़गार युवा की कहानी जगह नहीं पाती। प्रदूषण, जल संकट, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे छोटे कोने में सिमट जाते हैं। लेकिन किसी उत्पाद की लॉन्चिंग, किसी फ़िल्मी सितारे की पार्टी या सरकारी कार्यक्रम को घंटों का प्रसारण मिल जाता है।

खोजी पत्रकारिता कभी इस पेशे की पहचान थी। एक ख़बर सरकारें गिरा देती थी। बड़े-बड़े घोटाले उजागर होते थे। आज ऐसे उदाहरण कम दिखाई देते हैं। इसकी एक वजह डर भी है। मुकदमे, कानूनी दबाव, आर्थिक संकट और नौकरी जाने का भय। प्रेस स्वतंत्रता से जुड़े अंतरराष्ट्रीय सूचकांक भी यही संकेत देते हैं कि स्वतंत्र पत्रकारिता पहले से अधिक कठिन होती जा रही है।

टीवी चैनलों की बहसें देखिए। हर शाम वही चेहरे। वही चीख-पुकार। वही तयशुदा संवाद। एंकर कई बार सवाल पूछने वाले पत्रकार कम और किसी पक्ष के वकील ज़्यादा लगते हैं। बहस कम होती है, शोर ज़्यादा होता है। दर्शक जानकारी लेकर नहीं, उलझन लेकर उठता है।

आज तर्क की जगह तमाशा बिकता है। तथ्य से ज़्यादा तेज़ आवाज़ मायने रखती है। वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों से ज़्यादा जगह कई बार ज्योतिषियों, स्वयंभू बाबाओं और सनसनी फैलाने वालों को मिलती है। सोशल मीडिया की रफ्तार ने भी इस बीमारी को बढ़ाया है। पहले खबर की पुष्टि होती थी, अब पहले वायरल होना ज़रूरी समझा जाता है।

प्रेस की आज़ादी का मतलब कभी सत्ता से सवाल पूछने की आज़ादी था। आज कई जगह इसका मतलब बदलता दिखाई देता है। कुछ मीडिया संस्थान सरकारों और बड़े कॉरपोरेट घरानों के साथ इतने करीब हो गए हैं कि आलोचना उन्हें नागवार गुजरती है। सत्ता की प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवाल कम और तारीफ ज़्यादा सुनाई देती है। कई नेता अब कठिन सवालों से बचते हुए सीधे सोशल मीडिया के ज़रिए जनता तक अपना संदेश पहुंचा देते हैं। संवाद की जगह एकतरफा प्रसारण ने ले ली है।

यह संकट केवल भारत का नहीं है। दुनिया के कई लोकतांत्रिक देशों में मीडिया पर लोगों का भरोसा लगातार घट रहा है। लोगों को लगता है कि खबरें निष्पक्ष कम और झुकाव वाली ज़्यादा हो गई हैं। 

हर साल पत्रकारिता के कॉलेज हजारों नए छात्र तैयार कर रहे हैं। लेकिन अच्छी पत्रकारिता केवल डिग्री से नहीं आती। उसके लिए भाषा पर पकड़ चाहिए। इतिहास और समाज की समझ चाहिए। सबसे बढ़कर ईमानदारी चाहिए। अफ़सोस, क्लिकों की दौड़, कम वेतन और नौकरी की असुरक्षा ने नए पत्रकारों पर भी गहरा असर डाला है। बहुत से युवाओं के लिए पत्रकारिता अब केवल पीआर या डिजिटल इन्फ्लुएंसर बनने की सीढ़ी बनकर रह गई है।

इसका सबसे बड़ा नुकसान आम नागरिक उठाता है। जब उसे पूरी और सही जानकारी नहीं मिलती, तब अफ़वाहें फैलती हैं। समाज खेमों में बंटता है। लोग एक-दूसरे को सुनना छोड़ देते हैं। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत, यानी जागरूक नागरिक, धीरे-धीरे भ्रमित नागरिक में बदलने लगता है।

पत्रकारिता का काम सरकार गिराना नहीं है। उसका काम सरकार से सवाल पूछना है। उसका काम किसी दल का विरोध या समर्थन करना नहीं, बल्कि जनता के हित की हिफाज़त करना है। पत्रकार अगर दरबारी बन जाएगा, तो जनता की आवाज़ कौन बनेगा?

सच बोलना कभी आसान नहीं रहा। लेकिन इतिहास गवाह है कि वही समाज आगे बढ़ते हैं, जहां पत्रकार सवाल पूछने से नहीं डरते। जहां कलम बिकती नहीं, झुकती नहीं और सत्ता के दरबार में सलाम करने के बजाय जनता के दरवाज़े पर खड़ी रहती है।

जिस दिन खबर फिर से सच की तरफ लौटेगी, उसी दिन पत्रकारिता भी अपनी खोई हुई इज़्ज़त वापस पा लेगी। वरना अख़बार छपते रहेंगे, चैनल चलते रहेंगे, मोबाइल पर नोटिफिकेशन बजते रहेंगे, लेकिन सच धीरे-धीरे हमारी आंखों के सामने दम तोड़ देगा। और तब सबसे बड़ा नुकसान किसी पत्रकार का नहीं, पूरे लोकतंत्र का होगा।

Friday, July 3, 2026

 


शादी का न्योता, वंदे भारत का सफर और बदलते भारत की नई रेल कहानी

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पटरियों पर दौड़ता नया हिंदुस्तान, मुस्कुराता मध्यवर्ग और मजबूत होती राष्ट्रीय एकता

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बृज खंडेलवाल द्वारा

4 जुलाई 2026

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एक ज़माना था, जब शादी का कार्ड मिलते ही सबसे पहले रेल यात्रा की चिंता शुरू हो जाती थी। टिकट मिलेगा या नहीं? ट्रेन समय पर चलेगी या नहीं? भीड़ कितनी होगी? रात कैसे कटेगी? बच्चे संभलेंगे या नहीं?बिस्तरबंद, संदूकों, सुराही, खाने में पूरी सब्जी, नमकीन, डकार के लिए चूर्ण! फुल टेंशन।

आज तस्वीर बदल रही है।

इस सप्ताह चेन्नई में हमारे परिवार की एक शादी है। लेकिन यह सिर्फ एक शादी नहीं, बदलते भारत की एक खूबसूरत राष्ट्रीय एकता की  कहानी भी है। रिश्तेदार देश के अलग-अलग शहरों से आ रहे हैं। कोई बेंगलुरु से, कोई कोयंबटूर से, लड़के वाले दिल्ली से,  रिश्तेदार हैदराबाद से और कोलकाता से भी। हम दोनों, मैं और मेरी पत्नी, मैसूर से वंदे भारत एक्सप्रेस में सवार हुए और पांच घंटे में बैंगलोर होकर चेन्नई पहुंचे।

सफर शुरू होते ही लगा कि मंज़िल से पहले ही जश्न शुरू हो गया है।

कोच चमचमा रहा था। सीटें आरामदेह थीं। झटके नाममात्र के थे। न खाने की फिक्र, न पानी की चिंता। गर्मागर्म नाश्ता और चाय अपनी सीट पर ही मिल गए। साफ-सुथरे शौचालय, शांत माहौल और बड़ी खिड़कियों से बाहर भागते खेत, पहाड़ और गांव।

चेन्नई कब आ गया, पता ही नहीं चला।

स्टेशन पर उतरे तो ऐसा नहीं लगा कि कई घंटे की यात्रा करके आए हैं। हम सीधे शादी की रौनक में शामिल होने के लिए तैयार थे।

यही सबसे बड़ा बदलाव है।

एक समय रेल यात्रा अपने आप में इम्तिहान होती थी। लोग घर से पूड़ी-सब्ज़ी, अचार, पानी की बोतलें और दवाइयों का थैला लेकर चलते थे। पूरी रात सामान की रखवाली करनी पड़ती थी। शादी में पहुंचते-पहुंचते आधी थकान चेहरे पर साफ दिखाई देती थी।

आज वंदे भारत ने सफर की पूरी तासीर बदल दी है।

अब यात्रा बोझ नहीं, छुट्टियों और खुशियों का हिस्सा बन गई है।

भारत का नया आकांक्षी मध्यवर्ग यही चाहता था। वह हवाई यात्रा जितना आराम चाहता है, लेकिन परिवार के साथ रेल यात्रा का अपनापन भी नहीं छोड़ना चाहता। वंदे भारत ने दोनों के बीच का रास्ता निकाल दिया है।

ट्रेन के भीतर भी भारत की एक छोटी-सी तस्वीर दिखाई देती है। कोई लैपटॉप पर काम कर रहा है। बच्चे खिड़की से बाहर झांक रहे हैं। बुजुर्ग आराम से अखबार पढ़ रहे हैं। अलग-अलग भाषाएं सुनाई देती हैं, लेकिन मुस्कान की भाषा सबकी एक होती है। मोबाइल प्रेम इतना बढ़ गया है, की पहले जैसे आपस में अजनबी बात नहीं करते! 


भारतीय रेल केवल लोहे की पटरियां और इंजन नहीं है। यह देश की धड़कन है। यह गांवों को शहरों से, पहाड़ों को समुद्र से और दिलों को दिलों से जोड़ती है।

आज भारतीय रेल दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्कों में शामिल है। करीब 68 हजार किलोमीटर लंबे नेटवर्क पर रोज़ लगभग 13 हजार यात्री ट्रेनें दौड़ती हैं। हर दिन 2 करोड़ 30 लाख से अधिक लोग रेल से सफर करते हैं। यानी कई देशों की पूरी आबादी से भी ज़्यादा लोग रोज़ भारतीय रेल पर भरोसा करते हैं।

साल 2019 में पहली वंदे भारत एक्सप्रेस नई दिल्ली और वाराणसी के बीच शुरू हुई थी। आज 2026 तक देश के अलग-अलग हिस्सों में 160 से अधिक वंदे भारत सेवाएं चल रही हैं। इन ट्रेनों का निर्माण चेन्नई की इंटीग्रल कोच फैक्टरी में 'मेक इन इंडिया' अभियान के तहत हुआ है। यह केवल एक ट्रेन नहीं, बल्कि आत्मविश्वास से भरे नए भारत की पहचान बन चुकी है।

समय की बरबादी और सिरदर्दियों से तो बचते ही हैं, इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि रिश्ते और भी करीब आ गए हैं।

अब मैसूर का परिवार आराम से चेन्नई की शादी में शामिल हो सकता है। बेंगलुरु का बेटा सुबह निकलकर दोपहर तक घर पहुंच सकता है। बुजुर्ग बिना ज़्यादा थके बच्चों और पोते-पोतियों से मिलने जा सकते हैं।

रेल अब केवल यात्रियों को नहीं, उम्मीदों को भी मंज़िल तक पहुंचा रही है।

यह भी सच है कि भारतीय रेल की असली ताकत केवल वंदे भारत नहीं है। लाखों लोगों के लिए आज भी साधारण मेल, एक्सप्रेस और पैसेंजर ट्रेनें जीवनरेखा हैं। किसान, मज़दूर, छात्र, व्यापारी और तीर्थयात्री, सबके लिए रेल बराबरी का सफर उपलब्ध कराती है।

इसी बराबरी में भारत की असली ताकत छिपी है।

रेल हमें केवल एक शहर से दूसरे शहर नहीं ले जाती। वह हमें एक-दूसरे के और करीब भी ले आती है। रास्ते में मिलने वाले लोग, बदलते नज़ारे, अलग-अलग बोलियां और साझा मुस्कानें हमें याद दिलाती हैं कि विविधता के बावजूद हम एक ही देश की संतान हैं।

इस बार चेन्नई की शादी में हमारे परिवार को जोड़ने का काम केवल रिश्तों ने नहीं किया। वंदे भारत ने भी उतनी ही अहम भूमिका निभाई।

कभी-कभी राष्ट्र निर्माण बड़े-बड़े भाषणों से नहीं होता। वह तब होता है, जब दादा-दादी बिना थके शादी में पहुंच जाएं। जब बच्चे सफर का आनंद लें। जब रिश्तेदार समय पर मिलें। जब यात्रा शिकायत नहीं, खुशगवार याद बन जाए।

भारतीय रेल पिछले 170 वर्षों से देश को जोड़ती आई है। वंदे भारत उस लंबी यात्रा का नया पड़ाव है। यह केवल तेज़ रफ्तार ट्रेन नहीं, बल्कि उस नए भारत की तस्वीर है जो अपने नागरिकों को सुविधा, सम्मान और बेहतर जीवन देना चाहता है।

मैसूर से चेन्नई तक के इस सफर में हमने सिर्फ दूरी तय नहीं की। हमने बदलते भारत की रफ्तार को अपनी आंखों से देखा, महसूस किया और जिया।

Thursday, July 2, 2026

 


सोडा वाटर की फिज़ क्यों फुस्स हो गई?

क्या वेलफेयर की मिठास ने भारत के जनआंदोलनों की आग ठंडी कर दी है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

3 जुलाई 2026

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कभी भारत में आंदोलन खड़ा करना सोडा वाटर की बोतल खोलने जैसा था। ढक्कन खुला नहीं कि झाग आसमान छूने लगता था। एक नारा लगता था और हजारों लोग सड़कों पर उतर आते थे। छात्र, किसान, मजदूर, कर्मचारी। हर तरफ उबाल था। सत्ता की पेशानी पर पसीना आ जाता था।


आज भी गुस्सा है। शिकायतें भी हैं। महंगाई है। बेरोजगारी है। किसानों की परेशानियां हैं। लेकिन फिर भी पूरे देश को हिला देने वाले जनआंदोलन पहले जैसे क्यों नहीं दिखाई देते?


क्या जनता बदल गई है? या राजनीति का मिज़ाज बदल गया है? या फिर सरकार ने नाराजगी की आग पर वेलफेयर का पानी डाल दिया है?


यही सवाल आज की भारतीय राजनीति की सबसे दिलचस्प पहेली है।


इतिहास कहता है कि क्रांतियां सिर्फ भूख से नहीं होतीं। वे टूटती उम्मीदों से जन्म लेती हैं। फ्रांसीसी चिंतक एलेक्सिस डी टॉकविल ने बहुत पहले कहा था कि सबसे बड़ा विस्फोट तब होता है, जब लोगों की उम्मीदें तेजी से बढ़ें, लेकिन व्यवस्था उनका साथ न दे। जेम्स सी. डेविस और सैमुअल पी. हंटिंगटन ने भी इसी सोच को आगे बढ़ाया।


भारत का स्वतंत्रता संग्राम हो, सत्तर के दशक का जेपी आंदोलन हो, गुजरात का नव निर्माण आंदोलन हो, रेलवे की ऐतिहासिक हड़ताल हो या 2011 का अन्ना आंदोलन, इन सबकी जड़ में गहरा मोहभंग था। लोगों को लगने लगा था कि सत्ता सुन नहीं रही। जब उम्मीद दम तोड़ देती है, तब इंकलाब जन्म लेता है।


लेकिन 2014 के बाद कहानी का रुख बदलता दिखाई देता है।


सरकार ने विकास के साथ कल्याणकारी योजनाओं का ऐसा ताना-बाना बुना, जिसे कुछ अर्थशास्त्री "सॉफ्ट कैपिटलिज्म" कहते हैं। यानी बाजार भी चले और गरीब का चूल्हा भी जले।


जनधन खाते खुले। आधार जुड़ा। मोबाइल हाथ में आया। डीबीटी के जरिए पैसा सीधे बैंक खातों में पहुंचने लगा। उज्ज्वला का गैस सिलेंडर मिला। पीएम किसान की मदद आई। मुफ्त राशन, पेंशन, छात्रवृत्ति और दूसरी योजनाओं का लाभ सीधे लोगों तक पहुंचने लगा। बिचौलियों की दुकान धीरे-धीरे सिमटने लगी।


यह बदलाव केवल जेब में नहीं, दिमाग में भी हुआ।

जिस गरीब ने पहली बार बैंक में अपना नाम देखा, जिसके घर बिजली आई, नल से पानी आया, राशन की चिंता घटी या इलाज का भरोसा मिला, उसके भीतर व्यवस्था के प्रति पूरी मायूसी की जगह एक उम्मीद ने जन्म लिया।


क्रांतियां उम्मीद से नहीं, निराशा से पैदा होती हैं।

यही शायद सबसे बड़ा बदलाव है।

पिछले एक दशक में करोड़ों लोग औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से जुड़े। गांवों तक सड़कें पहुंचीं। डिजिटल भुगतान ने रेहड़ी वाले तक को क्यूआर कोड पकड़ा दिया। मोबाइल इंटरनेट ने गांव और शहर के बीच की कई दीवारें गिरा दीं। स्टार्टअप और स्वरोजगार ने युवाओं के सामने नए सपने रख दिए।


अब लोगों की बातचीत भी बदल गई है।

पहले सवाल होता था, "सरकार कब जाएगी?"

अब सवाल है, "बेटे को नौकरी कब मिलेगी?" "बेटी की पढ़ाई कैसे पूरी होगी?" "अपना घर कब बनेगा?" "दुकान कैसे बढ़ेगी?"

यानी सामूहिक गुस्से की जगह निजी उम्मीदों ने ले ली।


लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं कि भारत में विरोध खत्म हो गया है।

किसान आंदोलन ने दिखा दिया कि जब मुद्दा गहरा हो, तो लाखों लोग आज भी एकजुट हो सकते हैं। नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शन हुए। कई राज्यों में स्थानीय आंदोलनों ने सरकारों को मुश्किल में डाला। लोकतंत्र में असहमति अब भी जिंदा है।


फिर भी एक फर्क साफ दिखाई देता है। आज के आंदोलन अक्सर किसी खास मुद्दे या इलाके तक सीमित रह जाते हैं। वे पूरे देश में वैसी आग नहीं लगा पाते, जैसी पहले लगती थी।

इसके पीछे सिर्फ वेलफेयर योजनाएं ही जिम्मेदार नहीं हैं। मजबूत सरकारी तंत्र, सोशल मीडिया पर बिखरती बहस, कमजोर विपक्ष, बदलती चुनावी राजनीति और युवाओं की नई महत्वाकांक्षाएं भी इस बदलाव की अहम वजह हैं।


सच यह है कि समाज बदल रहा है।

जिस नागरिक के पास बैंक खाता, गैस कनेक्शन, राशन की गारंटी, स्वास्थ्य बीमा और डिजिटल पहचान है, वह व्यवस्था को आग लगाने से पहले दस बार सोचता है। वह क्रांति से ज्यादा सुधार चाहता है। उसे सड़क पर संघर्ष से ज्यादा अपने बच्चों का भविष्य दिखाई देता है।


लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।

बेरोजगारी आज भी बड़ा सवाल है। आय की खाई अब भी चौड़ी है। किसान और युवा अब भी परेशान हैं। अगर उम्मीदें टूटने लगीं, अवसर सिकुड़ गए और विकास की रफ्तार थम गई, तो वही दबा हुआ लावा फिर बाहर भी आ सकता है। इतिहास यही सिखाता है।


इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत में जनआंदोलनों का दौर खत्म हो गया है। इतना जरूर कहा जा सकता है कि उनकी शक्ल बदल गई है। राजनीति का तापमान बदल गया है। विरोध की भाषा बदल गई है।


सोडा वाटर की बोतल अब भी बंद है। उसके भीतर दबाव भी है। फर्क सिर्फ इतना है कि ढक्कन अब पहले जितनी आसानी से नहीं खुलता।


भविष्य किस करवट बैठेगा, यह आने वाला वक्त बताएगा। लेकिन फिलहाल इतना साफ दिखता है कि जिस समाज के पास उम्मीदें बची हों, वह हर सुबह क्रांति का बिगुल नहीं बजाता। वह अपने बच्चों के लिए बेहतर कल बनाने निकल पड़ता है।


Wednesday, July 1, 2026

 पेठे की मिठास, पेड़े की महक... 

ब्रज का स्वाद अब भी दुनिया का दिल जीत रहा है!

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

2 जुलाई 2026

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मुगल बादशाह जहांगीर ने  चाँदी की कटोरी में रखी ठंडी खीर का एक चम्मच उठाया। फिर गरमागरम गुलाब जामुन का छोटा-सा टुकड़ा उसमें डुबोया। एक कौर लिया और मुस्कुरा उठे। कहते हैं, शाही रसोइयों की यही सबसे बड़ी दाद थी। 

कहते हैं, ताजमहल बन रहा था। शाहजहां ने चाशनी में पके पेठे का स्वाद चखा और ऐसे मुरीद हुए कि आगरा का पेठा हमेशा के लिए शाही पहचान बन गया। खासतौर पर पंछी! 

इतिहास इन किस्सों की  तस्दीक करे या न करे, लेकिन इतना तय है कि आगरा की मिठाइयों का रिश्ता सिर्फ़ स्वाद से नहीं, तहज़ीब, विरासत और जज़्बात से भी रहा है।

आज वही मिठास एक नए इम्तिहान से गुज़र रही है। एक तरफ़ बदलती जीवनशैली, चॉकलेट और बेकरी उत्पादों की बढ़ती घुसपैठ है। दूसरी तरफ़ सरकारी नियम, लगातार निरीक्षण और काग़ज़ी अनुपालन का बोझ। 

फिर भी आगरा, मथुरा, वृंदावन और हाथरस के हलवाई हार मानने को तैयार नहीं हैं। वे परंपरा को बचाते हुए नए स्वाद गढ़ रहे हैं।

ब्रज मंडल सदियों से मिठाइयों का इलाक़ा रहा है। मथुरा और वृंदावन अपने दूध, खोए और पेड़ों, खुरचन के लिए मशहूर हैं। हाथरस की रबड़ी और सोन पपड़ी की अलग पहचान है। आगरा की पहचान देसी घी की मिठाइयों, गुलाब जामुन, बूंदी के लड्डुओं, बर्फियों और दुनिया भर में मशहूर पेठे से है। यहाँ शादी हो, जन्मदिन हो, मंदिर का भोग हो या किसी मेहमान का इस्तकबाल, या फिर मृत्यु भोज, मिठाई के बिना बात अधूरी मानी जाती है। हलवे के नाम पर सबसे ज्यादा डिमांड सीजन में गाजर का हलवा, बाकी टाइम मूंग की दाल का  देशी घी वाला हलवा, की रहती है। गर्मी में रस गुल्ले, रस मलाई, सर्दी में पिस्ते की बर्फी, खूब बिकती हैं।

ख़ऊओं की नगरी मथुरा के चौबेजी कहते हैं, "ब्रज के ठाकुरजी भी मानो मिठास के सबसे बड़े रसिक हैं। कहीं बूंदी के लड्डू चढ़ते हैं, कहीं पेड़ा, कहीं माखन-मिश्री और कहीं तरह-तरह की बर्फियाँ, मोहन थाल, ठौर, मीठी मठरी, खुरमा, बालू शाही। यही धार्मिक परंपरा इस कारोबार को पीढ़ियों से सहारा देती आई है। जलेबी, इमरती, माल पुओं की तो शान निराली है। माखन का समोसा, परमल भरमा, खोए की गुजिया, रबड़ी आम नहीं चखा तो ब्रज दर्शन बेकार।"

मथुरा-वृंदावन की सबसे प्रसिद्ध और पहचान बन चुकी मिठाई मथुरा का पेड़ा है। यह खोया (मावा), चीनी और इलायची से तैयार किया जाता है। इसका हल्का दानेदार, मुलायम और मुंह में घुल जाने वाला स्वाद इसे खास बनाता है। श्रीकृष्ण भक्ति परंपरा से जुड़े इस पेड़े का मंदिरों में प्रसाद के रूप में भी विशेष महत्व है।

मथुरा के प्रसिद्ध मिठाई विक्रेताओं में बृजवासी स्वीट्स सबसे अधिक चर्चित है। इसके अलावा राधिका स्वीट्स, शंकर मिठाई वाला और श्रीजी पेड़ा भंडार भी अपनी गुणवत्ता के लिए जाने जाते हैं।

पोद्दारजी बताते हैं, "मथुरा की अन्य लोकप्रिय मिठाइयों में खुरचन, रबड़ी और मालपुआ प्रमुख हैं। खुरचन गाढ़े दूध की परतों से बनाई जाने वाली अनोखी मिठाई है, जबकि रबड़ी और मालपुआ का स्वाद एक-दूसरे के साथ और भी लाजवाब लगता है।

इसके अलावा बूंदी लड्डू, बेसन लड्डू, मेवा लड्डू, विभिन्न प्रकार की बर्फियां, जलेबी, बालूशाही, रेवड़ी और गजक भी यहां खूब पसंद की जाती हैं। ब्रज की मिठाइयों में दूध, मावा और घी का भरपूर उपयोग होता है, जो भगवान श्रीकृष्ण की गोपाल संस्कृति और ब्रज की समृद्ध दुग्ध परंपरा का प्रतीक है।"

अगले माह सावन की आहट के साथ घेवर का मौसम शुरू होने वाला है। लेकिन इस बार सिर्फ़ पारंपरिक घेवर नहीं, बल्कि केसर, चॉकलेट, ब्लूबेरी, पान, ड्राई फ्रूट और फ्यूज़न फ्लेवर वाले घेवर भी बाज़ार में उतर रहे हैं। यही नहीं, आगरा के पुराने हलवाई काजू अनारकली, पान पेठा, चॉकलेट पेठा, ड्राई फ्रूट बर्फी और कई नई प्रयोगधर्मी मिठाइयाँ तैयार कर रहे हैं।

करीब तीन सौ साल पुराने भगत हलवाई जैसे प्रतिष्ठानों ने साबित किया है कि परंपरा का मतलब ठहर जाना नहीं होता। पुराने स्वाद को बचाते हुए नई पीढ़ी की पसंद के हिसाब से मिठाइयों में नए रंग, नए आकार और नए फ्लेवर जोड़े जा सकते हैं। गोपाल दास, ब्रज भोग, जीएमबी, डबल हाथरस, मोर मुकुट, सत्तो , देवीराम, हीरालाल और कई अन्य प्रतिष्ठान भी इसी राह पर आगे बढ़ रहे हैं। यह फ्यूज़न सिर्फ़ फैशन नहीं, बल्कि बदलते बाज़ार की ज़रूरत बन चुका है।

मगर तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। आगरा और मथुरा का अधिकांश मिठाई उद्योग आज भी असंगठित है। हज़ारों छोटी दुकानों और पारिवारिक कारोबारों पर इसकी नींव टिकी है। पिछले कुछ वर्षों में मशीनें आई हैं, पैकेजिंग सुधरी है और सफ़ाई के मानकों पर भी काम हुआ है। फिर भी अधिकतर काम आज भी हाथों से होता है। यही इसकी पहचान भी है और चुनौती भी।

खाद्य सुरक्षा के लिए निरीक्षण और निगरानी ज़रूरी हैं। मिलावट करने वालों पर सख़्त कार्रवाई भी होनी चाहिए। लेकिन ईमानदार हलवाइयों का कहना है कि कई बार अलग-अलग विभागों की लगातार छापेमारी, नोटिस और काग़ज़ी औपचारिकताएँ कारोबार पर बेवजह का दबाव बना देती हैं। उनका तर्क है कि सरकार का ध्यान उद्योग को बेहतर बनाने पर होना चाहिए, न कि सिर्फ़ दंडात्मक कार्रवाई पर।

एक नई चिंता मिठाइयों पर स्वास्थ्य संबंधी चेतावनी छापने की संभावित योजना को लेकर भी है। मधुमेह के बढ़ते मामलों के कारण चीनी की मात्रा पर सख़्त नियम बनाने की चर्चा चल रही है। कुछ हलवाई इसे ज़रूरी बहस मानते हैं, लेकिन कई का कहना है कि भारतीय भोजन की परंपरा में थोड़ा-सा मीठा हमेशा से शामिल रहा है। उनके अनुसार स्थानीय दूध, घी, गुड़ और सूखे मेवों से बनी पारंपरिक मिठाइयों की तुलना चॉकलेट, मफ़िन या अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों से नहीं की जानी चाहिए।

हलवाई यह आरोप भी लगाते हैं कि बड़े चॉकलेट और कन्फेक्शनरी ब्रांड भारतीय मिठाइयों को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं ताकि उनके उत्पादों की बिक्री बढ़े। इस दावे का स्वतंत्र प्रमाण भले न हो, लेकिन इतना सच है कि बदलती उपभोक्ता आदतों ने पारंपरिक मिठाई कारोबार पर दबाव ज़रूर बढ़ाया है।

फिर भी उम्मीद की वजहें कम नहीं हैं। आगरा आने वाला शायद ही कोई पर्यटक पेठा खरीदे बिना लौटता हो। मथुरा का पेड़ा आज भी श्रद्धा और स्वाद, दोनों का प्रतीक है। ऑनलाइन ऑर्डर, आकर्षक पैकेजिंग, वैक्यूम सील तकनीक और लंबी शेल्फ लाइफ़ ने देश-विदेश तक पहुँचने के नए रास्ते खोल दिए हैं।

ज़रूरत इस बात की है कि सरकार और उद्योग एक-दूसरे के विरोधी नहीं, साझेदार बनें। सफ़ाई, गुणवत्ता और प्रशिक्षण पर निवेश हो। छोटे हलवाइयों को आधुनिक तकनीक और आसान ऋण मिले। साथ ही ब्रज की इस मीठी विरासत को भौगोलिक पहचान, पर्यटन और सांस्कृतिक धरोहर से भी जोड़ा जाए।

आगरा की मिठाइयाँ केवल चीनी और घी का मेल नहीं हैं। इनमें इतिहास की खुशबू है, ब्रज की भक्ति है, मुग़ल रसोई की झलक है और हर भारतीय त्योहार की रौनक बसती है। अगर इस विरासत को समझदारी से सँभाला गया, तो इसकी मिठास आने वाली पीढ़ियों की ज़ुबान पर भी उसी तरह घुलती रहेगी, जैसे कभी बादशाहों की खीर में डूबा एक गुलाब जामुन।

Tuesday, June 30, 2026

 पहले खुद का इलाज कीजिए, डॉक्टर साहब!

डॉक्टर्स डे पर चिकित्सा जगत के सामने खड़े नैतिक सवाल!!

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

30 जून 2026

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डॉक्टर को धरती पर भगवान का दूसरा रूप कहा जाता है। बीमार इंसान अपनी ज़िंदगी, अपना भरोसा और अपने परिवार की उम्मीदें डॉक्टर के हाथों में सौंप देता है। डॉक्टर्स डे पर हम उन लाखों चिकित्सकों को सलाम करते हैं जो ईमानदारी, रहमदिली और समर्पण के साथ दिन-रात लोगों की जान बचाते हैं। उनका पेशा सिर्फ़ रोज़गार नहीं, बल्कि इंसानियत की ख़िदमत है।

लेकिन हर बाग़ में कुछ सूखे पेड़ भी होते हैं। डॉक्टरों की दुनिया भी इससे अछूती नहीं रही। एक छोटा मगर बढ़ता हुआ तबका पूरे पेशे की साख पर दाग़ लगा रहा है। सेवा की जगह मुनाफ़ा, हमदर्दी की जगह कारोबार और मरीज़ की जगह ग्राहक दिखाई देने लगा है। सबसे बड़ी दवा भरोसा होता है। वही भरोसा अब दरकने लगा है।

इस बीमारी की शुरुआत मेडिकल कॉलेज के दरवाज़े से ही हो जाती है।

हर साल 22 लाख से ज़्यादा विद्यार्थी नीट परीक्षा देते हैं। लेकिन सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सीटें बहुत कम हैं। जिन छात्रों को सरकारी कॉलेज नहीं मिलते, उनके सामने निजी मेडिकल कॉलेजों की लाखों नहीं, करोड़ों रुपये तक की फीस खड़ी होती है। कई परिवार ज़मीन बेचते हैं, मकान गिरवी रखते हैं या जीवन भर की जमा-पूंजी खर्च कर देते हैं। हज़ारों छात्र मजबूरी में रूस, जॉर्जिया, कज़ाख़स्तान और फ़िलीपींस जैसे देशों का रुख़ करते हैं।

जब डॉक्टर बनने की कीमत ही करोड़ों में चुकानी पड़े, तो कुछ लोगों के मन में बाद में उस रकम की भरपाई करने का लालच पैदा होना कोई हैरानी की बात नहीं। यहीं से चिकित्सा सेवा धीरे-धीरे कारोबार में बदलने लगती है।

देश में मेडिकल कॉलेज और एमबीबीएस सीटें बढ़ी हैं। इसके बावजूद गाँवों और सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की भारी कमी बनी हुई है। बड़े शहरों में विशेषज्ञ डॉक्टर मिल जाते हैं, लेकिन दूर-दराज़ के इलाक़ों में लोग आज भी बुनियादी इलाज के लिए भटकते हैं। कई योग्य डॉक्टर बेहतर वेतन और सुविधाओं के लिए विदेश चले जाते हैं।

सबसे बड़ी कीमत मरीज़ चुकाता है।

मेडिकल लापरवाही के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। ग़लत इलाज, बीमारी की देर से पहचान, ऑपरेशन में चूक और निगरानी की कमी जैसी घटनाएँ आए दिन सामने आती हैं। हर ऐसी घटना के पीछे किसी परिवार का टूटा हुआ सपना, किसी माँ की सूनी गोद या किसी बच्चे का उजड़ा भविष्य छिपा होता है। अधिकांश डॉक्टर ईमानदार हैं, लेकिन कुछ लोगों की लापरवाही पूरे पेशे की साख पर सवाल खड़े कर देती है।

कई निजी नर्सिंग होम भी सवालों के घेरे में हैं। कहीं बेवजह महँगे टेस्ट लिखे जाते हैं, कहीं अनावश्यक ऑपरेशन की सलाह दी जाती है, तो कहीं अस्पताल का बिल बीमारी से भी बड़ा हो जाता है। बीमारी किसी परिवार की मजबूरी होती है, कमाई का मौक़ा नहीं।

एक और गंभीर बीमारी है कमीशन का खेल।

कुछ पैथोलॉजी लैब डॉक्टरों को जाँच लिखने पर कमीशन देती हैं। कुछ दवा कंपनियाँ महँगी ब्रांडेड दवाइयाँ लिखवाने के लिए तरह-तरह के लालच देती हैं। इसका बोझ आख़िरकार मरीज़ की जेब पर पड़ता है। इलाज महँगा होता जाता है और भरोसा सस्ता।

फिर आता है आईसीयू का सबसे दर्दनाक सच।

कई बार ऐसे मरीज़ों को भी लंबे समय तक आईसीयू में रखा जाता है जिनके बचने की उम्मीद लगभग समाप्त हो चुकी होती है। परिवार चमत्कार की आस में घर, ज़मीन और गहने तक बेच देता है। लेकिन अस्पताल का बिल बढ़ता ही जाता है। ऐसे कठिन फ़ैसलों में इंसानियत सबसे आगे होनी चाहिए, मुनाफ़ा नहीं।

इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि पूरा चिकित्सा जगत दोषी है। सच तो यह है कि देश के लाखों डॉक्टर आज भी पूरी निष्ठा और ईमानदारी से सेवा कर रहे हैं। सरकारी अस्पतालों की भीड़ हो या दूर-दराज़ का गाँव, वे सीमित संसाधनों में भी लोगों की जान बचाने में जुटे रहते हैं। यही डॉक्टर इस पेशे का असली चेहरा हैं।

लेकिन कुछ लोगों की ग़लतियों पर पर्दा डालना भी उचित नहीं। समय आ गया है कि चिकित्सा जगत आत्ममंथन करे। अस्पतालों की फ़ीस पारदर्शी हो, मेडिकल लापरवाही पर सख़्त कार्रवाई हो, अनैतिक कमीशन पर पूरी तरह रोक लगे और मेडिकल शिक्षा में नैतिक मूल्यों को उतनी ही अहमियत दी जाए जितनी आधुनिक तकनीक को।

मरीज़ों को भी अपने अधिकारों की जानकारी होनी चाहिए। इलाज का पूरा ब्यौरा साफ़-साफ़ बताया जाए। हर जाँच और हर ख़र्च का कारण समझाया जाए। भरोसा छिपाने से नहीं, पारदर्शिता से पैदा होता है।

इस डॉक्टर्स डे पर हम उन सभी चिकित्सकों को दिल से सलाम करते हैं जो चिकित्सा को सेवा मानते हैं, सौदा नहीं।

सफ़ेद कोट केवल सम्मान का प्रतीक नहीं, ज़िम्मेदारी का भी प्रतीक है।

अस्पताल मंदिर बने रहें, बाज़ार नहीं।

हिप्पोक्रेटिक शपथ का पहला संदेश है: इंसानियत की सेवा। शायद इस डॉक्टर्स डे की सबसे ज़रूरी दवा भी यही है; दूसरों का इलाज करने से पहले, चिकित्सा व्यवस्था को अपना इलाज ख़ुद करना होगा।