पौराणिक कहानियां क्यों लुभाती हैं?
क्या है मिथकों का मिथक?
______________________
बृज खंडेलवाल द्वारा
19 जुलाई 2026
_________________________
सिनेमा हॉल में सन्नाटा पसरा है। विशाल पर्दे पर देवता और असुर आमने-सामने खड़े हैं। तलवारें चमकती हैं, शंख गूंजते हैं, आकाश में दिव्य अस्त्र बरसते हैं। जैसे ही धर्म की जीत होती है और राक्षस धराशायी होता है, पूरा हॉल तालियों और जयघोष से गूंज उठता है। कई दर्शकों की आंखें नम हैं। यह केवल एक फिल्म का अंत नहीं, बल्कि भीतर दबे डर, उम्मीद और न्याय की चाह का विस्फोट है। सदियों से इंसान ऐसी ही कहानियों में अपने मन का बोझ हल्का करता आया है।
फिल्म खत्म होती है, लेकिन कहानी नहीं। वही दर्शक घर लौटकर अपने बच्चों को भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार, राम की विजय या कृष्ण की लीलाएं सुनाते हैं। कर्नाटक के एक छोटे-से गांव में बरगद के नीचे बैठा एक बूढ़ा किस्सागो भी यही कर रहा है। वह राजा मनु और महाप्रलय की कथा सुनाता है। यही कहानी बाइबिल के नूह और मेसोपोटामिया के उत्नापिष्टिम की दास्तानों में भी सुनाई देती है। हज़ारों साल और हज़ारों किलोमीटर का फ़ासला मिट जाता है। कहानी वही रहती है, सिर्फ़ किरदार बदल जाते हैं.
इंसान हमेशा से कहानियों का दीवाना रहा है। यही किस्से दुनिया के अलग-अलग मुल्कों और सदियों को एक धागे में पिरो देते हैं।
पौराणिक कथाएँ सिर्फ़ देवताओं, राक्षसों और चमत्कारों की पुरानी दास्तानें नहीं हैं। ये ज़िंदगी और मौत, नेकी और बुराई, उम्मीद और रहस्य को समझने का ज़रिया हैं। जब विज्ञान के पास जवाब नहीं थे, तब मिथकों ने इंसान को मायने दिए। हर सभ्यता ने ऐसे सवालों का जवाब खोजने के लिए अपनी कथाएँ गढ़ीं : हम यहाँ क्यों हैं? मौत के बाद क्या होता है? हमें कैसी ज़िंदगी जीनी चाहिए?
मिथक किसी भी समाज की सोच, आस्था और तहज़ीब की बुनियाद होते हैं। सदियों तक ये कहानियाँ आग के अलाव के पास बैठकर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक सुनाई जाती रहीं। बाद में इन्हें लिखा गया। इनमें कल्पना और प्रतीक ज़रूर हैं, लेकिन इनके भीतर इंसानी फ़ितरत और समाज की गहरी सच्चाइयाँ छिपी हैं। इनका असर धर्मों पर भी साफ़ दिखाई देता है।
मनोवैज्ञानिक कार्ल युंग का मानना था कि मिथक इंसान के "सामूहिक अवचेतन" से जन्म लेते हैं। यानी कुछ भावनाएँ और प्रतीक ऐसे हैं जो पूरी इंसानियत में साझा हैं। इसलिए दुनिया के अलग-अलग हिस्सों की कहानियाँ एक जैसी लगती हैं। जनचिंतक पारस नाथ झा कहते हैं कि मिथक हमें केवल कल्पना नहीं, बल्कि इंसानी अनुभव का आईना दिखाई देते हैं।
मिथकों का एक बड़ा मक़सद इंसान को सही रास्ता दिखाना भी है। देवताओं और नायकों की कहानियाँ साहस, ईमानदारी, दया और त्याग की सीख देती हैं। वहीं लालच, घमंड और जलन जैसी बुराइयों से आगाह करती हैं। स्वर्ग, नरक और परलोक की कथाएँ लोगों को नेक और मक़सद भरी ज़िंदगी जीने की प्रेरणा देती हैं।
हैरानी की बात यह है कि दुनिया की दूर-दराज़ सभ्यताओं में भी कई मिथक लगभग एक जैसे हैं, जबकि उनका आपस में कोई सीधा संपर्क नहीं था। महाप्रलय की कहानी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। हिंदू धर्म में विष्णु मनु को बचाते हैं, बाइबिल में नूह अपनी नाव से जीवन बचाते हैं और मेसोपोटामिया में उत्नापिष्टिम यही भूमिका निभाते हैं। ऐसी कथाएँ यूनान, चीन, ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों और माया सभ्यता में भी मिलती हैं। शायद ये किसी प्राचीन प्राकृतिक आपदा की याद हैं या फिर पानी के प्रति इंसान के साझा डर और सम्मान की अभिव्यक्ति।
एक और साझा विषय है; अराजकता से सृष्टि का जन्म। मिस्र की कथाओं में आदिकालीन जल से सूर्य देव प्रकट होते हैं। बेबीलोन की कथा में एक देवी के शरीर से धरती बनती है। यूनानी और हिंदू परंपराएँ भी बताती हैं कि व्यवस्था अव्यवस्था से पैदा हुई। यह यात्रा इंसान के भ्रम से समझ तक पहुँचने की कहानी भी है।
मिथकों के देवता अक्सर इंसानी समाज का ही प्रतिबिंब होते हैं। जैसे समाज में राजा, योद्धा और मेहनतकश होते हैं, वैसे ही देवताओं की भी अलग-अलग ज़िम्मेदारियाँ होती हैं। यूनानी कथाओं में ज़्यूस आकाश के, पोसाइडन समुद्र के और हेडीज़ पाताल के स्वामी हैं। हिंदू परंपरा में इंद्र वर्षा के देवता हैं, अग्नि अग्नि के और विष्णु सृष्टि के पालनकर्ता। इन कथाओं ने प्राचीन समाज को व्यवस्था, सत्ता और ज़िम्मेदारी समझने में मदद की।
अधिकांश मिथकों में एक संघर्ष हमेशा दिखाई देता है: व्यवस्था और अराजकता का। देवता और असुर, रोशनी और अंधेरा, नेकी और बुराई आमने-सामने खड़े होते हैं। यह केवल रोमांच नहीं, बल्कि इंसान के भीतर और समाज में चलने वाली जद्दोजहद का प्रतीक है।
आज हम पहले जैसी नई पौराणिक कथाएँ नहीं गढ़ते। लेकिन सुपरहीरो फ़िल्में, स्टार वॉर्स, अंतरिक्ष यात्राओं की कहानियाँ और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की दास्तानें उसी परंपरा का नया रूप हैं। विज्ञान ने बिजली, बादल और बाढ़ के रहस्यों को समझा दिया है, लेकिन इंसान की कल्पना और अर्थ की तलाश अब भी ज़िंदा है। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने साझा किस्सों की जगह अलग-अलग डिजिटल दुनिया बना दी है।
पौराणिक फ़िल्में आज इस आकर्षण की सबसे बड़ी मिसाल बन गई हैं। रामायण, महाभारत और यूनानी कथाओं पर बनी फ़िल्में दुनिया भर में करोड़ों दर्शकों को खींचती हैं। इनके विशाल दृश्य, असाधारण नायक और कर्तव्य, त्याग तथा नियति जैसे विषय लोगों को आज भी बाँध लेते हैं।
जेम्स कैमरून की अवतार इसका बेहतरीन उदाहरण है। पेंडोरा की चमकती दुनिया, अद्भुत जीव-जंतु और प्रकृति से गहरा आध्यात्मिक रिश्ता दर्शकों को एक नई, लेकिन बेहद परिचित दुनिया में ले जाते हैं। यह फ़िल्म बताती है कि इंसान आज भी प्रकृति और ब्रह्मांड के साथ अपना रिश्ता तलाशना चाहता है।
विज्ञान के इस दौर में भी इंसान केवल तथ्यों से संतुष्ट नहीं होता। उसे ज़िंदगी का मतलब चाहिए। जलवायु संकट, तेज़ी से बदलती तकनीक और अनिश्चित भविष्य के बीच हम प्रेरणादायक अंतरिक्ष यात्रियों, सच बोलने वाले नायकों और धरती को जीवित माँ मानने वाली कहानियों की ओर लौटते हैं। इन्हीं में हमें उम्मीद और मक़सद मिलता है।
बरगद के नीचे बैठा वह बूढ़ा किस्सागो शायद यह बात बिना किसी किताब के समझता है। उसकी सुनाई महाप्रलय की कहानी आज के बच्चों को हज़ारों साल पुराने अपने पुरखों से जोड़ देती है। विज्ञान हमें बताता है कि दुनिया कैसे चलती है, लेकिन कहानियाँ हमें समझाती हैं कि यह दुनिया हमारे लिए क्यों मायने रखती है। जब तक इंसान रहेगा, मिथक भी रहेंगे। क्योंकि कहानी कहना और सुनना हमारी फ़ितरत का हिस्सा है।