धुंध में खड़ी दिल्ली
जयशंकर की कूटनीति: मुस्कान नरम, संदेश गरम
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बृज खंडेलवाल द्वारा
13 मार्च 2026
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दिल्ली आज भी धुंध की चादर ओढ़े खड़ी है; ठीक वैसे ही जैसे वैश्विक अस्थिरता के इस दौर में भारत की विदेश नीति।
दुनिया बेचैन है, सवाल पूछ रही है: भारत आखिर किसके साथ है? वॉशिंगटन के साथ? मॉस्को के साथ? तेहरान के साथ? या फिर किसी के साथ भी नहीं?
दिल्ली चुप है। और यही चुप्पी सबसे स्पष्ट और शक्तिशाली जवाब है।
आज की दुनिया अजीब मोड़ पर है। दोस्ती-दुश्मनी मौसम की तरह बदल रही है। हर देश नया ब्लॉक बना रहा है, नई धुरियाँ खड़ी कर रहा है। लेकिन भारत ने एक अलग, स्वतंत्र रास्ता चुना है। इसका नारा सरल है:
रणनीतिक स्वायत्तता; लेकिन रास्ता जटिल और सूक्ष्म।
इस रास्ते के मुख्य शिल्पकार हैं विदेश मंत्री एस. जयशंकर। उनकी कूटनीति में शोर-शराबा नहीं, ढोल-नगाड़े नहीं बजते। घोषणाएँ कम, लेकिन चालें गहरी और दूरगामी। उनकी रणनीति के कुछ प्रमुख शब्द हैं: रणनीतिक स्वायत्तता, बहुध्रुवीय संबंध, सोची-समझी अस्पष्टता, जानबूझकर चुप्पी, और दिल्ली की खास शैली:
"नॉनचलेंस," यानी बेपरवाही भरा उदासीन रवैया। दुनिया चीखती-चिल्लाती है, दिल्ली बस कंधे उचकाती है।
कुछ साल पहले जयशंकर ने एक वाक्य कहा था, शांत स्वर में, लेकिन उसकी गूंज दूर तक गई: “यूरोप की मुसीबतें दुनिया की मुसीबतें नहीं हैं।” इस एक पंक्ति ने कई राजधानियों में हलचल मचा दी। संदेश साफ था; भारत अब किसी का जूनियर पार्टनर नहीं रहा। न किसी के नैतिक उपदेश सुनने को तैयार, न दबाव में आने को।
अब पश्चिम एशिया में नया संकट मंडरा रहा है। अमेरिका और इज़राइल एक तरफ, ईरान दूसरी तरफ। फरवरी 2026 के अंत से शुरू हुआ यह दौर अब और तीव्र हो चुका है; हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य पर तनाव, ऊर्जा आपूर्ति पर खतरा। दुनिया के रणनीतिकार नक्शे पर लकीरें खींच रहे हैं, टीवी पर बहसें चल रही हैं। सवाल वही पुराना: भारत किसके साथ?
जवाब है: रणनीतिक अस्पष्टता। यह कोई दुर्बलता या अनिर्णय नहीं, बल्कि कूटनीति की परिपक्व कला है।
तस्वीर देखिए:
एक तरफ अमेरिका के साथ गहरे आर्थिक रिश्ते: टेक्सास में अरबों डॉलर की परियोजनाएँ, इंडो-पैसिफिक में रणनीतिक सहयोग, राजनीतिक गर्मजोशी।
दूसरी तरफ ईरान के साथ व्यावहारिक बातचीत: तेल आपूर्ति, हॉर्मुज़ से जहाज़ों का सुरक्षित गुजरना, ऊर्जा सुरक्षा की गणना। 10 मार्च 2026 को जयशंकर ने ईरानी विदेश मंत्री से विस्तृत बातचीत की।
तीसरी तरफ रूस: पुराना, भरोसेमंद साथी। सस्ता रूसी तेल खरीदा गया, रक्षा सौदे मजबूत। 11-12 मार्च को लावरोव से बातचीत हुई।
और चीन? सीमा पर तनाव, सैनिक आमने-सामने, लेकिन व्यापार का रास्ता बंद नहीं। बातचीत जारी।
यह है भारत की नीति का व्यावहारिक चेहरा: समान दूरी, बिना किसी के प्रति पूरी निष्ठा या पूरी दुश्मनी। कार्ड जेब में रखे हैं, मेज़ पर नहीं दिखाए जाते। पुराना सिद्धांत फिर जीवित हो उठा है: स्थायी दोस्त नहीं होते, स्थायी राष्ट्रीय हित होते हैं।
नैतिकता की बातें मंचों पर अच्छी लगती हैं, लेकिन युद्धों का इतिहास कुछ और बताता है: जंग अंत में कोई नहीं जीतता, सिर्फ बर्बादी, मलबा, नफरत और लंबी असुरक्षा छोड़ जाता है। इसलिए दिल्ली सतर्क है।
9 मार्च 2026 को संसद में जयशंकर ने पश्चिम एशिया की स्थिति पर बयान दिया: शांति, संवाद, कूटनीति, अवरोधन, संयम और नागरिकों की सुरक्षा की वकालत की। भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता बताई।
देश के भीतर विपक्ष सवाल उठाता है; राहुल गांधी बार-बार कहते हैं, “साफ स्टैंड लेना चाहिए।” लेकिन विदेश नीति टीवी डिबेट नहीं है। असली खेल बंद कमरों में होता है: खुफिया रिपोर्ट्स, बैक-चैनल बातचीत, गुप्त समझौते। जो दिखता नहीं, वही निर्णायक होता है।
जयशंकर इस खेल के माहिर हैं। मुस्कुराते हैं, धीरे बोलते हैं, लेकिन संदेश कड़ा होता है। रायसीना डायलॉग 2026 में उन्होंने कहा: भारत का उदय भारत तय करेगा, अपनी ताकत से, दूसरों की गलतियों से नहीं। बहुध्रुवीयता अब स्थायी है। कोई एक शक्ति सब कुछ नहीं तय कर सकती।
भारत ने अपने हित सुरक्षित रखे हैं; ऊर्जा आपूर्ति जारी, व्यापार बढ़ रहा, विदेश में भारतीय सुरक्षित, कोई बड़ा प्रतिबंध नहीं, कोई गंभीर संकट नहीं। यह संतुलन आसान नहीं; इसके लिए निरंतर सतर्कता चाहिए।
विश्लेषक अब भारत को "स्विंग पावर" कहने लगे हैं; किसी धुरी में बंधा नहीं, लेकिन हर धुरी को प्रभावित करने की क्षमता।
यही है नई भारतीय कूटनीति, नारे कम, गणित ज्यादा। भावनाएँ कम, हित ज्यादा।
दुनिया ब्लॉक बना रही है, भारत रास्ते बना रहा है।
धुंध में खड़ी दिल्ली साफ संदेश दे रही है: स्वतंत्र, व्यावहारिक और निर्भीक। भारत अपना रास्ता खुद बनाएगा, अपनी शर्तों पर।