Thursday, September 3, 2026

 क्या आगरा का ट्रैफिक कभी सुधरेगा?

उपेक्षा, अव्यवस्था और अधूरे मेट्रो निर्माण ने शहर को जाम का अखाड़ा बना दिया है

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बृज खंडेलवाल द्वारा

5 सितंबर 2026

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आगरा की सड़कें अब सफर का रास्ता कम और रोज का रणक्षेत्र ज्यादा लगती हैं। 

कहीं ऑटो चालक नियमों को ठेंगा दिखाते हैं, कहीं गलत दिशा में दौड़ते वाहन जान जोखिम में डालते हैं और कहीं मेट्रो निर्माण ने पहले से परेशान यातायात की कमर तोड़ रखी है। 

शहर में सुरक्षित आवागमन जैसे प्रशासन की प्राथमिकताओं की सूची से ही बाहर हो गया है।

एमजी रोड, शहर की प्रमुख जीवनरेखा, पर बेतरतीब ऑटो संचालन और यातायात नियमों की धज्जियां उड़ने के कारण पाबंदियां लगाई गईं। लेकिन समस्या खत्म नहीं हुई। वह बस दूसरी सड़कों पर स्थानांतरित हो गई। 

अब ऑटो मुख्य मार्गों के अलावा लिंक रोड और हाईवे तक को घेरते दिखाई देते हैं। लो-फ्लोर बसें चलाने से सार्वजनिक परिवहन की समस्या का दिखावटी समाधान जरूर हुआ, लेकिन यातायात की बुनियादी बीमारी जस की तस है।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि सड़क पर नियम तोड़ने वाला दिखाई देता है, लेकिन व्यवस्था की विफलता दिखाई नहीं देती। पुलिस और नगर नियोजन तंत्र दोनों इस अव्यवस्था के लिए जवाबदेह हैं।


आंकड़े इस अराजकता की भयावह तस्वीर पेंट कर रहे हैं। वर्ष 2024 में आगरा जिले में 1,223 सड़क दुर्घटनाएं दर्ज हुईं और 586 लोगों की जान गई। यानी औसतन हर दिन लगभग चार दुर्घटनाएं और एक से अधिक मौत।

गलत दिशा में वाहन चलाना, लाल बत्ती पार करना, तेज रफ्तार, मोबाइल पर बात करना और दोपहिया वाहनों पर तीन सवारियां बैठाना आम बात है। पुलिस चालान काटती है, लेकिन उसका असर कितना है, यह सड़कें रोज बता देती हैं। कार्रवाई अक्सर छिटपुट होती है। ब्लैक स्पॉट पर लगातार निगरानी, लाइसेंस निलंबन और वाहन जब्ती जैसे कठोर कदम विरले ही दिखाई देते हैं।

आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे का अनुभव भी आंखें खोलने वाला है। 2021 से 2025 के मध्य तक 7,000 से अधिक दुर्घटनाओं में आधे से ज्यादा मामलों में चालक की थकान एक प्रमुख कारण रही। सवाल उठता है कि सड़क सुरक्षा को लेकर निगरानी और जागरूकता व्यवस्था आखिर कितनी गंभीर है?


आगरा में मेट्रो निर्माण यातायात सुधार की उम्मीद लेकर आया था। लेकिन निर्माण की धीमी गति, लंबे समय तक खुले पड़े कार्यक्षेत्र, संकरे डायवर्जन और जगह-जगह टूटे मार्गों ने स्थानीय यातायात को बेहाल कर दिया है। शुरू में ही समझदार लोगों ने अंडरग्राउंड मेट्रो रेल नेटवर्क की डिमांड की थी, मगर लागत  कम करने के चक्कर में सारे शहर की यातायात व्यवस्था भंग कर दी।

अब, जहां पांच मिनट में पहुंच जाना चाहिए, वहां 20-25 मिनट लगना अब सामान्य बात है। कई जगह सड़क का एक बड़ा हिस्सा बैरिकेडिंग में घिरा है और बची हुई सड़क पर ऑटो, ई-रिक्शा, दोपहिया, कार और बसें एक-दूसरे को रास्ता देने से कतराते  हैं।

मेट्रो जैसी बड़ी परियोजना के लिए कुछ समय की परेशानी समझी जा सकती है। लेकिन तैयारी और निर्माण की समयसीमा के बीच तालमेल न हो तो असुविधा यातना बन जाती है। निर्माण स्थल की सफाई, बैरिकेडिंग, डायवर्जन की स्पष्ट सूचना और वैकल्पिक मार्गों का बेहतर प्रबंधन जरूरी है। शहर को यह जानने का अधिकार है कि कौन सा काम कब पूरा होगा और देरी क्यों हो रही है।


आगरा की आबादी लगभग 30 लाख तक पहुंच चुकी है। इसके अलावा हर वर्ष करोड़ों पर्यटक ताजमहल और अन्य ऐतिहासिक स्थलों को देखने आते हैं। दशकों पहले की आबादी और यातायात को ध्यान में रखकर बनी सड़कें अब इस बोझ के सामने छोटी पड़ रही हैं।

पीक आवर में कई प्रमुख मार्गों पर वाहन गति लगभग 15 किलोमीटर प्रति घंटा तक गिर जाती है। जाम केवल समय नहीं खाता, ईंधन और उत्पादकता भी निगलता है। एक अनुमान के अनुसार यातायात जाम, अतिरिक्त ईंधन और समय की बर्बादी से शहर को हर साल लगभग 500 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान होता है।

पर्यटक भी इस अनुभव को लेकर अच्छी यादें लेकर नहीं लौटते। ताज देखने आए व्यक्ति को अगर आधा दिन सड़क पर फंसे रहना पड़े, तो विश्व धरोहर शहर की छवि पर भी सवाल उठता है।


जाम के साथ जहरीली हवा का बोनस

यातायात की समस्या केवल समय और धैर्य नहीं निगलती। यह हवा को भी जहरीला बनाती है।

वाहनों से निकलने वाला प्रदूषण शहर के PM2.5 में महत्वपूर्ण योगदान देता है। सड़क की धूल इसका बड़ा हिस्सा हो सकती है, लेकिन यातायात ऐसा स्रोत है जिस पर प्रशासन तत्काल नियंत्रण कर सकता है।

सर्दियों में प्रदूषण का स्तर खतरनाक सीमा तक पहुंच जाता है। चौराहों पर घंटों खड़े वाहन धुआं छोड़ते रहते हैं और पैदल चलने वाले उसी हवा में सांस लेते हैं। बच्चे और बुजुर्ग इसकी सबसे बड़ी कीमत चुकाते हैं।

ताजमहल की सुरक्षा के लिए ताज ट्रेपेजियम जोन बनाया गया था। लेकिन अगर ताज के आसपास का यातायात ही प्रदूषण का बड़ा स्रोत बना रहे, तो केवल कागजी संरक्षण से विरासत नहीं बच सकती।

इलाज मुश्किल नहीं, इच्छाशक्ति चाहिए

आगरा को किसी चमत्कारी यातायात योजना की जरूरत नहीं है। जरूरत है नियमों के लगातार और निष्पक्ष पालन की।

तेज रफ्तार, गलत दिशा, लाल बत्ती तोड़ने और खतरनाक ड्राइविंग पर नियमित कार्रवाई हो। लाइसेंस निलंबन और वाहन जब्ती जैसे कदम वास्तव में लागू हों। सड़कों पर फुटपाथ, स्पष्ट जेब्रा क्रॉसिंग, बेहतर संकेतक और सुरक्षित पैदल मार्ग बनाए जाएं।

सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना होगा। कुछ लो-फ्लोर बसें समस्या का समाधान नहीं हैं। उच्च आवृत्ति वाली विश्वसनीय बस सेवा, व्यवस्थित ऑटो और ई-रिक्शा स्टैंड तथा बेहतर पार्किंग व्यवस्था निजी वाहनों का दबाव कम कर सकती है।


हर सार्वजनिक निर्माण में भी समयसीमा और जवाबदेही तय होनी चाहिए। हर निर्माण स्थल पर स्पष्ट डायवर्जन, पर्याप्त रोशनी, पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित रास्ता और नियमित यातायात प्रबंधन अनिवार्य होना चाहिए।

कैमरा आधारित निगरानी, स्मार्ट सिग्नल, रियल-टाइम ट्रैफिक मॉनिटरिंग और तेज आपातकालीन प्रतिक्रिया व्यवस्था अब विलासिता नहीं, आवश्यकता है।

भारी वाणिज्यिक यातायात को शहर के भीतरी हिस्सों से बाहर रखने के लिए उपलब्ध बाईपास और एक्सप्रेसवे का अधिक प्रभावी इस्तेमाल किया जा सकता है।

आगरा का ट्रैफिक संकट किसी दैवी आपदा का परिणाम नहीं है। यह वर्षों की प्रशासनिक उदासीनता, कमजोर प्रवर्तन, खराब नियोजन और अधूरे समन्वय का नतीजा है।

शहर को जाम से निकालना असंभव नहीं है। सड़कें पर्याप्त हो सकती हैं, यदि व्यवस्था पर्याप्त हो।

सवाल केवल यह है कि जिम्मेदार अधिकारी कब समझेंगे कि ट्रैफिक जाम सिर्फ गाड़ियों को नहीं रोकता। यह शहर की अर्थव्यवस्था, पर्यावरण, पर्यटन और नागरिकों की जिंदगी रोक देता है।

आगरा को ताज का शहर बने रहना है या जाम का। फैसला अब सड़कों पर नहीं, प्रशासनिक इच्छाशक्ति में होगा।

 श्रीकृष्ण: प्रकृति के रक्षक और यमुना के प्रियतम

क्या इस जन्माष्टमी हम कृष्ण को केवल याद ही नहीं, बल्कि उनकी प्रिय यमुना को बचाने का संकल्प भी ले सकते हैं?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

4 सितंबर 2026

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देशभर में आज जन्माष्टमी की धूम है। मंदिर रोशनी से जगमगा रहे हैं। गलियां सज रही हैं। घंटियां बज रही हैं और भक्त आधी रात को भगवान कृष्ण के जन्म का इंतजार कर रहे हैं।

मथुरा और वृंदावन से लेकर द्वारका, मुंबई, दिल्ली, अहमदाबाद और देश के छोटे-बड़े शहरों तक जन्माष्टमी आस्था का सबसे बड़ा उत्सव बन चुकी है। कहीं रासलीला हो रही है, कहीं झांकियां सज रही हैं और कहीं दही-हांडी के लिए मानव पिरामिड बनाए जा रहे हैं।

लेकिन इस उत्सव के बीच एक सवाल हमें जरूर पूछना चाहिए।

अगर कृष्ण आज हमारे बीच होते, तो नदियों, जंगलों, पहाड़ों और पशुओं की हालत देखकर क्या सोचते?

कृष्ण केवल मंदिरों में विराजमान देवता नहीं थे। उनका बचपन जंगलों, गायों, बछड़ों, पक्षियों, पेड़ों, पहाड़ों और नदियों के बीच बीता। उनका जीवन हमें बताता है कि प्रकृति कोई सामान नहीं है, जिसे मनुष्य अपनी सुविधा के लिए इस्तेमाल करे। प्रकृति हमारे जीवन और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है।

कृष्ण और ब्रज की जीवंत प्रकृति

“वृंदावन कृष्ण की बाल लीलाओं की केवल पृष्ठभूमि नहीं था। वहां पेड़, पक्षी, गाय, नदी और मनुष्य एक ही परिवार का हिस्सा थे।”

यह कहना है आगरा के श्री मथुराधीश मंदिर के गोस्वामी नंदन श्रोत्रिय का।

कृष्ण और कदंब का रिश्ता आज भी ब्रज की कल्पना का हिस्सा है। कहा जाता है कि कदंब के पेड़ की छांव में कृष्ण की बांसुरी गूंजती थी। उनके साथ केवल ग्वाल-बाल और गोपियां ही नहीं थीं। गाय, बछड़े, पक्षी और पूरा प्राकृतिक संसार उनकी दुनिया का हिस्सा थे।

फिर आता है गोवर्धन पर्वत का प्रसंग।

जब ब्रज पर मूसलाधार बारिश का संकट आया, तो कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाकर लोगों और पशुओं को आश्रय दिया। इस कथा को हम धार्मिक दृष्टि से देखें या प्रतीक के रूप में, इसका पर्यावरणीय संदेश बहुत स्पष्ट है।

पर्यावरणविद् डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य के अनुसार, गोवर्धन केवल एक पहाड़ नहीं था। वह जंगल, जल, चारा, भोजन और पूरे समुदाय की सुरक्षा का प्रतीक था।

कृष्ण का संदेश आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है, मनुष्य का जीवन प्रकृति की सुरक्षा पर निर्भर है।

कृष्ण और यमुना का रिश्ता

कृष्ण की कहानी में यमुना का स्थान सबसे खास है।

रिवर कनेक्ट अभियान से जुड़ी पद्मिनी अय्यर कहती हैं, “कृष्ण का यमुना से रिश्ता बहुत गहरा था। वसुदेव उन्हें शिशु अवस्था में यमुना पार कराकर गोकुल ले गए। कृष्ण ने यमुना के किनारे खेला और कालिया नाग का सामना भी यमुना में ही किया।”

कृष्ण की कथा में यमुना केवल पानी की धारा नहीं है। वह एक जीवंत पात्र है।

लेकिन आज यही यमुना मथुरा, वृंदावन और आगरा से गुजरते हुए गंदे नालों, सीवर और प्रदूषण का बोझ ढो रही है। करोड़ों लोग कृष्ण का नाम लेते हैं, लेकिन उनकी प्रिय नदी लगातार मर रही है।

आगरा में यह विडंबना और भी बड़ी है। यमुना विश्व प्रसिद्ध ताजमहल के सामने से गुजरती है। एक ओर दुनिया का सबसे सुंदर स्मारक है और दूसरी ओर उसकी जीवनरेखा प्रदूषण से जूझ रही है।

यमुना भक्त चतुर्भुज तिवारी कहते हैं कि नदी को वह सम्मान नहीं मिल रहा, जिसकी वह हकदार है।

आईएमए अध्यक्ष डॉ. हरेंद्र गुप्ता सवाल करते हैं, “क्या हम कृष्ण के भक्त कहलाकर उनकी प्रिय यमुना को नाले में बदल सकते हैं?”

मथुरा में भव्य जन्माष्टमी

4 सितंबर को जन्माष्टमी मनाई जा रही है और आधी रात के बाद तक कृष्ण जन्मोत्सव चलेगा।

मथुरा में इस बार विशेष उत्साह है। हजारों श्रद्धालु मथुरा-वृंदावन पहुंच रहे हैं। कृष्ण जन्मभूमि पर आधी रात को विशेष पूजा होगी। ब्रज तीर्थ विकास परिषद ने कृष्ण के जीवन और जन्म को दर्शाने वाले 500 ड्रोन का विशेष कार्यक्रम भी तैयार किया है।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 3 सितंबर को मथुरा का दौरा किया। उन्होंने स्वामी हरिदास सभागार और कई विकास परियोजनाओं का उद्घाटन किया। उन्होंने यह भी कहा कि विकास के साथ सांस्कृतिक विरासत की रक्षा जरूरी है।

यह बात ब्रज के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

ब्रज का विकास केवल चौड़ी सड़कों और ज्यादा पर्यटकों से नहीं हो सकता। अगर मथुरा की पहचान कृष्ण हैं, तो उसकी यमुना, कुंड, गोवर्धन, वन, गाय और पुराने घाट भी उसी विरासत का हिस्सा हैं।

कृष्ण के पोस्टरों से सजा कंक्रीट का जंगल ब्रज नहीं हो सकता। ब्रज इतना सुंदर रहना चाहिए कि कृष्ण खुद उसे पहचान सकें।

द्वारका से पूरे भारत तक

दूर गुजरात में द्वारका भी जन्माष्टमी के लिए तैयार है। इस वर्ष पांच दिन के उत्सव में लगभग सात लाख श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है। द्वारकाधीश मंदिर में आधी रात की पूजा के लिए बड़ी संख्या में भक्त जुटेंगे।

मथुरा और द्वारका कृष्ण के जीवन के दो अलग-अलग पड़ाव हैं। एक ओर ब्रज की नदी, जंगल और गांव हैं। दूसरी ओर समुद्र के किनारे बसी द्वारका है।

कृष्ण हमें नदी से लेकर समुद्र तक और गांव से लेकर शहर तक जोड़ते हैं।

महाराष्ट्र में दही-हांडी उत्सव सड़कों को उत्सव के मैदान में बदल देता है। मुंबई के गोविंदा दल मानव पिरामिड बनाकर कृष्ण की माखन चोरी की लीला को रोमांचक रूप देते हैं।

दिल्ली, लखनऊ, बंगाल, गुजरात और देश के अनेक हिस्सों में मंदिरों और सार्वजनिक स्थानों पर विशेष कार्यक्रम हो रहे हैं। कहीं कृष्ण लीला है, कहीं रासलीला और कहीं शास्त्रीय नृत्य।

लेकिन कृष्ण की प्रकृति से जुड़ी विरासत ब्रज में सबसे ज्यादा महसूस होती है।

गायों से कृष्ण का रिश्ता

कृष्ण को गोपाल और गोविंद कहा गया। गाय उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा थीं।

वृंदावन टुडे के मुख्य संपादक और फ्रेंड्स ऑफ वृंदावन के संयोजक जगन्नाथ पोद्दार कहते हैं कि ब्रज में गाय केवल आर्थिक संपत्ति नहीं थी। वह परिवार और धार्मिक जीवन का हिस्सा थी।

आज स्थिति बदल गई है।

हम गाय की पूजा तो करते हैं, लेकिन उसके भोजन और स्वास्थ्य की चिंता कम करते हैं। प्लास्टिक, कचरा और गंदा पानी पशुओं के जीवन को नुकसान पहुंचा रहे हैं।

यह कैसी भक्ति है, जिसमें भगवान का नाम तो है, लेकिन उनकी प्रिय गायों की चिंता नहीं?

गीता का संदेश और आज की दुनिया

भगवद्गीता में जलवायु परिवर्तन या जैव विविधता जैसे आधुनिक शब्द नहीं मिलते। फिर भी कृष्ण का दर्शन मनुष्य और प्रकृति के गहरे संबंध की बात करता है।

गीता में कृष्ण पृथ्वी की सुगंध और सभी जीवों में जीवन को अपनी ही अभिव्यक्ति बताते हैं। एक पत्ता, फूल, फल या जल भी सच्ची श्रद्धा से अर्पित किया जाए तो उसका महत्व है।

गीता का संदेश आज भी साफ है,

प्रकृति को नष्ट करके मनुष्य सुखी नहीं रह सकता।

इस जन्माष्टमी कुछ बदलें

हम हजारों दीप जला सकते हैं। विशाल झांकियां निकाल सकते हैं। भव्य जुलूस कर सकते हैं। पूरी रात “राधे-राधे” और “जय श्रीकृष्ण” का जयघोष कर सकते हैं।

लेकिन अगर यमुना मरती रही, तो हमारी भक्ति अधूरी रहेगी।

ब्रज में कृष्ण की विरासत बचाने का अर्थ है, यमुना को साफ करना, गोवर्धन की प्रकृति बचाना, पुराने कुंडों को पुनर्जीवित करना, पवित्र उपवनों की रक्षा करना और गायों की बेहतर देखभाल करना।

आगरा में इसका अर्थ है ताजमहल के सामने बहती यमुना को फिर जीवित नदी बनाना।

मथुरा और वृंदावन में तीर्थयात्रा के साथ पर्यावरण की जिम्मेदारी जोड़नी होगी।

देशभर के मंदिर भी पहल कर सकते हैं। हर जन्माष्टमी पर एक पेड़ लगाया जा सकता है। कोई तालाब साफ किया जा सकता है। प्लास्टिक कम किया जा सकता है। पशु कल्याण के लिए सहयोग किया जा सकता है।

यही भक्ति को कर्म में बदलना होगा।

कृष्ण हमारे लिए राधा के प्रियतम हैं। वे यशोदा के नटखट कन्हैया हैं। वे गोपाल हैं, गोविंद हैं, कालिया के संहारक हैं और गोवर्धन उठाने वाले हैं। वे अर्जुन के सारथी और गीता के महान उपदेशक भी हैं।

लेकिन आज हमें एक और कृष्ण को याद करना चाहिए, 

पेड़ों के मित्र, गायों के रक्षक, गोवर्धन के संरक्षक और यमुना के प्रियतम कृष्ण।

जन्माष्टमी की भव्यता जरूरी है। यह हमारी संस्कृति और आस्था को जीवित रखती है। लेकिन असली जन्माष्टमी आधी रात के बाद शुरू होनी चाहिए।

अगली सुबह एक साफ नदी हो।

एक हरा-भरा उपवन हो।

एक स्वस्थ गाय हो।

एक सुरक्षित पहाड़ी हो।

और एक ऐसा मनुष्य हो, जो प्रकृति की जिम्मेदारी समझता हो।

अगर कृष्ण हर जीव में हैं, तो प्रकृति की रक्षा केवल पर्यावरण सेवा नहीं है।

वह भक्ति है।

इस जन्माष्टमी कृष्ण को यही सबसे सुंदर शुभकामना हो सकती है, 

जय श्रीकृष्ण!

और यमुना को जीने दो।



Wednesday, September 2, 2026

 यमुना रिवर कनेक्ट : एक नदी को संरक्षित रखने की जिद  

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बृज खंडेलवाल  द्वारा 

4 सितंबर 2026  

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ताजमहल आगरा की पहचान है, लेकिन यमुना उसकी आत्मा है। पिछले एक दशक से अधिक समय से रिवर कनेक्ट अभियान इसी भूली हुई नदी को शहर की चेतना में वापस लाने की कोशिश कर रहा है।  

2014-15 में शुरू हुई यह नागरिक मुहिम महज सफाई अभियान नहीं थी। इसका असली मकसद था लोगों को यमुना से फिर जोड़ना। इसके लिए आरती हुई, श्रमदान हुए, पदयात्राएं निकलीं, हवन हुए, हस्ताक्षर अभियान चले और कभी-कभी विरोध का तरीका इतना अनोखा रहा कि राष्ट्रीय मीडिया का भी ध्यान खींच गया।  

आरती से आंदोलन तक  

एत्माद-उद-दौला व्यू पॉइंट पर शुरू हुई दैनिक यमुना आरती इस अभियान की सबसे स्थायी पहचान बन गई। 2015 से हर शाम बड़ी संख्या में लोग आरती के लिए जुटने लगे। अभियान के सदस्य गोस्वामी नंदन श्रोत्रिय बताते हैं कि श्रद्धालुओं और कार्यकर्ताओं की संख्या लगातार बढ़ती गई।  

लेकिन यह आरती सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं थी। आरती के बाद यमुना की हालत, प्रदूषण, कचरा, पानी की कमी और सरकारी वादों पर चर्चा होती थी। एनडीटीवी स्वच्छ इंडिया ने भी अभियान की दैनिक आरती और रविवार के सफाई अभियानों को प्रमुखता दी। इन सफाई अभियानों में आमतौर पर 30-40 स्वयंसेवक आते थे और कई बार संख्या सौ से ऊपर पहुंच जाती थी।  

रिवर कनेक्ट का दर्शन साफ था; पहले लोगों को नदी तक वापस लाओ, फिर नदी बचाने की लड़ाई को जन आंदोलन बनाओ।  

जब पानी नहीं था, हुआ रेत स्नान  

मई 2016 में अभियान ने ऐसा प्रदर्शन किया जिसे लंबे समय तक याद रखा गया। कार्यकर्ताओं ने यमुना किनारे रेत स्नान किया। पानी की जगह शरीर पर नदी की सूखी रेत मलकर उन्होंने एक असहज सवाल खड़ा किया: जब नदी में पानी ही नहीं है, तो स्नान कैसे होगा? उन्होंने याद दिलाया कि यमुना का जल संकट हर चुनाव में मुद्दा बनता है, लेकिन चुनाव खत्म होते ही मुद्दा भी गायब हो जाता है।  

गंगा दशहरा पर भी इसी तरह का प्रदर्शन हुआ। आईएएनएस ने इसे “रॉयल सैंड बाथ” के रूप में रिपोर्ट किया। संदेश सीधा था: यमुना को सिर्फ भाषण नहीं, पानी चाहिए।  

कागज की नावों में डूबे सरकारी वादे  

सरकारी वादों पर व्यंग्य करना भी अभियान की खास शैली रही। दिल्ली-आगरा जल परिवहन के वादे की याद दिलाने के लिए कार्यकर्ताओं ने यमुना में कागज और थर्मोकोल की नावें उतारीं।  

द इंडियन एक्सप्रेस ने 2017 में रिपोर्ट किया कि ये नावें ताजमहल की ओर कुछ दूर जाकर डूब गईं। दृश्य अपने आप में पूरा व्यंग्य था: नावें चलाने की तैयारी थी, लेकिन नदी चलने लायक नहीं थी।  

इसी दौरान अभियान ने निर्बाध जलप्रवाह, नदी की सफाई, बाढ़ क्षेत्र की सुरक्षा, राष्ट्रीय नदी नीति और केंद्रीय नदी प्राधिकरण की मांग भी उठाई।  

सफाई से आगे की लड़ाई  

रविवार के सफाई अभियानों में स्वयंसेवकों ने प्लास्टिक, पॉलीथिन, मूर्तियां, कचरा और निर्माण मलबा हटाया। मगर रिवर कनेक्ट ने हमेशा कहा कि नदी किनारे झाड़ू लगाने भर से नदी जीवित नहीं होगी।  

अभियान की असली मांगें कहीं ज्यादा व्यापक हैं: नालों को टैप करना, सीवेज का उपचार, नदी तल की गाद निकालना, ड्रेजिंग, बाढ़ क्षेत्र से अतिक्रमण हटाना और पूरे साल न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह सुनिश्चित करना।  

2023 के विश्व जल दिवस पर सफाई और आरती के साथ इन मांगों को फिर उठाया गया। 2025 में नगर निगम के साथ संयुक्त सफाई अभियानों में स्कूली बच्चे, नागरिक और अधिकारी शामिल हुए। एक बड़े अभियान में करीब 25 ट्रैक्टर-ट्रॉलियां कचरे से भरी गईं।  

झुनझुना दिवस : जब आंदोलन ने व्यंग्य का सहारा लिया  

दिसंबर 2021 में रिवर कनेक्ट ने ‘झुनझुना दिवस’ मनाया। कार्यकर्ताओं ने पांच मिनट तक झुनझुने बजाकर जनप्रतिनिधियों की कथित निष्क्रियता के खिलाफ विरोध जताया।  

बृज खंडेलवाल ने जनप्रतिनिधियों पर यमुना के प्रति उदासीनता का आरोप लगाया। डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य ने व्यंग्य में कहा कि यमुना पहले भी गंदी थी, आज भी गंदी है और जनप्रतिनिधियों की कृपा रही तो आगे भी गंदी रहेगी।  

यह आंदोलन की शैली का नमूना था; जब ज्ञापन बेअसर हों, तो झुनझुना बजाकर सत्ता को जगाओ।  

यमुना केवल नदी नहीं, विरासत है  

रिवर कनेक्ट ने लगातार कहा है कि यमुना का सवाल सिर्फ पर्यावरण का सवाल नहीं है। यह आगरा की विरासत, पर्यटन और अर्थव्यवस्था का भी सवाल है।  

ताजमहल, आगरा किला और कई ऐतिहासिक स्मारक यमुना के किनारे खड़े हैं। द इंडियन एक्सप्रेस ने भी यमुना के प्रदूषण और ताजमहल की सुरक्षा के बीच संबंध को रेखांकित किया है।  

अभियान का सवाल सरल है; अगर ताजमहल के आसपास का संगमरमर बचाया जा सकता है, तो उसके पीछे की नदी क्यों नहीं?  

बारह साल बाद भी मांगें वही  

रिवर कनेक्ट की प्रमुख मांगों में ताजमहल के नीचे बैराज, सालभर न्यूनतम जलप्रवाह, ड्रेजिंग और डी-सिल्टिंग, नालों का टैपिंग, सीवेज ट्रीटमेंट, बाढ़ क्षेत्र से अतिक्रमण हटाना, घाटों का पुनरुद्धार और प्रदूषण फैलाने वालों पर कार्रवाई शामिल हैं।  

इसके साथ अभियान लंबे समय से राष्ट्रीय नदी नीति और केंद्रीय नदी प्राधिकरण की मांग करता रहा है। तर्क है कि नदी प्रशासनिक सीमाओं को नहीं मानती, इसलिए उसका संरक्षण भी विभागों और राज्यों की सीमाओं में बंटा नहीं रह सकता।  

सबसे बड़ी उपलब्धि : नदी को याद रखना  

रिवर कनेक्ट की उपलब्धि सिर्फ हटाए गए कचरे या आयोजित कार्यक्रमों में नहीं है। उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने आगरा को उसकी नदी याद दिलाई।  

दैनिक आरती ने यमुना को सार्वजनिक जीवन में लौटाया। सफाई अभियानों ने नागरिक भागीदारी पैदा की। रेत स्नान ने पानी की त्रासदी दिखाई। कागज की नावों ने सरकारी वादों का मजाक उड़ाया। झुनझुना दिवस ने राजनीतिक उदासीनता पर चोट की।  

सरकारें बदलती रहीं। योजनाएं आती रहीं। समितियां बनती रहीं। घोषणाएं होती रहीं। लेकिन यमुना आज भी पानी और प्रवाह के लिए तरस रही है।  

फिर भी उसकी शामें पूरी तरह अंधेरी नहीं हैं। एत्माद-उद-दौला के किनारे हर शाम जलते दीप एक सवाल उठाते हैं: क्या ताजमहल को बचाकर उसकी नदी को मरने दिया जा सकता है?  

रिवर कनेक्ट का जवाब है: नहीं।  

यमुना को सिर्फ साफ नहीं करना है। उसे फिर से जीवित, अविरल, निर्मल और सम्मानित नदी बनाना है।


 भारत सरकार श्वेत पत्र जारी करे।

कोविड का रहस्य सुलझाने के लिए UN कराए निष्पक्ष जांच

छह साल बाद भी वह खौफनाक रात हमारा पीछा कर रही है

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

3 सितंबर 2026

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मार्च 2020 की वह काली रात याद है? सन्नाटा चीरती एंबुलेंस की चीखें। वीरान सड़कें, बंद हवाई अड्डे, ताले लगे स्कूल, अस्पतालों के बाहर मौत का इंतज़ार करती कतारें। एक खांसी डर बन जाती थी, एक छींक आफत। लोग अपने ही घरों में क़ैद थे, परिवार दूर, डॉक्टर-नर्सें टूटते जा रहे थे। कई लोग अपनों को आखिरी बार छू भी नहीं सके।

दुनिया उस बुरे सपने से बाहर तो निकल आई, लेकिन उसके सवाल अब भी जागते हैं।

वायरस आया कहां से? प्रकृति से, या इंसान और वन्यजीवों के बढ़ते टकराव से? यह वायरस के प्राकृतिक विकास की घटना थी, या इसमें किसी प्रयोगशाला की भी भूमिका रही? छह साल बाद भी इनका पूरा जवाब हमारे पास नहीं है।

मास्क गायब हो चुके हैं, हवाई अड्डे फिर भीड़ से भरे हैं, बच्चे स्कूल लौट आए हैं ,  मगर सामान्य जीवन का लौटना सवालों का अंत नहीं है। इसीलिए संयुक्त राष्ट्र को कोविड-19 की उत्पत्ति और महामारी से निपटने के तरीके की एक स्वतंत्र, निष्पक्ष, अंतरराष्ट्रीय जांच का समर्थन करना चाहिए। यह किसी को दोषी ठहराने की मांग नहीं, सच जानने की मांग है।


SARS-CoV-2 अचानक सामने आया और पूरी दुनिया में फैल गया। प्राकृतिक उत्पत्ति की संभावना आज भी गंभीरता से मौजूद है, और प्रयोगशाला दुर्घटना की बहस भी खत्म नहीं हुई ,  लेकिन किसी एक को निर्णायक रूप से साबित करने वाला पूरा प्रमाण अब तक सामने नहीं आया। यह फर्क समझना ज़रूरी है: प्रयोगशाला की संभावना का मतलब जानबूझकर वायरस फैलाना नहीं, और रहस्य बने रहना अपने आप में साजिश का सबूत नहीं। पर इतनी बड़ी ऐतिहासिक त्रासदी के साथ अनिश्चितता को हमेशा के लिए स्वीकार भी नहीं किया जा सकता। शुरुआती आंकड़ों, नमूनों और रिकॉर्ड तक पहुंच पर सवाल उठते रहे हैं। कोई निश्चित मध्यवर्ती पशु मेजबान भी आज तक नहीं मिला। दुनिया को अटकलें नहीं, सबूत चाहिए।


किसी के लिए यह कुछ दिनों की खांसी थी, किसी दूसरे के लिए मौत। कुछ स्वस्थ लोग अचानक गंभीर हालत में पहुंचे, तो कुछ संक्रमित परिवार के साथ रहकर भी बचे रहे — इन्हें अनौपचारिक रूप से "सुपरडॉजर" कहा गया। उम्र, जेनेटिक्स और प्रतिरक्षा इस अंतर की काफी हद तक व्याख्या करते हैं, फिर भी विज्ञान अब तक इस पहेली के सारे टुकड़े नहीं जोड़ पाया , एक ही वायरस किसी में हल्का तूफान क्यों बनता है और किसी दूसरे में तबाही?


लाखों लोगों के लिए कोविड बुखार उतरने के साथ खत्म नहीं हुआ। थकान, सांस फूलना, ब्रेन फॉग, नसों की परेशानी ;  आज इसे लॉन्ग कोविड कहा जाता है। प्रतिरक्षा प्रणाली में बदलाव, लगातार सूजन, ऑटोइम्यून प्रतिक्रिया और शरीर में वायरस के अवशेष रहने जैसी कई परिकल्पनाएं जांची जा रही हैं, पर एक भी सार्वभौमिक व्याख्या, आसान जांच या जादुई इलाज नहीं मिला। लाखों के लिए यह रहस्य आज भी निजी त्रासदी है।


आधिकारिक आंकड़े ही भयावह हैं, पर असली कीमत कहीं ज्यादा हो सकती है। अतिरिक्त मृत्यु दर के अध्ययन बताते हैं कि प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष मौतें दर्ज संख्या से काफी अधिक रही होंगी। कुछ अस्पताल न मिलने से मरे, कुछ ऑक्सीजन के अभाव में, कुछ का टला कैंसर इलाज या ऑपरेशन जानलेवा साबित हुआ, कुछ बुजुर्ग बिल्कुल अकेले चले गए। और आंकड़ों से बाहर भी एक विशाल नुकसान हुआ ;  पढ़ाई रुकी, रोजगार गए, अकेलापन और मानसिक आघात बढ़ा। महामारी की पूरी कीमत शायद अब तक गिनी ही नहीं गई।


आंकड़े उस दर्द को नहीं बताते जो अस्पतालों के भीतर था। मरीज परिवार का हाथ थामे बिना मर रहे थे, रिश्तेदार मोबाइल स्क्रीन पर आखिरी बार अपनों को देख रहे थे, डॉक्टर-नर्स लगातार काम करते हुए इस डर में जी रहे थे कि संक्रमण उनके घर न पहुंच जाए। जो बचकर लौटे, उनमें से कई तुरंत सामान्य जीवन में नहीं लौट पाए ,  कमजोरी, डर और सामने हुई मौतों की यादें आज भी उनका पीछा करती हैं। कोविड सिर्फ स्वास्थ्य संकट नहीं था; यह डर, अकेलेपन, शोक और इंसानी सहनशक्ति की वैश्विक परीक्षा थी।


इंसान दशकों से जंगल काट रहा है, वन्यजीवों के करीब बढ़ रहा है, शहर लगातार फैला रहा है ,  इंसान और दूसरे जीवों के बीच दूरी घट रही है। ऐसे में नई संक्रामक बीमारियों का खतरा काल्पनिक नहीं है। हो सकता है कोविड इस बढ़ते असंतुलन की चेतावनी हो, या वायरस के प्राकृतिक विकास की घटना हो, या मानव गतिविधियों ने किसी प्राकृतिक जोखिम को वैश्विक आपदा में बदलने में भूमिका निभाई हो। सच जो भी हो, हमें पूरी तरह मालूम नहीं ,  और यही वजह है कि जांच जरूरी है।


दुनिया कोविड को भूलना चाहती है, यह स्वाभाविक है। पर इतिहास को भूलना अगली त्रासदी को न्योता देना है। हमें उत्पत्ति पर पारदर्शिता चाहिए, बेहतर महामारी निगरानी चाहिए, मजबूत जैव-सुरक्षा चाहिए, लॉन्ग कोविड पर गंभीर शोध चाहिए, और यह जांचने की ज़रूरत है कि कुछ देशों की स्वास्थ्य व्यवस्थाएं संकट में इतनी जल्दी क्यों चरमरा गईं। यह जांच किसी सरकार, संस्था या विचारधारा के नियंत्रण में नहीं होनी चाहिए ,  स्वतंत्र, निष्पक्ष, अंतरराष्ट्रीय और सबूतों पर आधारित होनी चाहिए। यह किसी पसंदीदा सिद्धांत को सही ठहराने या साजिश की कहानियां फैलाने की कवायद नहीं, तथ्यों की तलाश है।

विज्ञान तब कमजोर नहीं होता जब वह कहता है "हमें नहीं पता" ,  वह तब मजबूत होता है जब कहता है "आइए, पता लगाते हैं।"

एक अदृश्य सूक्ष्म जीव ने अर्थव्यवस्थाएं रोक दीं, शहर खाली कर दिए, परिवार बांट दिए, और उस सभ्यता के अहंकार को चोट पहुंचाई जो मानती थी कि उसने प्रकृति को काबू में कर लिया है। सच जो भी हो, उसे जानना ज़रूरी है ,  क्योंकि अगली महामारी शायद हमें छह साल का समय न दे।

छह साल बाद दुनिया आगे बढ़ चुकी है, पर कोविड के सवाल अब भी जिंदा हैं। उन्हें दफनाने के बजाय, अब समय है उनका सामना करने का। संयुक्त राष्ट्र निष्पक्ष अंतरराष्ट्रीय जांच का रास्ता खोले। इतिहास को जवाब चाहिए, भविष्य को सबक।

Monday, August 31, 2026

 बहुतों को नहीं पता !!

किसने की थी साज़िश? 

संस्कृत का वो गीत जो नहीं बन सका राष्ट्र गान!!

जब भारत माता संस्कृत में गाने लगीं, तो दिल्ली ने कान क्यों बंद कर लिए?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

3 सितंबर 2026

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जयति जयति भारत माता!

कितना सरल, कितना मधुर और कितना भारतीय उद्घोष है। 

फिर सवाल उठता है, आज़ादी के बाद जब देश अपनी नई पहचान तलाश रहा था, तब ऐसा सुंदर संस्कृत गीत राष्ट्रीय मंच तक क्यों नहीं पहुंच पाया?

यह गीत दक्षिण भारत के महान कर्नाटक संगीतकार मयूरम विश्वनाथ शास्त्री (1893–1958) ने रचा था। आजादी के आसपास उन्होंने भारत माता और महात्मा गांधी की प्रशंसा में संस्कृत गीतों का संग्रह भारत भजन तैयार किया था जिसमें 18 गीत थे।

जयति जयति भारत माता उन्हीं गीतों में से एक था। इसकी धुन राग खमास में है। शब्द सरल हैं और भाव बहुत व्यापक है। भारत माता सभी की माता हैं। वह किसी जाति, भाषा या क्षेत्र में भेद नहीं करतीं। वह सज्जनों की रक्षा करती हैं और गिरे हुए लोगों को भी अपनाती हैं।

यानी आज के भारत की 'एकता में अनेकता' वाली भावना इसमें खूब दिखाई देती है।

फिर यह गीत राष्ट्रीय गीत क्यों नहीं बना?

यहीं से कहानी थोड़ी दिलचस्प हो जाती है।

आज़ादी के बाद राष्ट्रीय पहचान के प्रतीकों को लेकर काफी विचार-विमर्श हुआ। अंततः जन गण मन को राष्ट्रगान बनाया गया और वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत का सम्मान मिला।

दोनों के पीछे लंबा स्वतंत्रता आंदोलन था। जन गण मन को देशभर में पहचान मिल चुकी थी। वंदे मातरम् तो आजादी की लड़ाई का जोशीला नारा बन चुका था।

जयति जयति भारत माता की स्थिति अलग थी। यह अपेक्षाकृत नया गीत था। इसका प्रसार मुख्यतः दक्षिण भारत और कर्नाटक संगीत की दुनिया में था। दिल्ली की राजनीतिक गलियों में इसकी उतनी पहुंच नहीं थी।

लेकिन यहीं एक सवाल पैदा होता है।

क्या आजादी के शुरुआती वर्षों में कांग्रेस नेतृत्व, नेहरू सरकार और सांस्कृतिक संस्थाओं को भारत की दूसरी भाषाई और संगीत परंपराओं को राष्ट्रीय मंच देने की ज्यादा कोशिश नहीं करनी चाहिए थी?

नेहरू और उस दौर के नेताओं के सामने एक विशाल और जटिल देश था। राष्ट्रगान चुनना कोई संगीत प्रतियोगिता नहीं थी। उसमें इतिहास, स्वतंत्रता आंदोलन, सामूहिक स्वीकार्यता और सरकारी समारोहों में प्रस्तुति जैसे कई सवाल जुड़े थे।

फिर भी, दक्षिण भारत से आए इस संस्कृत गीत को राष्ट्रीय स्तर पर ज्यादा प्रचार क्यों नहीं मिला, यह सवाल पूछने में कोई हर्ज नहीं है।

संस्कृत होने का भी सवाल है

संस्कृत भारत की प्राचीन भाषा है। वह उत्तर की भी है और दक्षिण की भी। मंदिरों, दर्शन, साहित्य और शास्त्रीय संगीत की विशाल परंपरा उससे जुड़ी है।

फिर भी आजादी के बाद राष्ट्र निर्माण की राजनीति में भाषा का सवाल बेहद संवेदनशील था। हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी और क्षेत्रीय भाषाओं के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं था।

ऐसे माहौल में संस्कृत के किसी गीत को राष्ट्रीय प्रतीक बनाना शायद राजनीतिक रूप से आसान विकल्प नहीं माना गया।

लेकिन अगर ऐसा था, तो सवाल और बड़ा हो जाता है: 

क्या भारत की प्राचीन भाषाई विरासत को राजनीति के डर से पीछे कर दिया गया?

इसका सीधा दोष केवल जवाहरलाल नेहरू पर डालना इतिहास को कुछ ज्यादा सरल बना देना होगा। लेकिन नेहरू और तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व से यह सवाल जरूर पूछा जा सकता है कि उन्होंने भारत की विविध सांस्कृतिक परंपराओं को राष्ट्रीय मंच पर लाने के लिए कितना प्रयास किया।

गीत बच गया, लेकिन इतिहास की किताब में नहीं आया।

दिलचस्प बात यह है कि जयति जयति भारत माता , मरा नहीं। दक्षिण भारत के कर्नाटक संगीत जगत ने इसे अपने दिल में बचाए रखा।

महान गायक जी. एन. बालसुब्रमण्यम, जिन्हें संगीत की दुनिया में असाधारण स्थान प्राप्त था, ने इसे गाया। मदुरै मणि अय्यर और दूसरे कलाकारों ने भी इसे लोकप्रिय बनाया।

आज भी स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के अवसर पर यह गीत सुनाई देता है।

लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर इसकी पहचान अभी भी सीमित है।

भारत में अक्सर ऐसा होता है।

दिल्ली में जो गूंजता है, वह पूरे देश का गीत बन जाता है। जो चेन्नई, मैसूर, तंजावुर या मदुरै में गूंजता है, उसे 'क्षेत्रीय' कहकर छोड़ दिया जाता है।

शायद यही इस गीत की सबसे बड़ी विडंबना है।

भारत माता की स्तुति संस्कृत में हुई, धुन दक्षिण भारत से आई, भाव पूरे भारत का था, लेकिन राष्ट्रीय मंच ने उसे पूरी तरह अपना नहीं पाया।

आज, आजादी के इतने वर्षों बाद, इस गीत को फिर से सुनने की जरूरत है।

राष्ट्रगान बदलने की जरूरत नहीं है। राष्ट्रीय गीत की गरिमा भी अपनी जगह है।

लेकिन भारत की सांस्कृतिक विरासत कोई सरकारी फाइल नहीं है, जिसमें केवल दो-चार नाम दर्ज हों।

भारत माता के गीत जितने ज्यादा होंगे, भारत की आवाज उतनी ही समृद्ध होगी।

और शायद आज फिर कोई पूछ सकता है: 

जयति जयति भारत माता तो तब भी थीं, आज भी हैं।

फिर हमने उनकी यह आवाज इतनी देर से क्यों सुनी?

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जयति जयति भारत माता

जयति जयति भारत-माता बुध-गीता।

निखिल-माता वन-निरता नत-जन-सुहिता॥

सरल अर्थ:

भारत माता की जय हो, जय हो। विद्वान लोग उनका गुणगान करते हैं। वे सभी की माता हैं और प्रकृति तथा वनों से प्रेम करने वाली हैं। जो लोग उनके सामने श्रद्धा से झुकते हैं, उनका वे कल्याण करती हैं।

सकल-जीव-समता साधु-साधु-विदिता।

अखिल-लोक-पृथिता परमानन्द-समुदिता॥

सरल अर्थ:

भारत माता सभी जीवों को समान मानती हैं। सज्जन उनके गुणों को जानते और पहचानते हैं। उनकी ख्याति पूरे संसार में फैली है और वे परम आनंद से भरी हुई हैं।

अगणित-गुण-शीला अति-दयाल-बाला।

प्रकटित-शुभ-जाला पतित-प्राण-लोला॥

सरल अर्थ:

भारत माता अनगिनत गुणों से सम्पन्न हैं। वे अत्यंत दयालु हैं। उनके भीतर शुभ और मंगलकारी गुणों का प्रकाश है। गिरे हुए और दुखी लोगों के प्रति भी उनका हृदय करुणा से भर जाता है।

पण्डित-परिपूजिता पाप-सङ्ग-विवर्जिता।

खण्डित-खल-चेष्टिता अखण्ड-देश-वेष्टिता॥

सरल अर्थ:

विद्वान लोग भारत माता की पूजा और सम्मान करते हैं। वे पाप और बुराई से दूर हैं। वे दुष्टों की बुरी कोशिशों को विफल करती हैं और पूरे अखंड भारत को अपने आँचल में समेटे हुए हैं।

गीत का मूल भाव

इस गीत की सबसे सुंदर बात यह है कि इसमें भारत माता को किसी एक धर्म, जाति या क्षेत्र की माता नहीं, बल्कि सभी की माता के रूप में देखा गया है। समानता, करुणा, प्रकृति-प्रेम, सद्गुण और अखंडता इसके प्रमुख भाव हैं।

और शायद यही बात इसे आज भी प्रासंगिक बनाती है: भारत की कल्पना केवल एक भूगोल के रूप में नहीं, बल्कि एक करुणामयी और सबको साथ लेकर चलने वाली माता के रूप में की गई है।

 कब तक पुकारें?

प्रिय आगरा के नेताओं, 

कुछ तो शर्म करो


अब ताज की आड़ में मत छिपिए!

नया टूरिस्ट सीजन शुरू होने को है।

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

2 सितंबर 2026

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ताजमहल बेशक चमक रहा है। मगर आगरा परेशान है। दुनिया ताज की तस्वीरें खींचती है। आगरा के लोग गड्ढों, जाम, गंदे नालों, सीवर, जलभराव और धूल की तस्वीरें खींच रहे हैं।

प्रिय आगरा के नेताओं और शहरी नियोजकों, अब फैसला आपको करना है: आप ताज को बचा रहे हैं या सिर्फ ताज की चमक को बेच रहे हैं?

अक्टूबर से पर्यटन सीजन शुरू होगा। देश-विदेश से लाखों लोग आगरा आएंगे। उन्हें ताजमहल तो शानदार मिलेगा। लेकिन उसके आसपास का शहर क्या उन्हें शर्मिंदा करेगा?

आप के पास बहाने नहीं, सत्ता है।

2022 में भाजपा ने आगरा की सभी नौ विधानसभा सीटें जीतीं। दोनों लोकसभा सीटें भी भाजपा के पास हैं। नगर निगम में भी भाजपा का नेतृत्व है।

इतना मजबूत राजनीतिक जनादेश किसी भी शहर को बदलने के लिए पर्याप्त होना चाहिए।

फिर सवाल उठता है:

यमुना अब भी गंदी क्यों है?

सड़कें बार-बार क्यों धंसती हैं?

हर बारिश में शहर क्यों डूबता है?

ट्रैफिक रोज क्यों रेंगता है?

जनादेश सिर्फ कुर्सी नहीं देता।

जनादेश जवाबदेही भी देता है।

यमुना: घोषणाओं की नदी

यमुना के नाम पर योजनाएं बनती रही हैं। करोड़ों रुपये स्वीकृत होते रहे हैं। एसटीपी बनते रहे हैं। नालों की टैपिंग के निर्देश जारी होते रहे हैं।

लेकिन नदी आज भी सीवर ढो रही है।

आगरा रोज करीब 280-300 एमएलडी सीवेज पैदा करता है। नई उपचार क्षमता जुड़ रही है। फिर भी सभी नालों का पूरा इंटरसेप्शन और एसटीपी का लगातार मानकों के अनुसार संचालन अभी अधूरा है।

तो सवाल सीधा है?

पैसा कहां गया, काम कितना हुआ और नदी कब साफ होगी?

यमुना को एक और योजना नहीं चाहिए। उसे परिणाम चाहिए।

जब पार्षद को नाले में उतरना पड़े

जून में एक  पार्षद ने गंदे नाले में खड़े होकर अपना जन्मदिन मनाया। उनका दावा था कि तीन साल में 30 से ज्यादा शिकायतें देने के बावजूद समस्या जस की तस रही।

तस्वीर वायरल हुई। सवाल भी उठा।

लेकिन असली सवाल यह है: 

क्या किसी निर्वाचित प्रतिनिधि को अपनी ही व्यवस्था जगाने के लिए नाले में उतरना चाहिए?

अगर पार्षद की शिकायत नहीं सुनी गई, तो आम आदमी किस उम्मीद से दरवाजा खटखटाए?

सड़कें विकास की परीक्षा हैं

अगस्त की बारिश में कई जगह सड़कें धंस गईं। कहीं विशाल गड्ढे बने। कहीं एक महीने में दूसरी या तीसरी बार सड़क बैठ गई।

अधिकारी कभी सीवर लीकेज, कभी पाइपलाइन को कारण बताते हैं।

लेकिन जनता पूछ रही है:

सड़क बनाने से पहले नीचे की जमीन और पाइपलाइन किसने जांची?

किसने डिजाइन मंजूर किया?

किसने गुणवत्ता प्रमाणित की?

किस ठेकेदार ने काम किया?

गारंटी क्या थी?

और सड़क टूटने पर जिम्मेदारी किसकी तय हुई?

हर बार सड़क बनाना समाधान नहीं है।

पहले यह पता लगाइए कि सड़क बार-बार टूट क्यों रही है।

हर मानसून शहर क्यों डूबता है?

बालूगंज से दयालबाग तक। शास्त्रीपुरम से आईएसबीटी तक। यमुना किनारे से वीआईपी रोड तक।

बारिश होते ही कई सड़कें तालाब बन जाती हैं।

फिर वही दृश्य: जाम, डूबे वाहन, दुकानों में पानी और परेशान नागरिक।

क्या बारिश अचानक होती है?

नहीं।

मानसून हर साल आता है।

फिर तैयारी हर साल अधूरी क्यों रहती है?

यह मौसम की समस्या कम और शहरी नियोजन की विफलता ज्यादा है।

ट्रैफिक: डायवर्जन कोई नीति नहीं

आगरा में ट्रैफिक प्रबंधन अक्सर डायवर्जन के भरोसे चलता है।

त्योहार आया: डायवर्जन।

धार्मिक आयोजन हुआ: डायवर्जन।

भारी वाहन बढ़े: डायवर्जन।

पर्यटक बढ़े: फिर डायवर्जन।

लेकिन कब बनेगा स्थायी समाधान?

आगरा को चाहिए: 

एक दीर्घकालिक मोबिलिटी प्लान।

बेहतर सार्वजनिक परिवहन।

व्यवस्थित पार्किंग।

सुरक्षित फुटपाथ।

पैदल पर्यटकों के लिए रास्ते।

बेहतर ट्रैफिक सिग्नल समन्वय।

एक विश्वस्तरीय पर्यटन शहर जुगाड़ से नहीं चलता।

वह योजना से चलता है।

शहरी नियोजकों से भी हिसाब चाहिए

सारी जिम्मेदारी नेताओं की नहीं है।

नगर नियोजक, इंजीनियर, आर्किटेक्ट और संबंधित विभाग भी उतने ही जवाबदेह हैं।

क्या मास्टर प्लान आज की आबादी और वाहनों के हिसाब से तैयार है?

क्या नए निर्माण से पहले जलनिकासी की क्षमता देखी जाती है?

क्या तालाब, प्राकृतिक नाले और जलमार्ग सुरक्षित हैं?

क्या फुटपाथ वास्तव में पैदल चलने वालों के लिए हैं?

क्या शहर कारों के लिए बनाया जा रहा है या नागरिकों के लिए?

अगर इन सवालों के जवाब नहीं हैं, तो विकास किस दिशा में जा रहा है?

स्मार्ट सिटी या स्मार्ट मेकअप?

नई दीवार। नया रंग। नया गेट। नया उद्घाटन।

फोटो खिंचती है। खबर छपती है। फीता कटता है।

लेकिन क्या इससे सीवर रुकता है?

क्या इससे जलभराव खत्म होता है?

क्या इससे ट्रैफिक कम होता है?

क्या इससे सड़क मजबूत होती है?

सजावट विकास नहीं है।

आगरा को फोटो के लिए सुंदर नहीं, जीवन के लिए बेहतर बनाना होगा।

अब हर नेता से एक सवाल

अक्टूबर में पर्यटक आएंगे।

इसलिए आगरा के हर सांसद, विधायक, मेयर और पार्षद से पूछिये।

एक अक्टूबर तक क्या बदलेगा?

कौन-से नाले पूरी तरह टैप होंगे?

कौन-से एसटीपी पूरी क्षमता से चलेंगे?

कौन-सी सड़कें स्थायी रूप से ठीक होंगी?

कहां जलभराव खत्म होगा?

ट्रैफिक के लिए क्या स्थायी कदम उठेंगे?

कितने पार्क और तालाब बचेंगे?

हर घोषणा के साथ समयसीमा हो। जिम्मेदार अधिकारी का नाम हो। प्रगति की सार्वजनिक रिपोर्ट हो।

और अगर काम नहीं हुआ?

तो जिम्मेदारी भी सार्वजनिक हो।

व्हाट्सऐप से आगे बढ़िए

आगरा के नागरिक भी अब सिर्फ शिकायतकर्ता न रहें।

हर गड्ढे की तस्वीर डालना काफी नहीं है। हर बारिश में वीडियो बनाना काफी नहीं है। हर बार व्हाट्सऐप पर गुस्सा निकालना भी काफी नहीं है।

सवाल पूछिए।

जनसुनवाई मांगिए।

समयसीमा मांगिए।

प्रगति रिपोर्ट मांगिए।

लोकतंत्र में वोट पांच साल में एक बार पड़ता है। सवाल हर दिन पूछा जा सकता है।

ताजमहल को किसी प्रचार की जरूरत नहीं है।

उसे बनाने वाले लोग सदियों पहले चले गए। उसकी खूबसूरती आज भी कायम है।

अब आज के नेताओं की बारी है।

वे इतिहास में क्या छोड़ेंगे?

एक और उद्घाटन पट्टिका?

या ऐसा आगरा, जहां यमुना साफ हो, सड़कें मजबूत हों, बारिश में शहर न डूबे, ट्रैफिक चले और नागरिक सम्मान से जी सकें?

ताज दुनिया की धरोहर है।

आगरा यहां के लोगों का घर है।

ताज को दुनिया बचा लेगी।

आगरा को उसके नेताओं और नागरिकों को बचाना होगा।

अब ताज की चमक के पीछे छिपने का वक्त खत्म हुआ।

प्रिय नेताओं,

ताज की तस्वीरें बहुत हो गईं।

अब आगरा का रिपोर्ट कार्ड दिखाइए।

Sunday, August 30, 2026

 


सितंबर आते ही बज उठती थी Come September 

पूरा इंडिया नचा था हॉलीवुड की इस फिल्मी टयून पर

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

1 September 2026

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जरा आंखें बंद कीजिए। धूल भरी सड़क है, आगे घोड़ी पर दूल्हा है, पीछे बारातियों की भीड़। अचानक बैंड वाला अपनी तुरही उठाता है और ऐसी धुन छेड़ देता है कि बूढ़े की मूंछ भी फड़कने लगे और जवान के पैर अपने-आप थिरकने लगें। 

यही था वह दौर, जब ‘Come September’ की धुन ने भारत की शादियों, पिकनिकों और महफिलों में ऐसी दस्तक दी कि वह विदेशी होकर भी बिल्कुल अपनी लगने लगी।

साठ के दशक में हॉलीवुड फिल्म Come September  भारत पहुंची और देखते ही देखते उसकी धुन दिलों पर छा गई।

इस धुन को बॉबी डैरिन ने रचा था। फिल्म में उनके साथ रॉक हडसन, जीना लोलोब्रिजिडा और सैंड्रा डी जैसे सितारे थे। डैरिन ने बारह-तार वाले गिटार पर इसकी शुरुआती धुन तैयार की थी। मकसद था: रोमांस भी हो, लय भी हो और उसमें थोड़ी शरारत भी। नतीजा ऐसा निकला कि गिटार, मैंडोलिन, एकॉर्डियन और बोंगो की आवाजें मिलकर ऐसी दिलकश रवानी पैदा कर गईं, कि बस हर कोई ट्विस्ट करने को आतुर।

भारत में इस धुन को किसी तर्जुमे की जरूरत नहीं पड़ी। इसमें बोल नहीं थे, लेकिन कहानी पूरी थी। उसमें जवानी थी, आजादी का अहसास था और जिंदगी को थोड़ा खुलकर जीने की गुंजाइश भी। मोहल्लों में बारात निकलती तो बैंड वाले फिल्मी गीतों के साथ पश्चिमी धुनों का भी तड़का लगा देते। ‘Come September’ बजते ही बारात का अनुशासन अक्सर छुट्टी पर चला जाता था। दूल्हे के रिश्तेदार, पड़ोसी और रास्ते के तमाशबीन, सबके पैर अपनी-अपनी पॉलिटिक्स करने लगते थे।

फिर बहुत सालों बाद आई: दूसरी कमाल की धुन, ब्राजील। आर्य बारोसो की मशहूर ब्राजीली रचना Aquarela do Brasil, जिसे दुनिया ने अलग-अलग वाद्य और ऑर्केस्ट्रा संस्करणों में जाना, भारत में भी एक खास पहचान बना चुकी थी। खासकर बैंड बाजों और ऑर्केस्ट्रा की दुनिया में इसकी लय ऐसी घुसी कि शहर ही नहीं, दूरदराज के कस्बों और गांवों की शादियों तक में इसकी गूंज सुनाई देती थी। कई बार बारातियों को यह भी मालूम नहीं होता था कि धुन ब्राज़ील की है। उनके लिए वह बस ‘बैंड वाले की जबरदस्त धुन’ थी।

यही तो संगीत का कमाल है। पासपोर्ट उसका अपना होता है, लेकिन दिलों पर कोई वीजा नहीं लगता।

‘Come September’ और ‘Brazil’ जैसी धुनों ने भारत में एक अजीब सांस्कृतिक घालमेल पैदा किया। ब्राज़ील की लय, हॉलीवुड की धुन और भारतीय बारात, तीनों एक ही सड़क पर मिल गए।  शादी की रौनक में ऐसा घुल जाता था जैसे समोसे में चटनी।

‘Come September’ की सबसे बड़ी ताकत उसकी सादगी थी। धुन ऊपर जाती, नीचे आती और कानों में अटक जाती।  उस समय के ‘ट्विस्ट’ और आज के ‘फ्री स्टाइल’ के बीच शायद कोई औपचारिक समझौता नहीं था, लेकिन पैर अपना फैसला खुद कर लेते थे। विदेशी धुन भारतीय शादी के लिए तैयार थी, बस उसमें ढोल, नगाड़ा और थोड़ी देसी बेफिक्री जोड़नी थी।

बॉलीवुड भी भला पीछे कैसे रहता?

भारतीय संगीतकारों ने ‘Come September’ की लय और सुरों से प्रेरणा ली। इसकी छाप कई गीतों और बैकग्राउंड स्कोर में दिखाई दी। Hamraaz जैसी फिल्मों में इसकी गूंज महसूस हुई। बाद के दशकों में भी इसकी धुन नए रूपों में लौटती रही। राजा का ‘नजरें मिलीं, दिल धड़का’ और दूसरे लोकप्रिय गीतों में भी इस तरह की पश्चिमी लय का असर सुनाई दिया। भारतीय संगीतकार विदेशी धुनों को सुनते, उनमें से कोई टुकड़ा पकड़ते और उसे अपनी मिट्टी में रोप देते। फिर उससे एक नया पौधा निकलता, जिसमें विदेशी खुशबू भी होती और देसी रंग भी।


साठ और सत्तर के दशक की शादियों को याद कीजिए। न डीजे था, न लेजर लाइट, न कान फोड़ने वाले स्पीकर। एक बैंड था, कुछ चमकती तुरहियां थीं, ढोल था और उत्साहित बाराती थे। फिर भी मजा कम नहीं था। बल्कि शायद ज्यादा था।

आज बारात में डीजे होता है और गाने की आवाज इतनी तेज होती है कि दूल्हे को भी पता नहीं चलता कि उसकी शादी हो रही है या चुनाव प्रचार। उस जमाने में एक अच्छी धुन ही काफी थी।

‘Come September’ इसलिए याद रह गई क्योंकि उसने संगीत को केवल सुनने की चीज नहीं रहने दिया। उसने लोगों को चलाया, झुमाया और कुछ देर के लिए सामाजिक लिहाज की जंजीरें ढीली कर दीं।

‘Brazil’ ने भी यही काम अपनी अलग लय में किया। उसकी मस्ती भरी चाल ने भारतीय बारातों को बताया कि दुनिया बहुत बड़ी है, लेकिन नाचने के लिए जगह हर जगह मिल सकती है।

साठ साल से ज्यादा गुजर गए। लेकिन कभी-कभी किसी पुराने विवाह समारोह में वह धुन सुनाई पड़ जाती है तो बीता हुआ जमाना अचानक लौट आता है।

धूल उड़ती सड़क, रंगीन कपड़े, घोड़ी पर बैठा दूल्हा, हाथ में फूलों की माला और आगे-आगे उछलता बाराती।

तुरही बजती है: ‘Come September…’

और कहीं दूर से ‘Brazil’ की लय मिल जाती है।

तब समझ आता है कि संगीत की कोई सरहद नहीं होती। हॉलीवुड की धुन हो या ब्राज़ील की लय; भारत की बारात उसे अपना बना लेती है।