Wednesday, April 8, 2026

 तमाशा

दस नई टाउनशिप्स का नाम नदियों पर रखने से यमुना नहीं बचेगी

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बृज खंडेलवाल द्वारा

10 अप्रैल 2026

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आगरा के चमकदार रियल एस्टेट ब्रोशरों में एक खामोश सा तमाशा सजाया जा रहा है। दस नई टाउनशिप्स: सिंधुपुरम, गंगापुरम, यमुनापुरम, नर्मदापुरम, अपने नामों में पवित्र नदियों की याद संजोए हुए हैं। पहली नज़र में यह एक श्रद्धांजलि लगती है, जैसे हमारी सभ्यता अपने जलस्रोतों को सलाम कर रही हो। कागज़ पर बने नक्शे हरे-भरे दिखते हैं, भाषणों में तरक़्क़ी और पर्यावरण का ज़िक्र होता है। मगर इस चमक के पीछे एक कड़वी हक़ीक़त छुपी है, जो हर दिन और भी गहरी होती जा रही है।

कुछ ही दूरी पर बहती यमुना एक बिल्कुल अलग दास्तान कहती है। वह नदी कम, एक थकी हुई, दम तोड़ती धारा ज़्यादा लगती है। काला पड़ चुका पानी, बदबू, झाग और ठहराव; ये सब मिलकर उस दर्द की तस्वीर बनाते हैं जिसे हम देखना नहीं चाहते। हज़ारों लोग नदी किनारे घरों का ख़्वाब खरीद रहे हैं, लेकिन उसी नदी की साँसें घुट रही हैं। यह विरोधाभास नहीं, एक संगीन विडंबना है।

यही हमारे दौर का सबसे बड़ा फ़रेब है। हम नामों में पवित्रता ढूंढ लेते हैं, मगर ज़मीनी हक़ीक़त से आँख चुरा लेते हैं। यमुना को किसी टाउनशिप के नाम में जगह नहीं चाहिए। उसे साफ़ पानी चाहिए, बहाव चाहिए, और एक ईमानदार कोशिश चाहिए जो उसे ज़िंदा रख सके।

यमुना कोई मामूली नदी नहीं है। यमुनोत्री से लेकर प्रयागराज तक लगभग 1,376 किलोमीटर का सफ़र तय करती यह धारा करोड़ों लोगों के जीवन से जुड़ी है। यह आस्था है, रोज़गार है, विरासत है। लेकिन दिल्ली से गुजरने वाला इसका छोटा सा हिस्सा दुनिया के सबसे प्रदूषित हिस्सों में गिना जाता है। यहाँ पानी में घुली ऑक्सीजन लगभग नदारद है। जलीय जीवन की कोई गुंजाइश नहीं बची।

त्योहारों के समय जो दृश्य सामने आता है, वह दिल दहला देता है। लोग श्रद्धा से डुबकी लगाते हैं, मगर पानी झाग से भरा होता है। यह झाग किसी चमत्कार का नहीं, बल्कि डिटर्जेंट और रसायनों का नतीजा है। एक तरह से हम एक बीमार नदी से जीवन की दुआ मांगते हैं।

सरकारों के पास इसका जवाब अक्सर बजट के आंकड़ों में मिलता है। हज़ारों करोड़ रुपये खर्च किए जाते हैं। योजनाएँ बनती हैं, घोषणाएँ होती हैं, और हर बार उम्मीद जगाई जाती है कि अब हालात बदलेंगे। लेकिन सच यह है कि निवेश और नतीजों के बीच एक गहरी खाई बनी हुई है। पैसा बहता है, मगर नदी साफ़ नहीं होती।

दिल्ली की सफाई योजनाएँ मुख्यतः सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स पर टिकी हैं। इनकी संख्या बढ़ाने, उन्हें आधुनिक बनाने और ड्रेनेज सुधारने की बातें होती हैं। यह सब ज़रूरी है, मगर काफ़ी नहीं। शहर हर दिन भारी मात्रा में सीवेज पैदा करता है, और मौजूदा संयंत्र उस दबाव को झेल नहीं पा रहे। कई प्लांट आधी क्षमता पर चलते हैं। तकनीक पुरानी है, रखरखाव अधूरा है, और व्यवस्था बिखरी हुई है।

और सबसे बड़ी समस्या यह है कि सारा सीवेज इन प्लांट्स तक पहुँचता ही नहीं। टूटे-फूटे सीवर, अवैध कनेक्शन और लापरवाही का आलम यह है कि गंदा पानी सीधे नदी में गिरता है। ऐसे में कितनी भी बड़ी योजना बना ली जाए, उसका असर सीमित ही रहेगा।

गुरुग्राम की कहानी इस संकट को और गहरा करती है। तेज़ी से बढ़ते इस शहर ने विकास तो देखा, मगर बुनियादी ढांचे को उसी गति से नहीं बढ़ाया। नतीजा यह हुआ कि भारी मात्रा में प्रदूषण यमुना तक पहुँचने लगा। सीवेज और औद्योगिक कचरा बिना पर्याप्त उपचार के नदी में जाता है। क़ानून मौजूद हैं, लेकिन उनका पालन कमज़ोर है।

यह पूरा परिदृश्य एक बड़ी प्रशासनिक नाकामी की तरफ़ इशारा करता है। अलग-अलग राज्य अपनी-अपनी सीमाओं में काम करते हैं, जबकि नदी किसी सरहद को नहीं मानती। अगर एक जगह सुधार हो और दूसरी जगह से प्रदूषण जारी रहे, तो पूरी मेहनत बेकार हो जाती है।

अब ज़रूरत है सोच बदलने की। परियोजनाओं के स्तर से आगे बढ़कर एक समग्र व्यवस्था बनानी होगी। छोटे और विकेंद्रीकृत समाधान अपनाने होंगे। स्थानीय स्तर पर ट्रीटमेंट की व्यवस्था करनी होगी। प्राकृतिक तरीकों; जैसे आर्द्रभूमि और हरित बफर ज़ोन, को अपनाना होगा।

इसके साथ ही जवाबदेही तय करनी होगी। जो प्रदूषण फैलाए, उसे इसकी क़ीमत चुकानी पड़े। निगरानी पारदर्शी हो, आंकड़े सार्वजनिक हों, और उल्लंघन पर सख़्त कार्रवाई हो। यह तभी मुमकिन है जब नीयत साफ़ हो और अमल सख़्त।

सबसे अहम बात, एक ऐसा तंत्र बने जो पूरे यमुना बेसिन को एक इकाई की तरह देखे। राज्यों के बीच तालमेल हो, साझा लक्ष्य हों, और नियमों का पालन सुनिश्चित किया जाए।

यमुना का संकट केवल पर्यावरण का मसला नहीं है। यह हमारे शासन, हमारी प्राथमिकताओं और हमारी संवेदनशीलता का आईना है। नदी को नामों से नहीं, काम से बचाया जा सकता है।

हमें यह मानना होगा कि पैसा अकेला हल नहीं है। जब तक नीयत में खोट, व्यवस्था में ढील और सोच में दिखावा रहेगा, तब तक यमुना की हालत नहीं सुधरेगी।

वक़्त अभी हाथ से पूरी तरह निकला नहीं है, लेकिन मोहलत कम है। लोग प्रार्थना कर चुके हैं, नेता वादे कर चुके हैं, और बाज़ार अपने सपने बेच चुका है। अब ज़रूरत है एक सच्ची, ठोस और ईमानदार कोशिश की।

यमुना को बस एक चीज़ चाहिए; जीने का हक़।


Tuesday, April 7, 2026

 समय से नहीं, समय के ऊपर चलते हम?

लेट लतीफी नहीं, अच्छे समय का गायन, भारतीय जीवन की असली टाइमिंग


बृज खंडेलवाल द्वारा 



घड़ी टिक-टिक करती है। हम मुस्कुराते हैं। जितने बजे का कार्यक्रम होता है, उतने बजे हम तैयार होना शुरू करते हैं। टैम से पहुंचकर होस्ट को टेंशन नहीं देने का। अपने यहाँ समय चलता नहीं… बहता है।

पश्चिम के पास जीपीएस है। हमारे पास उससे कहीं आगे की चीज़ है। एक अदृश्य, आत्मिक नेविगेशन सिस्टम। रास्ते में ट्रैफिक हो, बरसात हो, अचानक कोई बारात मिल जाए, या बस मन कहे कि अभी बैठकर चाय पी लो… समय खुद एडजस्ट हो जाता है। कई बार ऐन वक्त कुतिया हंगासी हो जाती है।

हम देर को संदर्भ के साथ पहुँचना कहते हैं। सवाल यह नहीं कि आप लेट हैं। सवाल यह है कि आप खाली तो नहीं आए?

अपनी सोसायटी में समय सीधी रेखा नहीं है। यह गोल है। लचीला है। बिल्कुल भारतीय लोकतंत्र की तरह। सुबह 10 बजे की मीटिंग दो दुनियाओं में एक साथ चलती है। एक में एक बेचारा समय पर पहुँचकर कुर्सियाँ गिन रहा होता है। दूसरी में लोग 10:47 पर प्रवेश करते हैं, पेट भरा हुआ, चेहरे पर शांति, और पहला वाक्य यही… यह मीटिंग व्हाट्सऐप पर हो सकती थी।

पश्चिम का मिनट लोहे की छड़ है।

भारत का मिनट रबर बैंड है।

खींचो, मोड़ो, जी लो।

इतिहास उठाकर देख लीजिए। ताजमहल 22 साल में बना। क्या शाहजहाँ हर देरी पर माथा पकड़कर बैठ गया था? नहीं। उसने चाय पी। इंतजार किया। गुंबद आखिर आ ही गया। आज दुनिया फोटो खिंचवाती है, ठेकेदार का “बस पाँच मिनट” इतिहास बन गया।

रेलवे अंग्रेज लाए थे, टाइम टेबल के साथ। हमने उसे आत्मा दे दी। अब ट्रेनें समय पर नहीं चलतीं, आस्था पर चलती हैं। 6:15 की शताब्दी लेट नहीं है। वह बस इरादे और वास्तविकता के बीच कहीं ध्यान लगा रही है।

और बहाने? अरे वह तो हमारी सांस्कृतिक धरोहर है।

नौसिखिया कहेगा, ट्रैफिक था।

मध्यम स्तर वाला कहानी गढ़ेगा, जुलूस था, शायद त्योहार, शायद राजनीति, सड़कों ने साथ छोड़ दिया।

मास्टर खिलाड़ी आएगा, बैठेगा, पानी मांगेगा, और बोलेगा, ड्राइवर के चचेरे भाई के पड़ोसी की तबीयत… छोड़िए, बहुत मुश्किल सुबह थी। आपने खाना खाया?

असली कला तब है जब आप देर से आएँ और सामने वाला माफी माँगने लगे कि वह गलत जगह इंतजार करता रहा।

हमारे वादे भी सीधे नहीं होते। “मैं पहुँच रहा हूँ” का मतलब है कि इस क्षण मेरी आत्मा पहुँचने की इच्छा रखती है। शरीर का क्या होगा, वह भगवान जाने।

“जल्द मिलते हैं” एक भावना है, योजना नहीं।

“एंड ऑफ डे” किस दिन का अंत है, यह शोध का विषय है।

और शादी? वह तो समय की अंतिम परीक्षा है।

निमंत्रण में 7 बजे लिखा होता है।

सच्चाई में रात 10 बजे भी लोग पूछ रहे होते हैं, दूल्हा आया क्या?

बारात तीन घंटे देर से।

लड़की वाले खुश। तैयारी पूरी हुई।

फेरे तब शुरू जब पंडित और कैटरर की बहस खत्म।

डिनर आधी रात।

डीजे मंगलवार तक।

यह अव्यवस्था नहीं है। यह सामूहिक सहमति है कि समय को इतना गंभीर मत लो।

जो लोग समय पर पहुँचते हैं, उनसे एक छोटा सा सवाल है। इतना समय था आपके पास? 7:30 पर तैयार होकर गाड़ी में बैठे रहे? मोबाइल रिफ्रेश करते रहे? और फिर 8 बजे पहुँचकर मौसम पर चर्चा की?

जो 10 बजे आता है, वह दिन जीकर आता है। उसके पास किस्से होते हैं। वही पार्टी है।

और अगर कोई टोक दे, आपने 6 बजे कहा था…

तो मुस्कुराइए।

कहिए, हाँ, और मैं आ गया।

स्पष्टीकरण मत दीजिए। स्पष्टीकरण अपराधबोध की निशानी है। आप उस सभ्यता के नागरिक हैं जिसने शून्य दिया। आपको पता है कि शून्य और 6 बजे में गहरा रिश्ता है… दोनों ही लचीले हैं।

सच तो यह है कि हम इसी आईएसटी पर चलते हुए दुनिया की सबसे बड़ी लोकतंत्र बन गए। मंगल तक पहुँच गए। अर्थव्यवस्था दौड़ा दी।

हम समय से नहीं बंधे। समय हमसे बंधा है।

और अगर कभी हम सचमुच समय पर हो गए…तो शायद यह सारा जादू खत्म हो जाए। इसलिए हम देर नहीं करते।हम बस समय को थोड़ा और जी लेते हैं।

 


वीआईपी संस्कृति: हमारे 'भव्य' समाजवाद का 'आलीशान' सलाम

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बृज खंडेलवाल द्वारा

9 अप्रैल 2026 

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अहा, असली भारतीय पल! आप लेट हैं। फैशनेबली लेट नहीं। बॉलीवुड हीरो की एंट्री वाली लेट नहीं। नहीं, बल्कि सही मायने में, ट्रैजिकली, “हे भगवान, बॉस मुझे नौकरी से निकाल ही देगा” वाली लेट। पसीना आपकी रीढ़ से टपकता है जैसे किसी दिवालिया कंपनी की तिमाही रिपोर्ट। और फिर: धमाका! सड़क जम जाती है। धीमी नहीं। जाम नहीं। जम जाती है। जैसे आपकी सैलरी का इंक्रीमेंट, जो कभी आता ही नहीं।

क्यों?

क्योंकि कहीं, किसी आम आदमी की औकात से परे, एक वीआईपी... चल रहा है। पहुंच नहीं रहा। सेवा नहीं कर रहा। बस... चल रहा है। जैसे किसी फिल्म का सेट हो, और आप एक्स्ट्रा हों।

सायरन फट पड़ते हैं जैसे दिवाली के वो पटाखे, जो टैक्सपेयर के पैसे से ही नहीं, बल्कि हमारे धैर्य की भी धज्जियाँ उड़ाते हुए स्पॉन्सर किए गए हों। ट्रैफिक पुलिस हवा से प्रकट हो जाती है, परेशान कबूतरों की तरह हाथ लहराती हुई, जो शायद खुद सोच रहे हों कि ये कबूतर क्यों नहीं हैं। बैरिकेड्स, जो चुनावी वादों से भी तेज खड़े हो जाते हैं, आपकी उम्मीदों को और भी धीमा कर देते हैं। और आप? आप वहीं खड़े रहते हैं। हेलमेट हाथ में, उम्मीद जेब में, और गरिमा कब की कहीं और, शायद किसी वीआईपी की गाड़ी के नीचे कुचली जा चुकी है। जैसे कोई बाराती जिसका बैंड वाला, दूल्हे की जगह दुल्हन के साथ ही हवा हो गया हो।

स्वागत है दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में, जहाँ समानता एक खूबसूरत थ्योरी है, और वीआईपी काफिले उसकी रोजाना की 'मौत' के जनाजे।

हमें बताया गया था कि समाजवाद का मतलब 'सब बराबर'। पर किसी ने ये नहीं बताया कि कुछ ‘इक्वल-प्लस’, ‘इक्वल-प्रीमियम’ और ‘इक्वल-विद-लाइफटाइम-फ्री-फास्टैग’ के स्पेशल पैकेज भी आते हैं, जो सिर्फ 'खास' लोगों के लिए होते हैं।

इस महान गणराज्य में, आपका वोट पवित्र है। आपका समय? अरे, वो तो कबाड़ है, जब तक वीआईपी की मर्ज़ी हो।

आप सिग्नल पर रुकते हैं। वे सिग्नल को 'वैकल्पिक' मानकर 'मिटा' देते हैं।

आप कतार में खड़े होते हैं। वे कतार को "महत्वपूर्ण लोगों के लिए, जो आम जनता से 'अलग' हैं, के लिए विशेष प्रवेश" करार दे देते हैं।

आप अपॉइंटमेंट बुक करते हैं। वे पूरे शहर को 'अपने लिए' बुक कर लेते हैं।

मंदिर की लाइन छह घंटे लंबी। भक्त भजन गाते हैं, ध्यान करते हैं, शानदार तरीके से बूढ़े हो रहे हैं। अचानक, 'द ग्रेट एंट्री' होती है। नेताजी, परिवार, विस्तारित परिवार, भावनात्मक समर्थन वाले चचेरे भाई, और एक कन्फ्यूज्ड कुत्ता (शायद वो भी वीआईपी कैटेगरी में हो!)। वे सीधे अंदर चले जाते हैं। भगवान स्पष्ट रूप से वीआईपी ड्यूटी पर हैं, या शायद वीआईपी की पूजा कर रहे हैं।

“हे भक्त, थोड़ा रुकिए। भगवान अभी ‘प्राथमिकता दर्शन’ में व्यस्त हैं, जो सिर्फ वीआईपी के लिए आरक्षित है।”

याद है वो महान लाल बत्ती क्रांति? वो भव्य घोषणा भाजपा सरकार की। वो भावुक राष्ट्रीय डिटॉक्स। “अब कोई लाल बत्ती नहीं!” गर्जा सिस्टम, जैसे कोई नया एड-ब्लॉकर लॉन्च हुआ हो।

और बस, 'पुफ्फ'! वीआईपी संस्कृति गायब हो गई।

...सिवाय, वो गायब नहीं हुई। उसने सिर्फ अवतार बदल लिया। लाल बत्ती ने आध्यात्मिक यात्रा कर ली। उसने मोक्ष प्राप्त किया। वो अब नीली लाइट्स, पायलट कारों, काली फिल्म वाली खिड़कियों और उस अनोखे MEP (मोर इक्वल पर्सन) के ऑरा में प्रकट होती है।

क्योंकि चलिए, ईमानदार बनें। जब आपका अहंकार बत्ती से ज्यादा चमकता हो, तो बत्ती की क्या ज़रूरत?

हम औपनिवेशिक नशे को दोष देते हैं। लेकिन कम से कम ब्रिटिश, अपनी 'राज' वाली दादागिरी में, ब्रांडिंग में ईमानदार थे। उन्होंने इसे “राज” कहा। हम इसे “पब्लिक सर्विस” कहते हैं, जहां पब्लिक सर्विस खुद इंतजार करती है, जब तक कि 'खास' लोग अपनी सर्विस पूरी न कर लें।

1947 में शासक बदल गए। नियम? वो तो बस, 'अपडेट' हो गए।

ताज गायब हो गए। काफिले 'अपग्रेड' हो गए।

पहले साहब कहता था, “मेरे रास्ते से हटो।”

अब 'नेताजी' कहते हैं, “मेरे लोकतंत्र से हटो।”

और सुरक्षा; ओह, वो भव्य, सिनेमाई, स्लो-मोशन सुरक्षा।

जेड-प्लस। जेड-माइनस। जेड-इनफिनिटी। इस रफ्तार से तो उनकी परछाइयां भी जल्दी 'आर्म्ड प्रोटेक्शन' मांगने लगेंगी।

ये आधे नेता ऐसे चलते हैं जैसे राष्ट्र का आखिरी बचा वाई-फाई पासवर्ड उनके पास हो। काली एसयूवी फॉर्मेशन में सरकती हुई निकल जाती हैं। जवान, मासूम पैदल यात्रियों को ऐसे घूरते हैं जिनका सबसे बड़ा अपराध है "दो-पहिया" होना।

खतरे की धारणा? बिल्कुल।

इधर, पब्लिक सर्विसेज ने भी चुपके से वही 'फिलॉसफी' अपना ली है। एयरपोर्ट्स पर वीआईपी लाउंज, जहां समय अलग 'वीआईपी स्पीड' से बहता है। हॉस्पिटल्स में वीआईपी वार्ड, जहां बीमारियां भी सम्मान दिखाती हैं और विनम्रता से इंतजार करती हैं (शायद वीआईपी की मर्ज़ी हो तो)। रेलवे में वीआईपी कोटा, जहां वेटिंग लिस्ट भी खुद को 'हीन' महसूस करती है।

आपकी इमरजेंसी उनकी 'छोटी-मोटी' असुविधा।

उनकी (वीआईपी की) 'छोटी-मोटी' असुविधा? राष्ट्रिय इमरजेंसी!

ये असमानता नहीं। ये तो 'कोरियोग्राफी' है। विशेषाधिकार का खूबसूरती से रिहर्स्ड बैले, जहाँ आम आदमी 'बैकग्राउंड प्रॉप नंबर 47' का रोल प्ले करता है।

और समाधान?

अहा, शाश्वत भारतीय समाधान। कमेटियां। पैनल। घोषणाएं। हैशटैग।

“इक्वालिटी इनिशिएटिव 2.0”

“मिशन समता”

“सबका टाइम, सबका ट्रैफिक”

फोटो ऑप्स होंगे। नेता कैमरे पर सादा भोजन खाएंगे, क्रॉस-लेग्ड 11 मिनट के लिए, बिल्कुल, फिर वापस बुलेटप्रूफ बुफे पर लौटेंगे। उनके बच्चे विदेश में समानता पढ़ेंगे, एसी क्लासरूम में, जबकि आप लाल बत्तियों पर धैर्य की शिक्षा लेंगे, जो सिर्फ और सिर्फ आपके लिए हैं।

तो हम यहीं हैं। इंजन ऑफ। गुस्सा ऑन। लोकतंत्र पॉज।

काफिला दूर गायब हो जाता है। सड़क फिर खुल जाती है, जैसे कुछ हुआ ही न हो। जिंदगी फिर से अपनी गति पकड़ लेती है। आप एक्सीलरेट करते हैं। लेट। फिर से।

और कहीं गहरे अंदर, एक शांत अहसास, किसी सायरन से तेज हॉर्न बजाता है:

हमने सामंतवाद खत्म नहीं किया।

हमने उसे 'अपग्रेड' किया है।

अब अगर माफ़ करेंगे, वही काफिला उल्टी दिशा से लौट रहा लगता है।

शायद समानता दूसरी लेन में फंस गई है, या फिर 'विशेष अनुमति' का इंतजार कर रही है।

Monday, April 6, 2026

 क्या भारत सिर्फ वोट डाल रहा है… या सत्ता का हिसाब भी मांग रहा है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

8 अप्रैल 2026

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पड़ोस में युद्ध की गूंज है। सीमाओं के पार बारूद की गंध है। और इसी बीच भारत के चार राज्य वोट डालने निकल पड़े हैं। सवाल सीधा है, लेकिन जवाब धुंधला। क्या ये चुनाव सिर्फ सरकार चुनने के लिए हैं… या सत्ता का लेखा-जोखा मांगने के लिए?

ऊपरी तस्वीर शांत दिखती है। कोई बड़ा उलटफेर नहीं। अनुमान कहते हैं असम में भाजपा की पकड़ बनी रहेगी। तमिलनाडु में स्टालिन की सरकार टिकी रहेगी। केरल में समीकरण ज्यादा नहीं बदलेंगे। पश्चिम बंगाल में हलचल है, पर भूकंप नहीं। यानी नतीजे शायद चौंकाएं नहीं।

लेकिन चुनाव सिर्फ नतीजों का खेल नहीं होते। वे मन की हलचल का आईना भी होते हैं।

इस बार मतदाता एक आवाज में नहीं बोल रहा। चार दिशाओं से चार अलग सुर उठ रहे हैं। केरल की सोच अलग है। बंगाल की धड़कन अलग। असम की बेचैनी अलग। तमिलनाडु का मिजाज अलग। एक शरीर है लोकतंत्र का, लेकिन दिल चार जगह धड़क रहा है।

केरल में मतदाता आज भी पढ़ता हुआ बूथ तक जाता है। वहां विचारधारा अब भी जिंदा है। लेकिन इस बार उस विचार में एक थकान घुली है। मतदान प्रतिशत में मामूली गिरावट आंकड़ा नहीं, संकेत है। लंबे संघर्ष के बाद आई हुई एक धीमी सांस।

पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र कभी शांत नहीं रहता। यहां वोट देना भी एक प्रदर्शन है। भीड़, नारे, जोश। यहां फुसफुसाहट भी फैसला बन जाती है। हर वोट एक बयान है। हर बूथ एक जंग का मैदान।

असम में मामला और गहरा है। यहां वोट सिर्फ सरकार के लिए नहीं डाला जाता। यहां पहचान दांव पर होती है। कौन अपना, कौन पराया। कागज, नागरिकता, जमीन। वोट यहां अधिकार से ज्यादा अस्तित्व बन जाता है।

तमिलनाडु में राजनीति एक रंगमंच है। चेहरे वही हैं, संवाद भी जाने-पहचाने। लेकिन दर्शकों का मूड बदल रहा है। शहरों में एक ठंडापन है। गांवों में अब भी गर्मी बची है। बीच में खड़ा मतदाता सोच रहा है, क्या कहानी अब भी वही रहेगी?

इन सबके नीचे एक अदृश्य धागा है जो चारों राज्यों को जोड़ता है। थकान। महंगाई। और वादों से उपजी निराशा।

वादे तेज होते जा रहे हैं। लेकिन उनका निभना धीमा पड़ता जा रहा है। रसोई में महंगाई की आंच तेज है। युवाओं के हाथ में डिग्री है, लेकिन नौकरी नहीं। घर के बजट में खामोशी है, लेकिन चिंता बहुत बोलती है।

केरल में कल्याण योजनाएं अब सवालों के घेरे में हैं। भरोसा टूट नहीं रहा, लेकिन घिस जरूर रहा है।

बंगाल में बेरोजगारी और कानून व्यवस्था नारों में बदल चुके हैं। राजनीति यहां सीधी टक्कर में है।

असम में पहचान की बहस हर घर तक पहुंच चुकी है। यह मुद्दा नहीं, रोजमर्रा की सच्चाई है।

तमिलनाडु में कर्ज, अपराध और अधूरे वादों की परतें एक जटिल तस्वीर बनाती हैं।

और तभी राजनीति एक पुराना दरवाजा खटखटाती है। आसमान की ओर देखती है। ज्योतिष की एंट्री होती है। ग्रह-नक्षत्रों की चाल पढ़ी जाती है। राजयोग खोजे जाते हैं। मानो जमीन के सवालों का जवाब आसमान में छिपा हो।

लेकिन सच यह है कि चुनाव न तो पूरी तरह गणित हैं, न पूरी तरह किस्मत। यह मनोविज्ञान है। एक छोटी सी लहर पूरी तस्वीर बदल सकती है। तीन प्रतिशत का झटका सत्ता हिला सकता है। एक वीडियो, एक बयान, एक गलती महीनों की मेहनत पर पानी फेर सकती है।

तो यह चुनाव आखिर है क्या?

जनादेश?

एक और पड़ाव?

या एक खामोश ऑडिट?

शायद यह तीनों का मिश्रण है।

अगर सत्ताधारी गठबंधन नए इलाकों में पैर पसारता है, तो उसकी ताकत बढ़ेगी। अगर क्षेत्रीय दल टिके रहते हैं, तो संदेश साफ होगा कि भारत एक नहीं, कई भारतों का देश है।

यहां हर राज्य अपनी भाषा में वोट करता है।

केरल विचारधारा में बोलता है। बंगाल व्यक्तित्व में। असम पहचान में। तमिलनाडु विरासत में।

और इनके बीच खड़ा है आम मतदाता। न नारों में, न बहसों में। चुप। धैर्यवान। थोड़ा थका हुआ। वह वोट देता है उम्मीद में नहीं, राहत की तलाश में। महंगाई से राहत। अनिश्चितता से राहत। अधूरे वादों के बोझ से राहत।

मतपेटी बंद हो जाएगी। स्याही सूख जाएगी। टीवी स्टूडियो का शोर थम जाएगा।

लेकिन असली सवाल वहीं रहेगा। क्या यह सिर्फ वोट था… या सत्ता के खिलाफ दर्ज एक खामोश हिसाब?

 स्क्रीन का साम्राज्य: लोकतंत्र या एल्गोरिद्म का राज?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

7 अप्रैल 2026

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दरवाज़ा खुला है। भीतर कुर्सी पर सरकार नहीं, एक स्क्रीन बैठी है। उंगली रखिए, पहचान हो जाएगी। क्लिक कीजिए, हक मिल जाएगा। सुविधा इतनी सहज कि सवाल पूछना असभ्यता लगे। मगर असली मालिक कौन है? नागरिक या चुपचाप गणना करता एल्गोरिद्म?

भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने की दौड़ में है। अब यह दौड़ सड़कों और कारखानों से आगे निकलकर सर्वरों और प्लेटफॉर्मों पर आ चुकी है। डिजिटल गवर्नेंस अब महज़ औज़ार नहीं रहा, यह राज्य और नागरिक के बीच नए सामाजिक अनुबंध का शिल्पकार बन गया है। पहचान, भुगतान, शिकायत, सब कुछ एक क्लिक पर। लेकिन जहां रोशनी है, वहीं परछाईं भी लंबी होती है।

डिजिटल गवर्नेंस का अर्थ सीधा है। शासन में डेटा, तकनीक और प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल। लक्ष्य भी साफ है। सेवाएं तेज हों, पारदर्शिता बढ़े, नागरिक की भागीदारी मजबूत हो। भारत ने इसे “डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर” के रूप में गढ़ा है। आधार, यूपीआई, ओएनडीसी जैसे प्लेटफॉर्म ने राज्य की क्षमता को कई गुना बढ़ा दिया। 2024-25 में आधार ने 2700 करोड़ से अधिक प्रमाणीकरण किए। डीबीटी के जरिए 90 करोड़ से अधिक लोगों तक सीधे लाभ पहुंचे। MyGov जैसे मंचों ने नागरिक को नीति-निर्माण में आवाज दी।

यहीं लोकतंत्र का डिजिटल रूप दिखता है। लाइनें खत्म। संवाद शुरू।

अब जरा खाड़ी देशों की तरफ देखिए। यूएई और सऊदी अरब ने डिजिटल गवर्नेंस को दक्षता के हथियार की तरह इस्तेमाल किया है। वहां सब कुछ तेज है, सटीक है, केंद्रीकृत है।

फर्क साफ दिखता है। भारत में खुला, सहभागिता आधारित मॉडल, बहस और फीडबैक के साथ। उधर टॉप-डाउन व्यवस्था, नियंत्रण के साथ सेवा। सऊदी अरब में 2024 तक 87 प्रतिशत सरकारी सेवाएं डिजिटल हो चुकी हैं। यूएई “पुलिस विदाउट पुलिसमैन” जैसे मॉडल पर काम कर रहा है, जहां निगरानी इंसान नहीं, तकनीक करती है।

भारत का रास्ता अलग है। यहां डिजिटल लोकतंत्र की कोशिश है। मगर यह रास्ता अभी असमान है। इंटरनेट पहुंच 72 प्रतिशत है, पर ग्रामीण भारत में यह लगभग 55 प्रतिशत तक सिमटी है। लोकतंत्र डिजिटल है, बराबरी अभी अधूरी है।

इस बदलाव ने रिश्ता बदल दिया है। पहले सरकार दूर थी, नागरिक लाइन में खड़ा था। अब सरकार स्क्रीन पर है, नागरिक ऐप में सिमट गया है। यह सिर्फ सुविधा नहीं, सत्ता का पुनर्वितरण है। नागरिक अब डेटा का स्रोत भी है और निगरानी का विषय भी।

खतरा यहीं छिपा है।

डेटा का केंद्रीकरण बढ़ रहा है। आधार, यूपीआई, स्वास्थ्य और शिक्षा पोर्टल, सब एक-दूसरे से जुड़े हैं। इससे दक्षता बढ़ती है, पर एक विशाल डेटा बैंक भी बनता है। अगर यह डेटा गलत हाथों में गया, तो निजता हवा हो जाएगी।

और जब सिस्टम “ना” कह दे, तो जवाबदेह कौन होगा? कोड, अधिकारी या मंत्री? यह धुंध अभी छंटी नहीं है।

डिजिटल डिवाइड भी कम चुनौती नहीं। शहरों में ऐप, गांवों में अब भी कागज़। एक ही देश में दो तरह की नागरिकता उभरती दिख रही है। एक क्लिक करने वाली, दूसरी इंतजार करने वाली।

समाधान का रास्ता सीधा है, मगर आसान नहीं। संतुलन और सख्त कानूनी सुरक्षा। डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट 2023 एक अहम कदम है। कंसेंट आधारित डेटा उपयोग, डेटा न्यूनतमकरण, डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड। पर असली परीक्षा लागू करने की है। सरकारी एजेंसियों को मिली छूट पर कड़ी निगरानी जरूरी है। नियमित ऑडिट और स्वतंत्र निगरानी संस्थाएं अनिवार्य बनानी होंगी।

डिजिटल समावेशन के बिना यह क्रांति अधूरी रहेगी। भारतनेट का विस्तार, 2030 तक 90 प्रतिशत कनेक्टिविटी, PMGDISHA के जरिए डिजिटल साक्षरता, स्थानीय भाषाओं में एआई सेवाएं, कॉमन सर्विस सेंटर के जरिए सहायक पहुंच। और सबसे अहम, डिजिटल को सुविधा नहीं, अधिकार बनाना होगा।

विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं। हर बड़े डिजिटल प्रोजेक्ट के लिए एल्गोरिद्मिक इम्पैक्ट असेसमेंट जरूरी हो। ओपन सोर्स को बढ़ावा मिले। नागरिक ऑडिट की व्यवस्था बने।

क्योंकि तकनीक तटस्थ नहीं होती। वह जिस हाथ में होती है, उसी की ताकत बनती है।

खाड़ी देशों से सबक साफ है। दक्षता और नियंत्रण का आकर्षण तेज होता है। सब कुछ व्यवस्थित, बिना शोर, बिना बहस। मगर यही खामोशी सबसे बड़ा जोखिम है। वहां डिजिटल गवर्नेंस ने राज्य को मजबूत किया, नागरिक को नहीं।

भारत अगर आंख मूंदकर इस राह पर चला, तो डिजिटल लोकतंत्र चुपचाप डिजिटल अधिनायकवाद में बदल सकता है।

इसलिए असली लड़ाई कोड में है। एल्गोरिद्म में है।

तकनीक को लोकतंत्र के अधीन रखना होगा, लोकतंत्र को तकनीक के हवाले नहीं करना होगा।

विकसित भारत 2047 का सपना सिर्फ तेज सर्वर और स्मार्ट ऐप से पूरा नहीं होगा।

यह पूरा होगा नागरिक अधिकारों की सुरक्षा से, पारदर्शी एल्गोरिद्म से, और समावेशी पहुंच से।

अंतिम सवाल वही है।

क्या हम स्क्रीन को अपना सेवक बनाए रखेंगे, या खुद उसके नागरिक बन जाएंगे?

स्क्रीन चमक रही है।

फैसला अभी भी हमारे हाथ में है।

Sunday, April 5, 2026

 हम तो कठपुतलियां हैं, नचाता तो कोई और ही है!

हर शख्स पूछ रहा है ,  कब अंधेरी रात की सुबह होगी?  

नेता नहीं बता पा रहे, पूछते हैं ज्योतिषियों से।  

क्या सचमुच आसमान युद्ध का फैसला लिख रहा है? या फिर इतिहास अब भी ट्रंप के हाथों में है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा  

6 अप्रैल 2026

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आसमान अशांत है। आग लगी हुई है। चीन और रूस ऐसे खामोश हैं जैसे कुछ हुआ ही न हो। जबकि ज़मीन पर धुआँ है, बारूद है और बेचैनी है।

बेचारा ट्रंप क्या करे। ग्रह-नक्षत्र उसे चैन से रहने नहीं दे रहे। ज्योतिषियों का दावा है कि ऊपर ग्रहों की चाल ही नीचे युद्ध की दिशा तय कर रही है। अमेरिका और इज़राइल की अगुवाई में ईरान के खिलाफ छिड़ा संघर्ष छह दिनों की जगह अब छठे हफ्ते में प्रवेश कर चुका है। शुरुआत का पलड़ा साफ तौर पर एक तरफ झुका दिखता है। लेकिन अंत अब भी धुंध में लिपटा है ;  लंबा, उलझा हुआ, थकाने वाला।

“इतिहास की सबसे बड़ी लड़ाइयाँ पहले आसमान में लड़ी जाती हैं, धरती तो सिर्फ उसका मंच बनती है,” एक पश्चिमी ज्योतिषी की यह टिप्पणी इन दिनों खूब दोहराई जा रही है।

कहानी 28 फरवरी की उस रात अचानक रफ्तार पकड़ती है। मिसाइलें आसमान चीरती हैं। ठिकाने ढहते हैं। और ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मौत इस संघर्ष को एक नए मोड़ पर ला खड़ा करती है। सैन्य ढांचे को गहरी चोट लगती है। दुनिया सन्न रह जाती है।

ज्योतिषी इसे महज संयोग नहीं मानते। मंगल और यूरेनस का टकराव। राहु और मंगल की युति। यही विस्फोटक संयोजन है जिसे शास्त्रों में उथल-पुथल का संकेत माना गया है।

“जब मंगल उग्र होता है, तो तलवारें खुद रास्ता खोज लेती हैं,” एक वैदिक ज्योतिषी का कहना है।

शुरुआती दौर में यह युद्ध एकतरफा दिखता है। अमेरिकी वायु शक्ति का दबदबा साफ नजर आता है। सटीक हमले। सीमित नुकसान। मजबूत पकड़। लेकिन यही वह क्षण है जहाँ कहानी पलटने को बेकरार है।

कुंडलियाँ इशारा कर रही हैं कि यह संघर्ष जल्द थमने वाला नहीं। अप्रैल और मई आग से भरे महीने बताए जा रहे हैं। शनि और मंगल की युति तनाव को लंबा खींचेगी।

“शनि सिखाता है, मंगल सज़ा देता है। दोनों साथ हों तो समय कठोर हो जाता है,” यह पुरानी ज्योतिषीय कहावत फिर प्रासंगिक लगने लगी है।

आगे क्या? जवाब बेचैन करने वाला है। ड्रोन हमले बढ़ेंगे। मिसाइलों की बरसात होगी। प्रॉक्सी युद्ध गहराएंगे। होरमुज़ जलडमरूमध्य पर खतरे मंडराएंगे। पूरा पश्चिम एशिया इस आग की तपिश महसूस करेगा।

लेकिन हर भविष्यवाणी सिर्फ अंधेरा नहीं दिखाती। नास्त्रेदमस के लंबे सात महीनों के युद्ध का भी हवाला दिया जा रहा है।

कुछ ज्योतिषी दावा कर रहे हैं कि यह संकट अपने भीतर एक बदलाव का बीज भी लिए हुए है। गर्मियों के आखिर तक ईरान के लिए “मुक्ति” और एक तरह का पुनर्जन्म संभव है।

“हर विनाश अपने भीतर सृजन का बीज छुपाए होता है,” यह कथन जैसे इस पूरे परिदृश्य पर फिट बैठता है।

वैदिक ज्योतिष के कई चेहरे इसे सिर्फ सैन्य संघर्ष नहीं, बल्कि एक गहरे राजनीतिक और सांस्कृतिक भूकंप की शुरुआत मानते हैं। उनके मुताबिक दबाव बढ़ेगा, सत्ता डगमगाएगी और अंततः एक नई पहचान उभरेगी। शायद “प्राचीन पर्शिया” की स्मृति फिर सिर उठाए।

इस अंधेरे में एक हल्की रोशनी भी है।

जब बृहस्पति कर्क राशि में प्रवेश करेगा, तब संवाद के दरवाजे खुल सकते हैं। कुछ ज्योतिषी जुलाई के अंतिम सप्ताह की ओर इशारा कर रहे हैं। कुछ सितंबर और अक्टूबर में चरणबद्ध समझौते की संभावना देखते हैं। लेकिन इतिहास बार-बार साबित कर चुका है : “शांति कभी सीधे रास्ते से नहीं आती, वह संघर्ष के काँटों से होकर गुजरती है।”

भविष्यवक्ताओं की मानें तो एक और संकेत चिंता बढ़ाता है। यूरेनस का मिथुन राशि में प्रवेश। इतिहास गवाह है ;  जब-जब ऐसा हुआ, अमेरिका बड़े युद्धों में उलझा है। आशंका है कि यह संघर्ष सीमाओं से बाहर फैल सकता है। तेल की कीमतें उछल सकती हैं। दूसरी शक्तियां परोक्ष रूप से मैदान में उतर सकती हैं।

ज्योतिषियों की भाषा अलग है, लेकिन निष्कर्ष एक सा है। फिलहाल युद्ध का मैदान अमेरिका और इज़राइल के पक्ष में झुका हुआ दिखता है। लेकिन जीत का ताज अभी दूर है। यह लड़ाई सिर्फ गोलियों और बमों से तय नहीं होगी। इसका असली हिसाब वक्त करेगा।

एक वरिष्ठ ज्योतिषी के शब्दों में गूंजती सच्चाई है:

“युद्ध मैदान में जीते जाते हैं, लेकिन उनका अर्थ समय तय करता है।”

नीचे धरती पर सैनिक आगे बढ़ रहे हैं। मोर्चा संभाले खड़े हैं। ऊपर आसमान में ग्रह अपनी चाल चल रहे हैं। और दुनिया ठहरी हुई सांसों के साथ देख रही है।

आखिर फैसला कौन करेगा?  

सितारे?  

या इंसान की जिद, उसकी बुद्धि और उसका साहस?

“ग्रह दिशा देते हैं, लेकिन मंज़िल इंसान खुद चुनता है।”

 क्या भारत में चुनाव जीतने का असली पासपोर्ट आज भी जाति का प्रमाणपत्र है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

6 अप्रैल 2026

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जी, ऐसा ही है।

दरवाज़ा संविधान ने खोला था, इरादा साफ था। सदियों की अन्याय-भरी सीढ़ियाँ तोड़नी थीं। आरक्षण उस वक़्त एक बैसाखी था, स्थायी बैरिकेड नहीं। लेकिन सियासत ने उसे हथियार बना दिया। वोटों की गिनती ने समाज की दरारों को भरने के बजाय और गहरा कर दिया। जो अस्थायी पुल होना था, वही स्थायी मोर्चा बन गया। आज हाल यह है कि पढ़ा-लिखा मतदाता भी उसी खांचे में खड़ा है, जहां उसके दादा खड़े थे। फर्क बस इतना है कि अब गणित और ज्यादा परिष्कृत हो गया है।

शुरुआत में सोच अलग थी। सुधारकों के लिए आरक्षण एक सर्जिकल स्ट्राइक था। एक झटका, जो बराबरी का रास्ता साफ करे। उनका लक्ष्य जाति को स्थायी पहचान बनाना नहीं था, बल्कि उसे धीरे-धीरे अप्रासंगिक कर देना था। लेकिन राजनीति की गंध अलग होती है। यहां आदर्श नहीं, अंकगणित चलता है। यहां दर्द भी वोट में बदलता है और उम्मीद भी।

फिर आए वे खिलाड़ी, जिन्होंने जाति को स्थायी इंजन बना दिया। कांशी राम, मायावती, मुलायम, अखिलेश आदि  ने जातिगत आक्रोश को अनुशासित वोट बैंक में ढाला। यह सिर्फ सामाजिक आंदोलन नहीं था, यह सटीक चुनावी गणित था। बसपा सुप्रीमो बहन मायावती ने और धार दी। 2007 में उन्होंने जो किया, वह एक केस स्टडी है। दलित, ब्राह्मण, मुस्लिम, सबको जोड़कर सत्ता का समीकरण गढ़ा। 206 सीटें सिर्फ आंकड़ा नहीं थीं, वह संदेश था कि जाति को जोड़कर भी जीता जा सकता है, तोड़कर भी।

शुरुआत डॉ राम मनोहर लोहिया ने पिछड़ों की राजनीति को वैचारिक धार देकर की। उनका 60 प्रतिशत का नारा सिर्फ नारा नहीं था, सामाजिक पुनर्संतुलन का प्रस्ताव था। लेकिन जैसे ही यह जमीन पर उतरा, वह भी वोट की भाषा में अनुवादित हो गया। और फिर आया वह क्षण जिसने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी। मंडल कमीशन की सिफारिशें जब लागू हुईं, तो देश दो खेमों में बंट गया। वीपी सिंह ने इसे लागू किया, सरकार चली गई, लेकिन राजनीति बदल गई। उत्तर भारत में नई जातीय ताकतें उभरीं। समाजवादी पार्टियां, क्षेत्रीय दल, सबने अपने-अपने खांचे बना लिए।

दक्षिण में कहानी अलग दिखती है, पर सार वही है। तमिलनाडु में द्रविड़ मुनेत्र काझागम ने गैर-ब्राह्मण राजनीति को संस्थागत रूप दिया। 69 प्रतिशत आरक्षण सिर्फ नीति नहीं था, एक स्थायी सामाजिक समझौता था। नतीजा यह हुआ कि दशकों से सत्ता उन्हीं खेमों में घूम रही है। कर्नाटक में लिंगायत और वोक्कालिगा समीकरण ने सरकारों की चाबी अपने पास रखी।  देव गौडा का उदय इसी गणित की देन था।

चुनाव अब विचारों से कम, जातीय नक्शों से ज्यादा तय होते हैं। हर पार्टी के पास अपना डेटा है। कौन-सी सीट पर कौन-सी जाति भारी है, किसे टिकट देना है, किसे वादा करना है। उत्तर प्रदेश में यह फार्मूला खुलकर दिखता है। यादव बहुल सीटों पर समाजवादी टिकट, दलित बहुल इलाकों में अलग रणनीति। यह ठंडा, सटीक, बेरहम गणित है। यहां विचारधारा अक्सर बैक सीट पर बैठी रहती है।

कम्युनिस्टों ने एक अलग सपना देखा था। वर्ग संघर्ष का। उन्हें लगा कि आर्थिक बराबरी से जाति मिट जाएगी। लेकिन जमीन ने उनका भ्रम तोड़ दिया। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में आंदोलन खुद जातियों में बंट गए। केरल और बंगाल में कुछ सफलता मिली, लेकिन वहां भी जाति की छाया कभी पूरी तरह नहीं गई। सच्चाई यह है कि आदमी रोजमर्रा की जिंदगी में जाति जीता है। शादी में, जमीन में, रिश्तों में। ऐसे में  वर्ग संघर्ष ठोस आरक्षण के सामने कमजोर पड़ गया।

आज तस्वीर साफ है। शिक्षा बढ़ी, शहर फैले, नौकरियां बदलीं। लेकिन जाति जिंदा है, क्योंकि उसका सीधा रिश्ता लाभ से जुड़ा है। एक डिग्री के साथ भी जाति प्रमाणपत्र चाहिए। राजनीति के लिए यह सोने की खान है। हर चुनाव से पहले नई मांग, नया वादा, नया ध्रुवीकरण। भीतर ही भीतर असमानता भी बढ़ती है। एक ही जाति के भीतर कुछ समूह सारा लाभ समेट लेते हैं, बाकी किनारे खड़े रह जाते हैं।

यह एक चक्र है, जो खुद को लगातार मजबूत करता है। जाति वोट देती है। वोट सत्ता देता है। सत्ता जाति को बचाए रखती है। और फिर वही कहानी दोहराई जाती है। सवाल यह नहीं कि आरक्षण सही है या गलत। सवाल यह है कि क्या हमने उसे लक्ष्य तक पहुंचने का साधन बनाया या रास्ते में ही उसका स्थायी शिविर खड़ा कर लिया।

भारतीय लोकतंत्र अभी भी उस जवाब की तलाश में है। जब तक कोई नई राजनीति, नई भाषा, नया भरोसा नहीं उभरेगा, तब तक यह कोड नहीं टूटेगा। जाति की स्याही अभी सूखी नहीं है। बैलेट पेपर पर उसका नाम अब भी सबसे गाढ़ा लिखा है।