Tuesday, August 25, 2026

 द ग्रेट समन्वय:

जब पूरब और पश्चिम की बनी खिचड़ी!

कितना भारतीय है आज का एवरेज इंडियन?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

27 अगस्त 2026

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देश भ्रमण के अनेक फायदे हैं। कूपमंडूकता और कई दृष्टि-भ्रम रास्ते में ही टूट जाते हैं। उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम निकलें, तो बहुत से पूर्वाग्रह अपने आप ध्वस्त होते चलते हैं।

खूबसूरती से बदल रहा है भारत।

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आसमान को छूती कांच की इमारतें खड़ी हैं। बाजू में पुराना हनुमान जी का मंदिर है।

इमारत के भीतर युवा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स और ग्लोबल मार्केट की बातें कर रहे हैं। बाहर कोई जूते उतारकर मंदिर की घंटी बजाता है और श्रद्धा से हाथ जोड़ लेता है।

किसी को यह विरोधाभास नहीं लगता। यही तो आज का भारत है।

बेंगलुरु, मुंबई, हैदराबाद, चेन्नई, गुरुग्राम या चंडीगढ़ चले जाइए। नज़ारा बदलता जाएगा, मगर कहानी एक ही मिलेगी। एक्सप्रेसवे, मेट्रो, चमचमाते एयरपोर्ट, शॉपिंग मॉल और गगनचुंबी इमारतें शहरों का चेहरा बदल रही हैं। मोबाइल फोन हाथ का हिस्सा बन गया है। डिजिटल पेमेंट ने बटुए की जगह ले ली है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस दफ्तरों, स्कूलों और घरों में दस्तक दे रही है।

भारत तेज़ी से भविष्य की ओर दौड़ रहा है। लेकिन अपना अतीत पीछे नहीं छोड़ रहा।

यहीं भारत की मौजूदा यात्रा की खूबसूरती है। यह केवल पश्चिमीकरण की कहानी नहीं है। न ही पुराने ज़माने में लौटने की ज़िद है।

यह दिलचस्प समन्वय है। पूरब की आत्मा और पश्चिम की आधुनिकता का संगम।

पुराने को कबाड़खाने में नहीं फेंका जा रहा। नए को आंख मूंदकर अपनाया भी नहीं जा रहा। भारत चुन रहा है, परख रहा है और फिर अपने रंग में ढाल रहा है।

हैदराबाद का रोहित अमेरिकी टेक्नोलॉजी कंपनी में काम करता है। दफ्तर में अंग्रेज़ी बोलता और नवीनतम तकनीक इस्तेमाल करता है। शाम को पूजा में शामिल होता है या परिवार के साथ त्योहार की तैयारी करता है। दोनों दुनिया उसके भीतर रहती हैं और आराम से साथ चलती हैं।

आज का भारतीय सिलिकॉन वैली की तरक्की से प्रभावित हो सकता है, मगर वाराणसी की गलियों से रिश्ता भी बनाए रखता है। वह क्वांटम फिजिक्स पढ़ सकता है और गीता में जीवन का अर्थ खोज सकता है। हवाई जहाज़ से सात समंदर पार जा सकता है, फिर भी गांव की मिट्टी नहीं भूलता।

एक ही मेज़ पर लैपटॉप और दीपक रखे हो सकते हैं। यही भारत का नया मिज़ाज है।

यह समन्वय अचानक पैदा नहीं हुआ।

भारत और पश्चिम के संपर्क ने अनेक संस्थागत बदलाव किए। औपनिवेशिक शासन शोषण और लूट से भरा था। फिर भी स्वतंत्र भारत ने कुछ आधुनिक संस्थाओं को अपनाया और लोकतांत्रिक उद्देश्यों के अनुसार ढाला।

संसदीय लोकतंत्र, स्वतंत्र न्यायपालिका, सिविल सर्विस, आधुनिक विश्वविद्यालय और लिखित कानून इसी प्रक्रिया का हिस्सा बने।

इन संस्थाओं ने आम आदमी के लिए नए रास्ते खोले।

कभी जन्म, जमीन और खानदान ही इंसान की हैसियत तय करते थे। आधुनिक शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं ने नए दरवाज़े खोले। साधारण परिवार का बच्चा विश्वविद्यालय पहुंच सकता था। गांव का लड़का या लड़की सरकारी नौकरी के लिए मुकाबला कर सकता था। नागरिक अदालत का दरवाज़ा खटखटा सकता था।

व्यवस्था आज भी मुकम्मल नहीं है। कमियां भी हैं, खामियां भी।

मगर ऊपर चढ़ने के लिए नई सीढ़ियां जरूर बनी हैं। एस्केलेटर्स भी हैं।

लोकतंत्र ने इस बदलाव में एक और ताकत जोड़ी।

मतपत्र ने उन लोगों को भी राजनीतिक महत्व दिया, जो सदियों तक सत्ता के गलियारों से दूर रहे। सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार ने करोड़ों लोगों को राष्ट्रीय संवाद में शामिल किया।

भारत ने लोकतंत्र को रेडीमेड मशीन की तरह नहीं अपनाया। उसने इसे अपने ढंग से भारतीय बनाया।

चुनाव जनभागीदारी के बड़े मेले बन गए। जाति, भाषा, क्षेत्र और समुदाय राजनीति में आए, लेकिन उनके साथ नई उम्मीदें और आकांक्षाएं भी आईं।

जिनकी आवाज़ पहले कमजोर थी, वे धीरे-धीरे मंच तक पहुंचने लगे।

पश्चिम से आया संस्थागत ढांचा भारतीय समाज की धड़कन से जुड़ गया।

सामाजिक सुधार की कहानी भी कुछ ऐसी ही रही।

स्वतंत्रता, समानता और अधिकारों के आधुनिक विचारों ने भारतीय चिंतकों को प्रभावित किया। मगर सुधार केवल बाहर से नहीं आया। समाज सुधारकों ने आधुनिक तर्क और अपनी नैतिक-धार्मिक परंपराओं, दोनों का सहारा लेकर कुरीतियों को चुनौती दी।

एक तरफ नए विचार थे। दूसरी तरफ अपनी जड़ें थीं। दोनों ने मिलकर बदलाव की जमीन तैयार की।

शिक्षा पूरब और पश्चिम के बीच सबसे मजबूत पुल बनी। आधुनिक स्कूलों और विश्वविद्यालयों ने वैज्ञानिक सोच, सवाल करने की आदत और व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया। अंग्रेज़ी, औपनिवेशिक विरासत के बावजूद, अनेक भाषाओं वाले देश में उपयोगी संपर्क भाषा बनी।

तमिलनाडु का वेंकटेश दिल्ली में काम कर सकता है। बिहार का इंजीनियर दिनेश चेन्नई में नौकरी पा सकता है। बंगाल का सुब्रतो बेंगलुरु में पढ़ सकता है।

आधुनिक संचार ने दूरी घटाई।

दूरी घटी तो अवसर बढ़े।

रेलवे, तार और डाक व्यवस्था पहले प्रशासनिक जरूरतों के लिए बनाई गई थीं। बाद में उन्होंने भारत के लोगों को एक-दूसरे से जोड़ दिया। विचार तेजी से फैले। अखबारों की पहुंच बढ़ी। राष्ट्रीय आंदोलन को नई ताकत मिली।

इतिहास भी कभी-कभी अजीब मज़ाक करता है। साम्राज्य के लिए बनी सुविधाएं राष्ट्रीय एकता की ताकत बन गईं।

आर्थिक आधुनिकता ने भी समाज का ढांचा बदला। उद्योग, व्यापार, बैंकिंग और शहरों में रोजगार ने पारंपरिक पेशों की दीवारें कमजोर कीं। बेटे को हमेशा पिता का काम नहीं करना पड़ा। बेटी को भी पुरानी सीमाओं में कैद रहना जरूरी नहीं रहा।

शिक्षा और रोजगार ने महिलाओं के लिए नए आसमान खोले। आर्थिक आत्मनिर्भरता, कानूनी अधिकार और पेशेवर अवसरों ने सामाजिक सोच बदली।

आधुनिकता ने जीवन का बाहरी ढांचा बदला। मगर भारत की सांस्कृतिक धड़कन कायम रही।

त्योहार आज भी कैलेंडर को रंग देते हैं। शादियां बड़े पारिवारिक आयोजन हैं। धार्मिक यात्राओं में युवाओं की भीड़ बढ़ रही है।

परंपरा गायब नहीं हुई। उसने अपग्रेड होना सीख लिया है।

दीवाली अब एलईडी की रोशनी में चमकती है। मंदिर की घंटियां मोबाइल कैमरे में कैद होती हैं। पूजा की सामग्री ऑनलाइन मंगाई जाती है। दर्शन के लिए ऐप से बुकिंग होती है। योग की कक्षाएं दुनिया भर में ऑनलाइन चल रही हैं। पुरानी परंपराएं डिजिटल युग में प्रवेश कर चुकी हैं।

मगर अपनी पहचान के साथ।

यह बदलाव है। यह अनुकूलन है।

भारत की सभ्यता हमेशा विचारों के आदान-प्रदान से समृद्ध हुई है। बाहर से आई चीजों को उसने जस का तस स्वीकार नहीं किया। उन्हें अपनी जरूरतों और संस्कारों के अनुसार ढाला।

आज का दौर उसी लंबी प्रक्रिया का नया अध्याय है। पश्चिम ने विज्ञान, तकनीक और आधुनिक संस्थाओं के शक्तिशाली औजार दिए। कानून, प्रशासन और लोकतांत्रिक भागीदारी के नए तरीके दिए।

भारतीय परंपरा ने परिवार, कर्तव्य, समुदाय और नैतिक जिम्मेदारी के विचारों को मजबूत रखा।

एक ने प्रगति का रास्ता दिखाया।

दूसरी ने पूछा—प्रगति किसके लिए और किस दिशा में?

यही सवाल आज पहले से अधिक महत्वपूर्ण है।

कोई समाज तकनीकी रूप से बहुत आगे बढ़ सकता है, मगर भीतर से खाली हो सकता है। वह अमीर हो सकता है, मगर अकेला भी। व्यक्तिगत आज़ादी हो सकती है, मगर सामुदायिक रिश्ते कमजोर पड़ सकते हैं।

भारत का परिवार और समाज से जुड़ाव केवल रूढ़िवाद नहीं है। यह इंसानी रिश्तों को बचाए रखने की कोशिश भी है। बेशक, हर परंपरा आलोचना से ऊपर नहीं हो सकती।

जो परंपरा इंसान की गरिमा या समानता को चोट पहुंचाती है, उस पर सवाल उठना चाहिए। केवल पुरानी होने से कोई बात पवित्र नहीं हो जाती।

उसी तरह, केवल नया और विदेशी होने से हर विचार श्रेष्ठ नहीं बन जाता।

असली समझ संतुलन में है।

भारत के सामने चुनौती है कि वह अपनी विरासत की श्रेष्ठ चीजों को बचाए और आधुनिक ज्ञान को खुले मन से अपनाए।

पूरब और पश्चिम किसी जंग के मैदान में आमने-सामने खड़े नहीं हैं। वे अब एक ही चौराहे पर मिल रहे हैं। एक के पास पुरानी स्मृतियां, सांस्कृतिक निरंतरता और आध्यात्मिक अनुभव हैं।

दूसरे के पास आधुनिक संस्थाएं, वैज्ञानिक ज्ञान और तकनीकी शक्ति है। दोनों मिलकर नया भारतीय समन्वय रच रहे हैं।

भारत शायद दुनिया को यही दिखा रहा है कि आधुनिक बनने का मतलब सांस्कृतिक समर्पण नहीं है। परंपरा का अर्थ ठहराव भी नहीं है।

कोई देश कल की ओर देख सकता है, बिना अपनी सदियों पुरानी स्मृतियों को मिटाए।

शायद यही भारत की आधुनिक यात्रा का सबसे बड़ा सबक है।

भविष्य बनाने के लिए हमेशा अतीत को जलाना जरूरी नहीं।

कभी-कभी भविष्य की सबसे मजबूत इमारत उसी नींव पर खड़ी होती है, जिसमें अतीत की अच्छी ईंटें भी लगी हों।

भारत पीछे नहीं जा रहा।

वह आंख मूंदकर पश्चिम की ओर भी नहीं दौड़ रहा।

वह अपने रास्ते पर आगे बढ़ रहा है।

और इस यात्रा में पूरब और पश्चिम प्रतिद्वंद्वी नहीं हैं।

वे भारत के नए युग के दो साथी हैं।

 गिफ्ट का सूट, जूतों की लूट और पत्रकारों की जलवा-ए-फ़ज़ीहत!

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खरांची से बृज खंडेलवाल द्वारा 

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दक्षिण प्रांत के पाजीपुर कस्बे की यह दास्तान पत्रकारिता के इतिहास में सुनहरे अक्षरों से नहीं, बल्कि रेडीमेड सूट के कपड़े पर कढ़ाई करके लिखी जानी चाहिए।

हुआ यूँ कि एक बड़ी रेडीमेड वस्त्र कंपनी ने अपना शानदार शोरूम खोला। उद्घाटन पर पत्रकारों को खास तौर पर दावत दी गई। पत्रकार भी कैमरे, कलम और उम्मीदों की बड़ी-बड़ी जेबें लेकर तशरीफ ले आए।

कार्यक्रम खत्म हुआ तो राज़ खुला।

गिफ्ट में थे सिर्फ आठ सूट।

मगर पत्रकार थे पूरे बाईस।

बस हुज़ूर, फिर क्या था!

प्रेस फ्रीडम खतरे में पड़ गई। पत्रकारिता की अस्मिता पर हमला हो गया। ऐसा संकट आया, मानो किसी ने संपादकीय पन्ने की जगह साबुन का इश्तिहार छाप दिया हो।

कंजूस मालिक ने मासूमियत से पूछा, “कितने आदमी  थे?”

एक बुज़ुर्ग पत्रकार का ख़ून खौल उठा। “यह मीडिया की तौहीन है!” दूसरे ने दहाड़ लगाई, “आठ सूट और बाईस आदमी! जनाब, यह कैसा हिसाब है? यह गणित आपने किस मदरसे में पढ़ा?”

देखते ही देखते कांच की बोतलें हवा में उड़ने लगीं। उद्घाटन समारोह कम और आईपीएल का फाइनल ज्यादा लगने लगा। कुछ लोगों को मामूली चोटें भी आईं। अगले दिन शहर में कंपनी के शोरूम से ज्यादा चर्चा सूटों की हो रही थी।

रविवार को लोकल प्रेस क्लब की हंगामी बैठक बुलाई गई।

चेहरे गंभीर थे। आवाजें भारी थीं। माहौल में इंकलाब की खुशबू थी।

फैसला हुआ कि अब कोई पत्रकार गिफ्ट नहीं लेगा। गिफ्टबाजी का बहिष्कार होगा। और अगर कोई गिफ्ट देगा भी, तो प्रेस क्लब के सभी 213 सदस्यों को बराबर मिलेगा।

वाह! पत्रकारिता बच गई।

नैतिकता ने अंगड़ाई ली। उसूलों ने सीना फुलाया। सिद्धांतों ने खड़े होकर सलाम ठोंका।

फिर शादी का मौसम आ गया।

एक नेताजी के बड़े साहबज़ादे की शादी का निमंत्रण आया। प्रेस क्लब के पत्रकारों को बाकायदा कार्ड मिला। खुशियों की लहर दौड़ गई। किसी ने नया कुर्ता निकाला, किसी ने इत्र लगाया, किसी ने बरसों पुराना कैमरा चमकाया।

पंद्रह तारीख की शाम आंधी और बारिश ने बारातघर पर धावा बोल दिया। बिजली गुल। जनरेटर में डीजल खत्म। मोमबत्तियां जल रही थीं और लालटेनें अपनी आखिरी सरकारी नौकरी निभा रही थीं।

नेताजी खुद पत्रकारों की खातिरदारी में लगे थे।

तभी,

भक्क्काटा!

बिजली आ गई।

संगीत शुरू हुआ। जाम छलके। महफ़िल जवान हुई।

और फिर सबकी नजर एक ही दिशा में जम गई।

आठ पत्रकार।

आठों ने एक ही रंग के।

एक ही डिजाइन के।

एक ही कंपनी के सूट पहन रखे थे।

बाकी चौदह पत्रकारों की आंखों में शरारत चमक उठी।

“क्यों उमर भाई, आजकल फैशन में यूनिफॉर्म चल रहा है क्या?”

“ख़ां साहब, कहीं किसी जमींदार के अब्बाजान के मातम में तो नहीं गए थे?”

“सुना है, मुफ्त के कपड़े मिले थे उधर!”

बस जनाब, पार्टी का सारा लुत्फ़ गया तेल लेने।

आठों सूटधारी पत्रकार ऐसे खिसके, जैसे बिजली विभाग का बिल देखकर आम आदमी खिसकता है। कोई पंडाल के पीछे, कोई खाने की मेज के पास, कोई अंधेरे कोने में जाकर अपनी पत्रकारिता तलाशने लगा।

मगर किस्सा यहीं खत्म नहीं हुआ।

उधर, तुमकाडा जिले से खबर आई कि एक पत्रकार के दादाजी की शोकसभा में बड़ी तादाद में मीडिया वाले पहुंचे। मातमपुर्सी खत्म हुई, लोग बाहर निकले, तो जूते-चप्पलों का ऐसा महाभारत सामने था कि ईरान-अमेरिका भी शर्मिंदा हो जाएं।

दर्जनों जूते। एक ही रंग। एक ही ठप्पा। एक ही डिजाइन। एक ही कंपनी।

किसका कौन सा? पहचानने का कोई चांस नहीं।

तभी रैम्बो बाबू ने मंजर देखा। उनसे चुप रहा नहीं गया।

बोले, “क्यों बे! तुम सब जूते वाली फैक्ट्री में आग लगने की खबर कवर करने गए थे न?”

सन्नाटा।

ऐसा सन्नाटा कि अगर कोई पिन गिरती, तो शायद वही अपना जूता पहचान लेती।

फिर सब बगलें झांकने लगे।

आखिर लोकतांत्रिक फैसला हुआ, जिसके पैर में जो फिट हो जाए, वही उसका।

बस, फिर क्या था!

मीडिया वाले एक-एक करके निकल लिए। किसी के पैर में अपना जूता था, किसी के पैर में किसी और का। एक साहब का दायां जूता शायद उनका था, बायां किसी दूसरे अखबार का।

पत्रकारिता की इज्जत पीछे रह गई।

जूते आगे निकल गए।

व्याकुल दुनिया के संपादक ने इस तमाम फ़ज़ीहत पर गहरी सांस लेकर फरमाया:

“सबक सिर्फ इतना है कि मुफ्त का सूट हो या मुफ्त का जूता, मीडिया की पहचान छिपाए नहीं छिपती। कभी सभी के सूट एक जैसे होते हैं, कभी जूते। कभी घरों में एक जैसे शोपीस, बेडशीट, घड़ियां और क्रॉकरी बरामद होती हैं। गिफ्ट देने वाले भी वही घिसे-पिटे सामान बांटते रहते हैं, और बाकी दुनिया तमाशा देखकर ठहाके लगाती रहती है।”

आखिर पत्रकारिता का भी अपना एक उसूल है।

खबर चाहे अलग-अलग हो, मगर गिफ्ट सबको एक जैसा चाहिए

Monday, August 24, 2026


बादल, कंप्यूटर और पवित्र अग्नि: भारत का दोमुखी यथार्थवाद

न्यूटन और नास्त्रेदमस, दोनों का सम्मान है!

पढ़े लिखे होने का मतलब वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं है

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

26 अगस्त, 2026

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कर्नाटक के आसमान में बादल तो नहीं थे, पर सरकार की तैयारी पूरी थी।

एक टीम ने विमान और मौसम विज्ञान की तरफ देखा; दूसरी टीम ने मंदिर, पवित्र अग्नि और मंत्रों की ओर। अजीब!  पर दोनों सरकारी जवाब थे।

राज्य ने सूखे से निपटने के लिए 28.52 करोड़ रुपये के आपात क्लाउड-सीडिंग अभियान की घोषणा की। 31 जिलों में से 29 बारिश की कमी से जूझ रहे थे। विमान बादल ढूंढेंगे, वैज्ञानिक हालात पर निगरानी रखेंगे, सैकड़ों उड़ान घंटे तय किए गए।

उसी सुबह कोडागु के पाडी इग्गुथप्पा मंदिर में रुद्र होम होना था; कृषि मंत्री पी.एम. नरेंद्रस्वामी शामिल होने वाले थे। बताया गया कि मुख्यमंत्री के निर्देश पर यह अनुष्ठान रखा गया, उम्मीद यही थी कि देवता कर्नाटक पर मेहरबान होंगे।

एक तस्वीर सोचिए: एक तरफ वैज्ञानिक क्लाउड-इंजीनियरिंग, दूसरी तरफ हवनों का धुआँ; दोनों का मकसद समान है: बारिश।

यह भारत की दोहरी ज़िंदगी है।

हम रॉकेट बनाते हैं, पर अहम काम से पहले मुहूर्त पूछते हैं। उपग्रह भेजते हैं, पर नए व्यापार के लिए सितारों की सलाह लेते हैं। हम दुनिया के बेहतरीन इंजीनियर तैयार करते हैं, पर कई बार दफ्तरों का नक्शा वास्तु और अंकशास्त्र तय करते हैं। विज्ञान और अंधविश्वास यहां सिर्फ पड़ोसी नहीं, कभी-कभी वे एक ही बेडरूम शेयर करते हैं।

ISRO की सफलताएँ और वैज्ञानिक क्षमता बहुमूल्य हैं। फिर भी बड़े कार्यक्रमों से पहले “मुहूर्त शुभ है या नहीं” जैसे सवाल उठते हैं। गणित रॉकेट को चलाता है; इंसान अक्सर ग्रह-नक्षत्रों पर भरोसा कर लेता है।

यह विरोधाभास शिक्षा और व्यावहारिक जीवन में भी दिखता है। हमारे पास विश्वस्तरीय मेडिकल संस्थान हैं, पर डिजिटल बाजार पर वही फोन चमत्कारी दवाइयाँ, कुंडली-वाले ऐप और तांत्रिक इलाज भी बेचते हैं। इतिहास पर गर्व करना ठीक है, पर पुरानी कथाओं से आधुनिक आविष्कार निकालना सबूत नहीं है।

पर्यावरण की भी यही कहानी  है। वैज्ञानिक नदियों की सफाई, जलवायु परिवर्तन और भूजल घटने की चेतावनी दे रहे हैं; अदालतें आदेश दे रही हैं; पर त्यौहारों में टनों सामग्री उन्हीं नदियों में विसर्जित कर दी जाती है। आस्था कहती है नदी पवित्र है; नदी के पास पीआर टीम नहीं है: वह कचरा ढोती आगे बढ़ती है।

हमारा संविधान वैज्ञानिक सोच की बात करता है, पर सामाजिक फैसलों में जाति, कुंडली और परंपरा का प्रभाव आज भी दिखता है। एक हाथ में आधुनिक डिग्री हो सकती है; दूसरे हाथ में जन्मपत्री मजबूती से थमी रहती है।

कर्नाटक का मामला इसलिए आँख खोलने वाला है क्योंकि विज्ञान और आस्था एक साथ सामने आए। क्लाउड-सीडिंग कोई जादू नहीं; यह सही परिस्थितियों पर निर्भर एक तकनीक है। रुद्र होम आस्था और परंपरा का मामला है। प्रार्थना उम्मीद देती है; पर उम्मीद हाइड्रोलॉजी की जगह नहीं ले सकती। हवन सूखी नहर की मरम्मत नहीं कर सकता; मंत्र खाली जलाशय भर नहीं देते।

प्राचीन ज्ञान का अध्ययन ज़रूरी है; पर पुराने किस्सों को साक्ष्य मान लेना खतरे की घंटी है। अखबार हो या टीवी, डिजिटल मीडिया, ज्योतिषियों की भरमार है। तमाम लोग राशिफल पढ़कर ही दिन शुरू करते हैं। 

सुबह प्रार्थना कीजिए; दोपहर तक जलाशय बना लीजिए। यही मिश्रित तर्कहीनता से निकलने की असली चुनौती है।

भारत ज्ञान, तकनीक और नेतृत्व बनने का सपना देखता है। सपने अच्छे हैं। पर पहले फर्क सीखिए। ज्ञान और विश्वास, सबूत और भावना, शोध और आत्म–प्रशंसा के बीच। वरना हम दो दुनियाओं में यूं ही जीते रहेंगे: एक हाथ उपग्रह छोड़ेगा, दूसरा शुभ मुहूर्त खोजेगा; एक विमान बादल में बीज डालेगा, दूसरा सरकारी दल पवित्र अग्नि में आहुति देगा, और विरोधाभास धुएँ और बादलों के बीच नाचता रहेगा। 


 












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बादल, कंप्यूटर और पवित्र अग्नि: भारत का दोमुखी यथार्थवाद

न्यूटन और नास्त्रेदमस, दोनों का सम्मान है!

पढ़े लिखे होने का मतलब वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं है

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

26 अगस्त, 2026

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कर्नाटक के आसमान में बादल तो नहीं थे, पर सरकार की तैयारी पूरी थी।

एक टीम ने विमान और मौसम विज्ञान की तरफ देखा; दूसरी टीम ने मंदिर, पवित्र अग्नि और मंत्रों की ओर। अजीब!  पर दोनों सरकारी जवाब थे।

राज्य ने सूखे से निपटने के लिए 28.52 करोड़ रुपये के आपात क्लाउड-सीडिंग अभियान की घोषणा की। 31 जिलों में से 29 बारिश की कमी से जूझ रहे थे। विमान बादल ढूंढेंगे, वैज्ञानिक हालात पर निगरानी रखेंगे, सैकड़ों उड़ान घंटे तय किए गए।

उसी सुबह कोडागु के पाडी इग्गुथप्पा मंदिर में रुद्र होम होना था; कृषि मंत्री पी.एम. नरेंद्रस्वामी शामिल होने वाले थे। बताया गया कि मुख्यमंत्री के निर्देश पर यह अनुष्ठान रखा गया, उम्मीद यही थी कि देवता कर्नाटक पर मेहरबान होंगे।

एक तस्वीर सोचिए: एक तरफ वैज्ञानिक क्लाउड-इंजीनियरिंग, दूसरी तरफ हवनों का धुआँ; दोनों का मकसद समान है: बारिश।

यह भारत की दोहरी ज़िंदगी है।

हम रॉकेट बनाते हैं, पर अहम काम से पहले मुहूर्त पूछते हैं। उपग्रह भेजते हैं, पर नए व्यापार के लिए सितारों की सलाह लेते हैं। हम दुनिया के बेहतरीन इंजीनियर तैयार करते हैं, पर कई बार दफ्तरों का नक्शा वास्तु और अंकशास्त्र तय करते हैं। विज्ञान और अंधविश्वास यहां सिर्फ पड़ोसी नहीं, कभी-कभी वे एक ही बेडरूम शेयर करते हैं।

ISRO की सफलताएँ और वैज्ञानिक क्षमता बहुमूल्य हैं। फिर भी बड़े कार्यक्रमों से पहले “मुहूर्त शुभ है या नहीं” जैसे सवाल उठते हैं। गणित रॉकेट को चलाता है; इंसान अक्सर ग्रह-नक्षत्रों पर भरोसा कर लेता है।

यह विरोधाभास शिक्षा और व्यावहारिक जीवन में भी दिखता है। हमारे पास विश्वस्तरीय मेडिकल संस्थान हैं, पर डिजिटल बाजार पर वही फोन चमत्कारी दवाइयाँ, कुंडली-वाले ऐप और तांत्रिक इलाज भी बेचते हैं। इतिहास पर गर्व करना ठीक है, पर पुरानी कथाओं से आधुनिक आविष्कार निकालना सबूत नहीं है।

पर्यावरण की भी यही कहानी  है। वैज्ञानिक नदियों की सफाई, जलवायु परिवर्तन और भूजल घटने की चेतावनी दे रहे हैं; अदालतें आदेश दे रही हैं; पर त्यौहारों में टनों सामग्री उन्हीं नदियों में विसर्जित कर दी जाती है। आस्था कहती है नदी पवित्र है; नदी के पास पीआर टीम नहीं है: वह कचरा ढोती आगे बढ़ती है।

हमारा संविधान वैज्ञानिक सोच की बात करता है, पर सामाजिक फैसलों में जाति, कुंडली और परंपरा का प्रभाव आज भी दिखता है। एक हाथ में आधुनिक डिग्री हो सकती है; दूसरे हाथ में जन्मपत्री मजबूती से थमी रहती है।

कर्नाटक का मामला इसलिए आँख खोलने वाला है क्योंकि विज्ञान और आस्था एक साथ सामने आए। क्लाउड-सीडिंग कोई जादू नहीं; यह सही परिस्थितियों पर निर्भर एक तकनीक है। रुद्र होम आस्था और परंपरा का मामला है। प्रार्थना उम्मीद देती है; पर उम्मीद हाइड्रोलॉजी की जगह नहीं ले सकती। हवन सूखी नहर की मरम्मत नहीं कर सकता; मंत्र खाली जलाशय भर नहीं देते।

प्राचीन ज्ञान का अध्ययन ज़रूरी है; पर पुराने किस्सों को साक्ष्य मान लेना खतरे की घंटी है। अखबार हो या टीवी, डिजिटल मीडिया, ज्योतिषियों की भरमार है। तमाम लोग राशिफल पढ़कर ही दिन शुरू करते हैं। 

सुबह प्रार्थना कीजिए; दोपहर तक जलाशय बना लीजिए। यही मिश्रित तर्कहीनता से निकलने की असली चुनौती है।

भारत ज्ञान, तकनीक और नेतृत्व बनने का सपना देखता है। सपने अच्छे हैं। पर पहले फर्क सीखिए। ज्ञान और विश्वास, सबूत और भावना, शोध और आत्म–प्रशंसा के बीच। वरना हम दो दुनियाओं में यूं ही जीते रहेंगे: एक हाथ उपग्रह छोड़ेगा, दूसरा शुभ मुहूर्त खोजेगा; एक विमान बादल में बीज डालेगा, दूसरा सरकारी दल पवित्र अग्नि में आहुति देगा, और विरोधाभास धुएँ और बादलों के बीच नाचता रहेगा। 


Sunday, August 23, 2026

 (A Mass communication study)

मोदी के मैजिक मंत्र: 

कैसे एक माहिर संचारक (कम्युनिकेटर) विचारों को राष्ट्रीय मिशन में बदल देता है

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बृज खंडेलवाल द्वारा

25 अगस्त, 2026

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देश अपने घरों में बंद था। सड़कें सुनसान थीं, बाजार खामोश थे और कारखानों के पहिए थम गए थे। कोरोना का अदृश्य खौफ लगभग हर घर में दाखिल हो चुका था। किसी को नहीं मालूम था कि यह संकट कब खत्म होगा।

तभी टेलीविजन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आवाज गूंजी।

शाम के पांच बजे ताली बजाइए। घंटी बजाइए। थाली बजाइए। डॉक्टरों, नर्सों, सफाईकर्मियों, पुलिसकर्मियों और कोरोना योद्धाओं का शुक्रिया अदा कीजिए।

कुछ दिन बाद एक और अपील आई।

रात नौ बजे घर की बत्तियां बुझाइए। दरवाजे या बालकनी में खड़े होकर नौ मिनट तक दिया, मोमबत्ती या मोबाइल की रोशनी जलाइए।

निर्देश आसान थे। समय तय था। काम सबके लिए एक था। लाखों लोगों ने उसका पालन किया।

कोई इन प्रतीकों से सहमत था, कोई असहमत। उनके व्यावहारिक असर पर भी बहस हुई। मगर एक बात साफ थी, संप्रेषण बेहद स्पष्ट था।


यही शायद नरेंद्र मोदी की राजनीतिक संचार शैली का सबसे दिलचस्प पहलू है। पिछले एक दशक से ज्यादा समय में उन्होंने कठिन नीतियों, आर्थिक रणनीतियों और राष्ट्रीय लक्ष्यों को छोटे-छोटे सूत्रों, मंत्रों, नारों और याद रह जाने वाले वाक्यों में बदलने की कला विकसित की है।

तीन शब्द। पांच बिंदु। सात संकल्प।

3S, 5T, 5F, पंच प्रण और सप्तधारा।

इनमें वैज्ञानिक स्पष्टता भी है और संचार की समझ भी। ग्रामीण विकास हो, आर्थिक तरक्की हो, युवाओं के कौशल की बात हो, आत्मनिर्भर भारत का सपना हो या 2047 तक विकसित भारत बनाने का लक्ष्य; संदेश में अक्सर लक्ष्य साफ होता है, रास्ता बताया जाता है और नागरिक की भूमिका भी तय की जाती है। कई बार लगता है किसी कॉरपोरेट कंपनी के हेड का प्रेजेंटेशन चल रहा है: यह लक्ष्य है। यह रणनीति है। यह आपकी भूमिका है। और यह समय सीमा है।


रेडियो पर मन की बात हो, संसद में भाषण हो, चुनावी सभा हो या लाल किले से स्वतंत्रता दिवस का संबोधन, मोदी की भाषा में आम तौर पर बहुत कम अस्पष्टता दिखाई देती है।

हंसी-मजाक, दोहरे अर्थ वाले वाक्य और बेवजह की हल्की-फुल्की टिप्पणियां उनकी शैली का मुख्य हिस्सा नहीं हैं। इसके बजाय वे अक्सर ऐसे दिखाई देते हैं जैसे कोई विश्वविद्यालय का प्रोफेसर पूरी तैयारी के साथ कक्षा में आया हो। नोट्स तैयार हैं। विषय स्पष्ट है। और विद्यार्थियों के लिए संदेश भी। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां विद्यार्थी पूरा देश है।

तीन, पांच और सात का जादू

मोदी के शुरुआती सूत्रों में एक था 5T—Talent, Tradition, Tourism, Trade और Technology।

इन पांच शब्दों में भारत की एक पूरी तस्वीर खींच दी गई। परंपरा के साथ तकनीक। पर्यटन के साथ व्यापार। पुरानी सभ्यता के साथ नई अर्थव्यवस्था।

संदेश साफ है: भारत को अपने अतीत और भविष्य में से किसी एक को चुनने की जरूरत नहीं है।

फिर आया 3S: Speed, Skill और Scale।

विकास तेज होना चाहिए। युवाओं के पास कौशल होना चाहिए। काम बड़े पैमाने पर होना चाहिए।

तीन शब्दों में आर्थिक नीति का एक बड़ा खाका सामने आ जाता है।

5F भी इसी शैली का शानदार उदाहरण है: Farm, Fibre, Fabric, Fashion और Foreign।

खेत से फाइबर, फाइबर से कपड़ा, कपड़े से फैशन और फैशन से विदेशी बाजार।

पूरी वैल्यू चेन पांच शब्दों में।

फिर आया एक ऐसा सूत्र जो स्कूल की ब्लैकबोर्ड पर लिखे किसी समीकरण जैसा लगता है: 

IT + IT = IT

यानी Indian Talent + Information Technology = India Tomorrow.

लोग समीकरण याद रखते हैं। शायद इसीलिए यह सूत्र भी याद रह गया।

मोदी की भाषा में यही संचार-कला बार-बार दिखाई देती है।

नारे नहीं, याद रखने की तकनीक

Reform, Perform, Transform: 

पहले सुधार, फिर बेहतर प्रदर्शन और अंत में बदलाव।

Per Drop More Crop; हर बूंद से ज्यादा फसल।

कृषि, सिंचाई और जल संरक्षण जैसे जटिल विषय को चार शब्दों में समेट दिया गया।

इसी तरह Make in India, Atmanirbhar Bharat, Vocal for Local और Swadeshi एक-दूसरे को मजबूत करते हैं।

एक ही विचार अलग-अलग नारों के जरिए बार-बार सामने आता है।

और यही दोहराव संदेश को सार्वजनिक भाषा का हिस्सा बना देता है।

मोदी की सबसे लोकप्रिय राजनीतिक पंक्तियों में से एक है; 

सबका साथ, सबका विकास।

बाद में इसमें दो और शब्द जुड़ गए: 

सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास।

साथ, विकास, विश्वास और प्रयास।

चार शब्द, लेकिन एक पूरी राजनीतिक सोच।

यही शैली पार्टी संगठन तक भी पहुंचती है। भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए बताए गए सात मंत्र: सेवाभाव, संतुलन, संयम, समन्वय, सकारात्मकता, संवेदना और संवाद; सिर्फ विचार नहीं हैं। समान ध्वनि वाले शब्दों के कारण वे आसानी से याद भी रहते हैं। यहां भाषा केवल सूचना नहीं देती। भाषा स्मृति बनाती है।


कोविड-19 महामारी ने मोदी की संचार शैली को सबसे नाटकीय तरीके से सामने रखा।

देश डरा हुआ था। अस्पतालों पर दबाव था। कारोबार बंद हो रहे थे। करोड़ों लोगों के रोजगार और भविष्य को लेकर चिंता थी। ऐसे समय में संचार खुद शासन का एक महत्वपूर्ण औजार बन गया।

पहले आया जनता कर्फ्यू।

फिर शाम पांच बजे कोरोना योद्धाओं के सम्मान में ताली, घंटी और थाली बजाने की अपील हुई।

इस प्रतीक पर बहस हुई। आलोचना भी हुई। लेकिन संचार की दृष्टि से इसका एक असर जरूर हुआ।

डॉक्टर, नर्स, सफाईकर्मी और दूसरे फ्रंटलाइन वर्कर अचानक राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में आ गए।

इसके बाद आया 21 दिन का लॉकडाउन।

मोदी ने इसे समझाने के लिए भारतीय सांस्कृतिक स्मृति से एक जाना-पहचाना रूपक निकाला: लक्ष्मण रेखा।

आपका घर आपकी सीमा है।

बेवजह बाहर मत निकलो।

घर में रहो।

संक्रमण की कड़ी तोड़ो।

फिर आया रात नौ बजे, नौ मिनट का संदेश।

बत्तियां बुझाइए।

दीया जलाइए।

मोमबत्ती जलाइए।

मोबाइल की रोशनी जलाइए।

नौ मिनट तक एक साझा प्रतीक बनाइए।

इसके बाद सात बिंदुओं वाली अपील में बुजुर्गों की रक्षा करने, सामाजिक दूरी रखने, प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, आरोग्य सेतु का इस्तेमाल करने, गरीब परिवारों की मदद करने, कर्मचारियों की चिंता करने और कोरोना योद्धाओं का सम्मान करने की बात कही गई।

पूरे अभियान का सबसे महत्वपूर्ण संदेश शायद यही था: सरकार अकेली कोरोना से नहीं लड़ रही है। आप भी इस लड़ाई का हिस्सा हैं।

यही सहभागी संप्रेषण है।

घर में बंद डरा हुआ नागरिक भी किसी काम का हिस्सा बन गया।

संकट के समय एक छोटा-सा साझा काम भी लोगों में सामूहिकता और भरोसे की भावना पैदा कर सकता है।

संकट से 2047 तक

कोरोना के बाद यही संचार शैली तत्काल संकट से निकलकर भारत के दीर्घकालीन सपने तक पहुंची।

2022 में आया पंच प्रण।

2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाना। औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति। अपनी विरासत पर गर्व। एकता को मजबूत करना। नागरिक कर्तव्यों को निभाना।

2047 बहुत दूर का सपना है।

लेकिन पांच संकल्प उसे समझने योग्य बना देते हैं।

इसके बाद डेमोग्राफी, डेमोक्रेसी और डायवर्सिटी यानी जनसांख्यिकी, लोकतंत्र और विविधता का त्रिफलक सामने आया।

दूसरी तरफ भ्रष्टाचार, परिवारवाद और तुष्टीकरण जैसे मुद्दों को भी तीन के ढांचे में पेश किया गया।

फिर आया सप्तधारा का विचार।

विकसित भारत के रास्ते में सात बड़ी धाराएं: मैन्युफैक्चरिंग, कृषि और खाद्य प्रसंस्करण, तकनीक और नवाचार, गति शक्ति और कनेक्टिविटी, रक्षा शक्ति, ग्रीन और ब्लू इकोनॉमी तथा भारत की सॉफ्ट पावर।

यहां प्रतीक और आधुनिकता का अनोखा मेल दिखाई देता है।

प्राचीन भारत में सप्त सिंधु की कल्पना थी।

आज के भारत के सामने सप्तधारा है।

एक तरफ कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम टेक्नोलॉजी, रोबोटिक्स, ग्रीन हाइड्रोजन और आधुनिक लॉजिस्टिक्स हैं। दूसरी तरफ योग, आयुर्वेद, संस्कृति और पर्यटन।

एक पैर सभ्यतागत स्मृति में है।

दूसरा 2047 में।

यह शैली मोदी तक सीमित नहीं

यह संचार शैली अब दूसरे वरिष्ठ मंत्रियों में भी दिखाई देती है।

विदेश मंत्री एस. जयशंकर का उदाहरण लिया जा सकता है। उन्होंने बदलती दुनिया को 3 Cs: Competition, Conflict और Choke Points, के जरिए समझाया है।

जवाब के लिए 4 Ds: Derisking, Diversification, distortions से निपटना और सुरक्षा का एक मार्जिन बनाए रखना, जैसी शब्दावली सामने आती है। पुरानी सोच थी: Just in Time। नई दुनिया कह रही है: Just in Case। जटिल भू-राजनीति भी कुछ याद रहने वाले शब्दों में बदल जाती है।

मगर नारा शासन नहीं है

यहां एक जरूरी सवाल भी है।

सूत्र और नारे प्रभावशाली हो सकते हैं, लेकिन वे शासन का विकल्प नहीं हैं।

सिर्फ नारे से कारखाना नहीं बनता।

मंत्र से रोजगार पैदा नहीं होता।

दिया जलाने से बीमारी ठीक नहीं होती।

कोई आकर्षक वाक्य नदी को साफ नहीं कर सकता।

अंततः असली परीक्षा काम की है।

नीतियों के परिणामों को आंकना जरूरी है। सरकार के दावों को जांचना जरूरी है। नागरिकों, अर्थशास्त्रियों, पत्रकारों और विपक्षी दलों को सवाल पूछने का पूरा अधिकार है।

राजनीतिक संचार लोगों को जोड़ सकता है।

लेकिन परिणाम ही उसकी अंतिम कसौटी हैं।

फिर भी संचार को कम करके नहीं आंका जा सकता।

1.4 अरब से ज्यादा लोगों के देश में कोई नीति अगर सरकारी फाइलों में बंद रह जाए तो वह जनभागीदारी का अभियान नहीं बन सकती।

पहले लोगों को बात समझनी होगी।

फिर वे उससे जुड़ेंगे।

यहीं मोदी की संचार शक्ति सबसे दिलचस्प बन जाती है।

वे जानते हैं कि लोग तीन शब्द तीस पैराग्राफ से ज्यादा आसानी से याद रखते हैं।

लोग लंबे भाषण से ज्यादा आसानी से कोई ठोस काम याद रखते हैं।

और अस्पष्ट वादे से ज्यादा आसानी से एक तय समय सीमा याद रखते हैं।


भारत के राजनीतिक इतिहास में संक्षिप्त और ताकतवर नारों की परंपरा पुरानी है।

महात्मा गांधी के दौर में "भारत छोड़ो" और "करो या मरो" जैसे छोटे वाक्यों ने विशाल जनसमूह को आंदोलित किया था।

समय बदल गया है।

माइक की जगह टेलीविजन, मोबाइल, यूट्यूब और सोशल मीडिया ने ले ली है।

लेकिन संचार का मूल सिद्धांत आज भी वही है।

लोगों को एक वाक्य दीजिए।

एक उद्देश्य दीजिए।

और उसमें उनकी भूमिका तय कर दीजिए।

मोदी के 3S, 5T, 5F, पंच प्रण, सप्तधारा और Per Drop More Crop जैसे सूत्र इसी आधुनिक संचार परंपरा के अध्ययन का विषय बन सकते हैं।

ये सिर्फ नारे नहीं हैं। ये याद रखने की तकनीक हैं।

इनके जरिए जटिल नीतियों को सरल बनाया जाता है, भावनात्मक जुड़ाव पैदा किया जाता है और लोगों को किसी बड़े राष्ट्रीय अभियान का हिस्सा बनने के लिए प्रेरित किया जाता है।

आखिर असली कमाल केवल आकर्षक नारा गढ़ने में नहीं है।

कमाल है किसी विचार को साझी जिम्मेदारी में बदल देने में।

पानी बचाइए।

स्थानीय सामान खरीदिए।

नई स्किल सीखिए।

बुजुर्गों की रक्षा कीजिए।

गरीब की मदद कीजिए।

कोरोना योद्धाओं का सम्मान कीजिए।

और विकसित भारत बनाने में अपना योगदान दीजिए।

भाषा छोटी है।

मगर लक्ष्य बहुत बड़ा है।

भाषण खत्म होता है।

कैमरे बंद हो जाते हैं।

लेकिन संदेश का सफर शुरू हो जाता है।

वह अखबार की हेडलाइन बनता है। टीवी की पट्टी बनता है। गांव की सभा में दोहराया जाता है। व्हाट्सऐप पर घूमता है। घर की बातचीत में पहुंचता है।

यही है नारे के पीछे का विज्ञान।

एक अच्छा वक्ता लोगों को सोचने के लिए कुछ देता है।

एक माहिर संचारक उन्हें याद रखने और कुछ करने के लिए देता है।

Saturday, August 22, 2026

 इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों की दुकानदारी: 

जब शिक्षा से ज्यादा जरूरी हो जाए मुनाफा

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बृज खंडेलवाल द्वारा

24 अगस्त, 2026

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नई इमारत तैयार है। चमचमाता बोर्ड लग गया है। रंगीन ब्रोशर छप चुके हैं।

"एडमिशन शुरू हैं!"

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस। डेटा साइंस। साइबर सिक्योरिटी। मशीन लर्निंग। रोबोटिक्स।

नाम सुनकर लगता है, बस दाखिला लो और भविष्य जेब में डाल लो। मगर कई कॉलेजों के भीतर जाइए। खाली कुर्सियां आपका स्वागत करती मिलेंगी।

यही भारतीय उच्च शिक्षा की सबसे बड़ी विडम्बना है।

कर्नाटक के उच्च शिक्षा मंत्री ने हाल में कहा कि राज्य अब नए सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज नहीं खोलेगा। पहली नजर में यह फैसला पीछे हटने जैसा लग सकता है। असल में, यह देर से आया हुआ एक समझदार फैसला है।


पिछले तीन दशकों में प्रोफेशनल शिक्षा का ऐसा विस्तार हुआ कि हर शहर और कस्बे में कॉलेज कुकुरमुत्तों की तरह उग आए। इंजीनियरिंग, मेडिकल, डेंटल, फार्मेसी, मैनेजमेंट और होम्योपैथी कॉलेजों की बाढ़ आ गई।

शिक्षा धीरे-धीरे कारोबार बन गई।कॉलेज की सीट एक उत्पाद बन गई। छात्र ग्राहक बन गया।

कर्नाटक में हर साल करीब 28 से 30 हजार इंजीनियरिंग सीटें खाली रह जाती हैं। देश भर में इंजीनियरिंग की लगभग 30 से 40 प्रतिशत सीटों पर दाखिला नहीं हो पाता। यानी हर साल तीन से पांच लाख सीटें खाली रह सकती हैं।

तमिलनाडु की तस्वीर भी कम परेशान करने वाली नहीं है। टीएनईए काउंसलिंग के तीसरे दौर के बाद भी करीब 37,943 इंजीनियरिंग सीटें खाली थीं। लगभग 1,57,570 सीटें भर गईं, लेकिन बड़ी संख्या में सीटें फिर भी खाली रह गईं। राज्य में करीब 418 इंजीनियरिंग कॉलेज हैं।

सवाल यह नहीं कि छात्रों ने इंजीनियरिंग छोड़ दी है। असली बात यह है कि छात्र अब हर कॉलेज में दाखिला लेने को तैयार नहीं हैं।

अच्छे और पुराने संस्थानों में आज भी भीड़ है। शहरों के प्रतिष्ठित कॉलेज, जहां पढ़ाई और प्लेसमेंट बेहतर हैं, छात्रों की पहली पसंद बने हुए हैं।

लेकिन छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों के कई निजी कॉलेजों की हालत पतली है। कुछ कॉलेजों में एक भी छात्र नहीं पहुंचा। कुछ को गिनती के विद्यार्थी मिले।

संदेश साफ है। सीटें बढ़ा देने से मांग पैदा नहीं होती।

निजी कॉलेजों ने एक नया नुस्खा खोज लिया है। पुराने कंप्यूटर साइंस कोर्स के नाम के साथ कोई फैशनेबल शब्द जोड़ दीजिए। नया कोर्स तैयार।

एआई एंड मशीन लर्निंग। एआई एंड डेटा साइंस। साइबर सिक्योरिटी।इंटरनेट ऑफ थिंग्स। डेटा एनालिटिक्स। नाम अलग-अलग हैं। कई बार पढ़ाई का बड़ा हिस्सा लगभग एक जैसा होता है।

ब्रोशर नया है, सीटें नई हैं और फीस भी नई।

मुश्किल यह नहीं कि एआई पढ़ाई जा रही है। मुश्किल यह है कि कई जगह एआई सिर्फ एक चमकदार लेबल बन गया है। अच्छी लैब बनाना महंगा है। योग्य शिक्षक रखना महंगा है। रिसर्च कराना महंगा है। ब्रोशर बदलना सस्ता है। मुनाफे की दुनिया अक्सर आसान रास्ता चुनती है।

दूसरी तरफ मैकेनिकल, सिविल और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की सीटें खाली रह रही हैं। यह एक अजीब विरोधाभास है।

देश मैन्युफैक्चरिंग की बात करता है। बड़े-बड़े कारखानों की बात करता है। नई सड़कें, पुल, बिजली, सेमीकंडक्टर और ग्रीन एनर्जी की बातें होती हैं।

मगर युवाओं को एक ही दिशा में धकेला जा रहा है। सॉफ्टवेयर की तरफ।

कल को हमारे पास कोड लिखने वाले बहुत होंगे, लेकिन मशीन बनाने वाले कम। पुल बनाने वाले कम। बिजली और ऊर्जा व्यवस्था संभालने वाले कम।

इसे शिक्षा नीति नहीं, शैक्षिक सट्टेबाजी कहना ज्यादा ठीक होगा।


आईआईआईटी-बेंगलुरु के पूर्व निदेशक एस. सदागोपन की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति ने एक बेहद चिंताजनक तस्वीर पेश की।अनुमान यह था कि इंजीनियरिंग ग्रेजुएट्स में केवल करीब 17 प्रतिशत ही सीधे नौकरी के लिए तैयार माने जा सकते हैं।

जरा सोचिए। मां-बाप लाखों रुपये खर्च करते हैं। बच्चा चार साल पढ़ता है। डिग्री हाथ में आती है। फिर नौकरी का दरवाजा कहता है: अभी आप तैयार नहीं हैं।


समिति ने कंप्यूटर साइंस सीटों में कमी, एक जैसे कोर्सों पर रोक और एआई को अलग-अलग शाखाओं में शामिल करने की सिफारिश की।

बात बिल्कुल वाजिब है।



निजीकरण के समर्थकों ने कहा था कि इससे प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। गुणवत्ता सुधरेगी। दक्षता आएगी। लेकिन शिक्षा के एक बड़े हिस्से में हुआ कुछ और।

अगर एक कॉलेज मुनाफा कमा सकता है, तो दूसरा खोलो। अगर 60 सीटें बिकती हैं, तो 120 कर दो।कंप्यूटर साइंस चल रहा है, तो उसके पांच नए संस्करण निकाल दो। दाखिले कम हों, तो विज्ञापन बढ़ा दो।


मगर बड़ी तस्वीर से आंखें नहीं मूंदी जा सकतीं।

शिक्षा के विस्तार में राजनीतिक रसूख, ट्रस्ट, सोसायटी और कारोबारी हितों की भूमिका लगातार बढ़ती गई।हर सरकार ने कॉलेज खोलने को विकास का तमगा बना दिया। मगर किसी ने ठीक से नहीं पूछा: क्या हमें सचमुच एक और कॉलेज चाहिए?

उत्तर प्रदेश में 2026 में निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों में मांग और सीटों के बीच बड़ा असंतुलन दिखाई दे रहा है। AKTU की UPTAC काउंसलिंग के बाद करीब 74,000 बीटेक सीटें खाली रह गईं, जिनमें अधिकांश निजी कॉलेजों की हैं। लोकप्रिय CSE में भी 22,000 से अधिक सीटें खाली रहीं। छात्र नोएडा, गाजियाबाद और ग्रेटर नोएडा के प्रतिष्ठित कॉलेजों को तरजीह दे रहे हैं। कई निजी संस्थानों में JEE Main के बिना 12वीं के अंकों पर सीधे दाखिले की व्यवस्था करनी पड़ी। जरूरत से ज्यादा सीटें बढ़ने से कई कॉलेज आर्थिक दबाव और भविष्य के संकट से जूझ रहे हैं।

यही कहानी मेडिकल शिक्षा में भी दिखाई देती है। नए मेडिकल कॉलेजों की घोषणाएं बड़ी सुर्खियां बनती हैं। लेकिन मेडिकल कॉलेज केवल एक इमारत का नाम नहीं है।

उसे अनुभवी डॉक्टर चाहिए। शिक्षक चाहिए। लैब चाहिए। अस्पताल चाहिए। मरीज चाहिए। क्लीनिकल ट्रेनिंग चाहिए।

इनके बिना मेडिकल कॉलेज सिर्फ एक बड़ा भवन और चमकदार नामपट्ट बनकर रह सकता है।

होम्योपैथी और दूसरे प्रोफेशनल कोर्सों में भी कई संस्थान सीटें भरने के लिए जूझ रहे हैं। फिर भी नए संस्थान खोलने की होड़ खत्म नहीं होती।

यह कैसी तरक्की है?

जब पुरानी दुकान में ग्राहक नहीं हैं, तब नई दुकान क्यों खोली जा रही है?


हर साल नई इमारतें खड़ी करना बंद कीजिए। मौजूदा कॉलेजों को मजबूत बनाइए। खाली पड़े परिसरों का बेहतर इस्तेमाल कीजिए। उन्हें स्किलिंग और री-स्किलिंग सेंटर बनाइए। अच्छे शिक्षक लाइए। लैब सुधारिए। उद्योगों से सीधा रिश्ता जोड़िए।

और सबसे जरूरी बात; जितनी वास्तविक जरूरत है, उतनी ही सीटें रखिए। देश को 500 कमजोर इंजीनियरिंग कॉलेजों की जरूरत नहीं है। 100 अच्छे संस्थान शायद ज्यादा बेहतर काम कर सकते हैं।


खाली सीटें केवल दाखिले की समस्या नहीं हैं। वे व्यवस्था के खिलाफ छात्रों का खामोश फैसला हैं।


कई वर्षों से उच्च शिक्षा को समाज सेवा का लिबास पहनाकर एक बड़े कारोबार की तरह चलाया जा रहा है।

कॉलेज खोलने वालों को फायदा हुआ। राजनीतिक रसूख बढ़ा। इमारतें बनती गईं। सीटें बढ़ती गईं। मगर बेरोजगार डिग्रीधारियों की फौज भी बढ़ती गई।

समस्या निजी संस्थानों के होने की नहीं है। समस्या यह है कि शिक्षा को केवल मुनाफे की नजर से नहीं देखा जा सकता। कॉलेज इसलिए नहीं चलना चाहिए कि वह सीटें बेच सकता है। सरकार को तय करना होगा कि देश को किस तरह के पेशेवर चाहिए। कितने इंजीनियर चाहिए। कितने डॉक्टर चाहिए। किस इलाके में कॉलेज की जरूरत है।

सिर्फ वोट, जमीन और मुनाफे के लिए कॉलेज नहीं खुलने चाहिए।


Friday, August 21, 2026

 जब बड़े सो रहे थे, बच्चों ने घंटी बजा दी!  

जंतर-मंतर से यूपी के गांवों तक उठती आवाज़

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

23 अगस्त, 2026

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कल्पना कीजिए, श्याम बेनेगल की मशहूर फिल्म अंकुर का वह आखिरी दृश्य। गांव का एक छोटा लड़का सब कुछ चुपचाप देख रहा है: जमींदार की हुकूमत, गरीबों की बेबसी और अन्याय का खेल।

फिर अचानक वह एक पत्थर उठाता है।

पत्थर हवेली की ओर उछलता है। स्क्रीन लाल हो जाती है। एक छोटा-सा पत्थर, मगर उसके भीतर बगावत का एक बड़ा बीज छिपा है।

आज 2026 के भारत में वही दृश्य फिर याद आता है।

इस बार पत्थर असली नहीं है। कभी वह परीक्षा में पेपर लीक के खिलाफ नारा बनता है। कभी सोशल मीडिया का मीम बनता है। कभी जंतर-मंतर पर छात्रों की भीड़ बन जाता है। और अब वही आवाज उत्तर प्रदेश के गांवों के स्कूलों तक पहुंच रही है।

उन्नाव, लखनऊ, कन्नौज और हमीरपुर में बच्चे सवाल पूछ रहे हैं। खाना ठीक क्यों नहीं? पीने का पानी कहां है? शिक्षक पूरे क्यों नहीं हैं? स्कूल तक पहुंचने के लिए सड़क क्यों नहीं है?

हमीरपुर के चंदूपुर और आसपास के गांवों में सैकड़ों बच्चे अपनी मांग लेकर कलेक्ट्रेट तक पहुंच गए। उनकी मांग कोई आसमान से तारे तोड़ने वाली नहीं थी। बस स्कूल तक जाने के लिए एक ठीक सड़क चाहिए थी।

बच्चों को समझाने और दबाव डालने की कोशिशें हुईं। मगर इस बार बच्चे चुप रहने को तैयार नहीं थे। 


असल में यह आग कहीं और भड़की थी।

दिल्ली के जंतर-मंतर पर।

शुरुआत हुई परीक्षा के पेपर लीक से। खासकर NEET-UG जैसी बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा ने लाखों युवाओं का भरोसा हिला दिया। छात्रों को लगा कि वे सालों पढ़ें, कोचिंग में लाखों खर्च करें और आखिर में कोई पेपर चुरा ले जाए; तो मेहनत का मतलब क्या रह जाता है?

कुछ युवा प्रदर्शनकारियों ने अपने समूह को मजाकिया अंदाज में “कॉकरोच जनता पार्टी” कहा। नाम अजीब था, तरीका भी नया था। पुराने छात्र संगठनों और लंबे-लंबे भाषणों की जगह मीम थे, इंस्टाग्राम था, वीडियो थे और सोशल मीडिया का शोर था।

मगर धीरे-धीरे हंसी के पीछे का गुस्सा साफ दिखाई देने लगा।

सोनम वांगचुक भूख हड़ताल पर बैठे। 20 जुलाई को संसद की ओर बढ़ रहे प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच तनाव पैदा हुआ। पुलिस ने रोका, प्रदर्शनकारियों ने दबाव बनाए रखा।

और फिर हुआ वह, जिसकी शायद किसी ने उम्मीद नहीं की थी।

सड़क का दबाव सत्ता के दरवाजे तक पहुंच गया।

25 जुलाई को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। यह मोदी दौर की राजनीति में एक असाधारण घटना मानी गई। पहली बार लगा कि सड़क पर खड़े साधारण छात्रों की आवाज किसी बड़े मंत्री की कुर्सी तक पहुंच सकती है।

इसके बाद कार्रवाई का सिलसिला शुरू हुआ। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी से जुड़े करीब 600 अधिकारियों को हटाया गया। परीक्षा प्रश्नपत्रों की जांच के लिए नई चार-स्तरीय व्यवस्था बनाई गई। परीक्षा केंद्रों और गोपनीयता की सुरक्षा और कड़ी की गई।

15 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं के लिए मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग और एक करोड़ युवाओं को एआई प्रशिक्षण देने की घोषणा की। इसके बाद मंत्री विश्वविद्यालय परिसरों में सीधे पहुंचने लगे। “वन डे, वन यूनिवर्सिटी” जैसे कार्यक्रम शुरू हुए।

सवाल यह है कि यह सब किसने कराया?

न कोई बड़ा विपक्षी आंदोलन।

न कोई अनुभवी राजनीतिक दल।

न कोई स्थापित छात्र यूनियन।

यह काम उन युवाओं ने किया, जिन्हें राजनीति अक्सर नासमझ समझती रही है।

दिलचस्प बात यह भी रही कि जिस विपक्ष से सरकार को चुनौती देने की उम्मीद थी, वह लंबे समय से दिशा खोजता नजर आया। राहुल गांधी के नेतृत्व वाला विपक्ष लगातार चुनावी हार और संगठनात्मक कमजोरियों से जूझता रहा। INDIA गठबंधन भी कोई ऐसी साफ कहानी नहीं बना पाया, जो आम मतदाता को एक मजबूत विकल्प दिखाई दे।

संसद में हंगामा हुआ, विरोध हुआ, नारे लगे। मगर सत्ता की चमक पर कोई खास खरोंच नहीं आई।

फिर अचानक जंतर-मंतर पर यह अजीब-सी हलचल शुरू हुई।

“कॉकरोच” वाला तमाशा, तीखी भाषा, गालियां और निजी हमले:  कुछ  लोगों को भद्दा लगा लड़कियों द्वारा गालियां बकना; लड़के तो लड़के होते हैं!  मगर राजनीति के ठहरे हुए तालाब में किसी ने पत्थर जरूर फेंक दिया था।

लहरें उठीं।

इसे 1970 के दशक के जयप्रकाश नारायण आंदोलन से मिलाना आसान है। तब भी छात्र फीस, भ्रष्टाचार और व्यवस्था से परेशान थे। बाद में आंदोलन “संपूर्ण क्रांति” तक पहुंच गया। लोकनायक जयप्रकाश नारायण एक नैतिक चेहरा बने। इस बार सोनम वांगचुक ने भी युवाओं के गुस्से को एक नैतिक ताकत देने की अधूरी कोशिश की।

मगर दोनों आंदोलनों में बड़ा फर्क है।

जेपी आंदोलन पूरी व्यवस्था बदलना चाहता था। 2026 के छात्रों की मांगें ज्यादा सीधी थीं: पेपर लीक बंद करो, जिम्मेदारों को हटाओ, परीक्षा व्यवस्था ठीक करो।

और सबसे बड़ी बात, इनकी राजनीति व्हाट्सऐप, मीम और इंस्टाग्राम पर बनी।

यह यूनियन के दफ्तरों की राजनीति नहीं थी।

यह मोबाइल फोन की राजनीति थी।

लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई है।

जंतर-मंतर का छोटा पत्थर अब उत्तर प्रदेश के गांवों तक पहुंच गया है। अब बच्चे पेपर लीक के खिलाफ ही नहीं, स्कूल पहुंचने की सड़क, साफ पानी, अच्छा खाना और शिक्षक की मांग कर रहे हैं।

यही असली इम्तिहान है।

मंत्री का इस्तीफा हो जाना आसान है। कुछ अफसरों को हटाना भी आसान है। नई नीति की घोषणा करना तो सबसे आसान काम है।

मुश्किल काम है व्यवस्था को बदलना।

भारत की कोचिंग संस्कृति अभी भी जवान है। परीक्षा का जुनून अभी भी बेकाबू है। गांवों के स्कूलों की हालत कई जगह खराब है। डिग्री और रोजगार के बीच की खाई भी जस की तस है।

फिर भी एक बात साफ हो गई है।

जब बड़े लोग सो जाते हैं, कभी-कभी बच्चे घंटी बजा देते हैं।

अंकुर के उस बच्चे ने एक पत्थर फेंका था।

2026 के बच्चों ने भी पत्थर फेंका है।

अब देखना यह है कि सत्ता पक्ष उस पत्थर को सिर्फ एक शरारत समझती है, या उसके भीतर उगते नए अंकुर को पहचानती है। गनीमत है कि केंद्र सरकार ने इसे पॉजिटिव दृष्टि से लिया है, और तत्परता से आवश्यक पहलें  की हैं।