Wednesday, September 9, 2026

 न भूकंप आया, न सुनामी, फिर दिल्ली में हॉस्टल भरभरा के कैसे गिरा?

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जब इमारतें मौत का जाल बनने लगें, तो शायद अतीत हमें कुछ सिखाना चाहता है

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बृज खंडेलवाल द्वारा

11 सितंबर 2026

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आखिर एक इमारत सदियों तक कैसे टिकती है?

अच्छी सामग्री? समझदार इंजीनियरिंग? नियमित रखरखाव? या प्रकृति का सम्मान?

लगता है, इन सबकी जरूरत होती है। बस शायद नगर निगम के प्रमाणपत्र की नहीं।

6 सितंबर को दिल्ली ने फिर याद दिलाया कि शहर जितनी तेजी से बढ़ रहे हैं, नागरिक व्यवस्था उतनी तेजी से मजबूत नहीं हो रही।

दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के पास सत्या निकेतन में पांच मंजिला इमारत ‘होस्टल डेज’ भरभराकर गिर गई। कम से कम सात लोगों की मौत हुई। 

कोई इमारत अचानक एक सुबह उठकर गिरने का फैसला नहीं करती।

पहले दरारें आती हैं। नींव कमजोर होती है। अतिरिक्त मंजिलें जुड़ती हैं। बेसमेंट और गहरा होता है। नालियां बंद होती हैं।

फिर एक दिन गुरुत्वाकर्षण अपना अंतिम नोटिस भेज देता है।


लेकिन सवाल वही है:

सरकार की नींद हादसे के बाद ही क्यों खुलती है?

सत्या निकेतन की घटना कोई अकेली त्रासदी नहीं है। यह देश के बड़े शहरी संकट का हिस्सा है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, 2020 से 2024 के बीच भारत में इमारत गिरने, आग लगने, गड्ढों और मैनहोल में गिरने जैसी घटनाओं में करीब 33,000 लोगों की मौत हुई।

आग से 22,000 से अधिक मौतें हुईं। इमारतों के गिरने से भी हजारों लोग मारे गए। केवल 2024 में ढांचागत गिरावट से करीब 1,525 मौतें हुईं। दिल्ली में पांच वर्षों में इमारत गिरने से 169 मौतें दर्ज हुईं।

ये महज आंकड़े नहीं हैं।

हर संख्या के पीछे एक परिवार था। कोई मां इंतजार कर रही थी। कोई पिता फोन कर रहा था। कोई घर लौटने की राह देख रहा था।


पुरानी इमारतों का रखरखाव नहीं होता। अवैध मंजिलें जुड़ती जाती हैं। बिना पर्याप्त इंजीनियरिंग के बेसमेंट खोदे जाते हैं। नालियां जवाब दे देती हैं। जलभराव नींव पर हमला करता है।

और फिर निर्माण स्थल का सबसे बड़ा हाथी सामने आता है: भ्रष्टाचार।

सरकारी इमारतें जनता के पैसे से बनती हैं। मगर हर रुपया ईंट, सीमेंट, स्टील और सुरक्षा में नहीं बदलता।

कहीं घटिया सामग्री, कहीं फर्जी माप, कहीं बढ़े हुए बिल और कहीं कमजोर निगरानी। नतीजा यह कि इमारत की उम्र उद्घाटन से पहले ही घटने लगती है।

निर्माण में भ्रष्टाचार केवल सरकारी खजाने को नुकसान नहीं पहुंचाता।

वह खतरे भी पैदा करता है।

कमजोर सड़क जल्दी टूटती है। घटिया पुल जोखिम बन जाता है। खराब नाला बस्ती को डुबो देता है। घटिया निर्माण सामान्य इमारत को मौत का जाल बना सकता है।

बाहर कोई बोर्ड नहीं लगा होता—

“कमीशन बचाने के लिए मानक से नीचे बनाया गया है।”

नतीजे वर्षों बाद सामने आते हैं। तब तक फाइलें धूल खा चुकी होती हैं और ठेकेदार अगली परियोजना पकड़ चुका होता है।

इसलिए स्वतंत्र गुणवत्ता जांच, पारदर्शी डिजिटल रिकॉर्ड, तीसरे पक्ष का निरीक्षण और गंभीर लापरवाही पर व्यक्तिगत जवाबदेही जरूरी है।

यह प्रशासनिक सुधार भर नहीं है।

यह जनसुरक्षा का सवाल है।

नतीजा सामने है: 

ऊपर कंक्रीट। नीचे पानी। बीच में भ्रष्टाचार। और पीछे भागता प्रशासन।

लेकिन भारत की पुरानी वास्तुकला हमें एक अलग कहानी सुनाती है।

वह कहानी है; दीर्घायु, जलवायु की समझ और मजबूती की।

आगरा को ही देखिए।

ताजमहल, आगरा किला और फतेहपुर सीकरी ने तपती गर्मी, बारिश, प्रदूषण और सदियों की मार झेली है। उन्होंने बादशाह देखे। आक्रमण देखे। उपेक्षा देखी।

फिर भी खड़े हैं।

उधर कुछ आधुनिक इमारतें कुछ ही वर्षों में टपकने लगती हैं।

और कुछ तो इतना इंतजार भी नहीं करतीं।

सवाल सीधा है:

पुराने कारीगर क्या जानते थे, जिसे आधुनिक निर्माण भूल गया?

बहुत कुछ।

पारंपरिक वास्तुकला केवल दिखावे के लिए नहीं बनाई जाती थी। वह काम करने के लिए बनाई जाती थी।

मोटी दीवारें गर्मी रोकती थीं। आंगन हवा का रास्ता बनाते थे। जालियां धूप को नियंत्रित करती थीं। छज्जे छाया देते थे।

स्थानीय जलवायु के हिसाब से पत्थर, लकड़ी, मिट्टी, चूना और अन्य सामग्री चुनी जाती थी।

चूना-सुरखी जैसे मिश्रण कई परिस्थितियों में नमी और हलचल को कठोर आधुनिक सामग्री से बेहतर ढंग से सहन कर सकते थे। मजबूत चबूतरे और भार वहन करने वाली दीवारें वजन को स्वाभाविक रूप से बांटती थीं।

हिमालय में काठ-कुनी जैसी तकनीक लकड़ी और पत्थर को जोड़कर लचीलापन पैदा करती थी।

आज कंक्रीट, शीशा और एयर-कंडीशनिंग आधुनिकता के प्रतीक बन गए हैं।

तकनीक समस्या नहीं है।

लापरवाही से इस्तेमाल की गई तकनीक समस्या है।

आरसीसी की इमारत बेहद सुरक्षित हो सकती है। लेकिन मिट्टी की जांच, सही नींव, बेहतर जल निकासी, गुणवत्तापूर्ण सामग्री और कठोर निगरानी जरूरी है।

बिना नींव मजबूत किए एक और मंजिल जोड़िए। पुरानी इमारत के नीचे बेसमेंट खोदिए। पानी रिसने दीजिए।

फिर एक दिन भौतिक विज्ञान अपना हिसाब मांग लेगा।

इसीलिए आगरा में हुआ 23वां एआरकेएएसआईए फोरम महत्वपूर्ण था। 24 एशियाई देशों के 600 से अधिक वास्तुकार, शिक्षक, विद्यार्थी और विशेषज्ञ वहां जुटे। विषय था—“Bringing Back Vernacular Wisdom”, यानी स्थानीय वास्तु-बुद्धि की वापसी।

यह केवल सम्मेलन का आकर्षक शीर्षक नहीं होना चाहिए।

पारंपरिक वास्तुकला में गर्मी, पानी, हवा, सामग्री और संरचनात्मक मजबूती की व्यावहारिक समझ छिपी है।

ताजमहल इसलिए केवल पर्यटकों के लिए स्मारक नहीं है।

वह अनुपात, कारीगरी, सामग्री और टिकाऊपन का पाठ है।

देश की अनगिनत हवेलियां, मंदिर, किले और पारंपरिक मकान भी यही कहानी कहते हैं।

वे सदियों से खड़े हैं।

हमारी कई नई इमारतें दशकों का इंतजार भी नहीं कर पातीं।

समाधान अतीत में लौट जाना नहीं है।

समाधान है—पुरानी बुद्धिमत्ता और आधुनिक विज्ञान का मेल।

आंगन आधुनिक कूलिंग का विकल्प बन सकते हैं। स्थानीय सामग्री पर्यावरणीय बोझ घटा सकती है। पारंपरिक छाया व्यवस्था बिजली की खपत कम कर सकती है। आधुनिक इंजीनियरिंग पुराने सिद्धांतों को और मजबूत कर सकती है।

लेकिन तकनीक अकेले खराब शासन को नहीं बचा सकती।

सख्त बिल्डिंग कोड, पुराने भवनों और पीजी हॉस्टलों का अनिवार्य स्ट्रक्चरल ऑडिट, बेहतर अग्नि सुरक्षा, प्रभावी जल निकासी और जवाबदेह नगर निकाय जरूरी हैं।

सबसे जरूरी है सुरक्षित छात्र आवास।

छात्रों को केवल इसलिए अपनी जान जोखिम में नहीं डालनी चाहिए कि शहर में पर्याप्त सरकारी हॉस्टल नहीं हैं।

शहर की सफलता शीशे की इमारतों से नहीं मापी जानी चाहिए।

न फ्लाईओवर से। न स्मार्टफोन ऐप से।

शहर तब सफल है जब उसके नागरिक सुरक्षित चल सकें, सुरक्षित रह सकें और सुरक्षित सो सकें।

विडंबना देखिए।

भारत को हर चीज नए सिरे से आविष्कार करने की जरूरत नहीं है।

कुछ जवाब हमारे आसपास पहले से खड़े हैं।

चुपचाप।

सदियों से।

शायद ताजमहल, आगरा किला और पुरानी हवेलियां हमसे कह रही हैं: 

प्रकृति के साथ बनाइए। लोगों के लिए बनाइए। टिकाऊ बनाइए।

भविष्य शायद अतीत में ही कहीं छिपा बैठा है।

सवाल सिर्फ इतना है: क्या हमारी आधुनिक नगर व्यवस्था अगली इमारत गिरने से पहले उसकी आवाज सुन पाएगी?


 नेता फेल हुए, अब न्यायपालिका का ही सहारा

समाज को आईना दिखाने लगे जज

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राजनीति की जड़ता ने न्यायपालिका को सामाजिक और पर्यावरणीय चौकीदार बना दिया है

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बृज खंडेलवाल द्वारा

10 सितंबर 2026

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अदालतों में आजकल सिर्फ कानून की बातें नहीं होतीं। वहां समाज भी आये दिन कटघरे में खड़ा होता है।

शादी, परिवार, पितृसत्ता, युवा, लिव-इन रिश्ते और महिलाओं की गरिमा पर टिप्पणियां हो रही हैं।

और अब नदियां भी अदालत पहुंच गई हैं।

यमुना से लेकर चंबल और अरावली तक, न्यायपालिका पर्यावरण की प्रहरी बनती दिखाई दे रही है।

ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि सरकारी तंत्र और उसकी इकाइयां सो रही हैं।राजनीति को इन दिनों एक अजीब बीमारी लग गई है: अनुकूलन पक्षाघात।

समाज बदल रहा है। तकनीक बदल रही है। रिश्ते बदल रहे हैं। पर कानून और राजनीति अक्सर वहीं टिके  हैं।


युवा अलग ढंग से सोच रहे हैं। महिलाएं अपने अधिकार मांग रही हैं। लिव-इन रिश्ते अब असामान्य नहीं रहे। डिजिटल दुनिया ने निजता की परिभाषा बदल दी है।


हाल के मामलों में सुप्रीम कोर्ट के जजों ने घरेलू हिंसा, दहेज, वैवाहिक अत्याचार और सामाजिक दबाव पर कड़ी टिप्पणियां की हैं।

एक मामले में सवाल उठा कि पढ़े-लिखे लोग बहू और उसके परिवार को क्यों अपमानित करते हैं।

दूसरे मामले में यह चिंता सामने आई कि सामाजिक बदनामी के डर से माता-पिता अपनी बेटियों को बार-बार हिंसक वैवाहिक घरों में वापस भेज देते हैं।

एक अन्य फैसले में पितृसत्ता को समाज की गहरी बीमारी के रूप में देखा गया।

लिव-इन संबंधों पर भी अदालत ने बदलते सामाजिक यथार्थ को स्वीकार किया।

यह सब स्वागत योग्य है। आखिर जज भी इसी समाज का हिस्सा हैं।

वे रोज उन परिवारों को देखते हैं, जिनकी पीड़ा अखबारों की सुर्खियां नहीं बनती।

वे देखते हैं कि कानून की किताब के बाहर जिंदगी कितनी बेरहम हो सकती है।

लेकिन यहीं से असली सवाल शुरू होता है। जज फैसला सुनाएं या समाज को प्रवचन दें? 'कॉकरोच' विवाद ने खतरे की घंटी बजाई थी। युवा कार्यकर्ताओं को लेकर 'कॉकरोच' और 'पैरासाइट' जैसे शब्दों पर विवाद हुआ।

बाद में संदर्भ और स्पष्टीकरण सामने आए। लेकिन सवाल फिर भी खड़ा है।

न्यायाधीश की एक टिप्पणी आम नागरिक की टिप्पणी नहीं होती। उसके पीछे संस्था की पूरी ताकत खड़ी होती है। जज के मुंह से निकला एक वाक्य अगले दिन राष्ट्रीय बहस बन सकता है। इसलिए न्यायिक भाषा में भी संयम जरूरी है। कानून की ताकत को शब्दों की तल्खी की जरूरत नहीं होती।

न्यायपालिका का पर्यावरण को लेकर बढ़ता हस्तक्षेप इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। नदियां गंदी हैं। जंगल कट रहे हैं। झीलें गायब हो रही हैं। भूजल नीचे जा रहा है।शहर दम घोंट रहे हैं। सरकारी विभाग फाइलें चला रहे हैं। और अदालतें सवाल पूछ रही हैं।

यमुना प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट की सुओ मोटू पहल इसका बड़ा उदाहरण है। मामला केवल एक नदी का नहीं रहा।सवाल साफ पानी और स्वस्थ जीवन के संवैधानिक अधिकार तक पहुंच गया।

चंबल अभयारण्य में अवैध रेत खनन हो या राजस्थान की जोजरी-बांडी-लूणी नदी प्रणाली की दुर्दशा, अदालत ने प्रशासन से जवाब मांगा।

अरावली की पहाड़ियों का सवाल भी केवल पहाड़ों की ऊंचाई का मामला नहीं है। वह भूजल, जंगल, जैव-विविधता और भविष्य की पीढ़ियों का सवाल है।

यानी अदालत अब पूछ रही है:

“सरकार जी, आप कर क्या रहे हैं?”

और शायद यही सवाल जनता वर्षों से पूछ रही है।

न्यायपालिका का हस्तक्षेप जरूरी हो सकता है। कभी-कभी वह जीवनदायी भी होता है। लेकिन क्या अदालतें हमेशा के लिए प्रशासन चलाएंगी? क्या जज प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का काम करेंगे? क्या अदालतें तय करेंगी कि कौन-सी नदी कैसे साफ होगी? क्या हर सरकारी नाकामी का इलाज सुओ मोटू ही होगा?

अदालत सरकार नहीं है। उसे सरकार का काम करने की जरूरत भी नहीं होनी चाहिए।

असली बीमारी कहीं और है । समस्या उस राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था में ज्यादा है, जो समय के साथ बदलने को तैयार नहीं। संसद समय पर कानून नहीं बदलेगी तो अदालत को बोलना पड़ेगा। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड काम नहीं करेगा तो अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ेगा।

नगर निगम नालियां और नदियां बचाने में नाकाम रहेगा तो अदालत का दरवाजा खटखटाया जाएगा।

सरकार महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं करेगी तो न्यायपालिका से उम्मीद की जाएगी।

जब व्यवस्था खाली जगह छोड़ती है, कोई न कोई उसे भरता है।

आज वह जगह न्यायपालिका भर रही है।

लेकिन यह स्थायी व्यवस्था नहीं बन सकती।

लोकतंत्र में सबका अपना काम है

संसद का काम है कानून बनाना।

सरकार का काम है उन्हें लागू करना।

प्रशासन का काम है व्यवस्था चलाना।

नियामक संस्थाओं का काम है नियम लागू करवाना।

नगर निकायों का काम है शहर और जलस्रोत बचाना।

और अदालत का काम है संविधान और नागरिक अधिकारों की रक्षा करना।

अगर हर संस्था दूसरे का काम करने लगे तो लोकतंत्र का संतुलन बिगड़ेगा।

जज समाज का विवेक जरूर बन सकते हैं। लेकिन उन्हें समाज का प्रबंधक बनने की जरूरत नहीं। वे आईना दिखा सकते हैं। आईने को खुद चेहरा बनने की जरूरत नहीं।

न्यायपालिका को चुप कराने की जरूरत नहीं है। हाल के न्यायिक हस्तक्षेपों से घबराने की जरूरत नहीं है। बल्कि उन्हें गंभीरता से समझने की जरूरत है।

अदालतें हमें हमारी कमियां दिखा रही हैं।

सवाल यह नहीं कि जज बोल क्यों रहे हैं।

सवाल यह है कि बाकी लोग चुप क्यों हैं?

न्यायपालिका को चुप कराना समाधान नहीं है।

राजनीति को जगाना समाधान है।

संसद को समाज की बदलती जरूरतों को समझना होगा।

सरकारों को अदालत के आदेश का इंतजार करना बंद करना होगा।

प्रशासन को हर संकट में न्यायिक डंडे की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए।

और राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि चुनाव केवल सत्ता पाने का रास्ता नहीं है।

वह समाज के बदलते सवालों का जवाब देने की जिम्मेदारी भी है।

भारत को कानूनों की कमी नहीं है।

कमी है संस्थागत कल्पनाशीलता की।

कमी है समय पर निर्णय लेने की।

कमी है जवाबदेही की।

कमी है बदलती दुनिया को स्वीकार करने की।

इसलिए आज की अदालतें एक बड़ा संदेश दे रही हैं। जब समाज बदलता है और राजनीति नहीं बदलती, न्यायपालिका आगे आती है।


जब संस्थाएं अपना काम नहीं करतीं, न्यायपालिका दरवाजा खटखटाती है।

यह उसकी ताकत भी है। और हमारे लोकतंत्र की कमजोरी का प्रमाण भी।

अच्छा लोकतंत्र वह नहीं है जिसमें जज बार-बार समाज को बचाने निकलें।

अच्छा लोकतंत्र वह है जिसमें चुनी हुई संस्थाएं अपना काम समय पर करें।

ताकि अदालत को हर बार कहना न पड़े:

“सरकार जी, अब तो जागिए!”


Monday, September 7, 2026

 यूपी 2027: जल्द शुरू होगा सियासी पलायन

टिकट, जातीय समीकरण और राजनीतिक वफादारी का मौसम बदलने लगा है

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बृज खंडेलवाल द्वारा

9 सितंबर 2026

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समय आ गया है।

लखनऊ में एक नया बोर्ड लग जाना चाहिए:

“राजनीतिक मौसम बदल रहा है। पार्टी का झंडा संभालकर रखें।”

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव अभी कई महीने दूर हैं। मगर सियासी पारा तेजी से चढ़ रहा है। नेता हवा का रुख भांप रहे हैं। पार्टियां वोट गिन रही हैं। टिकट के दावेदार दरवाजे खटखटा रहे हैं। और राजनीतिक रणनीतिकार जातीय समीकरणों की नई कुंडली बना रहे हैं।

चुनाव सिर्फ लड़े नहीं जाते; वे बाकायदा इंजीनियर किए जाते हैं।

403 विधानसभा सीटों वाले  प्रदेश में बहुमत का आंकड़ा 202 है। बीजेपी के पास फिलहाल करीब 258 विधायक हैं, जबकि समाजवादी पार्टी के पास लगभग 101 सीटें हैं।

लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव ने तस्वीर में दरार डाल दी थी। बीजेपी 33 सीटों पर सिमट गई, जबकि समाजवादी पार्टी ने 37 और कांग्रेस ने छह सीटें जीतकर विपक्षी गठबंधन को 43 सीटों तक पहुंचा दिया।

अचानक अजेय दिखने वाली सत्ता को चुनौती दिखाई देने लगी।

और जब सत्ता की दीवार में दरार नजर आए, तो दल-बदल उद्योग सबसे पहले सक्रिय होता है।


उत्तर प्रदेश ने दल-बदल की कला में महारत हासिल कर ली है। विचारधारा अक्सर नेता के साथ पार्टी बदल लेती है। खासकर जब टिकट का सवाल हो।

हाल में AIMIM के प्रवक्ता सैयद आसिम वकार कांग्रेस में शामिल हो गए। उन्होंने अपनी पुरानी पार्टी पर बीजेपी की “बी-टीम” की तरह काम करने का आरोप लगाया।

AIMIM यूपी में कोई बड़ी चुनावी ताकत नहीं है। फिर भी यह घटना संकेत देती है कि विपक्ष वोट कटने के खतरे को लेकर सतर्क है।

बिहार का अनुभव अभी ताजा है।

जब मुकाबला कांटे का हो, तब कुछ हजार वोट भी सरकार बना सकते हैं और सरकार गिरा सकते हैं।

यूपी में पार्टी बदलना अब कोई राजनीतिक अपराध नहीं माना जाता। नेता बीजेपी से सपा में जाते हैं। सपा से बसपा में जाते हैं। बसपा से बीजेपी में आते हैं। फिर मौका मिले तो वापस भी लौट आते हैं।

झंडा बदलता है, भाषण वही रहता है।


अयोध्या इस चुनाव का सबसे दिलचस्प राजनीतिक प्रयोगशाला बन सकती है।

राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के कुछ ही महीनों बाद फैजाबाद लोकसभा सीट पर बीजेपी की हार ने पार्टी को चौंका दिया। समाजवादी पार्टी के अवधेश प्रसाद ने बीजेपी के मौजूदा सांसद लल्लू सिंह को 54 हजार से अधिक मतों से हराया।

अब विधानसभा चुनाव में अयोध्या सीट पर सबकी नजर होगी।

मौजूदा विधायक वेद प्रकाश गुप्ता को लेकर पार्टी में मंथन चल रहा है। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी के पवन पांडेय मजबूत चुनौती पेश कर सकते हैं।

बीजेपी के सामने सवाल सीधा है।

क्या राम मंदिर का मुद्दा अकेले चुनाव जिता देगा, या उसके साथ जातीय समीकरण भी जोड़ना पड़ेगा?

यूपी की राजनीति इस सवाल का जवाब हमेशा एक ही देती है:

“दोनों चाहिए।”

बीजेपी: बूथ बचाओ, वोट बढ़ाओ

बीजेपी चुनाव में मजबूत संगठन, सत्ता की मशीनरी, कल्याणकारी योजनाओं और योगी आदित्यनाथ सरकार के कामकाज के सहारे उतरेगी।

उसकी रणनीति भी साफ है: बूथ मजबूत करो, लाभार्थियों तक पहुंचो, गैर-यादव पिछड़ों और गैर-जाटव दलितों को साथ रखो, सवर्ण समर्थन बनाए रखो और सपा के PDA समीकरण को फैलने से रोक दो।

NDA के सहयोगी भी अपनी-अपनी हिस्सेदारी मांगेंगे। अपना दल, निषाद पार्टी, आरएलडी और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी सीटों पर दावा ठोकेंगे।

गठबंधन राजनीति में पुरानी कहावत याद आती है: 

“बहुत ज्यादा रसोइये हों तो खिचड़ी बिगड़ सकती है।”

लेकिन चुनाव में कभी-कभी कम रसोइयों से भी खाना जल जाता है।


अखिलेश यादव के पास इस बार एक महत्वपूर्ण हथियार है; 2024 का प्रदर्शन।

PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण ने लोकसभा चुनाव में सपा को मजबूत किया। अब चुनौती इस सामाजिक गठजोड़ को विधानसभा की 403 सीटों तक पहुंचाने की है।

यह आसान काम नहीं है।

लोकसभा चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों और बड़े नेताओं के नाम पर लड़ा जाता है। विधानसभा चुनाव में बूथ, बिरादरी, उम्मीदवार और स्थानीय समीकरण ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

इसलिए सपा को जमीन पर संगठन मजबूत करना होगा।

सिर्फ सोशल मीडिया से सरकार नहीं बनती।

कांग्रेस को चाहिए सम्मान और सीटें, कांग्रेस ने लोकसभा में छह सीटें जीतकर अपनी सौदेबाजी की ताकत बढ़ा ली है।

अब वह विधानसभा में सम्मानजनक हिस्सेदारी चाहती है। पार्टी के नेताओं ने “बराबरी और सम्मान” के साथ गठबंधन की बात कही है।

लेकिन यहां पेच है।

सपा खुद को यूपी में वरिष्ठ सहयोगी मानती है। कांग्रेस ज्यादा सीटों की मांग कर रही है।

यानी INDIA गठबंधन का सबसे बड़ा दुश्मन शायद बीजेपी नहीं होगा।

सीटों का गणित हो सकता है।

राजनीति में विचारधारा पर भाषण दिए जा सकते हैं। लेकिन टिकट बांटते समय कैलकुलेटर निकल आता है।


बहुजन समाज पार्टी ने गठबंधन की गाड़ी में बैठने से इनकार कर दिया है।

मायावती ने साफ संकेत दिया है कि BSP 2027 का विधानसभा चुनाव अपने दम पर लड़ेगी। उनका तर्क है कि पिछले गठबंधनों में बसपा के वोट तो दूसरे दलों को मिले, लेकिन बदले में पर्याप्त समर्थन नहीं मिला।

बसपा के सामने लक्ष्य बड़ा है: पूर्ण बहुमत।

यह सुनने में महत्वाकांक्षी लगता है। लेकिन बसपा को कम आंकना भी राजनीतिक भूल हो सकती है।

वह कई सीटें न जीते, फिर भी कई सीटों का परिणाम तय कर सकती है।

यही है स्पॉइलर फैक्टर।

कभी-कभी चुनाव जीतने के लिए सीट जीतना जरूरी नहीं होता।

किसी दूसरे को हराने के लिए पर्याप्त वोट लेना भी काफी होता है।

असली मुद्दे दरवाजे पर खड़े हैं

जातीय गणित के पीछे जनता के असली सवाल भी खड़े हैं।

रोजगार, बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाएं, पेपर लीक, महंगाई, किसान, शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था और बुलडोजर राजनीति चुनावी विमर्श का हिस्सा बनेंगे।

युवा मतदाता खास तौर पर महत्वपूर्ण होंगे।

नारे से पेट नहीं भरता। नौकरी की जरूरत होती है।

बीजेपी कल्याणकारी योजनाओं, विकास, कानून-व्यवस्था और हिंदुत्व को सामने रखेगी।

सपा सामाजिक न्याय, बेरोजगारी और शासन के सवाल उठाएगी।

कांग्रेस पुनर्जीवन की कोशिश करेगी।

बसपा पुराने सामाजिक इंजीनियरिंग मॉडल को नए रूप में आजमा सकती है।

छोटी पार्टियां अपनी-अपनी जातीय जेबें तलाशेंगी।

और टिकट के दावेदार?

वे अपनी राजनीतिक तीर्थयात्रा जारी रखेंगे।

टिकट ही असली घोषणापत्र है

दशहरे तक कई राजनीतिक समीकरण साफ होने लगेंगे। दिवाली के बाद टिकटों की मंडी गर्म होगी।

फिर वही दृश्य सामने आएंगे।

नाराज नेता।

बागी उम्मीदवार।

भावुक इस्तीफे।

प्रेस कॉन्फ्रेंस।

और वही अमर संवाद: 

“पार्टी ने मेरे साथ धोखा किया है।”

वोटर चुपचाप सब देखेगा।

उत्तर प्रदेश का चुनाव कभी सिर्फ पार्टियों का चुनाव नहीं रहा। यह जातीय गठबंधनों, उम्मीदवारों, बूथ प्रबंधन, स्थानीय नाराजगी, धनबल, संगठन और राष्ट्रीय मुद्दों का जटिल मिश्रण है।

बीजेपी के पास मशीनरी है।

सपा के पास 2024 की रफ्तार है।

कांग्रेस को पुनर्जीवन चाहिए।

बसपा को पुनरुत्थान।

छोटी पार्टियों को मोलभाव की ताकत।

और वोटर?

आखिरी फैसला उसी का होगा।

उत्तर प्रदेश में सियासी हवा इतनी तेजी से बदलती है कि नेता के हाथ का झंडा भी पीछे रह जाए।

2027 का चुनाव सिर्फ योगी सरकार पर जनमत-संग्रह नहीं होगा।

यह परीक्षा होगी कि किस पार्टी ने नए यूपी के मतदाता को समझा है, और कौन अब भी पुराने चुनाव की रणनीति लेकर बैठा है।


 जब आस्था शोर बन जाए: त्योहारों के प्रदूषण का बढ़ता खतरा

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बृज खंडेलवाल द्वारा

8 सितंबर 2026

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त्योहार खुशियाँ लाते हैं। वे लोगों को जोड़ते हैं और रिश्तों में मिठास घोलते हैं। लेकिन जब भक्ति का वॉल्यूम इतना बढ़ जाए कि पूरा मोहल्ला परेशान हो जाए, तो सवाल उठना लाज़िमी है।

कभी त्योहार सादगी, श्रद्धा, लोक संगीत और सामुदायिक भागीदारी से जुड़े थे। मिट्टी की मूर्ति बनती थी और श्रद्धा के साथ उसका विसर्जन होता था। आज तस्वीर काफी बदल गई है।

ऊँचे लाउडस्पीकर, डीजे, बड़े साउंड सिस्टम, रीमिक्स गाने और लंबी शोभायात्राएँ त्योहारों का हिस्सा बनते जा रहे हैं। कई बार भक्ति कम और शोर ज्यादा सुनाई देता है।

त्योहारों का प्रदूषण केवल पानी और मूर्तियों तक सीमित नहीं है। शोर भी अब गंभीर प्रदूषण बन चुका है।

कर्नाटक के कोडागु जिले में पुलिस ने हाल ही में आयोजकों को ध्वनि प्रदूषण संबंधी नियमों का पालन करने की चेतावनी दी है। संदेश साफ है: उत्सव मनाइए, लेकिन कानून की हद में।

कानून भी बिल्कुल स्पष्ट है।

Noise Pollution (Regulation and Control) Rules, 2000, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत बनाए गए हैं। इनमें अलग-अलग क्षेत्रों के लिए ध्वनि की सीमा तय है। लाउडस्पीकर और पब्लिक एड्रेस सिस्टम के इस्तेमाल पर भी नियम लागू होते हैं। सामान्यतः रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक तेज आवाज पर रोक रहती है।

अस्पतालों, स्कूलों और रिहायशी इलाकों में तो और ज्यादा एहतियात जरूरी है। आखिर किसी मरीज की बीमारी, किसी बच्चे की नींद और किसी विद्यार्थी की पढ़ाई पर डीजे की मर्जी क्यों चले?

यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है: कानून है, फिर अमल कहाँ है?

हर त्योहार पर अक्सर वही कहानी दोहराई जाती है। आयोजक अनुमति लेते हैं और नियम मानने का भरोसा देते हैं। फिर डीजे शुरू होता है। आवाज बढ़ती जाती है और पूरा मोहल्ला बिना अपनी मर्जी के कार्यक्रम का हिस्सा बन जाता है।

शिकायत करने पर कभी पुलिस आती है, कभी नहीं। कई बार चेतावनी देकर मामला खत्म हो जाता है। इससे गलत संदेश जाता है कि त्योहारों में नियम थोड़े ढीले चल सकते हैं।

यही सोच असली समस्या है।

प्रशासन की अपनी मुश्किलें भी हैं। एक साथ कई कार्यक्रम होते हैं। पुलिस बल सीमित होता है। ध्वनि मापने के उपकरण भी हर जगह तुरंत उपलब्ध नहीं होते। लेकिन इन परेशानियों का अर्थ यह नहीं कि कानून को ताक पर रख दिया जाए।

गणेश चतुर्थी का इतिहास हमें उत्सव की असली ताकत भी याद दिलाता है। 1893 में बाल गंगाधर तिलक ने गणेश उत्सव को सार्वजनिक रूप दिया। इसका उद्देश्य लोगों को जोड़ना और सामाजिक चेतना पैदा करना था।

आज वही उत्सव कई जगह शक्ति प्रदर्शन की होड़ में बदलता दिखाई देता है। बड़े मंच, बड़े स्पीकर, बड़े जुलूस और उससे भी बड़ा शोर, मानो भक्ति की गहराई डेसिबल से मापी जाने लगी हो।

यह भी भूलना नहीं चाहिए कि विसर्जन के दौरान भीड़, यातायात, पर्यावरण और कानून-व्यवस्था से जुड़ी चुनौतियाँ पैदा होती हैं। उत्सव जब दूसरे नागरिकों के अधिकारों से टकराने लगे, तब आत्ममंथन जरूरी है।

इसका अर्थ त्योहार बंद करना नहीं है। जरूरत त्योहारों की मूल भावना वापस लाने की है।

आयोजकों को अनुमति पहले लेनी चाहिए। तय रास्ते, समय और ध्वनि सीमा का पालन होना चाहिए। डीजे मनोरंजन करे, पड़ोसियों को परेशान न करे।

मरीज को शांति चाहिए। बच्चे को नींद चाहिए। बुजुर्ग को सुकून चाहिए। विद्यार्थी को पढ़ाई के लिए खामोशी चाहिए। इन जरूरतों का सम्मान करना भी धर्म और समाज दोनों की जिम्मेदारी है।

पर्यावरण की चिंता भी उतनी ही जरूरी है। पीओपी की मूर्तियाँ, रासायनिक रंग और प्रदूषित जल विसर्जन हमारी आस्था की कीमत नहीं हो सकते। मिट्टी की मूर्ति, प्राकृतिक रंग और जिम्मेदार विसर्जन उत्सव को सुंदर भी बनाते हैं और टिकाऊ भी।

आखिर भक्ति वह नहीं, जो दूसरों को बेचैन कर दे। धर्म वह नहीं, जो पड़ोसी की नींद हराम कर दे।

गणेश को विघ्न विनाशक कहा जाता है, बाधाओं को दूर करने वाला। उनके प्रति सच्ची श्रद्धा यही होगी कि हमारा उत्सव खुद किसी के लिए नया विघ्न न बने।

आस्था और पर्यावरण साथ चल सकते हैं। आस्था और कानून भी साथ चल सकते हैं। लेकिन आस्था और सार्वजनिक परेशानी का कोई मेल नहीं।

त्योहार हमारी खुशी हैं। उन्हें किसी और की सजा नहीं बनना चाहिए।

त्योहार श्रद्धा के हों, प्रदूषण के नहीं।


Sunday, September 6, 2026

 नेता मौज में, अफसर उदासीन, आगरा का भविष्य अधर में 

ताज की छाया में ठहरा आगरा: T T Z के उद्योगों का उजड़ा हुआ सपना

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

7 सितंबर 2026

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कभी आगरा भारत के औद्योगिक नक्शे पर अपनी अलग पहचान रखता था।

यह शहर केवल ताजमहल और पेठे के लिए नहीं जाना जाता था।

यहां भट्टियां जलती थीं, कारखाने चलते थे और हुनर बिकता था। देश विदेश में उद्योगों की पहचान थी। ताज महल से ज्यादा कमाई व्यापार उद्योगों से थी।

आज वही आगरा औद्योगिक विकास की दौड़ में पिछड़ रहा है।

तीन दशक पहले ताज बचाने के लिए उठाए गए कदम जरूरी थे। लेकिन उनकी कीमत आज भी आगरा और पूरे टीटीजेड को चुकानी पड़ रही है।

1990 के दशक में आगरा के उद्योगों पर संकट मंडराया। ताजमहल को प्रदूषण से बचाना राष्ट्रीय प्राथमिकता बन गया। सुप्रीम कोर्ट ने 1993 से सख्त कदम उठाने शुरू किए।

1996 के ऐतिहासिक एम.सी. मेहता फैसले ने तस्वीर बदल दी। कोयला और कोक इस्तेमाल करने वाली इकाइयों को गैस अपनानी थी। या फिर उन्हें टीटीजेड से बाहर जाना था।

ताज ट्रेपेजियम जोन करीब 10,400 वर्ग किलोमीटर में फैला है। इसमें आगरा, फिरोजाबाद, मथुरा, हाथरस और एटा शामिल हैं। राजस्थान का भरतपुर भी इसका हिस्सा है। यह इलाका पर्यावरण की दृष्टि से बेहद संवेदनशील घोषित हुआ।

करीब 292 प्रदूषणकारी इकाइयों पर कार्रवाई हुई। कई बंद हुईं, कई दूसरी जगह चली गईं।

2017 के एक सर्वे ने तस्वीर और साफ कर दी। 1996 तक चल रही करीब 1,168 इकाइयों में केवल 250 बचीं।

बाकी बंद हुईं या दूसरे राज्यों की ओर निकल गईं। कई उद्यमी राजस्थान और मध्य प्रदेश चले गए। निवेश गया, रोजगार गया और औद्योगिक आत्मविश्वास भी कमजोर हुआ।

यहां एक सवाल उठना स्वाभाविक है।

क्या ताज को बचाने के लिए उद्योगों को खत्म करना जरूरी था?

जवाब इतना सीधा नहीं है।

पर्यावरण की हिफाजत जरूरी थी और आज भी है। लेकिन उद्योगों के लिए वैकल्पिक रास्ते तैयार करना भी जरूरी था। यहीं नीति और अमल के बीच बड़ी खाई दिखाई देती है।

आगरा की उद्यमशीलता पर कभी शक नहीं रहा। यहां लोगों ने हमेशा कम साधनों से बड़ा काम किया।

कच्चा माल दूर-दराज के इलाकों से आता रहा। लोहा, कोयला, गैस, शीशे का कच्चा माल बाहर से आया।

चमड़ा दक्षिण भारत से आया और फिर जूते बने। गुजरात और राजस्थान से सिलिका सैंड और सोडा ऐश आया।

लौकी से पेठा बना और पूरी दुनिया तक पहुंचा।

यही आगरा की असली ताकत थी। यहां प्राकृतिक संसाधन कम थे, लेकिन हुनर भरपूर था। फाउंड्री, कांच, जूते और हस्तशिल्प ने पहचान बनाई।

कारीगरों ने मामूली चीजों में भी बड़ी कीमत पैदा की। व्यापारियों ने छोटे कारोबार को बड़े बाजार से जोड़ा।

लेकिन आज वही ऊर्जा ठहराव से जूझ रही है।

आगरा का फुटवियर उद्योग अब भी सबसे मजबूत आधार है। यह सीधे और परोक्ष रूप से लाखों लोगों को रोजगार देता है।अनुमान है कि चार से पांच लाख आजीविकाएं इससे जुड़ी हैं। देश की घरेलू फुटवियर मांग में आगरा की हिस्सेदारी बड़ी है।

निर्यात में भी शहर की पुरानी मजबूत मौजूदगी है।

लेकिन बढ़ती लागत और वैश्विक प्रतिस्पर्धा ने मुश्किलें बढ़ाई हैं।

फिरोजाबाद का कांच उद्योग भी अपनी पुरानी चमक खो चुका है।

तकनीक बदली, लेकिन आधुनिकीकरण की रफ्तार धीमी रही।

कभी कृषि उपकरण और पाइप बनाने वाली फाउंड्रियां भी सिकुड़ गईं।

पारंपरिक उद्योगों के सामने ईंधन और प्रदूषण की पाबंदियां हैं।

नई पीढ़ी को इनमें भविष्य कम दिखाई देता है।

इसका असर केवल कारखानों पर नहीं पड़ा।

रोजगार की तलाश में गांवों से पलायन बढ़ा।

कई युवा दिल्ली-एनसीआर की तरफ निकल गए।

जहां मजदूरी बेहतर मिली, वहीं उन्होंने डेरा डाल लिया।

आगरा में हुनर रहा, लेकिन अवसर कम होते गए।

यह किसी भी शहर के लिए बेहद अफसोसनाक स्थिति है।

सरकारों को भी पूरी तरह कठघरे में खड़ा करना उचित नहीं होगा।

मूल प्रतिबंध सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से आए थे।

वे आज की सरकारों से बहुत पहले के फैसले हैं।

बाद की सरकारों ने गैर-प्रदूषणकारी उद्योगों का वादा किया।

लेकिन योजनाओं का जमीन पर असर असमान रहा।

वर्तमान सरकार ने भी कई पहल की हैं।

फुटवियर और हस्तशिल्प को ओडीओपी में बढ़ावा मिला है।

कौशल प्रशिक्षण से बड़ी संख्या में कारीगर जुड़े हैं।

नई फुटवियर और लेदर नीति भी सामने आई है।

आगरा में इंटीग्रेटेड मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर की योजना बनी है। शास्त्रीपुरम में एसटीपीआई सुविधा भी पूरी हुई है।एक्सप्रेसवे और ग्रेटर आगरा की योजनाएं भी उम्मीद जगाती हैं। फिर भी असली अड़चनें खत्म नहीं हुई हैं।

अछनेरा का प्रस्तावित लेदर पार्क इसका बड़ा उदाहरण है। सालों से यह परियोजना कागजी और कानूनी पेच में फंसी है। जमीन अधिग्रहण और मुआवजे के बाद भी रास्ता साफ नहीं है।

गैस की आपूर्ति भी कई बार उद्योगों के लिए संकट बनी। प्रदूषण नियंत्रण की अपनी चुनौतियां भी बरकरार हैं।

सवाल यह नहीं कि ताज बचे या उद्योग।सवाल यह है कि दोनों साथ क्यों नहीं बच सकते?

दुनिया में स्वच्छ तकनीक के साथ उद्योग चलते हैं। आगरा को भी उसी दिशा में आगे बढ़ना होगा।

भविष्य प्रदूषणकारी भारी उद्योगों में नहीं है। लेकिन स्वच्छ विनिर्माण, आईटी, डिजाइन और सेवाओं में है।

ताज की हिफाजत हमारी जिम्मेदारी है।लेकिन ताज की छाया में पलती युवा पीढ़ी भी हमारी जिम्मेदारी है।

आगरा को केवल पर्यटन शहर बनाकर नहीं छोड़ा जा सकता। यह मेहनती लोगों और उद्यमियों का शहर भी है। उसकी औद्योगिक रूह को फिर से जगाना होगा। तीन दशक का अनुभव एक साफ सबक देता है।

सिर्फ बंद करना आसान है, विकल्प बनाना मुश्किल।

अब विकल्प बनाने का वक्त है।

साफ उद्योगों के लिए जमीन, गैस और बिजली चाहिए। अनुमतियों की प्रक्रिया सरल और पारदर्शी होनी चाहिए। अटकी परियोजनाओं पर तेज फैसला होना चाहिए।

ताज चमकता रहे और कारखाने भी जलें।यमुना साफ रहे और रोजगार भी बढ़े। यही आगरा के लिए सही तरक्की होगी।

वरना इतिहास गवाही देगा कि हमने ताज तो बचा लिया, लेकिन उसके आसपास की औद्योगिक दुनिया को मुरझाने दिया।

Saturday, September 5, 2026

 


हैप्पी टीचर्स डे कहना काफी नहीं!

मास्टरजी की छड़ी गई, बदतमीजी आई!

बेबाक होना अच्छी बात है, बेलगाम होना नहीं।

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जब शिक्षक की आवाज धीमी और बच्चे की आवाज ऊँची हो गई

बढ़ती अनुशासनहीनता पर गंभीर सवाल

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अनुशासनहीनता की समस्या सड़क पर शुरू नहीं होती।

वह स्कूल की पहली घंटी के साथ शुरू होती है।

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बृज खंडेलवाल द्वारा

5 सितंबर 2026

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कभी स्कूल में मास्टरजी की एक नजर पड़ती थी और पूरी कक्षा शांत हो जाती थी। आज कई शिक्षक कहते हैं, “बच्चो, प्लीज शोर मत करो।” और पीछे से आवाज आती है, “शीला मैम आप हमें ट्रॉमा, स्ट्रेस मत दो!” 

रिटायर्ड मास्साब शर्माजी बता रहे थे, "एक बार एक स्टूडेंट होम असाइनमेंट करके नहीं लाया, पूछने पर बोला: "तो क्या हुआ?" मैंने बात इग्नोर करने में भलाई समझी। लेकिन उसके बाद, हर टोकने के सवाल पर उत्तर मिलने लगा: तो क्या हुआ?  उस दिन अगर सख्त कदम लिया होता तो ये समस्या नहीं झेलनी पड़ती।"

वाह! शिक्षा ने सचमुच लंबी छलांग लगाई है। लेकिन यह मजाक जितना दिलचस्प है, हकीकत उतनी ही चिंताजनक है। पिछले दिनों, देश के अलग-अलग हिस्सों से सामने आए कई मामलों ने कक्षा में घटते अनुशासन और शिक्षकों के प्रति कम होते सम्मान पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

आंध्र प्रदेश में दसवीं के एक छात्र ने बहस के बाद शिक्षक को कक्षा में मुक्का मार दिया। केरल में फुटबॉल मैच के विवाद के बाद छात्रों के एक समूह ने शारीरिक शिक्षा के शिक्षकों पर हमला किया।

उत्तर प्रदेश में छेड़छाड़ के आरोप के बाद एक छात्रा और उसके परिवार ने कोचिंग शिक्षक की सार्वजनिक रूप से पिटाई की। राजस्थान में एक छात्र ने पहले हुई अनुशासनात्मक कार्रवाई से नाराज होकर शिक्षक पर सड़क पर हमला कर दिया।

कन्नूर, केरल में परीक्षा के दौरान दो छात्रों ने शिक्षक को पीट दिया। दिल्ली का 2016 का मामला तो और भी भयावह था। परीक्षा और अनुशासन से जुड़े विवाद के बाद दो छात्रों ने शिक्षक मुकेश कुमार पर चाकू से हमला किया और बाद में उनकी मौत हो गई।

हर मामले की परिस्थितियां अलग थीं। कुछ मामलों में शिक्षकों पर दुर्व्यवहार के आरोप भी लगे, जिनकी निष्पक्ष जांच जरूरी है। लेकिन शिकायत, गुस्सा या असहमति किसी को हिंसा का लाइसेंस नहीं दे सकती।

सवाल यह है कि आखिर हम यहां तक पहुंचे कैसे?


पुराने जमाने में शिक्षक के हाथ में छड़ी होती थी। आज शिक्षक के हाथ में नियमों की मोटी फाइल होती है।

छड़ी चलाना तो दूर, कई बार ऊंची आवाज में बोलना भी जोखिम भरा हो गया है। अभिभावक नाराज हो सकते हैं। प्रशासन सवाल पूछ सकता है। सोशल मीडिया तो पहले से तैयार बैठा है।

“देखिए, शिक्षक ने बच्चे को डांट दिया!”

नतीजा यह है कि कुछ जगह शिक्षक अनुशासन लागू करने से पहले दस बार सोचते हैं। दूसरी तरफ कुछ बच्चे यह समझने लगते हैं कि उन्हें कोई रोक नहीं सकता।

लेकिन यहां एक जरूरी फर्क समझना होगा। शारीरिक दंड शिक्षा का आदर्श तरीका नहीं है। बच्चे को पीटना, अपमानित करना या डराना शिक्षा नहीं, ज्यादती है।

लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि शिक्षक के हाथ पूरी तरह बांध दिए जाएं। कक्षा में नियम होंगे तो नियम तोड़ने पर उचित परिणाम भी होना चाहिए।

“अनुशासन स्वतंत्रता का दुश्मन नहीं, उसकी बुनियाद है।”

समय पर नहीं आए? जवाब देना होगा।

कक्षा में बदतमीजी की? कार्रवाई होगी।

दूसरों को पढ़ने नहीं दिया? अभिभावकों को बुलाया जाएगा।

बार-बार नियम तोड़े? निर्धारित अनुशासनात्मक कदम उठेंगे।

यह सब शिक्षक की निजी सनक से नहीं, बल्कि स्पष्ट और पारदर्शी नियमों के तहत होना चाहिए। वरना नियम दीवार पर टंगे खूबसूरत पोस्टर बनकर रह जाएंगे।


एक और सच्चाई को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जो बच्चे पढ़ना चाहते हैं, उनका भी अधिकार है। कुछ शरारती बच्चों की अराजकता पूरी कक्षा को बंधक नहीं बना सकती।

शिक्षा का अधिकार केवल स्कूल आने का अधिकार नहीं है। उसमें शांत वातावरण में सीखने का अधिकार भी शामिल है।

हम बच्चों से कहते हैं, “अपनी बात खुलकर कहो।”

बहुत अच्छी बात है।

लेकिन साथ में यह भी सिखाना होगा, “दूसरे की बात सुनो।”

हम कहते हैं, “अपने अधिकार पहचानो।”

उन्हें यह भी बताना होगा, “अपने कर्तव्य मत भूलो।”

हम कहते हैं, “सवाल पूछो।”

उन्हें यह भी समझाना होगा कि सवाल और बदतमीजी में फर्क होता है।

यही फर्क आज कई जगह धुंधला पड़ रहा है।

आधुनिकता का मतलब बेलगाम होना नहीं


आत्मविश्वास अच्छी चीज है, अहंकार नहीं। सवाल करना बुद्धिमानी है, हर नियम को ठुकराना नहीं।

जो बच्चा स्कूल में लाइन तोड़ना सामान्य समझता है, वह आगे चलकर ट्रैफिक नियम भी तोड़ सकता है। जो शिक्षक का अपमान करना अपना अधिकार समझता है, वह कल संस्थाओं का सम्मान भी भूल सकता है।

छोटी आदतें ही आगे चलकर बड़े नागरिक चरित्र का निर्माण करती हैं।

मास्टरजी दोस्त नहीं, मार्गदर्शक भी हैं

आज शिक्षा में शिक्षक को बच्चों का “दोस्त” बनाने पर बहुत जोर दिया जाता है। दोस्ताना माहौल अच्छा है, लेकिन शिक्षक की भूमिका केवल दोस्त की नहीं है।

शिक्षक मार्गदर्शक है। वह सिर्फ किताब नहीं पढ़ाता, व्यवहार भी सिखाता है।

स्कूल परीक्षा पास करने की फैक्ट्री नहीं है। वह नागरिक बनाने की वर्कशॉप भी है।

बच्चों में आत्मसंयम, समय की पाबंदी, जिम्मेदारी और दूसरों के प्रति सम्मान पैदा करना भी शिक्षा का हिस्सा है।

माता-पिता की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। घर में हर मांग पूरी करके स्कूल से अनुशासन की उम्मीद करना बेमानी है।

जिस बच्चे को घर में कभी “नहीं” सुनने की आदत नहीं, वह स्कूल में नियम क्यों मानेगा?

फिर आता है मोबाइल और सोशल मीडिया का सवाल।

आज बच्चे ऐसी दुनिया में पल रहे हैं जहां हर मिनट मनोरंजन उपलब्ध है। कुछ सेकंड में वीडियो बदल जाता है। एक क्लिक में नया कंटेंट सामने आ जाता है।

ऐसे माहौल में धैर्य, एकाग्रता और इंतजार जैसे पुराने गुण कमजोर पड़ रहे हैं।

स्कूल को ऐसे समय में और मजबूत अनुशासन चाहिए, कम नहीं।

क्योंकि किताब पढ़ने के लिए धैर्य चाहिए। शिक्षक को सुनने के लिए एकाग्रता चाहिए। परीक्षा के लिए आत्मसंयम चाहिए। और जीवन में सफल होने के लिए इन तीनों की जरूरत पड़ती है।


पुराने मास्टरजी की छड़ी शायद वापस न आए। लेकिन उसकी आत्मा जरूर लौटनी चाहिए।

मर्यादा।

जवाबदेही।

समय की पाबंदी।

नियमों का सम्मान।

और अपने कर्म के परिणाम का बोध।

मास्टरजी को तानाशाह मत बनाइए।

लेकिन उन्हें इतना कमजोर भी मत बनाइए कि बच्चे ही कक्षा के हाकिम बन जाएं।

कक्षा लोकतंत्र की चुनावी रैली नहीं है। वहां शिक्षक नेतृत्व करता है और विद्यार्थी सीखते हैं।

डर से शिक्षा नहीं होती। लेकिन हर कर्म का परिणाम होता है, यह समझाना भी शिक्षा का ही हिस्सा है।

शिक्षक का रौब नहीं, उसकी गरिमा लौटाइए। उसकी आवाज में फिर से वह विश्वास लाइए कि वह बिना डर के अनुशासन कायम कर सकता है।

वरना कल का नागरिक स्कूल से यही सीखकर निकलेगा:

“नियम दूसरों के लिए होते हैं, मेरे लिए नहीं।”

और फिर हम हैरान होंगे कि ट्रैफिक क्यों नहीं सुधरता। कतारें क्यों नहीं बनतीं। सार्वजनिक संपत्ति की कद्र क्यों नहीं होती।

इसलिए इस शिक्षक दिवस पर सिर्फ “हैप्पी टीचर्स डे” कहना काफी नहीं है।

मास्टरजी को सम्मान दीजिए।

बच्चों को अधिकार दीजिए।

लेकिन अनुशासन को भी उसका अधिकार दीजिए।

क्योंकि अच्छे स्कूल केवल अच्छे विद्यार्थी नहीं बनाते।

वे अच्छे नागरिक बनाते हैं।


Thursday, September 3, 2026

 क्या आगरा का ट्रैफिक कभी सुधरेगा?

उपेक्षा, अव्यवस्था और अधूरे मेट्रो निर्माण ने शहर को जाम का अखाड़ा बना दिया है

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बृज खंडेलवाल द्वारा

5 सितंबर 2026

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आगरा की सड़कें अब सफर का रास्ता कम और रोज का रणक्षेत्र ज्यादा लगती हैं। 

कहीं ऑटो चालक नियमों को ठेंगा दिखाते हैं, कहीं गलत दिशा में दौड़ते वाहन जान जोखिम में डालते हैं और कहीं मेट्रो निर्माण ने पहले से परेशान यातायात की कमर तोड़ रखी है। 

शहर में सुरक्षित आवागमन जैसे प्रशासन की प्राथमिकताओं की सूची से ही बाहर हो गया है।

एमजी रोड, शहर की प्रमुख जीवनरेखा, पर बेतरतीब ऑटो संचालन और यातायात नियमों की धज्जियां उड़ने के कारण पाबंदियां लगाई गईं। लेकिन समस्या खत्म नहीं हुई। वह बस दूसरी सड़कों पर स्थानांतरित हो गई। 

अब ऑटो मुख्य मार्गों के अलावा लिंक रोड और हाईवे तक को घेरते दिखाई देते हैं। लो-फ्लोर बसें चलाने से सार्वजनिक परिवहन की समस्या का दिखावटी समाधान जरूर हुआ, लेकिन यातायात की बुनियादी बीमारी जस की तस है।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि सड़क पर नियम तोड़ने वाला दिखाई देता है, लेकिन व्यवस्था की विफलता दिखाई नहीं देती। पुलिस और नगर नियोजन तंत्र दोनों इस अव्यवस्था के लिए जवाबदेह हैं।


आंकड़े इस अराजकता की भयावह तस्वीर पेंट कर रहे हैं। वर्ष 2024 में आगरा जिले में 1,223 सड़क दुर्घटनाएं दर्ज हुईं और 586 लोगों की जान गई। यानी औसतन हर दिन लगभग चार दुर्घटनाएं और एक से अधिक मौत।

गलत दिशा में वाहन चलाना, लाल बत्ती पार करना, तेज रफ्तार, मोबाइल पर बात करना और दोपहिया वाहनों पर तीन सवारियां बैठाना आम बात है। पुलिस चालान काटती है, लेकिन उसका असर कितना है, यह सड़कें रोज बता देती हैं। कार्रवाई अक्सर छिटपुट होती है। ब्लैक स्पॉट पर लगातार निगरानी, लाइसेंस निलंबन और वाहन जब्ती जैसे कठोर कदम विरले ही दिखाई देते हैं।

आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे का अनुभव भी आंखें खोलने वाला है। 2021 से 2025 के मध्य तक 7,000 से अधिक दुर्घटनाओं में आधे से ज्यादा मामलों में चालक की थकान एक प्रमुख कारण रही। सवाल उठता है कि सड़क सुरक्षा को लेकर निगरानी और जागरूकता व्यवस्था आखिर कितनी गंभीर है?


आगरा में मेट्रो निर्माण यातायात सुधार की उम्मीद लेकर आया था। लेकिन निर्माण की धीमी गति, लंबे समय तक खुले पड़े कार्यक्षेत्र, संकरे डायवर्जन और जगह-जगह टूटे मार्गों ने स्थानीय यातायात को बेहाल कर दिया है। शुरू में ही समझदार लोगों ने अंडरग्राउंड मेट्रो रेल नेटवर्क की डिमांड की थी, मगर लागत  कम करने के चक्कर में सारे शहर की यातायात व्यवस्था भंग कर दी।

अब, जहां पांच मिनट में पहुंच जाना चाहिए, वहां 20-25 मिनट लगना अब सामान्य बात है। कई जगह सड़क का एक बड़ा हिस्सा बैरिकेडिंग में घिरा है और बची हुई सड़क पर ऑटो, ई-रिक्शा, दोपहिया, कार और बसें एक-दूसरे को रास्ता देने से कतराते  हैं।

मेट्रो जैसी बड़ी परियोजना के लिए कुछ समय की परेशानी समझी जा सकती है। लेकिन तैयारी और निर्माण की समयसीमा के बीच तालमेल न हो तो असुविधा यातना बन जाती है। निर्माण स्थल की सफाई, बैरिकेडिंग, डायवर्जन की स्पष्ट सूचना और वैकल्पिक मार्गों का बेहतर प्रबंधन जरूरी है। शहर को यह जानने का अधिकार है कि कौन सा काम कब पूरा होगा और देरी क्यों हो रही है।


आगरा की आबादी लगभग 30 लाख तक पहुंच चुकी है। इसके अलावा हर वर्ष करोड़ों पर्यटक ताजमहल और अन्य ऐतिहासिक स्थलों को देखने आते हैं। दशकों पहले की आबादी और यातायात को ध्यान में रखकर बनी सड़कें अब इस बोझ के सामने छोटी पड़ रही हैं।

पीक आवर में कई प्रमुख मार्गों पर वाहन गति लगभग 15 किलोमीटर प्रति घंटा तक गिर जाती है। जाम केवल समय नहीं खाता, ईंधन और उत्पादकता भी निगलता है। एक अनुमान के अनुसार यातायात जाम, अतिरिक्त ईंधन और समय की बर्बादी से शहर को हर साल लगभग 500 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान होता है।

पर्यटक भी इस अनुभव को लेकर अच्छी यादें लेकर नहीं लौटते। ताज देखने आए व्यक्ति को अगर आधा दिन सड़क पर फंसे रहना पड़े, तो विश्व धरोहर शहर की छवि पर भी सवाल उठता है।


जाम के साथ जहरीली हवा का बोनस

यातायात की समस्या केवल समय और धैर्य नहीं निगलती। यह हवा को भी जहरीला बनाती है।

वाहनों से निकलने वाला प्रदूषण शहर के PM2.5 में महत्वपूर्ण योगदान देता है। सड़क की धूल इसका बड़ा हिस्सा हो सकती है, लेकिन यातायात ऐसा स्रोत है जिस पर प्रशासन तत्काल नियंत्रण कर सकता है।

सर्दियों में प्रदूषण का स्तर खतरनाक सीमा तक पहुंच जाता है। चौराहों पर घंटों खड़े वाहन धुआं छोड़ते रहते हैं और पैदल चलने वाले उसी हवा में सांस लेते हैं। बच्चे और बुजुर्ग इसकी सबसे बड़ी कीमत चुकाते हैं।

ताजमहल की सुरक्षा के लिए ताज ट्रेपेजियम जोन बनाया गया था। लेकिन अगर ताज के आसपास का यातायात ही प्रदूषण का बड़ा स्रोत बना रहे, तो केवल कागजी संरक्षण से विरासत नहीं बच सकती।

इलाज मुश्किल नहीं, इच्छाशक्ति चाहिए

आगरा को किसी चमत्कारी यातायात योजना की जरूरत नहीं है। जरूरत है नियमों के लगातार और निष्पक्ष पालन की।

तेज रफ्तार, गलत दिशा, लाल बत्ती तोड़ने और खतरनाक ड्राइविंग पर नियमित कार्रवाई हो। लाइसेंस निलंबन और वाहन जब्ती जैसे कदम वास्तव में लागू हों। सड़कों पर फुटपाथ, स्पष्ट जेब्रा क्रॉसिंग, बेहतर संकेतक और सुरक्षित पैदल मार्ग बनाए जाएं।

सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना होगा। कुछ लो-फ्लोर बसें समस्या का समाधान नहीं हैं। उच्च आवृत्ति वाली विश्वसनीय बस सेवा, व्यवस्थित ऑटो और ई-रिक्शा स्टैंड तथा बेहतर पार्किंग व्यवस्था निजी वाहनों का दबाव कम कर सकती है।


हर सार्वजनिक निर्माण में भी समयसीमा और जवाबदेही तय होनी चाहिए। हर निर्माण स्थल पर स्पष्ट डायवर्जन, पर्याप्त रोशनी, पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित रास्ता और नियमित यातायात प्रबंधन अनिवार्य होना चाहिए।

कैमरा आधारित निगरानी, स्मार्ट सिग्नल, रियल-टाइम ट्रैफिक मॉनिटरिंग और तेज आपातकालीन प्रतिक्रिया व्यवस्था अब विलासिता नहीं, आवश्यकता है।

भारी वाणिज्यिक यातायात को शहर के भीतरी हिस्सों से बाहर रखने के लिए उपलब्ध बाईपास और एक्सप्रेसवे का अधिक प्रभावी इस्तेमाल किया जा सकता है।

आगरा का ट्रैफिक संकट किसी दैवी आपदा का परिणाम नहीं है। यह वर्षों की प्रशासनिक उदासीनता, कमजोर प्रवर्तन, खराब नियोजन और अधूरे समन्वय का नतीजा है।

शहर को जाम से निकालना असंभव नहीं है। सड़कें पर्याप्त हो सकती हैं, यदि व्यवस्था पर्याप्त हो।

सवाल केवल यह है कि जिम्मेदार अधिकारी कब समझेंगे कि ट्रैफिक जाम सिर्फ गाड़ियों को नहीं रोकता। यह शहर की अर्थव्यवस्था, पर्यावरण, पर्यटन और नागरिकों की जिंदगी रोक देता है।

आगरा को ताज का शहर बने रहना है या जाम का। फैसला अब सड़कों पर नहीं, प्रशासनिक इच्छाशक्ति में होगा।