Tuesday, March 24, 2026

 एडवोकेट आकाश वशिष्ठ की जनहित याचिका ने उठाए गंभीर सवाल 

आगरा के भूले-बिसरे स्मारक दम तोड़ रहे हैं। जवाबदेह कौन?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

24 मार्च 2026

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जब इतिहास चुपचाप मरता है; ईंट दर ईंट, मेहराब दर मेहराब, और उसके रखवाले आँखें मूँद लेते हैं, तो क्या होता है? 

दुनिया ताजमहल की शाश्वत चमक से मोहित जरूर होती है। लेकिन थोड़ा हटकर देखिए, थोड़ा अंदर जाइए। चमक छूट जाती है, क्रूर सच सामने आता है।  

यहाँ इतिहास नहीं चमकता, यह बिखरता है। टूटे गुंबद, झाड़ियों में दबे आंगन, धुंधली पड़ती भित्तिचित्र आखिरी साँसें गिन रहे हैं। यह आगरा का दूसरा चेहरा है, अनदेखा, अनकहा, अनसुना।

इस हफ्ते इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने आखिरकार सख्त रुख अपनाया। उत्तर प्रदेश के आगरा, झांसी, वृंदावन, लखनऊ, हस्तिनापुर समेत कई शहरों में बिखरती विरासत पर स्वतः संज्ञान लिया और केंद्र व राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर आठ हफ्तों में जवाब माँगा।  

जो लोग इन गलियों से रोज गुजरते हैं, उनके लिए यह खबर नहीं, हकीकत है।  

आगरा किले और फतेहपुर सीकरी की भव्यता के पार एक खामोश कब्रिस्तान फैला है, स्मारकों का। सैकड़ों स्मारक भूले हुए, बेसहारा। न सुरक्षा, न सूचना पट्ट, न कोई संरक्षण योजना।  

विरासत संरक्षक डॉ. मुकुल पांड्या कहते हैं, “दारा शिकोह की खोई लाइब्रेरी हो या फतेहपुर सीकरी की मिटती शैल चित्रकला, बेगम समरू का बगीचा, सुल्तान परवेज का मकबरा, ताल फिरोज खान, चीनी का रौजा, हम्माम अलीवर्दी खान (छिप्पीतौला), जसवंत सिंह की छतरी, चौबुर्जी, बादशाही बाग (समुगरह), फतेहाबाद, यह महज उपेक्षा नहीं, यह इतिहास का दाह संस्कार है।”

एडवोकेट आकाश वशिष्ठ की जनहित याचिका ने तस्वीर और साफ कर दी। उत्तर प्रदेश में 5400 से अधिक धरोहरें दर्ज हैं, लेकिन सुरक्षित सिर्फ 421. बाकी? भगवान भरोसे। अतिक्रमण बढ़ रहे हैं, बुलडोजर मंडरा रहे हैं, समय चुपचाप अपना काम कर रहा है।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) का आगरा सर्किल 265 संरक्षित स्मारकों की देखभाल करता है। आंकड़ा सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन हकीकत यह कि एक भी स्मारक पर पूरी तरह हेरिटेज बायलॉज लागू नहीं हैं। पंद्रह साल बीत गए, फाइलें घूमती रहीं, स्मारक गिरते रहे।  

सबसे चौंकाने वाली बात; सितंबर 2023 से अप्रैल 2025 तक एक भी नया अतिक्रमण दर्ज नहीं किया गया। क्या सचमुच कोई उल्लंघन नहीं हो रहा, या देखने वाला कोई नहीं? जमीन पर तस्वीर साफ है; अवैध निर्माण धड़ल्ले से हो रहे हैं, संरक्षित क्षेत्र सिकुड़ रहे हैं, प्रशासन सोया हुआ है। यह लापरवाही नहीं, जिम्मेदारी से पलायन है।

कानून कहता है; संरक्षण करो। व्यवस्था कहती है; टालो, भूलो, छोड़ दो।  

उधर प्रकृति भी हमला बोल रही है। यमुना का प्रदूषण नींव खा रहा है, भूजल दीवारों को खोखला कर रहा है, बाढ़ इतिहास को चाट रही है। लेकिन सबसे बड़ा नुकसान अदृश्य है।  

वृंदावन के प्राचीन मंदिर, पुरानी आगरा की हवेलियाँ, यमुना किनारे के घाट, सौ साल पुरानी कारवांसरायें, जिनमें कभी रेशम मार्ग के व्यापारी ठहरते थे, सभी सूची से बाहर हैं। वृंदावन में अकेले 48 प्राचीन घाट और कुंड संरक्षण की पुकार कर रहे हैं, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं। यमुना किनारे की पूरी विरासत अतिक्रमण में दब गई, समय में खो गई, नजर और नीति से बाहर हो गई।

अब अदालत ने संस्कृति मंत्रालय, राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण और राज्य सरकार से जवाब माँगा है। माँगें स्पष्ट हैं: पूरी धरोहर की सूची बनाओ, हर स्मारक के लिए बायलॉज तैयार करो, सख्ती से अमल करो, अलग स्टाफ नियुक्त करो और हेरिटेज बोर्ड गठित करो।  

ये कदम सुनने में साधारण लगते हैं, लेकिन वास्तव में बेहद जरूरी हैं। क्योंकि यह सिर्फ पत्थरों की बात नहीं; यह पहचान की, स्मृति की और शहर की आत्मा की बात है।

आगरा हर साल 80 लाख से अधिक पर्यटकों को आकर्षित करता है, लेकिन ज्यादातर सिर्फ ताजमहल तक सीमित रहते हैं। कोई शहर एक पोस्टकार्ड पर नहीं जी सकता। राजस्थान देखिए, यूरोप देखिए, विरासत वहाँ रोजगार बनती है, पहचान बनती है, अर्थव्यवस्था बनती है। हम उसे सड़ने दे रहे हैं।  

हर गिरता गुंबद एक कहानी मिटाता है। हर अतिक्रमित आंगन एक याद चुरा लेता है। आगरा सिर्फ ताजमहल नहीं है। यह वह गुमनाम मकबरा भी है, टूटा दरवाजा भी है, उजड़ा बाग भी है। इन्हें खो दिया तो शहर की रूह खो जाएगी।

अदालत ने चेतावनी दे दी है। घंटी बज चुकी है। अब सवाल है: क्या कोई जागेगा?  

क्योंकि अब इतिहास सदियों में नहीं मर रहा। वह मौसमों में खत्म हो रहा है, हमारे सामने, हमारे देखते-देखते।

 ज़िंदगी की साँसों पर टिकी नदियाँ: सुप्रीम कोर्ट का सख्त पैग़ाम, बिखरी बेपरवाही खत्म करो

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

25 मार्च 2026

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क्या हमारी नदियाँ अब सिर्फ नक्शों में बचेंगी? या फिर हम उन्हें सच में “राष्ट्रीय संपत्ति” मानकर बचाने की जद्दोजहद करेंगे?

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि भारत की नदियाँ “राष्ट्रीय संपत्ति” हैं। यह कोई मामूली बयान नहीं था। यह एक जोरदार चेतावनी थी। एक अलार्म। मगर अफसोस, यह अलार्म भी हमारी सियासी और प्रशासनिक बेपरवाही की दीवारों से टकराकर खामोश हो गया।

सच तो यह है कि जो बात अदालत ने कही, वह हर आम आदमी पहले से जानता है: हमारी नदियाँ अब जीवनदायिनी नहीं, गंदे नालों में तब्दील हो चुकी हैं।

हिमालय की गोद से निकलने वाली पवित्र धाराएँ हों या दक्षिण के मैदानों में बहती नदियाँ, हर जगह एक ही कहानी है। जहरीले औद्योगिक कचरे का हमला। शहरों की सीवेज का सैलाब। और ऊपर से हुकूमतों की नाकामी।

सुप्रीम कोर्ट ने खास तौर पर यमुना नदी पर फोकस किया। दिल्ली, नोएडा और गाज़ियाबाद से निकलने वाला बिना ट्रीट हुआ कचरा सीधे यमुना में गिर रहा है। यह एक तरह का “गंदगी का फेडरलिज़्म” है, जहाँ हर राज्य और हर एजेंसी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ती है, और नदी धीरे-धीरे मरती जाती है।


आज की यमुना नदी नहीं, एक जिंदा इल्ज़ाम है, हमारी शहरी प्लानिंग पर, हमारी नीयत पर, हमारी नाकामी पर।

दिल्ली में यमुना के पानी में फीकल कोलीफॉर्म का स्तर 92,000 तक पहुँच चुका है, जो तय सीमा से करीब 40 गुना ज्यादा है। यह साफ इशारा है कि नदी में कच्चा सीवेज बेहिसाब बहाया जा रहा है।

बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड यानी BOD 70 mg/L तक पहुँच गई है, जबकि 3 mg/L से ऊपर जलीय जीवन खत्म होने लगता है। यानी यमुना अब एक बहती हुई कब्रगाह बन चुकी है, जहाँ पानी है, मगर जिंदगी नहीं।

ब्रज क्षेत्र, मथुरा और वृंदावन, जहाँ कभी कृष्ण की श्यामल सखी बहती थी, अब काले, गाढ़े कीचड़ में बदल चुकी है। हवा में मीथेन की सड़ी बदबू है। श्रद्धा भी जैसे शर्मिंदा हो गई हो।

आगरा में ताजमहल खड़ा है, खामोश, मगर सब कुछ देखता हुआ। कभी यमुना उसकी खूबसूरती को दोगुना करती थी। आज वही नदी उसकी बदहाली का आईना बन गई है।

हजारों करोड़ रुपये यमुना एक्शन प्लान पर खर्च हुए। मगर नतीजा? सिफर। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट या तो अधूरे हैं, या पुराने और बेअसर। सिर्फ दिल्ली से रोज़ करीब 28 मिलियन गैलन गंदा पानी बिना साफ हुए यमुना में बहा दिया जाता है।

यमुना की बदहाली दरअसल पूरे देश का आईना है।

गंगा, जिसे मां कहा जाता है, आज भी झाग और गंदगी से जूझ रही है। “नमामि गंगे” जैसे बड़े-बड़े प्रोजेक्ट भी ज़मीन पर बिखरे हुए नजर आते हैं। वाराणसी के घाटों पर झाग तैरता है, और यह झाग सिर्फ पानी में नहीं, हमारी नीतियों में भी है।

दक्षिण भारत में गोदावरी और कृष्णा नदियाँ औद्योगिक कचरे से जूझ रही हैं। कई जगह “डेड ज़ोन” बन चुके हैं, जहाँ पानी है, मगर जीवन नहीं।

कावेरी नदी, जो कभी सभ्यताओं की जननी थी, आज बेंगलुरु के सीवेज का बोझ ढो रही है।

मसला साफ है, जिम्मेदारी बंटी हुई है, मगर समस्या साझा है।

प्रदूषण सरहदें नहीं देखता। गाज़ियाबाद की गंदगी आगरा के खेतों तक पहुँचती है। हरियाणा का औद्योगिक कचरा दिल्ली के भूजल को जहरीला करता है।

फिर भी हमारी सरकारें अपने-अपने दायरे में सिमटी रहती हैं, जैसे नदी नहीं, कोई सियासी इलाका हो।

सुप्रीम कोर्ट का सख्त पैग़ाम

सुप्रीम कोर्ट ने इस बिखरी हुई व्यवस्था पर सीधा वार किया है। अदालत ने कहा कि जब बहुत सारी एजेंसियाँ होती हैं, तो जवाबदेही खो जाती है।

कोर्ट ने CPCB को निर्देश दिया है कि हर जिम्मेदार संस्था की पहचान करे। हरियाणा सरकार से भी रिपोर्ट मांगी गई है। मकसद साफ है, अब कोई बच नहीं पाएगा।

संदेश बिल्कुल साफ है:

नदियाँ साझा धरोहर हैं। अगर एक राज्य अपनी गंदगी नहीं रोकता, तो वह दूसरे राज्य के खिलाफ पर्यावरणी जुल्म करता है।

अब “तू-तू, मैं-मैं” का वक्त खत्म होना चाहिए। आगे रास्ता क्या है?

अगर नदियों को सच में बचाना है, तो इरादे मजबूत करने होंगे।

सबसे पहले, 2030 तक यह सुनिश्चित करना होगा कि एक बूंद भी बिना ट्रीट हुआ कचरा नदी में न जाए। इसके लिए आधुनिक और पारदर्शी सिस्टम चाहिए, जहाँ हर डिस्चार्ज पर नजर हो।

एक मजबूत नेशनल रिवर अथॉरिटी बनानी होगी, जिसके पास सख्त कानूनी ताकत हो। जो अफसर काम न करें, उन पर भारी जुर्माना लगे, चाहे वह कमिश्नर हों या मुख्यमंत्री।

नदियों के किनारों को अतिक्रमण से बचाना होगा। नदी को सांस लेने के लिए उसका फ्लडप्लेन चाहिए। मगर आज वहां या तो झुग्गियाँ हैं या आलीशान इमारतें। यह सिलसिला रोकना होगा।

सालों से जमी गाद को हटाने के लिए बड़े स्तर पर ड्रेजिंग अभियान चलाना होगा, ताकि नदी का प्राकृतिक बहाव वापस आ सके।

आखिरी सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने रास्ता दिखा दिया है। अब गेंद सरकारों के पाले में है।

“राष्ट्रीय संपत्ति” का दर्जा सिर्फ एक कागज़ी एलान नहीं होना चाहिए। यह एक वादा होना चाहिए, भविष्य से, आने वाली पीढ़ियों से।

अगर हम अब भी नहीं चेते, तो हम सिर्फ अपनी विरासत नहीं खोएंगे, हम अपनी जिंदगी की बुनियाद खो देंगे।

यमुना की खामोश चीख सिर्फ एक नदी की नहीं, पूरे देश की आवाज़ है।

अब वक्त आ गया है, बहानों को दफन करने का, और नदियों को ज़िंदा करने का।


Monday, March 23, 2026

 आज मौसम बड़ा बेईमान है!

जब कुदरत बदल ले मिज़ाज, तो कैसे पढ़ें आसमान की ज़ुबान?

बदलते दौर में मौसम पूर्वानुमान की बढ़ती अहमियत

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बृज खंडेलवाल द्वारा

23 मार्च 2026

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अब मौसम भरोसे के क़ाबिल नहीं रहा। सचमुच आसमान ने अपनी ज़ुबान बदल ली है।

आज विश्व मौसम दिवस है। बात सीधी है, मगर असर गहरा। मौसम अब वैसा नहीं रहा, जैसा हमने बचपन में जाना था। कभी हल्की-फुल्की बारिश होती थी, अब वही आफ़त बनकर टूट पड़ती है। कभी गर्मी बस तपिश देती थी, आज वही जानलेवा लू बन जाती है।

हाल के दिनों को ही देख लीजिए। अचानक बदले मौसम ने खेतों में खड़ी फसलों को चौपट कर दिया। पहाड़ों में बेमौसम बर्फबारी जारी है। होली के तुरंत बाद तापमान ने ऐसी छलांग लगाई कि लोगों की सांसें अटक गईं। मौसम अब सिर्फ़ बदलता नहीं, चौंकाता है, डराता है, और कई बार तबाही का मंजर भी दिखा देता है।

कभी हमारा रिश्ता मौसम से सीधा था। पुरखों ने आसमान पढ़ना सीखा था। घाघ और भड्डरी जैसे लोक-ज्ञानी, बिना किसी मशीन के, सिर्फ़ प्रकृति के संकेतों से मौसम का हाल बता देते थे। उनकी कहावतें आज भी गांवों में गूंजती हैं: 

“शुक्रवार की बादरी, रही सनीचर छाय… बिन बरसे ना जाए।”

“दिन में गर्मी, रात में ओस… कहें घाघ, बरखा सौ कोस।”

ये सिर्फ़ शब्द नहीं थे, सदियों का अनुभव था। हवा का रुख, बादलों की चाल, पक्षियों का व्यवहार, सब कुछ संकेत देता था। किसान इन्हीं इशारों पर भरोसा करके बीज बोता था, मवेशी खरीदता-बेचता था, और अपनी रोज़ी-रोटी का फैसला करता था।

फिर आया विज्ञान का दौर। मौसम विभाग बना। सैटेलाइट आसमान पर नजर रखने लगे। रडार ने बादलों की चाल पकड़ ली। ज़मीनी स्टेशन डेटा जुटाने लगे। और फिर आने लगा पूर्वानुमान; कल बारिश होगी या धूप निकलेगी।

इस एक जानकारी पर कितनी ज़िंदगियां टिकी होती हैं! किसान की फसल, पायलट की उड़ान, मछुआरे की नाव, सरकार की तैयारी, सब कुछ मौसम की एक सही भविष्यवाणी पर निर्भर करता है। एक सटीक पूर्वानुमान कई जिंदगियां बचा सकता है।

लेकिन अब कहानी बदल चुकी है।

जलवायु परिवर्तन ने मौसम की पूरी किताब ही उलट दी है। बारिश का कोई ठिकाना नहीं। सूखा लंबा खिंचता है। तूफान पहले से ज्यादा ताक़तवर हो गए हैं। भारत में ही देख लीजिए, पहाड़ों में अचानक बाढ़, मैदानों में झुलसाती गर्मी, शहरों में जलभराव का कहर।

पुराना डेटा अब हर बार काम नहीं आता। मौसम अब सीधी लकीर नहीं, उलझी हुई पहेली बन गया है। ऐसे में मौसम वैज्ञानिकों की जिम्मेदारी कई गुना बढ़ गई है। उनका काम अब सिर्फ़ “कल का मौसम” बताना नहीं रह गया है।

अब वे आने वाले हफ्तों, महीनों का अनुमान लगाते हैं। किसान को सलाह दी जाती है: कब बोना है, कब काटना है। जल प्रबंधन की रणनीतियां बनती हैं। आपदा प्रबंधन टीमें पहले से अलर्ट हो जाती हैं। यानी अब मौसम पूर्वानुमान सिर्फ़ सूचना नहीं, तैयारी का आधार बन चुका है।

तकनीक ने इस काम को और तेज़ और सटीक बनाया है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग ने पूर्वानुमान को नई आंखें दी हैं। अब चेतावनी सिर्फ़ इतनी नहीं होती कि “भारी बारिश होगी”, बल्कि यह भी बताया जाता है कि “इस इलाके में बाढ़ का खतरा है।” हीटवेव की स्थिति में बुज़ुर्गों और बच्चों के लिए खास सलाह जारी की जाती है।

यह सिर्फ़ विज्ञान नहीं, ज़िंदगी बचाने का काम है।

इन सबके पीछे होते हैं मौसम वैज्ञानिक; खामोशी से काम करते हुए, दिन-रात आंकड़ों में डूबे हुए। उनकी मेहनत दिखती नहीं, लेकिन उसका असर हर जगह महसूस होता है। अब तो छोटे-छोटे इलाकों के लिए भी सटीक भविष्यवाणी संभव हो रही है।

दिलचस्प बात यह है कि अब आम लोग भी इस प्रक्रिया का हिस्सा बन रहे हैं। मोबाइल से भेजी गई स्थानीय जानकारी भी सिस्टम का हिस्सा बनती है। मौसम की दुनिया अब ज्यादा जुड़ी हुई, ज्यादा साझा हो गई है।

लेकिन एक सच्चाई और है; मौसम किसी सरहद को नहीं मानता। एक देश में उठा तूफान दूसरे देश में तबाही ला सकता है। इसलिए वैश्विक सहयोग जरूरी है। देशों के बीच डेटा साझा करना, तकनीक बांटना, और कमजोर देशों की मदद करना आज की जरूरत बन चुका है।

फिर भी, एक सवाल हमसे भी है।

क्या हम इन चेतावनियों को गंभीरता से लेते हैं? हम क्रिकेट का स्कोर हर मिनट देखते हैं, लेकिन मौसम की चेतावनी को अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। यही लापरवाही कई बार भारी पड़ती है।

आज का पैग़ाम साफ़ है।

मौसम अब सिर्फ़ खबर नहीं रहा। यह हमारी ज़िंदगी और मौत के बीच खिंची एक नाज़ुक लकीर बन चुका है। इसे समझना, इसे सुनना, और इस पर अमल करना; अब हमारी मजबूरी नहीं, हमारी ज़िम्मेदारी है।

Sunday, March 22, 2026

 डॉ लोहिया जयंती पर

कांग्रेस-मुक्त भारत का पहला खाका: लोहिया की बेचैन विरासत

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

23 मार्च 2026

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कांग्रेस-मुक्त भारत, यह नारा किसका है?

आज के राजनीतिक गलियारों में गूंजता है। पर इसकी पहली आहट बहुत पहले सुनाई दी थी।

एक बाग़ी दिमाग में। एक बेचैन आत्मा में। डॉ. राम मनोहर लोहिया के भीतर।

23 मार्च। जयंती। सिर्फ फूल चढ़ाने का दिन नहीं। थोड़ी असहज सच्चाइयों से टकराने का दिन भी।

लोहिया, कद काठी छोटी, मगर असर विराट।

1934। कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी। साथ में जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव। कांग्रेस के भीतर समाजवाद का बीज बोया गया। लोहिया विदेश विभाग के सचिव बने। फिर 1942,  भारत छोड़ो आंदोलन। भूमिगत जीवन। कांग्रेस रेडियो की आवाज़।दबाने की हर कोशिश नाकाम।

आज़ादी आई। पर लोहिया संतुष्ट नहीं हुए। नेहरू का मॉडल उन्हें अधूरा लगा। मिश्रित अर्थव्यवस्था। केंद्रीकृत योजना। उन्हें यह “ऊपर से विकास” दिखा, जनता से दूर, सत्ता के करीब।उन्होंने राह बदली।

1955, सोशलिस्ट पार्टी। फिर संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी। अपना मंच। अपनी लड़ाई। संसद में पहुंचे तो आंकड़ों को हथियार बनाया। “तीन आने रोज।” गरीबी की रेखा का नंगा सच देश के सामने रख दिया।

सड़क पर उतरे तो मुद्दे और तेज हो गए; जाति के खिलाफ। अंग्रेज़ी के प्रभुत्व के खिलाफ। किसान के शोषण के खिलाफ।

फिर आया 1967,  एक नारा नहीं, एक रणनीति। “गैर-कांग्रेसवाद।” आज की भाषा में कहें तो, यही था “कांग्रेस-मुक्त भारत” का पहला ब्लूप्रिंट।

लोहिया ने विपक्ष को जोड़ा। कांग्रेस की दीवारों में दरार डाली। कई राज्यों में सत्ता बदली। गठबंधन राजनीति ने यहीं जन्म लिया।

यहीं एक असहज सवाल खड़ा होता है। आज जो “कांग्रेस-मुक्त भारत” का नारा गूंजता है; क्या उसके पहले शिल्पकार को याद किया जाता है?

क्या सत्ता को अपने वैचारिक पूर्वजों के प्रति आभार नहीं जताना चाहिए?

पर कहानी सीधी रेखा नहीं है। लोहिया जितने तेज थे, उतने असहज भी। कटु आलोचना। बिना फिल्टर की भाषा। नतीजा, अपने ही खेमे में दरारें। दोस्त विरोधी बनते गए।आंदोलन बड़ा हुआ, संगठन छोटा रह गया।

अब उनके दिमाग की ओर चलते हैं।

बर्लिन विश्वविद्यालय। नमक कर पर पीएचडी। मार्क्स को पढ़ा, पर आंख मूंदकर नहीं अपनाया। वर्ग-संघर्ष की कठोरता ठुकराई। सोवियत मॉडल पर सवाल उठाए। उन्होंने गढ़ा: “नया समाजवाद।” न पूंजीवाद। न साम्यवाद। दोनों से “समान दूरी।” उनका समाजवाद किताबों का नहीं, ज़रूरतों का था।

उत्पादन, ज़रूरत के हिसाब से। केंद्र में: मनुष्य। मशीन नहीं। और फिर; सप्त क्रांति। एक साथ कई मोर्चे।आर्थिक असमानता के खिलाफ।जाति के खिलाफ। लिंग भेद के खिलाफ। रंगभेद के खिलाफ। विदेशी वर्चस्व के खिलाफ।

यह विचार नहीं; एक बहु-आयामी संघर्ष था। “चौखंबा राज्य।” गांव, जिला, प्रांत, केंद्र। सत्ता का विकेंद्रीकरण। दिल्ली की पकड़ ढीली करने का सपना। नेहरू की केंद्रीकृत सोच के ठीक उलट।

पर असली ट्विस्ट यहां है। लोहिया गांधी के उत्तराधिकारी थे; पर कॉपी-पेस्ट नहीं।

एक अपग्रेडेड संस्करण। अहिंसा ली।सत्याग्रह लिया। ग्राम स्वराज लिया।पर उसमें समाजवाद का बारूद भरा।

गांधी नैतिक सुधार की बात करते थे।लोहिया ने कहा, संरचना बदलो। “रोटी और बेटी।” एक साथ खाना।एक साथ शादी। जाति पर सीधा प्रहार।

यह नारा नहीं था; सामाजिक विस्फोट का फार्मूला था। उन्होंने गांधीवाद को रीब्रांड किया। आंदोलन को हथियार बनाया। न शुद्ध आदर्शवाद। न विदेशी विचारधारा।

एक देसी मिश्रण, जो जमीन से जुड़ा था, और झकझोरने वाला भी। लेकिन हर विरासत की तरह, यह भी धुंधली और विवादित हो गई, लोहिया के अनेकों शिष्यों,  उत्तराधिकारियों की करतूतों की वजह से। राज नारायण, मधु लिमए, जॉर्ज फर्नांडिस, कर्पूरी ठाकुर, लालू यादव, नीतीश, मंडल, मुलायम सिंह यादव, बड़ी लिस्ट है!!

कुछ नीतियों पर सवाल भी उठे। विकेंद्रीकरण; कहीं विखंडन का डर।अंग्रेज़ी विरोध; मध्यम वर्ग की दूरी।टूटती पार्टियां; कमजोर राजनीतिक असर। तीखे व्यक्तिगत हमले; बड़ी सोच पर परदा।

फिर भी एक तस्वीर याद रखिए।

1967। गरीबी में जीवन। सादगी में मौत। न सत्ता का लोभ। न संपत्ति का मोह।

आज जब असमानता फिर सिर उठा रही है। जब नवउदारवाद का शोर है।जब विकास की चमक के पीछे असंतुलन छिपा है ;  तब लोहिया फिर याद आते हैं।

उनका “नया समाजवाद”; एक तरह का सशस्त्र गांधीवाद। जहां स्वराज सिर्फ आज़ादी नहीं, बराबरी भी है।

लोहिया संत नहीं थे। पर चिंगारी जरूर थे। एक विद्रोही गांधीवादी, जिसने सत्ता को ललकारा। समाज को आईना दिखाया। और आज भी उनकी आवाज़ गूंजती है;  “जब सड़क खामोश है, सदन आवारा हो जाती है।”

जाति पर उनका प्रहार आज भी उतना ही सटीक है; “जाति अवसर को सीमित करती है… और अवसर क्षमता को।”

और स्त्री पर उनकी कल्पना; सीता नहीं, द्रौपदी। आज्ञाकारिता नहीं, बुद्धि और साहस।

यही लोहिया थे: असुविधाजनक, असहज, लेकिन जरूरी।

सवाल अब भी हवा में तैर रहा है? क्या हम लोहिया को सिर्फ याद कर रहे हैं, या सच में उन्हें समझ भी रहे हैं?

Saturday, March 21, 2026

 सभ्यता का सबसे बड़ा गुनाह: इंसानियत का जनाज़ा उठाकर भी दुनिया चुप क्यों? दुनिया के सभी मुल्क अब चुप्पी तोड़ें!

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

23 मार्च 2026

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अरे, खामोशी कभी-कभी सबसे बड़ा गुनाह बन जाती है। और आज वही घड़ी है। सभ्य दुनिया की इस चुप्पी में कोई समझ नहीं, कोई नैतिकता नहीं; सिर्फ एक ठंडी साजिश नज़र आती है। एक सवाल है जो रातों को जागता रखता है। एक बेचैनी है जो गले में फँस गई है। एक इंतज़ार है जो अब और नहीं सहा जा सकता।

पश्चिम एशिया जल नहीं रहा; धधक रहा है। इज़राइल और ईरान आमने-सामने। अमेरिका की सीधी दखल। मिसाइलें आसमान को चीर रही हैं। ड्रोन मौत की बारिश कर रहे हैं। तेल के कुओं के आसपास बारूद की तेज़ गंध फैल रही है। समुद्र जहरीला हो रहा है, हवा में जहर घुल रहा है। पर्यावरण का कत्ल हो रहा है, इंसानों का तो पहले ही।

दुनिया इस आग से थक चुकी है। हर देश, हर इंसान एक ही सवाल चिल्ला रहा है: “कौन बुझाएगा ये आग?” लेकिन जवाब में सन्नाटा। कोई नाम नहीं उभरता। रूस और चीन बोलेंगे या ट्रंप की हुंकार से काँप गए हैं? क्या वैश्विक शक्ति का खेल इतना छोटा हो गया है कि बड़े-बड़े देश भी डरकर पीछे हट जाते हैं?

भारत की स्थिति बिल्कुल अलग है। हम घी नहीं डाल रहे, न ही चुप्पी साधे बैठे हैं। जबकि रूस और चीन ईरान को सामरिक मदद दे रहे हैं, सैटेलाइट इंटेलिजेंस, ड्रोन टेक्नोलॉजी, हथियारों की सप्लाई। 

लेकिन भारत ने हमेशा संतुलन बनाए रखा। मुद्दा ये नहीं कि कौन गलत है, किसने पहला वार किया। असली चिंता ये है कि जिन देशों का इस विवाद से कोई सीधा लेना-देना नहीं, वे क्यों बेवजह युद्ध के शिकार बन रहे हैं? क्यों उनके नागरिक, उनकी अर्थव्यवस्था, उनका भविष्य बिना वजह जल रहा है?

मोदी काल में भारत ने इस इलाके में जो संतुलन साधा, वो कोई संयोग नहीं था। इज़राइल के साथ गहरी, भरोसेमंद दोस्ती। सऊदी अरब, यूएई, कतर के साथ आर्थिक रिश्तों की मजबूत डोर। ईरान के साथ बातचीत का दरवाज़ा हमेशा खुला। ये भारत की नई पहचान है; रणनीतिक स्वायत्तता। न किसी खेमे में, न किसी के खिलाफ। सिर्फ अपने हितों पर, अपनी शर्तों पर।

लेकिन कूटनीति सिर्फ रिश्ते बाँधने का खेल नहीं है। असली परीक्षा तब आती है जब दोस्त आपस में लड़ रहे हों। तब कौन बीच में खड़ा होता है? कौन हाथ बढ़ाता है? आज भारत ठीक उसी चौराहे पर खड़ा है। 

“विश्वगुरु” कहलाने वाला भारत, ग्लोबल साउथ का चेहरा बनने का दावा करने वाला भारत: क्या सिर्फ तमाशा देखेगा? लीडरशिप का मतलब GDP के आंकड़े नहीं, रैंकिंग नहीं, तालियाँ नहीं। लीडरशिप का मतलब आग के बीच कूदना है। हाथ बढ़ाना है। रास्ता दिखाना है।

पश्चिम एशिया हमारी दूर की खबर नहीं; हमारा घर का मामला है। करीब 90 लाख भारतीय वहाँ पसीना बहा रहे हैं। उनकी मेहनत से हमारी अर्थव्यवस्था की नब्ज़ धड़कती है। हमारा तेल, गैस, ऊर्जा उसी इलाके से आती है। हमारे व्यापार, बंदरगाह, समुद्री सुरक्षा, सब उससे जुड़े हैं। वहाँ एक चिंगारी यहाँ तूफान बन जाती है। लेकिन भारत की असली ताकत उसके हित नहीं, उसकी साख है। दुनिया हमें एक ऐसे देश के रूप में देखती है जो दबाव नहीं बनाता, आदेश नहीं देता, सिर्फ सम्मान के साथ संवाद करता है। आज यही निष्पक्षता हमारी सबसे बड़ी पूंजी है।

तो सवाल उठता है, अगर भारत नहीं, तो कौन? 

भारत को अब आगे आना होगा। समाधान थोपने नहीं, संवाद शुरू कराने के लिए। बैक-चैनल डिप्लोमेसी, ट्रस्ट बिल्डिंग, छोटे-छोटे कदम। इतिहास कभी-कभी बड़े फैसलों से नहीं, एक फोन कॉल से, एक अपील से, एक मंच से बदल जाता है। भारत वो मंच बन सकता है, एक सेतु, जहाँ दुश्मन भी बैठकर बात कर सकें। 

कुछ लोग कहेंगे, “ये बहुत उलझा हुआ मसला है।” बिल्कुल सही। लेकिन यही तो वजह है कि भारत जैसी संतुलित, निष्पक्ष आवाज़ की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। इतिहास तमाशबीनों को कभी याद नहीं रखता। इतिहास उनको याद रखता है जिन्होंने वक्त आने पर खड़े होने का साहस दिखाया।

भारत हमेशा कहता आया है: वसुधैव कुटुंबकम। पूरी दुनिया एक परिवार है। तो बताइए, जब परिवार में आग लगी हो तो मुखिया चुप कैसे रह सकता है? 

दुनिया युद्ध से थक चुकी है। उसे चाहिए संयम, संवाद और समझदारी। ये तीनों भारत दे सकता है। हालात बेहद नाज़ुक हैं। ईरान-इज़राइल-अमेरिका टकराव चौथे हफ्ते में घुस चुका है। तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं। हमारे लोग वहाँ फँसे हैं। हर मिनट की देरी जोखिम बढ़ा रही है। वक्त दरवाज़ा पीट रहा है, जोर से, लगातार। 

फिर कहाँ गुम हो गए हार्वर्ड-कैम्ब्रिज के बुद्धिजीवी? कहाँ हैं नोबेल शांति पुरस्कार विजेता? क्यों चुप हैं दुनिया के थिंक टैंक? क्यों नहीं उठ रही गांधीवादी मुखौटे वाली आवाज़ें? अगर आज महात्मा गांधी होते तो क्या स्टैंड लेते? क्या वे भी चुप्पी साध लेते या अहिंसा और संवाद का झंडा उठाते? 

जर्मनी, जापान, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, क्या ये सभी देश अब सिर्फ बुजदिल हो गए हैं? या आर्थिक स्वार्थ, आराम और संपन्नता ने उनके आदर्शवाद को ज़िंदा दफन कर दिया है? 

सभ्य दुनिया के पास अब कोई बहाना नहीं बचा। हमारी साख, हमारी ताकत, हमारी नैतिकता, सब इस वक्त की परीक्षा दे रही है। अगर हम चुप रहे तो इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा। 

वक्त आ गया है। भारत को लीडरशिप दिखानी होगी। संवाद का मंच बनाना होगा। इंसानियत को बचाना होगा। क्योंकि अगर हम नहीं तो फिर कौन? 

 क्यों नारे, स्लोगन्स बनते हैं जन आंदोलन के हथियार? 

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क्या शब्द भी आग बन सकते हैं? एक नारा… और भीड़ बन जाए तूफान!

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

24 मार्च 2026

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फुल पेज एडवरटाइजमेंट याद नहीं रहता, सिर्फ पंच लाइन ही जेहन में रह जाती है, जैसे:  ये दिल मांगे मोर, क्या जूते भी सांस लेते हैं, डर के आगे जीत है, ठंडा मतलब कोक।

क्या तीन शब्द सचमुच इतिहास बदल सकते हैं? क्या एक छोटी-सी पंक्ति लाखों लोगों को एक साथ खड़ा कर सकती है? क्या आवाज़, जब नारा बनती है, तो सत्ता के सिंहासन तक डोल जाते हैं? जवाब साफ है : हाँ। स्लोगन या नारा केवल शब्द नहीं होता, वह चेतना का विस्फोट होता है।

नारा लेखन की कला, दरअसल, संक्षेप में विस्तार भरने की कला है। कम शब्द, बड़ा असर। जो बात लंबा भाषण नहीं कह पाता, वह एक नारा कह देता है। सफल जननेता और जनसंचारक इस राज को समझते हैं। वे जानते हैं कि भीड़ किताबें नहीं पढ़ती, नारे दोहराती है। छोटा, सटीक, लयबद्ध, और भीतर से उबाल मारता हुआ, यही है असरदार नारे की पहचान।

महात्मा गांधी का “करो या मरो”, तीन शब्द, लेकिन पूरे देश को जगा देने वाला आह्वान। सुभाष चंद्र बोस का “जय हिंद”, एक सलाम, जो राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक बन गया। “इंकलाब जिंदाबाद”: क्रांति की गूंज, जिसने युवाओं के खून में आग भर दी। बाल गंगाधर तिलक का “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है”, एक अधिकार की पुकार, जिसने गुलामी के ताले तोड़ने की हिम्मत दी। डॉ राम मनोहर लोहिया के जाति तोड़ो, अंग्रेजी हटाओ, हिमालय बचाओ, दाम बांधो, सामाजिक और सांस्कृतिक जंजीरों को चुनौती देते  नारे हैं।

यही नारे की असली ताकत है। वह विचार को सरल बनाता है। दर्शन को जनभाषा में ढाल देता है। किताबों की जटिलता को सड़क की सादगी में बदल देता है।

आजादी के बाद भी नारे समाज को दिशा देते रहे। “हम दो, हमारे दो”, सिर्फ एक सरकारी संदेश नहीं, बल्कि एक सामाजिक बदलाव की शुरुआत। दीवारों पर लिखे गए नारे, गांव-गांव, शहर-शहर फैलते गए। वे पोस्टरों से उतरकर लोगों की सोच में बस गए। दीवारें किताब बनीं, और राहगीर पाठक।

दुनिया के इतिहास में भी नारे ने कई बार निर्णायक भूमिका निभाई है। Martin Luther King Jr. का “I Have a Dream”, एक सपना, जिसने नस्लीय भेदभाव के खिलाफ पूरी दुनिया को झकझोर दिया। “Make Love, Not War”, युद्ध के खिलाफ शांति का गीत बना। “Black Lives Matter”, तीन शब्द, लेकिन सदियों के अन्याय को उजागर कर देने वाली पुकार।

“We Shall Overcome”, आशा का स्वर, जिसने संघर्षरत लोगों को हिम्मत दी। French Revolution का “Liberty, Equality, Fraternity”, आज भी लोकतंत्र की आत्मा बना हुआ है।

आधुनिक समय में भी नारे उतने ही प्रासंगिक हैं। “We Are the 99%” ने आर्थिक असमानता को स्पष्ट रूप से सामने रखा। “No Justice, No Peace”, अन्याय के खिलाफ चेतावनी। “There Is No Planet B”, पर्यावरण संकट का सटीक और तीखा संदेश। “Silence = Death”, चुप्पी के खतरे को उजागर करता हुआ नारा।

तो आखिर एक नारा प्रभावशाली कैसे बनता है?

पहला, सरलता। नारा तुरंत समझ में आना चाहिए।

दूसरा, लय और तुक। जो कानों में गूंजे और याद रह जाए।

तीसरा, भावनात्मक जुड़ाव। दिल को छुए बिना दिमाग पर असर नहीं होता।

चौथा, सार्वभौमिकता। हर व्यक्ति को लगे कि यह उसकी बात है।

और सबसे महत्वपूर्ण, समय, टाइमिंग।  सही नारा वही है जो सही समय पर जन्म ले।

आज के डिजिटल युग में, जब सूचनाओं की बाढ़ है, नारे की ताकत और बढ़ गई है। सोशल मीडिया पर एक लाइन ट्रेंड बन जाती है, आंदोलन खड़ा कर देती है। हैशटैग भी आधुनिक नारे ही हैं, छोटे, तेज, और वायरल होने वाले।

लेकिन इस शक्ति के साथ खतरा भी जुड़ा है। नारा सच्चाई को सरल बना सकता है, लेकिन उसे तोड़-मरोड़ भी सकता है। वह प्रेरित कर सकता है, लेकिन भटका भी सकता है। इसलिए नारा लेखन केवल कला नहीं, एक जिम्मेदारी है। शब्दों में आग हो, पर वह सच की आग हो, भ्रम की नहीं।

अंततः, नारे की असली ताकत उसकी जनता में बसने की क्षमता है। जब लोग उसे अपना लेते हैं, उसे दोहराते हैं, उसे जीते हैं, तभी वह अमर होता है। वह रैलियों से निकलकर रोजमर्रा की भाषा में घुल जाता है। दीवारों से उतरकर दिलों में बस जाता है।

अच्छा नारा लिखा नहीं जाता: वह जन्म लेता है, समय की कोख से।

और जब सही शब्द सही क्षण से मिलते हैं, तो वे केवल आवाज़ नहीं बनते, वे आंदोलन बन जाते हैं, इतिहास रचते हैं। इंकलाब जिंदाबाद!!

Friday, March 20, 2026

 कैसा विकास! जब पीने के लिए शुद्ध पानी भी उपलब्ध न हो

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पानी का हक: सांस जितना जरूरी, अब कानून में भी दर्ज हो!

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

21 मार्च 2026

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विश्व जल दिवस है, 22 मार्च 2026 को। इस बार का मुद्दा है जल और लैंगिक समानता, Water and Gender। 

मतलब साफ है, पानी की कमी सबसे ज्यादा औरतों और लड़कियों पर भारी पड़ती है। 

दुनिया भर में जहां साफ पानी और शौचालय की कमी है, वहां असमानता और बढ़ती है, और सबसे ज्यादा बोझ महिलाओं पर। 

लेकिन भारत में यह सिर्फ एक दिन की बात नहीं, यह रोज की जंग है। एक दिन भाषण, फोटो, पोस्टर, और फिर वही खामोशी। अब वक्त आ गया है कि हम चुप न रहें। सवाल सीधा है, पानी भीख है या हक?

हवा पर कोई मीटर नहीं, कोई टैक्स नहीं, कोई ताला नहीं। क्योंकि बिना हवा के जीवन खत्म। पानी भी तो उतना ही जरूरी है। बिना पानी के जीवन नहीं चलता। फिर क्यों पानी को बाजार में बेचा जा रहा है? बोतल में बंद, दाम लगाकर। जो अमीर है, वह खरीद लेता है। जो गरीब है, वह गंदा पानी पीकर बीमार पड़ता है, मौत के मुंह में जाता है। यह इंसानियत के खिलाफ है। पानी सार्वजनिक संपत्ति है, जन-धन है। इसे मुनाफे की चीज नहीं बनाया जा सकता।

सच कड़वा है। भारत में 18 प्रतिशत दुनिया की आबादी है, लेकिन सिर्फ 4 प्रतिशत मीठा पानी हमारे पास। करीब 60 करोड़ लोग उच्च से अत्यधिक जल-तनाव में जी रहे हैं। भूजल तेजी से खत्म हो रहा है। 

हम दुनिया में सबसे ज्यादा भूजल निकालने वाले देश हैं। पानी की प्रति व्यक्ति उपलब्धता गिरकर 1400 घन मीटर के आसपास पहुंच गई है, जो जल-तनाव की सीमा से नीचे है। नदियां नाले बन चुकी हैं। हैंडपंप जहर उगलते हैं। शहरों में टैंकर माफिया राज करता है। 

दिल्ली हो या लखनऊ, आगरा हो या मुरादाबाद, कहानी एक जैसी है। 40 प्रतिशत पानी पाइपलाइनों में लीक हो जाता है। मौसम बेकाबू, बेमौसम बारिश, झुलसाती गर्मी, कमजोर मानसून। यह सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं रहा। यह अर्थव्यवस्था का संकट है, स्वास्थ्य का विस्फोट है, सामाजिक अस्थिरता का संकेत है।

सबसे ज्यादा चोट किसे लगती है? गरीब को, औरत को, बच्चे को, हाशिए पर खड़े समाज को। गांवों में औरतें आज भी मटके सिर पर रखकर मीलों चलती हैं। समय गंवाती हैं, स्वास्थ्य गंवाती हैं, स्कूल जाने वाली लड़कियां पढ़ाई छोड़ देती हैं। गंदा पानी दस्त, हैजा, टाइफाइड लाता है। हर साल लाखों बच्चे ऐसी बीमारियों से मरते हैं, जिन्हें एक गिलास साफ पानी रोक सकता था। यह त्रासदी नहीं, अपराध है। और यह अपराध रोका जा सकता है।

अब एक उम्मीद की किरण है, जल जीवन मिशन। 2019 में शुरू हुआ था। टैप तो लग गए, लेकिन फंक्शनल? नियमित पानी? साफ पानी? कई जगहों पर अभी कमी है। भूजल गिर रहा है, प्रदूषण बढ़ रहा है। मिशन 2028 तक बढ़ा दिया गया है, बजट भी बढ़ा है। लेकिन अब जरूरत है कि सिर्फ कनेक्शन नहीं, असली जल सुरक्षा हो, हर बूंद का हिसाब, हर घर में नियमित, साफ पानी।

समाधान भावना में नहीं, डेटा और तकनीक में है। कल्पना कीजिए, हर पाइप पर स्मार्ट मीटर। रियल-टाइम डैशबोर्ड बताए कि कहां पानी खत्म होने वाला है। एआई अवैध बोरवेल पकड़े। एल्गोरिदम तय करे कि किसे कितना पानी मिले, ताकि कोई प्यासा न रहे। सिंगापुर ने करके दिखाया, केप टाउन ने घबराहट को प्रबंधन में बदला। हम क्यों नहीं? 

लेकिन असली लड़ाई शासन की है। बांध-नहर की पुरानी राजनीति बंद हो। मांग को काबू करना होगा। पानी की असली कीमत तय करनी होगी, कड़वी लेकिन जरूरी। प्रदूषण पर सख्त सजा। स्थानीय निकायों को डेटा, अधिकार, संसाधन दो। समुदाय को ताकत दो।

वरना क्या होगा? अमीर टैंकर मंगाएंगे। गरीब कतार में खड़े रहेंगे। बीमारियां फैलेंगी। उद्योग ठप होंगे। समाज दरक जाएगा। समय भाग रहा है। सलाहें मरहम हैं, जख्म गहरा है। 60 करोड़ लोग इंतजार नहीं कर सकते।

पानी अब दया नहीं, अधिकार है। सांस जितना जरूरी हक। विश्व जल दिवस सिर्फ याद दिलाने का नहीं, फैसला लेने का दिन है। सरकारें मजबूत नीतियां बनाएं। बजट लगे। जवाबदेही तय हो। हर घर तक साफ पानी पहुंचे। जल स्रोत सुरक्षित हों। वितरण बराबरी से हो। औरतों की आवाज सुनी जाए, उनकी अगुवाई हो।

यह कोई योजना नहीं, यह अधिकार है। इसे कानून में, नीति में, जमीन पर सच बनाओ। वरना अगली बार नल नहीं सूखेंगे, पूरी व्यवस्था सूख जाएगी। पानी का हक बनाओ कानून। अब वक्त है। कल बहुत देर हो जाएगी।