Saturday, August 29, 2026

 


यूपी की हवा में कौन-सा रुख? तिलचट्टों का शोर या योगी की हैट्रिक?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

31 अगस्त 2026

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एक तरफ योगी की मजबूत सत्ता, सख्त कानून-व्यवस्था और चमकते एक्सप्रेसवे हैं। दूसरी तरफ बेरोजगार युवा, पेपर लीक और सोशल मीडिया पर गरजता एक अजीब नारा: “हम कॉकरोच हैं!”

चुनावी बिगुल अभी बजा भी नहीं है, लेकिन उत्तर प्रदेश की सियासी गलियों में सवाल गूंज रहा है: हवा किस तरफ है?

2027 की गर्मियों में 403 विधानसभा सीटों पर फैसला होगा। बहुमत के लिए 202 सीटें चाहिए। अगस्त 2026 के उपलब्ध सर्वेक्षणों में मुकाबला फिलहाल कांटे का दिखता है। भाजपा-एनडीए और सपा के नेतृत्व वाला विपक्षी गठबंधन लगभग बराबरी की जमीन पर खड़े नजर आते हैं।

लेकिन एक दिलचस्प फर्क है। मुख्यमंत्री पद की पसंद में योगी आदित्यनाथ अभी भी अखिलेश यादव से काफी आगे दिखाई देते हैं। यानी पार्टी बनाम पार्टी मुकाबला कड़ा है, मगर चेहरे की लड़ाई में योगी का पलड़ा भारी है।

2012 में सपा ने 224 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। 2017 में भाजपा ने 312 सीटों के साथ ऐतिहासिक जीत दर्ज की। 2022 में भाजपा 255 सीटों पर सिमटी, जबकि सपा 111 सीटों के साथ मजबूत विपक्ष बनकर उभरी।

यूपी की राजनीति अब काफी हद तक भाजपा बनाम सपा हो चुकी है। बसपा कमजोर जरूर हुई है, लेकिन उसका वोट बैंक पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। दो अंकों में रहने वाला उसका वोट प्रतिशत कई सीटों पर नतीजों का गणित बदल सकता है।

बूढ़ा हाथी अब अकेले युद्ध नहीं जीत सकता, लेकिन उसकी चिंघाड़ अभी भी कई मैदान हिला सकती है।

और अब मैदान में एक नया जीव चर्चा में है: कॉकरोच।

नाम सुनते ही मुस्कान आती है। मगर राजनीति में कभी-कभी मजाक भी गंभीर संकेत बन जाता है।

“हम कॉकरोच हैं”; यह नारा पहली नजर में हास्यास्पद लगता है। लेकिन इसके भीतर युवाओं की गहरी बेचैनी छिपी है। 18 से 25 वर्ष के लाखों मतदाता डिजिटल दुनिया में जीते हैं। उन्हें लंबे भाषणों से ज्यादा मीम, रील और वायरल वीडियो प्रभावित करते हैं।

उनके सामने सवाल बहुत असली हैं, नौकरी कहां है? भर्ती कब होगी? पेपर लीक क्यों होते हैं? परीक्षा होगी तो परिणाम कब आएगा?

यहीं से “कॉकरोच जनता पार्टी” जैसा व्यंग्यात्मक नैरेटिव गंभीर हो जाता है। संदेश सीधा है: अगर व्यवस्था हमें बार-बार कुचलती है, तो हम कॉकरोच की तरह फिर उठ खड़े होंगे।

इस नैरेटिव की खासियत यह है कि इसमें जाति का झंडा नहीं है। इसमें हिंदुत्व का नारा भी नहीं है। यह सीधे रोजगार, शिक्षा और भर्ती व्यवस्था की नाकामी पर चोट करता है।

अगर यह आंदोलन सड़क से सोशल मीडिया तक फैलता है, तो भाजपा के युवा वोट में हलचल पैदा कर सकता है। तीन से पांच प्रतिशत वोट का मामूली झटका भी करीबी मुकाबलों वाली दर्जनों सीटों पर फर्क डाल सकता है।

राजनीति में जीत हमेशा अपने वोट बढ़ाने से नहीं मिलती। कभी-कभी सामने वाले के वोटर को घर बैठा देना ही काफी होता है।

फिर भी योगी सरकार की जमीन कमजोर नहीं है।

कानून-व्यवस्था उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी है। एक्सप्रेसवे, सड़कें, एयरपोर्ट, बिजली, राशन, आवास और निवेश जैसे मुद्दों ने सरकार को डिलीवरी और विकास की छवि दी है। राम मंदिर ने सांस्कृतिक राजनीति को भी नई ऊर्जा दी।

सबसे महत्वपूर्ण बात: भाजपा का संगठन मजबूत है। बूथ स्तर तक उसकी पकड़ है। कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों का बड़ा वर्ग भी उसके साथ खड़ा दिखाई देता है।

लेकिन दो कार्यकाल के बाद सवाल भी बदलते हैं।

अब आगे क्या?

यही भाजपा की असली परीक्षा है।

बेरोजगारी, पेपर लीक, भर्ती में देरी, महंगाई, किसान, शिक्षा और स्वास्थ्य चुनावी बहस के बड़े मुद्दे बन सकते हैं। युवा अब भाषण नहीं, नियुक्ति चाहता है।

स्थानीय विधायकों के प्रति नाराजगी भी भाजपा के लिए सिरदर्द बन सकती है। मतदाता सरकार से संतुष्ट हो सकता है, लेकिन अपने विधायक से नहीं।

मतदाता की भाषा में कहें तो; “लखनऊ ठीक है साहब, लेकिन हमारे मोहल्ले का विधायक बदलना चाहिए!” आगरा में यही स्थिति है। जनता विधायकों से नाराज है, मगर झुकाव भाजपा की तरफ है। 

कुछ ब्राह्मण वर्गों में नाराजगी की चर्चाएं भी तेज हैं। “ठाकुर राज” जैसी शिकायतें सुनाई देती हैं। प्रतिनिधित्व और प्रशासनिक प्रभाव को लेकर असंतोष के स्वर हैं।

अखिलेश यादव इस मौके को भुनाना चाहते हैं। PDA की राजनीति में ‘P’ को पंडित तक ले जाने की कोशिश इसका संकेत है।

लेकिन नाराजगी का अर्थ वोट का पूरा हस्तांतरण नहीं होता। ब्राह्मणों का भाजपा से रिश्ता कई दशकों पुराना है। सपा की पुरानी यादव-केंद्रित छवि और कानून-व्यवस्था की पुरानी स्मृतियां भी उसके रास्ते में हैं।

अखिलेश ने 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा को नई ऊर्जा दी। PDA के जरिए दलितों और गैर-यादव पिछड़ों तक पहुंच बढ़ी। लेकिन विधानसभा का चुनाव अलग खेल है।

यहां उम्मीदवार, बूथ प्रबंधन, स्थानीय समीकरण और छोटे सामाजिक गठजोड़ बहुत मायने रखते हैं। कांग्रेस अभी जूनियर पार्टनर है। छोटे दल और AIMIM जैसे खिलाड़ी कुछ सीटों पर वोट काट सकते हैं।

विपक्ष के पास मुद्दे हैं। संगठन भी धीरे-धीरे मजबूत हो रहा है। लेकिन अभी लहर दिखाई नहीं देती।

और मुद्दा होना तथा लहर होना; दो अलग चीजें हैं।

तो फिर हवा किस तरफ है?

अगस्त 2026 की तस्वीर में हवा किसी एक दिशा में तूफानी रफ्तार से नहीं बह रही। मुकाबला पिछली बार से निश्चित रूप से कठिन है। सत्ता विरोधी भावना मौजूद है, लेकिन अभी वह सुनामी नहीं बनी है।

कॉकरोच आंदोलन भाजपा के युवा वोट को प्रभावित कर सकता है। लेकिन उसका गैर-दलीय चरित्र विपक्ष के लिए भी जोखिम है। वह वोट में बदलेगा, मतदान से दूरी बनाएगा या केवल सोशल मीडिया का शोर रहेगा; यह कहना अभी जल्दबाजी होगी।

आखिरकार चुनाव अभी दूर है। अगले दस महीनों में उम्मीदवार, गठबंधन, जातीय समीकरण और अंतिम समय का नैरेटिव बहुत कुछ बदल सकते हैं।

फिलहाल भाजपा के पास कई ठोस फायदे हैं, योगी की लोकप्रियता, मजबूत संगठन, कानून-व्यवस्था की छवि, कल्याणकारी योजनाएं और दिखाई देने वाला विकास।

इसलिए शुरुआती तस्वीर साफ है:

मुकाबला कड़ा है, मगर हवा पूरी तरह बदली नहीं है।

अगर योगी सरकार बेरोजगारी और भर्ती की समस्या पर निर्णायक कदम उठाती है, युवाओं की नाराजगी कम करती है, स्थानीय विधायकों के खिलाफ असंतोष साधती है और सामाजिक संतुलन बनाए रखती है, तो भाजपा की बढ़त कायम रह सकती है।

2027 की कहानी अभी खुली किताब है। मगर शुरुआती पन्नों पर योगी का नाम साफ दिखाई देता है।

कॉकरोच शोर मचा सकते हैं। विपक्ष चुनौती दे सकता है। लेकिन चुनाव का फैसला अंततः काम, भरोसे और मतदाता के मूड से होगा।

और अगर अगले दस महीनों में सरकार प्रदर्शन मजबूत करती है, संगठन एकजुट रहता है और युवा असंतोष को समय रहते साध लिया जाता है, तो उत्तर प्रदेश में फिर इतिहास लिखा जा सकता है; 

योगी आदित्यनाथ की हैट्रिक।

क्योंकि चुनाव में नारा कुछ दिनों तक चलता है।

काम का हिसाब पांच साल तक चलता है।

 जब पूरा हिंदुस्तान गाता था: दूरदर्शन के यादगार विज्ञापन जिंगल

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

31 अगस्त 2026

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एक ज़माना था जब हिंदुस्तान में टीवी का मतलब दूरदर्शन था। चैनल एक था, बातचीत एक थी और शाम को पूरा परिवार एक ही कमरे में बैठकर टीवी देखता था।

रिमोट का आतंक नहीं था। मोबाइल की घंटी नहीं थी। रील्स और शॉर्ट्स नाम की कोई आफ़त नहीं थी। विज्ञापन आते थे तो लोग उठकर पानी लेने नहीं जाते थे। कई बार विज्ञापन ही कार्यक्रम से ज़्यादा याद रह जाते थे।

सत्तर से अस्सी और नब्बे के दशक,  भारतीय टेलीविजन विज्ञापन का सुनहरा दौर था। केबल टीवी ने अभी दस्तक नहीं दी थी। इंटरनेट तो किसी साइंस-फिक्शन कहानी का हिस्सा लगता था।

विज्ञापन छोटे थे, मगर उनका असर लंबा था। धुन सीधी थी, बोल आसान थे और संदेश दिल में उतर जाता था। आज के करोड़ों रुपये वाले विज्ञापन देखकर कभी-कभी लगता है, तब विज्ञापन बनाए जाते थे, आज विज्ञापन बनाए जाते हैं ताकि विज्ञापन बनते हुए दिखाई दें!

आइए, उन दिनों के कुछ दिलचस्प,  यादगार जिंगल याद करें।

निरमा — कानों में बस जाने वाला जिंगल

“Washing powder Nirma…”

इसके आगे किसी परिचय की जरूरत नहीं।

सफेद कपड़ों में घूमती लड़कियां, झाग और दूध जैसी सफेदी का दावा। निरमा का जिंगल घर-घर की धुन बन गया था।

मां गुनगुनाती थीं, बच्चे गुनगुनाते थे और पिताजी भी बोल भूलने का नाटक करते हुए पूरा जिंगल जानते थे।

निरमा ने साबित किया कि विज्ञापन में शेक्सपियर नहीं चाहिए। एक आसान धुन, कुछ सीधे शब्द और भरपूर दोहराव: बस, काम तमाम।

हमारा बजाज :  मध्यमवर्ग का राष्ट्रगीत

“बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर, हमारा बजाज।”

यह सिर्फ स्कूटर का विज्ञापन नहीं था। यह उभरते हुए भारतीय मध्यमवर्ग का सपना था।

स्कूटर पर बच्चे, पत्नी, पति और कभी-कभी रिश्तेदार भी। वही स्कूटर दफ्तर जाता था, बच्चों को स्कूल छोड़ता था और रविवार को पूरा परिवार पिकनिक पर ले जाता था।

बजाज ने वाहन नहीं बेचा। उसने आकांक्षा बेची।

लिरिल :  झरने के नीचे आज़ादी

“ला ला ला ला… लिरिल।”

झरना, झाग, ताजगी और बेफिक्री।

लिरिल ने साबुन को नहाने की चीज़ से उठाकर आज़ादी का प्रतीक बना दिया। नहाना अचानक एक रोमांचक अनुभव लगने लगा।

विज्ञापन ने साबुन कम बेचा, कल्पना ज्यादा बेची।

लाइफबॉय :  सेहत की पहरेदारी

“तंदुरुस्ती की रक्षा करता है लाइफबॉय।”

लाइफबॉय का अंदाज़ सीधा था। बीमारी और कीटाणुओं के खिलाफ मोर्चा खोलो और साबुन का इस्तेमाल करो।

न कोई बड़ी फिल्मी कहानी, न लंबा भाषण। बस समस्या, समाधान और याद रह जाने वाली धुन।

विक्स:  खिच-खिच का इलाज

“विक्स की गोली लो, खिच-खिच दूर करो।”

क्या शानदार सादगी थी!

गले में खिच-खिच हुई, विक्स की गोली आई और समस्या गई।

आज के विज्ञापन में पहले समस्या खोजी जाती है, फिर उपभोक्ता की मनोवैज्ञानिक प्रोफाइल बनाई जाती है और अंत में उत्पाद आता है। विक्स ने मामला दो पंक्तियों में निपटा दिया।

विको टर्मरिक :  छह शब्दों की बाज़ीगरी

“Vicco Turmeric, नहीं cosmetic.”

बस छह शब्द।

परंपरा, आयुर्वेद और भारतीयता को आधुनिक विज्ञापन भाषा में पैक कर दिया गया।

पीली ट्यूब घर-घर पहचानी जाने लगी। आज भी उसका नाम सुनते ही पुराना दूरदर्शन सामने आ जाता है।

रसना :  बचपन का स्वाद

“I love you, Rasna.”

रसना सिर्फ पेय नहीं था। वह गर्मियों की छुट्टियां थीं। घर में आए रिश्तेदार थे। रसोई में तैयार होता ठंडा शरबत था। बच्चों की खुशी थी।

उस छोटी-सी बच्ची की आवाज़ ने एक पाउडर को बचपन की याद बना दिया।

मैगी :  “मम्मी, मैं भूखा हूं!”

मैगी ने भारतीय रसोई में समय की नई परिभाषा लिखी।

“Fast to cook, good to eat.”

बच्चा भूखा है। मां व्यस्त है। समाधान सामने है, दो मिनट की मैगी।

बाद में दो मिनट पर बहस हो सकती है। लेकिन भारतीय मां और बच्चे के बीच मैगी की दोस्ती पर बहस की जरूरत नहीं।

पान पराग :  स्वागत में क्या है?

“पान पराग से स्वागत कीजिए।”

शम्मी कपूर, अशोक कुमार, बाराती और शादी का पूरा फिल्मी माहौल।

पान पराग ने भारतीय मेहमाननवाज़ी को विज्ञापन में बदल दिया। थोड़ा नाच, थोड़ा गाना, थोड़ा दिखावा और खूब सारा उत्सव।

भारतीय शादी में जितना ड्रामा होता है, विज्ञापन ने उतना ही स्क्रीन पर डाल दिया।

ओनिडा :  पड़ोसी की जलन

“Neighbour’s envy, owner’s pride.”

और वह शैतान!

ओनिडा ने टीवी को मनोरंजन के साधन से उठाकर प्रतिष्ठा का प्रतीक बना दिया।

आपके घर में टीवी है? तो पड़ोसी को जलना चाहिए!

यह उस बदलते भारत की निशानी थी, जहां उपभोक्तावाद धीरे-धीरे दरवाजे पर दस्तक दे रहा था।

और भी बहुत कुछ था

लिज्जत पापड़ का “कुर्रम कुर्रम”, अमूल के चुटीले विज्ञापन, बजाज के भावुक अभियान और सबसे बढ़कर “मिले सुर मेरा तुम्हारा”, ये सब सिर्फ विज्ञापन नहीं थे। ये उस दौर की सामूहिक याददाश्त का हिस्सा थे।

पियूष पांडे, प्रह्लाद कक्कड़ और कई दूसरे रचनात्मक लोगों ने भारतीय विज्ञापन को एक अलग ज़बान दी। उसमें हास्य था, भावना थी, संगीत था और सबसे बड़ी बात, भारतीय मिट्टी की खुशबू थी।

आज विज्ञापन की दुनिया बहुत बड़ी हो गई है। टीवी के साथ यूट्यूब, इंस्टाग्राम, फेसबुक, रील्स और शॉर्ट्स की पूरी फौज खड़ी है।

ध्यान की अवधि घट गई है। हर कोई अगले तीन सेकंड में दर्शक को पकड़ लेना चाहता है। रचनात्मकता भी जैसे इंस्टेंट नूडल बन गई है, डालो, पकाओ और भूल जाओ।

आज का मोबाइल वह नया घरेलू तानाशाह है, जिसके सामने पूरा परिवार अलग-अलग स्क्रीन पर झुका बैठा है। रील्स और शॉर्ट्स हमारी जेबों में ऐसे घुस आए हैं जैसे बरसात में कॉकरोच।

शोर ज्यादा है। सनसनी ज्यादा है। उत्तेजना ज्यादा है। लेकिन याद रहने वाली रचनात्मकता शायद कम है।

तब एक जिंगल सालों चलता था। आज कई विज्ञापन एक सप्ताह में कूड़ेदान में चले जाते हैं।

शायद हमें दूरदर्शन के विज्ञापन नहीं, वह हिंदुस्तान याद आता है जो उनके साथ जुड़ा था।

एक चैनल था।

एक ड्राइंग रूम था।

पूरा परिवार था।

एक जिंगल बजता था।

और देखते-देखते पूरा हिंदुस्तान गाने लगता था:

“वॉशिंग पाउडर निरमा…”

क्या वह सचमुच बेहतर दौर था?

शायद नहीं।

लेकिन यकीनन वह ज्यादा अपना था।

Friday, August 28, 2026

 


छिपकलियों, कॉकरोचों और मेंढकों को भी समझना होगा: मौजूदा निज़ाम की निरंतरता क्यों ज़रूरी है

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

30 अगस्त, 2026

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किसी भी मुल्क की सियासत में बदलाव ज़रूरी है, लेकिन हर बदलाव बेहतर हो, यह ज़रूरी नहीं। कभी-कभी जो व्यवस्था मुश्किलों के बावजूद स्थिर हो गई हो, उसे अचानक बदलना खुद एक बड़ा जोखिम बन जाता है। भारत के लिए 2014 के बाद का दौर इसी सवाल को बार बार उठाता है। क्या निरंतरता को सिर्फ इसलिए छोड़ दिया जाए कि बदलाव आकर्षक लगता है?

2014 के बाद भारत के राजनीतिक सफर की सबसे बड़ी खूबी सियासी स्थिरता रही है। सरकारें अपना कार्यकाल पूरा कर रही हैं और नीतियों को समय मिल रहा है। पहले की तरह बार-बार सत्ता बदलने और नीतियों के पलटने की बेचैनी अपेक्षाकृत कम हुई है।

निरंतरता का सबसे बड़ा फायदा यह है कि किसी नीति को नतीजा देने का मौका मिलता है। हर नई सरकार अगर पुरानी लकीर मिटाकर नई लकीर खींचे, तो देश आगे बढ़ने के बजाय फाइलों में ही उलझा रहेगा।


भारत जैसे विशाल और विविध देश में केंद्र और राज्यों के रिश्ते बेहद अहम हैं। पिछले बारह वर्षों में विपक्षी दलों की सरकार वाले राज्यों के साथ केंद्र के रिश्तों को लेकर बहस और आरोप जरूर हुए हैं, लेकिन राष्ट्रपति शासन को सामान्य राजनीतिक हथियार बनाने की कोई परंपरा नहीं बनी।

संवैधानिक संस्थाओं ने भी अपनी भूमिका निभाई है। संसद, अदालतें, चुनाव व्यवस्था और पंचायतों से लेकर राज्यों तक लोकतांत्रिक संस्थाएं लगातार काम करती रही हैं। असहमति भी रही, विरोध भी हुआ और सड़कों पर आंदोलन भी हुए। मगर लोकतंत्र का पहिया चलता रहा।

यही किसी लोकतंत्र की असली परीक्षा है। सरकार से सहमत होना लोकतंत्र नहीं है। असहमति के बावजूद व्यवस्था का चलते रहना लोकतंत्र है।


पिछले बारह साल फूलों की सेज नहीं रहे। आतंकवादी हमले हुए, नागरिक आंदोलनों ने सरकार को चुनौती दी और विपक्ष ने कई मुद्दों पर तीखा विरोध किया। संसद में भी खूब हंगामा हुआ और सियासी बयानबाज़ी ने कई बार मर्यादा की सीमा छुई।

फिर भी व्यवस्था बिखरी नहीं। विरोध अपनी जगह रहा और शासन अपनी जगह। आंदोलन हुए, लेकिन देश चलता रहा। यही सिस्टम की सहनशक्ति है।

लोकतंत्र कोई ऐसा पंखा नहीं है जिसे स्विच दबाते ही चलना शुरू कर दें। इसे चलाए रखने के लिए संस्थाओं, परंपराओं और जनता के भरोसे की जरूरत होती है।


अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी भारत की हैसियत बदली है। Brand India को लेकर आत्मविश्वास बढ़ा है। विदेशों में बसे भारतीयों ने स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं और समाजों में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई है।

बड़ी ताकतों के दबाव के बीच भारत ने अपने हितों को प्राथमिकता देने की कोशिश की है। अमेरिका हो, रूस हो या कोई और ताकत; नई दुनिया में भारत ने किसी एक खेमे का पिछलग्गू बनने के बजाय अपने विकल्प खुले रखने की नीति अपनाई है।

बहुध्रुवीय दुनिया में यही रणनीतिक स्वायत्तता है। कभी दोस्ती, कभी दूरी और कभी दो टूक बात; कूटनीति में यही तो हुनर है।


अर्थव्यवस्था में चुनौतियां कम नहीं हैं। निर्यात पर दबाव है, वैश्विक बाजार अनिश्चित है और रोजगार से लेकर महंगाई तक कई सवाल हैं। फिर भी भारतीय अर्थव्यवस्था ने झटकों को झेलने की क्षमता दिखाई है।

कारोबार को आसान बनाने, उद्यमिता को बढ़ावा देने और नए कारोबारियों को अवसर देने की कोशिशों के नतीजे दिखाई देने लगे हैं। करोड़ों युवाओं की महत्वाकांक्षाएं भी अब नौकरी से आगे बढ़कर कारोबार और स्टार्टअप की ओर देख रही हैं।

अर्थव्यवस्था को सबसे ज्यादा जरूरत होती है भरोसे और स्थिर माहौल की। कारोबारी यह नहीं चाहते कि आज बनाई गई नीति कल किसी नए राजनीतिक प्रयोग के साथ कूड़ेदान में चली जाए।

इसका मतलब यह नहीं कि सब कुछ ठीक है

मौजूदा व्यवस्था को बनाए रखने की बात का अर्थ यह कतई नहीं कि सरकार से सवाल न पूछे जाएं। लोकतंत्र में आलोचना जरूरी है। गलत नीतियों पर सवाल उठना चाहिए और जहां सुधार की जरूरत हो, वहां सुधार होना चाहिए।

सरकार कोई दूध की धुली संस्था नहीं होती। सत्ता में रहते हुए गलतियां भी होती हैं और फैसलों पर बहस भी होनी चाहिए। मगर आलोचना और अराजकता में फर्क है।

देश को मजबूत विपक्ष भी चाहिए और जवाबदेह सरकार भी। लेकिन सिर्फ सरकार बदलने के लिए सरकार बदलना कोई नीति नहीं हो सकती।


सियासत में कुछ लोग हर पांच साल बाद नई बोतल में पुरानी शराब बेचने निकल पड़ते हैं। कोई कहता है सब बदल दो, कोई कहता है पूरा सिस्टम उलट दो। छिपकलियां दीवार पर चढ़ती-उतरती रहें, कॉकरोच इधर-उधर भागते रहें और मेंढक तालाब में टर्राते रहें; देश को आखिर आगे तो बढ़ना है।

बदलाव लोकतंत्र की खूबसूरती है, लेकिन बदलाव अपने आप में उपलब्धि नहीं है। सवाल यह होना चाहिए कि बदलाव से देश मजबूत होगा या कमजोर।

बारह साल में कोई व्यवस्था परिपूर्ण नहीं हो जाती। लेकिन अगर संस्थाएं काम कर रही हों, चुनाव हो रहे हों, सत्ता संवैधानिक दायरे में चल रही हो, अर्थव्यवस्था झटके झेल रही हो और दुनिया में भारत की आवाज पहले से ज्यादा सुनी जा रही हो, तो अचानक सब कुछ दांव पर लगाने की जरूरत क्या है?


मौजूदा निज़ाम को जारी रखने का तर्क किसी पार्टी के प्रति अंधभक्ति नहीं, बल्कि व्यावहारिक सोच का सवाल है। निरंतरता का अर्थ यह नहीं कि सरकार को खुली छूट दे दी जाए। इसका अर्थ है: जो अच्छा हुआ है, उसे आगे बढ़ाया जाए; जो गलत है, उसे सुधारा जाए।

देश बनाना कोई पांच साल का प्रोजेक्ट नहीं। यह पीढ़ियों का काम है। संस्थाएं और नीतियां बनने में साल लगते हैं, लेकिन उन्हें बिगाड़ने में ज्यादा वक्त नहीं लगता।

इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं कि कौन आएगा? सवाल यह भी है कि जो व्यवस्था बनी है, उसे कौन संभालेगा?

भारत को प्रयोगशाला बनाने से पहले यह देखना होगा कि प्रयोग की कीमत कौन चुकाएगा।

स्थिरता को बचाना जड़ता नहीं है। कभी-कभी यही सबसे समझदार बदलाव होता है; बिना व्यवस्था बदले, व्यवस्था को बेहतर बनाना

 हिमालय में  मंडराता खतरा

चीन की हरकतों से सावधान रहना होगा

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

29 अगस्त 2026

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26 अगस्त 2026 को नेपाल-तिब्बत (चीन) सीमा पर एक भयंकर बाढ़ और मिट्टी का सैलाब आया। ऊँचाई पर स्थित एक ग्लेशियर का हिस्सा टूटकर गिर गया। करीब 5,200 मीटर की ऊँचाई से बर्फ और चट्टान का बड़ा हिस्सा नीचे गिरा और ल्हेंदे नदी (नेपाल में भोटेकोशी) में जा गिरा। यह जगह रसुवागढ़ी-ग्यीरोंग सीमा चौकी से करीब 20 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में है। मलबा नदी को कुछ देर के लिए रोक दिया। फिर पानी, कीचड़ और पत्थरों का तेज सैलाब नीचे की तरफ दौड़ पड़ा।

इस आपदा ने नेपाल के रसुवा और नuwाकोट जिलों (जिसमें स्याब्रुबेसी शामिल है) और चीन के ग्यीरोंग काउंटी को प्रभावित किया। अब तक 160 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं और आंकड़ा बढ़ रहा है। दोनों तरफ सैकड़ों से लेकर एक हजार से ज्यादा लोग लापता बताए जा रहे हैं। इनमें कई विदेशी पर्यटक और तीर्थयात्री भी शामिल हैं। गाँव, पुल, सड़कें और कई निर्माण नष्ट हो गए। बचाव कार्य जारी है, लेकिन आगे बाढ़ का खतरा बना हुआ है।

यह सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा नहीं है। यह एक चेतावनी है। हिमालय दुनिया के सबसे कमजोर पहाड़ी क्षेत्रों में से एक है। चीन ने भारत और नेपाल की सीमा पर सड़कें, सैन्य ठिकाने, सुरंगें, बाँध और बिजली परियोजनाएँ बड़े पैमाने पर बनाई हैं। इन कामों से पहाड़ों की ढलानें, नदियों का रास्ता और मिट्टी का संतुलन बिगड़ा है। चीन ने वैज्ञानिकों की चेतावनियों और नीचे रहने वाले देशों पर पड़ने वाले असर को बार-बार कम करके आँका है।

1978 में मैंने टिहरी बाँध के विवाद पर लिखा था और हिमालय में बड़े बाँध बनाने के खतरों के बारे में चेतावनी दी थी। पानी, बिजली और विकास के फायदे तो हैं। लेकिन भूकंप वाले इलाके में और चीन की सीमा के पास इतने बड़े निर्माण के खतरे भी बहुत हैं। आलोचकों ने कहा था कि बड़ा भूकंप या कोई हादसा होने पर बाढ़ उत्तर भारत के मैदानों तक पहुँच सकती है। वही सवाल आज भी खड़ा है: क्या फायदे इतने बड़े खतरे के लायक हैं?

भूवैज्ञानिक लंबे समय से कहते आए हैं कि हिमालय पृथ्वी की पपड़ी का कमजोर और सक्रिय हिस्सा है। यहाँ लगातार उठान, दरारें और दबाव चल रहे हैं। ऊपरी शिवालिक की ढलानें चिकनी मिट्टी और रेत की वजह से अस्थिर हैं। बड़े निर्माण पहाड़ी पर्यावरण को नुकसान पहुँचा सकते हैं। पहाड़ों का तेज उठना और भूकंप की गतिविधि उनकी अस्थिरता को साफ दिखाती है। इसलिए इस इलाके में बड़े बाँध और जलाशय खास तौर पर खतरनाक हैं। ये बातें नई नहीं हैं। दशकों से वैज्ञानिक यही चेतावनी देते आए हैं।

चीन ने इन चेतावनियों को ज्यादातर नजरअंदाज किया है। शोधकर्ताओं ने बार-बार कहा है कि बाँध टूटने या ग्लेशियर झीलों के फटने से बड़ी तबाही हो सकती है। खुदाई, सुरंगें और बड़े जलाशय ढलानों को कमजोर कर सकते हैं और पानी के सिस्टम को बिगाड़ सकते हैं। फिर भी निर्माण काम चलते रहे, और नीचे वाले देशों को पूरी जानकारी कम ही दी गई। इस हफ्ते ग्लेशियर टूटा तो सैलाब ऐसे इलाके से गुजरा जहाँ पहले से काफी बदलाव हो चुके थे। तात्कालिक कारण प्राकृतिक लगता है: बर्फ और चट्टान का गिरना। लेकिन इतने बड़े निर्माण से पूरे इलाके का खतरा बढ़ जाता है। छोटे बदलाव भी यहाँ बड़ी तबाही ला सकते हैं।

पूर्व में भी यही रवैया दिखता है। चीन ब्रह्मपुत्र (यारलुंग त्सांगपो) पर एक बहुत बड़ा बाँध बना रहा है, जो थ्री गॉर्जेस बाँध से भी बड़ा होगा। उस जगह के पास सक्रिय दरार भी पाई गई है। अगर भूकंप या कोई और हादसा हुआ तो पूर्वोत्तर भारत और बांग्लादेश के बड़े हिस्से बाढ़ की चपेट में आ सकते हैं। नीचे वाले देशों ने चिंता जताई है, लेकिन चीन निर्माण जारी रखे हुए है और खतरों की बात को कम करके बता रहा है।

26 अगस्त की यह आपदा सिर्फ स्थानीय घटना नहीं है। यह एक साफ चेतावनी है। चीन की तेज रफ्तार वाली ऊँचाई वाली परियोजनाओं ने इस कमजोर पहाड़ी क्षेत्र में खतरा बढ़ा दिया है। वैज्ञानिकों और नीचे रहने वाले लोगों की चेतावनियों को कम आँककर, और अपनी महत्वाकांक्षा को प्राथमिकता देकर, चीन ने और बड़ी घटनाओं की संभावना बढ़ा दी है। जलवायु परिवर्तन से ग्लेशियर पहले से कमजोर हो रहे हैं। गलत जगह पर भारी निर्माण इस खतरे को और बढ़ा देता है।

क्षेत्रीय सरकारों, वैज्ञानिक संस्थाओं और नीचे रहने वाले लोगों को चीन की परियोजनाओं की पूरी जानकारी चाहिए। ग्लेशियर झीलों और कमजोर ढलानों की स्वतंत्र निगरानी जरूरी है। सबसे ज्यादा खतरे वाले इलाकों में और बड़े निर्माण पर लगाम लगानी होगी। वरना ऐसी तबाही बार-बार हो सकती है। इस हफ्ते मारे गए लोगों और उजड़े गाँवों को सिर्फ प्राकृतिक हादसा मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। ये उन फैसलों का नतीजा हैं जो ऐसे पहाड़ों में लिए गए जहाँ अस्थिरता की चेतावनी पीढ़ियों से दी जा रही है; और जिन्हें अभी भी नजरअंदाज किया जा रहा है।

Thursday, August 27, 2026

 बदलाव की दहलीज पर आगरा: ताज के साये से विकास के नए क्षितिज तक

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बृज खंडेलवाल द्वारा  

28 अगस्त 2026

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आगरा शायद अब खुद को भी चौंकाने की तैयारी में है। सदियों से यह शहर एक खूबसूरत मगर कठिन दुविधा में जीता आया है। ताजमहल ने आगरा को दुनिया भर में शोहरत दी, लेकिन उसी ताज की हिफाजत के नाम पर औद्योगिक विकास पर तरह-तरह की पाबंदियां भी लगती रहीं। कारखाने शक की निगाह से देखे गए, नए प्रोजेक्ट्स को मंजूरियों के जंगल से गुजरना पड़ा और हर बड़ी योजना फाइलों, समितियों, एनओसी व अदालतों के चक्कर काटती रही।

अब यह तस्वीर बदलती दिख रही है। जुलाई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने ताज ट्रेपेजियम जोन (लगभग 10,400 वर्ग किमी) में दो साल पुराना व्यापक प्रतिबंध हटाया। कोर्ट ने गैर-प्रदूषणकारी सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के करीब 400 लंबित आवेदनों पर टीटीजेड प्राधिकरण को विशेषज्ञ निगरानी (नीरी व सीईसी के प्रतिनिधियों की सहमति) के साथ आगे बढ़ने की अनुमति दी। इससे पर्यावरण मानकों के भीतर स्वच्छ उद्योगों के लिए रास्ता खुला है। विधानसभा चुनाव (अपेक्षित फरवरी-मार्च 2027) से पहले अगले महीने-वर्ष आगरा के इतिहास में निर्णायक साबित हो सकते हैं। कई परियोजनाएं पूरी होने के करीब हैं, अनेक निर्माणाधीन हैं और कई पाइपलाइन में हैं।

असली सवाल विकास और विरासत के बीच संतुलन साधने का है। आगरा को धुआं उगलती चिमनियां नहीं चाहिएं; उसे चाहिए स्वच्छ उद्योग, नई तकनीक, सेवा क्षेत्र, पर्यटन आधारित कारोबार और आधुनिक मैन्युफैक्चरिंग। ताज की हिफाजत भी जरूरी है और आगरा के नौजवानों को रोजगार भी।

आगरा की आर्थिक बुनियाद पहले से मजबूत है। यह देश के सबसे बड़े पर्यटन केन्द्रों में शामिल है। जूता उद्योग, संगमरमर की जड़ाई, हस्तशिल्प, कालीन, फाउंड्री, कांच के सामान और पेठा जैसे छोटे-मझोले कारोबार यहां की पुरानी पहचान हैं। शिक्षा क्षेत्र भी फैल रहा है। भौगोलिक स्थिति इसकी बड़ी ताकत है; दिल्ली, जयपुर, ग्वालियर, लखनऊ से सड़क-रेल कनेक्टिविटी शानदार है। यमुना एक्सप्रेसवे और अन्य मार्गों ने यात्रा का नक्शा बदल दिया है।

सबसे बड़ा बदलाव आगरा मेट्रो ला रही है। ताज ईस्ट गेट से मनकामेश्वर (करीब 6 किमी) प्राथमिक खंड मार्च 2024 से संचालित है। मनकामेश्वर से आईएसबीटी तक ट्रायल और सीएमआरएस निरीक्षण अगस्त 2026 में सफल रहे। कॉरिडोर-1 (सिकंदरा से ताज ईस्ट गेट, 14.25 किमी) नवंबर 2026 में पूर्ण संचालन के लक्ष्य पर है; सिकंदरा से ताज तक यात्रा समय घटकर करीब 28 मिनट रह जाएगा। कॉरिडोर-2 (आगरा कैंट से कालिंदी विहार) पर भी निर्माण तेज है। कभी तांगे-रिक्शे और जाम की पहचान वाला शहर आधुनिक जन परिवहन के युग में प्रवेश कर रहा है।

हवाई अड्डे का नया सिविल टर्मिनल भी उम्मीद जगा रहा है। अगस्त 2026 तक करीब 70 प्रतिशत काम पूरा; 30 नवंबर 2026 तक हैंडओवर का लक्ष्य। क्षमता बढ़कर लगभग 1400 यात्रियों तक पहुंचेगी, मल्टीलेवल पार्किंग, एयरोब्रिज और आधुनिक सुविधाएं होंगी। बेहतर कनेक्टिविटी पर्यटकों को दिल्ली से दिनभर की यात्रा के बजाय दो-तीन दिन रुकने के लिए प्रेरित कर सकती है।

सड़कों पर चौड़ीकरण, फ्लाईओवर, रेलवे ओवरब्रिज, नए पुल और ड्रेनेज योजनाएं शहर की सूरत बदल रही हैं। यमुना पर मेट्रो पुल समेत कई पुलों का काम आगे बढ़ रहा है। ग्रेटर आगरा की टाउनशिप और अटल टाउनशिप योजनाएं भीड़भाड़ वाले पुराने शहर से बाहर विकास फैलाने की कोशिश हैं; कई टाउनशिप में प्लॉट आवंटन प्रक्रिया चल रही है।

शिल्पग्राम के पास यूनिटी मॉल (लगभग 128 करोड़ रुपये) उत्तर प्रदेश के ओडीओपी व जीआई टैग उत्पादों और पारंपरिक हस्तशिल्प को बड़ा बाजार दे सकता है। अगस्त 2026 तक करीब 42 प्रतिशत काम पूरा; नवंबर लक्ष्य है, हालांकि गति पर प्रशासनिक निगरानी बढ़ी है। पर्यटन अब सिर्फ ताजमहल तक सीमित नहीं रहना चाहिए। आगरा किला, फतेहपुर सीकरी, मेहताब बाग, बटेश्वर और ब्रज क्षेत्र मिलकर बड़ा सर्किट बना रहे हैं। हेरिटेज वॉक, होमस्टे और बेहतर सुविधाएं रुकने की अवधि बढ़ा सकती हैं।

छत्रपति शिवाजी महाराज म्यूजियम (पहले मुगल म्यूजियम का नाम बदला गया) तेज गति से तैयार हो रहा है; लक्ष्य 2026 का अंत। कोठी मीना बाजार में शिवाजी स्मारक (50 फुट प्रतिमा, म्यूजियम आदि) पर भी काम आगे बढ़ रहा है। स्वास्थ्य क्षेत्र में एसएन मेडिकल कॉलेज को मिनी एम्स स्तर पर विकसित किया जा रहा है: किडनी ट्रांसप्लांट शुरू, क्रिटिकल केयर यूनिट और अन्य ब्लॉक निर्माणाधीन; पूर्ण रूप 2027 तक अपेक्षित। लेडी लॉयल अस्पताल का विस्तार भी चल रहा है। साइंस पार्क व नक्षत्रशाला (लगभग 40 करोड़) भूमि संबंधी बाधाओं के बावजूद आगे बढ़ रहा है। कैलाश मंदिर का कायाकल्प चरणबद्ध तरीके से हो रहा है। हाईकोर्ट बेंच की मांग अभी भी लंबित है और अधिवक्ता आंदोलनरत हैं।

ताज के पास प्रस्तावित बैराज/रबर डैम वर्षों से एनओसी और अध्ययनों में अटका है; बजट आवंटित होने के बावजूद निर्माण शुरू नहीं हुआ। पर्यावरण संबंधी चिंताएं जायज हैं, मगर फाइलों को धूल खाने देना भी संरक्षण नहीं कहलाता। ब्यूरोक्रेसी की सुस्ती विकास की बड़ी बाधा बनी हुई है।

आगरा शहर की आबादी लाखों में है; मेट्रो क्षेत्र अनुमानित 25 लाख से अधिक। तेज बढ़ोतरी ने मकान, पानी, सीवर, सड़क, कचरा प्रबंधन और परिवहन पर दबाव डाला है। समाधान शहर की बढ़त रोकना नहीं, बल्कि समझदारी से बढ़ाना है।

अगले बारह महीने अहम हैं। मेट्रो का विस्तार, एयरपोर्ट टर्मिनल, नई सड़कें-पुल, टाउनशिप, पर्यटन परियोजनाएं और स्वच्छ उद्योगों पर नीतिगत फैसले मिलकर तकदीर बदल सकते हैं। आगरा चौराहे पर खड़ा है; एक रास्ता जाम, प्रदूषण और लालफीताशाही की तरफ; दूसरा स्वच्छ उद्योगों, बेहतर कनेक्टिविटी, रोजगार और आधुनिक विकास की ओर। अगर स्वच्छ उद्योग, आधुनिक बुनियादी ढांचा और पर्यावरण संरक्षण हमसफर बन जाएं, तो आगरा सिर्फ ताज का शहर नहीं, उत्तर भारत का बड़ा विकास केन्द्र बन सकता है।

Tuesday, August 25, 2026

 द ग्रेट समन्वय:

जब पूरब और पश्चिम की बनी खिचड़ी!

कितना भारतीय है आज का एवरेज इंडियन?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

27 अगस्त 2026

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देश भ्रमण के अनेक फायदे हैं। कूपमंडूकता और कई दृष्टि-भ्रम रास्ते में ही टूट जाते हैं। उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम निकलें, तो बहुत से पूर्वाग्रह अपने आप ध्वस्त होते चलते हैं।

खूबसूरती से बदल रहा है भारत।

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आसमान को छूती कांच की इमारतें खड़ी हैं। बाजू में पुराना हनुमान जी का मंदिर है।

इमारत के भीतर युवा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स और ग्लोबल मार्केट की बातें कर रहे हैं। बाहर कोई जूते उतारकर मंदिर की घंटी बजाता है और श्रद्धा से हाथ जोड़ लेता है।

किसी को यह विरोधाभास नहीं लगता। यही तो आज का भारत है।

बेंगलुरु, मुंबई, हैदराबाद, चेन्नई, गुरुग्राम या चंडीगढ़ चले जाइए। नज़ारा बदलता जाएगा, मगर कहानी एक ही मिलेगी। एक्सप्रेसवे, मेट्रो, चमचमाते एयरपोर्ट, शॉपिंग मॉल और गगनचुंबी इमारतें शहरों का चेहरा बदल रही हैं। मोबाइल फोन हाथ का हिस्सा बन गया है। डिजिटल पेमेंट ने बटुए की जगह ले ली है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस दफ्तरों, स्कूलों और घरों में दस्तक दे रही है।

भारत तेज़ी से भविष्य की ओर दौड़ रहा है। लेकिन अपना अतीत पीछे नहीं छोड़ रहा।

यहीं भारत की मौजूदा यात्रा की खूबसूरती है। यह केवल पश्चिमीकरण की कहानी नहीं है। न ही पुराने ज़माने में लौटने की ज़िद है।

यह दिलचस्प समन्वय है। पूरब की आत्मा और पश्चिम की आधुनिकता का संगम।

पुराने को कबाड़खाने में नहीं फेंका जा रहा। नए को आंख मूंदकर अपनाया भी नहीं जा रहा। भारत चुन रहा है, परख रहा है और फिर अपने रंग में ढाल रहा है।

हैदराबाद का रोहित अमेरिकी टेक्नोलॉजी कंपनी में काम करता है। दफ्तर में अंग्रेज़ी बोलता और नवीनतम तकनीक इस्तेमाल करता है। शाम को पूजा में शामिल होता है या परिवार के साथ त्योहार की तैयारी करता है। दोनों दुनिया उसके भीतर रहती हैं और आराम से साथ चलती हैं।

आज का भारतीय सिलिकॉन वैली की तरक्की से प्रभावित हो सकता है, मगर वाराणसी की गलियों से रिश्ता भी बनाए रखता है। वह क्वांटम फिजिक्स पढ़ सकता है और गीता में जीवन का अर्थ खोज सकता है। हवाई जहाज़ से सात समंदर पार जा सकता है, फिर भी गांव की मिट्टी नहीं भूलता।

एक ही मेज़ पर लैपटॉप और दीपक रखे हो सकते हैं। यही भारत का नया मिज़ाज है।

यह समन्वय अचानक पैदा नहीं हुआ।

भारत और पश्चिम के संपर्क ने अनेक संस्थागत बदलाव किए। औपनिवेशिक शासन शोषण और लूट से भरा था। फिर भी स्वतंत्र भारत ने कुछ आधुनिक संस्थाओं को अपनाया और लोकतांत्रिक उद्देश्यों के अनुसार ढाला।

संसदीय लोकतंत्र, स्वतंत्र न्यायपालिका, सिविल सर्विस, आधुनिक विश्वविद्यालय और लिखित कानून इसी प्रक्रिया का हिस्सा बने।

इन संस्थाओं ने आम आदमी के लिए नए रास्ते खोले।

कभी जन्म, जमीन और खानदान ही इंसान की हैसियत तय करते थे। आधुनिक शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं ने नए दरवाज़े खोले। साधारण परिवार का बच्चा विश्वविद्यालय पहुंच सकता था। गांव का लड़का या लड़की सरकारी नौकरी के लिए मुकाबला कर सकता था। नागरिक अदालत का दरवाज़ा खटखटा सकता था।

व्यवस्था आज भी मुकम्मल नहीं है। कमियां भी हैं, खामियां भी।

मगर ऊपर चढ़ने के लिए नई सीढ़ियां जरूर बनी हैं। एस्केलेटर्स भी हैं।

लोकतंत्र ने इस बदलाव में एक और ताकत जोड़ी।

मतपत्र ने उन लोगों को भी राजनीतिक महत्व दिया, जो सदियों तक सत्ता के गलियारों से दूर रहे। सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार ने करोड़ों लोगों को राष्ट्रीय संवाद में शामिल किया।

भारत ने लोकतंत्र को रेडीमेड मशीन की तरह नहीं अपनाया। उसने इसे अपने ढंग से भारतीय बनाया।

चुनाव जनभागीदारी के बड़े मेले बन गए। जाति, भाषा, क्षेत्र और समुदाय राजनीति में आए, लेकिन उनके साथ नई उम्मीदें और आकांक्षाएं भी आईं।

जिनकी आवाज़ पहले कमजोर थी, वे धीरे-धीरे मंच तक पहुंचने लगे।

पश्चिम से आया संस्थागत ढांचा भारतीय समाज की धड़कन से जुड़ गया।

सामाजिक सुधार की कहानी भी कुछ ऐसी ही रही।

स्वतंत्रता, समानता और अधिकारों के आधुनिक विचारों ने भारतीय चिंतकों को प्रभावित किया। मगर सुधार केवल बाहर से नहीं आया। समाज सुधारकों ने आधुनिक तर्क और अपनी नैतिक-धार्मिक परंपराओं, दोनों का सहारा लेकर कुरीतियों को चुनौती दी।

एक तरफ नए विचार थे। दूसरी तरफ अपनी जड़ें थीं। दोनों ने मिलकर बदलाव की जमीन तैयार की।

शिक्षा पूरब और पश्चिम के बीच सबसे मजबूत पुल बनी। आधुनिक स्कूलों और विश्वविद्यालयों ने वैज्ञानिक सोच, सवाल करने की आदत और व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया। अंग्रेज़ी, औपनिवेशिक विरासत के बावजूद, अनेक भाषाओं वाले देश में उपयोगी संपर्क भाषा बनी।

तमिलनाडु का वेंकटेश दिल्ली में काम कर सकता है। बिहार का इंजीनियर दिनेश चेन्नई में नौकरी पा सकता है। बंगाल का सुब्रतो बेंगलुरु में पढ़ सकता है।

आधुनिक संचार ने दूरी घटाई।

दूरी घटी तो अवसर बढ़े।

रेलवे, तार और डाक व्यवस्था पहले प्रशासनिक जरूरतों के लिए बनाई गई थीं। बाद में उन्होंने भारत के लोगों को एक-दूसरे से जोड़ दिया। विचार तेजी से फैले। अखबारों की पहुंच बढ़ी। राष्ट्रीय आंदोलन को नई ताकत मिली।

इतिहास भी कभी-कभी अजीब मज़ाक करता है। साम्राज्य के लिए बनी सुविधाएं राष्ट्रीय एकता की ताकत बन गईं।

आर्थिक आधुनिकता ने भी समाज का ढांचा बदला। उद्योग, व्यापार, बैंकिंग और शहरों में रोजगार ने पारंपरिक पेशों की दीवारें कमजोर कीं। बेटे को हमेशा पिता का काम नहीं करना पड़ा। बेटी को भी पुरानी सीमाओं में कैद रहना जरूरी नहीं रहा।

शिक्षा और रोजगार ने महिलाओं के लिए नए आसमान खोले। आर्थिक आत्मनिर्भरता, कानूनी अधिकार और पेशेवर अवसरों ने सामाजिक सोच बदली।

आधुनिकता ने जीवन का बाहरी ढांचा बदला। मगर भारत की सांस्कृतिक धड़कन कायम रही।

त्योहार आज भी कैलेंडर को रंग देते हैं। शादियां बड़े पारिवारिक आयोजन हैं। धार्मिक यात्राओं में युवाओं की भीड़ बढ़ रही है।

परंपरा गायब नहीं हुई। उसने अपग्रेड होना सीख लिया है।

दीवाली अब एलईडी की रोशनी में चमकती है। मंदिर की घंटियां मोबाइल कैमरे में कैद होती हैं। पूजा की सामग्री ऑनलाइन मंगाई जाती है। दर्शन के लिए ऐप से बुकिंग होती है। योग की कक्षाएं दुनिया भर में ऑनलाइन चल रही हैं। पुरानी परंपराएं डिजिटल युग में प्रवेश कर चुकी हैं।

मगर अपनी पहचान के साथ।

यह बदलाव है। यह अनुकूलन है।

भारत की सभ्यता हमेशा विचारों के आदान-प्रदान से समृद्ध हुई है। बाहर से आई चीजों को उसने जस का तस स्वीकार नहीं किया। उन्हें अपनी जरूरतों और संस्कारों के अनुसार ढाला।

आज का दौर उसी लंबी प्रक्रिया का नया अध्याय है। पश्चिम ने विज्ञान, तकनीक और आधुनिक संस्थाओं के शक्तिशाली औजार दिए। कानून, प्रशासन और लोकतांत्रिक भागीदारी के नए तरीके दिए।

भारतीय परंपरा ने परिवार, कर्तव्य, समुदाय और नैतिक जिम्मेदारी के विचारों को मजबूत रखा।

एक ने प्रगति का रास्ता दिखाया।

दूसरी ने पूछा—प्रगति किसके लिए और किस दिशा में?

यही सवाल आज पहले से अधिक महत्वपूर्ण है।

कोई समाज तकनीकी रूप से बहुत आगे बढ़ सकता है, मगर भीतर से खाली हो सकता है। वह अमीर हो सकता है, मगर अकेला भी। व्यक्तिगत आज़ादी हो सकती है, मगर सामुदायिक रिश्ते कमजोर पड़ सकते हैं।

भारत का परिवार और समाज से जुड़ाव केवल रूढ़िवाद नहीं है। यह इंसानी रिश्तों को बचाए रखने की कोशिश भी है। बेशक, हर परंपरा आलोचना से ऊपर नहीं हो सकती।

जो परंपरा इंसान की गरिमा या समानता को चोट पहुंचाती है, उस पर सवाल उठना चाहिए। केवल पुरानी होने से कोई बात पवित्र नहीं हो जाती।

उसी तरह, केवल नया और विदेशी होने से हर विचार श्रेष्ठ नहीं बन जाता।

असली समझ संतुलन में है।

भारत के सामने चुनौती है कि वह अपनी विरासत की श्रेष्ठ चीजों को बचाए और आधुनिक ज्ञान को खुले मन से अपनाए।

पूरब और पश्चिम किसी जंग के मैदान में आमने-सामने खड़े नहीं हैं। वे अब एक ही चौराहे पर मिल रहे हैं। एक के पास पुरानी स्मृतियां, सांस्कृतिक निरंतरता और आध्यात्मिक अनुभव हैं।

दूसरे के पास आधुनिक संस्थाएं, वैज्ञानिक ज्ञान और तकनीकी शक्ति है। दोनों मिलकर नया भारतीय समन्वय रच रहे हैं।

भारत शायद दुनिया को यही दिखा रहा है कि आधुनिक बनने का मतलब सांस्कृतिक समर्पण नहीं है। परंपरा का अर्थ ठहराव भी नहीं है।

कोई देश कल की ओर देख सकता है, बिना अपनी सदियों पुरानी स्मृतियों को मिटाए।

शायद यही भारत की आधुनिक यात्रा का सबसे बड़ा सबक है।

भविष्य बनाने के लिए हमेशा अतीत को जलाना जरूरी नहीं।

कभी-कभी भविष्य की सबसे मजबूत इमारत उसी नींव पर खड़ी होती है, जिसमें अतीत की अच्छी ईंटें भी लगी हों।

भारत पीछे नहीं जा रहा।

वह आंख मूंदकर पश्चिम की ओर भी नहीं दौड़ रहा।

वह अपने रास्ते पर आगे बढ़ रहा है।

और इस यात्रा में पूरब और पश्चिम प्रतिद्वंद्वी नहीं हैं।

वे भारत के नए युग के दो साथी हैं।

 गिफ्ट का सूट, जूतों की लूट और पत्रकारों की जलवा-ए-फ़ज़ीहत!

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खरांची से बृज खंडेलवाल द्वारा 

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दक्षिण प्रांत के पाजीपुर कस्बे की यह दास्तान पत्रकारिता के इतिहास में सुनहरे अक्षरों से नहीं, बल्कि रेडीमेड सूट के कपड़े पर कढ़ाई करके लिखी जानी चाहिए।

हुआ यूँ कि एक बड़ी रेडीमेड वस्त्र कंपनी ने अपना शानदार शोरूम खोला। उद्घाटन पर पत्रकारों को खास तौर पर दावत दी गई। पत्रकार भी कैमरे, कलम और उम्मीदों की बड़ी-बड़ी जेबें लेकर तशरीफ ले आए।

कार्यक्रम खत्म हुआ तो राज़ खुला।

गिफ्ट में थे सिर्फ आठ सूट।

मगर पत्रकार थे पूरे बाईस।

बस हुज़ूर, फिर क्या था!

प्रेस फ्रीडम खतरे में पड़ गई। पत्रकारिता की अस्मिता पर हमला हो गया। ऐसा संकट आया, मानो किसी ने संपादकीय पन्ने की जगह साबुन का इश्तिहार छाप दिया हो।

कंजूस मालिक ने मासूमियत से पूछा, “कितने आदमी  थे?”

एक बुज़ुर्ग पत्रकार का ख़ून खौल उठा। “यह मीडिया की तौहीन है!” दूसरे ने दहाड़ लगाई, “आठ सूट और बाईस आदमी! जनाब, यह कैसा हिसाब है? यह गणित आपने किस मदरसे में पढ़ा?”

देखते ही देखते कांच की बोतलें हवा में उड़ने लगीं। उद्घाटन समारोह कम और आईपीएल का फाइनल ज्यादा लगने लगा। कुछ लोगों को मामूली चोटें भी आईं। अगले दिन शहर में कंपनी के शोरूम से ज्यादा चर्चा सूटों की हो रही थी।

रविवार को लोकल प्रेस क्लब की हंगामी बैठक बुलाई गई।

चेहरे गंभीर थे। आवाजें भारी थीं। माहौल में इंकलाब की खुशबू थी।

फैसला हुआ कि अब कोई पत्रकार गिफ्ट नहीं लेगा। गिफ्टबाजी का बहिष्कार होगा। और अगर कोई गिफ्ट देगा भी, तो प्रेस क्लब के सभी 213 सदस्यों को बराबर मिलेगा।

वाह! पत्रकारिता बच गई।

नैतिकता ने अंगड़ाई ली। उसूलों ने सीना फुलाया। सिद्धांतों ने खड़े होकर सलाम ठोंका।

फिर शादी का मौसम आ गया।

एक नेताजी के बड़े साहबज़ादे की शादी का निमंत्रण आया। प्रेस क्लब के पत्रकारों को बाकायदा कार्ड मिला। खुशियों की लहर दौड़ गई। किसी ने नया कुर्ता निकाला, किसी ने इत्र लगाया, किसी ने बरसों पुराना कैमरा चमकाया।

पंद्रह तारीख की शाम आंधी और बारिश ने बारातघर पर धावा बोल दिया। बिजली गुल। जनरेटर में डीजल खत्म। मोमबत्तियां जल रही थीं और लालटेनें अपनी आखिरी सरकारी नौकरी निभा रही थीं।

नेताजी खुद पत्रकारों की खातिरदारी में लगे थे।

तभी,

भक्क्काटा!

बिजली आ गई।

संगीत शुरू हुआ। जाम छलके। महफ़िल जवान हुई।

और फिर सबकी नजर एक ही दिशा में जम गई।

आठ पत्रकार।

आठों ने एक ही रंग के।

एक ही डिजाइन के।

एक ही कंपनी के सूट पहन रखे थे।

बाकी चौदह पत्रकारों की आंखों में शरारत चमक उठी।

“क्यों उमर भाई, आजकल फैशन में यूनिफॉर्म चल रहा है क्या?”

“ख़ां साहब, कहीं किसी जमींदार के अब्बाजान के मातम में तो नहीं गए थे?”

“सुना है, मुफ्त के कपड़े मिले थे उधर!”

बस जनाब, पार्टी का सारा लुत्फ़ गया तेल लेने।

आठों सूटधारी पत्रकार ऐसे खिसके, जैसे बिजली विभाग का बिल देखकर आम आदमी खिसकता है। कोई पंडाल के पीछे, कोई खाने की मेज के पास, कोई अंधेरे कोने में जाकर अपनी पत्रकारिता तलाशने लगा।

मगर किस्सा यहीं खत्म नहीं हुआ।

उधर, तुमकाडा जिले से खबर आई कि एक पत्रकार के दादाजी की शोकसभा में बड़ी तादाद में मीडिया वाले पहुंचे। मातमपुर्सी खत्म हुई, लोग बाहर निकले, तो जूते-चप्पलों का ऐसा महाभारत सामने था कि ईरान-अमेरिका भी शर्मिंदा हो जाएं।

दर्जनों जूते। एक ही रंग। एक ही ठप्पा। एक ही डिजाइन। एक ही कंपनी।

किसका कौन सा? पहचानने का कोई चांस नहीं।

तभी रैम्बो बाबू ने मंजर देखा। उनसे चुप रहा नहीं गया।

बोले, “क्यों बे! तुम सब जूते वाली फैक्ट्री में आग लगने की खबर कवर करने गए थे न?”

सन्नाटा।

ऐसा सन्नाटा कि अगर कोई पिन गिरती, तो शायद वही अपना जूता पहचान लेती।

फिर सब बगलें झांकने लगे।

आखिर लोकतांत्रिक फैसला हुआ, जिसके पैर में जो फिट हो जाए, वही उसका।

बस, फिर क्या था!

मीडिया वाले एक-एक करके निकल लिए। किसी के पैर में अपना जूता था, किसी के पैर में किसी और का। एक साहब का दायां जूता शायद उनका था, बायां किसी दूसरे अखबार का।

पत्रकारिता की इज्जत पीछे रह गई।

जूते आगे निकल गए।

व्याकुल दुनिया के संपादक ने इस तमाम फ़ज़ीहत पर गहरी सांस लेकर फरमाया:

“सबक सिर्फ इतना है कि मुफ्त का सूट हो या मुफ्त का जूता, मीडिया की पहचान छिपाए नहीं छिपती। कभी सभी के सूट एक जैसे होते हैं, कभी जूते। कभी घरों में एक जैसे शोपीस, बेडशीट, घड़ियां और क्रॉकरी बरामद होती हैं। गिफ्ट देने वाले भी वही घिसे-पिटे सामान बांटते रहते हैं, और बाकी दुनिया तमाशा देखकर ठहाके लगाती रहती है।”

आखिर पत्रकारिता का भी अपना एक उसूल है।

खबर चाहे अलग-अलग हो, मगर गिफ्ट सबको एक जैसा चाहिए