Monday, July 20, 2026

 फ्लैट संस्कृति की तरफ बढ़ रहे शहर

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उत्तर प्रदेश कब जागेगा?

फ्लैट खरीदारों को बिल्डरों और आरडब्ल्यूए की मनमानी से बचाना जरूरी

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

2 2 जुलाई, 2026

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घर हर इंसान का सबसे बड़ा सपना होता है। लोग पूरी उम्र की कमाई, भविष्य निधि, बैंक कर्ज और अपनी तमाम बचत लगाकर एक फ्लैट खरीदते हैं। उम्मीद रहती है कि अब परिवार को सुरक्षित और सुकून भरी ज़िंदगी मिलेगी। 

मगर उत्तर प्रदेश के हजारों अपार्टमेंटों में यह सपना धीरे-धीरे एक दर्दनाक हकीकत में बदलता जा रहा है। फ्लैट मिलने के बाद भी लोग राहत नहीं, बल्कि रोज़ नई परेशानियों, झगड़ों और कानूनी लड़ाइयों में उलझ जाते हैं।

भारत में फ्लैट या अपार्टमेंट मुख्य रूप से शहरी इलाकों की पहचान हैं और अभी भी देश के कुल आवासों में इनकी हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम है। शहरी क्षेत्रों में लगभग 31 प्रतिशत परिवार फ्लैटों में रहते हैं, जबकि छोटे शहरों में यह आंकड़ा करीब 24 प्रतिशत है। राष्ट्रीय स्तर पर केवल 10–15 प्रतिशत परिवार ही अपार्टमेंट में रहते हैं, क्योंकि अधिकांश लोग, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में, स्वतंत्र मकानों में रहते हैं। तेज़ी से बढ़ता शहरीकरण, जमीन की कमी, छोटे परिवार और आधुनिक सुविधाओं की बढ़ती मांग फ्लैट संस्कृति को बढ़ावा दे रहे हैं। भारत में हर वर्ष लगभग 12 से 15 लाख नए शहरी फ्लैट बनते हैं, लेकिन देशभर में फ्लैटों की कुल संख्या का कोई एकीकृत और अद्यतन सरकारी आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।

इस बीच कर्नाटक सरकार ने एक ऐसी पहल की है, जिससे दूसरे राज्यों को भी सबक लेना चाहिए। कर्नाटक अपार्टमेंट (ओनरशिप एंड मैनेजमेंट) एक्ट, 2026 का मसौदा तैयार किया गया है। इस कानून को बनाने से पहले राज्य की 500 से अधिक अपार्टमेंट एसोसिएशनों के प्रतिनिधियों से विस्तार से राय ली गई। मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के सामने फ्लैट मालिकों ने साफ कहा कि उन्हें मजबूत कानूनी सुरक्षा, पूरी पारदर्शिता और बिल्डरों की जवाबदेही चाहिए।

अब सवाल यह है कि उत्तर प्रदेश ऐसा कानून कब बनाएगा?

आगरा, मथुरा, वृंदावन, लखनऊ, नोएडा, गाजियाबाद, कानपुर और तेजी से बढ़ते दूसरे शहरों में लाखों लोग बहुमंजिला इमारतों में रह रहे हैं। लेकिन इन सोसाइटियों में रहने वाले परिवार अक्सर तीन तरफ़ा दबाव झेलते हैं। 

एक ओर बिल्डर हैं, जो फ्लैट बेचने के बाद अपनी जिम्मेदारी से किनारा कर लेते हैं। दूसरी ओर कई रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन यानी आरडब्ल्यूए हैं, जिनमें लोकतंत्र की जगह कुछ लोगों का कब्ज़ा बना रहता है। तीसरी ओर सरकारी एजेंसियां हैं, जो अक्सर तब तक सक्रिय नहीं होतीं, जब तक मामला अदालत या बड़े विरोध प्रदर्शन तक नहीं पहुंच जाता।

कई सोसाइटियों में वर्षों से निष्पक्ष चुनाव नहीं हुए हैं। वही लोग लगातार पदों पर बने रहते हैं। रखरखाव शुल्क हर साल बढ़ता जाता है, लेकिन खर्च का पूरा हिसाब निवासियों के सामने नहीं रखा जाता। ऑडिट या तो होता नहीं या फिर उसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाती। आम निवासी यह तक नहीं जान पाते कि उनकी मेहनत की कमाई आखिर खर्च कहां हो रही है।

मुसीबत यहीं खत्म नहीं होती। कई बिल्डर आरडब्ल्यूए बनने के बाद भी साझा सुविधाओं, कॉमन एरिया, रखरखाव निधि और जरूरी दस्तावेज समय पर नहीं सौंपते। इसका नुकसान सीधे फ्लैट मालिकों को उठाना पड़ता है। वे सालों तक अनिश्चितता में जीते रहते हैं।

दूसरी तरफ निर्माण की गुणवत्ता भी गंभीर चिंता का विषय है। कहीं छत टपकती है, कहीं दीवारों में दरारें पड़ जाती हैं। खराब पाइपलाइन, बिजली की अव्यवस्थित वायरिंग और दूसरी तकनीकी खामियां लोगों की सुरक्षा पर सवाल खड़े करती हैं। शिकायत करने पर बिल्डर अक्सर जिम्मेदारी लेने से बचते हैं।

रोजमर्रा की सुविधाओं का हाल भी कम खराब नहीं है। पानी की अनियमित आपूर्ति, बार-बार खराब होने वाली लिफ्ट, बंद पड़े सीसीटीवी कैमरे, कमजोर सुरक्षा व्यवस्था, कूड़े के ढेर और अग्निशमन के अधूरे इंतजाम कई सोसाइटियों की पहचान बन चुके हैं। पूजा स्थल,  क्लब हाउस, जिम, स्विमिंग पूल, पार्क और बच्चों के खेल मैदान का सपना दिखाकर फ्लैट बेचे जाते हैं, वे कई बार सिर्फ विज्ञापनों तक ही सीमित रह जाते हैं।

पार्किंग को लेकर भी विवाद लगातार बढ़ रहे हैं। कई जगह विज़िटर पार्किंग तक बेच दी जाती है। साझा जगहों पर कब्ज़ा हो जाता है और आए दिन झगड़े होते रहते हैं। शिकायत करने वाले लोगों को भी कई बार मानसिक दबाव या उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है।

सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि अलग-अलग कानूनों और नियमों के कारण अधिकार और जिम्मेदारियां साफ नहीं हैं। अदालतों में ऐसे हजारों मामले वर्षों तक लंबित रहते हैं। आम परिवार समय और पैसा दोनों गंवाता है, जबकि बड़े बिल्डर कानूनी पेचीदगियों का फायदा उठाते रहते हैं।

ऐसे में उत्तर प्रदेश को भी कर्नाटक की तर्ज पर एक व्यापक और प्रभावी अपार्टमेंट स्वामित्व एवं प्रबंधन कानून बनाने की जरूरत है। हर सोसाइटी में समयबद्ध और निष्पक्ष चुनाव अनिवार्य हों। आरडब्ल्यूए बनते ही बिल्डर सभी साझा संपत्तियां, रखरखाव निधि और जरूरी दस्तावेज तुरंत सौंपे। हर साल स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए और उसकी रिपोर्ट सभी निवासियों के लिए सार्वजनिक हो। बैठकों में ऑनलाइन भागीदारी की सुविधा भी हो, ताकि अधिक से अधिक लोग निर्णय प्रक्रिया में शामिल हो सकें।

भ्रष्टाचार उजागर करने वाले लोगों को कानूनी सुरक्षा मिले। शिकायतों का निपटारा महीनों में हो, वर्षों में नहीं। साथ ही नियामक संस्थाओं को ऐसे अधिकार दिए जाएं कि वे नियम तोड़ने वाले बिल्डरों और मनमानी करने वाले आरडब्ल्यूए पर भारी जुर्माना लगा सकें और जरूरत पड़ने पर उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई कर सकें।

भारत के शहर तेजी से अपार्टमेंट संस्कृति की ओर बढ़ रहे हैं। आने वाले वर्षों में करोड़ों परिवार बहुमंजिला इमारतों में रहेंगे। ऐसे में पुराने और बिखरे हुए कानून अब पर्याप्त नहीं हैं। समय की मांग है कि फ्लैट खरीदारों के अधिकारों को मजबूत कानूनी सुरक्षा मिले।

कर्नाटक ने इस दिशा में कदम बढ़ा दिया है। अब उत्तर प्रदेश सरकार, रेरा, नगर निकायों, आवास विकास संस्थाओं और उपभोक्ता मंचों को भी मिलकर ठोस फैसला लेना होगा।

फ्लैट मालिक कोई एहसान नहीं मांग रहे। उन्होंने अपने खून-पसीने की कमाई से घर खरीदा है। उन्हें सिर्फ वही हक चाहिए, जिसकी कीमत वे पहले ही चुका चुके हैं। आखिर घर सुकून की जगह होना चाहिए, अदालतों और विवादों का स्थायी मैदान नहीं। उत्तर प्रदेश जितनी जल्दी यह सच समझेगा, उतनी ही जल्दी लाखों परिवारों की जिंदगी आसान हो सकेगी।

Saturday, July 18, 2026

 


बिना मरीज के डॉक्टर!!!

शोध के कुली: नाम के आगे 'डॉ.' लगाने की दौड़ या ज्ञान की तलाश?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

20 जुलाई, 2026

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आजकल भारत में पीएचडी की बड़ी धूम है। हर साल करीब 30 से 35 हजार लोग डॉक्टरेट की डिग्री हासिल कर रहे हैं। विश्वविद्यालयों में शोधार्थियों (रिसर्च स्कॉलरों) की संख्या साढ़े तीन लाख के आसपास पहुँच चुकी है। कागज़ पर यह तस्वीर बहुत शानदार दिखती है। लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और ही कहानी सुनाती है।

पीएचडी का मक़सद नए विचार पैदा करना, देश की समस्याओं का हल ढूँढ़ना और समाज को आगे बढ़ाना था। अफ़सोस, कई जगह यह डिग्री सिर्फ़ नाम के आगे "डॉ." लगाने का ज़रिया बनकर रह गई है। ज्ञान की जगह दिखावा, गुणवत्ता की जगह संख्या और मौलिक सोच की जगह औपचारिकता ने ले ली है।

आज कई शोधार्थी खुद को शोधकर्ता नहीं, बल्कि "रिसर्च कुली" महसूस करते हैं। वे वर्षों तक मेहनत करते हैं, लेकिन सम्मान, मार्गदर्शन और सुरक्षा के बजाय उन्हें दबाव, अनिश्चितता और शोषण का सामना करना पड़ता है।

सबसे बड़ी बीमारी है "छापो या मिट जाओ" की संस्कृति। विश्वविद्यालयों और शिक्षकों के मूल्यांकन में शोध-पत्रों की संख्या को बहुत अहमियत दी जाती है। नतीजा यह हुआ कि अच्छी रिसर्च करने के बजाय ज़्यादा से ज़्यादा शोध-पत्र छापने की होड़ मच गई।

इस होड़ ने एक पूरा कारोबार खड़ा कर दिया है। पैसे देकर शोध-पत्र लिखवाना, नकली या घटिया पत्रिकाओं में उन्हें छपवाना और एक ही शोध को कई हिस्सों में बाँटकर अलग-अलग प्रकाशित करना आम बात बन गई है। ऐसे कई शोध-पत्र बाद में वापस भी लेने पड़े। इससे भारतीय शोध की साख  पर सवाल उठे हैं।

दुख की बात यह है कि इन शोधों का बड़ा हिस्सा न उद्योग के काम आता है, न किसानों के, न अस्पतालों के और न समाज के। वे सिर्फ़ विश्वविद्यालय की अलमारी या ऑनलाइन भंडार में धूल खाते रहते हैं।

एक और बड़ी समस्या है शोध-निर्देशक और शोधार्थी के बीच असमान ताक़त का रिश्ता। कई जगह मार्गदर्शक (गाइड) छात्रों पर इतना नियंत्रण रखते हैं कि उनका भविष्य पूरी तरह उन्हीं के हाथ में होता है।

कई संस्थानों से शिकायतें सामने आई हैं कि शोधार्थियों से निजी काम कराए जाते हैं। किसी से गाड़ी चलवाई जाती है, किसी से घरेलू काम करवाए जाते हैं। कई बार सेक्सुअल हरासमेंट की खबरें भी आई हैं। कहीं थीसिस पास कराने के बदले महंगे तोहफ़ों या नक़द की माँग तक के आरोप लगे। जो छात्र विरोध करे, उसकी थीसिस महीनों या वर्षों तक अटक सकती है। यह रिश्ता गुरु-शिष्य का कम और मालिक-मज़दूर का ज़्यादा लगता है।

देश के बड़े और प्रतिष्ठित संस्थान भी इस बीमारी से पूरी तरह अछूते नहीं हैं। लंबे कार्य घंटे, सप्ताह में सत्तर-अस्सी घंटे लैब में रहने का दबाव और लगातार प्रदर्शन साबित करने की मजबूरी ने अनेक शोधार्थियों को मानसिक तनाव की तरफ़ धकेला है।

पीएचडी का सफ़र वैसे ही आसान नहीं होता। कम छात्रवृत्ति, भविष्य की अनिश्चितता, अकेलापन और लगातार दबाव कई छात्रों को चिंता और अवसाद की ओर ले जाता है। बहुत-से विश्वविद्यालयों में मानसिक स्वास्थ्य की समुचित सुविधा भी उपलब्ध नहीं है।

डिग्री पूरी होने के बाद भी तस्वीर बहुत उत्साहजनक नहीं है। हर साल हज़ारों नए पीएचडी धारक नौकरी की तलाश में निकलते हैं। लेकिन विश्वविद्यालयों में स्थायी पद सीमित हैं और उद्योग जगत अभी भी शोधकर्ताओं का पूरा उपयोग नहीं कर पा रहा है।

नतीजा यह होता है कि अनेक पीएचडी धारक अतिथि शिक्षक, अस्थायी व्याख्याता या अपनी योग्यता से बिल्कुल अलग काम करने को मजबूर हो जाते हैं। वर्षों की मेहनत के बाद भी उन्हें वह सम्मान और अवसर नहीं मिलता जिसकी उन्होंने उम्मीद की थी।

भारत में पेटेंट की संख्या बढ़ी है, लेकिन उनमें से बहुत कम तकनीक बाज़ार तक पहुँच पाती है। कुछ आईआईटी, आईआईएससी और चुनिंदा संस्थानों को छोड़ दें, तो अधिकांश विश्वविद्यालयों का शोध प्रयोगशाला से बाहर निकल ही नहीं पाता। उसका लाभ न उद्योग को मिलता है और न आम नागरिक को।

यही वजह है कि डिग्रियाँ बढ़ रही हैं, लेकिन नवाचार (इनोवेशन) उसी रफ़्तार से नहीं बढ़ रहा। शोध का उद्देश्य समस्या का समाधान होना चाहिए, केवल शोध-पत्रों की गिनती नहीं।

सरकार ने अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फ़ाउंडेशन (एएनआरएफ), उद्योग से जुड़े पीएचडी कार्यक्रम और बेहतर वित्तीय सहायता जैसी कई पहल शुरू की हैं। ये अच्छी शुरुआत हैं, लेकिन पूरे तंत्र को बदलने के लिए अभी लंबा सफ़र तय करना बाकी है।

ज़रूरत इस बात की है कि शोध-निर्देशकों की जवाबदेही तय हो, छात्रों को सम्मानजनक माहौल मिले, मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान दिया जाए और विश्वविद्यालयों तथा उद्योगों के बीच मज़बूत साझेदारी बने। सबसे ज़रूरी यह है कि शोध का लक्ष्य देश की असली समस्याओं का हल निकालना हो।

भारत को केवल आँकड़ों में सबसे ज़्यादा पीएचडी नहीं चाहिए। देश को ऐसे शोध चाहिए जो खेतों की पैदावार बढ़ाएँ, अस्पतालों को बेहतर बनाएँ, कारखानों को नई तकनीक दें, रोज़गार पैदा करें और लोगों का जीवन आसान बनाएँ।

जब तक पीएचडी केवल प्रतिष्ठा (शोहरत) का तमगा बनी रहेगी, तब तक शोधार्थी ज्ञान के निर्माता नहीं, बल्कि व्यवस्था के "शोध के कुली" बने रहेंगे। डिग्री की असली कीमत उसके काग़ज़ में नहीं, बल्कि उससे पैदा होने वाले बदलाव में होती है। वही बदलाव भारत की सबसे बड़ी ज़रूरत है।


Friday, July 17, 2026

 पौराणिक कहानियां क्यों लुभाती हैं?

क्या है मिथकों का मिथक?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

19 जुलाई 2026

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सिनेमा हॉल में सन्नाटा पसरा है। विशाल पर्दे पर देवता और असुर आमने-सामने खड़े हैं। तलवारें चमकती हैं, शंख गूंजते हैं, आकाश में दिव्य अस्त्र बरसते हैं। जैसे ही धर्म की जीत होती है और राक्षस धराशायी होता है, पूरा हॉल तालियों और जयघोष से गूंज उठता है। कई दर्शकों की आंखें नम हैं। यह केवल एक फिल्म का अंत नहीं, बल्कि भीतर दबे डर, उम्मीद और न्याय की चाह का विस्फोट है। सदियों से इंसान ऐसी ही कहानियों में अपने मन का बोझ हल्का करता आया है।

फिल्म खत्म होती है, लेकिन कहानी नहीं। वही दर्शक घर लौटकर अपने बच्चों को भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार, राम की विजय या कृष्ण की लीलाएं सुनाते हैं। कर्नाटक के एक छोटे-से गांव में बरगद के नीचे बैठा एक बूढ़ा किस्सागो भी यही कर रहा है। वह राजा मनु और महाप्रलय की कथा सुनाता है। यही कहानी बाइबिल के नूह और मेसोपोटामिया के उत्नापिष्टिम की दास्तानों में भी सुनाई देती है। हज़ारों साल और हज़ारों किलोमीटर का फ़ासला मिट जाता है। कहानी वही रहती है, सिर्फ़ किरदार बदल जाते हैं. 

इंसान हमेशा से कहानियों का दीवाना रहा है। यही किस्से दुनिया के अलग-अलग मुल्कों और सदियों को एक धागे में पिरो देते हैं।

पौराणिक कथाएँ सिर्फ़ देवताओं, राक्षसों और चमत्कारों की पुरानी दास्तानें नहीं हैं। ये ज़िंदगी और मौत, नेकी और बुराई, उम्मीद और रहस्य को समझने का ज़रिया हैं। जब विज्ञान के पास जवाब नहीं थे, तब मिथकों ने इंसान को मायने दिए। हर सभ्यता ने ऐसे सवालों का जवाब खोजने के लिए अपनी कथाएँ गढ़ीं : हम यहाँ क्यों हैं? मौत के बाद क्या होता है? हमें कैसी ज़िंदगी जीनी चाहिए?

मिथक किसी भी समाज की सोच, आस्था और तहज़ीब की बुनियाद होते हैं। सदियों तक ये कहानियाँ आग के अलाव के पास बैठकर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक सुनाई जाती रहीं। बाद में इन्हें लिखा गया। इनमें कल्पना और प्रतीक ज़रूर हैं, लेकिन इनके भीतर इंसानी फ़ितरत और समाज की गहरी सच्चाइयाँ छिपी हैं। इनका असर धर्मों पर भी साफ़ दिखाई देता है।

मनोवैज्ञानिक कार्ल युंग का मानना था कि मिथक इंसान के "सामूहिक अवचेतन" से जन्म लेते हैं। यानी कुछ भावनाएँ और प्रतीक ऐसे हैं जो पूरी इंसानियत में साझा हैं। इसलिए दुनिया के अलग-अलग हिस्सों की कहानियाँ एक जैसी लगती हैं। जनचिंतक पारस नाथ झा कहते हैं कि मिथक हमें केवल कल्पना नहीं, बल्कि इंसानी अनुभव का आईना दिखाई देते हैं।

मिथकों का एक बड़ा मक़सद इंसान को सही रास्ता दिखाना भी है। देवताओं और नायकों की कहानियाँ साहस, ईमानदारी, दया और त्याग की सीख देती हैं। वहीं लालच, घमंड और जलन जैसी बुराइयों से आगाह करती हैं। स्वर्ग, नरक और परलोक की कथाएँ लोगों को नेक और मक़सद भरी ज़िंदगी जीने की प्रेरणा देती हैं।

हैरानी की बात यह है कि दुनिया की दूर-दराज़ सभ्यताओं में भी कई मिथक लगभग एक जैसे हैं, जबकि उनका आपस में कोई सीधा संपर्क नहीं था। महाप्रलय की कहानी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। हिंदू धर्म में विष्णु मनु को बचाते हैं, बाइबिल में नूह अपनी नाव से जीवन बचाते हैं और मेसोपोटामिया में उत्नापिष्टिम यही भूमिका निभाते हैं। ऐसी कथाएँ यूनान, चीन, ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों और माया सभ्यता में भी मिलती हैं। शायद ये किसी प्राचीन प्राकृतिक आपदा की याद हैं या फिर पानी के प्रति इंसान के साझा डर और सम्मान की अभिव्यक्ति।

एक और साझा विषय है; अराजकता से सृष्टि का जन्म। मिस्र की कथाओं में आदिकालीन जल से सूर्य देव प्रकट होते हैं। बेबीलोन की कथा में एक देवी के शरीर से धरती बनती है। यूनानी और हिंदू परंपराएँ भी बताती हैं कि व्यवस्था अव्यवस्था से पैदा हुई। यह यात्रा इंसान के भ्रम से समझ तक पहुँचने की कहानी भी है।

मिथकों के देवता अक्सर इंसानी समाज का ही प्रतिबिंब होते हैं। जैसे समाज में राजा, योद्धा और मेहनतकश होते हैं, वैसे ही देवताओं की भी अलग-अलग ज़िम्मेदारियाँ होती हैं। यूनानी कथाओं में ज़्यूस आकाश के, पोसाइडन समुद्र के और हेडीज़ पाताल के स्वामी हैं। हिंदू परंपरा में इंद्र वर्षा के देवता हैं, अग्नि अग्नि के और विष्णु सृष्टि के पालनकर्ता। इन कथाओं ने प्राचीन समाज को व्यवस्था, सत्ता और ज़िम्मेदारी समझने में मदद की।

अधिकांश मिथकों में एक संघर्ष हमेशा दिखाई देता है: व्यवस्था और अराजकता का। देवता और असुर, रोशनी और अंधेरा, नेकी और बुराई आमने-सामने खड़े होते हैं। यह केवल रोमांच नहीं, बल्कि इंसान के भीतर और समाज में चलने वाली जद्दोजहद का प्रतीक है।

आज हम पहले जैसी नई पौराणिक कथाएँ नहीं गढ़ते। लेकिन सुपरहीरो फ़िल्में, स्टार वॉर्स, अंतरिक्ष यात्राओं की कहानियाँ और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की दास्तानें उसी परंपरा का नया रूप हैं। विज्ञान ने बिजली, बादल और बाढ़ के रहस्यों को समझा दिया है, लेकिन इंसान की कल्पना और अर्थ की तलाश अब भी ज़िंदा है। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने साझा किस्सों की जगह अलग-अलग डिजिटल दुनिया बना दी है।

पौराणिक फ़िल्में आज इस आकर्षण की सबसे बड़ी मिसाल बन गई हैं। रामायण, महाभारत और यूनानी कथाओं पर बनी फ़िल्में दुनिया भर में करोड़ों दर्शकों को खींचती हैं। इनके विशाल दृश्य, असाधारण नायक और कर्तव्य, त्याग तथा नियति जैसे विषय लोगों को आज भी बाँध लेते हैं।

जेम्स कैमरून की अवतार इसका बेहतरीन उदाहरण है। पेंडोरा की चमकती दुनिया, अद्भुत जीव-जंतु और प्रकृति से गहरा आध्यात्मिक रिश्ता दर्शकों को एक नई, लेकिन बेहद परिचित दुनिया में ले जाते हैं। यह फ़िल्म बताती है कि इंसान आज भी प्रकृति और ब्रह्मांड के साथ अपना रिश्ता तलाशना चाहता है।

विज्ञान के इस दौर में भी इंसान केवल तथ्यों से संतुष्ट नहीं होता। उसे ज़िंदगी का मतलब चाहिए। जलवायु संकट, तेज़ी से बदलती तकनीक और अनिश्चित भविष्य के बीच हम प्रेरणादायक अंतरिक्ष यात्रियों, सच बोलने वाले नायकों और धरती को जीवित माँ मानने वाली कहानियों की ओर लौटते हैं। इन्हीं में हमें उम्मीद और मक़सद मिलता है।

बरगद के नीचे बैठा वह बूढ़ा किस्सागो शायद यह बात बिना किसी किताब के समझता है। उसकी सुनाई महाप्रलय की कहानी आज के बच्चों को हज़ारों साल पुराने अपने पुरखों से जोड़ देती है। विज्ञान हमें बताता है कि दुनिया कैसे चलती है, लेकिन कहानियाँ हमें समझाती हैं कि यह दुनिया हमारे लिए क्यों मायने रखती है। जब तक इंसान रहेगा, मिथक भी रहेंगे। क्योंकि कहानी कहना और सुनना हमारी फ़ितरत का हिस्सा है।

Wednesday, July 15, 2026

 जब सड़कों पर इंसानों से ज़्यादा जानवरों का राज हो जाए

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बेकाबू आवारा कुत्ते, बंदरों के हमले और सड़कों पर घूमते मवेशी ताज नगरी की रफ्तार और लोगों की सुरक्षा पर भारी पड़ रहे हैं

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

17 जुलाई 2026

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सुबह की पहली किरण ताजमहल पर पड़ने से पहले ही आगरा के लोग अपने घरों से निकलते हैं। लेकिन अब उनकी पहली चिंता ट्रैफिक नहीं, बल्कि सड़क पर खड़े या दौड़ते जानवर होते हैं। दयालबाग, कमला नगर, शाहगंज, ताजगंज, सिकंदरा, बल्केश्वर और ट्रांस यमुना कॉलोनियों तक एक जैसा मंजर दिखाई देता है।

कहीं आवारा कुत्तों के झुंड राहगीरों का पीछा करते हैं। कहीं बंदर छतों और बालकनियों पर नज़र गड़ाए बैठे रहते हैं। यमुना किनारा रोड पर भैंसों और गायों के झुंड सड़क को अपना चारागाह समझ लेते हैं। ऐसा लगता है मानो शहर की सड़कें अब इंसानों की नहीं रहीं।

ताजमहल के कारण दुनिया भर में पहचान रखने वाले इस शहर के लिए यह सिर्फ असुविधा नहीं, बल्कि एक गंभीर नागरिक संकट बन चुका है। अस्पतालों, वाहन चालकों, स्कूली बच्चों और सुबह टहलने वालों के लिए हर दिन एक नई परीक्षा बन गया है।

डराने वाले आंकड़े

सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि आगरा में 90 हजार से अधिक आवारा कुत्ते और लगभग 60 हजार पालतू कुत्ते हैं। हर दिन करीब 300 लोग कुत्तों के काटने का शिकार होते हैं। यह संख्या कई बड़े महानगरों से भी अधिक है।

दिल्ली जैसे विशाल शहर में छह महीने के दौरान जितने डॉग बाइट के मामले दर्ज हुए थे, आगरा में लगभग उतने मामले कुछ ही दिनों में सामने आ जाते हैं। यह तुलना बताती है कि ताज नगरी की समस्या कितनी गंभीर हो चुकी है।

गांधी नगर क्षेत्र के एक वरिष्ठ चिकित्सक बताते हैं कि उनके पास आने वाले अधिकांश पीड़ित 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चे होते हैं। कई बच्चे खेलते समय या कुत्तों को खाना खिलाते हुए घायल हो जाते हैं। निजी क्लीनिकों में ही रोज़ सौ से अधिक मरीज पहुंचते हैं। जिला अस्पताल और अन्य स्वास्थ्य केंद्रों पर अलग से भारी दबाव रहता है।

नगर निगम भी बेबस

नगर निगम के अधिकारी मानते हैं कि मौजूदा संसाधनों से इतनी बड़ी संख्या में कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण करना आसान नहीं है। अभियान चल रहे हैं, लेकिन उनकी रफ्तार समस्या के मुकाबले बहुत धीमी है।

इसी कारण अब पूरे शहर में बड़े स्तर पर नसबंदी और वैक्सीनेशन का काम किसी निजी एजेंसी को सौंपने की योजना बनाई जा रही है। लेकिन लोगों का सवाल है कि जब वर्षों से करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं, तब भी हालात क्यों नहीं बदले?

सिर्फ कुत्ते ही नहीं

मुसीबत केवल आवारा कुत्तों तक सीमित नहीं है। मंदिरों, बाजारों और ताजमहल के आसपास बंदरों का आतंक लगातार बढ़ रहा है। वे बच्चों के हाथ से टिफिन छीन लेते हैं, बुजुर्गों के चश्मे और मोबाइल उठा ले जाते हैं। कई पर्यटक भी उनका शिकार बन चुके हैं।

उधर यमुना किनारा रोड पर शाम के समय नदी से लौटते भैंसों और गायों के झुंड पूरी सड़क घेर लेते हैं। दोपहिया और चारपहिया वाहन किसी तरह रास्ता निकालते हैं। कई बार दुर्घटनाएं होते-होते बचती हैं।

रात का समय सबसे खतरनाक होता है। अंधेरे में काले रंग के मवेशी सड़क पर दिखाई नहीं देते। बाइक सवार अक्सर उनसे टकरा जाते हैं। कई हादसों में लोगों को गंभीर चोटें भी आई हैं।

बदल गई है शहर की दिनचर्या

जो पार्क कभी बुजुर्गों की हंसी और बच्चों की खिलखिलाहट से गूंजते थे, वहां अब डर का माहौल है। सुबह की सैर करने वाले लोग बताते हैं कि कुत्तों के झुंड उनका पीछा करते हैं। कई लोगों ने अपनी सैर का समय घटा दिया है।

माता-पिता अब छोटे बच्चों को अकेले बाहर खेलने भेजने से घबराते हैं। स्कूल जाते समय भी बच्चों के साथ किसी बड़े का होना ज़रूरी समझा जाने लगा है।

देशभर की चिंता, आगरा की चुनौती

देश के कई शहरों में आवारा जानवरों की समस्या बढ़ रही है। मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने भी साफ कहा कि नागरिकों को बिना भय के सार्वजनिक स्थानों पर चलने का संवैधानिक अधिकार है। अदालत ने भीड़भाड़ वाले इलाकों से आवारा कुत्तों को हटाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया और स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी तय की।

अब ठोस कार्रवाई की जरूरत

रिवर कनेक्ट अभियान से जुड़े कार्यकर्ताओं का कहना है कि आगरा केवल स्थानीय लोगों का शहर नहीं, बल्कि करोड़ों पर्यटकों की मंज़िल भी है। यदि सड़कों पर असुरक्षा का माहौल बना रहेगा तो शहर की छवि और पर्यटन, दोनों प्रभावित होंगे।

समाधान आधे-अधूरे उपायों से नहीं निकलेगा। बड़े पैमाने पर नसबंदी और टीकाकरण, छोड़े गए मवेशियों के पुनर्वास, बंदरों के वैज्ञानिक प्रबंधन और लापरवाह पशु मालिकों पर सख्त कार्रवाई की जरूरत है।

जब तक ऐसा नहीं होता, ताज नगरी के लोग हर सुबह घर से निकलते समय पहले सड़क पर नज़र डालेंगे और फिर अपने कदम आगे बढ़ाएंगे। किसी भी सभ्य शहर के लिए इससे बड़ी बदकिस्मती और क्या हो सकती है?


Tuesday, July 14, 2026


गांव के मोड़ से ग्लोबल दुनिया तक: अंग्रेज़ी बन रही नई ताक़त 

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

16 जुलाई 2026

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सुबह के आठ बजे हैं। मथुरा ज़िले की गोवर्धन तहसील के एक गांव के मोड़ पर रंग-बिरंगे स्कूल बैग टांगे, टाई और साफ-सुथरी यूनिफॉर्म पहने लड़के और लड़कियों का एक झुंड बस का इंतज़ार कर रहा है। कोई कह रहा है, hi, how are you? दूसरा मुस्कुराकर जवाब देता है, "I am fine, thank you." तीसरी बच्ची अपनी सहेली से पूछती है, "Where is your project ?" उनकी अंग्रेज़ी अभी बहुत साधारण है, मगर  सपने बड़े हैं।

पास खड़े बुज़ुर्ग हैरानी और फ़ख्र से उन्हें देखते हैं। यही बच्चे कुछ साल पहले गांव के हिंदी स्कूल में जाते थे। आज रोज़ कई किलोमीटर दूर एक अंग्रेज़ी माध्यम के पब्लिक स्कूल की बस पकड़ते हैं। यह सिर्फ़ स्कूल बदलने की कहानी नहीं, बदलते भारत की तस्वीर है।

केरल, कर्नाटक, तमिल नाडु के अनेकों शहरों में और ग्रामीण अंचलों में प्राइवेट, मिशनरी अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की भरमार है। ऊटी के रास्ते में मसिनीगुडी कस्बे में एक स्कूली हेड मास्टर ने बताया , " सरकारी स्कूलों में लोकल भाषा माध्यम है जहां अधिकांश गरीब बच्चे पढ़ते हैं, जिनके पास साधन हैं उनके बच्चे प्राइवेट में स्टडी करते हैं, अंग्रेजी सीखते हैं!" गांव गांव से प्राइवेट बसें बच्चों को स्कूलों तक ढोती हैं। दक्षिण भारत के ज्यादातर पेरेंट्स बच्चों को विदेश जाने के लिए पढ़ाते हैं, गल्फ कंट्रीज या अमेरिका!

लोग मानने लगे हैं कि भारत में अंग्रेज़ी अब किसी हुकूमत की छोड़ी हुई निशानी नहीं रही। यह रोज़गार, तरक्की और नए मौकों की ज़ुबान बन चुकी है। करोड़ों भारतीय इसे पढ़ते, समझते और बोलते हैं। अनुमान है कि करीब 26 करोड़ से अधिक लोगों को अंग्रेज़ी की बुनियादी समझ है। हर साल लाखों नए बच्चे इस सफ़र में शामिल हो रहे हैं।

एक दौर था जब अंग्रेज़ी सिर्फ़ बड़े शहरों और अमीर घरों तक सीमित मानी जाती थी। अब यह गांवों की गलियों तक पहुंच चुकी है। किसान, दुकानदार, मज़दूर और छोटे कारोबारी भी चाहते हैं कि उनके बच्चे अंग्रेज़ी सीखें। वे जानते हैं कि बदलती दुनिया में यह हुनर नई राहें खोल सकता है।

देश में अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूलों की संख्या तेज़ी से बढ़ी है। मिशनरी और कॉन्वेंट स्कूलों ने दशकों पहले इसकी बुनियाद रखी। बाद में निजी स्कूल, सीबीएसई और आईसीएसई संस्थान आगे आए। अब कई सरकारी स्कूल भी अंग्रेज़ी माध्यम की पढ़ाई शुरू कर चुके हैं। करोड़ों बच्चे इन स्कूलों में शिक्षा पा रहे हैं।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं,"इस बदलाव के पीछे कोई सियासी नारा नहीं, बल्कि ज़मीनी हक़ीक़त है। भारत जैसे बहुभाषी देश में अंग्रेज़ी अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले लोगों के बीच एक साझा पुल बन गई है। कश्मीर से केरल और गुजरात से असम तक, अलग-अलग प्रदेशों के लोग इसी भाषा के सहारे आसानी से संवाद कर लेते हैं।"

उच्च शिक्षा में भी अंग्रेज़ी की अहमियत लगातार बढ़ी है। इंजीनियरिंग, चिकित्सा, विज्ञान, क़ानून, प्रबंधन और शोध की अधिकांश किताबें और अध्ययन सामग्री अंग्रेज़ी में उपलब्ध हैं। दुनिया के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से जुड़ने में भी यही भाषा सबसे बड़ा सहारा बनती है।

भारत की आईटी क्रांति में अंग्रेज़ी की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे, नोएडा और गुरुग्राम जैसे शहरों ने दुनिया भर की कंपनियों को आकर्षित किया। भारतीय युवाओं ने अपनी मेहनत के साथ अंग्रेज़ी की क्षमता के दम पर वैश्विक बाज़ार में पहचान बनाई। कॉल सेंटर, बीपीओ, सॉफ्टवेयर, डिजिटल सेवाएं और ऑनलाइन कारोबार लाखों लोगों को रोज़गार दे रहे हैं।

आज डिजिटल दुनिया में भी अंग्रेज़ी एक अहम चाबी है। इंटरनेट, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस, ऑनलाइन कोर्स, रिसर्च और नई तकनीकों का बड़ा हिस्सा अंग्रेज़ी में उपलब्ध है। जिसे अंग्रेज़ी आती है, उसके सामने सीखने के रास्ते कहीं ज़्यादा खुल जाते हैं।

लेकिन इसका मतलब यह हरगिज़ नहीं कि हिंदी या दूसरी भारतीय भाषाएं कमज़ोर हो जाएं। अपनी मातृभाषा इंसान की पहचान, संस्कृति और जड़ों से जुड़ी होती है। अंग्रेज़ी उस पहचान की जगह नहीं ले सकती। असली समझदारी दोनों को साथ लेकर चलने में है।

दुनिया के कई विकसित देशों के बच्चे अपनी मातृभाषा के साथ अंग्रेज़ी भी सीखते हैं। भारत में भी यही रास्ता सबसे बेहतर साबित हो सकता है। घर में अपनी भाषा, समाज में अपनी संस्कृति और दुनिया से जुड़ने के लिए अंग्रेज़ी; यही संतुलन भविष्य की ज़रूरत है।

सरकारी स्कूलों में बेहतर अंग्रेज़ी शिक्षा, प्रशिक्षित शिक्षक, आधुनिक तकनीक और अच्छी पाठ्य सामग्री उपलब्ध कराना अब समय की मांग है। अंग्रेज़ी किसी वर्ग विशेष की जागीर नहीं रहनी चाहिए। गांव का बच्चा भी वही अवसर पाए जो महानगर के छात्र को मिलता है।

भारत को अंग्रेज़ी विरासत में मिली थी, लेकिन उसने इसे अपनी मेहनत और ज़रूरत के मुताबिक़ नया रूप दिया। आज यह विदेशी भाषा कम और भारतीय क्षमता का हिस्सा ज़्यादा बन चुकी है।

शायद इसी लिए गोवर्धन के उस गांव के चौराहे पर खड़े वे छोटे-छोटे बच्चे, जो हिचकिचाते हुए कहते हैं, "Good morning, teacher," सिर्फ़ अंग्रेज़ी नहीं बोल रहे होते। वे अपने भविष्य के दरवाज़े पर दस्तक दे रहे होते हैं। उनके होंठों पर कुछ साधारण अंग्रेज़ी के शब्द हैं, लेकिन उनकी आंखों में पूरे हिंदुस्तान के बदलते कल का ख़्वाब चमक रहा होता है।

Monday, July 13, 2026

 


प्रिय आगरा, हमारे फुटपाथ लौटा दो!

सड़कें सिर्फ़ गाड़ियों की नहीं, इंसानों की भी हैं

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बृज खंडेलवाल द्वारा

15 जुलाई 2026

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नेताओं और अफ़सरों से एक छोटी-सी गुज़ारिश है। एक दिन बिना लालबत्ती, बिना सरकारी गाड़ी और बिना सुरक्षा घेरे के आगरा की सड़कों पर पैदल चलकर दिखाइए। तब मालूम होगा कि इस शहर में पैदल चलना अब सफ़र नहीं, रोज़ का इम्तिहान बन चुका है।

आगरा का कोई एक इलाक़ा बता दीजिए, जहाँ आदमी निडर होकर फुटपाथ पर चल सके। योगी सरकार तेज़ रफ़्तार एक्सप्रेसवे बनाने में व्यस्त है, लेकिन पैदल चलने वालों की रफ़्तार और सुरक्षा जैसे किसी की प्राथमिकता ही नहीं रही।

ताजमहल दुनिया की शान है, मगर शहर की असली पहचान उसकी सड़कें होती हैं। और आगरा की सड़कें आज एक कड़वी हक़ीक़त बयान करती हैं: यह शहर पैदल चलने वालों का नहीं रहा।

फुटपाथ, जो आम लोगों के लिए बने थे, अब दुकानों के शो-रूम, ठेलों, पार्किंग और अतिक्रमण की जागीर बन चुके हैं। कहीं सामान फैला है, कहीं शेड खड़े हैं, कहीं मोटरसाइकिलें और कारें कब्ज़ा किए बैठी हैं। नतीजा साफ़ है। पैदल आदमी सड़क पर उतरता है और मौत के साथ चलने को मजबूर हो जाता है।

बेलनगंज, हॉस्पिटल रोड, लोहामंडी, राजा मंडी, किनारी बाज़ार, सदर और शहर के दर्जनों इलाक़ों में यही मंजर दिखाई देता है। कहीं फुटपाथ टूटे हैं, कहीं ग़ायब हैं और जहाँ बचे भी हैं, वहाँ अतिक्रमण ने उनका दम घोंट दिया है।

यह सिर्फ़ असुविधा नहीं, सार्वजनिक सुरक्षा का गंभीर संकट है। "सेफ़ स्ट्रीट्स फ़ॉर आगरा" रिपोर्ट बताती है कि शहर में सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली 88 प्रतिशत मौतें पैदल यात्रियों, साइकिल सवारों और दोपहिया वाहन चालकों जैसी सबसे कमज़ोर श्रेणी के लोगों की होती हैं। यानी जो सबसे कम सुरक्षित हैं, वही सबसे ज़्यादा जान गंवा रहे हैं।

देशभर में हर साल तीस हज़ार से अधिक पैदल यात्री सड़क हादसों में मारे जाते हैं। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार, कुल सड़क दुर्घटना मौतों में लगभग पाँचवाँ हिस्सा पैदल यात्रियों का है। आगरा में टूटे फुटपाथ, खुले मैनहोल, उखड़ी टाइलें और बरसात में पानी से छिपे गड्ढे इस ख़तरे को कई गुना बढ़ा देते हैं।

सबसे ज़्यादा तकलीफ़ बुज़ुर्गों, महिलाओं, बच्चों और दिव्यांग नागरिकों को होती है। रोज़ कोई न कोई गिरता है, घायल होता है। छोटी चोटें अब आम बात हो गई हैं। बड़े हादसे किसी भी दिन किसी के साथ हो सकते हैं।

विडम्बना देखिए। हर साल लाखों पर्यटक आगरा आते हैं। वे इस शहर को पैदल महसूस करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें भी ट्रैफ़िक के बीच जान हथेली पर रखकर चलना पड़ता है। विश्व धरोहर का शहर अगर पैदल यात्रियों के लिए असुरक्षित है, तो यह हमारी शहरी सोच की नाकामी है।

सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में साफ़ कहा है कि स्वच्छ, सुरक्षित और बाधारहित फुटपाथ पर चलना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों का मौलिक अधिकार है। सड़कों पर पहला हक़ पैदल चलने वालों का है, वाहनों का नहीं। मगर आगरा में यह अधिकार हर दिन कुचला जा रहा है।

नगर निगम को अब सिर्फ़ रंग-रोगन और सौंदर्यीकरण से बाहर निकलना होगा। फुटपाथों की मरम्मत, खुले मैनहोल बंद करना, जल निकासी दुरुस्त करना और अतिक्रमण हटाना उसकी पहली ज़िम्मेदारी होनी चाहिए। दुकानदार सार्वजनिक ज़मीन पर कब्ज़ा नहीं कर सकते। रेहड़ी-पटरी वालों के लिए व्यवस्थित वेंडिंग ज़ोन बनाए जाएँ, ताकि उनका रोज़गार भी सुरक्षित रहे और पैदल यात्रियों का रास्ता भी।

अब वक्त आ गया है कि "प्रिय आगरा, फुटपाथ वापस दो" अभियान शुरू किया जाए। नागरिक मोबाइल से टूटे फुटपाथ, खुले मैनहोल और अतिक्रमण की तस्वीरें भेजें। नगर निगम तय समय-सीमा में कार्रवाई करे और हर सप्ताह सार्वजनिक रिपोर्ट जारी करे। स्थानीय अख़बार भी नागरिक शिकायतों के लिए स्थायी कॉलम शुरू करें। जवाबदेही होगी, तभी बदलाव आएगा।

बेंगलुरु समेत कई शहरों ने सख़्ती से फुटपाथ अतिक्रमण हटाने की शुरुआत कर दी है। आगरा कब जागेगा? या फिर हमारे हुक्मरान रिप वैन विंकल की तरह सोते ही रहेंगे?

किसी शहर की पहचान उसकी चौड़ी सड़कों से नहीं होती। उसकी पहचान इस बात से होती है कि वहाँ एक बच्चा, एक बुज़ुर्ग, एक महिला, एक दिव्यांग और एक पर्यटक कितनी बेफ़िक्री से पैदल चल सकता है।

आगरा ने अपने स्मारकों पर करोड़ों रुपये खर्च किए हैं। अब अपने नागरिकों पर भी कुछ निवेश कीजिए।

हमें फुटपाथ वापस चाहिए।

क्योंकि शहर तभी सभ्य कहलाता है, जब सड़क पर सबसे कमज़ोर इंसान भी बिना डर के चल सके। ताजमहल की ख़ूबसूरती तभी मुकम्मल होगी, जब उसके शहर की सड़कें भी इंसानों के लिए सुरक्षित हों

Sunday, July 12, 2026

 क्या वाकई औरतें मर्दों पर भारी पड़ रही हैं? 

एक सनसनीखेज़ हत्या से सदियों की असमानता नहीं मिट जाती

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कुछ वायरल अपराधों से यह मत मान लीजिए कि भारत में पितृसत्ता खत्म हो गई है

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

14 जुलाई 2026

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मेरठ का नीला ड्रम, आगरा में फर्श के नीचे दफन पति, मुंबई-वसई में प्रेमी की हत्या और ऐसी ही कुछ दूसरी सनसनीखेज़ वारदातों ने पूरे देश को झकझोर दिया। टीवी स्टूडियो गरजे, सोशल मीडिया पर मीम्स की बाढ़ आ गई और एक नया निष्कर्ष गढ़ लिया गया: "क्या अब महिलाएँ पुरुषों पर भारी पड़ने लगी हैं?" 

लेकिन क्या कुछ भयावह अपराध सचमुच भारत की सामाजिक हकीकत बदल देते हैं? क्या कुछ वायरल घटनाएँ सदियों पुरानी पितृसत्ता, असमानता और महिलाओं के खिलाफ हिंसा के पहाड़ को मिटा सकती हैं? जवाब भावनाओं में नहीं, आँकड़ों में छिपा है।

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आज के दौर में सच से कहीं तेज़ दौड़ती है सनसनी।

किसी पत्नी पर पति की हत्या का आरोप लगता है। कहीं प्रेमी के साथ मिलकर हत्या की साज़िश रची जाती है। टीवी चैनलों पर दिन-रात वही दृश्य चलते हैं। सोशल मीडिया पर मीम्स की बाढ़ आ जाती है। व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी फ़ौरन फैसला सुना देती है; "अब तो औरतें मर्दों पर भारी पड़ने लगी हैं।" कुछ लोग तो यह तक कहने लगते हैं कि अब पुरुष ही सबसे बड़े पीड़ित हैं।

ऐसी बातें सुनने में आकर्षक लगती हैं, लेकिन आंकड़ों की कसौटी पर टिकती नहीं हैं।

अपराध का कोई लिंग नहीं होता। हत्या करने वाला चाहे पुरुष हो या महिला, कानून की नज़र में दोनों बराबर हैं। दोषी को सज़ा मिलनी ही चाहिए। लेकिन कुछ सनसनीखेज़ घटनाओं के आधार पर पूरे समाज की तस्वीर बदल देना न्याय भी नहीं है और बुद्धिमानी भी नहीं।

कुछ अपराध सदियों की सामाजिक हकीकत को नहीं बदल सकते।

यह सच है कि भारत में महिलाओं की स्थिति पहले से बेहतर हुई है। आज पहले की तुलना में कहीं अधिक लड़कियाँ स्कूल और कॉलेज पहुँच रही हैं। उच्च शिक्षा में महिलाओं का सकल नामांकन अनुपात अब पुरुषों से अधिक है। महिलाएँ लड़ाकू विमान उड़ा रही हैं, अंतरिक्ष अभियानों का नेतृत्व कर रही हैं, उद्योग चला रही हैं, न्यायपालिका और प्रशासन में महत्वपूर्ण पदों पर हैं। पंचायतों में लाखों महिलाएँ जनप्रतिनिधि हैं। मातृ मृत्यु दर घटी है, संस्थागत प्रसव बढ़े हैं और करोड़ों महिलाओं के बैंक खाते खुले हैं।

यह बदलाव स्वागत योग्य है।

लेकिन कुछ सफल महिलाओं की उपलब्धियों को पूरे देश की महिलाओं की वास्तविक स्थिति मान लेना सबसे बड़ी भूल होगी।

असल सवाल यह है कि गाँवों, कस्बों और शहरों की आम महिला कैसी ज़िंदगी जी रही है?

यहीं तस्वीर बदल जाती है। सामाजिक कार्यकर्ता पद्मिनी अय्यर कहती हैं, "भारत में महिलाओं की श्रम भागीदारी दर बढ़ी जरूर है, लेकिन आज भी पुरुषों की तुलना में आधी से भी कम है। जो महिलाएँ काम करती भी हैं, उनमें अधिकांश असंगठित क्षेत्र में हैं, जहाँ न नौकरी की सुरक्षा है, न उचित वेतन और न सामाजिक सुरक्षा। इससे भी बड़ा सच है वह काम जिसका कोई वेतन नहीं मिलता।समय-उपयोग सर्वे बताते हैं कि भारतीय महिलाएँ पुरुषों की तुलना में रोज़ तीन घंटे से अधिक अतिरिक्त समय रसोई, सफाई, बच्चों की परवरिश और बुज़ुर्गों की देखभाल में लगाती हैं। यह श्रम देश की अर्थव्यवस्था को सहारा देता है, लेकिन न इसका कोई वेतन है और न सम्मान।"

संपत्ति का बँटवारा भी बराबरी की कहानी नहीं कहता।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार केवल लगभग 13 प्रतिशत महिलाओं के नाम अकेले मकान है और मात्र 8 से 9 प्रतिशत महिलाओं के पास अपनी भूमि है। आर्थिक निर्भरता आज भी सामाजिक निर्भरता को जन्म देती है।

सोशल एक्टिविस्ट विद्या चौधरी के मुताबिक, "सबसे कठोर सच महिलाओं के खिलाफ हिंसा का है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार वर्ष 2024 में महिलाओं के विरुद्ध 4.41 लाख से अधिक अपराध दर्ज हुए। यानी हर दिन लगभग 1,210 मामले और औसतन हर 71 सेकंड में एक महिला के खिलाफ अपराध। इनमें सबसे अधिक मामले पति और रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता के हैं। इसके बाद दुष्कर्म, अपहरण, यौन उत्पीड़न और दहेज से जुड़े अपराध आते हैं।"

ये केवल दर्ज मामले हैं।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण बताता है कि भारत में लगभग हर तीन विवाहित महिलाओं में से एक ने अपने जीवन में पति या साथी द्वारा शारीरिक, मानसिक या यौन हिंसा झेली है। विशेषज्ञ मानते हैं कि असंख्य महिलाएँ सामाजिक बदनामी, आर्थिक निर्भरता और पारिवारिक दबाव के कारण शिकायत तक दर्ज नहीं करा पातीं।

यही भारत की असली तस्वीर है।

इसके मुकाबले हाल के वर्षों में पतियों की हत्या के कुछ चर्चित मामलों ने पूरे देश का ध्यान खींचा। ये घटनाएँ भयावह हैं और दोषियों को कठोर सज़ा मिलनी चाहिए। लेकिन ये अपवाद हैं, प्रवृत्ति नहीं।

सोशल मीडिया अपवाद को सामान्य बना देता है।

एक सनसनीखेज़ हत्या कई दिनों तक सुर्खियों में रहती है, जबकि घरेलू हिंसा झेल रही सैकड़ों महिलाएँ किसी समाचार की पात्र भी नहीं बनतीं। लगातार दिखाई जाने वाली असाधारण घटनाएँ धीरे-धीरे लोगों को यह भ्रम दे देती हैं कि अब सत्ता का संतुलन बदल गया है।

लेकिन आंकड़े इस भ्रम की पुष्टि नहीं करते।

हाँ, महिलाओं की सुरक्षा के लिए बने कुछ कानूनों के दुरुपयोग के मामले सामने आए हैं। लेकिन कुछ झूठे मामलों के कारण पूरे कानून को गलत नहीं ठहराया जा सकता।

एक और दुखद सच्चाई विधवाओं की है। भारत में करोड़ों विधवाएँ आज भी गरीबी, उपेक्षा, संपत्ति से वंचित किए जाने और सामाजिक तिरस्कार का जीवन जी रही हैं। वृंदावन जैसे शहर आज भी हजारों बेसहारा विधवाओं की पीड़ा के मौन गवाह हैं। उनका दर्द कभी वायरल नहीं होता, क्योंकि ख़ामोश पीड़ा टीआरपी नहीं देती।

एक सनसनीखेज़ हत्या एक सप्ताह तक सुर्खियाँ बना सकती है। लेकिन वह भारत की करोड़ों महिलाओं के हिस्से में आज भी दर्ज असमानता, हिंसा और भेदभाव की सदी पुरानी कहानी को नहीं बदल सकती।