Monday, October 19, 2026

 ट्रंप: धमकियों का बादशाह, यू-टर्न का उस्ताद!

नोबेल पुरस्कार मिलना चाहिए थूक कर चाटने की कला के लिए!

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

20 अक्टूबर 2026

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जब से बड़बोले डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में दोबारा डेरा जमाया है, दुनिया की शामत आई हुई है। लगता है, तीसरा विश्व युद्ध बस ट्रंप की अगली पोस्ट का इंतज़ार कर रहा है। अब तक तीन-चार बार दुनिया बारूद के ढेर पर बैठते-बैठते बची है। ट्रंप की जुबान मिसाइल है, दिमाग मौसम विभाग और फैसले ऐसे कि सुबह का शेर शाम को भीगी बिल्ली बन जाए।

इरादा था चीन की हेकड़ी निकालने का, उत्तर कोरिया के तानाशाह किम को घुटनों पर लाने का, ईरान को मिट्टी में मिलाने का और भारत की किश्ती को मझधार में डुबोने का। जेलेंस्की को दुनिया के सामने बेइज्जत करके यूक्रेन को रूस के सामने नाक रगड़वाने का सपना भी देखा। कनाडा को निगलने और ग्रीनलैंड पर कब्जे की हसरत भी पाल ली। नोबेल शांति पुरस्कार तो ऐसे चाहिए था, मानो दुनिया की सारी जंगें रोकने का ठेका अकेले इन्हीं ने ले रखा हो!

लेकिन  न चीन झुका, न किम सुधरा, न ईरान गायब हुआ, न रूस ने ट्रंप के इशारे पर नाचना शुरू किया। कनाडा अपनी जगह खड़ा है, ग्रीनलैंड बिकने को तैयार नहीं और नोबेल पुरस्कार भी दूर से ठेंगा दिखाता रहा। 

हर बार धमकी का पहाड़ खड़ा होता है, फिर समझौते का चूहा निकलता है। पहले आंखें लाल, फिर तेवर ढीले; पहले दुनिया को सबक सिखाने का ऐलान, फिर खुद सफाई देने की नौबत। 

न पूरब बदला, न पश्चिम। बदली है तो सिर्फ अमेरिका की साख, जिसकी किरकिरी अब दुनिया भर में हो रही है। ट्रंप हर बार इतिहास बनाने निकलते हैं, मगर सुर्खियों में अपनी ही फजीहत का नया अध्याय जोड़ आते हैं। 

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दुनिया को डराते हैं, फिर खुद ही पीछे हट जाते हैं। टैरिफ से रूस तक, अमेरिकी राष्ट्रपति की सियासत में कब क्या होगा, कोई नहीं जानता।

सुबह दुनिया को धमकी, शाम को समझौते की पेशकश! कभी व्यापार युद्ध का ऐलान, कभी दुश्मनों को सबक सिखाने की हुंकार। कभी दोस्तों पर पाबंदियां, तो कभी उन्हीं को राहत। डोनाल्ड ट्रंप की सियासत का यही रंग है। पहले धमाका करो, फिर नुकसान का हिसाब लगाओ। बात बिगड़ने लगे, तो पलटी मारकर उसे अपनी शानदार जीत बता दो!

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने राजनीति में यू-टर्न को एक नई कला बना दिया है। उनकी जुबान पर सख्ती रहती है, लेकिन फैसलों में अक्सर नरमी दिखाई देती है। उनकी धमकियों से दुनिया कांपती है, बाजारों में हलचल मचती है और सरकारें बेचैन हो जाती हैं। लेकिन कुछ समय बाद वही ट्रंप समझौते की मेज पर बैठे नजर आते हैं।

उनका हर ऐलान अंतिम फैसला नहीं होता। हर धमकी कार्रवाई में नहीं बदलती। और हर घोषित जीत वास्तव में जीत हो, यह भी जरूरी नहीं!

2 अप्रैल 2025 को ट्रंप ने दुनिया के सामने अपने टैरिफ अभियान को 'लिबरेशन डे' का नाम दिया। उन्होंने कई देशों पर भारी आयात शुल्क लगाने का ऐलान किया। उनका दावा था कि अमेरिका को दूसरे देशों ने व्यापार में खूब लूटा है। अब हिसाब बराबर करने का समय आ गया है।

ऐलान इतना आक्रामक था कि दुनिया भर के बाजारों में बेचैनी फैल गई। कारोबारियों को डर सताने लगा कि महंगे आयात, जवाबी शुल्क और व्यापार युद्ध से उनका कारोबार चौपट हो सकता है।

लेकिन 9 अप्रैल को कहानी में नया मोड़ आ गया। ट्रंप ने चीन को छोड़कर कई देशों पर लगाए गए नए शुल्कों में 90 दिनों की रोक लगा दी। सामान्य 10 प्रतिशत शुल्क जारी रहा, जबकि चीन के खिलाफ सख्ती और बढ़ाई गई। बाद में बातचीत के दौरान कई फैसलों में फिर बदलाव हुए।

जिस अभियान को ऐतिहासिक आर्थिक क्रांति बताया गया था, उसमें इतनी जल्दी बदलाव क्यों आया? शायद बाजारों की प्रतिक्रिया, कारोबारियों की चिंता और अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर संभावित असर ने हकीकत का आईना दिखा दिया।

भारत के मामले में भी ट्रंप की नीति में उतार-चढ़ाव दिखाई दिया। रूस से तेल खरीदने को लेकर उन्होंने भारत पर दबाव बनाया। भारतीय सामान पर शुल्क बढ़ाए गए और रूस से तेल खरीदने के कारण अतिरिक्त 25 प्रतिशत शुल्क भी लगाया गया।

वाशिंगटन का संदेश साफ था। रूस से तेल खरीदना जारी रखा, तो भारत को आर्थिक कीमत चुकानी पड़ सकती है। ट्रंप की इस सख्ती से भारतीय निर्यातकों की चिंता बढ़ी।

फिर फरवरी 2026 में तस्वीर बदलने लगी। अमेरिका ने भारत के साथ अंतरिम व्यापार समझौते की रूपरेखा घोषित की। इसके तहत रूस से तेल खरीदने से जुड़े अतिरिक्त 25 प्रतिशत शुल्क को हटाने और भारतीय सामान पर जवाबी शुल्क को 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करने की घोषणा की गई।

ट्रंप ने दावा किया कि भारत ने रूसी तेल की खरीद घटाने पर सहमति जताई है। लेकिन व्यापार समझौते के कई पहलुओं पर बातचीत और अनिश्चितता बनी रही।

यहां सवाल समझौते से नहीं, बल्कि उस अंदाज से है जिसमें पहले धमकी दी जाती है और बाद में राहत का ऐलान होता है। 

भारत जैसे बड़े देश के लिए भी यह मामला मामूली नहीं है। अमेरिकी फैसलों का असर निर्यात, रोजगार, निवेश और कारोबार पर पड़ सकता है।

रूस के मामले में तो कहानी और दिलचस्प हो जाती है।  रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर दबाव बनाने के लिए अमेरिका ने सख्त कदमों और भारी शुल्क की धमकियां दीं। भारत समेत कई देशों को चेतावनी मिली कि रूस से ऊर्जा खरीदना महंगा पड़ सकता है।

लेकिन अक्टूबर 2026 में फिर एक नया मोड़ आया। ट्रंप ने राष्ट्रीय हित का हवाला देते हुए संबंधित कानून के तहत अतिरिक्त दंडात्मक शुल्कों से अस्थायी राहत देने का फैसला किया। इससे रूसी ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर तत्काल दबाव कुछ कम हुआ।

इसी दौरान रूसी डीजल की आपूर्ति से जुड़ा अमेरिकी फैसला भी चर्चा में आया। प्रशासन ने ऊर्जा जरूरतों और यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने की कूटनीतिक कोशिशों का हवाला दिया।

अब सवाल उठता है कि जब रूस से ऊर्जा खरीदने पर दूसरों को सजा देने की बात हो रही थी, तो खुद अमेरिका के लिए रूसी ईंधन का रास्ता कैसे खुला?

ट्रंप की परेशानी यही है। उनके ऐलान इतने बड़े होते हैं कि बाद में उनसे पीछे हटना भी बड़ी खबर बन जाता है।

कभी ईरान पर हमले की तैयारी, कभी आखिरी समय पर रोक लगा दी जाती है। 

ट्रंप के यू-टर्न केवल व्यापार तक सीमित नहीं हैं। 2019 में, अपने पहले कार्यकाल के दौरान, उन्होंने अमेरिकी ड्रोन गिराए जाने के बाद ईरान पर जवाबी हमले की मंजूरी दी थी। लेकिन हमला शुरू होने से कुछ मिनट पहले उन्होंने इसे रोक दिया।

ट्रंप ने संभावित जनहानि का हवाला दिया। यह फैसला बड़े युद्ध को टालने के लिहाज से समझदारी भरा हो सकता था।

इसी तरह नाटो को लेकर भी उनका रुख बदला। पहले उन्होंने इस सैन्य गठबंधन को अप्रासंगिक बताया, फिर कहा कि अब वह अप्रासंगिक नहीं रहा। हालांकि, सदस्य देशों से रक्षा खर्च बढ़ाने की मांग जारी रही।

टिकटॉक पर भी उनका रुख समय के साथ बदला। पहले उन्होंने इस पर प्रतिबंध लगाने या इसकी बिक्री के लिए दबाव बनाया। बाद में उन्होंने पूर्ण प्रतिबंध के बजाय समयसीमा बढ़ाने और दूसरे विकल्पों पर विचार करने का रास्ता अपनाया।

जब बार-बार बड़ी-बड़ी घोषणाओं के बाद नीति बदलती है, तो नेतृत्व की तैयारी और फैसलों की गंभीरता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

अमेरिका के दोस्त भी अब पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं। किसी देश की ताकत केवल उसके हथियारों, अर्थव्यवस्था या सेना में नहीं होती। उसकी असली ताकत उसके वादों की साख में भी होती है।

मित्र देश वर्षों की योजना बनाते हैं। वे व्यापार समझौते करते हैं, रक्षा सहयोग बढ़ाते हैं और निवेश के फैसले लेते हैं। अगर अमेरिकी नीति कभी सख्त और कभी नरम होती रहे, तो दूसरे देशों के लिए भरोसे के साथ आगे बढ़ना मुश्किल हो जाता है।

आज शुल्क लगाने की धमकी, कल राहत का ऐलान। आज प्रतिबंधों की बात, कल राष्ट्रीय हित का हवाला देकर छूट। ऐसी सियासत में मित्र देश भी हर घोषणा को अंतिम फैसला मानने से पहले कई बार सोचेंगे।

ट्रंप शायद मानते हैं कि अनिश्चितता उनकी सबसे बड़ी ताकत है। इससे विरोधी दबाव में आते हैं और बातचीत की मेज पर झुकने को मजबूर होते हैं। कुछ मौकों पर यह रणनीति काम भी कर सकती है।

लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। बार-बार बदलते फैसले मित्र देशों को नए विकल्प तलाशने के लिए मजबूर कर सकते हैं। अमेरिकी वादों की अहमियत भी घट सकती है।

ट्रंप की राजनीति का एक खास अंदाज है। पहले बयान को इतना आक्रामक बनाओ कि दुनिया का ध्यान खिंच जाए। फिर विरोध और नुकसान सामने आएं, तो समझौते का रास्ता तलाशो। आखिर में पीछे हटने को भी अपनी जीत बताकर पेश कर दो।

यह तरीका सुर्खियां बटोर सकता है। लेकिन क्या इससे दुनिया में भरोसा बढ़ता है? क्या इससे कारोबारियों को स्थिरता मिलती है? और क्या मित्र देशों को अमेरिकी फैसलों पर पूरा यकीन हो पाता है?

ट्रंप की सबसे बड़ी कला शायद यही है कि वह पीछे हटकर भी जीत का दावा कर लेते हैं। लेकिन हर बार दुनिया उनकी इस कला पर तालियां बजाएगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है।

प्रभाव और भरोसा दो अलग चीजें हैं। धमकियों से लोग कुछ समय के लिए झुक सकते हैं, मगर भरोसा केवल स्थिरता और साफ नीयत से बनता है। महाशक्ति का राष्ट्रपति होना बड़ी जिम्मेदारी है। हर बार मुंह की खाने के बाद उसे जीत का नाम देना आसान हो सकता है, लेकिन इतिहास ऐसे दांवों का हिसाब जरूर मांगता है।

Saturday, October 17, 2026

 पत्रकार कौन? 

सुप्रीम कोर्ट ने उठाया अहम सवाल, अब पत्रकारिता को चाहिए पहचान, मर्यादा और जवाबदेही।

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बृज खंडेलवाल द्वारा

17 अक्टूबर 2026

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जब हर हाथ में मोबाइल हो, हर मोबाइल न्यूज़रूम बन जाए और हर सोशल मीडिया वाला खुद को पत्रकार बताने लगे, तो असली पत्रकार की पहचान कौन करेगा? क्या कैमरा उठाना ही काबिलियत है? क्या माइक पकड़कर चिल्लाने से पत्रकारिता आ जाती है? क्या किसी अफसर को धमकाते ही प्रेस की धौंस जमाई जा सकती है? और क्या पत्रकार होने का दावा करते ही खास सुरक्षा और सुविधाओं का पट्टा मिल जाना चाहिए?

सवाल तीखे हैं, मगर वक्त की जरूरत हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने हाल में पत्रकारों की सुरक्षा से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान इसी पेचीदा मुद्दे पर गौर किया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने डिजिटल दौर में पत्रकार की पहचान तय करने की मुश्किलों की ओर इशारा किया।

वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने कहा कि जनहित के मुद्दे उठाने वाले स्वतंत्र पत्रकारों के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए। सरकारी मान्यता न होने से उनकी आवाज कमजोर नहीं पड़नी चाहिए।

दूसरी तरफ, सॉलिसिटर जनरल ने भी जायज सवाल उठाया। आज मोबाइल उठाइए, वीडियो बनाइए और खुद को पत्रकार घोषित कर दीजिए। न डिग्री, न तजुर्बा, न जवाबदेही। बस बन गए पत्रकार!

अदालत ने इस मसले पर विस्तार से विचार करने की जरूरत बताई है। अभी कोई अंतिम परिभाषा तय नहीं हुई है।

लेकिन सवाल अपनी जगह खड़ा है। आखिर पत्रकारिता है क्या?

पत्रकारिता सिर्फ माइक, कैमरा और सोशल मीडिया पोस्ट का खेल नहीं है। इसके लिए जानकारी चाहिए, हुनर चाहिए और तथ्यों की जांच करने का सलीका चाहिए। ईमानदारी, समझ और जनता के प्रति जवाबदेही भी जरूरी हैं।

मोबाइल एक औजार है, योग्यता का प्रमाणपत्र नहीं। ऊंची आवाज हुनर की गारंटी नहीं। और प्रेस कार्ड कोई जादुई छड़ी नहीं, जिसे घुमाते ही सारे नियम खत्म हो जाएं।

अफसोस, आज पत्रकारिता का चेहरा कई जगह बिगड़ता नजर आता है। खबर पीछे छूट रही है, तमाशा आगे निकल रहा है। टीआरपी की दौड़ में सच कई बार दम तोड़ देता है।

जियोस्टार के उपाध्यक्ष उदय शंकर ने भी चिंता जताई है कि पत्रकारिता की पुरानी पहचान खत्म होती जा रही है। न्यूज़रूम अब खबरों की अहमियत से ज्यादा उनकी पहुंच और रेटिंग को तवज्जो देने लगे हैं।

पूर्व संपादक एन. राम भारतीय टीवी समाचार चैनलों की गुणवत्ता पर तीखी टिप्पणी कर चुके हैं। राजदीप सरदेसाई ने भी पत्रकारिता के नैतिक पतन और उसके कारोबारी मॉडल पर सवाल उठाए हैं।

बात कड़वी है, मगर सच से मुंह मोड़ने से क्या फायदा?

पब्लिक कमेंटेटर प्रोफ पारस नाथ चौधरी कहते हैं, "जब खबर की जगह शोर बिकने लगे, सवाल की जगह गाली सुनाई दे और पड़ताल की जगह प्रोपेगेंडा परोसा जाए, तो पेशे की साख पर सवाल उठेंगे ही। पत्रकारिता कोई खुला मेला नहीं, जहां हर ऐरा-गैरा अपनी दुकान सजा ले। मगर यह किसी सरकार की जागीर भी नहीं, जहां सत्ता तय करे कि कौन बोलेगा और कौन चुप रहेगा।"

तो रास्ता क्या है?

भारत को पत्रकारों की पेशेवर पहचान के लिए एक पारदर्शी और भरोसेमंद व्यवस्था बनानी चाहिए। पत्रकारिता या जनसंचार की पढ़ाई, मान्यता प्राप्त संस्थान से डिग्री या डिप्लोमा, काम का अनुभव और किसी मीडिया संस्थान से जुड़ाव उपयोगी आधार हो सकते हैं।

लेकिन डिग्री को ही आखिरी कसौटी बनाना भी गलत होगा। कई अच्छे पत्रकार बिना औपचारिक डिग्री के इस पेशे में आए हैं। उन्होंने अपने काम से पहचान बनाई है। 

प्रिंट मीडिया में लागू पंजीकरण व्यवस्था संस्थानों की पहचान में मदद कर सकती है। लेकिन पंजीकरण भी पत्रकारिता की गुणवत्ता की गारंटी नहीं है। आखिर कागज पर दर्ज नाम और जमीन पर किए गए काम में फर्क होता है।

यूनेस्को का नजरिया इस बहस में अहम है। वह पत्रकारिता के लिए कोई कठोर शैक्षणिक योग्यता, अनिवार्य लाइसेंस या पत्रकारों की तय संख्या निर्धारित नहीं करता। उसका जोर इस बात पर है कि कौन जनहित में जानकारी जुटाता है, तथ्यों की पड़ताल करता है और जनता तक खबर पहुंचाता है।

इसलिए स्वतंत्र पत्रकारों, फ्रीलांसरों, ब्लॉगरों और नागरिक पत्रकारों को एक झटके में खारिज नहीं किया जा सकता। उनका काम, अनुभव और आचरण भी मायने रखते हैं।

खासकर गांवों और दूरदराज के इलाकों में कई पत्रकार बेहद सीमित साधनों के बीच काम करते हैं। न बड़ा दफ्तर, न चमचमाती गाड़ी, न भारी-भरकम पहचान पत्र। फिर भी वे भ्रष्टाचार उजागर करते हैं, सरकारी लापरवाही सामने लाते हैं और उन लोगों की आवाज बनते हैं जिन्हें अक्सर कोई सुनने वाला नहीं मिलता।

कई बार बड़े मीडिया संस्थान जिन खबरों से मुंह फेर लेते हैं, वही खबरें छोटे कस्बों के पत्रकार सामने लाते हैं।

ऐसे पत्रकारों को सिर्फ डिग्री या सरकारी मान्यता के अभाव में खारिज करना अन्याय होगा। असली कसौटी उनका काम, उनकी विश्वसनीयता और उनका आचरण होना चाहिए।

लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि हर किसी को खुली छूट दे दी जाए।

कर्नाटक के एक सीनियर मीडिया प्रशिक्षक बताते हैं, "कुछ लोग पत्रकारिता की आड़ में वसूली करते हैं। व्यापारियों को डराते हैं, अधिकारियों को धमकाते हैं और आम नागरिकों को ब्लैकमेल करते हैं। उनके लिए कैमरा सच दिखाने का जरिया नहीं, दबाव बनाने का हथियार है। ऐसे लोगों से सावधान रहने की जरूरत है। वे पत्रकारिता की इज्जत पर बट्टा लगाते हैं। चंद फर्जी पत्रकार पूरे पेशे को बदनाम कर देते हैं।"

यहां एक बात साफ होनी चाहिए। पत्रकारिता की स्वतंत्रता का मतलब मनमानी नहीं है। अधिकार के साथ जिम्मेदारी भी आती है। सवाल पूछना पत्रकार का हक है, लेकिन किसी को डराकर अपना उल्लू सीधा करना अपराध की श्रेणी में आ सकता है।

इसलिए समाधान सरकारी लाइसेंस बांटने या पत्रकारों पर राजनीतिक शिकंजा कसने में नहीं है। जरूरत ऐसी स्वतंत्र व्यवस्था की है, जो पेशेवर पहचान, रिपोर्टिंग के अधिकार और विशेष सुविधाओं के बीच फर्क समझे। प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया इसमें पहल करे। वकील, डॉक्टर, चार्टर्ड अकाउंटेंट्स, अन्य पेशेवर लोग, कहीं न कहीं पंजीकृत होते हैं, प्रैक्टिस करने का लाइसेंस मिलता है, तो फिर मीडिया के लोगों को ये व्यवस्था लागू नहीं की जा सकती, कुछ तो पेशेवर मापदंड होने ही चाहिए। 

आचार संहिता हो। शिकायतों की निष्पक्ष जांच हो। गलत काम साबित होने पर उचित कार्रवाई हो। लेकिन किसी पत्रकार की पहचान केवल इसलिए न छीनी जाए कि उसकी खबर सरकार या किसी ताकतवर व्यक्ति को पसंद नहीं आई।

आखिर लोकतंत्र में पत्रकार का काम सत्ता की तारीफ में कसीदे पढ़ना नहीं है। उसका काम सवाल पूछना है। जरूरत पड़ने पर असुविधाजनक सच सामने लाना है।

सरकार पत्रकार तय करने बैठेगी, तो कल खबरों की जगह फरमान छपेंगे।

बोलने का अधिकार हर नागरिक को है। जनहित में जानकारी जुटाने और उसे लोगों तक पहुंचाने की आजादी भी जरूरी है। लेकिन विशेष पेशेवर पहचान और उससे जुड़ी सुविधाओं के लिए विश्वसनीय काम, अनुभव और जिम्मेदारी की कसौटी होनी चाहिए।

Friday, October 16, 2026

 मस्क के स्टारलिंक पर भारत की हिचकिचाहट: देर से सही, समझदारी तो है!

यूक्रेन का तजुर्बा बता रहा है कि मुल्क की हिफाजत की चाबी किसी विदेशी कंपनी के हाथ में नहीं दी जा सकती

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बृज खंडेलवाल द्वारा

18 अक्टूबर 2026

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यूक्रेन ने साबित कर दिया है कि एक विदेशी निजी कंपनी के सैटेलाइट नेटवर्क पर निर्भरता राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बन सकती है। युद्ध के बीच स्टारलिंक की सेवा पर अचानक पाबंदी से यूक्रेन के सैन्य संचार और ड्रोन अभियान बाधित हुए। भारत का संयम दुश्मनी नहीं, बल्कि संप्रभुता, आत्मनिर्भरता और सीमांत सुरक्षा की अनिवार्य शर्त है।

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क्या भारत को एलन मस्क के लिए अपने दरवाजे बिना सोचे-समझे खोल देने चाहिए? क्या तेज इंटरनेट की चमक-दमक में हम अपनी हिफाजत, सरहदों की सुरक्षा और मुल्क की खुदमुख्तारी को दांव पर लगा सकते हैं? और अगर कल किसी जंग के दौरान कोई विदेशी कंपनी हमारी संचार व्यवस्था पर पाबंदी लगा दे, तो हम क्या करेंगे?

ये सवाल आज इसलिए अहम हो गए हैं, क्योंकि यूक्रेन में हाल की घटनाओं ने दुनिया को एक कड़ा सबक दिया है। भारत में स्टारलिंक को मंजूरी देने में सरकार की देरी और एहतियात पर सवाल उठाने वालों को अब समझना चाहिए कि हर देरी नाकामी नहीं होती। कभी-कभी जल्दबाजी से बचना ही सबसे बड़ी समझदारी होती है।


एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स का स्टारलिंक सैटेलाइट इंटरनेट आज की दुनिया की एक बड़ी तकनीकी कामयाबी है। आसमान में धरती के करीब चक्कर लगाने वाले हजारों छोटे उपग्रहों की मदद से दूर-दराज के इलाकों में भी इंटरनेट पहुंचाया जा सकता है। जहां मोबाइल नेटवर्क नहीं पहुंचता, वहां भी इसकी मदद से संपर्क कायम रखा जा सकता है।

यूरोपीय मामलों के जानकार प्रोफेसर पी एन चौधरी के मुताबिक, "यूक्रेन की जंग में स्टारलिंक ने बड़ी भूमिका निभाई है। रूसी हमलों के बीच यूक्रेनी सेना ने इसका इस्तेमाल सैनिकों के बीच संपर्क, रसद और ड्रोन चलाने के लिए किया। लेकिन अब इसी निर्भरता ने एक नई चिंता पैदा कर दी है।

अक्टूबर 2026 के मध्य में आई खबरों के मुताबिक, यूक्रेन के सैन्य संचार तंत्र से जुड़े स्टारशील्ड नेटवर्क पर गति संबंधी पाबंदियों के कारण कुछ तेज रफ्तार ड्रोनों के संचालन में मुश्किलें आईं। इससे रूसी ड्रोन और दूसरे हवाई खतरों को रोकने वाले कुछ अभियानों पर भी असर पड़ने की खबरें सामने आईं। बाद में संपर्क व्यवस्था बहाल होने की खबर आई।"

इन पाबंदियों के पीछे किसका फैसला था और पूरा मामला क्या था, इस पर अलग-अलग दावे हैं। एलन मस्क का कहना है कि सैन्य इस्तेमाल वाला स्टारशील्ड अमेरिकी सरकार के नियंत्रण में है और उसके संचालन से जुड़े फैसले अमेरिकी अधिकारी लेते हैं।

लेकिन यहां असली सवाल मस्क या वाशिंगटन के बीच जिम्मेदारी तय करने का नहीं है। सवाल यह है कि जब किसी मुल्क की सेना की ताकत एक विदेशी संचार व्यवस्था पर निर्भर हो जाए, तो उस मुल्क की अपनी आजादी कितनी महफूज रह जाती है?

जंग में कुछ मिनटों का संपर्क टूटना भी भारी पड़ सकता है। ड्रोन रास्ता भटक सकता है, हमला नाकाम हो सकता है और दुश्मन को बढ़त मिल सकती है। यानी जो तकनीक कल तक मददगार थी, वही संकट के समय कमजोरी बन सकती है।


स्टारलिंक जैसी सेवाएं निजी कंपनियां चलाती हैं, लेकिन उनका रिश्ता संबंधित देशों की सरकारों, कानूनों और सुरक्षा नीतियों से भी होता है। जरूरत पड़ने पर सेवाओं पर पाबंदी लग सकती है, कुछ इलाकों में कवरेज रोकी जा सकती है या इस्तेमाल की शर्तें बदली जा सकती हैं।

आज अमेरिका और यूक्रेन के हित एक दिशा में हों, यह जरूरी नहीं कि हर हाल में ऐसा ही रहे। यही बात भारत पर भी लागू होती है।

मान लीजिए, कल चीन या पाकिस्तान के साथ भारत का गंभीर सैन्य टकराव हो जाए। अगर उस समय किसी विदेशी कंपनी ने अपनी सेवा सीमित कर दी, तो क्या होगा? अगर किसी अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक विवाद के कारण भारत को जरूरी संचार सुविधा मिलने में रुकावट आ जाए, तो हमारी सेना क्या करेगी?

क्या हम किसी दूसरे देश की सरकार या किसी कारोबारी की मर्जी पर अपनी सुरक्षा छोड़ सकते हैं?

यह किसी के खिलाफ दुश्मनी नहीं, बल्कि हकीकत को समझने की बात है। अंतरराष्ट्रीय रिश्तों में दोस्ती अहम है, मगर राष्ट्रीय हित सबसे ऊपर होते हैं।

एक रिटायर्ड सैन्य अधिकारी बताते हैं कि भारत ने 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान विदेशी उपग्रह तस्वीरों और संबंधित क्षमताओं तक पहुंच की सीमाओं का अनुभव किया था। ऐसे अनुभवों ने यह समझ मजबूत की कि जरूरी तकनीक के लिए हमेशा दूसरे देशों पर निर्भर रहना खतरनाक हो सकता है।

इसी सोच के तहत भारत ने अपनी उपग्रह और नेविगेशन क्षमताओं को बढ़ाया। स्वदेशी नेविगेशन प्रणाली नाविक इसी दिशा में एक अहम कदम है।

स्टारलिंक के मामले में भी यही सोच अपनाने की जरूरत है।

भारत में इंटरनेट की सुविधा बढ़नी चाहिए। पहाड़ों, द्वीपों, गांवों और सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों को बेहतर संपर्क मिलना चाहिए। आपदा के समय सैटेलाइट इंटरनेट बहुत काम आ सकता है। कारोबार और शिक्षा के लिए भी इसके बड़े फायदे हैं।

लेकिन फायदे गिनाते समय खतरों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

भारत में गेटवे स्थापित करना, आंकड़ों की सुरक्षा के नियम बनाना और सरकारी निगरानी की व्यवस्था करना जरूरी है। लेकिन सिर्फ भारत की जमीन पर स्टेशन बना देने से अंतरिक्ष में घूम रहे उपग्रहों पर भारत का नियंत्रण नहीं हो जाता।

इंटरनेट का कनेक्शन हमारे यहां हो सकता है, मगर उसे चालू या बंद करने का अधिकार किसी और के पास हो, तो यह अधूरी आत्मनिर्भरता है।

विशेषज्ञ टीपी श्रीवास्तव कहते हैं, "भारत को स्टारलिंक का दरवाजा पूरी तरह बंद करने की जरूरत नहीं है। जरूरत है सोच-समझकर आगे बढ़ने की। विदेशी कंपनियों को नियमों के तहत काम करने का मौका मिले। लोगों को बेहतर इंटरनेट मिले और बाजार में मुकाबला बढ़े। मगर साथ ही भारत को अपने उपग्रह, सुरक्षित सैन्य संचार और ड्रोन नियंत्रण प्रणालियां भी मजबूत करनी होंगी।"

सरकार को एक ही कंपनी पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता से बचना चाहिए। फाइबर नेटवर्क, मोबाइल इंटरनेट और स्वदेशी उपग्रह सेवाओं का विस्तार जारी रहना चाहिए। संकट के समय हमारे पास ऐसे विकल्प होने चाहिए जो किसी विदेशी कंपनी के फैसले से ठप न पड़ें।

यूक्रेन का तजुर्बा हमें यही समझाता है कि तकनीक जितनी ताकत देती है, उस पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता उतनी ही बड़ी कमजोरी भी पैदा कर सकती है।

स्टारलिंक आए, कारोबार करे और भारतीयों को बेहतर इंटरनेट दे। लेकिन भारत की सुरक्षा, सरहदों की हिफाजत और फैसले लेने की आजादी की चाबी भारत के ही हाथों में रहनी चाहिए।

क्योंकि इंटरनेट की रफ्तार कुछ देर कम हो जाए, तो गुजारा हो सकता है। लेकिन अगर मुल्क की खुदमुख्तारी ही कमजोर पड़ जाए, तो उसकी कीमत बहुत भारी हो सकती है।

Thursday, October 15, 2026

 कॉकरोचों का राज, बाबाओं का चमत्कार और मीडिया की नौटंकी!  

सच गायब, शोर बेशुमार! सत्ता की चापलूसी, अंधविश्वास का कारोबार और जनता के सवालों पर पर्दा आखिर कब तक?

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बृज खंडेलवाल द्वारा  

17 अक्टूबर 2026  

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रातोंरात भगवान बनने वाले बाबाओं की कमी नहीं है। भविष्य बताने वाले ज्योतिषियों की दुकानें चमक रही हैं। कोई ग्रहों की चाल से देश का भविष्य बताता है, कोई चमत्कार से किस्मत बदलने का दावा करता है। टीवी पर स्वयंभू बुद्धिजीवी ज्ञान बांटते हैं। संस्कृति के ठेकेदार तहजीब का सर्टिफिकेट जारी करते हैं। नारी मुक्ति के नाम पर कुछ लोग अपनी दुकान चलाते हैं। और इन सबके बीच कॉकरोच भी खूब फल-फूल रहे हैं; गंदगी में पलते हैं, खतरा भांपते ही बिल में घुस जाते हैं और मौका मिलते ही फिर बाहर निकल आते हैं।  

सवाल सीधा है। जब पाखंड का बाजार गर्म हो, अंधविश्वास की दुकान सज जाए और दिखावे के सौदागर समाज पर छा जाएं, तो सच की आवाज कौन उठाएगा? जवाब होना चाहिए: मीडिया। लेकिन अफसोस, कई बार मीडिया खुद इस तमाशे का हिस्सा बन जाता है। खबर कम, नौटंकी ज्यादा। सवाल कम, शोर ज्यादा। जनता कभी तालियां बजाती है, कभी माथा पीटती है और कभी रिमोट उठाकर चैनल बदल देती है।  

कभी मीडिया को लोकतंत्र का चौथा खंभा कहा जाता था। उसका काम था सत्ता से सवाल पूछना, जनता की आवाज उठाना और हुक्मरानों को आईना दिखाना। आज कई चैनलों को देखकर लगता है कि आईना तो मौजूद है, लेकिन उसमें सच्चाई दिखाने के बजाय सत्ता की आरती उतारी जा रही है।  

टीवी खोलकर देखिए। एंकर की आवाज आसमान छू रही है। स्टूडियो में बैठे प्रवक्ता एक-दूसरे पर ऐसे टूट पड़ते हैं मानो देश की सारी समस्याओं का हल विरोधी को चुप कराने में छिपा हो। बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रदूषण जैसे मुद्दे कोने में खड़े अपनी बारी का इंतजार करते रहते हैं। उनकी सुनता कौन है? राजनीतिक झगड़े में टीआरपी की मलाई जो मिलती है! जनता को चाहिए रोजगार, मगर टीवी पर मिलता है शोर।  

उदाहरण लें: जब दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण का स्तर खतरनाक स्तर पर पहुंच जाता है और अस्पतालों में सांस के मरीज बढ़ जाते हैं, तो कई चैनल घंटों राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और ‘कौन जिम्मेदार’ के शोर में उलझे रहते हैं। उसी समय कोई बाबा ‘वायु शुद्धि यज्ञ’ या ‘ग्रह दोष निवारण’ का कार्यक्रम चला रहा होता है तो कैमरे तुरंत वहां पहुंच जाते हैं। वैज्ञानिक उपायों और जमीनी रिपोर्टिंग की जगह सनसनी और चमत्कार को प्राथमिकता मिल जाती है।  

पत्रकारिता का मिशन पीछे छूट रहा है और कारोबार आगे निकल रहा है। सवाल पूछने वाले पत्रकार की जगह कई बार ऐसे चेहरे दिखाई देते हैं जो सत्ता के प्रवक्ता होने का भ्रम पैदा करते हैं। मीडिया की आजादी का मतलब केवल अखबार छापना या टीवी चैनल चलाना नहीं है। असली आजादी है बिना डर के सच सामने रखना। लेकिन जब मीडिया का मालिकाना हक कुछ बड़े कारोबारी समूहों तक सिमटने लगे, तब चिंता स्वाभाविक है। बड़े कारोबारियों के अपने हित होते हैं, सत्ता से रिश्ते होते हैं और सरकारी विज्ञापनों का महत्व होता है। ऐसे में संपादक के सामने धर्मसंकट खड़ा हो सकता है।  

इसी माहौल में ‘गोदी मीडिया’ जैसे शब्द लोकप्रिय हुए हैं। यह राजनीतिक कटाक्ष है, लेकिन इसके पीछे निष्पक्षता को लेकर जनता का अविश्वास भी दिखाई देता है। सरकार की तारीफ करना गलत नहीं, उसकी आलोचना करना भी अपने आप में कोई क्रांति नहीं। असली पत्रकारिता तथ्यों के आधार पर दोनों काम करती है। सरकार अच्छा करे तो तारीफ मिले, गलती करे तो सवाल उठें। पत्रकारिता का धर्म किसी की आरती उतारना नहीं, बल्कि जनता के सामने सच रखना है।  

जनसंचार के जानकार प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं, “आज खबर की अहमियत कई बार इस बात से तय होती है कि वह कितनी सनसनी पैदा कर सकती है। किसी अभिनेता का बयान, किसी नेता की तकरार या किसी बाबा का चमत्कार घंटों चल सकता है। लेकिन सरकारी अस्पताल में दवाइयां नहीं हैं, स्कूल में शिक्षक नहीं हैं या गांव में पीने का पानी नहीं है, तो खबर के लिए जगह कम पड़ जाती है।”  

समाज सेविका विद्या झा का कहना है, “बाबाओं, ज्योतिषियों और चमत्कार बेचने वालों के लिए कैमरे हमेशा तैयार रहते हैं। कोई भविष्य बताता है, कोई बीमारी दूर करने का दावा करता है और कोई भक्तों को स्वर्ग का टिकट बेचने का भरोसा देता है। मीडिया का काम इन दावों की जांच करना है, न कि बिना सवाल पूछे उनका प्रचार करना।”  

एक और उदाहरण: कुछ वर्ष पहले एक स्वयंभू बाबा ने दावा किया था कि वह कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों को ‘दिव्य शक्ति’ से ठीक कर सकते हैं। कई चैनलों ने बिना किसी वैज्ञानिक जांच के उनके कार्यक्रमों को घंटों प्रसारित किया। बाद में जब मरीजों की शिकायतें सामने आईं और अदालती प्रक्रिया शुरू हुई, तब मीडिया का रुख बदल गया। लेकिन तब तक हजारों लोग भ्रमित हो चुके थे। चमत्कार का तमाशा बिकता है, इसलिए कैमरा वहीं टिक जाता है। वैज्ञानिक सोच की बात करने वाले पीछे रह जाते हैं।  

डिजिटल दौर में झूठ को सजाकर सच के रूप में बेचना आसान हो गया है। कभी पुराना वीडियो नई घटना बताकर दिखाया जाता है, कभी किसी तस्वीर के साथ मनगढ़ंत कहानी जोड़ दी जाती है। सोशल मीडिया की अफवाह जांच-पड़ताल के बिना ब्रेकिंग न्यूज बन जाती है। फैक्ट-चेक मंचों की जरूरत इसी कारण बढ़ी है। लेकिन जिम्मेदारी केवल दूसरों की खबरों की जांच करना नहीं है। हर मीडिया संस्थान को अपनी खबरों की सच्चाई भी सुनिश्चित करनी चाहिए।  

पैसे लेकर खबर दिखाने या छापने का कारोबार भी कम खतरनाक नहीं है। जब विज्ञापन और खबर के बीच का फर्क मिटने लगे, तो पाठक कैसे पहचाने कि वह पत्रकारिता पढ़ रहा है या किसी का प्रचार? कार्यकर्ता सच्चेंद्र सिंह कहते हैं, “जनता को जानने का पूरा हक है कि उसके सामने रखी सामग्री खबर है या विज्ञापन। पत्रकारिता कोई किराना दुकान नहीं, जहां पैसे देकर मनचाहा सच तौल लिया जाए।”  

पत्रकारों पर मुकदमे, छापे और पूछताछ की खबरें भी बढ़ रही हैं। हर जांच को पत्रकारिता पर हमला कहना उचित नहीं। कानून सबके लिए बराबर होना चाहिए। लेकिन यदि कानून का इस्तेमाल आलोचनात्मक आवाजों को दबाने के लिए होने लगे, तो लोकतंत्र की सेहत बिगड़ती है।  

मीडिया में सामाजिक प्रतिनिधित्व का सवाल भी महत्वपूर्ण है। गांवों में पानी की किल्लत, किसानों की मुश्किलें, मजदूरों का पलायन और अस्पतालों की बदहाली भी बड़ी खबरें हैं। लेकिन इन मुद्दों पर रिपोर्टिंग करने में मेहनत लगती है। गांव जाना पड़ता है, लोगों से मिलना पड़ता है और आंकड़ों की जांच करनी पड़ती है। जबकि स्टूडियो में बैठकर किसी को देशद्रोही या राष्ट्रवादी घोषित करना बेहद आसान है।  

नदियां प्रदूषित हों, शहरों में पानी का संकट बढ़े या जलवायु परिवर्तन से खेती प्रभावित हो, तो इन विषयों पर लगातार रिपोर्टिंग होनी चाहिए। मगर कई बार किसी गंभीर मुद्दे की उम्र अगले राजनीतिक विवाद तक ही रहती है। बंगलौर की युवा पत्रकार मुक्त गुप्ता बताती हैं कि मीडिया की दुनिया में कुछ स्वयंभू बुद्धिजीवी भी खूब चमक रहे हैं। "हर विषय पर ज्ञान बांटने को तैयार। तथ्य हों या न हों, आत्मविश्वास में कोई कमी नहीं।  नारीवाद के नाम पर भी कभी-कभी दिखावे की दुकान सज जाती है। महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई को केवल प्रचार और सोशल मीडिया की लोकप्रियता तक सीमित करना आंदोलन के साथ नाइंसाफी है। "

जनता का भरोसा मीडिया की सबसे बड़ी पूंजी है। आज भी कई पत्रकार जोखिम उठाकर सच सामने लाते हैं। छोटे डिजिटल मंच और स्वतंत्र प्रकाशन भी ऐसे मुद्दों को उठाते हैं जिन्हें बड़े संस्थान नजरअंदाज कर देते हैं। यह उम्मीद की किरण है। लेकिन कुछ ईमानदार पत्रकारों के भरोसे पूरे मीडिया की साख नहीं बच सकती। इसके लिए मालिकाना हक में पारदर्शिता, विज्ञापन और खबर के बीच साफ अंतर, गलतियों का सार्वजनिक सुधार और संपादकीय स्वतंत्रता जरूरी है।  

सनसनी की जगह तथ्य-जांच को महत्व देना होगा। सामाजिक विविधता बढ़ानी होगी। जनहित की खबरों को प्राथमिकता देनी होगी। मीडिया को समझना होगा कि जनता केवल मनोरंजन नहीं चाहती। उसे जानना है कि महंगाई क्यों बढ़ रही है, रोजगार कहां हैं, सरकारी योजनाओं का पैसा कहां खर्च हो रहा है और उसके बच्चों का भविष्य कितना सुरक्षित है।  

इन सवालों से मुंह मोड़कर कोई भी संस्थान लंबे समय तक जनता का भरोसा नहीं जीत सकता। मीडिया सत्ता का दरबारी है या जनता का पहरेदार? यही असली सवाल है। लोकतंत्र में पत्रकार का काम किसी सरकार को गिराना या किसी पार्टी को जिताना नहीं है। उसका धर्म सच तलाशना, सवाल पूछना और जनता तक सही जानकारी पहुंचाना है। सरकार किसी भी दल की हो, पत्रकारिता की कसौटी एक ही रहनी चाहिए।  

और कॉकरोचों से भरे कमरे में केवल झाड़ू दिखाने से काम नहीं चलेगा। गंदगी साफ करनी होगी और रोशनी भी लानी होगी। याद रखिए, लोकतंत्र को खतरा केवल झूठ बोलने वालों से नहीं होता। खतरा उन लोगों से भी होता है जो सच जानते हैं, लेकिन खामोश रहते हैं। क्योंकि जब मीडिया सवाल पूछना छोड़ देता है, तो सत्ता जवाब देना भी जरूरी नहीं समझती। और जब जनता की आवाज दब जाती है, तब लोकतंत्र का चौथा खंभा खड़ा तो रहता है, मगर उसकी आत्मा दम तोड़ने लगती है।

Wednesday, October 14, 2026

 दूर के ढोल सुहाने!

यूरोप की चमक-दमक और खाली जेब!

ज्यादा कमाई, ज्यादा मेहनत, फिर भी महीने के अंत में कंगाली!

यूरोप यात्रा ने सिखाया जिंदगी का असली हिसाब-किताब

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बृज खंडेलवाल द्वारा

16 अक्टूबर 2026

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यूरोप की चमचमाती सड़कें, साफ-सुथरी नदियां, शानदार इमारतें और समय पर दौड़ती ट्रेनें देखकर मन खुश हो जाता है। लगता है, बस यहीं बस जाएं! 

लेकिन जैसे ही जेब से पैसे निकलने शुरू होते हैं, सपनों की दुनिया में महंगाई का भूत नाचने लगता है। खूबसूरती अपनी जगह है, मगर जिंदगी चलाने का खर्चा देखकर अच्छे-अच्छों के पसीने छूट जाते हैं। आखिर यह कैसी तरक्की है, जहां कमाई लाखों में और बचत कौड़ियों में रह जाती है?

मेरी हाल की यूरोप यात्रा ने बहुत कुछ सिखाया। खूबसूरत शहर देखे, नदियों के किनारे घूमे, शानदार सार्वजनिक सुविधाएं देखीं और लोगों का अनुशासन भी। लेकिन साथ ही समझ आया कि यहां जिंदगी जीना कोई मुफ्त का तमाशा नहीं है। यहां तो प्रकृति की पुकार सुनने के लिए भी जेब ढीली करनी पड़ सकती है!

भारत में सार्वजनिक शौचालय अक्सर मुफ्त मिल जाते हैं या कुछ रुपये देकर काम चल जाता है। हां, बदबू ऐसी कि नाक बंद करके भागने का मन करे। कई जगह पानी गायब, सफाई नदारद और दरवाजे का भरोसा भगवान भरोसे! 

लेकिन कम से कम जेब तो सलामत रहती है। यूरोप में सार्वजनिक शौचालयों में एक यूरो, यानी करीब सौ रुपये या उससे ज्यादा, खर्च करने पड़ सकते हैं। सोचिए, पेट खराब हो और जेब खाली हो, तो आदमी जाए तो जाए कहां? यहां तो कुदरत की पुकार भी आर्थिक संकट बन सकती है!

टैक्सी का हाल भी कुछ ऐसा ही है। भारत में पांच किलोमीटर की सवारी सौ-दो सौ रुपये में मिल सकती है, जबकि यूरोप के बड़े शहरों में यही सफर पंद्रह सौ से ढाई हजार रुपये तक पड़ सकता है। बस या मेट्रो का टिकट भी कई बार दो-तीन सौ रुपये का होता है। एक कप कॉफी चार-पांच सौ रुपये की और मामूली दोपहर का भोजन पंद्रह सौ रुपये के आसपास! पत्नी को रेस्तरां में खाना खिलाकर निकलिए, तो रास्ते में हिसाब लगाने लगेंगे कि अगली बार घर पर खिचड़ी बनाना ही बेहतर रहेगा।

सुपरमार्केट में फल-सब्जियां खरीदना भी किसी परीक्षा से कम नहीं। सेब, केला, टमाटर, आलू और प्याज के दाम देखकर भारतीय ग्राहक की आंखें फैल जाती हैं। दूध और ब्रेड भी सस्ते नहीं। आप कुछ जरूरी सामान खरीदने जाते हैं और बिल देखकर लगता है कि गलती से पूरा सुपरमार्केट ही खरीद लिया! सबसे सस्ता टूथ ब्रश 350 रुपए का था, सोचा उंगली से ही कुछ दिन काम चला लें।

मगर सबसे बड़ा झटका मकान का किराया देता है। एम्स्टर्डम में एक छोटे से फ्लैट का किराया महीने का दो लाख रुपये या उससे ज्यादा हो सकता है। पेरिस, बर्लिन और ब्रसेल्स भी कम महंगे नहीं हैं। दूसरी तरफ, आगरा में दस-पंद्रह हजार रुपये में ठीकठाक फ्लैट मिल सकता है। तीन कमरों वाला घर भी यूरोप के बड़े शहरों की तुलना में काफी कम किराये पर उपलब्ध हो सकता है।

जरा हिसाब लगाइए। यूरोप में एक महीने का किराया कभी-कभी आगरा में पूरे साल के किराये से भी ज्यादा बैठता है। मकान मालिक तो मालामाल हो जाए और किरायेदार की जेब में हवा बचे! महीने की शुरुआत में तनख्वाह देखकर खुशी होती होगी, लेकिन किराया, बिजली, खाना और आने-जाने का खर्च कटते ही खुशी काफूर हो जाती होगी।

बेशक, यूरोप में वेतन भारत से काफी ज्यादा है। लेकिन खर्च भी उसी रफ्तार से दौड़ते हैं। ज्यादा कमाई का मतलब हमेशा ज्यादा बचत नहीं होता। आदमी सुबह से शाम तक मेहनत करे, टैक्स भरे, मकान का किराया चुकाए और फिर महीने के आखिर में बैंक खाते को ऐसे देखे, जैसे डॉक्टर मरीज की नब्ज देखता है।

स्वास्थ्य सेवाओं में भी तस्वीर मिली-जुली है। यूरोप में सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था कई देशों में अच्छी है, लेकिन निजी डॉक्टर, विशेषज्ञ और कुछ इलाज काफी महंगे पड़ सकते हैं। भारत में डॉक्टर की फीस और अस्पताल का खर्च तुलनात्मक रूप से कम है। हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था में कमियां जरूर हैं, मगर यहां कम आमदनी वाला व्यक्ति भी अपनी हैसियत के मुताबिक इलाज के विकल्प तलाश सकता है।

अब भारत की एक ऐसी खूबी पर आइए, जिसका हिसाब किसी अर्थशास्त्री की किताब में आसानी से नहीं मिलेगा।

हमारे यहां मंदिरों, गुरुद्वारों और सामाजिक संस्थाओं में रोज लाखों लोगों को भोजन मिलता है। गुरुद्वारे का लंगर हो या मंदिर का भंडारा, भूखे पेट को खाना खिलाने की परंपरा आज भी करोड़ों लोगों के लिए सहारा है। वहां किसी से यह नहीं पूछा जाता कि जेब में कितने रुपये हैं, कौन-सी गाड़ी से आए हैं या बैंक खाते में कितना पैसा है। आओ, बैठो और भोजन करो। इंसानियत का इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा?

यूरोप में भी चैरिटी, फूड बैंक और जरूरतमंदों के लिए सामुदायिक रसोई हैं। लेकिन भारत में धार्मिक संस्थाओं के जरिए मुफ्त भोजन की परंपरा का अपना अलग विस्तार और सामाजिक महत्व है।

पानी का मामला भी दिलचस्प है। भारत में अनेक सार्वजनिक स्थानों, मंदिरों और गुरुद्वारों में पीने का पानी मुफ्त मिल जाता है। यूरोप में नल का पानी कई जगह साफ और पीने योग्य है, लेकिन कैफे में बोतलबंद पानी खरीदने जाएं तो बिल देखकर गला सूख सकता है। पानी पीने आए थे, मगर कीमत देखकर प्यास ही मर गई!

हां, भारत की कमजोरियां भी कम नहीं हैं। गंदे शौचालय, प्रदूषित नदियां, कूड़े के ढेर, ट्रैफिक और बदहाल नागरिक सुविधाएं हमें मुंह चिढ़ाती हैं। यूरोप से हमें शहरों की योजना, नदियों की सफाई, सार्वजनिक परिवहन और नागरिक अनुशासन सीखना चाहिए। खूबसूरत नदियां और साफ सार्वजनिक स्थान अपने आप नहीं बनते। इनके पीछे बेहतर व्यवस्था, पैसा और नागरिक जिम्मेदारी होती है।

लेकिन यूरोप की चमक देखकर अपनी हर चीज को बेकार समझ लेना भी नासमझी होगी। वहां सुविधाएं अच्छी हैं, मगर उनकी कीमत भी चुकानी पड़ती है। भारत में जीवनशैली की कई परतें हैं। कोई पांच सितारा होटल में भोजन करता है, तो कोई सड़क किनारे ढाबे पर। कोई मॉल में खरीदारी करता है, तो कोई साप्ताहिक बाजार में मोलभाव करके खुश होता है। दोनों अपनी हैसियत के मुताबिक जिंदगी का आनंद ले सकते हैं।

मेरी यूरोप यात्रा आंखें खोलने वाली रही। वहां की नदियों, शहरों और व्यवस्थाओं से बहुत कुछ सीखने को मिला। लेकिन लौटकर भारत की कुछ खूबियों की अहमियत भी समझ आई। यहां कम पैसों में गुजारा करने के रास्ते ज्यादा हैं, सामाजिक सहयोग की परंपरा मजबूत है और जिंदगी के कई विकल्प उपलब्ध हैं।

यूरोप हमें सिखाता है कि शहर कैसे सुंदर और व्यवस्थित बनाए जाएं। भारत याद दिलाता है कि जिंदगी का आनंद केवल मोटी तनख्वाह से नहीं मिलता।

आखिर में बात इतनी सी है। चमक-दमक देखकर ही किसी जिंदगी को खुशहाल मत मानिए। कभी-कभी चमकती दुकान के पीछे महंगे बिलों का अंबार होता है। और कभी किसी गुरुद्वारे के लंगर में मिली दाल-रोटी, मुफ्त पानी और जेब में बचे सौ रुपये ही जिंदगी का असली खजाना बन जाते हैं!

Tuesday, October 13, 2026

 त्यौहारी धमाका! बाजारों में रौनक, खरीदारी के नए रिकॉर्ड की आस

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कपड़ों से कारों तक, गहनों से गैजेट्स तक छूट की बहार, आसान किस्तों का सहारा और छोटे शहरों से उठती खरीदारी की लहर

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बृज खंडेलवाल द्वारा

15 अक्टूबर 2026

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जरा दिल्ली, मुंबई  के किसी बड़े बाजार का नजारा देखिए। शाम ढलते ही दुकानों की जगमगाती रोशनी आंखों को चौंधिया रही है। कपड़ों के शोरूम में रंग-बिरंगी साड़ियों, डिजाइनर लहंगों और चमचमाते सूटों की बहार है। गहनों की दुकानों में सोना-चांदी दमक रहे हैं। कहीं हीरे की अंगूठियां ग्राहकों को लुभा रही हैं, तो कहीं सोने की चेन पर नजरें टिक गई हैं।

उधर, सड़क के दूसरी ओर कारों के शोरूम सजे हैं। चमचमाती नई गाड़ियां ऐसे खड़ी हैं, मानो ग्राहकों को अपने साथ घर चलने का न्योता दे रही हों। मोटरसाइकिलों के शोरूम में भी भीड़ कम नहीं है। मोबाइल, टीवी, फ्रिज, वाशिंग मशीन और दूसरे घरेलू सामानों की दुकानों पर छूट के बड़े-बड़े बोर्ड टंगे हैं। मिठाइयों की खुशबू, दुकानदारों की आवाजें और ग्राहकों की चहल-पहल मिलकर ऐसा समां बांध रहे हैं कि मंदी की चर्चा कुछ देर के लिए तो कोने में दुबक जाती है।

अखबारों के फुल पेज विज्ञापन देखकर लग रहा है कि इस त्यौहारी सीजन में खरीदारी के नए रिकॉर्ड बनेंगे।  बाजारों के चेहरे पर चमक देखकर तो यही लगता है। 

व्यापारियों के संगठन कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAIT) का अनुमान है कि नवरात्र से दिवाली तक देश में कारोबार सात लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच सकता है। पिछले साल यह आंकड़ा लगभग 6.05 लाख करोड़ रुपये था। इस बार 15 से 18 प्रतिशत बढ़ोतरी की उम्मीद है।

मगर सवाल यह है कि इस संभावित उछाल के पीछे कौन से पांच कारक काम कर रहे हैं?

महंगाई और खर्चों की मार के बीच भी त्योहारों का आकर्षण कम नहीं हुआ है। कई ग्राहक, जिन्होंने पहले कपड़े, घरेलू सामान या गाड़ी खरीदने का इरादा टाल दिया था, अब खरीदारी के लिए तैयार दिख रहे हैं।

कुछ सर्वेक्षणों के अनुसार, लगभग आधे खरीदार पिछले साल के मुकाबले कम से कम 10 प्रतिशत अधिक खर्च करने की योजना बना रहे हैं। यानी इस बार जेब कुछ ज्यादा ढीली हो सकती है।

कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक सामान, गाड़ियां और जीवनशैली से जुड़ी चीजें खरीदने की मांग बढ़ने की उम्मीद है। दुकानदारों को आस है कि त्योहारों का उत्साह उनके गल्लों में भी बरकत लाएगा।

हालांकि, खरीदने की इच्छा और खरीदने की ताकत में फर्क होता है। बाजार की असली परीक्षा तभी होगी, जब ग्राहक सामान पसंद करने के बाद बिल चुकाने को भी तैयार हों।

इस बार त्योहारों की रौनक लंबे समय तक बाजारों को गुलजार रख सकती है। ओणम से छठ तक फैला त्योहारों का सिलसिला लगभग 80 दिनों का बताया जा रहा है, जबकि पिछले साल यह अवधि करीब 52 दिन थी।

ओणम, गणेश चतुर्थी और नवरात्र के दौरान मिले शुरुआती संकेतों ने कारोबारियों की उम्मीदें बढ़ाई हैं। ऑनलाइन खरीदारी के मंचों पर भी ग्राहकों की आवाजाही बढ़ने की खबरें हैं।

अमेजन के ग्रेट इंडियन फेस्टिवल जैसे बिक्री अभियानों ने भी बाजार में उत्साह बढ़ाया है। शुरुआती आंकड़ों में पिछले साल की तुलना में कुछ श्रेणियों में ऑर्डर दोगुने से अधिक होने की खबरें सामने आई हैं।

लंबा त्योहारों का मौसम दुकानदारों को बिक्री के ज्यादा मौके देता है। ग्राहकों को भी खरीदारी के लिए अधिक समय मिलता है। लेकिन लंबा मौसम अपने आप में ज्यादा बिक्री की गारंटी नहीं है। आखिरकार फैसला ग्राहक की जेब ही करेगी।

कीमतों में राहत मिले तो ग्राहक का दिल भी खरीदारी के लिए मचलने लगता है। जीएसटी में हालिया कटौती और दरों के युक्तिकरण से कुछ श्रेणियों में सामान सस्ता हुआ है। इनमें वाहन और कई उपभोक्ता वस्तुएं शामिल हैं।

इसके साथ ही आसान किस्तों, बैंक ऑफरों और पुराने सामान के बदले नई चीज खरीदने की योजनाओं ने भी ग्राहकों को आकर्षित किया है।

अब नई कार खरीदने के लिए पूरी रकम एक साथ जुटाना जरूरी नहीं। मोबाइल, टीवी और फ्रिज भी किस्तों पर घर लाए जा सकते हैं। खरीदारी के लिए अभी पैसा कम पड़ रहा हो तो कुछ योजनाएं भुगतान को आगे टालने का विकल्प भी देती हैं।

खरीदारी का नक्शा तेजी से बदल रहा है। अब बाजार की धड़कन केवल दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और दूसरे महानगरों में नहीं सुनाई देती। छोटे शहरों और कस्बों में भी ग्राहकों के अरमान कुलांचे भर रहे हैं।

टियर-दो और टियर-तीन शहरों से ऑनलाइन खरीदारी में बड़ी हिस्सेदारी आने की खबरें हैं। कुछ बाजारों में इस कारोबार की बढ़ोतरी 50 प्रतिशत से अधिक बताई गई है। कई रिपोर्टों के अनुसार, त्योहारों के दौरान ऑनलाइन ऑर्डर का 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा छोटे शहरों से आ रहा है।

इन शहरों के ग्राहक भी अब महंगे स्मार्टफोन, आधुनिक घरेलू उपकरण, स्मार्ट घड़ियां और आकर्षक घरेलू सजावट का सामान खरीदना चाहते हैं। छोटे शहरों में बड़े ब्रांडों की पहुंच बढ़ी है और ऑनलाइन खरीदारी ने दूरियों को काफी हद तक मिटा दिया है।

क्विक कॉमर्स यानी कुछ ही मिनटों में सामान पहुंचाने वाली सेवाएं भी इस रौनक में अपना हिस्सा जोड़ रही हैं। मिठाई, फल, सजावट का सामान या कोई जरूरी चीज चाहिए, तो मोबाइल पर उंगली घुमाइए और इंतजार कीजिए।

कुछ जरूरी वस्तुओं की महंगाई में नरमी, शहरों में रोजगार और आमदनी के रुझान तथा घरेलू खर्च की बदलती प्राथमिकताएं भी त्योहारों की खरीदारी को सहारा दे सकती हैं।

कुछ परिवार महंगी यात्राओं पर खर्च घटाकर घर की सजावट, नए कपड़ों, घरेलू उपकरणों और पारिवारिक समारोहों पर पैसा लगाना पसंद कर सकते हैं। हवाई किराये, ईंधन की लागत और अनिश्चितता के बीच घर पर त्योहार मनाना कुछ लोगों को बेहतर विकल्प लग सकता है।

हालांकि, ग्रामीण बाजारों की तस्वीर हर जगह एक जैसी नहीं है। कहीं मांग अच्छी है, तो कहीं मानसून के असर और आमदनी की स्थिति ने खरीदारी को प्रभावित किया है। इसलिए पूरे देश में एक जैसी तेजी की उम्मीद करना जल्दबाजी होगी।

त्योहारों की अच्छी बिक्री का असर केवल दुकानदारों तक सीमित नहीं रहता। ज्यादा खरीदारी से परिवहन, गोदामों, पैकेजिंग, होटल, रेस्तरां, पर्यटन, सजावट और ऑनलाइन सामान पहुंचाने वाली सेवाओं को भी काम मिलता है।

जब कंपनियों की बिक्री बढ़ने की उम्मीद मजबूत होती है, तो उनके मुनाफे को लेकर भी बाजार में आशावाद पैदा हो सकता है। इससे शेयर बाजार की धारणा को सहारा मिल सकता है। हालांकि, शेयर बाजार की चाल पर कई दूसरे आर्थिक और वैश्विक कारक भी असर डालते हैं।

कुल मिलाकर, इस दिवाली बाजार में उत्साह की पांच धाराएं मिलकर बह रही हैं। ग्राहकों का भरोसा, लंबे त्योहार, करों में राहत, आसान किस्तें और छोटे शहरों की बढ़ती ताकत कारोबार को नई ऊंचाई दे सकती हैं।


Monday, October 12, 2026

 लड़ाई समोसा, कचौड़ी की नहीं, न्याय की है!

नारेबाजी की क्रांति या बदलाव की लड़ाई? क्या कैंपस की आवाज़ आधी आबादी की आवाज़ है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

14 अक्टूबर 2026

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क्या होगा जब किसी पार्क में एक नाबालिग लड़की के साथ कथित सामूहिक बलात्कार हो और इंसाफ की मांग का शोर चंद मिनटों में तुकबंदी के मुकाबले में बदल जाए? 

जरूर, पुलिस से जवाब मांगे जाने चाहिए, अफसरों की जवाबदेही तय होनी चाहिए और बेटियों की हिफाजत सुनिश्चित होनी चाहिए। लेकिन दिल्ली में एक गंभीर वारदात के बाद सोशल मीडिया पर कुछ ऐसे नारे छा गए, मानो इंसाफ की लड़ाई नहीं, कोई हास्य कवि सम्मेलन चल रहा हो!

सवाल सीधा है। क्या दिल्ली के नामी कॉलेजों में गूंजते ये नारे देश की आधी आबादी की असली आवाज़ हैं, या फिर चंद खुशहाल घरों की बेटियों का गुस्सा, जिसे सोशल मीडिया ने सिर आंखों पर बिठा लिया है?

21 सितंबर 2026 की शाम दिल्ली के कालकाजी मंदिर के पास आस्था कुंज पार्क में एक 17 वर्षीय लड़की अपना जन्मदिन मना रही थी। वह एक पुरुष मित्र के साथ थी। आरोप है कि तीन लोगों ने खुद को पुलिसकर्मी बताकर उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया। दिल्ली पुलिस ने 12 घंटे के भीतर आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया।

लेकिन पार्क की बदइंतजामी भी सामने आई। कई प्रवेश द्वारों पर सीसीटीवी कैमरे नहीं थे। अंधेरा था और सुरक्षा गार्डों की भी कमी थी। उपराज्यपाल तरनजीत सिंह संधू ने दिल्ली के पार्कों की सुरक्षा जांचने के आदेश दिए। दिल्ली विकास प्राधिकरण ने सूर्यास्त के बाद प्रवेश पर पाबंदी लगाई और निगरानी बेहतर करने का भरोसा दिया।

मगर सवाल है कि आखिर एक लड़की का जन्मदिन खौफनाक हादसे में क्यों बदल गया? बेटियों को अपनी आजादी की कीमत डर और पाबंदियों से क्यों चुकानी पड़े?

घटना के बाद लेडी श्रीराम कॉलेज, मिरांडा हाउस, गार्गी और कमला नेहरू कॉलेज की छात्राएं ‘हम औरतें आजाद हैं’ के बैनर तले सड़कों पर उतरीं।

कुछ नारे असरदार थे, तो कुछ ने गंभीर आंदोलन को कैंटीन की गपशप जैसा बना दिया।

“एक कचौरी, दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा!”

“एक सिगरेट, दो चाय, मर्द जात हाय हाय!”

“मेरे सर में दर्द है, इसका कारण मर्द है!”

और फिर फरमाया गया, “हमारी स्कर्ट नहीं है छोटी, इन मर्दों की सोच है छोटी!”

वाह! तुकबंदी ऐसी कि इंस्टाग्राम पर रीलें बन जाएं। गुस्सा भी जाहिर हो गया और मनोरंजन का इंतजाम भी हो गया।

लेकिन जनाब, जरा ठहरिए! क्या इन नारों से पार्कों की बत्तियां जल उठेंगी? क्या गायब सीसीटीवी कैमरे अपने आप लग जाएंगे? क्या पुलिस की गश्त बढ़ जाएगी? और क्या अदालतों में वर्षों से लटके मुकदमे फटाफट निपटने लगेंगे?

नारे ध्यान खींच सकते हैं, मगर सुरक्षा का इंतजाम नहीं कर सकते।

हालांकि छात्राओं ने कुछ बेहद जरूरी बातें भी उठाईं। “रेपिस्ट को अंदर करो, लड़कियों को नहीं” जैसे नारे ने उस पुरानी सोच पर चोट की, जिसमें अपराधी को पकड़ने के बजाय लड़कियों पर पाबंदियां लगा दी जाती हैं।

एक और संदेश था कि बेटियों की लोकेशन पूछने के बजाय बेटों की नीयत जांचिए।

बिल्कुल सही! बेटी कहां गई, क्या पहना और किससे मिली, इन सवालों की लंबी फेहरिस्त बनाने वाले परिवारों को बेटों के व्यवहार पर भी गौर करना चाहिए।

मगर अफसोस, गंभीर संदेश अक्सर मसालेदार तुकबंदी के शोर में दब जाते हैं।

अब असली सवाल पर आइए। क्या दिल्ली के नामी कॉलेजों में पढ़ने वाली छात्राएं करोड़ों भारतीय महिलाओं की नुमाइंदगी करती हैं?

एक खेत में मजदूरी करने वाली महिला, मुंबई के घरों में बर्तन मांजने वाली कामगार, उत्तर प्रदेश के किसी गांव की बहू और दिल्ली के किसी बड़े कॉलेज की छात्रा, सभी को सुरक्षा और सम्मान चाहिए। लेकिन उनकी जिंदगी की मुश्किलें एक जैसी नहीं हैं।

किसी लड़की के लिए आजादी का मतलब अपनी पसंद के कपड़े पहनना हो सकता है। किसी दूसरी के लिए इसका मतलब स्कूल पूरा करना है। किसी महिला के लिए नौकरी पाना आजादी है, तो किसी के लिए घरेलू हिंसा से छुटकारा।

गरीब महिला के सामने अक्सर रोटी, रोजगार और छत की चिंता खड़ी होती है। उसकी आजादी परिवार की आर्थिक हालत से भी जुड़ी होती है। कई महिलाओं के लिए परिवार ही मुश्किल वक्त का सहारा है।

पब्लिक कमेंटेटर प्रोफ पारस नाथ चौधरी कहते हैं, "इसका मतलब यह नहीं कि पुरानी परंपराओं पर सवाल नहीं उठने चाहिए। लेकिन हर परिवार, हर पुरुष और हर सामाजिक रिश्ता दुश्मन नहीं होता।

भारतीय नारी आंदोलन ने शिक्षा, संपत्ति में अधिकार, घरेलू हिंसा से सुरक्षा और रोजगार के बराबर अवसरों के लिए लंबी लड़ाई लड़ी है। यह संघर्ष केवल नारों से नहीं, बल्कि कानून, सामाजिक सुधार और लगातार मेहनत से आगे बढ़ता है। देश में महिलाओं की रोजगार में भागीदारी बढ़ी है, लेकिन रास्ता अभी लंबा है। गांवों और शहरों, अमीरों और गरीबों के बीच बड़ा फर्क मौजूद है।"

क्या इन महिलाओं की आवाज़ इसलिए कम अहम है, क्योंकि वे सोशल मीडिया पर वायरल नहीं होतीं?

सोशल एक्टिविस्ट पद्मिनी अय्यर कहती हैं, "छात्राओं को विरोध करने का पूरा हक है। गुस्सा जायज है। व्यंग्य और हास्य भी समाज की बुराइयों पर चोट कर सकते हैं। लेकिन आंदोलन की असली परीक्षा अगले दिन होती है, जब कैमरे हट जाते हैं और भीड़ अपने घर लौट जाती है।

पार्कों में रोशनी कौन सुनिश्चित करेगा? सीसीटीवी कैमरों की निगरानी कौन करेगा? पुलिस की गश्त पर नजर कौन रखेगा? पीड़िताओं को कानूनी मदद कौन देगा? अदालतों में मुकदमों की सुनवाई तेज कराने के लिए कौन आवाज उठाएगा?

युवा एडवोकेट, अंकुर के मुताबिक, "बलात्कार के मामलों में सजा की दर को लेकर गंभीर चिंता बनी हुई है, हालांकि आंकड़े अलग-अलग राज्यों, अदालतों और अवधियों के अनुसार बदलते हैं। गिरफ्तारी इंसाफ की पहली सीढ़ी है, आखिरी मंजिल नहीं। निष्पक्ष जांच, मजबूत सबूत और समय पर सुनवाई भी जरूरी हैं।"

सरकार केवल घोषणाएं करके अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। इसी तरह आंदोलनकारी भी नारे लगाकर अपना फर्ज पूरा नहीं मान सकते।

सामाजिक कार्यकर्ता मुक्त गुप्ता कहती हैं, " एक बात याद रखिए। सभी पुरुषों को एक ही तराजू में तौलना भी इंसाफ नहीं है। लड़ाई पुरुषों से नहीं, बल्कि अपराधी सोच, यौन हिंसा, दबंगई और दोषियों को बचाने वाली व्यवस्था से होनी चाहिए। पुरुषों को भी इस लड़ाई में भागीदार बनाना होगा।"

भारत को आंदोलनों की जरूरत है, मगर ऐसे आंदोलनों की जो कॉलेजों की चारदीवारी से निकलकर आम महिलाओं की जिंदगी से जुड़ें।

छात्राएं सुरक्षित पार्कों, बेहतर पुलिस व्यवस्था, तेज सुनवाई और पीड़िताओं की मदद के लिए अभियान चलाएं। मजदूर महिलाओं, ग्रामीण संगठनों, वकीलों, शिक्षकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर काम करें। सोशल मीडिया का इस्तेमाल भी हो, लेकिन वायरल वीडियो ही आंदोलन की मंजिल न बन जाएं।

आस्था कुंज की घटना प्रशासन की नाकामी पर सवाल उठाती है। इसका जवाब यह नहीं हो सकता कि लड़कियां शाम के बाद घरों में बैठी रहें और खतरनाक जगहों की बदइंतजामी जस की तस बनी रहे।

आखिर आंदोलन की कामयाबी लाइक, शेयर और तालियों से नहीं, जिंदगी में आए बदलाव से मापी जानी चाहिए।

एक नारा कॉलेज हिला सकता है। लेकिन असली क्रांति तभी होगी, जब उसका असर सड़क, गांव, दफ्तर और घर तक पहुंचे। जब आम महिला बिना खौफ जी सके, तभी समझिए कि नारेबाजी ने इंसाफ की राह पकड़ी है।