Sunday, May 31, 2026

 गलत नंबर, छूटी ट्रेन और फिसला संतरा: जब कामदेव ने किस्मत की पटकथा लिखी

अनेक रूपों में प्रेम की कृपा

___________________

बृज खंडेलवाल द्वारा

1 जून 2026

_________________________

प्रेम रस, प्रेम रोग या प्रेम का बीज आखिर कैसे  अंकुरित होता है?

क्या प्रेम गुलाब का फूल लेकर दरवाजे पर दस्तक देता है? क्या चांदनी रात में कोई मधुर संगीत बजने लगता है? क्या आसमान से फूल बरसते हैं?

फिल्में और धारावाहिक तो यही दिखाते हैं। लेकिन जिंदगी की पटकथा कुछ और ही होती है।

असल जीवन में प्रेम अक्सर बिना सूचना के आता है। कभी गलत नंबर बनकर फोन करता है। कभी भीड़ भरी ट्रेन में बगल की सीट पर बैठ जाता है। कभी किसी मामूली दुर्घटना में छिपा होता है। और कभी किसी ऐसी घटना में, जिसे याद करके इंसान पहले शर्मिंदा होता है और बाद में मुस्कुराता है।

लगता है प्रेम के देवता कामदेव को सीधे रास्ते पसंद ही नहीं हैं।

भारतीय मिथकों में भी प्रेम की राहें बड़ी टेढ़ी रही हैं। राजा दुष्यंत शिकार खेलने निकले थे, विवाह करने नहीं। लेकिन वन के एक आश्रम में शकुंतला से भेंट हुई और इतिहास बदल गया। नल और दमयंती ने पहले एक-दूसरे को देखा तक नहीं था। संदेशवाहक हंसों ने दोनों के बीच प्रेम का पुल बनाया। भगवान शिव की तपस्या भंग करने भेजे गए कामदेव स्वयं भस्म हो गए, लेकिन प्रेम का बीज बो गए।

शायद तभी से प्रेम संयोगों का सबसे बड़ा खिलाड़ी बना हुआ है।

आगरा के अध्यापक डॉ. राज की कहानी सुनिए। एक बरसाती शाम वे अपने एक सहयोगी को फोन मिलाने की कोशिश कर रहे थे। जल्दबाजी में नंबर गलत लग गया। दूसरी तरफ से एक महिला की आवाज आई। “उम्मीद है आप कोई टेलीमार्केटिंग वाले नहीं हैं।” राज हंस पड़े। बातचीत शुरू हुई। दस मिनट एक घंटे में बदल गए। फिर रोज बात होने लगी। फोन के उस पार ऋषिकेश की शिक्षिका अनीता थीं। आवाज पहचान बनी, पहचान अपनापन बनी और अपनापन रिश्ते में बदल गया। एक गलत नंबर ने सही जीवनसाथी दिला दिया।

लखनऊ की नेहा की प्रेम कहानी तो एक फिसलन से शुरू हुई। सुपरमार्केट का फर्श गीला था। पैर फिसला और संतरे पूरे गलियारे में बिखर गए। नेहा शर्म से भर उठीं। तभी एक युवा इंजीनियर अर्जुन उनकी मदद के लिए दौड़े। दोनों संतरे समेटते रहे और साथ-साथ हंसते रहे।

बाद में कॉफी हुई। फिर मुलाकातें। और फिर शादी। आज भी दोनों मजाक में कहते हैं कि उनकी शादी में सबसे बड़ा योगदान संतरे का था।

मथुरा के करण गोविंद की कहानी भारतीय रेलवे की सौजन्य से शुरू हुई। मुंबई जाने वाली ट्रेन में वह इतनी गहरी नींद में सो गए कि अपना स्टेशन ही पार कर गए। पहले तो उन्हें गुस्सा आया, लेकिन अगले कुछ घंटे उन्होंने सहयात्री अदिति के साथ बातचीत में बिताए। किताबों, यात्राओं, सपनों और संघर्षों पर चर्चा होती रही। सुबह तक मोबाइल नंबरों का आदान-प्रदान हो चुका था। दो साल बाद सात फेरे भी हो गए।

बेंगलुरु मेट्रो में रोहित ने एक युवती को अपनी सीट देने की पेशकश की। युवती ने मना कर दिया। रोहित ने फिर आग्रह किया। उसने फिर मना कर दिया। कुछ ही देर में दोनों के बीच यह बहस छिड़ गई कि आखिर सीट पर बैठने का ज्यादा अधिकार किसका है। पूरी बोगी मुस्कुरा रही थी। बहस बातचीत में बदली, बातचीत दोस्ती में और दोस्ती प्रेम में। कुछ वर्षों बाद वही दोनों विवाह के मंडप में थे।

पुणे की मीरा को नहीं मालूम था कि जन्मदिन पर मंगाया गया पिज्जा उनकी जिंदगी बदल देगा। मूसलाधार बारिश में भीगते हुए डिलीवरी बॉय समीर पिज्जा लेकर पहुंचे। दोस्तों ने उन्हें अंदर बुला लिया। चाय पिलाई, बातें हुईं और नंबरों का आदान-प्रदान हो गया। अगले दिन पिज्जा का डिब्बा कूड़े में चला गया, लेकिन रिश्ता बचा रहा।

चेन्नई के दो मेडिकल छात्रों अनन्या और विकी की कहानी और भी अलग है। उनकी पहली मुलाकात किसी पार्क या कैफे में नहीं हुई थी। एनाटॉमी लैब में घंटों साथ पढ़ते-पढ़ते दोनों के बीच दोस्ती हुई। फॉर्मेलिन की गंध, मोटी किताबों और कठिन परीक्षाओं के बीच प्रेम ने चुपचाप अपनी जगह बना ली।

आज दोनों डॉक्टर हैं, पति-पत्नी हैं और दो बच्चों के माता-पिता भी।

गुरुग्राम की पूजा की प्रेम कहानी एक छोटी-सी कार दुर्घटना से शुरू हुई।

पार्किंग करते समय उनकी कार दूसरे वाहन से हल्की-सी टकरा गई। नुकसान कम हुआ लेकिन बातचीत ज्यादा हो गई। बीमा की जानकारी साझा हुई, फिर कॉफी हुई, फिर मुलाकातें शुरू हुईं। कार का डेंट कुछ दिनों में गायब हो गया। रिश्ता नहीं।

और शायद सबसे खूबसूरत कहानी अहमदाबाद के हरीश और सुनीता की है। दोनों साठ वर्ष की आयु पार कर चुके थे। एक सार्वजनिक पुस्तकालय में मरम्मत का काम चल रहा था। हरीश को अपनी नियमित सीट छोड़नी पड़ी। खाली कुर्सी केवल सुनीता जी के पास थी। पहले अखबारों पर चर्चा हुई। फिर किताबों पर। फिर जीवन की स्मृतियों पर।

धीरे-धीरे अकेलापन साथ में बदल गया। दोनों ने विवाह कर लिया। प्रेम ने एक बार फिर साबित कर दिया कि उसे कैलेंडर पढ़ना नहीं आता।

इन सभी कहानियों में एक बात समान है। जिंदगी अपने सबसे बड़े मोड़ों की घोषणा नहीं करती। न कोई बिगुल बजता है, न कोई चेतावनी मिलती है। बस एक साधारण-सा पल आता है और चुपचाप जीवन की दिशा बदल देता है।

एक गलत नंबर। एक छूटी हुई ट्रेन।एक बिखरा हुआ संतरा। एक छोटी-सी टक्कर। या फिर पुस्तकालय की एक खाली कुर्सी।

फिल्में परफेक्ट प्रेम कहानियां गढ़ने पर करोड़ों रुपये खर्च करती हैं। जिंदगी वही काम मुफ्त में कर देती है।

शायद इसलिए हमारे पूर्वजों ने कामदेव को पुष्प-बाणधारी कहा था। उनके बाण दिखाई नहीं देते। कोई आवाज नहीं करते। लेकिन कब किसे लग जाएं, कोई नहीं जानता।

कभी वे दुष्यंत को शकुंतला तक ले जाते हैं। कभी नल और दमयंती के बीच हंसों को संदेशवाहक बना देते हैं। और कभी आगरा के किसी अध्यापक से एक गलत नंबर डायल करा देते हैं।

हजारों वर्षों से प्रेम की लीला यही है।

सिर्फ माध्यम बदल गए हैं।

Saturday, May 30, 2026

 अवैध घुसपैठ: भारत के विकास और सामाजिक संतुलन के सामने बढ़ती चुनौती

______________________

क्या भारत की सीमाएं केवल नक्शे पर खींची गई रेखाएं हैं?

_____________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा 

31 मई 2026

___________________________

यदि किसी दिन आपको पता चले कि आपके शहर की आबादी लाखों बढ़ गई है, स्कूलों में सीटें कम पड़ रही हैं, अस्पतालों में कतारें लंबी होती जा रही हैं, मजदूरी घट रही है और सरकारी योजनाओं का बोझ लगातार बढ़ रहा है, तो क्या आप इसे महज संयोग मानेंगे?

यह सवाल केवल सीमा राज्यों का नहीं है। यह सवाल देश के हर करदाता, हर बेरोजगार युवक, हर किसान और हर उस नागरिक का है जो बेहतर जीवन, बेहतर सुविधाओं और सुरक्षित भविष्य का सपना देखता है। अवैध घुसपैठ का मुद्दा वर्षों से राजनीति के अखाड़े में उछलता रहा है, लेकिन इसके सामाजिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय प्रभाव अब धीरे-धीरे पूरे देश में महसूस किए जाने लगे हैं।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं, "भारत आज दुनिया की सबसे तेज़ी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है। लेकिन विकास की इस दौड़ के बीच एक ऐसी समस्या लगातार बढ़ रही है, जिस पर राजनीति तो खूब होती है, पर समाधान कम दिखाई देता है। यह समस्या है अवैध घुसपैठ और अनधिकृत प्रवासन की।

यह विषय केवल सीमा सुरक्षा का प्रश्न नहीं है। इसका संबंध रोजगार, संसाधनों, जनसंख्या संतुलन, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय सुरक्षा से भी है।

अवैध प्रवासियों की वास्तविक संख्या का सटीक अनुमान लगाना कठिन है, क्योंकि वे सरकारी अभिलेखों में दर्ज नहीं होते। फिर भी समय-समय पर विभिन्न सरकारी बयानों में इनकी संख्या लाखों से लेकर करोड़ों तक बताई गई है। अधिकांश अवैध प्रवासी बांग्लादेश से आने वाले लोगों के रूप में चिन्हित किए जाते रहे हैं, जबकि म्यांमार से आए रोहिंग्या शरणार्थियों की भी एक उल्लेखनीय संख्या भारत के विभिन्न राज्यों में निवास कर रही है।"

पूर्वोत्तर भारत के राज्यों, विशेषकर असम, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल, ने दशकों से इस दबाव को महसूस किया है। असम आंदोलन का इतिहास इसी चिंता से जुड़ा रहा। स्थानीय लोगों का आरोप रहा कि लगातार हो रही घुसपैठ ने न केवल जनसंख्या का स्वरूप बदला, बल्कि भूमि, रोजगार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर भी असर डाला।

कल्पना कीजिए कि किसी छोटे शहर की आबादी अचानक कुछ वर्षों में लाखों बढ़ जाए। अस्पतालों में भीड़ बढ़ेगी, स्कूलों पर दबाव पड़ेगा, पानी और बिजली की मांग बढ़ेगी, और सस्ते श्रम की उपलब्धता स्थानीय मजदूरों की आय को प्रभावित कर सकती है। यही स्थिति कई सीमावर्ती क्षेत्रों और महानगरों में देखने को मिलती है।

दिल्ली, मुंबई, जयपुर, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे शहरों में निर्माण कार्यों, घरेलू श्रम, रिक्शा संचालन और असंगठित क्षेत्र में बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर कार्यरत हैं। इनमें अधिकांश वैध भारतीय नागरिक होते हैं, लेकिन सुरक्षा एजेंसियों ने समय-समय पर अवैध विदेशी नागरिकों के नेटवर्क भी उजागर किए हैं। नकली आधार कार्ड, फर्जी राशन कार्ड और जाली पहचान पत्रों का कारोबार इस समस्या को और जटिल बनाता है। समूचा नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद, गुरुग्राम के अर्बन क्लस्टर्स में डोमेस्टिक हेल्प के रूप में हजारों बाहरी तत्व कार्यरत हैं। दक्षिण भारत की चाय और काफी बागानों में बाहर के घुसपैठी काम कर रहे हैं, सस्ती लेबर के रूप में।

समाजशास्त्री टीपी श्रीवास्तव के मुताबिक, "आर्थिक दृष्टि से भी यह चुनौती कम नहीं है। भारत पहले ही अपने करोड़ों नागरिकों को बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और रोजगार उपलब्ध कराने के संघर्ष से जूझ रहा है। ऐसे में यदि बड़ी संख्या में अवैध लोग सार्वजनिक सुविधाओं का उपयोग करें, तो सरकारी संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ना स्वाभाविक है। करदाताओं के पैसे से चलने वाली योजनाओं का लाभ वास्तविक पात्र नागरिकों तक कम पहुंचने का खतरा भी बढ़ जाता है।"

मामला केवल आर्थिक नहीं है। कई क्षेत्रों में जनसांख्यिकीय परिवर्तन सामाजिक तनाव का कारण बने हैं। स्थानीय समुदायों को अपनी सांस्कृतिक पहचान, भाषा और पारंपरिक जीवन शैली पर खतरा महसूस होने लगता है। इतिहास गवाह है कि जब संसाधन सीमित हों और आबादी तेजी से बढ़े, तो सामाजिक टकराव की आशंका भी बढ़ जाती है।

भारत को इस चुनौती का समाधान संतुलित और व्यावहारिक तरीके से खोजना होगा। सीमाओं की बेहतर निगरानी, आधुनिक तकनीक आधारित सर्विलांस, पहचान प्रणालियों को मजबूत बनाना और पड़ोसी देशों के साथ प्रभावी प्रत्यर्पण एवं सत्यापन व्यवस्था विकसित करना आवश्यक है। साथ ही यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि मानवीय आधार पर संरक्षण पाने वाले लोगों के अधिकारों का सम्मान हो।

अवैध घुसपैठ किसी एक राज्य या राजनीतिक दल का मुद्दा नहीं है। यह राष्ट्रीय संसाधनों, सामाजिक स्थिरता और भविष्य की विकास योजनाओं से जुड़ा प्रश्न है। यदि इसे समय रहते गंभीरता से नहीं लिया गया, तो इसका बोझ आने वाली पीढ़ियों को उठाना पड़ सकता है।

एक विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा, जब उसकी सीमाएं सुरक्षित हों, नागरिकों के अधिकार संरक्षित हों और प्रवासन की व्यवस्था कानून तथा मानवीय मूल्यों दोनों के अनुरूप संचालित हो। संवेदनशीलता आवश्यक है, लेकिन संप्रभुता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।



Friday, May 29, 2026

 रात का खाना जानलेवा बन गया: वैवाहिक जीवन में पाक-विवादों का बढ़ता खतरा

_____________________

जब रसोई बनी रणभूमि: नमक, चिकन करी और मौत की थाली

______________________

रात का खाना क्या बनेगा?

यह सवाल हर घर में पूछा जाता है। कभी मुस्कुराहट के साथ, कभी शिकायत के साथ। 

लेकिन जब यही सवाल मौत का कारण बन जाए, तब समाज को आईना देखने की जरूरत है।

____________________

बृज खंडेलवाल द्वारा 

31 मई 2026

________________________

भारत समेत दुनिया भर के घरों में रसोई, जो कभी देखभाल और प्यार की जगह मानी जाती थी, अब झगड़ों का अखाड़ा बनती जा रही है। छोटी-मोटी बातों पर खाने को लेकर विवाद इतने उग्र रूप ले रहे हैं कि हत्या तक हो जा रही है। यह वैवाहिक संबंधों की गहरी दरारों को उजागर करता है।

तेलंगाना के कामारेड्डी में 28 वर्षीय कबाड़ विक्रेता कोडंडम शिवाजी ने अपनी पत्नी लक्ष्मी से रात के खाने में चिकन करी न बनाने पर झगड़ा किया। रिश्तेदारों ने शांत कराया, लेकिन थोड़ी देर बाद विवाद फिर भड़क उठा। पत्नी ने दरांती से हमला कर उसकी गर्दन पर वार किया। अत्यधिक खून बहने से वह मौके पर ही मर गया।

इसी तरह वडोदरा, गुजरात में मजदूर अमित देवीपूजक ने पत्नी मंजू द्वारा बनाए गए दोपहर के खाने को खाने से इनकार कर दिया। झगड़ा बढ़ा तो पत्नी ने चाकू से उसके सीने और सिर पर वार कर दी। अमित की मौत हो गई और मंजू को हत्या का मामला दर्ज कर गिरफ्तार किया गया।

ये घटनाएं अकेली नहीं हैं। ठाणे, महाराष्ट्र में एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी को “साबुदाना खिचड़ी में नमक ज्यादा” होने पर गला घोंटकर मार डाला। मुंबई में बिरयानी में नमक ज्यादा होने पर पत्नी की हत्या कर दी गई। उत्तर प्रदेश में गर्भवती पत्नी के साथ खाने को लेकर झगड़े में मौत हो गई। तेलंगाना में मटन करी न बनाने पर पत्नी की पिटाई कर हत्या का मामला भी सामने आया है। विदेशों में भी बुजुर्ग दंपति पैनकेक पर झगड़कर एक-दूसरे को मार डालने और ब्रिटेन में जन्मदिन के भोजन पर पत्नी द्वारा पति की हत्या जैसे मामले दर्ज हैं।

नमक-मिर्च, नॉन-वेज खाने की मांग, समय पर न बनाना या खाने से इनकार। ये विवाद रात के खाने या दोपहर के समय भूख और थकान में सबसे ज्यादा भड़कते हैं। हथियार आमतौर पर रसोई के चाकू या दरांती होते हैं। आर्थिक तनाव, शराब, बार-बार के झगड़े और खाना पकाने की जिम्मेदारी को लेकर लिंग-भेद की अपेक्षाएं इन छोटी घटनाओं को खूनी बना देती हैं।

ये “पाक-विवाद” बड़े सामाजिक विफलताओं : संघर्ष सुलझाने की कमी, मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा और वैवाहिक भूमिकाओं के दबाव , के लक्षण हैं। जब डिनर टेबल अपराध स्थल बन जाए तो समझ लीजिए कि घर में कुछ गलत पक रहा है। जागरूकता, काउंसलिंग और घरेलू जिम्मेदारियों को बांटने की जरूरत है।


हैदराबाद के पास कामारेड्डी में एक युवक ने पत्नी से पूछा कि चिकन करी क्यों नहीं बनी। बात बढ़ी। आवाजें ऊंची हुईं। रिश्तेदार आए, समझा-बुझाकर चले गए। लेकिन भीतर सुलग रही आग शांत नहीं हुई। कुछ देर बाद पत्नी ने घर में रखा हंसिया उठाया और पति पर वार कर दिया। युवक की मौके पर ही मौत हो गई।

उधर गुजरात के वडोदरा में एक आदमी ने पत्नी के बनाए खाने को खाने से इनकार कर दिया। बहस शुरू हुई। आरोप है कि पति ने पहले पत्नी को मारा। जवाब में पत्नी ने धारदार हथियार उठा लिया। कुछ मिनटों में एक और परिवार बिखर गया। दो बच्चे अनाथ जैसे हालात में पहुंच गए।

पहली नजर में ये घटनाएं हास्यास्पद लग सकती हैं। "चिकन करी के लिए हत्या?" "दोपहर के खाने पर मौत?" लेकिन पुलिस फाइलें और मनोवैज्ञानिक कुछ और कहानी बताते हैं।

असल में मौत चिकन करी से नहीं हुई। मौत उस तनाव से हुई जो वर्षों से जमा हो रहा था।

नमक ज्यादा था, जिंदगी कम पड़ गई

महाराष्ट्र के भायंदर में एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी की हत्या इसलिए कर दी क्योंकि साबूदाना खिचड़ी में नमक ज्यादा था। उनका बेटा यह सब देख रहा था।

मुंबई में एक अन्य मामले में बिरयानी में नमक ज्यादा होने की शिकायत ने पति-पत्नी के झगड़े को हत्या तक पहुंचा दिया।

उत्तर प्रदेश में एक गर्भवती महिला की जान चली गई। कारण वही पुराना था, खाने में नमक को लेकर विवाद।

सोचिए, एक चुटकी नमक। जिसकी कमी या अधिकता भोजन का स्वाद बदलती है। वही चुटकी कभी-कभी पूरे परिवार का भविष्य भी बदल देती है।

यह केवल भारत की कहानी नहीं है।

अमेरिका के विस्कॉन्सिन में एक युवती अपने प्रेमी के साथ बाहर जाना चाहती थी। प्रेमी ने कहा कि वह घर पर एयर फ्रायर में चिकन ड्रमस्टिक बना लेगा। मामूली लगने वाली बहस हिंसा में बदल गई और युवक की जान चली गई।

ब्रिटेन में एक महिला ने जन्मदिन के भोजन को लेकर हुए विवाद में अपने पति की हत्या कर दी।

वॉशिंगटन डीसी में एक बुजुर्ग दंपती के बीच पैनकेक को लेकर शुरू हुआ विवाद हत्या पर समाप्त हुआ।

महाद्वीप बदल जाते हैं। भाषा बदल जाती है। लेकिन कहानी लगभग वही रहती है।

रसोई में पकता भोजन कभी-कभी रिश्तों की कड़वाहट भी उबाल देता है।असल कारण खाना नहीं, कुछ और होता है

सवाल यह है कि क्या कोई सचमुच केवल नमक या चिकन के लिए हत्या कर सकता है? विशेषज्ञों का जवाब है: आमतौर पर नहीं। खाना सिर्फ ट्रिगर होता है। असली विस्फोटक सामग्री पहले से जमा रहती है।

आर्थिक तनाव। बेरोजगारी। शराब की लत। ससुराल के झगड़े। शक और अविश्वास। घरेलू हिंसा का पुराना इतिहास। अधूरी अपेक्षाएं। दबी हुई नाराजगी।

जब ये सब एक साथ जमा हो जाते हैं तो फिर एक वाक्य काफी होता है।

"आज चिकन क्यों नहीं बनाया?"

"इतना नमक किसने डाला?"

"मैं यह खाना नहीं खाऊंगा।"

और फिर शब्द हथियार बन जाते हैं। उसके बाद अक्सर असली हथियार भी निकल आते हैं।

भारतीय समाज में खाना केवल खाना नहीं है। यह प्रेम का प्रतीक है। कर्तव्य का प्रतीक है। सम्मान का प्रतीक है।विशेषकर महिलाओं के लिए रसोई को आज भी उनके मूल्यांकन का पैमाना माना जाता है।

खाना अच्छा बना तो तारीफ कम मिलती है। खराब बना तो आलोचना तुरंत मिल जाती है।

कई घरों में पत्नी की मेहनत को स्वाभाविक मान लिया जाता है। वहीं दूसरी ओर पुरुषों पर कमाने और परिवार चलाने का दबाव रहता है। दोनों पक्ष तनाव में रहते हैं।

नतीजा? रात का भोजन कभी-कभी तनाव का अखाड़ा बन जाता है।

थाली में परोसी दाल केवल दाल नहीं रहती। उसमें आर्थिक संघर्ष, सामाजिक अपेक्षाएं और वैवाहिक तनाव भी परोस दिए जाते हैं।

भूख और गुस्से का खतरनाक रिश्ता

मनोविज्ञान में एक दिलचस्प शब्द है "हैंग्री"। यानी भूख और गुस्से का मिश्रण।

शोध बताते हैं कि भूखे व्यक्ति में चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है। निर्णय लेने की क्षमता कमजोर पड़ती है। छोटी बात बड़ी लगने लगती है।

भारत में अधिकांश ऐसे झगड़े शाम या रात के भोजन के समय होते हैं।

दिन भर की थकान। पैसों की चिंता।काम का दबाव। और फिर भूख। इन सबका मिश्रण कई बार विस्फोटक साबित होता है।

रसोई के बर्तन नहीं, रिश्ते तेज हो रहे हैं । इन घटनाओं में एक और समानता दिखाई देती है। हथियार अक्सर घर में ही मौजूद होते हैं। चाकू। हंसिया।कैंची। बेलन। यानी हत्या की तैयारी नहीं होती। गुस्से का क्षण होता है।

एक क्षण जो पूरी जिंदगी बदल देता है। पांच मिनट का क्रोध कई बार पचास वर्षों की सजा बन जाता है।

एक समय था जब भारतीय परिवार साथ बैठकर भोजन करते थे और बातचीत भी करते थे। आज कई घरों में बातचीत खत्म हो रही है, केवल शिकायतें बची हैं।

चिकन करी, बिरयानी, खिचड़ी या पैनकेक किसी की जान नहीं लेते।

लेकिन अनियंत्रित क्रोध, लगातार अपमान, घरेलू हिंसा और संवाद की कमी जरूर जान ले सकती है।

रसोई में आग का काम भोजन पकाना है। जब वही आग रिश्तों को जलाने लगे, तब समाज को चेत जाना चाहिए। क्योंकि मौत कभी नमक से नहीं होती। मौत उस कड़वाहट से होती है जो वर्षों से रिश्तों में घुलती रहती है।


 ये रस्साकशी कब तक?

तीन भाषा फार्मूला: स्कूल की घंटी से क्यों कांप उठता है भारत?

अब सुप्रीम कोर्ट को करना है फैसला।

__________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा 

30 मई 2026

_______________________

भारत में भाषा केवल बोली नहीं जाती। भाषा यहां छाती ठोककर चलती है। झंडा बन जाती है। राजनीति बन जाती है। और कभी-कभी बारूद भी।

एक मामूली सा स्कूल सर्कुलर फिर तूफान ले आया है।

सीबीएसई ने कहा है कि जुलाई 2026 से कक्षा 9 के बच्चों को तीन भाषाएं पढ़नी होंगी। दो भारतीय भाषाएं जरूरी होंगी। सुनने में बात सीधी लगती है। लेकिन भारत में भाषा का मामला कभी सीधा नहीं होता। यहां तो खीर में भी राजनीति ढूंढ ली जाती है।

बस फिर क्या था। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। अभिभावक परेशान। बच्चे हक्के-बक्के। शिक्षक माथा पकड़कर बैठे हैं। लोग पूछ रहे हैं : गांव के स्कूल में गणित का मास्टर नहीं मिलता, अब तमिल और कन्नड़ कौन पढ़ाएगा? बच्चे बोर्ड परीक्षा की तैयारी करें या भाषा प्रयोगशाला खोलें?

भारत में भाषा की आग नई नहीं है। यह चिंगारी आजादी के साथ ही पैदा हो गई थी। संविधान सभा में सवाल उठा :  देश आखिर बोलेगा क्या?

हिंदी समर्थक चाहते थे कि अंग्रेजी का बोरिया-बिस्तर बांध दिया जाए। दक्षिण भारत डर गया। उन्हें लगा दिल्ली धीरे-धीरे हिंदी का बुलडोजर चला देगी।

आखिर समझौता हुआ। हिंदी राजभाषा बनी। अंग्रेजी को 15 साल की मोहलत मिली। लेकिन, भारत में असली लड़ाई मोहलत खत्म होने पर ही शुरू होती है।

1965 आया।

तमिलनाडु सुलग उठा। छात्र सड़क पर उतर आए। रेल रोकी गईं। नारे गूंजे।आग लगी। लाठियां चलीं। लाशें गिरीं।

दक्षिण भारत को लगा कि हिंदी अब सिर पर बैठाई जा रही है। आंदोलन ऐसा उठा कि कांग्रेस तमिलनाडु में बह गई। द्रविड़ राजनीति का सूरज वहीं से निकला। दिल्ली को पीछे हटना पड़ा। अंग्रेजी बच गई। हिंदी रुक गई। लेकिन शक का कांटा दिल में धंसा रह गया।

इधर, उत्तर भारत की यूनिवर्सिटीज में सोशलिस्टों ने अंग्रेजी हटाओ आंदोलन को आगे बढ़ाया, स्ट्राइक, प्रदर्शन, बोर्ड पुताई, उपद्रव!

इसी तूफान से निकला “तीन भाषा फार्मूला”।

सोच बड़ी सुंदर थी। एक भारत, श्रेष्ठ भारत। हर बच्चा तीन भाषाएं सीखे।मातृभाषा भी। हिंदी भी। अंग्रेजी भी।

सपना ऐसा कि काशी वाला बच्चा तमिल कविता समझे और चेन्नई वाला बच्चा कबीर पढ़े। भाषा दिलों को जोड़े। देश को गोंद की तरह चिपका दे।

लेकिन भारत में नीति और जमीन का रिश्ता अक्सर सास-बहू जैसा रहता है।

कागज पर फार्मूला चमकता रहा।जमीन पर लड़खड़ाता रहा।

तमिलनाडु ने साफ कह दिया :  हमें नहीं चाहिए तीन भाषा फार्मूला। वहां आज भी तमिल और अंग्रेजी की दो भाषा नीति चलती है। दूसरी तरफ हिंदी पट्टी के कई राज्यों ने भी चालाकी दिखाई। दक्षिण भारतीय भाषाएं पढ़ाने की जगह संस्कृत डाल दी। सांप भी मर गया, लाठी भी नहीं टूटी।

यही बात दक्षिण भारत को चुभती है।

एक तमिल बच्चा हिंदी सीखे।

लेकिन उत्तर भारत का बच्चा तमिल क्यों नहीं सीखता?

यही सवाल आज भी राजनीति की हांडी में उबलता रहता है।

भाषा का मामला यहां सीधा कभी नहीं रहा। इसके पीछे सत्ता छिपी रहती है। नौकरी छिपी रहती है।पहचान छिपी रहती है।

नई शिक्षा नीति कहती है कि बहुभाषी बच्चे ज्यादा रचनात्मक होते हैं। कई भाषाएं सीखने से सोचने की क्षमता बढ़ती है। बात गलत भी नहीं है। यूरोप में लोग तीन-चार भाषाएं आराम से बोल लेते हैं।

लेकिन भारत यूरोप नहीं है। यहां गांव के स्कूल में ब्लैकबोर्ड टूटा पड़ा है। कहीं पंखा नहीं। कहीं शिक्षक नहीं।कहीं बच्चे फर्श पर बैठते हैं।

ऐसे में लोग पूछते हैं :  पहले स्कूल तो संभाल लो, फिर भाषाई महल बनाना।

और सबसे बड़ा व्यंग्य देखिए।

नेता मंच से भारतीय भाषाओं का गुणगान करते हैं। लेकिन अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूल में भेजते हैं। घर में हिंदी। भाषण में संस्कृत। और करियर के लिए अंग्रेजी।

यानी मुंह में राम, बगल में अंग्रेजी कॉन्वेंट।

सच्चाई यह है कि भारत में अंग्रेजी आज भी नौकरी का पासपोर्ट है। आईटी कंपनी से लेकर अदालत तक, मेडिकल कॉलेज से लेकर कॉरपोरेट दफ्तर तक, अंग्रेजी का सिक्का चलता है। गरीब आदमी भी जानता है कि टूटी-फूटी अंग्रेजी कई बार अच्छी हिंदी से ज्यादा कमाई करा देती है।

यहीं भाषा राजनीति का असली दर्द छिपा है।

दक्षिण भारत को डर है कि भाषा के नाम पर धीरे-धीरे केंद्रीकरण बढ़ेगा। उत्तर भारत को लगता है कि हिंदी राष्ट्रीय पहचान की डोर है। अंग्रेजी चुपचाप दोनों के सिर पर बैठी मुस्कुरा रही है।

भारत का नक्शा भी भाषा ने बदला है। आंध्र प्रदेश भाषा आंदोलन से बना। महाराष्ट्र और गुजरात भाषाई मांगों से निकले।

भाषा ने सरकारें गिराईं। नेता पैदा किए। और कई बार देश को बांटने की धमकी भी दी।

इसलिए भारत में भाषा केवल विषय नहीं है। यह भावनाओं का ज्वालामुखी है।

अब सुप्रीम कोर्ट फैसला करेगा।

लेकिन अदालत कानून समझा सकती है, दिल नहीं बदल सकती।

तीन भाषा फार्मूला आज भी रस्सी पर चलने जैसा है।

हर सरकार संतुलन बनाती है। हर राज्य शक की नजर से देखता है। हर अभिभावक डरता है कि कहीं प्रयोग का बोझ उसके बच्चे पर न टूट पड़े।

भारत की भाषाएं उसकी सबसे बड़ी ताकत हैं। लेकिन यही उसकी सबसे बड़ी सिरदर्दी भी हैं।

यहां भाषा केवल पढ़ाई नहीं जाती।उसकी पहरेदारी होती है। उसके सहारे राजनीति होती है। 1956 में भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन करना सबसे बड़ी गलती थी। 

Thursday, May 28, 2026

 ज्ञापन

यमुना पुनर्जीवन हेतु आगरा-विशिष्ट माँगों के संबंध में

प्रेषक:

ब्रज खंडेलवाल एवं सदस्यगण

रिवर कनेक्ट अभियान (यमुना आरती सभा), आगरा

एतमाद्दौला व्यू प्वाइंट पार्क, यमुना किनारा रोड, आगरा

प्रति:

माननीय प्रधानमंत्री, भारत सरकार

श्री नरेंद्र मोदी जी

साउथ ब्लॉक, नई दिल्ली

तथा

माननीय मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश सरकार

श्री योगी आदित्यनाथ जी

लखनऊ, उत्तर प्रदेश

विषय: 27 मई 2026 को माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यमुना पुनर्जीवन के संबंध में दिए गए निर्देशों के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु आगरा-विशिष्ट माँगों के संबंध में ज्ञापन।

दिनांक: 28 मई 2026

मान्यवर,

27 मई 2026 को माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यमुना नदी की दयनीय स्थिति पर स्वतः संज्ञान लेते हुए केंद्रीय गृह सचिव की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति गठित की गई है, जिसे आठ सप्ताह के भीतर व्यापक “यमुना एक्शन प्लान” प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है। यह निर्णय करोड़ों लोगों की भावनाओं, पर्यावरणीय चिंताओं तथा सांस्कृतिक विरासत की रक्षा की दिशा में एक ऐतिहासिक और स्वागतयोग्य कदम है।

हम, रिवर कनेक्ट अभियान (यमुना आरती सभा), आगरा के सदस्य एवं समर्थक, आपके समक्ष यह ज्ञापन प्रस्तुत कर यमुना नदी की आगरा क्षेत्र में अत्यंत गंभीर स्थिति की ओर ध्यान आकृष्ट करना चाहते हैं तथा कुछ अत्यावश्यक और व्यावहारिक माँगें रखना चाहते हैं, जिनका तत्काल समाधान यमुना पुनर्जीवन के लिए अनिवार्य है।

यमुना, जो कभी ब्रज संस्कृति, आस्था, कृषि और जीवन का आधार थी, आज आगरा में एक मौसमी नाले में बदल चुकी है। वर्ष के अधिकांश समय नदी का पाट सूखा पड़ा रहता है। बहाव के स्थान पर केवल सीवर का काला पानी दिखाई देता है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा व्यक्त यह पीड़ा कि “यमुना अब एक सीवेज नाले से अधिक कुछ नहीं रह गई”, आगरा की जनता प्रतिदिन अपनी आँखों से देख रही है।

ताजमहल की संरचनात्मक स्थिरता भी यमुना के जलस्तर और आर्द्रता पर निर्भर मानी जाती है। यदि नदी सूखती रही तो यह केवल पर्यावरणीय संकट नहीं रहेगा, बल्कि विश्व धरोहर और भारत की सांस्कृतिक पहचान पर भी खतरा बन जाएगा। अतः यह समय केवल घोषणाओं का नहीं, बल्कि निर्णायक और समयबद्ध कार्रवाई का है।

रिवर कनेक्ट अभियान की प्रमुख आगरा-विशिष्ट माँगें

1. ताजमहल के डाउनस्ट्रीम क्षेत्र में बैराज /  डैम का तत्काल निर्माण

पिछले लगभग 25-30 वर्षों से ताजमहल के डाउनस्ट्रीम क्षेत्र में बैराज अथवा रबर चेक डैम निर्माण का प्रस्ताव सरकारी फाइलों में लंबित पड़ा है। अनेक बार माँग उठने के बावजूद यह परियोजना नौकरशाही उदासीनता का शिकार रही है।

यह संरचना अत्यंत आवश्यक है ताकि ताजमहल के आसपास तथा उसके आगे लगभग 20-25 किलोमीटर क्षेत्र में न्यूनतम जलस्तर बना रहे और नदी में बारहमासी प्रवाह सुनिश्चित हो सके। वर्तमान में नदी का सूखा पाट अतिक्रमण, कचरा फेंकने, गाद जमाव तथा प्रदूषण का स्थायी केंद्र बन गया है।

हम माँग करते हैं कि:

- इस परियोजना को “राष्ट्रीय महत्व” की परियोजना घोषित किया जाए।

- राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन एवं जल शक्ति मंत्रालय के माध्यम से विशेष निधि आवंटित की जाए।

- निर्माण हेतु स्पष्ट समयसीमा तय की जाए।

- तकनीकी एवं पर्यावरणीय स्वीकृतियों की प्रक्रिया में अनावश्यक विलंब समाप्त किया जाए।

अब और देरी यमुना तथा ताजमहल दोनों के लिए विनाशकारी सिद्ध होगी।

2. न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह (E-Flow) एवं पर्याप्त स्वच्छ जल छोड़े जाने की व्यवस्था

आगरा तक पहुँचते-पहुँचते यमुना में स्वच्छ जल लगभग समाप्त हो जाता है। गैर-मानसूनी महीनों में नदी में जो प्रवाह दिखाई देता है, उसका अधिकांश भाग सीवर, नालों और औद्योगिक अपशिष्टों का होता है।

हम माँग करते हैं कि:

- हरियाणा एवं उत्तराखंड के बैराजों से वर्षभर न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह कानूनी रूप से सुनिश्चित किया जाए।

- Upper Yamuna River Board के माध्यम से रियल-टाइम टेलीमेट्री आधारित निगरानी प्रणाली लागू हो।

- जल बँटवारे के नियमों को सख्ती से लागू किया जाए।

- गर्मियों एवं सूखे मौसम में अतिरिक्त स्वच्छ जल छोड़ा जाए।

पर्याप्त जल प्रवाह के बिना यमुना का पुनर्जीवन असंभव है। जल ही नदी का प्राण है।

3. आगरा के शहरी क्षेत्र में वैज्ञानिक डी-सिल्टिंग एवं ड्रेजिंग

आगरा में यमुना का तल भारी मात्रा में गाद, प्लास्टिक, निर्माण मलबे और विषैले अवशेषों से भर चुका है। इससे नदी की जलधारण क्षमता और भूजल पुनर्भरण की प्रक्रिया गंभीर रूप से प्रभावित हुई है।

हम माँग करते हैं कि:

- आगरा के लगभग 20-25 किलोमीटर शहरी हिस्से में चरणबद्ध वैज्ञानिक डी-सिल्टिंग एवं ड्रेजिंग कराई जाए।

- इस कार्य में IITs, पर्यावरण विशेषज्ञों, पुरातत्व विभाग एवं जल वैज्ञानिकों की निगरानी सुनिश्चित हो।

- पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) के आधार पर सुरक्षित तकनीक अपनाई जाए।

- निकाली गई गाद एवं अपशिष्ट के वैज्ञानिक निस्तारण की व्यवस्था हो।

यदि यह कार्य सावधानीपूर्वक किया जाए, तो इससे नदी की गहराई, प्रवाह क्षमता और भूजल पुनर्भरण में उल्लेखनीय सुधार होगा।

4. यमुना के बाढ़क्षेत्रों एवं नदी तल से अतिक्रमण हटाया जाए

नदी के प्राकृतिक बाढ़क्षेत्रों पर अवैध कब्जों, कंक्रीटीकरण और निर्माण कार्यों ने यमुना की प्राकृतिक जीवन प्रणाली को बाधित कर दिया है।

हम माँग करते हैं कि:

- सभी अवैध अतिक्रमणों के विरुद्ध विशेष अभियान चलाया जाए।

- बाढ़क्षेत्रों को पुनर्स्थापित किया जाए।

- नदी किनारों के अनियंत्रित कंक्रीटीकरण पर पूर्ण प्रतिबंध लगे।

- जैव-विविधता संरक्षण हेतु प्राकृतिक हरित पट्टियाँ विकसित की जाएँ।

नदी केवल जलधारा नहीं होती; उसका बाढ़क्षेत्र भी उसके शरीर का हिस्सा होता है।

5. प्रदूषण नियंत्रण एवं आधारभूत ढाँचे को सुदृढ़ किया जाए

यमुना में गिरने वाले अधिकांश नाले आज भी अपर्याप्त शोधन व्यवस्था के कारण प्रदूषण फैला रहे हैं।

हमारी माँगें हैं:

- आगरा के सभी नालों का 100 प्रतिशत सीवेज शोधन सुनिश्चित किया जाए।

- STP एवं CETP की क्षमता बढ़ाई जाए तथा उनकी नियमित मॉनिटरिंग हो।

- औद्योगिक प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों पर कठोर दंडात्मक कार्रवाई हो।

- यमुना घाटों का सौंदर्यीकरण पर्यावरणीय संवेदनशीलता के साथ किया जाए।

- नदी संरक्षण कानूनों के पालन हेतु विशेष “रिवर पुलिस स्क्वॉड” गठित किया जाए।

6. जनभागीदारी एवं पारदर्शी निगरानी व्यवस्था

किसी भी नदी पुनर्जीवन अभियान की सफलता स्थानीय समाज की भागीदारी पर निर्भर करती है।

अतः हम माँग करते हैं कि:

- रिवर कनेक्ट अभियान सहित स्थानीय सामाजिक संगठनों, पर्यावरणविदों एवं नागरिक समूहों को योजना निर्माण एवं निगरानी में शामिल किया जाए।

- जल गुणवत्ता, प्रवाह, प्रदूषण स्तर और परियोजनाओं की प्रगति हेतु सार्वजनिक डिजिटल डैशबोर्ड बनाया जाए।

- प्रत्येक तीन माह में प्रगति रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।

- स्कूलों, कॉलेजों और सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से “यमुना जन-जागरण अभियान” चलाया जाए।

माननीय प्रधानमंत्री जी एवं मुख्यमंत्री जी,

आगरा की जनता दशकों से यमुना के पुनर्जीवन की प्रतीक्षा कर रही है। सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप एक ऐतिहासिक अवसर लेकर आया है। यदि अब भी निर्णायक कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें कभी क्षमा नहीं करेंगी।

अतः हम आपसे विनम्र निवेदन करते हैं कि:

1. उपर्युक्त आगरा-विशिष्ट माँगों को यमुना एक्शन प्लान में तत्काल शामिल किया जाए।

2. आगरा हेतु विशेष टास्क फोर्स एवं पृथक बजट आवंटित किया जाए।

3. सभी परियोजनाओं के लिए समयबद्ध कार्ययोजना बनाई जाए।

4. डाउनस्ट्रीम बैराज परियोजना पर लंबित नौकरशाही बाधाओं को समाप्त करने हेतु व्यक्तिगत हस्तक्षेप किया जाए।

यमुना का पुनर्जीवन केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं है। यह भारत की सभ्यता, संस्कृति, आस्था, इतिहास और भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। ब्रजभूमि की आत्मा यमुना से ही जीवित है।

हम पूर्ण सहयोग का आश्वासन देते हुए आपसे आग्रह करते हैं कि शीघ्र, ठोस और प्रभावी कदम उठाए जाएँ ताकि आने वाली पीढ़ियाँ पुनः एक स्वच्छ, निर्मल और अविरल यमुना का दर्शन कर सकें।


सादर,


रिवर कनेक्ट अभियान (यमुना आरती सभा)

एतमाद्दौला व्यू प्वाइंट पार्क

यमुना किनारा रोड, आगरा

मोबाइल: ___7895852750

ईमेल: agrabrij@gmail.com 

प्रतिलिपि:

- माननीय केंद्रीय जल शक्ति मंत्री, भारत सरकार

- मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश सरकार

- सदस्य सचिव, राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन

- अध्यक्ष, अपर यमुना नदी बोर्ड

- जिलाधिकारी, आगरा

- नगर आयुक्त, आगरा नगर निगम

Wednesday, May 27, 2026

 नई कुली अर्थव्यवस्था: 

क्या भारत के स्टार्टअप आधुनिक गुलामी गढ़ रहे हैं?

___________________

बृज खंडेलवाल द्वारा 

29 मई 2026

_______________________

28 वर्षीय युवक, उदय नाथ पीठ पर भारी बैग लटकाए ट्रैफिक चीरता भाग रहा है।

बिहार से आया रमेश चौधरी चार मंज़िल सीढ़ियाँ चढ़कर राशन का सामान पहुँचा रहा है।

उधर हलवाई की दुकान के बाहर बाबू लाल मोबाइल स्क्रीन पर टकटकी लगाए अगले ऑर्डर का इंतज़ार कर रहा है।

मोतियाबिंदी अर्थ शास्त्री इसे “स्टार्टअप क्रांति” कहते हैं। लेकिन क्या यह सचमुच क्रांति है? या फिर पुरानी सामंती व्यवस्था का नया डिजिटल संस्करण?

चेहरे बदल गए हैं। लठैत जमींदार की जगह अब हूडी पहनने वाले फाउंडर हैं। कुली अब सूटकेस नहीं, फूड पैकेट और किराने के बैग ढो रहा है।

ढांचा मगर वही है। भारत के महानगरों में लाखों प्रवासी युवक आज क्विक कॉमर्स, डिलीवरी ऐप्स, लॉजिस्टिक्स और प्लेटफॉर्म कंपनियों की रीढ़ बने हुए हैं। निवेशक अरबों डॉलर की वैल्यूएशन पर ताली बजाते हैं। स्टार्टअप फाउंडर नए भारत के “आइकॉन” कहलाते हैं। विज्ञापन इन्हें “डिलीवरी हीरो” और “पार्टनर” बताते हैं। लेकिन चमकदार शब्दों के पीछे एक कड़वी सच्चाई छिपी है। ये नव युग के कुली मेहनत करते हैं, कौशल प्रदर्शन नहीं।

दो सौ वर्षों से कुली गिरी चल रही है, पहले अंग्रेजों की, अब अमेरिकन्स की। या तो गोरे आदमी का मैन फ्राइडे, या बाबुओं का सामान ढोता कुली! बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश या राजस्थान से आया युवक दस-दस घंटे बाइक चलाता है। बारिश, धूप, प्रदूषण, दुर्घटना: सब झेलता है। पाँच साल बाद उसके पास क्या बचता है? बस टूटता शरीर और अनिश्चित भविष्य। यह रोजगार अवसर कम, श्रम दोहन अधिक है।

मैन्युफैक्चरिंग और इंजीनियरिंग सेक्टर्स तो कुछ ज्यादा आगे नहीं बढ़ सके, लेकिन हौले हौले हमारी अर्थव्यवस्था “सुविधा सेवा” आधारित समाज बनती जा रही है। एक ऐसा समाज जहाँ मध्यम वर्ग अपनी सुविधा के लिए अलादीन का बटन दबाता है और कोई अदृश्य भूत, यानी श्रमिक दस मिनट में सामान लेकर दरवाज़े पर हाज़िर हो जाता है।

आराम अब नया धर्म बन चुका है।

देश कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल इंडिया और नवाचार की बातें करता है, मगर करोड़ों युवा आज भी बेहद प्राथमिक श्रम चक्र में फँसे हुए हैं। शहरों की सुविधा का बोझ इन्हीं कुलियों के कंधों पर लदा है, कहते हैं पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी।

समाज शास्त्री टीपी श्रीवास्तव के मुताबिक, "हमारी भाषा भी अब सच्चाई छिपाने लगी है। कुली अब “गिग पार्टनर” बन गया है। नौकरी “फ्लेक्सिबिलिटी” कहलाने लगी। शोषण “ऑपर्च्युनिटी” बन गया। स्टार्टअप संस्कृति कई बार नई रंगाई-पुताई वाला पुराना हवेली तंत्र लगती है।"

यह समस्या केवल डिलीवरी ऐप्स तक सीमित नहीं है। भारत पहले भी ऐसा दौर देख चुका है।

बीपीओ और आईटी सर्विस सेक्टर के उभार के समय लाखों युवा कॉल सेंटर और आउटसोर्सिंग नौकरियों में चुक गए। शुरुआती वर्षों में यह आर्थिक चमत्कार जैसा लगा। वेतन बढ़े। अंग्रेज़ी बोलने वाली पीढ़ी तैयार हुई। परिवार खुश हुए। लेकिन दो दशक बाद तस्वीर उतनी चमकदार नहीं दिखती।

बहुत बड़ी संख्या में युवाओं ने सीमित और दोहराव वाले कौशल सीखे। वे वैश्विक सेवा उद्योग के “रिप्लेसेबल पार्ट” बनकर रह गए। देश ने डिग्रीधारी युवाओं की फौज तो पैदा कर ली, मगर नवाचार, अनुसंधान और विनिर्माण क्षमता उतनी विकसित नहीं हुई।

आज की गिग अर्थव्यवस्था उसी गलती को और बड़े पैमाने पर दोहरा रही है। एक डिलीवरी बॉय रोज़ी तो कमा सकता है, मगर क्या यही किसी युवा राष्ट्र का सपना होना चाहिए? रोजगार अगर व्यक्ति को ऊपर उठाने की बजाय वहीं जकड़ दे, तो वह विकास नहीं, संगठित ठहराव है।सबसे खतरनाक असर मानसिक है।

शहरी भारत आज प्रवासी श्रमिकों पर पूरी तरह निर्भर है। गरम खाना इसलिए पहुँचता है क्योंकि कोई बारिश में भीग रहा है। रातोंरात पार्सल इसलिए आता है क्योंकि किसी ने नींद छोड़ी है। दस मिनट में किराना इसलिए मिलता है क्योंकि किसी ने अपनी सेहत दाँव पर लगाई है।

लेकिन कोई यह नहीं पूछता;

चालीस साल की उम्र में उस डिलीवरी राइडर का क्या होगा? उसकी टूटी कमर का इलाज कौन करेगा?एल्गोरिद्म उसे बेकार कर देंगे तो नया कौशल कौन देगा?

किसी सभ्यता की असली पहचान उसके अरबपतियों से नहीं, उसके श्रमिकों की गरिमा से होती है।

मज़दूरी सीढ़ी बननी चाहिए, दलदल नहीं। देश तब आगे बढ़ते हैं जब श्रमिक मांसपेशियों से कौशल की ओर बढ़ते हैं। 

यह आधुनिकता नहीं। यह डिजिटल सामंतवाद है। स्टार्टअप कहानी केवल यूनिकॉर्न पैदा करने की नहीं होनी चाहिए। उसे कुशल नागरिक भी पैदा करने चाहिए। क्योंकि जो अर्थव्यवस्था दस मिनट में बर्गर पहुँचा सकती है, लेकिन दस साल में श्रमिक को गरिमा नहीं दे सकती, वह वास्तव में प्रगति नहीं कर रही। वह बस गोल-गोल दौड़ रही है,  लाइक एलिस इन वंडरलैंड।

Monday, May 25, 2026

 क्या यही वह गौरवशाली, पूजनीय श्रीकृष्ण की भूमि है, जो आज बूंद-बूंद पानी के लिए तड़प रही है?

___________________

प्यासा ब्रज: तालाबों-कुंडों की धरती श्रीकृष्ण नगरी आखिर पानी को क्यों तरस रही है?

___________________

बृज खंडेलवाल द्वारा

28 मई 2026

____________________

ब्रज मंडल की प्रकृति, यमुना तट, कुंज गलियों, मोरों, गायों और कृष्ण लीलाओं का सुंदर वर्णन अनेक लोकप्रिय भजनों और गीतों में मिलता है। “श्याम तेरी बंसी पुकारे,” “राधे राधे बरसाने वाली,” “मैया मोरी,” और “जय राधा माधव” जैसे भजन वृंदावन, बरसाना और गोकुल की आध्यात्मिक सुंदरता को जीवंत करते हैं। सूरदास और रसखान के पद विशेष रूप से प्रकृति का मार्मिक वर्णन करते हैं।

_____________________

कभी यह धरती बांसुरी की तान पर झूमती थी। यमुना किनारे कदंब की छांव थी। कुंडों में कमल खिलते थे।तालाब गांवों की धड़कन होते थे।

आज उसी ब्रज मंडल में सुबह का पहला दृश्य क्या है? हाथों में बाल्टियां लिए महिलाएं। सूखे नलों के नीचे टकटकी लगाए बच्चे। और पानी के टैंकर के पीछे भागती भीड़।

यह वही ब्रज है, जहां श्रीकृष्ण ने गोपियों संग रास रचाया था। वही भूमि, जिसे संतों ने “धरा पर स्वर्ग” कहा। लेकिन अब यह स्वर्ग प्यास से फटे होंठों वाला मरुस्थल बनता जा रहा है। विडंबना देखिए । यमुना किनारे बसे शहरों में लोग पीने के पानी के लिए जूझ रहे हैं।

कभी ब्रज का हर गांव एक छोटे जल-संसार जैसा था। कुंड थे। पोखर थे। बावड़ियां थीं। बरसात का पानी सहेजने की अद्भुत लोक-व्यवस्था थी।

बूढ़े लोग बताते हैं कि मथुरा और वृंदावन में बीस तीस फीट खोदो तो मीठा पानी मिल जाता था। अब डेढ़ सौ फीट नीचे भी कई बार सिर्फ गाद या हवा निकलती है। धरती का सीना खाली हो चुका है। जैसे किसी ने भीतर का सारा जीवन चूस लिया हो।

गर्मियों में हालात और भयावह हो जाते हैं। मोहल्लों में,  गांवों में पानी के लिए रोज छोटे-छोटे युद्ध होते हैं। टैंकर आता है तो ऐसा लगता है जैसे रेगिस्तान में बादल उतर आया हो। 

यह संकट अचानक नहीं आया। यह वर्षों की लापरवाही का नतीजा है।

ब्रज के तालाब और सरोवर सिर्फ सजावट नहीं थे। वे धरती के बैंक थे। बरसात का पानी जमा करते थे, भूजल रिचार्ज करते थे, गर्मी कम करते थे। लेकिन विकास के नाम पर इन जलाशयों को मिटा दिया गया। कहीं कॉलोनियां उग आईं। कहीं पार्किंग बन गई। कई कुंड कूड़ाघर में बदल गए।

कंक्रीट ने मिट्टी की सांस रोक दी।

धरती पानी पीना भूल गई।

राजनीति ने भी अपना खेल खेला। चुनावों में बड़े-बड़े वादे हुए। यमुना सफाई की बातें हुईं। हर घर जल पहुंचाने के दावे हुए। घाट चमकाए गए। रंगीन लाइटें लगीं। पर्यटन को बढ़ावा मिला। लेकिन गांवों के सूखे हैंडपंप किसी भाषण का हिस्सा नहीं बने।

मथुरा से सांसद बनीं हेमा मालिनी ने भी यमुना और जल संकट पर कई घोषणाएं कीं। करोड़ों रुपये योजनाओं में खर्च हुए। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बने। “नमामि गंगे” और “जल जीवन मिशन” जैसे अभियानों का खूब प्रचार हुआ। मगर जमीन पर तस्वीर अब भी अधूरी है। शहर के कुछ हिस्सों में पाइपलाइन पहुंची, लेकिन बाहरी बस्तियां और गांव अब भी भूजल के भरोसे हैं।

सबसे दुखद हालत यमुना की है।

जिस नदी को ब्रज की मां कहा जाता था, वह कई जगहों पर नाले जैसी दिखती है। दिल्ली और दूसरे शहरों का प्रदूषण बहता हुआ यहां पहुंचता है। काले झाग, बदबू और गंदगी ने नदी की आत्मा को घायल कर दिया है। श्रद्धालु आरती उतारते हैं, लेकिन नदी खुद जैसे मदद की गुहार लगा रही हो।

एक समय था जब बच्चे यमुना में छलांग लगाकर तैरना सीखते थे। आज माता-पिता बच्चों को नदी के पास जाने से डरते हैं। पानी में बीमारी है। जहरीले रसायन हैं। गांवों के कई इलाकों में भूजल में फ्लोराइड और TDS की मात्रा खतरनाक स्तर तक पहुंच चुकी है। लोग धीरे-धीरे बीमार हो रहे हैं। दांत खराब हो रहे हैं। किडनी रोग बढ़ रहे हैं। टाइफाइड और हेपेटाइटिस आम बात बनते जा रहे हैं।

पर्यटन ने भी दबाव बढ़ाया है।

हर साल करोड़ों श्रद्धालु ब्रज पहुंच रहे हैं। होटल, धर्मशालाएं, रेस्टोरेंट और नई कॉलोनियां तेजी से बढ़ रही हैं। पानी की मांग आसमान छू रही है। लेकिन जल संरक्षण की रफ्तार घोंघे जैसी है। विकास हो रहा है या विनाश? 

स्थानीय नेतृत्व की विफलता अब खुली किताब है।

भव्य परियोजनाओं पर ध्यान रहा। फोटो खिंचवाने पर ध्यान रहा। लेकिन तालाब बचाने, वर्षा जल संचयन लागू करने और अतिक्रमण हटाने जैसे बुनियादी काम पीछे छूट गए। विकास का ढोल बजता रहा, मगर धरती भीतर से सूखती रही।

फिर भी उम्मीद पूरी तरह मरी नहीं है।

कुछ गांवों में लोग खुद चंदा इकट्ठा कर तालाब साफ करा रहे हैं। कुछ पर्यावरण कार्यकर्ता पुराने कुंडों को पुनर्जीवित करने में जुटे हैं। युवा वृक्षारोपण अभियान चला रहे हैं। कुछ NGO वर्षा जल संचयन और चेक डैम बनाने की मांग उठा रहे हैं।

असल लड़ाई पाइपलाइन की नहीं, सोच की है।

जब तक विकास और प्रकृति साथ नहीं चलेंगे, तब तक कोई योजना स्थायी नहीं होगी। चमचमाती सड़कें प्यास नहीं बुझातीं। रंगीन घाट सूखे भूजल को नहीं भरते।

ब्रज आज पूरे देश को चेतावनी दे रहा है।

यदि श्रीकृष्ण की भूमि प्यास से तड़प सकती है, तो कोई शहर सुरक्षित नहीं। प्रकृति देर से हिसाब करती है, मगर बहुत सख्ती से करती है।

अब समय आ गया है कि नेता भाषणों से आगे बढ़ें।

तालाब बचाए जाएं।

कुंड पुनर्जीवित हों।

वर्षा जल संचयन अनिवार्य बने।

यमुना में गिरता गंदा पानी रोका जाए।

क्योंकि आखिर सवाल सिर्फ विकास का नहीं है। सवाल जीवन का है।

ब्रज की पुकार आज बहुत साफ सुनाई दे रही है :

“भव्य चमकीली परियोजनाएं बाद में बनाना, पहले हमारे कुंड, तालाब, वन, बगीचे, नदी सुरक्षित करो।