Tuesday, May 5, 2026

 क्या यह वही वृन्दावन है… या कोई और शहर?

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वृन्दावन को टूरिस्ट स्पॉट बनाने का पाप: ब्रज की आत्मा पर हमला और सांस्कृतिक हत्या

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बृज खंडेलवाल द्वारा

6 मई 2026

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एक तरफ वह पुराना ब्रज; धूल भरी पगडंडियाँ, कदम्ब की छाँव, यमुना की धीमी लहरें, मुरली की अनसुनी धुन। दूसरी तरफ आज का वृन्दावन; हॉर्न, होटल, भीड़ और सेल्फी स्टिक का जंगल। 

तब भक्ति बहती थी, अब भीड़ बहती है। तब साधु मिलते थे, अब पैकेज टूर। तब शांति थी, अब शोर का मेला। क्या हमने आध्यात्मिकता को मनोरंजन में बदल दिया है? क्या यह वही भूमि है जहाँ राधा-कृष्ण की लीलाएँ सांस लेती थीं? या फिर यह एक ऐसा बाज़ार बन चुका है जहाँ आस्था भी बिकने लगी है?

वृन्दावन को व्यावसायिक टूरिज्म का हब बनाने का मॉडल न केवल गलत है, बल्कि श्री कृष्ण-राधा की पावन भक्ति संस्कृति पर सीधा आघात है। यह आस्था की भावनाओं से खिलवाड़ है, प्राचीन बृज विरासत पर हमला है। पुराणों, ग्रंथों और वैष्णव परंपरा में बृज भूमि को वन-उपवन, कुंज-वाटिका, तालाब-कुंड और यमुना घाटों से भरी एक पवित्र, शांत, गौ-पालन और रास-लीला की भूमि के रूप में वर्णित किया गया है। लेकिन आज का “विकास” मॉडल इस वर्णन का घोर विरोधाभास है।

तथ्य चौंकाने वाले हैं। अध्ययनों के अनुसार वृन्दावन में सालाना 60 लाख से अधिक पर्यटक आते हैं, जो त्योहारों के समय बढ़कर लाखों प्रतिदिन हो जाते हैं। इस भीड़ ने समूची ब्रज भूमि की काया विकृत कर दी है। ठोस कचरा, प्लास्टिक की बोतलें, प्रसाद पैकेटिंग और पूजा सामग्री का ढेर कुंडों, घाटों और यमुना में गिर रहा है। यमुना की स्थिति तो और भी भयावह है, उच्च BOD स्तर, फीकल कोलीफॉर्म की भारी मात्रा और अनुपचारित सीवेज के कारण नदी स्नान योग्य भी नहीं रही। 2026 के आंकड़ों में केशी घाट, विश्राम घाट जैसे स्थानों पर प्रदूषण का स्तर खतरनाक दर्ज किया गया। बोट टूरिज्म के नाम पर चल रही नावों ने प्रदूषण को और बढ़ाया है, 2026 में वृन्दावन के पास यमुना में नाव पलटने की घटनाएं हुईं, जिसमें दर्जनों श्रद्धालु मारे गए। शुद्धिकरण की जगह सौंदर्यीकरण का ढोंग चल रहा है, जिससे पावन ब्रज रज दुर्लभ हो गई है।

पर्यावरणीय विनाश के आंकड़े स्पष्ट हैं। वन, हरियाली, तालाब और कुंड तेजी से गायब हो रहे हैं। कुंज गलियां, जो राधा-कृष्ण की लीला स्थलियाँ हैं, अब कंक्रीट की ऊंची अट्टालिकाओं से घिर गई हैं। 5500 से अधिक मंदिरों वाले इस छोटे से क्षेत्र में कैरिंग कैपेसिटी पार हो चुकी है। ट्रैफिक, शोर और वायु प्रदूषण ने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। लोकल निवासियों का कहना है कि पहले की शांत वातावरण अब इतिहास बन चुका है। बिल्डर्स लॉबी का मॉडल हावी है: 2020-2025 के बीच प्राइम एरिया में भूमि की कीमतें तीन गुना से अधिक बढ़ गई हैं, कुछ जगहों पर 22-29% CAGR के साथ। स्थानीय वाशिंदे हाशिए पर धकेल दिए गए हैं, जबकि बाहरी डेवलपर्स और फ्रॉड बाबाओं का राज चल रहा है। मठाधीश बनकर भावनाओं का व्यापार करने वाले अज्ञान के अंधेरे का फायदा उठा रहे हैं। भक्ति अब कमोडिटी बन गई है; इंस्टेंट मोक्ष की तलाश में आने वाली भीड़ असली आस्था को कुचल रही है।

सांस्कृतिक विनाश और भी गहरा है। बृज भाषा लगभग विलुप्त होने की कगार पर है। गुरुकुलों की जगह अंग्रेजी स्कूलों का बोलबाला है। पारंपरिक गायन, नृत्य, भोजन और वेशभूषा बदल चुके हैं। चैतन्य महाप्रभु, सूरदास और वल्लभाचार्य की भूमि अब पहचान में नहीं आती। चारों तरफ ऐश-ऐय्याशी के केंद्र बन चुके हैं, जहां भक्ति की जगह व्यावसायिकता हावी है। बृज संस्कृति के संरक्षण में जीरो प्रयास दिखाई देता है। विकास संस्थाएं भ्रष्टाचार के अड्डे बन गई हैं। बिना शुद्ध जल की व्यवस्था बढ़ाए रिवर फ्रंट प्रोजेक्ट चलाए जा रहे हैं, जो यमुना को और प्रदूषित कर रहे हैं।

यह “विकास” ब्रज भूमि की मूल आत्मा को कुचल रहा है। प्राचीन ग्रंथों में बृज का विकास उसके पिछड़ेपन को सहेजने, गौ-रक्षा, वन-संरक्षण और सादगी में निहित था, कंक्रीटाइजेशन में नहीं। आज की अट्टालिकाएं, मॉल जैसी संरचनाएं और हाईवे ब्रज की पावनता को नष्ट कर रहे हैं। स्थानीय ज्ञान प्रणाली, पारंपरिक जल संरक्षण और जैव विविधता खतरे में है। पर्यटन अर्थव्यवस्था के नाम पर जो रोजगार पैदा हो रहा है, वह मौसमी और असमान है; स्थानीय महिलाएं और पिछड़े वर्ग हाशिए पर हैं।

ब्रज की रक्षा जरूरी है। विकास का नाम लेकर इस पवित्र भूमि की आत्मा को कुचलना अपराध है। श्री कृष्ण की लीला भूमि को सौंदर्यीकरण की नहीं, असली शुद्धिकरण की जरूरत है; यमुना की सफाई, कुंडों का संरक्षण, वनों का पुनरुद्धार, भीड़ नियंत्रण, स्थानीय संस्कृति का संवर्धन और बिल्डर्स लॉबी पर लगाम। बिना इनके कोई भी विकास मॉडल ब्रज के साथ छलावा है।

आस्था के केंद्र को व्यावसायिक हब बनाने वाले सोचें; क्या हम श्री कृष्ण को बेच रहे हैं? क्या हम राधा की वाटिकाओं को कंक्रीट के नीचे दफना रहे हैं? ब्रज की रक्षा करना सिर्फ पर्यावरण या संस्कृति की रक्षा नहीं, बल्कि सनातन धारा की रक्षा है। अगर आज नहीं रोका गया, तो आने वाली पीढ़ियां सिर्फ प्लास्टिक और कंक्रीट के बीच “इंस्टेंट भक्ति” का मजाक देखेंगी, असली ब्रज कभी नहीं जान पाएंगी।

यह घोर अन्याय है। ब्रज को बचाओ, उसकी आत्मा को बचाओ। विकास का ढोंग बंद करो, शुद्धिकरण और संरक्षण अपनाओ।

Monday, May 4, 2026

 कब तक 80 प्रतिशत आबादी खुद को कमजोर समझती रहेगी? कब तक बहुसंख्यक होकर भी राजनीतिक रूप से बिखरे रहेंगे? क्या सच में यह देश अपने ही मूल समाज से कटता जा रहा था? और सबसे बड़ा सवाल; क्या ‘सेक्युलरिज्म’ के नाम पर एक खामोश अन्याय चल रहा था? दशकों तक यह सवाल हवा में तैरते रहे, लेकिन जवाब किसी ने नहीं दिया। फिर अचानक कुछ बदल गया। एक खामोशी टूटी। एक गुस्सा फूटा। और जो समाज सदियों से सहनशीलता का प्रतीक था, वही अब सवाल पूछने लगा। क्या यह सिर्फ राजनीति का बदलाव है, या एक सोया हुआ शेर सच में जाग उठा है?

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हिंदू बहुमत: वो सोए हुए शेर जो जाग उठे

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बृज खंडेलवाल द्वारा

5 मई, 2026

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2014 से पहले, भारत में हिंदू बहुसंख्यक एक बेहद अजीब और विरोधाभासी स्थिति में थे। करीब 80 प्रतिशत आबादी होने के बावजूद, यह समाज राजनीतिक रूप से बंटा हुआ, वैचारिक रूप से कमजोर और अपनी सामूहिक ताकत को लेकर उदासीन था।

उस दौर में समाजवादी और कम्युनिस्ट विचारधारा के नेताओं ने ‘सेक्युलरिज्म’ को एक चादर की तरह ओढ़ रखा था। मगर इसके नीचे सच्चाई कुछ और थी। हिंदू समाज को जातियों और क्षेत्रों में उलझाए रखना ही उनकी राजनीति का मूल था।

कांग्रेस और परिवारवादी पार्टियों ने इस बिखराव को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया। उनका गणित सीधा था; अल्पसंख्यकों और चुनिंदा जातियों का गठजोड़ बनाओ, सत्ता पाओ। यह खेल दशकों तक चला। मगर हर खेल की एक सीमा होती है।

धीरे-धीरे यह ‘तुष्टीकरण’ एक चुभन बन गया। एक ऐसा जख्म, जो दिखता नहीं था, मगर दर्द देता था। यही दर्द आगे चलकर विस्फोट बना।

आज़ादी के बाद भारत ने खुद को आधुनिक राष्ट्र बनाने की कोशिश की। 1950 के दशक में जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने हिंदू कोड बिल लागू किया। यह सुधार जरूरी था। इससे महिलाओं को अधिकार मिले, समाज में बदलाव आया।

लेकिन सवाल यहीं खड़ा होता है, क्या यही साहस मुस्लिम पर्सनल लॉ में दिखाया गया? जवाब साफ है; नहीं।

यहां से एक असमानता शुरू हुई। सरकार हिंदुओं के लिए सुधारक बनी, और अल्पसंख्यकों के लिए रक्षक।

संविधान का अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यकों को अपने शिक्षण संस्थान चलाने की आजादी देता है। मगर बहुसंख्यकों को यह अधिकार नहीं मिला।

फिर आया 1991 का पूजा स्थल कानून। इसने 1947 की स्थिति को स्थिर कर दिया। काशी और मथुरा जैसे विवादों के रास्ते कानूनी तौर पर बंद हो गए।

दूसरी ओर, हिंदू मंदिर सरकारी नियंत्रण में आ गए। तिरुपति जैसे मंदिरों की आय सरकार के अधीन हो गई।

यह एक विचित्र स्थिति थी। दुनिया में शायद ही कोई ऐसा देश होगा जहां बहुसंख्यकों के धार्मिक संस्थानों पर सरकार का नियंत्रण हो, और अल्पसंख्यकों के संस्थान पूरी तरह स्वतंत्र हों।

अगर इस पूरी कहानी का ‘टर्निंग पॉइंट’ तलाशना हो, तो वह 1985 का शाहबानो केस था।

एक 62 वर्षीय महिला, जिसे उसके पति ने तीन तलाक देकर छोड़ दिया। सुप्रीम कोर्ट ने उसके पक्ष में फैसला दिया। उसे गुजारा भत्ता मिलना चाहिए।

मगर तब के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने बहुमत होने के बावजूद पीछे कदम खींच लिया। उन्होंने संसद में नया कानून बनाकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट दिया।

यह सिर्फ एक फैसला नहीं था। यह एक संदेश था। यह संदेश साफ था; राजनीति न्याय से बड़ी है।

यहीं से लोगों को समझ आया कि ‘सेक्युलरिज्म’ का अर्थ बराबरी नहीं, बल्कि झुकाव है। यही वह क्षण था जब हिंदू समाज को अपनी राजनीतिक कमजोरी का अहसास हुआ।

1990 में V. P. सिंह ने मंडल आयोग लागू किया। उद्देश्य था पिछड़ों को आरक्षण देना। मगर इसके पीछे राजनीति का गहरा खेल था। यह उस हिंदू एकता को तोड़ने की कोशिश थी जो राम मंदिर आंदोलन से बन रही थी।

देश में उबाल आया। विरोध प्रदर्शन हुए। युवाओं ने आत्मदाह तक किया।

इसके जवाब में लाल कृष्ण आडवाणी ने रथ यात्रा निकाली। सोमनाथ से अयोध्या तक की यह यात्रा सिर्फ एक यात्रा नहीं थी। यह एक प्रतीक थी।

इसने जातियों में बंटे हिंदुओं को एक सूत्र में बांधना शुरू किया।

यहीं से ‘हिंदू वोट’ की अवधारणा जन्मी। जिसे पहले असंभव माना जाता था।

UPA सरकार के समय तुष्टीकरण एक नीति बन गया। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट आई। उसने मुसलमानों की आर्थिक स्थिति को उजागर किया। मगर इसका इस्तेमाल समाधान के लिए नहीं, बल्कि राजनीति के लिए हुआ।

मनमोहन सिंह का बयान: “देश के संसाधनों पर अल्पसंख्यकों का पहला हक है”, एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया।

इसके साथ ही ‘भगवा आतंकवाद’ का नैरेटिव गढ़ा गया। हिंदू संगठनों को आतंकी गतिविधियों से जोड़ने की कोशिश हुई।

बाद में अदालतों में ये दावे कमजोर साबित हुए।

लेकिन तब तक एक धारणा बन चुकी थी, सरकार बहुसंख्यकों के साथ खड़ी नहीं है।

2014 में जो हुआ, वह अचानक नहीं था। यह दशकों की नाराजगी का परिणाम था।

यह किसी एक पार्टी की रणनीति नहीं थी। यह समाज के भीतर पनप रही भावना थी।

हिंदू समाज अब खुद को सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि शक्ति के रूप में देखने लगा।

2026 के पश्चिम बंगाल चुनाव इसका ताजा उदाहरण हैं। जो राज्य कभी वामपंथी और बौद्धिक राजनीति का गढ़ था, वहां भी यह बदलाव दिख रहा है।

यह बदलाव सिर्फ वोट का नहीं है। यह सोच का है।

जो लोग यह मानकर बैठे थे कि बहुसंख्यक समाज हमेशा बंटा रहेगा, उनकी गणना अब गलत साबित हो रही है।

सोए हुए शेर अब जाग चुके हैं।

और जब शेर जागता है, तो जंगल का संतुलन बदलता है।

आज का हिंदू समाज सवाल पूछ रहा है। जवाब मांग रहा है।

वह अब सिर्फ सहनशील नहीं, सजग भी है।

राजनीति अब बदल रही है। वोट बैंक का गणित कमजोर पड़ रहा है।

उसकी जगह एक नई सोच उभर रही है, राष्ट्रवाद की। भारत और भारतीयता की। तमिल राजनीति भी इस से प्रभावित हो रही है।

यह बदलाव स्थायी होगा या अस्थायी, यह भविष्य बताएगा।

लेकिन इतना तय है; अब बहुसंख्यक समाज को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। शेर की दहाड़ गूंज चुकी है। अब सन्नाटा पहले जैसा नहीं रहेगा।


Sunday, May 3, 2026

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पूंजीवाद का कुरूप चेहरा:

लोकतांत्रिक समाजवाद की वापसी की पुकार

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

4 मई 2026

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लाल झंडे अब कम दिखते हैं। मई दिवस की रौनक भी फीकी पड़ गई है। कभी जो दिन मेहनतकशों की  एकता का पैग़ाम देता था, आज वह बस एक रस्म सा लगता है। मगर सच यह है कि ज़मीन के नीचे अंगारे अब भी सुलग रहे हैं। सवाल वही है; क्या तरक़्क़ी सिर्फ कुछ लोगों के लिए है, या सबके लिए?

तीन दशकों से भारत में उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण का निज़ाम  चला। कहा गया कि विकास होगा, दौलत बढ़ेगी, सबका भला होगा। हुआ क्या? अमीर और अमीर हो गए। ग़रीब वहीं खड़े रह गए, कई जगह और पीछे चले गए। शहर चमक उठे, लेकिन गाँव सूने हो गए। अमीरी-गरीबी का फासला अब खाई बन चुका है।

दुनिया के मंच पर यह पूंजीवाद अब और भी बेनक़ाब हो चुका है। डोनाल्ड ट्रंप इस सिस्टम का सबसे बदसूरत चेहरा बनकर उभरे। उनकी सियासत में तहज़ीब  कम, घमंड ज़्यादा दिखाई दिया है। व्यापार युद्ध, ऊँचे टैरिफ, कमज़ोर देशों को “hell hole” कहना; यह सब सिर्फ लफ्ज़ नहीं, बल्कि उस सोच की झलक है जहाँ ताक़त ही सच बन जाती है।

यह पूंजीवाद का वही चेहरा है, जो इंसान को इंसान नहीं, माल (commodity) समझता है। कामगार एक नंबर बन जाता है। मज़दूर एक लागत बन जाता है। और इंसानियत? वह कहीं गुम हो जाती है।

कार्ल मार्क्स ने बहुत पहले चेतावनी दी थी: यह सिस्टम इंसान के रिश्तों को सिर्फ पैसे के लेन-देन में बदल देगा। आज गिग इकॉनमी, ठेके पर काम, और प्रवासी मज़दूरों की हालत देखिए। सब कुछ वही कहानी कह रहे हैं।

रोजा लक्जेमबर्ग ने कहा था, या तो समाजवाद आएगा, या बर्बरता। आज दुनिया जिस मोड़ पर खड़ी है, यह बात और भी सच्ची लगती है। नफ़रत की राजनीति, धर्म और नस्ल के नाम पर बँटवारा; यह सब उसी बर्बरता की आहट है।

भारत में समाजवाद की सोच कोई पराई चीज़ नहीं है। डॉ राम मनोहर लोहिया ने साफ कहा था: बराबरी के बिना भाईचारा एक झूठ है। जब तक आर्थिक समानता नहीं होगी, तब तक समाज में सच्ची मोहब्बत नहीं पनपेगी।

आचार्य नरेंद्र देव ने लोकतंत्र और समाजवाद को एक-दूसरे का पूरक माना। उनका मानना था कि पूंजीवाद के तहत लोकतंत्र सिर्फ दिखावा है, असल ताक़त कुछ लोगों के हाथ में सिमट जाती है।

आज भारत में यह सच्चाई साफ दिखती है। शहरों में ऊँची-ऊँची इमारतें हैं, लेकिन उनके साये में झुग्गियाँ भी हैं। कॉर्पोरेट मुनाफा आसमान छू रहा है, लेकिन किसान कर्ज़ में डूबकर जान दे रहा है। नौजवान पढ़-लिखकर भी बेरोज़गार है। यह कैसी तरक़्क़ी है?

दुनिया में भी हालात कुछ अलग नहीं। ट्रंप की नीतियों ने दिखा दिया कि पूंजीवाद अब सिर्फ बाज़ार नहीं, बल्कि ताक़त का खेल बन चुका है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ कमज़ोर हो रही हैं। नियमों की जगह मनमानी चल रही है।

ऐसे में लोकतांत्रिक समाजवाद एक उम्मीद बनकर उभरता है। यह कोई ख़याली पुलाव नहीं है। यह एक संतुलित रास्ता है, जहाँ लोकतंत्र भी हो, और आर्थिक न्याय भी।

समाजवाद का मतलब सिर्फ सरकार का नियंत्रण नहीं। इसका मतलब है; हर इंसान को इज़्ज़त से जीने का हक़ मिले। अच्छी शिक्षा, सस्ती स्वास्थ्य सेवा, और रोजगार के मौके सबको मिलें।

नॉर्डिक देशों का मॉडल सामने है। वहाँ बाज़ार भी है, लेकिन मज़बूत यूनियन भी हैं। अमीर टैक्स देते हैं, और ग़रीबों को सहारा मिलता है। यही संतुलन समाज को स्थिर बनाता है।

भारत में भी कुछ कोशिशें हुई हैं। मनरेगा, मिड-डे मील जैसी योजनाओं ने राहत दी है। लेकिन ये आधे-अधूरे कदम हैं। ज़रूरत है एक बड़े बदलाव की: नीतियों में, सोच में, और सियासत में।

आज सबसे ज़रूरी है इंसान को केंद्र में रखना। मुनाफा नहीं, इंसानियत अहम हो। विकास का मतलब सिर्फ जीडीपी नहीं, बल्कि लोगों की खुशहाली हो।

मई दिवस भले फीका पड़ गया हो, लेकिन उसका पैग़ाम आज भी ज़िंदा है। यह हमें याद दिलाता है कि हक़ माँगने से नहीं, लड़ने से मिलते हैं।

पूंजीवाद ने हमें बहुत कुछ दिया, लेकिन बहुत कुछ छीन भी लिया। अब वक़्त है सोचने का; क्या हम उसी रास्ते पर चलते रहेंगे, या कोई नया रास्ता चुनेंगे?

लोकतांत्रिक समाजवाद कोई पुरानी किताब का सपना नहीं। यह आज की ज़रूरत है। यह वह रास्ता है, जहाँ इंसान, इंसान बना रहता है, न कि सिर्फ एक ग्राहक या मजदूर।

और शायद यही सबसे बड़ी लड़ाई है: इंसान को इंसान बनाए रखने की।

Saturday, May 2, 2026

 ख़ऊओं का शहर आगरा!  

बृज मंडल की मिठास की अनंत परंपरा  

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बृज खंडेलवाल द्वारा  

3 मई 2026  

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बृज मंडल: आगरा, मथुरा और हाथरस का यह पवित्र त्रिकोण कृष्ण प्रेम की मीठी धुन पर थिरकता है। यमुना की लहरों और ब्रज की धूल में दूध, घी और खोए की महक आज भी घुली हुई है। 

यहां की मिठाइयां सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि भक्ति, संस्कृति और सदियों पुरानी विरासत का संगम हैं। मंदिरों में “लाल कू मीठी खीर भौत भावे” कहकर भोग चढ़ाया जाता है, जहां मठरी, लड्डू, ठौर, पेड़ा और रबड़ी, मोहन थाल जैसे प्रसाद कृष्ण भक्ति को और मिठास देते हैं।  वृन्दावन में ठंडी दही लस्सी के बिना यात्रा अधूरी मानी जाती है, तो मथुरा में खुरचन और मेवा-युक्त खौलते दूध का कुल्लड़ चटकाए बिना मनोकामना पूरी नहीं होती।

बृज क्षेत्र की मिठाइयां सांस्कृतिक धरोहर हैं। इनमें मुगल काल की समृद्धि और ब्रज की सादगी का अनोखा मेल दिखता है। आगरा का विश्व प्रसिद्ध पेठा तो गरीब- अमीर सभी का पसंदीदा है, लेकिन घेवर, कलाकंद, बर्फी, गुलाब जामुन, खुरमी, बालूशाही, पेड़ा, रबड़ी, सोन पपड़ी और दूध की मलाई जैसी रचनाएं ब्रज की आत्मा को छूती हैं। घी और खोया इन मिठाइयों की जान हैं, जबकि बंगाल चेना पर और दक्षिण भारत नारियल पर निर्भर रहता है। यहां गोंद जैसे पौष्टिक तत्व और मुगल शाही रबड़ी की गाढ़ापन ब्रज की खास पहचान है।

भारत में मिठाइयों का इतिहास वैदिक काल से जुड़ा है, लेकिन आगरा की भगत हलवाई इसे जीवंत उदाहरण बनाती है। 1795 में लेख राज भगत द्वारा यमुना किनारे बेलंगंज में स्थापित यह दुकान भारत की सबसे पुरानी मिठाई की दुकानों में से एक मानी जाती है। लगभग 231 वर्ष पुरानी इस संस्था ने पीढ़ी दर पीढ़ी पारंपरिक रेसिपी और बनाने के तरीके संभालकर रखे हैं। शुरू में बेड़इं, जलेबी, लड्डू और साधारण मिठाइयों से सफर शुरू करने वाली यह संस्थान आज सैकड़ों आइटम्स, मिठाई, चाट, बेकरी और कन्फेक्शनरी, तक पहुंच चुकी है। NDTV समेत कई मीडिया संस्थानों ने इसे भारत की सबसे पुरानी मिठाई दुकान के रूप में मान्यता दी है। मक्खन का समोसा, पिस्ते की बर्फी, खास हैं।

बेलनगंज में भगत हलवाई के सामने एक जमाने में राजनीतिक सभाएं होती थीं और बड़े-बड़े राष्ट्रीय नेता यहां नाश्ता करते थे। आज इसके 7-8 आउटलेट्स हैं, लेकिन स्वाद वही पुराना, शुद्ध घी-खोया वाला बना हुआ है। 

कई दुकानों पर आज भी दोपहर को कढ़ाई में पका गाढ़ा दूध पीना आगरा की अनोखी शान है।

आगरा में तिकोनिया इलाके की दुकानें भी कम प्रसिद्ध नहीं। शहर के विभिन्न हिस्सों में हीरा लाल मिष्ठान, गोपाल दास पेठे वाले, देवी राम, दाऊजी, गोपिका और GMB जैसे ब्रांड्स लंबे समय  से स्वाद की सेवा कर रहे हैं। गोपाल दास तो पेठा और दालमोठ के लिए मशहूर है। रबड़ी इतनी गाढ़ी होती है कि चम्मच उसमें खड़ा रह जाता है। धीमी आंच पर घंटों पकाई जाने वाली यह रबड़ी ब्रज की धैर्यपूर्ण परंपरा का प्रतीक है।

मथुरा में पेड़ा कृष्ण भक्ति का प्रतीक है। यहां का पारंपरिक पेड़ा खोए, शुद्ध घी और सूखे मेवों से बना नरम, हल्का पीला गोला मुंह में घुल जाता है। कान्हा स्वीट्स और बसंती मिठाई की रबड़ी दूध को उबाल-उबालकर बनाई जाती है, जिसमें पिस्ता की बारीक कतरनें स्वाद बढ़ाती हैं। मक्खन संदेश मक्खन की मलाई में फल-मेवे मिलाकर ब्रज का अनूठा स्वाद प्रस्तुत करता है। खुरचन भी यहां लोकप्रिय है, दूध की मलाई को रगड़कर बनाया गया चिपचिपा, इलायची-केसर युक्त आनंद।

हाथरस हींग कचौड़ी के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन मिठाइयों में भी पीछे नहीं। यहां का घेवर मेवों से भरा आता है। सोन पपड़ी पतली-कुरकुरी चादरों वाली, लंबे समय तक टिकने वाली मिठाई है। हाथरस के हलवाई पारंपरिक चूल्हों पर घी डालकर स्वाद को और गहराई देते हैं। खुरचन यहां भी चिपचिपी और सुगंधित बनती है।

बृज के छोटे कस्बे भी अपनी विशेषताएं रखते हैं। पिनाहट की खोए की गुजियां त्योहारों में खास होती हैं, खोया भरी कुरकुरी परतें, गुड़ या चीनी से मीठी। किरावली के पेड़े छोटे, घने खोए वाले और बेहद स्वादिष्ट होते हैं। ये छोटी जगहें ब्रज की गहरी सांस्कृतिक जड़ों को दर्शाती हैं।

बृज मिठाइयों की सबसे बड़ी खूबी उनकी सादगी और पौष्टिकता है। शुद्ध घी, ताजा खोया और मेवों से बनी ये मिठाइयां न सिर्फ स्वाद देती हैं बल्कि ऊर्जा भी। आज के दौर में जब पैकेटबंद मिठाइयां बाजार में छाई हुई हैं, तब भी बृज मंडल के हलवाई पुरानी परंपराओं को जीवित रखे हुए हैं।

ताजमहल देखने आने वाले पर्यटक अब सिर्फ पत्थर की सुंदरता नहीं, बल्कि ब्रज की मीठी विरासत का भी रसास्वादन जरूर करें। आगरा, मथुरा और हाथरस की गलियों में घूमते हुए एक कौर पेड़ा, एक चम्मच रबड़ी या एक टुकड़ा सोन पपड़ी मुंह में रखें, तो महसूस होगा कि कृष्ण की लीला अभी भी यहां जीवंत है। 

बृज मंडल की मिठास अनंत है, ठीक उसी तरह जैसे कान्हा का प्रेम। एक बार चख लो, तो बार-बार याद आएगी। 


Friday, May 1, 2026

 कब तक तेल के भरोसे? अब सूरज से चलेगा भारत

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पश्चिम एशिया के संकट के बीच, सोलर एनर्जी की चमक से भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिखी जा रही है

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

3 मई 2026

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पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष। दूर जल रही आग की तपिश भारत तक साफ महसूस हो रही है। तेल और गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव, आपूर्ति की अनिश्चितता और आयात पर बढ़ती निर्भरता भारत के लिए गंभीर खतरे हैं। देश अभी भी अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयातित ईंधन से पूरा करता है। ऐसे में वैश्विक तनाव सीधे हमारे ऊर्जा बिल पर असर डालते हैं।

हर संकट अवसर भी लेकर आता है।  एक रिपोर्ट

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धूप में नहाया, उत्तर प्रदेश का एक छोटा सा गांव। सरसों के पीले खेतों के बीच से गुजरती कच्ची पगडंडी। दूर कहीं एक घर की छत पर चमकते सोलर पैनल। आंगन में धीरे-धीरे घूमता पंखा, मोबाइल चार्ज हो रहा है, और शाम ढलते ही बच्चों की किताबों पर स्थिर, चमकदार रोशनी फैल रही है, टिमटिमाती ढिबरी या लालटेन की जगह।

यकीन करना मुश्किल है, लेकिन यही वो भारत है जो महज 25 साल पहले अंधेरे से जूझ रहा था। तब सूरज ढलते ही गांव सिमट जाता था। दीए की कांपती लौ में रात कटती, और बिजली एक  मेहमान की तरह आती-जाती रहती। इन्वर्टर अमीरों की शान था, जनरेटर शोर मचाता और डीजल की तेज गंध हवा में घुली रहती। 

आज तस्वीर पूरी तरह पलट चुकी है। छतों पर सोलर पैनल चमक रहे हैं, खेतों के किनारे मिनी ग्रिड काम कर रहे हैं, और गांव खुद अपनी ऊर्जा गढ़ रहा है। 

भारत आज ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक स्थिर लेकिन निर्णायक यात्रा पर है। यह कोई अचानक छलांग नहीं, बल्कि निरंतर प्रयासों की कहानी है। 

वित्तीय वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही में देश की बिजली मांग ने नया रिकॉर्ड बनाया। 25 अप्रैल 2026 को दोपहर करीब 3:38 बजे पीक डिमांड 256.1 गीगावॉट तक पहुंच गई। गर्मी की लहर और बढ़ती आर्थिक गतिविधियों ने इस मांग को और तेज किया। बढ़ती अर्थव्यवस्था, हर घर बिजली पहुंचाने के प्रयास, शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन से तेज होती गर्मी; सब मिलकर ऊर्जा की भूख को बढ़ा रहे हैं। 

सोलर ऊर्जा का उत्पादन साल-दर-साल 24 प्रतिशत बढ़ा है। कुल बिजली उत्पादन में करीब 3 प्रतिशत की वृद्धि हुई, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से गैर-जीवाश्म स्रोतों से आई। कोयला और लिग्नाइट आधारित उत्पादन में 1 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। यानी विकास और प्रदूषण के पुराने रिश्ते में अब दरार पड़ रही है। 

संकेत और भी साफ हैं। पिछले 90 दिनों में से 88 दिन ऐसे रहे जब बिजली की सबसे ज्यादा मांग दिन के समय दर्ज हुई, जब सूरज चरम पर होता है। इसका मतलब है कि सोलर ऊर्जा अब महज विकल्प नहीं रह गई है, बल्कि मुख्यधारा बनती जा रही है।

इसी बदलाव को घर-घर तक पहुंचाने वाली एक बड़ी पहल है पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना। इस योजना का उद्देश्य साधारण परिवारों की छतों को छोटे-छोटे पावर प्लांट में बदलना है। सरकार सब्सिडी मुहैया करा रही है, आसान ऋण की व्यवस्था कर रही है और लोगों को अपनी बिजली खुद उत्पन्न करने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। अब तक इस योजना के तहत 31 लाख से ज्यादा घरों को फायदा पहुंच चुका है, जबकि लाखों आवेदन लंबित हैं।

गांवों में जहां कभी बिजली आने का इंतजार किया जाता था, वहां अब लोग खुद बिजली पैदा कर रहे हैं। बिजली का बिल काफी कम हो रहा है, और अतिरिक्त ऊर्जा को ग्रिड में बेचकर अतिरिक्त आय का नया जरिया भी बन रहा है। यह सिर्फ एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि ऊर्जा के लोकतंत्रीकरण की दिशा में एक सामाजिक बदलाव है। आम आदमी अब ऊर्जा का उपभोक्ता नहीं, बल्कि उत्पादक भी बन रहा है।

महंगे आयातित तेल-गैस के मुकाबले सोलर और पवन ऊर्जा अब केवल पर्यावरणीय विकल्प नहीं, बल्कि आर्थिक मजबूरी भी बन गई है। जब वैश्विक बाजार अस्थिर हों, तब सूरज की रोशनी और हवा की ताकत सबसे भरोसेमंद साथी साबित होते हैं।

इसलिए सरकार सोलर पार्क, विंड एनर्जी कॉरिडोर और ग्रीन हाइड्रोजन जैसी परियोजनाओं पर तेजी से काम कर रही है। निजी क्षेत्र का निवेश भी बढ़ रहा है, क्योंकि साफ ऊर्जा अब भविष्य की बात नहीं, तुरंत की जरूरत बन गई है। ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु लक्ष्य दोनों एक ही रास्ते पर दिख रहे हैं।

हालांकि सोलर और पवन ऊर्जा की क्षमता तेजी से बढ़ रही है, लेकिन इसका पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा। “कर्टेलमेंट”; यानी पैदा हुई साफ ऊर्जा को व्यर्थ जाना, एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। चौथी तिमाही में करीब 27 गीगावॉट सोलर और 4 गीगावॉट पवन ऊर्जा को सीधे कर्टेल किया गया, जबकि ट्रांसमिशन रिजर्व के तहत और भी बड़ी मात्रा प्रभावित हुई।

यह विडंबना है, एक ओर देश प्रदूषण कम करने की कोशिश कर रहा है, दूसरी ओर साफ ऊर्जा को मजबूरी में रोकना पड़ रहा है। समस्या उत्पादन की नहीं, बल्कि व्यवस्था की है। हमने सोलर प्लांट तो तेजी से लगाए, लेकिन बिजली को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने वाले ट्रांसमिशन नेटवर्क की गति उससे मेल नहीं खा पाई। राजस्थान, गुजरात और तमिलनाडु जैसे राज्यों में सूरज और हवा से भरपूर ऊर्जा पैदा हो रही है, लेकिन उसे उपभोक्ता केंद्रों तक पहुंचाने में अड़चनें बनी हुई हैं।

भंडारण की कमी भी एक बड़ी बाधा है। दिन में पैदा हुई अतिरिक्त सोलर ऊर्जा को शाम या रात के लिए संग्रहित करने की क्षमता अभी सीमित है। बैटरी स्टोरेज और पंप्ड स्टोरेज हाइड्रो जैसी तकनीकें अभी शुरुआती चरण में हैं। नतीजा यह होता है कि दोपहर में बिजली की अधिकता और शाम को फिर वही दबाव।

कोयला आधारित प्लांट्स की कहानी भी बदल रही है। प्लांट लोड फैक्टर 72 प्रतिशत से घटकर 69 प्रतिशत रह गया है। कोयला अब “राजा” की जगह बैकअप की भूमिका निभा रहा है। पर्यावरण की दृष्टि से यह सकारात्मक है, लेकिन पुराने प्लांट्स की कार्यक्षमता और लागत पर नए सवाल खड़े हो रहे हैं।

तो क्या भारत की ऊर्जा स्वतंत्रता की राह रुक गई है? बिल्कुल नहीं। रुकावटें जरूर हैं: ट्रांसमिशन नेटवर्क की कमी, भंडारण की चुनौती, नीतिगत स्पष्टता की जरूरत और राज्यों के बीच समन्वय की कमी। लेकिन राह बंद नहीं है।

असल जरूरत संतुलित विकास की है। उत्पादन के साथ-साथ वितरण, भंडारण और स्मार्ट ग्रिड पर बराबर ध्यान देना होगा। ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर को तेजी से पूरा करना, बैटरी स्टोरेज में बड़े पैमाने पर निवेश और टाइम-ऑफ-डे टैरिफ जैसी व्यवस्थाएं इस संक्रमण को आसान बना सकती हैं। अगर निवेशकों को नीतिगत निश्चितता और समय पर भुगतान मिले, तो निजी क्षेत्र और तेजी से आगे आएगा।

आज गांव की छत पर चमकता सोलर पैनल सिर्फ बिजली नहीं दे रहा। वह आत्मनिर्भरता, पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक सशक्तिकरण का प्रतीक बन गया है। जहां कभी अंधेरा स्थायी लगता था, वहां अब रोशनी अपने दम पर जल रही है।

भारत की यह यात्रा अभी अधूरी है। बढ़ते भारत की यह “ग्रोइंग पेन” की कहानी है; पुरानी ऊर्जा से नई, स्वच्छ और आत्मनिर्भर ऊर्जा की ओर एक साहसिक संक्रमण की।

 चुनाव संपन्न: अब चार तक, काटे नहीं कटते दिन और रात

बदलाव की आहट ने बढ़ाई सियासी हलचल

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

2 मई 2026

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चार मई को तय हो जाएगा ;  दीदी लौटेंगी या दादा के हाथ आएगी पश्चिम बंगाल की कमान। लेकिन तब तक बड़े-बड़े नेताओं के दिलों की धड़कनें बगावत पर उतारू हैं, और दिल्ली से कोलकाता तक सियासी गलियारों में बेचैनी का आलम है।

चुनाव तो कई प्रांतों में हुए हैं ;  पश्चिम बंगाल, केरल, असम, तमिलनाडु और पुदुचेरी , लेकिन सबकी निगाहें बंगाल पर टिकी हैं। 294 सीटों वाली इस विधानसभा में बहुमत का जादुई आंकड़ा 148 है, और इस बार की लड़ाई इसी आंकड़े के इर्द-गिर्द घूम रही है।

इस बार पश्चिम बंगाल में कुल 68,251,008 पंजीकृत मतदाताओं में से दोनों चरणों में औसत मतदान लगभग 91.57 प्रतिशत रहा। पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं: "इतनी बड़ी भागीदारी यह इशारा करती है कि जनता इस बार कुछ नया सोचकर आई है , शायद बदलाव की ओर।"

राज्य की राजनीति में इस बार सीधा मुकाबला सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच रहा। टीएमसी ने अपनी सामाजिक योजनाओं, महिला मतदाताओं, अल्पसंख्यक समर्थन और 'बंगाली अस्मिता' को ढाल बनाया। भाजपा ने भ्रष्टाचार, कानून-व्यवस्था, बेरोजगारी और 15 साल की सत्ता के विरुद्ध उठी थकान को अपना हथियार बनाया। वामपंथी दल और कांग्रेस इस बार हाशिये पर नज़र आए । 2021 में इनके संयुक्त मोर्चे को महज़ एक सीट मिली थी, हालाँकि उनका वोट-शेयर 117 सीटों पर जीत के अंतर से अधिक रहा था।

चुनाव प्रचार के दौरान एक बड़ा विवाद मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (SIR) को लेकर उठा, जिसमें अक्टूबर 2025 के बाद से लगभग 91 लाख मतदाताओं के नाम काटे गए — यानी कुल मतदाताओं का करीब 12 प्रतिशत। टीएमसी ने इसे राजनीतिक षड्यंत्र बताया, जबकि भाजपा ने इसे अवैध घुसपैठियों की सफाई करार दिया।


मतदान के बाद जारी एग्जिट पोल्स ने तस्वीर को और रोमांचक बना दिया है। रिपब्लिक टीवी के 'पोल ऑफ पोल्स' में भाजपा को 155 से 158 सीटें मिलती दिख रही हैं , बहुमत के आंकड़े से साफ ऊपर। अधिकांश एजेंसियाँ भाजपा को 146 से 175 सीटों के बीच रख रही हैं, जबकि टीएमसी 120 से 140 सीटों पर सिमटती नजर आ रही है। कुछ सर्वे टीएमसी को 177 से 195 सीटें भी देते हैं, जिससे साफ है कि सर्वे एकमत नहीं हैं।

उल्लेखनीय यह भी है कि एक्सिस माई इंडिया जैसी बड़ी एजेंसी ने इस बार बंगाल का एग्जिट पोल जारी नहीं किया, जिससे अटकलों का बाजार और गर्म है।

ममता बनर्जी ने सभी सर्वे खारिज करते हुए कहा कि उनकी पार्टी 226 से ज्यादा सीटें जीतेगी। दूसरी ओर भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी 180 से अधिक सीटों का दावा कर रहे हैं।

हालाँकि एग्जिट पोल्स हमेशा सही नहीं होते। 2021 में कई सर्वे गलत साबित हुए थे, जब भाजपा को बड़ी बढ़त दिखाने के बावजूद टीएमसी ने 215 सीटें जीती थीं। इस बार त्रिशंकु विधानसभा की संभावना पूरी तरह नकारी नहीं जा सकती।


उधर, असम में सत्तारूढ़ भाजपा गठबंधन के पक्ष में रुझान हैं। ज्यादातर सर्वे मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा की सरकार की वापसी के संकेत दे रहे हैं।

केरल में इस बार पारंपरिक ढर्रा टूटता दिख रहा है। मनोरमा न्यूज़-सीवोटर सर्वे में यूडीएफ को 82 से 94 सीटें और एलडीएफ को 44 से 56 सीटें मिलती दिख रही हैं। टुडेज़ चाणक्य का अनुमान है कि यूडीएफ 69, एलडीएफ 64 और भाजपा 7 सीटों के आसपास रहेगी। अगर ये रुझान सही निकले तो पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाला वाम मोर्चा लगातार दूसरी बार सत्ता में आने का रिकॉर्ड नहीं बना पाएगा।

तमिलनाडु में लोकल एक्टिविस्ट गोपाल कृष्णन के मुताबिक अधिकांश सर्वे डीएमके गठबंधन को बढ़त दे रहे हैं और मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन की वापसी की संभावना मजबूत दिखाई दे रही है। पुदुचेरी में एनडीए के पक्ष में संकेत हैं।

4 मई का इंतज़ार

4 मई की सुबह 8 बजे से मतगणना शुरू होगी। अगर बंगाल में भाजपा सत्ता में आई, तो यह 2011 के बाद पहली बार होगा जब ममता बनर्जी की पार्टी सत्ता से बाहर जाएगी। और अगर टीएमसी वापसी करती है, तो यह उन तमाम सर्वेक्षणों के मुँह पर एक और तमाचा होगा जो बंगाल की जनता को समझने का दावा करते हैं।

सस्पेंस अपने चरम पर है। चार मई का इंतज़ार है।

Thursday, April 30, 2026

 क्या कभी जूते भी सांस लेते हैं?

जंग की आंच से आगरा के जूतों की अटकने लगीं धड़कनें! 

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

1 मई, 2026

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आगरा का विश्वप्रसिद्ध फुटवियर हब इन दिनों एक ऐसे अभूतपूर्व संकट की चपेट में है, जिसने इस ऐतिहासिक शहर की आर्थिक रीढ़ को हिलाकर रख दिया है। पश्चिम एशिया के सुलगते मैदानों से उठी युद्ध की लपटें अब सात समंदर पार आगरा की उन तंग गलियों तक पहुँच चुकी हैं, जहाँ सदियों से जूतों के निर्माण की कला फलती-फूलती रही है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के छिन्न-भिन्न होने से निर्यात का पहिया थम सा गया है और अंतरराष्ट्रीय बाजारों से मिलने वाले नए ऑर्डर प्रभावित हो रहे हैं। इस भू-राजनीतिक अस्थिरता ने न केवल व्यापारिक मुनाफे को चोट पहुँचाई है, बल्कि उन लाखों हाथों को भी अनिश्चितता के अंधेरे में धकेल दिया है, जो हर सुबह उम्मीद के साथ कारखानों का रुख करते थे।

उद्योग के जानकारों और अनुभवी निर्यातकों का मानना है कि वर्तमान तनाव के कारण माल की आवाजाही लंबी देरी हो रही है। समुद्री रास्तों के असुरक्षित होने से माल ढुलाई की लागत में  वृद्धि हुई है, जिसने वैश्विक खरीदारों के बीच एक गहरा अविश्वास पैदा कर दिया है। सबसे गंभीर मार कच्चे माल की कीमतों पर पड़ी है। पेट्रोलियम उत्पादों से तैयार होने वाले कृत्रिम चमड़े और विभिन्न प्रकार के तलवों जैसे सिंथेटिक सामग्री की कीमतों में तीस प्रतिशत तक का उछाल आया है। यह वृद्धि उस उद्योग के लिए कमर तोड़ने वाली साबित हो रही है, जो पहले से ही अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के कारण बहुत ही कम मार्जिन पर काम करने को मजबूर था। अब स्थिति यह है कि उत्पादन की लागत और बिक्री मूल्य के बीच का संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका है।

आर्थिक आंकड़ों के आइने में देखें तो आगरा का फुटवियर उद्योग प्रतिवर्ष लगभग चार से पांच हजार करोड़ रुपये का विदेशी मुद्रा भंडार देश के लिए जुटाता है। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए कारोबारियों में इस बात का भारी भय व्याप्त है कि व्यापार में बीस से पच्चीस प्रतिशत की सीधी गिरावट आ सकती है। यदि युद्ध की यह स्थिति लंबी खिंचती है, तो नुकसान का यह आंकड़ा चालीस प्रतिशत तक भी पहुँच सकता है। यूरोप और अमेरिका जैसे संपन्न बाजारों तक पहुँचने में लगने वाले अतिरिक्त समय ने उत्पादन के पूरे चक्र को ही अस्त-व्यस्त कर दिया है। जब समय पर माल नहीं पहुँचता, तो विदेशी खरीदार अपने ऑर्डर रद्द कर देते हैं, जिससे न केवल आर्थिक क्षति होती है बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में आगरा की साख पर भी बट्टा लगता है।

इस संकट का सबसे मार्मिक और मानवीय पक्ष उन सूक्ष्म एवं लघु इकाइयों से जुड़ा है, जो इस पूरे उद्योग का आधार हैं। आगरा की लगभग पांच हजार छोटी इकाइयाँ आज अपनी उत्पादन क्षमता के न्यूनतम स्तर पर काम कर रही हैं। इन कारखानों में काम करने वाले साढ़े तीन से चार लाख श्रमिक आज असमंजस में हैं। सुबह की पहली किरण के साथ जिस शहर में मशीनों की घरघराहट और हथौड़ों की गूँज सुनाई देती थी, वहाँ अब एक अजीब सा सन्नाटा पसरने लगा है। कई छोटी कार्यशालाओं में काम आधा हो चुका है और मजदूरों को मजबूरी में छुट्टी पर भेजा जा रहा है। दूर देश में छिड़ी जंग की लहरें यहाँ के कारीगरों की रसोई तक पहुँच गई हैं, जिससे उनकी दैनिक आजीविका पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।

आगरा का जूता उद्योग केवल ईंट-पत्थर की फैक्ट्रियां नहीं, बल्कि एक जीवंत विरासत है जो मुगल काल से निरंतर चली आ रही है। पीढ़ी दर पीढ़ी कारीगरों ने अपने खून-पसीने से इस हुनर को सींचा है। भारत के कुल फुटवियर निर्यात में लगभग अट्ठाइस से तीस प्रतिशत का योगदान देने वाला यह शहर घरेलू बाजार की भी पैंसठ प्रतिशत मांग को पूरा करता है। आधुनिकता की दौड़ में यहाँ के कारीगरों ने खुद को बदला भी है और मशीनी तकनीक को हाथ की सफाई के साथ जोड़ा है। चीन और वियतनाम जैसे देशों के दबाव के बावजूद आगरा अपनी रचनात्मकता और छोटे ऑर्डरों को कुशलता से पूरा करने की क्षमता के कारण टिका हुआ है। भौगोलिक संकेतक अर्थात जीआई टैग मिलने से इस शहर की पहचान को एक नई संजीवनी मिली थी, लेकिन युद्ध के इस दौर ने उन तमाम कोशिशों पर पानी फेरने की चुनौती पेश की है।

आज जब हम भविष्य की ओर देखते हैं, तो जेवर के पास बन रहे नए हवाई अड्डे और प्रस्तावित फुटवियर पार्क जैसी बुनियादी ढांचागत योजनाएं उम्मीद तो जगाती हैं, लेकिन तात्कालिक चुनौतियां कहीं अधिक विकराल हैं। महंगे कर्ज, जटिल नियम और पर्यावरण संबंधी चिंताओं के बीच अब युद्ध की यह मार इस उद्योग के लिए 'करेला और नीम चढ़ा' वाली स्थिति बन गई है। फिर भी, इस शहर की मिट्टी में संघर्ष और सृजन का अद्भुत संगम है। यहाँ के युवा डिजाइनर और महिलाएं अब नए प्रयोगों के साथ इस संकट से निकलने की राह खोज रहे हैं। सवाल अब केवल आर्थिक लाभ का नहीं, बल्कि उस हुनर को बचाने का है जिसने सदियों से आगरा को दुनिया के नक्शे पर चमकाया है। ताजमहल को निहारने आने वाली दुनिया को शायद अब उन कारीगरों के हाथों के छालों और उनकी मेहनत को भी पहचानना होगा, क्योंकि हर जूते की जोड़ी के पीछे एक परिवार की जीवटता और संघर्ष की अनकही कहानी छिपी होती है।