Tuesday, March 10, 2026

 दुश्मन कैसे बढ़ाएँ, दोस्त कैसे खोएँ ,  ट्रंप से सीखिए

क्या ईरान बनेगा ट्रम्प का वाटरलू?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

11 मार्च 2026

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क्या ईरान डोनाल्ड ट्रंप का वाटरलू बनेगा?

तारीख़ गवाह है कि इतिहास को ऐसे लम्हे बहुत पसंद आते हैं।

एक फैसला। एक जुआ। एक जंग।

और अचानक जो अजेय लगता था, वह भी कमजोर नज़र आने लगता है।

28 फरवरी 2026 को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने एक नाटकीय सैन्य कार्रवाई का हुक्म दिया: ऑपरेशन एपिक फ्यूरी। सब कुछ बहुत तेज़ हुआ। खामोशी से। लेकिन धमाकेदार अंदाज़ में।

अमेरिका और इज़राइल की संयुक्त फौजी कार्रवाई ने ईरान के कई सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। मिसाइलें कमांड सेंटरों को चीरती हुई गुज़रीं। हवाई हमलों ने बेस और इन्फ्रास्ट्रक्चर को तबाह किया। फिर सबसे बड़ा झटका आया। ईरान के सुप्रीम लीडर अली खमेनेई इन हमलों में मारे गए।

पूरा मध्य-पूर्व सांस रोके खड़ा था।

वॉशिंगटन में जश्न। तेहरान में गुस्सा और आग। देखते देखते जंग दूसरे हफ्ते में दाखिल हो गई।

व्हाइट हाउस ने इसे मजबूत लीडरशिप बताया। एक बहादुर कदम। ज़रूरी कार्रवाई। सरकार का दावा था कि इससे ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम कुचल जाएगा। शायद हुकूमत भी बदल जाए।

खुद ट्रम्प का लहजा भरोसे से भरा था। “ताकत के ज़रिए अमन,” उन्होंने कहा। उनका कहना था कि यह टकराव “बहुत जल्दी खत्म” हो सकता है।

लेकिन जंगें अक्सर राष्ट्रपति की टाइमलाइन नहीं मानतीं। खासतौर पर मध्य-पूर्व में।

बिना तालियों की जंग

अगर ट्रम्प को लगा था कि अमेरिका में जबरदस्त देशभक्ति की लहर उठेगी, तो ऐसा नहीं हुआ। माहौल कुछ और है। बेचैनी। शक।और  घबराहट।

सर्वे इस कहानी को साफ बताते हैं।

CNN/SSRS के सर्वे में

59% अमेरिकियों ने हमलों को गलत बताया। सिर्फ 41% ने समर्थन किया।

NPR/PBS/Marist के पोल में

56% लोग फौजी कार्रवाई के खिलाफ हैं। 44% इसके हक में।

Reuters/Ipsos का आंकड़ा और सख्त है। सिर्फ 27% लोग हमलों का समर्थन कर रहे हैं।

यह जोश नहीं है। यह हिचक है।

हमलों के बाद ट्रम्प की कुल लोकप्रियता भी गिरकर 40–45% के बीच आ गई है। इसे जबरदस्त समर्थन नहीं कहा जा सकता।

अमेरिका साफ-साफ बंटा हुआ है।

रिपब्लिकन पार्टी के करीब 84% लोग इस कार्रवाई के साथ हैं।

डेमोक्रेट्स में 86% लोग इसके खिलाफ हैं।

इंडिपेंडेंट मतदाता भी ज्यादातर विरोध में हैं।

कई सर्वे में 55–59% लोग जंग को बढ़ाने के खिलाफ दिखते हैं।

यह एकता नहीं है। यह गहरी ध्रुवीकरण की तस्वीर है। और बिना राष्ट्रीय एकता की जंग अक्सर सियासी दलदल बन जाती है।

झंडे के पीछे भीड़ नहीं

पहले की जंगों में जनता तुरंत साथ खड़ी हो जाती थी। 11 सितंबर के हमलों के बाद अफगानिस्तान युद्ध को 92% समर्थन मिला था। इराक युद्ध से पहले करीब 72% लोग समर्थन में थे।

आज?

मुश्किल से आधा देश साथ है। कई जगह इससे भी कम। न कोई राष्ट्रीय उबाल। न देशभक्ति की लहर। बस चिंता।

अमेरिकियों को पिछली मध्य-पूर्व की जंगें याद हैं। और उनका अंजाम भी।

एक और सवाल व्हाइट हाउस का पीछा कर रहा है। आख़िर असली प्लान क्या है?

कई सर्वे बताते हैं कि अमेरिकियों को लगता है कि साफ योजना ही नहीं है।

क्या यह सीमित हमला है? क्या यह सरकार बदलने की कोशिश है? या फिर एक और अंतहीन जंग की शुरुआत?

वॉशिंगटन अभी तक भरोसे से जवाब नहीं दे पाया है। और अनिश्चितता डर को जन्म देती है।

एक और मसला संवैधानिक है। कांग्रेस ने इस हमले को मंजूरी नहीं दी थी। यह बात अहम है।

सर्वे बताते हैं कि 59% अमेरिकी मानते हैं कि फौजी कार्रवाई के लिए कांग्रेस की अनुमति जरूरी होनी चाहिए। आलोचकों का कहना है कि व्हाइट हाउस ने अकेले फैसला लिया।

हर जंग का एक अंधेरा पहलू होता है।

अब नागरिकों के हताहत होने की खबरें सामने आ रही हैं। एक अमेरिकी हमले में ईरान के शहर मिनाब में एक लड़कियों का स्कूल भी निशाने पर आ गया, ऐसा बताया जा रहा है।

विदेशों में नाराज़गी बढ़ी है। और अमेरिका में भी असहज सवाल उठ रहे हैं। युद्ध कक्षों में लक्ष्य और नक्शे होते हैं। जमीन पर इंसान होते हैं।

सबसे दिलचस्प असर ट्रम्प के अपने समर्थक खेमे में दिख रहा है। कुछ प्रमुख कंज़र्वेटिव आवाज़ें भी बेचैन हैं।

टीवी होस्ट Tucker Carlson ने गहरे फौजी दखल से सावधान रहने की बात कही है। उन्हें डर है कि यह एक और अंतहीन जंग बन सकती है।

यहाँ तक कि Laura Ingraham ने भी प्रशासन से नागरिक मौतों पर ज्यादा ईमानदार जवाब मांगा है। दरारें छोटी हैं। लेकिन दिख रही हैं।

अमेरिकी राजधानी में सियासी जंग तेज़ है। रिपब्लिकन इसे जरूरी कदम बता रहे हैं। उनका कहना है कि ईरान परमाणु खतरा बन चुका था।

डेमोक्रेट्स की राय बिल्कुल अलग है।

वे इसे “चुनी हुई जंग” कहते हैं। एक खतरनाक बढ़ोतरी। बिना साफ वजह के शुरू हुआ संघर्ष। बहस तेज़ है।कड़वी है। और बहुत जानी-पहचानी भी। अमेरिका यह बहस पहले भी देख चुका है।

वॉशिंगटन से बाहर भी माहौल उबल रहा है। कई शहरों में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। सोशल मीडिया पर बहस आग की तरह फैल रही है।

समर्थकों का कहना है कि ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षा ने कोई और रास्ता छोड़ा ही नहीं था।

विरोधियों का कहना है कि देश फिर से इराक वाली गलती दोहरा रहा है।

सच शायद हमेशा की तरह गोलियों और बमों के बीच कहीं दबा पड़ा है।

रणनीति से परे एक गहरा सवाल खड़ा है। जंग की कीमत क्या होती है? हर मिसाइल के साथ नतीजे आते हैं।अमेरिकी सैनिक खतरे में पड़ते हैं।ईरानी नागरिक तबाही झेलते हैं।पूरा इलाका अस्थिर हो जाता है। बमबारी शायद ही कभी नफरत खत्म करती है। अक्सर वह अगली जंग के बीज बो देती है। इतिहास इस बात का बेरहम गवाह है।

ट्रम्प के लिए ऑपरेशन एपिक फ्यूरी एक बड़ा जुआ है। अगर ईरान जल्दी ढह गया, तो वह इसे ऐतिहासिक जीत बताएंगे। लेकिन अगर जंग लंबी खिंची, तो सियासी कीमत बहुत भारी हो सकती है। जंगों ने पहले भी राष्ट्रपतियों की कुर्सी हिलाई है। और इराक और अफगानिस्तान की परछाइयाँ अभी भी अमेरिका की यादों में जिंदा हैं।

इसलिए सवाल अभी भी हवा में तैर रहा है। धीरे-धीरे। बेचैनी के साथ। क्या यह ट्रम्प की सबसे बड़ी जीत बनेगी? या वही पल जिसे इतिहास उनका वाटरलू कहेगा?

Monday, March 9, 2026

 When Krishna Dances: Dr. Jyoti Khandelwal Decodes the Sacred Rhythm of Braj

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By Brij Khandelwal

10 March 2026

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Some lands are geographical.

Braj is emotional.

It breathes devotion. It sings poetry. It dances memory.

Spread across dusty village lanes, ancient temples, forest groves and the quiet banks of the Yamuna, Braj is not merely a region on the map. It is a living theatre of Krishna’s divine play.

For centuries poets have sung him. Painters have painted him. Devotees have adored him. And dancers across generations have tried to capture the impossible: the rhythm of Krishna himself.

But here is the curious thing.

While Krishna’s stories flood India’s music, theatre and dance traditions, the deeper connection between Braj’s culture, Krishna’s philosophy and the grammar of dance remained surprisingly underexplored in academic scholarship.

Until now.

Dr. Jyoti Khandelwal has stepped into that gap with a remarkable and pioneering doctoral study. Her research examines how Krishna’s leelas, the playful, profound episodes of his life, flow into the dance traditions of Braj and beyond. Classical. Folk. Sacred. Social.

In her work, dance stops being mere performance. It becomes philosophy in motion.

The journey begins at the beginning.

Dr. Khandelwal traces the origins of dance itself. Not as entertainment. Not as spectacle. But as one of humanity’s earliest languages.

Long before written texts, people moved their bodies to express awe, devotion, fear and celebration. Ritual gestures became symbolic movements. Rhythm became prayer.

From these early impulses emerged the refined traditions of Indian classical dance. Each codified. Each disciplined. Each deeply philosophical.

Forms like Bharatanatyam, Kathak, Manipuri and Kuchipudi developed their own languages of expression, gestures, rhythms, storytelling techniques.

But these forms did not grow in isolation. They drew nourishment from mythology, devotion and cultural landscapes.

And few mythological figures have inspired dancers as deeply as Krishna.

Here Dr. Khandelwal brings the spotlight back to Braj, the cradle of Krishna lore.

Braj is not just sacred geography. It is narrative geography.

Every hill whispers a story. Every ghat remembers a miracle. Every dusty path echoes a flute note.

Vrindavan. Govardhan. Gokul. Barsana. The Yamuna’s quiet banks.

These are not merely pilgrimage sites. They are stages where Krishna’s divine drama unfolded, at least in the collective imagination of millions.

Dr. Khandelwal’s research shows how these places are continuously kept alive through dance, music and festivals. Culture here is not archived. It is performed.

Take the Yamuna.

In Braj tradition she is not simply a river. She is Krishna’s companion. Witness. Confidante.

She watched the butter thief grow up. She heard the flute at midnight. She reflected the moonlit Rasleela.

Small wonder then that Yamuna flows endlessly through Braj’s artistic imagination. Songs celebrate her. Dances evoke her. Devotion surrounds her.

One of the most fascinating sections of Dr. Khandelwal’s study explores Krishna’s philosophy through dance narratives.

Krishna is not a solemn philosopher seated under a tree.

He is a laughing child stealing butter.

A mischievous boy teasing the gopis.

A flute player hypnotising the forests.

A protector lifting a mountain.

Yet beneath this playfulness lies profound wisdom.

Through dance, performers translate these stories into visual poetry. A raised eyebrow becomes mischief. A circular movement becomes the Ras dance. A rhythmic stamp becomes cosmic joy.

Dance, in this framework, becomes philosophy made visible.

Themes emerge naturally.

Divine love.

Harmony between nature and humanity.

The celebration of life through rhythm and movement.

Spiritual insight hidden within everyday experiences.

And then comes perhaps the most refreshing part of Dr. Khandelwal’s research.

She steps beyond the classical stage. Into the villages.

While classical dance forms have attracted plenty of scholarly attention, Braj’s folk traditions have often remained under the academic radar.

That changes here.

Village squares. Temple courtyards. Festival nights.

These are Braj’s real theatres.

Here folk dances, dramatic enactments and Rasleela performances retell Krishna’s adventures in earthy dialects and spontaneous humour.

The butter thief lives again.

The gopis complain again.

The mountain rises again.

These performances are not mere entertainment. They are moral storytelling for the community.

Courage. Devotion. Humility. Compassion. Harmony with nature.

Each leela carries a quiet lesson.

Music, naturally, sits at the heart of this universe.

After all, Krishna himself is the eternal flute player.

The flute is not just an instrument. It is a metaphor.

Harmony. Attraction. Inner awakening.

Dr. Khandelwal’s research beautifully explores how Braj’s lyrical traditions, poetry, songs, rhythmic cycles, intertwine with dance to create a complete aesthetic experience.

Poetry provides emotion.

Rhythm provides structure.

Movement provides expression.

Together they produce devotion in motion.

Historically, many scholars have examined the cosmic dance of Shiva; the powerful Tandava symbolising creation and destruction.

Dr. Jyoti Khandelwal offers a different lens.

Krishna’s dance is softer. Playful. Human.

It celebrates love, community, laughter and participation.

Shiva’s dance shakes the universe.

Krishna’s dance invites the village.

That shift in perspective makes her research both refreshing and significant.

She interprets Krishna’s leelas not as distant mythology but as messages for ordinary life.

Govardhan lifting becomes a lesson in ecological balance.

Krishna’s affection for cows reflects compassion toward animals.

His playful equality with villagers hints at social harmony.

And the flute?

A reminder that inner peace is the sweetest music.

Through dance and storytelling these messages travel easily, from stage to street, from temple courtyard to village fair.

Dr. Khandelwal argues that dance traditions are not merely artistic displays. They are vessels of cultural memory.

They preserve values. They transmit philosophy. They bind communities.

The completion of this research marks an important academic milestone.

For perhaps the first time, a scholar from Agra has systematically explored the deep interplay between Braj’s culture, Krishna’s philosophy and the expressive language of dance.

By weaving together classical theory, folk traditions, geography, music and spirituality, Dr. Jyoti Khandelwal has created a study that bridges academia and living culture.

In Braj, dance is never just movement.

It is devotion in rhythm.

Poetry in gesture.

Philosophy in motion.

And as Dr. Khandelwal’s research beautifully reveals, when Krishna dances, an entire civilisation moves with him.

 नृत्य में धड़कता ब्रज: रास, भक्ति और संस्कृति पर डॉ. ज्योति का शोध

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बृज खंडेलवाल द्वारा

10 मार्च 2026

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भारत की सांस्कृतिक धरती पर यदि किसी क्षेत्र को उत्सव, संगीत और भक्ति का जीवंत रंगमंच कहा जाए, तो वह श्री कृष्ण की लीला भूमि, ब्रज है। यहाँ जीवन साधारण नहीं, उत्सव है। यहाँ धर्म केवल आस्था नहीं, लोकजीवन की धड़कन है।

ब्रज की गलियों में चलते हुए लगता है जैसे समय ठहर गया हो। मंदिरों की घंटियाँ, कुंजों की शांति, यमुना के घाट और रासलीलाओं की गूँज: सब मिलकर एक ऐसा सांस्कृतिक संसार रचते हैं जहाँ श्रीकृष्ण की लीलाएँ आज भी सांस लेती प्रतीत होती हैं।

सदियों से कवियों, संतों और कलाकारों ने इन लीलाओं को शब्द, स्वर और नृत्य में ढाला है। माखन चोरी की शरारत, गोपियों के साथ रास का अलौकिक आनंद, और बांसुरी की मोहक धुन: ये सब केवल कथाएँ नहीं, ब्रज की सामूहिक स्मृति का हिस्सा हैं।

लेकिन ब्रज संस्कृति, कृष्ण दर्शन और नृत्य के इस गहरे संबंध को अकादमिक दृष्टि से बहुत कम समझा गया था। इसी कमी को भरने का महत्वपूर्ण प्रयास किया है डॉ. ज्योति खंडेलवाल ने।

उनके शोध कार्य पर उन्हें पीएचडी की उपाधि मिली है। आगरा में कथक को लोकप्रिय बनाने के लिए सक्रिय “नृत्य ज्योति कथक केंद्र” की निदेशक और स्वयं एक प्रतिष्ठित नृत्यांगना के रूप में डॉ. ज्योति पिछले दो दशकों से कला साधना में रत हैं।

उनका शोध केवल नृत्य का अध्ययन नहीं है। यह ब्रज की आत्मा को समझने की एक कोशिश है।

नृत्य: मनोरंजन नहीं, साधना

डॉ. ज्योति के शोध की शुरुआत एक मूल प्रश्न से होती है: नृत्य आखिर है क्या?

आज हम नृत्य को अक्सर मंचीय कला या मनोरंजन के रूप में देखते हैं। लेकिन भारतीय परंपरा में नृत्य का जन्म ही भक्ति और पूजा से हुआ था।

प्राचीन मंदिरों में नृत्य देवताओं की आराधना का माध्यम था। भाव, ताल और लय के माध्यम से कलाकार अपनी भक्ति व्यक्त करता था।

समय के साथ यह परंपरा विकसित होती गई। शास्त्रीय नृत्य पद्धतियाँ बनीं: जिनके अपने नियम, मुद्राएँ, ताल और अभिनय शैली हैं।

भारत के प्रमुख शास्त्रीय नृत्यों—कथक, भरतनाट्यम, मणिपुरी और कुचिपुड़ी: सभी में कथा कहने की समृद्ध परंपरा है।

इन कथाओं के केंद्र में अक्सर श्रीकृष्ण ही होते हैं।

कभी राधा के साथ प्रेम संवाद, कभी कालिया नाग का दमन, तो कभी गोवर्धन उठाने की लीला: ये प्रसंग नृत्य के माध्यम से जीवंत हो उठते हैं।

डॉ. ज्योति ने अपने शोध में नृत्य के तकनीकी पक्ष, ताल, लय, भाव, अभिनय और अभिव्यक्ति, का भी विस्तार से अध्ययन किया है।

ब्रज: भूगोल नहीं, भावलोक

शोध का एक बड़ा हिस्सा ब्रज की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को समझने में लगा है।

ब्रज केवल नक्शे पर अंकित क्षेत्र नहीं है। यह आस्था का भावलोक है।

वृंदावन, गोवर्धन, बरसाना, नंदगाँव और यमुना, ये स्थान केवल तीर्थ नहीं, कृष्ण कथा के जीवित मंच हैं।

ब्रज संस्कृति में यमुना का स्थान विशेष है।

यहाँ यमुना केवल नदी नहीं। वह कृष्ण की सखी है, जीवनदायिनी शक्ति है।

ब्रज के गीतों, लोककथाओं और नृत्यों में यमुना बार-बार प्रकट होती है।

डॉ. ज्योति के अध्ययन में यह स्पष्ट होता है कि ब्रज की सांस्कृतिक कल्पना में यमुना एक भावात्मक प्रतीक है, प्रेम, पवित्रता और जीवन का प्रतीक।

कृष्ण की लीलाएँ: जीवन के संदेश

डॉ. ज्योति खंडेलवाल का शोध एक और महत्वपूर्ण दृष्टि प्रस्तुत करता है।

उन्होंने कृष्ण की लीलाओं को केवल धार्मिक कथा के रूप में नहीं देखा।

उन्होंने उन्हें जीवन के प्रतीकों के रूप में समझने की कोशिश की।

जैसे; गोवर्धन लीला हमें प्रकृति संरक्षण का संदेश देती है। गायों के प्रति कृष्ण का स्नेह जीव-जंतुओं के प्रति करुणा का प्रतीक है। और बांसुरी की धुन प्रेम, आकर्षण और आंतरिक शांति का संकेत है।

डॉ. ज्योति का मानना है कि नृत्य और संगीत इन संदेशों को लोगों तक सरल और प्रभावशाली तरीके से पहुँचाते हैं।

लोकनृत्य: ब्रज की असली धड़कन

शास्त्रीय नृत्य पर अक्सर अधिक चर्चा होती है। लेकिन ब्रज की असली आत्मा उसके लोकनृत्यों और लोकनाट्यों में बसती है।

गाँवों में होने वाली रासलीलाएँ, उत्सवों के दौरान सामूहिक नृत्य, और कृष्ण कथा पर आधारित नाटकीय प्रस्तुतियाँ; ये सब ब्रज की सांस्कृतिक पहचान हैं।

इन प्रस्तुतियों में कलाकार कृष्ण की बाल लीलाओं, गोपियों के साथ रास और माखन चोरी के प्रसंगों को जीवंत बना देते हैं।

दर्शक केवल दर्शक नहीं रहते; वे इस सांस्कृतिक अनुभव का हिस्सा बन जाते हैं।

यह केवल मनोरंजन नहीं होता। इसके माध्यम से समाज को नैतिक और आध्यात्मिक संदेश भी मिलते हैं।

संगीत और नृत्य का अनोखा मेल

ब्रज संस्कृति में संगीत और नृत्य एक-दूसरे से अलग नहीं हैं।

हर उत्सव, हर कथा, हर लीला में संगीत की केंद्रीय भूमिका है।

कृष्ण स्वयं बांसुरी वादक के रूप में जाने जाते हैं। उनकी बांसुरी की धुन प्रेम, आकर्षण और आध्यात्मिक आनंद का प्रतीक बन चुकी है।

ब्रज के पद, भजन और कविताएँ जब नृत्य के साथ जुड़ते हैं, तो एक सम्पूर्ण सांस्कृतिक अनुभव बन जाता है।

तांडव और रास: दो दृष्टियाँ

भारतीय परंपरा में नृत्य की चर्चा होती है तो अक्सर शिव के तांडव का उल्लेख आता है।

तांडव शक्ति, सृजन और विनाश की ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रतीक है।

लेकिन डॉ. ज्योति का शोध एक अलग दृष्टिकोण सामने रखता है।

उनके अनुसार कृष्ण का रास नृत्य आनंद, प्रेम और सामूहिक उत्सव का प्रतीक है।

जहाँ तांडव ब्रह्मांडीय शक्ति की अभिव्यक्ति है, वहीं रास जीवन की खुशियों का उत्सव है।

एक नई अकादमिक पहल

इस शोध का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि आगरा की एक शोधकर्ता ने पहली बार ब्रज संस्कृति और नृत्य के इस संबंध को इतने विस्तार से अकादमिक रूप में प्रस्तुत किया है।

डॉ. ज्योति खंडेलवाल का काम केवल एक शोध प्रबंध नहीं है।

यह ब्रज की जीवंत परंपराओं, लोककला और आध्यात्मिक विरासत को समझने का एक नया दरवाजा खोलता है।

ब्रज में नृत्य केवल कला नहीं।

यह भक्ति है।

यह जीवन का उत्सव है।

यह दर्शन का माध्यम है।

यमुना के किनारे जन्मी यह परंपरा आज भी लोगों को प्रेम, आनंद और आध्यात्मिकता का संदेश देती है।

और शायद यही इस शोध का सबसे बड़ा निष्कर्ष है;  जब कला, संस्कृति और आस्था एक साथ बहती हैं, तब सभ्यता केवल जीवित नहीं रहती, बल्कि पीढ़ियों तक चमकती रहती है।

Saturday, March 7, 2026

औरतों का सम्मान करना है तो गालियों में उनका जिक्र न कीजिए!

ताज नगरी की ज़बानी गंदगी: आखिर हर गाली में औरत ही क्यों?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

9 मार्च 2026

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आगरा ताजमहल के लिए मशहूर है।

मोहब्बत की निशानी। लेकिन ज़रा शहर की गलियों में घूमिए। एक और “स्मारक” नज़र आएगा।

गालियों का स्मारक।

यहाँ तालीम मायने नहीं रखती।

तहज़ीब भी नहीं। दौलत भी नहीं।

आगरा में एक लोकतांत्रिक ज़बान है;

गालियों की ज़बान।

सब्ज़ी बेचने वाला। स्कूटर मिस्त्री।कॉलेज का छात्र। पान की दुकान पर बैठे बुज़ुर्ग। गुटके की पीक बौछार के साथ गालियों का मधुर रस! 

लेकिन इस कहानी में एक अजीब मोड़ है।

ज़्यादातर गालियाँ औरतों के नाम पर टिकती हैं। माँ। बहन। बेटी ।

झगड़ा चाहे पार्किंग का हो या बिजली बिल का; इज़्ज़त किसी की माँ-बहन की ही उछलती है।

आगरा की हवा में भाषाई प्रदूषण तैरता है। लेकिन किसी को तकलीफ़ नहीं। लोगों को इसकी आदत पड़ चुकी है। जैसे सड़क का शोर।

औरतें भी पीछे नहीं। वे भी इस कला में कम उस्ताद नहीं। उम्र की कोई पाबंदी नहीं। दादी-नानी भी ऐसी शब्दावली चला सकती हैं कि ट्रक ड्राइवर भी शर्मा जाए।

एक ज़माना था जब बातों में नज़ाकत होती थी। मुहावरों से बात सजती थी।कहावतों से तर्क मजबूत होते थे।शेर-ओ-शायरी से बात में नूर आ जाता था।

आजकल ग़ुस्सा बढ़ा है। सब्र घटा है।और ज़बान गरीब हो गई है। जब लफ़्ज़ कम पड़ते हैं; गाली हाज़िर हो जाती है।

हर वाक्य में जिस्मानी इशारे। हर झगड़े में माँ-बहन का जिक्र। असल ग़ुस्सा ट्रैफिक पर होता है; लेकिन निशाना औरत बनती है।

यह सवाल शायद ही किसी को परेशान करता है। ग्रामीण आगरा हो या शहर, गाली कई लोगों के लिए ग़ुस्सा निकालने का सबसे आसान ज़रिया है।

ज़िंदगी मुश्किल है। नाइंसाफ़ी बहुत है। दिल में भड़ास भरी है। तो लोग गाली देते हैं। न खून-खराबा। न पुलिस केस। बस ज़बानी आतिशबाज़ी।

कुछ लोग तो इसे सामाजिक हथियार भी बताते हैं। "गाली एक तरह का अहिंसक विरोध है। गोली नहीं चलती। बस ज़बान चलती है।"

अजीब ख्याल है।

लेकिन पूरी तरह बेबुनियाद भी नहीं।

गालियाँ अक्सर उस ग़ुस्से की आवाज़ होती हैं जो व्यवस्था से निराश आम आदमी के भीतर जमा होता रहता है।

फिर भी एक सवाल बार-बार उठता है। हर गाली औरत के इर्द-गिर्द ही क्यों घूमती है? माँ। बहन। बेटी।

यह कैसी मानसिकता है जिसमें औरत को इज़्ज़त का बर्तन बना दिया गया है?

सामाजिक विश्लेषक श्रीवास्तव तो और आगे जाते हैं। उनका कहना है; समाज में बदलाव गोलियों से नहीं, गालियों से आता है। भारत जैसे अहिंसा-प्रिय समाज में गाली ग़ुस्से का वैध इज़हार है। वे तो यहाँ तक कहते हैं कि गालियों का दायरा बढ़ना चाहिए।

नई तरह की, एलजीबीटी-दोस्त गालियाँ भी बननी चाहिए।

बात चौंकाने वाली है। लेकिन हमारी परंपरा भी कम अजीब नहीं।

उत्तर भारत की शादियों में दूल्हे की बारात का स्वागत औरतें लयबद्ध गालियों से करती हैं। सब हँसते हैं।मज़ा लेते हैं। एक सांस्कृतिक रस्म।

गली-मुहल्लों की मिली-जुली संस्कृति में भी गाली का अपना मुकाम है। चाय की दुकान। बाज़ार। बस अड्डा। हर जगह यह खुरदुरी भाषा सुनाई देती है।

पुलिस की नौकरी करनी हो तो शायद गाली-शास्त्र में पारंगत होना भी ज़रूरी है।

कवि खुसकेट अकबराबादी ने बरसों पहले लिखा था “जिसे गाली देना नहीं आता, उसकी ज़िंदगी अधूरी है।”

आगरा इस बात को पूरी शिद्दत से साबित करता है। यहाँ लोग लड़ाई में हथियार कम निकालते हैं। गालियाँ ज़्यादा। 

जहाँ समाज बीमार होता है; वहाँ पिस्तौल चलती है।

जहाँ लोग थोड़े सभ्य होते हैं; वहाँ गाली से काम चल जाता है।

लेकिन आगरा की गाली संस्कृति पर एक नया खतरा मंडरा रहा है।

पश्चिमी असर। शहर संस्कृति के जानकार एक पंडित दुखी हैं। उनका कहना है कि आज के नौजवानों ने गालियों की पूरी विरासत बरबाद कर दी। उनकी पूरी शब्दावली बस दो अंग्रेज़ी लफ़्ज़ों में सिमट गई है; 

“ओह शिट।”

बस। न कोई तर्ज़। न कोई रंग।

आगरा की पुरानी गालियों में रचनात्मकता थी। लय थी। अदायगी थी। अब सब कुछ ग्लोबलाइजेशन की भेंट चढ़ रहा है।

फिर भी शहर चलता जा रहा है।

ताजमहल में दुनिया मोहब्बत देखने आती है। और बाहर गलियों में लोग ग़ुस्सा निकालते रहते हैं।

शायद बुज़ुर्ग ठीक ही कहते हैं; गालियां भाषा का श्रृंगार हैं। गालियाँ ज़बान में करंट भर देती हैं। बात में बेबाकी लाती हैं। 

बस एक छोटी-सी गुज़ारिश है। अगली बार ग़ुस्सा आए:  किसी की माँ को बख्श दीजिए। बेचारी भाषा में बहुत पहले ही शहीद हो चुकी है।

 विदेश नीति कोई सियासी खिलौना नहीं

राष्ट्रीय हित को दलीय शोर-शराबे से ऊपर उठना होगा

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बृज खंडेलवाल द्वारा

9 मार्च, 2026

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विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने हाल ही में एक बुनियादी सच्चाई को दोहराया है: भारत की तक़दीर  उसकी अपनी अंदरूनी ताक़त से तय होगी, दूसरों की मेहरबानी या गलतियों से नहीं। आज की बदलती दुनिया में, उन्होंने एक आत्मनिर्भर भारत पर ज़ोर दिया है, एक ऐसा भारत जो हिंद महासागर को सिर्फ एक रास्ता नहीं, बल्कि वैश्विक स्थिरता के लिए एक ज़रूरी हिस्सा मानता है। कोच्चि में ईरानी जहाज़ का रुकना भी इसी नीति का हिस्सा था, जिसे सरकार ने क्षेत्रीय उथल-पुथल के बीच एक 'मानवीय कदम'  बताया।

लेकिन, घरेलू राजनीति की तस्वीर कुछ अलग है। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने अमेरिकी सेना द्वारा ईरानी युद्धपोत IRIS देना को डुबोए जाने पर सरकार की "खामोशी" पर कड़े सवाल उठाए हैं। उन्होंने इसे भारत के बैक यार्ड,  में लगी आग करार दिया और पूछा कि क्या हमने अपनी रणनीतिक संप्रभुता  गिरवी रख दी है? उन्होंने तेल की सप्लाई और ऊर्जा सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई।

रक्षा और अंतरराष्ट्रीय मामलों में संजीदगी और संयम की ज़रूरत होती है। ये ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ राजनीतिक दलों को रोज़ाना की तू-तू मैं-मैं से ऊपर उठकर एक सुर में बोलना चाहिए। दुनिया किसी देश को सिर्फ उसकी सेना या जीडीपी से नहीं, बल्कि उसकी राजनीतिक बातचीत के तेवरों (standard/level) से आंकती है।

अफ़सोस की बात है कि यह अनुशासन  भारत की घरेलू बहस से गायब होता जा रहा है। विदेश नीति कोई टीवी की चिल्लाने वाली बहस नहीं है; यह एक बारीक महारत  है जहाँ हर शब्द का अपना कूटनीतिक वज़न होता है। जब अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को केवल राजनीतिक अंक बटोरने का ज़रिया बनाया जाता है, तो इससे दुनिया भर में गलत संदेश जाता है।

आज़ादी के बाद से भारत ने 'रणनीतिक स्वायत्तता' (strategic autonomy) की एक मज़बूत परंपरा निभाई है। नेहरू और इंदिरा गांधी से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी तक, एक ही उसूल  कायम रहा है: भारत हर शक्ति के साथ जुड़ेगा, लेकिन किसी का ताबेदार follower नहीं बनेगा। आज जब दुनिया महाशक्तियों की आपसी खींचतान और ऊर्जा संकट से गुज़र रही है, नई दिल्ली एक मुश्किल संतुलन बना रही है। हम वाशिंगटन से रिश्ते गहरे कर रहे हैं, मॉस्को के साथ पुरानी दोस्ती निभा रहे हैं और 'ग्लोबल साउथ' की आवाज़ बन रहे हैं।

लोकतंत्र में बहस ज़रूरी है, लेकिन जब अंदरूनी झगड़े विदेशी मंचों पर दिखने लगते हैं, तो देश की छवि को खामियाजा  भुगतना पड़ता है। 2020 के चीन सीमा विवाद का उदाहरण लीजिए। लद्दाख में ज़मीन खोने के आरोपों और सरकार के जवाबों के बीच जो शोर मचता है, उसका फायदा उठाकर चीन हमारी अंदरूनी एकता में कमी होने का दावा कर सकता है।

इसी तरह, 2025 में पाकिस्तान के खिलाफ की गई सैन्य कार्रवाई (ऑपरेशन सिंदूर) भी राजनीति की भेंट चढ़ गई। विपक्ष ने इसे विदेशी नीति की नाकामी बताया, जबकि सरकार ने इसे सेना का मनोबल गिराने वाला बयान कहा। सच जो भी हो, संकट के समय 'बंटा हुआ घर' दिखना देश के हित में नहीं होता।

चाहे विदेशी दौरों पर विवादित नेताओं से मिलना हो या रूस से तेल खरीदने का मामला, हर चीज़ को सियासी चश्मे से देखना हमारी साख  को कमज़ोर करता है।

भारत की ऐतिहासिक सफलताएं हमेशा आम सहमति  पर आधारित रही हैं। शीत युद्ध  के दौरान भी हमारे नेताओं ने दुनिया के सामने भारत के रुख को कमज़ोर नहीं होने दिया।

आज चुनौतियां और भी बड़ी हैं। दुनिया के समीकरण पल-पल बदल रहे हैं। ऐसे में भारत की स्थिरता और स्पष्टता ही हमारी सबसे बड़ी ताक़त है।

सरकार की आलोचना करना लोकतंत्र का हक है, लेकिन विदेशी मंच पर यह आलोचना रचनात्मक और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर होनी चाहिए।

हमारे राजनयिक और सैनिक बेहद कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं, हिमालय की बर्फीली चोटियों से लेकर संयुक्त राष्ट्र की मेजों तक। जब हमारी घरेलू राजनीति अलग-अलग संकेत देती है, तो उनका काम और भी मुश्किल हो जाता है।

विदेश नीति कोई 'स्प्रिंट' (100 मीटर की तेज़ दौड़) नहीं, बल्कि एक 'मैराथन' (लंबी दौड़) है। सरकारें आएंगी और जाएंगी, लेकिन राष्ट्र का हित शाश्वत, परमानेंट है। भारत की राजनीतिक जमात को यह याद रखना होगा कि जब देश दुनिया से मुखातिब  हो, तो उसकी आवाज़ में गरिमा, स्पष्टता और एकता होनी चाहिए।

Friday, March 6, 2026

 महिला दिवस किसके लिए?

सास भी कभी बहू थी… या बहू भी कभी सास बनेगी?

टूटती हदें: जब सास-बहू का झगड़ा जानलेवा हो जाए

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बृज खंडेलवाल द्वारा

8 मार्च 2026

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अगर पुरानी फिल्मों वाली ललिता पवार टाइप सास आज की मॉडर्न बहू से टकरा जाए, तो मंजर कैसा होगा?

और अगर टीवी सीरियल “वसुधा” की सास-बहू की लड़ाई असल जिंदगी में उतर आए, तो घर की कहानी कुछ और ही होगी।

बरसों से सास-बहू का रिश्ता टीवी सीरियलों, बॉलीवुड फिल्मों और डिनर टेबल की गपशप का पसंदीदा विषय रहा है। आम तौर पर इसे हल्के-फुल्के मज़ाक या ड्रामे के तौर पर दिखाया जाता है: चालाक सास और बेचारी, सताई हुई बहू।

लेकिन पिछले कुछ सालों में देश के अलग-अलग हिस्सों से जो खबरें आई हैं, वे इस मज़ाकिया तस्वीर को बिल्कुल झुठला देती हैं।

अब यह रिश्ता सिर्फ तानों, शिकायतों और चुप्पी भरे झगड़ों तक सीमित नहीं रहा। कई जगह यह टकराव हिंसा और कत्ल तक पहुँच गया है।

महाराष्ट्र से तमिलनाडु तक, संयुक्त परिवार की जो चमकदार तस्वीर दिखाई जाती थी, उसके पीछे छिपे तनाव अब खुलकर सामने आने लगे हैं।

सबसे हैरान करने वाली बात है इन मामलों की बर्बरता।

अब यह सिर्फ दहेज उत्पीड़न या आत्महत्या के लिए उकसाने तक सीमित नहीं रहा। कई मामलों में सीधे-सीधे हत्या हो रही है।

जनवरी 2026 में महाराष्ट्र के ठाणे में 60 साल की एक सास पर आरोप लगा कि उसने अपनी बहू का गला घोंट कर उसे मार डाला। वजह कोई मामूली घरेलू झगड़ा नहीं था। असल लड़ाई सरकारी नौकरी के फायदे और मुआवज़े को लेकर थी।

सास को लगता था कि बेटे की मौत के बाद यह हक उसका है।

लेकिन कानून के मुताबिक वह रकम बेटे की विधवा पत्नी को मिलनी थी।

यानी दुख, आर्थिक डर और असुरक्षा ने मिलकर गुस्से को कातिलाना शक्ल दे दी।

ऐसे मामले पहले भी सामने आए हैं।

2016 में मुंबई के पास मुंब्रा में एक सास ने अपनी बहू और उसकी माँ की गला रेत कर हत्या कर दी। वजह सिर्फ इतनी थी कि उसका बेटा अपनी बीवी को ज्यादा तवज्जो देता था।

यह सास-बहू संघर्ष का सबसे पुराना और बुनियादी रूप है; बेटे या शौहर पर भावनात्मक कब्ज़े की जंग।

2019 में वसई में एक सास ने बहू को चाकू मार दिया। बाद में वह खुद खून से सने हाथों के साथ पुलिस स्टेशन पहुंच गई।

इससे साफ है कि घरेलू सत्ता की लड़ाई में कभी-कभी होश-ओ-हवास भी गायब हो जाते हैं।

ये घटनाएँ किसी एक प्रदेश तक सीमित नहीं हैं।

यह एक तरह से पूरे हिंदुस्तान की कहानी बनती जा रही है।

2025 में झारखंड में 60 साल की अनीता देवी को अपनी बहू को जहर देने के जुर्म में उम्रकैद की सज़ा हुई।

उत्तर प्रदेश में वजहें और भी दिलचस्प हैं।

2023 में अमरोहा में एक सास ने अपनी बहू को गोली मार दी। वजह बताई गई; उसका “मॉडर्न लाइफस्टाइल” और घर के कामों में दिलचस्पी न लेना।

यह दरअसल दो पीढ़ियों की टक्कर है। एक तरफ पारंपरिक सोच वाली सास, जिसे आज्ञाकारी गृहिणी चाहिए।

दूसरी तरफ नई पीढ़ी की औरत, जो अपने करियर, आज़ादी और जिंदगी के फैसले खुद करना चाहती है।

लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी है।

हर बार सास ही हमलावर नहीं होती।

अब कई मामलों में बहू भी पलटवार कर रही है: और वह भी बेहद खतरनाक तरीके से।

2025 में दिल्ली में एक गर्भवती महिला ने अपनी सास को चाकू मारकर हत्या कर दी। फिर लूट का नाटक रचा और सबूत मिटाने के लिए लाश को आग लगा दी।

हिमाचल प्रदेश के सिरमौर में भी बहू ने घरेलू सामान और जिम्मेदारियों को लेकर हुए झगड़े में अपनी बुजुर्ग सास पर तेज हथियार से हमला किया।

झांसी में जमीन के झगड़े और कथित अवैध रिश्तों के शक ने बहू को अपनी सास को जहर देने तक पहुंचा दिया।

इन घटनाओं से एक बात साफ हो जाती है।

“बेचारी बहू” और “जालिम सास” वाला पुराना स्टीरियोटाइप अब टूट रहा है।

असलियत कहीं ज्यादा जटिल और जहरीली है।

शायद सबसे सिहराने वाला मामला 2026 की शुरुआत में तमिलनाडु के कल्लाकुरिची से सामने आया।

यहां एक सास, मैरी, और उसकी बेटी एमिली ने मिलकर 25 साल की नंदिनी को कथित अवैध संबंधों के शक में बहला-फुसला कर मार डाला। बाद में उसकी लाश नदी किनारे फेंक दी गई।

यह घटना दिखाती है कि कई बार परिवार के लोग मिलकर “बाहरी” बहू के खिलाफ साजिश रच लेते हैं।

तो आखिर इन खौफनाक घटनाओं की जड़ क्या है?

असल वजह भारतीय परिवार की कुछ पुरानी कमजोरियां हैं।

संयुक्त परिवार, जो कभी सहारा और सुरक्षा का सिस्टम माना जाता था, अब कई बार प्रेशर कुकर बन जाता है।

सास, जो अक्सर विधवा होती है या जिसने पूरी जिंदगी परिवार के लिए कुर्बान कर दी, अपनी पहचान और सुरक्षा बेटे से जोड़ कर देखती है।

ऐसे में बहू का घर में आना उसे अपने रुतबे और जगह के लिए खतरा लगता है।

उधर बहू को हर वक्त की दखलअंदाजी और नियंत्रण घुटन जैसा महसूस होता है। पैसे, निजी जगह, बच्चों की परवरिश, हर मुद्दा ताकत की लड़ाई बन जाता है।

और जब बातचीत बंद हो जाए, और बेटा या पति चुप तमाशबीन बना रहे, तो छोटे-छोटे झगड़े कभी-कभी खूनी हादसों में बदल जाते हैं।

ये घटनाएँ एक कड़वी चेतावनी हैं।

सास-बहू का रिश्ता अब सिर्फ टीवी सीरियल का मसाला या पारिवारिक ड्रामा नहीं रहा।

यह मानसिक तनाव, आर्थिक असुरक्षा और पितृसत्तात्मक सोच का ऐसा संगम बनता जा रहा है जो कई घरों को क्राइम सीन में बदल रहा है।

अगर परिवारों ने समय रहते इज्ज़त, दूरी और समझदारी के नए उसूल नहीं अपनाए, तो ऐसे सुर्खियां शायद और आम होती जाएंगी।

Thursday, March 5, 2026

 भारत का शोर उत्सव: 

जब हर जश्न लाउडस्पीकर बन जाता है!

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

7 मार्च 2026

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भारत में एक चीज़ बहुत तेजी से विलुप्त हो रही है, खामोशी।

जैसे जंगलों से बाघ गायब होते हैं, वैसे ही शहरों से सन्नाटा।

यह देश त्योहारों का है, रस्मों का है, जुलूसों का है। लेकिन इन सबके बीच एक और चीज़ है, अखंड और असीम शोर।

शादी हो तो ऐसा लगता है मानो पूरा ब्रह्मांड नाचने बुलाया गया हो। घोड़ी पर बैठा दूल्हा, पीछे डीजे का ट्रक।बॉलीवुड के रीमिक्स 100 डेसिबल पर चीखते हुए। दूल्हे से ज्यादा थके हुए घोड़े के कान।

अजीब विडंबना है।

शादी प्यार का उत्सव है, लेकिन संगीत ऐसा कि दिल नहीं, कान फट जाएं।

और अगर आप सोचते हैं कि शोर सिर्फ खुशी का हिस्सा है, तो श्मशान घाट का चक्कर लगा लीजिए। अब तो उठावनी से भी शांति गायब हो चुकी है, प्रवचन बाज आ चुके हैं। वहाँ भी लाउडस्पीकर लगे मिलेंगे।

मृत्यु, जो कभी शांत, गंभीर और चिंतन का क्षण हुआ करती थी, अब एम्पलीफायर पर विदाई बन गई है।

भजन भी ऐसे बजते हैं जैसे स्वर्ग का दरवाज़ा खोलने के लिए भगवान को जगाना पड़ रहा हो।

भारत का त्योहार कैलेंडर किसी ध्वनि विस्फोट का टाइम टेबल जैसा है।होली आती है, ढोल, डीजे, चीखती भीड़। घिसे पिटे फिल्मी गाने। 

कई तरह की चतुर्थी, जयंती, भंडारे, रात्रि जागरण, जयकारे, मूर्ति विसर्जन,  बेचारे मच्छर भी बिलबिला जाते हैं! सड़कों पर जुलूस, ढोल-ताशे और सबवूफर। पूजा होती है, कोलकाता की गलियाँ थरथराती हैं।दीवाली पर आसमान पटाखों से नहीं, डेसिबल से भर जाता है। ऐसा लगता है जैसे हर त्योहार एक प्रतियोगिता हो रही है! कौन ज्यादा शोर मचा सकता है।

कागज पर नियम मौजूद हैं। 2000 के Noise Pollution Rules साफ कहते हैं कि रिहायशी इलाकों में दिन में 55 डेसिबल और रात में 45 डेसिबल की सीमा है। अस्पतालों और स्कूलों के पास तो इससे भी कम। लेकिन कागज की दुनिया और भारतीय सड़कों की दुनिया में जमीन-आसमान का फर्क है।

दिल्ली और मुंबई में ट्रैफिक का औसत शोर 80 डेसिबल के आसपास रहता है। पीक आवर में यह 100 तक पहुंच जाता है। यानी हम रोज़ाना लगभग जेट इंजन की आवाज़ में जी रहे हैं। कोई प्रेशर हॉर्न बजाता है, कोई साइलेंसर निकलकर पूरी कॉलोनी के कई चक्कर लगाता है!

सवाल उठता है, हम इतने शोर-प्रिय क्यों हैं? इतिहास कुछ संकेत देता है।

प्राचीन भारत में युद्ध और विजय के समय शंख और नगाड़े बजते थे। ध्वनि को शक्ति का प्रतीक माना जाता था।

मान्यता थी कि तेज आवाज़ बुरी आत्माओं को दूर भगाती है और देवताओं का ध्यान आकर्षित करती है।

लेकिन आज का शोर आध्यात्मिक कम और सामाजिक प्रदर्शन ज्यादा है।

राजनीति ने इसे और बढ़ाया।

चुनावी रैलियाँ, माइक, स्पीकर, नारे, गाड़ियों के काफिले।

ऐसा लगता है लोकतंत्र की ताकत वोट में नहीं, लाउडस्पीकर में है।

धार्मिक मंच भी पीछे नहीं हैं।

हर उपदेशक के हाथ में माइक्रोफोन।

ज्ञान कम, वॉल्यूम ज्यादा।

टीवी डिबेट्स से लेकर मंदिर प्रवचन तक; एक ही नियम है: जो सबसे जोर से बोलेगा, वही जीतेगा।

फिर आया तकनीक का चमत्कार या आविष्कार, लाउडस्पीकर देव।

1920 के दशक में यह उपकरण थिएटर और सभाओं में स्पष्ट आवाज़ के लिए बना था। लेकिन भारत में यह सांस्कृतिक विस्फोटक साबित हुआ है। आजकल एक ही जगह पर सौ सौ decks लगाए जाते हैं, कोई चैन से न जीए।

आज हर मंदिर, हर मस्जिद, हर जुलूस, हर सभा, सबके पास अपनी ध्वनि सेना है। जहाँ पहले घंटी बजती थी, अब बास स्पीकर गूंजते हैं।

कभी-कभी लगता है कि भगवान तक पहुँचने का रास्ता भक्ति से नहीं, वॉट्स से होकर जाता है।

दुनिया के सबसे शोर भरे शहरों की सूची में भारतीय शहर नियमित रूप से जगह बनाते हैं।

लगातार शोर का असर गंभीर है; हाई ब्लड प्रेशर, नींद की कमी, मानसिक तनाव, सुनने की क्षमता का ह्रास।

हर साल हजारों लोग समय से पहले बहरे हो जाते हैं; कारण कोई वायरस नहीं, डेसिबल।

लेकिन शोर का दायरा सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं। हिमालय की शांत घाटियाँ भी अब सुरक्षित नहीं रहीं।

त्योहारों और पर्यटन के मौसम में 90 डेसिबल तक शोर दर्ज किया गया है।

पक्षी घोंसले छोड़ देते हैं।

जानवर जंगलों में भाग जाते हैं।

प्रकृति, जिसे हमने ध्यान और योग की भूमि कहा था, अब लाउडस्पीकर के बीच ध्यान करने की कोशिश कर रही है।

विडंबना देखिए।

ऋषियों की भूमि में योग शिविर भी माइक्रोफोन पर चलते हैं। कोचिंग क्लासेज भी ! प्राणायाम की गहरी सांसें भी स्पीकर से गूंजती हैं।

खामोशी, जो आध्यात्मिक अनुभव की आत्मा है, अब एलिट शौक समझी जाती है। सच्चाई शायद थोड़ी असहज है।

यह शोर हमारी सांस्कृतिक ऊर्जा जितना ही हमारी सामूहिक बेचैनी का संकेत भी है। एक ऐसा समाज जहाँ हर कोई सुना जाना चाहता है। जहाँ ध्यान पाने का सबसे आसान तरीका है, आवाज़ बढ़ा देना।

इसलिए हर मंच पर माइक है।

हर जुलूस में स्पीकर।

हर गली में डीजे।

लेकिन सवाल अभी भी वही है? 

क्या भगवान सचमुच इतने दूर हैं कि उन्हें सुनाने के लिए हमें 100 डेसिबल चाहिए?

या हम अपनी ही खालीपन को आवाज़ से भरने की कोशिश कर रहे हैं?

भारत की असली ताकत उसकी विविधता है, उसकी संस्कृति है, उसका उत्सव है।

लेकिन उत्सव का मतलब कोलाहल नहीं होना चाहिए।

कभी-कभी सभ्यता की सबसे बड़ी पहचान शोर नहीं, संयम होती है।

शायद समय आ गया है कि हम जश्न मनाना सीखें:  बिना पड़ोसी के कान फाड़े। माइक थोड़ा कम।

ढोल थोड़ा धीमा। और शायद, बस शायद, भारत फिर से खामोशी की संगीत सुन सके।