Thursday, October 22, 2026

 पर्यावरण के रक्षक या विकास के दुश्मन?

नर्मदा से टिहरी और मथुरा रिफाइनरी तक: विरोध की राजनीति पर तीन बड़े सवाल

क्या पर्यावरण बचाने के नाम पर विकास रोकना जायज है? 

भारत की तीन बड़ी परियोजनाएं इस बहस की हकीकत को बयां करती हैं।

_________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा

23 अक्टूबर 2026

____________________________

“हमें इस देश में एक भी ऐसी परियोजना दिखाइए, जिसका इन कथित पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने स्वागत किया हो... हर मामले को अदालत में घसीट लिया जाता है... इस देश में ऐसी याचिकाएं सिर्फ विकास परियोजनाओं को रोकने के लिए दाखिल की जाती हैं।”

11 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ ने ये तीखी टिप्पणियां कीं। पीठ की अगुवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत कर रहे थे। मामला गुजरात के पीपावाव बंदरगाह के विस्तार और आधुनिकीकरण की पर्यावरण मंजूरी को चुनौती देने वाली याचिका का था।

इन टिप्पणियों ने एक अहम सवाल खड़ा कर दिया। क्या कुछ स्वयंभू पर्यावरण रक्षक सचमुच प्रकृति बचा रहे हैं? या पर्यावरण की चिंताओं को आर्थिक तरक्की रोकने का हथियार बना रहे हैं?

भारत को साफ हवा, बहती नदियां और सुरक्षित जंगल चाहिए। लेकिन देश को बांध, बिजलीघर, बंदरगाह, सड़कें और उद्योग भी चाहिए। समस्या तब शुरू होती है, जब कुछ कार्यकर्ता बिना ठोस जांच के हर परियोजना को पर्यावरण के लिए खतरा बता देते हैं।

नर्मदा बांध, टिहरी बांध और मथुरा रिफाइनरी की कहानियां इस बहस को समझने में मदद करती हैं। ये तीनों उदाहरण बताते हैं कि पर्यावरण की हिफाजत और आर्थिक विकास के बीच संतुलन कितना जरूरी है।

पर्यावरण के नाम पर आंदोलन करना गलत नहीं है। लेकिन कुछ अभियानों में खतरे बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए जाते हैं। विशेषज्ञों की जांच पूरी होने से पहले ही विनाश की भविष्यवाणियां होने लगती हैं। फिर प्रचार, प्रदर्शन और अदालतों में मुकदमों का सिलसिला शुरू हो जाता है।

एक जाना-पहचाना चक्र बन गया है। पहले खतरे की घंटी बजाओ, फिर सुर्खियां बटोरों, अदालत पहुंचो, RTI लगाओ और परियोजना को लटका दो। इसके बाद अगली परियोजना के खिलाफ मोर्चा खोल दो।

क्या कुछ अभियानों के पीछे निहित स्वार्थ भी काम करते हैं? इस सवाल की जांच होनी चाहिए। राजनीतिक विरोधियों, कारोबारी प्रतिस्पर्धियों और दूसरे समूहों को किसी परियोजना के रुकने से फायदा हो सकता है। 

जब पर्यावरण संबंधी आपत्तियां सबूतों को मानने से इनकार करने लगें, तब आंदोलन और अड़ंगे के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है।

नर्मदा: विरोध के बीच विकास के फायदे

मेधा पाटकर और नर्मदा बचाओ आंदोलन ने दशकों तक नर्मदा घाटी की बड़ी बांध परियोजनाओं का विरोध किया। सरदार सरोवर बांध इस आंदोलन का प्रमुख निशाना बना।

आंदोलन ने विस्थापन, आदिवासी अधिकारों, पर्यावरण को नुकसान और पुनर्वास की कमियों पर सवाल उठाए। ये गंभीर मुद्दे थे और इनकी अनदेखी नहीं की जा सकती।

लेकिन एक दूसरा सवाल भी जरूरी है। क्या आंदोलन ने उन लाखों लोगों के संभावित फायदे पर पर्याप्त ध्यान दिया, जिन्हें इन परियोजनाओं से पानी और बिजली मिल सकती थी?

सरदार सरोवर बांध ने गुजरात के कई हिस्सों में पानी की उपलब्धता बढ़ाने में मदद की है। इसकी विशाल नहर व्यवस्था नर्मदा का पानी सौराष्ट्र और कच्छ जैसे सूखाग्रस्त इलाकों तक पहुंचाती है।

कई गांवों और कस्बों में पीने के पानी की समस्या लंबे समय से रही है। नर्मदा का पानी मिलने से अनेक इलाकों को अधिक भरोसेमंद जलापूर्ति का सहारा मिला है।

खेती को भी फायदा हुआ है। सिंचाई से किसानों की मानसून पर निर्भरता घटती है। फसलों को पानी मिलता है और ग्रामीण आमदनी बढ़ाने के अवसर बनते हैं। नहर व्यवस्था राजस्थान के कुछ हिस्सों तक भी लाभ पहुंचाती है।

गुजरात में पानी की कमी लंबे समय से विकास की राह में बड़ी बाधा रही है। ऐसे इलाकों तक पानी पहुंचाने के दूसरे विकल्प ज्यादा मुश्किल और महंगे साबित हो सकते थे।

मध्य प्रदेश को भी नर्मदा घाटी विकास परियोजना से लाभ मिला है। इंदिरा सागर बांध की बिजली उत्पादन क्षमता 1,000 मेगावाट है। यह सिंचाई और कृषि गतिविधियों को भी सहारा देता है।

ये फायदे केवल सरकारी कागजों पर लिखे वादे नहीं हैं। पानी, बिजली और सिंचाई की उपलब्धता लोगों की जिंदगी पर सीधा असर डालती है।

टिहरी बांध: इंजीनियरिंग की बड़ी चुनौती

उत्तराखंड का टिहरी बांध भी विकास और पर्यावरण के बीच लंबे संघर्ष का केंद्र रहा है।

चिपको आंदोलन के प्रसिद्ध नेता सुंदरलाल बहुगुणा ने इस परियोजना के खिलाफ जोरदार अभियान चलाया। भूख हड़ताल, प्रदर्शन और कानूनी लड़ाइयों ने वर्षों तक इस विवाद को जिंदा रखा।

टिहरी बांध 2006 में पूरा हुआ। इसकी ऊंचाई 260.5 मीटर है। इसके मुख्य बिजलीघर की क्षमता 1,000 मेगावाट है।

इससे जुड़ी व्यापक परियोजना में 400 मेगावाट की कोटेश्वर परियोजना और 1,000 मेगावाट की पंप्ड-स्टोरेज सुविधा भी शामिल है। अप्रैल 2026 तक यह पंप्ड-स्टोरेज सुविधा पूरी तरह चालू हो चुकी थी।

इस तरह पूरे परिसर की स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता 2,400 मेगावाट हो गई है।

यह भारत की बिजली व्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान है। परियोजना उत्तरी बिजली ग्रिड को सहारा देती है। निर्धारित व्यवस्थाओं के तहत उत्तराखंड को भी बिजली संबंधी लाभ मिलते हैं।

टिहरी झील से दिल्ली सहित बड़े आबादी वाले क्षेत्रों की पेयजल जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलती है। यह उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में सिंचाई के लिए भी उपयोगी है।

जलाशय में पानी जमा करने से बाढ़ के असर को कुछ हद तक कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इससे बाढ़ का खतरा पूरी तरह खत्म नहीं होता।

टिहरी झील ने पर्यटन, मनोरंजन और स्थानीय रोजगार के नए अवसर भी पैदा किए हैं।

लेकिन बांध टूटने और भारी तबाही की आशंकाओं का क्या हुआ?

बांध 2006 से काम कर रहा है। इस दौरान वैसी विनाशकारी टूटन नहीं हुई, जिसकी आशंका विरोधियों ने जताई थी। इसके मिट्टी और चट्टानों से बने ढांचे को क्षेत्र के भूकंपीय जोखिमों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था।

बड़ा सबक साफ है। परियोजनाओं का मूल्यांकन तकनीकी तथ्यों, वास्तविक जोखिमों, उनके प्रदर्शन और सामाजिक प्रभावों के आधार पर होना चाहिए। केवल विरोध की तीव्रता से किसी परियोजना का सही या गलत होना तय नहीं होता।

टिहरी दिखाता है कि बड़ी इंजीनियरिंग परियोजनाएं कठिन चुनौतियों के बावजूद सफल हो सकती हैं। साथ ही, सुरक्षा के मामले में कभी लापरवाही नहीं होनी चाहिए।

मथुरा रिफाइनरी: उद्योग बनाम ताजमहल

मथुरा की तेल रिफाइनरी ने विकास और पर्यावरण के बीच एक और कठिन सवाल खड़ा किया।

जब 1970 के दशक में इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन ने रिफाइनरी लगाने की योजना बनाई, तब संरक्षणवादियों ने चिंता जताई। सवाल था कि क्या इससे निकलने वाला प्रदूषण करीब 40 से 50 किलोमीटर दूर स्थित ताजमहल को नुकसान पहुंचा सकता है?

यह चिंता बेबुनियाद नहीं थी। सल्फर डाइऑक्साइड और दूसरे प्रदूषक अम्लीय जमाव का कारण बन सकते हैं। इससे संगमरमर और दूसरी संवेदनशील सतहों को नुकसान पहुंच सकता है।

ताजमहल की हिफाजत बेहद जरूरी है। इसलिए इस मामले में सावधानी बरतना स्वाभाविक था।

विरोध बढ़ा और विशेषज्ञ समितियों ने पर्यावरण पर संभावित असर की जांच की। आखिरकार जरूरी सुरक्षा उपायों के साथ रिफाइनरी को मंजूरी मिली। इसका संचालन 1982 में शुरू हुआ।

आलोचकों को आशंका थी कि प्रदूषण से ताजमहल धीरे-धीरे पीला पड़ जाएगा और पूरे इलाके की हवा खराब होगी।

फिर क्या हुआ?

इसका जवाब किसी एक नारे में नहीं मिल सकता।

ताजमहल के संगमरमर में पीलापन और सतह पर गिरावट देखी गई है। वायु प्रदूषण चिंता का एक कारण है। धूल, सूक्ष्म कण और दूसरे पर्यावरणीय दबाव भी असर डालते हैं। अलग-अलग प्रदूषण स्रोतों की भूमिका का सही आकलन करना जरूरी है।

समय के साथ रिफाइनरी में प्रदूषण नियंत्रण की व्यवस्थाएं बेहतर की गईं। इनमें सल्फर रिकवरी और स्वच्छ ईंधन बनाने की तकनीकें शामिल हैं।

ताजमहल की सुरक्षा के लिए व्यापक ताज ट्रेपेजियम जोन में भी कई तरह की पाबंदियां लागू की गई हैं।

इस विवाद ने औद्योगिक प्रदूषण और ऐतिहासिक धरोहरों की सुरक्षा पर ध्यान बढ़ाया। यह संदेश मजबूत हुआ कि विश्वप्रसिद्ध स्मारक के आसपास उद्योगों को कड़े पर्यावरणीय मानकों का पालन करना चाहिए।

दूसरी तरफ, रिफाइनरी का आर्थिक महत्व भी है।

यह उत्तरी भारत और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति करती है। इसकी क्षमता सालाना 60 लाख टन से बढ़कर 80 लाख टन हो गई है।

रिफाइनरी रोजगार, सरकारी राजस्व, औद्योगिक गतिविधियों और ईंधन की आपूर्ति में योगदान देती है। इसकी तकनीकी व्यवस्थाओं में सुधार से स्वच्छ ईंधन बनाने में भी मदद मिली है।

क्या ताजमहल की सुरक्षा से समझौता करके ये फायदे हासिल किए जा सकते थे? बिल्कुल नहीं।

लेकिन क्या प्रदूषण का जोखिम होने भर से यह निष्कर्ष निकाल लिया जाए कि रिफाइनरी बननी ही नहीं चाहिए थी?

इस निष्कर्ष के लिए भी ठोस सबूत चाहिए।

रिफाइनरी का संचालन और उसके साथ पर्यावरणीय पाबंदियों का बढ़ना बताता है कि उद्योग और धरोहर संरक्षण साथ चल सकते हैं। लेकिन इसके लिए सुरक्षा उपाय प्रभावी होने चाहिए और उनका लगातार पालन भी होना चाहिए।

सबक यह नहीं कि पर्यावरण संबंधी चेतावनियों को खारिज कर दिया जाए। सबक यह है कि चेतावनियों के जवाब में बेहतर नियम, स्वच्छ तकनीक और नतीजों की नियमित जांच होनी चाहिए। हर उद्योग को बिना सोचे-समझे खारिज कर देना समाधान नहीं है।

विकास को चाहिए सबूत, अंतहीन मुकदमे नहीं

गुजरात के पीपावाव बंदरगाह का मामला इस बहस को फिर सामने ले आया है।

11 मई 2026 की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण संरक्षण के नाम पर विकास परियोजनाओं को बार-बार चुनौती देने की प्रवृत्ति पर सवाल उठाए।

इस चिंता पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। जब बुनियादी ढांचे की परियोजनाएं लंबे मुकदमों में उलझ जाती हैं, तो नुकसान केवल सरकार या कंपनियों को नहीं होता।

परियोजनाओं में देरी से लागत बढ़ती है। रोजगार के अवसर टलते हैं। निवेशकों का भरोसा डगमगा सकता है। जरूरी सुविधाएं वर्षों तक अधूरी रह सकती हैं।

इसका सबसे ज्यादा नुकसान गरीब और पिछड़े इलाकों के लोगों को हो सकता है। उन्हें पानी, बिजली, सड़क और रोजगार की जरूरत सबसे अधिक होती है।

भारत को विकास और पर्यावरण में से किसी एक को चुनने की जरूरत नहीं है। जरूरत ऐसी व्यवस्था की है, जिसमें परियोजना बनाने वालों और उसका विरोध करने वालों, दोनों को अपने दावों के समर्थन में सबूत देने पड़ें। कानून तोड़ने पर अदालतों को हस्तक्षेप करना चाहिए। लेकिन मुकदमेबाजी तथ्यों पर आधारित फैसलों का विकल्प नहीं बननी चाहिए।

नर्मदा की परियोजनाएं बताती हैं कि बांध पानी और बिजली उपलब्ध कराने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। साथ ही, विस्थापन और पुनर्वास की जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता।

टिहरी दिखाता है कि बड़े इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट कितने उपयोगी हो सकते हैं। लेकिन उनकी सुरक्षा की लगातार निगरानी भी जरूरी है।

मथुरा रिफाइनरी बताती है कि उद्योग और ऐतिहासिक धरोहरों का संरक्षण साथ चल सकते हैं। शर्त यही है कि पर्यावरणीय नियमों का प्रभावी पालन हो।

इन उदाहरणों से एक बात साफ होती है। हर परियोजना का आंख मूंदकर विरोध करना सही रास्ता नहीं है। भारत को असली पर्यावरण रक्षक चाहिए, केवल बैठे-बिठाए खतरे गिनाने वाले नहीं। देश को सुरक्षा उपायों के साथ विकास चाहिए, बिना सबूत के अड़ंगे नहीं।

पर्यावरण संरक्षण बहुत गंभीर विषय है। इसे राजनीतिक हथियार नहीं बनना चाहिए। और विकास भी इतना जरूरी है कि उसे बिना प्रमाण के डर और आशंकाओं के हवाले नहीं छोड़ा जा सकता।


 


भारत के लिए सबक: SIR में तेजी लाएं, UCC जरूरी, मजहबी कट्टरता पर लगाम लगे!

___________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा

22 अक्टूबर 2026

______________________________

यूरोप की सड़कों पर उठता धुआँ क्या भारत के लिए खतरे की घंटी है? पेरिस से लेकर दूसरे यूरोपीय शहरों तक हिंसक विरोध, आगजनी और लूटपाट ने हुक्मरानों की नींद उड़ा दी है। 

आव्रजन, पहचान और समाज में घुलने-मिलने के सवाल भी सियासत के केंद्र में हैं। यूरोप की यह बेचैनी भारत के लिए एक सबक है। समस्याओं को वक्त रहते सुलझाना समझदारी है। उन्हें कालीन के नीचे छिपाना, मुसीबत को न्योता देना है।

जब सरकारें कानून लागू करने, अवैध घुसपैठ रोकने और समाज में भरोसा कायम करने से कतराती हैं, तो छोटी दरारें बड़ी खाई बन जाती हैं।

SIR: वोटर लिस्ट साफ होगी, तभी लोकतंत्र मजबूत होगा

मोदी सरकार की मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR की पहल इसी संदर्भ में अहम है। लोकतंत्र की बुनियाद साफ है। हर पात्र नागरिक को वोट देने का हक मिले। किसी गैर-नागरिक का नाम मतदाता सूची में नहीं होना चाहिए।

अगर विदेशी नागरिक मतदाता सूची में शामिल हो जाते हैं, तो असली नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकार प्रभावित होते हैं। चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं। मतदाता सूची की विश्वसनीयता घटती है। नागरिकता और मतदान के बीच रिश्ता कमजोर पड़ता है।

भारत की लंबी सीमाएँ हैं। कुछ इलाकों में अवैध घुसपैठ की शिकायतें पुरानी हैं। खासकर सीमावर्ती राज्यों में इस सवाल को गंभीरता से देखना जरूरी है। जमीन, रोजगार, सरकारी सुविधाओं और स्थानीय राजनीति पर इसके असर की जाँच होनी चाहिए। आँखें मूँद लेने से समस्या खत्म नहीं होती।

दोहराने की जरूरत नहीं है। SIR में पारदर्शिता होनी चाहिए। लोगों को अपनी नागरिकता और पहचान साबित करने का उचित मौका मिले। गरीबों, बुजुर्गों, मजदूरों और दूर-दराज के इलाकों में रहने वालों को कागजों के नाम पर परेशान नहीं किया जाना चाहिए। गलत नाम हटाने की प्रक्रिया साफ हो। हर प्रभावित व्यक्ति को सुनवाई और अपील का मौका मिले।मकसद साफ होना चाहिए। मतदाता सूची दुरुस्त हो, नागरिकों की पहचान पुख्ता हो और हर पात्र वोटर का हक सुरक्षित रहे। यही लोकतंत्र की असली पहरेदारी है।


अब बात समान नागरिक संहिता यानी UCC की। भारत अनेक धर्मों, भाषाओं और परंपराओं वाला मुल्क है। यही उसकी खूबसूरती है। मगर विविधता के नाम पर भेदभाव को हमेशा ढोते रहना भी जरूरी नहीं।

संविधान का अनुच्छेद 44 राज्य को समान नागरिक संहिता की दिशा में प्रयास करने का निर्देश देता है। सवाल है कि शादी, तलाक, विरासत और पारिवारिक अधिकारों जैसे मामलों में समानता का रास्ता कब साफ होगा?

किसी महिला को सिर्फ उसके मजहब या परिवार की परंपरा के कारण बराबरी से वंचित क्यों रखा जाए? इंसाफ का तराजू सबके लिए एक जैसा होना चाहिए। किसी धर्म या समुदाय को संविधान से ऊपर नहीं माना जा सकता।

एक देश, बराबर अधिकार। न किसी को खास रियायत, न किसी के साथ नाइंसाफी।

यही संवैधानिक रास्ता है। यही आधुनिक भारत की जरूरत भी है।


यूरोप की उथल-पुथल को कुछ विचारक सभ्यताओं के टकराव के रूप में देखते हैं। उनके मुताबिक, एक तरफ आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्य हैं, तो दूसरी तरफ कुछ कट्टरपंथी विचारधाराएँ हैं, जो मजहबी नियमों को सर्वोपरि मानती हैं।

असली सवाल यह है कि कौन संविधान और कानून का सम्मान करता है, और कौन मजहब के नाम पर दूसरों पर अपनी मर्जी थोपना चाहता है।

भारत को हर तरह की मजहबी कट्टरता, सांप्रदायिक नफरत और हिंसक राजनीति के खिलाफ सख्त रुख अपनाना चाहिए। किसी को भी कानून हाथ में लेने, दूसरों को धमकाने या धार्मिक सत्ता को संविधान से ऊपर रखने की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए।

कानून का डंडा सबके लिए बराबर चले। चुनिंदा लोगों पर सख्ती और अपने लोगों को छूट, इस दोहरे रवैये से समाज नहीं जुड़ता।

यूरोप का अनुभव बताता है कि कमजोर सीमा प्रबंधन, एकीकरण की नाकामी और राजनीतिक ढुलमुलपन समय के साथ बड़ी समस्याएँ पैदा कर सकते हैं। भारत को इनसे सबक लेना चाहिए।

सीमाओं की निगरानी मजबूत हो। अवैध घुसपैठ की निष्पक्ष जाँच हो। नागरिकता की पुष्टि कानून के मुताबिक हो। मतदाता सूचियाँ दुरुस्त रहें। समान नागरिक संहिता पर गंभीरता से आगे बढ़ा जाए।

लेकिन सरकार को यह भी याद रखना होगा कि प्रशासनिक कार्रवाई राजनीतिक ध्रुवीकरण का हथियार नहीं बननी चाहिए। हर नागरिक को इज्जत, निष्पक्ष सुनवाई और कानून का संरक्षण मिलना चाहिए।

भारत की ताकत उसकी विविधता में है। जरूरत इस बात की है कि इस विविधता को संविधान के साझा धागे में पिरोया जाए।

यूरोप से मिलने वाला संदेश साफ है। साझा नियमों के बिना सामाजिक एकता नहीं टिकती, और जनता के भरोसे के बिना लोकतंत्र मजबूत नहीं होता।

भारत को तेजी से कदम उठाने होंगे, मगर पूरी समझदारी के साथ। मजबूत सीमाएँ, साफ मतदाता सूचियाँ, समान नागरिक अधिकार और सांप्रदायिकता पर सख्त लगाम एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।


Tuesday, October 20, 2026

 यूरोप की सड़कों पर बगावत: मजहबी असंतोष या एकीकरण की नाकामी?

अमेरिका से यूरोप तक आव्रजन के खिलाफ बढ़ता गुस्सा, दक्षिणपंथी ताकतें सख्त कार्रवाई के लिए बना रहीं दबाव

__________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा

21 अक्टूबर 2026

__________________________

यूरोप की सड़कों पर उठता धुआँ अब सिर्फ महँगाई, बेरोजगारी या बदहाल शिक्षा व्यवस्था का सवाल नहीं रह गया है। फ्रांस से बेल्जियम तक हिंसक प्रदर्शनों में मुस्लिम पृष्ठभूमि के कुछ युवाओं की भागीदारी ने आव्रजन, मजहबी पहचान और सामाजिक एकीकरण पर नई बहस छेड़ दी है। पुलिस पर हमले, आगजनी और लूटपाट ने मेजबान समाज के साथ बढ़ते टकराव की चिंता गहरा दी है। सवाल है कि यूरोप की बहुसांस्कृतिक नीति कहाँ चूकी? क्या यह मजहबी असंतोष का नतीजा है या एकीकरण की नाकामी का? और इस टकराव का समाधान क्या है?

_________________________


पश्चिमी सभ्यता की चमक पर अब खरोंचें नजर आने लगी हैं। अमेरिका से ब्रिटेन, फ्रांस, इटली और जर्मनी तक आव्रजन का मुद्दा बारूद के ढेर पर बैठा है। बहस अब सीमाओं और शरणार्थियों तक सीमित नहीं रही। यह मोहल्लों, बाजारों, चुनावी सभाओं और आम बातचीत का हिस्सा बन चुकी है। समाज का एक बड़ा वर्ग चाहता है कि सरकारें सख्त कदम उठाएँ और कानून का इकबाल बुलंद करें।

हाल की यूरोप यात्रा के दौरान मुझे इस बदलते माहौल की झलक खुद देखने को मिली। वेनिस और कुछ दूसरे शहरों में स्थानीय लोगों से बातचीत हुई। उनकी बातों में ऐसी बेचैनी दिखाई दी, जो पर्यटन के चमकदार विज्ञापनों में नजर नहीं आती। आव्रजन उनके लिए महज राजनीतिक मुद्दा नहीं था। इसका रिश्ता रोजगार, मकान, सांस्कृतिक पहचान और अपने समाज के भविष्य से जुड़ गया है।

कुछ जगहों पर बांग्लादेशियों के बारे में बेहद अपमानजनक टिप्पणियाँ भी सुनने को मिलीं। उनके प्रति तिरस्कार और घृणा खुलकर सामने आई। लेकिन इस गुस्से के पीछे छिपी बेचैनी को नजरअंदाज करना भी समझदारी नहीं होगी। 

पश्चिम आज पहचान के संकट से जूझ रहा है। आव्रजन इस टकराव का सबसे दिखाई देने वाला मैदान बन गया है। सवाल उठ रहा है कि क्या सरकारें बदलते सामाजिक हालात को समझने में नाकाम रही हैं? क्या विविधता और समावेश के नारों के बीच एकीकरण की बुनियादी जरूरतें पीछे छूट गईं?

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप ने सीमा सुरक्षा और निर्वासन को अपनी राजनीति का प्रमुख हथियार बनाया है। उनके समर्थकों का तर्क है कि अनियंत्रित आव्रजन राष्ट्रीय संप्रभुता को कमजोर करता है, सार्वजनिक सेवाओं पर दबाव बढ़ाता है और स्थानीय नागरिकों के हित प्रभावित करता है। दूसरी ओर, विरोधियों को डर है कि अंधाधुंध कार्रवाई से परिवार बिछड़ेंगे और निर्दोष लोगों के अधिकार कुचले जाएंगे।

ब्रिटेन में भी ऐसी ही हवा बह रही है। रिफॉर्म यूके और रूपर्ट लोवे की रिस्टोर ब्रिटेन पार्टी आव्रजन को लेकर जनता की नाराजगी को राजनीतिक आवाज दे रही हैं। लोवे सीमाओं पर सख्ती और निर्वासन की व्यापक व्यवस्था के समर्थक हैं। उनके विचारों में मानवाधिकारों और शरणार्थियों से जुड़े मौजूदा कानूनी ढाँचे में बड़े बदलाव की मांग भी शामिल है।

यह राजनीति पश्चिम में बदलते मिजाज का संकेत है। कल तक दक्षिणपंथी चरमपंथियों की मांग समझे जाने वाले विचार आज मुख्यधारा की बहस में जगह बना रहे हैं। जो सरकारें कभी विविधता और समावेश की दुहाई देती थीं, उनसे अब पूछा जा रहा है कि सीमाओं का मतलब क्या है, कानून का पालन कौन कराएगा और नागरिकों की चिंताओं का जवाब कौन देगा?

लेकिन आखिर यह बदलाव क्यों आया?

इसके पीछे कई कारण हैं। मकानों की कमी, महँगी जिंदगी, सार्वजनिक सेवाओं पर बढ़ता दबाव और रोजगार की चिंता ने लोगों को परेशान किया है। कुछ इलाकों में तेजी से बदलती आबादी के कारण भाषा, रीति-रिवाज और सामाजिक तालमेल को लेकर भी बेचैनी पैदा हुई है। आतंकवादी हमलों और धार्मिक कट्टरपंथ की घटनाओं ने इन आशंकाओं को और हवा दी है।

दक्षिणपंथी नेताओं का आरोप है कि सरकारें अपने नागरिकों की परेशानियों से ज्यादा नए आने वालों की जरूरतों पर ध्यान देती हैं। उनके मुताबिक, उदारवादी नीतियों ने ऐसी समस्याएँ पैदा की हैं, जिनका खामियाजा आम लोगों को भुगतना पड़ रहा है।

लेकिन आव्रजन को हर सामाजिक समस्या का जिम्मेदार ठहराना भी गलत होगा। प्रवासी कोई एक जैसा समूह नहीं हैं। 

इसी तरह, आव्रजन की हर आलोचना को नस्लभेद बताकर खारिज करना भी उचित नहीं है। नागरिकों को यह पूछने का पूरा हक है कि उनका देश कितने नए लोगों को बसा सकता है, किस तरह के कामगारों की जरूरत है, शरण के दावों की जाँच कैसे होगी और अवैध रूप से रह रहे लोगों के मामलों का निपटारा कब किया जाएगा।

नए आने वालों से यह अपेक्षा भी जायज है कि वे मेजबान देश के कानूनों, भाषा और बुनियादी लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करें। महिलाओं की समानता, धार्मिक स्वतंत्रता और दूसरे समुदायों के प्रति सहिष्णुता किसी एक मजहब या संस्कृति की जागीर नहीं हैं। ये लोकतांत्रिक समाज की बुनियादी शर्तें हैं।

यूरोप के मौजूदा संकट में मजहबी पहचान का पहलू भी बहस के केंद्र में है। कुछ हिंसक घटनाओं में मुस्लिम पृष्ठभूमि के युवाओं की भागीदारी पर सवाल उठना स्वाभाविक है। लेकिन कुछ लोगों के व्यवहार को पूरे मुस्लिम समुदाय का चरित्र मान लेना गंभीर भूल होगी। हर हिंसक प्रदर्शन को मजहबी असंतोष का नतीजा बताना भी तथ्यों से आगे निकलना होगा। आर्थिक नाराजगी, भेदभाव, कट्टरपंथ और स्थानीय तनाव जैसी वजहें अलग-अलग घटनाओं में भूमिका निभा सकती हैं। निष्कर्ष सबूतों के आधार पर ही निकाले जाने चाहिए।

असली चुनौती जायज शिकायतों और सामूहिक नफरत के बीच स्पष्ट लकीर खींचने की है। सरकारों को न तो हिंसा के सामने घुटने टेकने चाहिए और न ही पूरे समुदायों को शक के कठघरे में खड़ा करना चाहिए। कानून सबके लिए बराबर हो, यही लोकतंत्र की असली कसौटी है।

प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं, "पश्चिमी सरकारों को कानून लागू करने होंगे। अवैध प्रवेश पर नियंत्रण करना होगा। शरण के दावों का समय पर निपटारा करना होगा। जिन लोगों को देश में रहने का कानूनी अधिकार नहीं है, उन्हें लागू कानूनों और जरूरी सुरक्षा प्रावधानों के तहत वापस भेजना होगा। आने वाले साल यूरोप की लोकतांत्रिक सोच और सामाजिक एकता की परीक्षा लेंगे।"

तूफान अभी थमा नहीं है। यह संकट समझदारी भरे सुधारों का रास्ता खोलेगा या समाज में गहरी दरारें पैदा करेगा, इसका फैसला नेताओं के कदम और आम लोगों की सोच करेगी। सरकारों को सख्ती और इंसानियत के बीच संतुलन बनाना होगा। आव्रजन पर नियंत्रण जरूरी हो सकता है, लेकिन नफरत को नीति बनाना किसी समस्या का समाधान नहीं है।

यूरोप अब आँखें मूँदकर नहीं बैठ सकता। उसे अपनी नीतियों की कमियों को स्वीकारना होगा, एकीकरण की प्रक्रिया मजबूत करनी होगी और कानून का राज कायम रखना होगा। मगर अपनी पहचान बचाने की कोशिश में उसे अपनी इंसानियत भी नहीं खोनी चाहिए।


Monday, October 19, 2026

 ट्रंप: धमकियों का बादशाह, यू-टर्न का उस्ताद!

नोबेल पुरस्कार मिलना चाहिए थूक कर चाटने की कला के लिए!

_____________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा 

20 अक्टूबर 2026

______________________________

जब से बड़बोले डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में दोबारा डेरा जमाया है, दुनिया की शामत आई हुई है। लगता है, तीसरा विश्व युद्ध बस ट्रंप की अगली पोस्ट का इंतज़ार कर रहा है। अब तक तीन-चार बार दुनिया बारूद के ढेर पर बैठते-बैठते बची है। ट्रंप की जुबान मिसाइल है, दिमाग मौसम विभाग और फैसले ऐसे कि सुबह का शेर शाम को भीगी बिल्ली बन जाए।

इरादा था चीन की हेकड़ी निकालने का, उत्तर कोरिया के तानाशाह किम को घुटनों पर लाने का, ईरान को मिट्टी में मिलाने का और भारत की किश्ती को मझधार में डुबोने का। जेलेंस्की को दुनिया के सामने बेइज्जत करके यूक्रेन को रूस के सामने नाक रगड़वाने का सपना भी देखा। कनाडा को निगलने और ग्रीनलैंड पर कब्जे की हसरत भी पाल ली। नोबेल शांति पुरस्कार तो ऐसे चाहिए था, मानो दुनिया की सारी जंगें रोकने का ठेका अकेले इन्हीं ने ले रखा हो!

लेकिन  न चीन झुका, न किम सुधरा, न ईरान गायब हुआ, न रूस ने ट्रंप के इशारे पर नाचना शुरू किया। कनाडा अपनी जगह खड़ा है, ग्रीनलैंड बिकने को तैयार नहीं और नोबेल पुरस्कार भी दूर से ठेंगा दिखाता रहा। 

हर बार धमकी का पहाड़ खड़ा होता है, फिर समझौते का चूहा निकलता है। पहले आंखें लाल, फिर तेवर ढीले; पहले दुनिया को सबक सिखाने का ऐलान, फिर खुद सफाई देने की नौबत। 

न पूरब बदला, न पश्चिम। बदली है तो सिर्फ अमेरिका की साख, जिसकी किरकिरी अब दुनिया भर में हो रही है। ट्रंप हर बार इतिहास बनाने निकलते हैं, मगर सुर्खियों में अपनी ही फजीहत का नया अध्याय जोड़ आते हैं। 

____________________________

दुनिया को डराते हैं, फिर खुद ही पीछे हट जाते हैं। टैरिफ से रूस तक, अमेरिकी राष्ट्रपति की सियासत में कब क्या होगा, कोई नहीं जानता।

सुबह दुनिया को धमकी, शाम को समझौते की पेशकश! कभी व्यापार युद्ध का ऐलान, कभी दुश्मनों को सबक सिखाने की हुंकार। कभी दोस्तों पर पाबंदियां, तो कभी उन्हीं को राहत। डोनाल्ड ट्रंप की सियासत का यही रंग है। पहले धमाका करो, फिर नुकसान का हिसाब लगाओ। बात बिगड़ने लगे, तो पलटी मारकर उसे अपनी शानदार जीत बता दो!

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने राजनीति में यू-टर्न को एक नई कला बना दिया है। उनकी जुबान पर सख्ती रहती है, लेकिन फैसलों में अक्सर नरमी दिखाई देती है। उनकी धमकियों से दुनिया कांपती है, बाजारों में हलचल मचती है और सरकारें बेचैन हो जाती हैं। लेकिन कुछ समय बाद वही ट्रंप समझौते की मेज पर बैठे नजर आते हैं।

उनका हर ऐलान अंतिम फैसला नहीं होता। हर धमकी कार्रवाई में नहीं बदलती। और हर घोषित जीत वास्तव में जीत हो, यह भी जरूरी नहीं!

2 अप्रैल 2025 को ट्रंप ने दुनिया के सामने अपने टैरिफ अभियान को 'लिबरेशन डे' का नाम दिया। उन्होंने कई देशों पर भारी आयात शुल्क लगाने का ऐलान किया। उनका दावा था कि अमेरिका को दूसरे देशों ने व्यापार में खूब लूटा है। अब हिसाब बराबर करने का समय आ गया है।

ऐलान इतना आक्रामक था कि दुनिया भर के बाजारों में बेचैनी फैल गई। कारोबारियों को डर सताने लगा कि महंगे आयात, जवाबी शुल्क और व्यापार युद्ध से उनका कारोबार चौपट हो सकता है।

लेकिन 9 अप्रैल को कहानी में नया मोड़ आ गया। ट्रंप ने चीन को छोड़कर कई देशों पर लगाए गए नए शुल्कों में 90 दिनों की रोक लगा दी। सामान्य 10 प्रतिशत शुल्क जारी रहा, जबकि चीन के खिलाफ सख्ती और बढ़ाई गई। बाद में बातचीत के दौरान कई फैसलों में फिर बदलाव हुए।

जिस अभियान को ऐतिहासिक आर्थिक क्रांति बताया गया था, उसमें इतनी जल्दी बदलाव क्यों आया? शायद बाजारों की प्रतिक्रिया, कारोबारियों की चिंता और अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर संभावित असर ने हकीकत का आईना दिखा दिया।

भारत के मामले में भी ट्रंप की नीति में उतार-चढ़ाव दिखाई दिया। रूस से तेल खरीदने को लेकर उन्होंने भारत पर दबाव बनाया। भारतीय सामान पर शुल्क बढ़ाए गए और रूस से तेल खरीदने के कारण अतिरिक्त 25 प्रतिशत शुल्क भी लगाया गया।

वाशिंगटन का संदेश साफ था। रूस से तेल खरीदना जारी रखा, तो भारत को आर्थिक कीमत चुकानी पड़ सकती है। ट्रंप की इस सख्ती से भारतीय निर्यातकों की चिंता बढ़ी।

फिर फरवरी 2026 में तस्वीर बदलने लगी। अमेरिका ने भारत के साथ अंतरिम व्यापार समझौते की रूपरेखा घोषित की। इसके तहत रूस से तेल खरीदने से जुड़े अतिरिक्त 25 प्रतिशत शुल्क को हटाने और भारतीय सामान पर जवाबी शुल्क को 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करने की घोषणा की गई।

ट्रंप ने दावा किया कि भारत ने रूसी तेल की खरीद घटाने पर सहमति जताई है। लेकिन व्यापार समझौते के कई पहलुओं पर बातचीत और अनिश्चितता बनी रही।

यहां सवाल समझौते से नहीं, बल्कि उस अंदाज से है जिसमें पहले धमकी दी जाती है और बाद में राहत का ऐलान होता है। 

भारत जैसे बड़े देश के लिए भी यह मामला मामूली नहीं है। अमेरिकी फैसलों का असर निर्यात, रोजगार, निवेश और कारोबार पर पड़ सकता है।

रूस के मामले में तो कहानी और दिलचस्प हो जाती है।  रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर दबाव बनाने के लिए अमेरिका ने सख्त कदमों और भारी शुल्क की धमकियां दीं। भारत समेत कई देशों को चेतावनी मिली कि रूस से ऊर्जा खरीदना महंगा पड़ सकता है।

लेकिन अक्टूबर 2026 में फिर एक नया मोड़ आया। ट्रंप ने राष्ट्रीय हित का हवाला देते हुए संबंधित कानून के तहत अतिरिक्त दंडात्मक शुल्कों से अस्थायी राहत देने का फैसला किया। इससे रूसी ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर तत्काल दबाव कुछ कम हुआ।

इसी दौरान रूसी डीजल की आपूर्ति से जुड़ा अमेरिकी फैसला भी चर्चा में आया। प्रशासन ने ऊर्जा जरूरतों और यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने की कूटनीतिक कोशिशों का हवाला दिया।

अब सवाल उठता है कि जब रूस से ऊर्जा खरीदने पर दूसरों को सजा देने की बात हो रही थी, तो खुद अमेरिका के लिए रूसी ईंधन का रास्ता कैसे खुला?

ट्रंप की परेशानी यही है। उनके ऐलान इतने बड़े होते हैं कि बाद में उनसे पीछे हटना भी बड़ी खबर बन जाता है।

कभी ईरान पर हमले की तैयारी, कभी आखिरी समय पर रोक लगा दी जाती है। 

ट्रंप के यू-टर्न केवल व्यापार तक सीमित नहीं हैं। 2019 में, अपने पहले कार्यकाल के दौरान, उन्होंने अमेरिकी ड्रोन गिराए जाने के बाद ईरान पर जवाबी हमले की मंजूरी दी थी। लेकिन हमला शुरू होने से कुछ मिनट पहले उन्होंने इसे रोक दिया।

ट्रंप ने संभावित जनहानि का हवाला दिया। यह फैसला बड़े युद्ध को टालने के लिहाज से समझदारी भरा हो सकता था।

इसी तरह नाटो को लेकर भी उनका रुख बदला। पहले उन्होंने इस सैन्य गठबंधन को अप्रासंगिक बताया, फिर कहा कि अब वह अप्रासंगिक नहीं रहा। हालांकि, सदस्य देशों से रक्षा खर्च बढ़ाने की मांग जारी रही।

टिकटॉक पर भी उनका रुख समय के साथ बदला। पहले उन्होंने इस पर प्रतिबंध लगाने या इसकी बिक्री के लिए दबाव बनाया। बाद में उन्होंने पूर्ण प्रतिबंध के बजाय समयसीमा बढ़ाने और दूसरे विकल्पों पर विचार करने का रास्ता अपनाया।

जब बार-बार बड़ी-बड़ी घोषणाओं के बाद नीति बदलती है, तो नेतृत्व की तैयारी और फैसलों की गंभीरता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

अमेरिका के दोस्त भी अब पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं। किसी देश की ताकत केवल उसके हथियारों, अर्थव्यवस्था या सेना में नहीं होती। उसकी असली ताकत उसके वादों की साख में भी होती है।

मित्र देश वर्षों की योजना बनाते हैं। वे व्यापार समझौते करते हैं, रक्षा सहयोग बढ़ाते हैं और निवेश के फैसले लेते हैं। अगर अमेरिकी नीति कभी सख्त और कभी नरम होती रहे, तो दूसरे देशों के लिए भरोसे के साथ आगे बढ़ना मुश्किल हो जाता है।

आज शुल्क लगाने की धमकी, कल राहत का ऐलान। आज प्रतिबंधों की बात, कल राष्ट्रीय हित का हवाला देकर छूट। ऐसी सियासत में मित्र देश भी हर घोषणा को अंतिम फैसला मानने से पहले कई बार सोचेंगे।

ट्रंप शायद मानते हैं कि अनिश्चितता उनकी सबसे बड़ी ताकत है। इससे विरोधी दबाव में आते हैं और बातचीत की मेज पर झुकने को मजबूर होते हैं। कुछ मौकों पर यह रणनीति काम भी कर सकती है।

लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। बार-बार बदलते फैसले मित्र देशों को नए विकल्प तलाशने के लिए मजबूर कर सकते हैं। अमेरिकी वादों की अहमियत भी घट सकती है।

ट्रंप की राजनीति का एक खास अंदाज है। पहले बयान को इतना आक्रामक बनाओ कि दुनिया का ध्यान खिंच जाए। फिर विरोध और नुकसान सामने आएं, तो समझौते का रास्ता तलाशो। आखिर में पीछे हटने को भी अपनी जीत बताकर पेश कर दो।

यह तरीका सुर्खियां बटोर सकता है। लेकिन क्या इससे दुनिया में भरोसा बढ़ता है? क्या इससे कारोबारियों को स्थिरता मिलती है? और क्या मित्र देशों को अमेरिकी फैसलों पर पूरा यकीन हो पाता है?

ट्रंप की सबसे बड़ी कला शायद यही है कि वह पीछे हटकर भी जीत का दावा कर लेते हैं। लेकिन हर बार दुनिया उनकी इस कला पर तालियां बजाएगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है।

प्रभाव और भरोसा दो अलग चीजें हैं। धमकियों से लोग कुछ समय के लिए झुक सकते हैं, मगर भरोसा केवल स्थिरता और साफ नीयत से बनता है। महाशक्ति का राष्ट्रपति होना बड़ी जिम्मेदारी है। हर बार मुंह की खाने के बाद उसे जीत का नाम देना आसान हो सकता है, लेकिन इतिहास ऐसे दांवों का हिसाब जरूर मांगता है।

Saturday, October 17, 2026

 पत्रकार कौन? 

सुप्रीम कोर्ट ने उठाया अहम सवाल, अब पत्रकारिता को चाहिए पहचान, मर्यादा और जवाबदेही।

__________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा

17 अक्टूबर 2026

_________________________

जब हर हाथ में मोबाइल हो, हर मोबाइल न्यूज़रूम बन जाए और हर सोशल मीडिया वाला खुद को पत्रकार बताने लगे, तो असली पत्रकार की पहचान कौन करेगा? क्या कैमरा उठाना ही काबिलियत है? क्या माइक पकड़कर चिल्लाने से पत्रकारिता आ जाती है? क्या किसी अफसर को धमकाते ही प्रेस की धौंस जमाई जा सकती है? और क्या पत्रकार होने का दावा करते ही खास सुरक्षा और सुविधाओं का पट्टा मिल जाना चाहिए?

सवाल तीखे हैं, मगर वक्त की जरूरत हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने हाल में पत्रकारों की सुरक्षा से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान इसी पेचीदा मुद्दे पर गौर किया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने डिजिटल दौर में पत्रकार की पहचान तय करने की मुश्किलों की ओर इशारा किया।

वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने कहा कि जनहित के मुद्दे उठाने वाले स्वतंत्र पत्रकारों के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए। सरकारी मान्यता न होने से उनकी आवाज कमजोर नहीं पड़नी चाहिए।

दूसरी तरफ, सॉलिसिटर जनरल ने भी जायज सवाल उठाया। आज मोबाइल उठाइए, वीडियो बनाइए और खुद को पत्रकार घोषित कर दीजिए। न डिग्री, न तजुर्बा, न जवाबदेही। बस बन गए पत्रकार!

अदालत ने इस मसले पर विस्तार से विचार करने की जरूरत बताई है। अभी कोई अंतिम परिभाषा तय नहीं हुई है।

लेकिन सवाल अपनी जगह खड़ा है। आखिर पत्रकारिता है क्या?

पत्रकारिता सिर्फ माइक, कैमरा और सोशल मीडिया पोस्ट का खेल नहीं है। इसके लिए जानकारी चाहिए, हुनर चाहिए और तथ्यों की जांच करने का सलीका चाहिए। ईमानदारी, समझ और जनता के प्रति जवाबदेही भी जरूरी हैं।

मोबाइल एक औजार है, योग्यता का प्रमाणपत्र नहीं। ऊंची आवाज हुनर की गारंटी नहीं। और प्रेस कार्ड कोई जादुई छड़ी नहीं, जिसे घुमाते ही सारे नियम खत्म हो जाएं।

अफसोस, आज पत्रकारिता का चेहरा कई जगह बिगड़ता नजर आता है। खबर पीछे छूट रही है, तमाशा आगे निकल रहा है। टीआरपी की दौड़ में सच कई बार दम तोड़ देता है।

जियोस्टार के उपाध्यक्ष उदय शंकर ने भी चिंता जताई है कि पत्रकारिता की पुरानी पहचान खत्म होती जा रही है। न्यूज़रूम अब खबरों की अहमियत से ज्यादा उनकी पहुंच और रेटिंग को तवज्जो देने लगे हैं।

पूर्व संपादक एन. राम भारतीय टीवी समाचार चैनलों की गुणवत्ता पर तीखी टिप्पणी कर चुके हैं। राजदीप सरदेसाई ने भी पत्रकारिता के नैतिक पतन और उसके कारोबारी मॉडल पर सवाल उठाए हैं।

बात कड़वी है, मगर सच से मुंह मोड़ने से क्या फायदा?

पब्लिक कमेंटेटर प्रोफ पारस नाथ चौधरी कहते हैं, "जब खबर की जगह शोर बिकने लगे, सवाल की जगह गाली सुनाई दे और पड़ताल की जगह प्रोपेगेंडा परोसा जाए, तो पेशे की साख पर सवाल उठेंगे ही। पत्रकारिता कोई खुला मेला नहीं, जहां हर ऐरा-गैरा अपनी दुकान सजा ले। मगर यह किसी सरकार की जागीर भी नहीं, जहां सत्ता तय करे कि कौन बोलेगा और कौन चुप रहेगा।"

तो रास्ता क्या है?

भारत को पत्रकारों की पेशेवर पहचान के लिए एक पारदर्शी और भरोसेमंद व्यवस्था बनानी चाहिए। पत्रकारिता या जनसंचार की पढ़ाई, मान्यता प्राप्त संस्थान से डिग्री या डिप्लोमा, काम का अनुभव और किसी मीडिया संस्थान से जुड़ाव उपयोगी आधार हो सकते हैं।

लेकिन डिग्री को ही आखिरी कसौटी बनाना भी गलत होगा। कई अच्छे पत्रकार बिना औपचारिक डिग्री के इस पेशे में आए हैं। उन्होंने अपने काम से पहचान बनाई है। 

प्रिंट मीडिया में लागू पंजीकरण व्यवस्था संस्थानों की पहचान में मदद कर सकती है। लेकिन पंजीकरण भी पत्रकारिता की गुणवत्ता की गारंटी नहीं है। आखिर कागज पर दर्ज नाम और जमीन पर किए गए काम में फर्क होता है।

यूनेस्को का नजरिया इस बहस में अहम है। वह पत्रकारिता के लिए कोई कठोर शैक्षणिक योग्यता, अनिवार्य लाइसेंस या पत्रकारों की तय संख्या निर्धारित नहीं करता। उसका जोर इस बात पर है कि कौन जनहित में जानकारी जुटाता है, तथ्यों की पड़ताल करता है और जनता तक खबर पहुंचाता है।

इसलिए स्वतंत्र पत्रकारों, फ्रीलांसरों, ब्लॉगरों और नागरिक पत्रकारों को एक झटके में खारिज नहीं किया जा सकता। उनका काम, अनुभव और आचरण भी मायने रखते हैं।

खासकर गांवों और दूरदराज के इलाकों में कई पत्रकार बेहद सीमित साधनों के बीच काम करते हैं। न बड़ा दफ्तर, न चमचमाती गाड़ी, न भारी-भरकम पहचान पत्र। फिर भी वे भ्रष्टाचार उजागर करते हैं, सरकारी लापरवाही सामने लाते हैं और उन लोगों की आवाज बनते हैं जिन्हें अक्सर कोई सुनने वाला नहीं मिलता।

कई बार बड़े मीडिया संस्थान जिन खबरों से मुंह फेर लेते हैं, वही खबरें छोटे कस्बों के पत्रकार सामने लाते हैं।

ऐसे पत्रकारों को सिर्फ डिग्री या सरकारी मान्यता के अभाव में खारिज करना अन्याय होगा। असली कसौटी उनका काम, उनकी विश्वसनीयता और उनका आचरण होना चाहिए।

लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि हर किसी को खुली छूट दे दी जाए।

कर्नाटक के एक सीनियर मीडिया प्रशिक्षक बताते हैं, "कुछ लोग पत्रकारिता की आड़ में वसूली करते हैं। व्यापारियों को डराते हैं, अधिकारियों को धमकाते हैं और आम नागरिकों को ब्लैकमेल करते हैं। उनके लिए कैमरा सच दिखाने का जरिया नहीं, दबाव बनाने का हथियार है। ऐसे लोगों से सावधान रहने की जरूरत है। वे पत्रकारिता की इज्जत पर बट्टा लगाते हैं। चंद फर्जी पत्रकार पूरे पेशे को बदनाम कर देते हैं।"

यहां एक बात साफ होनी चाहिए। पत्रकारिता की स्वतंत्रता का मतलब मनमानी नहीं है। अधिकार के साथ जिम्मेदारी भी आती है। सवाल पूछना पत्रकार का हक है, लेकिन किसी को डराकर अपना उल्लू सीधा करना अपराध की श्रेणी में आ सकता है।

इसलिए समाधान सरकारी लाइसेंस बांटने या पत्रकारों पर राजनीतिक शिकंजा कसने में नहीं है। जरूरत ऐसी स्वतंत्र व्यवस्था की है, जो पेशेवर पहचान, रिपोर्टिंग के अधिकार और विशेष सुविधाओं के बीच फर्क समझे। प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया इसमें पहल करे। वकील, डॉक्टर, चार्टर्ड अकाउंटेंट्स, अन्य पेशेवर लोग, कहीं न कहीं पंजीकृत होते हैं, प्रैक्टिस करने का लाइसेंस मिलता है, तो फिर मीडिया के लोगों को ये व्यवस्था लागू नहीं की जा सकती, कुछ तो पेशेवर मापदंड होने ही चाहिए। 

आचार संहिता हो। शिकायतों की निष्पक्ष जांच हो। गलत काम साबित होने पर उचित कार्रवाई हो। लेकिन किसी पत्रकार की पहचान केवल इसलिए न छीनी जाए कि उसकी खबर सरकार या किसी ताकतवर व्यक्ति को पसंद नहीं आई।

आखिर लोकतंत्र में पत्रकार का काम सत्ता की तारीफ में कसीदे पढ़ना नहीं है। उसका काम सवाल पूछना है। जरूरत पड़ने पर असुविधाजनक सच सामने लाना है।

सरकार पत्रकार तय करने बैठेगी, तो कल खबरों की जगह फरमान छपेंगे।

बोलने का अधिकार हर नागरिक को है। जनहित में जानकारी जुटाने और उसे लोगों तक पहुंचाने की आजादी भी जरूरी है। लेकिन विशेष पेशेवर पहचान और उससे जुड़ी सुविधाओं के लिए विश्वसनीय काम, अनुभव और जिम्मेदारी की कसौटी होनी चाहिए।

Friday, October 16, 2026

 मस्क के स्टारलिंक पर भारत की हिचकिचाहट: देर से सही, समझदारी तो है!

यूक्रेन का तजुर्बा बता रहा है कि मुल्क की हिफाजत की चाबी किसी विदेशी कंपनी के हाथ में नहीं दी जा सकती

_____________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा

18 अक्टूबर 2026

______________________________

यूक्रेन ने साबित कर दिया है कि एक विदेशी निजी कंपनी के सैटेलाइट नेटवर्क पर निर्भरता राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बन सकती है। युद्ध के बीच स्टारलिंक की सेवा पर अचानक पाबंदी से यूक्रेन के सैन्य संचार और ड्रोन अभियान बाधित हुए। भारत का संयम दुश्मनी नहीं, बल्कि संप्रभुता, आत्मनिर्भरता और सीमांत सुरक्षा की अनिवार्य शर्त है।

_______________________________


क्या भारत को एलन मस्क के लिए अपने दरवाजे बिना सोचे-समझे खोल देने चाहिए? क्या तेज इंटरनेट की चमक-दमक में हम अपनी हिफाजत, सरहदों की सुरक्षा और मुल्क की खुदमुख्तारी को दांव पर लगा सकते हैं? और अगर कल किसी जंग के दौरान कोई विदेशी कंपनी हमारी संचार व्यवस्था पर पाबंदी लगा दे, तो हम क्या करेंगे?

ये सवाल आज इसलिए अहम हो गए हैं, क्योंकि यूक्रेन में हाल की घटनाओं ने दुनिया को एक कड़ा सबक दिया है। भारत में स्टारलिंक को मंजूरी देने में सरकार की देरी और एहतियात पर सवाल उठाने वालों को अब समझना चाहिए कि हर देरी नाकामी नहीं होती। कभी-कभी जल्दबाजी से बचना ही सबसे बड़ी समझदारी होती है।


एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स का स्टारलिंक सैटेलाइट इंटरनेट आज की दुनिया की एक बड़ी तकनीकी कामयाबी है। आसमान में धरती के करीब चक्कर लगाने वाले हजारों छोटे उपग्रहों की मदद से दूर-दराज के इलाकों में भी इंटरनेट पहुंचाया जा सकता है। जहां मोबाइल नेटवर्क नहीं पहुंचता, वहां भी इसकी मदद से संपर्क कायम रखा जा सकता है।

यूरोपीय मामलों के जानकार प्रोफेसर पी एन चौधरी के मुताबिक, "यूक्रेन की जंग में स्टारलिंक ने बड़ी भूमिका निभाई है। रूसी हमलों के बीच यूक्रेनी सेना ने इसका इस्तेमाल सैनिकों के बीच संपर्क, रसद और ड्रोन चलाने के लिए किया। लेकिन अब इसी निर्भरता ने एक नई चिंता पैदा कर दी है।

अक्टूबर 2026 के मध्य में आई खबरों के मुताबिक, यूक्रेन के सैन्य संचार तंत्र से जुड़े स्टारशील्ड नेटवर्क पर गति संबंधी पाबंदियों के कारण कुछ तेज रफ्तार ड्रोनों के संचालन में मुश्किलें आईं। इससे रूसी ड्रोन और दूसरे हवाई खतरों को रोकने वाले कुछ अभियानों पर भी असर पड़ने की खबरें सामने आईं। बाद में संपर्क व्यवस्था बहाल होने की खबर आई।"

इन पाबंदियों के पीछे किसका फैसला था और पूरा मामला क्या था, इस पर अलग-अलग दावे हैं। एलन मस्क का कहना है कि सैन्य इस्तेमाल वाला स्टारशील्ड अमेरिकी सरकार के नियंत्रण में है और उसके संचालन से जुड़े फैसले अमेरिकी अधिकारी लेते हैं।

लेकिन यहां असली सवाल मस्क या वाशिंगटन के बीच जिम्मेदारी तय करने का नहीं है। सवाल यह है कि जब किसी मुल्क की सेना की ताकत एक विदेशी संचार व्यवस्था पर निर्भर हो जाए, तो उस मुल्क की अपनी आजादी कितनी महफूज रह जाती है?

जंग में कुछ मिनटों का संपर्क टूटना भी भारी पड़ सकता है। ड्रोन रास्ता भटक सकता है, हमला नाकाम हो सकता है और दुश्मन को बढ़त मिल सकती है। यानी जो तकनीक कल तक मददगार थी, वही संकट के समय कमजोरी बन सकती है।


स्टारलिंक जैसी सेवाएं निजी कंपनियां चलाती हैं, लेकिन उनका रिश्ता संबंधित देशों की सरकारों, कानूनों और सुरक्षा नीतियों से भी होता है। जरूरत पड़ने पर सेवाओं पर पाबंदी लग सकती है, कुछ इलाकों में कवरेज रोकी जा सकती है या इस्तेमाल की शर्तें बदली जा सकती हैं।

आज अमेरिका और यूक्रेन के हित एक दिशा में हों, यह जरूरी नहीं कि हर हाल में ऐसा ही रहे। यही बात भारत पर भी लागू होती है।

मान लीजिए, कल चीन या पाकिस्तान के साथ भारत का गंभीर सैन्य टकराव हो जाए। अगर उस समय किसी विदेशी कंपनी ने अपनी सेवा सीमित कर दी, तो क्या होगा? अगर किसी अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक विवाद के कारण भारत को जरूरी संचार सुविधा मिलने में रुकावट आ जाए, तो हमारी सेना क्या करेगी?

क्या हम किसी दूसरे देश की सरकार या किसी कारोबारी की मर्जी पर अपनी सुरक्षा छोड़ सकते हैं?

यह किसी के खिलाफ दुश्मनी नहीं, बल्कि हकीकत को समझने की बात है। अंतरराष्ट्रीय रिश्तों में दोस्ती अहम है, मगर राष्ट्रीय हित सबसे ऊपर होते हैं।

एक रिटायर्ड सैन्य अधिकारी बताते हैं कि भारत ने 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान विदेशी उपग्रह तस्वीरों और संबंधित क्षमताओं तक पहुंच की सीमाओं का अनुभव किया था। ऐसे अनुभवों ने यह समझ मजबूत की कि जरूरी तकनीक के लिए हमेशा दूसरे देशों पर निर्भर रहना खतरनाक हो सकता है।

इसी सोच के तहत भारत ने अपनी उपग्रह और नेविगेशन क्षमताओं को बढ़ाया। स्वदेशी नेविगेशन प्रणाली नाविक इसी दिशा में एक अहम कदम है।

स्टारलिंक के मामले में भी यही सोच अपनाने की जरूरत है।

भारत में इंटरनेट की सुविधा बढ़नी चाहिए। पहाड़ों, द्वीपों, गांवों और सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों को बेहतर संपर्क मिलना चाहिए। आपदा के समय सैटेलाइट इंटरनेट बहुत काम आ सकता है। कारोबार और शिक्षा के लिए भी इसके बड़े फायदे हैं।

लेकिन फायदे गिनाते समय खतरों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

भारत में गेटवे स्थापित करना, आंकड़ों की सुरक्षा के नियम बनाना और सरकारी निगरानी की व्यवस्था करना जरूरी है। लेकिन सिर्फ भारत की जमीन पर स्टेशन बना देने से अंतरिक्ष में घूम रहे उपग्रहों पर भारत का नियंत्रण नहीं हो जाता।

इंटरनेट का कनेक्शन हमारे यहां हो सकता है, मगर उसे चालू या बंद करने का अधिकार किसी और के पास हो, तो यह अधूरी आत्मनिर्भरता है।

विशेषज्ञ टीपी श्रीवास्तव कहते हैं, "भारत को स्टारलिंक का दरवाजा पूरी तरह बंद करने की जरूरत नहीं है। जरूरत है सोच-समझकर आगे बढ़ने की। विदेशी कंपनियों को नियमों के तहत काम करने का मौका मिले। लोगों को बेहतर इंटरनेट मिले और बाजार में मुकाबला बढ़े। मगर साथ ही भारत को अपने उपग्रह, सुरक्षित सैन्य संचार और ड्रोन नियंत्रण प्रणालियां भी मजबूत करनी होंगी।"

सरकार को एक ही कंपनी पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता से बचना चाहिए। फाइबर नेटवर्क, मोबाइल इंटरनेट और स्वदेशी उपग्रह सेवाओं का विस्तार जारी रहना चाहिए। संकट के समय हमारे पास ऐसे विकल्प होने चाहिए जो किसी विदेशी कंपनी के फैसले से ठप न पड़ें।

यूक्रेन का तजुर्बा हमें यही समझाता है कि तकनीक जितनी ताकत देती है, उस पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता उतनी ही बड़ी कमजोरी भी पैदा कर सकती है।

स्टारलिंक आए, कारोबार करे और भारतीयों को बेहतर इंटरनेट दे। लेकिन भारत की सुरक्षा, सरहदों की हिफाजत और फैसले लेने की आजादी की चाबी भारत के ही हाथों में रहनी चाहिए।

क्योंकि इंटरनेट की रफ्तार कुछ देर कम हो जाए, तो गुजारा हो सकता है। लेकिन अगर मुल्क की खुदमुख्तारी ही कमजोर पड़ जाए, तो उसकी कीमत बहुत भारी हो सकती है।

Thursday, October 15, 2026

 कॉकरोचों का राज, बाबाओं का चमत्कार और मीडिया की नौटंकी!  

सच गायब, शोर बेशुमार! सत्ता की चापलूसी, अंधविश्वास का कारोबार और जनता के सवालों पर पर्दा आखिर कब तक?

________________________  

बृज खंडेलवाल द्वारा  

17 अक्टूबर 2026  

____________________________

रातोंरात भगवान बनने वाले बाबाओं की कमी नहीं है। भविष्य बताने वाले ज्योतिषियों की दुकानें चमक रही हैं। कोई ग्रहों की चाल से देश का भविष्य बताता है, कोई चमत्कार से किस्मत बदलने का दावा करता है। टीवी पर स्वयंभू बुद्धिजीवी ज्ञान बांटते हैं। संस्कृति के ठेकेदार तहजीब का सर्टिफिकेट जारी करते हैं। नारी मुक्ति के नाम पर कुछ लोग अपनी दुकान चलाते हैं। और इन सबके बीच कॉकरोच भी खूब फल-फूल रहे हैं; गंदगी में पलते हैं, खतरा भांपते ही बिल में घुस जाते हैं और मौका मिलते ही फिर बाहर निकल आते हैं।  

सवाल सीधा है। जब पाखंड का बाजार गर्म हो, अंधविश्वास की दुकान सज जाए और दिखावे के सौदागर समाज पर छा जाएं, तो सच की आवाज कौन उठाएगा? जवाब होना चाहिए: मीडिया। लेकिन अफसोस, कई बार मीडिया खुद इस तमाशे का हिस्सा बन जाता है। खबर कम, नौटंकी ज्यादा। सवाल कम, शोर ज्यादा। जनता कभी तालियां बजाती है, कभी माथा पीटती है और कभी रिमोट उठाकर चैनल बदल देती है।  

कभी मीडिया को लोकतंत्र का चौथा खंभा कहा जाता था। उसका काम था सत्ता से सवाल पूछना, जनता की आवाज उठाना और हुक्मरानों को आईना दिखाना। आज कई चैनलों को देखकर लगता है कि आईना तो मौजूद है, लेकिन उसमें सच्चाई दिखाने के बजाय सत्ता की आरती उतारी जा रही है।  

टीवी खोलकर देखिए। एंकर की आवाज आसमान छू रही है। स्टूडियो में बैठे प्रवक्ता एक-दूसरे पर ऐसे टूट पड़ते हैं मानो देश की सारी समस्याओं का हल विरोधी को चुप कराने में छिपा हो। बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रदूषण जैसे मुद्दे कोने में खड़े अपनी बारी का इंतजार करते रहते हैं। उनकी सुनता कौन है? राजनीतिक झगड़े में टीआरपी की मलाई जो मिलती है! जनता को चाहिए रोजगार, मगर टीवी पर मिलता है शोर।  

उदाहरण लें: जब दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण का स्तर खतरनाक स्तर पर पहुंच जाता है और अस्पतालों में सांस के मरीज बढ़ जाते हैं, तो कई चैनल घंटों राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और ‘कौन जिम्मेदार’ के शोर में उलझे रहते हैं। उसी समय कोई बाबा ‘वायु शुद्धि यज्ञ’ या ‘ग्रह दोष निवारण’ का कार्यक्रम चला रहा होता है तो कैमरे तुरंत वहां पहुंच जाते हैं। वैज्ञानिक उपायों और जमीनी रिपोर्टिंग की जगह सनसनी और चमत्कार को प्राथमिकता मिल जाती है।  

पत्रकारिता का मिशन पीछे छूट रहा है और कारोबार आगे निकल रहा है। सवाल पूछने वाले पत्रकार की जगह कई बार ऐसे चेहरे दिखाई देते हैं जो सत्ता के प्रवक्ता होने का भ्रम पैदा करते हैं। मीडिया की आजादी का मतलब केवल अखबार छापना या टीवी चैनल चलाना नहीं है। असली आजादी है बिना डर के सच सामने रखना। लेकिन जब मीडिया का मालिकाना हक कुछ बड़े कारोबारी समूहों तक सिमटने लगे, तब चिंता स्वाभाविक है। बड़े कारोबारियों के अपने हित होते हैं, सत्ता से रिश्ते होते हैं और सरकारी विज्ञापनों का महत्व होता है। ऐसे में संपादक के सामने धर्मसंकट खड़ा हो सकता है।  

इसी माहौल में ‘गोदी मीडिया’ जैसे शब्द लोकप्रिय हुए हैं। यह राजनीतिक कटाक्ष है, लेकिन इसके पीछे निष्पक्षता को लेकर जनता का अविश्वास भी दिखाई देता है। सरकार की तारीफ करना गलत नहीं, उसकी आलोचना करना भी अपने आप में कोई क्रांति नहीं। असली पत्रकारिता तथ्यों के आधार पर दोनों काम करती है। सरकार अच्छा करे तो तारीफ मिले, गलती करे तो सवाल उठें। पत्रकारिता का धर्म किसी की आरती उतारना नहीं, बल्कि जनता के सामने सच रखना है।  

जनसंचार के जानकार प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं, “आज खबर की अहमियत कई बार इस बात से तय होती है कि वह कितनी सनसनी पैदा कर सकती है। किसी अभिनेता का बयान, किसी नेता की तकरार या किसी बाबा का चमत्कार घंटों चल सकता है। लेकिन सरकारी अस्पताल में दवाइयां नहीं हैं, स्कूल में शिक्षक नहीं हैं या गांव में पीने का पानी नहीं है, तो खबर के लिए जगह कम पड़ जाती है।”  

समाज सेविका विद्या झा का कहना है, “बाबाओं, ज्योतिषियों और चमत्कार बेचने वालों के लिए कैमरे हमेशा तैयार रहते हैं। कोई भविष्य बताता है, कोई बीमारी दूर करने का दावा करता है और कोई भक्तों को स्वर्ग का टिकट बेचने का भरोसा देता है। मीडिया का काम इन दावों की जांच करना है, न कि बिना सवाल पूछे उनका प्रचार करना।”  

एक और उदाहरण: कुछ वर्ष पहले एक स्वयंभू बाबा ने दावा किया था कि वह कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों को ‘दिव्य शक्ति’ से ठीक कर सकते हैं। कई चैनलों ने बिना किसी वैज्ञानिक जांच के उनके कार्यक्रमों को घंटों प्रसारित किया। बाद में जब मरीजों की शिकायतें सामने आईं और अदालती प्रक्रिया शुरू हुई, तब मीडिया का रुख बदल गया। लेकिन तब तक हजारों लोग भ्रमित हो चुके थे। चमत्कार का तमाशा बिकता है, इसलिए कैमरा वहीं टिक जाता है। वैज्ञानिक सोच की बात करने वाले पीछे रह जाते हैं।  

डिजिटल दौर में झूठ को सजाकर सच के रूप में बेचना आसान हो गया है। कभी पुराना वीडियो नई घटना बताकर दिखाया जाता है, कभी किसी तस्वीर के साथ मनगढ़ंत कहानी जोड़ दी जाती है। सोशल मीडिया की अफवाह जांच-पड़ताल के बिना ब्रेकिंग न्यूज बन जाती है। फैक्ट-चेक मंचों की जरूरत इसी कारण बढ़ी है। लेकिन जिम्मेदारी केवल दूसरों की खबरों की जांच करना नहीं है। हर मीडिया संस्थान को अपनी खबरों की सच्चाई भी सुनिश्चित करनी चाहिए।  

पैसे लेकर खबर दिखाने या छापने का कारोबार भी कम खतरनाक नहीं है। जब विज्ञापन और खबर के बीच का फर्क मिटने लगे, तो पाठक कैसे पहचाने कि वह पत्रकारिता पढ़ रहा है या किसी का प्रचार? कार्यकर्ता सच्चेंद्र सिंह कहते हैं, “जनता को जानने का पूरा हक है कि उसके सामने रखी सामग्री खबर है या विज्ञापन। पत्रकारिता कोई किराना दुकान नहीं, जहां पैसे देकर मनचाहा सच तौल लिया जाए।”  

पत्रकारों पर मुकदमे, छापे और पूछताछ की खबरें भी बढ़ रही हैं। हर जांच को पत्रकारिता पर हमला कहना उचित नहीं। कानून सबके लिए बराबर होना चाहिए। लेकिन यदि कानून का इस्तेमाल आलोचनात्मक आवाजों को दबाने के लिए होने लगे, तो लोकतंत्र की सेहत बिगड़ती है।  

मीडिया में सामाजिक प्रतिनिधित्व का सवाल भी महत्वपूर्ण है। गांवों में पानी की किल्लत, किसानों की मुश्किलें, मजदूरों का पलायन और अस्पतालों की बदहाली भी बड़ी खबरें हैं। लेकिन इन मुद्दों पर रिपोर्टिंग करने में मेहनत लगती है। गांव जाना पड़ता है, लोगों से मिलना पड़ता है और आंकड़ों की जांच करनी पड़ती है। जबकि स्टूडियो में बैठकर किसी को देशद्रोही या राष्ट्रवादी घोषित करना बेहद आसान है।  

नदियां प्रदूषित हों, शहरों में पानी का संकट बढ़े या जलवायु परिवर्तन से खेती प्रभावित हो, तो इन विषयों पर लगातार रिपोर्टिंग होनी चाहिए। मगर कई बार किसी गंभीर मुद्दे की उम्र अगले राजनीतिक विवाद तक ही रहती है। बंगलौर की युवा पत्रकार मुक्त गुप्ता बताती हैं कि मीडिया की दुनिया में कुछ स्वयंभू बुद्धिजीवी भी खूब चमक रहे हैं। "हर विषय पर ज्ञान बांटने को तैयार। तथ्य हों या न हों, आत्मविश्वास में कोई कमी नहीं।  नारीवाद के नाम पर भी कभी-कभी दिखावे की दुकान सज जाती है। महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई को केवल प्रचार और सोशल मीडिया की लोकप्रियता तक सीमित करना आंदोलन के साथ नाइंसाफी है। "

जनता का भरोसा मीडिया की सबसे बड़ी पूंजी है। आज भी कई पत्रकार जोखिम उठाकर सच सामने लाते हैं। छोटे डिजिटल मंच और स्वतंत्र प्रकाशन भी ऐसे मुद्दों को उठाते हैं जिन्हें बड़े संस्थान नजरअंदाज कर देते हैं। यह उम्मीद की किरण है। लेकिन कुछ ईमानदार पत्रकारों के भरोसे पूरे मीडिया की साख नहीं बच सकती। इसके लिए मालिकाना हक में पारदर्शिता, विज्ञापन और खबर के बीच साफ अंतर, गलतियों का सार्वजनिक सुधार और संपादकीय स्वतंत्रता जरूरी है।  

सनसनी की जगह तथ्य-जांच को महत्व देना होगा। सामाजिक विविधता बढ़ानी होगी। जनहित की खबरों को प्राथमिकता देनी होगी। मीडिया को समझना होगा कि जनता केवल मनोरंजन नहीं चाहती। उसे जानना है कि महंगाई क्यों बढ़ रही है, रोजगार कहां हैं, सरकारी योजनाओं का पैसा कहां खर्च हो रहा है और उसके बच्चों का भविष्य कितना सुरक्षित है।  

इन सवालों से मुंह मोड़कर कोई भी संस्थान लंबे समय तक जनता का भरोसा नहीं जीत सकता। मीडिया सत्ता का दरबारी है या जनता का पहरेदार? यही असली सवाल है। लोकतंत्र में पत्रकार का काम किसी सरकार को गिराना या किसी पार्टी को जिताना नहीं है। उसका धर्म सच तलाशना, सवाल पूछना और जनता तक सही जानकारी पहुंचाना है। सरकार किसी भी दल की हो, पत्रकारिता की कसौटी एक ही रहनी चाहिए।  

और कॉकरोचों से भरे कमरे में केवल झाड़ू दिखाने से काम नहीं चलेगा। गंदगी साफ करनी होगी और रोशनी भी लानी होगी। याद रखिए, लोकतंत्र को खतरा केवल झूठ बोलने वालों से नहीं होता। खतरा उन लोगों से भी होता है जो सच जानते हैं, लेकिन खामोश रहते हैं। क्योंकि जब मीडिया सवाल पूछना छोड़ देता है, तो सत्ता जवाब देना भी जरूरी नहीं समझती। और जब जनता की आवाज दब जाती है, तब लोकतंत्र का चौथा खंभा खड़ा तो रहता है, मगर उसकी आत्मा दम तोड़ने लगती है।