समय से नहीं, समय के ऊपर चलते हम?
लेट लतीफी नहीं, अच्छे समय का गायन, भारतीय जीवन की असली टाइमिंग
बृज खंडेलवाल द्वारा
घड़ी टिक-टिक करती है। हम मुस्कुराते हैं। जितने बजे का कार्यक्रम होता है, उतने बजे हम तैयार होना शुरू करते हैं। टैम से पहुंचकर होस्ट को टेंशन नहीं देने का। अपने यहाँ समय चलता नहीं… बहता है।
पश्चिम के पास जीपीएस है। हमारे पास उससे कहीं आगे की चीज़ है। एक अदृश्य, आत्मिक नेविगेशन सिस्टम। रास्ते में ट्रैफिक हो, बरसात हो, अचानक कोई बारात मिल जाए, या बस मन कहे कि अभी बैठकर चाय पी लो… समय खुद एडजस्ट हो जाता है। कई बार ऐन वक्त कुतिया हंगासी हो जाती है।
हम देर को संदर्भ के साथ पहुँचना कहते हैं। सवाल यह नहीं कि आप लेट हैं। सवाल यह है कि आप खाली तो नहीं आए?
अपनी सोसायटी में समय सीधी रेखा नहीं है। यह गोल है। लचीला है। बिल्कुल भारतीय लोकतंत्र की तरह। सुबह 10 बजे की मीटिंग दो दुनियाओं में एक साथ चलती है। एक में एक बेचारा समय पर पहुँचकर कुर्सियाँ गिन रहा होता है। दूसरी में लोग 10:47 पर प्रवेश करते हैं, पेट भरा हुआ, चेहरे पर शांति, और पहला वाक्य यही… यह मीटिंग व्हाट्सऐप पर हो सकती थी।
पश्चिम का मिनट लोहे की छड़ है।
भारत का मिनट रबर बैंड है।
खींचो, मोड़ो, जी लो।
इतिहास उठाकर देख लीजिए। ताजमहल 22 साल में बना। क्या शाहजहाँ हर देरी पर माथा पकड़कर बैठ गया था? नहीं। उसने चाय पी। इंतजार किया। गुंबद आखिर आ ही गया। आज दुनिया फोटो खिंचवाती है, ठेकेदार का “बस पाँच मिनट” इतिहास बन गया।
रेलवे अंग्रेज लाए थे, टाइम टेबल के साथ। हमने उसे आत्मा दे दी। अब ट्रेनें समय पर नहीं चलतीं, आस्था पर चलती हैं। 6:15 की शताब्दी लेट नहीं है। वह बस इरादे और वास्तविकता के बीच कहीं ध्यान लगा रही है।
और बहाने? अरे वह तो हमारी सांस्कृतिक धरोहर है।
नौसिखिया कहेगा, ट्रैफिक था।
मध्यम स्तर वाला कहानी गढ़ेगा, जुलूस था, शायद त्योहार, शायद राजनीति, सड़कों ने साथ छोड़ दिया।
मास्टर खिलाड़ी आएगा, बैठेगा, पानी मांगेगा, और बोलेगा, ड्राइवर के चचेरे भाई के पड़ोसी की तबीयत… छोड़िए, बहुत मुश्किल सुबह थी। आपने खाना खाया?
असली कला तब है जब आप देर से आएँ और सामने वाला माफी माँगने लगे कि वह गलत जगह इंतजार करता रहा।
हमारे वादे भी सीधे नहीं होते। “मैं पहुँच रहा हूँ” का मतलब है कि इस क्षण मेरी आत्मा पहुँचने की इच्छा रखती है। शरीर का क्या होगा, वह भगवान जाने।
“जल्द मिलते हैं” एक भावना है, योजना नहीं।
“एंड ऑफ डे” किस दिन का अंत है, यह शोध का विषय है।
और शादी? वह तो समय की अंतिम परीक्षा है।
निमंत्रण में 7 बजे लिखा होता है।
सच्चाई में रात 10 बजे भी लोग पूछ रहे होते हैं, दूल्हा आया क्या?
बारात तीन घंटे देर से।
लड़की वाले खुश। तैयारी पूरी हुई।
फेरे तब शुरू जब पंडित और कैटरर की बहस खत्म।
डिनर आधी रात।
डीजे मंगलवार तक।
यह अव्यवस्था नहीं है। यह सामूहिक सहमति है कि समय को इतना गंभीर मत लो।
जो लोग समय पर पहुँचते हैं, उनसे एक छोटा सा सवाल है। इतना समय था आपके पास? 7:30 पर तैयार होकर गाड़ी में बैठे रहे? मोबाइल रिफ्रेश करते रहे? और फिर 8 बजे पहुँचकर मौसम पर चर्चा की?
जो 10 बजे आता है, वह दिन जीकर आता है। उसके पास किस्से होते हैं। वही पार्टी है।
और अगर कोई टोक दे, आपने 6 बजे कहा था…
तो मुस्कुराइए।
कहिए, हाँ, और मैं आ गया।
स्पष्टीकरण मत दीजिए। स्पष्टीकरण अपराधबोध की निशानी है। आप उस सभ्यता के नागरिक हैं जिसने शून्य दिया। आपको पता है कि शून्य और 6 बजे में गहरा रिश्ता है… दोनों ही लचीले हैं।
सच तो यह है कि हम इसी आईएसटी पर चलते हुए दुनिया की सबसे बड़ी लोकतंत्र बन गए। मंगल तक पहुँच गए। अर्थव्यवस्था दौड़ा दी।
हम समय से नहीं बंधे। समय हमसे बंधा है।
और अगर कभी हम सचमुच समय पर हो गए…तो शायद यह सारा जादू खत्म हो जाए। इसलिए हम देर नहीं करते।हम बस समय को थोड़ा और जी लेते हैं।