कैसे कैसे लोग?
श्रेय लेने का उतावलापन: सेल्फ़ी युग में सेवा कम, पोस्ट ज़्यादा
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बृज खंडेलवाल द्वारा
12 मार्च 2026
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सेवा का काम शोर नहीं, असर होना चाहिए ।
लेकिन आज के समय में असर से पहले पोस्ट आ जाती है।
गौर से देखें, समाजसेवा भी कुछ-कुछ क्रिकेट मैच जैसी हो गई है। सबकी नज़र स्कोरबोर्ड पर है; किसने सबसे पहले ट्वीट किया। किसने फेसबुक पर “ब्रेकिंग” डाली। किसने फोटो के साथ लिखा ; “मेरे प्रयासों से…”
मुद्दा क्या था, यह बाद में याद आता है। पहले याद आता है : पोस्ट किसकी वायरल हुई।
आजकल सेवा कम, सेल्फ़ी ज़्यादा होती है।
किसी ने गड्ढे की शिकायत की। गड्ढा भरने से पहले पाँच पोस्ट आ गईं : “देखिए, मेरे प्रयास से नगर निगम हरकत में।”
नगर निगम बेचारा सोचता रह जाता है, गड्ढा हमने भरा, श्रेय किसी और ने भर लिया।
एक्टिविस्ट हैं या डिजिटल इन्फ्लुएंसर?
एक ज़माना था जब समाजसेवक चुपचाप काम करते थे। लोग बाद में बताते थे : “अरे, यह काम फलाँ व्यक्ति ने करवाया था।”
अब दौर उल्टा है। पहले घोषणा होती है। फिर पोस्ट होती है। फिर टैगिंग होती है। फिर हैशटैग चलता है।
काम कब होता है ?
यह कभी-कभी प्रशासन को भी बाद में पता चलता है।
अब एक्टिविस्ट और इन्फ्लुएंसर में फर्क करना मुश्किल हो गया है।
फर्क बस इतना है कि इन्फ्लुएंसर साबुन बेचता है और एक्टिविस्ट श्रेय बेचता है।
RTI: सूचना का अधिकार या श्रेय का अधिकार?
RTI एक शानदार औज़ार है। लोकतंत्र का एक्स-रे मशीन। सवाल पूछो, तो सरकार को जवाब देना पड़ता है।फाइलें खुलती हैं। सच बाहर आता है।
लेकिन हमारे यहाँ RTI का एक नया संस्करण भी आ गया है :
RTI = “Recognition Through Internet.”
यानी सूचना बाद में, पहचान पहले।
RTI लगाई नहीं कि पोस्ट तैयार :
“मेरी RTI से बड़ा खुलासा!” खुलासा क्या हुआ, यह तो बाद में पढ़ा जाएगा।
पहले यह देख लिया जाए कि पोस्ट पर कितने लाइक आए। कभी-कभी लगता है
RTI फाइल कम, प्रेस रिलीज़ ज़्यादा हो गई है। मुद्दा पीछे, चेहरा आगे, आजकल हर आंदोलन में दो मोर्चे होते हैं।
एक असली मोर्चा ; जहाँ समस्या है।दूसरा सोशल मीडिया मोर्चा ; जहाँ फोटो है।
पहले लोग वृक्ष बचाते थे।
अब लोग किनारे खड़े होकर
सेल्फ़ी बचाते हैं।
किसी ने सफाई अभियान में झाड़ू उठाई।
अगले ही पल फोटो पोस्ट ; “ शहर सफाई के लिए मेरी लड़ाई।” शहर बेचारा मन में सोचता होगा :
“भाई, झाड़ू चलाओ या कैमरा?”
श्रेय की राजनीति
हमारे समाज में श्रेय भी राजनीति जैसा हो गया है। सबको चाहिए। और तुरंत चाहिए। कुछ विशेषज्ञ छपास रोग को दोष देते हैं।
अगर कहीं कोई अच्छा काम हो जाए
तो पाँच लोग तुरंत प्रकट हो जाते हैं ,
“यह मेरे प्रयासों से हुआ।”
छठा व्यक्ति थोड़ा विनम्र होता है। वह लिखता है ; “मेरे छोटे से प्रयास का परिणाम।”
छोटा प्रयास इतना छोटा होता है कि कभी-कभी दिखता ही नहीं। लेकिन पोस्ट बहुत बड़ी होती है।
सेवा या व्यक्तिगत ब्रांडिंग?
सोशल मीडिया ने एक नई चीज़ पैदा की है : “पर्सनल ब्रांड एक्टिविज़्म।”
यहाँ उद्देश्य समस्या हल करना नहीं, प्रोफ़ाइल चमकाना होता है। जैसे ही कोई मुद्दा ट्रेंड करता है, कुछ लोग तुरंत पहुँच जाते हैं।
एक फोटो। एक लंबा पोस्ट। दो-चार टैग। और अंत में लिखा ; “संघर्ष जारी रहेगा।”
संघर्ष कहाँ जारी है ; यह पता नहीं।
लेकिन पोस्ट जरूर जारी रहते हैं।
सच थोड़ा सादा होता है। सच यह है कि समाज का कोई भी काम एक व्यक्ति से नहीं होता। कई लोग मेहनत करते हैं। कुछ सामने दिखते हैं। कई लोग पर्दे के पीछे रह जाते हैं।
लेकिन आजकल पर्दे के पीछे रहना। किसी को पसंद नहीं। शायद बदबू आती है।
हर किसी को लगता है, इतिहास उसी से शुरू होता है। मर्यादा आजकल थोड़ा पुराना फ़ैशन लगती है।
संयम का मतलब है : काम होने दो,
फिर बोलो। लेकिन सोशल मीडिया का नियम है , पहले बोलो, फिर काम होने का इंतज़ार करो।
असली संतोष कहाँ है?
सच पूछिए तो सेवा का असली सुख, लाइक और शेयर में नहीं होता। वह उस दिन होता है, जब समस्या सच में हल हो जाती है।
ताली की आवाज़ दो सेकंड रहती है।परिवर्तन की गूँज वर्षों तक। लेकिन यह बात समझने के लिए थोड़ा धैर्य चाहिए।
और धैर्य…
सोशल मीडिया की दुनिया में, सबसे दुर्लभ संसाधन है।