Wednesday, March 25, 2026

 बीहड़ों की धूल, बंदूकों की गूंज और आत्मसमर्पण की आहट

और अब, उसी इतिहास को सलाम करने की तैयारी…

_____________________

बृज खंडेलवाल द्वारा 

27 मार्च 2026

_________________________

चम्बल।

नाम लेते ही दिल धक से रह जाता था।

उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान की सीमाओं के बीच पसरे वे बीहड़ किसी भूगोल की साधारण रचना नहीं। वे धरती के फटे हुए सीने जैसे थे, गहरे, टेढ़े मेढ़े, रहस्यमयी। सूरज की रोशनी भी वहाँ सीधी नहीं उतरती थी, जैसे डरती हो कि कहीं लौट न पाए। धूल ऐसी उड़ती थी मानो हर कण में एक अधूरी कहानी अटकी हो। कहीं खामोशी इतनी गाढ़ी कि कानों में गूंजने लगे, तो कहीं अचानक किसी अज्ञात दिशा से आती आवाज दिल की धड़कन बढ़ा दे।

1960 और 70 का दशक। यह वह समय था जब चम्बल सिर्फ एक नदी नहीं, वह एक मनःस्थिति थी।

सड़कें वहाँ जाकर खत्म हो जाती थीं। कानून कागजों में रह जाता था। शासन की पहुँच बीहड़ों की गहराई में खो जाती थी।

बीहड़ों की धरती पर चलना आसान नहीं था। पांव रखते ही मिट्टी खिसक जाती। एक मोड़ के बाद क्या है, कोई नहीं जानता। कांटेदार झाड़ियां, गहरी खाइयां, सांपों की सरसराहट, और ऊपर आसमान में मंडराते गिद्ध। यह प्रकृति का ऐसा दुर्ग था, जिसे इंसान ने नहीं बनाया, पर जिसने इंसान को अपने हिसाब से ढाल लिया।

इन्हीं बीहड़ों में जन्म लेते थे बागी।

डकैत कह देना आसान है, पर कहानी उससे कहीं ज्यादा जटिल थी। कोई किसान था जिसे जमींदार ने कुचल दिया। कोई युवा था जिसे पुलिस की ज्यादती ने विद्रोही बना दिया। कोई ऐसा था जिसे न्याय नहीं मिला, और उसने बंदूक उठा ली।

बीहड़ों में कानून की किताब नहीं चलती थी। चलती थी बंदूक की नली और बदले की आग।

लेकिन हर कहानी में सिर्फ अंधेरा नहीं होता। कहीं न कहीं रोशनी भी जन्म लेती है।

और चम्बल में वह रोशनी लेकर आए कई गांधीवादी, सर्वोदय के नेता, आचार्य विनोबा भावे, जय प्रकाश नारायण, आदि। दुबला पतला शरीर। शांत चेहरा। न कोई हथियार, न कोई डर। बस एक विश्वास कि इंसान बदल सकता है। यह विश्वास लेकर वे बीहड़ों में उतरे। जहाँ पुलिस जाने से कतराती थी, वहाँ वे नंगे पांव चले। इस आंदोलन को नई ताकत मिली, और लोग जुड़े।

कहानी किसी फिल्म की तरह लगती है, लेकिन यह हकीकत थी। डकैतों ने संदेश भेजा। वे आत्मसमर्पण करना चाहते हैं, लेकिन अपमान नहीं सहेंगे।

और फिर वह दिन आया जब बीहड़ों ने एक अनोखा दृश्य देखा। मंच सजा। भीड़ जुटी। पुलिस भी थी, प्रशासन भी। और फिर एक एक करके बागी सामने आए।

हाथों में बंदूक थी, लेकिन सिर झुका हुआ। उन्होंने हथियार जमीन पर रख दिए। उस दिन गोली नहीं चली। तालियां बजीं। यह सिर्फ आत्मसमर्पण नहीं था। यह एक युग का अंत था और दूसरे युग की शुरुआत।

इस पूरी कहानी ने सिनेमा को भी गहराई से प्रभावित किया। उस दौर की जिस देश में गंगा बहती है, गंगा जमुना, मुझे जीने दो, हीरोज डकैतों के दिल बदल देते दिखते हैं। आ अब लौट चलें ! सुनील दत्त की मुझे जीने दो  बीहड़ों की सच्चाई को बिना किसी परदे के दिखाती है।

और वर्षों बाद पान सिंह तोमर यह याद दिलाती है कि हर डकैत के पीछे एक टूटा हुआ इंसान होता है। सिनेमा ने चम्बल को सिर्फ रोमांच नहीं बनाया। उसने उसे समझने की कोशिश की।

1970 के दशक में, एक युवा पत्रकार के रूप में, मैंने चम्बल को करीब से देखा। बीहड़ों में चलते हुए ऐसा लगता था जैसे समय थम गया हो। हर मोड़ पर एक कहानी थी। किसी का नाम इतिहास में दर्ज हुआ, किसी का नहीं।लेकिन दर्द सबका एक जैसा था।

मैंने उस समय लिखा था कि भारत ने चम्बल में सिर्फ डकैतों को नहीं हराया, उसने अपने ही भटके हुए लोगों को वापस पाया। वह लेख विदेशों में भी प्रकाशित हुआ और यह अनुभव आज भी मन में ताजा है। सैकड़ों खूंखार बागियों ने जब मुरैना में आत्म समर्पण किया तो लगा ये किसी और दुनिया की कहानी थी। लेकिन नहीं, वह यहीं हुआ था, हमारी ही धरती पर।

और अब, उसी इतिहास को याद करने का समय फिर आया है। जौरा स्थित गांधी आश्रम में बागी समर्पण दिवस की 55वीं वर्षगांठ पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित होने जा रही है। यह आयोजन सिर्फ औपचारिक कार्यक्रम नहीं है। यह स्मृति का उत्सव है। यह उस क्षण को फिर से जीने का प्रयास है जब बंदूकें झुकी थीं और इंसानियत उठ खड़ी हुई थी। इस संगोष्ठी में देश भर के वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता, चिंतक और पत्रकार भाग लेंगे। अहिंसा, सामाजिक बदलाव और गांधीवाद के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा होगी। कार्यक्रम की शुरुआत सुबह होगी, जब उन बागियों को सम्मानित किया जाएगा जिन्होंने हिंसा का रास्ता छोड़कर समाज में लौटने का साहस दिखाया। फिर संवाद का सिलसिला चलेगा। विचारों का आदान प्रदान होगा। पुराने अनुभवों को नई पीढ़ी के सामने रखा जाएगा।

यह भी याद किया जाएगा कि कैसे एक समय में चम्बल के बीहड़ देश के लिए चुनौती थे, और कैसे गांधीवादी प्रयासों ने उन्हें परिवर्तन की प्रयोगशाला बना दिया।

आज जब समाज फिर से तनाव और विभाजन के दौर से गुजर रहा है, तब चम्बल की यह कहानी और भी प्रासंगिक हो जाती है।

यह हमें सिखाती है कि कोई भी समस्या इतनी बड़ी नहीं होती कि उसका समाधान न हो सके।

जरूरत होती है विश्वास की, संवाद की, और धैर्य की।

चम्बल आज भी है। बीहड़ आज भी हैं। लेकिन अब वहाँ डर की नहीं, इतिहास की गूंज सुनाई देती है। जब हवा उन खाइयों से गुजरती है, तो लगता है जैसे वह कोई पुरानी कहानी सुना रही हो। एक ऐसी कहानी जिसमें बंदूकें थीं, खून था, लेकिन अंत में जीत इंसानियत की हुई।

और जब जौरा में फिर से बागी समर्पण दिवस मनाया जाएगा, तो वह सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं होगा। वह उस विश्वास का पुनर्जन्म होगा जिसने कभी बीहड़ों में शांति बो दी थी।

चम्बल की धूल अब भी उड़ती है। लेकिन अब उसमें डर नहीं, इतिहास की खुशबू है।


______________________

Reference:

The 1977 article by **Brij Khandelwal** (under the byline "By Brij Khandelwal Gemini") appears on **page 8** of the *New Nation* (Singapore) issue dated **16 January 1977**.

### Available Excerpt (from digitized archives)

The publicly indexed opening text reads:

> "FOUR years or so ago If you travelled in a train or a bus through the Chambal valley region in Central India you might have found a notorious dacoit disguised as a superintendent of police sitting beside"

It continues from there, describing travel experiences in the Chambal valley during the early 1970s, when the area was still notorious for bandit (dacoit) activity. The piece is framed as a travelogue highlighting the risks and atmosphere of the region at that time.

 Changing Media? The Truth of the News: Journalism's Real Test in an Era of Noise

____________________

By Brij Khandalwal  

March 26, 2026

____________________

What exactly is news? Is it merely what just happened, or is it something that shakes us to our core and forces us to confront reality?

In today’s world, every pocket has become a newsroom. Every hand holds a smartphone, and every screen flashes with “breaking news.” We are drowning in an endless flood of information, surrounded by a cacophony of voices. Yet, amid this overwhelming noise, the truth often gets buried or distorted.

The digital revolution has democratized news like never before. Anyone with a phone can now report, comment, or analyze events in real time. But this very democratization has also made news more suspect. When everyone claims to be a reporter or analyst, the critical question arises: who is actually investigating?

This is where traditional journalism must prove its enduring value. Journalism is not a casual pursuit or a form of light entertainment. It is a rigorous discipline ,  one that demands gathering facts, rigorously testing them, verifying sources, and then presenting those facts clearly, accurately, and promptly to the public.

The great masters of the craft understood this deeply. Joseph Pulitzer famously described news as “what compels people to talk.” His contemporary, John Bogart, captured its essence more colorfully: “If a dog bites a man, it’s not news; but if a man bites a dog, it is news.” The message is clear :  news must be new, unusual, and possess the power to surprise or shock.

Yet journalism cannot be reduced to mere sensationalism. Grabbing attention is easy; building understanding is hard. The true purpose of journalism lies in transforming raw information into meaningful knowledge. It provides essential context, explains causes and consequences, and helps readers make sense of a complex world.

News generally falls into two broad categories. The first type delivers immediate impact :  major government decisions, economic shocks, pandemics, wars, or natural disasters. These stories alert and awaken us. The second type delves deeper: it explores the stories behind the headlines, examining long-term consequences and how distant events will ultimately affect our homes, jobs, families, and daily lives. These stories compel us to think.

One without the other remains incomplete. The best journalism seamlessly combines both ;  delivering urgency while fostering reflection.

At its foundation, strong journalism stands on four essential pillars:

First: Accuracy. 

This is the backbone of the profession. A single wrong name, incorrect figure, or unverified claim can shatter years of carefully built credibility in an instant. In an age of artificial intelligence, deepfakes, and rapidly spreading misinformation, accuracy is no longer just a professional virtue ,  it is a moral responsibility.

Second: Timeliness.

News has an extremely short shelf life. Today’s headline becomes tomorrow’s history. Information that arrives too late ceases to be news and turns into belated analysis or commentary.

Third: Relevance.

News must connect with people’s lives. An event happening in a distant country only becomes meaningful when its ripple effects touch our pockets, our safety, or our future. Relevance turns abstract information into something personal and actionable.

Fourth: Novelty. 

There must be an element of freshness ;  that “man bites dog” surprise factor that stops a scrolling reader in their tracks. Without novelty, even important stories risk being ignored.

Modern reader behavior has further reshaped journalistic presentation. Most people no longer read newspapers cover to cover. They scroll quickly, scanning headlines and snippets, deciding within seconds whether to stop or move on. This has forced news organizations to adapt: shorter formats, sharper headlines, clearer and more direct language, and visually engaging presentations that respect the limited time of busy lives.

Yet, an interesting paradox remains. While global events dominate headlines, people often connect most deeply with stories close to home ;  a broken road in the neighborhood, issues at the local school, the opening or closing of a familiar shop, or the tale of a local hero. These “hyper-local” stories touch hearts because they reflect our everyday reality. In truth, every big national or global story eventually becomes local. Policies framed in distant capitals ultimately play out in our kitchens and communities. Global debates on climate change matter only when rising floods threaten our cities or extreme heat scorches our streets.

The media industry today faces another harsh reality: intense commercial pressure. Many readers openly demand more entertainment and less serious news. In the digital economy, success is increasingly measured by clicks, views, shares, and engagement metrics. Yet trust ;  the most valuable currency of journalism, can only be earned through consistent, truthful reporting.

The finest journalism achieves a delicate balance. It delivers hard facts while telling compelling human stories. It simplifies complex issues without sacrificing depth or nuance. A good report is never just a dry collection of data or statistics; it is a narrative about people ,  their struggles, their hopes, their aspirations, and their resilience.

A journalist, at heart, serves as the eyes, ears, and sometimes the conscience of society. They venture where ordinary citizens cannot go. They ask uncomfortable questions when others remain silent. They peel away layers of secrecy and spin to reveal uncomfortable truths. Their role extends far beyond merely informing the public. It includes holding power accountable ,  whether that power resides in government, corporations, influential individuals, or institutions.

Today, journalism faces unprecedented challenges. Print circulation continues to decline. Digital algorithms increasingly dictate what audiences see and read. The shadow of fake news, propaganda, and coordinated disinformation grows darker. Economic uncertainties and declining ad revenues have forced newsrooms to shrink.

Despite these pressures, the core principles of journalism remain unchanged and non-negotiable: accuracy, timeliness, relevance, novelty, and above all, unwavering commitment to the public interest.

The mediums will continue to evolve ,  from printed paper to glowing screens, from text to voice, and from voice to immersive video and interactive formats. Technology will keep transforming how news is gathered and delivered. Yet the fundamental purpose of journalism endures. Human beings will always hunger to know what is happening, to understand why it matters, and to make informed decisions about their lives and societies.

As long as human curiosity survives, quality journalism will remain not just relevant, but more essential than ever before. In an age of noise, the clear, truthful voice of responsible journalism becomes the most valuable guide we have.

 बदलता मीडिया?

खबर का सच: शोर के दौर में पत्रकारिता की असली परीक्षा

____________________

बृज खंडेलवाल द्वारा 

26 मार्च 2026

_________________________

खबर क्या है? जो अभी हुआ? या जो हमें भीतर तक हिला दे?

आज हर जेब में न्यूज़रूम है। हर हाथ में मोबाइल। हर स्क्रीन पर ब्रेकिंग।

सूचनाओं की बाढ़ है। आवाज़ों का शोर है। लेकिन सच? वह अक्सर इस कोलाहल में दब जाता है।

डिजिटल दुनिया ने खबरों को लोकतांत्रिक बनाया है, पर साथ ही उन्हें संदिग्ध भी। अब हर कोई रिपोर्टर है। हर कोई विश्लेषक।

पर जांच कौन कर रहा है?

यही वह जगह है जहां पत्रकारिता अपनी असली पहचान साबित करती है। पत्रकारिता कोई हल्की कला नहीं। यह अनुशासन है। तथ्य जुटाना। उन्हें परखना। और फिर जनता के सामने साफ, सटीक और समय पर रखना।

पुराने उस्तादों ने यह रास्ता बहुत पहले तय कर दिया था। जोसेफ पुलित्जर ने कहा; खबर वही जो लोगों को बात करने पर मजबूर कर दे।

जॉन बोगार्ट ने इसे और चुटीले अंदाज़ में समझाया: “कुत्ता आदमी को काटे तो खबर नहीं, आदमी कुत्ते को काटे तो खबर है।”

मतलब साफ है, खबर में नया होना चाहिए, अनोखा होना चाहिए, चौंकाने की ताकत होनी चाहिए।

लेकिन क्या पत्रकारिता सिर्फ सनसनी है? क्या हर खबर का मकसद सिर्फ ध्यान खींचना है? नहीं।

पत्रकारिता का असली काम है: समझ बनाना। तथ्य को संदर्भ देना। सूचना को ज्ञान में बदलना।

खबर मोटे तौर पर, दो तरह की होती है। एक, जो तुरंत असर डालती है, सरकारी फैसले, आर्थिक झटके, महामारी, युद्ध, आपदा।

दूसरी, जो इन घटनाओं के पीछे की कहानी बताती है, इनका असर आपके घर, आपकी नौकरी, आपकी जिंदगी पर क्या होगा।

पहली खबर आपको जगाती है।

दूसरी आपको सोचने पर मजबूर करती है।

एक बिना दूसरी अधूरी है।

अच्छी पत्रकारिता चार मजबूत खंभों पर टिकी होती है।

पहला: सटीकता।

यह इसकी रीढ़ है।

एक छोटी गलती, एक गलत आंकड़ा, एक गलत नाम: और वर्षों का भरोसा पल भर में टूट जाता है।

आज के दौर में, जहां एआई, डीपफेक और फर्जी खबरें तेजी से फैलती हैं, सटीकता सिर्फ गुण नहीं, जिम्मेदारी है।

दूसरा: समय।

खबर की उम्र बहुत छोटी होती है।

आज की हेडलाइन, कल का इतिहास।

जो देर से पहुंचा, वह खबर नहीं, विश्लेषण बन जाता है।

तीसरा: प्रासंगिकता। खबर वही जो आपकी जिंदगी से जुड़ती है।

दूर देश की कोई घटना भी तभी मायने रखती है जब उसका असर आपकी जेब, आपकी सुरक्षा या आपके भविष्य पर दिखे।

चौथा: नवीनता।

कुछ ऐसा जो पहले न सुना हो, न देखा हो।

वही “आदमी ने कुत्ते को काटा” वाला तत्व, जो पाठक को रोकता है।

अब जरा पाठक की आदतों पर नजर डालिए।

वह पूरा अखबार नहीं पढ़ता। वह स्क्रॉल करता है, झांकता है, चुनता है।

कुछ सेकंड में फैसला करता है; रुकना है या आगे बढ़ना है।

इसलिए पत्रकारिता का रूप भी बदल रहा है। छोटी खबरें, तीखी सुर्खियाँ, साफ भाषा। ऐसी प्रस्तुति, जो व्यस्त जीवन में भी जगह बना सके।

लेकिन एक दिलचस्प सच है; 

लोग बड़ी खबरों से ज्यादा अपने आसपास की खबरों से जुड़ते हैं।

मोहल्ले की सड़क टूटी है। पास के स्कूल में क्या हुआ। किसी दुकान का खुलना या बंद होना। या कोई स्थानीय हीरो। यही खबरें दिल को छूती हैं। क्योंकि यही हमारी रोजमर्रा की दुनिया है। असल में हर बड़ी खबर भी अंततः लोकल ही होती है।

नीतियां राजधानी में बनती हैं, असर घर-घर में दिखता है। जलवायु परिवर्तन पर बहस वैश्विक है, लेकिन बाढ़ आपके शहर में आती है, गर्मी आपकी त्वचा झुलसाती है।

मीडिया के सामने एक और सच है—व्यापार का दबाव।

पाठक कहते हैं: मनोरंजन ज्यादा चाहिए, खबर कम।

क्लिक, व्यू और शेयर अब सफलता के नए पैमाने हैं।

पर भरोसा? वह सिर्फ सच्ची खबर से बनता है।

अच्छी पत्रकारिता इस संतुलन को साधती है। तथ्य भी देती है, कहानी भी सुनाती है। जटिल विषयों को सरल बनाती है, बिना उनकी गहराई खोए। एक रिपोर्ट सिर्फ आंकड़ों का पुलिंदा नहीं होती।

वह इंसानों की कहानी होती है; उनकी तकलीफ, उनकी उम्मीद, उनका संघर्ष।

पत्रकार कौन है? समाज की आंख।

समाज का कान। और कभी-कभी उसकी अंतरात्मा।

वह वहां जाता है, जहां आम आदमी नहीं पहुंच सकता। वह सवाल पूछता है, जहां चुप्पी है। वह सच निकालता है, जहां परतें चढ़ी होती हैं।

उसका काम सिर्फ सूचना देना नहीं।

जवाबदेही तय करना है। सत्ता को आईना दिखाना है, चाहे वह सरकार हो, कॉरपोरेट हो या कोई प्रभावशाली समूह।

आज पत्रकारिता कई मोर्चों पर जूझ रही है। प्रिंट सिमट रहा है। डिजिटल एल्गोरिद्म तय कर रहे हैं कि आप क्या देखेंगे। फेक न्यूज का साया गहरा हो रहा है।

फिर भी, इसके मूल सिद्धांत अडिग हैं। सटीकता। समय। प्रासंगिकता।नवीनता। और सबसे ऊपर, जनहित।

माध्यम बदलते रहेंगे। कागज से स्क्रीन, स्क्रीन से आवाज, आवाज से वीडियो।

पर पत्रकारिता का मकसद नहीं बदलेगा। इंसान हमेशा जानना चाहेगा। समझना चाहेगा। और सही फैसले लेना चाहेगा।

जब तक यह जिज्ञासा जिंदा है; पत्रकारिता भी जिंदा रहेगी। और शायद, पहले से कहीं ज्यादा जरूरी।

Tuesday, March 24, 2026

 एडवोकेट आकाश वशिष्ठ की जनहित याचिका ने उठाए गंभीर सवाल 

आगरा के भूले-बिसरे स्मारक दम तोड़ रहे हैं। जवाबदेह कौन?

___________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा

24 मार्च 2026

___________________________

जब इतिहास चुपचाप मरता है; ईंट दर ईंट, मेहराब दर मेहराब, और उसके रखवाले आँखें मूँद लेते हैं, तो क्या होता है? 

दुनिया ताजमहल की शाश्वत चमक से मोहित जरूर होती है। लेकिन थोड़ा हटकर देखिए, थोड़ा अंदर जाइए। चमक छूट जाती है, क्रूर सच सामने आता है।  

यहाँ इतिहास नहीं चमकता, यह बिखरता है। टूटे गुंबद, झाड़ियों में दबे आंगन, धुंधली पड़ती भित्तिचित्र आखिरी साँसें गिन रहे हैं। यह आगरा का दूसरा चेहरा है, अनदेखा, अनकहा, अनसुना।

इस हफ्ते इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने आखिरकार सख्त रुख अपनाया। उत्तर प्रदेश के आगरा, झांसी, वृंदावन, लखनऊ, हस्तिनापुर समेत कई शहरों में बिखरती विरासत पर स्वतः संज्ञान लिया और केंद्र व राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर आठ हफ्तों में जवाब माँगा।  

जो लोग इन गलियों से रोज गुजरते हैं, उनके लिए यह खबर नहीं, हकीकत है।  

आगरा किले और फतेहपुर सीकरी की भव्यता के पार एक खामोश कब्रिस्तान फैला है, स्मारकों का। सैकड़ों स्मारक भूले हुए, बेसहारा। न सुरक्षा, न सूचना पट्ट, न कोई संरक्षण योजना।  

विरासत संरक्षक डॉ. मुकुल पांड्या कहते हैं, “दारा शिकोह की खोई लाइब्रेरी हो या फतेहपुर सीकरी की मिटती शैल चित्रकला, बेगम समरू का बगीचा, सुल्तान परवेज का मकबरा, ताल फिरोज खान, चीनी का रौजा, हम्माम अलीवर्दी खान (छिप्पीतौला), जसवंत सिंह की छतरी, चौबुर्जी, बादशाही बाग (समुगरह), फतेहाबाद, यह महज उपेक्षा नहीं, यह इतिहास का दाह संस्कार है।”

एडवोकेट आकाश वशिष्ठ की जनहित याचिका ने तस्वीर और साफ कर दी। उत्तर प्रदेश में 5400 से अधिक धरोहरें दर्ज हैं, लेकिन सुरक्षित सिर्फ 421. बाकी? भगवान भरोसे। अतिक्रमण बढ़ रहे हैं, बुलडोजर मंडरा रहे हैं, समय चुपचाप अपना काम कर रहा है।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) का आगरा सर्किल 265 संरक्षित स्मारकों की देखभाल करता है। आंकड़ा सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन हकीकत यह कि एक भी स्मारक पर पूरी तरह हेरिटेज बायलॉज लागू नहीं हैं। पंद्रह साल बीत गए, फाइलें घूमती रहीं, स्मारक गिरते रहे।  

सबसे चौंकाने वाली बात; सितंबर 2023 से अप्रैल 2025 तक एक भी नया अतिक्रमण दर्ज नहीं किया गया। क्या सचमुच कोई उल्लंघन नहीं हो रहा, या देखने वाला कोई नहीं? जमीन पर तस्वीर साफ है; अवैध निर्माण धड़ल्ले से हो रहे हैं, संरक्षित क्षेत्र सिकुड़ रहे हैं, प्रशासन सोया हुआ है। यह लापरवाही नहीं, जिम्मेदारी से पलायन है।

कानून कहता है; संरक्षण करो। व्यवस्था कहती है; टालो, भूलो, छोड़ दो।  

उधर प्रकृति भी हमला बोल रही है। यमुना का प्रदूषण नींव खा रहा है, भूजल दीवारों को खोखला कर रहा है, बाढ़ इतिहास को चाट रही है। लेकिन सबसे बड़ा नुकसान अदृश्य है।  

वृंदावन के प्राचीन मंदिर, पुरानी आगरा की हवेलियाँ, यमुना किनारे के घाट, सौ साल पुरानी कारवांसरायें, जिनमें कभी रेशम मार्ग के व्यापारी ठहरते थे, सभी सूची से बाहर हैं। वृंदावन में अकेले 48 प्राचीन घाट और कुंड संरक्षण की पुकार कर रहे हैं, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं। यमुना किनारे की पूरी विरासत अतिक्रमण में दब गई, समय में खो गई, नजर और नीति से बाहर हो गई।

अब अदालत ने संस्कृति मंत्रालय, राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण और राज्य सरकार से जवाब माँगा है। माँगें स्पष्ट हैं: पूरी धरोहर की सूची बनाओ, हर स्मारक के लिए बायलॉज तैयार करो, सख्ती से अमल करो, अलग स्टाफ नियुक्त करो और हेरिटेज बोर्ड गठित करो।  

ये कदम सुनने में साधारण लगते हैं, लेकिन वास्तव में बेहद जरूरी हैं। क्योंकि यह सिर्फ पत्थरों की बात नहीं; यह पहचान की, स्मृति की और शहर की आत्मा की बात है।

आगरा हर साल 80 लाख से अधिक पर्यटकों को आकर्षित करता है, लेकिन ज्यादातर सिर्फ ताजमहल तक सीमित रहते हैं। कोई शहर एक पोस्टकार्ड पर नहीं जी सकता। राजस्थान देखिए, यूरोप देखिए, विरासत वहाँ रोजगार बनती है, पहचान बनती है, अर्थव्यवस्था बनती है। हम उसे सड़ने दे रहे हैं।  

हर गिरता गुंबद एक कहानी मिटाता है। हर अतिक्रमित आंगन एक याद चुरा लेता है। आगरा सिर्फ ताजमहल नहीं है। यह वह गुमनाम मकबरा भी है, टूटा दरवाजा भी है, उजड़ा बाग भी है। इन्हें खो दिया तो शहर की रूह खो जाएगी।

अदालत ने चेतावनी दे दी है। घंटी बज चुकी है। अब सवाल है: क्या कोई जागेगा?  

क्योंकि अब इतिहास सदियों में नहीं मर रहा। वह मौसमों में खत्म हो रहा है, हमारे सामने, हमारे देखते-देखते।

 ज़िंदगी की साँसों पर टिकी नदियाँ: सुप्रीम कोर्ट का सख्त पैग़ाम, बिखरी बेपरवाही खत्म करो

______________________

बृज खंडेलवाल द्वारा 

25 मार्च 2026

__________________________

क्या हमारी नदियाँ अब सिर्फ नक्शों में बचेंगी? या फिर हम उन्हें सच में “राष्ट्रीय संपत्ति” मानकर बचाने की जद्दोजहद करेंगे?

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि भारत की नदियाँ “राष्ट्रीय संपत्ति” हैं। यह कोई मामूली बयान नहीं था। यह एक जोरदार चेतावनी थी। एक अलार्म। मगर अफसोस, यह अलार्म भी हमारी सियासी और प्रशासनिक बेपरवाही की दीवारों से टकराकर खामोश हो गया।

सच तो यह है कि जो बात अदालत ने कही, वह हर आम आदमी पहले से जानता है: हमारी नदियाँ अब जीवनदायिनी नहीं, गंदे नालों में तब्दील हो चुकी हैं।

हिमालय की गोद से निकलने वाली पवित्र धाराएँ हों या दक्षिण के मैदानों में बहती नदियाँ, हर जगह एक ही कहानी है। जहरीले औद्योगिक कचरे का हमला। शहरों की सीवेज का सैलाब। और ऊपर से हुकूमतों की नाकामी।

सुप्रीम कोर्ट ने खास तौर पर यमुना नदी पर फोकस किया। दिल्ली, नोएडा और गाज़ियाबाद से निकलने वाला बिना ट्रीट हुआ कचरा सीधे यमुना में गिर रहा है। यह एक तरह का “गंदगी का फेडरलिज़्म” है, जहाँ हर राज्य और हर एजेंसी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ती है, और नदी धीरे-धीरे मरती जाती है।


आज की यमुना नदी नहीं, एक जिंदा इल्ज़ाम है, हमारी शहरी प्लानिंग पर, हमारी नीयत पर, हमारी नाकामी पर।

दिल्ली में यमुना के पानी में फीकल कोलीफॉर्म का स्तर 92,000 तक पहुँच चुका है, जो तय सीमा से करीब 40 गुना ज्यादा है। यह साफ इशारा है कि नदी में कच्चा सीवेज बेहिसाब बहाया जा रहा है।

बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड यानी BOD 70 mg/L तक पहुँच गई है, जबकि 3 mg/L से ऊपर जलीय जीवन खत्म होने लगता है। यानी यमुना अब एक बहती हुई कब्रगाह बन चुकी है, जहाँ पानी है, मगर जिंदगी नहीं।

ब्रज क्षेत्र, मथुरा और वृंदावन, जहाँ कभी कृष्ण की श्यामल सखी बहती थी, अब काले, गाढ़े कीचड़ में बदल चुकी है। हवा में मीथेन की सड़ी बदबू है। श्रद्धा भी जैसे शर्मिंदा हो गई हो।

आगरा में ताजमहल खड़ा है, खामोश, मगर सब कुछ देखता हुआ। कभी यमुना उसकी खूबसूरती को दोगुना करती थी। आज वही नदी उसकी बदहाली का आईना बन गई है।

हजारों करोड़ रुपये यमुना एक्शन प्लान पर खर्च हुए। मगर नतीजा? सिफर। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट या तो अधूरे हैं, या पुराने और बेअसर। सिर्फ दिल्ली से रोज़ करीब 28 मिलियन गैलन गंदा पानी बिना साफ हुए यमुना में बहा दिया जाता है।

यमुना की बदहाली दरअसल पूरे देश का आईना है।

गंगा, जिसे मां कहा जाता है, आज भी झाग और गंदगी से जूझ रही है। “नमामि गंगे” जैसे बड़े-बड़े प्रोजेक्ट भी ज़मीन पर बिखरे हुए नजर आते हैं। वाराणसी के घाटों पर झाग तैरता है, और यह झाग सिर्फ पानी में नहीं, हमारी नीतियों में भी है।

दक्षिण भारत में गोदावरी और कृष्णा नदियाँ औद्योगिक कचरे से जूझ रही हैं। कई जगह “डेड ज़ोन” बन चुके हैं, जहाँ पानी है, मगर जीवन नहीं।

कावेरी नदी, जो कभी सभ्यताओं की जननी थी, आज बेंगलुरु के सीवेज का बोझ ढो रही है।

मसला साफ है, जिम्मेदारी बंटी हुई है, मगर समस्या साझा है।

प्रदूषण सरहदें नहीं देखता। गाज़ियाबाद की गंदगी आगरा के खेतों तक पहुँचती है। हरियाणा का औद्योगिक कचरा दिल्ली के भूजल को जहरीला करता है।

फिर भी हमारी सरकारें अपने-अपने दायरे में सिमटी रहती हैं, जैसे नदी नहीं, कोई सियासी इलाका हो।

सुप्रीम कोर्ट का सख्त पैग़ाम

सुप्रीम कोर्ट ने इस बिखरी हुई व्यवस्था पर सीधा वार किया है। अदालत ने कहा कि जब बहुत सारी एजेंसियाँ होती हैं, तो जवाबदेही खो जाती है।

कोर्ट ने CPCB को निर्देश दिया है कि हर जिम्मेदार संस्था की पहचान करे। हरियाणा सरकार से भी रिपोर्ट मांगी गई है। मकसद साफ है, अब कोई बच नहीं पाएगा।

संदेश बिल्कुल साफ है:

नदियाँ साझा धरोहर हैं। अगर एक राज्य अपनी गंदगी नहीं रोकता, तो वह दूसरे राज्य के खिलाफ पर्यावरणी जुल्म करता है।

अब “तू-तू, मैं-मैं” का वक्त खत्म होना चाहिए। आगे रास्ता क्या है?

अगर नदियों को सच में बचाना है, तो इरादे मजबूत करने होंगे।

सबसे पहले, 2030 तक यह सुनिश्चित करना होगा कि एक बूंद भी बिना ट्रीट हुआ कचरा नदी में न जाए। इसके लिए आधुनिक और पारदर्शी सिस्टम चाहिए, जहाँ हर डिस्चार्ज पर नजर हो।

एक मजबूत नेशनल रिवर अथॉरिटी बनानी होगी, जिसके पास सख्त कानूनी ताकत हो। जो अफसर काम न करें, उन पर भारी जुर्माना लगे, चाहे वह कमिश्नर हों या मुख्यमंत्री।

नदियों के किनारों को अतिक्रमण से बचाना होगा। नदी को सांस लेने के लिए उसका फ्लडप्लेन चाहिए। मगर आज वहां या तो झुग्गियाँ हैं या आलीशान इमारतें। यह सिलसिला रोकना होगा।

सालों से जमी गाद को हटाने के लिए बड़े स्तर पर ड्रेजिंग अभियान चलाना होगा, ताकि नदी का प्राकृतिक बहाव वापस आ सके।

आखिरी सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने रास्ता दिखा दिया है। अब गेंद सरकारों के पाले में है।

“राष्ट्रीय संपत्ति” का दर्जा सिर्फ एक कागज़ी एलान नहीं होना चाहिए। यह एक वादा होना चाहिए, भविष्य से, आने वाली पीढ़ियों से।

अगर हम अब भी नहीं चेते, तो हम सिर्फ अपनी विरासत नहीं खोएंगे, हम अपनी जिंदगी की बुनियाद खो देंगे।

यमुना की खामोश चीख सिर्फ एक नदी की नहीं, पूरे देश की आवाज़ है।

अब वक्त आ गया है, बहानों को दफन करने का, और नदियों को ज़िंदा करने का।


Monday, March 23, 2026

 आज मौसम बड़ा बेईमान है!

जब कुदरत बदल ले मिज़ाज, तो कैसे पढ़ें आसमान की ज़ुबान?

बदलते दौर में मौसम पूर्वानुमान की बढ़ती अहमियत

_______________________


बृज खंडेलवाल द्वारा

23 मार्च 2026

_______________________


अब मौसम भरोसे के क़ाबिल नहीं रहा। सचमुच आसमान ने अपनी ज़ुबान बदल ली है।

आज विश्व मौसम दिवस है। बात सीधी है, मगर असर गहरा। मौसम अब वैसा नहीं रहा, जैसा हमने बचपन में जाना था। कभी हल्की-फुल्की बारिश होती थी, अब वही आफ़त बनकर टूट पड़ती है। कभी गर्मी बस तपिश देती थी, आज वही जानलेवा लू बन जाती है।

हाल के दिनों को ही देख लीजिए। अचानक बदले मौसम ने खेतों में खड़ी फसलों को चौपट कर दिया। पहाड़ों में बेमौसम बर्फबारी जारी है। होली के तुरंत बाद तापमान ने ऐसी छलांग लगाई कि लोगों की सांसें अटक गईं। मौसम अब सिर्फ़ बदलता नहीं, चौंकाता है, डराता है, और कई बार तबाही का मंजर भी दिखा देता है।

कभी हमारा रिश्ता मौसम से सीधा था। पुरखों ने आसमान पढ़ना सीखा था। घाघ और भड्डरी जैसे लोक-ज्ञानी, बिना किसी मशीन के, सिर्फ़ प्रकृति के संकेतों से मौसम का हाल बता देते थे। उनकी कहावतें आज भी गांवों में गूंजती हैं: 

“शुक्रवार की बादरी, रही सनीचर छाय… बिन बरसे ना जाए।”

“दिन में गर्मी, रात में ओस… कहें घाघ, बरखा सौ कोस।”

ये सिर्फ़ शब्द नहीं थे, सदियों का अनुभव था। हवा का रुख, बादलों की चाल, पक्षियों का व्यवहार, सब कुछ संकेत देता था। किसान इन्हीं इशारों पर भरोसा करके बीज बोता था, मवेशी खरीदता-बेचता था, और अपनी रोज़ी-रोटी का फैसला करता था।

फिर आया विज्ञान का दौर। मौसम विभाग बना। सैटेलाइट आसमान पर नजर रखने लगे। रडार ने बादलों की चाल पकड़ ली। ज़मीनी स्टेशन डेटा जुटाने लगे। और फिर आने लगा पूर्वानुमान; कल बारिश होगी या धूप निकलेगी।

इस एक जानकारी पर कितनी ज़िंदगियां टिकी होती हैं! किसान की फसल, पायलट की उड़ान, मछुआरे की नाव, सरकार की तैयारी, सब कुछ मौसम की एक सही भविष्यवाणी पर निर्भर करता है। एक सटीक पूर्वानुमान कई जिंदगियां बचा सकता है।

लेकिन अब कहानी बदल चुकी है।

जलवायु परिवर्तन ने मौसम की पूरी किताब ही उलट दी है। बारिश का कोई ठिकाना नहीं। सूखा लंबा खिंचता है। तूफान पहले से ज्यादा ताक़तवर हो गए हैं। भारत में ही देख लीजिए, पहाड़ों में अचानक बाढ़, मैदानों में झुलसाती गर्मी, शहरों में जलभराव का कहर।

पुराना डेटा अब हर बार काम नहीं आता। मौसम अब सीधी लकीर नहीं, उलझी हुई पहेली बन गया है। ऐसे में मौसम वैज्ञानिकों की जिम्मेदारी कई गुना बढ़ गई है। उनका काम अब सिर्फ़ “कल का मौसम” बताना नहीं रह गया है।

अब वे आने वाले हफ्तों, महीनों का अनुमान लगाते हैं। किसान को सलाह दी जाती है: कब बोना है, कब काटना है। जल प्रबंधन की रणनीतियां बनती हैं। आपदा प्रबंधन टीमें पहले से अलर्ट हो जाती हैं। यानी अब मौसम पूर्वानुमान सिर्फ़ सूचना नहीं, तैयारी का आधार बन चुका है।

तकनीक ने इस काम को और तेज़ और सटीक बनाया है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग ने पूर्वानुमान को नई आंखें दी हैं। अब चेतावनी सिर्फ़ इतनी नहीं होती कि “भारी बारिश होगी”, बल्कि यह भी बताया जाता है कि “इस इलाके में बाढ़ का खतरा है।” हीटवेव की स्थिति में बुज़ुर्गों और बच्चों के लिए खास सलाह जारी की जाती है।

यह सिर्फ़ विज्ञान नहीं, ज़िंदगी बचाने का काम है।

इन सबके पीछे होते हैं मौसम वैज्ञानिक; खामोशी से काम करते हुए, दिन-रात आंकड़ों में डूबे हुए। उनकी मेहनत दिखती नहीं, लेकिन उसका असर हर जगह महसूस होता है। अब तो छोटे-छोटे इलाकों के लिए भी सटीक भविष्यवाणी संभव हो रही है।

दिलचस्प बात यह है कि अब आम लोग भी इस प्रक्रिया का हिस्सा बन रहे हैं। मोबाइल से भेजी गई स्थानीय जानकारी भी सिस्टम का हिस्सा बनती है। मौसम की दुनिया अब ज्यादा जुड़ी हुई, ज्यादा साझा हो गई है।

लेकिन एक सच्चाई और है; मौसम किसी सरहद को नहीं मानता। एक देश में उठा तूफान दूसरे देश में तबाही ला सकता है। इसलिए वैश्विक सहयोग जरूरी है। देशों के बीच डेटा साझा करना, तकनीक बांटना, और कमजोर देशों की मदद करना आज की जरूरत बन चुका है।

फिर भी, एक सवाल हमसे भी है।

क्या हम इन चेतावनियों को गंभीरता से लेते हैं? हम क्रिकेट का स्कोर हर मिनट देखते हैं, लेकिन मौसम की चेतावनी को अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। यही लापरवाही कई बार भारी पड़ती है।

आज का पैग़ाम साफ़ है।

मौसम अब सिर्फ़ खबर नहीं रहा। यह हमारी ज़िंदगी और मौत के बीच खिंची एक नाज़ुक लकीर बन चुका है। इसे समझना, इसे सुनना, और इस पर अमल करना; अब हमारी मजबूरी नहीं, हमारी ज़िम्मेदारी है।

Sunday, March 22, 2026

 डॉ लोहिया जयंती पर

कांग्रेस-मुक्त भारत का पहला खाका: लोहिया की बेचैन विरासत

___________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा 

23 मार्च 2026

________________________

कांग्रेस-मुक्त भारत, यह नारा किसका है?

आज के राजनीतिक गलियारों में गूंजता है। पर इसकी पहली आहट बहुत पहले सुनाई दी थी।

एक बाग़ी दिमाग में। एक बेचैन आत्मा में। डॉ. राम मनोहर लोहिया के भीतर।

23 मार्च। जयंती। सिर्फ फूल चढ़ाने का दिन नहीं। थोड़ी असहज सच्चाइयों से टकराने का दिन भी।

लोहिया, कद काठी छोटी, मगर असर विराट।

1934। कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी। साथ में जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव। कांग्रेस के भीतर समाजवाद का बीज बोया गया। लोहिया विदेश विभाग के सचिव बने। फिर 1942,  भारत छोड़ो आंदोलन। भूमिगत जीवन। कांग्रेस रेडियो की आवाज़।दबाने की हर कोशिश नाकाम।

आज़ादी आई। पर लोहिया संतुष्ट नहीं हुए। नेहरू का मॉडल उन्हें अधूरा लगा। मिश्रित अर्थव्यवस्था। केंद्रीकृत योजना। उन्हें यह “ऊपर से विकास” दिखा, जनता से दूर, सत्ता के करीब।उन्होंने राह बदली।

1955, सोशलिस्ट पार्टी। फिर संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी। अपना मंच। अपनी लड़ाई। संसद में पहुंचे तो आंकड़ों को हथियार बनाया। “तीन आने रोज।” गरीबी की रेखा का नंगा सच देश के सामने रख दिया।

सड़क पर उतरे तो मुद्दे और तेज हो गए; जाति के खिलाफ। अंग्रेज़ी के प्रभुत्व के खिलाफ। किसान के शोषण के खिलाफ।

फिर आया 1967,  एक नारा नहीं, एक रणनीति। “गैर-कांग्रेसवाद।” आज की भाषा में कहें तो, यही था “कांग्रेस-मुक्त भारत” का पहला ब्लूप्रिंट।

लोहिया ने विपक्ष को जोड़ा। कांग्रेस की दीवारों में दरार डाली। कई राज्यों में सत्ता बदली। गठबंधन राजनीति ने यहीं जन्म लिया।

यहीं एक असहज सवाल खड़ा होता है। आज जो “कांग्रेस-मुक्त भारत” का नारा गूंजता है; क्या उसके पहले शिल्पकार को याद किया जाता है?

क्या सत्ता को अपने वैचारिक पूर्वजों के प्रति आभार नहीं जताना चाहिए?

पर कहानी सीधी रेखा नहीं है। लोहिया जितने तेज थे, उतने असहज भी। कटु आलोचना। बिना फिल्टर की भाषा। नतीजा, अपने ही खेमे में दरारें। दोस्त विरोधी बनते गए।आंदोलन बड़ा हुआ, संगठन छोटा रह गया।

अब उनके दिमाग की ओर चलते हैं।

बर्लिन विश्वविद्यालय। नमक कर पर पीएचडी। मार्क्स को पढ़ा, पर आंख मूंदकर नहीं अपनाया। वर्ग-संघर्ष की कठोरता ठुकराई। सोवियत मॉडल पर सवाल उठाए। उन्होंने गढ़ा: “नया समाजवाद।” न पूंजीवाद। न साम्यवाद। दोनों से “समान दूरी।” उनका समाजवाद किताबों का नहीं, ज़रूरतों का था।

उत्पादन, ज़रूरत के हिसाब से। केंद्र में: मनुष्य। मशीन नहीं। और फिर; सप्त क्रांति। एक साथ कई मोर्चे।आर्थिक असमानता के खिलाफ।जाति के खिलाफ। लिंग भेद के खिलाफ। रंगभेद के खिलाफ। विदेशी वर्चस्व के खिलाफ।

यह विचार नहीं; एक बहु-आयामी संघर्ष था। “चौखंबा राज्य।” गांव, जिला, प्रांत, केंद्र। सत्ता का विकेंद्रीकरण। दिल्ली की पकड़ ढीली करने का सपना। नेहरू की केंद्रीकृत सोच के ठीक उलट।

पर असली ट्विस्ट यहां है। लोहिया गांधी के उत्तराधिकारी थे; पर कॉपी-पेस्ट नहीं।

एक अपग्रेडेड संस्करण। अहिंसा ली।सत्याग्रह लिया। ग्राम स्वराज लिया।पर उसमें समाजवाद का बारूद भरा।

गांधी नैतिक सुधार की बात करते थे।लोहिया ने कहा, संरचना बदलो। “रोटी और बेटी।” एक साथ खाना।एक साथ शादी। जाति पर सीधा प्रहार।

यह नारा नहीं था; सामाजिक विस्फोट का फार्मूला था। उन्होंने गांधीवाद को रीब्रांड किया। आंदोलन को हथियार बनाया। न शुद्ध आदर्शवाद। न विदेशी विचारधारा।

एक देसी मिश्रण, जो जमीन से जुड़ा था, और झकझोरने वाला भी। लेकिन हर विरासत की तरह, यह भी धुंधली और विवादित हो गई, लोहिया के अनेकों शिष्यों,  उत्तराधिकारियों की करतूतों की वजह से। राज नारायण, मधु लिमए, जॉर्ज फर्नांडिस, कर्पूरी ठाकुर, लालू यादव, नीतीश, मंडल, मुलायम सिंह यादव, बड़ी लिस्ट है!!

कुछ नीतियों पर सवाल भी उठे। विकेंद्रीकरण; कहीं विखंडन का डर।अंग्रेज़ी विरोध; मध्यम वर्ग की दूरी।टूटती पार्टियां; कमजोर राजनीतिक असर। तीखे व्यक्तिगत हमले; बड़ी सोच पर परदा।

फिर भी एक तस्वीर याद रखिए।

1967। गरीबी में जीवन। सादगी में मौत। न सत्ता का लोभ। न संपत्ति का मोह।

आज जब असमानता फिर सिर उठा रही है। जब नवउदारवाद का शोर है।जब विकास की चमक के पीछे असंतुलन छिपा है ;  तब लोहिया फिर याद आते हैं।

उनका “नया समाजवाद”; एक तरह का सशस्त्र गांधीवाद। जहां स्वराज सिर्फ आज़ादी नहीं, बराबरी भी है।

लोहिया संत नहीं थे। पर चिंगारी जरूर थे। एक विद्रोही गांधीवादी, जिसने सत्ता को ललकारा। समाज को आईना दिखाया। और आज भी उनकी आवाज़ गूंजती है;  “जब सड़क खामोश है, सदन आवारा हो जाती है।”

जाति पर उनका प्रहार आज भी उतना ही सटीक है; “जाति अवसर को सीमित करती है… और अवसर क्षमता को।”

और स्त्री पर उनकी कल्पना; सीता नहीं, द्रौपदी। आज्ञाकारिता नहीं, बुद्धि और साहस।

यही लोहिया थे: असुविधाजनक, असहज, लेकिन जरूरी।

सवाल अब भी हवा में तैर रहा है? क्या हम लोहिया को सिर्फ याद कर रहे हैं, या सच में उन्हें समझ भी रहे हैं?