Saturday, April 4, 2026

 सात फेरे से पहले सात सवाल: बदलती पीढ़ी का ‘न’ जो सिर्फ इंकार नहीं, इकरार है अपने आप से

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बृज खंडेलवाल द्वारा

5 अप्रैल 2026

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दरवाज़ा आधा खुला था। भीतर पीली-सी रोशनी तैर रही थी। लैपटॉप की स्क्रीन पर एक लाइन चमक रही थी, “वन वे, पेरिस।”

फोन पर माँ की आवाज़ अटक कर रह गई, “बेटा, शादी कब…?”

उसने रुककर, जैसे अपने ही भीतर झाँककर कहा, “माँ, शायद… कभी नहीं।”

और फिर एक खामोशी। ऐसी, जैसे दीवार से पुरानी कील निकल जाए। तस्वीर अब भी टंगी है, पर सहारा बदल चुका है।

यह कहानी सिर्फ एक लड़की की नहीं है। यह उस पीढ़ी की कहानी है जो शादी को मंज़िल नहीं, विकल्प मानती है। और विकल्प भी ऐसा, जिसे टाल देना अब बगावत नहीं, सामान्य बात है।

कभी शादी जीवन का पासपोर्ट हुआ करती थी। समाज की मुहर। परिवार की गारंटी। इज़्ज़त का बीमा।

आज वही पासपोर्ट कई युवाओं को बेड़ियों जैसा लगता है।

बदलाव ने कोई शोर नहीं किया। वह दबे पांव आया। पहले करियर ने दरवाज़ा खटखटाया। फिर आत्मनिर्भरता भीतर आई। और फिर एक सवाल उठा, सीधा और असहज, “शादी क्यों?”

जब इस “क्यों” का जवाब ठोस नहीं मिला, तो परंपरा की दीवार में पहली दरार पड़ी।

आंकड़े भी अब कहानी कहने लगे हैं। 1993 में जहां 80 प्रतिशत किशोर शादी को अपना भविष्य मानते थे, आज यह संख्या 67 प्रतिशत पर आ गई है। महिलाओं में गिरावट और तेज़ है। यह सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं, सोच का भूकंप है।

आज की युवती कमाती है, निवेश करती है, अकेले दुनिया घूम आती है। उसे सहारे की ज़रूरत नहीं, साथ की तलाश है।

और फर्क यहीं है।

सहारा मजबूरी है। साथ चुनाव है।

दिल्ली की 29 साल की एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर। शानदार सैलरी। अपना घर। अपने फैसले। उसने अपने दोस्तों की शादियाँ देखीं। किसी ने करियर छोड़ा, किसी ने शहर, और किसी ने खुद को।

उसने तय किया, संबंध रहेंगे,  पर बिना कागज़ के। बिना औपचारिक रिश्ते के।

वह मुस्कराकर कहती है, “रिश्ता दिल से होना चाहिए, दस्तावेज़ से नहीं।”

यह सोच अब किनारे की लहर नहीं रही। यह बीच धारा में उतर चुकी है। सहजीवन बढ़ रहा है। रिश्ते हैं, पर बिना स्थायी मुहर के। जैसे लोग ऐप डाउनलोड करते हैं। जरूरत हो तो रखें, नहीं तो डिलीट।

कठोर लगता है। पर यही सच्चाई है।

इस कहानी में पैसा भी एक बड़ा किरदार है। बच्चा पालना अब सिर्फ भावनात्मक नहीं, आर्थिक प्रोजेक्ट बन चुका है। अमेरिका में एक बच्चे पर 18 साल में करीब 3.8 करोड़ रुपये खर्च होते हैं। भारत में भी शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवनशैली की कीमतें आसमान छू रही हैं।

करीब 70 प्रतिशत लोग मानते हैं कि बच्चों की परवरिश अब बहुत महंगी हो गई है।

तो युवा खुद से पूछता है, “क्या मैं अपनी ज़िंदगी जी पाऊंगा?”

और जवाब अक्सर ‘नहीं’ की तरफ झुक जाता है।

इसके ऊपर अनिश्चितता का बादल है। महामारी की यादें अभी सूखी नहीं हैं। नौकरियों का बाज़ार भरोसेमंद नहीं रहा। जलवायु संकट भविष्य पर सवालिया निशान लगा रहा है।

ऐसे में स्थायी बंधन कई लोगों को जोखिम लगता है।

लेकिन सबसे गहरी दरार घर के भीतर से आती है।

बचपन में देखे गए रिश्ते। माँ-बाप की खामोश लड़ाइयाँ। बच्चों के नाम पर खिंचती लंबी चुप्पियाँ। “समझौता” जो प्यार बनकर पेश किया गया।

इन दृश्यों ने शादी की चमक फीकी कर दी।

एक युवा कहता है, “मैंने अपने घर में प्यार नहीं, समझौता देखा है।” और वहीं वह तय करता है कि वह वही कहानी दोहराएगा नहीं।

संयुक्त परिवार अब धीरे-धीरे किस्सों में सिमट रहे हैं। न दादी की गोद, न नानी का सहारा। आज के दादा-दादी भी अपनी जिंदगी जीना चाहते हैं। बच्चे अलग शहरों में, अलग दुनिया में।

बच्चा पालना अब अकेले का प्रोजेक्ट है। भारी। थकाने वाला। कभी-कभी डरावना।

तो युवा क्या करता है?

वह रुकता है। सोचता है। और कई बार साफ कह देता है, “नहीं।”

यह “नहीं” गुस्सा नहीं है। यह हिसाब है। जिंदगी की बैलेंस शीट।

शादी अब अनिवार्यता नहीं रही। वह विकल्प है। और हर विकल्प हर किसी के लिए जरूरी नहीं होता।

कुछ लोग अकेले खुश हैं। कुछ बिना शादी के रिश्तों में संतुष्ट हैं। कुछ अपने काम में ही अपना संसार ढूंढ लेते हैं। बिना शादी के प्रेम भी है, सेक्स संबंध भी हैं, और बिन फेरे हम तेरे की स्वीकृति भी बढ़ रही है।

समाज असहज है। माता-पिता बेचैन हैं। पर सवाल अब भी खड़ा है, क्या शादी सिर्फ इसलिए होनी चाहिए क्योंकि वह हमेशा से होती आई है?

परंपरा का सम्मान जरूरी है। लेकिन परंपरा का बोझ हर पीढ़ी को खुद तौलना होगा।

यह बदलाव डराता है। पर इसमें एक ईमानदारी भी है।

अब लोग शादी इसलिए नहीं कर रहे क्योंकि करनी है। वे इसलिए कर रहे हैं क्योंकि चाहते हैं।

और जब चाहत सच्ची होती है, तभी रिश्ता टिकता है।

दरवाज़ा अब भी आधा खुला है।

माँ अब भी इंतज़ार में है।

लेकिन बेटी अब अपराधबोध में नहीं, अपने फैसले में खड़ी है।

यही इस कहानी का असली मोड़ है।

शादी खत्म नहीं हो रही। वह अपना रूप बदल रही है।

और हर बदलाव, अंत नहीं होता। वह एक नई शुरुआत की दस्तक होता है।

बस फर्क इतना है कि अब सात फेरे लेने से पहले, लोग सात सवाल पूछ रहे हैं।

 हंसी का भारत: ठहाकों में छिपी तहज़ीब, तंज में लिपटी सच्चाई

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

4 अप्रैल 2026

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हंसी कब सिर्फ हंसी रहती है?

कब वह एक हथियार बन जाती है, और कब मरहम?

भारत में यह फर्क समझना आसान नहीं। यहां ठहाका भी दर्शन है, मुस्कान भी राजनीति है, और चुटकुला कई बार अदालत से ज्यादा सटीक फैसला सुनाता है।

दो हजार साल से भी ज्यादा वक्त से हंसी इस देश की नसों में बह रही है। मंदिरों की कथाओं से लेकर चौपाल की गपशप तक, कविताओं से लेकर कटाक्ष तक, यह सिर्फ मनोरंजन नहीं रही। यह एक सांस्कृतिक औजार रही है। कभी समाज को आईना दिखाने के लिए, कभी दर्द को हल्का करने के लिए, और कभी सत्ता के कान खींचने के लिए।

भारत जितना विविध है, उसकी हंसी भी उतनी ही बहुरंगी है। भाषा बदलती है, लहजा बदलता है, पर व्यंग्य का तीर वही रहता है। कहीं यह सीधे सीने में उतरता है, कहीं धीरे से चुभता है। यही उसकी ताकत है। यही उसकी खूबसूरती।

उत्तर भारत की हंसी को देखिए। यहां शब्द तलवार हैं। फुर्तीली, चुटीली, और कई बार चुभती हुई। मुगल दरबारों की परंपरा ने इसे धार दी। अकबर और बीरबल की कहानियां आज भी गलियों में जिंदा हैं। एक किस्सा सुनिए। बादशाह ने कहा, राज्य के पांच सबसे बड़े मूर्ख ढूंढो। बीरबल ने आम लोगों में ही उन्हें खोज निकाला। एक आदमी जिसने अपनी दाढ़ी में तिनका बांध रखा था ताकि खोई हुई अंगूठी का दावा कर सके। हास्यास्पद? हां। पर साथ ही यह लालच और मूर्खता पर सटीक वार भी है।

यह शैली सीधी है। बात घुमा कर नहीं कहती। नौटंकी और लोकनाट्य में यही रंग और गहरा होता है। मंच पर हंसी, पर भीतर सवाल। सत्ता पर तंज, समाज पर चोट।

अब दक्षिण की ओर चलिए। यहां हंसी धीमी है, पर गहरी। यह तुरंत ठहाका नहीं मांगती। यह सोचने पर मजबूर करती है। तेनालीराम की कहानियां इसका बेहतरीन उदाहरण हैं। एक व्यापारी ने दावा किया कि वह किसी को भी मूर्ख बना सकता है। तेनाली ने एक फुसफुसाहट में पूरा खेल पलट दिया। व्यापारी खुद मजाक बन गया।

यहां व्यंग्य परतों में चलता है। ओट्टमथुल्लल जैसे लोकनृत्य, तमिल और तेलुगु कथाएं, सबमें यही खासियत दिखती है। हंसी यहां शोर नहीं करती। यह चुपचाप अंदर तक उतर जाती है।

फिर भी, यह विभाजन दीवार नहीं है। यह सिर्फ अलग-अलग रास्ते हैं, जो एक ही मंजिल की ओर जाते हैं। एक साझा समझ। एक साझा मुस्कान।

इस पूरे ताने-बाने की जड़ें और गहरी हैं। संस्कृत साहित्य ने हंसी को सिद्धांत दिया। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र ने ‘हास्य रस’ को परिभाषित किया। हल्की मुस्कान से लेकर ठहाके तक, हर रूप का स्थान तय किया गया। विदूषक का किरदार इसी का प्रतीक था। वह राजा के सामने सच कह सकता था, क्योंकि वह हंसा रहा था।

शूद्रक का ‘मृच्छकटिकम’ देखिए। प्रेम, गरीबी, चालाकी, और गलतफहमियों के बीच पैदा होती हंसी। यह सिर्फ मनोरंजन नहीं, समाज की विसंगतियों पर टिप्पणी भी है। लालच, वर्गभेद, और सत्ता के खेल, सब पर एक साथ वार।

समय के साथ यह परंपरा जनता के बीच उतर आई। भक्ति आंदोलन ने इसे और धार दी। कबीर ने दोहों में ऐसी चुभन भरी कि पाखंड हिल गया। महाराष्ट्र में पु. ल. देशपांडे ने रोजमर्रा की जिंदगी में हास्य खोजा। बंगाल में सुकुमार राय ने बेतुकी कविताओं से औपनिवेशिक सोच पर व्यंग्य किया।

हर दौर में कुछ चेहरे उभरे, जो हंसी के जरिए समाज से संवाद करते रहे। बीरबल ने राजाओं को आईना दिखाया। हरिशंकर परसाई ने नौकरशाही की परतें उधेड़ीं। वैकोम मुहम्मद बशीर ने गांव की साधारण जिंदगी में छिपी असाधारण विडंबनाओं को उजागर किया।

और फिर आया व्यंग्य का वह रूप, जिसने सीधी टक्कर ली। पंचतंत्र की कहानियों में जानवरों के जरिए इंसानों की पोल खोली गई। अंग्रेजों के दौर में ‘अवध पंच’ जैसे प्रकाशनों ने कलम को हथियार बनाया। कार्टून और कविताओं में साम्राज्य और उसके पिट्ठुओं की खबर ली गई।

आज यह परंपरा नए मंचों पर जिंदा है। स्टैंडअप कॉमेडी, सोशल मीडिया, मीम्स। फर्क सिर्फ इतना है कि मंच बदल गया है, इरादा नहीं। भ्रष्टाचार पर तंज आज भी उतना ही असरदार है, जितना कभी दरबार में था।

कार्टूनिंग इस विरासत का जीवंत उदाहरण है। R. K. Laxman का ‘कॉमन मैन’ कुछ नहीं कहता था, फिर भी सब कह जाता था। खामोश चेहरा, पर भीतर पूरा देश बोलता था। आज Satish Acharya जैसे कलाकार उसी परंपरा को डिजिटल युग में आगे बढ़ा रहे हैं। Rachita Taneja अपनी कॉमिक्स के जरिए जटिल मुद्दों को आसान बनाती हैं।

हंसी यहां अब भी लोकतंत्र का आईना है। यह चुभती है, पर तोड़ती नहीं। यह सवाल पूछती है, पर जवाब थोपती नहीं।

और शायद यही भारत की हंसी की असली पहचान है। यह जोड़ती है, तोड़ती नहीं। यह सिखाती है, बिना उपदेश दिए। यह चोट करती है, पर मरहम भी साथ लाती है।

ठहाका यहां सिर्फ आवाज नहीं है। यह एक विचार है। एक परंपरा है। एक प्रतिरोध है।

और जब अगली बार कोई चुटकुला सुनकर आप हंसें, तो जरा ठहरिए।

हो सकता है, वह सिर्फ मजाक न हो।

हो सकता है, वह सच बोल रहा हो।

Friday, April 3, 2026

 युद्ध के डरावने काले बादलों के पार एक चांदनी रेखा दिख रही है!

क्या पश्चिम एशिया की राख में भारत का सुनहरा बीज अंकुरित होगा: संकट में अवसर की कहानी

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

4 अप्रैल, 2026

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युद्ध सिर्फ शहर नहीं जलाता। वह नक्शे बदल देता है। ताकत की परिभाषा बदल देता है। और सबसे बढ़कर, वह खाली जगह छोड़ जाता है। यही खाली जगह इतिहास की सबसे बड़ी बोली होती है।

पश्चिम एशिया इस वक्त धधक रहा है। इमारतें मलबा हैं। सप्लाई चेन टूट चुकी है। लोग अपने ही घरों में बेघर हैं। लेकिन हर युद्ध की एक मियाद होती है। गोलियां थमती हैं। और फिर शुरू होती है असली जंग। पुनर्निर्माण की जंग। भरोसे की जंग। प्रभाव की जंग।

यहीं भारत की एंट्री होती है। चुपचाप। बिना शोर। बिना दुश्मनी।

नई दिल्ली ने एक संतुलित रास्ता चुना है: नीतिगत खामोश दूरी। सऊदी अरब से रिश्ते। यूएई से साझेदारी। कतर से संवाद। ईरान से जुड़ाव। इज़रायल से सहयोग। किसी से संबंधों का पुल नहीं जलाया। यही सबसे बड़ी पूंजी है। जब धुआं छंटेगा, तब वही देश बुलाया जाएगा जिसने आग में घी नहीं डाला।

सबसे बड़ा मौका पुनर्निर्माण का है। खाड़ी के शहर हों या ईरान के औद्योगिक इलाके, सबको फिर से खड़ा होना है। बंदरगाह चाहिए। एयरपोर्ट चाहिए। अस्पताल चाहिए। सड़कें और बिजली चाहिए। भारतीय कंपनियां पहले से वहां भरोसे का नाम हैं। अब वे तेजी से फैल सकती हैं।

भारतीय इंजीनियर, आर्किटेक्ट, प्रोजेक्ट मैनेजर, टेक्नीशियन। ये सिर्फ कामगार नहीं, चलते फिरते समाधान हैं। इनके साथ आएंगे डॉलर। रेमिटेंस बढ़ेगा। और भारत का चालू खाता सांस लेगा।

स्वास्थ्य क्षेत्र भी मौका है। सस्ती और भरोसेमंद जेनेरिक दवाएं। अस्पताल चेन। भारत इलाज दे सकता है, वह भी ऐसे दामों पर जिनसे पश्चिम और चीन दोनों असहज हो जाएं।

ऊर्जा सुरक्षा की कहानी भी यहीं बदलती है। होरमुज जलडमरूमध्य की नाजुकता ने दुनिया को जगा दिया है। तेल की कीमतें ऊपर नीचे होंगी। लेकिन युद्ध के बाद स्थिर सप्लाई की दौड़ शुरू होगी। भारत को यहीं सौदेबाजी करनी है। लंबी अवधि के अनुबंध। बेहतर शर्तें।

साथ ही यह मौका है अपने घर को ठीक करने का। गैर जरूरी ईंधन खपत पर लगाम। कड़े दक्षता मानक। सौर, पवन, जल और परमाणु ऊर्जा को तेज रफ्तार। युद्ध एक राजनीतिक ढाल भी देता है। कठिन फैसले लेना आसान हो जाता है। अगर यह मौका चूक गए तो फिर वही पुराना आयात जाल।

रक्षा क्षेत्र में भी हवा बदल रही है। कम लागत, ज्यादा संख्या वाले प्लेटफॉर्म इस युद्ध में कारगर साबित हुए हैं। यही भारत की ताकत है। ड्रोन, मिसाइल, सुरक्षित संचार, डिफेंस सॉफ्टवेयर। आत्मनिर्भर भारत का असली इम्तिहान अब है।

जरूरत है दिमाग में निवेश की। और ज्यादा वैज्ञानिक। और ज्यादा इंजीनियर। डीआरडीओ, निजी लैब, विश्वविद्यालय। अगर आज बीज बोया, तो कल भारत आयातक नहीं, निर्यातक बनेगा। नौकरियां आएंगी। तकनीक नागरिक क्षेत्र में भी उतरेगी।

भू-राजनीति का खेल भी पलट रहा है। चीन की चालें अब उतनी रहस्यमय नहीं रहीं। कर्ज के जाल और अपारदर्शी सौदों ने उसकी छवि को चोट पहुंचाई है। भारत यहां अलग दिखता है। बिना एजेंडा। बिना दबाव। भरोसेमंद साझेदार।

यही वह जगह है जहां भारत क्षेत्र का पसंदीदा विकास सहयोगी बन सकता है। भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा फिर से रफ्तार पकड़ सकता है। नियम आधारित विकल्प के तौर पर। धीरे धीरे, भारत केंद्र में आ सकता है।

देश के भीतर भी तस्वीर दिलचस्प है। चुनावी मौसम। आईपीएल का शोर। तपती गर्मी। रबी की फसल। आम आदमी की नजर अपने घर आंगन पर है। यह ध्यान भटकाव नहीं, अवसर है। सरकार बिना घबराहट के तैयारी कर सकती है।

यह युद्ध स्थायी संकट नहीं है। यह अस्थायी झटका है। जैसे ही बंदूकें शांत होंगी, पश्चिम एशिया की मांग फूट पड़ेगी। ऑर्डर आएंगे। निवेश आएगा। भारतीय कामगारों के लिए नए दरवाजे खुलेंगे।

अब सवाल है, क्या हम तैयार हैं।

सरकार को तुरंत खाका बनाना होगा। विदेश, वाणिज्य, ऊर्जा और रक्षा मंत्रालय एक साथ बैठें। एक टास्क फोर्स बने। कौशल मानचित्र तैयार हो। नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा मिले। रक्षा अनुसंधान को रफ्तार दी जाए।

तटस्थता कमजोरी नहीं है। यह धैर्य की रणनीति है। सही वक्त पर सही कदम।

पश्चिम एशिया के घाव भरने में साल लगेंगे। लेकिन मरहम वही लगाएगा जो भरोसेमंद हो। भारत के पास सस्ता कौशल है। भरोसे का इतिहास है। और तकनीक की बढ़ती ताकत है।

मौका दरवाजे पर है। सवाल सिर्फ इतना है। क्या हम उसे पहचानते हैं, या फिर इतिहास की तरह उसे गुजरते देखते रहेंगे।

Thursday, April 2, 2026

 डगमगाता दरबान: कागज़ी शेर बना नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल

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बृज खंडेलवाल द्वारा

3 अप्रैल, 2026

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हवा घुट रही है। नदियाँ सड़ रही हैं।कचरे के पहाड़ शहरों को निगल रहे हैं। और सवाल सीधा है; न्याय कहाँ है?

2010 में एक सपना बेचा गया था। नाम: नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल। कहा गया, अब पर्यावरण को अदालत में प्राथमिकता मिलेगी। तेज फैसले होंगे।विशेषज्ञ बैठेंगे। कागज़ नहीं, न्याय दौड़ेगा।

यह संस्था उम्मीद का चेहरा बनकर आई थी। लोगों ने सोचा, अब पेड़ों की भी सुनवाई होगी, नदियों को भी आवाज मिलेगी।

लेकिन आज तस्वीर उलटी है।

सोलह साल बाद NGT एक सबक बन चुका है: अच्छी नीयत, कमजोर व्यवस्था में कैसे दम तोड़ देती है।

सबसे बड़ी दरार इसकी आत्मा में है, स्वतंत्रता की कमी। जिस मंत्रालय पर इसे नजर रखनी है, वही इसे पैसा देता है, वही स्टाफ देता है। नियुक्तियाँ भी वहीं से।

नतीजा? निगरानी कम, नज़दीकी ज़्यादा। 2017 के बदलावों ने इसे और कमजोर किया। रीढ़ थी, अब झुक चुकी है।

दूसरी चोट: संसाधनों की कमी।

जज नहीं। विशेषज्ञ नहीं। बेंच बंद।

चेन्नई और कोलकाता जैसे शहर ठंडे पड़ गए। दूर बैठे लोग क्या करें?

दिल्ली आएँ। वक्त गंवाएँ। पैसा झोंकें।

न्याय अब भी दूर। नियम भी अजीब हैं। छह महीने में शिकायत करो, वरना दरवाज़ा बंद।

पर्यावरण का जख्म धीरे-धीरे दिखता है। जब तक दिखे, न्याय का समय निकल चुका होता है।

फैसलों की हालत भी अजीब है।

कभी बहुत सख्त। कभी बेहद नरम।कभी व्यक्ति-आधारित। कभी हद से आगे।

भरोसा टूटता है। मुआवजे का खेल और भी धुंधला है।

वैज्ञानिक आधार कमजोर। पैसा तय होता है, पर सही जगह नहीं पहुँचता।

पर्यावरण राहत कोष तक रकम कम ही जाती है। बीच में ही रास्ता बदल जाता है। प्रक्रिया भी कटघरे में है।

सुप्रीम कोर्ट तक कह चुका है: प्राकृतिक न्याय का पालन नहीं हो रहा। यहाँ फैसले अक्सर समितियों को सौंप दिए जाते हैं। रिपोर्टें आती हैं।पीड़ित गायब रहते हैं।

सबसे बड़ा सवाल: फैसलों को लागू कौन करेगा?

NGT आदेश देता है। सुर्खियाँ बनती हैं। तालियाँ बजती हैं। फाइल बंद।जमीन पर? कुछ नहीं बदलता।

दिल्ली वायु प्रदूषण संकट: निर्माण, वाहनों और पराली जलाने पर प्रतिबंध से PM2.5 में थोड़ी कमी आई, लेकिन दिवाली के बाद प्रदूषण फिर बढ़ जाता है। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से ही कुछ सुधार हुआ है।

गंगा नदी प्रदूषण: दशकों से प्रदूषण रोकने के नियम और कानपुर में चमड़ा कारखाने बंद करने के बावजूद विषैले पदार्थ और मल-जनित बैक्टीरिया नहीं रुके। नदी की हालत लगातार खराब हो रही है।

यमुना प्रदूषण और अतिक्रमण: नालों, कचरे और 'आर्ट ऑफ लिविंग' जैसे आयोजनों पर जुर्माने से भी यमुना साफ नहीं हो पाई। अदालती दबाव ही एकमात्र उम्मीद है।

देशभर में ठोस कचरा प्रबंधन की विफलता: बिहार और शहरी लैंडफिल में कचरा निपटान के नियमों के बावजूद कचरे का ढेर लगातार बढ़ रहा है।

जलवायु परिवर्तन याचिका (ऋधिमा पांडे, 2019) की खारिजी: एनजीटी ने बच्ची की याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि कानून पर्याप्त हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे पुनर्जीवित किया।

अवैध खनन और रेत निकासी: उत्तर प्रदेश और राजस्थान में प्रतिबंध के बाद भी नदियों का कटाव नहीं रुका। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद ही कुछ पालन हुआ।

औद्योगिक मामलों में प्रक्रियागत अतिक्रमण: ग्रासिम और सिंगरौली संयंत्र मामलों में एनजीटी के आदेशों को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया।

ग्रेट निकोबार परियोजना: एनजीटी ने वनों, मूंगों, जनजातियों के जोखिम के बावजूद रणनीतिक जरूरतों के नाम पर परियोजना को मंजूरी दे दी।

मुआवजा राशि का उपयोग न होना: प्रदूषण और खनन मामलों में अरबों रुपये की मुआवजा राशि राहत कोष में डाले बिना गलत तरीके से खर्च हो जाती है।

पदों के खाली होने से कामकाज ठप: एनजीटी में बेंचों के खाली होने और देरी के कारण वादियों को दिल्ली जाना पड़ता है, जिससे समयबद्ध मामले अटक जाते हैं। कुछ दिन राहत। फिर वही ज़हर।आख़िर में सुप्रीम कोर्ट की सख्ती ही काम करती है।

सच साफ है।

NGT सुर्खियाँ बनाने में माहिर है। पर अमल में कमजोर। यह अदालत फाइलों में तेज है, जमीन पर बेअसर।पर्यावरण की हालत बिगड़ती गई। हवा जहरीली। नदियाँ बीमार। कचरा बेलगाम। और असली पहरेदार कौन बना?

सुप्रीम कोर्ट।

NGT? एक कागज़ी शेर।

अब भी वक्त है। इसे आज़ाद करना होगा। सरकारी पकड़ से निकालना होगा। खाली पद भरने होंगे। फैसलों को लागू करने की ताकत देनी होगी।कानूनी दायरा बढ़ाना होगा।

वरना यह संस्था इतिहास में एक पंक्ति बनकर रह जाएगी; “इरादा नेक था, लेकिन हिम्मत आधी थी।”और तब तक; हम वही हवा सांस में भरते रहेंगे,

जिसमें सिर्फ धुआँ नहीं, न्याय भी घुट रहा है।

Wednesday, April 1, 2026

 मंदिरों में प्लास्टिक पर प्रहार… अब आस्था भी होगी ‘ग्रीन’!

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

2 अप्रैल 2026

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घंटी बजती है। भीड़ उमड़ती है। प्रसाद मिलता है। और पीछे छूट जाता है… प्लास्टिक का पहाड़।

क्या यही हमारी आस्था की पहचान है?

अब तस्वीर बदलने की कोशिश शुरू हो गई है।

Temple Connect ने Blueprint Water के साथ हाथ मिलाया है। मिशन साफ है; मंदिरों और तीर्थस्थलों से एकल-उपयोग प्लास्टिक बोतलों को धीरे-धीरे बाहर का रास्ता दिखाना।

आसान नहीं है। लेकिन जरूरी है।

भारत के मंदिर सिर्फ पूजा के स्थल नहीं, भीड़ के महासागर हैं। रोज़ लाखों लोग आते हैं। पानी पीते हैं। बोतल फेंकते हैं। और देखते ही देखते पवित्र परिसर कूड़ाघर में बदलने लगता है।

आस्था पवित्र… लेकिन आसपास गंदगी। यह विरोधाभास अब चुभने लगा है।

यहीं से इस पहल की शुरुआत होती है।

अब प्लास्टिक की जगह आएगी कागज आधारित, रिसाइकिल होने वाली पैकेजिंग। हल्की। सुविधाजनक। और सबसे बड़ी बात, धरती पर बोझ कम डालने वाली।

Blueprint Water का दावा है कि यह व्यवस्था मंदिरों की रोजमर्रा की जरूरतों से लेकर बड़े मेलों की भारी भीड़ तक आसानी से लागू हो सकती है। मतलब, न श्रद्धालु परेशान होंगे, न व्यवस्था चरमराएगी।

पर असली लड़ाई सिर्फ बोतल बदलने की नहीं है। आदत बदलने की है।

इसीलिए ‘इको-हीरो’ अभियान भी साथ चलाया जाएगा। संदेश सीधा है, अपनी बोतल साथ लाओ, जिम्मेदारी निभाओ।

सवाल उठता है, क्या श्रद्धालु सुनेंगे?

शायद हाँ। क्योंकि जब बात धर्म की हो, तो असर गहरा होता है।

गिरीश वासुदेव कुलकर्णी कहते हैं, धर्म सिर्फ पूजा नहीं सिखाता, जिम्मेदारी भी सिखाता है। और अगर मंदिर खुद उदाहरण बन जाएं, तो समाज को बदलने में देर नहीं लगती।

दूसरी तरफ, अनुज शाह इसे एक बड़े अवसर के रूप में देखते हैं। उनके शब्दों में, मंदिर देश के सबसे बड़े उपभोग केंद्र हैं। यहां छोटा बदलाव भी बड़ा असर पैदा कर सकता है।

बात में दम है।

अगर हर श्रद्धालु एक प्लास्टिक बोतल कम इस्तेमाल करे, तो सोचिए… हर दिन कितना कचरा कम होगा।

यह पहल धीरे-धीरे लागू होगी। पहले चुनिंदा मंदिर। फिर बड़े आयोजन। और फिर शायद पूरा देश।

लक्ष्य बड़ा है, धार्मिक स्थलों पर ‘ग्रीन वाटर’ को नया सामान्य बनाना।

आस्था अब सिर्फ सिर झुकाने तक सीमित नहीं रहेगी।

आस्था अब जिम्मेदारी भी निभाएगी।

और शायद पहली बार…

मंदिरों में पूजा के साथ-साथ प्रकृति भी मुस्कुराएगी।


Tuesday, March 31, 2026

 राक्षस और असुरों की लड़ाई से भारत दूर रहे।

कुछ युद्ध जरूरी होते हैं! दोनों पक्ष हल्के हों, तब ही शांति होगी!

इतिहास की एक अनिवार्य भिड़ंत

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

अप्रैल 1, 2026

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आसमान लाल है। सायरन चीख रहे हैं। मिसाइलें रात को चीरती हुई इतिहास पर अपने हस्ताक्षर कर रही हैं।

और इसी शोर के बीच एक असहज सवाल सिर उठाता है; क्या हर युद्ध सिर्फ त्रासदी होता है? या कुछ युद्ध इतिहास की अनिवार्य सफाई भी करते हैं?

पश्चिम एशिया सुलग रहा है। संयुक्त राज्य अमेरिका, इज़राइल और ईरान, तीनों आमने-सामने खड़े हैं। यह सिर्फ हथियारों की लड़ाई नहीं है। यह अहंकारों की भिड़ंत है। यह विचारधाराओं का टकराव है। यह उन कहानियों का युद्ध है, जिन्हें हर पक्ष सच मानता है और बदलना नहीं चाहता।

वॉशिंगटन और तेल अवीव इसे अस्तित्व की लड़ाई बताते हैं। उनके लिए तेहरान सिर्फ एक देश नहीं, एक खतरा है, परमाणु महत्वाकांक्षाओं से लैस, और पूरे क्षेत्र में फैले अपने नेटवर्क के साथ। हिज़्बुल्लाह, हमास, यमन के हूती; हर मोर्चे पर तनाव, हर दिन एक नई चिंगारी।

उनकी नजर में यह युद्ध कोई विकल्प नहीं, मजबूरी है।

लेकिन तेहरान की कहानी अलग है।

वह खुद को घिरा हुआ देखता है। प्रतिबंधों से जकड़ा हुआ। सौदे टूटते हुए। वैज्ञानिक मारे जाते हुए। उसके लिए यह प्रतिरोध है; अपनी संप्रभुता, अपनी पहचान, अपने अस्तित्व की रक्षा।

दोनों कहानियाँ आधी सच हैं।

और आधी झूठ।

अमेरिका लोकतंत्र की बात करता है, लेकिन इतिहास उसके हस्तक्षेपों से भरा पड़ा है। इज़राइल अपने अस्तित्व का तर्क देता है, लेकिन उस पर अंतरराष्ट्रीय नियमों को तोड़ने के आरोप भी कम नहीं।

ईरान अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाता है, लेकिन अपने ही लोगों की आवाज दबाने में पीछे नहीं रहता। धर्म के नाम पर सत्ता का खेल: पुराना, पर अब भी असरदार।

तीनों चेहरे अलग हैं।

लेकिन आईना एक ही है।

और अब वह आईना दरक रहा है।

“रूल्स-बेस्ड ऑर्डर” की बातें खोखली लगने लगी हैं। नियम अब किताबों में नहीं, ताकत के तराजू पर तय हो रहे हैं। दूसरी तरफ, इस्लामी एकता का मिथक भी बिखर चुका है।

सऊदी अरब चुप है।

तुर्की अपने हिसाब से चाल चल रहा है।

पाकिस्तान संतुलन साध रहा है।

“उम्मा” का नारा हकीकत की दीवार से टकराकर लौट आया है।

हर देश अपने लिए खेल रहा है।

बाकी दुनिया?

वह देख रही है।

भारत अपने हित साध रहा है। बेवजह विपक्ष के महाज्ञानी भारत को युद्ध में धकेलना चाहते हैं, मोदी सरकार की किरकिरी करने को। लेकिन भारत की भलाई चुप्पी साधने में ही है। गली के गुंडे भिड़ रहे हों, तो समझदार लोग किनारा कर लेने में ही भलाई समझते हैं।

चीन मौके तलाश रहा है।

यूरोप बयान दे रहा है: संतुलित, सधे हुए, और लगभग बेअसर।

कोई इस आग में कूदना नहीं चाहता।

कोई इस युद्ध का मालिक बनना नहीं चाहता।

और शायद यहीं सबसे कड़वी सच्चाई छिपी है।

कुछ युद्ध बीच में रुकते नहीं।

उन्हें थकना पड़ता है।

उन्हें खुद को खत्म करना पड़ता है।

सीज़फायर अच्छे लगते हैं, लेकिन कई बार वे सिर्फ सांस लेने का मौका देते हैं, समाधान नहीं। जब जिद, विचारधारा और बदले की आग बहुत गहरी हो जाए, तो बातचीत भी सतही लगने लगती है।

तब बचता क्या है?

एक कठोर विकल्प: इंतज़ार।

यह कोई जश्न का आह्वान नहीं है।

यह यथार्थ की स्वीकारोक्ति है।

इतिहास बताता है; कई बार शांति समझौतों से नहीं, थकान से जन्म लेती है। जब गोलियां इसलिए रुकती हैं क्योंकि चलाने की ताकत नहीं बचती। जब अहंकार इसलिए झुकते हैं क्योंकि उन्हें उठाने वाला ढांचा टूट चुका होता है।

लेकिन इसकी कीमत बहुत भारी होती है।

आम लोग। उजड़े शहर। टूटी अर्थव्यवस्थाएँ। जली हुई धरती।

यह आग साफ-सुथरी नहीं होती।

यह सब कुछ जलाती है।

फिर भी, हर युद्ध एक आईना होता है।

वह दिखाता है कि ताकत की सीमा क्या है।

वह खोलता है कि नैतिकता कितनी लचीली होती है।

वह याद दिलाता है कि सबसे ऊँची आवाजें भी अंततः खामोश हो जाती हैं।

और जब धुआं छंटेगा: कभी न कभी, तो सिर्फ नक्शे नहीं बदलेंगे।

सच भी बदलेंगे।

शायद तब दुनिया थोड़ा समझदार होगी।

शायद तब शांति थोड़ी सच्ची होगी।

क्योंकि कभी-कभी, इंसान सीखता नहीं; उसे सिखाया जाता 

Monday, March 30, 2026

 भारत में मरम्मत संस्कृति की मौत और ई-वेस्ट का पहाड़: क्या हम खुद को जहर दे रहे हैं?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

31 मार्च 2026

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क्या हमने सच में मरम्मत संस्कृति,  "ठीक करो" को भुला दिया है? या "फेंको और नया लाओ" को ही आधुनिक जीवन का मंत्र मान लिया है?

भारत के घरों में इलेक्ट्रॉनिक सामान की बाढ़ आ गई है, स्मार्टफोन, लैपटॉप, स्मार्ट टीवी, वॉशिंग मशीन, फ्रिज और एसी। लेकिन साथ ही एक खतरनाक चीज भी तेजी से बढ़ रही है, ई-वेस्ट,  (इलेक्ट्रॉनिक कचरा)। यह जहरीला कचरा है, जिसमें सीसा, पारा, कैडमियम जैसे भारी धातु और जहरीले रसायन होते हैं, जो मिट्टी, पानी और हवा को जहर देते हैं।

ताजा आंकड़ों के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2025-26 में भारत ने 14.14 लाख मीट्रिक टन (लगभग 1.41 मिलियन टन) ई-वेस्ट उत्पन्न किया है। इसमें से मात्र 9.79 लाख मीट्रिक टन का ही औपचारिक रिसाइक्लिंग हुआ है। यानी बड़ा हिस्सा अनियंत्रित तरीके से अनौपचारिक क्षेत्र में जा रहा है या खुले में फेंका जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में ई-वेस्ट की मात्रा लगातार बढ़ रही है—2023-24 में 12.54 लाख टन, 2024-25 में 13.97 लाख टन, और अब 14.14 लाख टन। यह संख्या चिंताजनक है, क्योंकि वैश्विक स्तर पर भी ई-वेस्ट 2022 में 62 मिलियन टन पहुंच चुका था और 2030 तक 82 मिलियन टन होने का अनुमान है। भारत दुनिया के सबसे बड़े ई-वेस्ट उत्पादकों में शुमार है।

एक हालिया अध्ययन और रिपोर्ट्स इस दुखद बदलाव को उजागर करती हैं। भारत की पुरानी मरम्मत संस्कृति तेजी से खत्म हो रही है। पहले हम जुगाड़ और रिपेयर से चीजों को सालों चलाते थे, लेकिन अब "रिप्लेसमेंट कल्चर" हावी है। दिल्ली और हैदराबाद जैसे महानगरों में हर वर्ग के लोग पुराने सामान को ठीक करने की बजाय नया खरीद रहे हैं। नागपुर में अमीर वर्ग अपग्रेड करता है, जबकि मध्यम वर्ग अभी भी मरम्मत पर निर्भर है। कोलकाता में पुरानी रिपेयर संस्कृति कुछ हद तक बची हुई है, और रांची जैसे छोटे शहरों में सादगी, बचत और टिकाऊपन की सोच अभी मजबूत है। लेकिन कुल मिलाकर, शहरों में रिपेयर की जगह नया खरीदना प्रमुख ट्रेंड बन गया है।

इसके पीछे कई कड़वे कारण हैं। मरम्मत अब महंगी पड़ती है। असली स्पेयर पार्ट्स मिलना मुश्किल है, क्योंकि कंपनियां उन्हें सीमित रखती हैं या महंगे बेचती हैं। कुशल तकनीशियन कम हो गए हैं, और उनके पास आधुनिक डायग्नोस्टिक टूल्स की कमी है। अनधिकृत रिपेयर सेंटरों पर भरोसा नहीं रहा; वारंटी नहीं, गुणवत्ता का डर, और कीमत अक्सर नए प्रोडक्ट के बराबर। नतीजा? ग्राहक मजबूरन नया खरीद लेता है।

यह सिर्फ व्यक्तिगत फैसला नहीं, बल्कि एक बड़ा सामाजिक और आर्थिक बदलाव है। पर्यावरण की चिंता अभी भी उपभोक्ताओं के फैसलों में बहुत कम भूमिका निभाती है। अमीर के लिए सुविधा और स्टेटस महत्वपूर्ण है, गरीब के लिए मजबूरी मरम्मत करवाती है। लेकिन इस चक्र से ई-वेस्ट का ढेर लगता जा रहा है। यह संसाधनों की बर्बादी है, कीमती धातुएं, दुर्लभ अर्थ मिनरल्स बर्बाद हो रहे हैं। कार्बन उत्सर्जन बढ़ रहा है, और अर्थव्यवस्था क्षणिक उपभोग पर टिकी है, जो टिकाऊ नहीं।

फिर भी उम्मीद है। सरकार और विशेषज्ञ एक स्पष्ट रोडमैप सुझा रहे हैं। राइट टू रिपेयर,  को मजबूत कानून बनाना जरूरी है। 2025 में सरकार ने मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए रिपेयरेबिलिटी इंडेक्स को मंजूरी दी है, और राइट टू रिपेयर पोर्टल शुरू किया गया है। कंपनियों को मजबूर किया जाए कि वे रिपेयर मैनुअल, असली स्पेयर पार्ट्स और डायग्नोस्टिक टूल्स उपलब्ध कराएं। मरम्मत सेक्टर के लिए सर्टिफिकेशन, मानक और ट्रेनिंग प्रोग्राम चलाए जाएं। स्पेयर पार्ट्स की सप्लाई चेन मजबूत हो। तकनीशियनों को स्किल्ड बनाया जाए।

सरकार की भूमिका सबसे अहम है। ई-वेस्ट (मैनेजमेंट) रूल्स 2022 लागू हैं, लेकिन इन्हें सख्ती से लागू करना होगा। अगर मरम्मत को नीति का हिस्सा नहीं बनाया गया, तो ई-वेस्ट का संकट और गहराएगा।

आखिरी सवाल आपके लिए है: क्या हम हर खराब चीज को कचरे में बदलते रहेंगे? या उसे ठीक करके नया जीवन देंगे?

भारत कभी जुगाड़ और मरम्मत की दुनिया में मशहूर था, सस्ता, टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल। वक्त है उस संस्कृति को फिर से जिंदा करने का। वरना ई-वेस्ट के पहाड़ हमारे विकास की कड़वी सच्चाई बन जाएंगे