Sunday, August 2, 2026

 दिल्ली-हरियाणा की गंदगी का बोझ, भुगत रहे आगरा और ब्रज मंडल

यमुना कब तक राजधानी और उसके पड़ोसी राज्यों का सीवर बनी रहेगी?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

3 अगस्त 2026

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नदियाँ कभी सरहदें नहीं मानतीं। वे जीवन, संस्कृति और सभ्यता को एक जगह से दूसरी जगह ले जाती हैं। लेकिन जब कोई शहर या राज्य अपनी गंदगी नदी में उड़ेल देता है, तो वह ज़हर भी सीमाएँ नहीं मानता। वह भी बहते-बहते दूर तक पहुँचता है। आज यमुना इसी राष्ट्रीय शर्म की सबसे बड़ी मिसाल बन गई है।

हाल ही में तमिलनाडु ने कर्नाटक पर आरोप लगाया कि बेंगलुरु का सीवर मिला पानी लगातार दक्षिण पिनाकिनी (थेनपेन्नई) नदी में छोड़ा जा रहा है। जल परीक्षण में भारी जैविक प्रदूषण, अमोनिया, फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया और रासायनिक कचरे की पुष्टि हुई। तमिलनाडु ने न केवल सख़्त एतराज़ जताया, बल्कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) से तत्काल दख़ल देने की मांग भी की।

सवाल है, जब दक्षिण भारत की एक नदी के लिए इतना शोर उठ सकता है, तो यमुना के लिए यह ख़ामोशी क्यों?

यमुना दिल्ली पहुँचने से पहले ही हरियाणा में बीमार हो चुकी होती है। हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आँकड़े बताते हैं कि राज्य के 11 बड़े नाले लगातार गंदगी यमुना में उँडेल रहे हैं। इनमें पानीपत-सोनीपत का ड्रेन नंबर-6, फरीदाबाद का बुढ़िया नाला, बल्लभगढ़-पालवल का गौंछी ड्रेन और गुरुग्राम के कई बड़े ड्रेन शामिल हैं।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि हरियाणा से यमुना में पहुँचने वाले प्रदूषण का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा अकेला गुरुग्राम छोड़ता है। पानीपत और सोनीपत में हर दिन लगभग 42 मिलियन लीटर अनुपचारित सीवेज नदी में जा रहा है। फरीदाबाद की अवैध डाइंग इकाइयाँ रासायनिक और रंगीन कचरा खुलेआम बुढ़िया नाले में छोड़ती हैं। बल्लभगढ़ और पलवल से भी बिना शोधन का सीवेज सीधे यमुना में गिरता है।

दिल्ली पहुँचते-पहुँचते हालात और बदतर हो जाते हैं। वज़ीराबाद से ओखला तक केवल 22 किलोमीटर का हिस्सा यमुना के लिए सबसे बड़ा अभिशाप बन चुका है। नजफ़गढ़ नाला समेत कई बड़े नाले रोज़ करोड़ों लीटर सीवेज और औद्योगिक कचरा नदी में गिराते हैं। दिल्ली जल बोर्ड के ताज़ा अनुमान बताते हैं कि इन नालों का प्रवाह पहले के आकलन से कहीं अधिक है। नतीजा यह है कि कई स्थानों पर पानी में घुली ऑक्सीजन शून्य हो जाती है और फीकल कोलीफॉर्म सुरक्षित सीमा से सैकड़ों गुना ऊपर पहुँच जाता है। यहाँ यमुना नदी नहीं, एक बदहाल नाला दिखाई देती है।

सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि दिल्ली और हरियाणा की यह साझा गंदगी नीचे आगरा, मथुरा, वृंदावन और पूरे ब्रज मंडल के हिस्से आती है। ऊपर वालों की लापरवाही, नीचे रहने वालों की सज़ा बन जाती है।

आगरा केवल एक शहर नहीं, ताजमहल का नगर है। यह विश्व धरोहर और भारत की पहचान है। लेकिन ताजमहल के सामने बहने वाली यमुना अब जीवन नहीं, बीमारियाँ लेकर आती है। ज़हरीला पानी भूजल को दूषित कर रहा है। जलीय जीव समाप्त हो रहे हैं। नदी का प्राकृतिक प्रवाह दम तोड़ रहा है। एक मृतप्राय नदी के किनारे दुनिया की सबसे खूबसूरत इमारत भी उदास दिखाई देती है।

इस पूरे संकट में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की भूमिका भी कठघरे में है। उनका काम केवल पानी की जाँच करना नहीं, बल्कि प्रदूषण रोकना भी है। यदि दशकों से यमुना की यही हालत है, तो सवाल उठना लाज़िमी है कि प्रभावी कार्रवाई अब तक क्यों नहीं हुई? क्या रिपोर्टें केवल फाइलों की ज़ीनत बढ़ाने के लिए बनती हैं? क्या कानून सिर्फ़ छोटे लोगों पर लागू होते हैं? बड़े शहरों, उद्योगों और सरकारी एजेंसियों पर नहीं?

हरियाणा सरकार ने 2027 तक बिना शोधन के पानी को पूरी तरह रोकने और नालों के बीओडी स्तर को 10 मिलीग्राम प्रति लीटर से नीचे लाने का लक्ष्य रखा है। नए एसटीपी, सीईटीपी और ड्रेन टैपिंग की योजनाएँ भी बनाई गई हैं। दिल्ली सरकार भी सीवेज शोधन क्षमता बढ़ाने के दावे कर रही है।

लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और ही कहानी कहती है। पानीपत, फरीदाबाद, गुरुग्राम, बल्लभगढ़ और पलवल से प्रदूषण आज भी लगातार यमुना में पहुँच रहा है। अवैध इकाइयाँ फिर से चालू हो जाती हैं और नालों में सीधा डिस्चार्ज रुकने का नाम नहीं लेता।

यमुना किसी एक राज्य की जागीर नहीं है। यह करोड़ों लोगों की जीवनरेखा है। संविधान हर नागरिक को स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार देता है। फिर आगरा और ब्रज के लोगों को प्रदूषित पानी क्यों मिले? ब्रज की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को इस लापरवाही की क़ीमत क्यों चुकानी पड़े?

अब वक़्त आ गया है कि दिल्ली और हरियाणा दोनों सरकारें अपनी साझा ज़िम्मेदारी स्वीकार करें। राजधानी और उसके औद्योगिक शहरों का विकास तभी मायने रखेगा, जब उसकी गंदगी दूसरे राज्यों की तक़दीर न बने। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य बोर्डों को भी अपनी निष्क्रियता छोड़नी होगी। केवल नोटिस जारी करना या नए लक्ष्य घोषित करना काफ़ी नहीं है। दोषी एजेंसियों और उद्योगों पर सख़्त कार्रवाई होनी चाहिए। यह सुनिश्चित किया जाए कि बिना शोधन का एक भी लीटर सीवेज या औद्योगिक कचरा यमुना में न गिरे।

यमुना सिर्फ़ पानी की धारा नहीं, हमारी सभ्यता की धड़कन है। यदि हम इसे बचाने में नाकाम रहे, तो इतिहास यह नहीं पूछेगा कि कितनी योजनाएँ बनीं या कितने वादे किए गए। वह सिर्फ़ इतना लिखेगा कि एक राष्ट्र अपनी सबसे पवित्र नदियों में से एक को दिल्ली, फरीदाबाद, पानीपत, गुरुग्राम, बल्लभगढ़ और पलवल के सीवर में बदलने से नहीं बचा सका। यही हमारी सबसे बड़ी पर्यावरणीय और नैतिक नाकामी होगी।

Saturday, August 1, 2026

 


ताज ट्रेपेज़ियम ज़ोन में उद्योगों को अनुमति देने में जल्दबाज़ी न हो।

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

2 अगस्त 2026

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क्या हम ताजमहल को बचा रहे हैं, या धीरे-धीरे उसे धूल, धुंध और धुएँ में दफ़न कर रहे हैं?

आगरा की हवा साल के अधिकांश दिनों में ज़हरीली बनी रहती है। हर दिन उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम जाने वाले हज़ारों ट्रक, डंपर, बसें और भारी वाहन इस शहर की साँसों पर नया बोझ डालते हैं। यमुना और उसकी सहायक नदियाँ सूख रही हैं, तालाब और झीलें ग़ायब हो चुके हैं, पेड़ों की हरियाली सिमटती जा रही है और सड़कों पर बेकाबू ट्रैफिक दम घोंट रहा है। ऐसे नाज़ुक हालात में ताज ट्रेपेज़ियम ज़ोन में नए उद्योगों को अनुमति देने से पहले उसके हर फ़ायदे और हर संभावित नुक़सान का बेहद गहराई और वैज्ञानिक नज़रिए से आकलन करना ज़रूरी है। कहीं ऐसा न हो कि आज का छोटा-सा फ़ैसला आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बड़ी पर्यावरणीय त्रासदी बन जाए।

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ताज महल के आसपास के संरक्षित क्षेत्र TTZ (लगभग 10,400 वर्ग किमी, जिसमें आगरा और आसपास के जिले शामिल हैं) में 1990 के दशक की शुरुआत से वाहनों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। 1990 के आसपास या 1990 के दशक के मध्य-अंत में आगरा क्षेत्र में लगभग 1.9–2.1 लाख वाहन थे। 2026 के मध्य तक आगरा जिले में निजी वाहनों की संख्या लगभग 8.5 लाख पहुँच गई है (एक आधिकारिक रिपोर्ट में आगरा आरटीओ का कुल आँकड़ा करीब 16.9 लाख बताया गया है)। यह लगभग 35 वर्षों में 4 से 8 गुना या उससे भी अधिक की वृद्धि है।

स्थानीय वाहनों की यह वृद्धि पारगमन यातायात से और बढ़ जाती है। आगरा यमुना एक्सप्रेसवे (रोज़ाना 50,000 से अधिक वाहन) और आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे (2020 से 2025 के बीच दैनिक यातायात लगभग दोगुना) जैसे प्रमुख मार्गों पर स्थित है। राष्ट्रीय राजमार्गों और एक्सप्रेसवे कनेक्शनों से भी हज़ारों ट्रक, पर्यटक बसें और कारें गुज़रती रहती हैं। स्थानीय वाहनों और बढ़ते पारगमन/पर्यटक यातायात से ज़ोन के अंदर वाहन-किलोमीटर लगातार बढ़ रहे हैं। वाहनों की इतनी बड़ी वृद्धि ने कई उपलब्धियों को बेअसर कर दिया है, जिससे प्रदूषण स्तर सुरक्षित सीमा तक  नहीं आ पा रहा। अध्ययन और आधिकारिक आकलन बार-बार वाहनों (स्थानीय + पारगमन) को ताजमहल और पूरे TTZ के लिए हवा की गुणवत्ता की समस्या का प्रमुख कारण बताते हैं। “वाहन विस्फोट” अभी भी प्रदूषण की चुनौती को बनाए रखे हुए है।

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में 2024 में लगाए गए पूर्ण प्रतिबंध में कुछ राहत देते हुए ताज ट्रेपेज़ियम ज़ोन (TTZ) में लगभग 400 लंबित गैर-प्रदूषणकारी सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों (एमएसएमई) के आवेदनों पर विचार करने की इजाज़त दी है। लेकिन इसे उद्योगों के लिए खुला निमंत्रण नहीं समझना चाहिए। अदालत ने रोज़गार और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है। हर आवेदन को नीरी (NEERI) और केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (CEC) के विशेषज्ञों की सर्वसम्मति से मंज़ूरी लेनी होगी। किसी विवाद की स्थिति में अंतिम फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट करेगा। इसके बावजूद भविष्य में किसी भी तरह की और ढील बेहद एहतियात के साथ ही दी जानी चाहिए। इस पूरे क्षेत्र की हवा अब भी चिंताजनक है और पर्यावरण पर मंडरा रहे खतरे अभी टले नहीं हैं।

साल 1996 में सुप्रीम कोर्ट ने कोयला और कोक से चलने वाले सैकड़ों उद्योगों, खासकर फाउंड्रियों, को प्राकृतिक गैस अपनाने या बंद करने का आदेश दिया था। उस समय सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) का स्तर 17 से 22 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था और हवा में धूल-कण (SPM) 400 से 750 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुँच जाते थे। यही प्रदूषण ताजमहल के संगमरमर को पीला कर रहा था और अम्लीय वर्षा का कारण बन रहा था।

अदालत के उस फैसले से बड़ा फ़ायदा हुआ। सल्फर डाइऑक्साइड का स्तर घटकर 4 से 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रह गया। नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO₂) में भी कमी आई। इससे ताजमहल को सबसे ज़्यादा नुकसान पहुँचाने वाली जहरीली गैसों से काफी हद तक राहत मिली।

लेकिन पूरी तस्वीर अभी भी तसल्लीबख्श नहीं है। हवा में मौजूद बारीक धूल-कण अब भी बेहद ज़्यादा हैं। पीएम-10 (PM₁₀) का स्तर कई स्थानों पर 120 से 180 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर या उससे भी अधिक दर्ज किया जाता है, जबकि संवेदनशील क्षेत्रों के लिए तय सीमा केवल 60 है। पीएम-2.5 (PM₂.₅) का वार्षिक औसत भी अक्सर 80 से 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर या उससे अधिक रहता है। सर्दियों में यह और खतरनाक हो जाता है। मानसून में वायु गुणवत्ता कभी-कभी सामान्य रहती है, लेकिन सर्दियों में अक्सर "खराब", "बहुत खराब" या "गंभीर" श्रेणी में पहुँच जाती है। यही बारीक धूल ताजमहल पर जमती है और लोगों की सेहत पर भी बुरा असर डालती है। पिछले तीस वर्षों में सुधार तो हुआ है, लेकिन मंज़िल अभी दूर है।

इस लगातार बने हुए प्रदूषण का कारण केवल उद्योग नहीं हैं। इसके पीछे कई गहरे पर्यावरणीय संकट भी हैं। यमुना नदी लगभग सूख चुकी है और उसका पानी बुरी तरह प्रदूषित है। नदी अब वह नमी और ठंडक नहीं दे पाती, जो कभी ताजमहल के आसपास का प्राकृतिक वातावरण बनाए रखती थी। आसपास की ज़मीन तेज़ी से बंजर होती जा रही है। मिट्टी का कटाव बढ़ रहा है और हरियाली लगातार घट रही है। ज़िले के कुछ हिस्सों में हरित क्षेत्र केवल लगभग 7 प्रतिशत रह गया है। पेड़-पौधे कम होने से धूल को रोकने की प्राकृतिक क्षमता घट गई है। सड़कों की धूल, निर्माण कार्य, छोटे उद्योग, वाहनों का धुआँ और दूसरे राज्यों में पराली व बायोमास जलाने का धुआँ भी इस संकट को और बढ़ा रहा है।

ऐसी हालत में पूरे टीटीज़ेड को उद्योगों के लिए और खोलना, चाहे वे "गैर-प्रदूषणकारी" ही क्यों न हों, ख़तरे से खाली नहीं है। अभी तक इस क्षेत्र की पर्यावरणीय वहन क्षमता (Carrying Capacity) का पूरा अध्ययन भी नहीं हुआ है और लंबे समय से लंबित विज़न डॉक्यूमेंट भी तैयार नहीं हो पाया है। एक बार उद्योग लग जाने के बाद ईंधन और उत्सर्जन के नियमों का सख़्ती से पालन कराना हमेशा आसान नहीं रहा है। नए उद्योगों से यातायात, निर्माण और ऊर्जा की माँग बढ़ेगी, जिससे अब तक मिले पर्यावरणीय लाभ कमज़ोर पड़ सकते हैं।

इसलिए आगे बढ़ने का रास्ता बेहद सोच-समझकर तय करना होगा। केवल उन्हीं व्हाइट और ग्रीन श्रेणी के एमएसएमई को अनुमति मिले, जो बिजली या प्राकृतिक गैस का उपयोग करें और जिनकी हर आवेदन पर विशेषज्ञों द्वारा अलग-अलग गहराई से जाँच हो। पूरी प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए।

इसके साथ-साथ यमुना में पर्याप्त स्वच्छ जल प्रवाह बहाल करना, बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण करना, मिट्टी संरक्षण के उपाय अपनाना, सड़कों की धूल और वाहनों से होने वाले प्रदूषण पर सख़्त नियंत्रण रखना तथा वायु गुणवत्ता की लगातार निगरानी कर उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक करना भी उतना ही ज़रूरी है। जब तक हवा में धूल-कणों का स्तर लगातार और स्पष्ट रूप से कम न हो जाए तथा क्षेत्र की पर्यावरणीय क्षमता मज़बूत न हो जाए, तब तक उद्योगों के लिए और छूट देने पर विचार नहीं किया जाना चाहिए।

ताजमहल केवल एक इमारत नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के पर्यावरण की सेहत का आईना है। 1996 में सुप्रीम कोर्ट ने साबित किया था कि सख़्त नियमों से प्रदूषण पर काबू पाया जा सकता है। 

Friday, July 31, 2026

 बारह साल बाद भी अधूरी तस्वीर!

क्या यही है 'नया भारत' का सपना, या सिर्फ़ नारों का शोर?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

31 जुलाई 2026

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क्या सिर्फ़ चमचमाती सड़कें, ऊँची इमारतें और डिजिटल ऐप्स ही किसी देश की तरक्की का पैमाना हैं? अगर चुनाव पैसे के दम पर लड़े जाएँ, अदालतों में इंसाफ़ वर्षों तक अटका रहे, सरकारी स्कूल कमज़ोर होते जाएँ, पुलिस पर भरोसा घटता जाए और इलाज जेब खाली कर दे, तो क्या सचमुच हम "नए भारत" की मंज़िल पर पहुँच गए हैं?

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार को सत्ता में आए अब बारह साल हो चुके हैं। इस दौरान बड़े-बड़े वादे हुए, कई उपलब्धियाँ भी मिलीं। सड़कों, डिजिटल सेवाओं, आधारभूत ढाँचे और कल्याणकारी योजनाओं में उल्लेखनीय प्रगति हुई। लेकिन देश के बुनियादी संस्थानों की हालत पर नज़र डालें तो तस्वीर उतनी रोशन नहीं दिखती। कई पुराने मसले आज भी जस के तस हैं, बल्कि कुछ और पेचीदा हो गए हैं। इनका असर सीधे करोड़ों आम नागरिकों की ज़िंदगी पर पड़ता है।

सबसे बड़ा अधूरा काम चुनाव सुधार है। वर्षों से अदालतें, चुनाव विशेषज्ञ और कई समितियाँ राजनीतिक व्यवस्था में सुधार की सिफारिश करती रही हैं। फिर भी राजनीति में धनबल और बाहुबल का दबदबा कम नहीं हुआ।

2024 के लोकसभा चुनाव में चुने गए लगभग 46 प्रतिशत सांसदों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज थे। इनमें से करीब एक-तिहाई मामलों में हत्या, बलात्कार और अपहरण जैसे गंभीर आरोप शामिल थे। औसतन हर सांसद की घोषित संपत्ति लगभग 38 करोड़ रुपये रही। चुनावी खर्च का अनुमान करीब एक लाख करोड़ रुपये लगाया गया। वहीं एजेंसियों ने 8,800 करोड़ रुपये से अधिक नकदी और अन्य प्रलोभन जब्त किए। यह तस्वीर लोकतंत्र के लिए कई सवाल खड़े करती है।

2017 में शुरू की गई इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को पारदर्शिता बढ़ाने का उपाय बताया गया था। लेकिन 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने इसे असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया। तब तक लगभग दो अरब डॉलर के बराबर चंदा इस व्यवस्था से गुजर चुका था, जिसका बड़ा हिस्सा सत्तारूढ़ दल को मिला। आज भी चुनावों के लिए सरकारी फंडिंग नहीं है, राजनीतिक दलों के खर्च पर प्रभावी सीमा नहीं है और कमजोर जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने जैसी व्यवस्था मौजूद नहीं है। वोटर सूची से नाम हटाने के आरोप भी बार-बार सामने आते हैं। कुल मिलाकर चुनाव जीतना,  ईमानदारी से अधिक अहम  है।

शिक्षा के क्षेत्र में भी देश दो हिस्सों में बँटता जा रहा है। एक ओर महँगे निजी स्कूल हैं, दूसरी ओर लगातार कमजोर होते सरकारी विद्यालय। पिछले दस वर्षों में लगभग 90 हजार सरकारी स्कूल बंद हुए, यानी औसतन हर दिन करीब 25 स्कूल। उधर निजी स्कूलों की संख्या लगातार बढ़ती रही।

आज सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आते हैं। यानी कमज़ोर शिक्षा व्यवस्था का सबसे बड़ा बोझ उन्हीं पर पड़ रहा है जिनके पास विकल्प सबसे कम हैं।

देश में शिक्षा के कई अलग-अलग ढाँचे हैं; सीबीएसई, राज्य बोर्ड, अंतरराष्ट्रीय पाठ्यक्रम, मदरसे और पंचायत स्कूल। लेकिन सबके लिए एक समान गुणवत्ता मानक नहीं है। भाषा नीति पर विवाद जारी है। स्वतंत्र सर्वेक्षण बताते हैं कि बड़ी संख्या में बच्चे बुनियादी पढ़ाई और गणित में भी अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँच पा रहे हैं। नई शिक्षा नीति ने बड़े बदलावों का वादा किया था, लेकिन अमीर और गरीब की शिक्षा के बीच की खाई और चौड़ी हो गई है।

भ्रष्टाचार खत्म नहीं हुआ, बल्कि उसका अंदाज़ बदल गया है। रोजमर्रा के सरकारी कामों में रिश्वत की शिकायतें अब भी आम हैं। अक्सर आरोप लगते हैं कि कंपनियाँ राजनीतिक दलों को चंदा देती हैं और बाद में सरकारी ठेके हासिल कर लेती हैं। कुछ उद्योगों, खासकर खनन और दवा क्षेत्र में, नियामक संस्थाओं की निष्पक्षता पर भी सवाल उठते रहे हैं।

राजनीतिक गलियारों में "वॉशिंग मशीन" शब्द भी खूब चर्चा में रहा। विपक्ष के जिन नेताओं पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप थे, वे सत्ता पक्ष में शामिल होते ही कानूनी दबाव से राहत पाते दिखाई दिए। उच्च स्तर के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए बना लोकपाल भी अब तक अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ पाया है।

न्यायपालिका की हालत भी चिंताजनक है। देशभर की अदालतों में 5.6 करोड़ से अधिक मुकदमे लंबित हैं। इनमें से लगभग पाँच करोड़ मामले जिला अदालतों में हैं। कई उच्च न्यायालयों में दस-दस वर्षों से मुकदमे लंबित पड़े हैं। बड़ी संख्या में न्यायाधीशों के पद खाली हैं। आम नागरिक इंसाफ़ के इंतज़ार में बूढ़ा हो जाता है, जबकि प्रभावशाली लोग लंबी कानूनी प्रक्रिया का बोझ आसानी से झेल लेते हैं।

पुलिस व्यवस्था भी आज़ादी के डेढ़ सौ साल पुराने ढाँचे पर टिकी हुई है। अधिकांश राज्यों में अब भी 1861 के पुलिस कानून की सोच हावी है। पुलिस बल में बड़ी संख्या में पद खाली हैं। राजनीतिक दखल, हिरासत में हिंसा और पक्षपातपूर्ण कार्रवाई की शिकायतें लगातार आती रहती हैं। 2006 में सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस सुधार के कई निर्देश दिए थे, लेकिन अधिकांश आज भी अधूरे हैं।

स्वास्थ्य व्यवस्था में भी कई कमियाँ बनी हुई हैं। दवाओं की कीमतों में पारदर्शिता नहीं है। निजी अस्पताल अक्सर दवाओं और जाँचों के लिए वास्तविक लागत से कई गुना अधिक शुल्क वसूलते हैं। आयुष्मान भारत योजना में फर्जीवाड़े के कारण हजारों अस्पतालों पर कार्रवाई करनी पड़ी। मिलावटी दवाओं से बच्चों की मौत जैसी घटनाओं ने भी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। सरकारी अस्पतालों में संसाधनों की कमी और मरीजों की परेशानी आज भी जारी है।

इन सभी समस्याओं को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। ये मिलकर उस फ़ासले की कहानी कहती हैं जो बड़े वादों और ज़मीनी हकीकत के बीच मौजूद है। चुनाव सुधार, बेहतर शिक्षा, ईमानदार प्रशासन, तेज़ न्याय, आधुनिक पुलिस व्यवस्था और भरोसेमंद स्वास्थ्य सेवाएँ आज भी अधूरा एजेंडा हैं।


यह भी सच है कि पिछले दशक में भारत ने बुनियादी ढाँचे, डिजिटल तकनीक और कल्याणकारी योजनाओं में उल्लेखनीय प्रगति की है। लेकिन कोई भी राष्ट्र केवल एक्सप्रेसवे, ऐप्स और ऊँची इमारतों से महान नहीं बनता। उसकी असली ताकत इस बात से तय होती है कि वह आम आदमी की रोज़मर्रा की परेशानियों को कितनी ईमानदारी से हल करता है।

आज भी छह बड़े सवाल देश के सामने खड़े हैं:

बेरोज़गारी, किसानों की बदहाली, महँगाई, पर्यावरण संकट, शिक्षा और स्वास्थ्य की असमानता, तथा सामाजिक सौहार्द को मजबूत करना। करोड़ों युवा अच्छी नौकरियों की तलाश में हैं। किसान अनिश्चित आमदनी से जूझ रहे हैं। महँगाई हर परिवार का बजट बिगाड़ रही है। हवा और पानी का प्रदूषण लोगों की सेहत पर हमला कर रहा है। समाज में बढ़ती दूरियाँ लोकतंत्र को भी कमज़ोर करती हैं।

सरकार की आलोचना करना देश-विरोध नहीं है। एक मज़बूत लोकतंत्र में रचनात्मक आलोचना ही बेहतर शासन की बुनियाद होती है। किसी भी सरकार की सबसे बड़ी कामयाबी केवल उपलब्धियाँ गिनाने में नहीं, बल्कि अपनी कमियों को स्वीकार कर उन्हें दूर करने में होती है। भारत को ऐसा विकास चाहिए जो सबको साथ लेकर चले, टिकाऊ हो और हर नागरिक तक उसका लाभ पहुँचे।

 जब पहरेदार ही राग दरबारी गाने लगे!!

क्यों मुख्यधारा का मीडिया हाशिये पर जा रहा है और सोशल मीडिया नई चौपाल बन गया है

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बृज खंडेलवाल द्वारा

1 अगस्त 2026

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आज भारत की सबसे बड़ी खबर वह नहीं है जो हर रात टीवी स्टूडियो में चीख-चीखकर दिखाई जाती है। सबसे बड़ी खबर वह है, जिसे दिखाने से बचा जाता है।

लोकतंत्र केवल तब कमजोर नहीं होता, जब सरकारें मीडिया पर सेंसर लगा दें। वह तब भी कमजोर होता है, जब पत्रकार खुद सवाल पूछना छोड़ दें। आज देश के बड़े हिस्से का मुख्यधारा का मीडिया सत्ता से जवाब मांगने के बजाय उसकी आवाज़ दोहराता दिखाई देता है।

कभी मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता था। उसका काम था भ्रष्टाचार उजागर करना, सरकार से सवाल पूछना और आम आदमी की आवाज़ बनना। आज उसकी बड़ी भूमिका सत्ता का बचाव करती नज़र आती है। पहरेदार अब गोद में बैठा हुआ लगता है।

यह बदलाव अचानक नहीं आया। बड़े मीडिया संस्थानों का मालिकाना हक़ कुछ बड़े कॉरपोरेट घरानों के हाथों में सिमट गया है। उनके कारोबार केवल मीडिया तक सीमित नहीं हैं। ऐसे माहौल में संपादकीय आज़ादी अक्सर मुनाफ़े और राजनीतिक रिश्तों के आगे पीछे छूट जाती है।

विज्ञापनों ने भी इस संकट को गहरा किया है। मीडिया संस्थानों की बड़ी आय सरकार और कॉरपोरेट विज्ञापनों से आती है। जिनसे कमाई होती है, उनके खिलाफ़ जांच करना आसान नहीं होता। खामोशी फ़ायदेमंद बन जाती है और सवाल महंगे पड़ने लगते हैं।

टीवी बहसें भी अब एक जैसी लगती हैं। वही चेहरे, वही प्रवक्ता और वही तयशुदा बहसें। किसान, मज़दूर, शिक्षक, वैज्ञानिक और आम नागरिक शायद ही कभी राष्ट्रीय चर्चा का हिस्सा बनते हैं। एजेंडा ताकतवर तय करते हैं और बाकी लोग उसे देखते रहते हैं।

जो पत्रकार अलग रास्ता चुनते हैं, उन्हें मुकदमों, ट्रोलिंग, आर्थिक दबाव और ऑनलाइन गालियों का सामना करना पड़ता है। डर धीरे-धीरे आत्म-सेंसरशिप में बदल जाता है। जब डर काम करने लगे, तब सेंसरशिप की ज़रूरत भी नहीं पड़ती।

हर शाम टीवी पर शोर बढ़ता है, लेकिन सच कम होता जाता है। बहस की जगह हंगामा ले लेता है। तथ्यों की जगह नारे आ जाते हैं। बेरोज़गारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों की परेशानियाँ और पर्यावरण जैसे मुद्दे स्टूडियो की राजनीति में कहीं खो जाते हैं।

विद्वानों एडवर्ड हरमन और नोम चॉम्स्की ने वर्षों पहले लिखा था कि मीडिया पर मालिकाना हक़, विज्ञापन और राजनीतिक दबाव यह तय करते हैं कि जनता क्या देखेगी और क्या नहीं। हमेशा झूठ नहीं दिखाया जाता, लेकिन पूरा सच भी नहीं दिखाया जाता।

इसीलिए "गोदी मीडिया" जैसा शब्द आम बोलचाल का हिस्सा बन गया है। कोई इससे सहमत हो या नहीं, लेकिन इतना साफ़ है कि लाखों लोगों का टीवी समाचारों पर भरोसा कम हुआ है।

विडंबना यह है कि जो मीडिया कभी जनता की आवाज़ था, वह आज कई बार सरकारों, विज्ञापनदाताओं और निवेशकों की ज़्यादा चिंता करता दिखाई देता है। उसकी सबसे बड़ी समस्या टीआरपी नहीं, बल्कि घटती विश्वसनीयता है। भरोसा एक बार टूट जाए तो लौटना आसान नहीं होता।

इसी खाली जगह को सोशल मीडिया ने भर दिया है।

हाल का जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन इसका बड़ा उदाहरण है। एक व्यंग्यात्मक ऑनलाइन अभियान देखते ही देखते राष्ट्रीय आंदोलन बन गया। युवाओं ने टीवी चैनलों या अखबारों का इंतज़ार नहीं किया। उन्होंने अपनी बात खुद दुनिया तक पहुँचाई।

इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब शॉर्ट्स और एक्स पर वीडियो, मीम, भाषण और पोस्ट कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुँच गए। अब किसी संपादक की मंजूरी की ज़रूरत नहीं रही। मोबाइल फोन ही कैमरा भी है, न्यूज़रूम भी और प्रसारण केंद्र भी।

इस आंदोलन का हास्य, व्यंग्य और मीम पारंपरिक पत्रकारिता से कहीं तेज़ फैला। युवा गंभीर संपादकीय से ज़्यादा चुटीले पोस्ट और छोटे वीडियो से जुड़ते दिखे।

बेशक सोशल मीडिया की अपनी कमियाँ भी हैं। अफवाहें तेज़ी से फैलती हैं, एल्गोरिद्म सनसनी को बढ़ावा देते हैं और तथ्य जांच हमेशा समय पर नहीं हो पाती। फिर भी इसने लाखों लोगों को बोलने का मंच दिया है।

अब यह बदलाव लौटने वाला नहीं है। भारत की नई पीढ़ी रात नौ बजे के टीवी बुलेटिन या अगली सुबह के अखबार का इंतज़ार नहीं करती। वह खुद खबर बनाती है, साझा करती है और उस पर बहस करती है।

यही कारण है कि मुख्यधारा का मीडिया धीरे-धीरे हाशिये पर जा रहा है, जबकि सोशल मीडिया नई जन-चौपाल बन चुका है। आज राजनीति, आंदोलन और जनमत का बड़ा हिस्सा वहीं आकार लेता है।

एक आज़ाद मीडिया का काम सत्ता की जय-जयकार करना नहीं, उससे सवाल पूछना है। अगर मुख्यधारा का मीडिया अपनी यह भूमिका नहीं निभाएगा, तो जनता अपनी आवाज़ के लिए नए मंच खोजती रहेगी।

Tuesday, July 28, 2026

 स्कूल खाली हो रहे हैं, जंतर-मंतर भर रहा है! क्या भारत की शिक्षा व्यवस्था जवाब देगी?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

30 जुलाई 2026

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अगर बच्चा एक साधारण पैराग्राफ भी नहीं पढ़ सकता, तो नए स्कूल भवन बनाने का क्या मतलब है?

अगर सरकारी स्कूल इतने अच्छे हैं, तो लाखों माता-पिता उन्हें छोड़कर निजी स्कूलों की ओर क्यों जा रहे हैं?

और अगर हमारी शिक्षा व्यवस्था सही दिशा में है, तो हजारों युवा हाल ही में जंतर-मंतर पर नीट के खिलाफ न्याय और जवाबदेही की मांग लेकर सड़कों पर क्यों उतर आए?

ये अलग-अलग सवाल नहीं हैं। ये एक ही संकट की अलग-अलग तस्वीरें हैं।

जंतर-मंतर पर गूंजा जनाक्रोश केवल नीट परीक्षा के खिलाफ नहीं था। वह पूरे शिक्षा तंत्र के खिलाफ बढ़ते अविश्वास का विस्फोट था। देश की जेन ज़ी पीढ़ी अब केवल एक परीक्षा पर सवाल नहीं उठा रही। वह उस व्यवस्था को चुनौती दे रही है, जो समझ से ज्यादा रटने को, सीखने से ज्यादा कोचिंग को और प्रतिभा से ज्यादा किस्मत को महत्व देती है।

यूडीआईएसई+ (UDISE+) 2025-26 की ताज़ा रिपोर्ट इस बेचैन करने वाली सच्चाई की पुष्टि करती है। भारत की स्कूली शिक्षा एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां कुछ उपलब्धियां दिखती हैं, लेकिन उनसे कहीं बड़े संकट भी सामने आते हैं। एक तरफ सुधार होता है, दूसरी तरफ व्यवस्था की कोई और कमजोरी उसे पीछे धकेल देती है।

देश में कुल छात्र संख्या 24.80 करोड़ से घटकर 24.72 करोड़ रह गई। अकेले सरकारी स्कूलों से लगभग 86 लाख बच्चे कम हुए, जबकि निजी स्कूलों में 88 लाख से अधिक नए छात्र जुड़े। माता-पिता अपने फैसले से साफ संदेश दे रहे हैं। एक ही वर्ष में 8,000 से अधिक सरकारी स्कूल बंद हो गए। अनुसूचित जाति के विद्यार्थियों की संख्या भी घटी। आज भी एक लाख से अधिक स्कूल केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं, जहां लगभग 34 लाख बच्चों को एक साथ कई कक्षाओं में पढ़ाया जाता है।

लेकिन सबसे बड़ा संकट स्कूल की इमारतों में नहीं, कक्षाओं के भीतर है।

एएसईआर 2024 बताता है कि महामारी के बाद कुछ सुधार जरूर हुआ है, लेकिन हालात अभी भी चिंताजनक हैं। कक्षा तीन के केवल लगभग एक चौथाई बच्चे ही कक्षा दो का पाठ ठीक से पढ़ सकते हैं। लगभग दो-तिहाई बच्चे साधारण घटाव तक नहीं कर पाते। पारख (PARAKH) और नीति आयोग की रिपोर्टें बताती हैं कि कक्षा छह के अनेक विद्यार्थी साधारण भिन्न और रोजमर्रा की गणितीय समझ में भी कमजोर हैं। आठवीं तक पहुंचते-पहुंचते पढ़ने की क्षमता भी पहले से गिर चुकी है।

यानी बच्चे कक्षा तो पास कर रहे हैं, लेकिन सीख नहीं रहे। उनके हाथ में प्रमाणपत्र है, पर आत्मविश्वास नहीं। अंक हैं, लेकिन ज्ञान नहीं।

स्कूलों में बिजली, शौचालय और पेयजल जैसी सुविधाएं बढ़ी हैं। यह स्वागतयोग्य है। लेकिन हजारों स्कूलों में आज भी खेल का मैदान नहीं है, दिव्यांगों के लिए सुविधाएं नहीं हैं, कंप्यूटर काम नहीं करते और इंटरनेट केवल कागज़ों में मौजूद है।

शिक्षा पर सरकारी खर्च भी चिंता बढ़ाता है। पिछले एक दशक में केंद्रीय बजट में शिक्षा की हिस्सेदारी लगातार घटी है। कम निवेश का सीधा असर शिक्षकों की नियुक्ति, प्रशिक्षण और पढ़ाई की गुणवत्ता पर पड़ता है। इमारतें जल्दी बन सकती हैं, लेकिन भरोसा धीरे-धीरे बनता है।

देश की स्कूली शिक्षा पांच बड़ी बीमारियों से जूझ रही है।

सबसे बड़ी बीमारी है कमजोर सीखने की क्षमता। बच्चे वर्षों तक स्कूल जाते हैं, लेकिन पढ़ना, लिखना और साधारण गणित तक ठीक से नहीं सीख पाते।

दूसरी समस्या है बीच रास्ते पढ़ाई छोड़ देना। पहली कक्षा में प्रवेश लेने वाले लगभग आधे बच्चे बारहवीं तक पहुंच ही नहीं पाते। हर स्तर पर स्कूल बदलने की मजबूरी ड्रॉपआउट का खतरा बढ़ाती है।

तीसरी चुनौती है शिक्षकों की भारी कमी। एक लाख से अधिक स्कूल आज भी केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं।

चौथी समस्या है शिक्षा व्यवस्था का बिखराव। प्राथमिक स्कूल बहुत हैं, लेकिन माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्कूल अपेक्षाकृत कम। बच्चों को बार-बार स्कूल बदलना पड़ता है, जिससे पढ़ाई की निरंतरता टूट जाती है।

पांचवीं चुनौती है गहरी असमानता। राज्यों, आय वर्गों और सामाजिक समूहों के बीच शिक्षा की गुणवत्ता में भारी अंतर है। अनुसूचित जाति और जनजाति के बच्चों की सीखने की क्षमता अब भी पीछे है।

समस्या यहीं खत्म नहीं होती।

देश में दर्जनों शिक्षा बोर्ड, अलग-अलग पाठ्यक्रम और अलग-अलग परीक्षा प्रणालियां चल रही हैं। सीबीएसई, सीआईएससीई, एनआईओएस, राज्य बोर्ड, संस्कृत बोर्ड, मदरसा बोर्ड और अंतरराष्ट्रीय बोर्ड; सब अपनी-अपनी दिशा में चल रहे हैं। यह विविधता कम और भ्रम ज्यादा पैदा करती है।

भारत का एक छात्र लगभग पच्चीस वर्ष तक किसी न किसी परीक्षा की तैयारी करता रहता है। स्कूल, कॉलेज, प्रतियोगी परीक्षा, नौकरी। लेकिन जीवन जीने की कला, आलोचनात्मक सोच, रचनात्मकता और समस्या समाधान जैसे कौशल अक्सर पीछे छूट जाते हैं।

नीट को लेकर जंतर-मंतर पर जो गुस्सा दिखाई दिया, वह अचानक नहीं फूटा। उसकी शुरुआत उन कक्षाओं में हुई थी जहां समझने से ज्यादा रटाया गया। उन कोचिंग सेंटरों में हुई, जहां स्कूलों से ज्यादा भरोसा पैदा हो गया। उन घरों में हुई, जहां माता-पिता अपनी सारी जमा-पूंजी एक अनिश्चित भविष्य पर दांव लगाने को मजबूर हैं।

भारत कभी नालंदा और तक्षशिला जैसी विश्वविख्यात शिक्षा परंपरा का केंद्र था। आज भी आईआईटी और कुछ चुनिंदा संस्थान दुनिया में सम्मान पाते हैं। लेकिन पूरी शिक्षा व्यवस्था अभी भी उस स्तर तक नहीं पहुंच सकी, जिसकी एक उभरती महाशक्ति से उम्मीद की जाती है।

भारत को केवल अधिक स्कूलों की जरूरत नहीं है। बेहतर स्कूलों की जरूरत है।

केवल अधिक दाखिलों की नहीं, बेहतर सीखने की जरूरत है।

केवल अधिक परीक्षाओं की नहीं, बेहतर शिक्षा की जरूरत है।

जेन ज़ी अपना फैसला सुना चुकी है। वह सड़कों पर उतर चुकी है। अब परीक्षा सरकार, नीति-निर्माताओं और पूरे समाज की है।

देश का हर छात्र आज सिर्फ एक सवाल पूछ रहा है—

क्या हमारी शिक्षा हमें जिंदगी के लिए तैयार करेगी, या सिर्फ अगली परीक्षा के लिए?

यही सवाल भारत के भविष्य का भी फैसला करेगा।

 


जब कॉकरोचों ने हिला दिया सत्ता का सिंहासन: जेन ज़ी ने कर दिखाया, जो विपक्ष नहीं कर सका

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

29 जुलाई 2026

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साल 2026 का सबसे बड़ा राजनीतिक धमाका संसद में नहीं हुआ। वह एक मीम से शुरू हुआ।

कुछ छात्रों को "कॉकरोच" कहा गया। उन्होंने बुरा मानने के बजाय उसी नाम को अपना झंडा बना लिया। फिर वे जंतर-मंतर पहुंचे, डटे रहे और आखिरकार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। महीनों तक संसद में हंगामा करने वाला पूरा विपक्ष जो नहीं कर सका, वह काम कुछ हजार युवाओं ने मोबाइल फोन, मीम और मुस्कान के सहारे कर दिखाया।

कहावत है, "जहाँ चाह, वहाँ राह।" इस बार राह इंस्टाग्राम से होकर निकली।

कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी), पहले मज़ाक लगती थी। लेकिन मज़ाक ही आंदोलन बन गया। युवाओं ने कहा, "अगर हमें कॉकरोच कहते हो, तो याद रखो, एक को कुचलोगे, सौ और निकल आएँगे।"

फिर आया नीट-यूजी पेपर लीक।

परीक्षा रद्द हुई। करीब बीस लाख छात्रों को दोबारा परीक्षा की चिंता सताने लगी। कई छात्रों की आत्महत्या की खबरों ने पूरे देश को झकझोर दिया। वर्षों से जमा गुस्सा, पेपर लीक, महँगी कोचिंग, बेरोज़गारी और सुस्त व्यवस्था, अब ज्वालामुखी बन चुका था।

चिंगारी मिली और आग फैल गई।

सीजेपी ने वही भाषा बोली जो आज का युवा समझता है। प्रेस कॉन्फ्रेंस की जगह इंस्टाग्राम रील्स थीं। लंबे भाषणों की जगह मीम थे। गुस्से को हँसी में बदलकर उन्होंने व्यवस्था पर सबसे तीखा वार किया।

जंतर-मंतर धीरे-धीरे धरना स्थल नहीं, युवा गणराज्य बन गया। गीत गूंजे, पोस्टर बने, बहस हुई, कविताएँ पढ़ी गईं। माता-पिता भी साथ आए। शिक्षकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने समर्थन दिया। सोनम वांगचुक का 26 दिन का अनशन आंदोलन को नैतिक ताकत दे गया। पुलिस की लाठी और आँसू गैस ने भी आंदोलन की आग बुझाने के बजाय और हवा दे दी।

इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत उसकी सादगी थी।

सिर्फ एक मांग थी: जवाबदेही।

व्यवस्था की नाकामी की लंबी बहसों में सरकारें अक्सर बच निकलती हैं। लेकिन जब उंगली सीधे एक जिम्मेदार व्यक्ति की ओर उठे, तब बचना आसान नहीं होता।

आखिरकार सरकार ने हालात भाँप लिए। संसद लगातार ठप थी। देशभर में छात्रों का समर्थन बढ़ रहा था। तस्वीरें सोशल मीडिया पर फैल रही थीं। टकराव लंबा खिंचता तो नुकसान और बढ़ता।

धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दिया। सरकार ने जांच, मुआवजे और किसी तरह की प्रताड़ना न होने का भरोसा दिया। तत्काल संकट टल गया।

दिलचस्प बात यह रही कि विपक्ष इस पूरी लड़ाई में अगली कतार में नहीं, पीछे की सीट पर बैठा दिखाई दिया।

वर्षों से विपक्ष शिक्षा, बेरोज़गारी और संस्थाओं की विफलता पर सरकार को घेरता रहा है। लेकिन जब असली जनआंदोलन उठा, तब उसकी भूमिका दर्शक जैसी रही। वह आंदोलन का नेतृत्व नहीं कर पाया, केवल समर्थन देने पहुँचा।

यहीं उसकी सबसे बड़ी कमजोरी सामने आई।

आज का विपक्ष विरोध तो करता है, लेकिन भरोसा नहीं जगा पाता।

इंडिया गठबंधन की सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि उसे जोड़ने वाला धागा कोई साझा विचार नहीं, बल्कि केवल भाजपा विरोध है। चुनाव आते ही सीटों पर झगड़े शुरू हो जाते हैं। राज्यों में साथी दल एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी बन जाते हैं। "एक अनार, सौ बीमार" जैसी हालत हो जाती है।

नेतृत्व का सवाल भी अब तक अनसुलझा है।

राहुल गांधी कांग्रेस का चेहरा हैं, लेकिन ममता बनर्जी, अखिलेश यादव और दूसरे क्षेत्रीय नेता भी अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन छोड़ने को तैयार नहीं। जहाँ कई नाविक हों, वहाँ नाव अक्सर भँवर में फँस जाती है।

संगठन भी विपक्ष की कमजोर कड़ी है।

भाजपा ने दशकों तक बूथ स्तर तक अपना संगठन खड़ा किया। दूसरी ओर कांग्रेस सहित कई विपक्षी दल स्थानीय कार्यकर्ताओं, अनुशासन और जमीनी नेटवर्क की कमी से जूझ रहे हैं। कई राज्यों में गुटबाजी अलग सिरदर्द है।

वंशवाद भी विपक्ष के गले की हड्डी बना हुआ है।

अधिकांश बड़े विपक्षी दल अब भी परिवारों के इर्द-गिर्द घूमते हैं। नई पीढ़ी के नेताओं को आगे बढ़ने का अवसर सीमित दिखाई देता है। इसके उलट भाजपा खुद को कार्यकर्ता आधारित संगठन के रूप में पेश करने में सफल रही है। राजनीति में धारणा भी आधी लड़ाई जीत लेती है।

विपक्ष की एक और समस्या है कि उसके पास आलोचना तो बहुत है, लेकिन विकल्प कम हैं।

महँगाई, बेरोज़गारी, पेपर लीक और संस्थागत संकट जैसे मुद्दे वास्तविक हैं। लेकिन मतदाता केवल शिकायत नहीं, समाधान भी सुनना चाहता है। केवल सरकार को कोसने से चुनाव नहीं जीते जाते।

जन टिप्पणीकार प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी का मानना है कि लगातार चुनावी हार ने विपक्ष को गहरी निराशा में धकेल दिया है। उसका पूरा ध्यान केवल मोदी सरकार को हटाने पर केंद्रित हो गया है। कॉकरोच आंदोलन उसे एक सुनहरा अवसर लगा। लेकिन राजनीति में बाजी उसी की होती है जो समय रहते चाल बदल ले।

यहीं नरेंद्र मोदी ने अपनी राजनीतिक चतुराई दिखाई।

सरकार ने टकराव को लंबा नहीं खींचा। प्रदर्शनकारियों की मुख्य माँगें मान लीं। मंत्री ने इस्तीफा दिया। बातचीत हुई। आंदोलन का तत्काल कारण समाप्त हो गया।

इसे कहते हैं "साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।"

सरकार ने एक मंत्री खोया, लेकिन बड़ा राजनीतिक संकट टाल दिया। विपक्ष के हाथ का सबसे तेज़ हथियार भी कुंद हो गया। संसद में शोर चलता रहा, लेकिन जनता का ध्यान दूसरी ओर मुड़ चुका था।

इसका मतलब यह नहीं कि समस्याएँ खत्म हो गई हैं। परीक्षा प्रणाली में सुधार की ज़रूरत अब भी है। युवाओं की बेरोज़गारी और शिक्षा व्यवस्था पर सवाल भी बने हुए हैं। छात्रों का भरोसा वापस जीतना आसान नहीं होगा।

लेकिन फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि मोदी इस मुश्किल इम्तिहान से निकलने में कामयाब रहे हैं।

कॉकरोच जनता पार्टी ने साबित कर दिया कि आज का युवा केवल वोटर नहीं, एजेंडा तय करने वाली ताकत भी बन सकता है।

और विपक्ष के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है:

अगर कुछ छात्रों ने मीम और मोबाइल के दम पर वह कर दिखाया, जो अनुभवी नेता वर्षों में नहीं कर सके, तो असली आत्ममंथन किसे करना चाहिए: सरकार को या विपक्ष को?

Sunday, July 26, 2026

 इंस्टाग्राम से जंतर-मंतर तक, बदल गई सियासत

नीट से निकला गुस्सा, लोकतंत्र का नया चेहरा

जब जेन ज़ी ने अपनी आवाज़ बुलंद की

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

28 जुलाई, 2026

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जंतर-मंतर बगावत के एक रंगीन मेले में बदल गया। जेन ज़ी के नौजवान गा रहे थे, नाच रहे थे, मीम्स बना रहे थे, ताकतवर नेताओं का मज़ाक उड़ा रहे थे और बर्गर, पिज़्ज़ा, भटूरे खाते हुए ऐसे मस्ती कर रहे थे, मानो राजनीति किसी कॉलेज फेस्ट में आ घुसी हो।

लेकिन इस हंसी-मज़ाक और शोर-शराबे के पीछे एक साफ़ और मज़बूत पैगाम था: जवाबदेही चाहिए। हिंसा भी इस आंदोलन का जोश कम नहीं कर सकी। युवाओं के नए झुंड लगातार पहुंचते रहे। बेखौफ, पूरे हौसले के साथ। देखते ही देखते यह धरना लोकतंत्र के एक जीवंत उत्सव में बदल गया।

यह युवा आंदोलन भारत के लोकतांत्रिक सफर का एक अहम पड़ाव बन गया। शुरुआत परीक्षा व्यवस्था के खिलाफ गुस्से से हुई थी, लेकिन जल्द ही यह एक बड़े संदेश में बदल गई; देश के युवाओं की आवाज़ को अब नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

जिस जनदबाव के बाद धर्मेंद्र प्रधान को पद छोड़ना पड़ा, प्रधानमंत्री से इंस्टाग्राम पर सीधे युवाओं से बात करने की मांग उठी, और नंदन नीलेकणी समेत विशेषज्ञों की नई टास्क फोर्स बनाने का फैसला हुआ, उसने एक बात साबित कर दी। शांतिपूर्ण, संगठित और स्पष्ट जनदबाव सरकारों को फैसले बदलने पर मजबूर कर सकता है।

इस आंदोलन ने सोशल मीडिया की असली ताकत भी दिखा दी। जो काम कभी बड़े मीडिया संस्थान तय करते थे, वह इस बार पूरी तरह इंटरनेट पर हुआ। कहानी वहीं बनी, वहीं फैली और वहीं से पूरे देश तक पहुंची। पारंपरिक मीडिया को इस बार युवाओं के पीछे-पीछे चलना पड़ा।

जेन ज़ी की अपनी अलग भाषा थी; बेबाक, अचानक, प्रतीकों से भरी और बिना किसी बनावट के। उसने राजनीतिक आंदोलनों के पुराने तौर-तरीकों को तोड़ दिया। उसकी सादगी और सच्चाई ने हर विचारधारा के लोगों का ध्यान खींचा।

यह आंदोलन दलगत राजनीति से ऊपर उठ गया। छोटा था, लेकिन रंगों और उम्मीदों से भरा हुआ। जैसे तपती गर्मी के बाद पहली बारिश राहत लेकर आती है, वैसे ही इसने पहली बार सड़कों पर उतरे युवाओं, डिजिटल दौर की पीढ़ी और आम छात्रों को एक मंच पर ला दिया। बिना किसी लिखी हुई स्क्रिप्ट के यह लोकतंत्र का ऐसा नज़ारा था, जिसने नई ऊर्जा और नई उम्मीद जगाई। इसने संकेत दिया कि देश में एक बड़े युवा जागरण की शुरुआत हो चुकी है।

सरकार ने समय रहते कुछ कदम उठाए, जिससे आंदोलन और नहीं भड़का। इस पूरे घटनाक्रम ने लोकतंत्र की एक पुरानी सच्चाई फिर याद दिला दी; शांतिपूर्ण जनआंदोलन लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं होते, बल्कि उसकी सबसे बड़ी ताकत होते हैं। खासकर युवाओं की आवाज़ को अनसुना करना किसी भी सरकार के लिए आसान नहीं होता।

राजनीति हमेशा एक सबक देती है; नेता जितनी ऊंचाई पर पहुंचता है, अहंकार आने पर उसका गिरना उतना ही दर्दनाक होता है। भारतीय पुराण ऐसी मिसालों से भरे पड़े हैं। सत्ता के नशे में चूर इंद्र को तब विनम्र होना पड़ा, जब बालक कृष्ण ने अपनी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया। अपनी विद्वता पर गर्व करने वाले नारद मुनि का अहंकार भी भगवान विष्णु ने तोड़ा। घमंड इंसान की सोच पर पर्दा डाल देता है, जबकि विनम्रता उसे सही रास्ता दिखाती है।

नीट विवाद नरेंद्र मोदी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन गया । यह केवल एक परीक्षा का मामला नहीं रहा। यह भरोसे का ऐसा संकट बन गया, जिसने उन लाखों छात्रों और परिवारों को झकझोर दिया है, जो शिक्षा को अपनी तरक्की की सबसे मजबूत सीढ़ी मानते हैं।

कई वर्षों तक नरेंद्र मोदी ने एक आत्मविश्वासी और सक्षम "विश्वगुरु भारत" की छवि बनाई। लेकिन नीट विवाद ने उस तस्वीर में गहरी दरार डाल दी। पेपर लीक, गड़बड़ियों और प्रशासनिक अव्यवस्था के आरोपों ने एक राष्ट्रीय परीक्षा को सरकारी व्यवस्था की नाकामी का प्रतीक बना दिया।

सबसे बड़ी भूल संकट का पैदा होना नहीं थी। असली गलती थी सरकार की धीमी और हिचकिचाती प्रतिक्रिया। सच्चा नेतृत्व वही होता है, जो गलती स्वीकार करे, निष्पक्ष जांच कराए और दोषियों पर तुरंत कार्रवाई करे। लेकिन यहां जवाब बचाव वाला ज़्यादा था, समाधान वाला कम। हर बीतते दिन के साथ लोगों का शक बढ़ता गया कि सरकार हालात को संभाल नहीं रही, बल्कि घटनाओं के पीछे-पीछे चल रही है।

नेतृत्व का मतलब ज़िम्मेदारी लेने का साहस भी होता है। संसदीय लोकतंत्र में कई बार मंत्री अपने विभाग की बड़ी विफलताओं की नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे देते हैं, चाहे उनकी व्यक्तिगत गलती साबित न हुई हो। ऐसे कदम जनता का भरोसा मज़बूत करते हैं। लेकिन नीट मामले में जवाबदेही की मांग को लगभग नज़रअंदाज़ कर दिया गया। इससे यही संदेश गया कि सरकार के लिए अपनी सियासी ताकत बचाना, जनता का भरोसा लौटाने से ज़्यादा अहम है।

इस विवाद ने एक और गहरी कमजोरी उजागर की। जब किसी सरकार को लगातार भारी चुनावी जीत मिलने लगती है, तो अक्सर वह आलोचना सुनना कम कर देती है। लोकतंत्र तभी मजबूत रहता है, जब सवाल पूछने वालों को दुश्मन नहीं, बल्कि चेतावनी देने वाला समझा जाए। आलोचना छोटी समस्याओं को बड़े राष्ट्रीय संकट बनने से रोकती है।

हमारी प्राचीन परंपरा भी यही सिखाती है। रामायण का वह धोबी, जिसकी कड़ी बात भी भगवान राम तक पहुंची, हमें याद दिलाता है कि शासक सबसे साधारण नागरिक की आवाज़ भी अनसुनी नहीं कर सकता। जनमत चाहे कितना भी कड़वा क्यों न लगे, वही समाज की असली नब्ज़ होता है।

आज की सरकारें संस्थाओं, स्वतंत्र मीडिया, विशेषज्ञों और नागरिक समाज के सहारे ही सही फैसले ले पाती हैं। यही उनकी आंखें और कान होते हैं। जब इन संस्थाओं पर भरोसा कम होने लगता है या उनकी बात सुनी नहीं जाती, तब सरकारें अपने ही बनाए दायरे में कैद हो जाती हैं। वहां सिर्फ वही आवाज़ सुनाई देती है, जो अच्छी लगे। असुविधाजनक सच बहुत देर से सामने आता है। नीट विवाद ने यही दिखाया। छात्र सड़कों पर थे, माता-पिता परेशान थे, अदालतें दखल दे रही थीं, लेकिन सरकारी बयान कानूनी दलीलों तक सीमित रहे। उनमें संवेदना और आत्ममंथन की कमी साफ़ दिखाई दी।

इतिहास भी ऐसी कई चेतावनियां देता है। 1975 की आपातकालीन अवधि सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण और जनता से बढ़ती दूरी का नतीजा थी। अंत में जनता ने उसी सत्ता को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया। आज हालात अलग हैं, लेकिन सबक वही है। लोकतंत्र में अति-आत्मविश्वास, सत्ता का केंद्रीकरण और आलोचना की अनदेखी हमेशा भारी पड़ती है।

नीट का पूरा घटनाक्रम केवल एक परीक्षा की विफलता नहीं है। यह शासन व्यवस्था के लिए चेतावनी है। किसी भी संस्था की साख पारदर्शिता, निष्पक्षता और जवाबदेही से बनती है। राजनीतिक ताकत की असली नींव अजेय होने का भ्रम नहीं, बल्कि जनता का भरोसा होती है।

नरेंद्र मोदी के सामने अभी भी एक अवसर है। वह दिखा सकते हैं कि मजबूत नेतृत्व का मतलब कभी गलती न करना नहीं होता। मजबूत नेता वही होता है, जो अपनी भूल स्वीकार करे, दोषियों को सज़ा दे, संस्थाओं में सुधार लाए और आम नागरिक की आवाज़ सुने।

तालियां अहंकार को कुछ समय तक ज़रूर मिल जाती हैं, लेकिन जनता का भरोसा केवल विनम्रता, ईमानदारी और जवाबदेही से लौटता है। भारत की प्राचीन कथाओं से लेकर आधुनिक लोकतंत्र तक यही सबसे बड़ा सबक रहा है।