पर्यावरण के रक्षक या विकास के दुश्मन?
नर्मदा से टिहरी और मथुरा रिफाइनरी तक: विरोध की राजनीति पर तीन बड़े सवाल
क्या पर्यावरण बचाने के नाम पर विकास रोकना जायज है?
भारत की तीन बड़ी परियोजनाएं इस बहस की हकीकत को बयां करती हैं।
_________________________
बृज खंडेलवाल द्वारा
23 अक्टूबर 2026
____________________________
“हमें इस देश में एक भी ऐसी परियोजना दिखाइए, जिसका इन कथित पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने स्वागत किया हो... हर मामले को अदालत में घसीट लिया जाता है... इस देश में ऐसी याचिकाएं सिर्फ विकास परियोजनाओं को रोकने के लिए दाखिल की जाती हैं।”
11 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ ने ये तीखी टिप्पणियां कीं। पीठ की अगुवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत कर रहे थे। मामला गुजरात के पीपावाव बंदरगाह के विस्तार और आधुनिकीकरण की पर्यावरण मंजूरी को चुनौती देने वाली याचिका का था।
इन टिप्पणियों ने एक अहम सवाल खड़ा कर दिया। क्या कुछ स्वयंभू पर्यावरण रक्षक सचमुच प्रकृति बचा रहे हैं? या पर्यावरण की चिंताओं को आर्थिक तरक्की रोकने का हथियार बना रहे हैं?
भारत को साफ हवा, बहती नदियां और सुरक्षित जंगल चाहिए। लेकिन देश को बांध, बिजलीघर, बंदरगाह, सड़कें और उद्योग भी चाहिए। समस्या तब शुरू होती है, जब कुछ कार्यकर्ता बिना ठोस जांच के हर परियोजना को पर्यावरण के लिए खतरा बता देते हैं।
नर्मदा बांध, टिहरी बांध और मथुरा रिफाइनरी की कहानियां इस बहस को समझने में मदद करती हैं। ये तीनों उदाहरण बताते हैं कि पर्यावरण की हिफाजत और आर्थिक विकास के बीच संतुलन कितना जरूरी है।
पर्यावरण के नाम पर आंदोलन करना गलत नहीं है। लेकिन कुछ अभियानों में खतरे बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए जाते हैं। विशेषज्ञों की जांच पूरी होने से पहले ही विनाश की भविष्यवाणियां होने लगती हैं। फिर प्रचार, प्रदर्शन और अदालतों में मुकदमों का सिलसिला शुरू हो जाता है।
एक जाना-पहचाना चक्र बन गया है। पहले खतरे की घंटी बजाओ, फिर सुर्खियां बटोरों, अदालत पहुंचो, RTI लगाओ और परियोजना को लटका दो। इसके बाद अगली परियोजना के खिलाफ मोर्चा खोल दो।
क्या कुछ अभियानों के पीछे निहित स्वार्थ भी काम करते हैं? इस सवाल की जांच होनी चाहिए। राजनीतिक विरोधियों, कारोबारी प्रतिस्पर्धियों और दूसरे समूहों को किसी परियोजना के रुकने से फायदा हो सकता है।
जब पर्यावरण संबंधी आपत्तियां सबूतों को मानने से इनकार करने लगें, तब आंदोलन और अड़ंगे के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है।
नर्मदा: विरोध के बीच विकास के फायदे
मेधा पाटकर और नर्मदा बचाओ आंदोलन ने दशकों तक नर्मदा घाटी की बड़ी बांध परियोजनाओं का विरोध किया। सरदार सरोवर बांध इस आंदोलन का प्रमुख निशाना बना।
आंदोलन ने विस्थापन, आदिवासी अधिकारों, पर्यावरण को नुकसान और पुनर्वास की कमियों पर सवाल उठाए। ये गंभीर मुद्दे थे और इनकी अनदेखी नहीं की जा सकती।
लेकिन एक दूसरा सवाल भी जरूरी है। क्या आंदोलन ने उन लाखों लोगों के संभावित फायदे पर पर्याप्त ध्यान दिया, जिन्हें इन परियोजनाओं से पानी और बिजली मिल सकती थी?
सरदार सरोवर बांध ने गुजरात के कई हिस्सों में पानी की उपलब्धता बढ़ाने में मदद की है। इसकी विशाल नहर व्यवस्था नर्मदा का पानी सौराष्ट्र और कच्छ जैसे सूखाग्रस्त इलाकों तक पहुंचाती है।
कई गांवों और कस्बों में पीने के पानी की समस्या लंबे समय से रही है। नर्मदा का पानी मिलने से अनेक इलाकों को अधिक भरोसेमंद जलापूर्ति का सहारा मिला है।
खेती को भी फायदा हुआ है। सिंचाई से किसानों की मानसून पर निर्भरता घटती है। फसलों को पानी मिलता है और ग्रामीण आमदनी बढ़ाने के अवसर बनते हैं। नहर व्यवस्था राजस्थान के कुछ हिस्सों तक भी लाभ पहुंचाती है।
गुजरात में पानी की कमी लंबे समय से विकास की राह में बड़ी बाधा रही है। ऐसे इलाकों तक पानी पहुंचाने के दूसरे विकल्प ज्यादा मुश्किल और महंगे साबित हो सकते थे।
मध्य प्रदेश को भी नर्मदा घाटी विकास परियोजना से लाभ मिला है। इंदिरा सागर बांध की बिजली उत्पादन क्षमता 1,000 मेगावाट है। यह सिंचाई और कृषि गतिविधियों को भी सहारा देता है।
ये फायदे केवल सरकारी कागजों पर लिखे वादे नहीं हैं। पानी, बिजली और सिंचाई की उपलब्धता लोगों की जिंदगी पर सीधा असर डालती है।
टिहरी बांध: इंजीनियरिंग की बड़ी चुनौती
उत्तराखंड का टिहरी बांध भी विकास और पर्यावरण के बीच लंबे संघर्ष का केंद्र रहा है।
चिपको आंदोलन के प्रसिद्ध नेता सुंदरलाल बहुगुणा ने इस परियोजना के खिलाफ जोरदार अभियान चलाया। भूख हड़ताल, प्रदर्शन और कानूनी लड़ाइयों ने वर्षों तक इस विवाद को जिंदा रखा।
टिहरी बांध 2006 में पूरा हुआ। इसकी ऊंचाई 260.5 मीटर है। इसके मुख्य बिजलीघर की क्षमता 1,000 मेगावाट है।
इससे जुड़ी व्यापक परियोजना में 400 मेगावाट की कोटेश्वर परियोजना और 1,000 मेगावाट की पंप्ड-स्टोरेज सुविधा भी शामिल है। अप्रैल 2026 तक यह पंप्ड-स्टोरेज सुविधा पूरी तरह चालू हो चुकी थी।
इस तरह पूरे परिसर की स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता 2,400 मेगावाट हो गई है।
यह भारत की बिजली व्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान है। परियोजना उत्तरी बिजली ग्रिड को सहारा देती है। निर्धारित व्यवस्थाओं के तहत उत्तराखंड को भी बिजली संबंधी लाभ मिलते हैं।
टिहरी झील से दिल्ली सहित बड़े आबादी वाले क्षेत्रों की पेयजल जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलती है। यह उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में सिंचाई के लिए भी उपयोगी है।
जलाशय में पानी जमा करने से बाढ़ के असर को कुछ हद तक कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इससे बाढ़ का खतरा पूरी तरह खत्म नहीं होता।
टिहरी झील ने पर्यटन, मनोरंजन और स्थानीय रोजगार के नए अवसर भी पैदा किए हैं।
लेकिन बांध टूटने और भारी तबाही की आशंकाओं का क्या हुआ?
बांध 2006 से काम कर रहा है। इस दौरान वैसी विनाशकारी टूटन नहीं हुई, जिसकी आशंका विरोधियों ने जताई थी। इसके मिट्टी और चट्टानों से बने ढांचे को क्षेत्र के भूकंपीय जोखिमों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था।
बड़ा सबक साफ है। परियोजनाओं का मूल्यांकन तकनीकी तथ्यों, वास्तविक जोखिमों, उनके प्रदर्शन और सामाजिक प्रभावों के आधार पर होना चाहिए। केवल विरोध की तीव्रता से किसी परियोजना का सही या गलत होना तय नहीं होता।
टिहरी दिखाता है कि बड़ी इंजीनियरिंग परियोजनाएं कठिन चुनौतियों के बावजूद सफल हो सकती हैं। साथ ही, सुरक्षा के मामले में कभी लापरवाही नहीं होनी चाहिए।
मथुरा रिफाइनरी: उद्योग बनाम ताजमहल
मथुरा की तेल रिफाइनरी ने विकास और पर्यावरण के बीच एक और कठिन सवाल खड़ा किया।
जब 1970 के दशक में इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन ने रिफाइनरी लगाने की योजना बनाई, तब संरक्षणवादियों ने चिंता जताई। सवाल था कि क्या इससे निकलने वाला प्रदूषण करीब 40 से 50 किलोमीटर दूर स्थित ताजमहल को नुकसान पहुंचा सकता है?
यह चिंता बेबुनियाद नहीं थी। सल्फर डाइऑक्साइड और दूसरे प्रदूषक अम्लीय जमाव का कारण बन सकते हैं। इससे संगमरमर और दूसरी संवेदनशील सतहों को नुकसान पहुंच सकता है।
ताजमहल की हिफाजत बेहद जरूरी है। इसलिए इस मामले में सावधानी बरतना स्वाभाविक था।
विरोध बढ़ा और विशेषज्ञ समितियों ने पर्यावरण पर संभावित असर की जांच की। आखिरकार जरूरी सुरक्षा उपायों के साथ रिफाइनरी को मंजूरी मिली। इसका संचालन 1982 में शुरू हुआ।
आलोचकों को आशंका थी कि प्रदूषण से ताजमहल धीरे-धीरे पीला पड़ जाएगा और पूरे इलाके की हवा खराब होगी।
फिर क्या हुआ?
इसका जवाब किसी एक नारे में नहीं मिल सकता।
ताजमहल के संगमरमर में पीलापन और सतह पर गिरावट देखी गई है। वायु प्रदूषण चिंता का एक कारण है। धूल, सूक्ष्म कण और दूसरे पर्यावरणीय दबाव भी असर डालते हैं। अलग-अलग प्रदूषण स्रोतों की भूमिका का सही आकलन करना जरूरी है।
समय के साथ रिफाइनरी में प्रदूषण नियंत्रण की व्यवस्थाएं बेहतर की गईं। इनमें सल्फर रिकवरी और स्वच्छ ईंधन बनाने की तकनीकें शामिल हैं।
ताजमहल की सुरक्षा के लिए व्यापक ताज ट्रेपेजियम जोन में भी कई तरह की पाबंदियां लागू की गई हैं।
इस विवाद ने औद्योगिक प्रदूषण और ऐतिहासिक धरोहरों की सुरक्षा पर ध्यान बढ़ाया। यह संदेश मजबूत हुआ कि विश्वप्रसिद्ध स्मारक के आसपास उद्योगों को कड़े पर्यावरणीय मानकों का पालन करना चाहिए।
दूसरी तरफ, रिफाइनरी का आर्थिक महत्व भी है।
यह उत्तरी भारत और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति करती है। इसकी क्षमता सालाना 60 लाख टन से बढ़कर 80 लाख टन हो गई है।
रिफाइनरी रोजगार, सरकारी राजस्व, औद्योगिक गतिविधियों और ईंधन की आपूर्ति में योगदान देती है। इसकी तकनीकी व्यवस्थाओं में सुधार से स्वच्छ ईंधन बनाने में भी मदद मिली है।
क्या ताजमहल की सुरक्षा से समझौता करके ये फायदे हासिल किए जा सकते थे? बिल्कुल नहीं।
लेकिन क्या प्रदूषण का जोखिम होने भर से यह निष्कर्ष निकाल लिया जाए कि रिफाइनरी बननी ही नहीं चाहिए थी?
इस निष्कर्ष के लिए भी ठोस सबूत चाहिए।
रिफाइनरी का संचालन और उसके साथ पर्यावरणीय पाबंदियों का बढ़ना बताता है कि उद्योग और धरोहर संरक्षण साथ चल सकते हैं। लेकिन इसके लिए सुरक्षा उपाय प्रभावी होने चाहिए और उनका लगातार पालन भी होना चाहिए।
सबक यह नहीं कि पर्यावरण संबंधी चेतावनियों को खारिज कर दिया जाए। सबक यह है कि चेतावनियों के जवाब में बेहतर नियम, स्वच्छ तकनीक और नतीजों की नियमित जांच होनी चाहिए। हर उद्योग को बिना सोचे-समझे खारिज कर देना समाधान नहीं है।
विकास को चाहिए सबूत, अंतहीन मुकदमे नहीं
गुजरात के पीपावाव बंदरगाह का मामला इस बहस को फिर सामने ले आया है।
11 मई 2026 की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण संरक्षण के नाम पर विकास परियोजनाओं को बार-बार चुनौती देने की प्रवृत्ति पर सवाल उठाए।
इस चिंता पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। जब बुनियादी ढांचे की परियोजनाएं लंबे मुकदमों में उलझ जाती हैं, तो नुकसान केवल सरकार या कंपनियों को नहीं होता।
परियोजनाओं में देरी से लागत बढ़ती है। रोजगार के अवसर टलते हैं। निवेशकों का भरोसा डगमगा सकता है। जरूरी सुविधाएं वर्षों तक अधूरी रह सकती हैं।
इसका सबसे ज्यादा नुकसान गरीब और पिछड़े इलाकों के लोगों को हो सकता है। उन्हें पानी, बिजली, सड़क और रोजगार की जरूरत सबसे अधिक होती है।
भारत को विकास और पर्यावरण में से किसी एक को चुनने की जरूरत नहीं है। जरूरत ऐसी व्यवस्था की है, जिसमें परियोजना बनाने वालों और उसका विरोध करने वालों, दोनों को अपने दावों के समर्थन में सबूत देने पड़ें। कानून तोड़ने पर अदालतों को हस्तक्षेप करना चाहिए। लेकिन मुकदमेबाजी तथ्यों पर आधारित फैसलों का विकल्प नहीं बननी चाहिए।
नर्मदा की परियोजनाएं बताती हैं कि बांध पानी और बिजली उपलब्ध कराने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। साथ ही, विस्थापन और पुनर्वास की जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता।
टिहरी दिखाता है कि बड़े इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट कितने उपयोगी हो सकते हैं। लेकिन उनकी सुरक्षा की लगातार निगरानी भी जरूरी है।
मथुरा रिफाइनरी बताती है कि उद्योग और ऐतिहासिक धरोहरों का संरक्षण साथ चल सकते हैं। शर्त यही है कि पर्यावरणीय नियमों का प्रभावी पालन हो।
इन उदाहरणों से एक बात साफ होती है। हर परियोजना का आंख मूंदकर विरोध करना सही रास्ता नहीं है। भारत को असली पर्यावरण रक्षक चाहिए, केवल बैठे-बिठाए खतरे गिनाने वाले नहीं। देश को सुरक्षा उपायों के साथ विकास चाहिए, बिना सबूत के अड़ंगे नहीं।
पर्यावरण संरक्षण बहुत गंभीर विषय है। इसे राजनीतिक हथियार नहीं बनना चाहिए। और विकास भी इतना जरूरी है कि उसे बिना प्रमाण के डर और आशंकाओं के हवाले नहीं छोड़ा जा सकता।