नदियों को क्रांति का वादा था, मिला भाषणों का सैलाब
भारत को अब नारा नहीं, राष्ट्रीय नदी नीति चाहिए
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बृज खंडेलवाल द्वारा
8 अक्टूबर 2026
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क्या आपने कभी ऐसी व्यवस्था देखी है जो पवित्र नदियों को बचाने के लिए सबसे ज्यादा भाषण दे और नदियां फिर भी मरती रहें?
भारत ने यह प्रयोग करीब एक दशक से देख लिया है।
सत्ता में आने के बाद एनडीए सरकार ने नदियों को लेकर बड़े सपने दिखाए। गंगा साफ होगी, यमुना बहेगी, नदियाँ जुड़ेंगी, जलमार्ग बनेंगे, नावें चलेंगी और नदी पर्यटन देश की नई तस्वीर बनाएगा।
सुनकर लगा था कि अब नदियों के अच्छे दिन आने वाले हैं।
लेकिन नदी की हालत देखकर लगता है कि अच्छे दिन शायद भाषण मंच पर ही आकर रुक गए।
सबसे दिलचस्प उदाहरण यमुना है।
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने दिल्ली से आगरा तक यमुना में फेरी चलाने का सपना दिखाया था। पर्यटक नाव में बैठेंगे, यमुना की लहरों का आनंद लेंगे और आखिर में ताजमहल के सामने उतरेंगे।
क्या शानदार तस्वीर थी!
बस एक छोटी-सी समस्या रह गई।
नदी कहाँ थी?
नावें नहीं आईं। जलमार्ग नहीं बना। ताज वहीं है। दिल्ली भी वहीं है। आगरा भी वहीं है। लेकिन यमुना आज भी कई जगह पानी से ज्यादा सीवेज, झाग और कचरे का बोझ ढो रही है।
वादे खूब बहे। नदी नहीं बही।
यही भारत की नदी राजनीति का सबसे बड़ा मजाक है।
सरकारें सड़क बना सकती हैं, पुल बना सकती हैं, हवाई अड्डे बना सकती हैं। हजारों करोड़ की परियोजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन कर सकती हैं। लेकिन नदी को जीवित करने के मामले में देश अभी भी फाइलों, समितियों और घोषणाओं के दलदल में फँसा है।
दस साल किसी सरकार के लिए कम समय नहीं होता।
एक दशक में शहरों का नक्शा बदल सकता है। एक्सप्रेसवे बन सकते हैं। नए हवाई अड्डे खड़े हो सकते हैं। लेकिन नदी?
नदी अब भी “काम प्रगति पर है” की पट्टी लगाए बैठी है।
भाषण राष्ट्रीय, जिम्मेदारी किसी की नहीं
भारत के पास वैज्ञानिक हैं। इंजीनियर हैं। पैसा है। तकनीक है। मंत्रालय हैं। समितियाँ हैं। मिशन हैं। योजनाएँ हैं।
कमी सिर्फ एक चीज की दिखती है।
लगातार राजनीतिक इच्छाशक्ति की।
नदी की सफाई के नाम पर पैसा खर्च होता है। ट्रीटमेंट प्लांट बनते हैं। बैठकें होती हैं। रिपोर्टें तैयार होती हैं। फिर नई योजना आती है।
लेकिन मूल सवाल वहीं खड़ा रहता है।
नदी की सेहत का जिम्मेदार कौन है?
यही हमारी व्यवस्था का कमाल है। नदी राष्ट्रीय है, लेकिन उसकी जिम्मेदारी टुकड़ों में बँटी है।
एक राज्य पानी रोकता है। दूसरा सीवेज छोड़ता है। तीसरा बाँध बनाता है। चौथा कम प्रवाह की शिकायत करता है।
नदी सबकी है, इसलिए व्यवहार में वह किसी की नहीं है।
और नदी की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि वह वोट नहीं देती।
नदी नाली नहीं है
नदी में पानी भर देना ही नदी बचाना नहीं है।
नदी एक जीवित व्यवस्था है। उसके साथ भूजल है, तालाब हैं, आर्द्रभूमियाँ हैं, सहायक नदियाँ हैं, मछलियाँ हैं, जंगल हैं, बाढ़ क्षेत्र हैं और प्राकृतिक गाद का प्रवाह है।
इन सबको मारकर सिर्फ नदी के पानी की जांच कर लेना वैसा ही है जैसे मरीज का तापमान देखकर उसे स्वस्थ घोषित कर देना।
नदी का रंग साफ हो सकता है, लेकिन नदी फिर भी बीमार हो सकती है।
इसलिए देश को हर प्रमुख नदी के लिए राष्ट्रीय नदी स्वास्थ्य सूचकांक चाहिए।
हर साल सार्वजनिक रिपोर्ट आए।
कितना पानी है? कितना प्राकृतिक प्रवाह है? भूजल की स्थिति क्या है? मछलियाँ बची हैं या नहीं? आर्द्रभूमियाँ कितनी बची हैं? बाढ़ क्षेत्र पर कितना कब्जा है? कितना सीवेज गिर रहा है? उद्योग कितना प्रदूषण कर रहे हैं?
और रिपोर्ट सिर्फ पढ़ी न जाए।
उस पर कार्रवाई भी हो।
नदी प्रदूषित हो तो जिम्मेदार अधिकारी भी दिखे।
अब यह व्यवस्था बदलनी होगी।
जहाँ लगातार सीवेज नदी में जा रहा है, वहाँ जिम्मेदारी तय हो। जहाँ उद्योग नियम तोड़ रहे हैं, वहाँ सिर्फ मामूली जुर्माना नहीं, कठोर कार्रवाई हो। जहाँ बाढ़ क्षेत्र पर कब्जा हो रहा है, वहाँ अनुमति देने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय हो।
बिना जवाबदेही के नदी पुनर्जीवन सिर्फ सरकारी शब्दावली है।
नदी पर्यटन अच्छी बात है। नौवहन भी उपयोगी हो सकता है। लेकिन नाव चलाने से पहले नदी में पानी होना चाहिए।
सूखी या प्रदूषित नदी पर पर्यटन का सपना कागज पर ही अच्छा लगता है।
पहले नदी बचाइए।
फिर नाव चलाइए।
दिल्ली से आगरा की फेरी का सपना इसलिए याद रखने लायक है क्योंकि उसने सरकार की प्राथमिकता का एक मजेदार सच सामने रखा।
ताज तक नाव पहुँचाने का सपना था, लेकिन ताज के पास बहती यमुना को बचाने की कोई समयसीमा नहीं थी।
आस्था और नदी दोनों बच सकती हैं
भारत की नदियाँ करोड़ों लोगों की आस्था हैं। पूजा, स्नान और धार्मिक आयोजन हमारी सामाजिक परंपरा का हिस्सा हैं।
लेकिन आस्था का अर्थ नदी में कूड़ा डालना नहीं हो सकता।
सरकार घाटों पर सफाई, शौचालय, कूड़ा प्रबंधन और पूजा सामग्री के संग्रह की व्यवस्था करे। विसर्जन के लिए वैज्ञानिक और सुरक्षित स्थान बनाए जाएँ।
धर्म को नदी से लड़ाने की जरूरत नहीं है। व्यवस्था को ईमानदार बनाने की जरूरत है।
नदी का इलाज किनारे से शुरू नहीं होता
नदी बचाने का असली काम नदी से दूर शुरू होता है।
जंगल कट रहे हैं। तालाब गायब हो रहे हैं। भूजल निकाला जा रहा है। रेत खनन बढ़ रहा है। बाढ़ क्षेत्र में कॉलोनियाँ बन रही हैं। शहर प्राकृतिक नालों को निगल रहे हैं।
फिर हम नदी में जाकर कचरा निकालते हैं और घोषणा कर देते हैं कि नदी बच गई।
नदी का पूरा बेसिन बचाना होगा।
सहायक नदियाँ, तालाब, आर्द्रभूमियाँ, भूजल क्षेत्र, बाढ़ मैदान और प्राकृतिक जल निकासी सभी राष्ट्रीय नदी नीति का हिस्सा होने चाहिए।
अब राष्ट्रीय नदी नीति का समय है
भारत की बड़ी नदियाँ राज्यों की सीमाएँ नहीं पहचानतीं।
फिर नदी नीति राज्य की सीमाओं में क्यों कैद रहे?
गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी और दूसरी नदियों के लिए नदी बेसिन को योजना की मूल इकाई बनाना होगा।
देश को एक मजबूत राष्ट्रीय नदी नीति और राष्ट्रीय नदी कानून चाहिए।
इसके तहत एक प्रभावी राष्ट्रीय नदी प्राधिकरण हो। वैज्ञानिक पर्यावरणीय प्रवाह तय हो। अंतरराज्यीय जल बँटवारा पारदर्शी हो। नदी स्वास्थ्य की नियमित स्वतंत्र जांच हो। और नियम तोड़ने वालों की जिम्मेदारी तय हो।
जनता को भी इस व्यवस्था का हिस्सा बनाना होगा। नदी किनारे रहने वाले लोग सबसे पहले जानते हैं कि नदी कब कमजोर पड़ रही है। मछुआरे जानते हैं कि मछलियाँ कब गायब हुईं। किसान जानते हैं कि भूजल कब नीचे गया।
उनकी आवाज को सरकारी फाइलों में जगह मिलनी चाहिए।
अब भाषण नहीं, हिसाब चाहिए
एक दशक बीत गया।
नदियों के लिए बड़े-बड़े वादे हुए। मिशन बने। योजनाएँ आईं। पैसा खर्च हुआ। भाषण हुए। तस्वीरें खिंचीं।
लेकिन सवाल आज भी वही है।
भारत की नदियाँ वास्तव में कितनी स्वस्थ हुईं?
अब सरकार को यह बताने से काम नहीं चलेगा कि उसने कितने करोड़ खर्च किए।
उसे बताना होगा कि नदी में कितना पानी लौटा।
कितनी मछलियाँ लौटीं।
कितनी आर्द्रभूमियाँ बचीं।
कितना सीवेज रुका।
कितने अतिक्रमण हटे।
और कितने अधिकारियों से जवाब माँगा गया।
क्योंकि नदी कोई चुनावी घोषणा नहीं है।
नदी कोई मंत्रालय की फाइल नहीं है।
नदी कोई उद्घाटन पट्टिका नहीं है।
नदी जीवन है।
और अगर भारत विश्व शक्ति बनने का सपना देखता है, तो उसे अपनी नदियों को मरने नहीं देना होगा।
नावें बाद में चलेंगी।
पहले नदी बहने दीजिए।
नारे बहुत हो गए। भाषण बहुत हो गए। अब नदी को पानी चाहिए, जगह चाहिए, स्वच्छता चाहिए, जीवन चाहिए और भविष्य चाहिए।