Tuesday, September 29, 2026

 गांधी तो मर गए, पर उनके सवाल जिंदा हैं  

क्या हिंसा, लालच और तपती ज़मीन से जूझती यह दुनिया महात्मा गांधी को अनदेखा कर सकती है?

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बृज खंडेलवाल  द्वारा

1 अक्टूबर, 2026

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वर्तमान दौर के भारत में महात्मा गांधी आउट ऑफ फैशन हैं। ये अलग बात है कि विदेशों में भारत की पहचान महात्मा गांधी से ही है। विदेशी मेहमानों को आज भी सबसे पहले राज घाट स्मारक पर ले जाया जाता है।

तो क्या गांधी गलत थे, या दुनिया के लालची इरादे ही सही थे?  

वह आदमी जिसने लाठी हाथ में लेकर नहीं बल्कि अहिंसा की ताकत दिखाकर रास्ता बताया था, आज की मिसाइलों, परमाणु हथियारों, लड़ाकू विमानों और अरबों डॉलर की दौलत वाली दुनिया में अजीब लगने लगा है। उनका चरखा अब स्मार्टफोन से बदल गया है, चिट्ठियों की जगह व्हाट्सऐप ने ले ली है, और सादगी के बदले “ज्यादा पाने, ज्यादा दिखाने” की होड़ लगी है।

फिर भी विडंबना देखिए: जितनी तेजी से दुनिया आधुनिक हो रही है, उतनी ही बेचैनी से उसे गांधी के मूल्यों की ज़रूरत महसूस हो रही है।  

दुनिया बाहर और अंदर दोनों तरह से जल रही है। ग्लोबल वार्मिंग मौसम बदल रही है।  युद्ध शहरों को खंडहर बना रहे हैं। नफ़रत आतंक को ताकत दे रही है। असमानता बढ़ रही है, जबकि कुछ लोग अकूत दौलत जमा कर रहे हैं। करोड़ों लोग तनाव और अकेलेपन से जूझ रहे हैं, और सोशल मीडिया पर फ़रेब और शोर के पिरामिड खड़े हो रहे हैं।  

इन सब के बीच गांधी एक असुविधाजनक सवाल पूछते दिखते हैं: आखिर कितना काफ़ी है?  

गांधी का दर्शन सिर्फ़ चरखा, उपवास या अंग्रेजों के ख़िलाफ़़ लड़ाई नहीं था। उसके बीच में थे सत्य, अहिंसा, आत्मसंयम, सादगी, निर्भीकता, समानता, स्थानीय आत्मनिर्भरता और हर इंसान के इज़्ज़त का ख़्याल।  

उनके व्रतों में सत्य और अहिंसा सबसे आगे थे; साथ में अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य (इंद्रिय संयम), अपरिग्रह (ज़रूरत से ज़्यादा न जमा करना), शरीरिक श्रम, स्वाद पर क़ाबू, सभी धर्मों का इज़्ज़त और अस्पृश्यता का उन्मूलन भी शामिल था।

पहली नज़र में ये किसी आश्रम के नियम लग सकते हैं। पर सोचिये: क्या यह सभ्य समाज के लिए भी ज़रूरी नहीं है, जो अपनी ही बनाई समस्याओं के दल दल में फँसता जा रहा है?

सत्य की बात लीजिए। जब राजनीति में प्रचार-प्रपंच और झूठ बढ़ जाए, विज्ञापन हमारी ज़रूरतों को इच्छाओं में बदल दें और झूठ सच से तेज़ी से फैले, तो गांधी का सत्य बहुत आधुनिक लगता है।  

अहिंसा को देखिए। जब किसी राष्ट्र के पास लाखों लोगों को नष्ट करने की ताकत हो, तब गांधी का सवाल और भी ज़्यादा चुनौती देता है, क्या हिंसा से स्थायी शांति मिल सकती है?

गांधी का उत्तर था सत्याग्रह: सत्य की ताकत, अहिंसक प्रतिरोध, सविनय अवज्ञा और आत्मबल: दोषी को मिटाने की बजाय उसके अंदर की समझ को जगाना। आज की बदले की राजनीति में यह विचार सबसे कठिन और शायद सबसे ज़रूरी है। हम किसी ग़लती पर उसे गलत से ज़्यादा बदले में टुकड़े करना चाहते हैं, और इसे हम रणनीति कह देते हैं। गांधी इसे जाल कहते थे।

आर्थिक सोच में भी गांधी आज के उपभोक्तावादी तंत्र को बेचैन करते हैं। उन्होंने कहा कि अर्थशास्त्र को नैतिकता से अलग नहीं रखा जा सकता। ज़्यादा दौलत रखने वाले को इसे समाज की अमानत समझना चाहिए, यही उनका ट्रस्टिशिप सिद्धांत था। सर्वोदय का मतलब सबका कल्याण, पर शुरुआत सबसे कमज़ोर से।

उनका यह वाक्य शायद हर कंपनी की दीवार पर होना चाहिए:  

“धरती हर व्यक्ति की ज़रूरतें पूरी करने के लिये काफ़ी है, पर हर व्यक्ति के लालच के लिये नहीं।”  

जलवायु संकट ने इस बात को और कड़ा कर दिया है। हम ज़्यादा खोदते हैं, ज़्यादा बनाते हैं, ज़्यादा फेंकते हैं, और आश्चर्य करते हैं कि धरती हांफ क्यों रही है। हमने उपभोग को सफलता का पैमाना बना लिया है। गांधी पूछते, क्या हमारी यह सफलता धीरे-धीरे हमारी विफलता बन रही है?

उनका अपरिग्रह हमें यह नहीं कहता कि आधुनिकता छोड़ दो; वह बस पूछता है: क्या हर इच्छा को खरीदकर पूरा करना ज़रूरी है? उनका स्वदेशी दरवाज़े बंद करने की बात नहीं करता था, बल्कि स्थानीय हुनर और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने की सलाह देता था। और शरीर श्रम यह सिखाता था कि इज़्ज़त सिर्फ़ कुर्सी पर बैठे लोगों की बात नहीं है।

शायद आज गांधी की सबसे बड़ी चुनौती हमारी अपनी ज़िन्दगी है:  

क्या हम कम ख़पत कर सकते हैं? कम नफ़रत? कम भंडार? कम डर? ज़्यादा सुनना? ज़्यादा बाँटना?

आधुनिक सभ्यता ने अद्भुत ताकत पा ली है, पर आत्मसंयम खो रहा है। हम दूसरे ग्रह भेज सकते हैं, पर अपना गुस्सा काबू में लाना अब भी मुश्किल लगता है। हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बना रहे हैं, पर मानवीय पारखी समझ तलाश रहे हैं। यही गांधी की विडंबना है: दूरियाँ घट गईं, मगर नफ़रत नहीं; परमाणु हासिल कर लिए, पर क्रोध नहीं; बीमारी से लड़ लिए, पर लालच पर जीत नहीं।

तो क्या गांधीवाद अप्रासंगिक है? नहीं।

दुनिया को गांधी की पूजा करने की ज़रूरत नहीं, न ही उनकी मूर्ति पर सवाल उठाना पाप घोषित करने की। ज़रूरत है उन असुविधाजनक सवालों को सुनने की जो गांधी ने छोड़े हैं:

- अगर धरती रहने लायक ही न रहे तो विकास का क्या मतलब?  

- अगर करोड़ों लोग पीछे छूट जाएँ तो समृद्धि किस काम की?  

- अगर शांति के नाम पर हमेशा युद्ध की तैयारी करनी पड़ी तो वह शांति कैसी?  

- अगर डर हमारे फ़ैसले तय करने लगे तो आज़ादी कैसी?  

- और अगर खुश रहने के लिये हमें लगातार और खरीदारी करनी पड़े तो यह कैसी सभ्यता है?

गांधी ने कोई जादू की छड़ी नहीं दी थी। उन्होंने एक मुश्किल चीज दी थी: नैतिक दिशा-निर्देश। दुनिया गांधी को अनदेखा कर सकती है: यह उसका हक़ है। मगर सत्य, संयम, करुणा और अहिंसा की अनदेखी करने के नतीजों से बचना सम्भव नहीं।  


Monday, September 28, 2026

 


नदियाँ बचेंगी, तभी जीवन बचेगा

सुप्रीम कोर्ट ने फिर दिखाया आईना

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बृज खंडेलवाल द्वारा

29 सितंबर 2026

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सुप्रीम कोर्ट ने नदियों को लेकर सरकारों को फिर आईना दिखाया है। यमुना प्रदूषण से शुरू हुई अदालत की स्वतः संज्ञान वाली कार्यवाही अब देश की नदियों में बह रहे सीवेज और प्रदूषण के व्यापक संकट तक पहुंच चुकी है। फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि स्वच्छ पर्यावरण और साफ पानी में जीवन का अधिकार निहित है।

इसी बीच सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर तैयार यमुना एक्शन प्लान ने एक और कड़वी तस्वीर सामने रखी है। यमुना बेसिन में रोज करीब 7,999.63 मिलियन लीटर घरेलू सीवेज पैदा होता है। इसमें से लगभग 1,755.80 एमएलडी के उपचार की व्यवस्था अभी भी नहीं है। उत्तर प्रदेश में अकेले शहरी क्षेत्रों का सीवेज ट्रीटमेंट गैप करीब 940 एमएलडी बताया गया है। आगरा और मथुरा भी उन प्रमुख इलाकों में हैं, जहां बड़ी मात्रा में अनुपचारित गंदा पानी यमुना तंत्र में पहुंच रहा है।

पर्यावरणविद डॉ देवाशीष भट्टाचार्य कहते हैं, "सवाल अब केवल यह नहीं है कि यमुना कितनी प्रदूषित है। सवाल यह है कि हम नदियों को आखिर कब तक कागजों पर बचाते रहेंगे? क्या हम नदियों के बिना भारत की कल्पना कर सकते हैं?"

नदियाँ केवल बहता हुआ पानी नहीं हैं। वे हमारी सभ्यता, संस्कृति, खेती, अर्थव्यवस्था और आने वाली पीढ़ियों की जीवनरेखा हैं। गंगा हो, यमुना हो, नर्मदा हो, कावेरी हो या किसी गांव की छोटी नदी, हर नदी अपने साथ जीवन लेकर चलती है।

लेकिन आज हमारी नदियाँ संकट में हैं।

कहीं पानी कम हो रहा है। कहीं नदी का प्राकृतिक प्रवाह रोक दिया गया है। कहीं शहरों का सीवर और उद्योगों का जहरीला पानी नदी में गिर रहा है। कहीं बाढ़ क्षेत्र पर कब्जे हो रहे हैं। कहीं नदी की तलहटी गाद, प्लास्टिक और कचरे से भर रही है।

हमने नदी को जीवित धारा मानने के बजाय कभी नाला और कभी जमीन का टुकड़ा समझ लिया है।

यमुना इसका सबसे दर्दनाक उदाहरण है।

आगरा के लिए यमुना केवल एक नदी नहीं है। यह शहर की आत्मा है। यह ब्रज की संस्कृति, आस्था और इतिहास का हिस्सा है। इसके किनारे घाट बने, मंदिर बसे, बस्तियां विकसित हुईं और लोक परंपराओं ने जन्म लिया। ताजमहल भी इसी नदी के किनारे खड़ा होकर सदियों से इसकी कहानी कह रहा है।

लेकिन आज ताजमहल के सामने सवाल सिर्फ उसकी खूबसूरती का नहीं है। सवाल उस नदी का है, जिसकी गोद में ताज का प्रतिबिंब दिखाई देता था।

अगर नदी में स्वच्छ और पर्याप्त पानी ही नहीं रहेगा, तो घाटों की सजावट और रोशनी किस काम की?

नदी को सजाने से पहले उसे बचाना होगा।

नदी का मतलब केवल पानी नहीं है। नदी का मतलब है उसका प्राकृतिक प्रवाह, साफ पानी, जीवंत तल और अपना बाढ़ क्षेत्र। नदी को सांस लेने की जगह चाहिए। उसका रास्ता रोककर, उसके किनारे कब्जा करके और उसमें गंदा पानी डालकर हम नदी को जिंदा नहीं रख सकते।

यही सवाल रिवर कनेक्ट कैंपेन वर्षों से उठा रहा है।

हमारी मांग साफ है। यमुना की तलहटी से गाद, कचरा और प्रदूषक निकाले जाएं। जरूरत के अनुसार डीसिल्टिंग और ड्रेजिंग हो। सभी नालों को टैप किया जाए। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट कागजों पर नहीं, पूरी क्षमता से जमीन पर चलें। औद्योगिक प्रदूषण पर सख्त निगरानी हो और जिम्मेदारी तय की जाए।

आगरा में यमुना पर बैराज की मांग भी लंबे समय से उठती रही है। यह मुद्दा बार बार सामने आता है, लेकिन फिर फाइलों और आश्वासनों के बीच कहीं खो जाता है। आगरा की जल जरूरतों और यमुना के पर्यावरणीय हितों को साथ रखकर इसका गंभीरता से अध्ययन और निर्णय होना चाहिए।

अब समय आ गया है कि केंद्र और राज्य सरकारें नदियों को अलग अलग योजनाओं की नजर से देखना बंद करें।

भारत को एक व्यापक राष्ट्रीय नदी नीति चाहिए।

ऐसी नीति में हर नदी के लिए न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह सुनिश्चित हो। प्राकृतिक बाढ़ क्षेत्र सुरक्षित हों। सीवर और औद्योगिक प्रदूषण की जिम्मेदारी स्पष्ट हो। भूजल, बांध, बैराज, रेत, जलग्रहण क्षेत्र और नदी किनारे की जमीन को एक समग्र व्यवस्था में देखा जाए।

नदी नीति केवल सरकारी फाइल न बने। इसमें वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों, किसानों, मछुआरों, नदी किनारे रहने वाले लोगों और नागरिक संगठनों की भागीदारी हो।

क्योंकि नदी केवल सरकार की नहीं होती। नदी समाज की होती है।

रिवर कनेक्ट अभियान का संकल्प साफ है। नदी बचेगी तो खेत बचेंगे। खेत बचेंगे तो किसान बचेंगे। पानी बचेगा तो शहर बचेंगे। नदी बचेगी तो संस्कृति बचेगी।

यमुना को अविरल और निर्मल बनाना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। सरकार की जवाबदेही जरूर है, लेकिन समाज की भागीदारी भी जरूरी है।

हमें नदी को नाला बनने से रोकना होगा।

नदी को जमीन बनने से रोकना होगा।

नदी को कूड़ेदान बनने से रोकना होगा।

और सबसे बढ़कर, नदी को फिर से नदी बनाना होगा।

क्योंकि आने वाली पीढ़ियां हमसे पूछेंगी कि जब नदियां मर रही थीं, तब हमने क्या किया था?

Saturday, September 19, 2026

 


हीडलबर्ग से ब्लैक फॉरेस्ट: जहां जंगल फुसफुसाता है और कोयल वक्त बताती है

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बृज खंडेलवाल द्वारा

जर्मनी

20 सितंबर, 2026

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शहर अचानक गायब हो गया।

एक पल पहले तक हमारी बस हीडलबर्ग की पुरानी गलियों, नेकर नदी, पहाड़ी पर खड़े लाल बलुआ पत्थर के खंडहरनुमा महल और ओल्ड ब्रिज की खूबसूरत मेहराबों को पीछे छोड़ रही थी। अगले ही पल लगा, जैसे बस जर्मनी के किसी बिल्कुल दूसरे हिस्से में दाखिल हो गई हो।

इमारतें गायब। पेड़ बढ़ते गए। दोनों ओर पहाड़ उठ खड़े हुए। घनी हरी शाखाओं के बीच से धूप छनकर आ रही थी, जैसे उसे भी जंगल में दाखिल होने की इजाज़त लेनी पड़ रही हो।

यह सफर कम और किसी परी-कथा की शुरुआत ज्यादा लग रहा था।

नाम जरूर थोड़ा डरावना है: ब्लैक फॉरेस्ट!

नाम सुनते ही आंखों के सामने घना अंधेरा जंगल, रहस्यमय रास्ते, चुड़ैलें, परियां और पेड़ के पीछे छिपा कोई भेड़िया घूमने लगता है। रोमनों ने इसकी घनी और छायादार हरियाली देखकर इसे Silva Nigra, यानी काला जंगल कहा था। जर्मन इसे श्वार्ज़वाल्ड कहते हैं।

लेकिन यहां पहुंचकर पहला ताज्जुब यही हुआ:

ब्लैक फॉरेस्ट काला कम और हरा ज्यादा है।

हमारी टीचर और गाइड लेडी मार्था ने बताया कि दक्षिण-पश्चिमी जर्मनी का यह विशाल पहाड़ी इलाका देवदार, स्प्रूस और बीच के घने पेड़ों, लहरदार पहाड़ियों, झरनों, झीलों, पुराने गांवों और ढलानदार छतों वाले लकड़ी के मकानों के लिए मशहूर है।

कुछ ही देर पहले हम हीडलबर्ग में थे: विश्वविद्यालयों, किताबों, रोमांस और पुराने यूरोपीय आकर्षण का शहर।

अब मंज़र पूरी तरह बदल चुका था।

गगनचुंबी इमारतों की जगह पहाड़ थे। ट्रैफिक के शोर की जगह पेड़ों की सरसराहट थी।

शेयर बाजार गायब था।

ऑक्सीजन बाजार तेज़ी से फल-फूल रहा था!

बस की खिड़की से बाहर देखते हुए लगा कि यहां प्रकृति को कभी जल्दी नहीं रही। पेड़ धीरे-धीरे बड़े हुए। पहाड़ सदियों से खड़े हैं। नदियां अपनी मर्ज़ी से रास्ता बनाती रही हैं।

जल्दी सिर्फ हमें है।

शहर में मोबाइल फोन बजता है। यहां चिड़ियां जवाब देती हैं।

शहर में हॉर्न चीखते हैं। यहां हवा पेड़ों के कान में कुछ फुसफुसाती है।

ब्लैक फॉरेस्ट ने मुझे दक्षिण भारत की नीलगिरि पहाड़ियों की याद दिला दी। दोनों जगह आधुनिक जिंदगी की वह दुर्लभ नेमत मिलती है, जिसे हमने लगभग भुला दिया है; आंखों के लिए सुकून और दिमाग के लिए खामोशी।

ब्लैक फॉरेस्ट के बड़े हिस्से को प्रकृति को अपनी रफ्तार से चलने देने की सोच के साथ संभाला जाता है। 2014 में बने ब्लैक फॉरेस्ट नेशनल पार्क का मूल विचार भी यही है कि प्रकृति को प्रकृति रहने दिया जाए।

मानो जंगल इंसानों से कह रहा हो: 

“भाई साहब, हमें अकेला छोड़ दीजिए। यह सिस्टम हम आपसे बहुत पहले से चला रहे हैं!”

और शायद जंगल सही भी कहता है।

हम इंसान हर चीज को मैनेज करना चाहते हैं: जंगल, नदियां, ट्रैफिक, बाजार, पड़ोसी और कभी-कभी दूसरों की जिंदगी भी।

जंगल को देखिए।

वह बस बढ़ता है।

ब्लैक फॉरेस्ट सिर्फ पेड़ों का नाम नहीं है। यह झरनों, झीलों, पुराने गांवों, लकड़ी के घरों और सबसे बढ़कर कुकू क्लॉक, यानी कोयल वाली घड़ियों की धरती है।

इन घड़ियों की परंपरा यहां काफी पुरानी है। 18वीं सदी में लंबे और बर्फीले जर्मन सर्दियों के दौरान किसानों और कारीगरों ने इन्हें बनाना शुरू किया। ट्राइबर्ग और उसके आसपास के इलाके आज भी इन घड़ियों के लिए मशहूर हैं।

हर घंटे छोटी-सी चिड़िया बाहर निकलती है और पूरे अनुशासन के साथ घोषणा करती है: 

“कू-कू!”

पद्मिनी अय्यर ने तुरंत टिप्पणी की:

“भारत में ऐसी घड़ी घर में लगा दी जाए तो तीसरे दिन परिवार पूछेगा, इसको बंद करने का बटन कहां है?

लेकिन यहां कोयल संस्कृति है।

हमारी घड़ियां कभी-कभी देर से चलती हैं।

यहां तो कोयल भी वक्त की पाबंद है।

जर्मन अनुशासन ने आखिरकार पक्षियों को भी पकड़ लिया!

यहां घड़ी सिर्फ समय नहीं बताती। वह कहानी सुनाती है और साथ में एक अच्छा-खासा स्मृति-चिह्न भी बेच देती है।"

फिर आया ट्राइबर्ग।

झरने का गिरता पानी, हरी पहाड़ियां और घुमावदार रास्ते ऐसा मंज़र बनाते हैं कि कैमरा खुद जेब से बाहर निकलना चाहता है।

पहले झरना देखिए।

फिर फोटो खींचिए।

फिर फोटो में खुद को देखिए।

और उसके बाद वह ऐतिहासिक वाक्य आता है:

“एक फोटो और!”

हमारी इस यूरोपीय यात्रा में “एक फोटो और” शायद दूसरे नंबर का सबसे ज्यादा इस्तेमाल हुआ वाक्य है।

पहले नंबर पर है:

“अगला टॉयलेट कितनी दूर है?” उसके बाद खाने में क्या मिलेगा?

लेकिन कई दिनों की लगातार सैर के बाद हमारे घुटनों ने भी अपनी राय देना शुरू कर दिया था।

उन्होंने साफ संदेश दिया:

“यात्रा आपकी है, घुटने हमारे हैं!”

सो हम वरिष्ठ यात्रियों ने प्रकृति के साथ एक व्यावहारिक समझौता कर लिया।

जितना आराम से देख सकते हैं, उतना ही काफी है।

हर झरने पर विजय प्राप्त करना जरूरी नहीं।

हर पहाड़ी पर चढ़ना जरूरी नहीं।

कभी-कभी दूर खड़े होकर प्रकृति की खूबसूरती का लुत्फ लेना भी काफी होता है।

उम्र एक बड़ी बात सिखाती है:

हर जगह पहुंचना जरूरी नहीं।

जहां पहुंच जाएं, वहां खुश रहना जरूरी है।

और फिर आया दिन का सबसे अहम अध्याय:

लंच!

ब्लैक फॉरेस्ट के बीच निलेश देसाई ने अपने रेस्तरां में हमारा स्वागत किया। और फिर ऐसा खाना सामने आया कि जर्मनी में अचानक घर की खुशबू महसूस होने लगी।

दही वड़ा।

आलू टिक्की।

कढ़ी।

खिचड़ी।

और साथ में असली ब्लैक फॉरेस्ट केक: चेरी और क्रीम से बना वह मशहूर केक, जिसकी जड़ें इसी इलाके से जुड़ी हैं।

हमने ब्लैक फॉरेस्ट के नाम पर दुनिया भर में बहुत केक खाए हैं।

लेकिन असली ब्लैक फॉरेस्ट के बीच बैठकर ब्लैक फॉरेस्ट केक खाना एक बेहद लज़ीज़ इत्तेफाक था।

जंगल जर्मन था।

खाना हिंदुस्तानी था।

और हमारे पेट को इस सांस्कृतिक मेल-मिलाप से कोई शिकायत नहीं थी।

धन्यवाद, लेडी मार्था!

कहते हैं, प्यार का रास्ता पेट से होकर जाता है।

हमारे मामले में कढ़ी और खिचड़ी ने तो दिल तक जाने के लिए एक्सप्रेसवे पकड़ लिया।

विदेश यात्रा में शाकाहारी पर्यटक के लिए खाना भी अपने आप में एक पर्यटन स्थल बन जाता है।

आप महल देखने निकलते हैं। संग्रहालय देखते हैं। झरने खोजते हैं।

लेकिन आखिर में पेट ही यात्रा का कार्यक्रम तय करने लगता है।

सुबह बस में गीता जी के भजन और “राधे-राधे” की गूंज अभी भी कानों में थी।

एक तरफ ब्रज की राधा थीं।

दूसरी तरफ जर्मनी का श्वार्ज़वाल्ड।

भाषा अलग।

मौसम अलग।

संस्कृति अलग।

लेकिन संगीत और प्रकृति में एक खूबसूरत समानता है:

उन्हें पासपोर्ट नहीं चाहिए।

अमेरिका से आईं गीता जी जिनकी जड़ें बिहार के भागलपुर में हैं,  के भजनों ने हमारी सुबह को आध्यात्मिक रंग दिया था। अब वही बस जंगलों के बीच आगे बढ़ रही थी और प्रकृति जैसे अपनी खामोश इबादत में लगी थी।

कहीं नदी बह रही थी।

कहीं कोयल घंटे का ऐलान कर रही थी।

और हमारे भारतीय पर्यटक दल के भीतर एक बेहद व्यावहारिक सवाल अब भी जिंदा था:

“अगला टॉयलेट कितनी दूर है?”

यही तो यूरोप है;

आध्यात्मिकता, खूबसूरती और सैनिटेशन: तीनों एक साथ!

इस यूरोपीय सफर में एक बात बार-बार सामने आई है।

शहर हमें तेज़ चलना सिखाते हैं।

प्रकृति हमें ठहरना सिखाती है।

और ब्लैक फॉरेस्ट में ऐसा लगा कि सिर्फ हवा को जल्दी थी।

शायद यही इस जंगल का सबसे बड़ा पैगाम है।

हर चीज को जल्दबाज़ी में करना जरूरी नहीं।

कभी-कभी जिंदगी को पेड़ की तरह खड़ा रहने देना चाहिए।

यहां पेड़ भाषण नहीं देते।

पहाड़ अपनी उपलब्धियों की सूची नहीं छापते।

नदी सोशल मीडिया पर सेल्फी नहीं डालती।

वे बस मौजूद हैं।

और आज की शोर-भरी दुनिया में शायद यही सबसे बड़ी दौलत है।

खामोशी भी एक ज़ुबान है।

कुछ ही दिन पहले हम एम्स्टर्डम की नहरों के किनारे थे।

फिर ब्रसेल्स आया।

एक ही दिन में हमारी बस की खिड़की से तीन देश गुजर गए।

हीडलबर्ग ने यूरोप का बौद्धिक और रोमानी चेहरा दिखाया।

अब ब्लैक फॉरेस्ट यूरोप का एक और चेहरा सामने ला रहा था: 

उसकी बेपनाह कुदरती खूबसूरती।

नक्शा लगातार बदल रहा था।

फोटो लगातार बढ़ रही थीं।

सूटकेस में जगह लगातार घट रही थी।

लेकिन यादों का खजाना लगातार भर रहा था।

अब सवाल यह नहीं था:

“यूरोप में और क्या देखना बाकी है?”

सवाल यह था:

“इतनी सारी यादें घर कैसे ले जाएंगे?”

सूटकेस में कपड़ों के लिए जगह भले कम पड़ जाए।

लेकिन दिमाग और दिल में यादों के लिए जगह हमेशा रहती है।

सफर जारी है।

और हमारी कहानी भी।

 


फ्रैंकफर्ट को अलविदा, हाइडलबर्ग को सलाम

पैसे, पढ़ाई और एक चुटकी रोमांस

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बृज खंडेलवाल द्वारा

फ्रैंकफर्ट–हाइडलबर्ग, जर्मनी

19 सितंबर, 2026

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एक ही दिन, तीन देश : बिना वीजा, बिना झंझट

हमारी आरामदेह टूरिस्ट बस ने एक ही दिन में फ्रांस, बेल्जियम और नीदरलैंड के किनारे पार किए। रात तक हम जर्मनी के फ्रैंकफर्ट पहुंच चुके थे। न टैंक, न सैनिक , बस कैमरा, नाश्ता, गूगल मैप और उत्सुक भारतीय वरिष्ठ नागरिकों का एक जत्था।

सड़क से यूरोप का असली चेहरा

खिड़की से दौड़ता यूरोप पोस्टकार्ड से अलग दिखता है: कोमल हरियाली, खाने-पीने वाले छोटे गाँव, हवा में मँडराती पवनचक्कियाँ, और बीच-बीच में फैक्ट्रियाँ व गोदाम। रेलवे लाइनों, खेतों और कस्बों की अपनी-अपनी कहानियाँ हैं , महल और गिरजाघर ही सब कुछ नहीं बताते। 

नदीयों का बहता इतिहास

टेम्स, सीन, एम्स्टेल और नेकर , ये नदियाँ शहरों का दूसरा चेहरा दिखाती हैं। सड़क से आप शहर देखते हैं, नदी से उसका मूड: लंदन की गंभीरता, पेरिस की रोमांटिक छाँव, एम्स्टर्डम की सहजता, और हाईडलबर्ग में नेकर के साथ पुराने मकानों की शान। साइकिलें, नावें और पतले-लम्बे मकान , सबको अपनी जगह चाहिए।

बस की छोटी-सी कूटनीति

हमारी बस ने तीन देशों की सीमाएँ पार कर दीं , बिना पूछताछ, बिना पासपोर्ट ड्रामे। पर असली ‘कूटनीति’ अंदर चली: मार्था ने यात्रियों से पलक झपकते ही फोटो-स्टॉप, सत्र और परिचय करवा दिए , “माइक लीजिए और अपने बारे में बताइए।” इतने दिन के सहयात्री अचानक परिचित बन गए।

एम्स्टर्डम से फ्रैंकफर्ट: रंग बदलते हैं

एम्स्टर्डम की नहरों और साइकिलों के बाद फ्रैंकफर्ट आभासी तौर पर अलग दुनिया थी , तेज, व्यवस्थित और पैसे का शहर। यह यूरोप का वित्तीय केंद्र है, जहाँ बैंक और कारोबार का बोलबाला है। फिर भी, इसी शहर में गोएथे का जन्मस्थान है , यानी पैसा और साहित्य साथ-साथ चलते हैं। बहुसांस्कृतिक माहौल के कारण खाने की परवाह करने वाले भारतीयों के लिये फ्रैंकफर्ट का ‘रंगोली’ रेस्टोरेंट किसी राहत से कम नहीं था: भरपेट शाकाहारी भोजन और आखिर में बड़ा कटोरा कस्टर्ड।

जलवायु परिवर्तन का सन्देश

यूरोप में गर्मी अब बड़ी चिंता बनती जा रही है। ऊँची-ऊँची इमारतें, अरबों के बैंक मदद नहीं करेंगे जब छाँव, पेड़ और खुले स्थान ज़रूरी हों। तापमान बैंक बैलेंस की परवाह नहीं करता , यही सबसे सादा सच है।

हाईडलबर्ग का धीरे-धीरे स्वागत

फ्रैंकफर्ट छोड़ते ही वातावरण बदल गया: ऊँची इमारतों की जगह पहाड़ियाँ और हरियाली। बस में सन्नाटा, फिर एक आवाज: “वो रहा हीडलबर्ग!” कैमरे फिर बाहर निकले। शहर ने शोर नहीं, शालीनता से परिचय दिया , हरी पहाड़ियाँ, पत्थर की गलियाँ, नेकर पर पुराना पुल और पहाड़ी पर बैठा हीडलबर्ग का किला। यहां इतिहास किताबों में बंद नहीं है; वह गलियों में चलता, पुलों पर ठहरता और नदी में अपना चेहरा देखता है।

फ्रैंकफर्ट और हाइडलबर्ग ,  दो चेहरे

फ्रैंकफर्ट आधुनिकता, पैसे और गिनती का शहर है; हाइडलबर्ग ज्ञान, इतिहास और थोड़े-से रोमांस का। शायद यही इन दोनों शहरों का जादू है: एक हाथ में बैंक का कैल्कुलेटर, दूसरे में कविता की पंक्ति। और नेकर किनारे खड़ा हाइडलबर्ग धीरे से कहता है: “ज़िन्दगी सिर्फ बैलेंस शीट नहीं है , थोड़ा रोमांस भी ज़रूरी है।” 



फ्रैंकफर्ट को अलविदा, हाइडलबर्ग को सलाम

पैसे, पढ़ाई और एक चुटकी रोमांस

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बृज खंडेलवाल द्वारा

फ्रैंकफर्ट–हाइडलबर्ग, जर्मनी

19 सितंबर, 2026

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एक ही दिन, तीन देश : बिना वीजा, बिना झंझट

हमारी आरामदेह टूरिस्ट बस ने एक ही दिन में फ्रांस, बेल्जियम और नीदरलैंड के किनारे पार किए। रात तक हम जर्मनी के फ्रैंकफर्ट पहुंच चुके थे। न टैंक, न सैनिक , बस कैमरा, नाश्ता, गूगल मैप और उत्सुक भारतीय वरिष्ठ नागरिकों का एक जत्था।

सड़क से यूरोप का असली चेहरा

खिड़की से दौड़ता यूरोप पोस्टकार्ड से अलग दिखता है: कोमल हरियाली, खाने-पीने वाले छोटे गाँव, हवा में मँडराती पवनचक्कियाँ, और बीच-बीच में फैक्ट्रियाँ व गोदाम। रेलवे लाइनों, खेतों और कस्बों की अपनी-अपनी कहानियाँ हैं , महल और गिरजाघर ही सब कुछ नहीं बताते। 

नदीयों का बहता इतिहास

टेम्स, सीन, एम्स्टेल और नेकर , ये नदियाँ शहरों का दूसरा चेहरा दिखाती हैं। सड़क से आप शहर देखते हैं, नदी से उसका मूड: लंदन की गंभीरता, पेरिस की रोमांटिक छाँव, एम्स्टर्डम की सहजता, और हाईडलबर्ग में नेकर के साथ पुराने मकानों की शान। साइकिलें, नावें और पतले-लम्बे मकान , सबको अपनी जगह चाहिए।

बस की छोटी-सी कूटनीति

हमारी बस ने तीन देशों की सीमाएँ पार कर दीं , बिना पूछताछ, बिना पासपोर्ट ड्रामे। पर असली ‘कूटनीति’ अंदर चली: मार्था ने यात्रियों से पलक झपकते ही फोटो-स्टॉप, सत्र और परिचय करवा दिए , “माइक लीजिए और अपने बारे में बताइए।” इतने दिन के सहयात्री अचानक परिचित बन गए।

एम्स्टर्डम से फ्रैंकफर्ट: रंग बदलते हैं

एम्स्टर्डम की नहरों और साइकिलों के बाद फ्रैंकफर्ट आभासी तौर पर अलग दुनिया थी , तेज, व्यवस्थित और पैसे का शहर। यह यूरोप का वित्तीय केंद्र है, जहाँ बैंक और कारोबार का बोलबाला है। फिर भी, इसी शहर में गोएथे का जन्मस्थान है , यानी पैसा और साहित्य साथ-साथ चलते हैं। बहुसांस्कृतिक माहौल के कारण खाने की परवाह करने वाले भारतीयों के लिये फ्रैंकफर्ट का ‘रंगोली’ रेस्टोरेंट किसी राहत से कम नहीं था: भरपेट शाकाहारी भोजन और आखिर में बड़ा कटोरा कस्टर्ड।

जलवायु परिवर्तन का सन्देश

यूरोप में गर्मी अब बड़ी चिंता बनती जा रही है। ऊँची-ऊँची इमारतें, अरबों के बैंक मदद नहीं करेंगे जब छाँव, पेड़ और खुले स्थान ज़रूरी हों। तापमान बैंक बैलेंस की परवाह नहीं करता , यही सबसे सादा सच है।

हाईडलबर्ग का धीरे-धीरे स्वागत

फ्रैंकफर्ट छोड़ते ही वातावरण बदल गया: ऊँची इमारतों की जगह पहाड़ियाँ और हरियाली। बस में सन्नाटा, फिर एक आवाज: “वो रहा हीडलबर्ग!” कैमरे फिर बाहर निकले। शहर ने शोर नहीं, शालीनता से परिचय दिया , हरी पहाड़ियाँ, पत्थर की गलियाँ, नेकर पर पुराना पुल और पहाड़ी पर बैठा हीडलबर्ग का किला। यहां इतिहास किताबों में बंद नहीं है; वह गलियों में चलता, पुलों पर ठहरता और नदी में अपना चेहरा देखता है।

फ्रैंकफर्ट और हाइडलबर्ग ,  दो चेहरे

फ्रैंकफर्ट आधुनिकता, पैसे और गिनती का शहर है; हाइडलबर्ग ज्ञान, इतिहास और थोड़े-से रोमांस का। शायद यही इन दोनों शहरों का जादू है: एक हाथ में बैंक का कैल्कुलेटर, दूसरे में कविता की पंक्ति। और नेकर किनारे खड़ा हाइडलबर्ग धीरे से कहता है: “ज़िन्दगी सिर्फ बैलेंस शीट नहीं है , थोड़ा रोमांस भी ज़रूरी है।” 



















Friday, September 18, 2026

 


ब्रसेल्स: छात्र सड़क पर, कॉकरोच मैदान में और टॉयलेट का €2 का टिकट

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बृज खंडेलवाल द्वारा

ब्रसेल्स से

18 सितंबर, 2026

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ब्रसेल्स में छात्र सड़क पर उतर आए। दिल्ली में कॉकरोच राजनीति में उतर आए। और हम भारतीय पर्यटक टॉयलेट की तलाश में उतर गए।

यूरोप में शिक्षा महंगी हो रही है। भारत में शिक्षा पर राजनीति गरम है। और दोनों के बीच एक बेचारा पर्यटक खड़ा है, जिसे सिर्फ एक मुफ्त टॉयलेट चाहिए।

यही है आज का ग्लोबल विलेज!

ब्रसेल्स में छात्र कह रहे हैं, “पढ़ाई हमारा हक है।”

दिल्ली के कॉकरोच कह रहे हैं, “हम भी यहीं हैं!”

और भारतीय पर्यटक पूछ रहा है, “भाई, टॉयलेट किधर है?”

जब छात्र सड़क पर आए

16 सितंबर को फ्रेंच भाषी छात्रों ने ब्रसेल्स में मार्च निकाला। वे बढ़ती यूनिवर्सिटी फीस और पढ़ाई से जुड़े नए नियमों का विरोध कर रहे थे। पुलिस ने करीब 750 प्रदर्शनकारी गिने, जबकि आयोजकों ने संख्या लगभग 2,000 बताई।

यानी विरोध प्रदर्शन में भी आंकड़ों की अपनी राजनीति होती है।

छात्रों की शिकायत वाजिब थी। फीस बढ़ रही है, किराया महंगा है, खाना महंगा है और बस-ट्रेन भी जेब को सलाम ठोककर चलती है।

आयोजकों के अनुसार, आधे से ज्यादा छात्रों को अब करीब €1,200 तक की नामांकन फीस देनी पड़ सकती है। पढ़ाई और रहने का कुल सालाना खर्च €8,100 से €13,600 तक पहुंच सकता है।

इतना खर्च सुनकर भारतीय माता-पिता शायद तुरंत कहें,

“बेटा, सरकारी कॉलेज देख लो।”

छात्रों का पैगाम साफ है। पढ़ाई अमीरों का विशेषाधिकार नहीं बननी चाहिए।

और यह बात उन्होंने सड़क पर आकर कह दी।

दिल्ली ने भी कमाल कर दिया

उधर दिल्ली में आंदोलन का अंदाज ही अलग है।

यहां युवाओं के एक समूह ने Cockroach Janta Party के नाम से शिक्षा और युवा मुद्दों को लेकर आंदोलन खड़ा किया है। जून में इस समूह ने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन किया था।

नाम सुनकर पहले तो लगा कि यह कोई मजाक है।

फिर पता चला कि मजाक ने बाकायदा राजनीति का रूप ले लिया है।

ब्रसेल्स में छात्र पोस्टर लेकर निकले।

दिल्ली में कॉकरोच प्रतीक बन गए।

एक के हाथ में बैनर था।

दूसरे के पास एंटीना।

दोनों ने सिस्टम को संदेश दे दिया।

“हमें नजरअंदाज मत करो।”

लोकतंत्र की खूबसूरती भी यही है। जब इंसान की आवाज नहीं सुनी जाती, तो कभी-कभी कॉकरोच भी बोलने लगते हैं।

ब्रसेल्स के पास भी कम मसले नहीं

छात्र फीस से परेशान हैं। सुरक्षा भी बड़ा सवाल है। नशे से जुड़ी हिंसा और गोलीबारी ने राजधानी की फिक्र बढ़ाई है।

फिर रूसी संपत्तियों का मामला है।

यूरोक्लियर में करीब €200 अरब की रूसी संपत्तियां जमी हुई हैं। इन्हें यूक्रेन के लिए इस्तेमाल करने को लेकर यूरोप में कानूनी और कूटनीतिक बहस चल रही है।

यानी ब्रसेल्स में सवाल छोटे नहीं हैं।

अरबों यूरो के सवाल हैं।

लेकिन आम आदमी की मुश्किलें फिर भी वही हैं।

फीस कैसे भरें?

किराया कैसे दें?

सुरक्षा कैसे मिले?

और...

टॉयलेट कहां मिले?

यूरोप की राजधानी या राजनीति का चौराहा?

ब्रसेल्स की सड़क पर चलते हुए लगता है कि यह सिर्फ बेल्जियम की राजधानी नहीं है।

यह यूरोप का राजनीतिक चौराहा है।

यहीं यूरोपीय आयोग है। यहीं यूरोपीय परिषद है। यूरोपीय संघ की परिषद है। यूरोपीय संसद का हिस्सा है। नाटो का मुख्यालय भी यहीं है।

एक सड़क पर राजनयिक मिल सकता है।

दूसरी पर पत्रकार।

तीसरी पर लॉबिस्ट।

और चौथी पर ऐसा पर्यटक, जो वॉफल खाते-खाते पूछ रहा हो,

“भाई, यहां टॉयलेट फ्री है क्या?”

ब्रसेल्स की आबादी करीब 12 लाख है और यहां लगभग 180 राष्ट्रीयताओं के लोग रहते हैं।

यानी दुनिया यहां बसती है।

और दुनिया की सबसे बड़ी समस्याएं भी शायद यहीं बैठकर चाय पीती हैं।

फिर आया मिनी यूरोप

हमारी टूर लीडर मार्था गोम्स ने हमें समझाया कि ब्रसेल्स सिर्फ यूरोपीय आयोग, नाटो और गंभीर चेहरों का शहर नहीं है।

यह चॉकलेट का शहर भी है।

वॉफल का शहर भी है।

कॉमिक्स, कैफे, संग्रहालय और आर्ट नोव्यू का शहर भी है।

फिर हम पहुंचे मिनी यूरोप।

यहां यूरोप अपने सारे झगड़े भूलकर छोटा हो गया है।

फ्रांस छोटा।

इटली छोटा।

जर्मनी छोटा।

स्पेन छोटा।

और सीमाएं इतनी छोटी कि कोई नेता उन पर भाषण भी पूरा न कर पाए।

पद्मिनी ने इसे बहुत खूबसूरती से कहा,

“यहां यूरोप सीमाओं पर बहस करना बंद कर देता है और एक छोटे से बगीचे में बदल जाता है।”

करीब 350 यूरोपीय स्मारकों के छोटे मॉडल देखकर लगा कि यूरोप को समझने का यह शायद सबसे शांत तरीका है।

न कोई पासपोर्ट।

न इमिग्रेशन।

न सामान की चिंता।

न सीमा पर सवाल।

बस चलते रहिए और यूरोप आपकी जेब में।

फिर मिला ब्रसेल्स का सबसे मशहूर लड़का

लेकिन ब्रसेल्स में घूमते हुए हमारी मुलाकात एक ऐसे लड़के से भी हुई, जो सदियों से एक ही काम कर रहा है।

पेशाब!

यह है मशहूर Manneken Pis, यानी “पेशाब करता छोटा लड़का।”

छोटी-सी कांस्य मूर्ति, लेकिन शोहरत इतनी कि दुनिया भर के पर्यटक उसे देखने पहुंचते हैं।

हम भी पहुंचे।

लड़का निश्चिंत था।

न उसे €2 के टॉयलेट की चिंता थी, न छुट्टे पैसों की।

वह अपनी जगह खड़ा होकर खुलेआम अपना काम कर रहा था।

मैंने सोचा,

“भाई, तुम्हारी किस्मत अच्छी है। यहां कोई टॉयलेट टिकट नहीं मांगता।”

हम भारतीय पर्यटक दूसरी तरफ €1 या €2 देकर पेशाब करने की सुविधा खोज रहे थे और ब्रसेल्स का यह लड़का मुफ्त में अपना काम कर रहा था।

लोकतंत्र में बराबरी कहां है?

एक कांस्य लड़का मुफ्त में।

एक भारतीय पर्यटक €2 में!

Manneken Pis की एक और खासियत है। उसके कपड़े बदलते रहते हैं। दुनिया भर से लोग उसके लिए पोशाकें भेजते हैं। कभी वह सैनिक बनता है, कभी किसी देश का प्रतिनिधि और कभी किसी खास अवसर का मेहमान।

हमारे सामने वह बस ब्रसेल्स का सबसे प्रसिद्ध बच्चा था।

उसने कुछ कहा नहीं।

लेकिन उसका संदेश साफ था।

“भाई, ज्यादा सोचो मत। प्रकृति की पुकार का अपना संविधान होता है।”

और शायद इसी वजह से वह इस शहर की राजनीति से भी ज्यादा लोकप्रिय है।

लेकिन असली यूरोप टॉयलेट में मिला

Manneken Pis देखने के बाद हमें असली यूरोप का सबसे बड़ा सांस्कृतिक झटका मिला।

टॉयलेट।

हां, टॉयलेट!

€1 या €2 देकर पेशाब करने की सुविधा।

भारतीय पर्यटक के लिए यह किसी म्यूजियम की टिकट से कम अनुभव नहीं था।

€2 यानी करीब 220 रुपये।

भारत में इतने में चाय, समोसा और कभी-कभी नाश्ता भी हो जाए।

यहां प्रकृति की पुकार सुनते ही जेब पुकारने लगती है।

“भाई, पहले मुझे देखो!”

पद्मिनी को यह परेशानी दो बार झेलनी पड़ी। उनके पास €100 का नोट था, लेकिन छोटे सिक्के नहीं थे।

टॉयलेट को सिक्के चाहिए।

बैंक नोट नहीं।

यूरोप में बैंकिंग इतनी आधुनिक हो गई है कि कभी-कभी €100 का नोट भी बेकार लगता है।

और तब समझ आया कि असली यूरोपीय संकट रूस की संपत्ति नहीं है।

छुट्टे पैसे हैं।

हमने Manneken Pis को याद किया।

वह मुफ्त में काम कर रहा था।

हम €2 जुटाने में लगे थे।

इतिहास में पहली बार लगा कि एक छोटी-सी मूर्ति ने भारतीय पर्यटक को अर्थशास्त्र का सबसे बड़ा पाठ पढ़ा दिया।

मार्था बनीं हमारी टॉयलेट मंत्री

हमारी टूर लीडर मार्था धीरे-धीरे समूह की अनौपचारिक टॉयलेट मंत्री बन गईं।

उनकी सबसे जरूरी जानकारी कभी-कभी यह नहीं होती थी कि अगला महल कौन-सा है।

सवाल होता था,

“अगला वॉशरूम कहां है?”

महल बाद में देखा जा सकता है।

मूत्राशय लोकतंत्र की तरह इंतजार नहीं करता।

मार्था ने हमें यूरोप के महल दिखाए।

म्यूजियम दिखाए।

स्मारक दिखाए।

लेकिन सबसे बड़ी सेवा यह की कि हमारी किडनी को यूरोप यात्रा पूरी करवाई।

इसे कहते हैं असली टूर मैनेजमेंट।

भारत में मामला थोड़ा अलग है

भारत में पेट्रोल पंप है।

ढाबा है।

होटल है।

सुलभ शौचालय है।

और कुछ भारतीय पुरुषों के पास तो अपनी निजी ‘ओपन एयर व्यवस्था’ भी है।

बस दीवार देखी और काम खत्म।

यूरोप में ऐसा करना भारी पड़ सकता है।

यहां दीवार सरकारी हो सकती है।

कैमरा लगा हो सकता है।

और पुलिस भी लोकतंत्र की तरह हर जगह मौजूद हो सकती है।

इसलिए हमने तय किया कि यूरोप में संस्कृति का सम्मान करेंगे।

दीवारों को दीवार ही रहने देंगे।

ब्रसेल्स का असली सबक

ब्रसेल्स ने हमें कई चेहरे दिखाए।

यूरोपीय क्वार्टर में राजनीति है।

सड़कों पर प्रदर्शन है।

मिनी यूरोप में इतिहास है।

कैफे में चॉकलेट और वॉफल हैं।

Manneken Pis में हास्य है।

और टॉयलेट में अर्थशास्त्र है।

कभी लोकतंत्र पोस्टर लेकर मार्च करता है।

कभी कॉकरोच एंटीना लेकर मैदान में उतरता है।

कभी ब्रसेल्स का छोटा लड़का सदियों से पेशाब करता रहता है।

और कभी एक भारतीय पर्यटक €2 का सिक्का ढूंढता हुआ घूमता है।

ब्रसेल्स शायद यही सिखाता है।

दुनिया चाहे कितनी भी बड़ी समस्या पर बहस करे, आम आदमी की जरूरतें छोटी ही रहती हैं।

उसे पढ़ाई चाहिए।

सुरक्षा चाहिए।

सस्ती जिंदगी चाहिए।

और कभी-कभी...

बस एक मुफ्त टॉयलेट चाहिए।

यूरोप अरबों यूरो की राजनीति करता रहे।

कॉकरोच अपनी पार्टी बनाते रहें।

छात्र अपने पोस्टर उठाते रहें।

Manneken Pis अपनी ड्यूटी निभाता रहे।

हम भारतीय पर्यटक अपना नक्शा संभालकर चलते रहेंगे।

लेकिन अगली बार ब्रसेल्स आने से पहले एक बात जरूर याद रखूंगा।

पासपोर्ट से पहले टॉयलेट का पता पूछना है।

Thursday, September 17, 2026

 जब पेरिस आएंगे पोप, शहर में होगी प्रार्थना, भीड़ और ट्रैफिक की परीक्षा


बृज खंडेलवाल द्वारा

पेरिस, 

18  सितंबर 2026


पेरिस ने राजा देखे हैं, राष्ट्रपति देखे हैं, फिल्मी सितारे देखे हैं और फैशन की दुनिया के बड़े नाम भी देखे हैं। लेकिन अगले सप्ताहांत शहर एक ऐसी हस्ती का स्वागत करने जा रहा है, जिसके साथ ग्लैमर से ज्यादा आस्था जुड़ी है।


पोप लियो चौदहवें पेरिस आ रहे हैं।

2008 के बाद पहली बार कोई पोप फ्रांस की राजधानी में कदम रखेगा। जाहिर है, पेरिस तैयार है। प्रार्थनाएं होंगी, बड़ी भीड़ जुटेगी, सुरक्षा कड़ी होगी और ट्रैफिक ऐसा हो सकता है कि पेरिसवासियों को अपने ही शहर में रास्ता ढूंढना किसी छोटी तीर्थयात्रा से कम न लगे।

पोप लियो चौदहवें शुक्रवार, 25 सितंबर को पेरिस पहुंचेंगे। उनका पहला महत्वपूर्ण कार्यक्रम राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से एलिसे पैलेस में मुलाकात का होगा।

इसके बाद आम लोगों के लिए भी उन्हें देखने का मौका होगा। शाम 4 से 5 बजे के बीच पोप लैटिन क्वार्टर से पोपमोबाइल में गुजरेंगे। यह यात्रा सभी के लिए निःशुल्क और खुली रहेगी।

यानी उस दिन लैटिन क्वार्टर में नजरें ऊपर नहीं, सड़क पर रहेंगी। हो सकता है पेरिस के किसी पर्यटक को पहली बार एहसास हो कि एफिल टावर के अलावा भी यहां देखने लायक बहुत कुछ है।

शुक्रवार की शाम युवाओं के नाम होगी। स्टेड द फ्रांस में पोप के साथ होने वाली युवा प्रार्थना सभा में करीब 75,000 लोगों के पहुंचने की उम्मीद है।

लेकिन शनिवार को तस्वीर और भी बड़ी होगी।

दोपहर 3 बजे खुली जगह पर विशेष प्रार्थना सभा होगी। इसका क्षेत्र प्लास द ला कॉनकॉर्ड से शॉं-ज़े-लीज़े तक फैलेगा। आयोजकों को उम्मीद है कि इसमें पांच लाख तक लोग शामिल हो सकते हैं।

पेरिस में उस दिन एफिल टावर, लूव्र और कैफे ही आकर्षण नहीं होंगे। आधा मिलियन लोग एक ही दिशा में देखते नजर आ सकते हैं।

सुरक्षा और यातायात को लेकर भी बड़े इंतजाम किए जा रहे हैं। प्लास द ला कॉनकॉर्ड और आसपास के इलाकों में मेट्रो बंद रहने और सड़कों पर रोक लगाए जाने की व्यवस्था की जा रही है।

पर्यटकों के लिए सीधी सलाह है, यात्रा की योजना पहले बना लें। वैसे भी पेरिस में एक जगह से दूसरी जगह पहुंचना कभी-कभी अपने आप में एक छोटी परीक्षा होती है। पोप के आने पर यह परीक्षा थोड़ी और कठिन हो सकती है।

पेरिस के बाद पोप लियो चौदहवें लूर्द और मेत्ज़ जाएंगे। इसके बाद उनकी फ्रांस यात्रा समाप्त होगी।

पेरिस दुनिया को एफिल टावर, लूव्र और शॉं-ज़े-लीज़े के लिए आकर्षित करता है। लेकिन अगले सप्ताहांत शहर की पहचान कुछ अलग होगी।

घंटियां बजेंगी। भीड़ जुटेगी। प्रार्थनाएं होंगी।

और कुछ घंटों के लिए शायद तेज रफ्तार वाला पेरिस भी थोड़ा ठहर जाएगा।

पोप आ रहे हैं। पेरिस तैयार है।

 


पेरिस: एफिल टावर चमका, पैरों ने बगावत की और हैंडबैग ने रचा थ्रिलर

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बृज खंडेलवाल द्वारा

पेरिस, 17 सितंबर 2026

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पेरिस ने हमारा स्वागत नहीं किया। उसने पहले हमारा इम्तिहान लिया।

लंदन से उतरते ही लगा कि हम किसी दूसरे ग्रह पर आ गए हैं। भाषा फ्रेंच थी, इमारतें बेहद सलीकेदार थीं, लोग फैशनेबल दिख रहे थे और ट्रैफिक ऐसा था जैसे सड़क पर कोई मुकाबला चल रहा हो। मौसम ने भी अपना अलग ही मिज़ाज दिखाया। कुल मिलाकर शहर नहीं बदला था, पूरी दुनिया बदल गई थी।

और फिर आया यूरोस्टार।

इंग्लिश चैनल के नीचे से ट्रेन का गुजरना अपने आप में एक कमाल है। हम आराम से बैठे थे और ऊपर कहीं समुद्र बह रहा था। मन में सवाल आया, जब चैनल के ऊपर से उड़ सकते हैं तो नीचे से क्यों न निकल जाएँ? हम सब कुछ देर के लिए शानदार कपड़े पहने हुए सुरंग के चूहे जैसे महसूस कर रहे थे।

पेरिस में दिन बहुत तेज़ी से भागे। सबसे यादगार रहा सीन नदी का क्रूज़। नाव धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी और पेरिस दोनों किनारों पर अपना हुस्न  दिखा रहा था। लगता था जैसे पूरा शहर हमारे लिए चलता-फिरता पोस्टकार्ड बन गया हो।

फिर आया एफिल टावर।

रात के अँधेरे में जब टावर अचानक जगमगाने लगा तो सबकी निगाहें ऊपर थीं और मोबाइल कैमरे नीचे नहीं आ रहे थे। हर घंटे होने वाली पाँच मिनट की रोशनी ने माहौल में जादू घोल दिया। ठंडी हवा ने खूब कोशिश की कि रोमांस में खलल डाले, लेकिन नाकाम रही।

दिलचस्प बात यह थी कि उस समय किसी ने मोबाइल के ज्यादा इस्तेमाल की शिकायत नहीं की। जिस मोबाइल को लेकर हम बच्चों को डाँटते हैं, उसी ने उस रात एफिल टावर को कैद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

एफिल की रोशनी सचमुच कमाल की थी। लोहे की यह बुज़ुर्ग महिला आज भी महफ़िल लूटना जानती है।

फिर पहुँचे वर्साय।

महल की शान देखकर लगा कि पुराने ज़माने के राजा-महाराजा सचमुच अलग ही दुनिया में रहते थे। इतनी शानो-शौकत कि आदमी सोचने लगे, आखिर जनता कब तक यह सब देखती रहती?

म्यूज़ियमों में कला और इतिहास का खजाना मिला। हर तरफ सदियों पुरानी कहानियाँ थीं। और फिर आया डिज़नीलैंड। वहाँ जाकर पता चला कि उम्र चाहे कितनी भी हो, सही माहौल मिले तो बच्चा अंदर से बाहर आने में देर नहीं लगाता।

लेकिन पेरिस ने हमें एक और बड़ा सबक दिया, सुंदर शहरों में सुंदरता देखने के लिए पैर भी चाहिए।

हम चलते रहे। फिर चलते रहे। और चलते ही रहे।

रोज़ के 10,000 कदम कब पार हो गए, पता ही नहीं चला। शाम तक हमारे पैर शिकायत नहीं कर रहे थे। वे बाकायदा राजनयिक छूट (diplomatic immunity) की मांग कर रहे थे।

कुछ पैरों ने तो शायद खतरा भत्ता भी माँगा होगा।

ऐसे में हमारी आरामदेह बस यात्रा किसी शांति समझौते से कम नहीं थी। बस में बैठते ही पैरों और यात्रियों के बीच युद्धविराम हो जाता था।

खाने की चिंता जरूर थी, क्योंकि हम शाकाहारी हैं। लेकिन पेरिस ने यहाँ भी ज्यादा परेशान नहीं किया। अच्छे भारतीय शाकाहारी भोजन ने दिल जीत लिया।

एक शाम शैंपेन के बाद हम पहुँचे शिवम रेस्टोरेंट। जालंधर के एक मेहनती पंजाबी उद्यमी द्वारा चलाया जा रहा यह रेस्तराँ उस रात हमें पेरिस से सीधे पंजाब ले गया।

थाली में सब्ज़ियाँ थीं, स्वाद में घर की याद थी और मन में सुकून। हमें पहली बार लगा कि विदेश में भी कोई समझता है कि सब्ज़ी का मतलब केवल प्लेट सजाना नहीं होता।

मार्था हमेशा की तरह हमारे साथ रहीं। उनका मुस्कुराता चेहरा, मदद का जज़्बा और हर वक्त काम की जानकारी बहुत काम आई। हमारी लोकल गाइड मैग्डलीन ने भी पेरिस की कहानी को और दिलचस्प बना दिया। उन्होंने इमारतों और जगहों के पीछे छिपी कई बातें बताईं।

लेकिन असली थ्रिलर अभी बाकी था।

होटल पहुँचते ही पद्मिनी अय्यर ने ऐसा ऐलान किया कि पूरा खुशहाल पर्यटक दल अचानक आपातकालीन समिति बन गया।

“मेरा हैंडबैग खो गया!”

हैंडबैग में मोबाइल था।

और उससे भी बड़ी आफ़त, पासपोर्ट था।

पैसा खो जाए तो वापस आ सकता है। मोबाइल भी खरीदा जा सकता है। लेकिन पासपोर्ट! वह तो ऐसा कागज़ है जिसके गायब होते ही आदमी को अंतरराष्ट्रीय नौकरशाही के लंबे गलियारों के सपने आने लगते हैं।

सलाहों की बौछार शुरू हो गई।

पुलिस को फोन करो। रास्ता दोबारा देखो। जहाँ-जहाँ गए थे, वहाँ तलाश करो। किसी ने तो यहाँ तक कह दिया कि सीन नदी में भी देख लेना चाहिए।

तभी किसी समझदार ने धीरे से कहा: 

“पहले होटल का कमरा तो देख लीजिए।”

मैं फोन करने लगा और संभावित संकट की योजनाएँ बनाने लगा। मार्था आसपास तलाश करने निकल गईं। होटल की लॉबी कुछ देर के लिए संयुक्त राष्ट्र की आपात बैठक जैसी लगने लगी।

बस फर्क इतना था कि यहाँ राजनयिक कम और सूटकेस ज्यादा थे।

और तभी पद्मिनी दौड़ती हुई वापस आईं।

“मिल गया!”

हैंडबैग कमरे में ही था।

पूरे समय वहीं था।

कपड़ों के ढेर के नीचे चुपचाप पड़ा था। शायद वह भी हमारे साथ लुका-छिपी खेलना चाहता था।

एक पल में अंतरराष्ट्रीय संकट खत्म हो गया।

पुलिस की जरूरत नहीं पड़ी। दूतावास को फोन नहीं करना पड़ा। कोई राजनयिक तार नहीं भेजना पड़ा। संयुक्त राष्ट्र को भी खबर नहीं करनी पड़ी।

एक कपड़े ने पूरी कूटनीति बचा ली।

सच कहें तो पेरिस फिर से सुंदर उसी क्षण लगा।

पीछे मुड़कर देखें तो इस यात्रा में सब कुछ था। सीन का रोमांस था। एफिल टावर की जगमगाहट थी। वर्साय की शानो-शौकत थी। म्यूज़ियमों का इतिहास था। डिज़नीलैंड की बचपन वाली खुशी थी।

आरामदेह बस थी। स्वादिष्ट भारतीय शाकाहारी खाना था। मार्था की मदद थी। मैग्डलीन की जानकारी थी।

और सबसे बढ़कर था: 2026 का हैंडबैग थ्रिलर।

फ्रांस ने हमें कला, इतिहास और वास्तुकला दी।

पेरिस ने हमें रोज़ 10,000 कदम दिए।

हमारे पैरों ने बदले में हमें याद दिलाया कि हर हसीन शहर का अपना हिसाब होता है।

और पद्मिनी ने इस यात्रा की सबसे शानदार सस्पेंस कहानी दे दी।

पेरिस की सीख सीधी है।

एफिल टावर की चमक देखिए। सीन पर तैरिए। वर्साय में हैरत कीजिए। अच्छा खाना खाइए। खूब घूमिए।

लेकिन अगर होटल में कोई सामान गायब हो जाए, तो पुलिस, दूतावास या संयुक्त राष्ट्र को फोन करने से पहले कपड़ों के नीचे जरूर देख लीजिए।

कभी-कभी सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय संकट, एक मुड़े हुए स्वेटर के नीचे पड़ा होता है।