Friday, July 24, 2026

 हर पाँचवाँ भारतीय होगा बुजुर्ग: क्या भारत तैयार है इस नई चुनौती के लिए?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

26 जुलाई 2026

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एक सुबह घर में अजीब-सी ख़ामोशी उतर आती है। बच्चे अपने-अपने शहरों में खो चुके हैं। फ़ोन की घंटी अब कम ही बजती है। घुटनों का दर्द बढ़ता है, यादें धुंधली पड़ने लगती हैं और तन्हाई बिना दस्तक दिए घर की स्थायी मेहमान बन जाती है। यह सिर्फ़ कुछ बुज़ुर्गों की कहानी नहीं, बल्कि उस भारत की तस्वीर है, जहाँ हर पाँचवाँ नागरिक जल्द ही बुज़ुर्ग होगा।

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भारत अब एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां उसकी सबसे बड़ी ताकत ही उसकी सबसे बड़ी चुनौती बनने जा रही है। दुनिया लंबे समय तक भारत को "यंग इंडिया" के नाम से जानती रही, लेकिन आने वाले वर्षों में तस्वीर बदलने वाली है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) की 2023 की रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2050 तक देश में 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की संख्या बढ़कर लगभग 34.7 करोड़ हो जाएगी। यानी हर पांचवां भारतीय वरिष्ठ नागरिक होगा। आज यह संख्या लगभग 15 करोड़ है। यह केवल जनसंख्या का बदलाव नहीं, बल्कि समाज, अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाओं और पारिवारिक व्यवस्था में आने वाले बड़े परिवर्तन का संकेत है।

लोग पहले से अधिक लंबा जीवन जी रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या वे स्वस्थ, सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन भी जी पाएंगे? 

यही वह चुनौती है, जिसके समाधान की दिशा में हेल्पएज इंडिया ने नई दिल्ली में इंस्टीट्यूट फॉर लॉन्गेविटी एंड एजिंग रिसर्च (ILAR) की स्थापना की है। 22 जुलाई 2026 को इसका उद्घाटन नीति आयोग के पूर्व सदस्य (स्वास्थ्य) डॉ. विनोद कुमार पॉल ने किया। उन्होंने कहा कि भारत को वृद्धावस्था के लिए अपना ऐसा मॉडल विकसित करना होगा, जिसमें भारतीय पारिवारिक मूल्यों, सामुदायिक सहयोग और आधुनिक विज्ञान का संतुलित समावेश हो।

भारत में औसत आयु लगातार बढ़ रही है, लेकिन स्वस्थ जीवन की अवधि अब भी सीमित है। बड़ी संख्या में बुजुर्ग मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, गठिया और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे हैं। दूसरी ओर, संयुक्त परिवारों का टूटना, युवाओं का रोज़गार के लिए बड़े शहरों की ओर पलायन और बढ़ता अकेलापन बुजुर्गों के जीवन को और कठिन बना रहा है। महिलाओं की स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण है। विधवा होने की अधिक संभावना और आर्थिक निर्भरता उन्हें अतिरिक्त असुरक्षा की ओर धकेल देती है।

हालांकि इस बदलती तस्वीर का एक सकारात्मक पक्ष भी है। तेजी से बढ़ती वरिष्ठ नागरिक आबादी "सिल्वर इकोनॉमी" के रूप में एक नया अवसर लेकर आ रही है। स्वास्थ्य सेवाएं, दवाइयां, सहायक तकनीक, वरिष्ठ नागरिकों के लिए अनुकूल आवास, बीमा और वित्तीय सेवाओं जैसे क्षेत्रों में बड़ी संभावनाएं उभर रही हैं। लेकिन इन अवसरों का लाभ तभी मिलेगा, जब देश समय रहते अपनी नीतियों और व्यवस्थाओं को तैयार करेगा।

इसी सोच के साथ ILAR को केवल एक शोध संस्थान नहीं, बल्कि नीति निर्माण, अनुसंधान, नवाचार और व्यावहारिक समाधान का राष्ट्रीय मंच बनाया गया है। संस्थान के निदेशक प्रो. अनिल कुमार इंदिरा कृष्णन का कहना है कि लंबी उम्र का अर्थ केवल जीवन के वर्षों में वृद्धि नहीं, बल्कि उन वर्षों में स्वास्थ्य, सम्मान और खुशहाली जोड़ना है। उनका मानना है कि भविष्य की नीतियां तभी प्रभावी होंगी, जब उनके केंद्र में स्वयं बुजुर्गों के अनुभव और उनकी जरूरतें हों।

संस्थान स्वस्थ वृद्धावस्था, सिल्वर इकोनॉमी, वरिष्ठ नागरिकों के अधिकार, उम्र-अनुकूल तकनीक और वृद्धावस्था से जुड़ी सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों पर व्यापक शोध करेगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, टेलीमेडिसिन और स्मार्ट उपकरणों के बेहतर उपयोग से लेकर अकेलेपन, देखभाल और सामुदायिक सहयोग जैसे विषय भी इसकी प्राथमिकताओं में शामिल होंगे। हर वर्ष "स्टेट ऑफ एजिंग इन इंडिया" रिपोर्ट प्रकाशित करने, सिल्वर टेक इनोवेशन लैब स्थापित करने, स्वास्थ्य वेधशाला विकसित करने और युवा शोधकर्ताओं के लिए फेलोशिप कार्यक्रम शुरू करने की भी योजना है।

हेल्पएज इंडिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी रोहित प्रसाद का मानना है कि आने वाले दो दशकों में वृद्धावस्था देश के सामने सबसे बड़ी सामाजिक चुनौतियों में होगी। उनका कहना है कि केवल सरकार के प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे। विश्वविद्यालयों, उद्योग जगत, कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) संस्थाओं और नागरिक समाज को मिलकर काम करना होगा। साक्ष्य-आधारित नीतियों और पर्याप्त निवेश के बिना भविष्य की इस चुनौती का सामना करना कठिन होगा।

हेल्पएज इंडिया स्वयं इस क्षेत्र में कोई नया नाम नहीं है। वर्ष 1978 से संस्था वरिष्ठ नागरिकों के स्वास्थ्य, आजीविका, अधिकारों की रक्षा और आपदा राहत के क्षेत्र में लगातार काम कर रही है। पिछले लगभग पांच दशकों में उसे संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या पुरस्कार और भारत सरकार के वयोश्रेष्ठ सम्मान सहित कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं। ILAR उसी लंबे अनुभव और विशेषज्ञता का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव है।

अब समय आ गया है कि भारत वृद्धावस्था को केवल सामाजिक बोझ के रूप में देखने की मानसिकता बदले। वरिष्ठ नागरिक अनुभव, ज्ञान और सामाजिक पूंजी का महत्वपूर्ण स्रोत हैं। उनके लिए उम्र-अनुकूल शहर, बेहतर सार्वजनिक परिवहन, सामुदायिक देखभाल केंद्र, मजबूत पेंशन व्यवस्था, व्यापक बीमा कवरेज, डिजिटल साक्षरता और ऐसी पीढ़ीगत पहलें विकसित करनी होंगी, जिनसे युवा और बुजुर्ग एक-दूसरे के अनुभवों से सीख सकें।

वर्ष 2050 का भारत आज लिए गए फैसलों पर निर्भर करेगा। यदि अभी दूरदर्शी नीतियां बनाई गईं और पर्याप्त निवेश किया गया, तो देश केवल अधिक आयु वाला समाज नहीं बनेगा, बल्कि ऐसा समाज बनेगा जहां बुजुर्ग स्वस्थ, सक्रिय, आत्मनिर्भर और सम्मानजनक जीवन जी सकेंगे। किसी भी सभ्य समाज की असली पहचान इस बात से होती है कि वह अपने वरिष्ठ नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है। ILAR ने इस दिशा में एक महत्वपूर्ण शुरुआत कर दी है। अब जरूरत है कि सरकार, निजी क्षेत्र और समाज मिलकर इसे राष्ट्रीय जनआंदोलन का रूप दें, ताकि बढ़ती उम्र भारत के लिए चुनौती नहीं, बल्कि नई ताकत बन सके।


Thursday, July 23, 2026

 बृज मंडल की हरियाली कौन निगल रहा है?

फैंसी प्रोजेक्ट बढ़ रहे हैं, पेड़ घट रहे हैं!

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

25 जुलाई 2026

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ब्रज मंडल या ताज ट्रिपेजियम जोन, पर खतरा फिर मंडरा रहा है। इस बार हमला सिर्फ धुएँ या कारखानों से नहीं है। उसके सबसे पुराने पहरेदार, उसके पेड़, तेजी से गायब हो रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने टीटीज़ेड में 10,700 से अधिक पूर्ण विकसित पेड़ों की कटाई को मंजूरी दे दी है। इन पेड़ों की बलि सड़कों, एक्सप्रेसवे, रेलवे लाइन, एयरपोर्ट विस्तार और दूसरे बड़े प्रोजेक्टों के लिए दी जाएगी। विकास ज़रूरी है, इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन सवाल यह है कि क्या विकास हरियाली की कीमत पर होगा? मथुरा, वृन्दावन, गोवर्धन में पिछले कुछ वर्षों में हजारों पेड़ कट चुके हैं।

टीटीज़ेड का गठन 1990 के दशक में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक एम.सी. मेहता मामले के बाद हुआ था। करीब 10,400 वर्ग किलोमीटर में फैला यह क्षेत्र आगरा, मथुरा, वृंदावन और आसपास के जिलों को समेटता है। इसका उद्देश्य था ताजमहल को प्रदूषण और पर्यावरणीय क्षरण से बचाना। आज वही सुरक्षा कवच धीरे-धीरे टूट रहा है।

हर साल हजारों पेड़ गायब हो रहे हैं। कहीं सड़क चौड़ी हो रही है, कहीं एक्सप्रेसवे बन रहा है। कहीं कॉलोनियाँ उग रही हैं, कहीं व्यावसायिक परिसर। शहर फैल रहे हैं, और हरियाली सिमट रही है। कंक्रीट का जंगल बढ़ रहा है, असली जंगल पीछे हट रहे हैं।

ताजमहल को प्रदूषण से बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 1996 में 10,400 वर्ग किमी क्षेत्र में ताज ट्रेपेजियम ज़ोन (TTZ) बनाया। इसके बावजूद हरित क्षेत्र लगातार घट रहा है। 2017 में छह जिलों का वन क्षेत्र 664 वर्ग किमी था, जो 2019 में घटकर 657.71 वर्ग किमी रह गया। आगरा में भी 9.38 वर्ग किमी वन क्षेत्र कम हुआ। शहरीकरण, निर्माण, पेड़ों की कटाई, अतिक्रमण, प्रदूषण और जल संकट इसके प्रमुख कारण हैं। लाखों पौधे लगाए जा रहे हैं, लेकिन रखरखाव की कमी से उनकी जीवित रहने की दर अपेक्षा से कम है। केवल पौधारोपण नहीं, बल्कि पेड़ों का संरक्षण भी जरूरी है।

सरकारें कहती हैं कि एक पेड़ के बदले दस पौधे लगाए जाएंगे। कागज़ पर यह तर्क अच्छा लगता है। मगर प्रकृति फाइलों से नहीं चलती।

एक पुराना पेड़ बनने में कई दशक लगते हैं। वह कार्बन सोखता है, छाया देता है, हवा साफ करता है, पक्षियों को आश्रय देता है और शहर का तापमान कम करता है। एक छोटा पौधा वर्षों तक उसकी बराबरी नहीं कर सकता। ऊपर से लगाए गए अनेक पौधे देखभाल के अभाव में सूख जाते हैं।

आगरा पहले ही खराब हवा से जूझ रहा है। धूल, वाहनों का धुआँ और लगातार निर्माण गतिविधियाँ प्रदूषण बढ़ा रही हैं। ऐसे में पेड़ों की कटाई शहर की प्राकृतिक ढाल को कमजोर कर देगी। गर्मी और बढ़ेगी, हवा और खराब होगी।

यमुना के बाढ़ क्षेत्र भी इससे प्रभावित होंगे। पेड़ मिट्टी को बचाते हैं, भूजल को रिचार्ज करते हैं और जैव विविधता को सहारा देते हैं। उनके खत्म होने से पूरा पारिस्थितिकी तंत्र कमजोर पड़ता है।

पर्यावरणविद् डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य का कहना है, "विकास का विरोध नहीं है। लेकिन हर परियोजना में पहले यह देखा जाना चाहिए कि कितने पुराने पेड़ों को बचाया जा सकता है। हजारों पेड़ काटना आख़िरी विकल्प होना चाहिए, पहला नहीं।"

वरिष्ठ पर्यावरण कार्यकर्ता डॉ मुकुल पांड्या कहते हैं, "आगरा की हरियाली जितनी तेजी से खत्म हो रही है, उतनी तेजी से लौट नहीं रही। पेड़ सिर्फ सौंदर्य नहीं हैं, वे शहर के फेफड़े हैं।"

वृन्दावन के ग्रीन एक्टिविस्ट जगन नाथ पोद्दार कहते हैं, "सरकारें सड़कों और पुलों का उद्घाटन करती हैं, जंगलों का नहीं। पेड़ों को जीवनदाता नहीं, बाधा समझा जाने लगा है। यही सबसे बड़ी त्रासदी है।"

असल सवाल विकास बनाम पर्यावरण का नहीं है। समझदारी भरे विकास का है। सड़कों का मार्ग बदला जा सकता है। एलिवेटेड कॉरिडोर बनाए जा सकते हैं। पेड़ों का वैज्ञानिक प्रत्यारोपण किया जा सकता है। लगाए गए पौधों की स्वतंत्र निगरानी होनी चाहिए और उनकी जीवित रहने की दर सार्वजनिक की जानी चाहिए।

टीटीज़ेड एक दूरदर्शी सोच का परिणाम था। उसे सिर्फ कागज़ी बाघ बनाकर नहीं छोड़ा जा सकता।

विडंबना देखिए। मोहब्बत की सबसे खूबसूरत निशानी ताजमहल अपने प्राकृतिक रखवालों को खो रहा है। एक सौ साल पुराने पेड़ को काटना आसान है, लेकिन उसे वापस लाने में कई पीढ़ियाँ लग जाती हैं।

ताजमहल को सिर्फ चमकदार पत्थरों की नहीं, साफ हवा, बहती यमुना और जीवित जंगलों की ज़रूरत है। प्रकृति को कुर्बान करके मिलने वाला विकास दरअसल विकास नहीं, आने वाली पीढ़ियों पर थोपा गया कर्ज है।


Tuesday, July 21, 2026

 बढ़ती फीस, घटते स्तर

निजी स्कूलों की बढ़ती फीस:

क्या हमें अपनी जेब के हिसाब से तालीम मिल रही है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

23 जुलाई 2026

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साल 1964-65 में मेरे माता-पिता आगरा के सेंट पीटर्स कॉलेज की मासिक फीस सिर्फ 6 से 10 रुपये भरते थे। स्कूल की यूनिफॉर्म साधारण सूती खाकी होती थी और इसके अलावा कोई छिपा हुआ खर्च नहीं था।

आज आगरा के डीपीएस या प्रील्यूड पब्लिक स्कूल जैसे बड़े निजी स्कूल हर महीने 12,000 से 16,000 रुपये तक फीस लेते हैं। यानी साल भर में करीब 1.5 लाख से 4 लाख रुपये का खर्च। यह बढ़ोतरी 1,50,000 प्रतिशत से भी ज्यादा है। इसी दौरान देश में महंगाई लगभग 100 से 120 गुना बढ़ी है।

सवाल यह है कि स्कूलों की फीस बाकी चीजों के मुकाबले इतनी तेज़ी से क्यों बढ़ी? और क्या तालीम की गुणवत्ता भी उतनी ही बेहतर हुई है?

फीस बढ़ने के पीछे कई वजहें हैं। शिक्षकों का वेतन बढ़ा है। स्कूलों की इमारतें आधुनिक हुई हैं। स्मार्ट क्लास, कंप्यूटर, लैब और खेल सुविधाओं पर खर्च बढ़ा है। सरकार के नए नियमों का पालन करना पड़ता है। साथ ही मध्यम वर्ग के परिवार अपने बच्चों को "प्रीमियम" स्कूलों में पढ़ाना चाहते हैं।

आज भारत के लगभग आधे बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं। बड़े स्कूल स्मार्ट क्लासरूम, विज्ञान प्रयोगशालाएं, खेल मैदान, बस सेवा, सह-पाठ्यक्रम गतिविधियां और जेईई तथा नीट जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी कराते हैं।

माता-पिता अब सिर्फ पढ़ाई के लिए नहीं, बल्कि बेहतर माहौल, अच्छे सहपाठियों, सामाजिक रुतबे और कॉलेज में दाखिले की उम्मीद के लिए भी पैसा खर्च कर रहे हैं। पिछले दस वर्षों में शहरों के निजी स्कूलों की फीस करीब 169 प्रतिशत बढ़ी है, जबकि लोगों की आमदनी इतनी तेज़ नहीं बढ़ी।

यहीं से फिक्र शुरू होती है। इसमें कोई शक नहीं कि आज के स्कूल 1960 के दशक की तुलना में कहीं अधिक आधुनिक हैं। भारतीय छात्र बोर्ड परीक्षाओं, जेईई और नीट जैसी कठिन परीक्षाओं में अच्छा प्रदर्शन करते हैं। इसी वजह से भारत बड़ी संख्या में सक्षम इंजीनियर और वैज्ञानिक तैयार करता है।

लेकिन जब बात अंतरराष्ट्रीय स्तर की परीक्षा PISA (Programme for International Student Assessment) की आती है, जो रटने के बजाय सोचने, समझने और वास्तविक जीवन में ज्ञान का इस्तेमाल करने की क्षमता को परखती है, तब भारत का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है।

साल 2009 में, जब भारत ने इस परीक्षा में भाग लिया, तब उसकी रैंकिंग सबसे नीचे रहने वाले देशों में थी। वियतनाम, एस्टोनिया और फिनलैंड जैसे देश भारत से काफी आगे रहे। निजी स्कूलों के छात्र सरकारी स्कूलों से बेहतर थे, लेकिन दुनिया के मानकों तक नहीं पहुंच सके।

उसके बाद भारत ने पीसा में हिस्सा नहीं लिया। लेकिन देश के अपने सर्वे भी यही तस्वीर दिखाते हैं। ASER (Annual Status of Education Report) और NAS (National Achievement Survey), जिसे अब PARAKH राष्ट्रीय सर्वेक्षण कहा जाता है, बताते हैं कि निजी स्कूलों के बहुत से बच्चे भी अपनी कक्षा के स्तर के अनुसार न ठीक से पढ़ पाते हैं और न ही गणित कर पाते हैं।

इसकी एक बड़ी वजह यह है कि हमारे स्कूल अब भी समझ विकसित करने के बजाय रटने पर ज़्यादा ज़ोर देते हैं।

एक सेवानिवृत्त शिक्षक का कहना है कि निजी स्कूलों की बेहतर छवि का एक और राज़ है। इनमें ज़्यादातर दाखिला उन परिवारों के बच्चों को मिलता है, जिनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति पहले से बेहतर होती है। इसलिए अच्छे नतीजों का पूरा श्रेय केवल स्कूलों की पढ़ाई को नहीं दिया जा सकता।

माता-पिता भारी-भरकम फीस इस उम्मीद से भरते हैं कि बच्चों को बेहतरीन तालीम मिलेगी। लेकिन फीस जितनी तेज़ी से बढ़ी है, शिक्षा की गुणवत्ता उतनी नहीं बढ़ी। बड़ी कक्षाएं, शिक्षकों की असमान ट्रेनिंग और परीक्षा-केंद्रित पढ़ाई आज भी आम समस्या हैं।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का मकसद रटने की संस्कृति कम करना और बच्चों में सोचने-समझने, हुनर और व्यवहारिक ज्ञान को बढ़ावा देना है। लेकिन ज़मीन पर इन बदलावों को लागू होने में अभी वक्त लगेगा।

फीस और शिक्षा की गुणवत्ता के बीच बढ़ता यह फ़ासला परिवारों की जेब पर भारी पड़ रहा है। इससे अच्छी शिक्षा सिर्फ़ अमीरों तक सीमित होने का ख़तरा भी बढ़ रहा है। सबसे बड़ी कमी यह है कि स्कूलों से यह साबित करने की कोई ठोस जवाबदेही नहीं मांगी जाती कि बढ़ी हुई फीस से बच्चों की सीखने की क्षमता भी वास्तव में बेहतर हुई है।

अगर 1965 का कोई छात्र आज के स्कूल देखे, तो वह शानदार इमारतों, स्मार्ट क्लासरूम और आधुनिक तकनीक से ज़रूर हैरान होगा। लेकिन शायद वह यह सवाल भी पूछे कि क्या असली तालीम भी उतनी ही आगे बढ़ी है, जितनी फीस बढ़ी है?

जब तक स्कूलों का हिसाब सिर्फ़ चमकदार इमारतों और सुविधाओं से नहीं, बल्कि बच्चों के वास्तविक सीखने के नतीजों से नहीं लिया जाएगा, तब तक माता-पिता शायद अच्छी शिक्षा से ज़्यादा उसकी चमक-दमक की कीमत चुकाते रहेंगे।

Monday, July 20, 2026

 फ्लैट संस्कृति की तरफ बढ़ रहे शहर

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उत्तर प्रदेश कब जागेगा?

फ्लैट खरीदारों को बिल्डरों और आरडब्ल्यूए की मनमानी से बचाना जरूरी

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

2 2 जुलाई, 2026

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घर हर इंसान का सबसे बड़ा सपना होता है। लोग पूरी उम्र की कमाई, भविष्य निधि, बैंक कर्ज और अपनी तमाम बचत लगाकर एक फ्लैट खरीदते हैं। उम्मीद रहती है कि अब परिवार को सुरक्षित और सुकून भरी ज़िंदगी मिलेगी। 

मगर उत्तर प्रदेश के हजारों अपार्टमेंटों में यह सपना धीरे-धीरे एक दर्दनाक हकीकत में बदलता जा रहा है। फ्लैट मिलने के बाद भी लोग राहत नहीं, बल्कि रोज़ नई परेशानियों, झगड़ों और कानूनी लड़ाइयों में उलझ जाते हैं।

भारत में फ्लैट या अपार्टमेंट मुख्य रूप से शहरी इलाकों की पहचान हैं और अभी भी देश के कुल आवासों में इनकी हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम है। शहरी क्षेत्रों में लगभग 31 प्रतिशत परिवार फ्लैटों में रहते हैं, जबकि छोटे शहरों में यह आंकड़ा करीब 24 प्रतिशत है। राष्ट्रीय स्तर पर केवल 10–15 प्रतिशत परिवार ही अपार्टमेंट में रहते हैं, क्योंकि अधिकांश लोग, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में, स्वतंत्र मकानों में रहते हैं। तेज़ी से बढ़ता शहरीकरण, जमीन की कमी, छोटे परिवार और आधुनिक सुविधाओं की बढ़ती मांग फ्लैट संस्कृति को बढ़ावा दे रहे हैं। भारत में हर वर्ष लगभग 12 से 15 लाख नए शहरी फ्लैट बनते हैं, लेकिन देशभर में फ्लैटों की कुल संख्या का कोई एकीकृत और अद्यतन सरकारी आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।

इस बीच कर्नाटक सरकार ने एक ऐसी पहल की है, जिससे दूसरे राज्यों को भी सबक लेना चाहिए। कर्नाटक अपार्टमेंट (ओनरशिप एंड मैनेजमेंट) एक्ट, 2026 का मसौदा तैयार किया गया है। इस कानून को बनाने से पहले राज्य की 500 से अधिक अपार्टमेंट एसोसिएशनों के प्रतिनिधियों से विस्तार से राय ली गई। मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के सामने फ्लैट मालिकों ने साफ कहा कि उन्हें मजबूत कानूनी सुरक्षा, पूरी पारदर्शिता और बिल्डरों की जवाबदेही चाहिए।

अब सवाल यह है कि उत्तर प्रदेश ऐसा कानून कब बनाएगा?

आगरा, मथुरा, वृंदावन, लखनऊ, नोएडा, गाजियाबाद, कानपुर और तेजी से बढ़ते दूसरे शहरों में लाखों लोग बहुमंजिला इमारतों में रह रहे हैं। लेकिन इन सोसाइटियों में रहने वाले परिवार अक्सर तीन तरफ़ा दबाव झेलते हैं। 

एक ओर बिल्डर हैं, जो फ्लैट बेचने के बाद अपनी जिम्मेदारी से किनारा कर लेते हैं। दूसरी ओर कई रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन यानी आरडब्ल्यूए हैं, जिनमें लोकतंत्र की जगह कुछ लोगों का कब्ज़ा बना रहता है। तीसरी ओर सरकारी एजेंसियां हैं, जो अक्सर तब तक सक्रिय नहीं होतीं, जब तक मामला अदालत या बड़े विरोध प्रदर्शन तक नहीं पहुंच जाता।

कई सोसाइटियों में वर्षों से निष्पक्ष चुनाव नहीं हुए हैं। वही लोग लगातार पदों पर बने रहते हैं। रखरखाव शुल्क हर साल बढ़ता जाता है, लेकिन खर्च का पूरा हिसाब निवासियों के सामने नहीं रखा जाता। ऑडिट या तो होता नहीं या फिर उसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाती। आम निवासी यह तक नहीं जान पाते कि उनकी मेहनत की कमाई आखिर खर्च कहां हो रही है।

मुसीबत यहीं खत्म नहीं होती। कई बिल्डर आरडब्ल्यूए बनने के बाद भी साझा सुविधाओं, कॉमन एरिया, रखरखाव निधि और जरूरी दस्तावेज समय पर नहीं सौंपते। इसका नुकसान सीधे फ्लैट मालिकों को उठाना पड़ता है। वे सालों तक अनिश्चितता में जीते रहते हैं।

दूसरी तरफ निर्माण की गुणवत्ता भी गंभीर चिंता का विषय है। कहीं छत टपकती है, कहीं दीवारों में दरारें पड़ जाती हैं। खराब पाइपलाइन, बिजली की अव्यवस्थित वायरिंग और दूसरी तकनीकी खामियां लोगों की सुरक्षा पर सवाल खड़े करती हैं। शिकायत करने पर बिल्डर अक्सर जिम्मेदारी लेने से बचते हैं।

रोजमर्रा की सुविधाओं का हाल भी कम खराब नहीं है। पानी की अनियमित आपूर्ति, बार-बार खराब होने वाली लिफ्ट, बंद पड़े सीसीटीवी कैमरे, कमजोर सुरक्षा व्यवस्था, कूड़े के ढेर और अग्निशमन के अधूरे इंतजाम कई सोसाइटियों की पहचान बन चुके हैं। पूजा स्थल,  क्लब हाउस, जिम, स्विमिंग पूल, पार्क और बच्चों के खेल मैदान का सपना दिखाकर फ्लैट बेचे जाते हैं, वे कई बार सिर्फ विज्ञापनों तक ही सीमित रह जाते हैं।

पार्किंग को लेकर भी विवाद लगातार बढ़ रहे हैं। कई जगह विज़िटर पार्किंग तक बेच दी जाती है। साझा जगहों पर कब्ज़ा हो जाता है और आए दिन झगड़े होते रहते हैं। शिकायत करने वाले लोगों को भी कई बार मानसिक दबाव या उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है।

सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि अलग-अलग कानूनों और नियमों के कारण अधिकार और जिम्मेदारियां साफ नहीं हैं। अदालतों में ऐसे हजारों मामले वर्षों तक लंबित रहते हैं। आम परिवार समय और पैसा दोनों गंवाता है, जबकि बड़े बिल्डर कानूनी पेचीदगियों का फायदा उठाते रहते हैं।

ऐसे में उत्तर प्रदेश को भी कर्नाटक की तर्ज पर एक व्यापक और प्रभावी अपार्टमेंट स्वामित्व एवं प्रबंधन कानून बनाने की जरूरत है। हर सोसाइटी में समयबद्ध और निष्पक्ष चुनाव अनिवार्य हों। आरडब्ल्यूए बनते ही बिल्डर सभी साझा संपत्तियां, रखरखाव निधि और जरूरी दस्तावेज तुरंत सौंपे। हर साल स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए और उसकी रिपोर्ट सभी निवासियों के लिए सार्वजनिक हो। बैठकों में ऑनलाइन भागीदारी की सुविधा भी हो, ताकि अधिक से अधिक लोग निर्णय प्रक्रिया में शामिल हो सकें।

भ्रष्टाचार उजागर करने वाले लोगों को कानूनी सुरक्षा मिले। शिकायतों का निपटारा महीनों में हो, वर्षों में नहीं। साथ ही नियामक संस्थाओं को ऐसे अधिकार दिए जाएं कि वे नियम तोड़ने वाले बिल्डरों और मनमानी करने वाले आरडब्ल्यूए पर भारी जुर्माना लगा सकें और जरूरत पड़ने पर उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई कर सकें।

भारत के शहर तेजी से अपार्टमेंट संस्कृति की ओर बढ़ रहे हैं। आने वाले वर्षों में करोड़ों परिवार बहुमंजिला इमारतों में रहेंगे। ऐसे में पुराने और बिखरे हुए कानून अब पर्याप्त नहीं हैं। समय की मांग है कि फ्लैट खरीदारों के अधिकारों को मजबूत कानूनी सुरक्षा मिले।

कर्नाटक ने इस दिशा में कदम बढ़ा दिया है। अब उत्तर प्रदेश सरकार, रेरा, नगर निकायों, आवास विकास संस्थाओं और उपभोक्ता मंचों को भी मिलकर ठोस फैसला लेना होगा।

फ्लैट मालिक कोई एहसान नहीं मांग रहे। उन्होंने अपने खून-पसीने की कमाई से घर खरीदा है। उन्हें सिर्फ वही हक चाहिए, जिसकी कीमत वे पहले ही चुका चुके हैं। आखिर घर सुकून की जगह होना चाहिए, अदालतों और विवादों का स्थायी मैदान नहीं। उत्तर प्रदेश जितनी जल्दी यह सच समझेगा, उतनी ही जल्दी लाखों परिवारों की जिंदगी आसान हो सकेगी।

Saturday, July 18, 2026

 


बिना मरीज के डॉक्टर!!!

शोध के कुली: नाम के आगे 'डॉ.' लगाने की दौड़ या ज्ञान की तलाश?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

20 जुलाई, 2026

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आजकल भारत में पीएचडी की बड़ी धूम है। हर साल करीब 30 से 35 हजार लोग डॉक्टरेट की डिग्री हासिल कर रहे हैं। विश्वविद्यालयों में शोधार्थियों (रिसर्च स्कॉलरों) की संख्या साढ़े तीन लाख के आसपास पहुँच चुकी है। कागज़ पर यह तस्वीर बहुत शानदार दिखती है। लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और ही कहानी सुनाती है।

पीएचडी का मक़सद नए विचार पैदा करना, देश की समस्याओं का हल ढूँढ़ना और समाज को आगे बढ़ाना था। अफ़सोस, कई जगह यह डिग्री सिर्फ़ नाम के आगे "डॉ." लगाने का ज़रिया बनकर रह गई है। ज्ञान की जगह दिखावा, गुणवत्ता की जगह संख्या और मौलिक सोच की जगह औपचारिकता ने ले ली है।

आज कई शोधार्थी खुद को शोधकर्ता नहीं, बल्कि "रिसर्च कुली" महसूस करते हैं। वे वर्षों तक मेहनत करते हैं, लेकिन सम्मान, मार्गदर्शन और सुरक्षा के बजाय उन्हें दबाव, अनिश्चितता और शोषण का सामना करना पड़ता है।

सबसे बड़ी बीमारी है "छापो या मिट जाओ" की संस्कृति। विश्वविद्यालयों और शिक्षकों के मूल्यांकन में शोध-पत्रों की संख्या को बहुत अहमियत दी जाती है। नतीजा यह हुआ कि अच्छी रिसर्च करने के बजाय ज़्यादा से ज़्यादा शोध-पत्र छापने की होड़ मच गई।

इस होड़ ने एक पूरा कारोबार खड़ा कर दिया है। पैसे देकर शोध-पत्र लिखवाना, नकली या घटिया पत्रिकाओं में उन्हें छपवाना और एक ही शोध को कई हिस्सों में बाँटकर अलग-अलग प्रकाशित करना आम बात बन गई है। ऐसे कई शोध-पत्र बाद में वापस भी लेने पड़े। इससे भारतीय शोध की साख  पर सवाल उठे हैं।

दुख की बात यह है कि इन शोधों का बड़ा हिस्सा न उद्योग के काम आता है, न किसानों के, न अस्पतालों के और न समाज के। वे सिर्फ़ विश्वविद्यालय की अलमारी या ऑनलाइन भंडार में धूल खाते रहते हैं।

एक और बड़ी समस्या है शोध-निर्देशक और शोधार्थी के बीच असमान ताक़त का रिश्ता। कई जगह मार्गदर्शक (गाइड) छात्रों पर इतना नियंत्रण रखते हैं कि उनका भविष्य पूरी तरह उन्हीं के हाथ में होता है।

कई संस्थानों से शिकायतें सामने आई हैं कि शोधार्थियों से निजी काम कराए जाते हैं। किसी से गाड़ी चलवाई जाती है, किसी से घरेलू काम करवाए जाते हैं। कई बार सेक्सुअल हरासमेंट की खबरें भी आई हैं। कहीं थीसिस पास कराने के बदले महंगे तोहफ़ों या नक़द की माँग तक के आरोप लगे। जो छात्र विरोध करे, उसकी थीसिस महीनों या वर्षों तक अटक सकती है। यह रिश्ता गुरु-शिष्य का कम और मालिक-मज़दूर का ज़्यादा लगता है।

देश के बड़े और प्रतिष्ठित संस्थान भी इस बीमारी से पूरी तरह अछूते नहीं हैं। लंबे कार्य घंटे, सप्ताह में सत्तर-अस्सी घंटे लैब में रहने का दबाव और लगातार प्रदर्शन साबित करने की मजबूरी ने अनेक शोधार्थियों को मानसिक तनाव की तरफ़ धकेला है।

पीएचडी का सफ़र वैसे ही आसान नहीं होता। कम छात्रवृत्ति, भविष्य की अनिश्चितता, अकेलापन और लगातार दबाव कई छात्रों को चिंता और अवसाद की ओर ले जाता है। बहुत-से विश्वविद्यालयों में मानसिक स्वास्थ्य की समुचित सुविधा भी उपलब्ध नहीं है।

डिग्री पूरी होने के बाद भी तस्वीर बहुत उत्साहजनक नहीं है। हर साल हज़ारों नए पीएचडी धारक नौकरी की तलाश में निकलते हैं। लेकिन विश्वविद्यालयों में स्थायी पद सीमित हैं और उद्योग जगत अभी भी शोधकर्ताओं का पूरा उपयोग नहीं कर पा रहा है।

नतीजा यह होता है कि अनेक पीएचडी धारक अतिथि शिक्षक, अस्थायी व्याख्याता या अपनी योग्यता से बिल्कुल अलग काम करने को मजबूर हो जाते हैं। वर्षों की मेहनत के बाद भी उन्हें वह सम्मान और अवसर नहीं मिलता जिसकी उन्होंने उम्मीद की थी।

भारत में पेटेंट की संख्या बढ़ी है, लेकिन उनमें से बहुत कम तकनीक बाज़ार तक पहुँच पाती है। कुछ आईआईटी, आईआईएससी और चुनिंदा संस्थानों को छोड़ दें, तो अधिकांश विश्वविद्यालयों का शोध प्रयोगशाला से बाहर निकल ही नहीं पाता। उसका लाभ न उद्योग को मिलता है और न आम नागरिक को।

यही वजह है कि डिग्रियाँ बढ़ रही हैं, लेकिन नवाचार (इनोवेशन) उसी रफ़्तार से नहीं बढ़ रहा। शोध का उद्देश्य समस्या का समाधान होना चाहिए, केवल शोध-पत्रों की गिनती नहीं।

सरकार ने अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फ़ाउंडेशन (एएनआरएफ), उद्योग से जुड़े पीएचडी कार्यक्रम और बेहतर वित्तीय सहायता जैसी कई पहल शुरू की हैं। ये अच्छी शुरुआत हैं, लेकिन पूरे तंत्र को बदलने के लिए अभी लंबा सफ़र तय करना बाकी है।

ज़रूरत इस बात की है कि शोध-निर्देशकों की जवाबदेही तय हो, छात्रों को सम्मानजनक माहौल मिले, मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान दिया जाए और विश्वविद्यालयों तथा उद्योगों के बीच मज़बूत साझेदारी बने। सबसे ज़रूरी यह है कि शोध का लक्ष्य देश की असली समस्याओं का हल निकालना हो।

भारत को केवल आँकड़ों में सबसे ज़्यादा पीएचडी नहीं चाहिए। देश को ऐसे शोध चाहिए जो खेतों की पैदावार बढ़ाएँ, अस्पतालों को बेहतर बनाएँ, कारखानों को नई तकनीक दें, रोज़गार पैदा करें और लोगों का जीवन आसान बनाएँ।

जब तक पीएचडी केवल प्रतिष्ठा (शोहरत) का तमगा बनी रहेगी, तब तक शोधार्थी ज्ञान के निर्माता नहीं, बल्कि व्यवस्था के "शोध के कुली" बने रहेंगे। डिग्री की असली कीमत उसके काग़ज़ में नहीं, बल्कि उससे पैदा होने वाले बदलाव में होती है। वही बदलाव भारत की सबसे बड़ी ज़रूरत है।


Friday, July 17, 2026

 पौराणिक कहानियां क्यों लुभाती हैं?

क्या है मिथकों का मिथक?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

19 जुलाई 2026

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सिनेमा हॉल में सन्नाटा पसरा है। विशाल पर्दे पर देवता और असुर आमने-सामने खड़े हैं। तलवारें चमकती हैं, शंख गूंजते हैं, आकाश में दिव्य अस्त्र बरसते हैं। जैसे ही धर्म की जीत होती है और राक्षस धराशायी होता है, पूरा हॉल तालियों और जयघोष से गूंज उठता है। कई दर्शकों की आंखें नम हैं। यह केवल एक फिल्म का अंत नहीं, बल्कि भीतर दबे डर, उम्मीद और न्याय की चाह का विस्फोट है। सदियों से इंसान ऐसी ही कहानियों में अपने मन का बोझ हल्का करता आया है।

फिल्म खत्म होती है, लेकिन कहानी नहीं। वही दर्शक घर लौटकर अपने बच्चों को भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार, राम की विजय या कृष्ण की लीलाएं सुनाते हैं। कर्नाटक के एक छोटे-से गांव में बरगद के नीचे बैठा एक बूढ़ा किस्सागो भी यही कर रहा है। वह राजा मनु और महाप्रलय की कथा सुनाता है। यही कहानी बाइबिल के नूह और मेसोपोटामिया के उत्नापिष्टिम की दास्तानों में भी सुनाई देती है। हज़ारों साल और हज़ारों किलोमीटर का फ़ासला मिट जाता है। कहानी वही रहती है, सिर्फ़ किरदार बदल जाते हैं. 

इंसान हमेशा से कहानियों का दीवाना रहा है। यही किस्से दुनिया के अलग-अलग मुल्कों और सदियों को एक धागे में पिरो देते हैं।

पौराणिक कथाएँ सिर्फ़ देवताओं, राक्षसों और चमत्कारों की पुरानी दास्तानें नहीं हैं। ये ज़िंदगी और मौत, नेकी और बुराई, उम्मीद और रहस्य को समझने का ज़रिया हैं। जब विज्ञान के पास जवाब नहीं थे, तब मिथकों ने इंसान को मायने दिए। हर सभ्यता ने ऐसे सवालों का जवाब खोजने के लिए अपनी कथाएँ गढ़ीं : हम यहाँ क्यों हैं? मौत के बाद क्या होता है? हमें कैसी ज़िंदगी जीनी चाहिए?

मिथक किसी भी समाज की सोच, आस्था और तहज़ीब की बुनियाद होते हैं। सदियों तक ये कहानियाँ आग के अलाव के पास बैठकर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक सुनाई जाती रहीं। बाद में इन्हें लिखा गया। इनमें कल्पना और प्रतीक ज़रूर हैं, लेकिन इनके भीतर इंसानी फ़ितरत और समाज की गहरी सच्चाइयाँ छिपी हैं। इनका असर धर्मों पर भी साफ़ दिखाई देता है।

मनोवैज्ञानिक कार्ल युंग का मानना था कि मिथक इंसान के "सामूहिक अवचेतन" से जन्म लेते हैं। यानी कुछ भावनाएँ और प्रतीक ऐसे हैं जो पूरी इंसानियत में साझा हैं। इसलिए दुनिया के अलग-अलग हिस्सों की कहानियाँ एक जैसी लगती हैं। जनचिंतक पारस नाथ झा कहते हैं कि मिथक हमें केवल कल्पना नहीं, बल्कि इंसानी अनुभव का आईना दिखाई देते हैं।

मिथकों का एक बड़ा मक़सद इंसान को सही रास्ता दिखाना भी है। देवताओं और नायकों की कहानियाँ साहस, ईमानदारी, दया और त्याग की सीख देती हैं। वहीं लालच, घमंड और जलन जैसी बुराइयों से आगाह करती हैं। स्वर्ग, नरक और परलोक की कथाएँ लोगों को नेक और मक़सद भरी ज़िंदगी जीने की प्रेरणा देती हैं।

हैरानी की बात यह है कि दुनिया की दूर-दराज़ सभ्यताओं में भी कई मिथक लगभग एक जैसे हैं, जबकि उनका आपस में कोई सीधा संपर्क नहीं था। महाप्रलय की कहानी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। हिंदू धर्म में विष्णु मनु को बचाते हैं, बाइबिल में नूह अपनी नाव से जीवन बचाते हैं और मेसोपोटामिया में उत्नापिष्टिम यही भूमिका निभाते हैं। ऐसी कथाएँ यूनान, चीन, ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों और माया सभ्यता में भी मिलती हैं। शायद ये किसी प्राचीन प्राकृतिक आपदा की याद हैं या फिर पानी के प्रति इंसान के साझा डर और सम्मान की अभिव्यक्ति।

एक और साझा विषय है; अराजकता से सृष्टि का जन्म। मिस्र की कथाओं में आदिकालीन जल से सूर्य देव प्रकट होते हैं। बेबीलोन की कथा में एक देवी के शरीर से धरती बनती है। यूनानी और हिंदू परंपराएँ भी बताती हैं कि व्यवस्था अव्यवस्था से पैदा हुई। यह यात्रा इंसान के भ्रम से समझ तक पहुँचने की कहानी भी है।

मिथकों के देवता अक्सर इंसानी समाज का ही प्रतिबिंब होते हैं। जैसे समाज में राजा, योद्धा और मेहनतकश होते हैं, वैसे ही देवताओं की भी अलग-अलग ज़िम्मेदारियाँ होती हैं। यूनानी कथाओं में ज़्यूस आकाश के, पोसाइडन समुद्र के और हेडीज़ पाताल के स्वामी हैं। हिंदू परंपरा में इंद्र वर्षा के देवता हैं, अग्नि अग्नि के और विष्णु सृष्टि के पालनकर्ता। इन कथाओं ने प्राचीन समाज को व्यवस्था, सत्ता और ज़िम्मेदारी समझने में मदद की।

अधिकांश मिथकों में एक संघर्ष हमेशा दिखाई देता है: व्यवस्था और अराजकता का। देवता और असुर, रोशनी और अंधेरा, नेकी और बुराई आमने-सामने खड़े होते हैं। यह केवल रोमांच नहीं, बल्कि इंसान के भीतर और समाज में चलने वाली जद्दोजहद का प्रतीक है।

आज हम पहले जैसी नई पौराणिक कथाएँ नहीं गढ़ते। लेकिन सुपरहीरो फ़िल्में, स्टार वॉर्स, अंतरिक्ष यात्राओं की कहानियाँ और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की दास्तानें उसी परंपरा का नया रूप हैं। विज्ञान ने बिजली, बादल और बाढ़ के रहस्यों को समझा दिया है, लेकिन इंसान की कल्पना और अर्थ की तलाश अब भी ज़िंदा है। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने साझा किस्सों की जगह अलग-अलग डिजिटल दुनिया बना दी है।

पौराणिक फ़िल्में आज इस आकर्षण की सबसे बड़ी मिसाल बन गई हैं। रामायण, महाभारत और यूनानी कथाओं पर बनी फ़िल्में दुनिया भर में करोड़ों दर्शकों को खींचती हैं। इनके विशाल दृश्य, असाधारण नायक और कर्तव्य, त्याग तथा नियति जैसे विषय लोगों को आज भी बाँध लेते हैं।

जेम्स कैमरून की अवतार इसका बेहतरीन उदाहरण है। पेंडोरा की चमकती दुनिया, अद्भुत जीव-जंतु और प्रकृति से गहरा आध्यात्मिक रिश्ता दर्शकों को एक नई, लेकिन बेहद परिचित दुनिया में ले जाते हैं। यह फ़िल्म बताती है कि इंसान आज भी प्रकृति और ब्रह्मांड के साथ अपना रिश्ता तलाशना चाहता है।

विज्ञान के इस दौर में भी इंसान केवल तथ्यों से संतुष्ट नहीं होता। उसे ज़िंदगी का मतलब चाहिए। जलवायु संकट, तेज़ी से बदलती तकनीक और अनिश्चित भविष्य के बीच हम प्रेरणादायक अंतरिक्ष यात्रियों, सच बोलने वाले नायकों और धरती को जीवित माँ मानने वाली कहानियों की ओर लौटते हैं। इन्हीं में हमें उम्मीद और मक़सद मिलता है।

बरगद के नीचे बैठा वह बूढ़ा किस्सागो शायद यह बात बिना किसी किताब के समझता है। उसकी सुनाई महाप्रलय की कहानी आज के बच्चों को हज़ारों साल पुराने अपने पुरखों से जोड़ देती है। विज्ञान हमें बताता है कि दुनिया कैसे चलती है, लेकिन कहानियाँ हमें समझाती हैं कि यह दुनिया हमारे लिए क्यों मायने रखती है। जब तक इंसान रहेगा, मिथक भी रहेंगे। क्योंकि कहानी कहना और सुनना हमारी फ़ितरत का हिस्सा है।

Wednesday, July 15, 2026

 जब सड़कों पर इंसानों से ज़्यादा जानवरों का राज हो जाए

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बेकाबू आवारा कुत्ते, बंदरों के हमले और सड़कों पर घूमते मवेशी ताज नगरी की रफ्तार और लोगों की सुरक्षा पर भारी पड़ रहे हैं

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

17 जुलाई 2026

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सुबह की पहली किरण ताजमहल पर पड़ने से पहले ही आगरा के लोग अपने घरों से निकलते हैं। लेकिन अब उनकी पहली चिंता ट्रैफिक नहीं, बल्कि सड़क पर खड़े या दौड़ते जानवर होते हैं। दयालबाग, कमला नगर, शाहगंज, ताजगंज, सिकंदरा, बल्केश्वर और ट्रांस यमुना कॉलोनियों तक एक जैसा मंजर दिखाई देता है।

कहीं आवारा कुत्तों के झुंड राहगीरों का पीछा करते हैं। कहीं बंदर छतों और बालकनियों पर नज़र गड़ाए बैठे रहते हैं। यमुना किनारा रोड पर भैंसों और गायों के झुंड सड़क को अपना चारागाह समझ लेते हैं। ऐसा लगता है मानो शहर की सड़कें अब इंसानों की नहीं रहीं।

ताजमहल के कारण दुनिया भर में पहचान रखने वाले इस शहर के लिए यह सिर्फ असुविधा नहीं, बल्कि एक गंभीर नागरिक संकट बन चुका है। अस्पतालों, वाहन चालकों, स्कूली बच्चों और सुबह टहलने वालों के लिए हर दिन एक नई परीक्षा बन गया है।

डराने वाले आंकड़े

सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि आगरा में 90 हजार से अधिक आवारा कुत्ते और लगभग 60 हजार पालतू कुत्ते हैं। हर दिन करीब 300 लोग कुत्तों के काटने का शिकार होते हैं। यह संख्या कई बड़े महानगरों से भी अधिक है।

दिल्ली जैसे विशाल शहर में छह महीने के दौरान जितने डॉग बाइट के मामले दर्ज हुए थे, आगरा में लगभग उतने मामले कुछ ही दिनों में सामने आ जाते हैं। यह तुलना बताती है कि ताज नगरी की समस्या कितनी गंभीर हो चुकी है।

गांधी नगर क्षेत्र के एक वरिष्ठ चिकित्सक बताते हैं कि उनके पास आने वाले अधिकांश पीड़ित 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चे होते हैं। कई बच्चे खेलते समय या कुत्तों को खाना खिलाते हुए घायल हो जाते हैं। निजी क्लीनिकों में ही रोज़ सौ से अधिक मरीज पहुंचते हैं। जिला अस्पताल और अन्य स्वास्थ्य केंद्रों पर अलग से भारी दबाव रहता है।

नगर निगम भी बेबस

नगर निगम के अधिकारी मानते हैं कि मौजूदा संसाधनों से इतनी बड़ी संख्या में कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण करना आसान नहीं है। अभियान चल रहे हैं, लेकिन उनकी रफ्तार समस्या के मुकाबले बहुत धीमी है।

इसी कारण अब पूरे शहर में बड़े स्तर पर नसबंदी और वैक्सीनेशन का काम किसी निजी एजेंसी को सौंपने की योजना बनाई जा रही है। लेकिन लोगों का सवाल है कि जब वर्षों से करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं, तब भी हालात क्यों नहीं बदले?

सिर्फ कुत्ते ही नहीं

मुसीबत केवल आवारा कुत्तों तक सीमित नहीं है। मंदिरों, बाजारों और ताजमहल के आसपास बंदरों का आतंक लगातार बढ़ रहा है। वे बच्चों के हाथ से टिफिन छीन लेते हैं, बुजुर्गों के चश्मे और मोबाइल उठा ले जाते हैं। कई पर्यटक भी उनका शिकार बन चुके हैं।

उधर यमुना किनारा रोड पर शाम के समय नदी से लौटते भैंसों और गायों के झुंड पूरी सड़क घेर लेते हैं। दोपहिया और चारपहिया वाहन किसी तरह रास्ता निकालते हैं। कई बार दुर्घटनाएं होते-होते बचती हैं।

रात का समय सबसे खतरनाक होता है। अंधेरे में काले रंग के मवेशी सड़क पर दिखाई नहीं देते। बाइक सवार अक्सर उनसे टकरा जाते हैं। कई हादसों में लोगों को गंभीर चोटें भी आई हैं।

बदल गई है शहर की दिनचर्या

जो पार्क कभी बुजुर्गों की हंसी और बच्चों की खिलखिलाहट से गूंजते थे, वहां अब डर का माहौल है। सुबह की सैर करने वाले लोग बताते हैं कि कुत्तों के झुंड उनका पीछा करते हैं। कई लोगों ने अपनी सैर का समय घटा दिया है।

माता-पिता अब छोटे बच्चों को अकेले बाहर खेलने भेजने से घबराते हैं। स्कूल जाते समय भी बच्चों के साथ किसी बड़े का होना ज़रूरी समझा जाने लगा है।

देशभर की चिंता, आगरा की चुनौती

देश के कई शहरों में आवारा जानवरों की समस्या बढ़ रही है। मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने भी साफ कहा कि नागरिकों को बिना भय के सार्वजनिक स्थानों पर चलने का संवैधानिक अधिकार है। अदालत ने भीड़भाड़ वाले इलाकों से आवारा कुत्तों को हटाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया और स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी तय की।

अब ठोस कार्रवाई की जरूरत

रिवर कनेक्ट अभियान से जुड़े कार्यकर्ताओं का कहना है कि आगरा केवल स्थानीय लोगों का शहर नहीं, बल्कि करोड़ों पर्यटकों की मंज़िल भी है। यदि सड़कों पर असुरक्षा का माहौल बना रहेगा तो शहर की छवि और पर्यटन, दोनों प्रभावित होंगे।

समाधान आधे-अधूरे उपायों से नहीं निकलेगा। बड़े पैमाने पर नसबंदी और टीकाकरण, छोड़े गए मवेशियों के पुनर्वास, बंदरों के वैज्ञानिक प्रबंधन और लापरवाह पशु मालिकों पर सख्त कार्रवाई की जरूरत है।

जब तक ऐसा नहीं होता, ताज नगरी के लोग हर सुबह घर से निकलते समय पहले सड़क पर नज़र डालेंगे और फिर अपने कदम आगे बढ़ाएंगे। किसी भी सभ्य शहर के लिए इससे बड़ी बदकिस्मती और क्या हो सकती है?