Sunday, June 28, 2026

 इतिहास का वो अद्भुत स्वाद: 

कैसे चाट, गोल गप्पे बने भारत की सबसे लोकतांत्रिक डिश

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

30 जून 2026

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आगरा से लेकर कोलकाता, चेन्नई से लेकर मुंबई, अहमदाबाद, भारत का सबसे लोकप्रिय स्ट्रीट फूड बन चुका है गोल गप्पा, पानी पूरी, पानी की टिकिया!


क्या आपने कभी सोचा है कि पहला गोलगप्पा  किसने खाया होगा? किसी बादशाह ने, किसी रानी ने, या किसी भूखे राहगीर ने?


दिल्ली की चाँदनी चौक से लेकर आगरा, मथुरा, लखनऊ, बनारस और कोलकाता तक, चाट सिर्फ़ एक नाश्ता नहीं, बल्कि हमारी तहज़ीब का ज़िंदा हिस्सा है। यह अमीर-गरीब, छोटे-बड़े, बच्चे-बूढ़े, सबकी पसंद है। सड़क किनारे ठेले पर मिलने वाली यह मामूली-सी दिखने वाली चीज़ सदियों का इतिहास अपने भीतर समेटे हुए है।

आगरा के हॉस्पिटल रोड पर शाम ढलते ही वही पुरानी खुशबू हवा में घुल जाती है। गरम तेल की महक, हरे धनिये की ताज़गी और इमली की खटास। ठेले पर खड़े बुलाकी चाट वाले अपनी उँगली से फुर्ती से गोलगप्पे में छेद करते हैं, मसालेदार पानी भरते हैं और ग्राहक के हाथ में पकड़ा देते हैं।

"अभी खाइए," वे मुस्कराकर कहते हैं। "गोलगप्पा किसी का इंतज़ार नहीं करता।"

शायद यही बात चाट पर भी लागू होती है। इसे हमेशा ताज़ा ही खाना पड़ता है, और इसकी कहानी भी हर पीढ़ी के साथ नई हो जाती है।

सबसे मशहूर किस्सा यह है कि मुगल बादशाह चाँदनी चौक की नहर में नाव की सैर करते हुए चाट खाते थे। कहा जाता है कि रात में चाँद की रोशनी पानी पर पड़ती थी, संगीत बजता था और शाही मेहमान चटपटी चाट का लुत्फ़ उठाते थे।

सुनने में यह कहानी बेहद ख़ूबसूरत लगती है। लेकिन इतिहास इसकी पूरी तस्दीक़ नहीं करता।

इतिहासकार मानते हैं कि चाँदनी चौक की नहर सचमुच थी। इसे शाहजहाँ की बेटी जहाँआरा बेगम ने बनवाया था। उसी नहर की वजह से इस बाज़ार का नाम चाँदनी चौक पड़ा। लेकिन कहीं भी ऐसा कोई भरोसेमंद दस्तावेज़ नहीं मिलता जिसमें लिखा हो कि बादशाह नाव में बैठकर चाट खाते थे।

यह शायद उन कहानियों में से एक है जो हर बार सुनाए जाने पर थोड़ी और रंगीन होती चली गईं।

एक और कहानी कुछ ज़्यादा भरोसेमंद लगती है। कहा जाता है कि शाहजहाँ के हकीमों ने दिल्ली के खारे पानी से होने वाली बदहज़मी दूर करने के लिए दही, इमली और मसालों वाली चाट खाने की सलाह दी थी। इसका भी कोई पक्का सबूत नहीं है, लेकिन यह बात पूरी तरह नामुमकिन भी नहीं लगती।

असलियत यह है कि चाट मुगलों से भी कहीं ज़्यादा पुरानी है।

गोलगप्पे की कहानी तो दो हज़ार साल पहले के मगध साम्राज्य तक पहुँच जाती है। एक और मशहूर दास्तान महाभारत से जुड़ी है। कहा जाता है कि द्रौपदी ने बचे हुए आटे और सब्ज़ियों से पांडवों के लिए पहला गोलगप्पा बनाया था।

इन दोनों बातों का कोई ठोस प्रमाण नहीं है, लेकिन इतना तय है कि यह व्यंजन सदियों से आम लोगों का साथी रहा है।

हाँ, उस समय आलू नहीं था। आलू तो सोलहवीं सदी में पुर्तगाली भारत लाए थे। इसलिए शुरुआती गोलगप्पों में दाल, अनाज या मसालेदार साग भरा जाता होगा।

फूडी दर्शन भाई बताते हैं, "मुगलों ने चाट बनाई नहीं, लेकिन उसे नया मुक़ाम ज़रूर दिया। उनके दौर में दिल्ली, आगरा और मथुरा के बाज़ार तेज़ी से आबाद हुए। हिन्दू और जैन समाज की शाकाहारी परंपराओं ने आलू, दही, दाल और मसालों से बनने वाले सस्ते और स्वादिष्ट नाश्तों को खूब बढ़ावा दिया। यही बाज़ार आगे चलकर चाट की असली पहचान बने।"

दिल्ली की पापड़ी चाट, आगरा की करारी आलू टिक्की और मथुरा की भक्तिभाव से जुड़ी चाट आज भी उसी विरासत की याद दिलाती हैं। दिल्ली में शाह जहां रोड पर दही भल्ले की चाट खाने नेताओं की भीड़ लगी रहती थी, लोग बताते हैं मेनका गांधी भी इनकी चाट की शौकीन थीं।

फिर रेल आई। लोग एक शहर से दूसरे शहर पहुँचे। बँटवारे के बाद लाखों शरणार्थी दिल्ली आए और अपने साथ चाट के नए स्वाद भी ले आए। मुंबई ने भेलपूरी बनाई, कोलकाता ने पुछका को और तीखा कर दिया, जबकि हर शहर ने अपनी ज़ुबान में चाट का नया अध्याय लिख दिया।

आज चाट करोड़ों रुपये का कारोबार है। शादियों की दावतों में सबसे ज्यादा भीड़ चाट स्टॉल पर रहती है। बड़े बड़े इमरतबानों में तरह तरह के मसालेदार पानी रहते हैं। पाँच सितारा होटलों के मेन्यू में भी है और सोशल मीडिया की तस्वीरों में भी। 

बादशाहों के किस्से सच हों या अफ़साने, इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता। सच यह है कि चाट ने हर सल्तनत को पीछे छोड़ दिया। आज भी भारत की गलियों में वही सबसे बड़ा बादशाह है, जिसके सामने हर कोई बराबर खड़ा होता है; जेब चाहे भरी हो या खाली।

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मानसून जो रास्ते से भटक गया, आसमान जो बरसना भूल गया

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अल्लाह, मेघ दे, पानी दे !

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

1 जुलाई 2026

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जून गुजर गया। कैलेंडर ने नया महीना दिखा दिया, लेकिन खेत अब भी सूखे पड़े हैं। 

उत्तर प्रदेश के बांदा जिले का किसान रामदीन रोज़ सुबह आसमान की तरफ देखता है। उसे बादलों का इंतज़ार है, मगर नज़र आती है सिर्फ़ धूल। खेतों की मिट्टी जगह-जगह फट गई है। धरती की दरारें जैसे किसी गहरे ज़ख्म की कहानी सुना रही हों।


इस साल जून ने किसानों की उम्मीदों पर पानी नहीं, मायूसी बरसाई। देश के कई हिस्सों में बारिश सामान्य से 30 से 40 प्रतिशत कम हुई। कहीं-कहीं तो आधी से भी कम बारिश दर्ज की गई। 

दक्षिण-पश्चिम मानसून, जो हर साल जून की शुरुआत में केरल से दस्तक देकर पूरे देश को राहत देता है, इस बार जैसे रास्ता ही भटक गया। कई इलाकों तक वह समय पर पहुंच ही नहीं पाया।


रामदीन अकेला नहीं है। देश के करोड़ों किसान इसी बेचैनी से आसमान निहार रहे हैं। मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक और बुंदेलखंड जैसे इलाकों में खेत सूने पड़े हैं। जहां इस समय तक धान, सोयाबीन, दालें और मोटे अनाज की हरियाली लहलहाती थी, वहां अब धूल उड़ रही है। खरीफ की बुवाई काफी पीछे चल रही है। कई जगह ट्रैक्टर खड़े हैं, बीज और खाद की दुकानों पर सन्नाटा पसरा है।


देश के विभिन्न क्षेत्रों में पानी का संकट पहले ही पुराना है। हर कमजोर मानसून यहां की मुश्किलें कई गुना बढ़ा देता है। किसान साहूकारों से ऊंचे ब्याज पर कर्ज लेकर बीज खरीदते हैं। अगर बारिश न हो तो फसल चौपट हो जाती है। फिर पूरा साल कर्ज़ चुकाने की जद्दोजहद में निकल जाता है। गरीब किसान की ज़िंदगी जैसे उम्मीद और मायूसी के बीच झूलती रहती है।


देश के बड़े जलाशयों की तस्वीर भी तसल्ली देने वाली नहीं है। पानी का भंडार लगातार घट रहा है। इसका असर सिर्फ खेती पर नहीं पड़ेगा, बल्कि पीने के पानी, सिंचाई और बिजली उत्पादन पर भी दिखाई देगा। कई जिलों में सूखे जैसे हालात बनने लगे हैं।


अब यह संकट गांवों तक सीमित नहीं रहा। शहर भी प्यासे होने लगे हैं।

मुंबई के जलाशयों में पानी तेजी से घट रहा है। बेंगलुरु में पानी के टैंकरों की मांग अचानक बढ़ गई है। दिल्ली, चेन्नई, हैदराबाद, पुणे और दूसरे बड़े शहरों में भी भूजल का स्तर लगातार नीचे जा रहा है। कई जगह पानी की कटौती शुरू हो चुकी है। स्विमिंग पूलों और निर्माण कार्यों में पानी के इस्तेमाल पर पाबंदियां लगाई जानी चाहिए।

सबसे बड़ी चिंता भूजल की है। हर साल हम ज़मीन के नीचे से लाखों लीटर पानी निकाल लेते हैं, लेकिन उसे वापस पहुंचाने का इंतज़ाम नहीं करते। नतीजा सामने है। टैंकर माफिया फिर सक्रिय हो गया है। लोग घंटों पानी का इंतज़ार कर रहे हैं। अगर जुलाई में भी अच्छी बारिश नहीं हुई, तो कई शहरों में पानी का गंभीर संकट खड़ा हो सकता है।


कमज़ोर मानसून का असर सिर्फ खेतों तक नहीं रहेगा। इसका सीधा असर आम आदमी की जेब पर भी पड़ेगा। अगर फसल कम हुई तो दाल, खाद्य तेल, सब्जियां और अनाज महंगे हो जाएंगे। महंगाई का बोझ हर घर तक पहुंचेगा। गांवों की आमदनी घटेगी तो बाज़ार की रौनक भी फीकी पड़ जाएगी। उद्योगों से लेकर छोटे कारोबार तक इसकी मार झेलेंगे।


मौसम वैज्ञानिक इसके पीछे एल नीनो और बदलती जलवायु को बड़ी वजह मान रहे हैं। उनका कहना है कि मौसम अब पहले जैसा भरोसेमंद नहीं रहा। कभी बादल अचानक फट पड़ते हैं, तो कभी हफ्तों तक आसमान साफ रहता है। जलवायु परिवर्तन ने मौसम का मिज़ाज ही बदल दिया है।


सरकार राहत पैकेज, फसल बीमा, सूखा-रोधी बीज और खाद पर सब्सिडी जैसी योजनाओं पर काम कर रही है। मगर किसान का दर्द सरकारी फाइलों से नहीं, खेतों में बरसने वाली बारिश से कम होगा। जब तक बादल मेहरबान नहीं होंगे, सारी योजनाएं अधूरी लगेंगी।


शाम ढल रही है। सूरज लाल होकर क्षितिज के पीछे छिपने लगा है। रामदीन अपने औजार समेटते हुए धीमी आवाज़ में कहता है, "मुश्किल साल पहले भी आए हैं, लेकिन तब दिल में उम्मीद थी। इस बार लगता है जैसे आसमान ही हमसे रूठ गया है।"


रामदीन सिर्फ एक किसान नहीं है। वह इस मुल्क के लाखों किसानों की आवाज़ है। उसकी आंखों में झलकती फ़िक्र, हर उस परिवार की फ़िक्र है जिसकी रोज़ी-रोटी खेतों से जुड़ी है।


अब सबकी निगाहें जुलाई पर टिकी हैं। अगर बादल जल्द नहीं बरसे, तो सिर्फ खेत ही नहीं सूखेंगे, शहरों की प्यास भी बढ़ेगी, महंगाई भी चढ़ेगी और देश की अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर पड़ेगा।

आसमान अभी भी ख़ामोश है। सवाल सिर्फ इतना है; क्या जुलाई यह ख़ामोशी तोड़ेगी, या फिर यह सूखा आने वाले दिनों की सबसे बड़ी कहानी बन जाएगा?

Friday, June 26, 2026

 पासपोर्ट है, नागरिकता नहीं!

भारतीय पहचान का नया गणित

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क्रिकेट मैच देखने के लिए टिकट खरीदने से आप क्रिकेटर नहीं बन सकते, वोट डालने से नेताजी नहीं बन सकते, लाल टोपी पहनने से क्रांतिकारी नहीं हो सकते, सिर्फ शादी होने से बाप नहीं कहलाए जा सकते, तो फिर पासपोर्ट बनवाने से भारतीय नागरिक कैसे?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

28 जून 2026

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बधाई हो! आपके पास भारतीय पासपोर्ट है। उसके पहले पन्ने पर बड़े गर्व से लिखा है: "Nationality: Indian."

लेकिन ज़्यादा खुश मत होइए। अब पता चला है कि यह किताब आपको दुनिया घुमा सकती है, पर यह साबित नहीं कर सकती कि आप भारतीय नागरिक हैं।

वाह रे कागज़ी लोकतंत्र!

यानी आप हवाई जहाज़ में चढ़ते समय भारतीय हैं। विदेश में फँस जाएँ तो भारतीय दूतावास आपको अपना नागरिक मान लेगा। लेकिन अगर किसी बाबू का मूड खराब हो गया तो वही पासपोर्ट अचानक "सिर्फ़ यात्रा दस्तावेज़" बन जाएगा। नागरिकता? वह तो किसी दूसरी फाइल में बंद होगी।

गजब की सोच! आप एक साथ नागरिक भी हैं और नहीं भी। जब तक बाबू फाइल नहीं खोलता, आपकी नागरिकता हवा में झूलती रहती है।

बेचारा आम आदमी सोच रहा है कि आखिर साबित क्या करे?

आधार है। नहीं चलेगा। पैन कार्ड है। नहीं चलेगा। वोटर आईडी है। नहीं चलेगा। राशन कार्ड है। नहीं चलेगा। पासपोर्ट है। अरे भाई, वह भी नहीं चलेगा!

तो फिर चलेगा क्या?

शायद दादी की दाई का हलफ़नामा। या उस पीपल के पेड़ का प्रमाणपत्र जिसके नीचे आपके दादा जी  पहली बार दादी जी से मिले थे। हो सकता है अगले आदेश में कहा जाए कि अपने गाँव की मिट्टी का नमूना, तीन पड़ोसियों के बयान और बचपन की स्कूल की स्लेट या जांघिया भी साथ लाना अनिवार्य है।

हमारा नौकरशाही तंत्र भी कमाल का है। पहले पुलिस सत्यापन। फिर दस्तावेज़ों की जाँच। फिर फीस। फिर महीनों का इंतज़ार। अंत में आपको एक चमचमाता पासपोर्ट सौंपा जाता है और मुस्कुराकर कहा जाता है, "शुभ यात्रा! हाँ, एक छोटी-सी बात... इससे नागरिकता सिद्ध नहीं होती।"

यह वैसा ही है जैसे डॉक्टर आपको फिटनेस सर्टिफिकेट दे और नीचे लिख दे: "मरीज स्वस्थ है, लेकिन इसे स्वस्थ मानना कानूनी रूप से आवश्यक नहीं है।"

अब तो लगता है भारतीयों को अपने जन्म प्रमाणपत्र बैंक लॉकर में रखने पड़ेंगे। कुछ लोग उसे प्लास्टिक में लपेटकर ज़मीन में गाड़ देंगे। आने वाली पीढ़ियाँ सोना नहीं, जन्म प्रमाणपत्र खोदेंगी।

दुनिया के कई देशों में पासपोर्ट पहचान का अंतिम प्रमाण माना जाता है। भारत में यह शायद सबसे सुंदर भ्रम है। एक महँगी किताब, जिसमें आपकी फोटो है, आपका नाम है, आपकी राष्ट्रीयता लिखी है, लेकिन नागरिकता का सवाल अभी भी लंबित है।

कहते हैं, भारत चाँद पर पहुँच गया है। डिजिटल क्रांति कर चुका है। दुनिया की सबसे तेज़ अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। लेकिन भारतीय होने का प्रमाण ढूँढने की यात्रा अभी भी जारी है।

सावधान रहिए। अगली बार कोई पूछे, "क्या आप भारतीय नागरिक हैं?" तो पासपोर्ट मत दिखाइए। पहले पूछ लीजिए: "सर, आज कौन-सा प्रमाणपत्र मान्य चल रहा है?"

और हाँ, भविष्य के लिए तैयार रहिए। हो सकता है अगला सरकारी परिपत्र आए: "पासपोर्ट, आधार, पैन, वोटर आईडी और जन्म प्रमाणपत्र के साथ कृपया अपनी पहली किलकारी की ऑडियो रिकॉर्डिंग, नाल काटने वाली दाई का शपथपत्र, बचपन में लगवाए गए चेचक के टीके का निशान और पड़ोस के शर्मा जी का चरित्र प्रमाणपत्र भी संलग्न करें।"

कल्पना कीजिए, हवाई अड्डे पर इमिग्रेशन अधिकारी पूछ रहा है, "पासपोर्ट तो ठीक है, लेकिन क्या आपके पास यह प्रमाण है कि आपके परदादा 1912 में गलती से नेपाल घूमने नहीं गए थे?" पीछे खड़ी कतार में लोग फाइलों के बोरे लेकर खड़े हैं। एक ट्रॉली पर सूटकेस नहीं, दस्तावेज़ों के बंडल हैं। ट्रैवल एजेंसियाँ अब "स्विट्ज़रलैंड टूर" के साथ "नागरिकता प्रमाण परामर्श" का पैकेज भी बेच रही हैं। और बेचारा भारतीय सोच रहा है कि काश नागरिकता भी रेलवे की वेटिंग लिस्ट की तरह होती। कम से कम चार्ट लगने पर पता तो चल जाता कि कन्फर्म हूँ या अभी भी आरएसी में लटका हुआ हूँ!

सरकार को एक 'नागरिकता वेरिफिकेशन ऐप' बना देना चाहिए, जहाँ हर पाँच साल में साबित करना पड़े कि आप अब भी वही इंसान हैं जो पैदा हुआ था। शायद भविष्य में डीएनए टेस्ट और जन्मस्थान की मिट्टी की लैब रिपोर्ट भी ज़रूरी हो जाए: सिर्फ़ यह साबित करने के लिए कि आप अपने ही जीवन के नागरिक हैं!


 नमक की दीवार: जब अंग्रेजों ने कांटों का साम्राज्य खड़ा कर दिया

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बृज खंडेलवाल द्वारा

27 जून 2026

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क्या मुंशी प्रेमचंद की अमर कहानी "नमक का दरोगा" सिर्फ एक कल्पना थी? या उसके पीछे उस दौर की कड़वी हक़ीक़त छिपी थी, जब अंग्रेजी हुकूमत ने नमक जैसे मामूली सामान को भी अपने ज़ुल्म का हथियार बना दिया था?

दाल में नमक कम हो जाए तो खाना बेस्वाद लगता है। किसी को नमकहराम कह दें तो बरसों का रिश्ता टूट सकता है। नमक सिर्फ रसोई की चीज़ नहीं है। यह ईमान, भरोसे और इंसान की बुनियादी ज़रूरत का प्रतीक है। सदियों से नमक की बड़ी अहमियत रही है। कभी यह सोने के बराबर कीमती माना जाता था। लेकिन भारत में एक ऐसा दौर भी आया, जब अंग्रेजों ने नमक पर इतना भारी कर लगा दिया कि गरीब आदमी के लिए एक मुट्ठी नमक खरीदना भी मुश्किल हो गया।

प्रेमचंद के ईमानदार दरोगा वंशीधर की कहानी पढ़ते समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि नमक की चोरी रोकने के लिए अंग्रेजों ने पूरे भारत में कांटों की एक विशाल जीवित दीवार खड़ी कर दी थी। यह कोई अफ़साना नहीं, बल्कि इतिहास का सच्चा पन्ना है। बबूल, करोंदा, बेर और दूसरी कांटेदार झाड़ियों से बनी यह दीवार हजारों किलोमीटर तक फैली हुई थी।

उन्नीसवीं सदी के मध्य में ब्रिटिश सरकार के सामने एक बड़ी मुश्किल थी। भारत के समुद्री तटों पर नमक आसानी से तैयार हो जाता था। लेकिन अंग्रेजी इलाकों में उस पर भारी टैक्स लगाया गया था। गरीब लोग और छोटे व्यापारी टैक्स से बचने के लिए नमक एक इलाके से दूसरे इलाके में ले जाते थे। इससे सरकार की आमदनी घट रही थी। अंग्रेजों ने इसे राजस्व का नुकसान माना और इसका अजीब समाधान निकाला।

उन्होंने ईंट या पत्थर की दीवार नहीं बनाई। उन्होंने प्रकृति को ही पहरेदार बना दिया। बबूल, करोंदा और दूसरी कांटेदार झाड़ियों की लंबी बाड़ लगाई गई। कुछ ही वर्षों में यह इतनी घनी हो गई कि ऊंट भी इसे पार नहीं कर सकता था। इसकी ऊंचाई आठ से बारह फीट तक पहुंच गई थी। यह सिर्फ झाड़ियां नहीं थीं, बल्कि अंग्रेजी हुकूमत की एक ज़िंदा दीवार थीं। इसे इनलैंड कस्टम्स लाइन कहा गया, जहां नमक समेत कई सामानों पर कर वसूला जाता था।

इस योजना को मज़बूत बनाने में एलन ऑक्टेवियन ह्यूम की अहम भूमिका रही। वे 1867 से 1870 तक इनलैंड कस्टम्स के कमिश्नर रहे। उन्होंने सूखी कांटेदार बाड़ की जगह जीवित हेज तैयार करवाई। बाद में यही ह्यूम भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापकों में भी शामिल हुए। उनके समय में यह कांटों की दीवार हिमालय की तलहटी से लेकर कटक तक फैल गई। पूरी कस्टम्स लाइन लगभग चार हजार किलोमीटर लंबी थी। यह दुनिया की सबसे अनोखी और सबसे लंबी जीवित दीवारों में गिनी जाती है।

इस दीवार की रखवाली के लिए हजारों कर्मचारी तैनात किए गए थे। वे दिन-रात पहरा देते थे। जगह-जगह चौकियां थीं। आने-जाने वालों की तलाशी ली जाती थी। नमक लेकर जाने वाले लोगों से पूछताछ होती थी। ऐसा लगता था मानो अपने ही देश में लोग किसी विदेशी सीमा को पार कर रहे हों।

लेकिन इस पूरी कहानी का सबसे दर्दनाक पहलू गरीब भारतीयों की तकलीफ थी। भारत जैसे गर्म देश में शरीर को नमक की बेहद ज़रूरत होती है। पसीने के साथ शरीर से नमक निकल जाता है। इसके बावजूद अंग्रेज सरकार ने इस बुनियादी ज़रूरत पर भारी टैक्स लगा दिया। नमक महंगा होता गया। गरीबों की थाली से स्वाद ही नहीं, सेहत भी गायब होने लगी। यह सिर्फ टैक्स नहीं था, बल्कि इंसान की बुनियादी ज़रूरत पर लगाया गया अन्याय था।

धीरे-धीरे लोगों के दिलों में गुस्सा भरने लगा। यही गुस्सा आगे चलकर आज़ादी की लड़ाई की ताक़त बना। महात्मा गांधी ने इस दर्द को समझा। 1930 में उन्होंने दांडी मार्च शुरू किया। समुद्र तक पैदल पहुंचकर उन्होंने अपने हाथों से नमक बनाया और अंग्रेजी कानून को खुली चुनौती दी। यह सिर्फ नमक उठाने की घटना नहीं थी। यह पूरे देश के स्वाभिमान को जगाने वाली पुकार थी।

1870 के दशक के आखिर तक अंग्रेज पूरे भारत में नमक उत्पादन पर अपना नियंत्रण कायम कर चुके थे। 1879 में नमक कर पूरे देश में एक जैसा कर दिया गया। इसके बाद कांटों की दीवार की ज़रूरत खत्म होने लगी। उसकी देखभाल महंगी पड़ रही थी। झाड़ियां सूख गईं। किसानों ने उस जमीन पर खेती शुरू कर दी। देखते ही देखते यह विशाल दीवार इतिहास की धूल में गुम हो गई।

करीब सौ साल बाद ब्रिटिश लेखक रॉय मोक्सहम ने पुरानी सरकारी फाइलों में इस दीवार का ज़िक्र पढ़ा। वे भारत आए और इसके निशान खोजने निकल पड़े। 1998 में उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में उन्हें मिट्टी की एक छोटी-सी बची हुई पट्टी मिली। बाद में उनकी पुस्तक "द ग्रेट हेज ऑफ इंडिया" ने दुनिया को बताया कि टैक्स वसूलने के लिए अंग्रेजी साम्राज्य किस हद तक जा सकता था।

आज उस कांटों की दीवार का कोई निशान दिखाई नहीं देता। लेकिन उसकी कहानी अब भी हमें सोचने पर मजबूर करती है। आखिर एक हुकूमत अपनी ही रियाया से नमक का एक दाना छीनने के लिए हजारों किलोमीटर लंबी कांटों की दीवार क्यों खड़ी करती है?

शायद मुंशी प्रेमचंद ने इसका जवाब बहुत पहले दे दिया था। "नमक का दरोगा" सिर्फ साहित्य नहीं था। वह उस दौर का आईना था, जब नमक भी सत्ता का हथियार बन चुका था।

नमक आज भी हमें सिर्फ खाने का स्वाद नहीं देता। वह हमें आज़ादी की कीमत, अन्याय के खिलाफ संघर्ष और इंसान के स्वाभिमान की याद भी दिलाता है। इतिहास की यह भूली-बिसरी कहानी बताती है कि जब हुकूमत इंसान की सबसे छोटी ज़रूरत पर भी पहरा बैठा देती है, तब वही ज़ुल्म एक दिन इंक़लाब की चिंगारी बन जाता है।

Wednesday, June 24, 2026

 


सेक्स का बुखार: क्या दुनिया अब बिस्तर के इर्द-गिर्द घूम रही है?

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मोबाइल स्क्रीन से बेडरूम तक, कारोबार से राजनीति तक... आखिर सेक्स है क्या: सुख, शक्ति, सनक या सभ्यता का सबसे बड़ा जुनून?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

26 जून 2026

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रात के दो बजे हैं।

दुनिया के तमाम शहर सो रहे हैं । सड़कें खाली हैं। लेकिन करोड़ों उंगलियां अब भी मोबाइल स्क्रीन पर फिसल रही हैं। कोई डेटिंग ऐप पर प्रेम खोज रहा है। कोई अश्लील सामग्री देख रहा है। कोई सोशल मीडिया पर अपनी खूबसूरती को "लाइक्स" में बदल रहा है। और कोई अकेलेपन, आकर्षण और इच्छाओं के बीच झूल रहा है।

तो क्या दुनिया को सचमुच सेक्स का बुखार चढ़ गया है?

आज सेक्स हर जगह दिखाई देता है। फिल्मों में, विज्ञापनों में, वेब सीरीज में, गीतों में, फैशन में और सोशल मीडिया में। देह एक उत्पाद बन गई है। आकर्षण एक पूंजी बन गया है। और इच्छा एक बाजार। किसी को सेक्सी बोलो तो खुशी होती है।

ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या इंसान पहले से ज्यादा कामुक हो गया है, या फिर सेक्स केवल पहले से ज्यादा दिखाई देने लगा है?

सच शायद दोनों के बीच कहीं छिपा है।

सेक्स केवल शारीरिक संबंध नहीं है। यह जीवन की निरंतरता का आधार है। प्रकृति ने इसे प्रजनन के लिए बनाया था। लेकिन इंसान ने इसे प्रेम, आनंद, शक्ति, पहचान, कला, मनोरंजन और व्यापार से जोड़ दिया। आज सेक्स एक बहु-अरब डॉलर का वैश्विक उद्योग है। यह मनोरंजन का साधन भी है और कई लोगों के लिए सामाजिक प्रतिष्ठा तथा व्यक्तिगत उपलब्धि का प्रतीक भी।

लेकिन क्या यह हमेशा ऐसा ही था?

इतिहास बताता है कि सेक्स के प्रति मानव समाज का नजरिया समय के साथ बदलता रहा है। प्राचीन यूनान और रोम में प्रेम, सौंदर्य और कामुकता कला और साहित्य के महत्वपूर्ण विषय थे। मूर्तियों, चित्रों और कविताओं में इसका खुला चित्रण मिलता है। तब इसे जीवन का स्वाभाविक हिस्सा माना जाता था।

फिर समय बदला।

यूरोप में ईसाई धार्मिक प्रभाव बढ़ने के साथ सेक्स को मुख्य रूप से विवाह और संतानोत्पत्ति तक सीमित करने की कोशिश हुई। मध्यकाल और बाद के विक्टोरियन युग में नैतिकता के नाम पर इच्छाओं पर नियंत्रण बढ़ा। विशेष रूप से महिलाओं की कामनाओं को संदेह और पाप की दृष्टि से देखा गया।

कुछ धर्मों, सभ्यताओं में सेक्स को पाप के रूप में देखा गया, लेकिन, भारत की कहानी कुछ अलग है।

करीब दो हजार वर्ष पहले रचित कामसूत्र आज भी दुनिया के सबसे चर्चित ग्रंथों में गिना जाता है। लेकिन यह केवल यौन मुद्राओं की किताब नहीं थी, जैसा कि आम धारणा बना दी गई है। इसके रचयिता वात्स्यायन ने इसे जीवन जीने की कला के रूप में प्रस्तुत किया था। इसमें प्रेम, आकर्षण, संवाद, सामाजिक व्यवहार, सौंदर्यबोध, विवाह और भावनात्मक संतुलन तक की चर्चा मिलती है।

सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि कामसूत्र स्त्री की इच्छा और उसके सुख को भी महत्व देता है। उस दौर के अनेक समाजों की तुलना में यह दृष्टिकोण कहीं अधिक प्रगतिशील माना जा सकता है।

फिर ऐसा क्या हुआ कि आज दुनिया में सेक्स को लेकर इतनी खुली चर्चा दिखाई देती है?

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं कि इसका सबसे बड़ा कारण 1960 के दशक की यौन क्रांति थी। गर्भनिरोधक गोलियों के व्यापक उपयोग ने पहली बार करोड़ों लोगों को गर्भधारण के भय से काफी हद तक मुक्त कर दिया। सेक्स और प्रजनन के बीच का पारंपरिक संबंध कमजोर पड़ने लगा।

यहीं से समाज में बड़ा बदलाव शुरू हुआ।

लोगों ने विवाह पूर्व संबंधों को अधिक स्वीकार करना शुरू किया। शादी की उम्र बढ़ी। शिक्षा और करियर प्राथमिकता बने। इंटरनेट ने सांस्कृतिक सीमाओं को ध्वस्त कर दिया। पोर्नोग्राफी, डेटिंग ऐप्स और सोशल मीडिया ने यौन अभिव्यक्ति को अभूतपूर्व दृश्यता प्रदान की।

आज का युवा उस दुनिया में बड़ा हो रहा है जहां सेक्स हर जगह मौजूद है।

लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी है।

कई अध्ययनों से संकेत मिलता है कि कुछ देशों में किशोरों और युवाओं के बीच वास्तविक यौन गतिविधियों में कमी आई है। यौन रोगों, सहमति, व्यक्तिगत सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता ने व्यवहार को प्रभावित किया है। यानी सेक्स की चर्चा और दृश्यता बढ़ी है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर व्यक्ति पहले से अधिक यौन सक्रिय है।

सोशल एक्टिविस्ट पद्मिनी अय्यर का मानना है कि अत्यधिक व्यावसायीकरण ने सेक्स को एक उत्पाद में बदल दिया है। सोशल मीडिया की तुलना संस्कृति, अवास्तविक अपेक्षाएं और पोर्नोग्राफी की लत रिश्तों को कमजोर कर सकती है। कई युवा प्रदर्शन के दबाव, शरीर की छवि और आत्मविश्वास की कमी से भी जूझ रहे हैं।

दूसरी ओर, डॉ. विजयधूत का तर्क है कि खुलापन लोगों को शर्म और अपराधबोध से मुक्त करता है। सहमति, लैंगिक समानता और विविध यौन पहचानों को स्वीकार करना आधुनिक समाज की महत्वपूर्ण उपलब्धियां हैं। उनके अनुसार चुप्पी से अधिक नुकसान होता है, जबकि स्वस्थ संवाद समझ पैदा करता है।

यहीं आधुनिक पश्चिमी सोच और भारतीय कामसूत्र दर्शन के बीच एक दिलचस्प अंतर दिखाई देता है।

समाजशास्त्री टी.पी. श्रीवास्तव के अनुसार आधुनिक पश्चिमी दृष्टिकोण अक्सर व्यक्तिगत स्वतंत्रता और व्यक्तिगत संतुष्टि पर जोर देता है। व्यक्ति की इच्छा सर्वोपरि मानी जाती है। इसके विपरीत कामसूत्र आनंद को जीवन के व्यापक संतुलन का हिस्सा मानता है। वहां सुख है, लेकिन जिम्मेदारी भी है। आकर्षण है, लेकिन भावनात्मक जुड़ाव भी है। इच्छा है, लेकिन उसके साथ संयम और संतुलन भी है।

शायद यही कारण है कि अनेक विद्वान मानते हैं कि भारत की प्राचीन सोच आज भी प्रासंगिक हो सकती है।

सामाजिक कार्यकर्ता विद्या जी कहती हैं कि इंसान की जैविक प्रकृति हजारों वर्षों में बहुत नहीं बदली है। बदला है उसका परिवेश। तकनीक ने इच्छाओं तक पहुंच आसान कर दी है। गर्भनिरोधकों ने पुराने भय कम कर दिए हैं। इंटरनेट ने कल्पनाओं को वैश्विक बना दिया है।

लेकिन एक सवाल आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना सदियों पहले था।

क्या सेक्स केवल मनोरंजन है, या उससे कहीं अधिक?

इतिहास, संस्कृति और मानवीय अनुभव बताते हैं कि यह केवल शरीर का मामला नहीं है। इसमें भावनाएं हैं। रिश्ते हैं। जिम्मेदारियां हैं। संवेदनाएं हैं। जीवन की निरंतरता है। कुछ दार्शनिक और आध्यात्मिक परंपराएं तो इसे आत्मिक ऊर्जा का स्रोत भी मानती हैं।

अब तो जमाना प्राकृतिक सेक्स से काफी आगे निकल चुका है, एनिमल सेक्स से लेकर, LGBTQ और न जाने क्या क्या तक!!

शायद आधुनिक दुनिया की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह स्वतंत्रता और संतुलन के बीच रास्ता खोजे। आनंद और जिम्मेदारी के बीच पुल बनाए। बाजार और मानवीय संवेदना के बीच सामंजस्य स्थापित करे।

क्योंकि सेक्स जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है। लेकिन जब वह केवल उपभोग की वस्तु बन जाता है, तो उसकी मानवीय गहराई कहीं खोने लगती है।

और शायद यही बहस आने वाले वर्षों में और तेज होने वाली है।

आखिर सवाल सेक्स का नहीं है।

सवाल यह है कि हम इंसान होने का अर्थ किस तरह समझते हैं।


 काफी हुआ है, बहुत बाकी है!

चमकते एक्सप्रेसवे, जर्जर इंसाफ़: क्या सिर्फ़ सड़कें बन जाने से देश विकसित हो जाता है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

24 जून 2026

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एक तरफ़ देश में एक्सप्रेसवे, मेट्रो, एयरपोर्ट और डिजिटल क्रांति की नई इबारत लिखी जा रही है। दूसरी तरफ़ समाज का एक बड़ा हिस्सा अब भी सदियों पुराने पूर्वाग्रहों और सामंती सोच की जंजीरों में जकड़ा हुआ है। ओडिशा में दलितों को अपमानित कर सिर मुंडवाने, घुटनों के बल चलने और गंदा पानी पीने पर मजबूर किया जाता है। झारखंड में अंधविश्वास के नाम पर महिलाओं को डायन बताकर मार दिया जाता है, जिनमें अक्सर जमीन हड़पने की साज़िशें छिपी होती हैं। उत्तर प्रदेश में अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाह करने वाले युवाओं को ऑनर किलिंग का शिकार होना पड़ता है। दहेज के दानव ने आज भी घरों को नहीं छोड़ा है और लगभग हर दिन दर्जनों महिलाएं इसकी भेंट चढ़ जाती हैं।

औपनिवेशिक दौर की लालफीताशाही अब भी आम नागरिक का रास्ता रोकती है। राजनीति और कारोबार में परिवारवाद तथा जातिगत नेटवर्क सत्ता और अवसरों पर अपना शिकंजा बनाए हुए हैं। कानून बदल गए, इमारतें बदल गईं, तकनीक बदल गई, लेकिन मानसिकता बदलने की रफ़्तार बेहद धीमी रही।

यही भारत का सबसे बड़ा विरोधाभास है। देश का हार्डवेयर इक्कीसवीं सदी में पहुंच चुका है, लेकिन उसका सामाजिक और प्रशासनिक सॉफ्टवेयर अब भी कई जगह उन्नीसवीं सदी के कोड पर चल रहा है। यही वह खाई है जो चमकते विकास और वास्तविक प्रगति के बीच मौजूद है।

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क्या विकास का मतलब सिर्फ़ चौड़ी सड़कें हैं?

क्या हवाई अड्डों की चमक किसी नागरिक को इंसाफ़ दिला सकती है?

क्या बुलेट ट्रेन की रफ़्तार उस मुकदमे को तेज़ कर सकती है जो बीस साल से अदालत में धूल खा रहा है?

और सबसे बड़ा सवाल। अगर थाना आज भी सत्ता के इशारे पर काम करे, अदालत में तारीख़ पर तारीख़ मिलती रहे और भ्रष्टाचार नए कपड़े पहनकर सामने खड़ा रहे, तो क्या हम सचमुच विकसित भारत की तरफ़ बढ़ रहे हैं?

पिछले बारह वर्षों में भारत का चेहरा बदला है। यह बात स्वीकार करनी होगी। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र और भाजपा शासित राज्यों की तथाकथित "डबल इंजन" सरकारों ने बुनियादी ढांचे के निर्माण में अभूतपूर्व गति दिखाई है।

2014 में राष्ट्रीय राजमार्गों की लंबाई लगभग 91 हजार किलोमीटर थी। आज यह डेढ़ लाख किलोमीटर के करीब पहुंच चुकी है। हवाई अड्डों की संख्या दोगुनी से अधिक हो गई है। वंदे भारत ट्रेनें देश के कई हिस्सों को जोड़ रही हैं। यूपीआई ने भुगतान की दुनिया बदल दी है। करोड़ों लोगों तक सरकारी योजनाओं का पैसा सीधे पहुंच रहा है। नए मेडिकल कॉलेज खुले हैं। गांवों तक नल का पानी पहुंचा है। लाखों घर बने हैं।

यह उपलब्धियां वास्तविक हैं। इन्हें नकारना नाइंसाफी होगी।

लेकिन कहानी का दूसरा हिस्सा कहीं अधिक अहम है।

देश का हार्डवेयर बदल गया है, मगर सॉफ्टवेयर आज भी पुराना है।

नई सड़कें बन गईं, लेकिन पुरानी व्यवस्था जस की तस खड़ी है। कंक्रीट और इस्पात का ढांचा आधुनिक हो गया, मगर पुलिस, अदालतें, प्रशासनिक संस्कृति और जवाबदेही की व्यवस्था अब भी औपनिवेशिक दौर की परछाइयों में जी रही है।

साल 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रकाश सिंह मामले में पुलिस सुधारों के लिए ऐतिहासिक निर्देश दिए थे। अदालत ने कहा था कि पुलिस को राजनीतिक दबाव से मुक्त किया जाए, अधिकारियों को निश्चित कार्यकाल मिले, स्वतंत्र शिकायत प्राधिकरण बने और जांच तथा कानून-व्यवस्था के काम अलग-अलग हों।

बीस साल बीत गए।

आज तक कोई भी राज्य इन निर्देशों को पूरी तरह लागू नहीं कर पाया।

कई राज्यों में पुलिस अब भी 1861 के उस कानून की मानसिकता के तहत काम कर रही है जिसे अंग्रेजों ने जनता की सेवा नहीं, बल्कि जनता को नियंत्रित करने के लिए बनाया था।

कानून बदलना आसान है। व्यवस्था बदलना मुश्किल।

भारतीय न्याय संहिता और अन्य नए आपराधिक कानूनों ने पुराने आईपीसी और सीआरपीसी की जगह ले ली है। इनमें कई सकारात्मक बदलाव भी हैं। अपराध स्थल की वीडियोग्राफी, पीड़ितों के अधिकार और समयबद्ध प्रक्रियाओं जैसे प्रावधान स्वागत योग्य हैं।

लेकिन सवाल फिर वही है।

अगर कानून लागू करने वाला तंत्र पुराना ही रहे तो नया कानून कितना नया साबित होगा?

न्यायपालिका की हालत भी कम चिंताजनक नहीं है।

देश की अदालतों में पांच करोड़ से अधिक मुकदमे लंबित हैं। सुप्रीम कोर्ट में ही नब्बे हजार से ज्यादा मामले प्रतीक्षा में हैं। अनेक हाईकोर्ट  न्यायाधीश_कमी के साथ काम कर रहे हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट में कई बार आधे से अधिक पद खाली रहे हैं।

नतीजा यह है कि एक सामान्य नागरिक को संपत्ति विवाद जैसे मामलों में न्याय पाने के लिए दो दशक तक इंतजार करना पड़ सकता है।

सोचिए।

जिस देश में एक्सप्रेसवे दो साल में बन जाते हैं, वहां न्याय मिलने में बीस साल क्यों लगते हैं?

कमी संसाधनों की नहीं दिखती। कमी प्राथमिकता की दिखती है।

भ्रष्टाचार के मोर्चे पर भी तस्वीर मिली-जुली है।

डिजिटल व्यवस्था ने छोटे स्तर की रिश्वतखोरी में कमी जरूर की है। सरकारी योजनाओं का पैसा सीधे खातों में पहुंचने लगा है। बिचौलियों की भूमिका घटी है।

फिर भी अंतरराष्ट्रीय सूचकांकों में भारत का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं कहा जा सकता। राजनीतिक चंदे की पारदर्शिता पर सवाल बने हुए हैं। मुखबिरों की सुरक्षा कमजोर है। बड़े भ्रष्टाचार मामलों में सजा की दर बेहद कम है।

उधर वीआईपी संस्कृति अब भी जीवित है।

काफिले दौड़ते हैं। सड़कें खाली कराई जाती हैं। प्रभावशाली लोगों के लिए नियम अलग दिखाई देते हैं। आम आदमी और खास आदमी के बीच की खाई अब भी पूरी तरह नहीं पटी।

जाति और लिंग आधारित भेदभाव भी कानून की किताबों से भले हट गए हों, लेकिन व्यवहारिक जीवन में उनकी मौजूदगी महसूस की जा सकती है।

राजनीति में भी तस्वीर बहुत अलग नहीं है। भ्रष्टाचार विरोधी भाषण खूब सुनाई देते हैं, लेकिन चुनावों में धनबल और बाहुबल का प्रभाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।

यहीं सबसे बड़ा खतरा छिपा है।

जब हार्डवेयर तेज़ी से आगे बढ़े और सॉफ्टवेयर पीछे छूट जाए, तो विकास का भ्रम पैदा होता है।

उपग्रह से देखने पर शहर चमक सकते हैं। रात में रोशन एक्सप्रेसवे किसी विदेशी पर्यटक को प्रभावित कर सकते हैं। कांच के टर्मिनल और आधुनिक रेलवे स्टेशन तस्वीरों में शानदार लग सकते हैं।

लेकिन किसी राष्ट्र की असली परीक्षा उसकी सड़कों पर नहीं, उसके थानों और अदालतों में होती है।

एक ऐसा देश जहां नागरिक को निष्पक्ष पुलिस न मिले, समय पर न्याय न मिले और सत्ता को जवाबदेह ठहराने वाली संस्थाएं कमजोर हों, वह केवल दिखने में विकसित हो सकता है, वास्तव में नहीं।

2047 के विकसित भारत का सपना केवल बुलेट ट्रेनों, एयरपोर्टों और एक्सप्रेसवे से पूरा नहीं होगा।

विकसित भारत तब बनेगा जब नागरिक को यह भरोसा होगा कि कानून सबके लिए बराबर है, पुलिस सत्ता की नहीं संविधान की सेवक है, और अदालत में इंसाफ़ उसकी उम्र से लंबा नहीं चलेगा।

सड़कें देश को जोड़ती हैं। लेकिन न्याय, जवाबदेही और समानता ही राष्ट्र को मजबूत बनाते हैं। यही वह बुनियाद है, जिसके बिना विकास की सबसे चमकदार इमारत भी खोखली साबित हो सकती है।

Monday, June 22, 2026

 बीस लाख सपने, सवा लाख सीटें: भारत को और मेडिकल कॉलेज चाहिए या नई परीक्षा व्यवस्था ?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

24 जून 2026

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हर साल भारत के लाखों घरों में एक ही सपना पलता है। बेटा या बेटी डॉक्टर बने। हर साल यह सपना एक कठिन परीक्षा से गुजरता है। और हर साल उम्मीदों का पहाड़ आंकड़ों की दीवार से टकरा जाता है।

इस वर्ष नीट-यूजी परीक्षा में 20 लाख से अधिक विद्यार्थियों ने भाग लिया। दूसरी ओर, देश में एमबीबीएस की कुल सीटें लगभग 1.29 लाख हैं। देशभर के 823 मेडिकल कॉलेजों में 1,29,602 सीटें उपलब्ध हैं। यानी एक सीट के लिए औसतन 16 से अधिक अभ्यर्थियों के बीच मुकाबला है। सरकारी मेडिकल कॉलेजों की सीटों के लिए यह प्रतिस्पर्धा और भी भयावह है।

140 करोड़ की आबादी वाले देश का स्वास्थ्य भविष्य इतनी सीमित सीटों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।

यह सच है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत ने मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। कुछ साल पहले जहां एमबीबीएस सीटों की संख्या करीब 1.09 लाख थी, वह बढ़कर लगभग 1.30 लाख तक पहुंच गई है। नए मेडिकल कॉलेज खुले हैं और कई संस्थानों में सीटें बढ़ाई गई हैं। लेकिन मांग की रफ्तार आपूर्ति से कहीं तेज है।

डॉक्टर बनने का सपना अब केवल महानगरों या संपन्न परिवारों तक सीमित नहीं रहा। छोटे शहरों, कस्बों और गांवों के छात्र दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। कई युवा कोचिंग संस्थानों में वर्षों बिताते हैं। परिवार अपनी जमा-पूंजी खर्च कर देते हैं। फिर भी सरकारी सीटें इतनी कम हैं कि मेहनत और प्रतिभा के बावजूद हजारों योग्य छात्र पीछे छूट जाते हैं।

आलोचकों का मानना है कि राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) ने अनजाने में एक विशाल कोचिंग उद्योग को जन्म दिया है, जो छात्रों की आशंकाओं और सपनों से मुनाफा कमाता है। उनका तर्क है कि यह परीक्षा अब प्रतिभा, संवेदनशीलता और वास्तविक समझ से अधिक महंगी कोचिंग, परीक्षा तकनीकों और रटंत शिक्षा को बढ़ावा देती है। इससे ग्रामीण, गरीब और सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों के लिए अवसर असमान हो जाते हैं। कोचिंग संस्थानों की बढ़ती संख्या, ऊंची फीस और प्रश्नपत्र लीक जैसी घटनाओं ने इस धारणा को मजबूत किया है कि शिक्षा के इर्द-गिर्द एक शक्तिशाली व्यावसायिक तंत्र विकसित हो चुका है। हालांकि, नीट को “माफियाओं की साजिश” कहना एक राय है, स्थापित तथ्य नहीं, क्योंकि इसके समर्थन में संगठित आपराधिक गठजोड़ का कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

जब सफलता केवल योग्यता से नहीं, बल्कि फीस भरने की क्षमता से तय होने लगे, तब व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

देश की कुल एमबीबीएस सीटों में लगभग 63 हजार सीटें सरकारी संस्थानों में हैं। शेष सीटें निजी और डीम्ड विश्वविद्यालयों में हैं, जहां फीस लाखों रुपये सालाना से लेकर पूरे पाठ्यक्रम के लिए करोड़ों रुपये तक पहुंच जाती है।

ऐसे में गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए डॉक्टर बनने का सपना अक्सर अधूरा रह जाता है।

यह केवल छात्रों की समस्या नहीं है। यह देश के सार्वजनिक स्वास्थ्य का सवाल है।

आज भी भारत के अनेक ग्रामीण और दूरदराज़ इलाकों में डॉक्टरों की भारी कमी है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र विशेषज्ञों के बिना चल रहे हैं। सरकारी अस्पतालों पर मरीजों का बोझ बढ़ता जा रहा है। डॉक्टर और मरीज के अनुपात में सुधार की जरूरत लगातार महसूस की जा रही है।

मेडिकल शिक्षा का विस्तार केवल शैक्षणिक मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आवश्यकता है।

समाधान मानकों को कम करना नहीं, अवसरों को बढ़ाना है। साल में दो बार अगर नीट परीक्षा अगर आयोजित हो जाए, तो कोई आफत नहीं आ जाएगी।

हर जिले में एक सुसज्जित मेडिकल कॉलेज और उससे जुड़ा शिक्षण अस्पताल होना चाहिए। जिला अस्पतालों को चरणबद्ध तरीके से मेडिकल कॉलेजों में बदला जाए। शिक्षकों की कमी दूर करने के लिए बेहतर वेतन, पारदर्शी भर्ती और आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।

सड़कें, हवाई अड्डे और औद्योगिक गलियारे जितने महत्वपूर्ण हैं, उतना ही महत्वपूर्ण स्वास्थ्य ढांचा भी है। डॉक्टर किसी देश की सबसे बड़ी पूंजी होते हैं।

उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश और पूर्वोत्तर राज्यों जैसे अधिक आबादी वाले क्षेत्रों में नए मेडिकल कॉलेज खोलने की विशेष जरूरत है।

साथ ही, निजी मेडिकल शिक्षा की फीस पर प्रभावी नियंत्रण और पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए। किसी भी प्रतिभाशाली छात्र का सपना केवल आर्थिक मजबूरी के कारण नहीं टूटना चाहिए।

नीट में शामिल होने वाले 20 लाख से अधिक छात्र केवल आंकड़े नहीं हैं। वे देश की ऊर्जा हैं, उसकी आकांक्षाएं हैं और भविष्य की स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ हैं।

डॉक्टर बनने का अवसर कुछ लोगों का विशेषाधिकार नहीं, हर योग्य छात्र का अधिकार होना चाहिए।