Thursday, October 15, 2026

 कॉकरोचों का राज, बाबाओं का चमत्कार और मीडिया की नौटंकी!  

सच गायब, शोर बेशुमार! सत्ता की चापलूसी, अंधविश्वास का कारोबार और जनता के सवालों पर पर्दा आखिर कब तक?

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बृज खंडेलवाल द्वारा  

17 अक्टूबर 2026  

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रातोंरात भगवान बनने वाले बाबाओं की कमी नहीं है। भविष्य बताने वाले ज्योतिषियों की दुकानें चमक रही हैं। कोई ग्रहों की चाल से देश का भविष्य बताता है, कोई चमत्कार से किस्मत बदलने का दावा करता है। टीवी पर स्वयंभू बुद्धिजीवी ज्ञान बांटते हैं। संस्कृति के ठेकेदार तहजीब का सर्टिफिकेट जारी करते हैं। नारी मुक्ति के नाम पर कुछ लोग अपनी दुकान चलाते हैं। और इन सबके बीच कॉकरोच भी खूब फल-फूल रहे हैं; गंदगी में पलते हैं, खतरा भांपते ही बिल में घुस जाते हैं और मौका मिलते ही फिर बाहर निकल आते हैं।  

सवाल सीधा है। जब पाखंड का बाजार गर्म हो, अंधविश्वास की दुकान सज जाए और दिखावे के सौदागर समाज पर छा जाएं, तो सच की आवाज कौन उठाएगा? जवाब होना चाहिए: मीडिया। लेकिन अफसोस, कई बार मीडिया खुद इस तमाशे का हिस्सा बन जाता है। खबर कम, नौटंकी ज्यादा। सवाल कम, शोर ज्यादा। जनता कभी तालियां बजाती है, कभी माथा पीटती है और कभी रिमोट उठाकर चैनल बदल देती है।  

कभी मीडिया को लोकतंत्र का चौथा खंभा कहा जाता था। उसका काम था सत्ता से सवाल पूछना, जनता की आवाज उठाना और हुक्मरानों को आईना दिखाना। आज कई चैनलों को देखकर लगता है कि आईना तो मौजूद है, लेकिन उसमें सच्चाई दिखाने के बजाय सत्ता की आरती उतारी जा रही है।  

टीवी खोलकर देखिए। एंकर की आवाज आसमान छू रही है। स्टूडियो में बैठे प्रवक्ता एक-दूसरे पर ऐसे टूट पड़ते हैं मानो देश की सारी समस्याओं का हल विरोधी को चुप कराने में छिपा हो। बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रदूषण जैसे मुद्दे कोने में खड़े अपनी बारी का इंतजार करते रहते हैं। उनकी सुनता कौन है? राजनीतिक झगड़े में टीआरपी की मलाई जो मिलती है! जनता को चाहिए रोजगार, मगर टीवी पर मिलता है शोर।  

उदाहरण लें: जब दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण का स्तर खतरनाक स्तर पर पहुंच जाता है और अस्पतालों में सांस के मरीज बढ़ जाते हैं, तो कई चैनल घंटों राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और ‘कौन जिम्मेदार’ के शोर में उलझे रहते हैं। उसी समय कोई बाबा ‘वायु शुद्धि यज्ञ’ या ‘ग्रह दोष निवारण’ का कार्यक्रम चला रहा होता है तो कैमरे तुरंत वहां पहुंच जाते हैं। वैज्ञानिक उपायों और जमीनी रिपोर्टिंग की जगह सनसनी और चमत्कार को प्राथमिकता मिल जाती है।  

पत्रकारिता का मिशन पीछे छूट रहा है और कारोबार आगे निकल रहा है। सवाल पूछने वाले पत्रकार की जगह कई बार ऐसे चेहरे दिखाई देते हैं जो सत्ता के प्रवक्ता होने का भ्रम पैदा करते हैं। मीडिया की आजादी का मतलब केवल अखबार छापना या टीवी चैनल चलाना नहीं है। असली आजादी है बिना डर के सच सामने रखना। लेकिन जब मीडिया का मालिकाना हक कुछ बड़े कारोबारी समूहों तक सिमटने लगे, तब चिंता स्वाभाविक है। बड़े कारोबारियों के अपने हित होते हैं, सत्ता से रिश्ते होते हैं और सरकारी विज्ञापनों का महत्व होता है। ऐसे में संपादक के सामने धर्मसंकट खड़ा हो सकता है।  

इसी माहौल में ‘गोदी मीडिया’ जैसे शब्द लोकप्रिय हुए हैं। यह राजनीतिक कटाक्ष है, लेकिन इसके पीछे निष्पक्षता को लेकर जनता का अविश्वास भी दिखाई देता है। सरकार की तारीफ करना गलत नहीं, उसकी आलोचना करना भी अपने आप में कोई क्रांति नहीं। असली पत्रकारिता तथ्यों के आधार पर दोनों काम करती है। सरकार अच्छा करे तो तारीफ मिले, गलती करे तो सवाल उठें। पत्रकारिता का धर्म किसी की आरती उतारना नहीं, बल्कि जनता के सामने सच रखना है।  

जनसंचार के जानकार प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं, “आज खबर की अहमियत कई बार इस बात से तय होती है कि वह कितनी सनसनी पैदा कर सकती है। किसी अभिनेता का बयान, किसी नेता की तकरार या किसी बाबा का चमत्कार घंटों चल सकता है। लेकिन सरकारी अस्पताल में दवाइयां नहीं हैं, स्कूल में शिक्षक नहीं हैं या गांव में पीने का पानी नहीं है, तो खबर के लिए जगह कम पड़ जाती है।”  

समाज सेविका विद्या झा का कहना है, “बाबाओं, ज्योतिषियों और चमत्कार बेचने वालों के लिए कैमरे हमेशा तैयार रहते हैं। कोई भविष्य बताता है, कोई बीमारी दूर करने का दावा करता है और कोई भक्तों को स्वर्ग का टिकट बेचने का भरोसा देता है। मीडिया का काम इन दावों की जांच करना है, न कि बिना सवाल पूछे उनका प्रचार करना।”  

एक और उदाहरण: कुछ वर्ष पहले एक स्वयंभू बाबा ने दावा किया था कि वह कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों को ‘दिव्य शक्ति’ से ठीक कर सकते हैं। कई चैनलों ने बिना किसी वैज्ञानिक जांच के उनके कार्यक्रमों को घंटों प्रसारित किया। बाद में जब मरीजों की शिकायतें सामने आईं और अदालती प्रक्रिया शुरू हुई, तब मीडिया का रुख बदल गया। लेकिन तब तक हजारों लोग भ्रमित हो चुके थे। चमत्कार का तमाशा बिकता है, इसलिए कैमरा वहीं टिक जाता है। वैज्ञानिक सोच की बात करने वाले पीछे रह जाते हैं।  

डिजिटल दौर में झूठ को सजाकर सच के रूप में बेचना आसान हो गया है। कभी पुराना वीडियो नई घटना बताकर दिखाया जाता है, कभी किसी तस्वीर के साथ मनगढ़ंत कहानी जोड़ दी जाती है। सोशल मीडिया की अफवाह जांच-पड़ताल के बिना ब्रेकिंग न्यूज बन जाती है। फैक्ट-चेक मंचों की जरूरत इसी कारण बढ़ी है। लेकिन जिम्मेदारी केवल दूसरों की खबरों की जांच करना नहीं है। हर मीडिया संस्थान को अपनी खबरों की सच्चाई भी सुनिश्चित करनी चाहिए।  

पैसे लेकर खबर दिखाने या छापने का कारोबार भी कम खतरनाक नहीं है। जब विज्ञापन और खबर के बीच का फर्क मिटने लगे, तो पाठक कैसे पहचाने कि वह पत्रकारिता पढ़ रहा है या किसी का प्रचार? कार्यकर्ता सच्चेंद्र सिंह कहते हैं, “जनता को जानने का पूरा हक है कि उसके सामने रखी सामग्री खबर है या विज्ञापन। पत्रकारिता कोई किराना दुकान नहीं, जहां पैसे देकर मनचाहा सच तौल लिया जाए।”  

पत्रकारों पर मुकदमे, छापे और पूछताछ की खबरें भी बढ़ रही हैं। हर जांच को पत्रकारिता पर हमला कहना उचित नहीं। कानून सबके लिए बराबर होना चाहिए। लेकिन यदि कानून का इस्तेमाल आलोचनात्मक आवाजों को दबाने के लिए होने लगे, तो लोकतंत्र की सेहत बिगड़ती है।  

मीडिया में सामाजिक प्रतिनिधित्व का सवाल भी महत्वपूर्ण है। गांवों में पानी की किल्लत, किसानों की मुश्किलें, मजदूरों का पलायन और अस्पतालों की बदहाली भी बड़ी खबरें हैं। लेकिन इन मुद्दों पर रिपोर्टिंग करने में मेहनत लगती है। गांव जाना पड़ता है, लोगों से मिलना पड़ता है और आंकड़ों की जांच करनी पड़ती है। जबकि स्टूडियो में बैठकर किसी को देशद्रोही या राष्ट्रवादी घोषित करना बेहद आसान है।  

नदियां प्रदूषित हों, शहरों में पानी का संकट बढ़े या जलवायु परिवर्तन से खेती प्रभावित हो, तो इन विषयों पर लगातार रिपोर्टिंग होनी चाहिए। मगर कई बार किसी गंभीर मुद्दे की उम्र अगले राजनीतिक विवाद तक ही रहती है। बंगलौर की युवा पत्रकार मुक्त गुप्ता बताती हैं कि मीडिया की दुनिया में कुछ स्वयंभू बुद्धिजीवी भी खूब चमक रहे हैं। "हर विषय पर ज्ञान बांटने को तैयार। तथ्य हों या न हों, आत्मविश्वास में कोई कमी नहीं।  नारीवाद के नाम पर भी कभी-कभी दिखावे की दुकान सज जाती है। महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई को केवल प्रचार और सोशल मीडिया की लोकप्रियता तक सीमित करना आंदोलन के साथ नाइंसाफी है। "

जनता का भरोसा मीडिया की सबसे बड़ी पूंजी है। आज भी कई पत्रकार जोखिम उठाकर सच सामने लाते हैं। छोटे डिजिटल मंच और स्वतंत्र प्रकाशन भी ऐसे मुद्दों को उठाते हैं जिन्हें बड़े संस्थान नजरअंदाज कर देते हैं। यह उम्मीद की किरण है। लेकिन कुछ ईमानदार पत्रकारों के भरोसे पूरे मीडिया की साख नहीं बच सकती। इसके लिए मालिकाना हक में पारदर्शिता, विज्ञापन और खबर के बीच साफ अंतर, गलतियों का सार्वजनिक सुधार और संपादकीय स्वतंत्रता जरूरी है।  

सनसनी की जगह तथ्य-जांच को महत्व देना होगा। सामाजिक विविधता बढ़ानी होगी। जनहित की खबरों को प्राथमिकता देनी होगी। मीडिया को समझना होगा कि जनता केवल मनोरंजन नहीं चाहती। उसे जानना है कि महंगाई क्यों बढ़ रही है, रोजगार कहां हैं, सरकारी योजनाओं का पैसा कहां खर्च हो रहा है और उसके बच्चों का भविष्य कितना सुरक्षित है।  

इन सवालों से मुंह मोड़कर कोई भी संस्थान लंबे समय तक जनता का भरोसा नहीं जीत सकता। मीडिया सत्ता का दरबारी है या जनता का पहरेदार? यही असली सवाल है। लोकतंत्र में पत्रकार का काम किसी सरकार को गिराना या किसी पार्टी को जिताना नहीं है। उसका धर्म सच तलाशना, सवाल पूछना और जनता तक सही जानकारी पहुंचाना है। सरकार किसी भी दल की हो, पत्रकारिता की कसौटी एक ही रहनी चाहिए।  

और कॉकरोचों से भरे कमरे में केवल झाड़ू दिखाने से काम नहीं चलेगा। गंदगी साफ करनी होगी और रोशनी भी लानी होगी। याद रखिए, लोकतंत्र को खतरा केवल झूठ बोलने वालों से नहीं होता। खतरा उन लोगों से भी होता है जो सच जानते हैं, लेकिन खामोश रहते हैं। क्योंकि जब मीडिया सवाल पूछना छोड़ देता है, तो सत्ता जवाब देना भी जरूरी नहीं समझती। और जब जनता की आवाज दब जाती है, तब लोकतंत्र का चौथा खंभा खड़ा तो रहता है, मगर उसकी आत्मा दम तोड़ने लगती है।

Wednesday, October 14, 2026

 दूर के ढोल सुहाने!

यूरोप की चमक-दमक और खाली जेब!

ज्यादा कमाई, ज्यादा मेहनत, फिर भी महीने के अंत में कंगाली!

यूरोप यात्रा ने सिखाया जिंदगी का असली हिसाब-किताब

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बृज खंडेलवाल द्वारा

16 अक्टूबर 2026

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यूरोप की चमचमाती सड़कें, साफ-सुथरी नदियां, शानदार इमारतें और समय पर दौड़ती ट्रेनें देखकर मन खुश हो जाता है। लगता है, बस यहीं बस जाएं! 

लेकिन जैसे ही जेब से पैसे निकलने शुरू होते हैं, सपनों की दुनिया में महंगाई का भूत नाचने लगता है। खूबसूरती अपनी जगह है, मगर जिंदगी चलाने का खर्चा देखकर अच्छे-अच्छों के पसीने छूट जाते हैं। आखिर यह कैसी तरक्की है, जहां कमाई लाखों में और बचत कौड़ियों में रह जाती है?

मेरी हाल की यूरोप यात्रा ने बहुत कुछ सिखाया। खूबसूरत शहर देखे, नदियों के किनारे घूमे, शानदार सार्वजनिक सुविधाएं देखीं और लोगों का अनुशासन भी। लेकिन साथ ही समझ आया कि यहां जिंदगी जीना कोई मुफ्त का तमाशा नहीं है। यहां तो प्रकृति की पुकार सुनने के लिए भी जेब ढीली करनी पड़ सकती है!

भारत में सार्वजनिक शौचालय अक्सर मुफ्त मिल जाते हैं या कुछ रुपये देकर काम चल जाता है। हां, बदबू ऐसी कि नाक बंद करके भागने का मन करे। कई जगह पानी गायब, सफाई नदारद और दरवाजे का भरोसा भगवान भरोसे! 

लेकिन कम से कम जेब तो सलामत रहती है। यूरोप में सार्वजनिक शौचालयों में एक यूरो, यानी करीब सौ रुपये या उससे ज्यादा, खर्च करने पड़ सकते हैं। सोचिए, पेट खराब हो और जेब खाली हो, तो आदमी जाए तो जाए कहां? यहां तो कुदरत की पुकार भी आर्थिक संकट बन सकती है!

टैक्सी का हाल भी कुछ ऐसा ही है। भारत में पांच किलोमीटर की सवारी सौ-दो सौ रुपये में मिल सकती है, जबकि यूरोप के बड़े शहरों में यही सफर पंद्रह सौ से ढाई हजार रुपये तक पड़ सकता है। बस या मेट्रो का टिकट भी कई बार दो-तीन सौ रुपये का होता है। एक कप कॉफी चार-पांच सौ रुपये की और मामूली दोपहर का भोजन पंद्रह सौ रुपये के आसपास! पत्नी को रेस्तरां में खाना खिलाकर निकलिए, तो रास्ते में हिसाब लगाने लगेंगे कि अगली बार घर पर खिचड़ी बनाना ही बेहतर रहेगा।

सुपरमार्केट में फल-सब्जियां खरीदना भी किसी परीक्षा से कम नहीं। सेब, केला, टमाटर, आलू और प्याज के दाम देखकर भारतीय ग्राहक की आंखें फैल जाती हैं। दूध और ब्रेड भी सस्ते नहीं। आप कुछ जरूरी सामान खरीदने जाते हैं और बिल देखकर लगता है कि गलती से पूरा सुपरमार्केट ही खरीद लिया! सबसे सस्ता टूथ ब्रश 350 रुपए का था, सोचा उंगली से ही कुछ दिन काम चला लें।

मगर सबसे बड़ा झटका मकान का किराया देता है। एम्स्टर्डम में एक छोटे से फ्लैट का किराया महीने का दो लाख रुपये या उससे ज्यादा हो सकता है। पेरिस, बर्लिन और ब्रसेल्स भी कम महंगे नहीं हैं। दूसरी तरफ, आगरा में दस-पंद्रह हजार रुपये में ठीकठाक फ्लैट मिल सकता है। तीन कमरों वाला घर भी यूरोप के बड़े शहरों की तुलना में काफी कम किराये पर उपलब्ध हो सकता है।

जरा हिसाब लगाइए। यूरोप में एक महीने का किराया कभी-कभी आगरा में पूरे साल के किराये से भी ज्यादा बैठता है। मकान मालिक तो मालामाल हो जाए और किरायेदार की जेब में हवा बचे! महीने की शुरुआत में तनख्वाह देखकर खुशी होती होगी, लेकिन किराया, बिजली, खाना और आने-जाने का खर्च कटते ही खुशी काफूर हो जाती होगी।

बेशक, यूरोप में वेतन भारत से काफी ज्यादा है। लेकिन खर्च भी उसी रफ्तार से दौड़ते हैं। ज्यादा कमाई का मतलब हमेशा ज्यादा बचत नहीं होता। आदमी सुबह से शाम तक मेहनत करे, टैक्स भरे, मकान का किराया चुकाए और फिर महीने के आखिर में बैंक खाते को ऐसे देखे, जैसे डॉक्टर मरीज की नब्ज देखता है।

स्वास्थ्य सेवाओं में भी तस्वीर मिली-जुली है। यूरोप में सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था कई देशों में अच्छी है, लेकिन निजी डॉक्टर, विशेषज्ञ और कुछ इलाज काफी महंगे पड़ सकते हैं। भारत में डॉक्टर की फीस और अस्पताल का खर्च तुलनात्मक रूप से कम है। हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था में कमियां जरूर हैं, मगर यहां कम आमदनी वाला व्यक्ति भी अपनी हैसियत के मुताबिक इलाज के विकल्प तलाश सकता है।

अब भारत की एक ऐसी खूबी पर आइए, जिसका हिसाब किसी अर्थशास्त्री की किताब में आसानी से नहीं मिलेगा।

हमारे यहां मंदिरों, गुरुद्वारों और सामाजिक संस्थाओं में रोज लाखों लोगों को भोजन मिलता है। गुरुद्वारे का लंगर हो या मंदिर का भंडारा, भूखे पेट को खाना खिलाने की परंपरा आज भी करोड़ों लोगों के लिए सहारा है। वहां किसी से यह नहीं पूछा जाता कि जेब में कितने रुपये हैं, कौन-सी गाड़ी से आए हैं या बैंक खाते में कितना पैसा है। आओ, बैठो और भोजन करो। इंसानियत का इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा?

यूरोप में भी चैरिटी, फूड बैंक और जरूरतमंदों के लिए सामुदायिक रसोई हैं। लेकिन भारत में धार्मिक संस्थाओं के जरिए मुफ्त भोजन की परंपरा का अपना अलग विस्तार और सामाजिक महत्व है।

पानी का मामला भी दिलचस्प है। भारत में अनेक सार्वजनिक स्थानों, मंदिरों और गुरुद्वारों में पीने का पानी मुफ्त मिल जाता है। यूरोप में नल का पानी कई जगह साफ और पीने योग्य है, लेकिन कैफे में बोतलबंद पानी खरीदने जाएं तो बिल देखकर गला सूख सकता है। पानी पीने आए थे, मगर कीमत देखकर प्यास ही मर गई!

हां, भारत की कमजोरियां भी कम नहीं हैं। गंदे शौचालय, प्रदूषित नदियां, कूड़े के ढेर, ट्रैफिक और बदहाल नागरिक सुविधाएं हमें मुंह चिढ़ाती हैं। यूरोप से हमें शहरों की योजना, नदियों की सफाई, सार्वजनिक परिवहन और नागरिक अनुशासन सीखना चाहिए। खूबसूरत नदियां और साफ सार्वजनिक स्थान अपने आप नहीं बनते। इनके पीछे बेहतर व्यवस्था, पैसा और नागरिक जिम्मेदारी होती है।

लेकिन यूरोप की चमक देखकर अपनी हर चीज को बेकार समझ लेना भी नासमझी होगी। वहां सुविधाएं अच्छी हैं, मगर उनकी कीमत भी चुकानी पड़ती है। भारत में जीवनशैली की कई परतें हैं। कोई पांच सितारा होटल में भोजन करता है, तो कोई सड़क किनारे ढाबे पर। कोई मॉल में खरीदारी करता है, तो कोई साप्ताहिक बाजार में मोलभाव करके खुश होता है। दोनों अपनी हैसियत के मुताबिक जिंदगी का आनंद ले सकते हैं।

मेरी यूरोप यात्रा आंखें खोलने वाली रही। वहां की नदियों, शहरों और व्यवस्थाओं से बहुत कुछ सीखने को मिला। लेकिन लौटकर भारत की कुछ खूबियों की अहमियत भी समझ आई। यहां कम पैसों में गुजारा करने के रास्ते ज्यादा हैं, सामाजिक सहयोग की परंपरा मजबूत है और जिंदगी के कई विकल्प उपलब्ध हैं।

यूरोप हमें सिखाता है कि शहर कैसे सुंदर और व्यवस्थित बनाए जाएं। भारत याद दिलाता है कि जिंदगी का आनंद केवल मोटी तनख्वाह से नहीं मिलता।

आखिर में बात इतनी सी है। चमक-दमक देखकर ही किसी जिंदगी को खुशहाल मत मानिए। कभी-कभी चमकती दुकान के पीछे महंगे बिलों का अंबार होता है। और कभी किसी गुरुद्वारे के लंगर में मिली दाल-रोटी, मुफ्त पानी और जेब में बचे सौ रुपये ही जिंदगी का असली खजाना बन जाते हैं!

Tuesday, October 13, 2026

 त्यौहारी धमाका! बाजारों में रौनक, खरीदारी के नए रिकॉर्ड की आस

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कपड़ों से कारों तक, गहनों से गैजेट्स तक छूट की बहार, आसान किस्तों का सहारा और छोटे शहरों से उठती खरीदारी की लहर

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बृज खंडेलवाल द्वारा

15 अक्टूबर 2026

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जरा दिल्ली, मुंबई  के किसी बड़े बाजार का नजारा देखिए। शाम ढलते ही दुकानों की जगमगाती रोशनी आंखों को चौंधिया रही है। कपड़ों के शोरूम में रंग-बिरंगी साड़ियों, डिजाइनर लहंगों और चमचमाते सूटों की बहार है। गहनों की दुकानों में सोना-चांदी दमक रहे हैं। कहीं हीरे की अंगूठियां ग्राहकों को लुभा रही हैं, तो कहीं सोने की चेन पर नजरें टिक गई हैं।

उधर, सड़क के दूसरी ओर कारों के शोरूम सजे हैं। चमचमाती नई गाड़ियां ऐसे खड़ी हैं, मानो ग्राहकों को अपने साथ घर चलने का न्योता दे रही हों। मोटरसाइकिलों के शोरूम में भी भीड़ कम नहीं है। मोबाइल, टीवी, फ्रिज, वाशिंग मशीन और दूसरे घरेलू सामानों की दुकानों पर छूट के बड़े-बड़े बोर्ड टंगे हैं। मिठाइयों की खुशबू, दुकानदारों की आवाजें और ग्राहकों की चहल-पहल मिलकर ऐसा समां बांध रहे हैं कि मंदी की चर्चा कुछ देर के लिए तो कोने में दुबक जाती है।

अखबारों के फुल पेज विज्ञापन देखकर लग रहा है कि इस त्यौहारी सीजन में खरीदारी के नए रिकॉर्ड बनेंगे।  बाजारों के चेहरे पर चमक देखकर तो यही लगता है। 

व्यापारियों के संगठन कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAIT) का अनुमान है कि नवरात्र से दिवाली तक देश में कारोबार सात लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच सकता है। पिछले साल यह आंकड़ा लगभग 6.05 लाख करोड़ रुपये था। इस बार 15 से 18 प्रतिशत बढ़ोतरी की उम्मीद है।

मगर सवाल यह है कि इस संभावित उछाल के पीछे कौन से पांच कारक काम कर रहे हैं?

महंगाई और खर्चों की मार के बीच भी त्योहारों का आकर्षण कम नहीं हुआ है। कई ग्राहक, जिन्होंने पहले कपड़े, घरेलू सामान या गाड़ी खरीदने का इरादा टाल दिया था, अब खरीदारी के लिए तैयार दिख रहे हैं।

कुछ सर्वेक्षणों के अनुसार, लगभग आधे खरीदार पिछले साल के मुकाबले कम से कम 10 प्रतिशत अधिक खर्च करने की योजना बना रहे हैं। यानी इस बार जेब कुछ ज्यादा ढीली हो सकती है।

कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक सामान, गाड़ियां और जीवनशैली से जुड़ी चीजें खरीदने की मांग बढ़ने की उम्मीद है। दुकानदारों को आस है कि त्योहारों का उत्साह उनके गल्लों में भी बरकत लाएगा।

हालांकि, खरीदने की इच्छा और खरीदने की ताकत में फर्क होता है। बाजार की असली परीक्षा तभी होगी, जब ग्राहक सामान पसंद करने के बाद बिल चुकाने को भी तैयार हों।

इस बार त्योहारों की रौनक लंबे समय तक बाजारों को गुलजार रख सकती है। ओणम से छठ तक फैला त्योहारों का सिलसिला लगभग 80 दिनों का बताया जा रहा है, जबकि पिछले साल यह अवधि करीब 52 दिन थी।

ओणम, गणेश चतुर्थी और नवरात्र के दौरान मिले शुरुआती संकेतों ने कारोबारियों की उम्मीदें बढ़ाई हैं। ऑनलाइन खरीदारी के मंचों पर भी ग्राहकों की आवाजाही बढ़ने की खबरें हैं।

अमेजन के ग्रेट इंडियन फेस्टिवल जैसे बिक्री अभियानों ने भी बाजार में उत्साह बढ़ाया है। शुरुआती आंकड़ों में पिछले साल की तुलना में कुछ श्रेणियों में ऑर्डर दोगुने से अधिक होने की खबरें सामने आई हैं।

लंबा त्योहारों का मौसम दुकानदारों को बिक्री के ज्यादा मौके देता है। ग्राहकों को भी खरीदारी के लिए अधिक समय मिलता है। लेकिन लंबा मौसम अपने आप में ज्यादा बिक्री की गारंटी नहीं है। आखिरकार फैसला ग्राहक की जेब ही करेगी।

कीमतों में राहत मिले तो ग्राहक का दिल भी खरीदारी के लिए मचलने लगता है। जीएसटी में हालिया कटौती और दरों के युक्तिकरण से कुछ श्रेणियों में सामान सस्ता हुआ है। इनमें वाहन और कई उपभोक्ता वस्तुएं शामिल हैं।

इसके साथ ही आसान किस्तों, बैंक ऑफरों और पुराने सामान के बदले नई चीज खरीदने की योजनाओं ने भी ग्राहकों को आकर्षित किया है।

अब नई कार खरीदने के लिए पूरी रकम एक साथ जुटाना जरूरी नहीं। मोबाइल, टीवी और फ्रिज भी किस्तों पर घर लाए जा सकते हैं। खरीदारी के लिए अभी पैसा कम पड़ रहा हो तो कुछ योजनाएं भुगतान को आगे टालने का विकल्प भी देती हैं।

खरीदारी का नक्शा तेजी से बदल रहा है। अब बाजार की धड़कन केवल दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और दूसरे महानगरों में नहीं सुनाई देती। छोटे शहरों और कस्बों में भी ग्राहकों के अरमान कुलांचे भर रहे हैं।

टियर-दो और टियर-तीन शहरों से ऑनलाइन खरीदारी में बड़ी हिस्सेदारी आने की खबरें हैं। कुछ बाजारों में इस कारोबार की बढ़ोतरी 50 प्रतिशत से अधिक बताई गई है। कई रिपोर्टों के अनुसार, त्योहारों के दौरान ऑनलाइन ऑर्डर का 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा छोटे शहरों से आ रहा है।

इन शहरों के ग्राहक भी अब महंगे स्मार्टफोन, आधुनिक घरेलू उपकरण, स्मार्ट घड़ियां और आकर्षक घरेलू सजावट का सामान खरीदना चाहते हैं। छोटे शहरों में बड़े ब्रांडों की पहुंच बढ़ी है और ऑनलाइन खरीदारी ने दूरियों को काफी हद तक मिटा दिया है।

क्विक कॉमर्स यानी कुछ ही मिनटों में सामान पहुंचाने वाली सेवाएं भी इस रौनक में अपना हिस्सा जोड़ रही हैं। मिठाई, फल, सजावट का सामान या कोई जरूरी चीज चाहिए, तो मोबाइल पर उंगली घुमाइए और इंतजार कीजिए।

कुछ जरूरी वस्तुओं की महंगाई में नरमी, शहरों में रोजगार और आमदनी के रुझान तथा घरेलू खर्च की बदलती प्राथमिकताएं भी त्योहारों की खरीदारी को सहारा दे सकती हैं।

कुछ परिवार महंगी यात्राओं पर खर्च घटाकर घर की सजावट, नए कपड़ों, घरेलू उपकरणों और पारिवारिक समारोहों पर पैसा लगाना पसंद कर सकते हैं। हवाई किराये, ईंधन की लागत और अनिश्चितता के बीच घर पर त्योहार मनाना कुछ लोगों को बेहतर विकल्प लग सकता है।

हालांकि, ग्रामीण बाजारों की तस्वीर हर जगह एक जैसी नहीं है। कहीं मांग अच्छी है, तो कहीं मानसून के असर और आमदनी की स्थिति ने खरीदारी को प्रभावित किया है। इसलिए पूरे देश में एक जैसी तेजी की उम्मीद करना जल्दबाजी होगी।

त्योहारों की अच्छी बिक्री का असर केवल दुकानदारों तक सीमित नहीं रहता। ज्यादा खरीदारी से परिवहन, गोदामों, पैकेजिंग, होटल, रेस्तरां, पर्यटन, सजावट और ऑनलाइन सामान पहुंचाने वाली सेवाओं को भी काम मिलता है।

जब कंपनियों की बिक्री बढ़ने की उम्मीद मजबूत होती है, तो उनके मुनाफे को लेकर भी बाजार में आशावाद पैदा हो सकता है। इससे शेयर बाजार की धारणा को सहारा मिल सकता है। हालांकि, शेयर बाजार की चाल पर कई दूसरे आर्थिक और वैश्विक कारक भी असर डालते हैं।

कुल मिलाकर, इस दिवाली बाजार में उत्साह की पांच धाराएं मिलकर बह रही हैं। ग्राहकों का भरोसा, लंबे त्योहार, करों में राहत, आसान किस्तें और छोटे शहरों की बढ़ती ताकत कारोबार को नई ऊंचाई दे सकती हैं।


Monday, October 12, 2026

 लड़ाई समोसा, कचौड़ी की नहीं, न्याय की है!

नारेबाजी की क्रांति या बदलाव की लड़ाई? क्या कैंपस की आवाज़ आधी आबादी की आवाज़ है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

14 अक्टूबर 2026

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क्या होगा जब किसी पार्क में एक नाबालिग लड़की के साथ कथित सामूहिक बलात्कार हो और इंसाफ की मांग का शोर चंद मिनटों में तुकबंदी के मुकाबले में बदल जाए? 

जरूर, पुलिस से जवाब मांगे जाने चाहिए, अफसरों की जवाबदेही तय होनी चाहिए और बेटियों की हिफाजत सुनिश्चित होनी चाहिए। लेकिन दिल्ली में एक गंभीर वारदात के बाद सोशल मीडिया पर कुछ ऐसे नारे छा गए, मानो इंसाफ की लड़ाई नहीं, कोई हास्य कवि सम्मेलन चल रहा हो!

सवाल सीधा है। क्या दिल्ली के नामी कॉलेजों में गूंजते ये नारे देश की आधी आबादी की असली आवाज़ हैं, या फिर चंद खुशहाल घरों की बेटियों का गुस्सा, जिसे सोशल मीडिया ने सिर आंखों पर बिठा लिया है?

21 सितंबर 2026 की शाम दिल्ली के कालकाजी मंदिर के पास आस्था कुंज पार्क में एक 17 वर्षीय लड़की अपना जन्मदिन मना रही थी। वह एक पुरुष मित्र के साथ थी। आरोप है कि तीन लोगों ने खुद को पुलिसकर्मी बताकर उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया। दिल्ली पुलिस ने 12 घंटे के भीतर आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया।

लेकिन पार्क की बदइंतजामी भी सामने आई। कई प्रवेश द्वारों पर सीसीटीवी कैमरे नहीं थे। अंधेरा था और सुरक्षा गार्डों की भी कमी थी। उपराज्यपाल तरनजीत सिंह संधू ने दिल्ली के पार्कों की सुरक्षा जांचने के आदेश दिए। दिल्ली विकास प्राधिकरण ने सूर्यास्त के बाद प्रवेश पर पाबंदी लगाई और निगरानी बेहतर करने का भरोसा दिया।

मगर सवाल है कि आखिर एक लड़की का जन्मदिन खौफनाक हादसे में क्यों बदल गया? बेटियों को अपनी आजादी की कीमत डर और पाबंदियों से क्यों चुकानी पड़े?

घटना के बाद लेडी श्रीराम कॉलेज, मिरांडा हाउस, गार्गी और कमला नेहरू कॉलेज की छात्राएं ‘हम औरतें आजाद हैं’ के बैनर तले सड़कों पर उतरीं।

कुछ नारे असरदार थे, तो कुछ ने गंभीर आंदोलन को कैंटीन की गपशप जैसा बना दिया।

“एक कचौरी, दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा!”

“एक सिगरेट, दो चाय, मर्द जात हाय हाय!”

“मेरे सर में दर्द है, इसका कारण मर्द है!”

और फिर फरमाया गया, “हमारी स्कर्ट नहीं है छोटी, इन मर्दों की सोच है छोटी!”

वाह! तुकबंदी ऐसी कि इंस्टाग्राम पर रीलें बन जाएं। गुस्सा भी जाहिर हो गया और मनोरंजन का इंतजाम भी हो गया।

लेकिन जनाब, जरा ठहरिए! क्या इन नारों से पार्कों की बत्तियां जल उठेंगी? क्या गायब सीसीटीवी कैमरे अपने आप लग जाएंगे? क्या पुलिस की गश्त बढ़ जाएगी? और क्या अदालतों में वर्षों से लटके मुकदमे फटाफट निपटने लगेंगे?

नारे ध्यान खींच सकते हैं, मगर सुरक्षा का इंतजाम नहीं कर सकते।

हालांकि छात्राओं ने कुछ बेहद जरूरी बातें भी उठाईं। “रेपिस्ट को अंदर करो, लड़कियों को नहीं” जैसे नारे ने उस पुरानी सोच पर चोट की, जिसमें अपराधी को पकड़ने के बजाय लड़कियों पर पाबंदियां लगा दी जाती हैं।

एक और संदेश था कि बेटियों की लोकेशन पूछने के बजाय बेटों की नीयत जांचिए।

बिल्कुल सही! बेटी कहां गई, क्या पहना और किससे मिली, इन सवालों की लंबी फेहरिस्त बनाने वाले परिवारों को बेटों के व्यवहार पर भी गौर करना चाहिए।

मगर अफसोस, गंभीर संदेश अक्सर मसालेदार तुकबंदी के शोर में दब जाते हैं।

अब असली सवाल पर आइए। क्या दिल्ली के नामी कॉलेजों में पढ़ने वाली छात्राएं करोड़ों भारतीय महिलाओं की नुमाइंदगी करती हैं?

एक खेत में मजदूरी करने वाली महिला, मुंबई के घरों में बर्तन मांजने वाली कामगार, उत्तर प्रदेश के किसी गांव की बहू और दिल्ली के किसी बड़े कॉलेज की छात्रा, सभी को सुरक्षा और सम्मान चाहिए। लेकिन उनकी जिंदगी की मुश्किलें एक जैसी नहीं हैं।

किसी लड़की के लिए आजादी का मतलब अपनी पसंद के कपड़े पहनना हो सकता है। किसी दूसरी के लिए इसका मतलब स्कूल पूरा करना है। किसी महिला के लिए नौकरी पाना आजादी है, तो किसी के लिए घरेलू हिंसा से छुटकारा।

गरीब महिला के सामने अक्सर रोटी, रोजगार और छत की चिंता खड़ी होती है। उसकी आजादी परिवार की आर्थिक हालत से भी जुड़ी होती है। कई महिलाओं के लिए परिवार ही मुश्किल वक्त का सहारा है।

पब्लिक कमेंटेटर प्रोफ पारस नाथ चौधरी कहते हैं, "इसका मतलब यह नहीं कि पुरानी परंपराओं पर सवाल नहीं उठने चाहिए। लेकिन हर परिवार, हर पुरुष और हर सामाजिक रिश्ता दुश्मन नहीं होता।

भारतीय नारी आंदोलन ने शिक्षा, संपत्ति में अधिकार, घरेलू हिंसा से सुरक्षा और रोजगार के बराबर अवसरों के लिए लंबी लड़ाई लड़ी है। यह संघर्ष केवल नारों से नहीं, बल्कि कानून, सामाजिक सुधार और लगातार मेहनत से आगे बढ़ता है। देश में महिलाओं की रोजगार में भागीदारी बढ़ी है, लेकिन रास्ता अभी लंबा है। गांवों और शहरों, अमीरों और गरीबों के बीच बड़ा फर्क मौजूद है।"

क्या इन महिलाओं की आवाज़ इसलिए कम अहम है, क्योंकि वे सोशल मीडिया पर वायरल नहीं होतीं?

सोशल एक्टिविस्ट पद्मिनी अय्यर कहती हैं, "छात्राओं को विरोध करने का पूरा हक है। गुस्सा जायज है। व्यंग्य और हास्य भी समाज की बुराइयों पर चोट कर सकते हैं। लेकिन आंदोलन की असली परीक्षा अगले दिन होती है, जब कैमरे हट जाते हैं और भीड़ अपने घर लौट जाती है।

पार्कों में रोशनी कौन सुनिश्चित करेगा? सीसीटीवी कैमरों की निगरानी कौन करेगा? पुलिस की गश्त पर नजर कौन रखेगा? पीड़िताओं को कानूनी मदद कौन देगा? अदालतों में मुकदमों की सुनवाई तेज कराने के लिए कौन आवाज उठाएगा?

युवा एडवोकेट, अंकुर के मुताबिक, "बलात्कार के मामलों में सजा की दर को लेकर गंभीर चिंता बनी हुई है, हालांकि आंकड़े अलग-अलग राज्यों, अदालतों और अवधियों के अनुसार बदलते हैं। गिरफ्तारी इंसाफ की पहली सीढ़ी है, आखिरी मंजिल नहीं। निष्पक्ष जांच, मजबूत सबूत और समय पर सुनवाई भी जरूरी हैं।"

सरकार केवल घोषणाएं करके अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। इसी तरह आंदोलनकारी भी नारे लगाकर अपना फर्ज पूरा नहीं मान सकते।

सामाजिक कार्यकर्ता मुक्त गुप्ता कहती हैं, " एक बात याद रखिए। सभी पुरुषों को एक ही तराजू में तौलना भी इंसाफ नहीं है। लड़ाई पुरुषों से नहीं, बल्कि अपराधी सोच, यौन हिंसा, दबंगई और दोषियों को बचाने वाली व्यवस्था से होनी चाहिए। पुरुषों को भी इस लड़ाई में भागीदार बनाना होगा।"

भारत को आंदोलनों की जरूरत है, मगर ऐसे आंदोलनों की जो कॉलेजों की चारदीवारी से निकलकर आम महिलाओं की जिंदगी से जुड़ें।

छात्राएं सुरक्षित पार्कों, बेहतर पुलिस व्यवस्था, तेज सुनवाई और पीड़िताओं की मदद के लिए अभियान चलाएं। मजदूर महिलाओं, ग्रामीण संगठनों, वकीलों, शिक्षकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर काम करें। सोशल मीडिया का इस्तेमाल भी हो, लेकिन वायरल वीडियो ही आंदोलन की मंजिल न बन जाएं।

आस्था कुंज की घटना प्रशासन की नाकामी पर सवाल उठाती है। इसका जवाब यह नहीं हो सकता कि लड़कियां शाम के बाद घरों में बैठी रहें और खतरनाक जगहों की बदइंतजामी जस की तस बनी रहे।

आखिर आंदोलन की कामयाबी लाइक, शेयर और तालियों से नहीं, जिंदगी में आए बदलाव से मापी जानी चाहिए।

एक नारा कॉलेज हिला सकता है। लेकिन असली क्रांति तभी होगी, जब उसका असर सड़क, गांव, दफ्तर और घर तक पहुंचे। जब आम महिला बिना खौफ जी सके, तभी समझिए कि नारेबाजी ने इंसाफ की राह पकड़ी है।


Sunday, October 11, 2026

 कॉकरोच क्रांति का खतरनाक खेल! वोट नहीं मिलते तो सड़कों पर हंगामा, दलीलें खत्म तो गाली गलौज!

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बृज खंडेलवाल द्वारा

13 अक्टूबर 2026

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जब वोटर भाव नहीं देते, तो कुछ नेता सड़क पर उतर आते हैं। जब दलीलें खत्म होती हैं, तो गाली गलौज शुरू हो जाती है। और जब जनता साथ नहीं देती, तो क्रांति का ढोल पीट दिया जाता है।

लीजिए जनाब, स्वागत कीजिए कॉकरोच जनता पार्टी का! इसके सिपहसालार देश की सियासत में इधर उधर रेंग रहे हैं। झोले में न ठोस कार्यक्रम है, न बदलाव का नक्शा। बस शोर शराबा, नफरत और हंगामा खड़ा करने का जुनून है।

ये खुद को जनता के गुस्से का असली नुमाइंदा बताते हैं। दावा करते हैं कि देश उबल रहा है और बस एक चिंगारी की देर है। मगर सवाल है कि इनका एजेंडा क्या है? नेता कौन है? देश को आगे ले जाने का रास्ता क्या है? इन सवालों पर सन्नाटा है। इनके पास नारे हैं, गालियों का गोदाम है और सोशल मीडिया पर वायरल होने वाले मीम्स की दुकान है।

इनका सपना भी दिलचस्प है। नेपाल या बांग्लादेश जैसी सड़क क्रांति भारत में भी हो जाए। हर झगड़े को राष्ट्रीय संकट बना दो और हर संस्था को कटघरे में खड़ा कर दो। फिर उम्मीद करो कि मोदी सरकार बिना चुनाव हारे ही गिर जाए।

वाह रे सियासी शॉर्टकट! जनता के बीच जाने, उसके सवाल सुनने और चुनाव लड़ने की क्या जरूरत है? कैमरे के सामने चिल्लाओ और रातोंरात क्रांतिकारी बन जाओ!

कॉकरोच जनता पार्टी ने कमाल का नुस्खा खोजा है। जनता का भरोसा नहीं जीत सकते, तो उसका गुस्सा भड़काओ। समाधान नहीं दे सकते, तो शक और डर बेचो। चुनाव में विरोधियों को नहीं हरा सकते, तो पूरी व्यवस्था को ही बदनाम कर दो।

लेकिन जनाब, लोकतंत्र कोई कॉकरोच दौड़ नहीं है। यहां मेज के नीचे सबसे तेजी से रेंगने वाला विजेता नहीं बनता। जनता का भरोसा जीतने के लिए जमीन पर उतरना पड़ता है।

भारत की विदेश नीति में बढ़ता आत्मविश्वास भी कुछ लोगों को रास नहीं आता। नई दिल्ली का संदेश साफ है। देश के फैसले राष्ट्रीय हितों के हिसाब से होंगे, किसी विदेशी दबाव में नहीं। अमेरिका हो, रूस हो या यूरोप, भारत सबके साथ अपने हित देखकर रिश्ते बनाना चाहता है।

दुनिया कई ताकतों में बंट रही है। अमेरिका की कुछ नीतियों और एलन मस्क जैसे चर्चित लोगों के विचारों से भारत कई मौकों पर असहमत रहा है। ऐसे माहौल में स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखना जरूरी है।

कॉकरोचों को शायद पता भी नहीं होता कि वे किसकी धुन पर नाच रहे हैं। लेकिन उनकी जहरीली सियासत देश में फूट डालने वाली ताकतों के काम जरूर आ सकती है। हर शोर मासूम नहीं होता और हर क्रांतिकारी नारा बदलाव का पैगाम नहीं लाता।

कॉकरोच टोली को नियम कायदे और संवैधानिक प्रक्रियाएं भारी लगती हैं। उसे हर फैसला तुरंत चाहिए, वह भी शाम की टीवी बहस से पहले।

सुप्रीम कोर्ट वही फैसला दे, जो इन्हें पसंद हो। चुनाव आयोग वही करे, जो इनकी मांग हो। संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति इनके खिलाफ पड़ जाए, तो उसे हटाने की मांग शुरू। बात न बने, तो पूरी व्यवस्था को भ्रष्ट और बेकार घोषित कर दो।

तो क्या अगली बार संसद के फैसले भी हैशटैग से होंगे? क्या जजों के निर्णय ऑनलाइन वोटिंग से तय होंगे? क्या संवैधानिक पदों पर नियुक्तियां जंतर मंतर की नारेबाजी से होंगी?

संविधान पढ़ने की क्या जरूरत, जब व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी हर किसी को लोकतंत्र में पीएचडी बांट रही है!

अदालतों की अपनी प्रक्रिया होती है और संवैधानिक पदों की गरिमा भी जरूरी है। विवादों का फैसला सबूत और कानून के आधार पर होना चाहिए। प्रक्रिया धीमी लग सकती है, लेकिन लोकतंत्र दो मिनट में तैयार होने वाला नूडल नहीं है।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग भी संविधान और कानून के दायरे में परखी जानी चाहिए। विपक्ष को सवाल उठाने और सरकार की आलोचना करने का पूरा हक है। लेकिन सड़क पर भीड़ जुटाकर किसी संवैधानिक पदाधिकारी को हटाने की मांग करना कानूनी प्रक्रिया का विकल्प नहीं हो सकता।

दावा मजबूत है, तो सबूत पेश कीजिए। अदालत का फैसला जरूरी है, तो उसका दरवाजा खटखटाइए। हर विवाद को सड़क का तमाशा बनाने की जरूरत क्या है?

भारत में नियमित चुनाव होते हैं। राजनीतिक दल सरकार की आलोचना कर सकते हैं और जनता से समर्थन मांग सकते हैं। लोकतंत्र का असली मैदान यही है, जहां जनता को अपनी पसंद की सरकार चुनने का अधिकार है।

लेकिन चुनाव जीतना बच्चों का खेल नहीं है। इसके लिए संगठन, भरोसेमंद नेतृत्व और जनता की समस्याओं का समाधान चाहिए। लोगों को रोजगार, अच्छे स्कूल, सस्ता इलाज, साफ हवा, सुरक्षित सड़कें और ईमानदार प्रशासन चाहिए। सिर्फ नारों से पेट नहीं भरता। गालियों से अस्पताल नहीं बनते और मीम्स से नौकरियां पैदा नहीं होतीं।

कॉकरोच टोली को मगर आसान रास्ता पसंद है। एक हंगामेदार प्रदर्शन करो, वीडियो बनाओ, विरोधियों को गालियां दो और टीवी कैमरों का इंतजार करो। कुछ घंटे की शोहरत मिलेगी, फिर अगले दिन नया तमाशा खड़ा कर दो।

लेकिन महंगाई, बेरोजगारी, खराब शिक्षा और लचर स्वास्थ्य सेवाओं पर कौन बात करेगा? कैमरे चले जाएंगे, मगर आम आदमी की मुश्किलें बनी रहेंगी।

मोदी सरकार ने जंतर मंतर पर प्रस्तावित बड़े प्रदर्शन को भारी पुलिस बंदोबस्त के जरिए रोकने का रास्ता चुना। समर्थक इसे कानून व्यवस्था बनाए रखने का कदम मान सकते हैं। आलोचक शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर पाबंदियों को लेकर सवाल उठा सकते हैं।

दोनों पक्षों को एक बात समझनी होगी। कानून व्यवस्था और लोकतांत्रिक आजादी के बीच संतुलन जरूरी है। सरकार हर आलोचक को उपद्रवी नहीं बता सकती। इसी तरह प्रदर्शनकारी भी कानून तोड़ने का खुला लाइसेंस नहीं मांग सकते। संविधान शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार देता है, हिंसा और धमकी की छूट नहीं।

लोकतंत्र में सरकार की जवाबदेही जितनी जरूरी है, विरोध का जिम्मेदार होना भी उतना ही जरूरी है। सत्ता को सवालों से डरना नहीं चाहिए। विपक्ष को भी सवाल पूछने के साथ जवाब देने की तैयारी रखनी चाहिए।

विपक्ष की परेशानी सिर्फ पुलिस की बैरिकेडिंग नहीं है। असली चुनौती जनता के सामने भरोसेमंद विकल्प पेश करना है।

राहुल गांधी और दूसरे विपक्षी नेता नरेंद्र मोदी की रोज आलोचना कर सकते हैं। सरकार की गलतियां उजागर करना उनका अधिकार है। लेकिन केवल आलोचना से सरकार का विकल्प तैयार नहीं होता। जनता जानना चाहती है कि विपक्ष सत्ता में आया, तो करेगा क्या?

नफरत कोई घोषणापत्र नहीं है। तंज कोई रणनीति नहीं है। गाली गलौज नेतृत्व नहीं है और वायरल वीडियो चुनाव जीतने का प्रमाणपत्र नहीं है।

विपक्ष को बताना होगा कि रोजगार कैसे बढ़ेगा, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं कैसे सुधरेंगी, संस्थाओं की रक्षा कैसे होगी और अर्थव्यवस्था किस दिशा में जाएगी। जनता को जवाब चाहिए, राजनीतिक कुश्ती का नया मुकाबला नहीं।

भारत ने युद्ध देखे हैं, आपातकाल झेला है और कई राजनीतिक आंधियां पार की हैं। देश को सतर्क नागरिकों, धैर्य और जिम्मेदार राजनीति की जरूरत है। लोकतंत्र केवल सरकार बनाने का तरीका नहीं है। यह असहमति का सम्मान करने और कानून के सामने सबको जवाबदेह रखने की व्यवस्था भी है।

सबसे बड़ा खतरा तब पैदा होता है, जब राजनीतिक विरोधी एक दूसरे को देश का दुश्मन समझने लगते हैं। नफरत बढ़ती है, तो सबसे पहले आम आदमी पिसता है। निवेश प्रभावित होता है, भरोसा टूटता है और समाज में दरारें गहरी होती हैं।

कॉकरोच टीवी स्टूडियो, धरना स्थलों और सोशल मीडिया पर रेंगते रहेंगे। सुबह देश के पतन की घोषणा करेंगे और शाम को लोकतंत्र का मातम मनाएंगे। हर दिन नया शोर, नया आरोप और नया तमाशा। मगर देश चलाने के लिए केवल तमाशा काफी नहीं है।

उन्हें शोर मचाने दीजिए। लेकिन शोर को जनसमर्थन मत समझिए। गुस्से को समझदारी और हंगामे को सुधार का नाम मत दीजिए। सड़क पर जुटी भीड़ और चुनाव में मिलने वाले वोटों के बीच बड़ा फर्क होता है।

अगर कॉकरोच जनता पार्टी सचमुच जनता की नुमाइंदगी करती है, तो चुनाव मैदान में उतरे। अपना कार्यक्रम बताए, उम्मीदवार खड़े करे और जनता से वोट मांगे। जनता खुद फैसला कर देगी कि इनके नेताओं को सत्ता चाहिए या सिर्फ सुर्खियां।

आखिर लोकतंत्र का सीधा सा उसूल है। आप छत पर चिल्लाइए, गलियारों में रेंगिए या सड़क पर नाचिए। लेकिन एक दिन जनता के सामने जाना ही पड़ेगा।

और उस दिन कॉकरोचों को एक कड़वी हकीकत समझ आएगी। बैलेट बॉक्स नाकाम नेताओं की हताशा फेंकने वाला कूड़ेदान नहीं है। वह जनता की अदालत है, जहां फैसले नारों से नहीं, वोटों से होते हैं।

Saturday, October 10, 2026

 आगरा 2047: यमुना को संवारो, गौरव लौटाओ, विरासत के शहर को खुशहाल बनाओ

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भविष्य की तैयारी आज से शुरू होनी चाहिए  

एक शहर जिसने कभी साम्राज्य की तकदीर लिखी थी, वह आज पर्यटकों की सेल्फी, बदहाल सड़कों और अधूरे वादों के सहारे नहीं जी सकता।  

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बृज खंडेलवाल द्वारा  

12 अक्टूबर 2026  

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कभी सोचा? जब 2047 में भारत अपनी आजादी के सौ साल पूरे करेगा, तब आगरा की पहचान कैसी होगी?  

क्या हमारा शहर सिर्फ ताजमहल देखने आने वाले पर्यटकों की भीड़ तक सिमटकर रह जाएगा? या फिर दुनिया के सामने एक ऐसे ऐतिहासिक शहर की मिसाल बनेगा, जिसने अपनी पुरानी शान को आधुनिक विकास से जोड़ दिया हो?  

आगरा के बारह विधायक, पांच सांसद, अनगिनत नेता, सबको मिलकर फैसला आज करना होगा। आगरा को ऐसा शहर बनाना है, जहां स्वच्छ हवा हो, साफ यमुना हो, सुगम यातायात हो, हरे-भरे पार्क हों और लोगों को रोजगार के बेहतर अवसर मिलें। यहां की ऐतिहासिक विरासत सुरक्षित रहे और आम नागरिक भी सम्मान के साथ जीवन बिता सकें।  

आगरा जिले का क्षेत्रफल लगभग 4,027–4,041 वर्ग किलोमीटर है। नगर निगम क्षेत्र और शहरी विस्तार के अनुमान अलग-अलग स्रोतों में 121 से 188–264 वर्ग किलोमीटर तक बताए जाते हैं। 2011 की जनगणना में शहर की आबादी करीब 15.86 लाख और शहरी समूह (UA) करीब 17.60 लाख थी। आज (2025–26 अनुमान) शहरी/मेट्रो क्षेत्र की आबादी लगभग 25–28 लाख के आसपास बताई जा रही है। विभिन्न अनुमानों में 2030 तक यह 28–32 लाख के करीब पहुंच सकती है। लंबे समय में (2040–50) कुछ अनुमान इससे कहीं ऊंचे आंकड़े  हैं, जबकि यमुना एक्सप्रेसवे किनारे प्रस्तावित न्यू आगरा/अर्बन सेंटर (मास्टर प्लान 2041) अतिरिक्त 12–15 लाख लोगों के आवास की योजना बनाई जा रही  है।  

हर साल ताजमहल अकेले 2024–25 में करीब 69 लाख पर्यटकों (लगभग 62.6 लाख भारतीय + 6.45 लाख विदेशी) को आकर्षित करता है और टिकटेड स्मारकों में शीर्ष पर रहता है। फिर भी शहर बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रहा है। यमुना प्रदूषण, बिगड़ती हवा, जाम, कूड़े के ढेर और अव्यवस्थित निर्माण विकास के दावों पर सवाल उठाते हैं।  

अब वक्त आ गया है कि आगरा के भविष्य की योजना बनाई जाए। वर्ष 2047 दूर जरूर है, लेकिन उसकी तैयारी आज से शुरू करनी होगी।  

शुरुआत यमुना से करें

यमुना आगरा की जीवनरेखा है। लेकिन आज यह नदी शहर की उपेक्षा और प्रशासनिक नाकामी की कहानी कहती है। नालों का गंदा पानी, कूड़ा और प्रदूषण इसकी सांसें रोक रहे हैं। नदी किनारे की जमीन पर भी लगातार दबाव बढ़ रहा है।  

आगरा के विकास की पहली शर्त यमुना का पुनर्जीवन होना चाहिए। शहर के सभी नालों को रोककर उनका पानी शोधित किया जाए। सीवेज शोधन संयंत्रों की क्षमता बढ़े और वे पूरी तरह काम करें। औद्योगिक प्रदूषण पर सख्ती हो। बाढ़ क्षेत्र में अवैध निर्माण रोका जाए।  

रिवर कनेक्ट कैंपेन के सदस्य मांग कर रहे हैं, "यमुना किनारे एक सुव्यवस्थित रिवरफ्रंट विकसित किया जाए। यहां हरित क्षेत्र, पैदल चलने के रास्ते, साइकिल ट्रैक, छायादार स्थान, सार्वजनिक घाट और सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए मंच हों। यमुना में पानी की उपलब्धता और नदी के पुनर्जीवन के लिए आगरा बैराज की मांग पर गंभीरता से आगे बढ़ना चाहिए। लेकिन यह काम केवल राजनीतिक घोषणा या शिलान्यास तक सीमित नहीं रहना चाहिए। बैराज के निर्माण से पहले जल प्रवाह, भूगर्भीय परिस्थितियों, पर्यावरण, गाद, बाढ़ और आसपास के इलाकों पर पड़ने वाले प्रभावों का वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी है। नदी में पर्याप्त स्वच्छ पानी पहुंचाने की व्यवस्था भी होनी चाहिए। इस परियोजना को पूरी यमुना घाटी की योजना से जोड़िए। नदी का प्राकृतिक प्रवाह, पर्यावरणीय जरूरतें और बाढ़ से सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।"

आगरा को बेहतर सार्वजनिक परिवहन की जरूरत है। मेट्रो फेज-1 (कुल लगभग 29.4–29.65 किमी, दो कॉरिडोर) का प्राथमिक हिस्सा पहले से चालू है और पूर्ण संचालन की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यह ताजमहल, आगरा किला, सिकंदरा, आईएसबीटी, मेडिकल कॉलेज और आवासीय क्षेत्रों को जोड़ेगा। शहर की बस सेवा मजबूत हो, इलेक्ट्रिक बसें बढ़ें और मेट्रो का विस्तार यात्रियों की वास्तविक जरूरतों के अनुसार किया जाए। बसों, मेट्रो और दूसरे साधनों के बीच आसान संपर्क होना चाहिए।  

फुटपाथ पैदल चलने वालों के लिए सुरक्षित हों। साइकिल सवारों के लिए अलग ट्रैक बनें। चौराहों पर ट्रैफिक सिग्नल काम करें और जेब्रा क्रॉसिंग पर पैदल यात्रियों को प्राथमिकता मिले। पार्किंग की उचित व्यवस्था हो, ताकि सड़कें वाहनों के कब्जे में न चली जाएं। फ्लाईओवर और चौड़ी सड़कें कुछ समस्याएं सुलझा सकती हैं, लेकिन हर समस्या का इलाज कंक्रीट नहीं है। आधुनिक शहर वही है, जहां बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं और दिव्यांग लोग सुरक्षित ढंग से चल सकें।  

ताजमहल आगरा की पहचान है, लेकिन आगरा की विरासत केवल ताजमहल तक सीमित नहीं है। आगरा किला, फतेहपुर सीकरी, पुराने बाजार, मुगलकालीन इमारतें, पेठा, जूते, संगमरमर की नक्काशी और ब्रज की सांस्कृतिक परंपराएं भी इसकी ताकत हैं।  

इन सबको जोड़कर पर्यटन का व्यापक नेटवर्क तैयार किया जाए। पर्यटकों के लिए साफ-सुथरे रास्ते, बेहतर परिवहन, अच्छी जानकारी, स्थानीय भोजन और नियमित सांस्कृतिक कार्यक्रम उपलब्ध हों। उन्हें कुछ घंटे नहीं, बल्कि दो-तीन दिन आगरा में बिताने के लिए प्रेरित किया जाए। इससे स्थानीय दुकानदारों, शिल्पकारों, गाइडों, कलाकारों और युवाओं को रोजगार मिलेगा। पर्यटन का लाभ बड़े कारोबारियों तक सीमित न रहे। छोटे उद्यमियों को भी अवसर मिलें। आगरा को केवल स्मारकों का शहर नहीं, बल्कि जीवंत संस्कृति और रचनात्मक कारोबार का केंद्र बनाना होगा।  

आगरा की अर्थव्यवस्था पर्यटन के अलावा चमड़ा-जूता उद्योग (देश के बड़े क्लस्टरों में से एक, लाखों लोगों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रोजगार), हस्तशिल्प (संगमरमर इनले आदि) और उभरते सेवा क्षेत्र पर टिकी है। न्यू आगरा अर्बन सेंटर (लगभग 14,480 हेक्टेयर, यमुना एक्सप्रेसवे किनारे, मास्टर प्लान 2041) में गैर-प्रदूषणकारी उद्योग, पर्यटन जोन, आवास (HIG/MIG/LIG/EWS) और लगभग 10 लाख रोजगार के लक्ष्य रखे गए हैं। आवास की कमी और अनियोजित विस्तार को रोकने के लिए पानी-सीवर-स्कूल-अस्पताल-परिवहन की पूर्ण व्यवस्था के बाद ही नए क्षेत्र विकसित होने चाहिए।  

शिक्षा में डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, दयालबाग एजुकेशनल इंस्टीट्यूट (डीम्ड), आगरा कॉलेज तथा मेडिकल-इंजीनियरिंग कॉलेज मौजूद हैं। स्वास्थ्य में सरोजिनी नायडू मेडिकल कॉलेज (सरकारी, ऐतिहासिक) के साथ कई निजी मल्टी-स्पेशलिटी अस्पताल (अपोलो, मैनिपल, फोर्टिस आदि) काम कर रहे हैं। खेल में एकलव्य स्पोर्ट्स स्टेडियम (हॉकी एस्ट्रो टर्फ सहित), सदर स्टेडियम और निजी टर्फ/क्लब सक्रिय हैं। न्यू आगरा योजना में स्पोर्ट्स विलेज, गोल्फ कोर्स आदि का भी उल्लेख है। इंडोर स्टेडियम जैसे प्रस्तावों को जमीन पर उतारना जरूरी है।  

आगरा के भविष्य की योजना में हरियाली, पानी और स्वच्छता को विशेष स्थान मिलना चाहिए। पुराने तालाबों को पुनर्जीवित किया जाए। वर्षा जल संचयन अनिवार्य हो। कूड़े का वैज्ञानिक निपटारा हो और सार्वजनिक स्थानों की नियमित सफाई सुनिश्चित की जाए। शहर के आसपास की खेती की जमीन और प्राकृतिक जलमार्गों को अंधाधुंध निर्माण से बचाना होगा।  

पर्यावरणविद डॉ देवाशीष भट्टाचार्य कहते हैं, "सबसे जरूरी है प्रशासनिक जवाबदेही। हर बड़ी परियोजना का बजट, समयसीमा और प्रगति रिपोर्ट सार्वजनिक हो। प्रदूषण के आंकड़े नागरिकों के सामने रखे जाएं। योजनाएं बनाते समय स्थानीय लोगों, विशेषज्ञों, पर्यावरणविदों और सामाजिक संगठनों की राय ली जाए। काम की सफलता का पैमाना शिलान्यास और उद्घाटन की संख्या नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाला बदलाव होना चाहिए। "

आगरा को किसी दूसरे शहर की नकल करने की जरूरत नहीं है। उसे अपनी ऐतिहासिक पहचान, प्राकृतिक संपदा और सांस्कृतिक ताकत के आधार पर आगे बढ़ना है। इसके लिए 2047 तक का स्पष्ट विकास खाका तैयार हो। पहले पांच साल की प्राथमिकताएं तय हों। फिर हर चरण की समीक्षा की जाए। नगर निगम, विकास प्राधिकरण, जिला प्रशासन, राज्य सरकार और केंद्र के बीच बेहतर तालमेल बने। नागरिकों को भी इस अभियान का भागीदार बनाया जाए।  

ताजमहल ने आगरा को दुनिया में पहचान दिलाई। अब स्वच्छ यमुना, बेहतर जीवन और खुशहाल नागरिक इसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकते हैं।  

सवाल यह नहीं है कि आगरा 2047 तक कितना बदल सकता है। असली सवाल यह है कि बदलाव की शुरुआत कब होगी।  

अगर योजना आज नहीं बनेगी, तो 2047 भी वादों का एक और पड़ाव बनकर रह जाएगा। आगरा का भविष्य इंतजार नहीं कर सकता।

 भारत में जन्मदिनों का मौसम!

 सितंबर-अक्टूबर में क्यों बरसते हैं जन्मदिन?


बृज खंडेलवाल द्वारा

10 अक्टूबर 2026


गाँवों में होली के आसपास बच्चों की किलकारियाँ ज्यादा सुनाई देती हैं, तो शहरों में मानसून के दौरान जन्मदिनों की बहार आती है! आखिर माजरा क्या है? क्या ग्रह-नक्षत्र बच्चों के जन्म की तारीख तय करते हैं, या फिर हमारी शादी-ब्याह की परंपराएँ इसके पीछे हैं? और क्या सरकारी बाबू भी इसमें कोई गुल खिला रहे हैं?


जरा अपने दोस्तों, रिश्तेदारों और दफ्तर के साथियों की जन्मतिथियों पर गौर कीजिए। सितंबर और अक्टूबर आते ही जन्मदिनों की झड़ी लग जाती है। व्हाट्सऐप पर बधाइयों की बाढ़ आ जाती है। केक कटते हैं, मोमबत्तियाँ बुझती हैं और तस्वीरें सोशल मीडिया पर चमकने लगती हैं। लगता है, मानो इन दो महीनों को ही जन्मदिन मनाने का ठेका मिला हो!


सितंबर-अक्टूबर में जन्म लेने वाली मशहूर हस्तियों की फेहरिस्त भी लंबी है। अमिताभ बच्चन, रेखा, शबाना आजमी, करीना कपूर, रणबीर कपूर और प्रभास जैसे फिल्मी सितारे इस सूची में शामिल हैं। राजनीति और सार्वजनिक जीवन की बात करें तो नरेंद्र मोदी, महात्मा गांधी, लाल बहादुर शास्त्री और ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जैसी हस्तियों की जन्मतिथियाँ भी इन्हीं महीनों में पड़ती हैं। लता मंगेशकर और आशा पारेख जैसे नाम भी इस चर्चा को दिलचस्प बनाते हैं। अगर आपका जन्मदिन भी इन महीनों में आता है, तो खुद को इस अनौपचारिक सितारा क्लब का सदस्य समझिए!


लेकिन इस जन्मदिन बहार का राज क्या है? ज्योतिष, संयोग या सामाजिक परंपराएँ?


ज्योतिष वेबसाइट एस्ट्रोसेज के आँकड़ों के अनुसार, उसके उपयोगकर्ताओं में 10 अक्टूबर जन्मदिन की सबसे आम तारीख बताई गई। इस तारीख को 1,40,091 लोगों ने दर्ज किया था। इसके बाद 15 अगस्त का नंबर आया। दस-दस की यह तारीख देखने में भी आकर्षक है। मगर सवाल है कि क्या इसके पीछे सितारों का हाथ है या इंसानी आदतों का?


एक ज्योतिषी ने इसकी वजह दिसंबर की शादियों को बताया। उनका तर्क सीधा है। दिसंबर में शादियाँ हुईं, तो नौ महीने बाद अक्टूबर में बच्चों की आमद बढ़ गई। बात में दम लगता है, लेकिन कहानी इतनी सीधी भी नहीं है।


भारत में जन्मतिथियों का सरकारी रिकॉर्ड हमेशा भरोसेमंद नहीं रहा। कई दशक पहले गाँवों और कस्बों में जन्म की सही तारीख दर्ज करना जरूरी नहीं समझा जाता था। कई माता-पिता सुविधा के लिए पहली, दसवीं या पंद्रहवीं तारीख लिखवा देते थे। स्कूल में दाखिले और कागजी काम के लिए भी ऐसी तारीखें सुविधाजनक थीं। यानी 10 अक्टूबर का जलवा कभी-कभी ज्योतिष का चमत्कार नहीं, बल्कि सरकारी रजिस्टर का कमाल भी हो सकता है!


वैज्ञानिक नजरिए से देखें तो भारत में सितंबर में जन्मों की संख्या अक्सर अधिक रहती है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के 2019-21 के आँकड़ों के मुताबिक, साल के कुल जन्मों में सितंबर की हिस्सेदारी लगभग 9.3 प्रतिशत थी। अगस्त से नवंबर तक के चार महीनों में करीब 37 प्रतिशत जन्म दर्ज हुए।


इसका संबंध हमारे शादी-ब्याह के कैलेंडर से भी है। भारत में नवंबर से फरवरी तक शादियों की धूम रहती है। मौसम सुहाना होता है, शुभ मुहूर्त मिलते हैं और बैंड-बाजे रात भर बजते हैं। इसके नौ-दस महीने बाद बच्चों की किलकारियाँ गूँजने लगती हैं। कह सकते हैं कि सर्दियों की शादियाँ मानसून के बच्चों की राह खोलती हैं!


शहरों में कहानी का एक नया मोड़ भी है। कुछ माता-पिता बच्चों के स्कूल में दाखिले को ध्यान में रखकर जन्म का समय तय करने की कोशिश करते हैं। उम्र की सीमा और दाखिले की तारीखों के कारण परिवारों में हिसाब-किताब चलता है। अब बच्चे केवल प्यार की निशानी नहीं, बल्कि दाखिले के कैलेंडर का हिस्सा भी बनते जा रहे हैं! हालाँकि, हर परिवार ऐसा करता है, यह मानना गलत होगा।


भारत अकेला नहीं है। अमेरिका में भी सितंबर में जन्मदिनों की संख्या अधिक देखी गई है। वहाँ क्रिसमस और नए साल की छुट्टियों के दौरान परिवारों के साथ बिताया गया समय इसकी एक संभावित वजह माना जाता है। भारत में शादी की शहनाई और पश्चिम में क्रिसमस की घंटियाँ, दोनों के बाद नौ महीने का हिसाब दिलचस्प नतीजे दिखा सकता है।


मगर इस हँसी-मजाक के पीछे एक गंभीर मसला भी छिपा है। जन्म का सही रिकॉर्ड न होने से सरकारी योजनाओं, कानूनी दस्तावेजों और जनसंख्या संबंधी अध्ययनों में परेशानी होती है। डिजिटल पंजीकरण और अस्पतालों में रिकॉर्ड रखने की व्यवस्था बेहतर हुई है, लेकिन हर जन्म का सटीक हिसाब रखना आज भी जरूरी है।


तो अगली बार कोई कहे कि उसका जन्मदिन 10 अक्टूबर को है, तो मुस्कराइए। हो सकता है सितारों की मेहरबानी हो, सर्दियों की किसी शादी का असर हो, या फिर पुराने जमाने के किसी बाबू ने तारीख गोल कर दी हो!


कारण जो भी हो, सितंबर भारत के जन्मदिन कैलेंडर का बड़ा खिलाड़ी दिखाई देता है। आखिर प्रकृति, परंपरा और सरकारी कागजों की इस मिली-जुली महफिल में केक तो किसी न किसी का कटना ही है!