लड़ाई समोसा, कचौड़ी की नहीं, न्याय की है!
नारेबाजी की क्रांति या बदलाव की लड़ाई? क्या कैंपस की आवाज़ आधी आबादी की आवाज़ है?
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बृज खंडेलवाल द्वारा
14 अक्टूबर 2026
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क्या होगा जब किसी पार्क में एक नाबालिग लड़की के साथ कथित सामूहिक बलात्कार हो और इंसाफ की मांग का शोर चंद मिनटों में तुकबंदी के मुकाबले में बदल जाए?
जरूर, पुलिस से जवाब मांगे जाने चाहिए, अफसरों की जवाबदेही तय होनी चाहिए और बेटियों की हिफाजत सुनिश्चित होनी चाहिए। लेकिन दिल्ली में एक गंभीर वारदात के बाद सोशल मीडिया पर कुछ ऐसे नारे छा गए, मानो इंसाफ की लड़ाई नहीं, कोई हास्य कवि सम्मेलन चल रहा हो!
सवाल सीधा है। क्या दिल्ली के नामी कॉलेजों में गूंजते ये नारे देश की आधी आबादी की असली आवाज़ हैं, या फिर चंद खुशहाल घरों की बेटियों का गुस्सा, जिसे सोशल मीडिया ने सिर आंखों पर बिठा लिया है?
21 सितंबर 2026 की शाम दिल्ली के कालकाजी मंदिर के पास आस्था कुंज पार्क में एक 17 वर्षीय लड़की अपना जन्मदिन मना रही थी। वह एक पुरुष मित्र के साथ थी। आरोप है कि तीन लोगों ने खुद को पुलिसकर्मी बताकर उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया। दिल्ली पुलिस ने 12 घंटे के भीतर आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया।
लेकिन पार्क की बदइंतजामी भी सामने आई। कई प्रवेश द्वारों पर सीसीटीवी कैमरे नहीं थे। अंधेरा था और सुरक्षा गार्डों की भी कमी थी। उपराज्यपाल तरनजीत सिंह संधू ने दिल्ली के पार्कों की सुरक्षा जांचने के आदेश दिए। दिल्ली विकास प्राधिकरण ने सूर्यास्त के बाद प्रवेश पर पाबंदी लगाई और निगरानी बेहतर करने का भरोसा दिया।
मगर सवाल है कि आखिर एक लड़की का जन्मदिन खौफनाक हादसे में क्यों बदल गया? बेटियों को अपनी आजादी की कीमत डर और पाबंदियों से क्यों चुकानी पड़े?
घटना के बाद लेडी श्रीराम कॉलेज, मिरांडा हाउस, गार्गी और कमला नेहरू कॉलेज की छात्राएं ‘हम औरतें आजाद हैं’ के बैनर तले सड़कों पर उतरीं।
कुछ नारे असरदार थे, तो कुछ ने गंभीर आंदोलन को कैंटीन की गपशप जैसा बना दिया।
“एक कचौरी, दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा!”
“एक सिगरेट, दो चाय, मर्द जात हाय हाय!”
“मेरे सर में दर्द है, इसका कारण मर्द है!”
और फिर फरमाया गया, “हमारी स्कर्ट नहीं है छोटी, इन मर्दों की सोच है छोटी!”
वाह! तुकबंदी ऐसी कि इंस्टाग्राम पर रीलें बन जाएं। गुस्सा भी जाहिर हो गया और मनोरंजन का इंतजाम भी हो गया।
लेकिन जनाब, जरा ठहरिए! क्या इन नारों से पार्कों की बत्तियां जल उठेंगी? क्या गायब सीसीटीवी कैमरे अपने आप लग जाएंगे? क्या पुलिस की गश्त बढ़ जाएगी? और क्या अदालतों में वर्षों से लटके मुकदमे फटाफट निपटने लगेंगे?
नारे ध्यान खींच सकते हैं, मगर सुरक्षा का इंतजाम नहीं कर सकते।
हालांकि छात्राओं ने कुछ बेहद जरूरी बातें भी उठाईं। “रेपिस्ट को अंदर करो, लड़कियों को नहीं” जैसे नारे ने उस पुरानी सोच पर चोट की, जिसमें अपराधी को पकड़ने के बजाय लड़कियों पर पाबंदियां लगा दी जाती हैं।
एक और संदेश था कि बेटियों की लोकेशन पूछने के बजाय बेटों की नीयत जांचिए।
बिल्कुल सही! बेटी कहां गई, क्या पहना और किससे मिली, इन सवालों की लंबी फेहरिस्त बनाने वाले परिवारों को बेटों के व्यवहार पर भी गौर करना चाहिए।
मगर अफसोस, गंभीर संदेश अक्सर मसालेदार तुकबंदी के शोर में दब जाते हैं।
अब असली सवाल पर आइए। क्या दिल्ली के नामी कॉलेजों में पढ़ने वाली छात्राएं करोड़ों भारतीय महिलाओं की नुमाइंदगी करती हैं?
एक खेत में मजदूरी करने वाली महिला, मुंबई के घरों में बर्तन मांजने वाली कामगार, उत्तर प्रदेश के किसी गांव की बहू और दिल्ली के किसी बड़े कॉलेज की छात्रा, सभी को सुरक्षा और सम्मान चाहिए। लेकिन उनकी जिंदगी की मुश्किलें एक जैसी नहीं हैं।
किसी लड़की के लिए आजादी का मतलब अपनी पसंद के कपड़े पहनना हो सकता है। किसी दूसरी के लिए इसका मतलब स्कूल पूरा करना है। किसी महिला के लिए नौकरी पाना आजादी है, तो किसी के लिए घरेलू हिंसा से छुटकारा।
गरीब महिला के सामने अक्सर रोटी, रोजगार और छत की चिंता खड़ी होती है। उसकी आजादी परिवार की आर्थिक हालत से भी जुड़ी होती है। कई महिलाओं के लिए परिवार ही मुश्किल वक्त का सहारा है।
पब्लिक कमेंटेटर प्रोफ पारस नाथ चौधरी कहते हैं, "इसका मतलब यह नहीं कि पुरानी परंपराओं पर सवाल नहीं उठने चाहिए। लेकिन हर परिवार, हर पुरुष और हर सामाजिक रिश्ता दुश्मन नहीं होता।
भारतीय नारी आंदोलन ने शिक्षा, संपत्ति में अधिकार, घरेलू हिंसा से सुरक्षा और रोजगार के बराबर अवसरों के लिए लंबी लड़ाई लड़ी है। यह संघर्ष केवल नारों से नहीं, बल्कि कानून, सामाजिक सुधार और लगातार मेहनत से आगे बढ़ता है। देश में महिलाओं की रोजगार में भागीदारी बढ़ी है, लेकिन रास्ता अभी लंबा है। गांवों और शहरों, अमीरों और गरीबों के बीच बड़ा फर्क मौजूद है।"
क्या इन महिलाओं की आवाज़ इसलिए कम अहम है, क्योंकि वे सोशल मीडिया पर वायरल नहीं होतीं?
सोशल एक्टिविस्ट पद्मिनी अय्यर कहती हैं, "छात्राओं को विरोध करने का पूरा हक है। गुस्सा जायज है। व्यंग्य और हास्य भी समाज की बुराइयों पर चोट कर सकते हैं। लेकिन आंदोलन की असली परीक्षा अगले दिन होती है, जब कैमरे हट जाते हैं और भीड़ अपने घर लौट जाती है।
पार्कों में रोशनी कौन सुनिश्चित करेगा? सीसीटीवी कैमरों की निगरानी कौन करेगा? पुलिस की गश्त पर नजर कौन रखेगा? पीड़िताओं को कानूनी मदद कौन देगा? अदालतों में मुकदमों की सुनवाई तेज कराने के लिए कौन आवाज उठाएगा?
युवा एडवोकेट, अंकुर के मुताबिक, "बलात्कार के मामलों में सजा की दर को लेकर गंभीर चिंता बनी हुई है, हालांकि आंकड़े अलग-अलग राज्यों, अदालतों और अवधियों के अनुसार बदलते हैं। गिरफ्तारी इंसाफ की पहली सीढ़ी है, आखिरी मंजिल नहीं। निष्पक्ष जांच, मजबूत सबूत और समय पर सुनवाई भी जरूरी हैं।"
सरकार केवल घोषणाएं करके अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। इसी तरह आंदोलनकारी भी नारे लगाकर अपना फर्ज पूरा नहीं मान सकते।
सामाजिक कार्यकर्ता मुक्त गुप्ता कहती हैं, " एक बात याद रखिए। सभी पुरुषों को एक ही तराजू में तौलना भी इंसाफ नहीं है। लड़ाई पुरुषों से नहीं, बल्कि अपराधी सोच, यौन हिंसा, दबंगई और दोषियों को बचाने वाली व्यवस्था से होनी चाहिए। पुरुषों को भी इस लड़ाई में भागीदार बनाना होगा।"
भारत को आंदोलनों की जरूरत है, मगर ऐसे आंदोलनों की जो कॉलेजों की चारदीवारी से निकलकर आम महिलाओं की जिंदगी से जुड़ें।
छात्राएं सुरक्षित पार्कों, बेहतर पुलिस व्यवस्था, तेज सुनवाई और पीड़िताओं की मदद के लिए अभियान चलाएं। मजदूर महिलाओं, ग्रामीण संगठनों, वकीलों, शिक्षकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर काम करें। सोशल मीडिया का इस्तेमाल भी हो, लेकिन वायरल वीडियो ही आंदोलन की मंजिल न बन जाएं।
आस्था कुंज की घटना प्रशासन की नाकामी पर सवाल उठाती है। इसका जवाब यह नहीं हो सकता कि लड़कियां शाम के बाद घरों में बैठी रहें और खतरनाक जगहों की बदइंतजामी जस की तस बनी रहे।
आखिर आंदोलन की कामयाबी लाइक, शेयर और तालियों से नहीं, जिंदगी में आए बदलाव से मापी जानी चाहिए।
एक नारा कॉलेज हिला सकता है। लेकिन असली क्रांति तभी होगी, जब उसका असर सड़क, गांव, दफ्तर और घर तक पहुंचे। जब आम महिला बिना खौफ जी सके, तभी समझिए कि नारेबाजी ने इंसाफ की राह पकड़ी है।