Wednesday, June 24, 2026

 काफी हुआ है, बहुत बाकी है!

चमकते एक्सप्रेसवे, जर्जर इंसाफ़: क्या सिर्फ़ सड़कें बन जाने से देश विकसित हो जाता है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

24 जून 2026

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एक तरफ़ देश में एक्सप्रेसवे, मेट्रो, एयरपोर्ट और डिजिटल क्रांति की नई इबारत लिखी जा रही है। दूसरी तरफ़ समाज का एक बड़ा हिस्सा अब भी सदियों पुराने पूर्वाग्रहों और सामंती सोच की जंजीरों में जकड़ा हुआ है। ओडिशा में दलितों को अपमानित कर सिर मुंडवाने, घुटनों के बल चलने और गंदा पानी पीने पर मजबूर किया जाता है। झारखंड में अंधविश्वास के नाम पर महिलाओं को डायन बताकर मार दिया जाता है, जिनमें अक्सर जमीन हड़पने की साज़िशें छिपी होती हैं। उत्तर प्रदेश में अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाह करने वाले युवाओं को ऑनर किलिंग का शिकार होना पड़ता है। दहेज के दानव ने आज भी घरों को नहीं छोड़ा है और लगभग हर दिन दर्जनों महिलाएं इसकी भेंट चढ़ जाती हैं।

औपनिवेशिक दौर की लालफीताशाही अब भी आम नागरिक का रास्ता रोकती है। राजनीति और कारोबार में परिवारवाद तथा जातिगत नेटवर्क सत्ता और अवसरों पर अपना शिकंजा बनाए हुए हैं। कानून बदल गए, इमारतें बदल गईं, तकनीक बदल गई, लेकिन मानसिकता बदलने की रफ़्तार बेहद धीमी रही।

यही भारत का सबसे बड़ा विरोधाभास है। देश का हार्डवेयर इक्कीसवीं सदी में पहुंच चुका है, लेकिन उसका सामाजिक और प्रशासनिक सॉफ्टवेयर अब भी कई जगह उन्नीसवीं सदी के कोड पर चल रहा है। यही वह खाई है जो चमकते विकास और वास्तविक प्रगति के बीच मौजूद है।

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क्या विकास का मतलब सिर्फ़ चौड़ी सड़कें हैं?

क्या हवाई अड्डों की चमक किसी नागरिक को इंसाफ़ दिला सकती है?

क्या बुलेट ट्रेन की रफ़्तार उस मुकदमे को तेज़ कर सकती है जो बीस साल से अदालत में धूल खा रहा है?

और सबसे बड़ा सवाल। अगर थाना आज भी सत्ता के इशारे पर काम करे, अदालत में तारीख़ पर तारीख़ मिलती रहे और भ्रष्टाचार नए कपड़े पहनकर सामने खड़ा रहे, तो क्या हम सचमुच विकसित भारत की तरफ़ बढ़ रहे हैं?

पिछले बारह वर्षों में भारत का चेहरा बदला है। यह बात स्वीकार करनी होगी। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र और भाजपा शासित राज्यों की तथाकथित "डबल इंजन" सरकारों ने बुनियादी ढांचे के निर्माण में अभूतपूर्व गति दिखाई है।

2014 में राष्ट्रीय राजमार्गों की लंबाई लगभग 91 हजार किलोमीटर थी। आज यह डेढ़ लाख किलोमीटर के करीब पहुंच चुकी है। हवाई अड्डों की संख्या दोगुनी से अधिक हो गई है। वंदे भारत ट्रेनें देश के कई हिस्सों को जोड़ रही हैं। यूपीआई ने भुगतान की दुनिया बदल दी है। करोड़ों लोगों तक सरकारी योजनाओं का पैसा सीधे पहुंच रहा है। नए मेडिकल कॉलेज खुले हैं। गांवों तक नल का पानी पहुंचा है। लाखों घर बने हैं।

यह उपलब्धियां वास्तविक हैं। इन्हें नकारना नाइंसाफी होगी।

लेकिन कहानी का दूसरा हिस्सा कहीं अधिक अहम है।

देश का हार्डवेयर बदल गया है, मगर सॉफ्टवेयर आज भी पुराना है।

नई सड़कें बन गईं, लेकिन पुरानी व्यवस्था जस की तस खड़ी है। कंक्रीट और इस्पात का ढांचा आधुनिक हो गया, मगर पुलिस, अदालतें, प्रशासनिक संस्कृति और जवाबदेही की व्यवस्था अब भी औपनिवेशिक दौर की परछाइयों में जी रही है।

साल 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रकाश सिंह मामले में पुलिस सुधारों के लिए ऐतिहासिक निर्देश दिए थे। अदालत ने कहा था कि पुलिस को राजनीतिक दबाव से मुक्त किया जाए, अधिकारियों को निश्चित कार्यकाल मिले, स्वतंत्र शिकायत प्राधिकरण बने और जांच तथा कानून-व्यवस्था के काम अलग-अलग हों।

बीस साल बीत गए।

आज तक कोई भी राज्य इन निर्देशों को पूरी तरह लागू नहीं कर पाया।

कई राज्यों में पुलिस अब भी 1861 के उस कानून की मानसिकता के तहत काम कर रही है जिसे अंग्रेजों ने जनता की सेवा नहीं, बल्कि जनता को नियंत्रित करने के लिए बनाया था।

कानून बदलना आसान है। व्यवस्था बदलना मुश्किल।

भारतीय न्याय संहिता और अन्य नए आपराधिक कानूनों ने पुराने आईपीसी और सीआरपीसी की जगह ले ली है। इनमें कई सकारात्मक बदलाव भी हैं। अपराध स्थल की वीडियोग्राफी, पीड़ितों के अधिकार और समयबद्ध प्रक्रियाओं जैसे प्रावधान स्वागत योग्य हैं।

लेकिन सवाल फिर वही है।

अगर कानून लागू करने वाला तंत्र पुराना ही रहे तो नया कानून कितना नया साबित होगा?

न्यायपालिका की हालत भी कम चिंताजनक नहीं है।

देश की अदालतों में पांच करोड़ से अधिक मुकदमे लंबित हैं। सुप्रीम कोर्ट में ही नब्बे हजार से ज्यादा मामले प्रतीक्षा में हैं। अनेक हाईकोर्ट  न्यायाधीश_कमी के साथ काम कर रहे हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट में कई बार आधे से अधिक पद खाली रहे हैं।

नतीजा यह है कि एक सामान्य नागरिक को संपत्ति विवाद जैसे मामलों में न्याय पाने के लिए दो दशक तक इंतजार करना पड़ सकता है।

सोचिए।

जिस देश में एक्सप्रेसवे दो साल में बन जाते हैं, वहां न्याय मिलने में बीस साल क्यों लगते हैं?

कमी संसाधनों की नहीं दिखती। कमी प्राथमिकता की दिखती है।

भ्रष्टाचार के मोर्चे पर भी तस्वीर मिली-जुली है।

डिजिटल व्यवस्था ने छोटे स्तर की रिश्वतखोरी में कमी जरूर की है। सरकारी योजनाओं का पैसा सीधे खातों में पहुंचने लगा है। बिचौलियों की भूमिका घटी है।

फिर भी अंतरराष्ट्रीय सूचकांकों में भारत का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं कहा जा सकता। राजनीतिक चंदे की पारदर्शिता पर सवाल बने हुए हैं। मुखबिरों की सुरक्षा कमजोर है। बड़े भ्रष्टाचार मामलों में सजा की दर बेहद कम है।

उधर वीआईपी संस्कृति अब भी जीवित है।

काफिले दौड़ते हैं। सड़कें खाली कराई जाती हैं। प्रभावशाली लोगों के लिए नियम अलग दिखाई देते हैं। आम आदमी और खास आदमी के बीच की खाई अब भी पूरी तरह नहीं पटी।

जाति और लिंग आधारित भेदभाव भी कानून की किताबों से भले हट गए हों, लेकिन व्यवहारिक जीवन में उनकी मौजूदगी महसूस की जा सकती है।

राजनीति में भी तस्वीर बहुत अलग नहीं है। भ्रष्टाचार विरोधी भाषण खूब सुनाई देते हैं, लेकिन चुनावों में धनबल और बाहुबल का प्रभाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।

यहीं सबसे बड़ा खतरा छिपा है।

जब हार्डवेयर तेज़ी से आगे बढ़े और सॉफ्टवेयर पीछे छूट जाए, तो विकास का भ्रम पैदा होता है।

उपग्रह से देखने पर शहर चमक सकते हैं। रात में रोशन एक्सप्रेसवे किसी विदेशी पर्यटक को प्रभावित कर सकते हैं। कांच के टर्मिनल और आधुनिक रेलवे स्टेशन तस्वीरों में शानदार लग सकते हैं।

लेकिन किसी राष्ट्र की असली परीक्षा उसकी सड़कों पर नहीं, उसके थानों और अदालतों में होती है।

एक ऐसा देश जहां नागरिक को निष्पक्ष पुलिस न मिले, समय पर न्याय न मिले और सत्ता को जवाबदेह ठहराने वाली संस्थाएं कमजोर हों, वह केवल दिखने में विकसित हो सकता है, वास्तव में नहीं।

2047 के विकसित भारत का सपना केवल बुलेट ट्रेनों, एयरपोर्टों और एक्सप्रेसवे से पूरा नहीं होगा।

विकसित भारत तब बनेगा जब नागरिक को यह भरोसा होगा कि कानून सबके लिए बराबर है, पुलिस सत्ता की नहीं संविधान की सेवक है, और अदालत में इंसाफ़ उसकी उम्र से लंबा नहीं चलेगा।

सड़कें देश को जोड़ती हैं। लेकिन न्याय, जवाबदेही और समानता ही राष्ट्र को मजबूत बनाते हैं। यही वह बुनियाद है, जिसके बिना विकास की सबसे चमकदार इमारत भी खोखली साबित हो सकती है।

Monday, June 22, 2026

 बीस लाख सपने, सवा लाख सीटें: भारत को और मेडिकल कॉलेज चाहिए या नई परीक्षा व्यवस्था ?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

24 जून 2026

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हर साल भारत के लाखों घरों में एक ही सपना पलता है। बेटा या बेटी डॉक्टर बने। हर साल यह सपना एक कठिन परीक्षा से गुजरता है। और हर साल उम्मीदों का पहाड़ आंकड़ों की दीवार से टकरा जाता है।

इस वर्ष नीट-यूजी परीक्षा में 20 लाख से अधिक विद्यार्थियों ने भाग लिया। दूसरी ओर, देश में एमबीबीएस की कुल सीटें लगभग 1.29 लाख हैं। देशभर के 823 मेडिकल कॉलेजों में 1,29,602 सीटें उपलब्ध हैं। यानी एक सीट के लिए औसतन 16 से अधिक अभ्यर्थियों के बीच मुकाबला है। सरकारी मेडिकल कॉलेजों की सीटों के लिए यह प्रतिस्पर्धा और भी भयावह है।

140 करोड़ की आबादी वाले देश का स्वास्थ्य भविष्य इतनी सीमित सीटों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।

यह सच है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत ने मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। कुछ साल पहले जहां एमबीबीएस सीटों की संख्या करीब 1.09 लाख थी, वह बढ़कर लगभग 1.30 लाख तक पहुंच गई है। नए मेडिकल कॉलेज खुले हैं और कई संस्थानों में सीटें बढ़ाई गई हैं। लेकिन मांग की रफ्तार आपूर्ति से कहीं तेज है।

डॉक्टर बनने का सपना अब केवल महानगरों या संपन्न परिवारों तक सीमित नहीं रहा। छोटे शहरों, कस्बों और गांवों के छात्र दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। कई युवा कोचिंग संस्थानों में वर्षों बिताते हैं। परिवार अपनी जमा-पूंजी खर्च कर देते हैं। फिर भी सरकारी सीटें इतनी कम हैं कि मेहनत और प्रतिभा के बावजूद हजारों योग्य छात्र पीछे छूट जाते हैं।

आलोचकों का मानना है कि राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) ने अनजाने में एक विशाल कोचिंग उद्योग को जन्म दिया है, जो छात्रों की आशंकाओं और सपनों से मुनाफा कमाता है। उनका तर्क है कि यह परीक्षा अब प्रतिभा, संवेदनशीलता और वास्तविक समझ से अधिक महंगी कोचिंग, परीक्षा तकनीकों और रटंत शिक्षा को बढ़ावा देती है। इससे ग्रामीण, गरीब और सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों के लिए अवसर असमान हो जाते हैं। कोचिंग संस्थानों की बढ़ती संख्या, ऊंची फीस और प्रश्नपत्र लीक जैसी घटनाओं ने इस धारणा को मजबूत किया है कि शिक्षा के इर्द-गिर्द एक शक्तिशाली व्यावसायिक तंत्र विकसित हो चुका है। हालांकि, नीट को “माफियाओं की साजिश” कहना एक राय है, स्थापित तथ्य नहीं, क्योंकि इसके समर्थन में संगठित आपराधिक गठजोड़ का कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

जब सफलता केवल योग्यता से नहीं, बल्कि फीस भरने की क्षमता से तय होने लगे, तब व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

देश की कुल एमबीबीएस सीटों में लगभग 63 हजार सीटें सरकारी संस्थानों में हैं। शेष सीटें निजी और डीम्ड विश्वविद्यालयों में हैं, जहां फीस लाखों रुपये सालाना से लेकर पूरे पाठ्यक्रम के लिए करोड़ों रुपये तक पहुंच जाती है।

ऐसे में गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए डॉक्टर बनने का सपना अक्सर अधूरा रह जाता है।

यह केवल छात्रों की समस्या नहीं है। यह देश के सार्वजनिक स्वास्थ्य का सवाल है।

आज भी भारत के अनेक ग्रामीण और दूरदराज़ इलाकों में डॉक्टरों की भारी कमी है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र विशेषज्ञों के बिना चल रहे हैं। सरकारी अस्पतालों पर मरीजों का बोझ बढ़ता जा रहा है। डॉक्टर और मरीज के अनुपात में सुधार की जरूरत लगातार महसूस की जा रही है।

मेडिकल शिक्षा का विस्तार केवल शैक्षणिक मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आवश्यकता है।

समाधान मानकों को कम करना नहीं, अवसरों को बढ़ाना है। साल में दो बार अगर नीट परीक्षा अगर आयोजित हो जाए, तो कोई आफत नहीं आ जाएगी।

हर जिले में एक सुसज्जित मेडिकल कॉलेज और उससे जुड़ा शिक्षण अस्पताल होना चाहिए। जिला अस्पतालों को चरणबद्ध तरीके से मेडिकल कॉलेजों में बदला जाए। शिक्षकों की कमी दूर करने के लिए बेहतर वेतन, पारदर्शी भर्ती और आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।

सड़कें, हवाई अड्डे और औद्योगिक गलियारे जितने महत्वपूर्ण हैं, उतना ही महत्वपूर्ण स्वास्थ्य ढांचा भी है। डॉक्टर किसी देश की सबसे बड़ी पूंजी होते हैं।

उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश और पूर्वोत्तर राज्यों जैसे अधिक आबादी वाले क्षेत्रों में नए मेडिकल कॉलेज खोलने की विशेष जरूरत है।

साथ ही, निजी मेडिकल शिक्षा की फीस पर प्रभावी नियंत्रण और पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए। किसी भी प्रतिभाशाली छात्र का सपना केवल आर्थिक मजबूरी के कारण नहीं टूटना चाहिए।

नीट में शामिल होने वाले 20 लाख से अधिक छात्र केवल आंकड़े नहीं हैं। वे देश की ऊर्जा हैं, उसकी आकांक्षाएं हैं और भविष्य की स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ हैं।

डॉक्टर बनने का अवसर कुछ लोगों का विशेषाधिकार नहीं, हर योग्य छात्र का अधिकार होना चाहिए।

Sunday, June 21, 2026

 सियासत के कीचड़ में बेटियाँ क्यों?

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राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के नाम पर परिवारों, खासकर बेटियों को निशाना बनाना लोकतंत्र नहीं, सामाजिक पतन का संकेत है।

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बेटी तो बेटी होती है

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बृज खंडेलवाल द्वारा

23 जून 2026

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सूरज ढल चुका था, लेकिन लखनऊ की एक पुरानी हवेली में रोशनी अभी भी जल रही थी। अखबारों के बिखरे पन्नों और टीवी चैनलों के शोर के बीच 22 वर्षीय प्रिया अपनी किताबों में डूबी थी। तभी फोन की घंटी बजी। दोस्त का संदेश था, “प्रिया, तुम ठीक हो? सोशल मीडिया पर क्या चल रहा है?”

स्क्रीन खुलते ही उसकी दुनिया बदल गई।

कहीं चोरी की अफवाह, कहीं गुमशुदगी की मनगढ़ंत कहानी, कहीं फोटोशॉप की गई तस्वीरें। एक ट्रोल ने लिखा, “नेता की बेटी का असली चेहरा सामने आ गया।” देखते ही देखते लाइक्स, कमेंट्स और शेयरों की बाढ़ आ गई। कुछ लोग इसे मजाक समझ रहे थे, कुछ इसे राजनीतिक हथियार बना रहे थे।

घर में सन्नाटा था। माँ की आँखों में आँसू थे। पिता की खामोशी में गुस्सा और बेबसी।

राजनीति हमेशा ऐसी नहीं थी। मतभेद होते थे, तीखी बहसें भी होती थीं, लेकिन परिवारों को निशाना बनाने की परंपरा नहीं थी। विरोधियों पर वैचारिक हमले होते थे, निजी जीवन पर नहीं। आज बहस का मंच कीचड़ उछालने का अखाड़ा बनता जा रहा है। मुद्दे गायब हैं, मर्यादा लापता है।

देश के अलग-अलग हिस्सों से ऐसी घटनाएँ लगातार सामने आ रही हैं। कभी किसी नेता की बेटी को फर्जी वीडियो से बदनाम किया जाता है, कभी किसी की पत्नी या माँ को अभद्र टिप्पणियों का शिकार बनाया जाता है। चुनावी रैलियों से लेकर सोशल मीडिया तक, राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता अब निजी हमलों में बदलती जा रही है।

तमिलनाडु, महाराष्ट्र, बिहार, राजस्थान या उत्तर प्रदेश, कोई प्रदेश इससे अछूता नहीं है। सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और खतरनाक बना दिया है। एक झूठी पोस्ट मिनटों में लाखों लोगों तक पहुँच जाती है। किसी को सनसनी चाहिए, किसी को लाइक्स चाहिए, तो किसी को अपने विरोधी को नीचा दिखाने का अवसर।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हाल में कहा, “बेटी तो बेटी होती है।” यह केवल एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि हमारी साझा संस्कृति और तहजीब की याद दिलाने वाला संदेश है। बेटियों का सम्मान किसी दल, धर्म, जाति या विचारधारा का विषय नहीं हो सकता।

इस मामले में पुलिस ने त्वरित कार्रवाई की। विभिन्न राजनीतिक दलों ने भी एक स्वर में इसकी निंदा की। यह स्वागतयोग्य है, लेकिन समस्या केवल एक घटना तक सीमित नहीं है। जब तक राजनीतिक दल अपने समर्थकों को संयम और जवाबदेही का पाठ नहीं पढ़ाएँगे, तब तक ऐसी घटनाएँ रुकने वाली नहीं हैं।

जरा उस लड़की की कल्पना कीजिए, जिसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं। वह स्कूल जाती है, सपने देखती है, दोस्तों के साथ हँसती है। अचानक पिता की राजनीतिक पहचान उसकी अपनी पहचान पर भारी पड़ जाती है। उसकी तस्वीरें वायरल होने लगती हैं। संदर्भ बदल दिए जाते हैं। स्कूल में सवाल उठते हैं, मोहल्ले में कानाफूसी शुरू हो जाती है। परिवार की नींद उड़ जाती है।

लोकतंत्र में असहमति जरूरी है। सरकार की आलोचना होनी चाहिए, विपक्ष से सवाल पूछे जाने चाहिए। लेकिन जब बहस परिवारों तक पहुँच जाती है, तब असली मुद्दे दम तोड़ देते हैं। बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, महँगाई और किसानों की समस्याएँ पीछे छूट जाती हैं। चर्चा अफवाहों और अपमान तक सिमट जाती है।

हमें ठहरकर सोचना होगा।

हर सनसनीखेज पोस्ट को साझा करने से पहले उसकी सच्चाई परखें। राजनीतिक कार्यकर्ता हों, इन्फ्लुएंसर हों या आम नागरिक, सभी को संयम दिखाना होगा। झूठ फैलाने वाला दोषी है, लेकिन बिना जाँच उसे आगे बढ़ाने वाला भी उतना ही जिम्मेदार है।

सत्ता बदलती रहती है। नेता आते-जाते रहते हैं। लेकिन समाज की शालीनता एक बार टूट जाए, तो उसे जोड़ने में पीढ़ियाँ लग जाती हैं।

बेटी तो बेटी होती है। यह कोई नारा नहीं, हमारी सामूहिक चेतना का हिस्सा होना चाहिए। क्योंकि जब सियासत बेटियों को निशाना बनाती है, तब हार किसी एक दल की नहीं होती, पूरे समाज की होती है। और इस हार की भरपाई कोई चुनावी जीत नहीं कर सकती।

Saturday, June 20, 2026

 सुप्रीम कोर्ट ने पैदल चलने को मौलिक अधिकार बनाया, अब परीक्षा आगरा की है

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बृज खंडेलवाल द्वारा

21 जून 2026

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आगरा में सुबह की सैर अब सैर नहीं, संघर्ष बन गई है। स्कूल जाते बच्चे तेज़ बाइकों से बचते हुए सड़क पार करते हैं, बुज़ुर्ग फुटपाथ न होने पर जान जोखिम में डालकर चलते हैं, और ताज देखने आए पर्यटक पार्क की गाड़ियों, आवारा पशुओं, ठेलों और खुले नालों के बीच रास्ता तलाशते हैं। प्रेम के इस शहर में पैदल चलना आज एक साहसिक एडवेंचर,  काम बन गया है।

यह तस्वीर अब बदल सकती है। 19 जून 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा कि सुरक्षित, सुस्पष्ट और सुव्यवस्थित फुटपाथ पर चलना नागरिकों का मौलिक अधिकार है ,  संविधान के अनुच्छेद 19(1)(डी) और 21 के तहत। न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और ए.एस. चंदूरकर की पीठ ने स्पष्ट किया कि सड़क पर पहला हक मोटर वाहनों का नहीं, पैदल यात्री का है। पीठ ने दिव्यांगजनों के लिए सुगम सुविधाओं और एक अलग राष्ट्रीय पैदल-सुरक्षा कानून की सिफारिश की, और कहा कि उल्लंघन की स्थिति में नागरिक मोटर वाहन अधिनियम से स्वतंत्र मुआवज़े और कानूनी राहत के हकदार होंगे।

यह फैसला अचानक नहीं आया। ठीक एक साल पहले, मई 2025 में, न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ केंद्र को फुटपाथ-दिशा-निर्देश और एक राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा बोर्ड बनाने का आदेश दे चुकी थी। मौजूदा फैसला उसी सिलसिले की अगली कड़ी है : अदालत ने मामले को अनुच्छेद 32 की याचिका के रूप में फिर दर्ज किया, केंद्र को पक्ष बनाया, और 1985 के ओल्गा टेलिस बनाम बॉम्बे म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन फैसले का हवाला देकर कहा कि फुटपाथ तक सुरक्षित पहुँच गरिमा से जीने के अधिकार का हिस्सा है।

आगरा के लिए यह चेतावनी है

यह शहर दशकों से वाहनों के हिसाब से बढ़ा, इंसानों के हिसाब से नहीं। सड़कें चौड़ी हुईं, फ्लाईओवर बने, पार्किंग बढ़ी ;  पर फुटपाथ या तो बने ही नहीं, या अतिक्रमण की भेंट चढ़ गए। एम.जी. रोड, फतेहाबाद रोड, सिकंदरा, शाहगंज और यमुना किनारा मार्ग पर एक ही कहानी दिखती है: दुकानों ने फुटपाथ निगल लिए हैं, वाहन उन पर खड़े हैं, बिजली के खंभे और टूटे स्लैब राह रोकते हैं, खुले मैनहोल जान जोखिम में डालते हैं। इसकी सबसे बड़ी कीमत वही चुकाते हैं जिनके पास निजी वाहन नहीं ;  बच्चे, महिलाएँ, बुज़ुर्ग, दिव्यांगजन।

विरोधाभास भी चुभता है: हर साल लाखों पर्यटक ताज देखने आते हैं, पर शहर की सड़कों पर वे खुद को असुरक्षित पाते हैं। यह सिर्फ सुविधा का मामला नहीं । इसका असर सड़क सुरक्षा, जनस्वास्थ्य और पर्यावरण पर भी पड़ता है, क्योंकि पैदल चलना हतोत्साहित होने पर ट्रैफिक और प्रदूषण बढ़ते हैं।

मांगें जो अब संवैधानिक ताकत पा गई हैं

शहर के नागरिक अधिकार कार्यकर्ता वर्षों से इस संकट को उठाते रहे हैं ;  लेखों, अभियानों और रिपोर्टों के ज़रिए फुटपाथों की कमी, तेज़ रफ्तार वाहनों, आवारा पशुओं और अव्यवस्थित यातायात के खतरे सामने लाते रहे हैं। उनकी मांग रही है: यमुना किनारा मार्ग समेत हर इलाके से अतिक्रमण हटाया जाए, भारतीय सड़क कांग्रेस के मानकों के अनुरूप फुटपाथ और साइकिल ट्रैक बनें, और अवैध पार्किंग पर सख्ती हो। सुप्रीम कोर्ट का फैसला अब इन्हीं मांगों को कानूनी आधार देता है।

अब परीक्षा प्रशासन की है

देश की सर्वोच्च अदालत का संदेश साफ है: सड़कें सिर्फ गाड़ियों के लिए नहीं हैं, उन पर पहला हक पैदल चलने वालों का है। अब आगरा विकास प्राधिकरण, नगर निगम, लोक निर्माण विभाग और ट्रैफिक पुलिस की बारी है ,  हर नई सड़क परियोजना में सुरक्षित फुटपाथ, सुगम क्रॉसिंग, साइकिल ट्रैक और दिव्यांगजन-अनुकूल सुविधाएँ अनिवार्य करनी होंगी, पुराने मार्गों का पुनर्विकास करना होगा, और अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई लगातार चलानी होगी।

जो शहर अपने पैदल यात्रियों की रक्षा नहीं कर सकता, वह खुद को स्मार्ट या विश्वस्तरीय नहीं कह सकता। आगरा ने दशकों मशीनों के लिए सड़कें बनाई हैं। अब समय इंसानों के लिए रास्ते बनाने का है ,  क्योंकि हर नागरिक और हर पर्यटक को बिना डर के चलने का अधिकार है।

असली सवाल यह है कि यह अदालती आदेश कागज़ों तक सीमित तो नहीं रह जाएगा। जवाबदेही अब केवल नैतिक नहीं, क़ानूनी भी है। आगरा के नागरिक संगठनों, मीडिया और स्थानीय निकायों को इस मौके का इस्तेमाल प्राधिकरणों से स्पष्ट समय-सीमा और जवाबदेही माँगने के लिए करना चाहिए, ताकि यह ऐतिहासिक फैसला सिर्फ एक और रिपोर्ट बनकर फाइलों में दफ़न न हो जाए।

Thursday, June 18, 2026

 युद्ध तो खत्म, लेकिन पर्यावरण और मानसूनी बारिश गड़बड़ाने का हिसाब कौन चुकाएगा?

जब बम बरसते हैं, तब जलवायु लहूलुहान होती है: युद्ध को पर्यावरण पर हमला माना जाए

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

20 जून 2026

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उनके लिए युद्ध एक खेल था। वो आए, धमाकेदार आतिशबाजी की, बम, मिसाइल, ड्रोन खूब चले, हजारों मरे, रिहाइशें तबाह हुईं, हवा जहरीली हुई, तापमान बढ़ा, समुद्र खौला, जंगल नष्ट हुए। वो तो गए। मानसून की चाल बिगड़ गई। अब भुगतो।

मानसून भारत की धड़कन है। यही हमारे खेतों को सींचता है, नदियों को भरता है, भूजल को पुनर्जीवित करता है और करोड़ों लोगों की रोज़ी-रोटी का आधार बनता है। लेकिन अब यह धड़कन कुछ बेताल-सी लगने लगी है।

मार्च 2026 में उत्तर भारत ने सामान्य से अधिक पश्चिमी विक्षोभ झेले। आमतौर पर मार्च में पाँच से छह पश्चिमी विक्षोभ आते हैं, लेकिन इस बार उनकी संख्या लगभग आठ रही। बेमौसम बारिश हुई। ओलों ने फसलों को पीटा। तापमान ऊपर-नीचे होता रहा। गर्मी की दस्तक बार-बार टलती रही।

अप्रैल, मई और जून के शुरुआती दिनों में भी यह सिलसिला जारी रहा।

मौसम वैज्ञानिक सावधानी बरतते हुए कहते हैं कि किसी एक मौसमीय घटना को सीधे जलवायु परिवर्तन से जोड़ना उचित नहीं होगा। लेकिन वे इस बात पर सहमत हैं कि मानव गतिविधियाँ वायुमंडल के संतुलन को बदल रही हैं। सदियों से चले आ रहे मौसम चक्र अस्थिर हो रहे हैं। चरम मौसमी घटनाएँ बढ़ रही हैं।

सवाल सीधा है। प्रकृति आखिर कितना बोझ और झेले?

दशकों से पर्यावरणविद् जीवाश्म ईंधन, वनों की कटाई और औद्योगिक प्रदूषण के खतरों की चेतावनी देते रहे हैं। लेकिन एक बड़ा प्रदूषक अक्सर हमारी नज़रों से ओझल रहता है: युद्ध।

हर मिसाइल, हर लड़ाकू विमान, हर टैंक और हर ध्वस्त शहर अपने पीछे एक विशाल कार्बन पदचिह्न छोड़ता है। सैन्य अभियान बेहिसाब ईंधन निगलते हैं। विस्फोट जहरीले रसायन छोड़ते हैं। जलती इमारतें और तबाह होता बुनियादी ढाँचा वातावरण में कालिख और ग्रीनहाउस गैसें छोड़ता है। पुनर्निर्माण के लिए सीमेंट, इस्पात और ऊर्जा की भारी खपत होती है।

युद्ध सिर्फ इंसानों को नहीं मारता। वह नदियों को ज़हरीला करता है, जंगलों को उजाड़ता है, मिट्टी को दूषित करता है और जलवायु को अस्थिर बनाता है।

संघर्षों की पर्यावरणीय कीमत सीमाओं में कैद नहीं रहती। धुएँ को पासपोर्ट की ज़रूरत नहीं होती। कार्बन उत्सर्जन वीज़ा लेकर नहीं चलता। प्रदूषण हवाओं के साथ महाद्वीपों को पार कर जाता है।

यह कहना वैज्ञानिक रूप से गलत होगा कि किसी एक युद्ध या सैन्य कार्रवाई ने सीधे भारत के मानसून को प्रभावित किया है। ऐसा कोई ठोस प्रमाण अभी उपलब्ध नहीं है। लेकिन यह भी उतना ही गैर-जिम्मेदाराना होगा कि हम युद्धों के जलवायु पर पड़ने वाले संचयी प्रभावों को नज़रअंदाज़ कर दें।

जलवायु परिवर्तन किसी एक देश, एक सेना या एक युद्ध का नतीजा नहीं है। यह मानव गतिविधियों के लंबे सिलसिले का परिणाम है, जिसमें युद्ध की मशीनरी भी शामिल है।

हैरानी की बात यह है कि सैन्य उत्सर्जन आज भी वैश्विक जलवायु विमर्श के सबसे कम चर्चित मुद्दों में से एक है।

जब उद्योगों को अपने कार्बन उत्सर्जन का हिसाब देना पड़ता है, तो युद्धों की पर्यावरणीय लागत का पूरा ब्योरा क्यों नहीं लिया जाता? जलवायु सम्मेलन कार्बन बजट की बात करते हैं, लेकिन युद्ध बिना किसी जवाबदेही के उसे राख में क्यों बदल देते हैं?

दुनिया को अब एक नए सिद्धांत की ज़रूरत है: युद्धकालीन पर्यावरणीय जवाबदेही।

सैन्य उत्सर्जन का आकलन हो। उनका स्वतंत्र सत्यापन हो। युद्धों में नष्ट होने वाले पारिस्थितिक तंत्रों को मानवता की साझा धरोहर माना जाए। संघर्षों से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान को जलवायु न्याय के वैश्विक एजेंडे में शामिल किया जाए।

शांति केवल राजनीतिक आवश्यकता नहीं है, यह पारिस्थितिक अनिवार्यता भी है।

भारतीय मानसून समुद्र, पर्वत, हवाओं और तापमान के नाज़ुक संतुलन पर टिका है। बढ़ते पश्चिमी विक्षोभ, गर्म होते महासागर और बदलती जेट स्ट्रीम हमें चेतावनी दे रहे हैं कि यह संतुलन बेहद नाज़ुक है।

जब हम एक-दूसरे के खिलाफ युद्ध छेड़ते हैं, तब हम धरती के खिलाफ भी युद्ध छेड़ते हैं।

और वायुमंडल हर वार का हिसाब रखता है।

अगर हमें अपने मानसून, अपने किसानों और अपने भविष्य को बचाना है, तो हमें सुरक्षा की परिभाषा बदलनी होगी। राष्ट्रीय सुरक्षा को पर्यावरणीय सुरक्षा से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

युद्धग्रस्त दुनिया स्थिर जलवायु नहीं बना सकती।

इक्कीसवीं सदी का अगला बड़ा शांति आंदोलन, एक हरित आंदोलन भी होना चाहिए।

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Wednesday, June 17, 2026

 बंगाल का भूचाल और बदलते भारतीय राजनीतिक नक्शे

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बृज खंडेलवाल  द्वारा 

19 जून 2026

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पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव 2026 का नतीजा केवल एक राज्य में सत्ता के बदलने का संकेत नहीं है; यह भारतीय राजनीति की जलवायु में आ रहे व्यापक बदलावों की पहली प्रभावी आहट भी है। जो क्षेत्रीय किले तकरीबन अपराजेय माने जाते थे, वहां दरारें उभर आई हैं और पुरानी बिसात उलटने लगी है। 

भाजपा की प्रचंड उपस्थिति और तृणमूल कांग्रेस की अप्रत्याशित कुर्सी‑घटती स्थिति केवल सीटों का गणित नहीं बता रही; यह बताती है कि भारतीय राजनीति के खेल के नियम बदल रहे हैं। भाजपा ने लगभग 207 सीटें पाकर बंगाल में नया अध्याय लिखा, जबकि ममता बनर्जी की पार्टी करीब 80 सीटों पर सिमट गई; यह बदलाव सिर्फ़ आंकड़ों का मुआयना नहीं, उन परिस्थितियों का परिणाम है जिनमें करिश्माई नेतृत्व, संगठन का थकना और सत्ता‑विरोधी लहरों का संगम दिखता है। 

लंबे समय तक ममता बनर्जी का व्यक्तित्व और उनकी जमीन‑से‑सभा तक की लडाई उन्हें बंगाल की राजनीति में मजबूती देता रहा, पर अब भ्रष्टाचार के आरोप, संगठनात्मक थकावट और विशेषकर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा शहरी मतदाताओं के बीच भाजपा की बढ़ती पैठ ने तृणमूल की नींव हिला दी है। नतीजों के बाद भीतर से उठ रही बगावत की फुसफुसाहटें, नेताओं की नाराज़गी और पाला बदलने की अटकलें संकेत देती हैं कि दीवारों में पहले ही दरारें आ चुकी थीं।

यह बदलाव केवल बंगाल तक सीमित नहीं दिखता। देश भर में क्षेत्रीय दल आज अस्तित्व और प्रासंगिकता की चुनौती से जूझ रहे हैं। महाराष्ट्र की शिवसेना, दिल्ली‑पंजाब की आम आदमी पार्टी या तमिलनाडु की एआईएडीएमके; हर जगह राजनीतिक समीकरण दबाव में हैं। कई बार विचारधारा मंचों पर सुंदर दिखती है, पर सियासत की बिसात पर अंकगणित और हित सिद्धांतों पर भारी पड़ते हैं; इसीलिए आज सत्ता के गलियारों में दल‑बदल, गठबंधन और नए समीकरणों की फुसफुसाहटें तेज़ हैं। कल तक जो नेता एक‑दूसरे पर तीखे हमले करते थे, वे अब साथ आने की संभावनाएँ तलाश रहे हैं, क्योंकि राजनीति में न कोई स्थायी दोस्त होता है, न स्थायी दुश्मन; स्थायी रहता है सत्ता और हित का समीकरण। इसी उथल‑पुथल के बीच विपक्षी एकता की परतें भी उधड़ती दिख रही हैं; बाहरी चुनौतियाँ जितनी महत्वपूर्ण हैं, उससे कहीं अधिक भीतर की असहमति और क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएँ उन गठजोड़ों को कमजोर कर रही हैं जिनका लक्ष्य भाजपा को चुनौती देना है।

राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में भाजपा अपनी चुनावी बढ़त को दीर्घकालिक राजनीतिक ताकत में बदलने की रणनीति पर काम कर रही है। 2024 के लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनने के बाद पूर्ण बहुमत न मिलने ने उसे और सक्रिय कर दिया है; परमुख मुद्दों में परिसीमन जैसे संवेदनशील विषय पर वह व्यापक समर्थन जुटाने की कोशिश कर रही है। 

संसदीय क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण का प्रस्ताव विशेषकर दक्षिणी राज्यों में चिंता का कारण बना हुआ है; उन राज्यों का तर्क है कि जनसंख्या नियंत्रण में सफलता के अनुपात में प्रतिनिधित्व घटाना उन्हें दंडित करने जैसा होगा। भाजपा इसे प्रतिनिधित्व और शासन की प्रभावशीलता बढ़ाने वाला कदम बताती है, जबकि आलोचक इसे संघीय ढाँचे पर असंतुलन पैदा करने का प्रयास मानते हैं। आने वाले वर्षों में यह बहस भारतीय राजनीति का एक बड़ा और स्थायी मुद्दा बन सकती है।

राज्य‑स्तरीय परिदृश्य भी उस बदलते नक्शे की तरह अनिश्चित है। बिहार में नीतीश कुमार के लंबे राजनीतिक दौर के बाद नए समीकरण आकार ले रहे हैं; सहयोगी बेचैन हैं और दावेदार सक्रिय। तमिलनाडु में अभिनेता से नेता बने विजय की एंट्री पारंपरिक द्रविड़ राजनीति को चुनौती देती नजर आ रही है और नई ताकतें मैदान बदल रही हैं। पुरानी बिसात उलट रही है, नए खिलाड़ी उतर रहे हैं और राजनीति के पुरानी पैटर्न अब उतने स्थायी नहीं रह गए हैं। कांग्रेस भी तमाम उतार‑चढ़ाव के बावजूद नए समीकरण तलाश रही है, और कभी कट्टर विरोधी रहे दलों के बीच संवाद की संभावनाएँ उभर रही हैं। समाजवादी पार्टी में भी उथल पुथल चालू है। बसपा सुप्रीमो मायावती भी नींद से जाग उठीं हैं, उधर उवैसी साहब मैदान में उतर चुके हैं।

अंततः इसका निर्णायक पहलू मतदाता का व्यवहार है।  क्षेत्रीय दल समाप्त नहीं हो रहे, पर अब सिर्फ़ करिश्माई नेतृत्व, जातीय समीकरण या पहचान‑राजनीति पर निर्भर रहकर लगातार सफलता पाना आसान नहीं रहा। संगठन, प्रदर्शन और जनता के साथ सतत संवाद पहले से कहीं अधिक अहम हो गया है। 

बंगाल का जनादेश इसलिए सिर्फ़ एक राज्य का फैसला नहीं है, बल्कि पूरे देश की राजनीति के लिए एक स्पष्ट संदेश है: इस नए दौर में वही टिकेगा जो समय के साथ खुद को बदल सकेगा; अकड़ नहीं, लचीलापन काम आएगा, क्योंकि राजनीति में हवा का रुख़ बदलते देर नहीं लगती।

Tuesday, June 16, 2026

 क्या 1947 का विभाजन एक सही निर्णय था? 

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एक दर्दनाक फैसले ने भारत की सभ्यतागत धारा को बचाए रखा

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बृज खंडेलवाल द्वारा

17 जून 2026

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1947 का विभाजन भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा ज़ख्म है। लाखों लोग बेघर हुए। अनगिनत परिवार बिछड़ गए। नफ़रत की आग में पूरा उपमहाद्वीप झुलस गया। आज भी उस दौर की कहानियाँ सुनकर रूह काँप उठती है।

लेकिन इतिहास केवल आँसुओं से नहीं लिखा जाता। कभी-कभी मुल्कों को दिल नहीं, दिमाग से फैसले लेने पड़ते हैं। कई बार हालात ऐसे बन जाते हैं कि चुनना अच्छे और बुरे के बीच नहीं, बल्कि बुरे और उससे भी बुरे के बीच पड़ता है।

1947 का विभाजन ऐसा ही फैसला था।

आज, लगभग अस्सी साल बाद, यह सवाल फिर उठता है कि अगर भारत अखंड रहता, तो क्या वह एक स्थिर और मजबूत राष्ट्र बन पाता? क्या वह अपनी सांस्कृतिक पहचान और सभ्यतागत विरासत को सुरक्षित रख पाता? या फिर वह लगातार सांप्रदायिक टकराव, राजनीतिक खींचतान और संवैधानिक गतिरोध में उलझा रहता?

सच यह है कि विभाजन किसी जश्न का नतीजा नहीं था। यह राजनीतिक हक़ीक़त को स्वीकार करने का फैसला था।

जून 1947 में कांग्रेस ने माउंटबेटन योजना को मंजूरी दी। तब तक हालात हाथ से निकल चुके थे। मुस्लिम लीग अलग देश की मांग पर अड़ी थी। उसने बार-बार साफ कर दिया था कि हिंदू और मुसलमान दो अलग राजनीतिक क़ौमें हैं।

साझा सत्ता, संघीय ढाँचे और समझौते के कई प्रस्ताव सामने आए, लेकिन बात नहीं बनी। 1946 के "डायरेक्ट एक्शन डे" के बाद भड़की हिंसा ने साफ संकेत दे दिया कि सत्ता का हस्तांतरण शांतिपूर्ण नहीं होगा।

बंगाल से पंजाब तक दंगे फैल गए। खून-खराबा बढ़ता गया। कांग्रेस नेतृत्व के सामने सवाल था—क्या देश को गृहयुद्ध की आग में झोंक दिया जाए या एक कड़वा फैसला लेकर आगे बढ़ा जाए?

कहावत है, "नासूर बन चुके घाव का इलाज कभी-कभी सर्जरी ही होती है।"

विभाजन उसी सर्जरी जैसा था।

1941 की जनगणना के मुताबिक, ब्रिटिश भारत की लगभग एक-चौथाई आबादी मुस्लिम थी और कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में उनका बहुमत था। ऐसे में अखंड भारत में सत्ता साझेदारी, प्रांतीय अधिकार और धार्मिक पहचान के मुद्दे लगातार टकराव का कारण बन सकते थे।

यह कहना मुश्किल है कि ऐसा भारत कितना स्थिर रहता। लेकिन आज़ादी से पहले के हालात देखकर इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि साझा शासन की राह दिन-ब-दिन कठिन होती जा रही थी।

विभाजन के बाद भारत एक स्पष्ट बहुसंख्यक जनसंख्या और मजबूत राजनीतिक केंद्र के साथ उभरा। नए गणराज्य ने धर्मनिरपेक्ष संविधान अपनाया, लेकिन उसकी सांस्कृतिक जड़ें हजारों साल पुरानी भारतीय परंपराओं में गहराई से जुड़ी रहीं।

आलोचक कह सकते हैं कि यह केवल एक अनुमान है, लेकिन यह भी सच है कि अखंड भारत में पहचान आधारित राजनीति और ज़्यादा तीखी हो सकती थी। संवैधानिक सौदेबाज़ी, क्षेत्रीय असंतोष और अलगाववादी दबाव लोकतंत्र को लगातार अस्थिर कर सकते थे।

दूसरे शब्दों में कहें तो विभाजन ने एक बड़ा संघर्ष पैदा किया, लेकिन शायद कई और बड़े संघर्षों को टाल भी दिया।

पाकिस्तान और बाद में बांग्लादेश में हिंदू और सिख आबादी में आई तेज़ गिरावट भी इस बहस को नया आयाम देती है। कई इतिहासकार मानते हैं कि किसी भी सभ्यता की निरंतरता के लिए जनसांख्यिकीय संतुलन अहम भूमिका निभाता है।

उधर भारत ने अपनी विविधता को बनाए रखते हुए लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत किया। यही स्थिरता आगे चलकर हरित क्रांति, आर्थिक उदारीकरण, तकनीकी प्रगति और मजबूत लोकतंत्र की नींव बनी।

यह भी एक विचारधारा का पक्ष है कि आज जिस तरह हिंदू सांस्कृतिक पुनर्जागरण और सांस्कृतिक आत्मविश्वास की चर्चा होती है, उसका स्वरूप अखंड भारत में अलग हो सकता था।

इतना जरूर कहा जा सकता है कि विभाजन कोई जीत नहीं था। वह एक सुरक्षा कवच था। उसने उस राजनीतिक हक़ीक़त को स्वीकार किया, जिसे लंबे समय तक नज़रअंदाज़ करना मुमकिन नहीं रह गया था।

जो लोग भारत को हिंदू सभ्यता की ऐतिहासिक मातृभूमि मानते हैं, उनके लिए विभाजन ने यह सुनिश्चित किया कि बहुसंख्यक समाज को अपनी सांस्कृतिक पहचान बचाने के लिए निरंतर राजनीतिक संघर्ष न करना पड़े।

विभाजन के घाव आज भी हरे हैं। उसकी पीड़ा कभी भुलाई नहीं जा सकती।

लेकिन इतिहास का एक कठोर सच यह भी हो सकता है कि उस दौर में उपलब्ध विकल्पों में विभाजन सबसे कम विनाशकारी फैसला था।

कभी-कभी मुल्कों को ज़िंदा रहने के लिए अपने दिल पर पत्थर रखना पड़ता है।