Saturday, March 21, 2026

 क्यों नारे, स्लोगन्स बनते हैं जन आंदोलन के हथियार? 

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क्या शब्द भी आग बन सकते हैं? एक नारा… और भीड़ बन जाए तूफान!

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

24 मार्च 2026

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फुल पेज एडवरटाइजमेंट याद नहीं रहता, सिर्फ पंच लाइन ही जेहन में रह जाती है, जैसे:  ये दिल मांगे मोर, क्या जूते भी सांस लेते हैं, डर के आगे जीत है, ठंडा मतलब कोक।

क्या तीन शब्द सचमुच इतिहास बदल सकते हैं? क्या एक छोटी-सी पंक्ति लाखों लोगों को एक साथ खड़ा कर सकती है? क्या आवाज़, जब नारा बनती है, तो सत्ता के सिंहासन तक डोल जाते हैं? जवाब साफ है : हाँ। स्लोगन या नारा केवल शब्द नहीं होता, वह चेतना का विस्फोट होता है।

नारा लेखन की कला, दरअसल, संक्षेप में विस्तार भरने की कला है। कम शब्द, बड़ा असर। जो बात लंबा भाषण नहीं कह पाता, वह एक नारा कह देता है। सफल जननेता और जनसंचारक इस राज को समझते हैं। वे जानते हैं कि भीड़ किताबें नहीं पढ़ती, नारे दोहराती है। छोटा, सटीक, लयबद्ध, और भीतर से उबाल मारता हुआ, यही है असरदार नारे की पहचान।

महात्मा गांधी का “करो या मरो”, तीन शब्द, लेकिन पूरे देश को जगा देने वाला आह्वान। सुभाष चंद्र बोस का “जय हिंद”, एक सलाम, जो राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक बन गया। “इंकलाब जिंदाबाद”: क्रांति की गूंज, जिसने युवाओं के खून में आग भर दी। बाल गंगाधर तिलक का “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है”, एक अधिकार की पुकार, जिसने गुलामी के ताले तोड़ने की हिम्मत दी। डॉ राम मनोहर लोहिया के जाति तोड़ो, अंग्रेजी हटाओ, हिमालय बचाओ, दाम बांधो, सामाजिक और सांस्कृतिक जंजीरों को चुनौती देते  नारे हैं।

यही नारे की असली ताकत है। वह विचार को सरल बनाता है। दर्शन को जनभाषा में ढाल देता है। किताबों की जटिलता को सड़क की सादगी में बदल देता है।

आजादी के बाद भी नारे समाज को दिशा देते रहे। “हम दो, हमारे दो”, सिर्फ एक सरकारी संदेश नहीं, बल्कि एक सामाजिक बदलाव की शुरुआत। दीवारों पर लिखे गए नारे, गांव-गांव, शहर-शहर फैलते गए। वे पोस्टरों से उतरकर लोगों की सोच में बस गए। दीवारें किताब बनीं, और राहगीर पाठक।

दुनिया के इतिहास में भी नारे ने कई बार निर्णायक भूमिका निभाई है। Martin Luther King Jr. का “I Have a Dream”, एक सपना, जिसने नस्लीय भेदभाव के खिलाफ पूरी दुनिया को झकझोर दिया। “Make Love, Not War”, युद्ध के खिलाफ शांति का गीत बना। “Black Lives Matter”, तीन शब्द, लेकिन सदियों के अन्याय को उजागर कर देने वाली पुकार।

“We Shall Overcome”, आशा का स्वर, जिसने संघर्षरत लोगों को हिम्मत दी। French Revolution का “Liberty, Equality, Fraternity”, आज भी लोकतंत्र की आत्मा बना हुआ है।

आधुनिक समय में भी नारे उतने ही प्रासंगिक हैं। “We Are the 99%” ने आर्थिक असमानता को स्पष्ट रूप से सामने रखा। “No Justice, No Peace”, अन्याय के खिलाफ चेतावनी। “There Is No Planet B”, पर्यावरण संकट का सटीक और तीखा संदेश। “Silence = Death”, चुप्पी के खतरे को उजागर करता हुआ नारा।

तो आखिर एक नारा प्रभावशाली कैसे बनता है?

पहला, सरलता। नारा तुरंत समझ में आना चाहिए।

दूसरा, लय और तुक। जो कानों में गूंजे और याद रह जाए।

तीसरा, भावनात्मक जुड़ाव। दिल को छुए बिना दिमाग पर असर नहीं होता।

चौथा, सार्वभौमिकता। हर व्यक्ति को लगे कि यह उसकी बात है।

और सबसे महत्वपूर्ण, समय, टाइमिंग।  सही नारा वही है जो सही समय पर जन्म ले।

आज के डिजिटल युग में, जब सूचनाओं की बाढ़ है, नारे की ताकत और बढ़ गई है। सोशल मीडिया पर एक लाइन ट्रेंड बन जाती है, आंदोलन खड़ा कर देती है। हैशटैग भी आधुनिक नारे ही हैं, छोटे, तेज, और वायरल होने वाले।

लेकिन इस शक्ति के साथ खतरा भी जुड़ा है। नारा सच्चाई को सरल बना सकता है, लेकिन उसे तोड़-मरोड़ भी सकता है। वह प्रेरित कर सकता है, लेकिन भटका भी सकता है। इसलिए नारा लेखन केवल कला नहीं, एक जिम्मेदारी है। शब्दों में आग हो, पर वह सच की आग हो, भ्रम की नहीं।

अंततः, नारे की असली ताकत उसकी जनता में बसने की क्षमता है। जब लोग उसे अपना लेते हैं, उसे दोहराते हैं, उसे जीते हैं, तभी वह अमर होता है। वह रैलियों से निकलकर रोजमर्रा की भाषा में घुल जाता है। दीवारों से उतरकर दिलों में बस जाता है।

अच्छा नारा लिखा नहीं जाता: वह जन्म लेता है, समय की कोख से।

और जब सही शब्द सही क्षण से मिलते हैं, तो वे केवल आवाज़ नहीं बनते, वे आंदोलन बन जाते हैं, इतिहास रचते हैं। इंकलाब जिंदाबाद!!

Friday, March 20, 2026

 कैसा विकास! जब पीने के लिए शुद्ध पानी भी उपलब्ध न हो

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पानी का हक: सांस जितना जरूरी, अब कानून में भी दर्ज हो!

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

21 मार्च 2026

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विश्व जल दिवस है, 22 मार्च 2026 को। इस बार का मुद्दा है जल और लैंगिक समानता, Water and Gender। 

मतलब साफ है, पानी की कमी सबसे ज्यादा औरतों और लड़कियों पर भारी पड़ती है। 

दुनिया भर में जहां साफ पानी और शौचालय की कमी है, वहां असमानता और बढ़ती है, और सबसे ज्यादा बोझ महिलाओं पर। 

लेकिन भारत में यह सिर्फ एक दिन की बात नहीं, यह रोज की जंग है। एक दिन भाषण, फोटो, पोस्टर, और फिर वही खामोशी। अब वक्त आ गया है कि हम चुप न रहें। सवाल सीधा है, पानी भीख है या हक?

हवा पर कोई मीटर नहीं, कोई टैक्स नहीं, कोई ताला नहीं। क्योंकि बिना हवा के जीवन खत्म। पानी भी तो उतना ही जरूरी है। बिना पानी के जीवन नहीं चलता। फिर क्यों पानी को बाजार में बेचा जा रहा है? बोतल में बंद, दाम लगाकर। जो अमीर है, वह खरीद लेता है। जो गरीब है, वह गंदा पानी पीकर बीमार पड़ता है, मौत के मुंह में जाता है। यह इंसानियत के खिलाफ है। पानी सार्वजनिक संपत्ति है, जन-धन है। इसे मुनाफे की चीज नहीं बनाया जा सकता।

सच कड़वा है। भारत में 18 प्रतिशत दुनिया की आबादी है, लेकिन सिर्फ 4 प्रतिशत मीठा पानी हमारे पास। करीब 60 करोड़ लोग उच्च से अत्यधिक जल-तनाव में जी रहे हैं। भूजल तेजी से खत्म हो रहा है। 

हम दुनिया में सबसे ज्यादा भूजल निकालने वाले देश हैं। पानी की प्रति व्यक्ति उपलब्धता गिरकर 1400 घन मीटर के आसपास पहुंच गई है, जो जल-तनाव की सीमा से नीचे है। नदियां नाले बन चुकी हैं। हैंडपंप जहर उगलते हैं। शहरों में टैंकर माफिया राज करता है। 

दिल्ली हो या लखनऊ, आगरा हो या मुरादाबाद, कहानी एक जैसी है। 40 प्रतिशत पानी पाइपलाइनों में लीक हो जाता है। मौसम बेकाबू, बेमौसम बारिश, झुलसाती गर्मी, कमजोर मानसून। यह सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं रहा। यह अर्थव्यवस्था का संकट है, स्वास्थ्य का विस्फोट है, सामाजिक अस्थिरता का संकेत है।

सबसे ज्यादा चोट किसे लगती है? गरीब को, औरत को, बच्चे को, हाशिए पर खड़े समाज को। गांवों में औरतें आज भी मटके सिर पर रखकर मीलों चलती हैं। समय गंवाती हैं, स्वास्थ्य गंवाती हैं, स्कूल जाने वाली लड़कियां पढ़ाई छोड़ देती हैं। गंदा पानी दस्त, हैजा, टाइफाइड लाता है। हर साल लाखों बच्चे ऐसी बीमारियों से मरते हैं, जिन्हें एक गिलास साफ पानी रोक सकता था। यह त्रासदी नहीं, अपराध है। और यह अपराध रोका जा सकता है।

अब एक उम्मीद की किरण है, जल जीवन मिशन। 2019 में शुरू हुआ था। टैप तो लग गए, लेकिन फंक्शनल? नियमित पानी? साफ पानी? कई जगहों पर अभी कमी है। भूजल गिर रहा है, प्रदूषण बढ़ रहा है। मिशन 2028 तक बढ़ा दिया गया है, बजट भी बढ़ा है। लेकिन अब जरूरत है कि सिर्फ कनेक्शन नहीं, असली जल सुरक्षा हो, हर बूंद का हिसाब, हर घर में नियमित, साफ पानी।

समाधान भावना में नहीं, डेटा और तकनीक में है। कल्पना कीजिए, हर पाइप पर स्मार्ट मीटर। रियल-टाइम डैशबोर्ड बताए कि कहां पानी खत्म होने वाला है। एआई अवैध बोरवेल पकड़े। एल्गोरिदम तय करे कि किसे कितना पानी मिले, ताकि कोई प्यासा न रहे। सिंगापुर ने करके दिखाया, केप टाउन ने घबराहट को प्रबंधन में बदला। हम क्यों नहीं? 

लेकिन असली लड़ाई शासन की है। बांध-नहर की पुरानी राजनीति बंद हो। मांग को काबू करना होगा। पानी की असली कीमत तय करनी होगी, कड़वी लेकिन जरूरी। प्रदूषण पर सख्त सजा। स्थानीय निकायों को डेटा, अधिकार, संसाधन दो। समुदाय को ताकत दो।

वरना क्या होगा? अमीर टैंकर मंगाएंगे। गरीब कतार में खड़े रहेंगे। बीमारियां फैलेंगी। उद्योग ठप होंगे। समाज दरक जाएगा। समय भाग रहा है। सलाहें मरहम हैं, जख्म गहरा है। 60 करोड़ लोग इंतजार नहीं कर सकते।

पानी अब दया नहीं, अधिकार है। सांस जितना जरूरी हक। विश्व जल दिवस सिर्फ याद दिलाने का नहीं, फैसला लेने का दिन है। सरकारें मजबूत नीतियां बनाएं। बजट लगे। जवाबदेही तय हो। हर घर तक साफ पानी पहुंचे। जल स्रोत सुरक्षित हों। वितरण बराबरी से हो। औरतों की आवाज सुनी जाए, उनकी अगुवाई हो।

यह कोई योजना नहीं, यह अधिकार है। इसे कानून में, नीति में, जमीन पर सच बनाओ। वरना अगली बार नल नहीं सूखेंगे, पूरी व्यवस्था सूख जाएगी। पानी का हक बनाओ कानून। अब वक्त है। कल बहुत देर हो जाएगी।

Thursday, March 19, 2026

 प्यासा भारत, सूखती नदियां:  ‘डे ज़ीरो’ अब कहानी नहीं, दस्तक है

(विश्व जल दिवस, 22 मार्च 2026 पर एक कड़वे सच की डोज)

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

19 मार्च 2026

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नल खुलता है। पानी गिरता है। हम चैन की सांस लेते हैं।

लेकिन ज़मीन के नीचे? सन्नाटा है। सूखी दरारें हैं। और एक डर है, जो धीरे-धीरे हमारे भविष्य को खा रहा है।

क्या हम सचमुच पानी के देश में रहते हैं? या बस एक भ्रम में जी रहे हैं? नदियों को पूजते हैं, और प्रदूषण से दम घोंटते हैं!

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22 मार्च विश्व जल दिवस पर भाषण होंगे। सेमिनार होंगे। संकल्प लिए जाएंगे। पर सच यह है कि भारत पानी के संकट की दहलीज़ पर खड़ा है। और यह कोई दूर का खतरा नहीं। यह आज का सच है। अभी का।

एक तस्वीर देखिए।

जल जीवन मिशन की सफलता का जश्न मना रहे हैं। 2019 में जहाँ सिर्फ़ 17% ग्रामीण घरों में नल था, आज 81% से ज़्यादा घरों तक पाइप से पानी पहुँच चुका है। लगभग 15.8 करोड़ परिवार। यह उपलब्धि छोटी नहीं है। यह सरकार की इच्छाशक्ति और क्षमता का प्रमाण है।

लेकिन दूसरी तस्वीर?

शहर प्यासे हैं। खेत सूख रहे हैं। और ‘डे ज़ीरो’, जब नलों में पानी आना बंद हो जाए, अब कोई दूर देश की कहानी नहीं रही। बेंगलुरु। चेन्नई। दिल्ली। हैदराबाद। चेतावनी हैं।

नीति आयोग साफ़ कहता है: 2030 तक पानी की मांग, उपलब्धता से आगे निकल जाएगी। 82 करोड़ लोग संकट में होंगे। 2050 तक प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता घटकर 1,140 क्यूबिक मीटर रह जाएगी।

यह ‘एब्सोल्यूट स्कैरसिटी’ की सीमा है। और इसका असर? अर्थव्यवस्था पर 6% तक की चोट।

शहर क्या कर रहे हैं? भाग-दौड़। तात्कालिक इलाज। कहीं पाइपलाइन, कहीं टैंकर, कहीं समुद्र के पानी को मीठा बनाने की योजनाएँ।

लेकिन असली कहानी ज़मीन के नीचे लिखी जा रही है।

भूजल: हमारा सबसे बड़ा, सबसे चुप साथी, सबसे ज़्यादा शोषित है। जल शक्ति मंत्रालय की 2025 की रिपोर्ट कहती है कि ओवर-एक्सप्लॉइटेड यूनिट्स 17% से घटकर 10.8% हो गईं।

सुनने में अच्छा लगता है। लेकिन आधी सच्चाई, पूरी झूठ के बराबर होती है। देश के 730 क्षेत्र अब भी ‘रेड ज़ोन’ में हैं। भारत हर साल 247 बिलियन क्यूबिक मीटर भूजल निकाल रहा है। सुरक्षित सीमा? उससे बहुत कम। कुल दोहन 60% से ऊपर।

कुछ राज्य तो सीमाएँ तोड़ चुके हैं।पंजाब 156% पानी खींच रहा है।राजस्थान 147%। हरियाणा, कर्नाटक, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, कहानी एक ही है।

यह वैसा ही है जैसे कोई बैंक से अपनी जमा पूंजी ही निकालता जाए। ना ब्याज, ना संतुलन। बस खाली खाता।

विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं: अगर एक्वीफर ‘टिपिंग पॉइंट’ पार कर गया, तो वापसी लगभग नामुमकिन होगी।

ऊपर से मौसम का खेल। जलवायु परिवर्तन ने आग में घी डाल दिया है।तापमान बढ़ रहा है। पानी तेजी से उड़ रहा है। मानसून अब भरोसेमंद नहीं रहा। कभी बाढ़। कभी सूखा। रीचार्ज की लय टूट चुकी है।

और शहर?

उन्होंने अपने ‘स्पंज’ खुद नष्ट कर दिए। तालाब। झीलें। वेटलैंड्स। कभी ये शहरों की सांस थे।

बेंगलुरु ने 1973 से 2016 के बीच 79% जल निकाय खो दिए। पंजाब ने अपने आधे जल स्रोत गंवा दिए।कंक्रीट और खेती के नाम पर। ये जलाशय सिर्फ़ सुंदरता नहीं थे।ये भूजल को रिचार्ज करते थे। बाढ़ रोकते थे। पानी साफ़ करते थे। शहर को ठंडा रखते थे।

हमने उन्हें मिटा दिया।

और अब टैंकरों के पीछे भाग रहे हैं।

मार्च 2026 है। गर्मी अभी शुरू भी नहीं हुई। फिर भी 166 बड़े जलाशयों में सिर्फ़ 56.7% पानी बचा है। दक्षिण और मध्य भारत में कई डैम आधे से भी कम भरे हैं।

मतलब साफ़ है। गर्मी आते ही संकट गहराएगा। किसान परेशान होंगे। फसलें झुलसेंगी। फैक्ट्रियाँ उत्पादन घटाएँगी। और शहरों में पानी के लिए लाइनें लगेंगी।

पानी का संकट सिर्फ़ प्यास नहीं लाता। यह भूख भी लाता है।

भारत दुनिया की 18% आबादी को खिलाता है। लेकिन उसके पास सिर्फ़ 4% जल संसाधन हैं। यह संतुलन पहले ही नाजुक था।

अब टूटने के कगार पर है। अनुमान डराने लगे हैं। तापमान बढ़ने से गेहूं उत्पादन 50% तक गिर सकता है।चावल 40% तक।

सोचिए। पानी नहीं, तो सिंचाई नहीं।

सिंचाई नहीं, तो अनाज नहीं। और अनाज नहीं, तो महंगाई, भूख, कुपोषण। स्वास्थ्य का संकट अलग।

भारत का लगभग 70% भूजल प्रदूषित है: आर्सेनिक, फ्लोराइड और बैक्टीरिया से।

डायरिया, हैजा, टाइफॉइड; हर साल लाखों लोग बीमार पड़ते हैं। हजारों जानें जाती हैं। यानी जो पानी है, वह भी सुरक्षित नहीं।

तो रास्ता क्या है?

क्या बारिश हमें बचा सकती है? हाँ, अगर हम उसे नारे नहीं, नीति बनाएं।

रेनवॉटर हार्वेस्टिंग। रूफटॉप सिस्टम।रीचार्ज पिट्स। पुराने कुएं, बावड़ियाँ, तालाबों का पुनर्जीवन।

चेन्नई ने रास्ता दिखाया है। कानून बना। लागू हुआ। असर भी दिखा।अब ज़रूरत है इसे हर शहर में लागू करने की। हर नई बिल्डिंग में अनिवार्य।पुरानी इमारतों में रेट्रोफिटिंग।

साथ ही झीलों और वेटलैंड्स की रक्षा। भूजल दोहन पर सख्त नियंत्रण।यह आसान नहीं है।

लेकिन नामुमकिन भी नहीं। तस्वीर साफ़ है। भूजल घट रहा है। जलाशय दबाव में हैं। झीलें गायब हैं। मौसम अनिश्चित है। और खाद्य सुरक्षा खतरे में। चेतावनियाँ नई नहीं हैं।

रिपोर्ट्स सालों से आ रही हैं। फर्क सिर्फ इतना है, अब समय कम बचा है।

तो सवाल सीधा है।

क्या हमारे पास इच्छाशक्ति है?

सरकारों को प्राथमिकताएँ बदलनी होंगी। शहरों को ज़मीन के नीचे झांकना होगा। कानून बनाना नहीं, लागू करना होगा।

और हम? हमें पानी को ‘अनलिमिटेड’ समझना बंद करना होगा। नल में बहता पानी, अनंत नहीं है।

जल जीवन मिशन ने दिखाया,  इरादा हो तो बदलाव संभव है।

अब समय है एक शहरी जल क्रांति का। वरना ‘डे ज़ीरो’ कोई हेडलाइन नहीं रहेगा। यह हमारी दिनचर्या बन जाएगा। पानी सिर्फ़ संसाधन नहीं है।यह सभ्यता की नब्ज़ है।

इसे बचाइए। इसे बहने दीजिए। वरना आने वाली पीढ़ियाँ पूछेंगी

नदियाँ कहाँ गईं?

और हमारे पास कोई जवाब नहीं होगा

 मोदी मॉडल की नई कसौटी: 4 मई बताएगा रफ्तार या रुकावट?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

21 मार्च 2026

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भारत बदल चुका है। चेहरा भी, चाल भी, चरित्र भी। सत्ता की भाषा बदली, शासन का व्याकरण बदला। पर असली सवाल अब सामने खड़ा है, क्या यह बदलाव की आंधी आगे भी चलेगी, या अब इसकी सांस फूलने लगी है? 4 मई को पांच राज्यों के नतीजे इस पहेली का जवाब लिखेंगे।

2014 के बाद भारतीय राजनीति ने जैसे करवट नहीं, पूरा पलटा खाया। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में समझौतों की खिचड़ी राजनीति को किनारे कर एक केंद्रीकृत, निर्णायक और आक्रामक शासन मॉडल उभरा। गठबंधन की बेड़ियां टूटीं। फैसलों की रफ्तार बढ़ी। “जो कहा, वो किया” का नया मंत्र चला। 2019 में दूसरा पूर्ण बहुमत आया, तो यह साफ हो गया कि अब एक दल भी पूरे देश की गाड़ी खींच सकता है।

अनुच्छेद 370 का अंत। राम मंदिर का निर्माण। ये सिर्फ फैसले नहीं थे, ये भावनाओं की धड़कन थे। राष्ट्रवाद और विकास का ऐसा संगम बना, जिसने जनता के दिल में सीधी जगह बनाई। राजनीति अब सिर्फ नीतियों की नहीं, प्रतीकों की भी हो गई।

लेकिन असली खेल कहीं और खेला गया: तकनीक के मैदान में। आधार, मोबाइल और बैंक खाते की तिकड़ी ने सरकारी योजनाओं को सीधे जनता के दरवाजे तक पहुंचा दिया। बिचौलियों की दुकानें बंद होने लगीं। गैस कनेक्शन, घर, नकद सहायता—सरकार अब फाइलों में नहीं, लोगों के जीवन में दिखने लगी। एक नया ‘लाभार्थी वर्ग’ पैदा हुआ, जो दिल्ली को दूर की सरकार नहीं, अपनी सरकार मानने लगा।

अर्थव्यवस्था में भी बड़े प्रयोग हुए। जीएसटी ने कर प्रणाली को एक धागे में पिरोया। दिवाला कानून ने पारदर्शिता की खिड़की खोली। अनौपचारिक अर्थव्यवस्था को औपचारिक बनाने की जिद ने दर्द जरूर दिया, लेकिन दिशा साफ रही; नियम, नियंत्रण और एकरूपता।

फिर आया 2024। जनादेश ने पहली बार ब्रेक लगाया। बहुमत की रफ्तार धीमी हुई। गठबंधन की जरूरत लौट आई। ‘मोदी 3.0’ में ताकत तो है, लेकिन पूरी आजादी नहीं। जैसे तेज दौड़ती कार को अब मोड़ों पर सावधानी से चलना पड़ रहा हो।

लेकिन सरकार ने गियर बदल लिया। रफ्तार कम नहीं होने दी। 2026 तक चार लेबर कोड लागू करने की तैयारी। न्यूक्लियर सेक्टर में निजी निवेश के दरवाजे खोलने की चर्चा। बीमा में 100% एफडीआई की पहल। टैक्स को सरल बनाने की कोशिश। संदेश साफ है; गठबंधन है, लेकिन सुधारों पर ब्रेक नहीं लगेगा।

फिर भी राह आसान नहीं। सियासत का पारा चढ़ रहा है। मुख्य चुनाव आयुक्त पर महाभियोग की तलवार लटक रही है। संस्थाओं पर ‘कब्जे’ के आरोप गूंज रहे हैं। जातीय जनगणना की मांग ने नई बहस छेड़ दी है। विपक्ष अब सिर्फ सवाल नहीं पूछ रहा, सीधे टकराव के मूड में है।

भाजपा का हिंदू सामाजिक गठजोड़ भी चुनौती के दौर में है। समाज की परतें खिसक रही हैं। नई आकांक्षाएं जन्म ले रही हैं। उधर पश्चिम एशिया की अस्थिरता वैश्विक अर्थव्यवस्था को झकझोर सकती है, जिसका असर भारत पर भी पड़ेगा।

अब नजरें टिकी हैं 4 मई पर। पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी; ये सिर्फ राज्य नहीं, राजनीतिक प्रयोगशालाएं हैं। असम में हिमंत बिस्वा सरमा का हिंदुत्व और विकास का फॉर्मूला फिलहाल मजबूत दिखता है। लेकिन दक्षिण भारत अलग मिजाज रखता है। वहां क्षेत्रीय पहचानें गहरी जड़ें जमाए बैठी हैं। भाजपा की राष्ट्रीय अपील को सीटों में बदलना आसान नहीं।

बंगाल में तो जैसे सीधी भिड़ंत है; तृणमूल की जमीनी पकड़ बनाम भाजपा का बढ़ता संगठन। यहां लड़ाई सिर्फ वोट की नहीं, नैरेटिव की है। कौन कहानी गढ़ेगा, कौन जनता को अपने शब्दों में बांधेगा; यही असली जंग है।

इन नतीजों की गूंज दिल्ली तक जाएगी। अगर दक्षिण में प्रदर्शन कमजोर रहा, तो 2026 का परिसीमन मुद्दा बारूद बन सकता है। दक्षिणी राज्य पहले ही जनसंख्या नियंत्रण के कारण प्रतिनिधित्व घटने के डर से बेचैन हैं। उत्तर और दक्षिण के बीच खाई और चौड़ी हो सकती है।

साथ ही, उत्तराधिकार का सवाल भी धीरे-धीरे सिर उठा रहा है। मोदी के बाद कौन? अगर नतीजे उम्मीद से कम रहे, तो क्षेत्रीय नेताओं के पंख लग सकते हैं। गठबंधन सहयोगी: जैसे टीडीपी, जेडीयू, अपनी शर्तों पर ‘कॉमन मिनिमम प्रोग्राम’ थोप सकते हैं। इससे सुधारों की रफ्तार पर ब्रेक लग सकता है।

तो क्या मोदी युग ढलान पर है? शायद नहीं। लेकिन यह जरूर है कि यह अब एक नए मोड़ पर खड़ा है। इसने भारतीय राज्य को दृश्यमान बनाया, प्रभावी बनाया, वैचारिक धार दी। अब चुनौती है; इस केंद्रीकृत ताकत को एक बहुध्रुवीय भारत में कैसे संतुलित किया जाए।

गति भी चाहिए, सहमति भी। रफ्तार भी जरूरी, रिश्ते भी।

4 मई सिर्फ तारीख नहीं है। यह एक संकेत है। यह बताएगा कि मोदी लहर अब भी समंदर की ज्वार है, या किनारों में सिमटती धारा बन रही है। देश की राजनीति की दिशा और दशा, दोनों इसी मोड़ पर टिके हैं।

Tuesday, March 17, 2026

 जिंदगी की टूटे न लड़ी

प्यार करले घड़ी दो घड़ी

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ज़हिलों की जिद्द से मची है तबाही!

हारी हुई जंग या जिंदगी की जीत?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

18 मार्च 2026

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ईरान कितने दिन टिकेगा?

पंद्रह दिन? एक महीना? या लंबी, थकी हुई सांसों में खिंचता हुआ सालों का सिलसिला? जैसे हरीश राणा।

सवाल सीधा है। जवाब उलझा हुआ।क्योंकि मुल्क ताश के पत्ते नहीं होते।हवा चली और ढह गए, इतनी सस्ती नहीं होती सभ्यताएं।

मिट्टी में सदियों का इतिहास गड़ा होता है। रगों में जिद दौड़ती है। दिल में डर भी पलता है। और सबसे ऊपर, इंसान होते हैं। वही, जो हर बार कुचले जाते हैं।

तोपें गरजती हैं। स्टूडियो दहाड़ते हैं।नक्शों पर तीर चलते हैं। एंकरों की आवाज़ में बारूद घुला होता है।

पर असली कहानी?

वह अस्पताल के बाहर रोती माँ लिखती है। वह मलबे में दबा बच्चा चीखकर सुनाता है।

हम पूछते हैं: ईरान क्यों लड़ रहा है?

सुरक्षा? सत्ता? या सिर्फ इसलिए कि अब पीछे हटना “हार” कहलाएगा?

सच कड़वा है। जंग तर्क से कम, अहंकार से ज्यादा चलती है।

दूसरी तरफ देखिए।

अमेरिका। इजराइल। ताकत। तकनीक। रणनीति। एक चलता हुआ बुलडोज़र, जिसे दुनिया “सुपरपावर” कहती है। नैतिकता जीरो।

कहना आसान है: “कुचल देंगे।” लेकिन इतिहास हल्की मुस्कान देता है। अफगानिस्तान याद है? इराक याद है?

आंकड़े झूठ नहीं बोलते।

2001 से 2023 तक, अफगानिस्तान, इराक और 9/11 के बाद के युद्धों में 9 लाख 40 हजार से ज्यादा लोग मारे गए। इनमें 4 लाख 32 हजार आम नागरिक। अप्रत्यक्ष मौतें? 36 से 38 लाख। कुल मिलाकर: 45 से 47 लाख जिंदगियां राख।

20 साल। 2.3 ट्रिलियन डॉलर।

और नतीजा? शांति अब भी लापता है। ताकत जमीन जीत लेती है। दिल नहीं जीत पाती।

फिर हम गुस्से में पूछते हैं; नेता क्या कर रहे हैं? किसके लिए लोग मर रहे हैं?

वालोडीमयर जिलेन्स्की हो या डोनाल्ड ट्रंप: नाम बदलते हैं, कहानी वही रहती है।

कुर्सी पर बैठा इंसान फैसला करता है।

जमीन पर खड़ा इंसान कीमत चुकाता है।

सीधी बात। कोई नेता। कोई विचारधारा। किसी आम आदमी की जान से बड़ी नहीं हो सकती। हिटलर हो या स्टालिन! 

पर हम मानते नहीं। हम कहते हैं; “इज्जत का सवाल है।” “झुकेंगे नहीं।” “मर जाएंगे, पर हार नहीं मानेंगे।”

ठीक है। लड़िए। पर याद रखिए;  गोली इज्जत नहीं देखती। वह सिर्फ जिस्म चीरती है। इतिहास खून से लिखा गया है।

कलिंगा वार के बाद अशोक को ज्ञान मिला। पर क्या हर बार पहले खून की नदी बहेगी, तब ही बुद्धि जागेगी?

यह कैसी अक्ल है? पहले घर जलाओ, फिर बुझाने की किताब पढ़ो।

दुनिया का सबसे बड़ा झूठ क्या है? “यह आखिरी जंग होगी।” नहीं होती।हर जंग, अगली जंग को जन्म देती है।बीच में क्या होता है? बचपन टूटता है।घर उजड़ते हैं। भविष्य राख बन जाता है।

तो रास्ता क्या है?

समझौता। बातचीत। थोड़ा झुकना।

कड़वा है। पर जंग से कम कड़वा।

यहीं याद आते हैं महात्मा गांधी।

न हथियार। न सेना। फिर भी साम्राज्य झुका दिया। सत्याग्रह से। नैतिक ताकत से। उनकी चेतावनी आज भी गूंजती है : “आँख के बदले आँख, पूरी दुनिया को अंधा कर देगी।”

फिर मार्टिन लूथर किंग जूनियर।उन्होंने कहा: युद्ध समस्या का हल नहीं, उसका विस्तार है।

और नेल्सन मंडेला। 27 साल जेल में रहे। बाहर आए, तो बदला नहीं, मेल-मिलाप चुना। कहा, नफरत राष्ट्र तोड़ती है, माफी राष्ट्र बनाती है।

यही असली बहादुरी है। बंदूक उठाना आसान है। हाथ बढ़ाना मुश्किल। क्या हासिल किया भारत के नक्सलियों ने?

सच साफ है: जिंदगी बची रहे, तो सब फिर खड़ा हो सकता है। देश भी। इज्जत भी। विचार भी।

पर कब्र से कोई राष्ट्र नहीं उठता।कड़वा सच सुनिए; जंग बहादुरी नहीं होती। अक्सर बेबसी की आखिरी चीख होती है।

और जिंदगी? वह सिर्फ एक बार मिलती है।

“जिंदगी न मिले दोबारा”, यह फिल्मी लाइन नहीं, चेतावनी है। फिर भी हम वही गलती दोहराते हैं।

स्कूलों पर बम गिरते हैं। अस्पताल जलते हैं। इंसानियत दम तोड़ती है।न इधर वाले पूरी तरह सही। न उधर वाले। बीच में सिर्फ ताकत और दौलत का खेल।

कहां हैं दुनिया के ivory tower के ज्ञानी? कहां हैं शांति के दूत? क्यों नहीं उठती आवाज? नोबेल शांति पुरस्कार… सिर्फ एक तमगा रह गया है क्या?

और सच्चाई? मूर्ख नेतृत्व। पत्थर युग की सोच। 21वीं सदी में भी वही खून-खराबा। यूक्रेन हो या ईरान, मरता आम आदमी है। उजड़ता उसका घर है। जलता उसका भविष्य है।

आखिर हासिल क्या?

अगर हर समस्या का हल युद्ध है: तो फिर यह विकास कैसा? यह सभ्यता कैसी?

इतिहास बार-बार फुसफुसाता है, जिद नहीं, समझदारी जीतती है।

अब फैसला हमारे सामने है। जंग की जिद? या जिंदगी की जीत?

Monday, March 16, 2026

 टूटते स्कूल, उड़ते सपने: क्या ऐसे बनेगा भारत विश्व गुरु ?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

17 मार्च 2026

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कल्पना कीजिए एक सरकारी स्कूल की कक्षा की।

ब्लैकबोर्ड आधा टूटा हुआ है। चॉक की धूल हवा में तैर रही है। छत से प्लास्टर झर रहा है। बच्चे फटी किताबों पर झुके बैठे हैं। 

और इसी देश में हम बड़े गर्व से घोषणा करते हैं, भारत विश्व गुरु बनने जा रहा है।

सवाल सीधा है। क्या टूटे ब्लैकबोर्ड पर करोड़ों बच्चों के सपने लिखे जा सकते हैं?

भारत का शिक्षा तंत्र किसी सजे-संवरे बगीचे जैसा नहीं दिखता। यह तो एक पैबंद लगी रजाई है। कहीं रेशम का टुकड़ा, कहीं टाट का। कहीं चमकदार निजी स्कूल, कहीं जर्जर सरकारी इमारतें।

देश में आज लगभग 72 शिक्षा बोर्ड हैं। हर बोर्ड अपनी ढपली, अपना राग बजा रहा है।

CBSE करीब 27,000 स्कूलों का नेटवर्क लेकर प्रतियोगी परीक्षाओं की दौड़ के लिए ग्राउंड  तैयार करता है। ICSE अपनी अभिजात पहचान में सिमटा रहता है। राज्य बोर्ड स्थानीय भाषा, इतिहास और राजनीति के रंग में रंगे होते हैं।

उधर NIOS उन बच्चों के लिए रास्ता खोलता है जो पारंपरिक स्कूल व्यवस्था से बाहर हो गए। और फिर आते हैं IB और Cambridge जैसे अंतरराष्ट्रीय बोर्ड। यहाँ पढ़ने वाले बच्चे सीधे वैश्विक विश्वविद्यालयों की ओर उड़ान भरते हैं।

नतीजा यह है कि भारतीय शिक्षा की गाड़ी कई दिशाओं में खिंच रही है।

कोई बोर्ड बच्चों को JEE और NEET की दौड़ में धकेलता है। कोई क्षेत्रीय इतिहास की मोटी किताबों में उलझा देता है।

हर साल यह अराजकता का मेला लगता है। और उसके बीच लाखों बच्चे रास्ता खोजते रहते हैं।

अब जरा स्कूलों के भीतर झांकिए।

एक तरफ महानगरों के चमचमाते निजी स्कूल हैं। काँच की दीवारें। एसी कमरे। स्मार्ट बोर्ड। रोबोटिक्स लैब। दस साल के बच्चे कोडिंग सीख रहे हैं। वे सिलिकॉन वैली और ऑक्सफोर्ड के सपने देखते हैं।

दूसरी तरफ सरकारी स्कूल हैं।

बरसात आते ही छत टपकने लगती है। फर्श कीचड़ से भर जाता है। कई जगह शौचालय तक नहीं।

डिजिटल इंडिया की चर्चा खूब होती है। लेकिन कई गांवों में इंटरनेट का नाम सुनते ही बच्चे ऐसे देखते हैं जैसे किसी ने परियों की कहानी सुना दी हो।

यहीं से असली तस्वीर सामने आती है।

ASER, यानी Annual Status of Education Report, भारत की स्कूली शिक्षा का सबसे ईमानदार आईना है। इसे हर साल शिक्षा संस्था प्रथम जारी करती है। इसके सर्वेक्षक गांव-गांव जाकर बच्चों की पढ़ने और गणित की बुनियादी क्षमता की जांच करते हैं।

रिपोर्ट बार-बार चेतावनी देती है कि बड़ी कक्षाओं तक पहुँचने के बाद भी लाखों बच्चे दूसरी कक्षा का पाठ ठीक से नहीं पढ़ पाते। साधारण घटाव जैसे गणित में भी अटक जाते हैं।

यानी स्कूल में साल गुजरते हैं, पर सीखने की बुनियाद कमजोर रहती है।

यहीं से असमानता की असली कहानी शुरू होती है।

अमीर परिवारों के बच्चे अंतरराष्ट्रीय बोर्डों से पढ़कर विदेशों की उड़ान भरते हैं। गरीब परिवारों के बच्चे अक्सर बीच रास्ते में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं।

जन्म ही किस्मत तय कर देता है।

हम अंतरिक्ष मिशनों और डिजिटल तकनीक पर अरबों रुपये खर्च करते हैं। लेकिन हजारों स्कूलों में आज भी शिक्षक नहीं हैं। कई कक्षाएँ खाली गूंजती रहती हैं।

भाषा और क्षेत्रीय राजनीति ने भी शिक्षा को अखाड़ा बना दिया है।

इस बीच रटने की संस्कृति ने रचनात्मकता का गला घोंट दिया है।

बचपन से बच्चों को सिखाया जाता है, याद करो। परीक्षा में उगल दो। फिर भूल जाओ।

ज्ञान का दीपक जलाने के बजाय शिक्षा कई बार टूटे कंगनों की तरह बिखर जाती है।

एक और बड़ी समस्या है, माइग्रेशन।

मान लीजिए किसी परिवार की नौकरी दूसरे राज्य में लग गई। अब बच्चे को नया बोर्ड, नई किताबें, नई परीक्षा प्रणाली झेलनी पड़ती है। माता-पिता दफ्तरों के चक्कर काटते हैं, इक्विवेलेंस सर्टिफिकेट के लिए।

प्रतियोगी परीक्षाओं में भी असमानता दिखती है। JEE और NEET की तैयारी में CBSE के छात्रों को अक्सर बढ़त मिलती है। दूसरे बोर्डों के बच्चे कई बार खुद को पीछे पाते हैं।

विडंबना यहीं खत्म नहीं होती।

एक ओर देश भर में हजारों मदरसे धार्मिक शिक्षा देते हैं। आस्था का संसार फल-फूल रहा है। लेकिन कई जगह विज्ञान और गणित पीछे रह जाते हैं।

दूसरी ओर मिशनरी स्कूल आधुनिक शिक्षा देते हैं। मगर वे भी राजनीतिक बहसों के घेरे में आ जाते हैं।

इन सबके बीच नई शिक्षा नीति 2020 आई। उम्मीदों का नया सूरज लेकर।

पाँच प्लस तीन प्लस तीन प्लस चार का नया ढांचा। PARAKH नाम की राष्ट्रीय मूल्यांकन प्रणाली। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या का सपना।

लेकिन नीति बनाना आसान है, जमीन पर उतारना मुश्किल।

पाँच साल गुजर चुके हैं। कई राज्य अभी भी पुराने ढांचे में ही अटके हुए हैं। स्वायत्तता और राजनीति के कारण बदलाव की रफ्तार धीमी है।

आंकड़े भी देश की कहानी कहते हैं।

केरल में साक्षरता लगभग 90 प्रतिशत से ऊपर चमकती है। बिहार अभी भी आधी दूरी पर हांफता दिखाई देता है।

निजी स्कूलों में अंग्रेजी और विज्ञान की पकड़ मजबूत है। सरकारी स्कूलों में कई बच्चे अभी भी बुनियादी पढ़ाई से जूझ रहे हैं।

हम गगनचुंबी इमारतों का सपना देख रहे हैं। लेकिन नींव रेत की है। कहीं लड़कियाँ पानी भरने के लिए स्कूल छोड़ देती हैं। कहीं लड़के मवेशी चराने लगते हैं।

और उसी देश के शहरों में दस साल के बच्चे मोबाइल ऐप बना रहे हैं। फासला गंगा जितना चौड़ा हो चुका है।

हमारा शिक्षा तंत्र कई बार किसी जर्जर रेलगाड़ी जैसा लगता है। डिब्बे अलग-अलग पटरी पर खिंच रहे हैं। कोई इंजन एक दिशा में नहीं। यात्रियों के सपने स्टेशन पर ही गिर जाते हैं।

यह वही देश है जो दुनिया को बड़े-बड़े सीईओ देता है। और उसी समय लाखों बच्चे बुनियादी पढ़ाई के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

टूटती दीवारें हमारे सपनों का मजाक उड़ा रही हैं। बहत्तर बोर्ड भविष्य को टुकड़ों में बांट रहे हैं। असमानता नई खाइयाँ बना रही है।

आधे-अधूरे उपाय अब काम नहीं करेंगे।

स्कूलों को मजबूत करना होगा। शिक्षकों को बेहतर प्रशिक्षण देना होगा। शिक्षा प्रणाली को सरल और न्यायपूर्ण बनाना होगा।

वरना आने वाली पीढ़ियाँ एक दिन पूछेंगी: भारत ने चाँद तक रॉकेट भेज दिए, लेकिन क्या वह अपने बच्चों को एक मजबूत स्कूल भी दे पाया?

Sunday, March 15, 2026

शादी का नया रंगमंच: पहले बस में बारात, अब कारों की कतार

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प्यार का परचम या पैकेज की परेड?

लव मैरिज बनाम मैरिज ऑफ कन्वीनियंस

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बृज खंडेलवाल की हल्की-फुल्की पड़ताल

16 मार्च 2026

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कभी मोहब्बत बगावत हुआ करती थी। घर से लड़ाई। समाज से टकराव।फिल्मी अंदाज़ में ;  “प्यार किया तो डरना क्या!”

लड़का-लड़की भाग कर शादी कर लेते थे। कोर्ट में दो गवाह। या आर्य समाज मंदिर में सात फेरे।

ना बैंड, ना बाजा, ना बारात। बस दिल की जिद।

मां-बाप सालों तक रूठे रहते। मोहल्ले में कानाफूसी चलती रहती।

पर इश्क में एक आग होती थी। एक दीवानगी।

अब तस्वीर बदल गई है।

ऑफिस में साथ काम। कॉफी डेट। वीकेंड ट्रिप। इंस्टाग्राम स्टोरी।

धीरे-धीरे इश्क भी “पैकेज” बन गया।

दोनों की अच्छी तनख्वाह। स्मार्ट लाइफस्टाइल।

जाति-भाषा की दीवारें भी कहीं-कहीं ढहती नजर आती हैं।

देखने में लगता है , मोहब्बत ने समाज को मात दे दी।

पर असली ट्विस्ट शादी के दिन आता है।

फिर वही पुरानी पटकथा।

बैंड-बाजा। डेस्टिनेशन वेडिंग।

डांस, दारू, डीजे, ड्रोन कैमरा।

दहेज नहीं तो “गिफ्ट्स” सही।

लेन-देन नहीं तो “कस्टम” सही।

गहने-जेवर, दिखावा, रस्मों की लंबी फेहरिस्त।

जो कभी समाज से बगावत करते थे,

आज वही समाज के सबसे आज्ञाकारी छात्र बन जाते हैं।

मोहब्बत की क्रांति…शादी के मंडप में परंपरा के सामने घुटने टेक देती है।

कहने को लव मैरिज। असल में   “मैरिज ऑफ कन्वीनियंस”।

पहले परिवार हुक्म देता था, बच्चे मानते थे। अब बच्चे फैसला करते हैं, परिवार ताली बजाता है।

फर्क बस इतना है : पहले इश्क में आग थी। आज इश्क में इवेंट मैनेजमेंट है।

और मोहब्बत…कभी-कभी बस एक खूबसूरत बहाना लगती है।

भारत में शादी कभी सिर्फ दो लोगों का मिलन नहीं रही।

यह पूरा मेला हुआ करती थी। गाँव का। मोहल्ले का। रिश्तों का।

आज भी मेला है। लेकिन रंग बदल गए हैं। ढोल वही है, बस उसकी तान बदल गई है।

पुरानी शादी और आज की शादी में सचमुच जमीन-आसमान का फर्क है।

जैसा बुजुर्ग कहते थे ; “समय बड़ा बलवान।” समय के साथ शादियों ने भी अपना रंग बदल लिया।

पहले बारात निकलती थी तो एक बस ही काफी होती थी। बस क्या , चलता-फिरता घर। सीटों पर लोग। गैलरी में लोग। कभी-कभी तो छत पर भी लोग।

बुजुर्ग मज़ाक में कहते , “अरे भाई, जितने लोग बस में आ जाएँ, उतने ही सच्चे रिश्तेदार!”

रास्ते भर नाश्ता चलता। अंताक्षरी के दौर। कभी फूफाजी रूठ जाते। कभी पंडितजी देर से पहुँचते।

दूल्हे के लिए अलग से एक छोटी कार होती थी। वही सबसे बड़ी शान। बाकी पूरी बस रिश्तेदारी और दोस्ती का प्रतीक लगती थी। जैसे कोई फिल्मी गीत बज रहा हो ; “ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे…”

बारात धर्मशाला या बगीची में रुकती थी। पूरा कुटुंब आवभगत में लग जाता। गीत गाए जाते। गालियाँ भी बजतीं : वही देसी रस्म वाली।

कहीं ताश की बाज़ी। कहीं भांग-ठंडाई का दौर। और फिर उन किस्सों को सालों तक सुनाया जाता।

अब तस्वीर उलट गई है।

बस का जमाना गया। अब कारों की कतार लगती है। एक ही रंग की गाड़ियाँ। दूल्हे की कार सबसे चमकीली। कहीं-कहीं तो हेलीकॉप्टर एंट्री भी। फोटोग्राफरों का अलग उत्साह। हर पल कैद होना चाहिए।

जैसे शादी नहीं, लाइव फिल्म की शूटिंग हो रही हो।

सजावट का भी नया खेल है।

पहले गाड़ियों पर खर्च कम होता था।

अब हालत यह है कि गाड़ी से ज्यादा खर्च उसकी सजावट पर हो जाता है।

फूल, लाइट, रिबन, थीम।

ऐसा लगता है जैसे कार नहीं,

चलती-फिरती फूलों की दुकान हो।

किसी ने सही कहा है ; “आजकल शादी रिश्तों से कम, इवेंट मैनेजमेंट से ज्यादा चलती है।”

पहले जमाना सीधा था। दूल्हा दुल्हन को पहली बार सुहागरात को ही देखता था। फिल्मी अंदाज़ में ; “पर्दा है पर्दा…” अब कहानी बदल गई है। पहले मुलाकात। फिर डेट। फिर प्री-वेडिंग शूट। पहाड़ों पर फोटो। झील के किनारे वीडियो। ड्रोन कैमरा ऊपर उड़ रहा है। और बैकग्राउंड में गाना बज रहा है ; “तुम ही हो…”

लाखों रुपये तस्वीरों और वीडियो पर खर्च। कभी-कभी लोग मजाक में कहते हैं : “शादी बाद में होती है, फिल्म पहले बन जाती है।”

पहले शादी में बैंड बाजा होता था।लाल यूनिफॉर्म वाले बैंड वाले। ट्रम्पेट, ढोल, नगाड़ा। और वही अमर गीत : “आज मेरे यार की शादी है…” या “बहारों फूल बरसाओ…”

बुजुर्ग, बच्चे, सब नाचते थे। किसी को स्टेप नहीं आते थे। फिर भी दिल से नाचते थे।

आज डीजे का जमाना है। लाइट, स्मोक, डांस फ्लोर। डीजे शायद सस्ता हो। लेकिन उसके लिए जो डीजे ज़ोन बनता है, वह अक्सर जेब ढीली कर देता है।

खाने का भी रंग बदल गया है।पहले टेंट सादा होता था।चार बाँस, एक कपड़ा। हलवाई  एक। मेनू छोटा। पूरी। आलू की सब्जी। रायता।जलेबी। लड्डू, बर्फी,  और लोग उँगलियाँ चाटते हुए कहते: “वाह! मजा आ गया।”

आज शादी में खाने की पूरी प्रदर्शनी लगती है। चाइनीज काउंटर। इटालियन काउंटर। लाइव पिज्जा।चाट की दस किस्में। पचास अचार।चालीस तरह के पापड़। कभी-कभी मेहमान प्लेट लेकर घूमते रहते हैं।समझ ही नहीं आता : खाएँ क्या और छोड़ें क्या।

इतने बदलावों के बाद भी एक सवाल बचता है। क्या शादियाँ सच में ज्यादा खुशहाल हुई हैं? या बस ज्यादा महँगी हो गई हैं? पुराने लोग अक्सर कहते हैं : “पहले शादी में प्यार ज्यादा था, दिखावा कम।”

आज दिखावा ज्यादा है। पैसा पानी की तरह बहता है। कभी-कभी तो ऐसा भी सुनने को मिलता है कि शादी के खर्च से बाप की कमर टूट जाती है।और ऊपर से समाज का दबाव अलग।

फिल्मी अंदाज़ में कोई कह दे ; “आज मेरे पास गाड़ी है, बंगला है…” पर असली सवाल यह है ;  क्या दिल में सुकून भी है?

आखिर में, समय बदलता है।रीति-रिवाज भी बदलते हैं। पर एक चीज़ नहीं बदलनी चाहिए  रिश्तों की सादगी और सच्चाई।

क्योंकि शादी का असली अर्थ है, दो दिलों का मिलन। बाकी सब तो बस

लाइट, कैमरा और एक्शन है।

इसलिए शादी कैसी भी हो , बस इतनी हो कि खुशियाँ रहें, कर्ज नहीं।