बारह साल बाद भी मंज़िल दूर क्यों?
वादों और डिलीवरी के बीच बढ़ता फासला?
_________________________
बृज खंडेलवाल द्वारा
9 अक्टूबर 2026
__________________________
2014 में दो करोड़ नौकरियां हर साल देने का वादा कहां गया?
क्या हमारी नदियां सचमुच साफ हो गईं?
क्या शहर स्मार्ट हो गए या सिर्फ स्मार्ट बोर्ड लग गए?
भ्रष्टाचार कम हुआ या हमने उसके साथ जीना सीख लिया?
और बारह साल बाद आखिर वादे और डिलीवरी के बीच कितनी दूरी तय हुई?
ये किसी विश्वविद्यालय के शोध के सवाल नहीं हैं। ये वे सवाल हैं जो लोग चाय की दुकानों पर, घरों में, दफ्तरों में और रेलवे प्लेटफॉर्म पर पूछते हैं।
2014 में नरेंद्र मोदी बदलाव के बड़े वादे के साथ सत्ता में आए थे। रोजगार, साफ-सुथरा शासन, बेहतर बुनियादी ढांचा, तेज विकास और नया भारत।
इसमें कोई शक नहीं कि इन बारह वर्षों में बहुत कुछ हुआ है। सड़कें बनीं। हवाई अड्डे बढ़े। डिजिटल सेवाओं का विस्तार हुआ। दुनिया में भारत की आवाज पहले से ज्यादा सुनाई देने लगी।
लेकिन राजनीति कोई पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन नहीं है।
एक समय के बाद आम आदमी सीधा सवाल करता है, "ठीक है, लेकिन मेरी जिंदगी में क्या बदला?"
यहीं से कहानी थोड़ी असहज हो जाती है।
स्वच्छ भारत: शौचालय बने, लेकिन आगे क्या हुआ?
स्वच्छ भारत अभियान सरकार की सबसे दिखाई देने वाली योजनाओं में था। लाखों शौचालय बने। यह निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि थी।
लेकिन शौचालय बन जाना और स्वच्छता आ जाना एक बात नहीं है।
कई शौचालय बंद पड़े हैं। कई में पानी नहीं है। कई गांवों को खुले में शौच से मुक्त घोषित कर दिया गया, लेकिन बाद में उनकी सही जांच नहीं हुई। कूड़ा और सीवेज प्रबंधन अब भी कमजोर है।
और एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि मैला ढोने की प्रथा पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
हमने शौचालय तेजी से बनाए। लेकिन उनके इस्तेमाल और रखरखाव की आदत उतनी तेजी से नहीं बदली।
यही कहानी नमामि गंगे की भी है।
गंगा की सफाई पर हजारों करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बने। योजनाएं बनीं। उद्घाटन हुए। भाषण हुए।
लेकिन सीवेज आज भी नदी में पहुंच रहा है।
नदी दुर्भाग्य से सरकारी प्रेस विज्ञप्तियां नहीं पढ़ती।
उसे सिर्फ यह पता होता है कि पानी में आखिर जा क्या रहा है।
स्मार्ट सिटी और पुराने सवाल
फिर आया स्मार्ट सिटी मिशन।
विचार अच्छा था। आखिर कौन स्मार्ट शहर नहीं चाहता?
लेकिन कई जगह "स्मार्ट सिटी" का मतलब स्मार्ट मोहल्ला बनकर रह गया।
कुछ सड़कें चमका दी गईं। कैमरे लग गए। वाई-फाई आया। कमांड सेंटर बन गए।
उधर आम नागरिक नालियों, कूड़े, ट्रैफिक, टूटी फुटपाथों और कमजोर सार्वजनिक परिवहन से जूझता रहा। आगरा को ही देख लो!
स्मार्ट सिटी की असली परीक्षा बहुत आसान है।
एक पैदल यात्री से पूछिए।
क्या वह सड़क सुरक्षित तरीके से पार कर सकता है?
एक साइकिल वाले से पूछिए।
क्या वह अपनी जान जोखिम में डाले बिना साइकिल चला सकता है?
एक रोज आने-जाने वाले से पूछिए।
क्या वह दो घंटे ट्रैफिक में फंसे बिना दफ्तर पहुंच सकता है?
अगर जवाब नहीं है तो शहर को अभी स्मार्ट होने में कुछ वक्त लगेगा।
वे सुधार जिनकी चर्चा कोई नहीं करना चाहता
सड़कें और पुल दिखाई देते हैं। संस्थागत सुधार दिखाई नहीं देते।
2006 में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस सुधार के निर्देश दिए थे। लेकिन उनका पूरा पालन अब तक नहीं हुआ। पुलिस में खाली पद, राजनीतिक हस्तक्षेप और हिरासत में अत्याचार जैसे सवाल बने हुए हैं।
शिक्षा व्यवस्था भी बार-बार परीक्षा पेपर लीक और बेरोजगार युवाओं के सवाल से घिरती है।
अदालतों में मुकदमों का बोझ बढ़ता जा रहा है। सरकारी अस्पतालों पर दबाव बना हुआ है।
इन समस्याओं का समाधान किसी भवन का उद्घाटन करके नहीं होता।
संस्थागत सुधार राजनीति का सबसे नीरस काम है।
न रिबन काटना है, न बड़ा पोस्टर लगाना है, न ड्रोन से तस्वीर खिंचवानी है।
लेकिन देश को सही ढंग से चलाने के लिए यही उबाऊ काम सबसे जरूरी है।
और नौकरियों का क्या हुआ?
शायद कोई दूसरा वादा इतना पीछा नहीं करता जितना रोजगार का सवाल।
2014 में देश के युवाओं में बड़ी उम्मीद जगी थी। हर साल करीब दो करोड़ नौकरियों का वादा राजनीतिक चर्चा का हिस्सा बन गया था।
बारह साल बाद भी बेरोजगारी और अधरोजगारी बड़ी चिंता हैं। पढ़े-लिखे युवाओं के लिए रोजगार का संकट और गंभीर है।
यहां आंकड़ों और जिंदगी का फर्क साफ दिखाई देता है।
डिग्री जीडीपी नहीं खाती। नौकरी चाहिए।
एक परिवार आर्थिक विकास की दर देखकर खुश नहीं होता। वह महीने का राशन, गैस सिलेंडर, स्कूल की फीस, बिजली का बिल और मकान का किराया देखता है।
इसीलिए बेरोजगारी और महंगाई बार-बार जनता की सबसे बड़ी चिंताओं में लौट आती हैं।
किसान अब भी इंतजार में
2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का वादा भी पूरा नहीं हुआ।
2020 के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों ने करीब एक साल तक आंदोलन किया। आखिरकार सरकार को कानून वापस लेने पड़े।
उन कानूनों के पक्ष या विपक्ष में अलग-अलग राय हो सकती है। लेकिन उस आंदोलन ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा किया।
क्या बड़े सुधार ऊपर से थोपे जाएंगे और जनता को बाद में समझाए जाएंगे?
लोकतंत्र में यह तरीका हमेशा सफल नहीं होता।
किसान को सहानुभूति के भाषण नहीं चाहिए। उसे भरोसेमंद आय चाहिए। उचित कीमत चाहिए। पानी और बिजली चाहिए। ऐसा बाजार चाहिए जो ज्यादा पैदा करने पर भी उसे सजा न दे।
विकास और पर्यावरण की लड़ाई
भारत को विकास चाहिए। इसमें किसी को आपत्ति नहीं हो सकती।
भारत के कई शहर आज भी दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में हैं। शहरी बाढ़ लगभग मौसमी समस्या बन गई है। ट्रैफिक बढ़ रहा है। तालाब और प्राकृतिक जल निकासी के रास्ते लगातार खत्म हो रहे हैं।
हम टिकाऊ विकास की बात बहुत करते हैं।
कभी-कभी लगता है कि हमें "विकास" शब्द तो याद रहता है, लेकिन "टिकाऊ" भूल जाते हैं।
भ्रष्टाचार का सवाल
कभी भ्रष्टाचार कांग्रेस के खिलाफ भाजपा का सबसे बड़ा हथियार था।
भाजपा एक साफ विकल्प बनकर सत्ता में आई थी।
लेकिन अब भ्रष्टाचार ने भारतीय राजनीति में एक नया शब्द पा लिया है।
"वॉशिंग मशीन।"
कोई नेता सीबीआई, ईडी या आयकर विभाग की जांच में घिरता है। फिर राजनीतिक समीकरण बदलते हैं। नेता पाला बदलता है। और देखते-देखते राजनीतिक माहौल बदल जाता है।
अजीत पवार का राजनीतिक सफर आलोचकों द्वारा अक्सर उदाहरण के रूप में पेश किया जाता है।
कल तक भ्रष्टाचार के आरोप।
आज राजनीतिक साझेदारी।
सवाल सीधा है।
क्या पार्टी बदलते ही आरोप भी धुल जाते हैं?
सच यह है कि भारतीय राजनीति में यह बीमारी नई नहीं है। पार्टियां दशकों से दलबदलुओं को खरीदती, उधार लेती और गले लगाती रही हैं।
लेकिन भाजपा ने कभी खुद को अलग बताया था।
इसीलिए यह आलोचना ज्यादा चुभती है।
अगर कल का कथित भ्रष्ट नेता आज सम्मानित सहयोगी बन जाता है तो कल के भ्रष्टाचार का क्या हुआ?
क्या वह खत्म हो गया?
या नेता ने सिर्फ वॉशिंग मशीन बदल ली?
वह पार्टी जो अलग होने का दावा करती थी
भाजपा की 2014 की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत यही थी कि वह खुद को अलग पार्टी बताती थी।
कम परिवारवाद। कम भ्रष्टाचार। बेहतर शासन। ज्यादा विकास।
आज आलोचक कहते हैं कि पार्टी ने उन्हीं राजनीतिक आदतों में से कुछ अपना ली हैं, जिनके खिलाफ वह कभी खड़ी थी।
सरकारें गिरीं। पार्टियां टूटीं। विधायक पाला बदलते रहे। राजनीतिक वफादारियां रातोंरात बदल गईं।
संविधान वही है।
राजनीतिक फर्नीचर लगातार बदल रहा है।
जब जांच एजेंसियों पर विपक्षी नेताओं के खिलाफ ज्यादा सक्रिय और सत्तापक्ष के नेताओं के प्रति नरम होने के आरोप लगते हैं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
हर आरोप को सच मान लेना ठीक नहीं।
लेकिन हर आरोप को विपक्ष का प्रचार कहकर खारिज करना भी लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं।
इन सवालों के जवाब जरूरी हैं।
लोकतंत्र सिर्फ चुनावों से नहीं चलता। वह उन संस्थाओं पर भरोसे से चलता है जिन्हें जनता निष्पक्ष मानती है।
दुनिया में भारत की साख बढ़ी है
इस कहानी का दूसरा पहलू भी है।
दुनिया में भारत की स्थिति निश्चित रूप से मजबूत हुई है। बड़े अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन, प्रवासी भारतीयों से संपर्क और बढ़ता कूटनीतिक प्रभाव भारत को नई पहचान दे रहे हैं।
यह महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
लेकिन अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा घरेलू समस्याओं को हमेशा नहीं ढक सकती।
एक देश शानदार सम्मेलन कर सकता है और उसी सम्मेलन स्थल के बाहर टूटी फुटपाथ भी हो सकती है।
वह वैश्विक शक्ति बनने की बात कर सकता है और उसका नागरिक अदालत में वर्षों तक न्याय का इंतजार कर सकता है।
वह डिजिटल इंडिया पर गर्व कर सकता है और उसी समय कोई गांव बुनियादी स्वच्छता के लिए तरस सकता है।
दोनों तस्वीरें एक साथ सच हो सकती हैं।
तो रिपोर्ट कार्ड क्या कहता है?
बारह साल का हिसाब इस सवाल से नहीं लगाया जा सकता कि मोदी सरकार ने कुछ किया या नहीं।
निश्चित रूप से बहुत कुछ किया है।
सही सवाल यह है:
क्या काम का पैमाना उन वादों के पैमाने के बराबर है जो 2014 में किए गए थे?
यहीं संदेह पैदा होता है।
भारत ने शानदार बुनियादी ढांचा बनाया है। लेकिन संस्थाएं अब भी कमजोर हैं।
भारत ज्यादा डिजिटल हुआ है। लेकिन करोड़ों लोगों के लिए अच्छी नौकरी अब भी सपना है।
स्वच्छता की बात होती है। लेकिन नदियां और शहर अब भी प्रदूषित हैं।
भारत की वैश्विक ताकत बढ़ी है। लेकिन घर के बाहर सड़क पार करना अब भी कई जगह जान जोखिम में डालना है।
भ्रष्टाचार खत्म करने की बात होती है। लेकिन राजनीतिक अवसरवाद पूरी ताकत से जिंदा है।
और आम आदमी?
वह अब भी उस "अच्छे दिन" का इंतजार कर रहा है जो नारे से निकलकर रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन जाए।
बारह साल कम समय नहीं होता।
इतने समय में सड़कें बन सकती हैं। हवाई अड्डे बन सकते हैं। बड़े स्मारक खड़े हो सकते हैं।
इतने समय में यह भी पता चल जाता है कि उनकी नींव कितनी मजबूत है।
मोदी सरकार ने जो बनाया है, उसका श्रेय उसे मिलना चाहिए।
जो अधूरा रह गया है, उसके सवाल भी पूछे जाने चाहिए।
यह मोदी विरोध नहीं है।
यह लोकतंत्र है।
असल दूरी दिल्ली से मुंबई की नहीं है। न ही किसी एक्सप्रेसवे की लंबाई से इसे नापा जा सकता है।
असल दूरी है वादे और डिलीवरी के बीच की दूरी।
और बारह साल बाद भी यह सड़क निर्माणाधीन है।
मोदी ने लंबा सफर तय किया है। लेकिन करोड़ों भारतीयों के लिए अभी कई लंबे मील बाकी हैं।