Monday, July 13, 2026

 


प्रिय आगरा, हमारे फुटपाथ लौटा दो!

सड़कें सिर्फ़ गाड़ियों की नहीं, इंसानों की भी हैं

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बृज खंडेलवाल द्वारा

15 जुलाई 2026

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नेताओं और अफ़सरों से एक छोटी-सी गुज़ारिश है। एक दिन बिना लालबत्ती, बिना सरकारी गाड़ी और बिना सुरक्षा घेरे के आगरा की सड़कों पर पैदल चलकर दिखाइए। तब मालूम होगा कि इस शहर में पैदल चलना अब सफ़र नहीं, रोज़ का इम्तिहान बन चुका है।

आगरा का कोई एक इलाक़ा बता दीजिए, जहाँ आदमी निडर होकर फुटपाथ पर चल सके। योगी सरकार तेज़ रफ़्तार एक्सप्रेसवे बनाने में व्यस्त है, लेकिन पैदल चलने वालों की रफ़्तार और सुरक्षा जैसे किसी की प्राथमिकता ही नहीं रही।

ताजमहल दुनिया की शान है, मगर शहर की असली पहचान उसकी सड़कें होती हैं। और आगरा की सड़कें आज एक कड़वी हक़ीक़त बयान करती हैं: यह शहर पैदल चलने वालों का नहीं रहा।

फुटपाथ, जो आम लोगों के लिए बने थे, अब दुकानों के शो-रूम, ठेलों, पार्किंग और अतिक्रमण की जागीर बन चुके हैं। कहीं सामान फैला है, कहीं शेड खड़े हैं, कहीं मोटरसाइकिलें और कारें कब्ज़ा किए बैठी हैं। नतीजा साफ़ है। पैदल आदमी सड़क पर उतरता है और मौत के साथ चलने को मजबूर हो जाता है।

बेलनगंज, हॉस्पिटल रोड, लोहामंडी, राजा मंडी, किनारी बाज़ार, सदर और शहर के दर्जनों इलाक़ों में यही मंजर दिखाई देता है। कहीं फुटपाथ टूटे हैं, कहीं ग़ायब हैं और जहाँ बचे भी हैं, वहाँ अतिक्रमण ने उनका दम घोंट दिया है।

यह सिर्फ़ असुविधा नहीं, सार्वजनिक सुरक्षा का गंभीर संकट है। "सेफ़ स्ट्रीट्स फ़ॉर आगरा" रिपोर्ट बताती है कि शहर में सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली 88 प्रतिशत मौतें पैदल यात्रियों, साइकिल सवारों और दोपहिया वाहन चालकों जैसी सबसे कमज़ोर श्रेणी के लोगों की होती हैं। यानी जो सबसे कम सुरक्षित हैं, वही सबसे ज़्यादा जान गंवा रहे हैं।

देशभर में हर साल तीस हज़ार से अधिक पैदल यात्री सड़क हादसों में मारे जाते हैं। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार, कुल सड़क दुर्घटना मौतों में लगभग पाँचवाँ हिस्सा पैदल यात्रियों का है। आगरा में टूटे फुटपाथ, खुले मैनहोल, उखड़ी टाइलें और बरसात में पानी से छिपे गड्ढे इस ख़तरे को कई गुना बढ़ा देते हैं।

सबसे ज़्यादा तकलीफ़ बुज़ुर्गों, महिलाओं, बच्चों और दिव्यांग नागरिकों को होती है। रोज़ कोई न कोई गिरता है, घायल होता है। छोटी चोटें अब आम बात हो गई हैं। बड़े हादसे किसी भी दिन किसी के साथ हो सकते हैं।

विडम्बना देखिए। हर साल लाखों पर्यटक आगरा आते हैं। वे इस शहर को पैदल महसूस करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें भी ट्रैफ़िक के बीच जान हथेली पर रखकर चलना पड़ता है। विश्व धरोहर का शहर अगर पैदल यात्रियों के लिए असुरक्षित है, तो यह हमारी शहरी सोच की नाकामी है।

सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में साफ़ कहा है कि स्वच्छ, सुरक्षित और बाधारहित फुटपाथ पर चलना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों का मौलिक अधिकार है। सड़कों पर पहला हक़ पैदल चलने वालों का है, वाहनों का नहीं। मगर आगरा में यह अधिकार हर दिन कुचला जा रहा है।

नगर निगम को अब सिर्फ़ रंग-रोगन और सौंदर्यीकरण से बाहर निकलना होगा। फुटपाथों की मरम्मत, खुले मैनहोल बंद करना, जल निकासी दुरुस्त करना और अतिक्रमण हटाना उसकी पहली ज़िम्मेदारी होनी चाहिए। दुकानदार सार्वजनिक ज़मीन पर कब्ज़ा नहीं कर सकते। रेहड़ी-पटरी वालों के लिए व्यवस्थित वेंडिंग ज़ोन बनाए जाएँ, ताकि उनका रोज़गार भी सुरक्षित रहे और पैदल यात्रियों का रास्ता भी।

अब वक्त आ गया है कि "प्रिय आगरा, फुटपाथ वापस दो" अभियान शुरू किया जाए। नागरिक मोबाइल से टूटे फुटपाथ, खुले मैनहोल और अतिक्रमण की तस्वीरें भेजें। नगर निगम तय समय-सीमा में कार्रवाई करे और हर सप्ताह सार्वजनिक रिपोर्ट जारी करे। स्थानीय अख़बार भी नागरिक शिकायतों के लिए स्थायी कॉलम शुरू करें। जवाबदेही होगी, तभी बदलाव आएगा।

बेंगलुरु समेत कई शहरों ने सख़्ती से फुटपाथ अतिक्रमण हटाने की शुरुआत कर दी है। आगरा कब जागेगा? या फिर हमारे हुक्मरान रिप वैन विंकल की तरह सोते ही रहेंगे?

किसी शहर की पहचान उसकी चौड़ी सड़कों से नहीं होती। उसकी पहचान इस बात से होती है कि वहाँ एक बच्चा, एक बुज़ुर्ग, एक महिला, एक दिव्यांग और एक पर्यटक कितनी बेफ़िक्री से पैदल चल सकता है।

आगरा ने अपने स्मारकों पर करोड़ों रुपये खर्च किए हैं। अब अपने नागरिकों पर भी कुछ निवेश कीजिए।

हमें फुटपाथ वापस चाहिए।

क्योंकि शहर तभी सभ्य कहलाता है, जब सड़क पर सबसे कमज़ोर इंसान भी बिना डर के चल सके। ताजमहल की ख़ूबसूरती तभी मुकम्मल होगी, जब उसके शहर की सड़कें भी इंसानों के लिए सुरक्षित हों

Sunday, July 12, 2026

 क्या वाकई औरतें मर्दों पर भारी पड़ रही हैं? 

एक सनसनीखेज़ हत्या से सदियों की असमानता नहीं मिट जाती

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कुछ वायरल अपराधों से यह मत मान लीजिए कि भारत में पितृसत्ता खत्म हो गई है

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

14 जुलाई 2026

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मेरठ का नीला ड्रम, आगरा में फर्श के नीचे दफन पति, मुंबई-वसई में प्रेमी की हत्या और ऐसी ही कुछ दूसरी सनसनीखेज़ वारदातों ने पूरे देश को झकझोर दिया। टीवी स्टूडियो गरजे, सोशल मीडिया पर मीम्स की बाढ़ आ गई और एक नया निष्कर्ष गढ़ लिया गया: "क्या अब महिलाएँ पुरुषों पर भारी पड़ने लगी हैं?" 

लेकिन क्या कुछ भयावह अपराध सचमुच भारत की सामाजिक हकीकत बदल देते हैं? क्या कुछ वायरल घटनाएँ सदियों पुरानी पितृसत्ता, असमानता और महिलाओं के खिलाफ हिंसा के पहाड़ को मिटा सकती हैं? जवाब भावनाओं में नहीं, आँकड़ों में छिपा है।

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आज के दौर में सच से कहीं तेज़ दौड़ती है सनसनी।

किसी पत्नी पर पति की हत्या का आरोप लगता है। कहीं प्रेमी के साथ मिलकर हत्या की साज़िश रची जाती है। टीवी चैनलों पर दिन-रात वही दृश्य चलते हैं। सोशल मीडिया पर मीम्स की बाढ़ आ जाती है। व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी फ़ौरन फैसला सुना देती है; "अब तो औरतें मर्दों पर भारी पड़ने लगी हैं।" कुछ लोग तो यह तक कहने लगते हैं कि अब पुरुष ही सबसे बड़े पीड़ित हैं।

ऐसी बातें सुनने में आकर्षक लगती हैं, लेकिन आंकड़ों की कसौटी पर टिकती नहीं हैं।

अपराध का कोई लिंग नहीं होता। हत्या करने वाला चाहे पुरुष हो या महिला, कानून की नज़र में दोनों बराबर हैं। दोषी को सज़ा मिलनी ही चाहिए। लेकिन कुछ सनसनीखेज़ घटनाओं के आधार पर पूरे समाज की तस्वीर बदल देना न्याय भी नहीं है और बुद्धिमानी भी नहीं।

कुछ अपराध सदियों की सामाजिक हकीकत को नहीं बदल सकते।

यह सच है कि भारत में महिलाओं की स्थिति पहले से बेहतर हुई है। आज पहले की तुलना में कहीं अधिक लड़कियाँ स्कूल और कॉलेज पहुँच रही हैं। उच्च शिक्षा में महिलाओं का सकल नामांकन अनुपात अब पुरुषों से अधिक है। महिलाएँ लड़ाकू विमान उड़ा रही हैं, अंतरिक्ष अभियानों का नेतृत्व कर रही हैं, उद्योग चला रही हैं, न्यायपालिका और प्रशासन में महत्वपूर्ण पदों पर हैं। पंचायतों में लाखों महिलाएँ जनप्रतिनिधि हैं। मातृ मृत्यु दर घटी है, संस्थागत प्रसव बढ़े हैं और करोड़ों महिलाओं के बैंक खाते खुले हैं।

यह बदलाव स्वागत योग्य है।

लेकिन कुछ सफल महिलाओं की उपलब्धियों को पूरे देश की महिलाओं की वास्तविक स्थिति मान लेना सबसे बड़ी भूल होगी।

असल सवाल यह है कि गाँवों, कस्बों और शहरों की आम महिला कैसी ज़िंदगी जी रही है?

यहीं तस्वीर बदल जाती है। सामाजिक कार्यकर्ता पद्मिनी अय्यर कहती हैं, "भारत में महिलाओं की श्रम भागीदारी दर बढ़ी जरूर है, लेकिन आज भी पुरुषों की तुलना में आधी से भी कम है। जो महिलाएँ काम करती भी हैं, उनमें अधिकांश असंगठित क्षेत्र में हैं, जहाँ न नौकरी की सुरक्षा है, न उचित वेतन और न सामाजिक सुरक्षा। इससे भी बड़ा सच है वह काम जिसका कोई वेतन नहीं मिलता।समय-उपयोग सर्वे बताते हैं कि भारतीय महिलाएँ पुरुषों की तुलना में रोज़ तीन घंटे से अधिक अतिरिक्त समय रसोई, सफाई, बच्चों की परवरिश और बुज़ुर्गों की देखभाल में लगाती हैं। यह श्रम देश की अर्थव्यवस्था को सहारा देता है, लेकिन न इसका कोई वेतन है और न सम्मान।"

संपत्ति का बँटवारा भी बराबरी की कहानी नहीं कहता।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार केवल लगभग 13 प्रतिशत महिलाओं के नाम अकेले मकान है और मात्र 8 से 9 प्रतिशत महिलाओं के पास अपनी भूमि है। आर्थिक निर्भरता आज भी सामाजिक निर्भरता को जन्म देती है।

सोशल एक्टिविस्ट विद्या चौधरी के मुताबिक, "सबसे कठोर सच महिलाओं के खिलाफ हिंसा का है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार वर्ष 2024 में महिलाओं के विरुद्ध 4.41 लाख से अधिक अपराध दर्ज हुए। यानी हर दिन लगभग 1,210 मामले और औसतन हर 71 सेकंड में एक महिला के खिलाफ अपराध। इनमें सबसे अधिक मामले पति और रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता के हैं। इसके बाद दुष्कर्म, अपहरण, यौन उत्पीड़न और दहेज से जुड़े अपराध आते हैं।"

ये केवल दर्ज मामले हैं।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण बताता है कि भारत में लगभग हर तीन विवाहित महिलाओं में से एक ने अपने जीवन में पति या साथी द्वारा शारीरिक, मानसिक या यौन हिंसा झेली है। विशेषज्ञ मानते हैं कि असंख्य महिलाएँ सामाजिक बदनामी, आर्थिक निर्भरता और पारिवारिक दबाव के कारण शिकायत तक दर्ज नहीं करा पातीं।

यही भारत की असली तस्वीर है।

इसके मुकाबले हाल के वर्षों में पतियों की हत्या के कुछ चर्चित मामलों ने पूरे देश का ध्यान खींचा। ये घटनाएँ भयावह हैं और दोषियों को कठोर सज़ा मिलनी चाहिए। लेकिन ये अपवाद हैं, प्रवृत्ति नहीं।

सोशल मीडिया अपवाद को सामान्य बना देता है।

एक सनसनीखेज़ हत्या कई दिनों तक सुर्खियों में रहती है, जबकि घरेलू हिंसा झेल रही सैकड़ों महिलाएँ किसी समाचार की पात्र भी नहीं बनतीं। लगातार दिखाई जाने वाली असाधारण घटनाएँ धीरे-धीरे लोगों को यह भ्रम दे देती हैं कि अब सत्ता का संतुलन बदल गया है।

लेकिन आंकड़े इस भ्रम की पुष्टि नहीं करते।

हाँ, महिलाओं की सुरक्षा के लिए बने कुछ कानूनों के दुरुपयोग के मामले सामने आए हैं। लेकिन कुछ झूठे मामलों के कारण पूरे कानून को गलत नहीं ठहराया जा सकता।

एक और दुखद सच्चाई विधवाओं की है। भारत में करोड़ों विधवाएँ आज भी गरीबी, उपेक्षा, संपत्ति से वंचित किए जाने और सामाजिक तिरस्कार का जीवन जी रही हैं। वृंदावन जैसे शहर आज भी हजारों बेसहारा विधवाओं की पीड़ा के मौन गवाह हैं। उनका दर्द कभी वायरल नहीं होता, क्योंकि ख़ामोश पीड़ा टीआरपी नहीं देती।

एक सनसनीखेज़ हत्या एक सप्ताह तक सुर्खियाँ बना सकती है। लेकिन वह भारत की करोड़ों महिलाओं के हिस्से में आज भी दर्ज असमानता, हिंसा और भेदभाव की सदी पुरानी कहानी को नहीं बदल सकती।

Thursday, July 9, 2026

 ज़िंदाबाद असहमति,

सवाल पूछना जरूरी है!

आलोचना लोकतंत्र का पोषण है

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बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा कि सरकार की आलोचना और शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र का मूल अधिकार है, अपराध नहीं। अदालत ने केवल विरोध के आधार पर एफआईआर और निर्वासन को असंवैधानिक बताया। फैसले ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों की रक्षा पर जोर दिया, हालांकि ऐसे संरक्षण का लाभ अभी सभी असहमत नागरिकों को समान रूप से नहीं मिल रहा।

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

11 जुलाई, 2026

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ज़रा एक पल के लिए ऐसे भारत की कल्पना कीजिए, जहाँ हर नागरिक सरकार की हर बात पर "जी हुज़ूर" कहे। संसद की बहसें कुछ मिनटों में खत्म हो जाएँ। टीवी चैनलों पर बहस की जगह केवल सरकारी प्रेस नोट पढ़े जाएँ। अख़बारों के संपादकों का काम सिर्फ़ अल्पविराम और पूर्णविराम ठीक करना रह जाए। सोशल मीडिया पर हर तरफ़ एक ही नारा गूँजे; "वाह सरकार, कमाल कर दिया!"

सब कुछ शांत दिखाई देगा। कोई विवाद नहीं, कोई बहस नहीं, कोई सवाल नहीं। लेकिन उसी ख़ामोशी में लोकतंत्र धीरे-धीरे पिछले दरवाज़े से बाहर निकल जाएगा।

ख़ुशकिस्मती से भारत कभी अंधी आज्ञाकारिता पर नहीं बना। भारत बहस, तर्क और मतभेद की ज़मीन पर खड़ा हुआ है।

यूरोप में ज्ञानोदय की हवा चलने से बहुत पहले भारत में जंगलों, आश्रमों, मंदिरों, बौद्ध विहारों और गाँव की चौपालों में विचारों की खुली बहस होती थी। यहाँ तलवारें कम, विचार ज़्यादा टकराते थे।

गौतम बुद्ध ने कर्मकांड, ऊँच-नीच और अंधविश्वास पर सवाल उठाए। महावीर ने अहिंसा और समानता का रास्ता दिखाया। चार्वाक ने वेदों की सत्ता तक को चुनौती दे दी। उन्होंने कहा कि बिना प्रमाण किसी बात को मत मानो। उनके अपने ग्रंथ भले न बचे हों, लेकिन उनके विरोधियों ने भी उनके विचारों को दर्ज किया। यही किसी आत्मविश्वासी सभ्यता की सबसे बड़ी पहचान है कि वह अपने विरोधी की आवाज़ भी मिटाती नहीं।

बाद में कबीर ने मंदिर और मस्जिद दोनों में फैले पाखंड पर बराबर चोट की। रैदास ने जाति के घमंड को ललकारा। गुरु नानक ने इंसानों की बराबरी का संदेश दिया। मीराबाई ने राजसत्ता के आगे अपनी अंतरात्मा नहीं बेची। तुकाराम ने सामाजिक अन्याय के खिलाफ़ आवाज़ उठाई।

आधुनिक भारत में राजा राममोहन राय ने सती प्रथा का विरोध किया। ज्योतिराव और सावित्रीबाई फुले ने लड़कियों और वंचित समाज की शिक्षा का बिगुल बजाया। पेरियार ने अंधविश्वास और जातीय वर्चस्व पर करारा हमला किया। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने सदियों पुरानी भेदभाव की दीवारों को चुनौती दी और हमें ऐसा संविधान दिया जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की रक्षा करता है।

इनमें से कोई भी अपने समय की सत्ता का लाड़ला नहीं था। कई लोगों का मज़ाक उड़ाया गया। उन्हें समाज से अलग किया गया। जेल भेजा गया। देशद्रोही, विधर्मी या ख़तरनाक तक कहा गया। लेकिन इतिहास ने आख़िरकार सम्मान उन्हीं लोगों को दिया जिन्होंने सवाल पूछे, न कि उन्हें जिन्होंने सवाल दबाए।

भारत की आज़ादी की लड़ाई भी असहमति की मिसाल है। भगत सिंह ने कहा कि क्रांति विचारों से आती है। सुभाष चंद्र बोस ने अंग्रेज़ी हुकूमत को सीधी चुनौती दी। टीपू सुल्तान और छत्रपति शिवाजी महाराज ने विदेशी और दमनकारी सत्ता के सामने झुकने से इनकार किया। इन सबका संदेश एक था; अन्याय के सामने ख़ामोश रहना सबसे बड़ी ग़लती है।

आज लोकतंत्र उसी विरासत को आगे बढ़ाता है। सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन संविधान स्थायी है। इसी कारण संविधान का अनुच्छेद 19 हर नागरिक को अभिव्यक्ति की आज़ादी देता है। लोकतंत्र में नागरिक प्रजा नहीं होता और सरकार कोई ऐसी संस्था नहीं, जिससे सवाल न पूछा जा सके।

सर्वोच्च न्यायालय भी बार-बार यही बात दोहराता रहा है। केदारनाथ सिंह मामले में अदालत ने साफ़ कहा कि सरकार की आलोचना तब तक देशद्रोह नहीं है, जब तक वह हिंसा भड़काने की कोशिश न करे। श्रेय सिंघल मामले में अदालत ने इंटरनेट पर अभिव्यक्ति को दबाने वाले कानून को रद्द करते हुए कहा कि केवल चर्चा करना या किसी विचार का समर्थन करना अपराध नहीं हो सकता। हाल के वर्षों में भी सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि असहमति लोकतंत्र का सेफ़्टी वाल्व है। यदि यह वाल्व बंद कर दिया जाए तो एक दिन पूरा तंत्र फट सकता है।

यह बात हर सरकारी दफ़्तर की दीवार पर लिखी जानी चाहिए।

फिर भी हर कुछ साल बाद कुछ लोग यह खोज निकालते हैं कि सरकार से सवाल पूछना देशविरोध है। मानो सवाल पूछने से देश कमज़ोर हो जाता है और बिना सोचे-समझे ताली बजाने से देश मज़बूत हो जाता है।

अगर यही तर्क सही है, तो सबसे अच्छा डॉक्टर वह होगा जो कभी बीमारी न बताए। सबसे अच्छा पत्रकार वह होगा जो कभी बुरी ख़बर न छापे। और सबसे अच्छा न्यायाधीश वह होगा जो हर मुक़दमे में सरकार के पक्ष में फ़ैसला सुना दे।

सच्ची देशभक्ति ताली बजाने में नहीं, बल्कि चौकन्ना रहने में है। जो नागरिक ग़लत नीतियों पर सवाल उठाते हैं, वे अक्सर लोकतंत्र की रक्षा कर रहे होते हैं। लोकतंत्र आलोचना से बेहतर होता है, जबकि तानाशाही सिर्फ़ तारीफ़ पर पलती है।

भारत में व्यंग्य और हास्य भी हमेशा सत्ता को आईना दिखाने का ज़रिया रहे हैं। पुराने राजाओं के दरबार में विदूषक वह सच कह देता था, जिसे मंत्री भी कहने से डरते थे। जब विदूषक ख़ामोश हो जाए, तब राजा को हर ताली सच्ची लगने लगती है।

भारत की सबसे बड़ी ताक़त एक जैसी सोच नहीं, बल्कि विविधता है। यहाँ आस्तिक भी रहे, नास्तिक भी। संत भी हुए, संशयवादी भी। कवि भी हुए, क्रांतिकारी भी। तीन हज़ार साल से हम बहस करते आए हैं, फिर भी एक सभ्यता बने हुए हैं। यही हमारी असली पहचान है।

शांतिपूर्ण असहमति को दबाने से देश मज़बूत नहीं होता। केवल इतना होता है कि ग़लतियाँ समय पर दिखाई नहीं देतीं। आत्मविश्वास से भरी सरकार सवालों का जवाब तथ्यों से देती है। असुरक्षित सरकार कानून का डर दिखाती है।

इतिहास का फ़ैसला हमेशा दिलचस्प रहा है। हर पीढ़ी पहले अपने असहमत लोगों को गालियाँ देती है, फिर कुछ दशक बाद उन्हीं की मूर्तियाँ बनवाती है।

शायद समझदारी इसी में है कि मूर्ति बनाने से पहले उनकी बात सुन ली जाए।

असहमति ज़िंदाबाद।

क्योंकि असहमति लोकतंत्र की दुश्मन नहीं, उसकी सबसे पुरानी, सबसे बहादुर और सबसे वफ़ादार साथी है।

याद रहे:  " कमजोर लोकतंत्र शक्तिशाली तानाशाही से बेहतर होता है।"

Wednesday, July 8, 2026

 


करोड़ों पौधे, फिर भी सूनी धरती! आखिर हर साल हरियाली जाती कहाँ है?

12 जुलाई को आगरा में 61.88 लाख पौधे लगाने का लक्ष्य,

पर्यावरणविदों ने मांगा स्वतंत्र सामाजिक और वैज्ञानिक ऑडिट

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ब्रज खंडेलवाल द्वारा

10 जुलाई 2026

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बारिश की पहली फुहार पड़ते ही सरकारी दफ्तरों में हलचल बढ़ जाती है। पौधों से भरे ट्रक निकल पड़ते हैं। अफसर हाथ में फावड़ा लेकर कैमरों के सामने मुस्कुराते हैं। नेता पौधे लगाते हैं। रिकॉर्ड बनते हैं। प्रेस विज्ञप्तियां जारी होती हैं। हर साल करोड़ों पौधे लगाने के नए दावे किए जाते हैं।

लेकिन कुछ महीने बाद वही धरती फिर सूनी दिखाई देती है। धूप पहले से ज्यादा चुभती है। सड़कों पर छांव कम होती जाती है। तब एक सवाल हर बार हवा में तैरता है, अगर हर साल करोड़ों पौधे लगाए जा रहे हैं, तो हरियाली आखिर गायब कहां हो रही है? क्या पेड़ धरती पर उग रहे हैं या सिर्फ सरकारी फाइलों में?

उत्तर प्रदेश सरकार ने 12 जुलाई को महावृक्षारोपण अभियान के तहत 35 करोड़ से अधिक पौधे लगाने का लक्ष्य रखा है। लगभग 30 सरकारी विभाग इसमें भाग लेंगे। उपमुख्यमंत्री ने प्रदेश के सभी जिलों में 150 हाईटेक नर्सरियां स्थापित करने की घोषणा की है, जिन पर करीब 150 करोड़ रुपये खर्च होंगे। सरकार का दावा है कि इस अभियान से नया गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनेगा।

आगरा भी इस मुहिम का बड़ा हिस्सा है। जिलाधिकारी मनीष बंसल ने सभी विभागों को इसे जन आंदोलन बनाने के निर्देश दिए हैं। 12 जुलाई को सुबह सात बजे से शाम छह बजे तक पूरे जिले में वृक्षारोपण होगा। स्कूलों, कॉलेजों, ग्राम पंचायतों और कॉलोनियों में "एक स्कूल-एक गांव" थीम पर पौधे लगाए जाएंगे। स्वयंसेवी संस्थाएं, एनएसएस, रोटरी क्लब, लायंस क्लब, महिला समूह और हजारों विद्यार्थी भी इसमें शामिल होंगे।

इस वर्ष आगरा को 61 लाख 88 हजार पौधे लगाने का लक्ष्य मिला है। इनमें वन विभाग 19.68 लाख और अन्य विभाग 42.20 लाख पौधे लगाएंगे। इससे पहले 5 जून, विश्व पर्यावरण दिवस पर भी लगभग 7.94 लाख पौधे लगाने का दावा किया गया था।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक आगरा में 2018 में 20 लाख, 2019 में 28 लाख, 2020 में 38 लाख और 2021 में 45 लाख पौधे लगाए गए। वन विभाग का दावा है कि इनमें लगभग 70 प्रतिशत पौधे जीवित हैं।

यहीं से सवाल शुरू होता है।

अगर इतने पौधे सचमुच जीवित हैं, तो आगरा पहले से ज्यादा हरा-भरा क्यों नहीं दिखता? शहर का तापमान लगातार क्यों बढ़ रहा है? सड़कों के किनारे छायादार पेड़ क्यों कम होते जा रहे हैं? हर मानसून के बाद नया अभियान शुरू करने की जरूरत आखिर क्यों पड़ती है?

रिवर कनेक्ट कैंपेन से जुड़े पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि पेड़ जमीन पर कम और सरकारी कागजों में ज्यादा दिखाई देते हैं। उनका कहना है कि वृक्षारोपण की सफलता पौधे लगाने से नहीं, बल्कि तीन-चार साल बाद उनके जीवित रहने से मापी जानी चाहिए।

कुछ वर्ष पूर्व यमुना किनारे हुई घटना आज भी लोगों को याद है। तत्कालीन महापौर नवीन जैन ने नदी की तलहटी  में लगभग 12 हजार पौधे लगवाए थे। अगस्त में यमुना का जलस्तर बढ़ा और सभी पौधे बह गए। करोड़ों रुपये की मेहनत कुछ दिनों में पानी में समा गई। इस मामले की जांच आज तक पूरी नहीं हो सकी।

रिवर कनेक्ट कैंपेन की पद्मिनी अय्यर कहती हैं कि पौधे लगाना आसान है, लेकिन उन्हें बचाना मुश्किल। तीन वर्षों तक नियमित सिंचाई, सुरक्षा, खाद और निगरानी के बिना अधिकांश पौधे शुरुआती दौर में ही नष्ट हो जाते हैं। पौधे लगाने के बाद उनकी देखभाल अक्सर भगवान भरोसे छोड़ दी जाती है।

वरिष्ठ पर्यावरणविद् डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य कहते हैं कि ताज ट्रेपेजियम जोन में विकास के नाम पर हरियाली लगातार घटती गई है। यमुना एक्सप्रेसवे, आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे, रिंग रोड, फ्लाईओवर, राष्ट्रीय राजमार्गों का चौड़ीकरण और नई कॉलोनियों ने हजारों पेड़ों की बलि ले ली। इसका असर केवल पर्यावरण पर नहीं, बल्कि ताजमहल की सुरक्षा पर भी पड़ रहा है। राजस्थान की ओर से आने वाली धूल भरी हवाओं को रोकने वाली प्राकृतिक हरित पट्टी कमजोर होती जा रही है।

विडंबना यह है कि ताज ट्रेपेजियम जोन का गठन ही ताजमहल और पर्यावरण की रक्षा के लिए किया गया था। 1996 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद टीटीजेड में प्रदूषण रोकने, उद्योगों को स्थानांतरित करने और बड़े पैमाने पर ग्रीन बेल्ट विकसित करने की योजना बनी। राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (NEERI) ने भी हरित क्षेत्र बढ़ाने की सिफारिश की थी। उस समय उम्मीद जगी थी कि आगरा फिर से हरियाली की चादर ओढ़ेगा।

लेकिन तीन दशक बाद तस्वीर निराशाजनक है। टीटीजेड में वन और हरित आवरण घटकर लगभग छह प्रतिशत या उससे भी कम रह गया है, जबकि राष्ट्रीय लक्ष्य 33 प्रतिशत है। 2021 की रिपोर्ट के अनुसार 2017 से 2019 के बीच वन क्षेत्र सिकुड़कर केवल 657.71 वर्ग किलोमीटर रह गया। कई तालाब और जलाशय सूख गए या प्रदूषण की चपेट में आ गए।

2015 में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को पेड़ लगाने के बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावों पर फटकार भी लगाई थी। दूसरी ओर अवैध पेड़ कटाई लगातार जारी रही। कई मामलों में अदालतों ने प्रति पेड़ 25 हजार रुपये तक का जुर्माना लगाया। इसके बावजूद विकास परियोजनाओं ने हरियाली को लगातार निगल लिया। इसी वर्ष राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने भी टीटीजेड में पर्यावरणीय उल्लंघनों पर नोटिस जारी किया। हवा की गुणवत्ता में अपेक्षित सुधार नहीं आया। नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और सूक्ष्म धूल कणों का स्तर बढ़ता गया। कई पर्यावरण विशेषज्ञ अब टीटीजेड प्राधिकरण की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठा रहे हैं।

वृंदावन के पर्यावरण कार्यकर्ता जगन्नाथ पोद्दार कहते हैं कि कभी पूरे ब्रज में बारह बड़े वन हुआ करते थे। आज उनकी पहचान केवल धार्मिक ग्रंथों और स्थानों के नाम तक सीमित रह गई है। जंगलों की जगह अब सीमेंट और कंक्रीट का जंगल खड़ा हो गया है।

पर्यावरण प्रेमी एक और अहम सवाल उठाते हैं। जब हर साल एक्सप्रेसवे, नई सड़कें, हवाई अड्डे, टाउनशिप, मॉल और औद्योगिक परियोजनाएं हजारों एकड़ जमीन घेर रही हैं, तब हर साल करोड़ों नए पौधे लगाने के लिए इतनी खाली जमीन आखिर आती कहां से है?

एक और मुश्किल बंदरों की है। शहर और गांवों में लगाए गए हजारों पौधे बंदर उखाड़ देते हैं। कई जगह पशु भी पौधों को नुकसान पहुंचाते हैं। पौधों के चारों ओर सुरक्षा जाली, नियमित सिंचाई और निगरानी के बिना उनकी जिंदगी ज्यादा लंबी नहीं होती।

ब्रज मंडल के पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने अब तक हुए सभी वृक्षारोपण अभियानों का स्वतंत्र सामाजिक और वैज्ञानिक ऑडिट कराने की मांग की है। उनका कहना है कि केवल पौधे लगाने की संख्या गिनना काफी नहीं है। हर पौधे को जियो-टैग किया जाए, उसकी तीन साल तक निगरानी हो और जीवित पौधों की सार्वजनिक रिपोर्ट जारी की जाए। तभी जनता को असली तस्वीर मालूम होगी।

पेड़ लगाना आसान है। पेड़ बनाना मुश्किल। एक पौधे को विशाल वृक्ष बनने में वर्षों लगते हैं। उसे पानी, सुरक्षा और देखभाल चाहिए। यही जिम्मेदारी सबसे ज्यादा नदारद दिखाई देती है।

इस मानसून भी लाखों पौधे धरती में रोपे जाएंगे। कैमरे फिर चमकेंगे। रिकॉर्ड फिर बनेंगे। भाषण फिर होंगे। लेकिन असली परीक्षा अगले मानसून में होगी।

तब देश फिर वही सवाल पूछेगा; क्या इस बार पौधे सचमुच पेड़ बनेंगे, या हरियाली एक बार फिर सरकारी फाइलों की हरी स्याही तक ही महदूद रह जाएगी?

Tuesday, July 7, 2026

 अंजीर का पत्ता: क्या हम अपने इतिहास से शर्मिंदा हैं?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

8 जुलाई 2026

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देश इस समय महंगाई, बेरोजगारी, प्रदूषण और बुनियादी ढांचे जैसी बड़ी चुनौतियों से जूझ रहा है। लेकिन इसी बीच  की कक्षा 9 की कला शिक्षा की पुस्तक मधुरिमा ने एक ऐसा विवाद खड़ा कर दिया, जिसने शिक्षा, इतिहास और संस्कृति पर नई बहस छेड़ दी।

मामला मोहनजोदड़ो की विश्वप्रसिद्ध “डांसिंग गर्ल” कांस्य प्रतिमा का है। यह साढ़े चार हजार वर्ष पुरानी कलाकृति भारतीय पुरातत्व की सबसे महत्वपूर्ण धरोहरों में से एक है। वर्षों से यह अपने मूल स्वरूप में पाठ्यपुस्तकों में प्रकाशित होती रही, लेकिन इस बार इसके धड़ पर डिजिटल छाया डालकर उसे ढक दिया गया। इतिहासकारों और शिक्षाविदों ने इसे ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ बताया। बढ़ते विवाद के बाद एनसीईआरटी ने मूल चित्र बहाल करने का फैसला लिया।

इतिहासकार  ने कहा, “यह एक काल्पनिक कलाकृति बनाने जैसा है। माइकलएंजेलो की डेविड प्रतिमा पर गिरजाघर द्वारा अंजीर का पत्ता चिपकाने जैसा।” यह टिप्पणी केवल एक उपमा नहीं थी। उसने पूरे विवाद का सार सामने रख दिया।

यह केवल एक तस्वीर का विवाद नहीं, बल्कि उस सोच का सवाल है जो इतिहास को उसकी असल शक्ल में देखने से हिचकती है। अगर किसी ऐतिहासिक कलाकृति को आज के नैतिक चश्मे से बदलना शुरू कर दिया जाए, तो कल किसी मूर्ति का हाथ, किसी चित्र का चेहरा या किसी शिलालेख की पंक्तियां भी बदली जा सकती हैं। तब इतिहास तथ्य नहीं रहेगा, बल्कि हमारी सुविधानुसार गढ़ी गई कहानी बन जाएगा।

दुनिया का अनुभव भी यही बताता है। यूरोप में कभी अनेक मूर्तियों और चित्रों को नैतिकता के नाम पर ढक दिया गया था। बाद में विद्वानों ने माना कि इससे कला और इतिहास दोनों के साथ अन्याय हुआ। संग्रहालयों ने मूल स्वरूप को फिर से अपनाया और यह स्वीकार किया कि इतिहास को बदलने के बजाय उसे समझाना ही बेहतर रास्ता है।

स्कूल की किताबों में बच्चों की उम्र और संवेदनशीलता का ध्यान रखना निश्चित रूप से ज़रूरी है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि प्रमाणिक ऐतिहासिक वस्तुओं को ही बदल दिया जाए। अगर किसी कलाकृति के बारे में अतिरिक्त व्याख्या की आवश्यकता है, तो वह पाठ, टिप्पणी या शिक्षक के माध्यम से दी जा सकती है। शिक्षा का उद्देश्य सच से परिचित कराना है, सच पर पर्दा डालना नहीं।

एक प्रमुख अखबार ने इस पूरे घटनाक्रम को “इतिहास पर फ़ोटोशॉप” कहा। यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि डिजिटल संपादन केवल तस्वीर नहीं बदलता, बल्कि देखने वाले की समझ भी बदल देता है। विद्यार्थी वही सच मानते हैं जो उनकी पाठ्यपुस्तक में छपा होता है। इसलिए पाठ्यपुस्तकों में तथ्य और प्रमाणिकता की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।

भारतीय सभ्यता ने मानव शरीर को कभी शर्म का विषय नहीं माना।  और  के मंदिर,  और  की भित्तिचित्र कला और मूर्तियां इसी सोच की गवाह हैं। इनमें शरीर को वासना नहीं, बल्कि जीवन, सौंदर्य, सृजन और प्रकृति के प्रतीक के रूप में देखा गया। यही हमारी सांस्कृतिक विरासत की सबसे बड़ी खूबी रही है।

विडंबना यह है कि हम दुनिया भर में योग, आयुर्वेद और अपनी प्राचीन सभ्यता पर फ़ख्र करते हैं, लेकिन उसी विरासत की कलात्मक अभिव्यक्तियों को देखकर असहज हो जाते हैं। यह विरोधाभास हमारी सांस्कृतिक समझ पर भी सवाल खड़ा करता है।

एक हिस्टोरियन ने सही  कहा, “अगर नृत्यांगना को अपनी असली शक्ल में नहीं दिखाया जा सकता, तो भारतीय कला का अध्ययन कैसे होगा?” यह प्रश्न केवल एक प्रतिमा का नहीं, बल्कि पूरे इतिहास बोध का है।

पाठ्यपुस्तकें केवल परीक्षा पास कराने का साधन नहीं होतीं। वे आने वाली पीढ़ियों की सोच, समझ और दृष्टि का निर्माण करती हैं। अधूरा या संशोधित इतिहास अंततः अधूरी समझ ही पैदा करता है। हमारी सभ्यता हजारों वर्षों तक इसलिए जीवित रही क्योंकि उसमें आत्मविश्वास था, जिज्ञासा थी और सच का सामना करने का साहस था।

इसलिए इतिहास को अंजीर के पत्ते से ढकने के बजाय उसकी मूल गरिमा के साथ प्रस्तुत करना चाहिए। संवेदनशीलता आवश्यक है, लेकिन सत्य उससे भी अधिक आवश्यक है। सच से आँखें चुराने वाली शिक्षा कभी आत्मविश्वासी समाज का निर्माण नहीं कर सकती।

Monday, July 6, 2026

 जब खबर बिक गई, और सच हार गया!

सत्ता बाजार के आगे घुटने टेकती  पत्रकारिता 

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

5 जुलाई 2026

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मीडिया की दुनिया में अब सबसे बड़ी खबर क्या है?

यह कि खबर अब खबर नहीं रही।

वह एक उत्पाद बन गई है। बिकती है। पैक होकर आती है। सजती है। चमकती है। और फिर दर्शकों के सामने परोस दी जाती है। सच कहीं पीछे छूट जाता है। उसकी जगह ले लेते हैं प्रचार, सनसनी और कारोबार।

कभी पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कही जाती थी। पत्रकार सत्ता की आंखों में आंखें डालकर सवाल पूछते थे। जेल जाते थे। मुकदमे झेलते थे। धमकियां सहते थे। लेकिन कलम नहीं झुकाते थे।

आज तस्वीर बदल गई है। खबर और प्रचार के बीच की दीवार गिर चुकी है। जनसंपर्क यानी पीआर और पत्रकारिता अब कई जगह एक ही सिक्के के दो पहलू दिखाई देते हैं। सत्ता जो कहना चाहती है, वही सुर्खियां बन जाती हैं। जो सवाल पूछता है, उसे अक्सर किनारे कर दिया जाता है।

आज न्यूज़रूम का सबसे ताकतवर आदमी संपादक नहीं, विज्ञापनदाता है। वही तय करता है कि कौन-सी खबर चलेगी और कौन-सी दब जाएगी। अगर किसी खबर से बड़े कारोबारी या राजनीतिक हित प्रभावित होते हों, तो कई बार वह खबर पैदा होने से पहले ही दम तोड़ देती है।

भारत में मीडिया का बड़ा हिस्सा अब कुछ गिने-चुने हाथों में सिमट चुका है। हिंदी के चार बड़े अखबार अधिकांश पाठकों तक पहुंचते हैं। कई बड़े टीवी नेटवर्क भी विशाल कॉरपोरेट घरानों के नियंत्रण में हैं। ऐसे माहौल में पूरी तरह स्वतंत्र पत्रकारिता करना आसान नहीं रह जाता। मालिक का कारोबार और संपादक की कलम हमेशा एक ही दिशा में नहीं चल सकते।

इधर पीआर एजेंसियों ने भी पत्रकारिता का चेहरा बदल दिया है। तैयार प्रेस विज्ञप्तियां, चमकदार तस्वीरें, पहले से लिखे बयान और वीडियो सीधे न्यूज़रूम में पहुंच जाते हैं। समय की कमी और लागत बचाने की मजबूरी में कई संस्थान इन्हें लगभग ज्यों का त्यों खबर बना देते हैं।

नतीजा सामने है। किसान की तकलीफ पीछे छूट जाती है। बेरोज़गार युवा की कहानी जगह नहीं पाती। प्रदूषण, जल संकट, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे छोटे कोने में सिमट जाते हैं। लेकिन किसी उत्पाद की लॉन्चिंग, किसी फ़िल्मी सितारे की पार्टी या सरकारी कार्यक्रम को घंटों का प्रसारण मिल जाता है।

खोजी पत्रकारिता कभी इस पेशे की पहचान थी। एक ख़बर सरकारें गिरा देती थी। बड़े-बड़े घोटाले उजागर होते थे। आज ऐसे उदाहरण कम दिखाई देते हैं। इसकी एक वजह डर भी है। मुकदमे, कानूनी दबाव, आर्थिक संकट और नौकरी जाने का भय। प्रेस स्वतंत्रता से जुड़े अंतरराष्ट्रीय सूचकांक भी यही संकेत देते हैं कि स्वतंत्र पत्रकारिता पहले से अधिक कठिन होती जा रही है।

टीवी चैनलों की बहसें देखिए। हर शाम वही चेहरे। वही चीख-पुकार। वही तयशुदा संवाद। एंकर कई बार सवाल पूछने वाले पत्रकार कम और किसी पक्ष के वकील ज़्यादा लगते हैं। बहस कम होती है, शोर ज़्यादा होता है। दर्शक जानकारी लेकर नहीं, उलझन लेकर उठता है।

आज तर्क की जगह तमाशा बिकता है। तथ्य से ज़्यादा तेज़ आवाज़ मायने रखती है। वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों से ज़्यादा जगह कई बार ज्योतिषियों, स्वयंभू बाबाओं और सनसनी फैलाने वालों को मिलती है। सोशल मीडिया की रफ्तार ने भी इस बीमारी को बढ़ाया है। पहले खबर की पुष्टि होती थी, अब पहले वायरल होना ज़रूरी समझा जाता है।

प्रेस की आज़ादी का मतलब कभी सत्ता से सवाल पूछने की आज़ादी था। आज कई जगह इसका मतलब बदलता दिखाई देता है। कुछ मीडिया संस्थान सरकारों और बड़े कॉरपोरेट घरानों के साथ इतने करीब हो गए हैं कि आलोचना उन्हें नागवार गुजरती है। सत्ता की प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवाल कम और तारीफ ज़्यादा सुनाई देती है। कई नेता अब कठिन सवालों से बचते हुए सीधे सोशल मीडिया के ज़रिए जनता तक अपना संदेश पहुंचा देते हैं। संवाद की जगह एकतरफा प्रसारण ने ले ली है।

यह संकट केवल भारत का नहीं है। दुनिया के कई लोकतांत्रिक देशों में मीडिया पर लोगों का भरोसा लगातार घट रहा है। लोगों को लगता है कि खबरें निष्पक्ष कम और झुकाव वाली ज़्यादा हो गई हैं। 

हर साल पत्रकारिता के कॉलेज हजारों नए छात्र तैयार कर रहे हैं। लेकिन अच्छी पत्रकारिता केवल डिग्री से नहीं आती। उसके लिए भाषा पर पकड़ चाहिए। इतिहास और समाज की समझ चाहिए। सबसे बढ़कर ईमानदारी चाहिए। अफ़सोस, क्लिकों की दौड़, कम वेतन और नौकरी की असुरक्षा ने नए पत्रकारों पर भी गहरा असर डाला है। बहुत से युवाओं के लिए पत्रकारिता अब केवल पीआर या डिजिटल इन्फ्लुएंसर बनने की सीढ़ी बनकर रह गई है।

इसका सबसे बड़ा नुकसान आम नागरिक उठाता है। जब उसे पूरी और सही जानकारी नहीं मिलती, तब अफ़वाहें फैलती हैं। समाज खेमों में बंटता है। लोग एक-दूसरे को सुनना छोड़ देते हैं। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत, यानी जागरूक नागरिक, धीरे-धीरे भ्रमित नागरिक में बदलने लगता है।

पत्रकारिता का काम सरकार गिराना नहीं है। उसका काम सरकार से सवाल पूछना है। उसका काम किसी दल का विरोध या समर्थन करना नहीं, बल्कि जनता के हित की हिफाज़त करना है। पत्रकार अगर दरबारी बन जाएगा, तो जनता की आवाज़ कौन बनेगा?

सच बोलना कभी आसान नहीं रहा। लेकिन इतिहास गवाह है कि वही समाज आगे बढ़ते हैं, जहां पत्रकार सवाल पूछने से नहीं डरते। जहां कलम बिकती नहीं, झुकती नहीं और सत्ता के दरबार में सलाम करने के बजाय जनता के दरवाज़े पर खड़ी रहती है।

जिस दिन खबर फिर से सच की तरफ लौटेगी, उसी दिन पत्रकारिता भी अपनी खोई हुई इज़्ज़त वापस पा लेगी। वरना अख़बार छपते रहेंगे, चैनल चलते रहेंगे, मोबाइल पर नोटिफिकेशन बजते रहेंगे, लेकिन सच धीरे-धीरे हमारी आंखों के सामने दम तोड़ देगा। और तब सबसे बड़ा नुकसान किसी पत्रकार का नहीं, पूरे लोकतंत्र का होगा।

Friday, July 3, 2026

 


शादी का न्योता, वंदे भारत का सफर और बदलते भारत की नई रेल कहानी

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पटरियों पर दौड़ता नया हिंदुस्तान, मुस्कुराता मध्यवर्ग और मजबूत होती राष्ट्रीय एकता

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बृज खंडेलवाल द्वारा

4 जुलाई 2026

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एक ज़माना था, जब शादी का कार्ड मिलते ही सबसे पहले रेल यात्रा की चिंता शुरू हो जाती थी। टिकट मिलेगा या नहीं? ट्रेन समय पर चलेगी या नहीं? भीड़ कितनी होगी? रात कैसे कटेगी? बच्चे संभलेंगे या नहीं?बिस्तरबंद, संदूकों, सुराही, खाने में पूरी सब्जी, नमकीन, डकार के लिए चूर्ण! फुल टेंशन।

आज तस्वीर बदल रही है।

इस सप्ताह चेन्नई में हमारे परिवार की एक शादी है। लेकिन यह सिर्फ एक शादी नहीं, बदलते भारत की एक खूबसूरत राष्ट्रीय एकता की  कहानी भी है। रिश्तेदार देश के अलग-अलग शहरों से आ रहे हैं। कोई बेंगलुरु से, कोई कोयंबटूर से, लड़के वाले दिल्ली से,  रिश्तेदार हैदराबाद से और कोलकाता से भी। हम दोनों, मैं और मेरी पत्नी, मैसूर से वंदे भारत एक्सप्रेस में सवार हुए और पांच घंटे में बैंगलोर होकर चेन्नई पहुंचे।

सफर शुरू होते ही लगा कि मंज़िल से पहले ही जश्न शुरू हो गया है।

कोच चमचमा रहा था। सीटें आरामदेह थीं। झटके नाममात्र के थे। न खाने की फिक्र, न पानी की चिंता। गर्मागर्म नाश्ता और चाय अपनी सीट पर ही मिल गए। साफ-सुथरे शौचालय, शांत माहौल और बड़ी खिड़कियों से बाहर भागते खेत, पहाड़ और गांव।

चेन्नई कब आ गया, पता ही नहीं चला।

स्टेशन पर उतरे तो ऐसा नहीं लगा कि कई घंटे की यात्रा करके आए हैं। हम सीधे शादी की रौनक में शामिल होने के लिए तैयार थे।

यही सबसे बड़ा बदलाव है।

एक समय रेल यात्रा अपने आप में इम्तिहान होती थी। लोग घर से पूड़ी-सब्ज़ी, अचार, पानी की बोतलें और दवाइयों का थैला लेकर चलते थे। पूरी रात सामान की रखवाली करनी पड़ती थी। शादी में पहुंचते-पहुंचते आधी थकान चेहरे पर साफ दिखाई देती थी।

आज वंदे भारत ने सफर की पूरी तासीर बदल दी है।

अब यात्रा बोझ नहीं, छुट्टियों और खुशियों का हिस्सा बन गई है।

भारत का नया आकांक्षी मध्यवर्ग यही चाहता था। वह हवाई यात्रा जितना आराम चाहता है, लेकिन परिवार के साथ रेल यात्रा का अपनापन भी नहीं छोड़ना चाहता। वंदे भारत ने दोनों के बीच का रास्ता निकाल दिया है।

ट्रेन के भीतर भी भारत की एक छोटी-सी तस्वीर दिखाई देती है। कोई लैपटॉप पर काम कर रहा है। बच्चे खिड़की से बाहर झांक रहे हैं। बुजुर्ग आराम से अखबार पढ़ रहे हैं। अलग-अलग भाषाएं सुनाई देती हैं, लेकिन मुस्कान की भाषा सबकी एक होती है। मोबाइल प्रेम इतना बढ़ गया है, की पहले जैसे आपस में अजनबी बात नहीं करते! 


भारतीय रेल केवल लोहे की पटरियां और इंजन नहीं है। यह देश की धड़कन है। यह गांवों को शहरों से, पहाड़ों को समुद्र से और दिलों को दिलों से जोड़ती है।

आज भारतीय रेल दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्कों में शामिल है। करीब 68 हजार किलोमीटर लंबे नेटवर्क पर रोज़ लगभग 13 हजार यात्री ट्रेनें दौड़ती हैं। हर दिन 2 करोड़ 30 लाख से अधिक लोग रेल से सफर करते हैं। यानी कई देशों की पूरी आबादी से भी ज़्यादा लोग रोज़ भारतीय रेल पर भरोसा करते हैं।

साल 2019 में पहली वंदे भारत एक्सप्रेस नई दिल्ली और वाराणसी के बीच शुरू हुई थी। आज 2026 तक देश के अलग-अलग हिस्सों में 160 से अधिक वंदे भारत सेवाएं चल रही हैं। इन ट्रेनों का निर्माण चेन्नई की इंटीग्रल कोच फैक्टरी में 'मेक इन इंडिया' अभियान के तहत हुआ है। यह केवल एक ट्रेन नहीं, बल्कि आत्मविश्वास से भरे नए भारत की पहचान बन चुकी है।

समय की बरबादी और सिरदर्दियों से तो बचते ही हैं, इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि रिश्ते और भी करीब आ गए हैं।

अब मैसूर का परिवार आराम से चेन्नई की शादी में शामिल हो सकता है। बेंगलुरु का बेटा सुबह निकलकर दोपहर तक घर पहुंच सकता है। बुजुर्ग बिना ज़्यादा थके बच्चों और पोते-पोतियों से मिलने जा सकते हैं।

रेल अब केवल यात्रियों को नहीं, उम्मीदों को भी मंज़िल तक पहुंचा रही है।

यह भी सच है कि भारतीय रेल की असली ताकत केवल वंदे भारत नहीं है। लाखों लोगों के लिए आज भी साधारण मेल, एक्सप्रेस और पैसेंजर ट्रेनें जीवनरेखा हैं। किसान, मज़दूर, छात्र, व्यापारी और तीर्थयात्री, सबके लिए रेल बराबरी का सफर उपलब्ध कराती है।

इसी बराबरी में भारत की असली ताकत छिपी है।

रेल हमें केवल एक शहर से दूसरे शहर नहीं ले जाती। वह हमें एक-दूसरे के और करीब भी ले आती है। रास्ते में मिलने वाले लोग, बदलते नज़ारे, अलग-अलग बोलियां और साझा मुस्कानें हमें याद दिलाती हैं कि विविधता के बावजूद हम एक ही देश की संतान हैं।

इस बार चेन्नई की शादी में हमारे परिवार को जोड़ने का काम केवल रिश्तों ने नहीं किया। वंदे भारत ने भी उतनी ही अहम भूमिका निभाई।

कभी-कभी राष्ट्र निर्माण बड़े-बड़े भाषणों से नहीं होता। वह तब होता है, जब दादा-दादी बिना थके शादी में पहुंच जाएं। जब बच्चे सफर का आनंद लें। जब रिश्तेदार समय पर मिलें। जब यात्रा शिकायत नहीं, खुशगवार याद बन जाए।

भारतीय रेल पिछले 170 वर्षों से देश को जोड़ती आई है। वंदे भारत उस लंबी यात्रा का नया पड़ाव है। यह केवल तेज़ रफ्तार ट्रेन नहीं, बल्कि उस नए भारत की तस्वीर है जो अपने नागरिकों को सुविधा, सम्मान और बेहतर जीवन देना चाहता है।

मैसूर से चेन्नई तक के इस सफर में हमने सिर्फ दूरी तय नहीं की। हमने बदलते भारत की रफ्तार को अपनी आंखों से देखा, महसूस किया और जिया।