Wednesday, May 20, 2026

 


यमुना नदी में सीवेज, मलबा, इंडस्ट्रियल वेस्ट और लाशें बह रही हैं, और सरकारी तंत्र मूक दर्शक बना खड़ा है

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बृज खंडेलवाल द्वारा

21 मई 2026

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यमुना छठ पर विशेष रिपोर्ट

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12 मई 2026 की शाम आगरा के एक घाट पर जो हुआ, वह कोई संयोग या महज़ दुर्भाग्य नहीं था। जन्मदिन मनाने आए छह युवा यमुना में उतरे। दो घंटे तक उन्हें बचाने की कोशिशें चलती रहीं, लेकिन अंततः चार बच्चों के शव बाहर निकाले गए। आए दिन ये दुर्घटनाएं हो रही हैं। पुलिस ने घाटों पर होर्डिंग्स लगाए हैं, सावधान किया है, पर लोग हैं कि मानते नहीं। वाकई, परिवारों का दुख शब्दों से परे है। वही यमुना, जिसके किनारे हमारी आस्था, इतिहास और सभ्यता सांस लेती आई है, आज मौत की गवाह बनती जा रही है।

इस घटना से कुछ ही सप्ताह पहले वृंदावन के केशी घाट पर नाव पलटने से 15 से अधिक तीर्थयात्रियों की मौत हुई थी। नाव में क्षमता से अधिक सवारियाँ थीं। लाइफ जैकेट नहीं थीं। निगरानी लगभग नदारद थी। सवाल यह है कि आखिर हर हादसे के बाद केवल शोक और मुआवज़े की रस्म क्यों निभाई जाती है?

इन घटनाओं को केवल “दुर्घटना” कहना सच्चाई से आँख चुराना होगा। यह प्रशासनिक विफलता, सरकारी लापरवाही और टूटी हुई व्यवस्था का नतीजा है। जब नदी जहरीली हो, उसका प्राकृतिक बहाव सिकुड़ चुका हो, सुरक्षा इंतज़ाम कागज़ों में सिमट जाएँ और निगरानी तंत्र सोया रहे, तब मौतें केवल समय का इंतज़ार बन जाती हैं। अरबों रुपये खर्च होने के दावों के बावजूद ज़मीनी हालात जस के तस हैं।

यमुना की हालत किसी से छिपी नहीं। लगभग 1,376 किलोमीटर लंबी यह नदी हिमालय से निकलकर हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश से गुजरती है। लेकिन दिल्ली के बाद इसका बड़ा हिस्सा एक बहती हुई नाली में बदल जाता है। करोड़ों लीटर बिना शोधन का सीवेज प्रतिदिन नदी में गिरता है। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट या तो अधूरे हैं, या उनकी क्षमता कम है, या फिर वे ठीक से चल ही नहीं रहे। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और अन्य पर्यावरणीय रिपोर्टें बार-बार बता चुकी हैं कि नदी में बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड और फीकल कॉलिफॉर्म का स्तर सुरक्षित सीमा से कई गुना ऊपर है। कई जगह पानी नहाने लायक भी नहीं बचा।

दिल्ली का प्रदूषण मथुरा, वृंदावन और आगरा तक पहुँचता है। धार्मिक नगरी होने के कारण इन शहरों के घाटों पर हर दिन भारी भीड़ उमड़ती है, लेकिन दूसरी ओर नाले सीधे नदी में गिरते रहते हैं। आगरा में ताजमहल के पीछे बहती यमुना अक्सर झाग, काले पानी और बदबू के कारण चर्चा में रहती है। यह केवल सौंदर्य का प्रश्न नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरणीय आपदा का संकेत है।

समस्या यहीं खत्म नहीं होती। यमुना की बाढ़ पट्टी पर तेजी से अतिक्रमण हुआ है। वृंदावन और मथुरा क्षेत्र में ड्रोन सर्वेक्षणों में सैकड़ों अवैध निर्माण सामने आए। नदी का प्राकृतिक फैलाव सिकुड़ता गया। जहाँ पानी फैलकर खुद को साफ करता था, वहाँ अब कंक्रीट और अवैध कॉलोनियाँ खड़ी हैं। नतीजा साफ है : जल ठहराव बढ़ा, प्रदूषण जमा हुआ और नदी का दम घुटने लगा। दुखद यह है कि ऐसे अतिक्रमण अक्सर प्रभावशाली लोगों के संरक्षण में पनपते हैं।

तीन दशक से योजनाएँ बन रही हैं। यमुना एक्शन प्लान आया। राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के तहत परियोजनाएँ चलीं। हजारों करोड़ रुपये खर्च होने के दावे किए गए। लेकिन सवाल वही है : अगर इतना पैसा लगा, तो नदी अब भी ज़हरीली क्यों है? अधूरी पाइपलाइनें, बंद पड़े प्लांट, कमजोर निगरानी और भ्रष्ट तंत्र ने योजनाओं को कागज़ी सफलता में बदल दिया। जनता को यह जानने का अधिकार है कि पैसा कहाँ गया, किसने निगरानी की और जवाबदेही किसकी तय हुई।

घाटों पर सुरक्षा व्यवस्था भी बेहद कमजोर है। आगरा के बल्केश्वर घाट सहित कई स्थानों पर न तो पर्याप्त लाइफगार्ड हैं, न गहराई के स्पष्ट संकेत, न मजबूत बैरियर और न ही आपातकालीन बचाव तंत्र। नाव संचालन में भी भारी लापरवाही है। क्षमता से अधिक यात्रियों को बैठाना आम बात है। फिटनेस सर्टिफिकेट और लाइफ जैकेट जैसे नियम केवल औपचारिकता बन चुके हैं।

रेत खनन ने स्थिति को और खतरनाक बना दिया है। अवैध खनन से नदी तल में गहरे गड्ढे और अदृश्य भंवर बन गए हैं। ऊपर से शांत दिखने वाला पानी अचानक किसी को निगल लेता है। यह केवल पर्यावरणीय अपराध नहीं, बल्कि सीधे-सीधे मानव जीवन से खिलवाड़ है।

सबसे बड़ी विफलता विभागों के बीच तालमेल की कमी है। जल शक्ति मंत्रालय, नगर निगम, विकास प्राधिकरण, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य सरकार :  सबकी जिम्मेदारियाँ अलग-अलग बंटी हैं, लेकिन समन्वय लगभग गायब है। हर हादसे के बाद फाइलें चलती हैं, बैठकें होती हैं, बयान दिए जाते हैं, फिर सब ठंडा पड़ जाता है।

न्यायालयों और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने समय-समय पर सख्त निर्देश दिए हैं। सीवेज रोकने, अतिक्रमण हटाने और नदी संरक्षण के आदेश जारी हुए। लेकिन अधिकतर आदेश कागज़ों तक सीमित रह गए। बिना सख्त निगरानी और जवाबदेही के आदेश केवल सरकारी फाइलों की शोभा बन जाते हैं।

अब केवल भाषणों से काम नहीं चलेगा। ठोस और तत्काल कार्रवाई की जरूरत है।

सबसे पहले, नदी में गिरने वाले सभी नालों को तत्काल ट्रीटमेंट प्लांट से जोड़ा जाए और बंद पड़े प्लांट 30 दिनों के भीतर चालू किए जाएँ। घाटों पर प्रशिक्षित लाइफगार्ड, गहराई संकेतक, चेतावनी बोर्ड और आपातकालीन बचाव व्यवस्था अनिवार्य हो। नाव संचालन पर सख्ती से नियम लागू किए जाएँ और हर नाव में लाइफ जैकेट अनिवार्य हो।

वृंदावन, मथुरा और आगरा की बाढ़ पट्टी में बने अवैध निर्माणों को चिन्हित कर पारदर्शी तरीके से हटाया जाए। अवैध रेत खनन पर तत्काल रोक लगे और दोषी अधिकारियों तथा माफिया पर आपराधिक कार्रवाई हो। यमुना में न्यूनतम जल प्रवाह सुनिश्चित करने के लिए जल प्रबंधन नीतियों की समीक्षा जरूरी है। सबसे महत्वपूर्ण, हर परियोजना का सार्वजनिक ऑडिट हो और उसकी प्रगति रिपोर्ट जनता के सामने रखी जाए।

ये माँगें कठोर जरूर हैं, लेकिन हालात उससे कहीं अधिक भयावह हैं। राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना कोई बदलाव संभव नहीं। जब तक प्रशासनिक अधिकारियों और राजनीतिक नेतृत्व की व्यक्तिगत जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक योजनाएँ केवल घोषणाओं में ही जीवित रहेंगी।

यमुना केवल एक नदी नहीं है। यह ब्रज की स्मृति, संस्कृति और जनजीवन की धड़कन है। इसके किनारे पीढ़ियाँ पली हैं। अगर यह नदी मरती है, तो केवल पर्यावरण नहीं मरता : समाज, संस्कृति और भविष्य भी घायल होते हैं।

कन्हा, महक, रिया और विक्की केवल चार नाम नहीं हैं। वे हमारी सामूहिक उदासीनता की कीमत हैं। केशी घाट और आगरा के हादसे चेतावनी हैं कि अब भी अगर हमने आँखें बंद रखीं, तो आने वाले वर्षों में ऐसी त्रासदियाँ और बढ़ेंगी।

सरकार के पास अभी भी अवसर है। पारदर्शिता दिखाई जाए, जवाबदेही तय की जाए और जनता को साझेदार बनाकर यमुना को पुनर्जीवित करने की गंभीर शुरुआत की जाए। नागरिकों को भी जागना होगा। सवाल पूछने होंगे। रिपोर्ट माँगनी होगी। स्थानीय निगरानी में भाग लेना होगा।

क्योंकि जब नदियाँ मरती हैं, तब सभ्यताएँ भी धीरे-धीरे दम तोड़ने लगती हैं। यमुना को बचाना केवल एक नदी को बचाना नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति, अपनी स्मृतियों और आने वाली पीढ़ियों को बचाना है।

आज भी समय है। फैसला हमें करना है : क्या हम यमुना को किस्मत के हवाले छोड़ देंगे, या समझदारी, संवेदनशीलता और कार्रवाई से उसका भविष्य बचाएँगे?


 


यमुना नदी में, सीवेज, मलवा, इंडस्ट्रियल वेस्ट और लाशें बह रही हैं, और सरकारी तंत्र मूक,  लाचार चश्मदीद बना खड़ा है

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

21 मई 2026

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12 मई 2026 की शाम आगरा के एक घाट पर जो हुआ, वह संयोग या दुर्भाग्य नहीं था। जन्मदिन मनाने आए छह युवा नदी में उतरे; दो घंटे तक बचाने की कोशिशें चलीं, पर चार बच्चों के शव निकले। पीड़ित परिवारों का शोक अपूरणीय है। वही यमुना, जिसके किनारे हमारी इतिहास‑कथाएँ, आरतियाँ और आस्थाएँ जुड़ी हैं, आज मौत की गवाही दे रही है। इस घटना के ठीक कुछ हफ्ते पहले वृंदावन के केशी घाट पर भी एक नाव पलटी थी, जिसमें 15‑16 तीर्थयात्रियों की मौत हुई, नाव में अधिक सवारियाँ, बिना लाइफ जैकेट के संचालन और निगरानी का अभाव मुख्य कारण बताया गया।

इन हादसों को केवल दुर्घटना कहना कानूनी और नैतिक दोनों तरह से हर्ज़ है। यह प्रणालीगत विफलता और व्यापक लापरवाही का परिणाम है, न सिर्फ स्थानीय प्रशासन की, बल्कि राज्य और केंद्रीय संस्थाओं की भी। जब नदी ही जहरीली है, संरक्षण का दायरा सिकुड़ चुका है और सुरक्षा मानक सिर्फ घोषणाओं में रह गए हैं, तब मानव जीवन का जोखिम बढ़ना स्वाभाविक है। सरकारों के वादों और खर्चों के बावजूद जमीन पर स्थितियाँ नहीं बदलीं।

यमुना की मौजूदा हालत समझने के लिए कुछ ठोस तथ्य देखें। यमुना की कुल लंबाई लगभग 1,376 किलोमीटर है और यह हिमालय की पिघलती चोटियों से उठकर उत्तर प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली होते हुए पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में बहती है। एनवायरनमेंटल मॉनिटर्स और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली के पास के हिस्से में कुल प्रदूषण का बहुत बड़ा हिस्सा उत्पन्न होता है। दिल्ली से प्रतिदिन करोड़ों लीटर सीवेज का रिसाव यमुना में होता रहा है; कई ट्रीटमेंट प्लांट हैं, पर पाइपलाइन अधूरी, प्लांट की क्षमता सीमित या संचालन ठप मिलती है। सीपीसीबी और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्टों में बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड और फीकल कॉलिफॉर्म के उच्च स्तर दर्ज हैं, जो नहाने के काबिल पानी से बहुत ऊपर हैं। उदाहरण के तौर पर दिल्ली के कुछ नापों में फीकल कॉलिफॉर्म हजारों से लेकर लाखों MPN प्रति 100 मिलीलीटर पाए गए, सुरक्षित मानक से कई गुना अधिक। ये आँकड़े सार्वजनिक रिपोर्टों और सर्वे रिपोर्टों में दर्ज हैं।

प्रदूषण दिल्ली से शुरू होकर आगरा, मथुरा और वृंदावन तक पहुँचता है। मथुरा और वृंदावन में धार्मिक गतिविधियों के चलते घाटों पर जनसैलाब होता है; वहीँ बिना उपचार के नाले सीधे नदी में गिरते हैं। आगरा में ताजमहल के पास यमुना का पानी झाग और गंदगी के कारण अक्सर चर्चा में रहता है। स्थानीय नागरिक और पर्यावरणविद यह कहते रहे हैं कि किसी ऐतिहासिक धरोहर के पास बहने वाली नदी का ऐसा हाल न सिर्फ पर्यटन के लिए नुकसानदेह है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा है।

अतिक्रमण और अवैध निर्माण समस्या को और बढ़ाते हैं। ड्रोन सर्वे और अन्य भू‑अवलोकन ने वृंदावन के बाढ़ पट्टी और किनारों पर सैकड़ों अवैध निर्माण दर्शाए हैं। 2025 के कुछ सर्वे में वृंदावन के बाढ़ क्षेत्र में कई सौ अवैध संरचनाएँ सामने आईं। जब नदी का प्राकृतिक दायरा सिकुड़ता है, बहाव बाधित होता है और जल का ठहराव बढ़ता है; इससे पानी का स्वच्छता स्तर गिरता है और प्लास्टिक, सीवेज व औद्योगिक अपशिष्ट का जमाव बढ़ता है। अतिक्रमण अक्सर स्थानीय शक्तिशाली वर्गों के संरक्षण में होता है, जिससे उचित कार्रवाई नहीं हो पाती।

सरकारी योजनाएँ और खर्च भी यहाँ संदिग्धता पैदा करते हैं। 1990 के दशक से अलग‑अलग योजनाएँ चलीं: यमुना एक्शन प्लान, राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन से जुड़े कार्यक्रम और अन्य परियोजनाएँ। अरबों रुपये खर्च किए जाने का दावा है, पर कई जगहों पर ट्रीटमेंट प्लांट अधूरी पाइपलाइन, बंद इकाइयाँ या अपर्याप्त संचालन के कारण प्रभावी नहीं रहे। इस असंगति का असर साफ दिखता है: निवेश जहाँ होना चाहिए था, वहाँ परिणाम कम दिखे। इससे नागरिकों में सवाल उठते हैं, वित्त कहाँ गया, परियोजनाओं की निगरानी और ऑडिट किसने की, जवाबदेही किसकी है।

जीवित निगरानी और आपदा प्रबंधन के अभाव ने कई मौतों को आम बना दिया है। आगरा के बल्केश्वर घाट जैसी जगहों पर घाट का डिजाइन, गहराई‑मार्किंग, बेरियर, लाइफगार्ड की नियुक्ति और आकस्मिक बचाव व्यवस्था की कमी थी। वाहन या नाव संचालन की मानक गतिविधियाँ: लाइफ जैकेट का अनिवार्य इस्तेमाल, नावों का फिटनेस सर्टिफिकेट, क्षमता नियंत्रण और सीसीटीवी निगरानी: इनका अनुपालन अक्सर नहीं किया जाता। रेत खनन ने नदी तल को असमान कर दिया है; अनियंत्रित खनन से तल में गहरे गड्ढे और भंवर बन गए हैं जो सतह से अप्रकट होते हैं और तैरने वाले लोगों के लिए जानलेवा सिद्ध होते हैं। इन सबका दायरा सिर्फ तकनीकी नहीं, बल्कि प्रशासनिक और कानूनी भी है।

प्रमुख समस्या कई विभागों के बीच समन्वय की कमी है। जल शक्ति मन्त्रालय, राज्य सरकार, नगर निगम, विकास प्राधिकरण और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड: ये सभी अलग जिम्मेदारियाँ निभाते हैं, पर अंतर्निहित तालमेल की कमी से कार्य अक्सर ढीला पड़ जाता है। यमुना जैसे पारिस्थितिक तंत्र को बचाने के लिए एक संयुक्त प्रशासनिक फ्रेमवर्क चाहिए, जिसमें समयबद्ध लक्ष्यों, पारदर्शी फंडिंग और सार्वजनिक ऑडिट का स्पष्ट तंत्र हो। राजनीति में इस मुद्दे का इस्तेमाल चुनावी वादों के लिए होता है, पर चुनावों के बाद दीर्घकालिक नीतियाँ और निगरानी गायब रहती है।

न्यायालयों और पर्यावरण ट्रिब्यूनलों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल और उच्च न्यायालय ने समय‑समय पर निर्देश जारी किए हैं: सीवेज ट्रीटमेंट बढ़ाने, अतिक्रमण हटाने और नदियों की बहाल व्यवस्था के आदेश दिए गए हैं। पर समस्या यह है कि कई बार ये आदेश प्रकृति में कागजी ही रह जाते हैं; आदेशों का पालन सुनिश्चित करने के लिए नियमित निगरानी, अनुशासनात्मक कार्रवाई और समय सीमा का पालन जरूरी है। बिना कठोर पालन के नोटिस भी रिक्त घोषणाएँ बनकर रह जाते हैं।

अब समय है मांगों का, न सिर्फ नारेबाजी का। यमुना और उससे जुड़े समुदायों की सुरक्षा और नदी‑पुनरुद्धार के लिए ठोस उपाय तत्काल लागू होने चाहिए। कुछ तत्काल और व्यावहारिक कदम जो लागू होने चाहिए, वे निम्न हैं:

1. नदी किनारे के सभी नालों और सीवरेज आउटलेट को प्राथमिकता के आधार पर ट्रीटमेंट प्लांट से जोड़ा जाए और 30 दिनों के भीतर बंद प्लांट को चालू किया जाए। इसके लिये केंद्रीय और राज्य स्तर पर संयुक्त निगरानी टीम गठित की जाए और सार्वजनिक रिपोर्टिंग अनिवार्य हो।

2. घाटों पर जीवनरक्षक सुविधाएँ अनिवार्य की जाएँ: प्रशिक्षित लाइफगार्ड, स्पष्ट गहराई‑मार्किंग, दृढ़ बेरियर और रियल‑टाइम धारा चेतावनी प्रणाली। घाटों का संरचनात्मक निरीक्षण रेलवे जैसी नियमितता से किया जाए।

3. नाव संचालन पर सख्त नियम लागू हों—प्रत्यक्ष क्षमता सीमाएँ, हर नाव पर लाइफ जैकेट अनिवार्य, फिटनेस सर्टिफिकेट अनिवार्य और उल्लंघन पर लाइसेंस रद्द एवं दंडात्मक कार्रवाई। यात्रियों की संख्या पर कठोर निगरानी रखी जाए।

4. वृंदावन‑मथुरा‑आगरा के बाढ़ पट्टी में पाए गए अवैध निर्माणों की स्वतः पहचान के लिए उपग्रह और ड्रोन सर्वे नियमित रूप से हो और अनुमत समयसीमा के भीतर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई पारदर्शी ढंग से की जाए। किसी भी तरह का राजनीतिक प्रोटेक्शन स्वीकार नहीं किया जाएगा।

5. रेत खनन पर तत्काल प्रतिबंध और जो अवैध खनन पाया जाए, उसके खिलाफ कड़ी आपराधिक और आर्थिक कार्रवाई की जाए। जिन अधिकारियों की मिलीभगत पाई जाए उनकी संपत्ति जब्त करने और मुकदमा चलाने जैसी रोक‑थाम की व्यवस्था लागू हो।

6. यमुना को पारिस्थितिक दृष्टि से सुदृढ़ करने के लिये न्यूनतम निर्बाध जलप्रवाह सुनिश्चित करने के उद्देश्य से जलप्रबंधन नीतियाँ लागू की जाएं। सहायक नदियों एवं धाराओं के बहाव को बहाल करने के लिए जल आवंटन और सिंचाई नीतियों में समन्वय अत्यावश्यक है।

7. सार्वजनिक पारदर्शिता और जवाबदेही के लिये हर परियोजना का आर्थिक ऑडिट सार्वजनिक किया जाए और परियोजना के समय‑समय पर प्रगति‑रिपोर्ट नागरिक मंचों पर उपलब्ध कराई जाए। कोई भी खर्च बिना स्वतंत्र ऑडिट के स्वीकृत नहीं किया जाए।

ये मांगें कठोर हैं, पर आवश्यक भी। राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना कोई भी नीति टिकाऊ नहीं होती। जब तक प्रशासनिक अधिकारियों और राजनीतिक नेतृत्व की व्यक्तिगत जवाबदेही तय नहीं की जाती, तब तक प्रक्रियाएँ अधूरी रहेंगी। जिन्हें जनता का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुना गया है, उन्हें उन्हें मिलने वाली जवाबदेही का बोझ वहन करना होगा।

यमुना सिर्फ पानी नहीं है; यह ब्रज की स्मृति है, संस्कृति है और जन‑जीवन का स्रोत है। यह हमारे इतिहास का वह धागा है जो पीढ़ियों से जुड़ा हुआ है। अगर हम इसे न बचाएंगे तो न केवल पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ेगा, बल्कि सामाजिक और आर्थिक तबाही भी गहरी होगी। बच्चों की हँसी खत्म नहीं हो सकती; किन्तु अगर नदी को बचाने के लिए हम आज कदम नहीं उठाएंगे, तो भविष्य में और अधिक प्राण जाएंगे।

कन्हा, महक, रिया और विक्की ; ये नाम सिर्फ चार परिवारों के सदस्यों के नहीं हैं; वे हमारी उदासीनता की वह तस्वीर हैं जिसे हम अब और नकार नहीं सकते। केशी घाट और आगरा के घाट की इन घटनाओं का अर्थ केवल व्यक्तिगत दुख नहीं है; यह चेतावनी है कि शासन और समाज ने मिलकर जो जिम्मेदारियाँ ठानी थीं, उन्हें पूरा करना अब जीवन और मृत्यु का प्रश्न बन गया है।

सरकार के पास अभी भी मौका है, कदम उठाइए, पारदर्शिता दिखाइए, और जनता के साथ साझेदारी में यमुना को पुनः जीवित कीजिए। और नागरिकों को भी जागृत होना होगा: सवाल पूछिए, रिपोर्ट माँगिए, स्थानीय निगरानी में भाग लीजिए। अगर नदियाँ मरती हैं तो हमारी सभ्यता का भी दम घुटने लगता है। यमुना बचाने का अर्थ सिर्फ नदी को नहीं बचाना है; यह अपने आप को, अपनी संस्कृति को और आने वाली पीढ़ियों को बचाने का काम है।

अगर आज हम इन मांगों को गंभीरता से लागू कर दें तो और मौतों को रोका जा सकता है। अगर नहीं तो इतिहास और जनता दोनों ही उन लोगों से हिसाब सवाल करेंगे जिन्होंने जानबूझकर आंखें बंद कर रखीं। यमुना को बचाना अब किसी दल विशेष का मुद्दा नहीं रह गया; यह हर नागरिक और हर संवेदनशील संस्थान की नैतिक आवश्यकता बन गया है।

यमुना की रक्षा की लड़ाई अभी बाकी है। और यह लड़ाई जितनी ज़रूरी है, उतनी ही अविलंब भी है। हमें चुनना होगा: किस्मत के हवाले कर देना, या समझदारी और कार्रवाई से अपने भविष्य को सुरक्षित करना।

 दोहरा मापदंड: भारत पर सख़्त, चीन पर नरम क्यों है पश्चिमी मीडिया?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

21 मई 2026

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मई 2026 में जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नॉर्वे दौरे पर गए, तो एक नॉर्वेजियन पत्रकार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस खत्म होने के बाद उनसे सवाल उछाल दिया। सवाल था :  भारत प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में नॉर्वे से बहुत नीचे क्यों है?

वीडियो वायरल हो गया। पश्चिमी मीडिया ने इसे भारत में लोकतंत्र के “गिरते स्तर” की मिसाल बना दिया।

लेकिन ज़रा ठहरिए। आख़िरी बार कब किसी पश्चिमी पत्रकार ने चीन के प्रेस फ्रीडम रिकॉर्ड पर इसी तरह सार्वजनिक तमाशा खड़ा किया था?

चीन उन्हीं सूचियों में सबसे नीचे बैठा है। फिर भी उसकी आलोचना वैसी सुर्खियां नहीं बनाती जैसी भारत की बनती हैं।

यहीं से दोहरे मापदंड की कहानी शुरू होती है। पश्चिमी मीडिया भारत की कमियों को अक्सर तेज़ रोशनी में दिखाता है।

सीएए को मुसलमानों के खिलाफ़ कदम बताया गया। किसान आंदोलन को “तानाशाही प्रवृत्ति” का सबूत कहा गया। कोविड की दूसरी लहर की भयावह तस्वीरें पूरी दुनिया में दिखाई गईं। चुनावों की कवरेज में “हिंदू राष्ट्रवाद” और बहुसंख्यकवाद पर लगातार सवाल उठे।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी पूछते हैं, "इन मुद्दों पर रिपोर्टिंग होना गलत नहीं है। पत्रकारिता का काम ही सवाल पूछना है। मगर सवाल यह है कि भारत के लिए इस्तेमाल होने वाला लहजा इतना कड़ा क्यों होता है, जबकि चीन के मामले में वही तीखापन अक्सर गायब दिखता है?"

चीन पर आरोप हैं कि उसने शिनजियांग में लाखों उइगर मुसलमानों को कैंपों में रखा। यह खबरें भी छपती हैं। लेकिन चीन को लेकर पश्चिमी मीडिया में वैसा लगातार नैरेटिव नहीं बनता कि “लोकतंत्र खतरे में है” या “सिस्टम टूट रहा है।”

क्यों?

क्योंकि दुनिया ने चीन से लोकतंत्र की उम्मीद ही नहीं की।

भारत लोकतांत्रिक देश है, इसलिए उससे ऊंचे आदर्शों की उम्मीद की जाती है। और जब वह उन आदर्शों पर पूरी तरह खरा नहीं उतरता, तो आलोचना कहीं ज्यादा कठोर हो जाती है।

शब्दों की राजनीति बहुत कुछ कहती है । मीडिया सिर्फ खबरों से नहीं, शब्दों से भी धारणा बनाता है, कहते हैं वरिष्ठ पत्रकार  जोज़फ।

भारत के लिए अक्सर शब्द सुनाई देते हैं ;  “बैकस्लाइडिंग”, “मेजॉरिटेरियन”, “हिंदू नेशनलिज्म”। हिंदू-मुस्लिम तनाव की रिपोर्टिंग में कई बार वही पुरानी औपनिवेशिक सोच झलकती है कि भारत एक बंटा हुआ, भावनात्मक और अव्यवस्थित समाज है।

दूसरी तरफ चीन के लिए “स्थिरता”, “कुशल प्रशासन” और “विकास” जैसे शब्द इस्तेमाल होते हैं। उसकी सख़्त सरकारी कार्रवाइयों को कभी-कभी “मजबूत शासन” कहकर पेश किया जाता है। आर्थिक विकास की तारीफ होती है, जबकि मानवाधिकार का मुद्दा पीछे छूट जाता है।

यह सिर्फ मीडिया बायस नहीं, इतिहास की परछाईं भी है।

ब्रिटिश औपनिवेशिक दौर में भारत को अक्सर अंधविश्वासी, अव्यवस्थित और “पश्चिमी मार्गदर्शन” का मोहताज बताकर शासन को जायज़ ठहराया गया था। आज वही सोच नए और अधिक परिष्कृत रूप में कई रिपोर्टों में दिखाई देती है।

खुलापन भी बनता है वजह; एक बड़ा कारण व्यावहारिक भी है।

भारत में प्रेस अपेक्षाकृत खुला है, आजाद है। विदेशी पत्रकार यहां घूम सकते हैं, लोगों से मिल सकते हैं, विवादित मुद्दों पर रिपोर्ट कर सकते हैं। इसलिए भारत की कमियां ज्यादा बाहर आती हैं।

चीन में विदेशी मीडिया पर सख़्त नियंत्रण है। वहां रिपोर्टिंग आसान नहीं। नतीजा यह कि कम खबरें बाहर निकलती हैं।

इसका मतलब यह नहीं कि भारत बदतर है। कई बार इसका मतलब सिर्फ इतना होता है कि भारत ज्यादा खुला समाज है।

पश्चिमी देशों के चीन से बड़े कारोबारी और रणनीतिक रिश्ते हैं। यह हक़ीक़त मीडिया के माहौल को भी प्रभावित करती है, चाहे खुलकर हो या परोक्ष रूप से।

चीन पर बहुत आक्रामक आलोचना कूटनीतिक तनाव बढ़ा सकती है।

भारत पर सवाल उठाना अपेक्षाकृत आसान है, क्योंकि भारत लोकतांत्रिक साझेदार माना जाता है और वहां आलोचना की कुछ गुंजाइश मौजूद है।

यह फर्क क्यों मायने रखता है

मीडिया की छवि सिर्फ अखबार तक सीमित नहीं रहती।

यह निवेशकों, नीति निर्माताओं और आम लोगों की सोच को प्रभावित करती है। व्यापार, विदेश नीति और वैश्विक जनमत पर इसका असर पड़ता है।

1.4 अरब लोगों का देश, जो करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकाल रहा है, दुनिया की सबसे बड़ी चुनावी प्रक्रिया चला रहा है और तेजी से टेक्नोलॉजी शक्ति बन रहा है ;  उसे अगर लगातार नकारात्मक चश्मे से दिखाया जाए, तो तस्वीर अधूरी बन जाती है।

अगर पश्चिमी मीडिया अपनी सारी नैतिक नाराज़गी सिर्फ खुले लोकतंत्रों पर खर्च कर देगा, तो बंद और कठोर व्यवस्थाओं पर जवाबदेही का दबाव कम हो जाएगा।

पश्चिमी न्यूज़रूम में भारत और ग्लोबल साउथ की आवाज़ों को ज्यादा जगह मिलनी चाहिए।

भारत की तुलना सिर्फ  पश्चिमी मॉडल से नहीं, बल्कि समान सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों वाले देशों से भी होनी चाहिए।

भारत में समस्याएं हैं। प्रेस फ्रीडम, सांप्रदायिक तनाव और राजनीतिक ध्रुवीकरण पर सवाल उठने चाहिए। लेकिन वही कसौटी चीन समेत हर देश पर भी बराबरी से लागू होनी चाहिए।

फिलहाल ऐसा नहीं दिखता।

और भारत तथा चीन की कवरेज में यही फर्क पश्चिमी मीडिया के नजरिए के बारे में उतना ही बताता है, जितना इन दोनों देशों के बारे में।


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Tuesday, May 19, 2026

 ज्योतिष, विज्ञान है या कला?

सत्ता के सौदागरों का सबसे बड़ा “कॉस्मिक झांसा”

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बृज खंडेलवाल द्वारा

20 मई 2026

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तमिलनाडु के नए मुख्यमंत्री C. जोसफ विजय ने हाल ही में अपने निजी ज्योतिषी को मुख्यमंत्री कार्यालय में OSD नियुक्त कर दिया। खबर जंगल की आग की तरह फैली। कहा गया कि इसी ज्योतिषी ने वर्षों पहले “भविष्यवाणी” की थी कि विजय एक दिन सत्ता की कुर्सी तक पहुंचेंगे। कुछ ही घंटों में राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई। सहयोगी दलों ने सवाल उठाए। तर्कवाद, वैज्ञानिक सोच और संविधान की दुहाई दी जाने लगी। आखिरकार सरकार को कदम पीछे खींचना पड़ा।

लेकिन असली सवाल अब भी हवा में गूंज रहा है। क्या लोकतंत्र  ग्रहों की चाल से चलेगा? क्या करोड़ों लोगों की किस्मत शनि, राहु और मंगल तय करेंगे? या फिर यह डर, असुरक्षा और सत्ता का वही पुराना कारोबार है, जिसे हर दौर में नया रंग-रोगन लगाकर बेच दिया जाता है?

भारत में सत्ता और ज्योतिष का रिश्ता नया नहीं है। सदियों से राजा-महाराजा युद्ध से पहले राज ज्योतिषियों से सलाह लेते रहे। ज्यादातर लोग कुंडलियों को मिलकर शादियां करते हैं, फिर भी बिगड़ते रिश्तों की संख्या बढ़ रही है।  व्यापारी लंबी यात्राओं से पहले कुंडली दिखाते थे।  सुबह की चाय के साथ राशिफल पढ़ना लगभग सामाजिक आदत बन चुका है। मानो आसमान से हर दिन कोई गुप्त फरमान उतरता हो।

लेकिन चुनाव आते ही यह कारोबार अचानक रॉकेट की रफ्तार पकड़ लेता है। टीवी स्टूडियो किसी “कॉस्मिक कंट्रोल रूम” में बदल जाते हैं। हर चैनल पर कोई “सितारों का विशेषज्ञ” मौजूद रहता है। कोई शनि देखकर सरकार गिरा देता है। कोई राहु के सहारे चुनाव जिता देता है। कोई बुध की चाल से गठबंधन की उम्र बता देता है। लोकतंत्र कम, ग्रहों का रियलिटी शो ज्यादा दिखने लगता है।

राजनीतिक दल भी इस तमाशे में पीछे नहीं रहते। उम्मीदवार “शुभ मुहूर्त” देखकर नामांकन भरते हैं। रैलियों की तारीखें ग्रहों की चाल से तय होती हैं। पार्टी दफ्तरों में रत्न बेचने वाले, अंकशास्त्री और भविष्यवक्ता ऐसे घूमते हैं, जैसे लोकतंत्र नहीं, कोई तांत्रिक मेला लगा हो।

असल में चुनाव डर और बेचैनी का मौसम होते हैं। नेता सत्ता के लिए बेताब रहते हैं। टीवी चैनलों को टीआरपी चाहिए। जनता महंगाई, बेरोजगारी और तनाव से परेशान रहती है। ऐसे माहौल में  लोग तर्क नहीं, तसल्ली खोजने लगते हैं।

मीडिया की भूमिका भी कम दिलचस्प नहीं। कई चैनल सेलिब्रिटी ज्योतिषियों को वैज्ञानिकों जैसी गंभीरता से पेश करते हैं। कोई आर्थिक तबाही की भविष्यवाणी करता है। कोई राजनीतिक भूचाल की चेतावनी देता है। कोई “देश पर संकट” का ऐलान कर देता है। अगर कुछ नहीं होता, तो कोई जवाबदेही नहीं। अगले हफ्ते वही चेहरा नई चमक के साथ फिर स्क्रीन पर लौट आता है।

सबसे खतरनाक वे “कयामत वाले बाबा” हैं, जो डर बेचते हैं। वे ग्रहों के बहाने युद्ध, महामारी, बर्बादी और राष्ट्रीय संकट की बातें फैलाते हैं। डर हमेशा बिकता है। ठंडी समझदारी नहीं।

भारत की आध्यात्मिक परंपरा बेहद समृद्ध रही है। यहां दर्शन, चिंतन और आत्ममंथन की लंबी विरासत है। लेकिन टीवी पर परोसी जा रही अंधभक्ति और सनसनीखेज भविष्यवाणियों पर आंख मूंदकर भरोसा करना समाज की तार्किक सोच को कमजोर कर रहा है। लोकतंत्र को जागरूक नागरिक चाहिए, डरे हुए राशिफल भक्त नहीं।

सच यह है कि ज्योतिष हर बड़े वैज्ञानिक परीक्षण में कमजोर साबित हुआ है। दावा किया जाता है कि ग्रह-नक्षत्र इंसान के स्वभाव, रिश्तों और भविष्य को प्रभावित करते हैं। मगर आज तक कोई वैज्ञानिक यह नहीं समझा पाया कि करोड़ों किलोमीटर दूर मौजूद मंगल या शनि किसी की नौकरी, शादी या चुनावी किस्मत कैसे तय कर सकते हैं।

भौतिक विज्ञान के अनुसार ग्रहों का गुरुत्वाकर्षण असर तो होता है, लेकिन वह इतना सूक्ष्म है कि जन्म के समय पास खड़े अस्पताल के उपकरणों का प्रभाव कई बार उससे अधिक हो सकता है। फिर भी लोग विश्वास क्यों करते हैं?

क्योंकि ज्योतिष का धंधा विज्ञान से ज्यादा मनोविज्ञान पर चलता है। इंसान स्वभाव से पैटर्न खोजता है। हम अव्यवस्था में अर्थ तलाशते हैं। मुश्किल वक्त में उम्मीद और सहारा चाहते हैं। ज्योतिष वही देता है, रहस्यमयी शब्दों और चमकीली भाषा में।

राशिफल अक्सर इतने धुंधले होते हैं कि हर किसी पर फिट बैठ जाएं।

“आज कोई चुनौती आ सकती है।”

“पुराना संबंध फिर सामने आ सकता है।”

“धन के मामलों में सावधानी रखें।”

ऐसी बातें लगभग हर इंसान पर लागू हो सकती हैं। मनोविज्ञान में इसे “बार्नम इफेक्ट” कहा जाता है, जहां सामान्य बातें भी हमें अपनी निजी सच्चाई लगने लगती हैं।

1985 में वैज्ञानिक पत्रिका Nature में प्रकाशित एक चर्चित प्रयोग और बाद के कई अध्ययनों ने दिखाया कि पेशेवर ज्योतिषियों की भविष्यवाणियां अनुमान से बेहतर नहीं थीं। अलग-अलग ज्योतिषी एक ही कुंडली की अलग व्याख्या करते मिले।  कई चर्चित ज्योतिषियों की भविष्यवाणियां बार-बार गलत साबित हुईं। सही निकले कुछ तुक्कों को खूब प्रचार मिलता है, लेकिन असफल भविष्यवाणियां जल्दी भुला दी जाती हैं।

सुबह चाय के साथ राशिफल पढ़ लेना कोई गुनाह नहीं। समस्या तब शुरू होती है जब लोग जिंदगी के बड़े फैसले तर्क और जानकारी की जगह ग्रहों के भरोसे लेने लगते हैं। कोई व्यापारी निवेश टाल देता है क्योंकि “बुध वक्री” है। कोई परिवार अच्छा रिश्ता ठुकरा देता है क्योंकि कुंडली नहीं मिली। कोई मरीज इलाज छोड़ देता है क्योंकि “शनि भारी” है। कोई नेता जनता की जरूरत नहीं, ज्योतिषी की सलाह सुनने लगता है।

रात का आसमान बेहद खूबसूरत है। तारों को देखकर हैरत होती है। ग्रह कल्पना को उड़ान देते हैं। लेकिन खूबसूरती सबूत नहीं होती। रहस्य हमेशा सच नहीं होता।


Sunday, May 17, 2026

 आगरा जल त्रासदी: 21 मई 1993

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अब भी नहीं सीखे सबक: अगली जल त्रासदी से पहले क्या भारत जागेगा?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

19 मई 2026

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21 मई 1993 को आगरा की पानी की टोंटियों से मौत बह निकली थी।

घटिया, खटीक पाड़ा और मंडी सईद खान की तंग गलियों में लोगों ने रोज़ की तरह वाटर वर्क्स का पानी पिया। कुछ ही घंटों में घरों में अफरा-तफरी मच गई। बच्चों को उल्टियाँ और तेज़ बुखार होने लगा। पूरे परिवार अस्पतालों की तरफ भागे। 200 से ज़्यादा लोग बुरी तरह बीमार पड़े। दूषित पानी पीने से 21 लोगों की जान चली गई।

ग़ुस्सा बहुत था। वादे भी हुए। अफसरों ने जांच और जवाबदेही की बातें कीं। लेकिन वक्त बीतता गया और शोर खामोशी में बदल गया। किसी को सचमुच सज़ा नहीं मिली। पीड़ित परिवार आज भी जवाब तलाश रहे हैं। गीता देवी जैसी महिलाएं, जिन्होंने इस हादसे में अपना पति खोया, आज भी कहती हैं कि गंदा पानी पाइपलाइनों से बहता रहता है।

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यह त्रासदी सिर्फ गंदे पानी की नहीं थी। इसने भारत की पानी प्रबंधन, शहरों की योजना और सरकारी जवाबदेही की पुरानी लापरवाही को नंगा कर दिया। सिस्टम आगे बढ़ गया, मगर सबक पीछे छूट गया।

अब 2026 में फिर एक खतरे की घंटी बज रही है। सवाल फिर डरावनी शक्ल में सामने खड़ा है। क्या हमने कुछ बदला भी है?

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का आसमान पहले से थका हुआ दिखने लगा है। तपती गर्मी में धरती जगह-जगह फट रही है। गांवों के तालाब अब कीचड़ भरे गड्ढों जैसे लगते हैं। भैंसें सिकुड़ते पानी में चुपचाप खड़ी मक्खियां उड़ाती रहती हैं। किसान दूर आसमान को ऐसे देखते हैं जैसे कोई अधूरा वादा लौटने वाला हो।

यमुना भी अब थकी हुई लगती है। कई जगह नदी एक पतली, संघर्ष करती धारा में बदल गई है। कई इलाकों में भूजल स्तर 300 फीट से नीचे चला गया है। हैंडपंप हांफ रहे हैं। बोरवेल हर साल और गहरे खोदे जा रहे हैं।

अब मौसम विभाग की चेतावनी ने बेचैनी बढ़ा दी है।

भारतीय मौसम विभाग ने कहा है कि 2026 का दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से कम रह सकता है। अनुमान है कि बारिश औसत का लगभग 92 प्रतिशत ही होगी। मौसम वैज्ञानिक इसके पीछे प्रशांत महासागर में मजबूत होते एल नीनो प्रभाव को जिम्मेदार मान रहे हैं। यही असर भारत में मानसून को कमजोर करता है और सूखे जैसे हालात पैदा करता है।

करोड़ों भारतीयों के लिए यह सिर्फ मौसम की खबर नहीं, बल्कि आर्थिक खतरे की घंटी है।

चाय की दुकानों, अनाज मंडियों और गांव की चौपालों पर बातचीत का रंग बदल चुका है। किसान अब मुनाफे की नहीं, बचने की बात कर रहे हैं। डीजल महंगा हो रहा है। नहरें सूखी पड़ी हैं। पशुओं का चारा महंगा होता जा रहा है। गर्म हवा में बेचैनी तैर रही है।

आगरा के पास एक बुजुर्ग किसान माथे का पसीना पोंछते हुए कहता है, “अगर जुलाई सूखी निकल गई, तो हम खत्म हो जाएंगे।”

भारत आज भी बारिश पर खतरनाक हद तक निर्भर है। देश की सालाना बारिश का 70 से 80 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ चार मानसूनी महीनों में आता है। आधे से ज्यादा खेत अब भी सिंचाई नहीं, बल्कि आसमान की मेहरबानी पर टिके हैं। एक कमजोर मानसून फसल बर्बादी, महंगाई, बेरोजगारी और गांवों की बदहाली ला सकता है।

लेकिन असली खतरा सिर्फ कम बारिश नहीं, बेतरतीब बारिश है।

एक जिला डूब सकता है, दूसरा प्यासा रह सकता है। देर से आने वाला मानसून, अचानक बादल फटना या लंबे सूखे दौर, कई बार पूरे सूखे से ज्यादा नुकसान करते हैं। खेती को कमी से ज्यादा अनिश्चितता डराती है।

फिर भी भारत हर मानसून के पहले लगभग बिना तैयारी के खड़ा मिलता है।

नदियां गाद से भरी पड़ी हैं। झीलें और तालाब अतिक्रमण, कूड़े और कंक्रीट के नीचे गायब हो चुके हैं। गांवों की जीवनरेखा रहे पारंपरिक जल स्रोत दशकों से उपेक्षित पड़े हैं। वर्षा जल संचयन अब ज्यादातर भाषणों, सरकारी फाइलों और चमकदार सेमिनारों के बैनरों तक सीमित है।

विडंबना देखिए।

हर मानसून में शहर कुछ घंटों की बारिश में डूब जाते हैं। सड़कें तालाब बन जाती हैं। पानी नालों में बहाकर बर्बाद कर दिया जाता है। फिर कुछ महीनों बाद वही शहर टैंकरों के पानी पर निर्भर हो जाते हैं। कुदरत दिल खोलकर देती है, मगर बदइंतजामी सब लूट लेती है।

उत्तर भारत का भूजल संकट अब खामोश खतरे में बदल चुका है। जरूरत से ज्यादा दोहन, कमजोर रिचार्ज सिस्टम और घटती बारिश ने जमीन के नीचे इमरजेंसी पैदा कर दी है। धरती को जितनी तेजी से खाली किया जा रहा है, उतनी तेजी से वह भर नहीं पा रही।

हल कोई रहस्य नहीं हैं। और नामुमकिन भी नहीं।

नहरों, जलाशयों और नदियों की तुरंत सफाई और गाद निकासी होनी चाहिए। गांवों के तालाब बचाए और दोबारा जिंदा किए जाएं। शहरों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग अनिवार्य हो। किसानों को ड्रिप सिंचाई और सूखा सहने वाली फसलों के लिए मदद मिले। मनरेगा जैसी योजनाओं का इस्तेमाल जल संरक्षण के कामों में कहीं बेहतर तरीके से हो सकता है।

सरकारें “वॉर फुटिंग” की बातें करती हैं, मगर हजारों गांवों में बुनियादी जल ढांचा टूटा या गायब है। बड़ी घोषणाएं सुर्खियां बनती हैं, जबकि जमीन पर रिसती पाइपलाइनें, सूखे हैंडपंप और मरते तालाब ही हकीकत बयान करते हैं।

आगरा के यमुना घाटों पर अच्छी बारिश के लिए विशेष प्रार्थनाएं शुरू हो चुकी हैं। आस्था मुश्किल समय में हौसला देती है। मगर सिर्फ दुआएं भूजल नहीं भर सकतीं, नहरें नहीं सुधार सकतीं और गंदी पाइपलाइनों को साफ नहीं कर सकतीं।

विज्ञान हमें पहले ही चेतावनी दे चुका है। अनुभव भी चेता चुका है। इतिहास भी अपना सबक दे चुका है।

1993 की आगरा जल त्रासदी को भारत की जल सुरक्षा और प्रशासनिक सोच बदल देनी चाहिए थी। लेकिन वह भी सरकारी बेरुखी की धूल में दबा एक भूला हुआ अध्याय बन गई।

बादल अभी दूर हैं। मगर डर पहले ही पहुंच चुका है।

2026 की असली परीक्षा सिर्फ बारिश की नहीं होगी। यह याददाश्त, शासन और जिम्मेदारी की परीक्षा होगी। जो देश अपनी जल त्रासदियों से सबक नहीं सीखता, वह उन्हें बार-बार दोहराने के लिए मजबूर हो जाता है। और हर बार इंसानी कीमत पहले से ज्यादा भारी होती है।

 तिलचट्टा, परजीवी.......

शब्दों की मर्यादा और अदालतों की गरिमा

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मान भी लें कि कुछ गलत एलिमेंट्स मीडिया में दाखिल हो चुके हैं, और कई एक्टिविस्ट्स सूचनाधिकार का दुरुपयोग करते हैं, तो क्या समूची बिरादरी को कटघरे में खड़ा करना उचित है? वकालत में, डाक्टरी में, न्यायिक व्यवस्था में, राजनीति में, सभी जगह काली भेड़ें अमर्यादित कार्य कर रही हैं, लेकिन क्या पूरा सिस्टम दोषी है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

18 मई 2026

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अदालतों की इमारतें सिर्फ पत्थर और दीवारों से नहीं बनतीं। उनका असली आधार जनता का भरोसा होता है। इसलिए जब न्यायपालिका जैसे सर्वोच्च संवैधानिक मंचों से कठोर शब्द निकलते हैं, तो वे सिर्फ एक टिप्पणी नहीं रहते, समाज के लिए एक व्यापक संदेश बन जाते हैं। 

हाल में “तिलचट्टे” और “परजीवी” जैसे शब्दों के इस्तेमाल ने एक नई बहस को उकसाया है।

15 मई 2026 को वरिष्ठ अधिवक्ता पदनाम से जुड़ी सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने उन लोगों पर चिंता जताई, जो वैध योग्यता या पेशेवर क्षमता के बिना मीडिया, सोशल मीडिया और आरटीआई एक्टिविज्म के जरिए संस्थाओं पर लगातार हमला करते हैं। उन्होंने कुछ तत्वों के लिए “तिलचट्टे” और “परजीवी” जैसे शब्दों का प्रयोग किया। 

हालांकि, बाद में उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणी पूरे युवावर्ग या सभी एक्टिविस्टों के लिए नहीं थी, बल्कि उन लोगों के लिए थी जो गलत तरीकों से व्यवस्था का दुरुपयोग करते हैं। यह स्पष्टीकरण जरूरी था और उसका स्वागत होना चाहिए।

लेकिन इसके बावजूद एक असहज सवाल बना रहता है। क्या इतनी तीखी भाषा जरूरी थी?

भारत का युवा पहले ही भारी दबाव में जी रहा है। बेरोजगारी बढ़ रही है। प्रतियोगिता लगातार कठिन होती जा रही है। लाखों पढ़े-लिखे युवा नौकरी, अवसर और पहचान की तलाश में भटक रहे हैं। ऐसे माहौल में जब ऊंचे संवैधानिक पदों से व्यापक टिप्पणियां आती हैं, तो कई लोगों को लगता है कि उनकी निराशा और संघर्ष को समझने के बजाय उनका मजाक बनाया जा रहा है। लोकतंत्र में असहमति रखने वाला हर व्यक्ति दुश्मन नहीं होता।

यह भी उतना ही सच है कि मीडिया, सोशल मीडिया और आरटीआई का दुरुपयोग हुआ है। कुछ लोग व्यक्तिगत एजेंडा चलाते हैं। कुछ यूट्यूब चैनल सनसनी बेचते हैं। कुछ लोग आरटीआई को सूचना के अधिकार की जगह निजी बदले का हथियार बना देते हैं। अदालतों पर भी कई बार बिना तथ्यों के आरोप लगाए जाते हैं। सोशल मीडिया पर न्यायपालिका के खिलाफ फर्जी अभियान चलाए जाते हैं। यह सब चिंता का विषय है।

मीडिया ट्रायल के उदाहरण हमारे सामने हैं। जेसिका लाल हत्याकांड, आरुषि तलवार मामला और सुशांत सिंह राजपूत केस में टीवी स्टूडियो अदालत से पहले फैसले सुनाने लगे थे। चीखती बहसों और सनसनीखेज रिपोर्टिंग ने निष्पक्ष सुनवाई पर असर डाला। सुप्रीम कोर्ट खुद कई बार मीडिया को चेतावनी दे चुका है कि sub-judice मामलों में संयम जरूरी है।

इसी तरह अदालतों ने आरटीआई के दुरुपयोग पर भी चिंता जताई है। कई मामलों में अधिकारियों ने कहा कि निरर्थक और बार-बार दाखिल आरटीआई आवेदन कामकाज को प्रभावित करते हैं। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी कुछ मामलों में माना कि बदले की भावना से डाली गई आरटीआई व्यवस्था में “fear and paralysis” पैदा करती हैं। यह चिंता पूरी तरह गलत नहीं कही जा सकती।

लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं: "इसी आरटीआई कानून ने भ्रष्टाचार के कई बड़े मामलों को उजागर किया। इसी ने आम नागरिक को सवाल पूछने की ताकत दी। कई स्वतंत्र पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सत्ता के दुरुपयोग को सामने लाने का साहस दिखाया। लोकतंत्र में असहज सवाल पूछना अपराध नहीं होना चाहिए।"

समस्या यह है कि आज हर आलोचना को दुश्मनी और हर सवाल को षड्यंत्र मान लेने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। यही प्रवृत्ति संस्थाओं और जनता के बीच दूरी पैदा करती है। अदालतों की ताकत सिर्फ अवमानना की शक्ति में नहीं, बल्कि जनता के नैतिक विश्वास में होती है।

एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि अदालत की गरिमा बनाए रखने का सबसे अच्छा तरीका उसके फैसलों की गुणवत्ता और न्यायपूर्ण व्यवहार है। यह बात आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। बड़े पदों पर बैठे लोगों के शब्दों में कठोरता नहीं, संतुलन ज्यादा दिखाई देना चाहिए।

न्यायिक स्वतंत्रता लोकतंत्र की रीढ़ है और उसकी रक्षा हर हाल में होनी चाहिए। लेकिन सम्मान और रचनात्मक आलोचना एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। दोनों साथ-साथ चल सकते हैं।

एक विविध, बेचैन और तनावग्रस्त समाज में अदालतों की भूमिका सिर्फ कानून लागू करने की नहीं, भरोसा पैदा करने की भी है। इसलिए न्यायपालिका से निकले शब्द ऐसे होने चाहिए जो लोगों को जोड़ें, तोड़ें नहीं। अदालतों की असली ताकत डर पैदा करने में नहीं, बल्कि न्याय और संवेदनशीलता के साथ विश्वास कायम करने में है।

Saturday, May 16, 2026

 मोदी जी की गांधीवादी अपील, लेकिन सरकारी नीतियां गांधी-विरोधी

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

17 मई 2026

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लोकतंत्र की सड़क पर दौड़ता नया सामंतवाद

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देश बदलने का दावा था।

लेकिन सड़कों पर अब भी वही पुराना दृश्य है। आगे लाल बत्ती जैसी अकड़। पीछे सायरनों की चीख। आम आदमी ट्रैफिक में पसीना बहाता खड़ा है और नेताओं के काफिले हवा चीरते निकल जाते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पुराने राजा हाथी पर चलते थे, नए शासक एसयूवी के झुंड में चलते हैं।

यह वीआईपी संस्कृति केवल सुरक्षा का सवाल नहीं रही। यह सत्ता के प्रदर्शन का सार्वजनिक तमाशा बन चुकी है। रोड शो, फूल वर्षा, दर्जनों गाड़ियाँ, बंद सड़कें, विशेष लाउंज, अलग कतारें, सरकारी संसाधनों का खुला दुरुपयोग। लोकतंत्र के नाम पर एक नई वर्ण व्यवस्था खड़ी की जा रही है। ऊपर “विशेष नागरिक” और नीचे धक्के खाती जनता।

विडंबना देखिए। चुनावों में नेता खुद को “जनसेवक” कहते हैं। जीतते ही वे जनता से भौतिक दूरी बना लेते हैं। उनके लिए सड़कें खाली कराई जाती हैं, अस्पतालों में वार्ड रोके जाते हैं, पुलिस सुरक्षा ढाल बन जाती है। जनता टैक्स देती है, फिर उसी पैसे से पैदा हुई असुविधा झेलती है।

यह परिवर्तन नहीं है। यह एलीट सामंतवाद का नया संस्करण है। लोकतंत्र की आत्मा बराबरी में बसती है, विशेषाधिकारों में नहीं। जिस दिन सत्ता का काफिला आम आदमी के ट्रैफिक में फँसने लगेगा, शायद उसी दिन असली लोकतंत्र सड़क पर दिखाई देगा।

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महात्मा गांधी की धरती पर, जहां सादगी, आत्मनिर्भरता और संयम हमेशा से हमारी संस्कृति का हिस्सा रहा है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हालिया ऑस्टेरिटी का आह्वान ज़रूरी तो है, मगर बेहद विडंबनापूर्ण भी है। पश्चिम एशिया के संकट और बढ़ते तेल के दामों के बीच मोदी जी ने लोगों से अपील की कि वर्क-फ्रॉम-होम करें, पेट्रोल-डीज़ल बचाएं, पब्लिक ट्रांसपोर्ट और इलेक्ट्रिक गाड़ियां इस्तेमाल करें, विदेश यात्राएं और सोने की खरीदारी टालें, खाने के तेल का कम इस्तेमाल करें और लोकल चीज़ें खरीदें।

ये अपील सही है क्योंकि हमारा देश वेस्ट एशिया से आने वाले क्रूड ऑयल पर बहुत निर्भर है। लेकिन ये उपदेश खोखले लगते हैं जब हम देखते हैं कि पिछले दस साल से सरकार ने ठीक उसी हाई-कंज़म्पशन, मशीन-निर्भर और कार-केंद्रित जीवनशैली को बढ़ावा दिया है जिसके खिलाफ गांधी जी ने चेतावनी दी थी।

गांधी जी की ऑस्टेरिटी सिर्फ संकट का हल नहीं थी, बल्कि जीवन की पूरी दर्शनशैली थी। उन्होंने कहा था कि “मैं हर तरह की विनाशकारी मशीनरी का कड़ा विरोधी हूँ”। वे ऐसी मशीनें चाहते थे जो इंसान को गुलाम न बनाएँ, बल्कि मदद करें। गांधी जी शारीरिक मेहनत, गांव की आत्मनिर्भरता और प्रकृति के साथ सामंजस्य पर ज़ोर देते थे। 

लेकिन मोदी सरकार ने $3 ट्रिलियन इकॉनमी का सपना पूरा करने के चक्कर में बुलेट ट्रेन और विशाल एक्सप्रेसवे जैसे मेगा प्रोजेक्ट्स पर ज़ोर दिया। ये प्रोजेक्ट्स तेज़ रफ़्तार और अमीरों की कार मोबिलिटी को बढ़ावा देते हैं। लग्ज़री कारों की बिक्री बढ़ रही है, जबकि आम मध्यवर्गी परिवार पेट्रोल-डीज़ल और LPG के महंगे दामों से परेशान हैं। अमीर लोग विदेश घूमते रहते हैं, शादी-ब्याह धूमधाम से करते हैं, सोना खरीदते हैं – उनकी ज़िंदगी पर कोई असर नहीं। सिर्फ आम आदमी को कष्ट झेलना पड़ता है।

सबसे निंदनीय बात ये है कि इंसानी गतिशीलता (human mobility) को पूरी तरह नज़रअंदाज़ किया गया। हमारे सड़कें अब कमज़ोरों के लिए कत्लगाह बन गई हैं। हर साल 1.75 लाख से ज़्यादा लोग सड़क दुर्घटनाओं में मरते हैं, जिनमें ज़्यादातर पैदल चलने वाले, साइकिल वाले और दोपहिया वाहन चलाने वाले होते हैं। फुटपाथ या तो हैं ही नहीं या अतिक्रमण से भरे हैं। साइकिल लेन लगभग नदारद हैं। एक्सप्रेसवे स्पीड के लिए बने हैं, सुरक्षा के लिए नहीं। 

गांधी जी जो खुद पैदल चलते थे और शारीरिक श्रम को महत्व देते थे, इस कार-केंद्रित मॉडल को देखकर दुखी होते। सरकार ने गांधीवादी रास्ते से मुड़कर चमक-दमक वाली आधुनिकता को अपनाया है। अब संकट के वक्त सादगी का उपदेश दिया जा रहा है। 

ये उपदेश सिर्फ़ शब्दों तक सीमित न रहें। असली बदलाव तब आएगा जब पैदल चलने वालों और साइकिलिस्टों के लिए सुरक्षित रास्ते बनाए जाएंगे, कार मोबिलिटी की जगह इंसानी मोबिलिटी को तरजीह दी जाएगी, तेज़ी और लग्ज़री का राग अलापना कम होगा और लोकल, सादा और आत्मनिर्भर जीवनशैली को बढ़ावा मिलेगा।

इस संकट के वक्त मोदी जी के शब्द गांधी को याद दिलाते हैं, लेकिन नीतियां और इंफ्रास्ट्रक्चर कुछ और ही कहानी बयान करते हैं। अगर एक्सट्रावगैंजा (फिजूलखर्ची) से इक्विटी (न्याय) की तरफ नहीं बदला गया तो ये उपदेश सिर्फ़ दिखावा बनकर रह जाएंगे। 

भारत को गांधी के सिद्धांत को सिर्फ़ तेल के संकट में नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बनाना होगा : सादगी, संयम और सबके लिए विकास। 






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