Wednesday, May 20, 2026

 


यमुना नदी में सीवेज, मलबा, इंडस्ट्रियल वेस्ट और लाशें बह रही हैं, और सरकारी तंत्र मूक दर्शक बना खड़ा है

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बृज खंडेलवाल द्वारा

21 मई 2026

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यमुना छठ पर विशेष रिपोर्ट

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12 मई 2026 की शाम आगरा के एक घाट पर जो हुआ, वह कोई संयोग या महज़ दुर्भाग्य नहीं था। जन्मदिन मनाने आए छह युवा यमुना में उतरे। दो घंटे तक उन्हें बचाने की कोशिशें चलती रहीं, लेकिन अंततः चार बच्चों के शव बाहर निकाले गए। आए दिन ये दुर्घटनाएं हो रही हैं। पुलिस ने घाटों पर होर्डिंग्स लगाए हैं, सावधान किया है, पर लोग हैं कि मानते नहीं। वाकई, परिवारों का दुख शब्दों से परे है। वही यमुना, जिसके किनारे हमारी आस्था, इतिहास और सभ्यता सांस लेती आई है, आज मौत की गवाह बनती जा रही है।

इस घटना से कुछ ही सप्ताह पहले वृंदावन के केशी घाट पर नाव पलटने से 15 से अधिक तीर्थयात्रियों की मौत हुई थी। नाव में क्षमता से अधिक सवारियाँ थीं। लाइफ जैकेट नहीं थीं। निगरानी लगभग नदारद थी। सवाल यह है कि आखिर हर हादसे के बाद केवल शोक और मुआवज़े की रस्म क्यों निभाई जाती है?

इन घटनाओं को केवल “दुर्घटना” कहना सच्चाई से आँख चुराना होगा। यह प्रशासनिक विफलता, सरकारी लापरवाही और टूटी हुई व्यवस्था का नतीजा है। जब नदी जहरीली हो, उसका प्राकृतिक बहाव सिकुड़ चुका हो, सुरक्षा इंतज़ाम कागज़ों में सिमट जाएँ और निगरानी तंत्र सोया रहे, तब मौतें केवल समय का इंतज़ार बन जाती हैं। अरबों रुपये खर्च होने के दावों के बावजूद ज़मीनी हालात जस के तस हैं।

यमुना की हालत किसी से छिपी नहीं। लगभग 1,376 किलोमीटर लंबी यह नदी हिमालय से निकलकर हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश से गुजरती है। लेकिन दिल्ली के बाद इसका बड़ा हिस्सा एक बहती हुई नाली में बदल जाता है। करोड़ों लीटर बिना शोधन का सीवेज प्रतिदिन नदी में गिरता है। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट या तो अधूरे हैं, या उनकी क्षमता कम है, या फिर वे ठीक से चल ही नहीं रहे। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और अन्य पर्यावरणीय रिपोर्टें बार-बार बता चुकी हैं कि नदी में बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड और फीकल कॉलिफॉर्म का स्तर सुरक्षित सीमा से कई गुना ऊपर है। कई जगह पानी नहाने लायक भी नहीं बचा।

दिल्ली का प्रदूषण मथुरा, वृंदावन और आगरा तक पहुँचता है। धार्मिक नगरी होने के कारण इन शहरों के घाटों पर हर दिन भारी भीड़ उमड़ती है, लेकिन दूसरी ओर नाले सीधे नदी में गिरते रहते हैं। आगरा में ताजमहल के पीछे बहती यमुना अक्सर झाग, काले पानी और बदबू के कारण चर्चा में रहती है। यह केवल सौंदर्य का प्रश्न नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरणीय आपदा का संकेत है।

समस्या यहीं खत्म नहीं होती। यमुना की बाढ़ पट्टी पर तेजी से अतिक्रमण हुआ है। वृंदावन और मथुरा क्षेत्र में ड्रोन सर्वेक्षणों में सैकड़ों अवैध निर्माण सामने आए। नदी का प्राकृतिक फैलाव सिकुड़ता गया। जहाँ पानी फैलकर खुद को साफ करता था, वहाँ अब कंक्रीट और अवैध कॉलोनियाँ खड़ी हैं। नतीजा साफ है : जल ठहराव बढ़ा, प्रदूषण जमा हुआ और नदी का दम घुटने लगा। दुखद यह है कि ऐसे अतिक्रमण अक्सर प्रभावशाली लोगों के संरक्षण में पनपते हैं।

तीन दशक से योजनाएँ बन रही हैं। यमुना एक्शन प्लान आया। राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के तहत परियोजनाएँ चलीं। हजारों करोड़ रुपये खर्च होने के दावे किए गए। लेकिन सवाल वही है : अगर इतना पैसा लगा, तो नदी अब भी ज़हरीली क्यों है? अधूरी पाइपलाइनें, बंद पड़े प्लांट, कमजोर निगरानी और भ्रष्ट तंत्र ने योजनाओं को कागज़ी सफलता में बदल दिया। जनता को यह जानने का अधिकार है कि पैसा कहाँ गया, किसने निगरानी की और जवाबदेही किसकी तय हुई।

घाटों पर सुरक्षा व्यवस्था भी बेहद कमजोर है। आगरा के बल्केश्वर घाट सहित कई स्थानों पर न तो पर्याप्त लाइफगार्ड हैं, न गहराई के स्पष्ट संकेत, न मजबूत बैरियर और न ही आपातकालीन बचाव तंत्र। नाव संचालन में भी भारी लापरवाही है। क्षमता से अधिक यात्रियों को बैठाना आम बात है। फिटनेस सर्टिफिकेट और लाइफ जैकेट जैसे नियम केवल औपचारिकता बन चुके हैं।

रेत खनन ने स्थिति को और खतरनाक बना दिया है। अवैध खनन से नदी तल में गहरे गड्ढे और अदृश्य भंवर बन गए हैं। ऊपर से शांत दिखने वाला पानी अचानक किसी को निगल लेता है। यह केवल पर्यावरणीय अपराध नहीं, बल्कि सीधे-सीधे मानव जीवन से खिलवाड़ है।

सबसे बड़ी विफलता विभागों के बीच तालमेल की कमी है। जल शक्ति मंत्रालय, नगर निगम, विकास प्राधिकरण, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य सरकार :  सबकी जिम्मेदारियाँ अलग-अलग बंटी हैं, लेकिन समन्वय लगभग गायब है। हर हादसे के बाद फाइलें चलती हैं, बैठकें होती हैं, बयान दिए जाते हैं, फिर सब ठंडा पड़ जाता है।

न्यायालयों और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने समय-समय पर सख्त निर्देश दिए हैं। सीवेज रोकने, अतिक्रमण हटाने और नदी संरक्षण के आदेश जारी हुए। लेकिन अधिकतर आदेश कागज़ों तक सीमित रह गए। बिना सख्त निगरानी और जवाबदेही के आदेश केवल सरकारी फाइलों की शोभा बन जाते हैं।

अब केवल भाषणों से काम नहीं चलेगा। ठोस और तत्काल कार्रवाई की जरूरत है।

सबसे पहले, नदी में गिरने वाले सभी नालों को तत्काल ट्रीटमेंट प्लांट से जोड़ा जाए और बंद पड़े प्लांट 30 दिनों के भीतर चालू किए जाएँ। घाटों पर प्रशिक्षित लाइफगार्ड, गहराई संकेतक, चेतावनी बोर्ड और आपातकालीन बचाव व्यवस्था अनिवार्य हो। नाव संचालन पर सख्ती से नियम लागू किए जाएँ और हर नाव में लाइफ जैकेट अनिवार्य हो।

वृंदावन, मथुरा और आगरा की बाढ़ पट्टी में बने अवैध निर्माणों को चिन्हित कर पारदर्शी तरीके से हटाया जाए। अवैध रेत खनन पर तत्काल रोक लगे और दोषी अधिकारियों तथा माफिया पर आपराधिक कार्रवाई हो। यमुना में न्यूनतम जल प्रवाह सुनिश्चित करने के लिए जल प्रबंधन नीतियों की समीक्षा जरूरी है। सबसे महत्वपूर्ण, हर परियोजना का सार्वजनिक ऑडिट हो और उसकी प्रगति रिपोर्ट जनता के सामने रखी जाए।

ये माँगें कठोर जरूर हैं, लेकिन हालात उससे कहीं अधिक भयावह हैं। राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना कोई बदलाव संभव नहीं। जब तक प्रशासनिक अधिकारियों और राजनीतिक नेतृत्व की व्यक्तिगत जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक योजनाएँ केवल घोषणाओं में ही जीवित रहेंगी।

यमुना केवल एक नदी नहीं है। यह ब्रज की स्मृति, संस्कृति और जनजीवन की धड़कन है। इसके किनारे पीढ़ियाँ पली हैं। अगर यह नदी मरती है, तो केवल पर्यावरण नहीं मरता : समाज, संस्कृति और भविष्य भी घायल होते हैं।

कन्हा, महक, रिया और विक्की केवल चार नाम नहीं हैं। वे हमारी सामूहिक उदासीनता की कीमत हैं। केशी घाट और आगरा के हादसे चेतावनी हैं कि अब भी अगर हमने आँखें बंद रखीं, तो आने वाले वर्षों में ऐसी त्रासदियाँ और बढ़ेंगी।

सरकार के पास अभी भी अवसर है। पारदर्शिता दिखाई जाए, जवाबदेही तय की जाए और जनता को साझेदार बनाकर यमुना को पुनर्जीवित करने की गंभीर शुरुआत की जाए। नागरिकों को भी जागना होगा। सवाल पूछने होंगे। रिपोर्ट माँगनी होगी। स्थानीय निगरानी में भाग लेना होगा।

क्योंकि जब नदियाँ मरती हैं, तब सभ्यताएँ भी धीरे-धीरे दम तोड़ने लगती हैं। यमुना को बचाना केवल एक नदी को बचाना नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति, अपनी स्मृतियों और आने वाली पीढ़ियों को बचाना है।

आज भी समय है। फैसला हमें करना है : क्या हम यमुना को किस्मत के हवाले छोड़ देंगे, या समझदारी, संवेदनशीलता और कार्रवाई से उसका भविष्य बचाएँगे?


 


यमुना नदी में, सीवेज, मलवा, इंडस्ट्रियल वेस्ट और लाशें बह रही हैं, और सरकारी तंत्र मूक,  लाचार चश्मदीद बना खड़ा है

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

21 मई 2026

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12 मई 2026 की शाम आगरा के एक घाट पर जो हुआ, वह संयोग या दुर्भाग्य नहीं था। जन्मदिन मनाने आए छह युवा नदी में उतरे; दो घंटे तक बचाने की कोशिशें चलीं, पर चार बच्चों के शव निकले। पीड़ित परिवारों का शोक अपूरणीय है। वही यमुना, जिसके किनारे हमारी इतिहास‑कथाएँ, आरतियाँ और आस्थाएँ जुड़ी हैं, आज मौत की गवाही दे रही है। इस घटना के ठीक कुछ हफ्ते पहले वृंदावन के केशी घाट पर भी एक नाव पलटी थी, जिसमें 15‑16 तीर्थयात्रियों की मौत हुई, नाव में अधिक सवारियाँ, बिना लाइफ जैकेट के संचालन और निगरानी का अभाव मुख्य कारण बताया गया।

इन हादसों को केवल दुर्घटना कहना कानूनी और नैतिक दोनों तरह से हर्ज़ है। यह प्रणालीगत विफलता और व्यापक लापरवाही का परिणाम है, न सिर्फ स्थानीय प्रशासन की, बल्कि राज्य और केंद्रीय संस्थाओं की भी। जब नदी ही जहरीली है, संरक्षण का दायरा सिकुड़ चुका है और सुरक्षा मानक सिर्फ घोषणाओं में रह गए हैं, तब मानव जीवन का जोखिम बढ़ना स्वाभाविक है। सरकारों के वादों और खर्चों के बावजूद जमीन पर स्थितियाँ नहीं बदलीं।

यमुना की मौजूदा हालत समझने के लिए कुछ ठोस तथ्य देखें। यमुना की कुल लंबाई लगभग 1,376 किलोमीटर है और यह हिमालय की पिघलती चोटियों से उठकर उत्तर प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली होते हुए पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में बहती है। एनवायरनमेंटल मॉनिटर्स और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली के पास के हिस्से में कुल प्रदूषण का बहुत बड़ा हिस्सा उत्पन्न होता है। दिल्ली से प्रतिदिन करोड़ों लीटर सीवेज का रिसाव यमुना में होता रहा है; कई ट्रीटमेंट प्लांट हैं, पर पाइपलाइन अधूरी, प्लांट की क्षमता सीमित या संचालन ठप मिलती है। सीपीसीबी और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्टों में बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड और फीकल कॉलिफॉर्म के उच्च स्तर दर्ज हैं, जो नहाने के काबिल पानी से बहुत ऊपर हैं। उदाहरण के तौर पर दिल्ली के कुछ नापों में फीकल कॉलिफॉर्म हजारों से लेकर लाखों MPN प्रति 100 मिलीलीटर पाए गए, सुरक्षित मानक से कई गुना अधिक। ये आँकड़े सार्वजनिक रिपोर्टों और सर्वे रिपोर्टों में दर्ज हैं।

प्रदूषण दिल्ली से शुरू होकर आगरा, मथुरा और वृंदावन तक पहुँचता है। मथुरा और वृंदावन में धार्मिक गतिविधियों के चलते घाटों पर जनसैलाब होता है; वहीँ बिना उपचार के नाले सीधे नदी में गिरते हैं। आगरा में ताजमहल के पास यमुना का पानी झाग और गंदगी के कारण अक्सर चर्चा में रहता है। स्थानीय नागरिक और पर्यावरणविद यह कहते रहे हैं कि किसी ऐतिहासिक धरोहर के पास बहने वाली नदी का ऐसा हाल न सिर्फ पर्यटन के लिए नुकसानदेह है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा है।

अतिक्रमण और अवैध निर्माण समस्या को और बढ़ाते हैं। ड्रोन सर्वे और अन्य भू‑अवलोकन ने वृंदावन के बाढ़ पट्टी और किनारों पर सैकड़ों अवैध निर्माण दर्शाए हैं। 2025 के कुछ सर्वे में वृंदावन के बाढ़ क्षेत्र में कई सौ अवैध संरचनाएँ सामने आईं। जब नदी का प्राकृतिक दायरा सिकुड़ता है, बहाव बाधित होता है और जल का ठहराव बढ़ता है; इससे पानी का स्वच्छता स्तर गिरता है और प्लास्टिक, सीवेज व औद्योगिक अपशिष्ट का जमाव बढ़ता है। अतिक्रमण अक्सर स्थानीय शक्तिशाली वर्गों के संरक्षण में होता है, जिससे उचित कार्रवाई नहीं हो पाती।

सरकारी योजनाएँ और खर्च भी यहाँ संदिग्धता पैदा करते हैं। 1990 के दशक से अलग‑अलग योजनाएँ चलीं: यमुना एक्शन प्लान, राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन से जुड़े कार्यक्रम और अन्य परियोजनाएँ। अरबों रुपये खर्च किए जाने का दावा है, पर कई जगहों पर ट्रीटमेंट प्लांट अधूरी पाइपलाइन, बंद इकाइयाँ या अपर्याप्त संचालन के कारण प्रभावी नहीं रहे। इस असंगति का असर साफ दिखता है: निवेश जहाँ होना चाहिए था, वहाँ परिणाम कम दिखे। इससे नागरिकों में सवाल उठते हैं, वित्त कहाँ गया, परियोजनाओं की निगरानी और ऑडिट किसने की, जवाबदेही किसकी है।

जीवित निगरानी और आपदा प्रबंधन के अभाव ने कई मौतों को आम बना दिया है। आगरा के बल्केश्वर घाट जैसी जगहों पर घाट का डिजाइन, गहराई‑मार्किंग, बेरियर, लाइफगार्ड की नियुक्ति और आकस्मिक बचाव व्यवस्था की कमी थी। वाहन या नाव संचालन की मानक गतिविधियाँ: लाइफ जैकेट का अनिवार्य इस्तेमाल, नावों का फिटनेस सर्टिफिकेट, क्षमता नियंत्रण और सीसीटीवी निगरानी: इनका अनुपालन अक्सर नहीं किया जाता। रेत खनन ने नदी तल को असमान कर दिया है; अनियंत्रित खनन से तल में गहरे गड्ढे और भंवर बन गए हैं जो सतह से अप्रकट होते हैं और तैरने वाले लोगों के लिए जानलेवा सिद्ध होते हैं। इन सबका दायरा सिर्फ तकनीकी नहीं, बल्कि प्रशासनिक और कानूनी भी है।

प्रमुख समस्या कई विभागों के बीच समन्वय की कमी है। जल शक्ति मन्त्रालय, राज्य सरकार, नगर निगम, विकास प्राधिकरण और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड: ये सभी अलग जिम्मेदारियाँ निभाते हैं, पर अंतर्निहित तालमेल की कमी से कार्य अक्सर ढीला पड़ जाता है। यमुना जैसे पारिस्थितिक तंत्र को बचाने के लिए एक संयुक्त प्रशासनिक फ्रेमवर्क चाहिए, जिसमें समयबद्ध लक्ष्यों, पारदर्शी फंडिंग और सार्वजनिक ऑडिट का स्पष्ट तंत्र हो। राजनीति में इस मुद्दे का इस्तेमाल चुनावी वादों के लिए होता है, पर चुनावों के बाद दीर्घकालिक नीतियाँ और निगरानी गायब रहती है।

न्यायालयों और पर्यावरण ट्रिब्यूनलों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल और उच्च न्यायालय ने समय‑समय पर निर्देश जारी किए हैं: सीवेज ट्रीटमेंट बढ़ाने, अतिक्रमण हटाने और नदियों की बहाल व्यवस्था के आदेश दिए गए हैं। पर समस्या यह है कि कई बार ये आदेश प्रकृति में कागजी ही रह जाते हैं; आदेशों का पालन सुनिश्चित करने के लिए नियमित निगरानी, अनुशासनात्मक कार्रवाई और समय सीमा का पालन जरूरी है। बिना कठोर पालन के नोटिस भी रिक्त घोषणाएँ बनकर रह जाते हैं।

अब समय है मांगों का, न सिर्फ नारेबाजी का। यमुना और उससे जुड़े समुदायों की सुरक्षा और नदी‑पुनरुद्धार के लिए ठोस उपाय तत्काल लागू होने चाहिए। कुछ तत्काल और व्यावहारिक कदम जो लागू होने चाहिए, वे निम्न हैं:

1. नदी किनारे के सभी नालों और सीवरेज आउटलेट को प्राथमिकता के आधार पर ट्रीटमेंट प्लांट से जोड़ा जाए और 30 दिनों के भीतर बंद प्लांट को चालू किया जाए। इसके लिये केंद्रीय और राज्य स्तर पर संयुक्त निगरानी टीम गठित की जाए और सार्वजनिक रिपोर्टिंग अनिवार्य हो।

2. घाटों पर जीवनरक्षक सुविधाएँ अनिवार्य की जाएँ: प्रशिक्षित लाइफगार्ड, स्पष्ट गहराई‑मार्किंग, दृढ़ बेरियर और रियल‑टाइम धारा चेतावनी प्रणाली। घाटों का संरचनात्मक निरीक्षण रेलवे जैसी नियमितता से किया जाए।

3. नाव संचालन पर सख्त नियम लागू हों—प्रत्यक्ष क्षमता सीमाएँ, हर नाव पर लाइफ जैकेट अनिवार्य, फिटनेस सर्टिफिकेट अनिवार्य और उल्लंघन पर लाइसेंस रद्द एवं दंडात्मक कार्रवाई। यात्रियों की संख्या पर कठोर निगरानी रखी जाए।

4. वृंदावन‑मथुरा‑आगरा के बाढ़ पट्टी में पाए गए अवैध निर्माणों की स्वतः पहचान के लिए उपग्रह और ड्रोन सर्वे नियमित रूप से हो और अनुमत समयसीमा के भीतर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई पारदर्शी ढंग से की जाए। किसी भी तरह का राजनीतिक प्रोटेक्शन स्वीकार नहीं किया जाएगा।

5. रेत खनन पर तत्काल प्रतिबंध और जो अवैध खनन पाया जाए, उसके खिलाफ कड़ी आपराधिक और आर्थिक कार्रवाई की जाए। जिन अधिकारियों की मिलीभगत पाई जाए उनकी संपत्ति जब्त करने और मुकदमा चलाने जैसी रोक‑थाम की व्यवस्था लागू हो।

6. यमुना को पारिस्थितिक दृष्टि से सुदृढ़ करने के लिये न्यूनतम निर्बाध जलप्रवाह सुनिश्चित करने के उद्देश्य से जलप्रबंधन नीतियाँ लागू की जाएं। सहायक नदियों एवं धाराओं के बहाव को बहाल करने के लिए जल आवंटन और सिंचाई नीतियों में समन्वय अत्यावश्यक है।

7. सार्वजनिक पारदर्शिता और जवाबदेही के लिये हर परियोजना का आर्थिक ऑडिट सार्वजनिक किया जाए और परियोजना के समय‑समय पर प्रगति‑रिपोर्ट नागरिक मंचों पर उपलब्ध कराई जाए। कोई भी खर्च बिना स्वतंत्र ऑडिट के स्वीकृत नहीं किया जाए।

ये मांगें कठोर हैं, पर आवश्यक भी। राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना कोई भी नीति टिकाऊ नहीं होती। जब तक प्रशासनिक अधिकारियों और राजनीतिक नेतृत्व की व्यक्तिगत जवाबदेही तय नहीं की जाती, तब तक प्रक्रियाएँ अधूरी रहेंगी। जिन्हें जनता का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुना गया है, उन्हें उन्हें मिलने वाली जवाबदेही का बोझ वहन करना होगा।

यमुना सिर्फ पानी नहीं है; यह ब्रज की स्मृति है, संस्कृति है और जन‑जीवन का स्रोत है। यह हमारे इतिहास का वह धागा है जो पीढ़ियों से जुड़ा हुआ है। अगर हम इसे न बचाएंगे तो न केवल पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ेगा, बल्कि सामाजिक और आर्थिक तबाही भी गहरी होगी। बच्चों की हँसी खत्म नहीं हो सकती; किन्तु अगर नदी को बचाने के लिए हम आज कदम नहीं उठाएंगे, तो भविष्य में और अधिक प्राण जाएंगे।

कन्हा, महक, रिया और विक्की ; ये नाम सिर्फ चार परिवारों के सदस्यों के नहीं हैं; वे हमारी उदासीनता की वह तस्वीर हैं जिसे हम अब और नकार नहीं सकते। केशी घाट और आगरा के घाट की इन घटनाओं का अर्थ केवल व्यक्तिगत दुख नहीं है; यह चेतावनी है कि शासन और समाज ने मिलकर जो जिम्मेदारियाँ ठानी थीं, उन्हें पूरा करना अब जीवन और मृत्यु का प्रश्न बन गया है।

सरकार के पास अभी भी मौका है, कदम उठाइए, पारदर्शिता दिखाइए, और जनता के साथ साझेदारी में यमुना को पुनः जीवित कीजिए। और नागरिकों को भी जागृत होना होगा: सवाल पूछिए, रिपोर्ट माँगिए, स्थानीय निगरानी में भाग लीजिए। अगर नदियाँ मरती हैं तो हमारी सभ्यता का भी दम घुटने लगता है। यमुना बचाने का अर्थ सिर्फ नदी को नहीं बचाना है; यह अपने आप को, अपनी संस्कृति को और आने वाली पीढ़ियों को बचाने का काम है।

अगर आज हम इन मांगों को गंभीरता से लागू कर दें तो और मौतों को रोका जा सकता है। अगर नहीं तो इतिहास और जनता दोनों ही उन लोगों से हिसाब सवाल करेंगे जिन्होंने जानबूझकर आंखें बंद कर रखीं। यमुना को बचाना अब किसी दल विशेष का मुद्दा नहीं रह गया; यह हर नागरिक और हर संवेदनशील संस्थान की नैतिक आवश्यकता बन गया है।

यमुना की रक्षा की लड़ाई अभी बाकी है। और यह लड़ाई जितनी ज़रूरी है, उतनी ही अविलंब भी है। हमें चुनना होगा: किस्मत के हवाले कर देना, या समझदारी और कार्रवाई से अपने भविष्य को सुरक्षित करना।

 दोहरा मापदंड: भारत पर सख़्त, चीन पर नरम क्यों है पश्चिमी मीडिया?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

21 मई 2026

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मई 2026 में जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नॉर्वे दौरे पर गए, तो एक नॉर्वेजियन पत्रकार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस खत्म होने के बाद उनसे सवाल उछाल दिया। सवाल था :  भारत प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में नॉर्वे से बहुत नीचे क्यों है?

वीडियो वायरल हो गया। पश्चिमी मीडिया ने इसे भारत में लोकतंत्र के “गिरते स्तर” की मिसाल बना दिया।

लेकिन ज़रा ठहरिए। आख़िरी बार कब किसी पश्चिमी पत्रकार ने चीन के प्रेस फ्रीडम रिकॉर्ड पर इसी तरह सार्वजनिक तमाशा खड़ा किया था?

चीन उन्हीं सूचियों में सबसे नीचे बैठा है। फिर भी उसकी आलोचना वैसी सुर्खियां नहीं बनाती जैसी भारत की बनती हैं।

यहीं से दोहरे मापदंड की कहानी शुरू होती है। पश्चिमी मीडिया भारत की कमियों को अक्सर तेज़ रोशनी में दिखाता है।

सीएए को मुसलमानों के खिलाफ़ कदम बताया गया। किसान आंदोलन को “तानाशाही प्रवृत्ति” का सबूत कहा गया। कोविड की दूसरी लहर की भयावह तस्वीरें पूरी दुनिया में दिखाई गईं। चुनावों की कवरेज में “हिंदू राष्ट्रवाद” और बहुसंख्यकवाद पर लगातार सवाल उठे।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी पूछते हैं, "इन मुद्दों पर रिपोर्टिंग होना गलत नहीं है। पत्रकारिता का काम ही सवाल पूछना है। मगर सवाल यह है कि भारत के लिए इस्तेमाल होने वाला लहजा इतना कड़ा क्यों होता है, जबकि चीन के मामले में वही तीखापन अक्सर गायब दिखता है?"

चीन पर आरोप हैं कि उसने शिनजियांग में लाखों उइगर मुसलमानों को कैंपों में रखा। यह खबरें भी छपती हैं। लेकिन चीन को लेकर पश्चिमी मीडिया में वैसा लगातार नैरेटिव नहीं बनता कि “लोकतंत्र खतरे में है” या “सिस्टम टूट रहा है।”

क्यों?

क्योंकि दुनिया ने चीन से लोकतंत्र की उम्मीद ही नहीं की।

भारत लोकतांत्रिक देश है, इसलिए उससे ऊंचे आदर्शों की उम्मीद की जाती है। और जब वह उन आदर्शों पर पूरी तरह खरा नहीं उतरता, तो आलोचना कहीं ज्यादा कठोर हो जाती है।

शब्दों की राजनीति बहुत कुछ कहती है । मीडिया सिर्फ खबरों से नहीं, शब्दों से भी धारणा बनाता है, कहते हैं वरिष्ठ पत्रकार  जोज़फ।

भारत के लिए अक्सर शब्द सुनाई देते हैं ;  “बैकस्लाइडिंग”, “मेजॉरिटेरियन”, “हिंदू नेशनलिज्म”। हिंदू-मुस्लिम तनाव की रिपोर्टिंग में कई बार वही पुरानी औपनिवेशिक सोच झलकती है कि भारत एक बंटा हुआ, भावनात्मक और अव्यवस्थित समाज है।

दूसरी तरफ चीन के लिए “स्थिरता”, “कुशल प्रशासन” और “विकास” जैसे शब्द इस्तेमाल होते हैं। उसकी सख़्त सरकारी कार्रवाइयों को कभी-कभी “मजबूत शासन” कहकर पेश किया जाता है। आर्थिक विकास की तारीफ होती है, जबकि मानवाधिकार का मुद्दा पीछे छूट जाता है।

यह सिर्फ मीडिया बायस नहीं, इतिहास की परछाईं भी है।

ब्रिटिश औपनिवेशिक दौर में भारत को अक्सर अंधविश्वासी, अव्यवस्थित और “पश्चिमी मार्गदर्शन” का मोहताज बताकर शासन को जायज़ ठहराया गया था। आज वही सोच नए और अधिक परिष्कृत रूप में कई रिपोर्टों में दिखाई देती है।

खुलापन भी बनता है वजह; एक बड़ा कारण व्यावहारिक भी है।

भारत में प्रेस अपेक्षाकृत खुला है, आजाद है। विदेशी पत्रकार यहां घूम सकते हैं, लोगों से मिल सकते हैं, विवादित मुद्दों पर रिपोर्ट कर सकते हैं। इसलिए भारत की कमियां ज्यादा बाहर आती हैं।

चीन में विदेशी मीडिया पर सख़्त नियंत्रण है। वहां रिपोर्टिंग आसान नहीं। नतीजा यह कि कम खबरें बाहर निकलती हैं।

इसका मतलब यह नहीं कि भारत बदतर है। कई बार इसका मतलब सिर्फ इतना होता है कि भारत ज्यादा खुला समाज है।

पश्चिमी देशों के चीन से बड़े कारोबारी और रणनीतिक रिश्ते हैं। यह हक़ीक़त मीडिया के माहौल को भी प्रभावित करती है, चाहे खुलकर हो या परोक्ष रूप से।

चीन पर बहुत आक्रामक आलोचना कूटनीतिक तनाव बढ़ा सकती है।

भारत पर सवाल उठाना अपेक्षाकृत आसान है, क्योंकि भारत लोकतांत्रिक साझेदार माना जाता है और वहां आलोचना की कुछ गुंजाइश मौजूद है।

यह फर्क क्यों मायने रखता है

मीडिया की छवि सिर्फ अखबार तक सीमित नहीं रहती।

यह निवेशकों, नीति निर्माताओं और आम लोगों की सोच को प्रभावित करती है। व्यापार, विदेश नीति और वैश्विक जनमत पर इसका असर पड़ता है।

1.4 अरब लोगों का देश, जो करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकाल रहा है, दुनिया की सबसे बड़ी चुनावी प्रक्रिया चला रहा है और तेजी से टेक्नोलॉजी शक्ति बन रहा है ;  उसे अगर लगातार नकारात्मक चश्मे से दिखाया जाए, तो तस्वीर अधूरी बन जाती है।

अगर पश्चिमी मीडिया अपनी सारी नैतिक नाराज़गी सिर्फ खुले लोकतंत्रों पर खर्च कर देगा, तो बंद और कठोर व्यवस्थाओं पर जवाबदेही का दबाव कम हो जाएगा।

पश्चिमी न्यूज़रूम में भारत और ग्लोबल साउथ की आवाज़ों को ज्यादा जगह मिलनी चाहिए।

भारत की तुलना सिर्फ  पश्चिमी मॉडल से नहीं, बल्कि समान सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों वाले देशों से भी होनी चाहिए।

भारत में समस्याएं हैं। प्रेस फ्रीडम, सांप्रदायिक तनाव और राजनीतिक ध्रुवीकरण पर सवाल उठने चाहिए। लेकिन वही कसौटी चीन समेत हर देश पर भी बराबरी से लागू होनी चाहिए।

फिलहाल ऐसा नहीं दिखता।

और भारत तथा चीन की कवरेज में यही फर्क पश्चिमी मीडिया के नजरिए के बारे में उतना ही बताता है, जितना इन दोनों देशों के बारे में।


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Tuesday, May 19, 2026

 ज्योतिष, विज्ञान है या कला?

सत्ता के सौदागरों का सबसे बड़ा “कॉस्मिक झांसा”

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बृज खंडेलवाल द्वारा

20 मई 2026

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तमिलनाडु के नए मुख्यमंत्री C. जोसफ विजय ने हाल ही में अपने निजी ज्योतिषी को मुख्यमंत्री कार्यालय में OSD नियुक्त कर दिया। खबर जंगल की आग की तरह फैली। कहा गया कि इसी ज्योतिषी ने वर्षों पहले “भविष्यवाणी” की थी कि विजय एक दिन सत्ता की कुर्सी तक पहुंचेंगे। कुछ ही घंटों में राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई। सहयोगी दलों ने सवाल उठाए। तर्कवाद, वैज्ञानिक सोच और संविधान की दुहाई दी जाने लगी। आखिरकार सरकार को कदम पीछे खींचना पड़ा।

लेकिन असली सवाल अब भी हवा में गूंज रहा है। क्या लोकतंत्र  ग्रहों की चाल से चलेगा? क्या करोड़ों लोगों की किस्मत शनि, राहु और मंगल तय करेंगे? या फिर यह डर, असुरक्षा और सत्ता का वही पुराना कारोबार है, जिसे हर दौर में नया रंग-रोगन लगाकर बेच दिया जाता है?

भारत में सत्ता और ज्योतिष का रिश्ता नया नहीं है। सदियों से राजा-महाराजा युद्ध से पहले राज ज्योतिषियों से सलाह लेते रहे। ज्यादातर लोग कुंडलियों को मिलकर शादियां करते हैं, फिर भी बिगड़ते रिश्तों की संख्या बढ़ रही है।  व्यापारी लंबी यात्राओं से पहले कुंडली दिखाते थे।  सुबह की चाय के साथ राशिफल पढ़ना लगभग सामाजिक आदत बन चुका है। मानो आसमान से हर दिन कोई गुप्त फरमान उतरता हो।

लेकिन चुनाव आते ही यह कारोबार अचानक रॉकेट की रफ्तार पकड़ लेता है। टीवी स्टूडियो किसी “कॉस्मिक कंट्रोल रूम” में बदल जाते हैं। हर चैनल पर कोई “सितारों का विशेषज्ञ” मौजूद रहता है। कोई शनि देखकर सरकार गिरा देता है। कोई राहु के सहारे चुनाव जिता देता है। कोई बुध की चाल से गठबंधन की उम्र बता देता है। लोकतंत्र कम, ग्रहों का रियलिटी शो ज्यादा दिखने लगता है।

राजनीतिक दल भी इस तमाशे में पीछे नहीं रहते। उम्मीदवार “शुभ मुहूर्त” देखकर नामांकन भरते हैं। रैलियों की तारीखें ग्रहों की चाल से तय होती हैं। पार्टी दफ्तरों में रत्न बेचने वाले, अंकशास्त्री और भविष्यवक्ता ऐसे घूमते हैं, जैसे लोकतंत्र नहीं, कोई तांत्रिक मेला लगा हो।

असल में चुनाव डर और बेचैनी का मौसम होते हैं। नेता सत्ता के लिए बेताब रहते हैं। टीवी चैनलों को टीआरपी चाहिए। जनता महंगाई, बेरोजगारी और तनाव से परेशान रहती है। ऐसे माहौल में  लोग तर्क नहीं, तसल्ली खोजने लगते हैं।

मीडिया की भूमिका भी कम दिलचस्प नहीं। कई चैनल सेलिब्रिटी ज्योतिषियों को वैज्ञानिकों जैसी गंभीरता से पेश करते हैं। कोई आर्थिक तबाही की भविष्यवाणी करता है। कोई राजनीतिक भूचाल की चेतावनी देता है। कोई “देश पर संकट” का ऐलान कर देता है। अगर कुछ नहीं होता, तो कोई जवाबदेही नहीं। अगले हफ्ते वही चेहरा नई चमक के साथ फिर स्क्रीन पर लौट आता है।

सबसे खतरनाक वे “कयामत वाले बाबा” हैं, जो डर बेचते हैं। वे ग्रहों के बहाने युद्ध, महामारी, बर्बादी और राष्ट्रीय संकट की बातें फैलाते हैं। डर हमेशा बिकता है। ठंडी समझदारी नहीं।

भारत की आध्यात्मिक परंपरा बेहद समृद्ध रही है। यहां दर्शन, चिंतन और आत्ममंथन की लंबी विरासत है। लेकिन टीवी पर परोसी जा रही अंधभक्ति और सनसनीखेज भविष्यवाणियों पर आंख मूंदकर भरोसा करना समाज की तार्किक सोच को कमजोर कर रहा है। लोकतंत्र को जागरूक नागरिक चाहिए, डरे हुए राशिफल भक्त नहीं।

सच यह है कि ज्योतिष हर बड़े वैज्ञानिक परीक्षण में कमजोर साबित हुआ है। दावा किया जाता है कि ग्रह-नक्षत्र इंसान के स्वभाव, रिश्तों और भविष्य को प्रभावित करते हैं। मगर आज तक कोई वैज्ञानिक यह नहीं समझा पाया कि करोड़ों किलोमीटर दूर मौजूद मंगल या शनि किसी की नौकरी, शादी या चुनावी किस्मत कैसे तय कर सकते हैं।

भौतिक विज्ञान के अनुसार ग्रहों का गुरुत्वाकर्षण असर तो होता है, लेकिन वह इतना सूक्ष्म है कि जन्म के समय पास खड़े अस्पताल के उपकरणों का प्रभाव कई बार उससे अधिक हो सकता है। फिर भी लोग विश्वास क्यों करते हैं?

क्योंकि ज्योतिष का धंधा विज्ञान से ज्यादा मनोविज्ञान पर चलता है। इंसान स्वभाव से पैटर्न खोजता है। हम अव्यवस्था में अर्थ तलाशते हैं। मुश्किल वक्त में उम्मीद और सहारा चाहते हैं। ज्योतिष वही देता है, रहस्यमयी शब्दों और चमकीली भाषा में।

राशिफल अक्सर इतने धुंधले होते हैं कि हर किसी पर फिट बैठ जाएं।

“आज कोई चुनौती आ सकती है।”

“पुराना संबंध फिर सामने आ सकता है।”

“धन के मामलों में सावधानी रखें।”

ऐसी बातें लगभग हर इंसान पर लागू हो सकती हैं। मनोविज्ञान में इसे “बार्नम इफेक्ट” कहा जाता है, जहां सामान्य बातें भी हमें अपनी निजी सच्चाई लगने लगती हैं।

1985 में वैज्ञानिक पत्रिका Nature में प्रकाशित एक चर्चित प्रयोग और बाद के कई अध्ययनों ने दिखाया कि पेशेवर ज्योतिषियों की भविष्यवाणियां अनुमान से बेहतर नहीं थीं। अलग-अलग ज्योतिषी एक ही कुंडली की अलग व्याख्या करते मिले।  कई चर्चित ज्योतिषियों की भविष्यवाणियां बार-बार गलत साबित हुईं। सही निकले कुछ तुक्कों को खूब प्रचार मिलता है, लेकिन असफल भविष्यवाणियां जल्दी भुला दी जाती हैं।

सुबह चाय के साथ राशिफल पढ़ लेना कोई गुनाह नहीं। समस्या तब शुरू होती है जब लोग जिंदगी के बड़े फैसले तर्क और जानकारी की जगह ग्रहों के भरोसे लेने लगते हैं। कोई व्यापारी निवेश टाल देता है क्योंकि “बुध वक्री” है। कोई परिवार अच्छा रिश्ता ठुकरा देता है क्योंकि कुंडली नहीं मिली। कोई मरीज इलाज छोड़ देता है क्योंकि “शनि भारी” है। कोई नेता जनता की जरूरत नहीं, ज्योतिषी की सलाह सुनने लगता है।

रात का आसमान बेहद खूबसूरत है। तारों को देखकर हैरत होती है। ग्रह कल्पना को उड़ान देते हैं। लेकिन खूबसूरती सबूत नहीं होती। रहस्य हमेशा सच नहीं होता।


Sunday, May 17, 2026

 आगरा जल त्रासदी: 21 मई 1993

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अब भी नहीं सीखे सबक: अगली जल त्रासदी से पहले क्या भारत जागेगा?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

19 मई 2026

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21 मई 1993 को आगरा की पानी की टोंटियों से मौत बह निकली थी।

घटिया, खटीक पाड़ा और मंडी सईद खान की तंग गलियों में लोगों ने रोज़ की तरह वाटर वर्क्स का पानी पिया। कुछ ही घंटों में घरों में अफरा-तफरी मच गई। बच्चों को उल्टियाँ और तेज़ बुखार होने लगा। पूरे परिवार अस्पतालों की तरफ भागे। 200 से ज़्यादा लोग बुरी तरह बीमार पड़े। दूषित पानी पीने से 21 लोगों की जान चली गई।

ग़ुस्सा बहुत था। वादे भी हुए। अफसरों ने जांच और जवाबदेही की बातें कीं। लेकिन वक्त बीतता गया और शोर खामोशी में बदल गया। किसी को सचमुच सज़ा नहीं मिली। पीड़ित परिवार आज भी जवाब तलाश रहे हैं। गीता देवी जैसी महिलाएं, जिन्होंने इस हादसे में अपना पति खोया, आज भी कहती हैं कि गंदा पानी पाइपलाइनों से बहता रहता है।

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यह त्रासदी सिर्फ गंदे पानी की नहीं थी। इसने भारत की पानी प्रबंधन, शहरों की योजना और सरकारी जवाबदेही की पुरानी लापरवाही को नंगा कर दिया। सिस्टम आगे बढ़ गया, मगर सबक पीछे छूट गया।

अब 2026 में फिर एक खतरे की घंटी बज रही है। सवाल फिर डरावनी शक्ल में सामने खड़ा है। क्या हमने कुछ बदला भी है?

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का आसमान पहले से थका हुआ दिखने लगा है। तपती गर्मी में धरती जगह-जगह फट रही है। गांवों के तालाब अब कीचड़ भरे गड्ढों जैसे लगते हैं। भैंसें सिकुड़ते पानी में चुपचाप खड़ी मक्खियां उड़ाती रहती हैं। किसान दूर आसमान को ऐसे देखते हैं जैसे कोई अधूरा वादा लौटने वाला हो।

यमुना भी अब थकी हुई लगती है। कई जगह नदी एक पतली, संघर्ष करती धारा में बदल गई है। कई इलाकों में भूजल स्तर 300 फीट से नीचे चला गया है। हैंडपंप हांफ रहे हैं। बोरवेल हर साल और गहरे खोदे जा रहे हैं।

अब मौसम विभाग की चेतावनी ने बेचैनी बढ़ा दी है।

भारतीय मौसम विभाग ने कहा है कि 2026 का दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से कम रह सकता है। अनुमान है कि बारिश औसत का लगभग 92 प्रतिशत ही होगी। मौसम वैज्ञानिक इसके पीछे प्रशांत महासागर में मजबूत होते एल नीनो प्रभाव को जिम्मेदार मान रहे हैं। यही असर भारत में मानसून को कमजोर करता है और सूखे जैसे हालात पैदा करता है।

करोड़ों भारतीयों के लिए यह सिर्फ मौसम की खबर नहीं, बल्कि आर्थिक खतरे की घंटी है।

चाय की दुकानों, अनाज मंडियों और गांव की चौपालों पर बातचीत का रंग बदल चुका है। किसान अब मुनाफे की नहीं, बचने की बात कर रहे हैं। डीजल महंगा हो रहा है। नहरें सूखी पड़ी हैं। पशुओं का चारा महंगा होता जा रहा है। गर्म हवा में बेचैनी तैर रही है।

आगरा के पास एक बुजुर्ग किसान माथे का पसीना पोंछते हुए कहता है, “अगर जुलाई सूखी निकल गई, तो हम खत्म हो जाएंगे।”

भारत आज भी बारिश पर खतरनाक हद तक निर्भर है। देश की सालाना बारिश का 70 से 80 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ चार मानसूनी महीनों में आता है। आधे से ज्यादा खेत अब भी सिंचाई नहीं, बल्कि आसमान की मेहरबानी पर टिके हैं। एक कमजोर मानसून फसल बर्बादी, महंगाई, बेरोजगारी और गांवों की बदहाली ला सकता है।

लेकिन असली खतरा सिर्फ कम बारिश नहीं, बेतरतीब बारिश है।

एक जिला डूब सकता है, दूसरा प्यासा रह सकता है। देर से आने वाला मानसून, अचानक बादल फटना या लंबे सूखे दौर, कई बार पूरे सूखे से ज्यादा नुकसान करते हैं। खेती को कमी से ज्यादा अनिश्चितता डराती है।

फिर भी भारत हर मानसून के पहले लगभग बिना तैयारी के खड़ा मिलता है।

नदियां गाद से भरी पड़ी हैं। झीलें और तालाब अतिक्रमण, कूड़े और कंक्रीट के नीचे गायब हो चुके हैं। गांवों की जीवनरेखा रहे पारंपरिक जल स्रोत दशकों से उपेक्षित पड़े हैं। वर्षा जल संचयन अब ज्यादातर भाषणों, सरकारी फाइलों और चमकदार सेमिनारों के बैनरों तक सीमित है।

विडंबना देखिए।

हर मानसून में शहर कुछ घंटों की बारिश में डूब जाते हैं। सड़कें तालाब बन जाती हैं। पानी नालों में बहाकर बर्बाद कर दिया जाता है। फिर कुछ महीनों बाद वही शहर टैंकरों के पानी पर निर्भर हो जाते हैं। कुदरत दिल खोलकर देती है, मगर बदइंतजामी सब लूट लेती है।

उत्तर भारत का भूजल संकट अब खामोश खतरे में बदल चुका है। जरूरत से ज्यादा दोहन, कमजोर रिचार्ज सिस्टम और घटती बारिश ने जमीन के नीचे इमरजेंसी पैदा कर दी है। धरती को जितनी तेजी से खाली किया जा रहा है, उतनी तेजी से वह भर नहीं पा रही।

हल कोई रहस्य नहीं हैं। और नामुमकिन भी नहीं।

नहरों, जलाशयों और नदियों की तुरंत सफाई और गाद निकासी होनी चाहिए। गांवों के तालाब बचाए और दोबारा जिंदा किए जाएं। शहरों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग अनिवार्य हो। किसानों को ड्रिप सिंचाई और सूखा सहने वाली फसलों के लिए मदद मिले। मनरेगा जैसी योजनाओं का इस्तेमाल जल संरक्षण के कामों में कहीं बेहतर तरीके से हो सकता है।

सरकारें “वॉर फुटिंग” की बातें करती हैं, मगर हजारों गांवों में बुनियादी जल ढांचा टूटा या गायब है। बड़ी घोषणाएं सुर्खियां बनती हैं, जबकि जमीन पर रिसती पाइपलाइनें, सूखे हैंडपंप और मरते तालाब ही हकीकत बयान करते हैं।

आगरा के यमुना घाटों पर अच्छी बारिश के लिए विशेष प्रार्थनाएं शुरू हो चुकी हैं। आस्था मुश्किल समय में हौसला देती है। मगर सिर्फ दुआएं भूजल नहीं भर सकतीं, नहरें नहीं सुधार सकतीं और गंदी पाइपलाइनों को साफ नहीं कर सकतीं।

विज्ञान हमें पहले ही चेतावनी दे चुका है। अनुभव भी चेता चुका है। इतिहास भी अपना सबक दे चुका है।

1993 की आगरा जल त्रासदी को भारत की जल सुरक्षा और प्रशासनिक सोच बदल देनी चाहिए थी। लेकिन वह भी सरकारी बेरुखी की धूल में दबा एक भूला हुआ अध्याय बन गई।

बादल अभी दूर हैं। मगर डर पहले ही पहुंच चुका है।

2026 की असली परीक्षा सिर्फ बारिश की नहीं होगी। यह याददाश्त, शासन और जिम्मेदारी की परीक्षा होगी। जो देश अपनी जल त्रासदियों से सबक नहीं सीखता, वह उन्हें बार-बार दोहराने के लिए मजबूर हो जाता है। और हर बार इंसानी कीमत पहले से ज्यादा भारी होती है।

 तिलचट्टा, परजीवी.......

शब्दों की मर्यादा और अदालतों की गरिमा

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मान भी लें कि कुछ गलत एलिमेंट्स मीडिया में दाखिल हो चुके हैं, और कई एक्टिविस्ट्स सूचनाधिकार का दुरुपयोग करते हैं, तो क्या समूची बिरादरी को कटघरे में खड़ा करना उचित है? वकालत में, डाक्टरी में, न्यायिक व्यवस्था में, राजनीति में, सभी जगह काली भेड़ें अमर्यादित कार्य कर रही हैं, लेकिन क्या पूरा सिस्टम दोषी है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

18 मई 2026

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अदालतों की इमारतें सिर्फ पत्थर और दीवारों से नहीं बनतीं। उनका असली आधार जनता का भरोसा होता है। इसलिए जब न्यायपालिका जैसे सर्वोच्च संवैधानिक मंचों से कठोर शब्द निकलते हैं, तो वे सिर्फ एक टिप्पणी नहीं रहते, समाज के लिए एक व्यापक संदेश बन जाते हैं। 

हाल में “तिलचट्टे” और “परजीवी” जैसे शब्दों के इस्तेमाल ने एक नई बहस को उकसाया है।

15 मई 2026 को वरिष्ठ अधिवक्ता पदनाम से जुड़ी सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने उन लोगों पर चिंता जताई, जो वैध योग्यता या पेशेवर क्षमता के बिना मीडिया, सोशल मीडिया और आरटीआई एक्टिविज्म के जरिए संस्थाओं पर लगातार हमला करते हैं। उन्होंने कुछ तत्वों के लिए “तिलचट्टे” और “परजीवी” जैसे शब्दों का प्रयोग किया। 

हालांकि, बाद में उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणी पूरे युवावर्ग या सभी एक्टिविस्टों के लिए नहीं थी, बल्कि उन लोगों के लिए थी जो गलत तरीकों से व्यवस्था का दुरुपयोग करते हैं। यह स्पष्टीकरण जरूरी था और उसका स्वागत होना चाहिए।

लेकिन इसके बावजूद एक असहज सवाल बना रहता है। क्या इतनी तीखी भाषा जरूरी थी?

भारत का युवा पहले ही भारी दबाव में जी रहा है। बेरोजगारी बढ़ रही है। प्रतियोगिता लगातार कठिन होती जा रही है। लाखों पढ़े-लिखे युवा नौकरी, अवसर और पहचान की तलाश में भटक रहे हैं। ऐसे माहौल में जब ऊंचे संवैधानिक पदों से व्यापक टिप्पणियां आती हैं, तो कई लोगों को लगता है कि उनकी निराशा और संघर्ष को समझने के बजाय उनका मजाक बनाया जा रहा है। लोकतंत्र में असहमति रखने वाला हर व्यक्ति दुश्मन नहीं होता।

यह भी उतना ही सच है कि मीडिया, सोशल मीडिया और आरटीआई का दुरुपयोग हुआ है। कुछ लोग व्यक्तिगत एजेंडा चलाते हैं। कुछ यूट्यूब चैनल सनसनी बेचते हैं। कुछ लोग आरटीआई को सूचना के अधिकार की जगह निजी बदले का हथियार बना देते हैं। अदालतों पर भी कई बार बिना तथ्यों के आरोप लगाए जाते हैं। सोशल मीडिया पर न्यायपालिका के खिलाफ फर्जी अभियान चलाए जाते हैं। यह सब चिंता का विषय है।

मीडिया ट्रायल के उदाहरण हमारे सामने हैं। जेसिका लाल हत्याकांड, आरुषि तलवार मामला और सुशांत सिंह राजपूत केस में टीवी स्टूडियो अदालत से पहले फैसले सुनाने लगे थे। चीखती बहसों और सनसनीखेज रिपोर्टिंग ने निष्पक्ष सुनवाई पर असर डाला। सुप्रीम कोर्ट खुद कई बार मीडिया को चेतावनी दे चुका है कि sub-judice मामलों में संयम जरूरी है।

इसी तरह अदालतों ने आरटीआई के दुरुपयोग पर भी चिंता जताई है। कई मामलों में अधिकारियों ने कहा कि निरर्थक और बार-बार दाखिल आरटीआई आवेदन कामकाज को प्रभावित करते हैं। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी कुछ मामलों में माना कि बदले की भावना से डाली गई आरटीआई व्यवस्था में “fear and paralysis” पैदा करती हैं। यह चिंता पूरी तरह गलत नहीं कही जा सकती।

लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं: "इसी आरटीआई कानून ने भ्रष्टाचार के कई बड़े मामलों को उजागर किया। इसी ने आम नागरिक को सवाल पूछने की ताकत दी। कई स्वतंत्र पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सत्ता के दुरुपयोग को सामने लाने का साहस दिखाया। लोकतंत्र में असहज सवाल पूछना अपराध नहीं होना चाहिए।"

समस्या यह है कि आज हर आलोचना को दुश्मनी और हर सवाल को षड्यंत्र मान लेने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। यही प्रवृत्ति संस्थाओं और जनता के बीच दूरी पैदा करती है। अदालतों की ताकत सिर्फ अवमानना की शक्ति में नहीं, बल्कि जनता के नैतिक विश्वास में होती है।

एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि अदालत की गरिमा बनाए रखने का सबसे अच्छा तरीका उसके फैसलों की गुणवत्ता और न्यायपूर्ण व्यवहार है। यह बात आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। बड़े पदों पर बैठे लोगों के शब्दों में कठोरता नहीं, संतुलन ज्यादा दिखाई देना चाहिए।

न्यायिक स्वतंत्रता लोकतंत्र की रीढ़ है और उसकी रक्षा हर हाल में होनी चाहिए। लेकिन सम्मान और रचनात्मक आलोचना एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। दोनों साथ-साथ चल सकते हैं।

एक विविध, बेचैन और तनावग्रस्त समाज में अदालतों की भूमिका सिर्फ कानून लागू करने की नहीं, भरोसा पैदा करने की भी है। इसलिए न्यायपालिका से निकले शब्द ऐसे होने चाहिए जो लोगों को जोड़ें, तोड़ें नहीं। अदालतों की असली ताकत डर पैदा करने में नहीं, बल्कि न्याय और संवेदनशीलता के साथ विश्वास कायम करने में है।

Saturday, May 16, 2026

 मोदी जी की गांधीवादी अपील, लेकिन सरकारी नीतियां गांधी-विरोधी

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

17 मई 2026

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लोकतंत्र की सड़क पर दौड़ता नया सामंतवाद

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देश बदलने का दावा था।

लेकिन सड़कों पर अब भी वही पुराना दृश्य है। आगे लाल बत्ती जैसी अकड़। पीछे सायरनों की चीख। आम आदमी ट्रैफिक में पसीना बहाता खड़ा है और नेताओं के काफिले हवा चीरते निकल जाते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पुराने राजा हाथी पर चलते थे, नए शासक एसयूवी के झुंड में चलते हैं।

यह वीआईपी संस्कृति केवल सुरक्षा का सवाल नहीं रही। यह सत्ता के प्रदर्शन का सार्वजनिक तमाशा बन चुकी है। रोड शो, फूल वर्षा, दर्जनों गाड़ियाँ, बंद सड़कें, विशेष लाउंज, अलग कतारें, सरकारी संसाधनों का खुला दुरुपयोग। लोकतंत्र के नाम पर एक नई वर्ण व्यवस्था खड़ी की जा रही है। ऊपर “विशेष नागरिक” और नीचे धक्के खाती जनता।

विडंबना देखिए। चुनावों में नेता खुद को “जनसेवक” कहते हैं। जीतते ही वे जनता से भौतिक दूरी बना लेते हैं। उनके लिए सड़कें खाली कराई जाती हैं, अस्पतालों में वार्ड रोके जाते हैं, पुलिस सुरक्षा ढाल बन जाती है। जनता टैक्स देती है, फिर उसी पैसे से पैदा हुई असुविधा झेलती है।

यह परिवर्तन नहीं है। यह एलीट सामंतवाद का नया संस्करण है। लोकतंत्र की आत्मा बराबरी में बसती है, विशेषाधिकारों में नहीं। जिस दिन सत्ता का काफिला आम आदमी के ट्रैफिक में फँसने लगेगा, शायद उसी दिन असली लोकतंत्र सड़क पर दिखाई देगा।

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महात्मा गांधी की धरती पर, जहां सादगी, आत्मनिर्भरता और संयम हमेशा से हमारी संस्कृति का हिस्सा रहा है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हालिया ऑस्टेरिटी का आह्वान ज़रूरी तो है, मगर बेहद विडंबनापूर्ण भी है। पश्चिम एशिया के संकट और बढ़ते तेल के दामों के बीच मोदी जी ने लोगों से अपील की कि वर्क-फ्रॉम-होम करें, पेट्रोल-डीज़ल बचाएं, पब्लिक ट्रांसपोर्ट और इलेक्ट्रिक गाड़ियां इस्तेमाल करें, विदेश यात्राएं और सोने की खरीदारी टालें, खाने के तेल का कम इस्तेमाल करें और लोकल चीज़ें खरीदें।

ये अपील सही है क्योंकि हमारा देश वेस्ट एशिया से आने वाले क्रूड ऑयल पर बहुत निर्भर है। लेकिन ये उपदेश खोखले लगते हैं जब हम देखते हैं कि पिछले दस साल से सरकार ने ठीक उसी हाई-कंज़म्पशन, मशीन-निर्भर और कार-केंद्रित जीवनशैली को बढ़ावा दिया है जिसके खिलाफ गांधी जी ने चेतावनी दी थी।

गांधी जी की ऑस्टेरिटी सिर्फ संकट का हल नहीं थी, बल्कि जीवन की पूरी दर्शनशैली थी। उन्होंने कहा था कि “मैं हर तरह की विनाशकारी मशीनरी का कड़ा विरोधी हूँ”। वे ऐसी मशीनें चाहते थे जो इंसान को गुलाम न बनाएँ, बल्कि मदद करें। गांधी जी शारीरिक मेहनत, गांव की आत्मनिर्भरता और प्रकृति के साथ सामंजस्य पर ज़ोर देते थे। 

लेकिन मोदी सरकार ने $3 ट्रिलियन इकॉनमी का सपना पूरा करने के चक्कर में बुलेट ट्रेन और विशाल एक्सप्रेसवे जैसे मेगा प्रोजेक्ट्स पर ज़ोर दिया। ये प्रोजेक्ट्स तेज़ रफ़्तार और अमीरों की कार मोबिलिटी को बढ़ावा देते हैं। लग्ज़री कारों की बिक्री बढ़ रही है, जबकि आम मध्यवर्गी परिवार पेट्रोल-डीज़ल और LPG के महंगे दामों से परेशान हैं। अमीर लोग विदेश घूमते रहते हैं, शादी-ब्याह धूमधाम से करते हैं, सोना खरीदते हैं – उनकी ज़िंदगी पर कोई असर नहीं। सिर्फ आम आदमी को कष्ट झेलना पड़ता है।

सबसे निंदनीय बात ये है कि इंसानी गतिशीलता (human mobility) को पूरी तरह नज़रअंदाज़ किया गया। हमारे सड़कें अब कमज़ोरों के लिए कत्लगाह बन गई हैं। हर साल 1.75 लाख से ज़्यादा लोग सड़क दुर्घटनाओं में मरते हैं, जिनमें ज़्यादातर पैदल चलने वाले, साइकिल वाले और दोपहिया वाहन चलाने वाले होते हैं। फुटपाथ या तो हैं ही नहीं या अतिक्रमण से भरे हैं। साइकिल लेन लगभग नदारद हैं। एक्सप्रेसवे स्पीड के लिए बने हैं, सुरक्षा के लिए नहीं। 

गांधी जी जो खुद पैदल चलते थे और शारीरिक श्रम को महत्व देते थे, इस कार-केंद्रित मॉडल को देखकर दुखी होते। सरकार ने गांधीवादी रास्ते से मुड़कर चमक-दमक वाली आधुनिकता को अपनाया है। अब संकट के वक्त सादगी का उपदेश दिया जा रहा है। 

ये उपदेश सिर्फ़ शब्दों तक सीमित न रहें। असली बदलाव तब आएगा जब पैदल चलने वालों और साइकिलिस्टों के लिए सुरक्षित रास्ते बनाए जाएंगे, कार मोबिलिटी की जगह इंसानी मोबिलिटी को तरजीह दी जाएगी, तेज़ी और लग्ज़री का राग अलापना कम होगा और लोकल, सादा और आत्मनिर्भर जीवनशैली को बढ़ावा मिलेगा।

इस संकट के वक्त मोदी जी के शब्द गांधी को याद दिलाते हैं, लेकिन नीतियां और इंफ्रास्ट्रक्चर कुछ और ही कहानी बयान करते हैं। अगर एक्सट्रावगैंजा (फिजूलखर्ची) से इक्विटी (न्याय) की तरफ नहीं बदला गया तो ये उपदेश सिर्फ़ दिखावा बनकर रह जाएंगे। 

भारत को गांधी के सिद्धांत को सिर्फ़ तेल के संकट में नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बनाना होगा : सादगी, संयम और सबके लिए विकास। 






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Wednesday, May 13, 2026

 क्यों डूब रहे हैं यमुना में लोग?

लापरवाही या साजिश? 

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

15 मई 2026

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गर्मियों की शाम को यमुना किनारे का माहौल बेहद आकर्षक होता है। ठंडी हवा, परिवारों की चहल-पहल, बच्चों की हँसी-खिलखिलाहट और नदी का शांत बहाव: सब कुछ मन को सुकून देता है। 

लेकिन यही यमुना अचानक अपना रौद्र रूप दिखा देती है। ऊपर से शांत दिखता पानी नीचे तेज़ धारा और खतरनाक भंवर छिपाए रखता है। 

12 मई 2026 को आगरा के एक घाट पर ठीक यही हुआ। एक परिवार जन्मदिन की खुशी मना रहा था। छह युवा नदी में नहाने उतरे। शुरू में पानी घुटनों तक था, सब हँस रहे थे, वीडियो बना रहे थे। लेकिन कुछ कदम आगे बढ़ते ही पैर फिसले, पानी गहरा हो गया और तेज़ धारा ने चार जिंदगियों को निगल लिया।

मृतकों में 22 वर्षीय कन्हा सिंह, 19 वर्षीय महक कुमारी, 17 वर्षीय रिया और मात्र 13 वर्षीय विक्की सिंह शामिल थे। दो लोग बच गए—उनमें महक और अंशु भाई-बहन थे। एक भाई अपनी बहन को डूबते देख रहा हो, यह दृश्य कल्पना से परे है। पुलिस और गोताखोरों ने दो घंटे तक रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया, लेकिन परिवार की खुशियाँ लौट नहीं सकीं।

यह कोई पहली घटना नहीं है। कुछ हफ्ते पहले अप्रैल 2026 में वृंदावन के केशी घाट के पास एक बड़ा नाव हादसा हुआ। पंजाब से आए तीर्थयात्रियों से भरी नाव (लगभग 30-37 लोग) पोंटून पुल से टकराकर पलट गई। क्षमता से ज्यादा सवारियाँ, लाइफ जैकेट्स की कमी: इन सबके चलते 15-16 लोगों की जान चली गई। कई शव घंटों बाद मिले। ऐसे हादसे आगरा, मथुरा और वृंदावन के इलाके में हर गर्मी में दोहराते रहते हैं—नहाते समय, सेल्फी लेते समय या नाव पलटने से।

क्यों बार-बार होती हैं ये त्रासदियाँ?

पहला बड़ा कारण: घाटों पर सुरक्षा की भयानक कमी। चेतावनी बोर्ड अक्सर टूटे या फीके पड़े रहते हैं। लाइफगार्ड की तैनाती न के बराबर। बैरिकेडिंग अधूरी, गहरे पानी की सही मार्किंग नहीं। पुलिस गश्त अनियमित। कई घाटों पर कोई सिस्टम नहीं जो नदी की अचानक बदलती धारा के बारे में लोगों को सचेत कर सके। बल्केश्वर घाट पर भी यही हुआ: शुरुआती उथला पानी लोगों को गुमराह कर गया।

दूसरा कारण: नदी का बदला हुआ स्वरूप। यमुना अब अपनी पुरानी प्राकृतिक अवस्था में नहीं है। अनियंत्रित रेत खनन (sand mining) ने नदी के तल को गहरा और अनियमित बना दिया है। अचानक गड्ढे बन गए हैं, कटाव बढ़ा है और रेत खिसकती रहती है। बैराजों (जैसे हथनीकुंड, वजीराबाद आदि) से अचानक पानी छोड़े जाने से धारा तेज़ हो जाती है। ऊपर शांत दिखने वाला पानी नीचे बहुत तेज़ गति से बहता है। अध्ययनों में पाया गया है कि रेत खनन नदी के flow regime को बदल देता है, जिससे localized high-velocity currents बनते हैं, जो तैराकों के लिए घातक साबित होते हैं।

तीसरा कारण: मानवीय लापरवाही।शराब पीकर नदी में उतरना, बच्चों को बिना निगरानी छोड़ देना, गहराई का अंदाज़ा न लगाना और सबसे बड़ा, सेल्फी का खतरनाक जुनून। युवा अक्सर उथले पानी से आगे बढ़ जाते हैं, बिना यह सोचे कि नीचे क्या छिपा है। नावों में भी क्षमता से ज्यादा भीड़, लाइफ जैकेट न पहनना और बोटमैन की लापरवाही आम है। केशी घाट हादसे में यही देखा गया; नाव पोंटून से टकराई क्योंकि नियंत्रण नहीं था।

चौथा कारण: विकास बनाम सुरक्षा का असंतुलन। आगरा-मथुरा-वृंदावन धार्मिक पर्यटन के बड़े केंद्र हैं। करोड़ों रुपये घाटों को सजाने, लाइटें लगाने और पर्यटकों को आकर्षित करने में खर्च हो रहे हैं। लेकिन सुरक्षा इंतजाम अभी भी भगवान भरोसे हैं। श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ रही है, पर उनकी जान-माल की सुरक्षा पर पर्याप्त ध्यान नहीं। हर हादसे के बाद “जांच होगी, सुरक्षा बढ़ेगी” जैसे बयान आते हैं, लेकिन कुछ दिनों बाद सब भूल जाता है।

क्या कहते हैं आंकड़े और वास्तविकता?

इस इलाके में हर साल गर्मियों में कई मौतें होती हैं। कुछ मामलों में अचानक पानी बढ़ने या कीचड़,  sludge में फंसने से भी हादसे हुए हैं। राष्ट्रीय स्तर पर भारत में डूबने से होने वाली मौतों में बच्चों और युवाओं का बड़ा हिस्सा होता है, और नदियों के किनारे की लापरवाही इसका प्रमुख कारण है। यमुना में प्रदूषण तो अलग मुद्दा है, लेकिन safety के लिहाज से यह “मौत का दरवाजा” बन चुकी है।

सरकारी स्तर पर तत्काल कदम जरूरी हैं:

- हर घाट पर मजबूत बैरिकेडिंग, स्पष्ट गहराई मार्किंग और रियल-टाइम धारा चेतावनी सिस्टम।

- प्रशिक्षित लाइफगार्ड और गोताखोरों की स्थायी तैनाती।

- नाव संचालन के लिए सख्त नियम: क्षमता सीमा, लाइफ जैकेट अनिवार्य, बोट फिटनेस सर्टिफिकेट और CCTV निगरानी।

- रेत खनन पर सख्त नियंत्रण और नदी तल का वैज्ञानिक अध्ययन।

लेकिन सिर्फ सरकारी कार्रवाई काफी नहीं। सामाजिक जागरूकता भी उतनी ही जरूरी है। नदी कोई पिकनिक स्पॉट नहीं है। परिवारों को बच्चों को अकेले पानी में नहीं जाने देना चाहिए। गहराई जांचे बिना न उतरें। स्थानीय चेतावनियों को नजरअंदाज न करें। नाव में हमेशा लाइफ जैकेट पहनें।

यमुना हमारी संस्कृति और आस्था का अभिन्न अंग है। भगवान कृष्ण की लीला से जुड़ी यह नदी श्रद्धा का प्रतीक है। लेकिन आस्था का मतलब आँखें बंद करके खतरे में कूदना नहीं। सावधानी भी श्रद्धा का ही हिस्सा है। जब तक हम व्यक्तिगत जिम्मेदारी और सामूहिक सतर्कता नहीं अपनाएंगे, यमुना का पानी दर्पण की जगह मौत का आईना बनता रहेगा।

ये त्रासदियाँ हमें याद दिलाती हैं कि प्रकृति के साथ खिलवाड़ और लापरवाही की कीमत इंसान को अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है। अब वक्त है कि हम सिर्फ शोक व्यक्त न करें, बल्कि ठोस बदलाव लाएँ—ताकि कोई और परिवार इस यमुना के छलावे का शिकार न बने।

Tuesday, May 12, 2026

 


आगरा: सभ्यता का शहर या अव्यवस्था का दलदल?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

14 मई 2026

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तीन सांसद, एक दर्जन विधायक, सौ पार्षद और एक मेयर बताएं, "कैसे एक ऐसा शहर, जिसने दुनिया को ताजमहल जैसा अजूबा दिया, खुद इंसानों के लिए सज़ा बनता जा रहा है?"

कैसे मुगल तहज़ीब, नफ़ासत और खूबसूरती का प्रतीक शहर आज धुएँ, शोर, ट्रैफिक जाम, टूटी सड़कों, कब्ज़ों, आवारा पशुओं और प्रशासनिक लापरवाही के नीचे दम तोड़ रहा है?

और क्या यह हमारे दौर की सबसे बड़ी विडंबना नहीं कि दुनिया भर से लोग ताजमहल देखने आते हैं, लेकिन आगरा की सड़कों पर चलना  पानीपत की युद्धभूमि पार करने जैसा अनुभव बन जाता है?

लोकल सिविल सोसाइटी लीडर्स मानते हैं कि आगरा अब केवल भीड़भाड़ वाला शहर नहीं रहा। यह धीरे धीरे एक सभ्यतागत दलदल में बदलता जा रहा है। ऐसा शहर, जहाँ विकास का मतलब केवल गाड़ियाँ बढ़ाना, फ्लाईओवर बनाना और इंसानों को किनारे करना रह गया है।

दिक्कत यह नहीं कि शहर बढ़ रहा है। हर शहर बढ़ता है। असली त्रासदी यह है कि आगरा बिना सोच, बिना योजना और बिना इंसानी संवेदनाओं के फैल रहा है।

हर सुबह लाखों लोग ऐसी सड़कों पर निकलते हैं जहाँ पैदल चलना किसी जोखिम से कम नहीं। फुटपाथ या तो हैं नहीं, या टूटे पड़े हैं, या दुकानदारों और ठेलों ने कब्ज़ा कर रखा है। जहाँ थोड़ी जगह बचती है, वहाँ मोटरसाइकिलें और कारें पार्क मिलती हैं। मजबूर होकर लोग सड़क पर चलते हैं, जहाँ बसें, ट्रक, ई रिक्शा, बाइक और तेज रफ्तार कारें हर पल उन्हें निगलने को तैयार रहती हैं।

"कमज़ोर आदमी यहाँ ट्रैफिक में नहीं चलता, बस बचने की कोशिश करता है," पद्मिनी अय्यर, एक सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा।

बुज़ुर्ग घर से निकलने से डरते हैं। बच्चे सड़क पार करना सीखने से पहले खतरा पहचानना सीख जाते हैं। महिलाओं के लिए रास्ता केवल सफर नहीं, संघर्ष बन चुका है। साइकिल चलाने वाला आदमी तो मानो शहर की नज़रों में गुनहगार हो, एक जूता फैक्ट्री वर्कर ने कहा। 

यह शहरीकरण नहीं, संगठित अव्यवस्था है।

सुप्रीम कोर्ट ने मई 2025 में साफ कहा कि बाधारहित और दिव्यांग अनुकूल फुटपाथ नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है। लेकिन आगरा जैसे शहरों में यह फैसला भी दीवार पर टंगे एक और सरकारी नारे की तरह रह गया। स्थानीय प्रशासन अब भी फुटपाथ को इंसानों की जरूरत नहीं, खाली पड़ी ज़मीन मानता है।

विडंबना देखिए। विदेशों से आने वाले पर्यटक उन शहरों से आते हैं जहाँ पैदल चलना सभ्यता की निशानी माना जाता है। आगरा में पैदल चलना जान जोखिम में डालने जैसा है। एक विदेशी पर्यटक ने कहा कि यहाँ केवल बेलगाम वाहन ही नहीं, बल्कि आवारा कुत्ते और पशु भी सड़कों को खतरनाक बनाते हैं। 

आगरा की हालत अचानक नहीं बिगड़ी। यह दशकों की गलत नीतियों और लापरवाही का नतीजा है।

जनसंख्या पचास लाख के करीब पहुँच रही है। दो मिलियन से ज्यादा वाहन सड़कों पर दौड़ रहे हैं। लेकिन सड़कें वही पुरानी, संकरी और थकी हुई हैं। ऊपर से मेट्रो निर्माण, टूटे पुल, अवैध पार्किंग, अतिक्रमण, अव्यवस्थित बाजार और बेतरतीब ट्रैफिक ने शहर को स्थायी जाम में बदल दिया है।

सिकंदरा का इलाका हर दिन घुटता है। बेलनगंज क्षेत्र के बाजारों में आधी सड़क पार्किंग निगल जाती है। हॉर्न अब आगरा की नई भाषा बन चुका है। धुआँ और धूल शहर की पहचान बनते जा रहे हैं।

सबसे दुखद बात यह है कि समाधान भी वही पुराने हैं। सड़क चौड़ी करो। फ्लाईओवर बना दो। और गाड़ियाँ आने दो। फिर अगला जाम झेलो।

असल बीमारी सोच में है। शहर अब इंसानों के लिए नहीं, वाहनों के लिए डिज़ाइन हो रहे हैं। नगर नियोजन का मकसद इंसानी गरिमा नहीं, ट्रैफिक का बहाव और ठेकेदारी बचा है।

यमुना किनारा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। ताजमहल से वाटर वर्क्स तक का इलाका दुनिया के सबसे खूबसूरत वॉकिंग कॉरिडोर में बदल सकता था। पेड़ों से घिरे रास्ते, साइकिल ट्रैक, घाट, सांस्कृतिक स्थल और नदी के मनोरम दृश्य आगरा की पहचान बन सकते थे। लेकिन वहाँ धूल, कब्ज़े, टूटे फुटपाथ और प्रशासनिक उदासीनता पसरी हुई है। ट्रांसपोर्ट कंपनीज ने हालत और खराब कर दी है।

जिस सभ्यता ने कभी नदी किनारे बेमिसाल वास्तुकला खड़ी की, वही आज एक ढंग का फुटपाथ बनाने में नाकाम रहे है।

और शायद सबसे बड़ा खतरा यही है कि लोग अब इस अव्यवस्था के आदी हो चुके हैं। ट्रैफिक जाम मौसम की तरह स्वीकार कर लिया गया है। प्रदूषण किस्मत बन चुका है। अवैध कब्ज़े सामान्य बात लगते हैं। अराजकता अब संस्कृति बनती जा रही है।

यही असली पतन है।

सिर्फ सड़कों का नहीं, सोच का पतन।

आगरा आज उस भारतीय शहरी संकट का प्रतीक बन गया है जहाँ नगर निगम, विकास प्राधिकरण, ट्रैफिक पुलिस, पर्यटन विभाग और पर्यावरण एजेंसियाँ सब मौजूद हैं, लेकिन जवाबदेही कहीं नहीं है। हर संस्था के पास थोड़ी ताकत है, मगर पूरी जिम्मेदारी किसी के पास नहीं।

फिर भी उम्मीद बाकी है।

जो नागरिक पैदल चलने वालों के अधिकार की बात कर रहे हैं, वे सही हैं। जो लोग साइकिल और फुटपाथ को प्राथमिकता देने की मांग कर रहे हैं, वे सही हैं। शहर का भविष्य और फ्लाईओवर, और कारें, और कंक्रीट नहीं बचा सकते।

एक सभ्य शहर की पहचान उसकी ऊँची इमारतें नहीं होतीं। असली पहचान यह होती है कि क्या एक बुज़ुर्ग महिला सुरक्षित सड़क पार कर सकती है। क्या एक बच्चा बिना डर साइकिल चला सकता है। क्या हवा सांस लेने लायक है। क्या सार्वजनिक जगहों पर इंसानों का हक बचा है।

आगरा कभी सुंदरता, संतुलन और तहज़ीब का प्रतीक था। आज खतरा यह है कि वह गलत विकास मॉडल, लालच, उदासीनता और अव्यवस्था का प्रतीक बनता जा रहा है।

ताजमहल आज भी खामोश खड़ा है।

लेकिन उसके आसपास का शहर चीख रहा है।

 मुद्दों के मेले ,  हम हैं अकेले !!

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

13 मई 2026

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मेला देखकर लौट रहे हम लोग,  एक अजीब चौराहे पर अटके हुए हैं।

जनता पूछ रही है, “रोजगार कहाँ है?”

सत्ता पूछ रही है, “वंदे मातरम् बोला कि नहीं?”

विपक्ष पूछ रहा है, “EVM का प्लग निकाला कि नहीं!”

और मीडिया पूछ रहा है, “आम चूसकर खाना चाहिए या काटकर?”

वाह रे तांत्रिक लोकतंत्र। जिस घर में चूल्हा ठंडा हो, वहां टीवी पर बहस गरम है।

एक तरफ बेरोजगार डिग्रियां लेकर धूप में लाइन लगा रहे हैं। दूसरी तरफ नेता माइक्रोफोन लेकर इतिहास की कब्रें खोद रहे हैं।

किसी को अस्पताल की बदहाली नहीं दिखती। पर कौन किस धर्म का है, यह सबको एक्स-रे मशीन की तरह साफ दिख जाता है।

गरीब आदमी महंगाई से पिस रहा है।

आम जरूरत की चीजों के भाव सुनकर  BP  की गोलियों की सेल बढ़ती  है। गैस सिलेंडर देखकर सांस फूलती है, अस्थमा अटैक हो रहे हैं।

लेकिन टीवी पर अर्बन ज्ञाणी द्वारा राष्ट्रवाद का ऑक्सीजन मुफ्त बांटा जा रहा है।

इसी बीच त्याग और सादगी की नदियों बहने लगी हैं।   मितव्ययिता मंत्र दिया गया है। कम खर्च करो।फिजूलखर्ची छोड़ो। सादगी अपनाओ।

पूरा देश  ये सुनकर भावुक हो गया है। कइयों ने विदेश यात्रा स्थगित कर दी हैं।  सरकारी बाबुओं ने AC की हवा में बैठकर त्याग पर सेमिनार किया। कुछ नेताओं ने पांच सितारा होटल में “सादगी सम्मेलन” रखा। किसी ने कहा, “विदेश यात्रा जरूरी है, आखिर मितव्ययिता का वैश्विक संदेश देना है।”

नई राजनीति का नया योग सूत्र है।जनता कटौती करे। सरकार प्रेरणा दे।

कहा गया, शादी समारोह सादगी से हों। वाह! यह बात उन लोगों ने कही जिनके काफिले निकलते समय ट्रैफिक खुद लोकतंत्र को सलाम करता है।

कहा गया, सरकारी खर्च कम हो।

और उसी शाम नई LED स्क्रीन पर “ऐतिहासिक उपलब्धियों” का विज्ञापन चमक उठा।

कहा गया, अनावश्यक यात्राएं बंद हों।

देश मुस्कुराया। एयरपोर्ट थोड़ा घबराया। त्याग का ऐसा अलौकिक वातावरण बना कि मध्यम वर्ग ने चाय में चीनी आधी कर दी। गरीब ने दाल में पानी बढ़ा दिया। और अमीर ने ट्वीट कर दिया, “Nation First.”

व्यवस्था तंत्र के पास मुद्दों की पूरी जादुई पोटली है। जनता फिर पांच किलो मुफ्त राशन और पंद्रह सेकंड के गुस्से में सब भूल जाती है।

उधर विपक्ष भी कम कलाकार नहीं।

देश जल रहा हो, पर उनकी प्राथमिकता EVM का पोस्टमार्टम है।

हार गए तो मशीन चोर। कुछ नहीं तो इनको हटाओ, उनको हटाओ। जीत गए तो लोकतंत्र जिंदाबाद। हार गए तो लोगों  को डेमोक्रेसी खतरे में दिखती है।

इस बीच पूरा देश एक दूसरे की गिनती करने में लगा है। जाति जनगणना से अगले कुंभ तक गरीबी भाग जाएगी।

विपक्ष कहता है इतने खतरे तो पुराने जमाने में डाकुओं से भरे जंगल में भी नहीं थे।

और मीडिया! अरे मीडिया तो इस महान लोकतांत्रिक सर्कस का रिंग मास्टर है। देश में किसान आत्महत्या करे, नदी सूख जाए, बच्चे कुपोषण से मर जाएं, कोई फर्क नहीं। ज्योतिषियों की चांदी कट रही है, सब कुछ सितारों के हवाले। हम क्या साथ लाए थे, क्या ले जाएंगे!

वर्ल्ड बेस्ट टीवी एंकर्स भारत में हैं, उनके रहते सरकारी प्रवक्ताओं की कोई जरूरत ही नहीं। अगर किसी ने कहा कि आम काटकर खाना चाहिए या चूसकर, तो तीन घंटे की “राष्ट्रव्यापी बहस” तय है।

“सीमा हैदर का छठा बच्चा।”

“ जेल में बेटी हुई।”

“फिल्म स्टार ने किस रंग की चप्पल या चड्डी पहनी?”

ब्रेकिंग न्यूज ऐसे दौड़ती है जैसे रॉकेट चांद पर नहीं, पाताल में उतर चुका हो।

पत्रकारिता अब सवाल नहीं पूछती।

TRP की भिक्षा मांगती है।

एंकर ऐसे चिल्लाते हैं जैसे देश की सारी समस्याएं डेसिबल से हल होंगी।

स्क्रीन पर आठ खिड़कियां खुलती हैं।

आठ लोग एक साथ चीखते हैं।

और दर्शक सोचता है, शायद यही लोकतंत्र का नया राष्ट्रीय गीत है।

शिक्षा?

उसकी हालत उस रिश्तेदार जैसी हो गई है जिसे शादी में कोई पूछता नहीं।

स्वास्थ्य व्यवस्था ICU में पड़ी है।

रोजगार फाइलों में लटका है।

गरीबी आंकड़ों में छिपी बैठी है।

लेकिन चुनाव आते ही सबको मंदिर, मस्जिद, भाषा, लोकल अस्मिता, पाकिस्तान और जाति याद आ जाती है।

मानो देश नहीं, कोई अनंतकालीन टीवी सीरियल चल रहा हो।

सब अपना अपना धंधा चमका रहे हैं।

जनता सिर्फ ताली बजाने वाली ऑडियंस है।

देश के असली मुद्दे फुटपाथ पर बैठे हैं।

और नकली मुद्दे लाल बत्ती वाली गाड़ियों में घूम रहे हैं।

कभी कभी लगता है भारत समस्याओं से नहीं, “प्रायोजित बहसों” से चल रहा है।

फिर भी उम्मीद जिंदा है।

क्योंकि इस देश का आम आदमी बहुत सहनशील है।

वह हर पांच साल बाद फिर लाइन में खड़ा हो जाता है।

उसे लगता है, शायद इस बार कोई रोटी, रोजगार और राहत की बात करेगा।

लेकिन सिस्टम को पक्ष, विपक्ष के बाजीगर ही चलते हैं। टोपी से कभी धर्म निकालता है। कभी डर। कभी दुश्मन। कभी मितव्ययिता का नया मंत्र। और जनता? वह फिर ताली बजाती है। क्योंकि असली मुद्दों की आवाज अब शोर में दब चुकी है

Sunday, May 10, 2026

 फर्क है पश्चिम बंगाल और तमिल नाडु में सत्ता परिवर्तन में। एक में हिंदुत्व बदलाव का जरिया बना। दूसरे में  नई राजनैतिक दिशा को पंख लगे। आजाद भारत में एक ऐतिहासिक दिशा परिवर्तन जिससे लोकतंत्र और मजबूत हुआ है।

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क्यों और कैसे एक एक्टर से नेता बने विजय ने मचाया सियासी तूफान 

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

12 मई 2026

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एक फिल्म स्टार ने तमिलनाडु की राजनीति का खेल ही बदल दिया

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साठ के दशक में कामराज को मात देने वाले अन्ना दुरई से लेकर टीवीके के नायक विजय तक, तमिलनाडु की राजनीति हमेशा से फिल्मों जैसी रही है। बड़े बड़े कटआउट। जोशीले नारे। भावुक भाषण। हीरो की पूजा। 

लेकिन इस बार  विजय का उभार कुछ अलग ही कहानी बन गया है। दो साल पहले तक वह सिर्फ सुपरस्टार अभिनेता थे। फिर अचानक राजनीति में आए और देखते ही देखते मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गए। डीएमके और एआईएडीएमके जैसी पुरानी ताकतों का किला डोल गया।

शुरू में बहुत लोगों ने उनका मजाक उड़ाया। कहा, “एक और अभिनेता राजनीति में आ गया।” तमिलनाडु में यह नया नहीं था। पहले भी कई सितारे राजनीति में आए। कुछ बीच रास्ते गायब हो गए। कुछ जनता से जुड़ नहीं पाए। लेकिन विजय ने लोगों का मूड सही समय पर समझ लिया।

तमिलनाडु की जनता पुराने नेताओं और पुरानी राजनीति से थक चुकी थी। डीएमके पर परिवारवाद और भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे थे। एआईएडीएमके जयललिता जी के बाद कमजोर हो चुकी थी। लोगों को नया चेहरा चाहिए था। विजय ने खुद को उसी “नई उम्मीद” के रूप में पेश किया।

उनकी सबसे बड़ी ताकत उनकी भाषा और बोलने का अंदाज बना। बाकी नेताओं की तरह लंबे, भारी भरकम भाषण नहीं। छोटी, सीधी, दिल को छूने वाली बातें। ऐसा लगता था जैसे कोई आम आदमी गुस्सा और उम्मीद दोनों साथ लेकर बोल रहा हो।

उनकी एक लाइन बहुत मशहूर हुई:

 “सत्ता किसी परिवार की जागीर नहीं है। सरकार जनता की है।”

यह बात लोगों के दिल में उतर गई। तमिलनाडु में परिवारवादी राजनीति से लोग परेशान थे। विजय ने सीधे उसी नस पर हाथ रखा।

एक और भाषण में उन्होंने कहा:

 “मैं कुर्सी के लिए राजनीति में नहीं आया। मैं इसलिए आया हूं क्योंकि अब चुप रहना खतरनाक हो गया है।”

इसमें फिल्मी ड्रामा भी था और सच्चाई का एहसास भी। खासकर युवाओं को यह लाइन बहुत पसंद आई। उन्हें लगा कि विजय सिर्फ नेता बनने नहीं, कुछ बदलने आए हैं।

एक और बयान ने खूब तालियां बटोरीं:

 “जनता को नेताओं से डरना नहीं चाहिए। नेताओं को जनता से डरना चाहिए।”

सीधी बात। लेकिन असरदार। विजय खुद को जनता का आदमी दिखाना चाहते थे, ऊपर बैठा शासक नहीं।

युवाओं के लिए उनका संदेश भी बहुत असरदार रहा:

 “आपका भविष्य अगली पीढ़ी तक टाला नहीं जा सकता।”

चेन्नई के रिटायर्ड टीचर कृष्णस्वामी बताते हैं, "बेरोजगारी, महंगाई और नौकरी की चिंता में फंसे युवाओं को लगा कि कोई उनकी भाषा बोल रहा है। यही वजह रही कि पहली बार वोट डालने वाले लाखों युवा विजय के पीछे खड़े हो गए।"

उनकी सबसे बड़ी खासियत यह रही कि उन्होंने फिल्मों को पूरी तरह छोड़ दिया। यह कदम बहुत बड़ा संदेश बन गया। लोगों को लगा कि विजय राजनीति को गंभीरता से ले रहे हैं। सिर्फ टाइमपास नहीं कर रहे।

उनके पुराने फैन क्लब भी बड़ी ताकत बने। सालों से ये लोग रक्तदान शिविर, बाढ़ राहत, गरीबों की मदद और सामाजिक काम करते रहे थे। राजनीति में आने से पहले ही विजय के पास जमीनी नेटवर्क तैयार था। यही उनकी असली ताकत बनी।

अब सवाल उठता है कि रजनीकांत और कमल हासन क्यों सफल नहीं हुए?

कोयंबटूर के एक्टिविस्ट गोपाल कृष्णन कहते हैं, "रजनीकांत के पास जबरदस्त स्टार पावर थी। शायद विजय से भी ज्यादा। लेकिन उन्होंने बहुत देर कर दी। सालों तक राजनीति में आने के संकेत देते रहे, फिर पीछे हटते रहे। जनता कन्फ्यूज हो गई। लोगों को लगा कि वह खुद तय नहीं कर पा रहे कि राजनीति करनी है या नहीं। राजनीति में हिचकिचाहट बहुत महंगी पड़ती है।"

उधर, कमल हासन पढ़े लिखे, समझदार और गंभीर नेता दिखे। लेकिन उनकी राजनीति आम जनता से थोड़ी दूर नजर आई। उनके भाषण कई बार बहुत बौद्धिक और शहरी लगते थे। गांव और छोटे शहरों के वोटरों से भावनात्मक रिश्ता नहीं बन पाया। लोग उनका सम्मान करते थे, लेकिन उनके पीछे जुनून से नहीं जुटे।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं,"विजय ने यही फर्क पैदा किया। वह बड़े विचारक की तरह नहीं, बदलाव लाने वाले आम आदमी की तरह सामने आए। उनकी भाषा आसान थी। अंदाज अपनापन वाला था। और सबसे बड़ी बात, वह सही समय पर मैदान में उतरे।"

तमिल राजनीति के जानकर वेंकट सुब्रमनियन के मुताबिक, "तमिलनाडु की राजनीति में फिल्मी सितारे पहले भी आए हैं। लेकिन विजय ने स्टारडम, युवा ऊर्जा, साफ छवि, मजबूत संगठन और जनता की नाराजगी, सबको जोड़कर एक बड़ा सियासी तूफान खड़ा कर दिया।"

यह सिर्फ चुनाव जीतने की कहानी नहीं थी। यह उस जनता की कहानी थी जो नए हीरो का इंतजार कर रही थी।

Saturday, May 9, 2026

 बंद करो यूपी को बीमारू कहना!

उत्तर प्रदेश है भारत की धड़कन, कोई बोझ नहीं

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बिन काशी, मथुरा, अयोध्या, हिन्दू धर्म में क्या?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

11 मई 2026

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जब दूसरे राज्य अपनी क्षेत्रीय शान का ढोल पीटते हैं, (तमिल प्राइड, मराठा गौरव, पंजाबियत, कश्मीरियत, बंगाली अस्मिता) तब उत्तर प्रदेश हमेशा “एक भारत” की बात करता है। पश्चिम और दक्षिण भारत के कुछ लोग जब यूपी को पिछड़ा बताकर उसकी जीडीपी या राष्ट्र निर्माण में योगदान पर सवाल उठाते हैं, तब वे एक बड़ी सच्चाई भूल जाते हैं। उत्तर प्रदेश सिर्फ नक्शे पर बना एक राज्य नहीं है। यह भारत की रूह, दिल, तहज़ीब और सियासत की धड़कन है।

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उत्तर प्रदेश के प्राचीन घाटों से लेकर ताज महल की संगमरमरी शायरी तक, उत्तर प्रदेश, मां भारती के माथे पर सजे चमकते मुकुट जैसा दिखाई देता है। यहां गंगा, यमुना और सरयू की पवित्र धाराएं संतों, क्रांतिकारियों, कवियों और बादशाहों की कहानियां सुनाती हैं। यही वह धरती है जहां तुलसीदास ने अमर रामचरितमानस लिखी, जहां कबीर ने पाखंड पर करारी चोट की, और जहां मुंशी प्रेमचंद ने गांव, गरीब और भूले हुए इंसानों की आवाज़ दुनिया तक पहुंचाई। अयोध्या की घंटियों से लेकर वाराणसी की अनंत आरती तक, लखनऊ की तहज़ीब से प्रयागराज की सियासी विरासत तक, उत्तर प्रदेश कोई मामूली सूबा नहीं। यह भारत की सभ्यता की धड़कन है।

दशकों तक उत्तर प्रदेश को “बीमारू राज्य” कहकर हिकारत  से देखा गया। इसे ऐसा बोझ बताया गया जो भारत की तरक्की रोक रहा है। टीवी बहसों, अखबारों और ड्रॉइंग रूम की चर्चाओं में यह शब्द फैशन बन गया। लेकिन जिन्होंने यह तमगा चिपकाया, उन्होंने कभी समझने की कोशिश नहीं की कि यूपी आखिर है क्या। उत्तर प्रदेश को सिर्फ गरीबी या आंकड़ों से मापना, हमारी सभ्यता को न समझ पाने जैसा है।

आज भारत में एक अजीब रुझान बढ़ रहा है। क्षेत्रीय पहचान अब संकीर्ण सोच में बदलती जा रही है। हर राज्य अपनी अलग दीवार खड़ी करता दिखाई देता है। पहले भारत की बात होती थी, अब क्षेत्रों की।

लेकिन यूपी ने हमेशा अलग रास्ता चुना। उसने खुद को सिर्फ अपनी सीमाओं तक सीमित नहीं किया। यहां “बाहरी” और “भीतरी” की राजनीति कम हुई। उत्तर प्रदेश ने हमेशा जोड़ने का काम किया, तोड़ने का नहीं। उसकी पहचान भारत से अलग नहीं, बल्कि भारत के भीतर घुली हुई है।

गंगा जमुनी तहज़ीब कोई किताबों का जुमला नहीं। यह सदियों की साझी जिंदगी का नतीजा है। यहां हिंदू, मुस्लिम, जैन, बौद्ध और सिख परंपराएं साथ साथ सांस लेती रहीं। त्योहार साझा हुए, खानपान मिला, शायरी और संगीत ने दिलों को जोड़ा। अवध में अदब संस्कृति बन गया। बनारस में आस्था दर्शन बन गई। मथुरा और वृंदावन में भक्ति उत्सव बन गई।

यूपी की नदियां सिर्फ नदियां नहीं हैं। गंगा, यमुना और सरयू बहती हुई पवित्र कथाएं हैं। इनके किनारों ने संत, फकीर, सुधारक, बागी और सपने देखने वाले पैदा किए। आदि शंकराचार्य ने काशी में ज्ञान की बहसों को नई जान दी। चैतन्य महाप्रभु वृंदावन की भक्ति में डूब गए। सूफी संतों ने इंसानियत का पैगाम फैलाया। बौद्ध भिक्षु इन्हीं रास्तों से एशिया तक ज्ञान ले गए। सल्तनतें आईं और चली गईं, मगर सभ्यता की यह धारा बहती रही।

भारत के दो सबसे लोकप्रिय आराध्य भी इसी मिट्टी से जुड़े हैं। भगवान राम अयोध्या के हैं। भगवान कृष्ण मथुरा और वृंदावन के। करोड़ों भारतीयों की नैतिकता, भक्ति और कल्पना इन दोनों से आकार लेती है। यही वजह है कि उत्तर प्रदेश को भारत की आत्मा का केंद्र माना जाता है।

आजादी की लड़ाई में भी यूपी सबसे आगे रहा। 1857 की क्रांति मेरठ से ज्वालामुखी की तरह फूटी। कानपुर, लखनऊ और झांसी तक आग फैल गई। बेगम हजरत महल अंग्रेजों के सामने डटकर खड़ी रहीं। नाना साहब ने संघर्ष किया। हजारों गुमनाम गांव वालों ने बिना किसी इनाम की उम्मीद के अपनी जान दे दी। बाद में महात्मा गांधी के नेतृत्व में भी यूपी राष्ट्रीय आंदोलन का दिल बना रहा।

साहित्य की दुनिया में भी यूपी की विरासत बेमिसाल है। मीर तकी मीर, मिर्जा गालिब, नज़ीर अकबराबादी, हरिवंश राय बच्चन, महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और प्रेमचंद ने सिर्फ यूपी के लिए नहीं लिखा। उन्होंने पूरे हिंदुस्तान की आत्मा को शब्द दिए।

वास्तुकला में भी उत्तर प्रदेश किसी खुले संग्रहालय जैसा है। ताजमहल आज भी संगमरमर में जमी मोहब्बत की धुन लगता है। आगरा किला, फतेहपुर सीकरी, सारनाथ और अनगिनत मंदिर, मस्जिदें और मठ बताते हैं कि यहां कितनी सभ्यताएं आकर मिलीं। हिंदू, बौद्ध, जैन, फारसी, इस्लामी और लोक परंपराओं ने यहां एक दूसरे को अपनाया और नया रंग दिया।

राजनीति में भी उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है। सबसे ज्यादा सांसद यहीं से संसद पहुंचते हैं। ज्यादातर प्रधानमंत्री या तो यूपी से निकले या यूपी की जनता के सहारे दिल्ली पहुंचे। दिल्ली की सत्ता की सांसें आज भी यूपी से जुड़ी हैं।

अब “बीमारू” शब्द पुराना, खोखला और नासमझी भरा लगता है। उत्तर प्रदेश कोई बीमार मरीज नहीं जो अपनी अहमियत बचाने के लिए जूझ रहा हो। यह एक विशाल, जीवंत, आध्यात्मिक और जुझारू प्रदेश है, जो अपनी ताकत फिर पहचान रहा है। यहां समस्याएं हैं, भीड़ है, विरोधाभास हैं, मगर जिंदगी भी है, ऊर्जा भी है और अद्भुत सहनशक्ति भी।

असल में उत्तर प्रदेश भारत का छोटा रूप है। यहां भारत का दर्द भी है, गरीबी भी, आस्था भी, विविधता भी, संघर्ष भी और उम्मीद भी। यूपी को समझना, भारत को समझना है। शायद इसी कारण, तमाम आलोचनाओं के बावजूद, उत्तर प्रदेश आज भी भारत पर बोझ नहीं, बल्कि उसकी धड़कन बनकर खड़ा है।

Friday, May 8, 2026

 सेल्फी की बीमारी!!!

एक तस्वीर के लिए मौत का खेल

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

10 मई 2026

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डेली यमुना किनारे, आरती स्थल के पास लड्डू गोपाल की विशाल मूर्ति के इर्द गिर्द, तमाम लोग सेल्फी लेते हैं, अजीब डांस करते हुए रील बनाते हैं। रोड पर कोई गिर जाए तो पहले वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हैं, बाद में हाल चल पूछते हैं। मैं और मेरा मोबाइल फोन, बस, और कुछ नहीं!

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दूर से ट्रेन की सीटी सुनाई देती है। चार लड़के मुस्कराते हुए मोबाइल कैमरे की तरफ देखते हैं। एक लड़का हाथ और आगे बढ़ाता है ताकि “परफेक्ट सेल्फी” आ सके। अगले ही पल तेज रफ्तार ट्रेन उन्हें कुचल देती है। उनकी तस्वीर कभी सोशल मीडिया तक नहीं पहुंचती।

भारत में सेल्फी का जुनून अब सिर्फ एक मासूम शौक नहीं रहा। यह एक खतरनाक सामाजिक बीमारी बन चुका है। रेलवे ट्रैक, नदी किनारे, पहाड़, झरने, पानी की टंकियां, चलती ट्रेनें, सब अब “रील” और “वायरल वीडियो” के मंच बन गए हैं। लाइक्स और व्यूज़ की भूख ने युवाओं को मौत से खेलना सिखा दिया है।

भारत को अब दुनिया की “सेल्फी रिपब्लिक” कहा जाने लगा है। कुछ लोग इसे “किलफी” संस्कृति भी कहते हैं, यानी ऐसी सेल्फी जो जान ले ले।

घटनाएं दिल दहला देती हैं।

2015 में मथुरा के पास तीन कॉलेज छात्र ताजमहल जाते समय रेलवे ट्रैक पर रुक गए। उन्हें पीछे आती ट्रेन के साथ एक “डेरिंग सेल्फी” चाहिए थी। ट्रेन नहीं रुकी। उनकी जिंदगी रुक गई।

2017 में दिल्ली में दो किशोर रेलवे ट्रैक पर सेल्फी लेते हुए ट्रेन की चपेट में आ गए। उन्हें लगा कि आखिरी पल में हट जाएंगे। मगर मौत ज्यादा तेज निकली।

2019 में पानीपत में तीन युवक एक ट्रेन से बचने के लिए दूसरे ट्रैक पर कूद गए। वहां दूसरी ट्रेन आ रही थी। तीनों की मौके पर मौत हो गई।

कानपुर में 2016 में सात छात्र गंगा में डूब गए। एक लड़का बांध के किनारे सेल्फी लेते समय फिसल गया। बाकी दोस्त उसे बचाने कूद पड़े। कोई वापस नहीं लौटा।

हाल ही में उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर में पांच किशोर वायरल रील बनाने के लिए पानी की ऊंची टंकी पर चढ़ गए। उतरते समय जंग लगी सीढ़ी टूट गई। एक की मौत हो गई, कई गंभीर घायल हुए।

फिर भी लोग नहीं संभल रहे।

आखिर क्यों?

मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि यह डिजिटल दौर की नई बीमारी है। सोशल मीडिया के एल्गोरिद्म (तरीके) सनसनी, खतरा और ड्रामा पसंद करते हैं। जितना खतरनाक वीडियो, उतने ज्यादा व्यूज़। मोबाइल स्क्रीन पर मिलने वाला हर “लाइक” दिमाग को छोटी सी खुशी देता है। धीरे धीरे यही आदत नशा बन जाती है।

आज का युवा सिर्फ जिंदगी नहीं जी रहा, वह हर पल “परफॉर्म” कर रहा है। हर किसी को वायरल होना है। हर कोई इंटरनेट का सितारा बनना चाहता है।

दोस्त भी उकसाते हैं।

“भाई, ये रील फाड़ देगी।”

“थोड़ा और आगे जा।”

“ट्रेन के पास खड़े हो, मजा आएगा।”

बस, यहीं हादसा जन्म लेता है।

सबसे दुखद बात यह है कि संवेदनाएं  भी कमजोर पड़ रही हैं। सड़क हादसों में घायल लोगों की मदद करने के बजाय लोग वीडियो बनाते हैं। बाढ़, आग, अंतिम संस्कार, अस्पताल, यहां तक कि मौत के पास भी लोग सेल्फी लेते नजर आते हैं।

दुनिया अब दर्द को भी “कंटेंट” बना रही है।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं: "यह सिर्फ भारत की समस्या नहीं है। अमेरिका में लोग खाई और पहाड़ों से गिरकर मरे हैं। रूस में सरकार को “सेफ सेल्फी कैंपेन” चलाना पड़ा क्योंकि लोग हथियारों और चलती गाड़ियों के साथ तस्वीरें लेते हुए मर रहे थे। स्पेन और ऑस्ट्रेलिया में भी समुद्र किनारे और चट्टानों पर सेल्फी लेते हुए कई पर्यटकों की मौत हुई। मगर भारत की हालत ज्यादा गंभीर है।"

एक अरब से ज्यादा मोबाइल फोन। सस्ता इंटरनेट। युवा आबादी। सोशल मीडिया की अंधी दौड़। और कमजोर कानून व्यवस्था। यह मिश्रण बेहद खतरनाक है।

सरकार ने कई जगह “नो सेल्फी ज़ोन” बनाए हैं। रेलवे स्टेशन और झरनों के पास चेतावनी बोर्ड लगाए गए हैं। पुलिस जागरूकता अभियान चलाती है। मगर असर बहुत कम दिखता है।

सिर्फ बोर्ड लगाने से नशा नहीं रुकता।

असल सवाल कहीं ज्यादा गहरा है। क्या आज का इंसान “अनदेखा” होने से डरने लगा है? क्या हर खुशी, हर सफर, हर दुख, हर खाना, हर पल दुनिया को दिखाना जरूरी हो गया है?

अब जिंदगी जीने से ज्यादा उसे पोस्ट करना जरूरी लगता है।

मोबाइल कैमरा नया आईना बन चुका है। लोग खुद को दूसरों की नजर से देखने लगे हैं।

और इस “सेल्फी रिपब्लिक” की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि लोग जिंदगी रिकॉर्ड करते करते जिंदगी खो रहे हैं।

कोई भी सेल्फी इतनी जरूरी नहीं कि उसके बदले जनाज़ा  उठे। कोई भी सेल्फी इतनी खूबसूरत नहीं कि उसकी कीमत एक मौत हो।

फिल्टर चेहरे बदल सकता है। कब्र नहीं।


 द ग्रेट इंडियन जुमला ओलंपिक्स

जब लोकतंत्र एक रंगमंच बन जाए


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बृज खंडेलवाल द्वारा

9 मई 2026


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भारत सिर्फ दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र नहीं है, यह दुनिया का सबसे बड़ा खुला रंगमंच भी है।

हमारे खूबसूरत मुल्क में चुनाव ऐसे आते हैं जैसे शादी, क्रिकेट फाइनल और पौराणिक धारावाहिक सबको मिलाकर एक विशाल सर्कस बना दिया गया हो। लाउडस्पीकर चीखते हैं। हेलिकॉप्टर फूल बरसाते हैं। टीवी एंकर अपनी आवाज़ खो बैठते हैं। और नेता लोग वादे ऐसे बांटते हैं जैसे भंडारे में हलवा पूरी।

सैलानियों के लिए भारत एक शानदार तमाशा पेश करता है, जिसका नाम है “द ग्रेट जुमला ओलंपिक्स।”

हर पांच साल में हर पार्टी के नेता इस पवित्र खेल प्रतियोगिता में जुटते हैं। किसी स्टेडियम की जरूरत नहीं। धूल वाला मैदान, प्लास्टिक की कुर्सियां और मुफ्त खाने के पैकेट काफी हैं। प्रतियोगी कई कठिन मुकाबलों में हिस्सा लेते हैं। स्पीच मैराथन, ब्लेम रिले, इमोशनल कुश्ती, यू टर्न जिम्नास्टिक और सबसे कठिन प्रतियोगिता “सिंक्रोनाइज्ड भूलने की कला।”

इस खेल की निर्विवाद दादा  या नानी चैंपियन थीं इंदिरा गांधी,  जिनका नारा था “गरीबी हटाओ।” गरीबी ने यह ऐलान सुना, हल्की मुस्कान दी और भारत में स्थायी किराये का मकान लेकर आराम से बैठी रही। पचास साल बाद भी गरीबी जिंदा है, तंदरुस्त है और कभी कभी खुद चुनाव भी लड़ लेती है।

फिर आया आधुनिक दौर का सबसे चर्चित जुमला “अच्छे दिन आने वाले हैं।” आह, भारतीय इतिहास के सबसे ज्यादा इंतजार किए गए मेहमान। भारतीय जनता अच्छे दिनों का इंतजार वैसे करती है जैसे यात्री छह घंटे लेट ट्रेन का करते हैं। हर साल कोई घोषणा करता है, “बस आने ही वाले हैं!” और भीड़ फिर तालियां बजा देती है।

एक और स्वर्ण पदक वाला प्रदर्शन था “इंडिया शाइनिंग” अभियान। शहरी भारत ने गर्व से सिर हिलाया, जबकि गांव का भारत सिर खुजलाकर पूछ बैठा, “शाइनिंग कहां हो रहा है भाई?” नारा इतना चमका कि मतदाताओं ने बैलेट बॉक्स की ही लाइट बंद कर दी।

ओलंपिक्स व्यक्तिगत प्रतिभा के बिना पूरे नहीं होते। मुलायम सिंह यादव ने अपने मशहूर बयान “लड़के हैं, लड़कों से गलती हो जाती है” से पूरे देश को हैरान कर दिया। उस बयान ने सिर्फ स्तर नहीं गिराया, बल्कि उसे सामान्य समझदारी के साथ जमीन के नीचे दफना दिया।

फिर कुछ नेताओं और खाप दर्शनशास्त्रियों की वैज्ञानिक खोज आई कि चाउमीन बलात्कार की वजह है। आखिरकार देश को असली खलनायक मिल गया। न पितृसत्ता, न अपराधी मानसिकता, न कमजोर पुलिस व्यवस्था। दोषी निकले नूडल्स! चीन में कोई नूडल बनाने वाला यह सुनकर शायद बेहोश हो गया होगा।

उधर नेता लोग गंगा यमुना सफाई का वादा करते रहे। अब हालत यह है कि नदी की मछलियां भी चुनावी नारे पहचानने लगी हैं। यमुना शायद दुनिया की इकलौती नदी है जिसे भाषणों में रोज साफ किया जाता है और हकीकत में हर घंटे गंदा। गडकरी का भला हो, उसने तो दिल्ली आगरा के बीच स्टीमर ही चलवा दिया होता, अगर नदी में जल होता! 

हर पार्टी के पास अपने अपने जुमलों का डिब्बा है। गुलाबी सपनों से भरा डिब्बा। जैसे आम आदमी पार्टी का भ्रष्टाचार मुक्त भारत या ममता बनर्जी का “खेला होबे।” लोकतंत्र चुनावों पर चलता है। उसे भावनात्मक तूफान चाहिए, ऐसी लहर जो तर्क और सामान्य समझ को बहाकर ले जाए। अक्सर कहानियों में सिर्फ शोर और गुस्सा होता है, सार बहुत कम।

और वह जादुई “15 लाख रुपये” वाला वादा कौन भूल सकता है? काले धन की वापसी का सपना। करोड़ों भारतीयों ने अपने बैंक खाते वैसे जांचे जैसे बच्चे परीक्षा का रिजल्ट देखते हैं। कुछ लोगों ने तो पासबुक उतनी बार अपडेट कराई जितनी बार लोग व्हाट्सऐप स्टेटस बदलते हैं। बैंक शांत रहे। ये जुमला था, अफवाह थी, गलत रिपोर्टिंग थी, आज तक स्पष्ट नहीं है।

लेकिन असली ओलंपिक चैंपियन हैं यू टर्न जिम्नास्टिक टीम के खिलाड़ी। एक दिन नेता पूरी छाती ठोककर बयान देता है। अगले हफ्ते सफाई आती है।  नया मतलब निकाला जाता है। फिर मीडिया पर दोष मढ़ा जाता है। और अंत में आता है भारतीय राजनीति का सबसे लोकप्रिय योगासन, “मेरा मतलब वह नहीं था।”

भारतीय नेताओं की रीढ़ की लचक देखकर सर्कस के बाजीगर भी जलन से रो पड़ते हैं।

लेकिन मतदाता भी भागीदारी पदक के हकदार हैं। हम शिकायतें करते हैं। राजनीतिक चुटकुले आगे भेजते हैं। मीम्स पर हंसते हैं। चाय की दुकान पर नेताओं को गालियां देते हैं। और फिर मुफ्त टोपी, बिरयानी और भावनात्मक भाषणों के लिए रैलियों में पहुंच जाते हैं। भारत में लोकतंत्र सिर्फ शासन नहीं है। यह जन मनोरंजन है।

और इस तरह जुमला ओलंपिक्स जारी रहते हैं। नए नारे आएंगे। पुराने वादे नए रंग रोगन के साथ लौटेंगे। घोषणापत्र पतंगों की तरह उड़ेंगे। टीवी बहसें बरसाती मौसम की सब्जी मंडी जैसी लगेंगी।

लेकिन एक बात तय है।

भारत में सरकारें बदल सकती हैं। पार्टियां टूट सकती हैं। विचारधाराएं कलाबाजी खा सकती हैं। मगर जुमले अमर हैं।

एक दिन सूरज ठंडा पड़ सकता है। चांद रिटायर हो सकता है। लेकिन कहीं न कहीं, किसी मंच पर, किसी विशाल कटआउट के नीचे, कोई नेता अब भी चिल्ला रहा होगा

“मित्रों… बस पांच साल और!”

Thursday, May 7, 2026

 दो हारने वालों की कहानी: एक ने हार पचाई, दूसरे ने हार से लड़ाई छेड़ी

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बृज खंडेलवाल द्वारा

8 मई 2026

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हार भी अजीब चीज़ होती है।

किसी को समझदार बना देती है। किसी को और ज़्यादा गुस्सैल।

कोई हारकर चुपचाप अपने टूटे घर की ईंटें जोड़ता है। कोई हार के बाद भी चौराहे पर खड़े होकर दुनिया को गालियाँ देता रहता है।

मई 2026 के चुनावों ने भारत को दो ऐसे “हारने वाले” दिखाए, जिनकी हार से ज्यादा दिलचस्प उनका बर्ताव था। एक तरफ तमिलनाडु में एम.के. स्टालिन। दूसरी तरफ बंगाल में ममता बनर्जी। दोनों सत्ता से बाहर हुए। दोनों को जनता ने झटका दिया। लेकिन दोनों ने हार का मतलब अलग-अलग समझा।

स्टालिन ने कहा, “जनादेश (लोकमत) स्वीकार है।”

ममता बोलीं, “जनादेश नहीं, साज़िश हुई है।”

बस, यहीं से दो रास्ते अलग हो गए।

तमिल राजनीति का पुराना उसूल है, “सत्ता आती-जाती है, संगठन बचा रहना चाहिए।” द्रविड़ राजनीति केवल तमिल अस्मिता का नारा नहीं रही। यह सामाजिक न्याय, भाषा के सम्मान और केंद्र के अति नियंत्रण के खिलाफ एक लंबा आंदोलन रहा है। स्टालिन उसी परंपरा के वारिस हैं। इसलिए हार के बाद भी उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को सड़क पर रोने नहीं भेजा। उन्होंने उन्हें अगले चुनाव की तैयारी में लगा दिया।

यह राजनीति कम और शतरंज ज्यादा लगती है। राजा गिरा है, खेल खत्म नहीं हुआ। स्टालिन जानते हैं कि जनता कभी-कभी गुस्से में सरकार बदल देती है, लेकिन वह स्थिर और गंभीर विपक्ष को पूरी तरह खारिज नहीं करती। हार को गरिमा  से स्वीकार करना भी एक राजनीतिक पूंजी होती है।

उधर बंगाल में ममता बनर्जी का अंदाज़ बिल्कुल अलग रहा।

उन्होंने हार को फैसला नहीं माना, बल्कि लड़ाई का अगला दौर समझ लिया। चुनाव आयोग पर सवाल। संस्थाओं पर आरोप। साज़िश की बातें। समर्थकों को जोश में रखने की कोशिश।

यह रणनीति भी नई नहीं है। भारतीय राजनीति में कई नेता हार के बाद “शहीद” बनने की कोशिश करते हैं। क्योंकि कभी-कभी पीड़ित दिखना, पराजित दिखने से आसान होता है।

लेकिन इसमें खतरा बड़ा है।

अगर हर हार मशीन, संस्था, आयोग और दुश्मनों की चाल बन जाए, तो फिर आत्ममंथन  कौन करेगा?

राजनीति में आईना सबसे खतरनाक चीज़ होता है। बहुत से नेता आईना तोड़ देना पसंद करते हैं।

ममता की राजनीति लंबे समय तक संघर्ष और सड़क की राजनीति पर टिकी रही। उन्होंने वामपंथ को हराया। भाजपा को चुनौती दी। खुद को “दीदी” बनाकर जनता से भावनात्मक रिश्ता जोड़ा। लेकिन हर आंदोलनकारी नेता की सबसे बड़ी मुश्किल यह होती है कि वह सत्ता में रहते हुए भी आंदोलनकारी मुद्रा छोड़ नहीं पाता।

यही बंगाल की मौजूदा त्रासदी है। हार के बाद भी तलवार म्यान में नहीं गई।

स्टालिन की राजनीति संस्था बचाने वाली दिखती है।

ममता की राजनीति व्यक्तित्व बचाने वाली।

फर्क छोटा लगता है, लेकिन लोकतंत्र की दिशा तय करता है।

तमिलनाडु की राजनीति दशकों से विचारधारा के सहारे चलती रही है। वहाँ पार्टियाँ केवल चेहरे पर नहीं टिकतीं। द्रविड़ आंदोलन ने संगठन को व्यक्ति से ऊपर रखा। शायद यही कारण है कि डीएमके हारकर भी बिखरी हुई नहीं दिखती।

बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का चेहरा ही पार्टी बन गया। जब चेहरा घायल होता है, पूरी पार्टी बेचैन दिखने लगती है।

यह केवल दो राज्यों की कहानी नहीं। यह भारतीय क्षेत्रीय राजनीति का आईना है। दिल्ली से लड़ना आसान है। खुद से लड़ना मुश्किल।

स्टालिन अभी विपक्ष में रहकर अगली सरकार बनने की तैयारी कर रहे हैं।

ममता अभी भी पिछली हार से मुकदमा लड़ रही हैं।

जनता दोनों को देख रही है।

एक नेता कह रहा है, “हम लौटेंगे।”

दूसरा कह रहा है, “हमें हराया ही नहीं गया।”

लोकतंत्र में शोर हमेशा ताकत नहीं होता। कई बार खामोशी ज्यादा खतरनाक तैयारी होती है।

भारतीय राजनीति का पुराना मुहावरा है, “हारने वाला वही नहीं जो चुनाव हार जाए, हारने वाला वह है जो सीखना छोड़ दे।”

2026 की राजनीति में दोनों हार गए।

लेकिन शायद असली सवाल यह नहीं कि कौन हारा। असल सवाल यह है कि कौन हार से बड़ा निकला।

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Wednesday, May 6, 2026

 न पत्थर का बनेगा, न रबड़ का बनेगा;

वायदों से बना है, हवाई बांध बनेगा

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शिलान्यास पर शिलान्यास, बैराज अब भी लापता !!

ताज के साए में यमुना सूखती रही, फाइलें चलती रहीं, वादे हर बार हुए, लेकिन काम हर बार अटक गया।

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बृज खंडेलवाल द्वारा

7 मई, 2026

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एक बैराज  बनाने के लिए कितने शिलान्यास पत्थर चाहिए?

और कोई दरिया  कितनी देर तक इंतज़ार कर सकता है, इससे पहले कि वह बहना ही भूल जाए?

आगरा में इन सवालों के जवाब गर्मियों की धूल की तरह हवा में तैर रहे हैं। तीन शिलान्यास। बरसों की घोषणाएँ। अनगिनत भरोसे। लेकिन ताजमहल के नीचे यमुना पर अब तक एक भी चालू बैराज नहीं।

नदी आज भी लाचार-सी बह रही है। ताज आज भी खामोश तमाशबीन बना खड़ा है। और वादों और हकीकत के बीच की खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है।

बरसों से यमुना बैराज परियोजना  एक अजीब दोहरी ज़िंदगी जी रही है। कागज़ों में यह फाइलों, प्रस्तावों और सियासी भाषणों में ज़िंदा है। ज़मीन पर इसका कहीं कोई वजूद  नहीं है।

यह उस ट्रेन की तरह है जिसकी अनाउंसमेंट  तो बार-बार होती है, मगर जो कभी प्लेटफॉर्म पर पहुँचती ही नहीं।

यह सिर्फ देरी नहीं है। यह ढीलापन है। सुस्त रफ्तार, जिद्दी ठहराव, और हैरत की बात यह कि सब इसे सामान्य मान बैठे हैं।

भारत रिकॉर्ड समय में एक्सप्रेसवे बना सकता है। जहाँ कभी नदियाँ दूरी बनाती थीं, वहाँ पुल खड़े हो जाते हैं। जहाँ खेत थे, वहाँ एयरपोर्ट उग आते हैं।

लेकिन दुनिया के सबसे मशहूर स्मारक ताजमहल के पास एक अहम और अपेक्षाकृत सीधी नदी परियोजना आज भी न्यूट्रल गियर में अटकी है।

क्यों?

क्योंकि हमारे निज़ाम  को अक्सर काम पूरा करने से ज्यादा रस्म-अदायगी  पसंद है। पहले ऐलान करो। जोरदार तालियाँ बटोर लो। बाद में सफाई देते रहो। और जब सवाल उठें तो कह दो:  “प्रक्रिया चल रही है।”

ताज के पास बैराज से कई उम्मीदें जुड़ी हैं। यमुना को फिर से जिंदा करना। ताज के आसपास का माहौल बेहतर बनाना। भूजल (groundwater) को रिचार्ज करना। पर्यावरणीय दबाव कम करना। शहर को कुछ राहत देना।

जहाँ नदी कई बार किसी सुस्त नाले जैसी लगती है, वहाँ यह कोई शौकिया परियोजना नहीं, बल्कि ज़रूरत है।

लेकिन खयाल से अमल  तक का सफर बेहद ऊबड़-खाबड़ रहा है।फाइलें चलीं। फिर रुक गईं। डिज़ाइन बदले। फिर दोबारा बदले। विभागों ने हामी भरी। फिर एतराज़  जता दिया। और वही पुराना हिंदुस्तानी राग गूँजता रहा; “यह मेरी फाइल नहीं है।” सो, परियोजना इंतज़ार करती रही। और करती रही।

एक दौर में रबर चेक डैम (अस्थायी लचीला बाँध) का प्रस्ताव आया। इसे तेज़ और लचीला हल बताया गया। सुनने में यह मुनासिब लगा। उम्मीद भी जगी।

लेकिन अब इसे चुपचाप किनारे रखकर चिनाई वाले पक्के बाँध  पर जोर दिया जा रहा है।

कागज़ों पर यह तरक्की लगती है। हकीकत में यह घड़ी की सुई फिर शून्य पर ले आई है। नया डिज़ाइन मतलब नई स्टडी। नई स्टडी मतलब नई मंज़ूरियाँ। नई मंज़ूरियाँ मतलब नई देरी। चक्र फिर वहीं से शुरू। जैसे कीचड़ में फँसा पहिया, घूम तो रहा हो मगर आगे न बढ़ रहा हो।

इस बीच यमुना लगातार पीछे हट रही है। कुछ हिस्सों में वह इतनी पतली हो जाती है कि लगता है जैसे अफसर और जनता अलग-अलग नदियाँ देख रहे हों। दाँव पर क्या लगा है, इस पर कोई बहस नहीं।

ताजमहल सिर्फ संगमरमर और यादों का ढांचा नहीं है। यह एक जीवित परिदृश्य (living landscape) है। इसकी खूबसूरती सिर्फ इसकी इमारत में नहीं, बल्कि उसके आसपास की नदी, हवा, रोशनी और पर्यावरणीय संतुलन में भी बसती है।

मरती हुई यमुना सिर्फ बदनुमा दाग नहीं। यह चेतावनी है।

कमज़ोर पड़ती नदी स्थानीय मौसम पर असर डालती है। भूजल को प्रभावित करती है। पूरे इलाके की पारिस्थितिकी  की लय बिगाड़ देती है। और धीरे-धीरे स्मारक के प्राकृतिक परिवेश को भी खतरे में डालती है।

इसीलिए सामाजिक कार्यकर्ता, पर्यावरणविद् और जागरूक नागरिक वर्षों से आवाज़ उठा रहे हैं।

रिवर कनेक्ट कैंपेन जैसे अभियान मुद्दे को जिंदा रखने की कोशिश करते रहे हैं।

आवाज़ें उठीं। रिपोर्टें लिखी गईं। अपीलें की गईं। लेकिन चिंता और प्रतिबद्धता  के बीच कहीं रफ्तार गुम हो जाती है। अब एक नया मोड़ आया है। चिनाई वाले बाँध के फैसले के बाद परियोजना को फिर नई जांचों से गुजरना होगा।

पर्यावरण प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment)। प्रदूषण नियंत्रण मंज़ूरी। भूजल मूल्यांकन। ताज की नज़दीकी के कारण विरासत संरक्षण मंज़ूरी। इनमें से कोई भी गैरज़रूरी नहीं। बल्कि सब बेहद ज़रूरी हैं।

ताज जैसे वैश्विक धरोहर (heritage) के पास कोई भी परियोजना शॉर्टकट नहीं अपना सकती।

मगर असली मसला सुरक्षा उपाय नहीं, उनकी रफ्तार है। भारत में अक्सर सुरक्षा उपाय स्पीड ब्रेकर बन जाते हैं। जो प्रक्रिया समयबद्ध और समन्वित  होनी चाहिए, वह ऐसी रिले रेस बन जाती है जिसमें बैटन बार-बार गिरती रहती है। ऐसी परियोजना को साफ समयसीमा चाहिए।

एक सशक्त प्राधिकरण (authority)।स्पष्ट जवाबदेही। और जनता को नियमित जानकारी।

लेकिन यहाँ यह फाइल किसी धूल भरी मेज़ पर पड़ी भूली हुई याद की तरह विभागों में भटकती रहती है।

असल मसला तकनीकी नहीं। सियासी है। जब ताज सुर्खियों में आता है, यमुना याद आ जाती है। जब खबरें बदलती हैं, फोकस भी बदल जाता है। नतीजा वही पुराना पैटर्न: घोषणा करो। देरी करो। दिलासा दो।दोहराओ। यह गूँजती हुई हुकूमत  है।

और फिर आती है सबसे कड़वी विडंबना । शिलान्यास हो चुके हैं। एक बार नहीं, कई बार। फीते कटे। फोटो खिंचे। भाषण हुए। लेकिन बैराज औपचारिक फावड़ों से नहीं बनता। वह लगातार मेहनत, अनुशासन और फॉलो-थ्रू  से बनता है। वही बेजान मगर असरदार प्रशासनिक मशक्कत , जो सुर्खियाँ भले न बटोरे, मगर नतीजे देती है।

साफ कहें:  यह कोई दिखावटी परियोजना नहीं। एक चालू बैराज जलस्तर स्थिर कर सकता है। ताज के पास नदी की मौजूदगी को बेहतर बना सकता है। भूजल को सहारा दे सकता है।

क्या इससे आगरा की हर पर्यावरणीय समस्या हल हो जाएगी? नहीं।

लेकिन यह एक अहम कदम होगा। और कई बार सही दिशा में उठाया गया छोटा कदम किसी बड़े ख्वाब से ज्यादा मायने रखता है।

इंतज़ार की भी कीमत होती है। हर साल की देरी जनता के भरोसे को थोड़ा और खोखला करती है। यह खामोश संदेश देती है कि अहम परियोजनाएँ भी बिना किसी जवाबदेही के अनंतकाल तक लटक सकती हैं।

और नदी? वह लगातार सिमटती रहती है। चुपचाप। सब्र के साथ।बेरहम ढंग से।

तो आगरा कहाँ खड़ा है? एक और दोराहे पर। शहर को अब नई घोषणा नहीं चाहिए। न नया शिलान्यास।न उम्मीदों में लिपटा कोई और वादा। उसे अमल चाहिए। ऐसी परियोजना चाहिए जो भाषणों से आगे निकले।फोटो-ऑप्स से बचे। सियासी मौसमों से ऊपर उठे। क्योंकि आखिर में यमुना फाइलें नहीं पढ़ती। बैठकों में शामिल नहीं होती। मंज़ूरियों का अनंत इंतज़ार नहीं करती। वह बस बहती है। या फिर रुक जाती है।

Tuesday, May 5, 2026

 क्या यह वही वृन्दावन है… या कोई और शहर?

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वृन्दावन को टूरिस्ट स्पॉट बनाने का पाप: ब्रज की आत्मा पर हमला और सांस्कृतिक हत्या

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बृज खंडेलवाल द्वारा

6 मई 2026

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एक तरफ वह पुराना ब्रज; धूल भरी पगडंडियाँ, कदम्ब की छाँव, यमुना की धीमी लहरें, मुरली की अनसुनी धुन। दूसरी तरफ आज का वृन्दावन; हॉर्न, होटल, भीड़ और सेल्फी स्टिक का जंगल। 

तब भक्ति बहती थी, अब भीड़ बहती है। तब साधु मिलते थे, अब पैकेज टूर। तब शांति थी, अब शोर का मेला। क्या हमने आध्यात्मिकता को मनोरंजन में बदल दिया है? क्या यह वही भूमि है जहाँ राधा-कृष्ण की लीलाएँ सांस लेती थीं? या फिर यह एक ऐसा बाज़ार बन चुका है जहाँ आस्था भी बिकने लगी है?

वृन्दावन को व्यावसायिक टूरिज्म का हब बनाने का मॉडल न केवल गलत है, बल्कि श्री कृष्ण-राधा की पावन भक्ति संस्कृति पर सीधा आघात है। यह आस्था की भावनाओं से खिलवाड़ है, प्राचीन बृज विरासत पर हमला है। पुराणों, ग्रंथों और वैष्णव परंपरा में बृज भूमि को वन-उपवन, कुंज-वाटिका, तालाब-कुंड और यमुना घाटों से भरी एक पवित्र, शांत, गौ-पालन और रास-लीला की भूमि के रूप में वर्णित किया गया है। लेकिन आज का “विकास” मॉडल इस वर्णन का घोर विरोधाभास है।

तथ्य चौंकाने वाले हैं। अध्ययनों के अनुसार वृन्दावन में सालाना 60 लाख से अधिक पर्यटक आते हैं, जो त्योहारों के समय बढ़कर लाखों प्रतिदिन हो जाते हैं। इस भीड़ ने समूची ब्रज भूमि की काया विकृत कर दी है। ठोस कचरा, प्लास्टिक की बोतलें, प्रसाद पैकेटिंग और पूजा सामग्री का ढेर कुंडों, घाटों और यमुना में गिर रहा है। यमुना की स्थिति तो और भी भयावह है, उच्च BOD स्तर, फीकल कोलीफॉर्म की भारी मात्रा और अनुपचारित सीवेज के कारण नदी स्नान योग्य भी नहीं रही। 2026 के आंकड़ों में केशी घाट, विश्राम घाट जैसे स्थानों पर प्रदूषण का स्तर खतरनाक दर्ज किया गया। बोट टूरिज्म के नाम पर चल रही नावों ने प्रदूषण को और बढ़ाया है, 2026 में वृन्दावन के पास यमुना में नाव पलटने की घटनाएं हुईं, जिसमें दर्जनों श्रद्धालु मारे गए। शुद्धिकरण की जगह सौंदर्यीकरण का ढोंग चल रहा है, जिससे पावन ब्रज रज दुर्लभ हो गई है।

पर्यावरणीय विनाश के आंकड़े स्पष्ट हैं। वन, हरियाली, तालाब और कुंड तेजी से गायब हो रहे हैं। कुंज गलियां, जो राधा-कृष्ण की लीला स्थलियाँ हैं, अब कंक्रीट की ऊंची अट्टालिकाओं से घिर गई हैं। 5500 से अधिक मंदिरों वाले इस छोटे से क्षेत्र में कैरिंग कैपेसिटी पार हो चुकी है। ट्रैफिक, शोर और वायु प्रदूषण ने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। लोकल निवासियों का कहना है कि पहले की शांत वातावरण अब इतिहास बन चुका है। बिल्डर्स लॉबी का मॉडल हावी है: 2020-2025 के बीच प्राइम एरिया में भूमि की कीमतें तीन गुना से अधिक बढ़ गई हैं, कुछ जगहों पर 22-29% CAGR के साथ। स्थानीय वाशिंदे हाशिए पर धकेल दिए गए हैं, जबकि बाहरी डेवलपर्स और फ्रॉड बाबाओं का राज चल रहा है। मठाधीश बनकर भावनाओं का व्यापार करने वाले अज्ञान के अंधेरे का फायदा उठा रहे हैं। भक्ति अब कमोडिटी बन गई है; इंस्टेंट मोक्ष की तलाश में आने वाली भीड़ असली आस्था को कुचल रही है।

सांस्कृतिक विनाश और भी गहरा है। बृज भाषा लगभग विलुप्त होने की कगार पर है। गुरुकुलों की जगह अंग्रेजी स्कूलों का बोलबाला है। पारंपरिक गायन, नृत्य, भोजन और वेशभूषा बदल चुके हैं। चैतन्य महाप्रभु, सूरदास और वल्लभाचार्य की भूमि अब पहचान में नहीं आती। चारों तरफ ऐश-ऐय्याशी के केंद्र बन चुके हैं, जहां भक्ति की जगह व्यावसायिकता हावी है। बृज संस्कृति के संरक्षण में जीरो प्रयास दिखाई देता है। विकास संस्थाएं भ्रष्टाचार के अड्डे बन गई हैं। बिना शुद्ध जल की व्यवस्था बढ़ाए रिवर फ्रंट प्रोजेक्ट चलाए जा रहे हैं, जो यमुना को और प्रदूषित कर रहे हैं।

यह “विकास” ब्रज भूमि की मूल आत्मा को कुचल रहा है। प्राचीन ग्रंथों में बृज का विकास उसके पिछड़ेपन को सहेजने, गौ-रक्षा, वन-संरक्षण और सादगी में निहित था, कंक्रीटाइजेशन में नहीं। आज की अट्टालिकाएं, मॉल जैसी संरचनाएं और हाईवे ब्रज की पावनता को नष्ट कर रहे हैं। स्थानीय ज्ञान प्रणाली, पारंपरिक जल संरक्षण और जैव विविधता खतरे में है। पर्यटन अर्थव्यवस्था के नाम पर जो रोजगार पैदा हो रहा है, वह मौसमी और असमान है; स्थानीय महिलाएं और पिछड़े वर्ग हाशिए पर हैं।

ब्रज की रक्षा जरूरी है। विकास का नाम लेकर इस पवित्र भूमि की आत्मा को कुचलना अपराध है। श्री कृष्ण की लीला भूमि को सौंदर्यीकरण की नहीं, असली शुद्धिकरण की जरूरत है; यमुना की सफाई, कुंडों का संरक्षण, वनों का पुनरुद्धार, भीड़ नियंत्रण, स्थानीय संस्कृति का संवर्धन और बिल्डर्स लॉबी पर लगाम। बिना इनके कोई भी विकास मॉडल ब्रज के साथ छलावा है।

आस्था के केंद्र को व्यावसायिक हब बनाने वाले सोचें; क्या हम श्री कृष्ण को बेच रहे हैं? क्या हम राधा की वाटिकाओं को कंक्रीट के नीचे दफना रहे हैं? ब्रज की रक्षा करना सिर्फ पर्यावरण या संस्कृति की रक्षा नहीं, बल्कि सनातन धारा की रक्षा है। अगर आज नहीं रोका गया, तो आने वाली पीढ़ियां सिर्फ प्लास्टिक और कंक्रीट के बीच “इंस्टेंट भक्ति” का मजाक देखेंगी, असली ब्रज कभी नहीं जान पाएंगी।

यह घोर अन्याय है। ब्रज को बचाओ, उसकी आत्मा को बचाओ। विकास का ढोंग बंद करो, शुद्धिकरण और संरक्षण अपनाओ।

Monday, May 4, 2026

 कब तक 80 प्रतिशत आबादी खुद को कमजोर समझती रहेगी? कब तक बहुसंख्यक होकर भी राजनीतिक रूप से बिखरे रहेंगे? क्या सच में यह देश अपने ही मूल समाज से कटता जा रहा था? और सबसे बड़ा सवाल; क्या ‘सेक्युलरिज्म’ के नाम पर एक खामोश अन्याय चल रहा था? दशकों तक यह सवाल हवा में तैरते रहे, लेकिन जवाब किसी ने नहीं दिया। फिर अचानक कुछ बदल गया। एक खामोशी टूटी। एक गुस्सा फूटा। और जो समाज सदियों से सहनशीलता का प्रतीक था, वही अब सवाल पूछने लगा। क्या यह सिर्फ राजनीति का बदलाव है, या एक सोया हुआ शेर सच में जाग उठा है?

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हिंदू बहुमत: वो सोए हुए शेर जो जाग उठे

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बृज खंडेलवाल द्वारा

5 मई, 2026

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2014 से पहले, भारत में हिंदू बहुसंख्यक एक बेहद अजीब और विरोधाभासी स्थिति में थे। करीब 80 प्रतिशत आबादी होने के बावजूद, यह समाज राजनीतिक रूप से बंटा हुआ, वैचारिक रूप से कमजोर और अपनी सामूहिक ताकत को लेकर उदासीन था।

उस दौर में समाजवादी और कम्युनिस्ट विचारधारा के नेताओं ने ‘सेक्युलरिज्म’ को एक चादर की तरह ओढ़ रखा था। मगर इसके नीचे सच्चाई कुछ और थी। हिंदू समाज को जातियों और क्षेत्रों में उलझाए रखना ही उनकी राजनीति का मूल था।

कांग्रेस और परिवारवादी पार्टियों ने इस बिखराव को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया। उनका गणित सीधा था; अल्पसंख्यकों और चुनिंदा जातियों का गठजोड़ बनाओ, सत्ता पाओ। यह खेल दशकों तक चला। मगर हर खेल की एक सीमा होती है।

धीरे-धीरे यह ‘तुष्टीकरण’ एक चुभन बन गया। एक ऐसा जख्म, जो दिखता नहीं था, मगर दर्द देता था। यही दर्द आगे चलकर विस्फोट बना।

आज़ादी के बाद भारत ने खुद को आधुनिक राष्ट्र बनाने की कोशिश की। 1950 के दशक में जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने हिंदू कोड बिल लागू किया। यह सुधार जरूरी था। इससे महिलाओं को अधिकार मिले, समाज में बदलाव आया।

लेकिन सवाल यहीं खड़ा होता है, क्या यही साहस मुस्लिम पर्सनल लॉ में दिखाया गया? जवाब साफ है; नहीं।

यहां से एक असमानता शुरू हुई। सरकार हिंदुओं के लिए सुधारक बनी, और अल्पसंख्यकों के लिए रक्षक।

संविधान का अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यकों को अपने शिक्षण संस्थान चलाने की आजादी देता है। मगर बहुसंख्यकों को यह अधिकार नहीं मिला।

फिर आया 1991 का पूजा स्थल कानून। इसने 1947 की स्थिति को स्थिर कर दिया। काशी और मथुरा जैसे विवादों के रास्ते कानूनी तौर पर बंद हो गए।

दूसरी ओर, हिंदू मंदिर सरकारी नियंत्रण में आ गए। तिरुपति जैसे मंदिरों की आय सरकार के अधीन हो गई।

यह एक विचित्र स्थिति थी। दुनिया में शायद ही कोई ऐसा देश होगा जहां बहुसंख्यकों के धार्मिक संस्थानों पर सरकार का नियंत्रण हो, और अल्पसंख्यकों के संस्थान पूरी तरह स्वतंत्र हों।

अगर इस पूरी कहानी का ‘टर्निंग पॉइंट’ तलाशना हो, तो वह 1985 का शाहबानो केस था।

एक 62 वर्षीय महिला, जिसे उसके पति ने तीन तलाक देकर छोड़ दिया। सुप्रीम कोर्ट ने उसके पक्ष में फैसला दिया। उसे गुजारा भत्ता मिलना चाहिए।

मगर तब के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने बहुमत होने के बावजूद पीछे कदम खींच लिया। उन्होंने संसद में नया कानून बनाकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट दिया।

यह सिर्फ एक फैसला नहीं था। यह एक संदेश था। यह संदेश साफ था; राजनीति न्याय से बड़ी है।

यहीं से लोगों को समझ आया कि ‘सेक्युलरिज्म’ का अर्थ बराबरी नहीं, बल्कि झुकाव है। यही वह क्षण था जब हिंदू समाज को अपनी राजनीतिक कमजोरी का अहसास हुआ।

1990 में V. P. सिंह ने मंडल आयोग लागू किया। उद्देश्य था पिछड़ों को आरक्षण देना। मगर इसके पीछे राजनीति का गहरा खेल था। यह उस हिंदू एकता को तोड़ने की कोशिश थी जो राम मंदिर आंदोलन से बन रही थी।

देश में उबाल आया। विरोध प्रदर्शन हुए। युवाओं ने आत्मदाह तक किया।

इसके जवाब में लाल कृष्ण आडवाणी ने रथ यात्रा निकाली। सोमनाथ से अयोध्या तक की यह यात्रा सिर्फ एक यात्रा नहीं थी। यह एक प्रतीक थी।

इसने जातियों में बंटे हिंदुओं को एक सूत्र में बांधना शुरू किया।

यहीं से ‘हिंदू वोट’ की अवधारणा जन्मी। जिसे पहले असंभव माना जाता था।

UPA सरकार के समय तुष्टीकरण एक नीति बन गया। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट आई। उसने मुसलमानों की आर्थिक स्थिति को उजागर किया। मगर इसका इस्तेमाल समाधान के लिए नहीं, बल्कि राजनीति के लिए हुआ।

मनमोहन सिंह का बयान: “देश के संसाधनों पर अल्पसंख्यकों का पहला हक है”, एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया।

इसके साथ ही ‘भगवा आतंकवाद’ का नैरेटिव गढ़ा गया। हिंदू संगठनों को आतंकी गतिविधियों से जोड़ने की कोशिश हुई।

बाद में अदालतों में ये दावे कमजोर साबित हुए।

लेकिन तब तक एक धारणा बन चुकी थी, सरकार बहुसंख्यकों के साथ खड़ी नहीं है।

2014 में जो हुआ, वह अचानक नहीं था। यह दशकों की नाराजगी का परिणाम था।

यह किसी एक पार्टी की रणनीति नहीं थी। यह समाज के भीतर पनप रही भावना थी।

हिंदू समाज अब खुद को सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि शक्ति के रूप में देखने लगा।

2026 के पश्चिम बंगाल चुनाव इसका ताजा उदाहरण हैं। जो राज्य कभी वामपंथी और बौद्धिक राजनीति का गढ़ था, वहां भी यह बदलाव दिख रहा है।

यह बदलाव सिर्फ वोट का नहीं है। यह सोच का है।

जो लोग यह मानकर बैठे थे कि बहुसंख्यक समाज हमेशा बंटा रहेगा, उनकी गणना अब गलत साबित हो रही है।

सोए हुए शेर अब जाग चुके हैं।

और जब शेर जागता है, तो जंगल का संतुलन बदलता है।

आज का हिंदू समाज सवाल पूछ रहा है। जवाब मांग रहा है।

वह अब सिर्फ सहनशील नहीं, सजग भी है।

राजनीति अब बदल रही है। वोट बैंक का गणित कमजोर पड़ रहा है।

उसकी जगह एक नई सोच उभर रही है, राष्ट्रवाद की। भारत और भारतीयता की। तमिल राजनीति भी इस से प्रभावित हो रही है।

यह बदलाव स्थायी होगा या अस्थायी, यह भविष्य बताएगा।

लेकिन इतना तय है; अब बहुसंख्यक समाज को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। शेर की दहाड़ गूंज चुकी है। अब सन्नाटा पहले जैसा नहीं रहेगा।


Sunday, May 3, 2026

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पूंजीवाद का कुरूप चेहरा:

लोकतांत्रिक समाजवाद की वापसी की पुकार

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

4 मई 2026

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लाल झंडे अब कम दिखते हैं। मई दिवस की रौनक भी फीकी पड़ गई है। कभी जो दिन मेहनतकशों की  एकता का पैग़ाम देता था, आज वह बस एक रस्म सा लगता है। मगर सच यह है कि ज़मीन के नीचे अंगारे अब भी सुलग रहे हैं। सवाल वही है; क्या तरक़्क़ी सिर्फ कुछ लोगों के लिए है, या सबके लिए?

तीन दशकों से भारत में उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण का निज़ाम  चला। कहा गया कि विकास होगा, दौलत बढ़ेगी, सबका भला होगा। हुआ क्या? अमीर और अमीर हो गए। ग़रीब वहीं खड़े रह गए, कई जगह और पीछे चले गए। शहर चमक उठे, लेकिन गाँव सूने हो गए। अमीरी-गरीबी का फासला अब खाई बन चुका है।

दुनिया के मंच पर यह पूंजीवाद अब और भी बेनक़ाब हो चुका है। डोनाल्ड ट्रंप इस सिस्टम का सबसे बदसूरत चेहरा बनकर उभरे। उनकी सियासत में तहज़ीब  कम, घमंड ज़्यादा दिखाई दिया है। व्यापार युद्ध, ऊँचे टैरिफ, कमज़ोर देशों को “hell hole” कहना; यह सब सिर्फ लफ्ज़ नहीं, बल्कि उस सोच की झलक है जहाँ ताक़त ही सच बन जाती है।

यह पूंजीवाद का वही चेहरा है, जो इंसान को इंसान नहीं, माल (commodity) समझता है। कामगार एक नंबर बन जाता है। मज़दूर एक लागत बन जाता है। और इंसानियत? वह कहीं गुम हो जाती है।

कार्ल मार्क्स ने बहुत पहले चेतावनी दी थी: यह सिस्टम इंसान के रिश्तों को सिर्फ पैसे के लेन-देन में बदल देगा। आज गिग इकॉनमी, ठेके पर काम, और प्रवासी मज़दूरों की हालत देखिए। सब कुछ वही कहानी कह रहे हैं।

रोजा लक्जेमबर्ग ने कहा था, या तो समाजवाद आएगा, या बर्बरता। आज दुनिया जिस मोड़ पर खड़ी है, यह बात और भी सच्ची लगती है। नफ़रत की राजनीति, धर्म और नस्ल के नाम पर बँटवारा; यह सब उसी बर्बरता की आहट है।

भारत में समाजवाद की सोच कोई पराई चीज़ नहीं है। डॉ राम मनोहर लोहिया ने साफ कहा था: बराबरी के बिना भाईचारा एक झूठ है। जब तक आर्थिक समानता नहीं होगी, तब तक समाज में सच्ची मोहब्बत नहीं पनपेगी।

आचार्य नरेंद्र देव ने लोकतंत्र और समाजवाद को एक-दूसरे का पूरक माना। उनका मानना था कि पूंजीवाद के तहत लोकतंत्र सिर्फ दिखावा है, असल ताक़त कुछ लोगों के हाथ में सिमट जाती है।

आज भारत में यह सच्चाई साफ दिखती है। शहरों में ऊँची-ऊँची इमारतें हैं, लेकिन उनके साये में झुग्गियाँ भी हैं। कॉर्पोरेट मुनाफा आसमान छू रहा है, लेकिन किसान कर्ज़ में डूबकर जान दे रहा है। नौजवान पढ़-लिखकर भी बेरोज़गार है। यह कैसी तरक़्क़ी है?

दुनिया में भी हालात कुछ अलग नहीं। ट्रंप की नीतियों ने दिखा दिया कि पूंजीवाद अब सिर्फ बाज़ार नहीं, बल्कि ताक़त का खेल बन चुका है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ कमज़ोर हो रही हैं। नियमों की जगह मनमानी चल रही है।

ऐसे में लोकतांत्रिक समाजवाद एक उम्मीद बनकर उभरता है। यह कोई ख़याली पुलाव नहीं है। यह एक संतुलित रास्ता है, जहाँ लोकतंत्र भी हो, और आर्थिक न्याय भी।

समाजवाद का मतलब सिर्फ सरकार का नियंत्रण नहीं। इसका मतलब है; हर इंसान को इज़्ज़त से जीने का हक़ मिले। अच्छी शिक्षा, सस्ती स्वास्थ्य सेवा, और रोजगार के मौके सबको मिलें।

नॉर्डिक देशों का मॉडल सामने है। वहाँ बाज़ार भी है, लेकिन मज़बूत यूनियन भी हैं। अमीर टैक्स देते हैं, और ग़रीबों को सहारा मिलता है। यही संतुलन समाज को स्थिर बनाता है।

भारत में भी कुछ कोशिशें हुई हैं। मनरेगा, मिड-डे मील जैसी योजनाओं ने राहत दी है। लेकिन ये आधे-अधूरे कदम हैं। ज़रूरत है एक बड़े बदलाव की: नीतियों में, सोच में, और सियासत में।

आज सबसे ज़रूरी है इंसान को केंद्र में रखना। मुनाफा नहीं, इंसानियत अहम हो। विकास का मतलब सिर्फ जीडीपी नहीं, बल्कि लोगों की खुशहाली हो।

मई दिवस भले फीका पड़ गया हो, लेकिन उसका पैग़ाम आज भी ज़िंदा है। यह हमें याद दिलाता है कि हक़ माँगने से नहीं, लड़ने से मिलते हैं।

पूंजीवाद ने हमें बहुत कुछ दिया, लेकिन बहुत कुछ छीन भी लिया। अब वक़्त है सोचने का; क्या हम उसी रास्ते पर चलते रहेंगे, या कोई नया रास्ता चुनेंगे?

लोकतांत्रिक समाजवाद कोई पुरानी किताब का सपना नहीं। यह आज की ज़रूरत है। यह वह रास्ता है, जहाँ इंसान, इंसान बना रहता है, न कि सिर्फ एक ग्राहक या मजदूर।

और शायद यही सबसे बड़ी लड़ाई है: इंसान को इंसान बनाए रखने की।

Saturday, May 2, 2026

 ख़ऊओं का शहर आगरा!  

बृज मंडल की मिठास की अनंत परंपरा  

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बृज खंडेलवाल द्वारा  

3 मई 2026  

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बृज मंडल: आगरा, मथुरा और हाथरस का यह पवित्र त्रिकोण कृष्ण प्रेम की मीठी धुन पर थिरकता है। यमुना की लहरों और ब्रज की धूल में दूध, घी और खोए की महक आज भी घुली हुई है। 

यहां की मिठाइयां सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि भक्ति, संस्कृति और सदियों पुरानी विरासत का संगम हैं। मंदिरों में “लाल कू मीठी खीर भौत भावे” कहकर भोग चढ़ाया जाता है, जहां मठरी, लड्डू, ठौर, पेड़ा और रबड़ी, मोहन थाल जैसे प्रसाद कृष्ण भक्ति को और मिठास देते हैं।  वृन्दावन में ठंडी दही लस्सी के बिना यात्रा अधूरी मानी जाती है, तो मथुरा में खुरचन और मेवा-युक्त खौलते दूध का कुल्लड़ चटकाए बिना मनोकामना पूरी नहीं होती।

बृज क्षेत्र की मिठाइयां सांस्कृतिक धरोहर हैं। इनमें मुगल काल की समृद्धि और ब्रज की सादगी का अनोखा मेल दिखता है। आगरा का विश्व प्रसिद्ध पेठा तो गरीब- अमीर सभी का पसंदीदा है, लेकिन घेवर, कलाकंद, बर्फी, गुलाब जामुन, खुरमी, बालूशाही, पेड़ा, रबड़ी, सोन पपड़ी और दूध की मलाई जैसी रचनाएं ब्रज की आत्मा को छूती हैं। घी और खोया इन मिठाइयों की जान हैं, जबकि बंगाल चेना पर और दक्षिण भारत नारियल पर निर्भर रहता है। यहां गोंद जैसे पौष्टिक तत्व और मुगल शाही रबड़ी की गाढ़ापन ब्रज की खास पहचान है।

भारत में मिठाइयों का इतिहास वैदिक काल से जुड़ा है, लेकिन आगरा की भगत हलवाई इसे जीवंत उदाहरण बनाती है। 1795 में लेख राज भगत द्वारा यमुना किनारे बेलंगंज में स्थापित यह दुकान भारत की सबसे पुरानी मिठाई की दुकानों में से एक मानी जाती है। लगभग 231 वर्ष पुरानी इस संस्था ने पीढ़ी दर पीढ़ी पारंपरिक रेसिपी और बनाने के तरीके संभालकर रखे हैं। शुरू में बेड़इं, जलेबी, लड्डू और साधारण मिठाइयों से सफर शुरू करने वाली यह संस्थान आज सैकड़ों आइटम्स, मिठाई, चाट, बेकरी और कन्फेक्शनरी, तक पहुंच चुकी है। NDTV समेत कई मीडिया संस्थानों ने इसे भारत की सबसे पुरानी मिठाई दुकान के रूप में मान्यता दी है। मक्खन का समोसा, पिस्ते की बर्फी, खास हैं।

बेलनगंज में भगत हलवाई के सामने एक जमाने में राजनीतिक सभाएं होती थीं और बड़े-बड़े राष्ट्रीय नेता यहां नाश्ता करते थे। आज इसके 7-8 आउटलेट्स हैं, लेकिन स्वाद वही पुराना, शुद्ध घी-खोया वाला बना हुआ है। 

कई दुकानों पर आज भी दोपहर को कढ़ाई में पका गाढ़ा दूध पीना आगरा की अनोखी शान है।

आगरा में तिकोनिया इलाके की दुकानें भी कम प्रसिद्ध नहीं। शहर के विभिन्न हिस्सों में हीरा लाल मिष्ठान, गोपाल दास पेठे वाले, देवी राम, दाऊजी, गोपिका और GMB जैसे ब्रांड्स लंबे समय  से स्वाद की सेवा कर रहे हैं। गोपाल दास तो पेठा और दालमोठ के लिए मशहूर है। रबड़ी इतनी गाढ़ी होती है कि चम्मच उसमें खड़ा रह जाता है। धीमी आंच पर घंटों पकाई जाने वाली यह रबड़ी ब्रज की धैर्यपूर्ण परंपरा का प्रतीक है।

मथुरा में पेड़ा कृष्ण भक्ति का प्रतीक है। यहां का पारंपरिक पेड़ा खोए, शुद्ध घी और सूखे मेवों से बना नरम, हल्का पीला गोला मुंह में घुल जाता है। कान्हा स्वीट्स और बसंती मिठाई की रबड़ी दूध को उबाल-उबालकर बनाई जाती है, जिसमें पिस्ता की बारीक कतरनें स्वाद बढ़ाती हैं। मक्खन संदेश मक्खन की मलाई में फल-मेवे मिलाकर ब्रज का अनूठा स्वाद प्रस्तुत करता है। खुरचन भी यहां लोकप्रिय है, दूध की मलाई को रगड़कर बनाया गया चिपचिपा, इलायची-केसर युक्त आनंद।

हाथरस हींग कचौड़ी के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन मिठाइयों में भी पीछे नहीं। यहां का घेवर मेवों से भरा आता है। सोन पपड़ी पतली-कुरकुरी चादरों वाली, लंबे समय तक टिकने वाली मिठाई है। हाथरस के हलवाई पारंपरिक चूल्हों पर घी डालकर स्वाद को और गहराई देते हैं। खुरचन यहां भी चिपचिपी और सुगंधित बनती है।

बृज के छोटे कस्बे भी अपनी विशेषताएं रखते हैं। पिनाहट की खोए की गुजियां त्योहारों में खास होती हैं, खोया भरी कुरकुरी परतें, गुड़ या चीनी से मीठी। किरावली के पेड़े छोटे, घने खोए वाले और बेहद स्वादिष्ट होते हैं। ये छोटी जगहें ब्रज की गहरी सांस्कृतिक जड़ों को दर्शाती हैं।

बृज मिठाइयों की सबसे बड़ी खूबी उनकी सादगी और पौष्टिकता है। शुद्ध घी, ताजा खोया और मेवों से बनी ये मिठाइयां न सिर्फ स्वाद देती हैं बल्कि ऊर्जा भी। आज के दौर में जब पैकेटबंद मिठाइयां बाजार में छाई हुई हैं, तब भी बृज मंडल के हलवाई पुरानी परंपराओं को जीवित रखे हुए हैं।

ताजमहल देखने आने वाले पर्यटक अब सिर्फ पत्थर की सुंदरता नहीं, बल्कि ब्रज की मीठी विरासत का भी रसास्वादन जरूर करें। आगरा, मथुरा और हाथरस की गलियों में घूमते हुए एक कौर पेड़ा, एक चम्मच रबड़ी या एक टुकड़ा सोन पपड़ी मुंह में रखें, तो महसूस होगा कि कृष्ण की लीला अभी भी यहां जीवंत है। 

बृज मंडल की मिठास अनंत है, ठीक उसी तरह जैसे कान्हा का प्रेम। एक बार चख लो, तो बार-बार याद आएगी। 


Friday, May 1, 2026

 कब तक तेल के भरोसे? अब सूरज से चलेगा भारत

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पश्चिम एशिया के संकट के बीच, सोलर एनर्जी की चमक से भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिखी जा रही है

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

3 मई 2026

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पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष। दूर जल रही आग की तपिश भारत तक साफ महसूस हो रही है। तेल और गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव, आपूर्ति की अनिश्चितता और आयात पर बढ़ती निर्भरता भारत के लिए गंभीर खतरे हैं। देश अभी भी अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयातित ईंधन से पूरा करता है। ऐसे में वैश्विक तनाव सीधे हमारे ऊर्जा बिल पर असर डालते हैं।

हर संकट अवसर भी लेकर आता है।  एक रिपोर्ट

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धूप में नहाया, उत्तर प्रदेश का एक छोटा सा गांव। सरसों के पीले खेतों के बीच से गुजरती कच्ची पगडंडी। दूर कहीं एक घर की छत पर चमकते सोलर पैनल। आंगन में धीरे-धीरे घूमता पंखा, मोबाइल चार्ज हो रहा है, और शाम ढलते ही बच्चों की किताबों पर स्थिर, चमकदार रोशनी फैल रही है, टिमटिमाती ढिबरी या लालटेन की जगह।

यकीन करना मुश्किल है, लेकिन यही वो भारत है जो महज 25 साल पहले अंधेरे से जूझ रहा था। तब सूरज ढलते ही गांव सिमट जाता था। दीए की कांपती लौ में रात कटती, और बिजली एक  मेहमान की तरह आती-जाती रहती। इन्वर्टर अमीरों की शान था, जनरेटर शोर मचाता और डीजल की तेज गंध हवा में घुली रहती। 

आज तस्वीर पूरी तरह पलट चुकी है। छतों पर सोलर पैनल चमक रहे हैं, खेतों के किनारे मिनी ग्रिड काम कर रहे हैं, और गांव खुद अपनी ऊर्जा गढ़ रहा है। 

भारत आज ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक स्थिर लेकिन निर्णायक यात्रा पर है। यह कोई अचानक छलांग नहीं, बल्कि निरंतर प्रयासों की कहानी है। 

वित्तीय वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही में देश की बिजली मांग ने नया रिकॉर्ड बनाया। 25 अप्रैल 2026 को दोपहर करीब 3:38 बजे पीक डिमांड 256.1 गीगावॉट तक पहुंच गई। गर्मी की लहर और बढ़ती आर्थिक गतिविधियों ने इस मांग को और तेज किया। बढ़ती अर्थव्यवस्था, हर घर बिजली पहुंचाने के प्रयास, शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन से तेज होती गर्मी; सब मिलकर ऊर्जा की भूख को बढ़ा रहे हैं। 

सोलर ऊर्जा का उत्पादन साल-दर-साल 24 प्रतिशत बढ़ा है। कुल बिजली उत्पादन में करीब 3 प्रतिशत की वृद्धि हुई, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से गैर-जीवाश्म स्रोतों से आई। कोयला और लिग्नाइट आधारित उत्पादन में 1 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। यानी विकास और प्रदूषण के पुराने रिश्ते में अब दरार पड़ रही है। 

संकेत और भी साफ हैं। पिछले 90 दिनों में से 88 दिन ऐसे रहे जब बिजली की सबसे ज्यादा मांग दिन के समय दर्ज हुई, जब सूरज चरम पर होता है। इसका मतलब है कि सोलर ऊर्जा अब महज विकल्प नहीं रह गई है, बल्कि मुख्यधारा बनती जा रही है।

इसी बदलाव को घर-घर तक पहुंचाने वाली एक बड़ी पहल है पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना। इस योजना का उद्देश्य साधारण परिवारों की छतों को छोटे-छोटे पावर प्लांट में बदलना है। सरकार सब्सिडी मुहैया करा रही है, आसान ऋण की व्यवस्था कर रही है और लोगों को अपनी बिजली खुद उत्पन्न करने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। अब तक इस योजना के तहत 31 लाख से ज्यादा घरों को फायदा पहुंच चुका है, जबकि लाखों आवेदन लंबित हैं।

गांवों में जहां कभी बिजली आने का इंतजार किया जाता था, वहां अब लोग खुद बिजली पैदा कर रहे हैं। बिजली का बिल काफी कम हो रहा है, और अतिरिक्त ऊर्जा को ग्रिड में बेचकर अतिरिक्त आय का नया जरिया भी बन रहा है। यह सिर्फ एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि ऊर्जा के लोकतंत्रीकरण की दिशा में एक सामाजिक बदलाव है। आम आदमी अब ऊर्जा का उपभोक्ता नहीं, बल्कि उत्पादक भी बन रहा है।

महंगे आयातित तेल-गैस के मुकाबले सोलर और पवन ऊर्जा अब केवल पर्यावरणीय विकल्प नहीं, बल्कि आर्थिक मजबूरी भी बन गई है। जब वैश्विक बाजार अस्थिर हों, तब सूरज की रोशनी और हवा की ताकत सबसे भरोसेमंद साथी साबित होते हैं।

इसलिए सरकार सोलर पार्क, विंड एनर्जी कॉरिडोर और ग्रीन हाइड्रोजन जैसी परियोजनाओं पर तेजी से काम कर रही है। निजी क्षेत्र का निवेश भी बढ़ रहा है, क्योंकि साफ ऊर्जा अब भविष्य की बात नहीं, तुरंत की जरूरत बन गई है। ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु लक्ष्य दोनों एक ही रास्ते पर दिख रहे हैं।

हालांकि सोलर और पवन ऊर्जा की क्षमता तेजी से बढ़ रही है, लेकिन इसका पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा। “कर्टेलमेंट”; यानी पैदा हुई साफ ऊर्जा को व्यर्थ जाना, एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। चौथी तिमाही में करीब 27 गीगावॉट सोलर और 4 गीगावॉट पवन ऊर्जा को सीधे कर्टेल किया गया, जबकि ट्रांसमिशन रिजर्व के तहत और भी बड़ी मात्रा प्रभावित हुई।

यह विडंबना है, एक ओर देश प्रदूषण कम करने की कोशिश कर रहा है, दूसरी ओर साफ ऊर्जा को मजबूरी में रोकना पड़ रहा है। समस्या उत्पादन की नहीं, बल्कि व्यवस्था की है। हमने सोलर प्लांट तो तेजी से लगाए, लेकिन बिजली को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने वाले ट्रांसमिशन नेटवर्क की गति उससे मेल नहीं खा पाई। राजस्थान, गुजरात और तमिलनाडु जैसे राज्यों में सूरज और हवा से भरपूर ऊर्जा पैदा हो रही है, लेकिन उसे उपभोक्ता केंद्रों तक पहुंचाने में अड़चनें बनी हुई हैं।

भंडारण की कमी भी एक बड़ी बाधा है। दिन में पैदा हुई अतिरिक्त सोलर ऊर्जा को शाम या रात के लिए संग्रहित करने की क्षमता अभी सीमित है। बैटरी स्टोरेज और पंप्ड स्टोरेज हाइड्रो जैसी तकनीकें अभी शुरुआती चरण में हैं। नतीजा यह होता है कि दोपहर में बिजली की अधिकता और शाम को फिर वही दबाव।

कोयला आधारित प्लांट्स की कहानी भी बदल रही है। प्लांट लोड फैक्टर 72 प्रतिशत से घटकर 69 प्रतिशत रह गया है। कोयला अब “राजा” की जगह बैकअप की भूमिका निभा रहा है। पर्यावरण की दृष्टि से यह सकारात्मक है, लेकिन पुराने प्लांट्स की कार्यक्षमता और लागत पर नए सवाल खड़े हो रहे हैं।

तो क्या भारत की ऊर्जा स्वतंत्रता की राह रुक गई है? बिल्कुल नहीं। रुकावटें जरूर हैं: ट्रांसमिशन नेटवर्क की कमी, भंडारण की चुनौती, नीतिगत स्पष्टता की जरूरत और राज्यों के बीच समन्वय की कमी। लेकिन राह बंद नहीं है।

असल जरूरत संतुलित विकास की है। उत्पादन के साथ-साथ वितरण, भंडारण और स्मार्ट ग्रिड पर बराबर ध्यान देना होगा। ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर को तेजी से पूरा करना, बैटरी स्टोरेज में बड़े पैमाने पर निवेश और टाइम-ऑफ-डे टैरिफ जैसी व्यवस्थाएं इस संक्रमण को आसान बना सकती हैं। अगर निवेशकों को नीतिगत निश्चितता और समय पर भुगतान मिले, तो निजी क्षेत्र और तेजी से आगे आएगा।

आज गांव की छत पर चमकता सोलर पैनल सिर्फ बिजली नहीं दे रहा। वह आत्मनिर्भरता, पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक सशक्तिकरण का प्रतीक बन गया है। जहां कभी अंधेरा स्थायी लगता था, वहां अब रोशनी अपने दम पर जल रही है।

भारत की यह यात्रा अभी अधूरी है। बढ़ते भारत की यह “ग्रोइंग पेन” की कहानी है; पुरानी ऊर्जा से नई, स्वच्छ और आत्मनिर्भर ऊर्जा की ओर एक साहसिक संक्रमण की।