Sunday, May 31, 2026

 गलत नंबर, छूटी ट्रेन और फिसला संतरा: जब कामदेव ने किस्मत की पटकथा लिखी

अनेक रूपों में प्रेम की कृपा

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बृज खंडेलवाल द्वारा

1 जून 2026

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प्रेम रस, प्रेम रोग या प्रेम का बीज आखिर कैसे  अंकुरित होता है?

क्या प्रेम गुलाब का फूल लेकर दरवाजे पर दस्तक देता है? क्या चांदनी रात में कोई मधुर संगीत बजने लगता है? क्या आसमान से फूल बरसते हैं?

फिल्में और धारावाहिक तो यही दिखाते हैं। लेकिन जिंदगी की पटकथा कुछ और ही होती है।

असल जीवन में प्रेम अक्सर बिना सूचना के आता है। कभी गलत नंबर बनकर फोन करता है। कभी भीड़ भरी ट्रेन में बगल की सीट पर बैठ जाता है। कभी किसी मामूली दुर्घटना में छिपा होता है। और कभी किसी ऐसी घटना में, जिसे याद करके इंसान पहले शर्मिंदा होता है और बाद में मुस्कुराता है।

लगता है प्रेम के देवता कामदेव को सीधे रास्ते पसंद ही नहीं हैं।

भारतीय मिथकों में भी प्रेम की राहें बड़ी टेढ़ी रही हैं। राजा दुष्यंत शिकार खेलने निकले थे, विवाह करने नहीं। लेकिन वन के एक आश्रम में शकुंतला से भेंट हुई और इतिहास बदल गया। नल और दमयंती ने पहले एक-दूसरे को देखा तक नहीं था। संदेशवाहक हंसों ने दोनों के बीच प्रेम का पुल बनाया। भगवान शिव की तपस्या भंग करने भेजे गए कामदेव स्वयं भस्म हो गए, लेकिन प्रेम का बीज बो गए।

शायद तभी से प्रेम संयोगों का सबसे बड़ा खिलाड़ी बना हुआ है।

आगरा के अध्यापक डॉ. राज की कहानी सुनिए। एक बरसाती शाम वे अपने एक सहयोगी को फोन मिलाने की कोशिश कर रहे थे। जल्दबाजी में नंबर गलत लग गया। दूसरी तरफ से एक महिला की आवाज आई। “उम्मीद है आप कोई टेलीमार्केटिंग वाले नहीं हैं।” राज हंस पड़े। बातचीत शुरू हुई। दस मिनट एक घंटे में बदल गए। फिर रोज बात होने लगी। फोन के उस पार ऋषिकेश की शिक्षिका अनीता थीं। आवाज पहचान बनी, पहचान अपनापन बनी और अपनापन रिश्ते में बदल गया। एक गलत नंबर ने सही जीवनसाथी दिला दिया।

लखनऊ की नेहा की प्रेम कहानी तो एक फिसलन से शुरू हुई। सुपरमार्केट का फर्श गीला था। पैर फिसला और संतरे पूरे गलियारे में बिखर गए। नेहा शर्म से भर उठीं। तभी एक युवा इंजीनियर अर्जुन उनकी मदद के लिए दौड़े। दोनों संतरे समेटते रहे और साथ-साथ हंसते रहे।

बाद में कॉफी हुई। फिर मुलाकातें। और फिर शादी। आज भी दोनों मजाक में कहते हैं कि उनकी शादी में सबसे बड़ा योगदान संतरे का था।

मथुरा के करण गोविंद की कहानी भारतीय रेलवे की सौजन्य से शुरू हुई। मुंबई जाने वाली ट्रेन में वह इतनी गहरी नींद में सो गए कि अपना स्टेशन ही पार कर गए। पहले तो उन्हें गुस्सा आया, लेकिन अगले कुछ घंटे उन्होंने सहयात्री अदिति के साथ बातचीत में बिताए। किताबों, यात्राओं, सपनों और संघर्षों पर चर्चा होती रही। सुबह तक मोबाइल नंबरों का आदान-प्रदान हो चुका था। दो साल बाद सात फेरे भी हो गए।

बेंगलुरु मेट्रो में रोहित ने एक युवती को अपनी सीट देने की पेशकश की। युवती ने मना कर दिया। रोहित ने फिर आग्रह किया। उसने फिर मना कर दिया। कुछ ही देर में दोनों के बीच यह बहस छिड़ गई कि आखिर सीट पर बैठने का ज्यादा अधिकार किसका है। पूरी बोगी मुस्कुरा रही थी। बहस बातचीत में बदली, बातचीत दोस्ती में और दोस्ती प्रेम में। कुछ वर्षों बाद वही दोनों विवाह के मंडप में थे।

पुणे की मीरा को नहीं मालूम था कि जन्मदिन पर मंगाया गया पिज्जा उनकी जिंदगी बदल देगा। मूसलाधार बारिश में भीगते हुए डिलीवरी बॉय समीर पिज्जा लेकर पहुंचे। दोस्तों ने उन्हें अंदर बुला लिया। चाय पिलाई, बातें हुईं और नंबरों का आदान-प्रदान हो गया। अगले दिन पिज्जा का डिब्बा कूड़े में चला गया, लेकिन रिश्ता बचा रहा।

चेन्नई के दो मेडिकल छात्रों अनन्या और विकी की कहानी और भी अलग है। उनकी पहली मुलाकात किसी पार्क या कैफे में नहीं हुई थी। एनाटॉमी लैब में घंटों साथ पढ़ते-पढ़ते दोनों के बीच दोस्ती हुई। फॉर्मेलिन की गंध, मोटी किताबों और कठिन परीक्षाओं के बीच प्रेम ने चुपचाप अपनी जगह बना ली।

आज दोनों डॉक्टर हैं, पति-पत्नी हैं और दो बच्चों के माता-पिता भी।

गुरुग्राम की पूजा की प्रेम कहानी एक छोटी-सी कार दुर्घटना से शुरू हुई।

पार्किंग करते समय उनकी कार दूसरे वाहन से हल्की-सी टकरा गई। नुकसान कम हुआ लेकिन बातचीत ज्यादा हो गई। बीमा की जानकारी साझा हुई, फिर कॉफी हुई, फिर मुलाकातें शुरू हुईं। कार का डेंट कुछ दिनों में गायब हो गया। रिश्ता नहीं।

और शायद सबसे खूबसूरत कहानी अहमदाबाद के हरीश और सुनीता की है। दोनों साठ वर्ष की आयु पार कर चुके थे। एक सार्वजनिक पुस्तकालय में मरम्मत का काम चल रहा था। हरीश को अपनी नियमित सीट छोड़नी पड़ी। खाली कुर्सी केवल सुनीता जी के पास थी। पहले अखबारों पर चर्चा हुई। फिर किताबों पर। फिर जीवन की स्मृतियों पर।

धीरे-धीरे अकेलापन साथ में बदल गया। दोनों ने विवाह कर लिया। प्रेम ने एक बार फिर साबित कर दिया कि उसे कैलेंडर पढ़ना नहीं आता।

इन सभी कहानियों में एक बात समान है। जिंदगी अपने सबसे बड़े मोड़ों की घोषणा नहीं करती। न कोई बिगुल बजता है, न कोई चेतावनी मिलती है। बस एक साधारण-सा पल आता है और चुपचाप जीवन की दिशा बदल देता है।

एक गलत नंबर। एक छूटी हुई ट्रेन।एक बिखरा हुआ संतरा। एक छोटी-सी टक्कर। या फिर पुस्तकालय की एक खाली कुर्सी।

फिल्में परफेक्ट प्रेम कहानियां गढ़ने पर करोड़ों रुपये खर्च करती हैं। जिंदगी वही काम मुफ्त में कर देती है।

शायद इसलिए हमारे पूर्वजों ने कामदेव को पुष्प-बाणधारी कहा था। उनके बाण दिखाई नहीं देते। कोई आवाज नहीं करते। लेकिन कब किसे लग जाएं, कोई नहीं जानता।

कभी वे दुष्यंत को शकुंतला तक ले जाते हैं। कभी नल और दमयंती के बीच हंसों को संदेशवाहक बना देते हैं। और कभी आगरा के किसी अध्यापक से एक गलत नंबर डायल करा देते हैं।

हजारों वर्षों से प्रेम की लीला यही है।

सिर्फ माध्यम बदल गए हैं।

Saturday, May 30, 2026

 अवैध घुसपैठ: भारत के विकास और सामाजिक संतुलन के सामने बढ़ती चुनौती

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क्या भारत की सीमाएं केवल नक्शे पर खींची गई रेखाएं हैं?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

31 मई 2026

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यदि किसी दिन आपको पता चले कि आपके शहर की आबादी लाखों बढ़ गई है, स्कूलों में सीटें कम पड़ रही हैं, अस्पतालों में कतारें लंबी होती जा रही हैं, मजदूरी घट रही है और सरकारी योजनाओं का बोझ लगातार बढ़ रहा है, तो क्या आप इसे महज संयोग मानेंगे?

यह सवाल केवल सीमा राज्यों का नहीं है। यह सवाल देश के हर करदाता, हर बेरोजगार युवक, हर किसान और हर उस नागरिक का है जो बेहतर जीवन, बेहतर सुविधाओं और सुरक्षित भविष्य का सपना देखता है। अवैध घुसपैठ का मुद्दा वर्षों से राजनीति के अखाड़े में उछलता रहा है, लेकिन इसके सामाजिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय प्रभाव अब धीरे-धीरे पूरे देश में महसूस किए जाने लगे हैं।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं, "भारत आज दुनिया की सबसे तेज़ी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है। लेकिन विकास की इस दौड़ के बीच एक ऐसी समस्या लगातार बढ़ रही है, जिस पर राजनीति तो खूब होती है, पर समाधान कम दिखाई देता है। यह समस्या है अवैध घुसपैठ और अनधिकृत प्रवासन की।

यह विषय केवल सीमा सुरक्षा का प्रश्न नहीं है। इसका संबंध रोजगार, संसाधनों, जनसंख्या संतुलन, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय सुरक्षा से भी है।

अवैध प्रवासियों की वास्तविक संख्या का सटीक अनुमान लगाना कठिन है, क्योंकि वे सरकारी अभिलेखों में दर्ज नहीं होते। फिर भी समय-समय पर विभिन्न सरकारी बयानों में इनकी संख्या लाखों से लेकर करोड़ों तक बताई गई है। अधिकांश अवैध प्रवासी बांग्लादेश से आने वाले लोगों के रूप में चिन्हित किए जाते रहे हैं, जबकि म्यांमार से आए रोहिंग्या शरणार्थियों की भी एक उल्लेखनीय संख्या भारत के विभिन्न राज्यों में निवास कर रही है।"

पूर्वोत्तर भारत के राज्यों, विशेषकर असम, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल, ने दशकों से इस दबाव को महसूस किया है। असम आंदोलन का इतिहास इसी चिंता से जुड़ा रहा। स्थानीय लोगों का आरोप रहा कि लगातार हो रही घुसपैठ ने न केवल जनसंख्या का स्वरूप बदला, बल्कि भूमि, रोजगार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर भी असर डाला।

कल्पना कीजिए कि किसी छोटे शहर की आबादी अचानक कुछ वर्षों में लाखों बढ़ जाए। अस्पतालों में भीड़ बढ़ेगी, स्कूलों पर दबाव पड़ेगा, पानी और बिजली की मांग बढ़ेगी, और सस्ते श्रम की उपलब्धता स्थानीय मजदूरों की आय को प्रभावित कर सकती है। यही स्थिति कई सीमावर्ती क्षेत्रों और महानगरों में देखने को मिलती है।

दिल्ली, मुंबई, जयपुर, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे शहरों में निर्माण कार्यों, घरेलू श्रम, रिक्शा संचालन और असंगठित क्षेत्र में बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर कार्यरत हैं। इनमें अधिकांश वैध भारतीय नागरिक होते हैं, लेकिन सुरक्षा एजेंसियों ने समय-समय पर अवैध विदेशी नागरिकों के नेटवर्क भी उजागर किए हैं। नकली आधार कार्ड, फर्जी राशन कार्ड और जाली पहचान पत्रों का कारोबार इस समस्या को और जटिल बनाता है। समूचा नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद, गुरुग्राम के अर्बन क्लस्टर्स में डोमेस्टिक हेल्प के रूप में हजारों बाहरी तत्व कार्यरत हैं। दक्षिण भारत की चाय और काफी बागानों में बाहर के घुसपैठी काम कर रहे हैं, सस्ती लेबर के रूप में।

समाजशास्त्री टीपी श्रीवास्तव के मुताबिक, "आर्थिक दृष्टि से भी यह चुनौती कम नहीं है। भारत पहले ही अपने करोड़ों नागरिकों को बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और रोजगार उपलब्ध कराने के संघर्ष से जूझ रहा है। ऐसे में यदि बड़ी संख्या में अवैध लोग सार्वजनिक सुविधाओं का उपयोग करें, तो सरकारी संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ना स्वाभाविक है। करदाताओं के पैसे से चलने वाली योजनाओं का लाभ वास्तविक पात्र नागरिकों तक कम पहुंचने का खतरा भी बढ़ जाता है।"

मामला केवल आर्थिक नहीं है। कई क्षेत्रों में जनसांख्यिकीय परिवर्तन सामाजिक तनाव का कारण बने हैं। स्थानीय समुदायों को अपनी सांस्कृतिक पहचान, भाषा और पारंपरिक जीवन शैली पर खतरा महसूस होने लगता है। इतिहास गवाह है कि जब संसाधन सीमित हों और आबादी तेजी से बढ़े, तो सामाजिक टकराव की आशंका भी बढ़ जाती है।

भारत को इस चुनौती का समाधान संतुलित और व्यावहारिक तरीके से खोजना होगा। सीमाओं की बेहतर निगरानी, आधुनिक तकनीक आधारित सर्विलांस, पहचान प्रणालियों को मजबूत बनाना और पड़ोसी देशों के साथ प्रभावी प्रत्यर्पण एवं सत्यापन व्यवस्था विकसित करना आवश्यक है। साथ ही यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि मानवीय आधार पर संरक्षण पाने वाले लोगों के अधिकारों का सम्मान हो।

अवैध घुसपैठ किसी एक राज्य या राजनीतिक दल का मुद्दा नहीं है। यह राष्ट्रीय संसाधनों, सामाजिक स्थिरता और भविष्य की विकास योजनाओं से जुड़ा प्रश्न है। यदि इसे समय रहते गंभीरता से नहीं लिया गया, तो इसका बोझ आने वाली पीढ़ियों को उठाना पड़ सकता है।

एक विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा, जब उसकी सीमाएं सुरक्षित हों, नागरिकों के अधिकार संरक्षित हों और प्रवासन की व्यवस्था कानून तथा मानवीय मूल्यों दोनों के अनुरूप संचालित हो। संवेदनशीलता आवश्यक है, लेकिन संप्रभुता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।



Friday, May 29, 2026

 रात का खाना जानलेवा बन गया: वैवाहिक जीवन में पाक-विवादों का बढ़ता खतरा

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जब रसोई बनी रणभूमि: नमक, चिकन करी और मौत की थाली

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रात का खाना क्या बनेगा?

यह सवाल हर घर में पूछा जाता है। कभी मुस्कुराहट के साथ, कभी शिकायत के साथ। 

लेकिन जब यही सवाल मौत का कारण बन जाए, तब समाज को आईना देखने की जरूरत है।

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

31 मई 2026

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भारत समेत दुनिया भर के घरों में रसोई, जो कभी देखभाल और प्यार की जगह मानी जाती थी, अब झगड़ों का अखाड़ा बनती जा रही है। छोटी-मोटी बातों पर खाने को लेकर विवाद इतने उग्र रूप ले रहे हैं कि हत्या तक हो जा रही है। यह वैवाहिक संबंधों की गहरी दरारों को उजागर करता है।

तेलंगाना के कामारेड्डी में 28 वर्षीय कबाड़ विक्रेता कोडंडम शिवाजी ने अपनी पत्नी लक्ष्मी से रात के खाने में चिकन करी न बनाने पर झगड़ा किया। रिश्तेदारों ने शांत कराया, लेकिन थोड़ी देर बाद विवाद फिर भड़क उठा। पत्नी ने दरांती से हमला कर उसकी गर्दन पर वार किया। अत्यधिक खून बहने से वह मौके पर ही मर गया।

इसी तरह वडोदरा, गुजरात में मजदूर अमित देवीपूजक ने पत्नी मंजू द्वारा बनाए गए दोपहर के खाने को खाने से इनकार कर दिया। झगड़ा बढ़ा तो पत्नी ने चाकू से उसके सीने और सिर पर वार कर दी। अमित की मौत हो गई और मंजू को हत्या का मामला दर्ज कर गिरफ्तार किया गया।

ये घटनाएं अकेली नहीं हैं। ठाणे, महाराष्ट्र में एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी को “साबुदाना खिचड़ी में नमक ज्यादा” होने पर गला घोंटकर मार डाला। मुंबई में बिरयानी में नमक ज्यादा होने पर पत्नी की हत्या कर दी गई। उत्तर प्रदेश में गर्भवती पत्नी के साथ खाने को लेकर झगड़े में मौत हो गई। तेलंगाना में मटन करी न बनाने पर पत्नी की पिटाई कर हत्या का मामला भी सामने आया है। विदेशों में भी बुजुर्ग दंपति पैनकेक पर झगड़कर एक-दूसरे को मार डालने और ब्रिटेन में जन्मदिन के भोजन पर पत्नी द्वारा पति की हत्या जैसे मामले दर्ज हैं।

नमक-मिर्च, नॉन-वेज खाने की मांग, समय पर न बनाना या खाने से इनकार। ये विवाद रात के खाने या दोपहर के समय भूख और थकान में सबसे ज्यादा भड़कते हैं। हथियार आमतौर पर रसोई के चाकू या दरांती होते हैं। आर्थिक तनाव, शराब, बार-बार के झगड़े और खाना पकाने की जिम्मेदारी को लेकर लिंग-भेद की अपेक्षाएं इन छोटी घटनाओं को खूनी बना देती हैं।

ये “पाक-विवाद” बड़े सामाजिक विफलताओं : संघर्ष सुलझाने की कमी, मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा और वैवाहिक भूमिकाओं के दबाव , के लक्षण हैं। जब डिनर टेबल अपराध स्थल बन जाए तो समझ लीजिए कि घर में कुछ गलत पक रहा है। जागरूकता, काउंसलिंग और घरेलू जिम्मेदारियों को बांटने की जरूरत है।


हैदराबाद के पास कामारेड्डी में एक युवक ने पत्नी से पूछा कि चिकन करी क्यों नहीं बनी। बात बढ़ी। आवाजें ऊंची हुईं। रिश्तेदार आए, समझा-बुझाकर चले गए। लेकिन भीतर सुलग रही आग शांत नहीं हुई। कुछ देर बाद पत्नी ने घर में रखा हंसिया उठाया और पति पर वार कर दिया। युवक की मौके पर ही मौत हो गई।

उधर गुजरात के वडोदरा में एक आदमी ने पत्नी के बनाए खाने को खाने से इनकार कर दिया। बहस शुरू हुई। आरोप है कि पति ने पहले पत्नी को मारा। जवाब में पत्नी ने धारदार हथियार उठा लिया। कुछ मिनटों में एक और परिवार बिखर गया। दो बच्चे अनाथ जैसे हालात में पहुंच गए।

पहली नजर में ये घटनाएं हास्यास्पद लग सकती हैं। "चिकन करी के लिए हत्या?" "दोपहर के खाने पर मौत?" लेकिन पुलिस फाइलें और मनोवैज्ञानिक कुछ और कहानी बताते हैं।

असल में मौत चिकन करी से नहीं हुई। मौत उस तनाव से हुई जो वर्षों से जमा हो रहा था।

नमक ज्यादा था, जिंदगी कम पड़ गई

महाराष्ट्र के भायंदर में एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी की हत्या इसलिए कर दी क्योंकि साबूदाना खिचड़ी में नमक ज्यादा था। उनका बेटा यह सब देख रहा था।

मुंबई में एक अन्य मामले में बिरयानी में नमक ज्यादा होने की शिकायत ने पति-पत्नी के झगड़े को हत्या तक पहुंचा दिया।

उत्तर प्रदेश में एक गर्भवती महिला की जान चली गई। कारण वही पुराना था, खाने में नमक को लेकर विवाद।

सोचिए, एक चुटकी नमक। जिसकी कमी या अधिकता भोजन का स्वाद बदलती है। वही चुटकी कभी-कभी पूरे परिवार का भविष्य भी बदल देती है।

यह केवल भारत की कहानी नहीं है।

अमेरिका के विस्कॉन्सिन में एक युवती अपने प्रेमी के साथ बाहर जाना चाहती थी। प्रेमी ने कहा कि वह घर पर एयर फ्रायर में चिकन ड्रमस्टिक बना लेगा। मामूली लगने वाली बहस हिंसा में बदल गई और युवक की जान चली गई।

ब्रिटेन में एक महिला ने जन्मदिन के भोजन को लेकर हुए विवाद में अपने पति की हत्या कर दी।

वॉशिंगटन डीसी में एक बुजुर्ग दंपती के बीच पैनकेक को लेकर शुरू हुआ विवाद हत्या पर समाप्त हुआ।

महाद्वीप बदल जाते हैं। भाषा बदल जाती है। लेकिन कहानी लगभग वही रहती है।

रसोई में पकता भोजन कभी-कभी रिश्तों की कड़वाहट भी उबाल देता है।असल कारण खाना नहीं, कुछ और होता है

सवाल यह है कि क्या कोई सचमुच केवल नमक या चिकन के लिए हत्या कर सकता है? विशेषज्ञों का जवाब है: आमतौर पर नहीं। खाना सिर्फ ट्रिगर होता है। असली विस्फोटक सामग्री पहले से जमा रहती है।

आर्थिक तनाव। बेरोजगारी। शराब की लत। ससुराल के झगड़े। शक और अविश्वास। घरेलू हिंसा का पुराना इतिहास। अधूरी अपेक्षाएं। दबी हुई नाराजगी।

जब ये सब एक साथ जमा हो जाते हैं तो फिर एक वाक्य काफी होता है।

"आज चिकन क्यों नहीं बनाया?"

"इतना नमक किसने डाला?"

"मैं यह खाना नहीं खाऊंगा।"

और फिर शब्द हथियार बन जाते हैं। उसके बाद अक्सर असली हथियार भी निकल आते हैं।

भारतीय समाज में खाना केवल खाना नहीं है। यह प्रेम का प्रतीक है। कर्तव्य का प्रतीक है। सम्मान का प्रतीक है।विशेषकर महिलाओं के लिए रसोई को आज भी उनके मूल्यांकन का पैमाना माना जाता है।

खाना अच्छा बना तो तारीफ कम मिलती है। खराब बना तो आलोचना तुरंत मिल जाती है।

कई घरों में पत्नी की मेहनत को स्वाभाविक मान लिया जाता है। वहीं दूसरी ओर पुरुषों पर कमाने और परिवार चलाने का दबाव रहता है। दोनों पक्ष तनाव में रहते हैं।

नतीजा? रात का भोजन कभी-कभी तनाव का अखाड़ा बन जाता है।

थाली में परोसी दाल केवल दाल नहीं रहती। उसमें आर्थिक संघर्ष, सामाजिक अपेक्षाएं और वैवाहिक तनाव भी परोस दिए जाते हैं।

भूख और गुस्से का खतरनाक रिश्ता

मनोविज्ञान में एक दिलचस्प शब्द है "हैंग्री"। यानी भूख और गुस्से का मिश्रण।

शोध बताते हैं कि भूखे व्यक्ति में चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है। निर्णय लेने की क्षमता कमजोर पड़ती है। छोटी बात बड़ी लगने लगती है।

भारत में अधिकांश ऐसे झगड़े शाम या रात के भोजन के समय होते हैं।

दिन भर की थकान। पैसों की चिंता।काम का दबाव। और फिर भूख। इन सबका मिश्रण कई बार विस्फोटक साबित होता है।

रसोई के बर्तन नहीं, रिश्ते तेज हो रहे हैं । इन घटनाओं में एक और समानता दिखाई देती है। हथियार अक्सर घर में ही मौजूद होते हैं। चाकू। हंसिया।कैंची। बेलन। यानी हत्या की तैयारी नहीं होती। गुस्से का क्षण होता है।

एक क्षण जो पूरी जिंदगी बदल देता है। पांच मिनट का क्रोध कई बार पचास वर्षों की सजा बन जाता है।

एक समय था जब भारतीय परिवार साथ बैठकर भोजन करते थे और बातचीत भी करते थे। आज कई घरों में बातचीत खत्म हो रही है, केवल शिकायतें बची हैं।

चिकन करी, बिरयानी, खिचड़ी या पैनकेक किसी की जान नहीं लेते।

लेकिन अनियंत्रित क्रोध, लगातार अपमान, घरेलू हिंसा और संवाद की कमी जरूर जान ले सकती है।

रसोई में आग का काम भोजन पकाना है। जब वही आग रिश्तों को जलाने लगे, तब समाज को चेत जाना चाहिए। क्योंकि मौत कभी नमक से नहीं होती। मौत उस कड़वाहट से होती है जो वर्षों से रिश्तों में घुलती रहती है।


 ये रस्साकशी कब तक?

तीन भाषा फार्मूला: स्कूल की घंटी से क्यों कांप उठता है भारत?

अब सुप्रीम कोर्ट को करना है फैसला।

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

30 मई 2026

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भारत में भाषा केवल बोली नहीं जाती। भाषा यहां छाती ठोककर चलती है। झंडा बन जाती है। राजनीति बन जाती है। और कभी-कभी बारूद भी।

एक मामूली सा स्कूल सर्कुलर फिर तूफान ले आया है।

सीबीएसई ने कहा है कि जुलाई 2026 से कक्षा 9 के बच्चों को तीन भाषाएं पढ़नी होंगी। दो भारतीय भाषाएं जरूरी होंगी। सुनने में बात सीधी लगती है। लेकिन भारत में भाषा का मामला कभी सीधा नहीं होता। यहां तो खीर में भी राजनीति ढूंढ ली जाती है।

बस फिर क्या था। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। अभिभावक परेशान। बच्चे हक्के-बक्के। शिक्षक माथा पकड़कर बैठे हैं। लोग पूछ रहे हैं : गांव के स्कूल में गणित का मास्टर नहीं मिलता, अब तमिल और कन्नड़ कौन पढ़ाएगा? बच्चे बोर्ड परीक्षा की तैयारी करें या भाषा प्रयोगशाला खोलें?

भारत में भाषा की आग नई नहीं है। यह चिंगारी आजादी के साथ ही पैदा हो गई थी। संविधान सभा में सवाल उठा :  देश आखिर बोलेगा क्या?

हिंदी समर्थक चाहते थे कि अंग्रेजी का बोरिया-बिस्तर बांध दिया जाए। दक्षिण भारत डर गया। उन्हें लगा दिल्ली धीरे-धीरे हिंदी का बुलडोजर चला देगी।

आखिर समझौता हुआ। हिंदी राजभाषा बनी। अंग्रेजी को 15 साल की मोहलत मिली। लेकिन, भारत में असली लड़ाई मोहलत खत्म होने पर ही शुरू होती है।

1965 आया।

तमिलनाडु सुलग उठा। छात्र सड़क पर उतर आए। रेल रोकी गईं। नारे गूंजे।आग लगी। लाठियां चलीं। लाशें गिरीं।

दक्षिण भारत को लगा कि हिंदी अब सिर पर बैठाई जा रही है। आंदोलन ऐसा उठा कि कांग्रेस तमिलनाडु में बह गई। द्रविड़ राजनीति का सूरज वहीं से निकला। दिल्ली को पीछे हटना पड़ा। अंग्रेजी बच गई। हिंदी रुक गई। लेकिन शक का कांटा दिल में धंसा रह गया।

इधर, उत्तर भारत की यूनिवर्सिटीज में सोशलिस्टों ने अंग्रेजी हटाओ आंदोलन को आगे बढ़ाया, स्ट्राइक, प्रदर्शन, बोर्ड पुताई, उपद्रव!

इसी तूफान से निकला “तीन भाषा फार्मूला”।

सोच बड़ी सुंदर थी। एक भारत, श्रेष्ठ भारत। हर बच्चा तीन भाषाएं सीखे।मातृभाषा भी। हिंदी भी। अंग्रेजी भी।

सपना ऐसा कि काशी वाला बच्चा तमिल कविता समझे और चेन्नई वाला बच्चा कबीर पढ़े। भाषा दिलों को जोड़े। देश को गोंद की तरह चिपका दे।

लेकिन भारत में नीति और जमीन का रिश्ता अक्सर सास-बहू जैसा रहता है।

कागज पर फार्मूला चमकता रहा।जमीन पर लड़खड़ाता रहा।

तमिलनाडु ने साफ कह दिया :  हमें नहीं चाहिए तीन भाषा फार्मूला। वहां आज भी तमिल और अंग्रेजी की दो भाषा नीति चलती है। दूसरी तरफ हिंदी पट्टी के कई राज्यों ने भी चालाकी दिखाई। दक्षिण भारतीय भाषाएं पढ़ाने की जगह संस्कृत डाल दी। सांप भी मर गया, लाठी भी नहीं टूटी।

यही बात दक्षिण भारत को चुभती है।

एक तमिल बच्चा हिंदी सीखे।

लेकिन उत्तर भारत का बच्चा तमिल क्यों नहीं सीखता?

यही सवाल आज भी राजनीति की हांडी में उबलता रहता है।

भाषा का मामला यहां सीधा कभी नहीं रहा। इसके पीछे सत्ता छिपी रहती है। नौकरी छिपी रहती है।पहचान छिपी रहती है।

नई शिक्षा नीति कहती है कि बहुभाषी बच्चे ज्यादा रचनात्मक होते हैं। कई भाषाएं सीखने से सोचने की क्षमता बढ़ती है। बात गलत भी नहीं है। यूरोप में लोग तीन-चार भाषाएं आराम से बोल लेते हैं।

लेकिन भारत यूरोप नहीं है। यहां गांव के स्कूल में ब्लैकबोर्ड टूटा पड़ा है। कहीं पंखा नहीं। कहीं शिक्षक नहीं।कहीं बच्चे फर्श पर बैठते हैं।

ऐसे में लोग पूछते हैं :  पहले स्कूल तो संभाल लो, फिर भाषाई महल बनाना।

और सबसे बड़ा व्यंग्य देखिए।

नेता मंच से भारतीय भाषाओं का गुणगान करते हैं। लेकिन अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूल में भेजते हैं। घर में हिंदी। भाषण में संस्कृत। और करियर के लिए अंग्रेजी।

यानी मुंह में राम, बगल में अंग्रेजी कॉन्वेंट।

सच्चाई यह है कि भारत में अंग्रेजी आज भी नौकरी का पासपोर्ट है। आईटी कंपनी से लेकर अदालत तक, मेडिकल कॉलेज से लेकर कॉरपोरेट दफ्तर तक, अंग्रेजी का सिक्का चलता है। गरीब आदमी भी जानता है कि टूटी-फूटी अंग्रेजी कई बार अच्छी हिंदी से ज्यादा कमाई करा देती है।

यहीं भाषा राजनीति का असली दर्द छिपा है।

दक्षिण भारत को डर है कि भाषा के नाम पर धीरे-धीरे केंद्रीकरण बढ़ेगा। उत्तर भारत को लगता है कि हिंदी राष्ट्रीय पहचान की डोर है। अंग्रेजी चुपचाप दोनों के सिर पर बैठी मुस्कुरा रही है।

भारत का नक्शा भी भाषा ने बदला है। आंध्र प्रदेश भाषा आंदोलन से बना। महाराष्ट्र और गुजरात भाषाई मांगों से निकले।

भाषा ने सरकारें गिराईं। नेता पैदा किए। और कई बार देश को बांटने की धमकी भी दी।

इसलिए भारत में भाषा केवल विषय नहीं है। यह भावनाओं का ज्वालामुखी है।

अब सुप्रीम कोर्ट फैसला करेगा।

लेकिन अदालत कानून समझा सकती है, दिल नहीं बदल सकती।

तीन भाषा फार्मूला आज भी रस्सी पर चलने जैसा है।

हर सरकार संतुलन बनाती है। हर राज्य शक की नजर से देखता है। हर अभिभावक डरता है कि कहीं प्रयोग का बोझ उसके बच्चे पर न टूट पड़े।

भारत की भाषाएं उसकी सबसे बड़ी ताकत हैं। लेकिन यही उसकी सबसे बड़ी सिरदर्दी भी हैं।

यहां भाषा केवल पढ़ाई नहीं जाती।उसकी पहरेदारी होती है। उसके सहारे राजनीति होती है। 1956 में भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन करना सबसे बड़ी गलती थी। 

Thursday, May 28, 2026

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यमुना पुनर्जीवन हेतु आगरा-विशिष्ट माँगों के संबंध में

प्रेषक:

ब्रज खंडेलवाल एवं सदस्यगण

रिवर कनेक्ट अभियान (यमुना आरती सभा), आगरा

एतमाद्दौला व्यू प्वाइंट पार्क, यमुना किनारा रोड, आगरा

प्रति:

माननीय प्रधानमंत्री, भारत सरकार

श्री नरेंद्र मोदी जी

साउथ ब्लॉक, नई दिल्ली

तथा

माननीय मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश सरकार

श्री योगी आदित्यनाथ जी

लखनऊ, उत्तर प्रदेश

विषय: 27 मई 2026 को माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यमुना पुनर्जीवन के संबंध में दिए गए निर्देशों के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु आगरा-विशिष्ट माँगों के संबंध में ज्ञापन।

दिनांक: 28 मई 2026

मान्यवर,

27 मई 2026 को माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यमुना नदी की दयनीय स्थिति पर स्वतः संज्ञान लेते हुए केंद्रीय गृह सचिव की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति गठित की गई है, जिसे आठ सप्ताह के भीतर व्यापक “यमुना एक्शन प्लान” प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है। यह निर्णय करोड़ों लोगों की भावनाओं, पर्यावरणीय चिंताओं तथा सांस्कृतिक विरासत की रक्षा की दिशा में एक ऐतिहासिक और स्वागतयोग्य कदम है।

हम, रिवर कनेक्ट अभियान (यमुना आरती सभा), आगरा के सदस्य एवं समर्थक, आपके समक्ष यह ज्ञापन प्रस्तुत कर यमुना नदी की आगरा क्षेत्र में अत्यंत गंभीर स्थिति की ओर ध्यान आकृष्ट करना चाहते हैं तथा कुछ अत्यावश्यक और व्यावहारिक माँगें रखना चाहते हैं, जिनका तत्काल समाधान यमुना पुनर्जीवन के लिए अनिवार्य है।

यमुना, जो कभी ब्रज संस्कृति, आस्था, कृषि और जीवन का आधार थी, आज आगरा में एक मौसमी नाले में बदल चुकी है। वर्ष के अधिकांश समय नदी का पाट सूखा पड़ा रहता है। बहाव के स्थान पर केवल सीवर का काला पानी दिखाई देता है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा व्यक्त यह पीड़ा कि “यमुना अब एक सीवेज नाले से अधिक कुछ नहीं रह गई”, आगरा की जनता प्रतिदिन अपनी आँखों से देख रही है।

ताजमहल की संरचनात्मक स्थिरता भी यमुना के जलस्तर और आर्द्रता पर निर्भर मानी जाती है। यदि नदी सूखती रही तो यह केवल पर्यावरणीय संकट नहीं रहेगा, बल्कि विश्व धरोहर और भारत की सांस्कृतिक पहचान पर भी खतरा बन जाएगा। अतः यह समय केवल घोषणाओं का नहीं, बल्कि निर्णायक और समयबद्ध कार्रवाई का है।

रिवर कनेक्ट अभियान की प्रमुख आगरा-विशिष्ट माँगें

1. ताजमहल के डाउनस्ट्रीम क्षेत्र में बैराज /  डैम का तत्काल निर्माण

पिछले लगभग 25-30 वर्षों से ताजमहल के डाउनस्ट्रीम क्षेत्र में बैराज अथवा रबर चेक डैम निर्माण का प्रस्ताव सरकारी फाइलों में लंबित पड़ा है। अनेक बार माँग उठने के बावजूद यह परियोजना नौकरशाही उदासीनता का शिकार रही है।

यह संरचना अत्यंत आवश्यक है ताकि ताजमहल के आसपास तथा उसके आगे लगभग 20-25 किलोमीटर क्षेत्र में न्यूनतम जलस्तर बना रहे और नदी में बारहमासी प्रवाह सुनिश्चित हो सके। वर्तमान में नदी का सूखा पाट अतिक्रमण, कचरा फेंकने, गाद जमाव तथा प्रदूषण का स्थायी केंद्र बन गया है।

हम माँग करते हैं कि:

- इस परियोजना को “राष्ट्रीय महत्व” की परियोजना घोषित किया जाए।

- राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन एवं जल शक्ति मंत्रालय के माध्यम से विशेष निधि आवंटित की जाए।

- निर्माण हेतु स्पष्ट समयसीमा तय की जाए।

- तकनीकी एवं पर्यावरणीय स्वीकृतियों की प्रक्रिया में अनावश्यक विलंब समाप्त किया जाए।

अब और देरी यमुना तथा ताजमहल दोनों के लिए विनाशकारी सिद्ध होगी।

2. न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह (E-Flow) एवं पर्याप्त स्वच्छ जल छोड़े जाने की व्यवस्था

आगरा तक पहुँचते-पहुँचते यमुना में स्वच्छ जल लगभग समाप्त हो जाता है। गैर-मानसूनी महीनों में नदी में जो प्रवाह दिखाई देता है, उसका अधिकांश भाग सीवर, नालों और औद्योगिक अपशिष्टों का होता है।

हम माँग करते हैं कि:

- हरियाणा एवं उत्तराखंड के बैराजों से वर्षभर न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह कानूनी रूप से सुनिश्चित किया जाए।

- Upper Yamuna River Board के माध्यम से रियल-टाइम टेलीमेट्री आधारित निगरानी प्रणाली लागू हो।

- जल बँटवारे के नियमों को सख्ती से लागू किया जाए।

- गर्मियों एवं सूखे मौसम में अतिरिक्त स्वच्छ जल छोड़ा जाए।

पर्याप्त जल प्रवाह के बिना यमुना का पुनर्जीवन असंभव है। जल ही नदी का प्राण है।

3. आगरा के शहरी क्षेत्र में वैज्ञानिक डी-सिल्टिंग एवं ड्रेजिंग

आगरा में यमुना का तल भारी मात्रा में गाद, प्लास्टिक, निर्माण मलबे और विषैले अवशेषों से भर चुका है। इससे नदी की जलधारण क्षमता और भूजल पुनर्भरण की प्रक्रिया गंभीर रूप से प्रभावित हुई है।

हम माँग करते हैं कि:

- आगरा के लगभग 20-25 किलोमीटर शहरी हिस्से में चरणबद्ध वैज्ञानिक डी-सिल्टिंग एवं ड्रेजिंग कराई जाए।

- इस कार्य में IITs, पर्यावरण विशेषज्ञों, पुरातत्व विभाग एवं जल वैज्ञानिकों की निगरानी सुनिश्चित हो।

- पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) के आधार पर सुरक्षित तकनीक अपनाई जाए।

- निकाली गई गाद एवं अपशिष्ट के वैज्ञानिक निस्तारण की व्यवस्था हो।

यदि यह कार्य सावधानीपूर्वक किया जाए, तो इससे नदी की गहराई, प्रवाह क्षमता और भूजल पुनर्भरण में उल्लेखनीय सुधार होगा।

4. यमुना के बाढ़क्षेत्रों एवं नदी तल से अतिक्रमण हटाया जाए

नदी के प्राकृतिक बाढ़क्षेत्रों पर अवैध कब्जों, कंक्रीटीकरण और निर्माण कार्यों ने यमुना की प्राकृतिक जीवन प्रणाली को बाधित कर दिया है।

हम माँग करते हैं कि:

- सभी अवैध अतिक्रमणों के विरुद्ध विशेष अभियान चलाया जाए।

- बाढ़क्षेत्रों को पुनर्स्थापित किया जाए।

- नदी किनारों के अनियंत्रित कंक्रीटीकरण पर पूर्ण प्रतिबंध लगे।

- जैव-विविधता संरक्षण हेतु प्राकृतिक हरित पट्टियाँ विकसित की जाएँ।

नदी केवल जलधारा नहीं होती; उसका बाढ़क्षेत्र भी उसके शरीर का हिस्सा होता है।

5. प्रदूषण नियंत्रण एवं आधारभूत ढाँचे को सुदृढ़ किया जाए

यमुना में गिरने वाले अधिकांश नाले आज भी अपर्याप्त शोधन व्यवस्था के कारण प्रदूषण फैला रहे हैं।

हमारी माँगें हैं:

- आगरा के सभी नालों का 100 प्रतिशत सीवेज शोधन सुनिश्चित किया जाए।

- STP एवं CETP की क्षमता बढ़ाई जाए तथा उनकी नियमित मॉनिटरिंग हो।

- औद्योगिक प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों पर कठोर दंडात्मक कार्रवाई हो।

- यमुना घाटों का सौंदर्यीकरण पर्यावरणीय संवेदनशीलता के साथ किया जाए।

- नदी संरक्षण कानूनों के पालन हेतु विशेष “रिवर पुलिस स्क्वॉड” गठित किया जाए।

6. जनभागीदारी एवं पारदर्शी निगरानी व्यवस्था

किसी भी नदी पुनर्जीवन अभियान की सफलता स्थानीय समाज की भागीदारी पर निर्भर करती है।

अतः हम माँग करते हैं कि:

- रिवर कनेक्ट अभियान सहित स्थानीय सामाजिक संगठनों, पर्यावरणविदों एवं नागरिक समूहों को योजना निर्माण एवं निगरानी में शामिल किया जाए।

- जल गुणवत्ता, प्रवाह, प्रदूषण स्तर और परियोजनाओं की प्रगति हेतु सार्वजनिक डिजिटल डैशबोर्ड बनाया जाए।

- प्रत्येक तीन माह में प्रगति रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।

- स्कूलों, कॉलेजों और सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से “यमुना जन-जागरण अभियान” चलाया जाए।

माननीय प्रधानमंत्री जी एवं मुख्यमंत्री जी,

आगरा की जनता दशकों से यमुना के पुनर्जीवन की प्रतीक्षा कर रही है। सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप एक ऐतिहासिक अवसर लेकर आया है। यदि अब भी निर्णायक कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें कभी क्षमा नहीं करेंगी।

अतः हम आपसे विनम्र निवेदन करते हैं कि:

1. उपर्युक्त आगरा-विशिष्ट माँगों को यमुना एक्शन प्लान में तत्काल शामिल किया जाए।

2. आगरा हेतु विशेष टास्क फोर्स एवं पृथक बजट आवंटित किया जाए।

3. सभी परियोजनाओं के लिए समयबद्ध कार्ययोजना बनाई जाए।

4. डाउनस्ट्रीम बैराज परियोजना पर लंबित नौकरशाही बाधाओं को समाप्त करने हेतु व्यक्तिगत हस्तक्षेप किया जाए।

यमुना का पुनर्जीवन केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं है। यह भारत की सभ्यता, संस्कृति, आस्था, इतिहास और भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। ब्रजभूमि की आत्मा यमुना से ही जीवित है।

हम पूर्ण सहयोग का आश्वासन देते हुए आपसे आग्रह करते हैं कि शीघ्र, ठोस और प्रभावी कदम उठाए जाएँ ताकि आने वाली पीढ़ियाँ पुनः एक स्वच्छ, निर्मल और अविरल यमुना का दर्शन कर सकें।


सादर,


रिवर कनेक्ट अभियान (यमुना आरती सभा)

एतमाद्दौला व्यू प्वाइंट पार्क

यमुना किनारा रोड, आगरा

मोबाइल: ___7895852750

ईमेल: agrabrij@gmail.com 

प्रतिलिपि:

- माननीय केंद्रीय जल शक्ति मंत्री, भारत सरकार

- मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश सरकार

- सदस्य सचिव, राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन

- अध्यक्ष, अपर यमुना नदी बोर्ड

- जिलाधिकारी, आगरा

- नगर आयुक्त, आगरा नगर निगम

Wednesday, May 27, 2026

 नई कुली अर्थव्यवस्था: 

क्या भारत के स्टार्टअप आधुनिक गुलामी गढ़ रहे हैं?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

29 मई 2026

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28 वर्षीय युवक, उदय नाथ पीठ पर भारी बैग लटकाए ट्रैफिक चीरता भाग रहा है।

बिहार से आया रमेश चौधरी चार मंज़िल सीढ़ियाँ चढ़कर राशन का सामान पहुँचा रहा है।

उधर हलवाई की दुकान के बाहर बाबू लाल मोबाइल स्क्रीन पर टकटकी लगाए अगले ऑर्डर का इंतज़ार कर रहा है।

मोतियाबिंदी अर्थ शास्त्री इसे “स्टार्टअप क्रांति” कहते हैं। लेकिन क्या यह सचमुच क्रांति है? या फिर पुरानी सामंती व्यवस्था का नया डिजिटल संस्करण?

चेहरे बदल गए हैं। लठैत जमींदार की जगह अब हूडी पहनने वाले फाउंडर हैं। कुली अब सूटकेस नहीं, फूड पैकेट और किराने के बैग ढो रहा है।

ढांचा मगर वही है। भारत के महानगरों में लाखों प्रवासी युवक आज क्विक कॉमर्स, डिलीवरी ऐप्स, लॉजिस्टिक्स और प्लेटफॉर्म कंपनियों की रीढ़ बने हुए हैं। निवेशक अरबों डॉलर की वैल्यूएशन पर ताली बजाते हैं। स्टार्टअप फाउंडर नए भारत के “आइकॉन” कहलाते हैं। विज्ञापन इन्हें “डिलीवरी हीरो” और “पार्टनर” बताते हैं। लेकिन चमकदार शब्दों के पीछे एक कड़वी सच्चाई छिपी है। ये नव युग के कुली मेहनत करते हैं, कौशल प्रदर्शन नहीं।

दो सौ वर्षों से कुली गिरी चल रही है, पहले अंग्रेजों की, अब अमेरिकन्स की। या तो गोरे आदमी का मैन फ्राइडे, या बाबुओं का सामान ढोता कुली! बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश या राजस्थान से आया युवक दस-दस घंटे बाइक चलाता है। बारिश, धूप, प्रदूषण, दुर्घटना: सब झेलता है। पाँच साल बाद उसके पास क्या बचता है? बस टूटता शरीर और अनिश्चित भविष्य। यह रोजगार अवसर कम, श्रम दोहन अधिक है।

मैन्युफैक्चरिंग और इंजीनियरिंग सेक्टर्स तो कुछ ज्यादा आगे नहीं बढ़ सके, लेकिन हौले हौले हमारी अर्थव्यवस्था “सुविधा सेवा” आधारित समाज बनती जा रही है। एक ऐसा समाज जहाँ मध्यम वर्ग अपनी सुविधा के लिए अलादीन का बटन दबाता है और कोई अदृश्य भूत, यानी श्रमिक दस मिनट में सामान लेकर दरवाज़े पर हाज़िर हो जाता है।

आराम अब नया धर्म बन चुका है।

देश कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल इंडिया और नवाचार की बातें करता है, मगर करोड़ों युवा आज भी बेहद प्राथमिक श्रम चक्र में फँसे हुए हैं। शहरों की सुविधा का बोझ इन्हीं कुलियों के कंधों पर लदा है, कहते हैं पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी।

समाज शास्त्री टीपी श्रीवास्तव के मुताबिक, "हमारी भाषा भी अब सच्चाई छिपाने लगी है। कुली अब “गिग पार्टनर” बन गया है। नौकरी “फ्लेक्सिबिलिटी” कहलाने लगी। शोषण “ऑपर्च्युनिटी” बन गया। स्टार्टअप संस्कृति कई बार नई रंगाई-पुताई वाला पुराना हवेली तंत्र लगती है।"

यह समस्या केवल डिलीवरी ऐप्स तक सीमित नहीं है। भारत पहले भी ऐसा दौर देख चुका है।

बीपीओ और आईटी सर्विस सेक्टर के उभार के समय लाखों युवा कॉल सेंटर और आउटसोर्सिंग नौकरियों में चुक गए। शुरुआती वर्षों में यह आर्थिक चमत्कार जैसा लगा। वेतन बढ़े। अंग्रेज़ी बोलने वाली पीढ़ी तैयार हुई। परिवार खुश हुए। लेकिन दो दशक बाद तस्वीर उतनी चमकदार नहीं दिखती।

बहुत बड़ी संख्या में युवाओं ने सीमित और दोहराव वाले कौशल सीखे। वे वैश्विक सेवा उद्योग के “रिप्लेसेबल पार्ट” बनकर रह गए। देश ने डिग्रीधारी युवाओं की फौज तो पैदा कर ली, मगर नवाचार, अनुसंधान और विनिर्माण क्षमता उतनी विकसित नहीं हुई।

आज की गिग अर्थव्यवस्था उसी गलती को और बड़े पैमाने पर दोहरा रही है। एक डिलीवरी बॉय रोज़ी तो कमा सकता है, मगर क्या यही किसी युवा राष्ट्र का सपना होना चाहिए? रोजगार अगर व्यक्ति को ऊपर उठाने की बजाय वहीं जकड़ दे, तो वह विकास नहीं, संगठित ठहराव है।सबसे खतरनाक असर मानसिक है।

शहरी भारत आज प्रवासी श्रमिकों पर पूरी तरह निर्भर है। गरम खाना इसलिए पहुँचता है क्योंकि कोई बारिश में भीग रहा है। रातोंरात पार्सल इसलिए आता है क्योंकि किसी ने नींद छोड़ी है। दस मिनट में किराना इसलिए मिलता है क्योंकि किसी ने अपनी सेहत दाँव पर लगाई है।

लेकिन कोई यह नहीं पूछता;

चालीस साल की उम्र में उस डिलीवरी राइडर का क्या होगा? उसकी टूटी कमर का इलाज कौन करेगा?एल्गोरिद्म उसे बेकार कर देंगे तो नया कौशल कौन देगा?

किसी सभ्यता की असली पहचान उसके अरबपतियों से नहीं, उसके श्रमिकों की गरिमा से होती है।

मज़दूरी सीढ़ी बननी चाहिए, दलदल नहीं। देश तब आगे बढ़ते हैं जब श्रमिक मांसपेशियों से कौशल की ओर बढ़ते हैं। 

यह आधुनिकता नहीं। यह डिजिटल सामंतवाद है। स्टार्टअप कहानी केवल यूनिकॉर्न पैदा करने की नहीं होनी चाहिए। उसे कुशल नागरिक भी पैदा करने चाहिए। क्योंकि जो अर्थव्यवस्था दस मिनट में बर्गर पहुँचा सकती है, लेकिन दस साल में श्रमिक को गरिमा नहीं दे सकती, वह वास्तव में प्रगति नहीं कर रही। वह बस गोल-गोल दौड़ रही है,  लाइक एलिस इन वंडरलैंड।

Monday, May 25, 2026

 क्या यही वह गौरवशाली, पूजनीय श्रीकृष्ण की भूमि है, जो आज बूंद-बूंद पानी के लिए तड़प रही है?

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प्यासा ब्रज: तालाबों-कुंडों की धरती श्रीकृष्ण नगरी आखिर पानी को क्यों तरस रही है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

28 मई 2026

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ब्रज मंडल की प्रकृति, यमुना तट, कुंज गलियों, मोरों, गायों और कृष्ण लीलाओं का सुंदर वर्णन अनेक लोकप्रिय भजनों और गीतों में मिलता है। “श्याम तेरी बंसी पुकारे,” “राधे राधे बरसाने वाली,” “मैया मोरी,” और “जय राधा माधव” जैसे भजन वृंदावन, बरसाना और गोकुल की आध्यात्मिक सुंदरता को जीवंत करते हैं। सूरदास और रसखान के पद विशेष रूप से प्रकृति का मार्मिक वर्णन करते हैं।

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कभी यह धरती बांसुरी की तान पर झूमती थी। यमुना किनारे कदंब की छांव थी। कुंडों में कमल खिलते थे।तालाब गांवों की धड़कन होते थे।

आज उसी ब्रज मंडल में सुबह का पहला दृश्य क्या है? हाथों में बाल्टियां लिए महिलाएं। सूखे नलों के नीचे टकटकी लगाए बच्चे। और पानी के टैंकर के पीछे भागती भीड़।

यह वही ब्रज है, जहां श्रीकृष्ण ने गोपियों संग रास रचाया था। वही भूमि, जिसे संतों ने “धरा पर स्वर्ग” कहा। लेकिन अब यह स्वर्ग प्यास से फटे होंठों वाला मरुस्थल बनता जा रहा है। विडंबना देखिए । यमुना किनारे बसे शहरों में लोग पीने के पानी के लिए जूझ रहे हैं।

कभी ब्रज का हर गांव एक छोटे जल-संसार जैसा था। कुंड थे। पोखर थे। बावड़ियां थीं। बरसात का पानी सहेजने की अद्भुत लोक-व्यवस्था थी।

बूढ़े लोग बताते हैं कि मथुरा और वृंदावन में बीस तीस फीट खोदो तो मीठा पानी मिल जाता था। अब डेढ़ सौ फीट नीचे भी कई बार सिर्फ गाद या हवा निकलती है। धरती का सीना खाली हो चुका है। जैसे किसी ने भीतर का सारा जीवन चूस लिया हो।

गर्मियों में हालात और भयावह हो जाते हैं। मोहल्लों में,  गांवों में पानी के लिए रोज छोटे-छोटे युद्ध होते हैं। टैंकर आता है तो ऐसा लगता है जैसे रेगिस्तान में बादल उतर आया हो। 

यह संकट अचानक नहीं आया। यह वर्षों की लापरवाही का नतीजा है।

ब्रज के तालाब और सरोवर सिर्फ सजावट नहीं थे। वे धरती के बैंक थे। बरसात का पानी जमा करते थे, भूजल रिचार्ज करते थे, गर्मी कम करते थे। लेकिन विकास के नाम पर इन जलाशयों को मिटा दिया गया। कहीं कॉलोनियां उग आईं। कहीं पार्किंग बन गई। कई कुंड कूड़ाघर में बदल गए।

कंक्रीट ने मिट्टी की सांस रोक दी।

धरती पानी पीना भूल गई।

राजनीति ने भी अपना खेल खेला। चुनावों में बड़े-बड़े वादे हुए। यमुना सफाई की बातें हुईं। हर घर जल पहुंचाने के दावे हुए। घाट चमकाए गए। रंगीन लाइटें लगीं। पर्यटन को बढ़ावा मिला। लेकिन गांवों के सूखे हैंडपंप किसी भाषण का हिस्सा नहीं बने।

मथुरा से सांसद बनीं हेमा मालिनी ने भी यमुना और जल संकट पर कई घोषणाएं कीं। करोड़ों रुपये योजनाओं में खर्च हुए। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बने। “नमामि गंगे” और “जल जीवन मिशन” जैसे अभियानों का खूब प्रचार हुआ। मगर जमीन पर तस्वीर अब भी अधूरी है। शहर के कुछ हिस्सों में पाइपलाइन पहुंची, लेकिन बाहरी बस्तियां और गांव अब भी भूजल के भरोसे हैं।

सबसे दुखद हालत यमुना की है।

जिस नदी को ब्रज की मां कहा जाता था, वह कई जगहों पर नाले जैसी दिखती है। दिल्ली और दूसरे शहरों का प्रदूषण बहता हुआ यहां पहुंचता है। काले झाग, बदबू और गंदगी ने नदी की आत्मा को घायल कर दिया है। श्रद्धालु आरती उतारते हैं, लेकिन नदी खुद जैसे मदद की गुहार लगा रही हो।

एक समय था जब बच्चे यमुना में छलांग लगाकर तैरना सीखते थे। आज माता-पिता बच्चों को नदी के पास जाने से डरते हैं। पानी में बीमारी है। जहरीले रसायन हैं। गांवों के कई इलाकों में भूजल में फ्लोराइड और TDS की मात्रा खतरनाक स्तर तक पहुंच चुकी है। लोग धीरे-धीरे बीमार हो रहे हैं। दांत खराब हो रहे हैं। किडनी रोग बढ़ रहे हैं। टाइफाइड और हेपेटाइटिस आम बात बनते जा रहे हैं।

पर्यटन ने भी दबाव बढ़ाया है।

हर साल करोड़ों श्रद्धालु ब्रज पहुंच रहे हैं। होटल, धर्मशालाएं, रेस्टोरेंट और नई कॉलोनियां तेजी से बढ़ रही हैं। पानी की मांग आसमान छू रही है। लेकिन जल संरक्षण की रफ्तार घोंघे जैसी है। विकास हो रहा है या विनाश? 

स्थानीय नेतृत्व की विफलता अब खुली किताब है।

भव्य परियोजनाओं पर ध्यान रहा। फोटो खिंचवाने पर ध्यान रहा। लेकिन तालाब बचाने, वर्षा जल संचयन लागू करने और अतिक्रमण हटाने जैसे बुनियादी काम पीछे छूट गए। विकास का ढोल बजता रहा, मगर धरती भीतर से सूखती रही।

फिर भी उम्मीद पूरी तरह मरी नहीं है।

कुछ गांवों में लोग खुद चंदा इकट्ठा कर तालाब साफ करा रहे हैं। कुछ पर्यावरण कार्यकर्ता पुराने कुंडों को पुनर्जीवित करने में जुटे हैं। युवा वृक्षारोपण अभियान चला रहे हैं। कुछ NGO वर्षा जल संचयन और चेक डैम बनाने की मांग उठा रहे हैं।

असल लड़ाई पाइपलाइन की नहीं, सोच की है।

जब तक विकास और प्रकृति साथ नहीं चलेंगे, तब तक कोई योजना स्थायी नहीं होगी। चमचमाती सड़कें प्यास नहीं बुझातीं। रंगीन घाट सूखे भूजल को नहीं भरते।

ब्रज आज पूरे देश को चेतावनी दे रहा है।

यदि श्रीकृष्ण की भूमि प्यास से तड़प सकती है, तो कोई शहर सुरक्षित नहीं। प्रकृति देर से हिसाब करती है, मगर बहुत सख्ती से करती है।

अब समय आ गया है कि नेता भाषणों से आगे बढ़ें।

तालाब बचाए जाएं।

कुंड पुनर्जीवित हों।

वर्षा जल संचयन अनिवार्य बने।

यमुना में गिरता गंदा पानी रोका जाए।

क्योंकि आखिर सवाल सिर्फ विकास का नहीं है। सवाल जीवन का है।

ब्रज की पुकार आज बहुत साफ सुनाई दे रही है :

“भव्य चमकीली परियोजनाएं बाद में बनाना, पहले हमारे कुंड, तालाब, वन, बगीचे, नदी सुरक्षित करो।

 

Who Hijacked India’s Mindspace?

The smartphone has not merely replaced newspapers and television; it has transformed how Indians think, read, interact, and remember. Once, mornings began with newspapers and evenings united families around television screens, creating shared conversations and collective experiences. Today, billions of scrolling thumbs have replaced deep reading with instant consumption.

With over 800 million smartphone users, India’s attention economy now runs on reels, viral clips, and algorithm-driven outrage. Traditional newspapers struggle to survive, while television loses viewers to endless digital content. Algorithms feed users only what excites, angers, or entertains them, shrinking attention spans and weakening thoughtful reflection.

The result is a society flooded with information but starved of wisdom. Families sit together yet live in separate digital worlds. The smartphone has become the new emperor of attention, raising an unsettling question: are humans controlling screens, or are screens controlling humans?

Sunday, May 24, 2026

 गायब होता अख़बार, फीकी पड़ती टीवी की चमक और मुट्ठीभर स्क्रीन का साम्राज्य

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क्या स्मार्टफोन बन चुका है भारत की नई ‘ध्यान सत्ता’ का सम्राट?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

27 मई 2026

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एक जमाना था सुबह का अखबार पढ़े बिना लोग निच्चू नहीं हो पाते थे, शाम को हम लोग, या महाभारत देखे बगैर सो नहीं पाते थे। घंटों तक बच्चे टीवी जिसे इलेक्ट्रॉनिक निप्पल कहा जाता था, चिपके रहते थे। क्रिकेट मैच मोहल्लों को जोड़ देते थे। धारावाहिक घर-घर की बातचीत बन जाते थे। समाचार चैनल देश की राजनीतिक धड़कन तय करते थे। मीडिया सिर्फ सूचना का माध्यम नहीं था, वह सामाजिक संस्कृति का हिस्सा था।

और अब?

क्या आपने गौर किया है कि  घरों में अख़बार की सरसराहट कम सुनाई देती है और टीवी के सामने परिवारों की भीड़ भी पहले जैसी नहीं रही?

एक खामोश क्रांति हमारे सामने घट रही है। बिना शोर। बिना मातम। बिना किसी औपचारिक घोषणा के। भारत में पारंपरिक मीडिया, खासकर प्रिंट और टेलीविजन, धीरे-धीरे अपनी पकड़ खोते जा रहे हैं। उनकी जगह अब स्मार्टफोन ने ले ली है। वही छोटा-सा चमकता पर्दा, जिसने दुनिया को हथेली में समेट लिया है और इंसानी ध्यान को अपनी गिरफ्त में कर लिया है।

कम्युनिकेशन क्रांति के गुरु मार्शल मैकलुहान ने ठीक ही कहा था:  “मीडियम ही संदेश है।”

आज वह संदेश बदल चुका है।

तेज़। छोटा। उत्तेजक। और बेहद नशे की तरह असर करने वाला।

स्मार्टफोन ने केवल टीवी या अख़बार को चुनौती नहीं दी, उसने इंसानी व्यवहार ही बदल दिया।

आंकड़े कहानी साफ़ बताते हैं। भारत में टीवी दर्शकों की संख्या धीरे-धीरे घट रही है। करोड़ों लोग डीटीएच कनेक्शन छोड़ चुके हैं। विज्ञापन आय ठहर गई है। कभी मनोरंजन का बादशाह रहा टीवी उद्योग अब असुरक्षा के दौर से गुजर रहा है।

लेकिन असली चिंता टीवी नहीं, अख़बारों की गिरती हालत है।

प्रिंट पत्रकारिता, जो लोकतंत्र की रीढ़ मानी जाती थी, डिजिटल तूफान में हांफती नजर आ रही है। नई पीढ़ी अब खबरें अख़बार में नहीं, इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब शॉर्ट्स, व्हाट्सऐप फॉरवर्ड और एल्गोरिदम से चलने वाली सोशल मीडिया फीड्स में ढूंढती है। लंबी रिपोर्ट पढ़ने का धैर्य घटता जा रहा है। लोग अब खबर को “समझना” नहीं, “स्क्रॉल” करना चाहते हैं।

सुबह का अख़बार अब किसी दूसरे अख़बार से नहीं, बल्कि मोबाइल की लगातार बजती नोटिफिकेशनों से लड़ रहा है।

यह बदलाव केवल तकनीकी नहीं, सामाजिक भी है।

अख़बार पाठक को ठहरना सिखाते थे। सोचने का समय देते थे। अलग-अलग विचारों से परिचय कराते थे। संपादकीय, विश्लेषण और खोजी रिपोर्टें समाज को गहराई देती थीं। दूसरी ओर स्मार्टफोन की दुनिया तेज़ प्रतिक्रिया, सनसनी और तात्कालिक उत्तेजना पर चलती है। सूचना अब टूटी हुई कांच के टुकड़ों की तरह बिखरकर आती है। लोग सब कुछ जानते हुए भी बहुत कम समझ पा रहे हैं।

माध्यम बदला है, इसलिए संदेश भी बदल गया है।

आज भारत में 80 करोड़ से अधिक स्मार्टफोन उपयोगकर्ता हैं और यह संख्या लगातार बढ़ रही है। सस्ते इंटरनेट ने डिजिटल दुनिया को हर हाथ तक पहुंचा दिया। सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने मनोरंजन को पूरी तरह व्यक्तिगत बना दिया है। अब हर व्यक्ति अपनी अलग डिजिटल दुनिया में जी रहा है।

टीवी सामूहिक अनुभव था। स्मार्टफोन व्यक्तिगत कैदखाना बन गया।

पहले पूरा परिवार एक कार्यक्रम साथ देखता था। अब एक ही कमरे में बैठे चार लोग चार अलग-अलग स्क्रीन पर अलग-अलग दुनिया देख रहे होते हैं। साझा सामाजिक संवाद बिखर रहा है। राष्ट्रीय बहसें अब स्वतः नहीं बनतीं, उन्हें एल्गोरिदम गढ़ते हैं।

आज की सबसे बड़ी पूंजी है : इंसानी ध्यान।

विज्ञापन कंपनियों ने यह बदलाव सबसे पहले समझ लिया। बड़े ब्रांड अब टीवी से ज्यादा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर पैसा लगा रहे हैं, जहां हर क्लिक, हर स्क्रॉल और हर सेकंड का हिसाब मिलता है। डिजिटल विज्ञापन तेजी से बढ़ रहा है जबकि टीवी और प्रिंट की विज्ञापन आय सिकुड़ती जा रही है।

और अख़बार?

वे चुपचाप लहूलुहान हो रहे हैं।

कई शहरों में प्रसार घट रहा है। विज्ञापन ऑनलाइन चले गए हैं। न्यूजप्रिंट की लागत बढ़ती जा रही है। छोटे और क्षेत्रीय अख़बार अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। अनुभवी पत्रकारों को डर है कि समाज केवल एक उद्योग नहीं खो रहा, बल्कि पढ़ने और गहराई से सोचने की आदत भी खो रहा है।

विडंबना देखिए : सूचना बढ़ी है, लेकिन ध्यान घट गया है।

तीस सेकंड की रील अब हजार शब्दों के विश्लेषण पर भारी पड़ रही है। वायरल कंटेंट बनाने वाले कई बार स्थापित न्यूज़रूम से ज्यादा प्रभावशाली हो गए हैं। इस डिजिटल जंगल में विश्वसनीयता से ज्यादा दृश्यता मायने रखती है।

असल लड़ाई अब टीवी बनाम डिजिटल की नहीं रही।

यह लड़ाई है इंसानी ध्यान पर कब्जे की।

और फिलहाल यह जंग सबसे छोटी स्क्रीन जीत रही है।

मैकलुहान की बात आज पहले से ज्यादा सच लगती है। माध्यम केवल संदेश नहीं देता, वह समाज की सोच, व्यवहार और रिश्तों को भी आकार देता है। स्मार्टफोन ने अभिव्यक्ति को लोकतांत्रिक बनाया, लेकिन साथ ही ध्यान भंग, ध्रुवीकरण और मानसिक बेचैनी भी बढ़ाई।

उत्तर प्रदेश के किसी गांव का युवा अब रातोंरात वायरल स्टार बन सकता है। किसान लाखों लोगों तक अपनी बात पहुंचा सकता है। यह बदलाव क्रांतिकारी भी है और खतरनाक भी।

सवाल यह है कि क्या समाज बिना गहराई से पढ़े स्वस्थ लोकतंत्र बचा पाएगा?

क्या लोग केवल स्क्रॉल करते-करते सोचने की क्षमता खो देंगे?

पारंपरिक मीडिया अब चौराहे पर खड़ा है।

अख़बारों और टीवी चैनलों को पुराने ढांचे से बाहर निकलना होगा। डिजिटल पत्रकारिता, क्षेत्रीय भाषाओं की ताकत, मल्टीमीडिया स्टोरीटेलिंग और विश्वसनीय कंटेंट ही उनका भविष्य तय करेंगे।

लेकिन एक सच्चाई साफ़ दिख रही है।

मीडिया के अधिकार का युग समाप्त हो रहा है।

एल्गोरिदम के प्रभाव का युग शुरू हो चुका है।

परिवार अब भी एक ही छत के नीचे रहते हैं, लेकिन मानसिक रूप से अलग-अलग डिजिटल दुनियाओं में बंट चुके हैं। टीवी अब भी जलता है। अख़बार अब भी कुछ दरवाजों तक पहुंचते हैं। मगर समाज का केंद्र अब हथेली में चमकती उस छोटी स्क्रीन पर खिसक चुका है।

ध्यान का नया सम्राट अब स्मार्टफोन है।

और हर अंतहीन स्क्रॉल के साथ, पुरानी मीडिया दुनिया थोड़ा और धुंधली पड़ती जा रही है।

 छोटे परिवार, टूटते रिश्ते: क्या परिवार नियोजन ने भारत की संयुक्त परिवार व्यवस्था को कमजोर कर दिया है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

26 मई 2026

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मदर्स डे पर बेटे ने अपनी ही मां को गोली मार दी।

भाई खेत के टुकड़े के लिए एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए।

बुजुर्ग मां फ्लैट के एक कोने में पड़ी रही, जैसे घर का कोई बेकार सामान।

एक युवा प्रोफेशनल अकेलेपन से टूटकर आत्महत्या की कोशिश कर बैठा।

यह किसी अपराध फिल्म की पटकथा नहीं। यह बदलते भारत की भयावह सामाजिक तस्वीर है। वही भारत, जिसने कभी पूरे उत्साह से “हम दो, हमारे दो” का नारा अपनाया था।

देश ने जनसंख्या नियंत्रण में उल्लेखनीय सफलता हासिल की। लेकिन इस सफलता की छाया में रिश्तों की जमीन धीरे-धीरे बंजर होती चली गई। सदियों तक भारतीय समाज को सहारा देने वाली संयुक्त परिवार व्यवस्था अब तेजी से दरक रही है। और इस बदलाव के पीछे परिवार नियोजन कार्यक्रमों की सफलता भी एक महत्वपूर्ण, मगर कम चर्चित कारण बनकर उभरी है।

दशकों तक सरकारों ने छोटे परिवार को आदर्श बताया। तर्क भी मजबूत था; कम बच्चे होंगे तो गरीबी घटेगी, शिक्षा बेहतर होगी, स्वास्थ्य सुधरेगा और आर्थिक विकास तेज होगा। अभियान सफल रहा।

NFHS-5 (2019-21) के अनुसार भारत की कुल प्रजनन दर घटकर 2.0 रह गई है, जो प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से भी नीचे है। 1960 के दशक में यही दर लगभग 5.7 थी। शहरों में एक या दो बच्चों का चलन सामान्य हो चुका है। गांव भी उसी दिशा में बढ़ रहे हैं।

NFHS-5 डेटा बताता है कि देश में 58.2% घरेलू इकाइयां अब न्यूक्लियर फैमिली हैं। औसत परिवार का आकार 1999 के 5.2 से घटकर 2021 में 4.4 रह गया है।

लेकिन हर सफलता की एक सामाजिक कीमत होती है। भारत अब वही कीमत चुका रहा है।

हाल की घटनाएं इस संकट का दर्दनाक चेहरा दिखाती हैं।

उत्तर प्रदेश में पुश्तैनी जमीन के विवाद में एक किसान ने अपनी मां और छोटे भाई की हत्या कर दी।

मध्य प्रदेश में सात एकड़ खेत के बंटवारे को लेकर भाइयों की लड़ाई खून-खराबे में बदल गई।

दिल्ली में पढ़ा-लिखा दंपती तलाक, दहेज और बच्चे की कस्टडी के मुकदमों में वर्षों से उलझा है।

हरियाणा में दहेज के लिए नई बहू को प्रताड़ित किया गया, क्योंकि छोटे परिवार में रोकने-टोकने वाला कोई बुजुर्ग नहीं था।

बेंगलुरु में बुजुर्ग मां बेटे के फ्लैट में उपेक्षा की शिकार हुई।

पंजाब में दो भाई दस वर्षों से अदालतों के चक्कर काट रहे हैं।

चेन्नई में एक युवक पारिवारिक अलगाव और अकेलेपन से टूटकर आत्महत्या का प्रयास कर बैठा।

ये सिर्फ घटनाएं नहीं हैं। ये बदलते भारत का सामाजिक एक्स-रे हैं।

संयुक्त परिवार कभी आदर्श व्यवस्था नहीं था। उसमें पितृसत्ता भी थी, दबाव भी थे, झगड़े भी होते थे। लेकिन उसके भीतर एक सुरक्षा कवच भी मौजूद था। दादा-दादी बच्चों को संभालते थे। चाचा-ताऊ संकट में साथ खड़े रहते थे। विधवाओं को सहारा मिलता था। घर के बड़े विवाद सुलझा देते थे। अकेलापन इतना गहरा नहीं होता था कि जानलेवा बन जाए।

आज वही ढांचा बिखर रहा है।

शहरीकरण, पलायन, बढ़ती महत्वाकांक्षाएं, उपभोक्तावाद और महिलाओं की शिक्षा-आर्थिक स्वतंत्रता ने इस प्रक्रिया को तेज किया। लेकिन परिवार नियोजन ने रिश्तों की पूरी गणित बदल दी।

पहले बड़े परिवारों में जिम्मेदारियां बंट जाती थीं। चार भाई खेत संभालते थे। कई बच्चे बुजुर्ग माता-पिता का सहारा बनते थे। चचेरे भाई-बहन भी सगे रिश्तों की तरह साथ पलते थे। परिवार सिर्फ खून का रिश्ता नहीं, सामाजिक बीमा भी था।

अब कई घरों में सिर्फ एक या दो बच्चे हैं। ऐसे में विवाद पैदा हो तो बीच-बचाव कौन करे?

एक तलाक पूरे व्यक्ति को अकेला कर देता है।

एक बेटा जिम्मेदारी छोड़ दे तो बुजुर्ग माता-पिता बेसहारा हो जाते हैं।

दो भाइयों का झगड़ा सीधे हत्या तक पहुंच जाता है।

छोटे परिवारों ने संपत्ति विवाद भी अधिक तीखे बना दिए हैं। खेती की जमीन छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटती गई। शहरों में मकान सोने की खान बन गए। जहां वारिस कम हों, वहां लालच और टकराव ज्यादा विस्फोटक हो जाते हैं। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स भी बताती हैं कि भारत में जमीन और संपत्ति विवाद हिंसक अपराधों का बड़ा कारण बनते जा रहे हैं।

UN Global Study on Homicide जैसे रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत में संपत्ति-जमीन विवाद हत्याओं का बड़ा कारण हैं।

आज अदालतें पारिवारिक मुकदमों से भरी पड़ी हैं। तलाक, गुजारा भत्ता, घरेलू हिंसा, संपत्ति विवाद और बुजुर्ग उपेक्षा के मामले न्याय तंत्र पर भारी पड़ रहे हैं। केरल जैसे राज्यों में रोज औसतन 75 तलाक के मामले दर्ज होते हैं। पुलिस थाने अब आधे पारिवारिक पंचायत बन चुके हैं।

आज अदालतें पारिवारिक मुकदमों से भरी पड़ी हैं। तलाक, गुजारा भत्ता, घरेलू हिंसा, संपत्ति विवाद और बुजुर्ग उपेक्षा के मामलों ने न्याय व्यवस्था पर भारी दबाव डाल दिया है। पुलिस थाने धीरे-धीरे पारिवारिक पंचायतों में बदलते जा रहे हैं।

लेकिन सबसे बड़ा संकट मानसिक है।

अकेलापन बढ़ रहा है। अवसाद बढ़ रहा है। बुजुर्ग भावनात्मक उपेक्षा झेल रहे हैं। न्यूक्लियर फैमिली कई बार छोटे द्वीपों जैसी बन गई है। एक रिश्ता टूटा नहीं कि पूरा भावनात्मक ढांचा ढह जाता है।

भारत की पारंपरिक सामाजिक समझ कहती थी कि इंसान अकेले नहीं, साथ रहकर बचता है। आधुनिक जीवन ने व्यक्ति को केंद्र में रख दिया और समुदाय को धीरे-धीरे पीछे धकेल दिया।

यह भी सच है कि परिवार नियोजन ने भारत को जनसंख्या विस्फोट से बचाया। मातृ स्वास्थ्य सुधरा। शिक्षा के अवसर बढ़े। गरीबी पर कुछ नियंत्रण हुआ। इन उपलब्धियों को नकारा नहीं जा सकता। लेकिन नीति निर्माताओं ने शायद इसके सामाजिक और मनोवैज्ञानिक दुष्प्रभावों का पूरा आकलन नहीं किया।

पश्चिमी देशों ने संयुक्त परिवार छोड़े तो बदले में मजबूत सामाजिक सुरक्षा, बुजुर्ग देखभाल और काउंसलिंग सिस्टम विकसित किए। भारत ने पुरानी व्यवस्था को कमजोर तो कर दिया, मगर नई सुरक्षा दीवारें समय पर खड़ी नहीं कर पाया।

नतीजा सामने है: 

छोटे घर।

छोटे परिवार।

छोटे रिश्ते।

और बड़ा अकेलापन।

अब चुनौती परिवार नियोजन को उलटने की नहीं है। असली चुनौती टूटते सामाजिक ताने-बाने को फिर से जोड़ने की है। भारत को पारिवारिक मध्यस्थता तंत्र, बुजुर्ग देखभाल योजनाएं, मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं और सामुदायिक सहयोग मॉडल मजबूत करने होंगे। स्कूलों और समाज को भी रिश्तों की सामूहिक जिम्मेदारी का महत्व फिर सिखाना होगा।

वरना आने वाले समय में भारत के पास मकान तो होंगे, मगर घर नहीं बचेंगे।


Saturday, May 23, 2026

 चौराहे पर खड़ी कांग्रेस: राहुल गांधी नेतृत्व कर रहे हैं या पार्टी को गर्त में धकेल रहे हैं?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

25 मई 2026

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कांग्रेस की राजनीति आज जंगल में भटकते कारवां जैसी लगती है। रास्ता भी धुंधला। रहबर भी असमंजस में।

राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी बार-बार ऐसी राजनीतिक “कौवा-भोज” करती दिखती है, जहां हर अधूरा बयान, हर जल्दबाजी और हर कमजोर रणनीति उसकी साख को थोड़ा और खोखला कर देती है। 

देश मजबूत विपक्ष चाहता है, मगर कांग्रेस अक्सर घायल मुसाफिर जैसी नजर आती है, जो मंजिल से ज्यादा बहानों की तलाश में है।

सबसे बड़ा संकट नेतृत्व का नहीं, भरोसे का है। कांग्रेस के पास अब वैसी दमदार, ईमानदार और ज़मीनी क्षेत्रीय फौज नहीं बची, जो अपने बूते जनाधार खड़ा कर सके। पुराने चेहरे थक चुके हैं। नए चेहरों को उभरने नहीं दिया जाता। अंदरूनी लोकतंत्र बंद कमरे में कैद है। परिवारवाद की धूल इतनी मोटी जम चुकी है कि प्रतिभा की पौध धूप तक नहीं देख पाती।

कांग्रेस की मौजूदा राजनीति भी अजीब प्रतीक्षा में फंसी दिखती है। कभी उम्मीद कि सरकार किसी संकट में फंस जाए। कभी आस कि महंगाई जनता को भड़का दे। कभी भरोसा कि विदेश नीति की उलझनें सत्ता को कमजोर कर देंगी। लेकिन राजनीति केवल विरोध का खेल नहीं है। जनता विकल्प चाहती है। विजन चाहती है। भरोसा चाहती है।

राजनीति के जानकार कहते हैं कि राहुल गांधी के आक्रामक बयान सुर्खियां जरूर बटोरते हैं, लेकिन बिना मजबूत संगठन, बिना बूथ नेटवर्क और बिना स्पष्ट आर्थिक सोच के वे हवा में छोड़े गए तीर लगते हैं। कांग्रेस आज तक तय नहीं कर पाई कि वह गरीबों की पार्टी है, उदार बाजार की समर्थक है या सिर्फ भाजपा विरोध का मंच।

अगर पार्टी ने जल्द नेतृत्व संस्कृति नहीं बदली, साफ छवि वाले युवा नेताओं को आगे नहीं लाया और नई आर्थिक तथा संघीय सोच पेश नहीं की, तो उसका राष्ट्रीय आधार और सिकुड़ जाएगा। कुछ राज्यों में छिटपुट जीत मिल सकती है, मगर राष्ट्रीय राजनीति में उसकी जगह क्षेत्रीय दल तेजी से भर देंगे।

साल 2026 आते-आते खतरे की घंटियां अब धीमे नहीं बज रहीं। वे किसी जलती इमारत के फायर अलार्म की तरह चीख रही हैं। जिस पार्टी ने दशकों तक भारतीय राजनीति पर राज किया, वही आज थके हुए हाथी जैसी दिखती है, जो चढ़ाई पर हांफ रही है, जबकि उसके प्रतिद्वंद्वी तेज रफ्तार घोड़ों की तरह आगे निकल चुके हैं।

पश्चिम बंगाल चुनावों ने कांग्रेस की हालत को और बेरहमी से उजागर कर दिया। भाजपा ने मजबूत प्रदर्शन किया, जबकि कांग्रेस तस्वीर से लगभग गायब रही। कभी कांग्रेस भारतीय राजनीति का बरगद थी। आज कई राज्यों में वह धूल खाए पुराने साइनबोर्ड जैसी लगती है, जिसे लोग देखते तो हैं, मगर पढ़ते नहीं।

कांग्रेस के सामने फिलहाल चार रास्ते दिखाई देते हैं।

पहला रास्ता है धीरे-धीरे क्षेत्रीय अप्रासंगिकता की ओर फिसलना। पार्टी खत्म नहीं होगी, मगर लगातार सिमटती जाएगी। कर्नाटक, हिमाचल, तेलंगाना या केरल जैसे कुछ जेबनुमा इलाकों तक सीमित रह सकती है। बाकी राज्यों में उसे क्षेत्रीय दलों की बैसाखियों पर चलना पड़ेगा। उत्तर प्रदेश, बंगाल, ओडिशा और दिल्ली में कांग्रेस पहले ही दर्शक दीर्घा की पार्टी बनती जा रही है।

दूसरा रास्ता पुनर्निर्माण का है। कठिन, मगर संभव। इसके लिए गांधी परिवार को रोजमर्रा की पकड़ ढीली करनी होगी। पार्टी में वास्तविक लोकतंत्र लाना होगा। राज्यों के नेताओं को ताकत देनी होगी। गैर वंशवादी युवा चेहरों को आगे बढ़ाना होगा। सबसे महत्वपूर्ण, कांग्रेस को अपनी वैचारिक पहचान साफ करनी होगी। फिलहाल उसका संदेश कभी इधर, कभी उधर झूलते पुराने रेडियो जैसा लगता है।

भाजपा ने हिंदू पहचान और कल्याणकारी राष्ट्रवाद को एक साथ जोड़ दिया है। कांग्रेस उसके मुकाबले कोई भावनात्मक और विश्वसनीय कथा खड़ी नहीं कर पाई। केवल सेक्युलरिज्म अब चुनावी जादू नहीं पैदा करता। केवल कल्याणकारी वादे भी काफी नहीं। आज का मतदाता पहचान, राष्ट्रवाद, विकास और आकांक्षा सब कुछ एक ही पैकेज में चाहता है।

तीसरा रास्ता सबसे खतरनाक है : आंतरिक टूट और बिखराव। इतिहास इसके संकेत पहले ही दे चुका है। तृणमूल कांग्रेस और एनसीपी जैसी पार्टियां कांग्रेस से टूटकर निकलीं। राज्यों में कई नेताओं को लगता है कि दिल्ली का हाईकमान उनकी राजनीतिक सांसें रोक रहा है। जब योग्यता से ज्यादा वफादारी मायने रखने लगे, तो असंतोष धीरे-धीरे विस्फोट बन जाता है।

अगर हार का सिलसिला जारी रहा, तो और नेता भाजपा या क्षेत्रीय दलों की ओर जा सकते हैं। राजनीति डूबते जहाज पर ज्यादा देर खड़े रहने का खेल नहीं है। कार्यकर्ता सत्ता की तरफ भागते हैं। नेता अवसर की तरफ। विचारधारा अक्सर बाद में प्रेस कॉन्फ्रेंस में आती है।

चौथा रास्ता है लंबी मगर फीकी राजनीतिक जिंदगी। इस स्थिति में कांग्रेस खत्म नहीं होगी, मगर दोबारा शिखर पर भी नहीं पहुंचेगी। वह विपक्षी गठबंधनों की धुरी बनी रहेगी। संसद में इतनी सीटें लाती रहेगी कि उसकी उपयोगिता बनी रहे। कुछ राज्यों में सरकारें भी बना सकती है। कभी-कभी गठबंधन राजनीति में किंगमेकर भी बन सकती है। शायद यही सबसे यथार्थवादी संभावना है। लेकिन केवल जीवित रहना किसी राजनीतिक आंदोलन को प्रेरित नहीं करता।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं: "आज कांग्रेस उस पुराने थिएटर समूह जैसी लगती है, जो अब भी पुराने नाटक खेल रहा है, जबकि दर्शक डिजिटल मंचों पर जा चुके हैं। युवा मतदाता कांग्रेस को उसके वर्तमान कामों से कम, सोशल मीडिया के मजाक, पुराने घोटालों और वंशवाद की बहसों से ज्यादा पहचानते हैं। यह बेहद खतरनाक संकेत है।"

फिर भी कांग्रेस को पूरी तरह खत्म मान लेना जल्दबाजी होगी। भारतीय राजनीति में कई बार मृत घोषित खिलाड़ी वापसी कर चुके हैं। लेकिन वापसी विरासत के सहारे नहीं होती। वापसी भूख, अनुशासन, विनम्रता और पुनर्निर्माण से होती है, दक्षिण भारत की राजनीति के विश्लेषक वेंकट सुब्रमनियन ने कहा।

आखिरकार कांग्रेस की सबसे बड़ी लड़ाई चुनावी नहीं, मानसिक है। क्या पार्टी अब भी खुद को भारत का नेतृत्व करने योग्य मानती है? या उसने भीतर ही भीतर स्थायी विपक्ष बनने को स्वीकार कर लिया है?

सच में, जिस राजनीतिक दल के भीतर विश्वास ही खत्म हो जाए, वह बिना हवा की पतंग बन जाता है। कुछ देर आसमान में जरूर दिखता है, मगर अंत में गुरुत्वाकर्षण ही जीतता है।

Friday, May 22, 2026

 डिग्रियों का ढेर, ज्ञान का अकाल: भारत के क्लासरूम में आखिर हो क्या रहा है?

रिपोर्ट कार्ड चमक रहे हैं, शिक्षा दम तोड़ रही है

जब शिक्षक ही तैयार नहीं, तो बच्चे क्या सीखेंगे?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

24 मई 2026

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एक पुराना किस्सा आज भी भारतीय शिक्षा व्यवस्था का आईना लगता है।

स्कूल इंस्पेक्टर अचानक क्लास में पहुंचा। मास्टरजी बच्चों को स्पेलिंग पढ़ा रहे थे :  “Girl बोलो… ग्रिल्ड।” इंस्पेक्टर भड़क गया, “ये क्या पढ़ा रहे हो?”

मास्टरजी ने भी तल्ख़ी से जवाब दिया, “तीन महीने से तनख्वाह नहीं मिली। जब तक वेतन नहीं मिलेगा, गर्ल को ग्रिल्ड ही पढ़ाऊंगा।”

यह सिर्फ मज़ाक नहीं। यह उस टूटती हुई व्यवस्था की कहानी है, जहां शिक्षक भी हताश है और छात्र भी भटक रहा है।

एक अंग्रेज़ी शिक्षक खुद ढंग से अंग्रेज़ी नहीं बोल पाता, लेकिन बच्चों को ग्रामर पढ़ा रहा है।

मई की तपती दोपहर में साठ बच्चों की क्लास में पंखा बंद पड़ा है। बच्चे कॉपियों से हवा कर रहे हैं।

बी.एड. में टॉप करने वाला नया शिक्षक पहली ही क्लास में शोर मचाते बच्चों के सामने घबरा जाता है।

मां-बाप शादी में गुरुजनों के पैर छूते हैं, लेकिन स्कूल में टीचर की सैलरी पर ऐसे मोलभाव करते हैं जैसे सब्ज़ी खरीद रहे हों।

यही है आज की भारतीय शिक्षा व्यवस्था का कड़वा विरोधाभास।

जिस देश में सरस्वती की पूजा होती है, वहीं शिक्षक धीरे-धीरे हाशिये पर धकेला जा रहा है।

डिग्रियां बढ़ रही हैं। कोचिंग सेंटर हर गली में उग रहे हैं। चमचमाते स्कूलों के विज्ञापन आसमान छू रहे हैं। लेकिन असली शिक्षा जेठ की धूप में सूखते तालाब की तरह सिकुड़ती जा रही है।

कभी भारत में शिक्षक सिर्फ नौकरीपेशा कर्मचारी नहीं था। गांव का “मास्टरजी” समाज का नैतिक स्तंभ माना जाता था। बच्चे उनसे डरते भी थे और सम्मान भी करते थे। मां-बाप अपने बच्चों की पढ़ाई ही नहीं, संस्कार भी शिक्षक के भरोसे छोड़ देते थे।

आज वह सम्मान चॉक की धूल की तरह हवा में उड़ रहा है।

भारत एक गहरे शैक्षणिक संकट से गुजर रहा है। कमजोर शिक्षक प्रशिक्षण, रटंत शिक्षा, गिरता स्तर, घटती सामाजिक प्रतिष्ठा और प्रेरणाहीन कक्षाओं ने शिक्षण पेशे को भीतर से खोखला कर दिया है। यह अब सिर्फ शिक्षा विभाग की समस्या नहीं रही। यह देश के भविष्य का संकट बन चुकी है।

सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि देश में लाखों शिक्षक भारी-भरकम डिग्रियां लेकर घूम रहे हैं : बी.एड., एम.एड., डिप्लोमा, सर्टिफिकेट , लेकिन उनमें से कई के पास न विषय की गहराई है, न पढ़ाने की कला, न आत्मविश्वास, न संवाद क्षमता।

डिग्रियां दीवार पर टंगी रहती हैं, लेकिन क्लासरूम में शिक्षक असहाय दिखता है।

सिर्फ डिग्री हासिल कर लेना किसी को अच्छा शिक्षक नहीं बना देता। मगर हमारी व्यवस्था इसी भ्रम में जी रही है।

सरकारी स्कूलों की हालत कई जगह बेहद चिंताजनक है। अंग्रेज़ी पढ़ाने वाले कई शिक्षक खुद धाराप्रवाह अंग्रेज़ी नहीं बोल पाते। उच्चारण कमजोर है। शब्दावली सीमित है। साहित्य पढ़ने की आदत लगभग खत्म हो चुकी है।

बच्चे तोते की तरह उत्तर रट लेते हैं, लेकिन सामान्य सवालों पर चुप हो जाते हैं।

उत्तर प्रदेश के एक ग्रामीण स्कूल का निरीक्षण करने गए एक रिटायर्ड अफसर ने बताया कि वहां का अंग्रेज़ी शिक्षक खुद सामान्य बातचीत तक नहीं कर पा रहा था। बच्चे पूरे पैराग्राफ याद करके सुना रहे थे, लेकिन अपने दम पर दो वाक्य नहीं बना पा रहे थे।

यह शिक्षा नहीं। यह रटी हुई नकल का कारखाना है।

समस्या सिर्फ सरकारी स्कूलों तक सीमित नहीं। बड़े-बड़े “इंटरनेशनल” और “स्मार्ट” स्कूल भी कई बार चमकदार पैकेजिंग भर साबित होते हैं। वहां कम वेतन पाने वाले, अनुभवहीन और असुरक्षित शिक्षक काम कर रहे हैं। कई शिक्षकों की तनख्वाह मॉल कर्मचारियों या डिलीवरी बॉय से भी कम है।

जिस पेशे में सम्मान और आर्थिक सुरक्षा दोनों न हों, वहां प्रतिभाशाली लोग क्यों आएंगे?

कभी शिक्षक बनना गर्व की बात थी। आज कई लोग मजबूरी में इस पेशे में आते हैं, क्योंकि दूसरी नौकरी नहीं मिली।

सबसे गहरी बीमारी हमारी शिक्षण पद्धति में है।

भारतीय शिक्षा व्यवस्था में आज भी जिज्ञासा को अनुशासनहीनता समझ लिया जाता है। रचनात्मकता परीक्षा के ढांचे में फिट नहीं बैठती।

शिक्षक बोलता रहता है। छात्र कॉपी करते रहते हैं। परीक्षा याददाश्त को मापती है, समझ को नहीं।

नतीजा यह है कि बच्चे डिग्रियां तो ले आते हैं, लेकिन आत्मविश्वास, संवाद क्षमता और स्वतंत्र सोच विकसित नहीं हो पाती। कई पढ़े-लिखे युवा ठीक से ईमेल नहीं लिख पाते, इंटरव्यू में बात नहीं कर पाते और व्यावहारिक समस्याओं का हल नहीं ढूंढ पाते।

त्रासदी की शुरुआत तो शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों से ही हो जाती है।

बी.एड. कॉलेजों में आज भी फाइलें भरने और सैद्धांतिक बातें रटाने पर ज़ोर है। वास्तविक क्लासरूम की चुनौतियों पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है।

दिल्ली की एक प्रशिक्षु शिक्षिका ने कहा, “बी.एड. ने मुझे लेसन प्लान बनाना सिखाया, लेकिन कमजोर बच्चे को पढ़ाना या शोरगुल वाली क्लास संभालना नहीं सिखाया।”

यही एक वाक्य पूरे संकट की तस्वीर पेश कर देता है।

इंटर्नशिप कई जगह सिर्फ औपचारिकता बन चुकी है। अनुभवी शिक्षकों से मार्गदर्शन कमजोर है। नए शिक्षक बिना तैयारी के क्लास में पहुंच जाते हैं।

उधर स्कूलों का बुनियादी ढांचा भी हालात बिगाड़ रहा है। भीड़भाड़ वाली कक्षाएं। टूटी बेंचें। खाली लाइब्रेरियां। इंटरनेट की कमी। शिक्षकों की भारी कमी। एक ही शिक्षक कई क्लासें संभाल रहा है।

ऐसे माहौल में व्यक्तिगत शिक्षा संभव ही नहीं।

सामाजिक बदलावों ने भी स्थिति को उलझाया है।

पश्चिमी सोच की नकल करते हुए हमने कई जगह शिक्षक और छात्र के रिश्ते में अनुशासन का महत्व ही कम कर दिया। “टीचर सिर्फ दोस्त हो” वाली सोच ने सम्मान और जवाबदेही दोनों को कमजोर किया है।

कई शिक्षक निजी बातचीत में मानते हैं कि आज छात्रों में शिक्षकों और यहां तक कि माता-पिता के प्रति भी सम्मान घटता जा रहा है। मोबाइल की लत, घटती पढ़ने की आदत और सिकुड़ती ध्यान क्षमता ने समस्या और बढ़ा दी है।

गांव का वह सख्त लेकिन समर्पित “मास्टरजी” अब धीरे-धीरे सार्वजनिक जीवन से गायब हो रहा है।

और जब शिक्षक का अधिकार कमजोर पड़ता है, तो क्लासरूम दिशा खो देता है।

समाधान मुश्किल नहीं, लेकिन राजनीतिक भाषणों से नहीं आएंगे।

शिक्षक प्रशिक्षण को फाइलों और औपचारिक भाषणों से निकालकर वास्तविक क्लासरूम से जोड़ना होगा। लंबी इंटर्नशिप, अनुभवी शिक्षकों की मेंटरशिप, नियमित प्रशिक्षण और व्यावहारिक अभ्यास जरूरी हैं।

भर्ती में सिर्फ परीक्षा अंक नहीं, बल्कि संवाद क्षमता, विषय ज्ञान, भावनात्मक समझ और पढ़ाने की प्रतिभा को महत्व देना होगा।

शिक्षकों को बेहतर वेतन, सामाजिक सम्मान और स्पष्ट करियर रास्ते देने होंगे। स्कूलों में लाइब्रेरी, डिजिटल सुविधाएं और बेहतर शिक्षण संसाधन उपलब्ध कराने होंगे।

सबसे जरूरी बात यह है कि भारत को शिक्षा को सिर्फ आंकड़ों और योजनाओं का खेल समझना बंद करना होगा। शिक्षा आखिरकार इंसानों द्वारा इंसानों को गढ़ने की प्रक्रिया है।

कोई भी देश अपने शिक्षकों की गुणवत्ता से ऊपर नहीं उठ सकता।

अगर भारत ने अपने शिक्षक, अपनी शिक्षण पद्धति और अपने क्लासरूम को बचाने की गंभीर कोशिश नहीं की, तो “शिक्षा महाशक्ति” बनने का सपना सरकारी फाइलों और भाषणों तक ही सीमित रह जाएगा, जबकि देश की असली कक्षाएं चुपचाप टूटती रहेंगी।

 चौंकाने वाला सच!!!

भारत के असली निर्माता चमचमाते एलीट स्कूल नहीं, साधारण स्कूल हैं

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बृज खंडेलवाल द्वारा

23 मई 2026

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आगरा में ही आधा दर्जन एलीट एक्सक्लूसिव स्कूल्स खुल चुके हैं जहां का खर्चा मां बाप से पूछिए

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आख़िर इंसान को कामयाब क्या बनाता है?

एयर कंडीशन्ड स्मार्ट क्लासरूम, विदेशी सिलेबस और चमकदार कैंपस?

या फिर संघर्ष, मेहनत, भूख और आगे बढ़ने का जुनून?

आज भारत में एक अजीब मानसिकता घर कर गई है। महंगे, हाई प्रोफाइल और “इंटरनेशनल” स्कूलों को सफलता की गारंटी माना जाने लगा है। लाखों रुपये फीस। अंग्रेज़ी लहजे पर गर्व। स्कूल कम, फाइव स्टार होटल ज़्यादा लगते हैं। माता-पिता भी अक्सर स्कूल नहीं, “स्टेटस सिंबल” खरीदते दिखाई देते हैं।

लेकिन भारत का इतिहास कुछ और कहानी सुनाता है।

आज़ाद भारत के असली निर्माता : प्रधानमंत्री, वैज्ञानिक, सैनिक, डॉक्टर, अफसर, उद्योगपति और खिलाड़ी , ज़्यादातर साधारण सरकारी स्कूलों, केन्द्रीय विद्यालयों, नगर निगम स्कूलों और सामान्य प्राइवेट स्कूलों से निकले हैं। देश की रीढ़ एलीट बोर्डिंग स्कूलों ने नहीं, आम स्कूलों ने तैयार की है।

गुजरात के वडनगर में एक साधारण स्कूल में पढ़ने वाला एक लड़का आगे चलकर भारत का प्रधानमंत्री बना। उसका नाम था नरेंद्र मोदी। न कोई स्मार्ट क्लास। न आलीशान कैंपस। न विदेशी सिलेबस।

ऐसी कहानियां पूरे भारत में बिखरी पड़ी हैं।

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने तमिलनाडु के साधारण स्कूल में पढ़ाई की। लाल बहादुर शास्त्री सामान्य स्कूलों से निकलकर देश के प्रधानमंत्री बने। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और रामनाथ कोविंद भी सरकारी और स्थानीय शिक्षा व्यवस्था से आगे बढ़े।

इन लोगों को विरासत में सुविधाएं नहीं मिलीं। इन्होंने भारत को करीब से देखा। गरीबी देखी। संघर्ष देखा। असमानता देखी। इन्हीं अनुभवों ने इन्हें मजबूत बनाया। इन्हें जमीन से जोड़े रखा।

बड़े एलीट स्कूलों से पढ़े लोग भी सफल होते हैं। उनमें आत्मविश्वास, नेटवर्क और एक्सपोजर होता है। लेकिन जब देश निर्माण की बात आती है, तब तस्वीर बदल जाती है।

कारोबारी दुनिया को ही देख लीजिए।

धीरूभाई अंबानी ने गुजरात के एक साधारण स्कूल से पढ़ाई की और फिर रिलायंस जैसा साम्राज्य खड़ा किया। इन्फोसिस के नारायण मूर्ति सरकारी स्कूलों में पढ़े। गौतम अडानी, शिव नाडर और सुनील मित्तल भी किसी शाही बोर्डिंग स्कूल की पैदाइश नहीं थे।

इन लोगों ने संघर्ष से सीख हासिल की। अभाव ने इन्हें जुगाड़, धैर्य और जोखिम उठाना सिखाया। यही असली बिजनेस स्कूल था।

भारतीय सेना की कहानी भी यही कहती है।

कारगिल के हीरो कैप्टन विक्रम बत्रा साधारण स्कूलों में पढ़े। फील्ड मार्शल करियप्पा सामान्य शिक्षा पृष्ठभूमि से आए। आज भी भारत की सीमाओं पर खड़े हजारों सैनिक और अफसर सरकारी स्कूलों, सैनिक स्कूलों और केन्द्रीय विद्यालयों से निकलते हैं।

जंग के मैदान में गोली यह नहीं पूछती कि सैनिक किस “इंटरनेशनल स्कूल” से पढ़ा है।

सेना में साहस, अनुशासन और प्रदर्शन मायने रखता है।

UPSC की परीक्षा तो इस मिथक को पूरी तरह तोड़ देती है।

हर साल IAS, IPS और IFS के टॉपर छोटे शहरों, गांवों, केन्द्रीय विद्यालयों, नवोदय विद्यालयों और सामान्य स्कूलों से निकलते हैं। कई हिंदी माध्यम से पढ़े होते हैं। कई बेहद साधारण परिवारों से आते हैं।

उनकी सफलता साबित करती है कि भारत में अब भी मेहनत, लगन और अनुशासन स्कूल के ब्रांड नाम से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।

डॉक्टरों और वैज्ञानिकों की दुनिया में भी यही तस्वीर दिखती है।

AIIMS के कई डॉक्टर, वैज्ञानिक और सर्जन साधारण स्कूलों से आए हैं। NEET के टॉपर भी अक्सर सरकारी या सामान्य स्कूलों से निकलते हैं। उनकी सफलता महंगे कैंपस नहीं, घंटों की पढ़ाई और अथक मेहनत से बनती है।

खेल जगत को देखिए।

सचिन तेंदुलकर शारदाश्रम विद्यालय से पढ़े। महेंद्र सिंह धोनी जवाहर विद्या मंदिर से निकले। पी.टी. ऊषा ने सरकारी स्कूल में पढ़ाई की। इनकी प्रतिभा एयर कंडीशनर में नहीं, संघर्ष में निखरी।

फिर भी समाज महंगे स्कूलों का इतना दीवाना क्यों है?

क्योंकि हमारे भीतर अब भी औपनिवेशिक मानसिकता जिंदा है। अंग्रेज़ी बोलने, चमकदार यूनिफॉर्म पहनने और महंगे स्कूल में पढ़ने को लोग श्रेष्ठता समझते हैं।

आज स्कूल शिक्षा का मंदिर कम, सामाजिक दिखावे का मंच ज्यादा बन गए हैं।

लेकिन शिक्षा फैशन शो नहीं है।

बच्चे की सफलता इस बात पर ज्यादा निर्भर करती है कि उसमें अनुशासन कितना है, मेहनत कितनी है, जिज्ञासा कितनी है, और परिवार व शिक्षक उसे कितनी सही दिशा देते हैं।

साधारण स्कूल एक और बड़ी चीज़ सिखाते हैं , जीवन से लड़ना।

वहां पढ़ने वाले बच्चे अक्सर बिजली कटौती में पढ़ते हैं। भीड़भाड़ वाली बसों में सफर करते हैं। किताबें बांटकर पढ़ते हैं। सीमित संसाधनों में सपने देखते हैं। यही संघर्ष उन्हें मानसिक रूप से मजबूत बनाता है।

यही कारण है कि मुख्यधारा के स्कूल भारत की असली ताकत हैं।

वे करोड़ों बच्चों को सपने देखने का अधिकार देते हैं। वे पहली पीढ़ी के अफसर, इंजीनियर, डॉक्टर और उद्यमी पैदा करते हैं। वे अवसरों की सीढ़ी को खुला रखते हैं।

भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था भी बराबरी का मौका देती है। IIT, AIIMS, NDA और UPSC जैसी परीक्षाएं गांव के बच्चे को भी राष्ट्रीय स्तर पर मुकाबला करने का अवसर देती हैं।

यही भारत की असली खूबसूरती है।

इसका मतलब यह नहीं कि सरकारी स्कूलों में समस्याएं नहीं हैं। वहां शिक्षक की कमी है। बुनियादी सुविधाओं की दिक्कत है। पुरानी पढ़ाई पद्धति है। इन कमियों को दूर करना बेहद जरूरी है।

लेकिन समाधान यह नहीं कि सिर्फ कुछ चमकदार एलीट स्कूल बना दिए जाएं।

समाधान यह है कि हर बच्चे को अच्छी शिक्षा मिले।

जब ओडिशा के किसी गांव का स्कूल अगला कलाम पैदा करता है, जब हिमाचल का साधारण स्कूल अगला विक्रम बत्रा देता है, तब भारत जीतता है।

आधुनिक भारत की कहानी एलीट स्कूलों की नहीं, साधारण स्कूलों की कहानी है।

यहीं भारत की असली प्रतिभा तैयार होती है।

यहीं से देश के असली निर्माता निकलते हैं।

Wednesday, May 20, 2026

 


यमुना नदी में सीवेज, मलबा, इंडस्ट्रियल वेस्ट और लाशें बह रही हैं, और सरकारी तंत्र मूक दर्शक बना खड़ा है

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बृज खंडेलवाल द्वारा

21 मई 2026

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यमुना छठ पर विशेष रिपोर्ट

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12 मई 2026 की शाम आगरा के एक घाट पर जो हुआ, वह कोई संयोग या महज़ दुर्भाग्य नहीं था। जन्मदिन मनाने आए छह युवा यमुना में उतरे। दो घंटे तक उन्हें बचाने की कोशिशें चलती रहीं, लेकिन अंततः चार बच्चों के शव बाहर निकाले गए। आए दिन ये दुर्घटनाएं हो रही हैं। पुलिस ने घाटों पर होर्डिंग्स लगाए हैं, सावधान किया है, पर लोग हैं कि मानते नहीं। वाकई, परिवारों का दुख शब्दों से परे है। वही यमुना, जिसके किनारे हमारी आस्था, इतिहास और सभ्यता सांस लेती आई है, आज मौत की गवाह बनती जा रही है।

इस घटना से कुछ ही सप्ताह पहले वृंदावन के केशी घाट पर नाव पलटने से 15 से अधिक तीर्थयात्रियों की मौत हुई थी। नाव में क्षमता से अधिक सवारियाँ थीं। लाइफ जैकेट नहीं थीं। निगरानी लगभग नदारद थी। सवाल यह है कि आखिर हर हादसे के बाद केवल शोक और मुआवज़े की रस्म क्यों निभाई जाती है?

इन घटनाओं को केवल “दुर्घटना” कहना सच्चाई से आँख चुराना होगा। यह प्रशासनिक विफलता, सरकारी लापरवाही और टूटी हुई व्यवस्था का नतीजा है। जब नदी जहरीली हो, उसका प्राकृतिक बहाव सिकुड़ चुका हो, सुरक्षा इंतज़ाम कागज़ों में सिमट जाएँ और निगरानी तंत्र सोया रहे, तब मौतें केवल समय का इंतज़ार बन जाती हैं। अरबों रुपये खर्च होने के दावों के बावजूद ज़मीनी हालात जस के तस हैं।

यमुना की हालत किसी से छिपी नहीं। लगभग 1,376 किलोमीटर लंबी यह नदी हिमालय से निकलकर हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश से गुजरती है। लेकिन दिल्ली के बाद इसका बड़ा हिस्सा एक बहती हुई नाली में बदल जाता है। करोड़ों लीटर बिना शोधन का सीवेज प्रतिदिन नदी में गिरता है। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट या तो अधूरे हैं, या उनकी क्षमता कम है, या फिर वे ठीक से चल ही नहीं रहे। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और अन्य पर्यावरणीय रिपोर्टें बार-बार बता चुकी हैं कि नदी में बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड और फीकल कॉलिफॉर्म का स्तर सुरक्षित सीमा से कई गुना ऊपर है। कई जगह पानी नहाने लायक भी नहीं बचा।

दिल्ली का प्रदूषण मथुरा, वृंदावन और आगरा तक पहुँचता है। धार्मिक नगरी होने के कारण इन शहरों के घाटों पर हर दिन भारी भीड़ उमड़ती है, लेकिन दूसरी ओर नाले सीधे नदी में गिरते रहते हैं। आगरा में ताजमहल के पीछे बहती यमुना अक्सर झाग, काले पानी और बदबू के कारण चर्चा में रहती है। यह केवल सौंदर्य का प्रश्न नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरणीय आपदा का संकेत है।

समस्या यहीं खत्म नहीं होती। यमुना की बाढ़ पट्टी पर तेजी से अतिक्रमण हुआ है। वृंदावन और मथुरा क्षेत्र में ड्रोन सर्वेक्षणों में सैकड़ों अवैध निर्माण सामने आए। नदी का प्राकृतिक फैलाव सिकुड़ता गया। जहाँ पानी फैलकर खुद को साफ करता था, वहाँ अब कंक्रीट और अवैध कॉलोनियाँ खड़ी हैं। नतीजा साफ है : जल ठहराव बढ़ा, प्रदूषण जमा हुआ और नदी का दम घुटने लगा। दुखद यह है कि ऐसे अतिक्रमण अक्सर प्रभावशाली लोगों के संरक्षण में पनपते हैं।

तीन दशक से योजनाएँ बन रही हैं। यमुना एक्शन प्लान आया। राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के तहत परियोजनाएँ चलीं। हजारों करोड़ रुपये खर्च होने के दावे किए गए। लेकिन सवाल वही है : अगर इतना पैसा लगा, तो नदी अब भी ज़हरीली क्यों है? अधूरी पाइपलाइनें, बंद पड़े प्लांट, कमजोर निगरानी और भ्रष्ट तंत्र ने योजनाओं को कागज़ी सफलता में बदल दिया। जनता को यह जानने का अधिकार है कि पैसा कहाँ गया, किसने निगरानी की और जवाबदेही किसकी तय हुई।

घाटों पर सुरक्षा व्यवस्था भी बेहद कमजोर है। आगरा के बल्केश्वर घाट सहित कई स्थानों पर न तो पर्याप्त लाइफगार्ड हैं, न गहराई के स्पष्ट संकेत, न मजबूत बैरियर और न ही आपातकालीन बचाव तंत्र। नाव संचालन में भी भारी लापरवाही है। क्षमता से अधिक यात्रियों को बैठाना आम बात है। फिटनेस सर्टिफिकेट और लाइफ जैकेट जैसे नियम केवल औपचारिकता बन चुके हैं।

रेत खनन ने स्थिति को और खतरनाक बना दिया है। अवैध खनन से नदी तल में गहरे गड्ढे और अदृश्य भंवर बन गए हैं। ऊपर से शांत दिखने वाला पानी अचानक किसी को निगल लेता है। यह केवल पर्यावरणीय अपराध नहीं, बल्कि सीधे-सीधे मानव जीवन से खिलवाड़ है।

सबसे बड़ी विफलता विभागों के बीच तालमेल की कमी है। जल शक्ति मंत्रालय, नगर निगम, विकास प्राधिकरण, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य सरकार :  सबकी जिम्मेदारियाँ अलग-अलग बंटी हैं, लेकिन समन्वय लगभग गायब है। हर हादसे के बाद फाइलें चलती हैं, बैठकें होती हैं, बयान दिए जाते हैं, फिर सब ठंडा पड़ जाता है।

न्यायालयों और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने समय-समय पर सख्त निर्देश दिए हैं। सीवेज रोकने, अतिक्रमण हटाने और नदी संरक्षण के आदेश जारी हुए। लेकिन अधिकतर आदेश कागज़ों तक सीमित रह गए। बिना सख्त निगरानी और जवाबदेही के आदेश केवल सरकारी फाइलों की शोभा बन जाते हैं।

अब केवल भाषणों से काम नहीं चलेगा। ठोस और तत्काल कार्रवाई की जरूरत है।

सबसे पहले, नदी में गिरने वाले सभी नालों को तत्काल ट्रीटमेंट प्लांट से जोड़ा जाए और बंद पड़े प्लांट 30 दिनों के भीतर चालू किए जाएँ। घाटों पर प्रशिक्षित लाइफगार्ड, गहराई संकेतक, चेतावनी बोर्ड और आपातकालीन बचाव व्यवस्था अनिवार्य हो। नाव संचालन पर सख्ती से नियम लागू किए जाएँ और हर नाव में लाइफ जैकेट अनिवार्य हो।

वृंदावन, मथुरा और आगरा की बाढ़ पट्टी में बने अवैध निर्माणों को चिन्हित कर पारदर्शी तरीके से हटाया जाए। अवैध रेत खनन पर तत्काल रोक लगे और दोषी अधिकारियों तथा माफिया पर आपराधिक कार्रवाई हो। यमुना में न्यूनतम जल प्रवाह सुनिश्चित करने के लिए जल प्रबंधन नीतियों की समीक्षा जरूरी है। सबसे महत्वपूर्ण, हर परियोजना का सार्वजनिक ऑडिट हो और उसकी प्रगति रिपोर्ट जनता के सामने रखी जाए।

ये माँगें कठोर जरूर हैं, लेकिन हालात उससे कहीं अधिक भयावह हैं। राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना कोई बदलाव संभव नहीं। जब तक प्रशासनिक अधिकारियों और राजनीतिक नेतृत्व की व्यक्तिगत जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक योजनाएँ केवल घोषणाओं में ही जीवित रहेंगी।

यमुना केवल एक नदी नहीं है। यह ब्रज की स्मृति, संस्कृति और जनजीवन की धड़कन है। इसके किनारे पीढ़ियाँ पली हैं। अगर यह नदी मरती है, तो केवल पर्यावरण नहीं मरता : समाज, संस्कृति और भविष्य भी घायल होते हैं।

कन्हा, महक, रिया और विक्की केवल चार नाम नहीं हैं। वे हमारी सामूहिक उदासीनता की कीमत हैं। केशी घाट और आगरा के हादसे चेतावनी हैं कि अब भी अगर हमने आँखें बंद रखीं, तो आने वाले वर्षों में ऐसी त्रासदियाँ और बढ़ेंगी।

सरकार के पास अभी भी अवसर है। पारदर्शिता दिखाई जाए, जवाबदेही तय की जाए और जनता को साझेदार बनाकर यमुना को पुनर्जीवित करने की गंभीर शुरुआत की जाए। नागरिकों को भी जागना होगा। सवाल पूछने होंगे। रिपोर्ट माँगनी होगी। स्थानीय निगरानी में भाग लेना होगा।

क्योंकि जब नदियाँ मरती हैं, तब सभ्यताएँ भी धीरे-धीरे दम तोड़ने लगती हैं। यमुना को बचाना केवल एक नदी को बचाना नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति, अपनी स्मृतियों और आने वाली पीढ़ियों को बचाना है।

आज भी समय है। फैसला हमें करना है : क्या हम यमुना को किस्मत के हवाले छोड़ देंगे, या समझदारी, संवेदनशीलता और कार्रवाई से उसका भविष्य बचाएँगे?


 


यमुना नदी में, सीवेज, मलवा, इंडस्ट्रियल वेस्ट और लाशें बह रही हैं, और सरकारी तंत्र मूक,  लाचार चश्मदीद बना खड़ा है

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

21 मई 2026

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12 मई 2026 की शाम आगरा के एक घाट पर जो हुआ, वह संयोग या दुर्भाग्य नहीं था। जन्मदिन मनाने आए छह युवा नदी में उतरे; दो घंटे तक बचाने की कोशिशें चलीं, पर चार बच्चों के शव निकले। पीड़ित परिवारों का शोक अपूरणीय है। वही यमुना, जिसके किनारे हमारी इतिहास‑कथाएँ, आरतियाँ और आस्थाएँ जुड़ी हैं, आज मौत की गवाही दे रही है। इस घटना के ठीक कुछ हफ्ते पहले वृंदावन के केशी घाट पर भी एक नाव पलटी थी, जिसमें 15‑16 तीर्थयात्रियों की मौत हुई, नाव में अधिक सवारियाँ, बिना लाइफ जैकेट के संचालन और निगरानी का अभाव मुख्य कारण बताया गया।

इन हादसों को केवल दुर्घटना कहना कानूनी और नैतिक दोनों तरह से हर्ज़ है। यह प्रणालीगत विफलता और व्यापक लापरवाही का परिणाम है, न सिर्फ स्थानीय प्रशासन की, बल्कि राज्य और केंद्रीय संस्थाओं की भी। जब नदी ही जहरीली है, संरक्षण का दायरा सिकुड़ चुका है और सुरक्षा मानक सिर्फ घोषणाओं में रह गए हैं, तब मानव जीवन का जोखिम बढ़ना स्वाभाविक है। सरकारों के वादों और खर्चों के बावजूद जमीन पर स्थितियाँ नहीं बदलीं।

यमुना की मौजूदा हालत समझने के लिए कुछ ठोस तथ्य देखें। यमुना की कुल लंबाई लगभग 1,376 किलोमीटर है और यह हिमालय की पिघलती चोटियों से उठकर उत्तर प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली होते हुए पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में बहती है। एनवायरनमेंटल मॉनिटर्स और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली के पास के हिस्से में कुल प्रदूषण का बहुत बड़ा हिस्सा उत्पन्न होता है। दिल्ली से प्रतिदिन करोड़ों लीटर सीवेज का रिसाव यमुना में होता रहा है; कई ट्रीटमेंट प्लांट हैं, पर पाइपलाइन अधूरी, प्लांट की क्षमता सीमित या संचालन ठप मिलती है। सीपीसीबी और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्टों में बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड और फीकल कॉलिफॉर्म के उच्च स्तर दर्ज हैं, जो नहाने के काबिल पानी से बहुत ऊपर हैं। उदाहरण के तौर पर दिल्ली के कुछ नापों में फीकल कॉलिफॉर्म हजारों से लेकर लाखों MPN प्रति 100 मिलीलीटर पाए गए, सुरक्षित मानक से कई गुना अधिक। ये आँकड़े सार्वजनिक रिपोर्टों और सर्वे रिपोर्टों में दर्ज हैं।

प्रदूषण दिल्ली से शुरू होकर आगरा, मथुरा और वृंदावन तक पहुँचता है। मथुरा और वृंदावन में धार्मिक गतिविधियों के चलते घाटों पर जनसैलाब होता है; वहीँ बिना उपचार के नाले सीधे नदी में गिरते हैं। आगरा में ताजमहल के पास यमुना का पानी झाग और गंदगी के कारण अक्सर चर्चा में रहता है। स्थानीय नागरिक और पर्यावरणविद यह कहते रहे हैं कि किसी ऐतिहासिक धरोहर के पास बहने वाली नदी का ऐसा हाल न सिर्फ पर्यटन के लिए नुकसानदेह है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा है।

अतिक्रमण और अवैध निर्माण समस्या को और बढ़ाते हैं। ड्रोन सर्वे और अन्य भू‑अवलोकन ने वृंदावन के बाढ़ पट्टी और किनारों पर सैकड़ों अवैध निर्माण दर्शाए हैं। 2025 के कुछ सर्वे में वृंदावन के बाढ़ क्षेत्र में कई सौ अवैध संरचनाएँ सामने आईं। जब नदी का प्राकृतिक दायरा सिकुड़ता है, बहाव बाधित होता है और जल का ठहराव बढ़ता है; इससे पानी का स्वच्छता स्तर गिरता है और प्लास्टिक, सीवेज व औद्योगिक अपशिष्ट का जमाव बढ़ता है। अतिक्रमण अक्सर स्थानीय शक्तिशाली वर्गों के संरक्षण में होता है, जिससे उचित कार्रवाई नहीं हो पाती।

सरकारी योजनाएँ और खर्च भी यहाँ संदिग्धता पैदा करते हैं। 1990 के दशक से अलग‑अलग योजनाएँ चलीं: यमुना एक्शन प्लान, राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन से जुड़े कार्यक्रम और अन्य परियोजनाएँ। अरबों रुपये खर्च किए जाने का दावा है, पर कई जगहों पर ट्रीटमेंट प्लांट अधूरी पाइपलाइन, बंद इकाइयाँ या अपर्याप्त संचालन के कारण प्रभावी नहीं रहे। इस असंगति का असर साफ दिखता है: निवेश जहाँ होना चाहिए था, वहाँ परिणाम कम दिखे। इससे नागरिकों में सवाल उठते हैं, वित्त कहाँ गया, परियोजनाओं की निगरानी और ऑडिट किसने की, जवाबदेही किसकी है।

जीवित निगरानी और आपदा प्रबंधन के अभाव ने कई मौतों को आम बना दिया है। आगरा के बल्केश्वर घाट जैसी जगहों पर घाट का डिजाइन, गहराई‑मार्किंग, बेरियर, लाइफगार्ड की नियुक्ति और आकस्मिक बचाव व्यवस्था की कमी थी। वाहन या नाव संचालन की मानक गतिविधियाँ: लाइफ जैकेट का अनिवार्य इस्तेमाल, नावों का फिटनेस सर्टिफिकेट, क्षमता नियंत्रण और सीसीटीवी निगरानी: इनका अनुपालन अक्सर नहीं किया जाता। रेत खनन ने नदी तल को असमान कर दिया है; अनियंत्रित खनन से तल में गहरे गड्ढे और भंवर बन गए हैं जो सतह से अप्रकट होते हैं और तैरने वाले लोगों के लिए जानलेवा सिद्ध होते हैं। इन सबका दायरा सिर्फ तकनीकी नहीं, बल्कि प्रशासनिक और कानूनी भी है।

प्रमुख समस्या कई विभागों के बीच समन्वय की कमी है। जल शक्ति मन्त्रालय, राज्य सरकार, नगर निगम, विकास प्राधिकरण और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड: ये सभी अलग जिम्मेदारियाँ निभाते हैं, पर अंतर्निहित तालमेल की कमी से कार्य अक्सर ढीला पड़ जाता है। यमुना जैसे पारिस्थितिक तंत्र को बचाने के लिए एक संयुक्त प्रशासनिक फ्रेमवर्क चाहिए, जिसमें समयबद्ध लक्ष्यों, पारदर्शी फंडिंग और सार्वजनिक ऑडिट का स्पष्ट तंत्र हो। राजनीति में इस मुद्दे का इस्तेमाल चुनावी वादों के लिए होता है, पर चुनावों के बाद दीर्घकालिक नीतियाँ और निगरानी गायब रहती है।

न्यायालयों और पर्यावरण ट्रिब्यूनलों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल और उच्च न्यायालय ने समय‑समय पर निर्देश जारी किए हैं: सीवेज ट्रीटमेंट बढ़ाने, अतिक्रमण हटाने और नदियों की बहाल व्यवस्था के आदेश दिए गए हैं। पर समस्या यह है कि कई बार ये आदेश प्रकृति में कागजी ही रह जाते हैं; आदेशों का पालन सुनिश्चित करने के लिए नियमित निगरानी, अनुशासनात्मक कार्रवाई और समय सीमा का पालन जरूरी है। बिना कठोर पालन के नोटिस भी रिक्त घोषणाएँ बनकर रह जाते हैं।

अब समय है मांगों का, न सिर्फ नारेबाजी का। यमुना और उससे जुड़े समुदायों की सुरक्षा और नदी‑पुनरुद्धार के लिए ठोस उपाय तत्काल लागू होने चाहिए। कुछ तत्काल और व्यावहारिक कदम जो लागू होने चाहिए, वे निम्न हैं:

1. नदी किनारे के सभी नालों और सीवरेज आउटलेट को प्राथमिकता के आधार पर ट्रीटमेंट प्लांट से जोड़ा जाए और 30 दिनों के भीतर बंद प्लांट को चालू किया जाए। इसके लिये केंद्रीय और राज्य स्तर पर संयुक्त निगरानी टीम गठित की जाए और सार्वजनिक रिपोर्टिंग अनिवार्य हो।

2. घाटों पर जीवनरक्षक सुविधाएँ अनिवार्य की जाएँ: प्रशिक्षित लाइफगार्ड, स्पष्ट गहराई‑मार्किंग, दृढ़ बेरियर और रियल‑टाइम धारा चेतावनी प्रणाली। घाटों का संरचनात्मक निरीक्षण रेलवे जैसी नियमितता से किया जाए।

3. नाव संचालन पर सख्त नियम लागू हों—प्रत्यक्ष क्षमता सीमाएँ, हर नाव पर लाइफ जैकेट अनिवार्य, फिटनेस सर्टिफिकेट अनिवार्य और उल्लंघन पर लाइसेंस रद्द एवं दंडात्मक कार्रवाई। यात्रियों की संख्या पर कठोर निगरानी रखी जाए।

4. वृंदावन‑मथुरा‑आगरा के बाढ़ पट्टी में पाए गए अवैध निर्माणों की स्वतः पहचान के लिए उपग्रह और ड्रोन सर्वे नियमित रूप से हो और अनुमत समयसीमा के भीतर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई पारदर्शी ढंग से की जाए। किसी भी तरह का राजनीतिक प्रोटेक्शन स्वीकार नहीं किया जाएगा।

5. रेत खनन पर तत्काल प्रतिबंध और जो अवैध खनन पाया जाए, उसके खिलाफ कड़ी आपराधिक और आर्थिक कार्रवाई की जाए। जिन अधिकारियों की मिलीभगत पाई जाए उनकी संपत्ति जब्त करने और मुकदमा चलाने जैसी रोक‑थाम की व्यवस्था लागू हो।

6. यमुना को पारिस्थितिक दृष्टि से सुदृढ़ करने के लिये न्यूनतम निर्बाध जलप्रवाह सुनिश्चित करने के उद्देश्य से जलप्रबंधन नीतियाँ लागू की जाएं। सहायक नदियों एवं धाराओं के बहाव को बहाल करने के लिए जल आवंटन और सिंचाई नीतियों में समन्वय अत्यावश्यक है।

7. सार्वजनिक पारदर्शिता और जवाबदेही के लिये हर परियोजना का आर्थिक ऑडिट सार्वजनिक किया जाए और परियोजना के समय‑समय पर प्रगति‑रिपोर्ट नागरिक मंचों पर उपलब्ध कराई जाए। कोई भी खर्च बिना स्वतंत्र ऑडिट के स्वीकृत नहीं किया जाए।

ये मांगें कठोर हैं, पर आवश्यक भी। राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना कोई भी नीति टिकाऊ नहीं होती। जब तक प्रशासनिक अधिकारियों और राजनीतिक नेतृत्व की व्यक्तिगत जवाबदेही तय नहीं की जाती, तब तक प्रक्रियाएँ अधूरी रहेंगी। जिन्हें जनता का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुना गया है, उन्हें उन्हें मिलने वाली जवाबदेही का बोझ वहन करना होगा।

यमुना सिर्फ पानी नहीं है; यह ब्रज की स्मृति है, संस्कृति है और जन‑जीवन का स्रोत है। यह हमारे इतिहास का वह धागा है जो पीढ़ियों से जुड़ा हुआ है। अगर हम इसे न बचाएंगे तो न केवल पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ेगा, बल्कि सामाजिक और आर्थिक तबाही भी गहरी होगी। बच्चों की हँसी खत्म नहीं हो सकती; किन्तु अगर नदी को बचाने के लिए हम आज कदम नहीं उठाएंगे, तो भविष्य में और अधिक प्राण जाएंगे।

कन्हा, महक, रिया और विक्की ; ये नाम सिर्फ चार परिवारों के सदस्यों के नहीं हैं; वे हमारी उदासीनता की वह तस्वीर हैं जिसे हम अब और नकार नहीं सकते। केशी घाट और आगरा के घाट की इन घटनाओं का अर्थ केवल व्यक्तिगत दुख नहीं है; यह चेतावनी है कि शासन और समाज ने मिलकर जो जिम्मेदारियाँ ठानी थीं, उन्हें पूरा करना अब जीवन और मृत्यु का प्रश्न बन गया है।

सरकार के पास अभी भी मौका है, कदम उठाइए, पारदर्शिता दिखाइए, और जनता के साथ साझेदारी में यमुना को पुनः जीवित कीजिए। और नागरिकों को भी जागृत होना होगा: सवाल पूछिए, रिपोर्ट माँगिए, स्थानीय निगरानी में भाग लीजिए। अगर नदियाँ मरती हैं तो हमारी सभ्यता का भी दम घुटने लगता है। यमुना बचाने का अर्थ सिर्फ नदी को नहीं बचाना है; यह अपने आप को, अपनी संस्कृति को और आने वाली पीढ़ियों को बचाने का काम है।

अगर आज हम इन मांगों को गंभीरता से लागू कर दें तो और मौतों को रोका जा सकता है। अगर नहीं तो इतिहास और जनता दोनों ही उन लोगों से हिसाब सवाल करेंगे जिन्होंने जानबूझकर आंखें बंद कर रखीं। यमुना को बचाना अब किसी दल विशेष का मुद्दा नहीं रह गया; यह हर नागरिक और हर संवेदनशील संस्थान की नैतिक आवश्यकता बन गया है।

यमुना की रक्षा की लड़ाई अभी बाकी है। और यह लड़ाई जितनी ज़रूरी है, उतनी ही अविलंब भी है। हमें चुनना होगा: किस्मत के हवाले कर देना, या समझदारी और कार्रवाई से अपने भविष्य को सुरक्षित करना।

 दोहरा मापदंड: भारत पर सख़्त, चीन पर नरम क्यों है पश्चिमी मीडिया?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

21 मई 2026

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मई 2026 में जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नॉर्वे दौरे पर गए, तो एक नॉर्वेजियन पत्रकार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस खत्म होने के बाद उनसे सवाल उछाल दिया। सवाल था :  भारत प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में नॉर्वे से बहुत नीचे क्यों है?

वीडियो वायरल हो गया। पश्चिमी मीडिया ने इसे भारत में लोकतंत्र के “गिरते स्तर” की मिसाल बना दिया।

लेकिन ज़रा ठहरिए। आख़िरी बार कब किसी पश्चिमी पत्रकार ने चीन के प्रेस फ्रीडम रिकॉर्ड पर इसी तरह सार्वजनिक तमाशा खड़ा किया था?

चीन उन्हीं सूचियों में सबसे नीचे बैठा है। फिर भी उसकी आलोचना वैसी सुर्खियां नहीं बनाती जैसी भारत की बनती हैं।

यहीं से दोहरे मापदंड की कहानी शुरू होती है। पश्चिमी मीडिया भारत की कमियों को अक्सर तेज़ रोशनी में दिखाता है।

सीएए को मुसलमानों के खिलाफ़ कदम बताया गया। किसान आंदोलन को “तानाशाही प्रवृत्ति” का सबूत कहा गया। कोविड की दूसरी लहर की भयावह तस्वीरें पूरी दुनिया में दिखाई गईं। चुनावों की कवरेज में “हिंदू राष्ट्रवाद” और बहुसंख्यकवाद पर लगातार सवाल उठे।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी पूछते हैं, "इन मुद्दों पर रिपोर्टिंग होना गलत नहीं है। पत्रकारिता का काम ही सवाल पूछना है। मगर सवाल यह है कि भारत के लिए इस्तेमाल होने वाला लहजा इतना कड़ा क्यों होता है, जबकि चीन के मामले में वही तीखापन अक्सर गायब दिखता है?"

चीन पर आरोप हैं कि उसने शिनजियांग में लाखों उइगर मुसलमानों को कैंपों में रखा। यह खबरें भी छपती हैं। लेकिन चीन को लेकर पश्चिमी मीडिया में वैसा लगातार नैरेटिव नहीं बनता कि “लोकतंत्र खतरे में है” या “सिस्टम टूट रहा है।”

क्यों?

क्योंकि दुनिया ने चीन से लोकतंत्र की उम्मीद ही नहीं की।

भारत लोकतांत्रिक देश है, इसलिए उससे ऊंचे आदर्शों की उम्मीद की जाती है। और जब वह उन आदर्शों पर पूरी तरह खरा नहीं उतरता, तो आलोचना कहीं ज्यादा कठोर हो जाती है।

शब्दों की राजनीति बहुत कुछ कहती है । मीडिया सिर्फ खबरों से नहीं, शब्दों से भी धारणा बनाता है, कहते हैं वरिष्ठ पत्रकार  जोज़फ।

भारत के लिए अक्सर शब्द सुनाई देते हैं ;  “बैकस्लाइडिंग”, “मेजॉरिटेरियन”, “हिंदू नेशनलिज्म”। हिंदू-मुस्लिम तनाव की रिपोर्टिंग में कई बार वही पुरानी औपनिवेशिक सोच झलकती है कि भारत एक बंटा हुआ, भावनात्मक और अव्यवस्थित समाज है।

दूसरी तरफ चीन के लिए “स्थिरता”, “कुशल प्रशासन” और “विकास” जैसे शब्द इस्तेमाल होते हैं। उसकी सख़्त सरकारी कार्रवाइयों को कभी-कभी “मजबूत शासन” कहकर पेश किया जाता है। आर्थिक विकास की तारीफ होती है, जबकि मानवाधिकार का मुद्दा पीछे छूट जाता है।

यह सिर्फ मीडिया बायस नहीं, इतिहास की परछाईं भी है।

ब्रिटिश औपनिवेशिक दौर में भारत को अक्सर अंधविश्वासी, अव्यवस्थित और “पश्चिमी मार्गदर्शन” का मोहताज बताकर शासन को जायज़ ठहराया गया था। आज वही सोच नए और अधिक परिष्कृत रूप में कई रिपोर्टों में दिखाई देती है।

खुलापन भी बनता है वजह; एक बड़ा कारण व्यावहारिक भी है।

भारत में प्रेस अपेक्षाकृत खुला है, आजाद है। विदेशी पत्रकार यहां घूम सकते हैं, लोगों से मिल सकते हैं, विवादित मुद्दों पर रिपोर्ट कर सकते हैं। इसलिए भारत की कमियां ज्यादा बाहर आती हैं।

चीन में विदेशी मीडिया पर सख़्त नियंत्रण है। वहां रिपोर्टिंग आसान नहीं। नतीजा यह कि कम खबरें बाहर निकलती हैं।

इसका मतलब यह नहीं कि भारत बदतर है। कई बार इसका मतलब सिर्फ इतना होता है कि भारत ज्यादा खुला समाज है।

पश्चिमी देशों के चीन से बड़े कारोबारी और रणनीतिक रिश्ते हैं। यह हक़ीक़त मीडिया के माहौल को भी प्रभावित करती है, चाहे खुलकर हो या परोक्ष रूप से।

चीन पर बहुत आक्रामक आलोचना कूटनीतिक तनाव बढ़ा सकती है।

भारत पर सवाल उठाना अपेक्षाकृत आसान है, क्योंकि भारत लोकतांत्रिक साझेदार माना जाता है और वहां आलोचना की कुछ गुंजाइश मौजूद है।

यह फर्क क्यों मायने रखता है

मीडिया की छवि सिर्फ अखबार तक सीमित नहीं रहती।

यह निवेशकों, नीति निर्माताओं और आम लोगों की सोच को प्रभावित करती है। व्यापार, विदेश नीति और वैश्विक जनमत पर इसका असर पड़ता है।

1.4 अरब लोगों का देश, जो करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकाल रहा है, दुनिया की सबसे बड़ी चुनावी प्रक्रिया चला रहा है और तेजी से टेक्नोलॉजी शक्ति बन रहा है ;  उसे अगर लगातार नकारात्मक चश्मे से दिखाया जाए, तो तस्वीर अधूरी बन जाती है।

अगर पश्चिमी मीडिया अपनी सारी नैतिक नाराज़गी सिर्फ खुले लोकतंत्रों पर खर्च कर देगा, तो बंद और कठोर व्यवस्थाओं पर जवाबदेही का दबाव कम हो जाएगा।

पश्चिमी न्यूज़रूम में भारत और ग्लोबल साउथ की आवाज़ों को ज्यादा जगह मिलनी चाहिए।

भारत की तुलना सिर्फ  पश्चिमी मॉडल से नहीं, बल्कि समान सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों वाले देशों से भी होनी चाहिए।

भारत में समस्याएं हैं। प्रेस फ्रीडम, सांप्रदायिक तनाव और राजनीतिक ध्रुवीकरण पर सवाल उठने चाहिए। लेकिन वही कसौटी चीन समेत हर देश पर भी बराबरी से लागू होनी चाहिए।

फिलहाल ऐसा नहीं दिखता।

और भारत तथा चीन की कवरेज में यही फर्क पश्चिमी मीडिया के नजरिए के बारे में उतना ही बताता है, जितना इन दोनों देशों के बारे में।


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Tuesday, May 19, 2026

 ज्योतिष, विज्ञान है या कला?

सत्ता के सौदागरों का सबसे बड़ा “कॉस्मिक झांसा”

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बृज खंडेलवाल द्वारा

20 मई 2026

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तमिलनाडु के नए मुख्यमंत्री C. जोसफ विजय ने हाल ही में अपने निजी ज्योतिषी को मुख्यमंत्री कार्यालय में OSD नियुक्त कर दिया। खबर जंगल की आग की तरह फैली। कहा गया कि इसी ज्योतिषी ने वर्षों पहले “भविष्यवाणी” की थी कि विजय एक दिन सत्ता की कुर्सी तक पहुंचेंगे। कुछ ही घंटों में राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई। सहयोगी दलों ने सवाल उठाए। तर्कवाद, वैज्ञानिक सोच और संविधान की दुहाई दी जाने लगी। आखिरकार सरकार को कदम पीछे खींचना पड़ा।

लेकिन असली सवाल अब भी हवा में गूंज रहा है। क्या लोकतंत्र  ग्रहों की चाल से चलेगा? क्या करोड़ों लोगों की किस्मत शनि, राहु और मंगल तय करेंगे? या फिर यह डर, असुरक्षा और सत्ता का वही पुराना कारोबार है, जिसे हर दौर में नया रंग-रोगन लगाकर बेच दिया जाता है?

भारत में सत्ता और ज्योतिष का रिश्ता नया नहीं है। सदियों से राजा-महाराजा युद्ध से पहले राज ज्योतिषियों से सलाह लेते रहे। ज्यादातर लोग कुंडलियों को मिलकर शादियां करते हैं, फिर भी बिगड़ते रिश्तों की संख्या बढ़ रही है।  व्यापारी लंबी यात्राओं से पहले कुंडली दिखाते थे।  सुबह की चाय के साथ राशिफल पढ़ना लगभग सामाजिक आदत बन चुका है। मानो आसमान से हर दिन कोई गुप्त फरमान उतरता हो।

लेकिन चुनाव आते ही यह कारोबार अचानक रॉकेट की रफ्तार पकड़ लेता है। टीवी स्टूडियो किसी “कॉस्मिक कंट्रोल रूम” में बदल जाते हैं। हर चैनल पर कोई “सितारों का विशेषज्ञ” मौजूद रहता है। कोई शनि देखकर सरकार गिरा देता है। कोई राहु के सहारे चुनाव जिता देता है। कोई बुध की चाल से गठबंधन की उम्र बता देता है। लोकतंत्र कम, ग्रहों का रियलिटी शो ज्यादा दिखने लगता है।

राजनीतिक दल भी इस तमाशे में पीछे नहीं रहते। उम्मीदवार “शुभ मुहूर्त” देखकर नामांकन भरते हैं। रैलियों की तारीखें ग्रहों की चाल से तय होती हैं। पार्टी दफ्तरों में रत्न बेचने वाले, अंकशास्त्री और भविष्यवक्ता ऐसे घूमते हैं, जैसे लोकतंत्र नहीं, कोई तांत्रिक मेला लगा हो।

असल में चुनाव डर और बेचैनी का मौसम होते हैं। नेता सत्ता के लिए बेताब रहते हैं। टीवी चैनलों को टीआरपी चाहिए। जनता महंगाई, बेरोजगारी और तनाव से परेशान रहती है। ऐसे माहौल में  लोग तर्क नहीं, तसल्ली खोजने लगते हैं।

मीडिया की भूमिका भी कम दिलचस्प नहीं। कई चैनल सेलिब्रिटी ज्योतिषियों को वैज्ञानिकों जैसी गंभीरता से पेश करते हैं। कोई आर्थिक तबाही की भविष्यवाणी करता है। कोई राजनीतिक भूचाल की चेतावनी देता है। कोई “देश पर संकट” का ऐलान कर देता है। अगर कुछ नहीं होता, तो कोई जवाबदेही नहीं। अगले हफ्ते वही चेहरा नई चमक के साथ फिर स्क्रीन पर लौट आता है।

सबसे खतरनाक वे “कयामत वाले बाबा” हैं, जो डर बेचते हैं। वे ग्रहों के बहाने युद्ध, महामारी, बर्बादी और राष्ट्रीय संकट की बातें फैलाते हैं। डर हमेशा बिकता है। ठंडी समझदारी नहीं।

भारत की आध्यात्मिक परंपरा बेहद समृद्ध रही है। यहां दर्शन, चिंतन और आत्ममंथन की लंबी विरासत है। लेकिन टीवी पर परोसी जा रही अंधभक्ति और सनसनीखेज भविष्यवाणियों पर आंख मूंदकर भरोसा करना समाज की तार्किक सोच को कमजोर कर रहा है। लोकतंत्र को जागरूक नागरिक चाहिए, डरे हुए राशिफल भक्त नहीं।

सच यह है कि ज्योतिष हर बड़े वैज्ञानिक परीक्षण में कमजोर साबित हुआ है। दावा किया जाता है कि ग्रह-नक्षत्र इंसान के स्वभाव, रिश्तों और भविष्य को प्रभावित करते हैं। मगर आज तक कोई वैज्ञानिक यह नहीं समझा पाया कि करोड़ों किलोमीटर दूर मौजूद मंगल या शनि किसी की नौकरी, शादी या चुनावी किस्मत कैसे तय कर सकते हैं।

भौतिक विज्ञान के अनुसार ग्रहों का गुरुत्वाकर्षण असर तो होता है, लेकिन वह इतना सूक्ष्म है कि जन्म के समय पास खड़े अस्पताल के उपकरणों का प्रभाव कई बार उससे अधिक हो सकता है। फिर भी लोग विश्वास क्यों करते हैं?

क्योंकि ज्योतिष का धंधा विज्ञान से ज्यादा मनोविज्ञान पर चलता है। इंसान स्वभाव से पैटर्न खोजता है। हम अव्यवस्था में अर्थ तलाशते हैं। मुश्किल वक्त में उम्मीद और सहारा चाहते हैं। ज्योतिष वही देता है, रहस्यमयी शब्दों और चमकीली भाषा में।

राशिफल अक्सर इतने धुंधले होते हैं कि हर किसी पर फिट बैठ जाएं।

“आज कोई चुनौती आ सकती है।”

“पुराना संबंध फिर सामने आ सकता है।”

“धन के मामलों में सावधानी रखें।”

ऐसी बातें लगभग हर इंसान पर लागू हो सकती हैं। मनोविज्ञान में इसे “बार्नम इफेक्ट” कहा जाता है, जहां सामान्य बातें भी हमें अपनी निजी सच्चाई लगने लगती हैं।

1985 में वैज्ञानिक पत्रिका Nature में प्रकाशित एक चर्चित प्रयोग और बाद के कई अध्ययनों ने दिखाया कि पेशेवर ज्योतिषियों की भविष्यवाणियां अनुमान से बेहतर नहीं थीं। अलग-अलग ज्योतिषी एक ही कुंडली की अलग व्याख्या करते मिले।  कई चर्चित ज्योतिषियों की भविष्यवाणियां बार-बार गलत साबित हुईं। सही निकले कुछ तुक्कों को खूब प्रचार मिलता है, लेकिन असफल भविष्यवाणियां जल्दी भुला दी जाती हैं।

सुबह चाय के साथ राशिफल पढ़ लेना कोई गुनाह नहीं। समस्या तब शुरू होती है जब लोग जिंदगी के बड़े फैसले तर्क और जानकारी की जगह ग्रहों के भरोसे लेने लगते हैं। कोई व्यापारी निवेश टाल देता है क्योंकि “बुध वक्री” है। कोई परिवार अच्छा रिश्ता ठुकरा देता है क्योंकि कुंडली नहीं मिली। कोई मरीज इलाज छोड़ देता है क्योंकि “शनि भारी” है। कोई नेता जनता की जरूरत नहीं, ज्योतिषी की सलाह सुनने लगता है।

रात का आसमान बेहद खूबसूरत है। तारों को देखकर हैरत होती है। ग्रह कल्पना को उड़ान देते हैं। लेकिन खूबसूरती सबूत नहीं होती। रहस्य हमेशा सच नहीं होता।


Sunday, May 17, 2026

 आगरा जल त्रासदी: 21 मई 1993

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अब भी नहीं सीखे सबक: अगली जल त्रासदी से पहले क्या भारत जागेगा?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

19 मई 2026

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21 मई 1993 को आगरा की पानी की टोंटियों से मौत बह निकली थी।

घटिया, खटीक पाड़ा और मंडी सईद खान की तंग गलियों में लोगों ने रोज़ की तरह वाटर वर्क्स का पानी पिया। कुछ ही घंटों में घरों में अफरा-तफरी मच गई। बच्चों को उल्टियाँ और तेज़ बुखार होने लगा। पूरे परिवार अस्पतालों की तरफ भागे। 200 से ज़्यादा लोग बुरी तरह बीमार पड़े। दूषित पानी पीने से 21 लोगों की जान चली गई।

ग़ुस्सा बहुत था। वादे भी हुए। अफसरों ने जांच और जवाबदेही की बातें कीं। लेकिन वक्त बीतता गया और शोर खामोशी में बदल गया। किसी को सचमुच सज़ा नहीं मिली। पीड़ित परिवार आज भी जवाब तलाश रहे हैं। गीता देवी जैसी महिलाएं, जिन्होंने इस हादसे में अपना पति खोया, आज भी कहती हैं कि गंदा पानी पाइपलाइनों से बहता रहता है।

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यह त्रासदी सिर्फ गंदे पानी की नहीं थी। इसने भारत की पानी प्रबंधन, शहरों की योजना और सरकारी जवाबदेही की पुरानी लापरवाही को नंगा कर दिया। सिस्टम आगे बढ़ गया, मगर सबक पीछे छूट गया।

अब 2026 में फिर एक खतरे की घंटी बज रही है। सवाल फिर डरावनी शक्ल में सामने खड़ा है। क्या हमने कुछ बदला भी है?

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का आसमान पहले से थका हुआ दिखने लगा है। तपती गर्मी में धरती जगह-जगह फट रही है। गांवों के तालाब अब कीचड़ भरे गड्ढों जैसे लगते हैं। भैंसें सिकुड़ते पानी में चुपचाप खड़ी मक्खियां उड़ाती रहती हैं। किसान दूर आसमान को ऐसे देखते हैं जैसे कोई अधूरा वादा लौटने वाला हो।

यमुना भी अब थकी हुई लगती है। कई जगह नदी एक पतली, संघर्ष करती धारा में बदल गई है। कई इलाकों में भूजल स्तर 300 फीट से नीचे चला गया है। हैंडपंप हांफ रहे हैं। बोरवेल हर साल और गहरे खोदे जा रहे हैं।

अब मौसम विभाग की चेतावनी ने बेचैनी बढ़ा दी है।

भारतीय मौसम विभाग ने कहा है कि 2026 का दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से कम रह सकता है। अनुमान है कि बारिश औसत का लगभग 92 प्रतिशत ही होगी। मौसम वैज्ञानिक इसके पीछे प्रशांत महासागर में मजबूत होते एल नीनो प्रभाव को जिम्मेदार मान रहे हैं। यही असर भारत में मानसून को कमजोर करता है और सूखे जैसे हालात पैदा करता है।

करोड़ों भारतीयों के लिए यह सिर्फ मौसम की खबर नहीं, बल्कि आर्थिक खतरे की घंटी है।

चाय की दुकानों, अनाज मंडियों और गांव की चौपालों पर बातचीत का रंग बदल चुका है। किसान अब मुनाफे की नहीं, बचने की बात कर रहे हैं। डीजल महंगा हो रहा है। नहरें सूखी पड़ी हैं। पशुओं का चारा महंगा होता जा रहा है। गर्म हवा में बेचैनी तैर रही है।

आगरा के पास एक बुजुर्ग किसान माथे का पसीना पोंछते हुए कहता है, “अगर जुलाई सूखी निकल गई, तो हम खत्म हो जाएंगे।”

भारत आज भी बारिश पर खतरनाक हद तक निर्भर है। देश की सालाना बारिश का 70 से 80 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ चार मानसूनी महीनों में आता है। आधे से ज्यादा खेत अब भी सिंचाई नहीं, बल्कि आसमान की मेहरबानी पर टिके हैं। एक कमजोर मानसून फसल बर्बादी, महंगाई, बेरोजगारी और गांवों की बदहाली ला सकता है।

लेकिन असली खतरा सिर्फ कम बारिश नहीं, बेतरतीब बारिश है।

एक जिला डूब सकता है, दूसरा प्यासा रह सकता है। देर से आने वाला मानसून, अचानक बादल फटना या लंबे सूखे दौर, कई बार पूरे सूखे से ज्यादा नुकसान करते हैं। खेती को कमी से ज्यादा अनिश्चितता डराती है।

फिर भी भारत हर मानसून के पहले लगभग बिना तैयारी के खड़ा मिलता है।

नदियां गाद से भरी पड़ी हैं। झीलें और तालाब अतिक्रमण, कूड़े और कंक्रीट के नीचे गायब हो चुके हैं। गांवों की जीवनरेखा रहे पारंपरिक जल स्रोत दशकों से उपेक्षित पड़े हैं। वर्षा जल संचयन अब ज्यादातर भाषणों, सरकारी फाइलों और चमकदार सेमिनारों के बैनरों तक सीमित है।

विडंबना देखिए।

हर मानसून में शहर कुछ घंटों की बारिश में डूब जाते हैं। सड़कें तालाब बन जाती हैं। पानी नालों में बहाकर बर्बाद कर दिया जाता है। फिर कुछ महीनों बाद वही शहर टैंकरों के पानी पर निर्भर हो जाते हैं। कुदरत दिल खोलकर देती है, मगर बदइंतजामी सब लूट लेती है।

उत्तर भारत का भूजल संकट अब खामोश खतरे में बदल चुका है। जरूरत से ज्यादा दोहन, कमजोर रिचार्ज सिस्टम और घटती बारिश ने जमीन के नीचे इमरजेंसी पैदा कर दी है। धरती को जितनी तेजी से खाली किया जा रहा है, उतनी तेजी से वह भर नहीं पा रही।

हल कोई रहस्य नहीं हैं। और नामुमकिन भी नहीं।

नहरों, जलाशयों और नदियों की तुरंत सफाई और गाद निकासी होनी चाहिए। गांवों के तालाब बचाए और दोबारा जिंदा किए जाएं। शहरों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग अनिवार्य हो। किसानों को ड्रिप सिंचाई और सूखा सहने वाली फसलों के लिए मदद मिले। मनरेगा जैसी योजनाओं का इस्तेमाल जल संरक्षण के कामों में कहीं बेहतर तरीके से हो सकता है।

सरकारें “वॉर फुटिंग” की बातें करती हैं, मगर हजारों गांवों में बुनियादी जल ढांचा टूटा या गायब है। बड़ी घोषणाएं सुर्खियां बनती हैं, जबकि जमीन पर रिसती पाइपलाइनें, सूखे हैंडपंप और मरते तालाब ही हकीकत बयान करते हैं।

आगरा के यमुना घाटों पर अच्छी बारिश के लिए विशेष प्रार्थनाएं शुरू हो चुकी हैं। आस्था मुश्किल समय में हौसला देती है। मगर सिर्फ दुआएं भूजल नहीं भर सकतीं, नहरें नहीं सुधार सकतीं और गंदी पाइपलाइनों को साफ नहीं कर सकतीं।

विज्ञान हमें पहले ही चेतावनी दे चुका है। अनुभव भी चेता चुका है। इतिहास भी अपना सबक दे चुका है।

1993 की आगरा जल त्रासदी को भारत की जल सुरक्षा और प्रशासनिक सोच बदल देनी चाहिए थी। लेकिन वह भी सरकारी बेरुखी की धूल में दबा एक भूला हुआ अध्याय बन गई।

बादल अभी दूर हैं। मगर डर पहले ही पहुंच चुका है।

2026 की असली परीक्षा सिर्फ बारिश की नहीं होगी। यह याददाश्त, शासन और जिम्मेदारी की परीक्षा होगी। जो देश अपनी जल त्रासदियों से सबक नहीं सीखता, वह उन्हें बार-बार दोहराने के लिए मजबूर हो जाता है। और हर बार इंसानी कीमत पहले से ज्यादा भारी होती है।

 तिलचट्टा, परजीवी.......

शब्दों की मर्यादा और अदालतों की गरिमा

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मान भी लें कि कुछ गलत एलिमेंट्स मीडिया में दाखिल हो चुके हैं, और कई एक्टिविस्ट्स सूचनाधिकार का दुरुपयोग करते हैं, तो क्या समूची बिरादरी को कटघरे में खड़ा करना उचित है? वकालत में, डाक्टरी में, न्यायिक व्यवस्था में, राजनीति में, सभी जगह काली भेड़ें अमर्यादित कार्य कर रही हैं, लेकिन क्या पूरा सिस्टम दोषी है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

18 मई 2026

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अदालतों की इमारतें सिर्फ पत्थर और दीवारों से नहीं बनतीं। उनका असली आधार जनता का भरोसा होता है। इसलिए जब न्यायपालिका जैसे सर्वोच्च संवैधानिक मंचों से कठोर शब्द निकलते हैं, तो वे सिर्फ एक टिप्पणी नहीं रहते, समाज के लिए एक व्यापक संदेश बन जाते हैं। 

हाल में “तिलचट्टे” और “परजीवी” जैसे शब्दों के इस्तेमाल ने एक नई बहस को उकसाया है।

15 मई 2026 को वरिष्ठ अधिवक्ता पदनाम से जुड़ी सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने उन लोगों पर चिंता जताई, जो वैध योग्यता या पेशेवर क्षमता के बिना मीडिया, सोशल मीडिया और आरटीआई एक्टिविज्म के जरिए संस्थाओं पर लगातार हमला करते हैं। उन्होंने कुछ तत्वों के लिए “तिलचट्टे” और “परजीवी” जैसे शब्दों का प्रयोग किया। 

हालांकि, बाद में उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणी पूरे युवावर्ग या सभी एक्टिविस्टों के लिए नहीं थी, बल्कि उन लोगों के लिए थी जो गलत तरीकों से व्यवस्था का दुरुपयोग करते हैं। यह स्पष्टीकरण जरूरी था और उसका स्वागत होना चाहिए।

लेकिन इसके बावजूद एक असहज सवाल बना रहता है। क्या इतनी तीखी भाषा जरूरी थी?

भारत का युवा पहले ही भारी दबाव में जी रहा है। बेरोजगारी बढ़ रही है। प्रतियोगिता लगातार कठिन होती जा रही है। लाखों पढ़े-लिखे युवा नौकरी, अवसर और पहचान की तलाश में भटक रहे हैं। ऐसे माहौल में जब ऊंचे संवैधानिक पदों से व्यापक टिप्पणियां आती हैं, तो कई लोगों को लगता है कि उनकी निराशा और संघर्ष को समझने के बजाय उनका मजाक बनाया जा रहा है। लोकतंत्र में असहमति रखने वाला हर व्यक्ति दुश्मन नहीं होता।

यह भी उतना ही सच है कि मीडिया, सोशल मीडिया और आरटीआई का दुरुपयोग हुआ है। कुछ लोग व्यक्तिगत एजेंडा चलाते हैं। कुछ यूट्यूब चैनल सनसनी बेचते हैं। कुछ लोग आरटीआई को सूचना के अधिकार की जगह निजी बदले का हथियार बना देते हैं। अदालतों पर भी कई बार बिना तथ्यों के आरोप लगाए जाते हैं। सोशल मीडिया पर न्यायपालिका के खिलाफ फर्जी अभियान चलाए जाते हैं। यह सब चिंता का विषय है।

मीडिया ट्रायल के उदाहरण हमारे सामने हैं। जेसिका लाल हत्याकांड, आरुषि तलवार मामला और सुशांत सिंह राजपूत केस में टीवी स्टूडियो अदालत से पहले फैसले सुनाने लगे थे। चीखती बहसों और सनसनीखेज रिपोर्टिंग ने निष्पक्ष सुनवाई पर असर डाला। सुप्रीम कोर्ट खुद कई बार मीडिया को चेतावनी दे चुका है कि sub-judice मामलों में संयम जरूरी है।

इसी तरह अदालतों ने आरटीआई के दुरुपयोग पर भी चिंता जताई है। कई मामलों में अधिकारियों ने कहा कि निरर्थक और बार-बार दाखिल आरटीआई आवेदन कामकाज को प्रभावित करते हैं। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी कुछ मामलों में माना कि बदले की भावना से डाली गई आरटीआई व्यवस्था में “fear and paralysis” पैदा करती हैं। यह चिंता पूरी तरह गलत नहीं कही जा सकती।

लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं: "इसी आरटीआई कानून ने भ्रष्टाचार के कई बड़े मामलों को उजागर किया। इसी ने आम नागरिक को सवाल पूछने की ताकत दी। कई स्वतंत्र पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सत्ता के दुरुपयोग को सामने लाने का साहस दिखाया। लोकतंत्र में असहज सवाल पूछना अपराध नहीं होना चाहिए।"

समस्या यह है कि आज हर आलोचना को दुश्मनी और हर सवाल को षड्यंत्र मान लेने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। यही प्रवृत्ति संस्थाओं और जनता के बीच दूरी पैदा करती है। अदालतों की ताकत सिर्फ अवमानना की शक्ति में नहीं, बल्कि जनता के नैतिक विश्वास में होती है।

एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि अदालत की गरिमा बनाए रखने का सबसे अच्छा तरीका उसके फैसलों की गुणवत्ता और न्यायपूर्ण व्यवहार है। यह बात आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। बड़े पदों पर बैठे लोगों के शब्दों में कठोरता नहीं, संतुलन ज्यादा दिखाई देना चाहिए।

न्यायिक स्वतंत्रता लोकतंत्र की रीढ़ है और उसकी रक्षा हर हाल में होनी चाहिए। लेकिन सम्मान और रचनात्मक आलोचना एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। दोनों साथ-साथ चल सकते हैं।

एक विविध, बेचैन और तनावग्रस्त समाज में अदालतों की भूमिका सिर्फ कानून लागू करने की नहीं, भरोसा पैदा करने की भी है। इसलिए न्यायपालिका से निकले शब्द ऐसे होने चाहिए जो लोगों को जोड़ें, तोड़ें नहीं। अदालतों की असली ताकत डर पैदा करने में नहीं, बल्कि न्याय और संवेदनशीलता के साथ विश्वास कायम करने में है।