Saturday, August 15, 2026

 आंदोलन नहीं, आवेदन करो

बेरोजगारों की कतार: इनकी फिक्र किसे है?  

परिभाषाएं बदलीं, समस्या नहीं

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बृज खंडेलवाल  द्वारा 

16 अगस्त 2026

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पचास साल पहले बेरोजगार लोग एम्प्लॉयमेंट एक्सचेंज  के बाहर खड़े होते थे। आज वे कोचिंग सेंटरों, भर्ती वेबसाइटों और परीक्षा पोर्टलों के सामने खड़े हैं। जगह बदल गई है। इंतजार वही है। जॉब नहीं मिले, एम्प्लॉयमेंट news मिला।

तब कुछ क्लर्कों की नौकरियों के लिए हजारों आवेदन आते थे। आज भी हजारों,  अक्सर लाखों, उम्मीदवार कुछ सौ सरकारी पदों के लिए भिड़ते हैं। ग्रेजुएट चपरासी की नौकरी के लिए आवेदन करता है। पोस्ट ग्रेजुएट क्लर्क बनने की दौड़ में शामिल होता है। इंजीनियर ऐसी परीक्षा की तैयारी करता है जिसका उसके ज्ञान से कोई लेना-देना नहीं।

शिक्षा बढ़ी है। रोजगार उतनी तेजी से नहीं बढ़ा। और इन दोनों के बीच भारतीय युवा खड़ा है; एक हाथ में डिग्री और दूसरे में आवेदन-पत्र लेकर।


पुराना रोजगार कार्यालय अब इतिहास बन चुका है। उसकी जगह स्मार्टफोन ने ले ली है। युवा नौकरी पोर्टल पर रजिस्टर करता है, भर्ती ऐप डाउनलोड करता है, रिज्यूमे अपलोड करता है। रिजेक्शन भी अब डिजिटल हो गया है। इसे भी प्रगति ही कहिए।


सरकारी आंकड़ों में बेरोजगारी बेहतर दिखती है। लेकिन औसत आंकड़े बहुत कुछ छिपा लेते हैं। युवाओं में बेरोजगारी कहीं ज्यादा है। पढ़े-लिखे युवाओं के सामने समस्या और भी पेचीदा है।


मामला अब सिर्फ बेरोजगारी का नहीं। कम रोजगार, अधूरा रोजगार और अपनी योग्यता से नीचे का रोजगार भी बड़ा सवाल है। कोई काम कर रहा है, लेकिन कमाई इतनी नहीं कि अपने पैरों पर खड़ा हो सके। कोई नौकरी में है, लेकिन कल की गारंटी नहीं। कोई सालों से प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा है और परीक्षा बार-बार टल जाती है। भारतीय युवा ने इंतजार करने में शायद पीएचडी कर ली है।


भारत में सरकारी नौकरी का आकर्षण किसी धार्मिक आस्था से कम नहीं। नौकरी पक्की। इज्जत पक्की। छुट्टियां पक्की। भविष्य की चिंता कुछ कम। इसलिए 500 पदों पर लाखों आवेदन आ जाते हैं।


क्योंकि निजी नौकरी सिर्फ रोजगार देती है। सरकारी नौकरी रोजगार के साथ प्रतिष्ठा भी देती है। माता-पिता आज भी कहते हैं: “पहले सरकारी नौकरी की कोशिश करो।” मानो नियुक्ति-पत्र खानदानी विरासत हो।


युवा मामूली निजी नौकरी छोड़कर सरकारी परीक्षा की तैयारी में कई साल लगा देता है। उम्र बढ़ती है। प्रयास खत्म होते जाते हैं। एक दिन नौकरी की तैयारी ही उसका सबसे स्थायी रोजगार बन जाती है।


भारत ने करोड़ों पढ़े-लिखे युवाओं की फौज तैयार की है। डिग्रियां बढ़ीं। कॉलेज बढ़े। कोचिंग सेंटर और तेजी से बढ़े। हर कोई यूपीएससी, एसएससी, बैंकिंग, रेलवे, पुलिस या शिक्षक भर्ती की तैयारी कर रहा है।कई उम्मीदवार वर्षों लगा देते हैं ऐसी परीक्षाओं में, जहां पद ऊंट के मुंह में जीरा हैं।

कोचिंग उद्योग ने शानदार मॉडल खोज लिया है:  उम्मीद मत छोड़िए। फेल हुए? “अगली बार कोशिश कीजिए।”  फिर फेल? “रणनीति बदलिए।”  फिर भी फेल? “सफलता बस आने वाली है।”  सफलता जरूर आती है; अक्सर कोचिंग बेचने वाले की।

डिग्री नौकरी नहीं है। शिक्षा व्यवस्था की बड़ी विडंबना यह है कि उसने युवाओं को परीक्षा पास करना सिखाया है, समस्या हल करना नहीं। बच्चा परिभाषाएं याद करता है, उत्तर रटता है, प्रमाणपत्र जमा करता है। फिर कंपनी पूछती है: “आप बात कर सकते हैं? टीम के साथ काम कर सकते हैं? व्यावहारिक समस्या हल कर सकते हैं?”

सन्नाटा।


फिर गिग इकोनॉमी आई। कहा गया,मोबाइल उठाइए और डिलीवरी कीजिए, गाड़ी चलाइए, फ्रीलांस कीजिए। खूबी है लचीलापन। दिक्कत यह है कि लचीली आमदनी इतनी लचीली होती है कि अगले महीने का भरोसा नहीं रहता।


तकनीक ने नए अवसर पैदा किए हैं। उसने असुरक्षित रोजगार के लिए नई शब्दावली भी दी है। पहले अस्थायी या दिहाड़ी कहते थे। अब “गिग वर्क” कहते हैं। नाम आधुनिक हो गया। अनिश्चितता उतनी नहीं।


जब युवा नौकरियों के लिए संघर्ष सीख ही रहा था, एआई मैदान में उतर आया। नई नौकरियां पैदा करेगा, उत्पादकता बढ़ाएगा। लेकिन कई दोहराव वाले काम भी निगल सकता है।युवा अक्सर पहली सीढ़ी से शुरुआत करता है। वहीं अनुभव मिलता है। अगर एआई ने पहली सीढ़ी हटा दी तो ऊपर कौन पहुंचेगा?

कल के युवा को डिग्री, कौशल और एआई को सही आदेश देने की कला; तीनों चाहिए।


रोजगार की कहानी महिलाओं के बिना अधूरी है। शिक्षा और भागीदारी बढ़ी है, फिर भी बड़ा अंतर बना हुआ है। बाधाएं पुरानी हैं, बिना वेतन वाला घर का काम, सुरक्षा, बच्चों की देखभाल, सामाजिक दबाव।

विडंबना देखिए। हम कहते हैं: लड़कियों को पढ़ाओ। फिर पूछते हैं; नौकरी क्यों करनी है? हम कहते हैं; आत्मनिर्भर बनाओ। फिर पूछते हैं; घर कौन संभालेगा।


रोजगार योजनाओं की कमी नहीं: कौशल विकास, स्वरोजगार, उद्यमिता, अप्रेंटिसशिप, ग्रामीण रोजगार, ऋण, प्रशिक्षण, पोर्टल। कभी-कभी लगता है हर चीज के लिए योजना है, बस उसे सफल बनाने की योजना नहीं।

असली सवाल सीधा होना चाहिए: कितने लोगों को अच्छी नौकरी मिली? प्रशिक्षण और प्रमाणपत्र नहीं। स्थायी और सम्मानजनक रोजगार गिनिए। वहीं असली हिसाब होगा।


ग्रामीण बेरोजगारी ने रूप बदल लिया है। खेती सबको रोजगार नहीं दे सकती। युवा गांव छोड़कर शहर जा रहे हैं। सपने लेकर आते हैं। शहर किराया और ट्रैफिक का बिल थमा देता है।


प्रवास बुरा नहीं। मजबूरी में किया गया पलायन अलग बात है। युवा शहर इसलिए जाए कि वहां अवसर हैं; इसलिए नहीं कि गांव में कुछ बचा ही नहीं है। अगर गांव युवाओं को खो दें और शहर सम्मानजनक काम न दे पाएं, तो दोनों जगह हार होगी।


सरकारें योजनाएं घोषित करती हैं। विश्वविद्यालय डिग्रियां बांटते हैं। कंपनियां कौशल मांगती हैं। कोचिंग सेंटर उम्मीद बेचते हैं। माता-पिता फीस भरते हैं। युवा आवेदन करता रहता है।

भारत को एक और नारा नहीं, ईमानदार रोजगार नीति चाहिए। श्रम-प्रधान उद्योग बढ़ाने होंगे। अप्रेंटिसशिप मजबूत करनी होगी। व्यावसायिक शिक्षा बेहतर बनानी होगी। छोटे कारोबार को बढ़ने देना होगा। महिलाओं के लिए सुरक्षित रोजगार बढ़ाने होंगे।

सबसे जरूरी, प्रशिक्षण की संख्या नहीं, नौकरी की संख्या गिननी होगी। प्रमाणपत्र से किराया नहीं भरता। पोर्टल से घर नहीं चलता।

नौकरी मांगने वाला युवा बहुत बड़ी मांग नहीं कर रहा। वह चाहता है: एक काम, उचित वेतन और थोड़ी इज्जत।

कतार अब डिजिटल हो गई है। आवेदन एक क्लिक में चला जाता है। रिज्यूमे एआई बना देता है। लेकिन सवाल आज भी इंसानी है; जब एक पढ़ा-लिखा भारतीय युवा नौकरी मांगते हुए दरवाजे पर दस्तक देता है, तो दरवाजा खोलने की जिम्मेदारी किसकी है?  और अगर कोई दरवाजा नहीं खोलता, तो वह दस्तक कब तक देता रहेगा?

 लाल किले से मोदी का संदेश: आत्मनिर्भर भारत, युवा शक्ति और विकसित भारत

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

15 अगस्त 2026

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भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किला देशभक्ति के जज़्बे से सराबोर था। सेना के बैंड ने वंदे मातरम् की धुन छेड़ी और उसके बाद स्वदेशी 21 तोपों की सलामी दी गई। तिरंगे की छांव में Mi-17 हेलीकॉप्टरों ने पुष्पवर्षा की। ज्ञानपथ पर एनसीसी कैडेट और युवा स्वयंसेवक मौजूद थे। माहौल गंभीर भी था और उल्लासपूर्ण भी। हर तरफ राष्ट्रगौरव और विकसित भारत का संकल्प दिखाई दे रहा था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2026 को लाल किले से दिए अपने भाषण में मजबूत, आत्मनिर्भर और तकनीक के मामले में सक्षम भारत का खाका पेश किया। उनका मकसद साफ था: 2047 तक, यानी आजादी के 100 साल पूरे होने पर, भारत को विकसित राष्ट्र बनाना।

भाषण का सबसे अहम मुद्दा आत्मनिर्भर भारत रहा। मोदी ने मेक इन इंडिया, स्वदेशी और वोकल फॉर लोकल पर जोर दिया। उनका कहना था कि भारत को विदेशी निर्भरता कम करनी होगी। विनिर्माण, खेती, खाद्य प्रसंस्करण, तकनीक और नए आविष्कार देश की तरक्की के अहम आधार बन सकते हैं।

मोदी ने राष्ट्रीय ताकत की सात धाराओं की बात की, जिसे उन्होंने “शक्ति की सप्त धारा” कहा। इनमें विनिर्माण, कृषि और खाद्य प्रसंस्करण, तकनीक और नवाचार, संपर्क और कनेक्टिविटी, रक्षा, हरित और नीली अर्थव्यवस्था तथा भारत की सॉफ्ट पावर शामिल हैं। उनका मानना है कि इन सात क्षेत्रों को मजबूत करके देश की अर्थव्यवस्था को नई रफ्तार दी जा सकती है।

तकनीक को भाषण में खास जगह मिली। प्रधानमंत्री ने अगले एक साल में एक करोड़ युवाओं को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई का प्रशिक्षण देने की घोषणा की। सेमीकंडक्टर निर्माण पर भी जोर दिया गया। मकसद भारत को दुनिया की तकनीकी सप्लाई चेन का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनाना है।

छात्रों और नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए भी कुछ अहम घोषणाएं हुईं। मोदी ने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग की बात कही, खासकर गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के युवाओं के लिए। उनका संदेश था कि देश के बदलाव की धुरी युवा होने चाहिए। खेलों और नई खेल प्रतिभाओं को खोजने पर भी उन्होंने जोर दिया।

महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी भी भाषण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रही। मोदी ने विधानसभाओं और संसद में महिलाओं की 33 प्रतिशत भागीदारी की जरूरत पर जोर दिया। यह कदम महिलाओं को निर्णय लेने की प्रक्रिया में बराबर की जगह देने की दिशा में अहम माना जा सकता है।

ऊर्जा सुरक्षा को भी राष्ट्रीय विकास से जोड़ा गया। मोदी ने 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा पैदा करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा। उनके मुताबिक ऊर्जा में आत्मनिर्भरता आर्थिक विकास के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी जरूरी है।

राष्ट्रीय सुरक्षा पर भी प्रधानमंत्री का रुख सख्त रहा। उन्होंने सशस्त्र नक्सलवाद के साथ-साथ “दिमागी नक्सलवाद” से भी सावधान किया। उनका तर्क था कि विकास के लिए देश की एकता, अमन और आंतरिक सुरक्षा बेहद जरूरी है।

इस पूरे भाषण में वंदे मातरम् का विशेष महत्व रहा। राष्ट्रीय गीत के 150 साल पूरे होने के मौके पर लाल किले में उसका गूंजना इतिहास, संस्कृति और राष्ट्रभावना को एक साथ जोड़ गया।

कुल मिलाकर मोदी का भाषण आर्थिक महत्वाकांक्षा और राष्ट्रवाद का मेल था। आत्मनिर्भरता, तकनीक, युवा, ऊर्जा, विनिर्माण और राष्ट्रीय एकता इसके प्रमुख स्तंभ रहे।

लेकिन असली इम्तिहान घोषणाओं के बाद शुरू होगा। बड़े लक्ष्य तभी मायने रखते हैं जब वे नौकरी, आमदनी, अवसर और बेहतर जिंदगी में बदलें। 2047 का विकसित भारत सिर्फ आंकड़ों और नारों से नहीं बनेगा। उसे करोड़ों आम भारतीयों की जिंदगी में महसूस होना चाहिए।

Thursday, August 13, 2026

 शीला की जवानी बुढ़ापा बन गई; फैसला आना है, रेप हुआ या नहीं!

सार्वजनिक जीवन में यौन आरोपों और जवाबदेही की लंबी कहानी

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

15 अगस्त 2026

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कितनी बार एक औरत को बोलना पड़ेगा, तब जाकर व्यवस्था सुनेगी? कितनी सुर्खियाँ चीखेंगी, तब किसी ताकतवर आदमी से कथित यौन अपराध का हिसाब माँगा जाएगा?

भारत में यह दृश्य अब अनजाना नहीं रहा। किसी नेताजी पर आरोप लगता है। मीडिया में तूफान आता है। कार्यकर्ता सड़क पर उतरते हैं। हैशटैग ट्रेंड करते हैं। पीड़िता से कहा जाता है: बोलो, साबित करो, फिर बोलो और उस दर्द को बार-बार जीओ।

फिर कानून की गाड़ी चलती है। धीरे-धीरे, बेहद धीरे। इतनी धीमी कि हिम्मत चुकने लगती है, पैसा खत्म होने लगता है, गवाह थक जाते हैं और सबूत कमजोर पड़ने लगते हैं। उधर जनता का गुस्सा भी नई खबर की तलाश में निकल जाता है।

कल का आक्रोश आज की पुरानी खबर बन जाता है।

सामाजिक कार्यकर्ता पद्मिनी अय्यर सवाल उठाती हैं, “इंसाफ के लिए पीड़िता को ही हर बार इतना सब्र क्यों करना पड़ता है, जबकि सत्ता के पास वक्त भी है, रसूख भी और बच निकलने के रास्ते भी?”

जन टिप्पणीकार पारस नाथ चौधरी कहते हैं कि पिछले दो दशकों में भारत ने राजनीति, फिल्म, मीडिया और धार्मिक संस्थाओं में एक ही तरह का तमाशा बार-बार देखा है,: एक ताकतवर आदमी, कुछ गंभीर आरोप, मीडिया का शोर और कभी-कभी वर्षों बाद अदालत का फैसला। किसी को उम्रकैद मिली। कोई बरी हो गया। किसी ने चुपचाप इस्तीफा दिया। किसी ने खुलेआम आरोप नकार दिए। लेकिन इन तमाम मामलों ने एक बड़ा सवाल जरूर छोड़ा है: क्या ताकतवर लोगों के लिए कानून की चाल अलग होती है?


पूर्व सांसद और पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवगौड़ा के पोते प्रज्वल रेवन्ना का मामला हाल के सबसे सनसनीखेज मामलों में रहा।

अप्रैल 2024 में कर्नाटक के हासन में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले सैकड़ों कथित यौन वीडियो वाले पेन ड्राइव सामने आए। आरोप कई महिलाओं के यौन उत्पीड़न से जुड़े थे। रेवन्ना देश छोड़कर चले गए और मई 2024 में लौटने पर गिरफ्तार हुए।

चार मामलों में चार्जशीट दाखिल हुई। अगस्त 2025 में विशेष अदालत ने एक घरेलू कामगार से बार-बार बलात्कार के मामले में उन्हें दोषी ठहराया। वीडियो, डीएनए और फॉरेंसिक सबूतों पर भरोसा करते हुए अदालत ने प्राकृतिक जीवन के शेष समय तक जेल की सजा सुनाई। रेवन्ना ने अपील की है और मामला अभी आगे की कानूनी प्रक्रिया में है।


उत्तर प्रदेश के उन्नाव के पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को नाबालिग लड़की से बलात्कार के मामले में दोषी ठहराया गया।

मामले ने देश को झकझोर दिया। आरोप लगे कि पीड़िता के पिता की हिरासत में मौत और बाद में हुए सड़क हादसे में परिवार के सदस्यों तथा वकील की मौत के पीछे सेंगर के सहयोगियों का हाथ था।

सेंगर को उम्रकैद हुई। दिल्ली हाईकोर्ट ने 2025 के आखिर में सजा निलंबित की। लेकिन मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश को पलट दिया और मुख्य अपील पर जल्द फैसला करने को कहा। एक दूसरे मामले में मिली सजा के कारण सेंगर जेल में बने हुए हैं।


भाजपा सांसद और 2023 तक भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष रहे बृज भूषण शरण सिंह पर कई महिला पहलवानों ने यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए। इनमें ओलंपिक पदक विजेता भी शामिल थीं।

जंतर-मंतर पर पहलवानों का आंदोलन देशभर में चर्चा का विषय बना। एफआईआर दर्ज हुई। बृज भूषण ने आरोपों से इनकार किया।

अगस्त 2026 में दिल्ली की अदालत ने उन्हें और एक सह-आरोपी को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि आरोप संदेह से परे साबित नहीं हुए। आदेश के कुछ हिस्सों में आरोपों को राजनीतिक रूप से प्रेरित दिखाई देने की बात भी कही गई। शिकायतकर्ताओं ने फैसले के खिलाफ अपील करने की बात कही है।

यहाँ कानून ने अपना फैसला सुना दिया है। लेकिन बहस अभी खत्म नहीं हुई।


राजस्थान के पूर्व मंत्री महिपाल मदेरणा का नाम 2011 में एएनएम भंवरी देवी के लापता होने और कथित हत्या के मामले में सामने आया।

उन्होंने संबंध होने की बात स्वीकार की, लेकिन हत्या में शामिल होने से इनकार किया। इस कांड ने उनका राजनीतिक करियर खत्म कर दिया। मुकदमा वर्षों तक चलता रहा। देरी के आधार पर कई आरोपियों को जमानत मिली। 2021 में मदेरणा की मौत हो गई, जबकि मामला अभी लंबित था।

कानून की किताब में तारीखें होती हैं। पीड़ित की जिंदगी में इंतजार होता है।


आसाराम बापू और गुरमीत राम रहीम सिंह जैसे स्वयंभू धर्मगुरुओं के मामले भी इसी बहस का हिस्सा हैं।

आसाराम को आश्रम में नाबालिग से बलात्कार के मामले में उम्रकैद हुई। मई 2026 में राजस्थान हाईकोर्ट ने बलात्कार की सजा बरकरार रखी, हालांकि कुछ अन्य आरोपों में राहत दी। मामला सुप्रीम कोर्ट में है।

डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को 2017 में दो बलात्कार मामलों में दोषी ठहराया गया था। उन्हें 20 साल की सजा मिली। उन्हें कई बार पैरोल भी मिली। हाल में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पत्रकार की हत्या के मामले में उन्हें बरी किया, लेकिन उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।

यहीं एक और सवाल पैदा होता है; क्या जेल की सलाखें सबके लिए बराबर होती हैं?


भारत में #MeToo आंदोलन ने 2018 में जोर पकड़ा। अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने 2009 की फिल्म शूटिंग के दौरान अभिनेता नाना पाटेकर पर उत्पीड़न का आरोप लगाया। पाटेकर ने आरोपों से इनकार किया।

टीवी निर्माता विंटा नंदा ने अभिनेता आलोक नाथ पर 1990 के दशक में यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया। एफआईआर दर्ज हुई और नाथ ने आरोपों से इनकार किया।

आंदोलन धीरे-धीरे राजनीति और मीडिया तक भी पहुँचा।

तत्कालीन केंद्रीय मंत्री एम.जे. अकबर पर कई महिला पत्रकारों ने उत्पीड़न के आरोप लगाए। उन्होंने इस्तीफा दिया और पत्रकार प्रिया रमानी पर मानहानि का मुकदमा किया। 2021 में दिल्ली की अदालत ने रमानी के पक्ष में फैसला दिया।


#MeToo दौर का शायद सबसे लंबा कानूनी सफर तरुण तेजपाल का रहा।

तहलका के संस्थापक और पूर्व प्रधान संपादक पर 2013 में गोवा के एक होटल की लिफ्ट में एक युवा सहकर्मी के यौन उत्पीड़न का आरोप लगा।

2021 में ट्रायल कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया। फैसले में पीड़िता के घटना के बाद के व्यवहार पर की गई टिप्पणियों की काफी आलोचना हुई। गोवा सरकार ने फैसले को चुनौती दी।

और फिर आया 6 अगस्त 2026,

करीब तेरह साल बाद बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा बेंच ने निचली अदालत का फैसला पलट दिया। तेजपाल को बलात्कार और संबंधित अपराधों में दोषी ठहराया गया। उन्हें दस साल की कठोर कैद और पीड़िता को देने के लिए भारी जुर्माने की सजा सुनाई गई। तेजपाल ने सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही है।

तेरह साल।

एक मुकदमे के लिए शायद सिर्फ एक संख्या। एक पीड़िता के लिए जिंदगी का बड़ा हिस्सा।


सभी मामले बलात्कार या यौन उत्पीड़न के नहीं थे। कुछ मामलों में निजी वीडियो सामने आए और आरोपों से इनकार हुआ।

एन.डी. तिवारी का 2009 का सेक्स-वीडियो विवाद और बाद में डीएनए जांच से विवाहेतर बेटे की पुष्टि हुई। अभिषेक मनु सिंघवी का 2012 का वीडियो विवाद भी खूब उछला। अदालतों ने उसके प्रसार पर रोक लगाने की कोशिश की।

स्वामी नित्यानंद का वीडियो विवाद, अभिनेता शाइनी आहूजा की बलात्कार में सजा और 1970 के दशक का सुरेश राम से जुड़ा राजनीतिक सेक्स-फोटो विवाद बताते हैं कि यह बीमारी नई नहीं है।

नई सिर्फ कैमरे की ताकत है। सोशल मीडिया की रफ्तार है। और शायद समाज की याददाश्त भी थोड़ी तेज हुई है।

पैटर्न साफ दिखाई देता है

इन मामलों को साथ रखिए तो कुछ बातें साफ दिखती हैं।

आरोप और अंतिम कानूनी फैसले के बीच अक्सर बहुत लंबा फासला होता है। तेजपाल का मामला तेरह साल चला। कई मामलों में अपीलें वर्षों तक चलती रहती हैं।

नतीजे भी अलग-अलग रहे। कहीं दोषसिद्धि हुई। कहीं बरी किया गया। कहीं मामला अभी अदालतों में है। इसलिए आरोप को फैसला मानना भी गलत है और बरी होने को हर सवाल का अंत मान लेना भी।

कई मामलों में पीड़ित महिलाएँ उस व्यक्ति पर संस्थागत रूप से निर्भर थीं। घरेलू कामगार, नाबालिग लड़कियाँ और खेल संघों के अधीन रहने वाली महिला खिलाड़ी इसका उदाहरण हैं।

सामाजिक कार्यकर्ता मुक्ता गुप्ता कहती हैं, “सूची में आरोपी और दोषी सभी पुरुष हैं। महिलाएँ आरोप लगाने वाली, पीड़ित या सर्वाइवर के रूप में दिखाई देती हैं।”

उनका कहना है कि यह केवल भारत की कहानी नहीं है। दुनिया भर में सार्वजनिक जीवन के ताकतवर पुरुषों पर यौन दुर्व्यवहार के आरोप सामने आते रहे हैं। सत्ता, राजनीतिक पद, फिल्मी हैसियत और धार्मिक प्रभाव जैसे पद अक्सर एक असमान शक्ति-संबंध स्थापित करते हैं।

महिला सार्वजनिक हस्तियों पर भी विवाद होते हैं। लेकिन भारत में उनके खिलाफ मामले अधिकतर भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद या निजी जीवन से जुड़े विवादों के रूप में सामने आते हैं।

असली सवाल अभी बाकी है

मामले आते रहते हैं। अदालतें अपनी रफ्तार से चलती रहती हैं। वकील तारीखें लेते रहते हैं। गवाह थकते रहते हैं। पीड़ित इंतजार करते रहते हैं।

और जनता?

जनता कुछ दिन गुस्सा करती है। फिर अगली खबर पर चली जाती है।

यही शायद इस पूरी कहानी का सबसे कड़वा सच है।

कानून अंधा हो सकता है, लेकिन सत्ता कभी-कभी बहुत अच्छी तरह देखती है कि रास्ता कहाँ से निकलेगा।

तो सवाल फिर वही है: 

एक औरत को कितनी बार बोलना पड़ेगा, तब जाकर व्यवस्था सचमुच सुनेगी?


Tuesday, August 11, 2026

 अमेरिका में सपने टूटे, भारत में कहानी मिली

संतोष नायर की जिंदगी का कड़वा-मीठा सफर

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पुस्तक समीक्षा

Silver Linings in the Dark Sky

278 पृष्ठ | अंग्रेज़ी

प्रकाशक: Pink Lotus, Varanasi

उपलब्ध: Amazon

लेखक: Santosh Nayar

संपादक: Dr Alok Gupta, PhD

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

13 अगस्त 2026

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अमेरिका सपनों की धरती है। कम-से-कम विज्ञापन यही कहते हैं। वहाँ सपने डॉलर में आते हैं और कभी-कभी उनकी ईएमआई जिंदगी भर चुकानी पड़ती है।

संतोष नायर भी सपने लेकर अमेरिका गए थे। लेकिन जिंदगी ने उन्हें ऐसा पैकेज थमा दिया, जिसमें सफलता के साथ बीमारी, शराब, टूटते रिश्ते, अदालत, जेल और आखिर में भारत वापसी भी शामिल थी। कहानी में इतना मसाला है कि बॉलीवुड की कोई पटकथा पढ़कर भी कह सकती है: भाई, थोड़ा कम करो!

लेकिन यह फिल्म नहीं, एक असली जिंदगी थी। और असली जिंदगी की पटकथा सबसे ज्यादा निर्दयी होती है।

संतोष नायर को आखिरकार कुछ ठहराव मैसूर में मिला। मगर अंतिम वर्षों में खराब सेहत ने उन्हें फिर घेर लिया। 2024 में उनका निधन हो गया। पीछे रह गई एक अधूरी पांडुलिपि, और एक ऐसी जिंदगी, जिसमें जितने मोड़ थे, उतने शायद किसी हाईवे में भी नहीं होते।

यही पांडुलिपि बाद में Silver Linings in the Dark Sky बनी।

जिंदगी ने कोई सीधी सड़क नहीं दी

नायर पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट थे। महत्वाकांक्षी थे। प्रतिभाशाली थे। अमेरिका में बेहतर भविष्य का सपना था। शादी हुई। परिवार बना। पेशेवर सफलता मिली।

फिर जिंदगी ने अचानक गियर बदल दिया।

बाइपोलर डिसऑर्डर ने उनके जीवन में प्रवेश किया। मानसिक उन्माद के दौर आए। शराब ने मुश्किलों को और उलझाया। रिश्ते कमजोर हुए। गलत फैसले हुए। कानून सामने आया और अंततः जेल की सलाखें भी आ गईं।

तीन शादियाँ, पारिवारिक तनाव, कभी गजब का आत्मविश्वास और कभी बच्चों जैसी मासूमियत; नायर एक ही व्यक्ति में कई व्यक्तित्वों का चलता-फिरता संस्करण लगते हैं।

लेकिन यही बाइपोलर डिसऑर्डर की पेचीदगी भी है। यह बीमारी सिर्फ मूड बदलने का मामला नहीं है। इसमें व्यक्ति की सोच, ऊर्जा, निर्णय क्षमता और व्यवहार तक प्रभावित हो सकते हैं।

मेनिया के दौरान इंसान को अपने फैसले बिल्कुल सही लग सकते हैं। दिमाग एक्सप्रेस ट्रेन की रफ्तार से दौड़ता है और विवेक बेचारा अगले स्टेशन पर छूट जाता है।

फिर जिंदगी बिल भेजती है।

रिश्तों का बिल।

पैसों का बिल।

नौकरी का बिल।

परिवार की चिंता का बिल।

और अंत में कानून का बिल, जिसमें ब्याज सबसे ज्यादा होता है।

नायर कई बार दवा लेना भूल जाते थे। इसके बाद उनका व्यवहार बदल जाता था। वे चिड़चिड़े, रूखे या हिंसक हो सकते थे। उनके अनुभव से पता चलता है कि मानसिक बीमारी को समझे बिना केवल व्यवहार को देखना कितना खतरनाक हो सकता है।

लेकिन नायर सिर्फ अपनी बीमारी नहीं थे

यही इस किताब की सबसे महत्वपूर्ण बात है।

नायर को सिर्फ बाइपोलर डिसऑर्डर वाला व्यक्ति मान लेना उनके साथ नाइंसाफी होगी। वे बुद्धिमान थे। जिज्ञासु थे। महत्वाकांक्षी थे। उनमें हास्यबोध था। वे अच्छे पेशेवर, पति, पिता, मित्र और प्रवासी भी थे।

बीमारी उनकी कहानी का हिस्सा थी।

पूरी कहानी नहीं।

यही फर्क इस आत्मकथा को महज बीमारी की कहानी बनने से रोकता है।

नायर अपनी जिंदगी को चमकदार पैकेजिंग में बेचने की कोशिश नहीं करते। वे खुद को महान नायक नहीं बनाते। अपनी गलतियों पर पर्दा नहीं डालते। अपनी कमजोरियों को भी सामने रखते हैं।

कभी वे बेहद समझदार लगते हैं। कभी लापरवाह। कभी अजीब। कभी बेहद मासूम।

और कई बार इतने मजेदार कि पाठक सोचता है, यह आदमी अपनी जिंदगी का दुख भी स्टैंड-अप कॉमेडी में बदल सकता था।

अध्यायों के नाम भी चुगली करते हैं

नायर की किताब के अध्यायों के नाम उनके मिजाज की पूरी चुगली करते हैं।

पहली शादी का नाम है—“Made in Heaven, Deep Fried on Earth.”

दूसरी शादी—“Until Mania Do Us Apart.”

और जेल?

उसे उन्होंने अपनी “Favorite Alma Mater” बना दिया।

आम आदमी कॉलेज से डिग्री लेकर निकलता है।

नायर जेल से अनुभव लेकर निकले।

जिंदगी ने उन्हें शायद गलत जगह दाखिला दिया था, लेकिन उन्होंने वहाँ भी नोट्स बना लिए।

हँसी के पीछे हालांकि दर्द बहुत गहरा है।

बीमारी और अपराध के बीच की धुंध

नायर के जेल अनुभव अमेरिकी न्याय व्यवस्था पर असहज सवाल उठाते हैं।

मानसिक बीमारी से जूझता व्यक्ति जब कानून के सामने आता है, तो क्या सिस्टम उसके मन को समझता है या सिर्फ उसके व्यवहार को सजा देता है?

सवाल आसान हैं।

जवाब नहीं।

बीमारी कब व्यवहार बन जाती है?

व्यवहार कब गलती बनता है?

और गलती कब अपराध?

किताब इन सवालों का कोई आसान फार्मूला नहीं देती। शायद इसलिए कि जिंदगी भी ऐसा कोई फार्मूला नहीं देती।

मानसिक उन्माद में लिया गया फैसला बाद में पागलपन लग सकता है। लेकिन उस समय वही फैसला व्यक्ति को पूरी तरह सही लगता है।

आत्मविश्वास लापरवाही बन जाता है। ऊर्जा जुनून में बदल जाती है। विचार इतनी तेजी से दौड़ते हैं कि उनके परिणाम पीछे छूट जाते हैं।

और जब परिणाम आते हैं, तब तक ट्रेन काफी दूर निकल चुकी होती है।

अँधेरे में भी हास्य की एक खिड़की

नायर की सबसे बड़ी खूबियों में एक उनका हास्यबोध था।

वे अपनी जिंदगी के सबसे खराब अध्यायों में भी विडंबना खोज लेते थे। शायद यही उनकी मानसिक ताकत थी।

यह किताब इसलिए कोई मोटिवेशनल पोस्टर नहीं बनती।

यह वह किताब नहीं है जिसमें लिखा हो; “मुश्किलों से मैंने सीखे जीवन के दस महान सबक।”

न कोई बनावटी ज्ञान।

न हर पन्ने पर चमकदार जीवन-दर्शन।

बस एक आदमी है जो कहता है; मेरे साथ यह हुआ।

और फिर पाठक खुद तय करता है कि इससे क्या समझना है।

यही ईमानदारी किताब को असरदार बनाती है।

जेल में शुरू हुई कहानी

नायर ने जेल में रहते हुए अपनी आत्मकथा लिखना शुरू किया था। 2013 में उन्होंने पांडुलिपि डॉ. आलोक गुप्ता को भेजी।

भारत लौटने के बाद डॉ. गुप्ता ने उन्हें Glowtronics में काम करने का अवसर दिया। लगा कि शायद जिंदगी अब दूसरी पारी खेलने के लिए तैयार है।

लेकिन बीमारी ने फिर दस्तक दी।

नौकरी चली गई। पांडुलिपि भी जिंदगी की फाइलों में दब गई।

और जिंदगी, जैसा कि अक्सर करती है, आगे बढ़ गई।

फिर 2024 में नायर का निधन हो गया।

लेकिन कहानी खत्म नहीं हुई थी।

2026 में डॉ. गुप्ता को वह पुरानी पांडुलिपि फिर मिली।

एक भूली हुई आवाज ने अचानक दरवाजा खटखटाया।

नायर अब सफाई देने के लिए मौजूद नहीं थे। वे किसी घटना पर अपना पक्ष नहीं रख सकते थे। अपनी गलती को सही नहीं ठहरा सकते थे। किसी पुराने फैसले का संदर्भ नहीं समझा सकते थे।

इसलिए किताब में उनकी आवाज जैसी थी, वैसी ही बची रही।

कच्ची।

बेबाक।

मजेदार।

कभी गुस्सैल।

कभी कमजोर।

और सबसे बढ़कर: इंसानी।

किताब न बरी करती है, न सजा देती है

Silver Linings in the Dark Sky नायर को निर्दोष साबित करने की कोशिश करती है, न उन्हें कटघरे में खड़ा करती है।

वह सिर्फ हमसे थोड़ी समझ मांगती है।

और थोड़ी इंसानियत।

मानसिक बीमारी को लेकर हमारा समाज अभी भी अजीब तरह से असहज है। शारीरिक बीमारी हो तो हम दवा, डॉक्टर और आराम की सलाह देते हैं। मानसिक बीमारी हो तो सलाह देने वालों की पूरी बारात निकल आती है।

“हिम्मत रखो।”

“अपने आपको कंट्रोल करो।”

“ज्यादा मत सोचो।”

काश दिमाग भी रिमोट कंट्रोल से चलता!

बाइपोलर डिसऑर्डर गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्या है। इसमें मूड, ऊर्जा और व्यवहार में अत्यधिक उतार-चढ़ाव आ सकता है। समय पर उपचार, दवा, थेरेपी और परिवार का सहयोग व्यक्ति को स्थिर और सार्थक जीवन जीने में मदद कर सकते हैं।

नायर की कहानी इसी समझ की जरूरत को सामने लाती है।

जिंदगी ने सब कुछ दिया, लेकिन पूरा नहीं दिया

नायर की जिंदगी में उपलब्धियाँ थीं, लेकिन नुकसान भी कम नहीं थे।

प्रतिभा हमेशा सफलता में नहीं बदल सकी।

रिश्ते टूटे।

मौके हाथ से निकले।

बीमारी ने रास्ता रोका।

गलत फैसलों ने कीमत वसूली।

फिर भी कोशिश चलती रही।

अमेरिका से भारत तक।

कामयाबी से गिरावट तक।

जेल से नई शुरुआत तक।

और एक भूली हुई पांडुलिपि से प्रकाशित किताब तक।

यही इस कहानी की असली ताकत है।

आखिर में कहानी किसकी है?

Silver Linings in the Dark Sky अँधेरे पर विजय की कहानी नहीं है।

यह उस आदमी की कहानी है जिसने लंबे समय तक अँधेरे में जिंदगी गुजारी। कई बार रास्ता खोया। कई बार खुद से हारा। कई बार दूसरों को दुख दिया। लेकिन उसी अँधेरे में कभी-कभी हँसी की एक किरण भी खोज ली।

किताब पढ़ते हुए लगता है कि जिंदगी ने नायर को कोई आसान रास्ता नहीं दिया।

लेकिन शायद उन्होंने भी जिंदगी को आसानी से छोड़ने से इनकार कर दिया था।

और अंत में जिंदगी ने उन्हें एक आखिरी, बेहद विडंबनापूर्ण तोहफा दिया।

संतोष नायर शायद अपनी जिंदगी पूरी तरह वापस नहीं पा सके।

लेकिन अंततः उन्हें अपनी कहानी वापस मिल गई।

और कभी-कभी, शायद यही हमारी सबसे बड़ी silver lining होती है; जब जिंदगी की सारी रोशनियाँ बुझ जाएँ, तब भी हमारी कहानी कहीं बची रह जाए।

 सेहत के नए हकीमों ने छेड़ी वेलनेस की जंग 

अमीरों ने शांत सुबह को बना दिया स्टेडियम!

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

१३ अगस्त 2026

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आजकल  बड़े शहरों में चमचमाती ऊंची इमारतों में रहने वाले लोगों की जिंदगी बदल गई है। ग्रेनाइट, शीशे और एयर-कंडीशनर से सजे इन आलीशान घरों में अब सूरज निकलने के बाद आराम से सोना लगभग गुनाह समझा जाता है।

अपने शर्माजी, भोर सुबह, सज संवर के जिम के लिए ड्राइव करते हैं, जहां हूरों से मिलकर उनका रक्तचाप नॉर्मल हो जाता है। उधर चौधरी साहब अपने फ्लैट की खिड़की से नजारा ताक रहे होते हैं। वो बताते हैं, "सुबह साढ़े छह बजे से ही फिटनेस का युद्ध शुरू हो जाता है। कोई जिम की तरफ भाग रहा है, कोई तैराकी कर रहा है। योगा मैट अलग-अलग “माइंडफुलनेस ज़ोन” में ऐसे बिछाए जाते हैं, जैसे कोई धार्मिक अनुष्ठान होने वाला हो। कुछ लोग तेज़-तेज़ चलते हैं, कुछ जॉगिंग करते हैं। सबके चेहरों पर ऐसा भाव होता है, जैसे सुबह पसीना बहाना ही इंसानियत की सबसे बड़ी सेवा हो।"

जिम इतना भरा रहता है कि सांस लेना मुश्किल हो जाए। स्विमिंग पूल में इतनी हलचल होती है कि पानी भी शायद आराम मांगने लगे। ध्यान लगाने वाले लोग इतनी गंभीरता से आंखें बंद करते हैं कि लगता है, अभी संतोष और आत्ममुग्धता के सहारे हवा में उड़ने लगेंगे।

हर सुबह ग्रेटर नोएडा की एक पूरी सोसाइटी स्वास्थ्य सुधारने के एक बड़े अभियान में बदल जाती है। सवाल बस इतना है कि क्या इससे सचमुच स्वास्थ्य सुधर रहा है? कभी-कभी यह फिटनेस से ज्यादा एक महंगा जुनून लगता है।

मेरा एक दोस्त, जो खुद जिम भक्त है, कहता है कि इतनी योगा, प्राणायाम और माइंडफुलनेस के बावजूद दुनिया पहले से ज्यादा स्वस्थ नजर नहीं आती। अस्पताल बढ़ रहे हैं, निजी क्लीनिक बढ़ रहे हैं और वेलनेस सेंटर भी हर गली में खुल रहे हैं।

अगर योगा के दावे आधे भी सच होते, तो शहर के आधे हृदय रोग विशेषज्ञ बेरोजगार हो जाते और बाकी आधे प्राणायाम सिखा रहे होते।

उधर, पुराने विचारों वाले एक पंडित जी, इस मामले को बहुत सीधे शब्दों में समझाते हैं। उनका कहना है कि अपनी ताकत बचाने का फायदा, सुबह-सुबह उसे बेकार में खर्च करने से कहीं ज्यादा है। ट्रैफिक झेलना, दफ्तर की राजनीति सहना, बढ़ती महंगाई और कभी-कभी जीवन के अर्थ पर चिंता करना: ये सब अपने आप में काफी बड़ी एक्सरसाइज हैं।

वह कहते हैं, “सुबह-सुबह तंग छोटे गारमेंट्स पहनकर खुद को क्यों सताते हो? जिंदगी खुद ही कम कसरत नहीं कराती क्या ?”

बात में दम है। अमीर लोग सुबह अंधेरे में अपने शरीर को सज़ा देते हैं, ताकि बाद में गर्व से एवोकाडो टोस्ट खा सकें। शायद लंबी उम्र का असली राज जिम में नहीं, बल्कि आराम से सोने में हो। हाइ सोसाइटी के तमाम लोग सुबह वर्क आउट इसलिए करते हैं ताकि देर रात तक चलने वाली पार्टियों में मजे लें।

हो सकता है असली फिटनेस यह हो कि इंसान एक सभ्य समय तक बिस्तर में पड़ा रहे, अपनी ऊर्जा बचाए और उसे दुनिया की सबसे कठिन एक्सरसाइज के लिए इस्तेमाल करे, इस पागल होती दुनिया में थोड़ा-बहुत सामान्य बने रहने के लिए।

आज फिटनेस एक नया धर्म बन चुकी है। फर्क बस इतना है कि पहले लोग मोक्ष के लिए तपस्या करते थे, अब लोग सिक्स-पैक के लिए।

एक तरफ जॉगर्स हैं। दूसरी तरफ योगा योद्धा। तीसरी तरफ जिम के पहलवान। चौथी तरफ वे लोग हैं, जो हाथ में महंगी पानी की बोतल लेकर सिर्फ इसलिए घूम रहे हैं ताकि सबको पता चले: भाई साहब, ये आज भी “हाइड्रेटेड” हैं। अब सुबह सोना पुराने जमाने की आदत हो गई है। जो आठ बजे उठता है, उसे शक की निगाह से देखा जाता है। लोग सोचते हैं, “बेचारा जिंदगी में कितना पीछे रह गया!” जबकि आदमी बेचारा बस नींद पूरी कर रहा होता है। और उधर गेट पर कंपटीशन के नतीजे आने लगे हैं: 

“आज कितने कदम चले?”

“दस हजार।”

“बस? मैंने पंद्रह हजार किए।”

“मैंने बीस हजार।”

तभी एक सज्जन मोबाइल निकालकर कहते हैं, “मेरी स्मार्टवॉच कह रही है कि मैं आज बहुत स्ट्रेस में हूं।”

बाकी लोग गंभीर हो जाते हैं। इतनी दौड़-भाग, इतनी योगा, इतना ध्यान और इतना प्राणायाम करने के बाद भी घड़ी बता रही है कि आदमी तनाव में है। अब घड़ी से बहस कौन करे?

जिम में भी हालत कम मजेदार नहीं है। ट्रेडमिल पर लोग ऐसे दौड़ते हैं जैसे पीछे ईडी, सीबीआई और इनकम टैक्स विभाग तीनों लगे हों। मजे की बात यह है कि आधे घंटे बाद वही सज्जन लिफ्ट से ऊपर अपने फ्लैट में जाते हैं। सेकंड फ्लोर तक सीढ़ियों से जाने में कष्ट होता है।

स्विमिंग पूल में लोग पानी को इतना मथते हैं कि लगता है समुद्र मंथन का ट्रायल चल रहा है। योगा क्लास में सब आंखें बंद करके “मन की शांति” खोज रहे हैं। क्लास खत्म होते ही पार्किंग में कार खड़ी करने को लेकर दो लोगों में युद्ध शुरू हो जाता है।

एक सज्जन रोज सुबह ध्यान करते हैं।

दूसरे सज्जन पूछते हैं, “कितनी देर?”

“एक घंटा।”

“फायदा?”

“बहुत शांति मिलती है।”

इतने में उनकी मेड छुट्टी मांग लेती है। सज्जन की आध्यात्मिक शांति तुरंत व्हाट्सऐप कॉल पर चली जाती है।

आधुनिक जीवनशैली का सबसे बड़ा चमत्कार यही है। आदमी स्वास्थ्य पाने के लिए पहले खुद को बीमार करता है। सुबह अलार्म से नींद खराब करो। ठंडे पानी से नहाओ। जिम में शरीर तोड़ो। फिर प्रोटीन शेक पियो। उसके बाद ऑफिस जाकर आठ घंटे कुर्सी पर बैठो और शाम को डॉक्टर से पूछो, “डॉक्टर साहब, कमर दर्द क्यों रहता है?”

पहले इंसान खेत में काम करता था, पैदल चलता था, कुएं से पानी खींचता था। उसे फिटनेस ऐप की जरूरत नहीं पड़ती थी। आज आदमी एयर-कंडीशनर में बैठता है, कार से जिम जाता है, ट्रेडमिल पर पांच किलोमीटर दौड़ता है और फिर कार से घर लौट आता है।

इसे आधुनिक प्रगति कहते हैं।

अब खाना भी पेट भरने के लिए नहीं खाया जाता। पहले उसकी फोटो खींची जाती है। एवोकाडो टोस्ट, क्विनोआ सलाद और ग्रीन जूस के साथ सेल्फी जरूरी है। आखिर दुनिया को कैसे पता चलेगा कि आप स्वस्थ हैं?

स्वास्थ्य से ज्यादा जरूरी है: स्वस्थ दिखना।

सोशल मीडिया ने तो फिटनेस को पूरा तमाशा बना दिया है। कोई आसन कर रहा है, कोई प्रोटीन पी रहा है, कोई “नो शुगर चैलेंज” चला रहा है। अगले दिन वही आदमी आधी रात को फ्रिज खोलकर रसगुल्ले ढूंढ रहा होता है।

सच तो यह है कि आधुनिक इंसान ने हर चीज को प्रतियोगिता बना दिया है। पहले नौकरी की दौड़ थी। फिर पैसे की दौड़ हुई। अब नींद छोड़कर स्वस्थ होने की भी दौड़ शुरू हो गई है।

शायद असली वेलनेस का राज इतना ही है; थोड़ा कम भागिए, थोड़ा कम दिखाइए और कभी-कभी बिना अपराधबोध के देर तक सो जाइए।

क्योंकि इस दुनिया में जहां हर कोई फिटनेस का महर्षि बनने पर तुला है, सबसे बड़ा योगासन शायद यही है: 

आराम से करवट बदलो, चादर ओढ़ो और कहो; आज नहीं, कल से जिम पक्का

Monday, August 10, 2026

 


महिला नेता दिखी नहीं कि गाली शुरू! 

सियासत में मुद्दों से ज्यादा आसान क्यों है चरित्र पर हमला?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

12 अगस्त 2026

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कल्पना कीजिए, चुनावी मंच पर एक महिला नेता खड़ी होती है। वह सरकार से तीखे सवाल पूछती है। विपक्ष को चुनौती देती है। अपनी पार्टी का बचाव करती है। कुछ ही मिनटों में सोशल मीडिया का माहौल बदल जाता है। उसके तर्कों पर कम, कपड़ों पर ज्यादा चर्चा होने लगती है। उसकी नीतियों को छोड़कर उम्र, शादी, शक्ल और निजी जिंदगी की चीरफाड़ शुरू हो जाती है।

बस, यहीं हमारी राजनीति का सबसे बदसूरत चेहरा दिखाई देता है।

पुरुष नेता गरजे तो उसे दमदार कहा जाता है। महिला नेता उसी अंदाज में जवाब दे दे, तो उसे “अहंकारी” या “बदतमीज” बता दिया जाता है। पुरुष नेता महत्वाकांक्षी हो तो दूरदर्शी कहलाता है। महिला महत्वाकांक्षी हो तो उसके इरादों पर शक किया जाता है। जैसे राजनीति में महिला का सबसे बड़ा अपराध सिर्फ इतना हो कि उसने चुप रहने से इनकार कर दिया।

महिला चुनाव लड़ सकती है, जीत सकती है और सत्ता की कुर्सी तक पहुंच सकती है। लेकिन जैसे ही वह मुखर होती है, बहस अक्सर मुद्दों से भटक जाती है। फिर शुरू होता है कपड़ों, चरित्र, रिश्तों और निजी जिंदगी पर हमला।

मानो सियासत का कोई अनलिखा नियम हो, महिला को हराना मुश्किल लगे, तो पहले उसे ज़लील कर दो।

पुरुष नेताओं को चोर, भ्रष्ट, निकम्मा या नाकाम कहना “तीखी राजनीतिक बहस” माना जाता है। महिला नेता आंख में आंख डालकर जवाब दे दे, तो शब्दों की तलवार अचानक उसके विचारों को छोड़कर उसकी देह और निजी जिंदगी की तरफ मुड़ जाती है। नीति-विचार पीछे छूट जाते हैं। तर्क दम तोड़ देते हैं। गाली सबसे आसान हथियार बन जाती है।

यह बीमारी किसी एक पार्टी की नहीं है। अफसोस, पूरा राजनीतिक तंत्र इससे संक्रमित दिखाई देता है। अपनी पार्टी की महिला नेता पर फूहड़ टिप्पणी हो, तो बयान जारी होते हैं और आक्रोश उमड़ पड़ता है। लेकिन विरोधी दल की महिला पर वही कीचड़ उछले, तो कई चेहरे अचानक मौन साध लेते हैं।

महिला सम्मान अब सिद्धांत कम, सियासी स्विच ज्यादा बन गया है, अपने लिए ऑन, विरोधियों के लिए ऑफ।

सुनंदा पुष्कर के मामले में भी सार्वजनिक चर्चा कई बार उनकी पहचान से ज्यादा सनसनी के इर्द-गिर्द घूमती रही। जयललिता जैसी शक्तिशाली मुख्यमंत्री को भी कई मौकों पर सिर्फ एक महिला होने के चश्मे से देखा गया। बसपा सुप्रीमो बहन मायावती पर जाति और लिंग, दोनों को मिलाकर तंज कसे गए। उमा भारती को भी ऐसी निजी टिप्पणियां सुननी पड़ीं, जिनका उनकी नीतियों या राजनीतिक काम से कोई संबंध नहीं था।

कंगना रनौत के विचारों से असहमति हो सकती है। उनकी राजनीति और बयानों की आलोचना भी होनी चाहिए। लोकतंत्र में किसी को आलोचना से छूट नहीं मिलती। लेकिन असहमति का अर्थ यह नहीं कि महिला होने के कारण उस पर हर तरह की गाली और गंदगी फेंक दी जाए।

किसी महिला नेता की आलोचना लोकतंत्र है। उसकी निजी जिंदगी नोंचना बदतमीजी है।

दोनों में फर्क है। मगर हमारी राजनीति अक्सर यह फर्क जानबूझकर भूल जाती है।

हम महिलाओं को राजनीति में लाने की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। सम्मेलन होते हैं। मंच सजते हैं। “नारी शक्ति” के नारे गूंजते हैं। भाषणों में महिलाओं के लिए आसमान तक खोल दिया जाता है। फिर टिकट बांटने का वक्त आता है, तो कई दरवाजे बंद मिलते हैं।

महिला आरक्षण का कानून बनना निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन असली सवाल सिर्फ सीटों का नहीं है। सवाल उस माहौल का भी है, जिसमें महिला राजनीति करेगी।

मान लीजिए, किसी महिला को सीट मिल गई। वह चुनाव जीत गई। मंत्री भी बन गई। फिर क्या?

क्या उसे वही सम्मान मिलेगा, जो उसके पुरुष सहयोगी को मिलता है? या फिर उसके कपड़ों पर टीवी बहस होगी? शादी पर सवाल उठेंगे? उम्र पर तंज कसे जाएंगे? और उसकी निजी जिंदगी को व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी के हवाले कर दिया जाएगा?

यही वह दलदल है, जिसमें हमारी राजनीति फंसी हुई है।

इसका सबसे बड़ा नुकसान लोकतंत्र को होता है। कई काबिल महिलाएं शायद राजनीति की तरफ देखकर सोचती होंगी; “यह मैदान मेरे लिए बहुत महंगा पड़ सकता है। यहां काम कम और निजी जिंदगी की सफाई ज्यादा देनी पड़ेगी।”

पुरुष नेता को शायद ही रोज यह सोचना पड़ता हो कि चुनाव लड़ने के बाद उसकी शादी, शरीर या चरित्र राष्ट्रीय बहस का विषय बन जाएगा। यही असमानता है। और यही असली समस्या है।

हम अक्सर शिकायत करते हैं कि राजनीति में अच्छे लोग नहीं आते। शिकायत सही हो सकती है। लेकिन एक सवाल हमसे भी पूछना चाहिए, क्या हम अच्छे और काबिल लोगों के लिए राजनीति का माहौल आसान बनाते हैं?

खासकर महिलाओं के लिए?

जितनी अधिक महिलाएं राजनीति में आएंगी, उन्हें दो-चार गालियों से चुप कराना उतना ही मुश्किल होगा। संख्या ताकत है। संगठन ताकत है। और सबसे बड़ी ताकत आर्थिक आजादी है।

जिस महिला के पास अपनी कमाई, अपना काम और अपना मजबूत नेटवर्क है, उसे डराना आसान नहीं होता। देश भर में लाखों महिला उद्यमी आज यही साबित कर रही हैं। वे कारोबार खड़ा कर रही हैं। रोजगार दे रही हैं। फैसले ले रही हैं। उन्हें किसी नेता की कृपा का इंतजार नहीं।

वे अपने पैरों पर खड़ी हैं। यही असली सशक्तिकरण है।

सिर्फ मंच पर “नारी शक्ति जिंदाबाद” बोलने से कुछ नहीं बदलेगा। महिला को अच्छी शिक्षा चाहिए, तो दीजिए। बैंक लोन चाहिए, तो रास्ते आसान कीजिए। काम का मौका चाहिए, तो दीजिए। सुरक्षित माहौल चाहिए, तो सुनिश्चित कीजिए।

और अगर वह राजनीति में आकर आपसे असहमत हो जाए, तो उसके विचारों से लड़िए, उसके कपड़ों से नहीं।

उसके काम पर सवाल उठाइए, चरित्र पर कीचड़ मत फेंकिए।

उसकी नीति की आलोचना कीजिए, निजी जिंदगी को चुनावी पोस्टर मत बनाइए।

लोकतंत्र में कोई भी नेता आलोचना से ऊपर नहीं है। न पुरुष, न महिला। लेकिन आलोचना और गाली में फर्क होता है। बहस और बेहूदगी में फर्क होता है। सवाल और चरित्रहनन में फर्क होता है।

अफसोस, हमारी सियासत में यह फर्क तेजी से धुंधला होता जा रहा है।

सबसे बड़ा पाखंड तब दिखाई देता है, जब कोई नेता सुबह महिला सम्मान पर लंबा भाषण देता है और शाम तक उसकी पार्टी के समर्थक किसी महिला विरोधी पर सोशल मीडिया में गंदगी उछाल रहे होते हैं। फिर पार्टी कहती है, “हमने तो नहीं कहा।”

यह कोई जवाब नहीं है।

घर में आग लगी हो और मालिक कहे कि माचिस मैंने नहीं जलाई, तो क्या घर बच जाएगा?

राजनीतिक दलों को समझना होगा कि उनकी ट्रोल सेना उनसे पूरी तरह अलग नहीं है। लगातार गाली, धमकी और निजी हमले होते रहें और पार्टी चुप बनी रहे, तो वह चुप्पी भी समर्थन का संदेश देती है।

कई बार चुप रहना समर्थन की सबसे आरामदेह भाषा होता है।

महिलाओं को राजनीति में देवी बनाकर रखने की जरूरत नहीं है। उन्हें आलोचना से बचाने की भी जरूरत नहीं है। बस, उन्हें इंसान और बराबर का नागरिक मानने की जरूरत है।

बहुत बड़ी मांग नहीं है।

वे गलत हों, तो खुलकर आलोचना कीजिए। भ्रष्ट हों, तो जांच कीजिए। काम कमजोर हो, तो चुनाव में हराइए। लेकिन सिर्फ इसलिए हमला मत कीजिए कि वे महिला हैं और शायद जवाब नहीं देंगी।

अब वक्त बदल रहा है। महिलाएं जवाब दे रही हैं। अदालतों का दरवाजा खटखटा रही हैं। कारोबार खड़ा कर रही हैं। राजनीति में अपनी जगह बना रही हैं। धीरे-धीरे संदेश साफ हो रहा है कि पुरानी गाली-गलौज वाली सियासत हमेशा नहीं चलेगी।

महिला-विरोधी सोच कोई प्राकृतिक आपदा नहीं है। यह न मानसून है, न भूकंप। इसे इंसानों ने बनाया है। इसलिए इंसान ही इसे बदल सकते हैं।

शुरुआत उस सबसे आसान बहाने को छोड़कर करनी होगी, “अरे, राजनीति में तो यह सब चलता है।”

नहीं। बहुत चल लिया।

बहुत गालियां दे लीं। बहुत चरित्र उछाल लिए। बहुत निजी जिंदगियां नीलाम कर लीं। अब मुद्दों पर लौटिए।

किसी महिला नेता को सिर्फ मुखर, सक्रिय और महत्वाकांक्षी होने की सजा देना उसके साथ ही नहीं, लोकतंत्र के साथ भी नाइंसाफी है। सियासत की असली लड़ाई विचारों की होनी चाहिए, गालियों की नहीं। नीतियों की होनी चाहिए, निजी जिंदगी की नहीं।

और याद रखिए, जिस लोकतंत्र में आधी आबादी को बोलने से पहले गाली की कीमत सोचनी पड़े, वहां लोकतंत्र का माइक तो चालू है, लेकिन उसकी आवाज अभी भी आधी है।

Sunday, August 9, 2026

 राजनीति को चाहिए नया खून: छात्र संघों की वापसी अब क्यों जरूरी है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

11 अगस्त 2026

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कहते हैं, जब राजनीति में नया खून नहीं आता, तो पुरानी नसों में जंग लगने लगती है। वही चेहरे, वही नारे, वही वादे और वही कुर्सी की दौड़। देश की राजनीति आज कुछ ऐसी ही थकी हुई दिखाई देती है।

इधर एक अजीब-सी जेन-ज़ी मुहिम ने सबका ध्यान खींचा है। दावा किया जा रहा है कि “कॉकरोचों के नेतृत्व” में चल रही यह नई पीढ़ी की हलचल युवाओं की बेचैनी और बगावत का प्रतीक बन गई है। नाम भले ही मज़ाकिया हो, मगर सवाल गंभीर है। जब युवा अपनी बात कहने के लिए इतने अजीब प्रतीक खोज रहे हैं, तब हमारे कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में उनके अपने लोकतांत्रिक मंच आखिर कहाँ हैं?

जवाब साफ है: हमने छात्र राजनीति का दरवाज़ा ही बंद कर दिया।

छात्र संघ कभी विश्वविद्यालयों की जान हुआ करते थे। पढ़ाई के साथ बहस होती थी, चुनाव होते थे, भाषण होते थे, सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे। छात्र अपनी शिकायतें लेकर संगठित ढंग से प्रशासन के सामने जाते थे। नेतृत्व सीखते थे, हारना सीखते थे और जीत को संभालना भी सीखते थे।

आज हम चाहते हैं कि युवा सीधे आईएएस बनें, सीईओ बनें, वैज्ञानिक बनें और नेता भी बनें। मगर नेता बनने की नर्सरी बंद कर दी गई है। फिर हम शिकायत करते हैं कि राजनीति में अच्छे लोग क्यों नहीं आते। यह तो वही बात हुई: खेत को पानी न दो और फसल से शिकायत करो।

1960 के दशक में शिक्षा आयोग ने भी छात्र संघों को महत्वपूर्ण माना था। सोच यह थी कि संगठित छात्र गतिविधियाँ युवाओं में आत्म-अनुशासन, स्वशासन और नेतृत्व की भावना पैदा करती हैं। कई जगह छात्र संघ कैंटीन चलाते थे, सहकारी दुकानें संभालते थे और साहित्यिक व सांस्कृतिक कार्यक्रम कराते थे।

मतलब साफ था। विश्वविद्यालय केवल डिग्री बाँटने की फैक्टरी नहीं है। वह नागरिक तैयार करने की जगह भी है।

भारत के इतिहास में छात्र आंदोलनों ने कई बार राजनीति की दिशा बदल दी। 1965 का तमिलनाडु का हिंदी-विरोधी आंदोलन हो या 1974 का गुजरात का नवनिर्माण आंदोलन, छात्रों ने अपनी ताकत दिखाई। मामूली-सी मेस फीस बढ़ने से शुरू हुआ गुजरात का आंदोलन भ्रष्टाचार और महंगाई के खिलाफ बड़ा जनांदोलन बन गया।

बिहार में छात्र आंदोलन से जयप्रकाश नारायण की “संपूर्ण क्रांति” का नारा उठा। उसी दौर ने देश की राजनीति को झकझोर दिया। बाद में आपातकाल और 1977 के चुनावों ने भारतीय लोकतंत्र का नया अध्याय लिखा।

कई बड़े राष्ट्रीय नेता छात्र राजनीति की ही देन रहे हैं। अरुण जेटली ने दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति सीखी। लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार बिहार के छात्र आंदोलनों से उभरे। सीताराम येचुरी और प्रकाश करात ने जेएनयू की छात्र राजनीति में अपने कदम जमाए। ममता बनर्जी ने भी छात्र जीवन से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की।

नितिन गडकरी, राजनाथ सिंह और अशोक गहलोत जैसे अनेक नेताओं ने भी युवावस्था में संगठन और सार्वजनिक जीवन का अनुभव पाया।

आज सवाल यह है कि अगली पीढ़ी कहाँ से आएगी?

व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी से?

इंस्टाग्राम रील से?

या किसी “कॉकरोच आंदोलन” के वायरल मीम से?

युवा ऊर्जा को आप दबा सकते हैं, खत्म नहीं कर सकते। जब उसे लोकतांत्रिक रास्ता नहीं मिलता, वह किसी और रास्ते से बाहर आती है। कभी अचानक विरोध प्रदर्शन बनकर, कभी सोशल मीडिया के गुस्से में और कभी किसी अजीब प्रतीक के पीछे।

खाली जगह कभी खाली नहीं रहती। लोकतंत्र में भी नहीं।

छात्र संघों को खत्म करने का एक तर्क हमेशा दिया गया: हिंसा, गुटबाजी और बाहरी राजनीतिक दलों का दखल। यह बात पूरी तरह गलत नहीं थी। कई छात्र संघ सचमुच राजनीति के अखाड़े बन गए। पढ़ाई पीछे छूट गई और पोस्टरबाजी आगे आ गई। कैंपस में बहस की जगह कभी-कभी लाठी और धमकी ने ले ली।

मगर बीमारी के कारण मरीज को मार देना इलाज नहीं होता।

गलत छात्र राजनीति को सुधारना चाहिए था, छात्र राजनीति को दफन नहीं करना चाहिए था।

उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों और विश्वविद्यालयों में छात्र संघ चुनाव बंद या सीमित किए गए। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, लखनऊ विश्वविद्यालय और कई अन्य संस्थानों में निर्वाचित छात्र प्रतिनिधित्व कमजोर पड़ता गया या खत्म हो गया। प्रशासन ने शांति तो पा ली, मगर छात्रों की लोकतांत्रिक आवाज भी काफी हद तक खो गई।

अब हमें नई सोच के साथ छात्र संघों को वापस लाना चाहिए।

पुराने ढर्रे पर नहीं। नए संविधान और साफ नियमों के साथ।

छात्र संघों का मुख्य काम चुनावी राजनीति नहीं होना चाहिए। उनका ध्यान छात्रों की असली समस्याओं पर रहे: फीस, छात्रावास, पुस्तकालय, खेल, सुरक्षा, परिवहन और कैंपस सुविधाएँ। बहस, वाद-विवाद, सांस्कृतिक कार्यक्रम और खेलों को भी बढ़ावा दिया जाए।

हर चुने हुए छात्र प्रतिनिधि को नेतृत्व का प्रशिक्षण मिले। उसे बातचीत करना, बजट बनाना, विवाद सुलझाना और अलग राय रखने वालों को साथ लेकर चलना सिखाया जाए। चुनाव लड़ना आसान है, लोकतांत्रिक ढंग से काम करना मुश्किल है। यही हुनर सीखना जरूरी है।

विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्र प्रतिनिधियों की नियमित बैठकें हों। शिकायत सड़क पर पहुँचने से पहले बातचीत की मेज तक पहुँचे। अध्यापक मार्गदर्शन करें, मगर छात्रों की आवाज दबाएँ नहीं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राजनीति में नए लोगों की आमद का कोई विकल्प नहीं है। लोकतंत्र को हर पीढ़ी अपना नया नेतृत्व देती है। यदि युवाओं को कॉलेज में बोलने, बहस करने, हारने, जीतने और जिम्मेदारी लेने का मौका नहीं मिलेगा, तो राजनीति बूढ़ी होती जाएगी।

आज जेन-ज़ी अपनी भाषा खुद बना रही है। कभी मीम, कभी हैशटैग, कभी अजीबोगरीब प्रतीक और कभी “कॉकरोच” जैसा नाम। हमें इस पर केवल हँसना नहीं चाहिए। इसके पीछे छिपी बेचैनी को समझना चाहिए।

युवा कहना चाहते हैं: “हमें सुना जाए।”

कॉलेज और विश्वविद्यालय इस आवाज के लिए सबसे स्वाभाविक जगह हैं।

राजनीति को नया खून चाहिए। उसे किसी प्रयोगशाला से नहीं लाया जा सकता। वह कैंपस की बहसों, छात्र सभाओं, चुनावों और आंदोलनों से ही निकलेगा। छात्र संघ लोकतंत्र की वह पाठशाला हैं, जहाँ भविष्य के नेता पहली बार जनता का सामना करते हैं।

परीक्षा पास करने से नौकरी मिल सकती है। मगर समाज चलाने के लिए जिम्मेदारी, संवाद और नेतृत्व चाहिए।

इनकी कोई गाइडबुक नहीं होती।

इन्हें जीना पड़ता है।

छात्र संघों को फिर से जीवित कीजिए। उन्हें अनुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ चलाइए। बाहरी दलों की कठपुतली बनने से बचाइए। मगर युवाओं का लोकतांत्रिक मंच मत छीनिए।

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Syndicated by NPA


Saturday, August 8, 2026

 


कुर्सी जनता की, तिजोरी अपनी? 

भ्रष्ट अफसरशाही के लालच का कड़वा सच

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बृज खंडेलवाल द्वारा

10 अगस्त 2026

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दिल्ली के कोचिंग सेंटरों के बाहर खड़े युवाओं से पूछिए: क्या कर रहे हो? जवाब लगभग एक जैसा मिलेगा: “UPSC की तैयारी कर रहे हैं।”

क्यों?

“देश की सेवा करनी है। समाज बदलना है। संविधान की रक्षा करनी है।”

इरादे नेक हैं। सपने बड़े हैं। मगर कहानी का अगला अध्याय हमेशा इतना खूबसूरत नहीं होता।

कुर्सी मिलते ही कुछ लोगों की सेवा का दायरा बदल जाता है। देश पीछे छूट जाता है और खुद आगे आ जाता है।

सरकारी अफसर को तनख्वाह मिलती है। सरकारी मकान मिलता है। गाड़ी मिलती है। चिकित्सा सुविधा मिलती है। भत्ते मिलते हैं। रुतबा मिलता है। नौकरी के बाद पेंशन भी मिलती है।

तो फिर सवाल सीधा है; 

साहब को और क्या चाहिए?

यही सवाल उन अधिकारियों से पूछा जाना चाहिए जिन पर रिश्वत, कमीशन, सरकारी धन की हेराफेरी या पद के दुरुपयोग के आरोप लगते रहे हैं।

IAS और IPS कोई मामूली नौकरी नहीं है। UPSC की कठिन परीक्षा पास करके अधिकारी प्रशासन और शासन की सबसे ताकतवर गलियों तक पहुंचते हैं। उनके हाथ में फैसले होते हैं। फाइलें होती हैं। ठेके होते हैं। नीतियों को लागू करने की ताकत होती है।

कभी भारतीय नौकरशाही को “Steel Frame of India” कहा गया था।

लेकिन लोहे का फ्रेम भी जंग खा सकता है।

खतरा वहीं शुरू होता है जहां ताकत बहुत हो और निगरानी कम। विवेकाधिकार बड़ा हो और जवाबदेही छोटी। फाइल रोकने की ताकत हो, लेकिन जवाब देने की मजबूरी न हो।

फिर तनख्वाह कम नहीं पड़ती।

नीयत छोटी पड़ जाती है।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी भ्रष्टाचार के पीछे कई कारण गिनाते हैं: अत्यधिक विवेकाधिकार, पारदर्शिता की कमी, राजनीतिक-नौकरशाही गठजोड़, कमजोर जवाबदेही, धीमी न्याय प्रक्रिया, कम सजा दर और व्यक्तिगत लालच। इन सबके मेल से पद सेवा का माध्यम न रहकर निजी लाभ का जरिया बन सकता है।

भ्रष्टाचार के लिए अक्सर कम वेतन, महंगाई और आर्थिक मजबूरी का बहाना दिया जाता है। लेकिन वरिष्ठ नौकरशाहों के मामले में यह दलील ज्यादा दूर तक नहीं जाती।

जिस अधिकारी को सम्मानजनक वेतन, सरकारी आवास, वाहन, चिकित्सा सुविधा और दूसरी सुविधाएं मिल रही हों, उसके लिए रिश्वतखोरी को मजबूरी कहना जनता के जख्म पर नमक छिड़कना है।

सोशल एक्टिविस्ट पद्मिनी अय्यर इसे ज्यादा कड़वे अंदाज में कहती हैं:

“झोला लेकर सिस्टम में दाखिल होते हैं, ट्रकों का काफिला लेकर निजी महल के लिए विदा होते हैं।”

बात कड़वी है, लेकिन सवाल जरूरी है।

नाम बड़े हैं। मामले पुराने हैं। और पैटर्न बार-बार सामने आता है।

पूर्व कोयला सचिव एच.सी. गुप्ता को कोयला आवंटन से जुड़े कई मामलों में अदालत ने दोषी ठहराया। झारखंड की IAS अधिकारी पूजा सिंघल पर मनरेगा धन और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े गंभीर आरोप लगे। छत्तीसगढ़ के अनिल टुटेजा का नाम कथित शराब सिंडिकेट मामले में सामने आया।

हरियाणा में पंकज अग्रवाल और प्रदीप कुमार से जुड़े मामलों में बैंक फंड की कथित हेराफेरी और फर्जी दस्तावेजों के आरोप सामने आए। राजस्थान के सुबोध अग्रवाल का नाम जल जीवन मिशन की टेंडर प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं से जोड़ा गया। उत्तर प्रदेश के अभिषेक प्रकाश पर रिश्वत और कमीशन से जुड़े आरोप लगे। झारखंड के छवि रंजन भूमि से जुड़े मामलों में जांच के घेरे में आए।

इनमें से जहां अदालत का अंतिम फैसला नहीं आया है, वहां आरोप को दोषसिद्धि कहना नाइंसाफी होगी।

लेकिन सवाल फिर भी खड़ा होता है; 

आखिर इतने मामले क्यों सामने आते हैं?

क्या सरकारी कुर्सी सचमुच सेवा का माध्यम है?

या कुछ लोगों के लिए वह कमाई का सबसे सुरक्षित रास्ता बन चुकी है?

भ्रष्टाचार का कोई जेंडर नहीं होता

भ्रष्टाचार को भी अब जेंडर की नजर से देखने की जरूरत नहीं।

भ्रष्टाचार न पुरुष होता है, न महिला।

जिस तरह कोई पुरुष अधिकारी कानून तोड़ सकता है, उसी तरह महिला अधिकारी भी जांच और कानून के दायरे में आ सकती है। पूजा सिंघल का मामला इसका चर्चित उदाहरण है।

NEET-UG पेपर लीक की जांच में भी महिलाओं समेत कई लोगों के नाम सामने आए। कुछ विशेषज्ञों और अन्य आरोपियों पर प्रश्न याद करने, साझा करने या पैसे के बदले उपलब्ध कराने जैसे आरोप लगे।

संदेश साफ है:

ईमानदारी का कोई जेंडर नहीं। बेईमानी का भी नहीं।

हर भ्रष्टाचार कांड के बाद वही राजनीतिक तमाशा शुरू होता है।

विपक्ष कहता है: सरकार नाकाम है।

सरकार कहती है: हमने कार्रवाई की।

फिर प्रेस कॉन्फ्रेंस होती है। बयान आते हैं। जांच एजेंसियां सक्रिय होती हैं। गिरफ्तारियां होती हैं। चार्जशीट दाखिल होती है।

और उसके बाद?

मामला अदालत पहुंचता है।

फिर तारीख पर तारीख।

गिरफ्तारी खबर बन जाती है, लेकिन सजा इतिहास बन जाती है।

CBI और ED जैसी एजेंसियों ने भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामलों में जांच और कार्रवाई की है। राज्य सरकारों ने भी अधिकारियों को निलंबित किया और विभागीय जांच शुरू की।

लेकिन छापा, गिरफ्तारी या चार्जशीट अपने आप में भ्रष्टाचार का इलाज नहीं है।

अंतिम कसौटी अदालत का फैसला है।

और फैसला जितना देर से आएगा, व्यवस्था की कमजोरी पर भ्रष्टाचारी का भरोसा उतना ही बढ़ेगा।

सिर्फ वेतन बढ़ाने से भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा।

अधिकारी को अच्छा वेतन दीजिए। सम्मान दीजिए। सुविधाएं दीजिए। लेकिन अगर नीयत में खोट है, तो लालच का पेट कभी नहीं भरता।

लालच की कोई सैलरी स्लिप नहीं होती।

सरकारी अधिकारी जनता के पैसे और अधिकारों के रखवाले हैं। वे सरकारी कुर्सी के मालिक नहीं हैं। सरकारी पद निजी जागीर नहीं है।

इसलिए भ्रष्टाचार रोकना है तो सिर्फ भाषण नहीं, नतीजे चाहिए।

तेज सुनवाई चाहिए।

संपत्ति की सख्त जांच चाहिए।

फैसलों में पारदर्शिता चाहिए।

जहां जरूरत हो, विवेकाधिकार सीमित करना होगा।

और सबसे जरूरी: कानून की नजर में कोई बड़ा नहीं होना चाहिए।

न IAS।

न IPS।

न नेता।

न कोई रसूखदार।

कुर्सी चाहे कितनी भी ऊंची हो, कानून उससे ऊंचा होना चाहिए।

क्योंकि कुर्सी जनता देती है।

कुर्सी के साथ तिजोरी नहीं देती।

और जिस दिन अफसर यह फर्क भूल जाएगा, उसी दिन लोकसेवा, निजी सेवा में बदल जाएगी।

Friday, August 7, 2026

 


आरटीआई या रंगदारी का नया धंधा?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

8 अगस्त 2026

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सूचना का अधिकार कानून कभी भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार माना जाता था। इसे जनता की आंख और कान कहा गया। उम्मीद थी कि सरकारी फाइलों में छिपे सच बाहर आएंगे और अफसर जवाबदेह बनेंगे। लेकिन आज तस्वीर बदलती दिख रही है। कई जगह आरटीआई जनहित का नहीं, बल्कि निजी फायदे, ब्लैकमेल और उगाही का औजार बन चुकी है। कानून की आड़ में कुछ लोगों ने पूरा कारोबार खड़ा कर लिया है।

मैसूर विश्वविद्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम में कर्नाटक के पूर्व सूचना आयुक्त डॉ. एल. कृष्णमूर्ति ने इसी खतरे की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि फर्जी आरटीआई कार्यकर्ताओं की बढ़ती संख्या इस कानून की आत्मा को खत्म कर रही है। उनके अनुसार, जिस कानून ने 2जी जैसे बड़े घोटाले उजागर किए, उसी का इस्तेमाल अब सरकारी दफ्तरों को परेशान करने और बेवजह हजारों पन्नों की सूचनाएं मांगने में हो रहा है।

देशभर से सामने आए मामले इस चिंता को और बढ़ा रहे हैं।

हिमाचल प्रदेश के ऊना में एक स्वयंभू आरटीआई कार्यकर्ता पर आरोप लगा कि उसने पत्थर खदान संचालकों से 75 लाख रुपये की मांग की। आरटीआई से दस्तावेज जुटाए गए और फिर शिकायत करने की धमकी देकर रकम मांगी गई। सतर्कता विभाग ने जाल बिछाकर उसे पहली किश्त लेते हुए गिरफ्तार किया।

असम में दुलाल बोरा का मामला और भी चौंकाने वाला है। उस पर उगाही और धोखाधड़ी के दर्जनों मुकदमे दर्ज हुए। बताया गया कि उसने दो हजार से अधिक दूसरी अपीलें दायर कीं और कई बार एक ही दिन में सौ से ज्यादा आरटीआई आवेदन भेज दिए। आरोप था कि बाद में अधिकारियों और ठेकेदारों से पैसे लेकर मामलों को ठंडे बस्ते में डालने का खेल चलता था।

हरियाणा के गुरुग्राम में एक आरटीआई कार्यकर्ता और एक यूट्यूबर पर स्कूल प्रबंधन से लाखों रुपये की उगाही का आरोप लगा। पहले लगातार आरटीआई लगाई गईं, फिर अदालत और आयकर विभाग की कार्रवाई का डर दिखाया गया। अंत में शिकायतें वापस लेने के बदले मोटी रकम मांगी गई।

गुजरात के सूरत में तो यह पूरा नेटवर्क बन गया। पुलिस ने दर्जनों मुकदमे दर्ज किए। आरोप था कि कुछ लोग नगर निगम से भवनों की जानकारी आरटीआई के जरिए हासिल करते, फिर मापने वाली फीता लेकर खुद को निरीक्षक बताकर निर्माण स्थलों पर पहुंच जाते। बिल्डरों और मकान मालिकों को कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर हजारों से लेकर लाखों रुपये तक वसूले जाते।

आंध्र प्रदेश में दो लोगों पर सूचना आयोग ने आगे आरटीआई लगाने तक पर रोक लगा दी। आयोग ने पाया कि वे एक के बाद एक दर्जनों अपीलें और शिकायतें दायर कर सरकारी अधिकारियों को लगातार परेशान कर रहे थे। कई आवेदन वर्षों पुराने रिकॉर्ड मांगते थे, जिनका जनहित से कोई सीधा संबंध नहीं था।

तमिलनाडु के थेनी में एक व्यक्ति ने 781 आरटीआई आवेदन केवल जिला न्यायालय के खिलाफ दायर कर दिए। नतीजा यह हुआ कि सरकारी कामकाज प्रभावित होने लगा। सूचना आयोग ने उस पर जुर्माना लगाया और इसे कानून के खुले दुरुपयोग का मामला बताया।

यह केवल कुछ अलग-थलग घटनाएं नहीं हैं। इन मामलों का तरीका लगभग एक जैसा है। पहले आरटीआई डालो। फिर दस्तावेज जुटाओ। उसके बाद शिकायत, जांच या मीडिया में बदनामी का डर दिखाओ। आखिर में समझौते के नाम पर पैसे मांगो। कई जगह निजी दुश्मनी निकालने के लिए भी आरटीआई का इस्तेमाल किया गया। कहीं एक ही विषय पर सैकड़ों आवेदन भेजे गए, तो कहीं पूरे विभाग को कागजों के ढेर में दबा दिया गया।

सर्वोच्च न्यायालय भी कई बार ऐसी प्रवृत्ति पर चिंता जता चुका है। अदालत ने कहा कि आरटीआई का इस्तेमाल ईमानदार अधिकारियों को डराने या सरकारी कामकाज रोकने के लिए नहीं होना चाहिए। एक अन्य टिप्पणी में अदालत ने यहां तक कहा कि आरटीआई एक्टिविज्म कुछ मामलों में नया कारोबार बनता जा रहा है।

सबसे दुखद बात यह है कि ऐसे लोग खुद को समाजसेवी और भ्रष्टाचार विरोधी योद्धा बताकर कानून की साख को चोट पहुंचाते हैं। जनता का भरोसा कमजोर होता है। सरकारी दफ्तर हर आवेदक को शक की नजर से देखने लगते हैं। असली और नकली के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है।

आरटीआई कानून का जन्म जनता को ताकत देने के लिए हुआ था, लेकिन कुछ स्वार्थी तत्वों ने इसे दबाव, धमकी और वसूली के हथियार में बदलने की कोशिश की है। जब अधिकार की आड़ में कारोबार शुरू हो जाए, तो सबसे बड़ा नुकसान उसी कानून की विश्वसनीयता को होता है। आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि सूचना मांगने का अधिकार कहीं कुछ लोगों के लिए डर और सौदेबाजी का लाइसेंस तो नहीं बनता जा रहा।

Monday, August 3, 2026

 अंग दान, महा दान

बीस हज़ार नई ज़िंदगियाँ: अंगदान ने बदली भारत की तस्वीर

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

5 अगस्त 2026

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आगरा का सरोजिनी नायडू मेडिकल कॉलेज अब अंग प्रत्यारोपण सेवाओं के विस्तार की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। सुपर स्पेशियलिटी विंग में किडनी प्रत्यारोपण की सभी प्रमुख तैयारियां पूरी हो चुकी हैं और जल्द नियमित प्रत्यारोपण शुरू होने की उम्मीद है। यहां कॉर्निया प्रत्यारोपण की सुविधा पहले से उपलब्ध है, जबकि भविष्य में लिवर, हृदय और फेफड़ों के प्रत्यारोपण की भी योजना है। मेडिकल कॉलेज का एनाटॉमी विभाग देहदान (कैडवर डोनेशन) भी स्वीकार करता है। दान किए गए शरीरों का उपयोग एमबीबीएस और पीजी छात्रों के प्रशिक्षण, एनाटॉमी अध्ययन तथा सर्जिकल शिक्षा में किया जाता है। देहदान के लिए इच्छुक व्यक्ति एनाटॉमी विभाग में पंजीकरण करा सकते हैं।

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हाल ही में गुजरात में वंदे भारत एक्सप्रेस ने ग्रीन कॉरिडोर की मदद से जीवित हृदय समय पर पहुँचाकर इतिहास रचा।

एक परिवार अपने प्रियजन को हमेशा के लिए विदा कर रहा था। उसी समय, किसी दूसरे अस्पताल में एक मरीज नई जिंदगी की उम्मीद से ऑपरेशन थिएटर में ले जाया जा रहा था। एक घर का ग़म, दूसरे घर की खुशी बन गया। 

अंगदान की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि इंसान इस दुनिया से जाने के बाद भी कई लोगों की धड़कनों में ज़िंदा रह सकता है।

भारत ने वर्ष 2025 में अंग प्रत्यारोपण के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की। पहली बार देश में 20,138 अंग प्रत्यारोपण किए गए। यह पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 6-7 प्रतिशत अधिक है। वर्ष 2013 में यह संख्या केवल 4,990 थी। यानी एक दशक में अंग प्रत्यारोपण चार गुना से भी अधिक बढ़ गया। दिल्ली-एनसीआर सबसे आगे रहा, जहाँ 4,500 से अधिक प्रत्यारोपण हुए। इसके बाद तमिलनाडु, महाराष्ट्र, तेलंगाना और केरल का स्थान रहा। मृत्यु के बाद अंगदान करने वालों में तमिलनाडु ने फिर मिसाल पेश की। महाराष्ट्र, तेलंगाना और कर्नाटक भी इस दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं।

आज भारत जीवित दाताओं से अंग प्रत्यारोपण में दुनिया का अग्रणी देश है। कुल प्रत्यारोपण की संख्या के मामले में भारत अब केवल अमेरिका और चीन से पीछे है। यह उपलब्धि देश के डॉक्टरों, सर्जनों, नर्सों और स्वास्थ्यकर्मियों की मेहनत का नतीजा है। साथ ही, यह उन परिवारों की संवेदनशील सोच को भी सलाम है, जिन्होंने अपने दुःख के बीच किसी अनजान व्यक्ति को जीवन देने का फैसला किया।

एक दाता परिवार के सदस्य ने कहा, “हमारा बेटा तो चला गया, लेकिन उसकी किडनी और लीवर अब दो और परिवारों में धड़क रहे हैं। हमें लग रहा है कि वो अब भी कहीं ज़िंदा है।” एक लाभार्थी, जो कई साल से डायलिसिस पर था, भावुक होकर बोला, “जब डॉक्टर ने कहा कि अंग मिल गया है, तो लगता था जैसे मौत के मुँह से वापस लौट आया हूँ। अब मैं बच्चों के साथ खेल सकता हूँ। दाता परिवार का शुक्रिया अदा करने के शब्द नहीं हैं।”

विशेषज्ञ भी इस बदलाव को सराहते हैं। प्रसिद्ध ट्रांसप्लांट सर्जन  कहते हैं, “अंगदान सबसे बड़ा उपहार है। कृपया अपने अंग स्वर्ग न ले जाएँ; स्वर्ग को पता है कि हमें यहाँ उनकी ज़रूरत है।” 

राष्ट्रीय डिजिटल पोर्टल पर 2023 से अब तक पाँच लाख से अधिक लोगों ने अंगदान का संकल्प लिया है। ‘जुग-जुग जियो अभियान’, NOTTO मोबाइल ऐप और ‘वन नेशन, वन पॉलिसी’ ने प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया है। कई नए एम्स में किडनी और लीवर प्रत्यारोपण की सुविधाएँ बढ़ी हैं। 

फिर भी चुनौती बाकी है। हर साल लाखों मरीज अंगों की प्रतीक्षा में हैं। बहुत से लोग समय पर अंग न मिलने से जान गँवा देते हैं। 

यही कमी ग्रे मार्केट को बढ़ावा देती है। ग़रीबों से किडनी चुराकर या जबरदस्ती बेचने के मामले समय-समय पर सामने आते रहते हैं। दलाल ग़रीब किसानों, मजदूरों और कर्ज में डूबे लोगों को फुसलाते हैं। नकली रिश्ते, फर्जी दस्तावेज़ बनाकर अवैध प्रत्यारोपण कराए जाते हैं। महाराष्ट्र, तमिलनाडु, दिल्ली-एनसीआर और यहाँ तक कि बांग्लादेश-कम्बोडिया से जुड़े अंतरराष्ट्रीय रैकेट भी पकड़े गए हैं। ग़रीब दाता को थोड़े पैसे मिलते हैं, जबकि मरीज से लाखों वसूले जाते हैं। कई बार किडनी चुरा ली जाती है या धोखे से निकाल ली जाती है। यह काला व्यापार मानवीय गरिमा का घोर अपमान है।

कानून सख्त है, लेकिन जागरूकता और पारदर्शिता बढ़ाकर ही इस ग्रे मार्केट पर अंकुश लगाया जा सकता है। 

जब मृत्यु के बाद अंगदान समाज की स्वाभाविक संस्कृति बनेगी, तभी असली सफलता मिलेगी। आख़िरकार, इंसान की सबसे बड़ी विरासत उसकी दौलत नहीं, बल्कि वह जीवन है जो वह दूसरों को देकर जाता है। अंगदान सचमुच मृत्यु के बाद भी जीवन का सबसे सुंदर उत्सव है।

 गेट कीपर्स का दौर खत्म: सेल्फ पब्लिशिंग ने बदल दी है किताबों की दुनिया

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

5 अगस्त 2026

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सन् 1455 में योहानेस गुटेनबर्ग ने जब चल अक्षरों वाली मुद्रण मशीन का आविष्कार किया, तब शायद उन्हें भी अंदाज़ा नहीं रहा होगा कि एक दिन किताबें छापना इतना आसान हो जाएगा कि हर लेखक अपना स्वयं का प्रकाशक बन सकेगा। गुटेनबर्ग की छापाखाने ने ज्ञान को राजमहलों और मठों की दीवारों से निकालकर आम लोगों तक पहुंचाया। अब, लगभग साढ़े पांच सौ वर्ष बाद, सेल्फ पब्लिशिंग उसी क्रांति को एक नए मुकाम पर ले गई है।

आज हालात यह हैं कि जहां देखिए, वहां सेल्फ पब्लिशिंग कंपनियों की भरमार है। सोशल मीडिया, गूगल और यूट्यूब पर हर दिन दर्जनों विज्ञापन दिखाई देते हैं: "अपनी किताब छपवाइए", "बेस्टसेलर लेखक बनिए", "सिर्फ कुछ दिनों में अपनी पुस्तक प्रकाशित कराइए।" ये कंपनियां पांडुलिपि तैयार करने, संपादन, कवर डिजाइन, ISBN, ई-बुक, प्रिंटिंग, अमेज़न लिस्टिंग और प्रचार तक की हर सुविधा एक ही छत के नीचे उपलब्ध करा रही हैं। पैकेज लगभग ₹2,999 से शुरू होकर ₹50,000 या उससे अधिक तक जाते हैं। इतनी किफायती और आसान प्रक्रिया देखकर कोई भी व्यक्ति यह सोच सकता है: "क्यों न मैं भी अपनी किताब प्रकाशित करूं?"

एक समय था जब किताब लिखना ही काफी नहीं था। असली इम्तिहान किसी प्रकाशक को यह विश्वास दिलाना होता था कि आपकी पांडुलिपि छपने लायक है। लेखक वर्षों तक शोध करते, लिखते, बार-बार संशोधन करते और फिर भी अक्सर उनके हिस्से में केवल अस्वीकृति या खामोशी आती थी। न जाने कितनी उत्कृष्ट रचनाएं पाठकों तक पहुंचने से पहले ही प्रकाशकों की मेज पर दम तोड़ देती थीं।

सदियों तक किताब लिखना ही सबसे बड़ी चुनौती नहीं था। असली इम्तिहान था किसी प्रकाशक को यह यकीन दिलाना कि आपकी किताब छपने लायक है। लेखक बरसों तक मेहनत करते, रिसर्च करते, कई-कई बार पांडुलिपि लिखते और सुधारते। फिर भी जवाब में या तो एक शालीन-सा "अफसोस" मिलता, या फिर बिल्कुल खामोशी। न जाने कितनी शानदार किताबें सिर्फ इसलिए पाठकों तक नहीं पहुंच सकीं क्योंकि वे कुछ प्रकाशकों की कारोबारी सोच या निजी पसंद पर खरी नहीं उतरीं।

पारंपरिक प्रकाशन ने साहित्य को बहुत कुछ दिया है। बड़े-बड़े लेखकों को पहचान मिली और अनगिनत कालजयी रचनाएं दुनिया तक पहुंचीं। लेकिन यह भी सच है कि प्रकाशकों ने लंबे समय तक साहित्य के "दरबान" की भूमिका निभाई। वही तय करते थे कि किस लेखक की आवाज़ लोगों तक पहुंचेगी और किसकी नहीं।

सोचिए, अगर किसी जमाने में शेक्सपीयर, कालिदास, प्रेमचंद या एमिली डिकिंसन जैसे रचनाकारों की पांडुलिपियां किसी प्रकाशक की मेज पर ही ठुकरा दी जातीं, तो दुनिया कितना बड़ा साहित्यिक ख़ज़ाना खो देती। शायद ऐसे न जाने कितने प्रतिभाशाली लेखक इतिहास के अंधेरे में गुम हो गए, जिनकी रचनाएं कभी छप ही नहीं सकीं।

लेकिन अब तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है।

डिजिटल तकनीक, सस्ती प्रिंटिंग, प्रिंट-ऑन-डिमांड, ई-बुक्स और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म ने प्रकाशन की दुनिया में एक नई इंकलाबी हवा चला दी है। अब किसी लेखक को अपनी बात दुनिया तक पहुंचाने के लिए किसी प्रकाशक की इजाज़त का इंतजार नहीं करना पड़ता। वह अपनी किताब खुद प्रकाशित कर सकता है, उसकी कीमत तय कर सकता है, डिजाइन चुन सकता है और सीधे पाठकों तक पहुंच सकता है। साहित्य पर कुछ गिने-चुने लोगों का एकाधिकार अब टूट रहा है।

इसके आंकड़े भी इसी बदलाव की गवाही देते हैं। अमेरिका में 2025 के दौरान चार मिलियन से अधिक किताबें प्रकाशित हुईं। इनमें लगभग साढ़े तीन मिलियन किताबें सेल्फ पब्लिशिंग के जरिए आईं। पारंपरिक प्रकाशकों की तुलना में अब स्वतंत्र रूप से प्रकाशित किताबों की संख्या पांच गुना से भी ज्यादा हो चुकी है। पिछले कुछ वर्षों में जहां पारंपरिक प्रकाशन की रफ्तार बेहद धीमी रही, वहीं सेल्फ पब्लिशिंग तेज़ी से आगे बढ़ी है।

पिछले कुछ महीनों में मेरी मुलाकात एक दर्जन से अधिक ऐसे लेखकों से हुई जिन्होंने अपनी किताबें स्वयं प्रकाशित कीं। उन्होंने मुझे अपने हस्ताक्षर वाली प्रतियां बड़े गर्व से भेंट कीं। उनके चेहरे पर आत्मविश्वास साफ झलक रहा था। वे किसी प्रकाशक की मंजूरी के मोहताज नहीं थे। उन्होंने अपनी रचनात्मक तकदीर खुद अपने हाथों में ले ली थी।

आज सेल्फ पब्लिशिंग केवल एक विकल्प नहीं रही, बल्कि हजारों लेखकों की पहली पसंद बनती जा रही है। कुछ वर्ष पहले तक लेखक किताब छपवाने, बाजार तक पहुंचाने और उसके प्रचार के लिए पूरी तरह प्रकाशकों पर निर्भर रहते थे। अब यह तस्वीर बदल चुकी है।

अमेज़न किंडल डायरेक्ट पब्लिशिंग (KDP), Amazon, Kobo और Google Play Books जैसे प्लेटफॉर्म ने पूरी दुनिया को एक खुला बाज़ार बना दिया है। अब आगरा, मैसूर या कोच्चि में बैठा कोई लेखक अपनी किताब अपलोड करता है और कुछ ही मिनटों में न्यूयॉर्क, लंदन या सिडनी का पाठक उसे खरीद सकता है।

प्रिंट-ऑन-डिमांड तकनीक ने प्रकाशन का खर्च भी काफी कम कर दिया है। अब हजारों प्रतियां पहले से छापकर गोदाम भरने की जरूरत नहीं पड़ती। जब कोई पाठक ऑर्डर देता है, तभी उसकी प्रति छपती है। इससे आर्थिक जोखिम लगभग खत्म हो जाता है।

किताबों के प्रचार का तरीका भी पूरी तरह बदल गया है। पहले लेखक अपने प्रकाशक की मेहरबानी पर निर्भर रहते थे। आज सोशल मीडिया हर लेखक का अपना मंच बन चुका है। किसी किताब की अच्छी समीक्षा, एक पॉडकास्ट, यूट्यूब इंटरव्यू, इंस्टाग्राम रील या वायरल पोस्ट रातों-रात हजारों पाठकों तक पहुंच सकती है। आज मुंहज़बानी प्रचार एक क्लिक की रफ्तार से पूरी दुनिया में फैल जाता है।

इस पूरी क्रांति में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ने भी नई जान फूंक दी है। अब AI लेखक की जगह नहीं लेता, बल्कि उसका मददगार बन गया है। शोध, विचारों की रूपरेखा, भाषा सुधार, संपादन, प्रूफरीडिंग, किताब की सज्जा, कवर डिजाइन, चित्र, अनुवाद और प्रचार सामग्री तैयार करने जैसे कई काम AI कुछ ही मिनटों में आसान कर देता है। इससे समय और खर्च दोनों बचते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि नए लेखक अब तकनीकी झंझटों से डरते नहीं हैं और आत्मविश्वास के साथ अपनी किताब प्रकाशित कर पा रहे हैं।

बेशक, AI कल्पनाशक्ति, संवेदनाएं और जीवन के अनुभवों की जगह कभी नहीं ले सकता। एक अच्छी कहानी, गहरी सोच और सच्ची भावनाएं अब भी इंसान ही रच सकता है। लेकिन AI उस सफर को कहीं ज्यादा आसान जरूर बना देता है।

कई दशक पहले, जब फोटोकॉपी मशीनें नई-नई आई थीं, तब ज़ेरॉक्स कंपनी के एक अधिकारी ने कहा था, "एक दिन हर व्यक्ति अपना खुद का प्रकाशक होगा।" उस समय यह बात किसी ख्वाब जैसी लगती थी। आज वह भविष्यवाणी सच साबित हो चुकी है।

फिर भी यह समझना जरूरी है कि सेल्फ पब्लिशिंग कोई जादू की छड़ी नहीं है। अगर किताब कमजोर है तो केवल खुद प्रकाशित कर देने से वह बेहतरीन नहीं बन जाएगी। अच्छी संपादन प्रक्रिया, आकर्षक डिजाइन, सावधानी से की गई प्रूफरीडिंग और लगातार प्रचार आज भी उतने ही जरूरी हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि अब लेखक इन सेवाओं को अपनी पसंद से चुन सकता है। उसे अपनी रचना का पूरा नियंत्रण किसी और के हवाले नहीं करना पड़ता।

सेल्फ पब्लिशिंग की सबसे बड़ी कामयाबी सिर्फ ज्यादा किताबें छापना नहीं है। इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है रचनात्मक आज़ादी। अब क्षेत्रीय भाषाओं के लेखक, छोटे विषयों पर लिखने वाले लोग, भूले-बिसरे इतिहास, नए प्रयोग और अलग सोच रखने वाले रचनाकार भी बिना किसी रुकावट के अपनी बात दुनिया के सामने रख सकते हैं।

इतिहास में पहली बार किसी लेखक की सफलता इस बात पर कम निर्भर है कि कोई प्रकाशक उसे पसंद करता है या नहीं। अब फैसला सीधे पाठक करते हैं। अगर रचना दमदार है तो वह अपनी जगह बना ही लेती है।

छापाखाने ने किताबों को जन्म दिया था। इंटरनेट ने उन्हें हर घर तक पहुंचा दिया। और सेल्फ पब्लिशिंग ने उन्हें सचमुच लोकतांत्रिक बना दिया है। शायद यही इक्कीसवीं सदी की सबसे बड़ी साहित्यिक क्रांति है।

Sunday, August 2, 2026

 दिल्ली-हरियाणा की गंदगी का बोझ, भुगत रहे आगरा और ब्रज मंडल

यमुना कब तक राजधानी और उसके पड़ोसी राज्यों का सीवर बनी रहेगी?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

3 अगस्त 2026

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नदियाँ कभी सरहदें नहीं मानतीं। वे जीवन, संस्कृति और सभ्यता को एक जगह से दूसरी जगह ले जाती हैं। लेकिन जब कोई शहर या राज्य अपनी गंदगी नदी में उड़ेल देता है, तो वह ज़हर भी सीमाएँ नहीं मानता। वह भी बहते-बहते दूर तक पहुँचता है। आज यमुना इसी राष्ट्रीय शर्म की सबसे बड़ी मिसाल बन गई है।

हाल ही में तमिलनाडु ने कर्नाटक पर आरोप लगाया कि बेंगलुरु का सीवर मिला पानी लगातार दक्षिण पिनाकिनी (थेनपेन्नई) नदी में छोड़ा जा रहा है। जल परीक्षण में भारी जैविक प्रदूषण, अमोनिया, फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया और रासायनिक कचरे की पुष्टि हुई। तमिलनाडु ने न केवल सख़्त एतराज़ जताया, बल्कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) से तत्काल दख़ल देने की मांग भी की।

सवाल है, जब दक्षिण भारत की एक नदी के लिए इतना शोर उठ सकता है, तो यमुना के लिए यह ख़ामोशी क्यों?

यमुना दिल्ली पहुँचने से पहले ही हरियाणा में बीमार हो चुकी होती है। हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आँकड़े बताते हैं कि राज्य के 11 बड़े नाले लगातार गंदगी यमुना में उँडेल रहे हैं। इनमें पानीपत-सोनीपत का ड्रेन नंबर-6, फरीदाबाद का बुढ़िया नाला, बल्लभगढ़-पालवल का गौंछी ड्रेन और गुरुग्राम के कई बड़े ड्रेन शामिल हैं।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि हरियाणा से यमुना में पहुँचने वाले प्रदूषण का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा अकेला गुरुग्राम छोड़ता है। पानीपत और सोनीपत में हर दिन लगभग 42 मिलियन लीटर अनुपचारित सीवेज नदी में जा रहा है। फरीदाबाद की अवैध डाइंग इकाइयाँ रासायनिक और रंगीन कचरा खुलेआम बुढ़िया नाले में छोड़ती हैं। बल्लभगढ़ और पलवल से भी बिना शोधन का सीवेज सीधे यमुना में गिरता है।

दिल्ली पहुँचते-पहुँचते हालात और बदतर हो जाते हैं। वज़ीराबाद से ओखला तक केवल 22 किलोमीटर का हिस्सा यमुना के लिए सबसे बड़ा अभिशाप बन चुका है। नजफ़गढ़ नाला समेत कई बड़े नाले रोज़ करोड़ों लीटर सीवेज और औद्योगिक कचरा नदी में गिराते हैं। दिल्ली जल बोर्ड के ताज़ा अनुमान बताते हैं कि इन नालों का प्रवाह पहले के आकलन से कहीं अधिक है। नतीजा यह है कि कई स्थानों पर पानी में घुली ऑक्सीजन शून्य हो जाती है और फीकल कोलीफॉर्म सुरक्षित सीमा से सैकड़ों गुना ऊपर पहुँच जाता है। यहाँ यमुना नदी नहीं, एक बदहाल नाला दिखाई देती है।

सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि दिल्ली और हरियाणा की यह साझा गंदगी नीचे आगरा, मथुरा, वृंदावन और पूरे ब्रज मंडल के हिस्से आती है। ऊपर वालों की लापरवाही, नीचे रहने वालों की सज़ा बन जाती है।

आगरा केवल एक शहर नहीं, ताजमहल का नगर है। यह विश्व धरोहर और भारत की पहचान है। लेकिन ताजमहल के सामने बहने वाली यमुना अब जीवन नहीं, बीमारियाँ लेकर आती है। ज़हरीला पानी भूजल को दूषित कर रहा है। जलीय जीव समाप्त हो रहे हैं। नदी का प्राकृतिक प्रवाह दम तोड़ रहा है। एक मृतप्राय नदी के किनारे दुनिया की सबसे खूबसूरत इमारत भी उदास दिखाई देती है।

इस पूरे संकट में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की भूमिका भी कठघरे में है। उनका काम केवल पानी की जाँच करना नहीं, बल्कि प्रदूषण रोकना भी है। यदि दशकों से यमुना की यही हालत है, तो सवाल उठना लाज़िमी है कि प्रभावी कार्रवाई अब तक क्यों नहीं हुई? क्या रिपोर्टें केवल फाइलों की ज़ीनत बढ़ाने के लिए बनती हैं? क्या कानून सिर्फ़ छोटे लोगों पर लागू होते हैं? बड़े शहरों, उद्योगों और सरकारी एजेंसियों पर नहीं?

हरियाणा सरकार ने 2027 तक बिना शोधन के पानी को पूरी तरह रोकने और नालों के बीओडी स्तर को 10 मिलीग्राम प्रति लीटर से नीचे लाने का लक्ष्य रखा है। नए एसटीपी, सीईटीपी और ड्रेन टैपिंग की योजनाएँ भी बनाई गई हैं। दिल्ली सरकार भी सीवेज शोधन क्षमता बढ़ाने के दावे कर रही है।

लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और ही कहानी कहती है। पानीपत, फरीदाबाद, गुरुग्राम, बल्लभगढ़ और पलवल से प्रदूषण आज भी लगातार यमुना में पहुँच रहा है। अवैध इकाइयाँ फिर से चालू हो जाती हैं और नालों में सीधा डिस्चार्ज रुकने का नाम नहीं लेता।

यमुना किसी एक राज्य की जागीर नहीं है। यह करोड़ों लोगों की जीवनरेखा है। संविधान हर नागरिक को स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार देता है। फिर आगरा और ब्रज के लोगों को प्रदूषित पानी क्यों मिले? ब्रज की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को इस लापरवाही की क़ीमत क्यों चुकानी पड़े?

अब वक़्त आ गया है कि दिल्ली और हरियाणा दोनों सरकारें अपनी साझा ज़िम्मेदारी स्वीकार करें। राजधानी और उसके औद्योगिक शहरों का विकास तभी मायने रखेगा, जब उसकी गंदगी दूसरे राज्यों की तक़दीर न बने। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य बोर्डों को भी अपनी निष्क्रियता छोड़नी होगी। केवल नोटिस जारी करना या नए लक्ष्य घोषित करना काफ़ी नहीं है। दोषी एजेंसियों और उद्योगों पर सख़्त कार्रवाई होनी चाहिए। यह सुनिश्चित किया जाए कि बिना शोधन का एक भी लीटर सीवेज या औद्योगिक कचरा यमुना में न गिरे।

यमुना सिर्फ़ पानी की धारा नहीं, हमारी सभ्यता की धड़कन है। यदि हम इसे बचाने में नाकाम रहे, तो इतिहास यह नहीं पूछेगा कि कितनी योजनाएँ बनीं या कितने वादे किए गए। वह सिर्फ़ इतना लिखेगा कि एक राष्ट्र अपनी सबसे पवित्र नदियों में से एक को दिल्ली, फरीदाबाद, पानीपत, गुरुग्राम, बल्लभगढ़ और पलवल के सीवर में बदलने से नहीं बचा सका। यही हमारी सबसे बड़ी पर्यावरणीय और नैतिक नाकामी होगी।

Saturday, August 1, 2026

 


ताज ट्रेपेज़ियम ज़ोन में उद्योगों को अनुमति देने में जल्दबाज़ी न हो।

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

2 अगस्त 2026

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क्या हम ताजमहल को बचा रहे हैं, या धीरे-धीरे उसे धूल, धुंध और धुएँ में दफ़न कर रहे हैं?

आगरा की हवा साल के अधिकांश दिनों में ज़हरीली बनी रहती है। हर दिन उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम जाने वाले हज़ारों ट्रक, डंपर, बसें और भारी वाहन इस शहर की साँसों पर नया बोझ डालते हैं। यमुना और उसकी सहायक नदियाँ सूख रही हैं, तालाब और झीलें ग़ायब हो चुके हैं, पेड़ों की हरियाली सिमटती जा रही है और सड़कों पर बेकाबू ट्रैफिक दम घोंट रहा है। ऐसे नाज़ुक हालात में ताज ट्रेपेज़ियम ज़ोन में नए उद्योगों को अनुमति देने से पहले उसके हर फ़ायदे और हर संभावित नुक़सान का बेहद गहराई और वैज्ञानिक नज़रिए से आकलन करना ज़रूरी है। कहीं ऐसा न हो कि आज का छोटा-सा फ़ैसला आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बड़ी पर्यावरणीय त्रासदी बन जाए।

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ताज महल के आसपास के संरक्षित क्षेत्र TTZ (लगभग 10,400 वर्ग किमी, जिसमें आगरा और आसपास के जिले शामिल हैं) में 1990 के दशक की शुरुआत से वाहनों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। 1990 के आसपास या 1990 के दशक के मध्य-अंत में आगरा क्षेत्र में लगभग 1.9–2.1 लाख वाहन थे। 2026 के मध्य तक आगरा जिले में निजी वाहनों की संख्या लगभग 8.5 लाख पहुँच गई है (एक आधिकारिक रिपोर्ट में आगरा आरटीओ का कुल आँकड़ा करीब 16.9 लाख बताया गया है)। यह लगभग 35 वर्षों में 4 से 8 गुना या उससे भी अधिक की वृद्धि है।

स्थानीय वाहनों की यह वृद्धि पारगमन यातायात से और बढ़ जाती है। आगरा यमुना एक्सप्रेसवे (रोज़ाना 50,000 से अधिक वाहन) और आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे (2020 से 2025 के बीच दैनिक यातायात लगभग दोगुना) जैसे प्रमुख मार्गों पर स्थित है। राष्ट्रीय राजमार्गों और एक्सप्रेसवे कनेक्शनों से भी हज़ारों ट्रक, पर्यटक बसें और कारें गुज़रती रहती हैं। स्थानीय वाहनों और बढ़ते पारगमन/पर्यटक यातायात से ज़ोन के अंदर वाहन-किलोमीटर लगातार बढ़ रहे हैं। वाहनों की इतनी बड़ी वृद्धि ने कई उपलब्धियों को बेअसर कर दिया है, जिससे प्रदूषण स्तर सुरक्षित सीमा तक  नहीं आ पा रहा। अध्ययन और आधिकारिक आकलन बार-बार वाहनों (स्थानीय + पारगमन) को ताजमहल और पूरे TTZ के लिए हवा की गुणवत्ता की समस्या का प्रमुख कारण बताते हैं। “वाहन विस्फोट” अभी भी प्रदूषण की चुनौती को बनाए रखे हुए है।

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में 2024 में लगाए गए पूर्ण प्रतिबंध में कुछ राहत देते हुए ताज ट्रेपेज़ियम ज़ोन (TTZ) में लगभग 400 लंबित गैर-प्रदूषणकारी सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों (एमएसएमई) के आवेदनों पर विचार करने की इजाज़त दी है। लेकिन इसे उद्योगों के लिए खुला निमंत्रण नहीं समझना चाहिए। अदालत ने रोज़गार और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है। हर आवेदन को नीरी (NEERI) और केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (CEC) के विशेषज्ञों की सर्वसम्मति से मंज़ूरी लेनी होगी। किसी विवाद की स्थिति में अंतिम फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट करेगा। इसके बावजूद भविष्य में किसी भी तरह की और ढील बेहद एहतियात के साथ ही दी जानी चाहिए। इस पूरे क्षेत्र की हवा अब भी चिंताजनक है और पर्यावरण पर मंडरा रहे खतरे अभी टले नहीं हैं।

साल 1996 में सुप्रीम कोर्ट ने कोयला और कोक से चलने वाले सैकड़ों उद्योगों, खासकर फाउंड्रियों, को प्राकृतिक गैस अपनाने या बंद करने का आदेश दिया था। उस समय सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) का स्तर 17 से 22 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था और हवा में धूल-कण (SPM) 400 से 750 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुँच जाते थे। यही प्रदूषण ताजमहल के संगमरमर को पीला कर रहा था और अम्लीय वर्षा का कारण बन रहा था।

अदालत के उस फैसले से बड़ा फ़ायदा हुआ। सल्फर डाइऑक्साइड का स्तर घटकर 4 से 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रह गया। नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO₂) में भी कमी आई। इससे ताजमहल को सबसे ज़्यादा नुकसान पहुँचाने वाली जहरीली गैसों से काफी हद तक राहत मिली।

लेकिन पूरी तस्वीर अभी भी तसल्लीबख्श नहीं है। हवा में मौजूद बारीक धूल-कण अब भी बेहद ज़्यादा हैं। पीएम-10 (PM₁₀) का स्तर कई स्थानों पर 120 से 180 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर या उससे भी अधिक दर्ज किया जाता है, जबकि संवेदनशील क्षेत्रों के लिए तय सीमा केवल 60 है। पीएम-2.5 (PM₂.₅) का वार्षिक औसत भी अक्सर 80 से 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर या उससे अधिक रहता है। सर्दियों में यह और खतरनाक हो जाता है। मानसून में वायु गुणवत्ता कभी-कभी सामान्य रहती है, लेकिन सर्दियों में अक्सर "खराब", "बहुत खराब" या "गंभीर" श्रेणी में पहुँच जाती है। यही बारीक धूल ताजमहल पर जमती है और लोगों की सेहत पर भी बुरा असर डालती है। पिछले तीस वर्षों में सुधार तो हुआ है, लेकिन मंज़िल अभी दूर है।

इस लगातार बने हुए प्रदूषण का कारण केवल उद्योग नहीं हैं। इसके पीछे कई गहरे पर्यावरणीय संकट भी हैं। यमुना नदी लगभग सूख चुकी है और उसका पानी बुरी तरह प्रदूषित है। नदी अब वह नमी और ठंडक नहीं दे पाती, जो कभी ताजमहल के आसपास का प्राकृतिक वातावरण बनाए रखती थी। आसपास की ज़मीन तेज़ी से बंजर होती जा रही है। मिट्टी का कटाव बढ़ रहा है और हरियाली लगातार घट रही है। ज़िले के कुछ हिस्सों में हरित क्षेत्र केवल लगभग 7 प्रतिशत रह गया है। पेड़-पौधे कम होने से धूल को रोकने की प्राकृतिक क्षमता घट गई है। सड़कों की धूल, निर्माण कार्य, छोटे उद्योग, वाहनों का धुआँ और दूसरे राज्यों में पराली व बायोमास जलाने का धुआँ भी इस संकट को और बढ़ा रहा है।

ऐसी हालत में पूरे टीटीज़ेड को उद्योगों के लिए और खोलना, चाहे वे "गैर-प्रदूषणकारी" ही क्यों न हों, ख़तरे से खाली नहीं है। अभी तक इस क्षेत्र की पर्यावरणीय वहन क्षमता (Carrying Capacity) का पूरा अध्ययन भी नहीं हुआ है और लंबे समय से लंबित विज़न डॉक्यूमेंट भी तैयार नहीं हो पाया है। एक बार उद्योग लग जाने के बाद ईंधन और उत्सर्जन के नियमों का सख़्ती से पालन कराना हमेशा आसान नहीं रहा है। नए उद्योगों से यातायात, निर्माण और ऊर्जा की माँग बढ़ेगी, जिससे अब तक मिले पर्यावरणीय लाभ कमज़ोर पड़ सकते हैं।

इसलिए आगे बढ़ने का रास्ता बेहद सोच-समझकर तय करना होगा। केवल उन्हीं व्हाइट और ग्रीन श्रेणी के एमएसएमई को अनुमति मिले, जो बिजली या प्राकृतिक गैस का उपयोग करें और जिनकी हर आवेदन पर विशेषज्ञों द्वारा अलग-अलग गहराई से जाँच हो। पूरी प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए।

इसके साथ-साथ यमुना में पर्याप्त स्वच्छ जल प्रवाह बहाल करना, बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण करना, मिट्टी संरक्षण के उपाय अपनाना, सड़कों की धूल और वाहनों से होने वाले प्रदूषण पर सख़्त नियंत्रण रखना तथा वायु गुणवत्ता की लगातार निगरानी कर उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक करना भी उतना ही ज़रूरी है। जब तक हवा में धूल-कणों का स्तर लगातार और स्पष्ट रूप से कम न हो जाए तथा क्षेत्र की पर्यावरणीय क्षमता मज़बूत न हो जाए, तब तक उद्योगों के लिए और छूट देने पर विचार नहीं किया जाना चाहिए।

ताजमहल केवल एक इमारत नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के पर्यावरण की सेहत का आईना है। 1996 में सुप्रीम कोर्ट ने साबित किया था कि सख़्त नियमों से प्रदूषण पर काबू पाया जा सकता है। 

Friday, July 31, 2026

 बारह साल बाद भी अधूरी तस्वीर!

क्या यही है 'नया भारत' का सपना, या सिर्फ़ नारों का शोर?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

31 जुलाई 2026

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क्या सिर्फ़ चमचमाती सड़कें, ऊँची इमारतें और डिजिटल ऐप्स ही किसी देश की तरक्की का पैमाना हैं? अगर चुनाव पैसे के दम पर लड़े जाएँ, अदालतों में इंसाफ़ वर्षों तक अटका रहे, सरकारी स्कूल कमज़ोर होते जाएँ, पुलिस पर भरोसा घटता जाए और इलाज जेब खाली कर दे, तो क्या सचमुच हम "नए भारत" की मंज़िल पर पहुँच गए हैं?

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार को सत्ता में आए अब बारह साल हो चुके हैं। इस दौरान बड़े-बड़े वादे हुए, कई उपलब्धियाँ भी मिलीं। सड़कों, डिजिटल सेवाओं, आधारभूत ढाँचे और कल्याणकारी योजनाओं में उल्लेखनीय प्रगति हुई। लेकिन देश के बुनियादी संस्थानों की हालत पर नज़र डालें तो तस्वीर उतनी रोशन नहीं दिखती। कई पुराने मसले आज भी जस के तस हैं, बल्कि कुछ और पेचीदा हो गए हैं। इनका असर सीधे करोड़ों आम नागरिकों की ज़िंदगी पर पड़ता है।

सबसे बड़ा अधूरा काम चुनाव सुधार है। वर्षों से अदालतें, चुनाव विशेषज्ञ और कई समितियाँ राजनीतिक व्यवस्था में सुधार की सिफारिश करती रही हैं। फिर भी राजनीति में धनबल और बाहुबल का दबदबा कम नहीं हुआ।

2024 के लोकसभा चुनाव में चुने गए लगभग 46 प्रतिशत सांसदों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज थे। इनमें से करीब एक-तिहाई मामलों में हत्या, बलात्कार और अपहरण जैसे गंभीर आरोप शामिल थे। औसतन हर सांसद की घोषित संपत्ति लगभग 38 करोड़ रुपये रही। चुनावी खर्च का अनुमान करीब एक लाख करोड़ रुपये लगाया गया। वहीं एजेंसियों ने 8,800 करोड़ रुपये से अधिक नकदी और अन्य प्रलोभन जब्त किए। यह तस्वीर लोकतंत्र के लिए कई सवाल खड़े करती है।

2017 में शुरू की गई इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को पारदर्शिता बढ़ाने का उपाय बताया गया था। लेकिन 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने इसे असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया। तब तक लगभग दो अरब डॉलर के बराबर चंदा इस व्यवस्था से गुजर चुका था, जिसका बड़ा हिस्सा सत्तारूढ़ दल को मिला। आज भी चुनावों के लिए सरकारी फंडिंग नहीं है, राजनीतिक दलों के खर्च पर प्रभावी सीमा नहीं है और कमजोर जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने जैसी व्यवस्था मौजूद नहीं है। वोटर सूची से नाम हटाने के आरोप भी बार-बार सामने आते हैं। कुल मिलाकर चुनाव जीतना,  ईमानदारी से अधिक अहम  है।

शिक्षा के क्षेत्र में भी देश दो हिस्सों में बँटता जा रहा है। एक ओर महँगे निजी स्कूल हैं, दूसरी ओर लगातार कमजोर होते सरकारी विद्यालय। पिछले दस वर्षों में लगभग 90 हजार सरकारी स्कूल बंद हुए, यानी औसतन हर दिन करीब 25 स्कूल। उधर निजी स्कूलों की संख्या लगातार बढ़ती रही।

आज सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आते हैं। यानी कमज़ोर शिक्षा व्यवस्था का सबसे बड़ा बोझ उन्हीं पर पड़ रहा है जिनके पास विकल्प सबसे कम हैं।

देश में शिक्षा के कई अलग-अलग ढाँचे हैं; सीबीएसई, राज्य बोर्ड, अंतरराष्ट्रीय पाठ्यक्रम, मदरसे और पंचायत स्कूल। लेकिन सबके लिए एक समान गुणवत्ता मानक नहीं है। भाषा नीति पर विवाद जारी है। स्वतंत्र सर्वेक्षण बताते हैं कि बड़ी संख्या में बच्चे बुनियादी पढ़ाई और गणित में भी अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँच पा रहे हैं। नई शिक्षा नीति ने बड़े बदलावों का वादा किया था, लेकिन अमीर और गरीब की शिक्षा के बीच की खाई और चौड़ी हो गई है।

भ्रष्टाचार खत्म नहीं हुआ, बल्कि उसका अंदाज़ बदल गया है। रोजमर्रा के सरकारी कामों में रिश्वत की शिकायतें अब भी आम हैं। अक्सर आरोप लगते हैं कि कंपनियाँ राजनीतिक दलों को चंदा देती हैं और बाद में सरकारी ठेके हासिल कर लेती हैं। कुछ उद्योगों, खासकर खनन और दवा क्षेत्र में, नियामक संस्थाओं की निष्पक्षता पर भी सवाल उठते रहे हैं।

राजनीतिक गलियारों में "वॉशिंग मशीन" शब्द भी खूब चर्चा में रहा। विपक्ष के जिन नेताओं पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप थे, वे सत्ता पक्ष में शामिल होते ही कानूनी दबाव से राहत पाते दिखाई दिए। उच्च स्तर के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए बना लोकपाल भी अब तक अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ पाया है।

न्यायपालिका की हालत भी चिंताजनक है। देशभर की अदालतों में 5.6 करोड़ से अधिक मुकदमे लंबित हैं। इनमें से लगभग पाँच करोड़ मामले जिला अदालतों में हैं। कई उच्च न्यायालयों में दस-दस वर्षों से मुकदमे लंबित पड़े हैं। बड़ी संख्या में न्यायाधीशों के पद खाली हैं। आम नागरिक इंसाफ़ के इंतज़ार में बूढ़ा हो जाता है, जबकि प्रभावशाली लोग लंबी कानूनी प्रक्रिया का बोझ आसानी से झेल लेते हैं।

पुलिस व्यवस्था भी आज़ादी के डेढ़ सौ साल पुराने ढाँचे पर टिकी हुई है। अधिकांश राज्यों में अब भी 1861 के पुलिस कानून की सोच हावी है। पुलिस बल में बड़ी संख्या में पद खाली हैं। राजनीतिक दखल, हिरासत में हिंसा और पक्षपातपूर्ण कार्रवाई की शिकायतें लगातार आती रहती हैं। 2006 में सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस सुधार के कई निर्देश दिए थे, लेकिन अधिकांश आज भी अधूरे हैं।

स्वास्थ्य व्यवस्था में भी कई कमियाँ बनी हुई हैं। दवाओं की कीमतों में पारदर्शिता नहीं है। निजी अस्पताल अक्सर दवाओं और जाँचों के लिए वास्तविक लागत से कई गुना अधिक शुल्क वसूलते हैं। आयुष्मान भारत योजना में फर्जीवाड़े के कारण हजारों अस्पतालों पर कार्रवाई करनी पड़ी। मिलावटी दवाओं से बच्चों की मौत जैसी घटनाओं ने भी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। सरकारी अस्पतालों में संसाधनों की कमी और मरीजों की परेशानी आज भी जारी है।

इन सभी समस्याओं को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। ये मिलकर उस फ़ासले की कहानी कहती हैं जो बड़े वादों और ज़मीनी हकीकत के बीच मौजूद है। चुनाव सुधार, बेहतर शिक्षा, ईमानदार प्रशासन, तेज़ न्याय, आधुनिक पुलिस व्यवस्था और भरोसेमंद स्वास्थ्य सेवाएँ आज भी अधूरा एजेंडा हैं।


यह भी सच है कि पिछले दशक में भारत ने बुनियादी ढाँचे, डिजिटल तकनीक और कल्याणकारी योजनाओं में उल्लेखनीय प्रगति की है। लेकिन कोई भी राष्ट्र केवल एक्सप्रेसवे, ऐप्स और ऊँची इमारतों से महान नहीं बनता। उसकी असली ताकत इस बात से तय होती है कि वह आम आदमी की रोज़मर्रा की परेशानियों को कितनी ईमानदारी से हल करता है।

आज भी छह बड़े सवाल देश के सामने खड़े हैं:

बेरोज़गारी, किसानों की बदहाली, महँगाई, पर्यावरण संकट, शिक्षा और स्वास्थ्य की असमानता, तथा सामाजिक सौहार्द को मजबूत करना। करोड़ों युवा अच्छी नौकरियों की तलाश में हैं। किसान अनिश्चित आमदनी से जूझ रहे हैं। महँगाई हर परिवार का बजट बिगाड़ रही है। हवा और पानी का प्रदूषण लोगों की सेहत पर हमला कर रहा है। समाज में बढ़ती दूरियाँ लोकतंत्र को भी कमज़ोर करती हैं।

सरकार की आलोचना करना देश-विरोध नहीं है। एक मज़बूत लोकतंत्र में रचनात्मक आलोचना ही बेहतर शासन की बुनियाद होती है। किसी भी सरकार की सबसे बड़ी कामयाबी केवल उपलब्धियाँ गिनाने में नहीं, बल्कि अपनी कमियों को स्वीकार कर उन्हें दूर करने में होती है। भारत को ऐसा विकास चाहिए जो सबको साथ लेकर चले, टिकाऊ हो और हर नागरिक तक उसका लाभ पहुँचे।

 जब पहरेदार ही राग दरबारी गाने लगे!!

क्यों मुख्यधारा का मीडिया हाशिये पर जा रहा है और सोशल मीडिया नई चौपाल बन गया है

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बृज खंडेलवाल द्वारा

1 अगस्त 2026

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आज भारत की सबसे बड़ी खबर वह नहीं है जो हर रात टीवी स्टूडियो में चीख-चीखकर दिखाई जाती है। सबसे बड़ी खबर वह है, जिसे दिखाने से बचा जाता है।

लोकतंत्र केवल तब कमजोर नहीं होता, जब सरकारें मीडिया पर सेंसर लगा दें। वह तब भी कमजोर होता है, जब पत्रकार खुद सवाल पूछना छोड़ दें। आज देश के बड़े हिस्से का मुख्यधारा का मीडिया सत्ता से जवाब मांगने के बजाय उसकी आवाज़ दोहराता दिखाई देता है।

कभी मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता था। उसका काम था भ्रष्टाचार उजागर करना, सरकार से सवाल पूछना और आम आदमी की आवाज़ बनना। आज उसकी बड़ी भूमिका सत्ता का बचाव करती नज़र आती है। पहरेदार अब गोद में बैठा हुआ लगता है।

यह बदलाव अचानक नहीं आया। बड़े मीडिया संस्थानों का मालिकाना हक़ कुछ बड़े कॉरपोरेट घरानों के हाथों में सिमट गया है। उनके कारोबार केवल मीडिया तक सीमित नहीं हैं। ऐसे माहौल में संपादकीय आज़ादी अक्सर मुनाफ़े और राजनीतिक रिश्तों के आगे पीछे छूट जाती है।

विज्ञापनों ने भी इस संकट को गहरा किया है। मीडिया संस्थानों की बड़ी आय सरकार और कॉरपोरेट विज्ञापनों से आती है। जिनसे कमाई होती है, उनके खिलाफ़ जांच करना आसान नहीं होता। खामोशी फ़ायदेमंद बन जाती है और सवाल महंगे पड़ने लगते हैं।

टीवी बहसें भी अब एक जैसी लगती हैं। वही चेहरे, वही प्रवक्ता और वही तयशुदा बहसें। किसान, मज़दूर, शिक्षक, वैज्ञानिक और आम नागरिक शायद ही कभी राष्ट्रीय चर्चा का हिस्सा बनते हैं। एजेंडा ताकतवर तय करते हैं और बाकी लोग उसे देखते रहते हैं।

जो पत्रकार अलग रास्ता चुनते हैं, उन्हें मुकदमों, ट्रोलिंग, आर्थिक दबाव और ऑनलाइन गालियों का सामना करना पड़ता है। डर धीरे-धीरे आत्म-सेंसरशिप में बदल जाता है। जब डर काम करने लगे, तब सेंसरशिप की ज़रूरत भी नहीं पड़ती।

हर शाम टीवी पर शोर बढ़ता है, लेकिन सच कम होता जाता है। बहस की जगह हंगामा ले लेता है। तथ्यों की जगह नारे आ जाते हैं। बेरोज़गारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों की परेशानियाँ और पर्यावरण जैसे मुद्दे स्टूडियो की राजनीति में कहीं खो जाते हैं।

विद्वानों एडवर्ड हरमन और नोम चॉम्स्की ने वर्षों पहले लिखा था कि मीडिया पर मालिकाना हक़, विज्ञापन और राजनीतिक दबाव यह तय करते हैं कि जनता क्या देखेगी और क्या नहीं। हमेशा झूठ नहीं दिखाया जाता, लेकिन पूरा सच भी नहीं दिखाया जाता।

इसीलिए "गोदी मीडिया" जैसा शब्द आम बोलचाल का हिस्सा बन गया है। कोई इससे सहमत हो या नहीं, लेकिन इतना साफ़ है कि लाखों लोगों का टीवी समाचारों पर भरोसा कम हुआ है।

विडंबना यह है कि जो मीडिया कभी जनता की आवाज़ था, वह आज कई बार सरकारों, विज्ञापनदाताओं और निवेशकों की ज़्यादा चिंता करता दिखाई देता है। उसकी सबसे बड़ी समस्या टीआरपी नहीं, बल्कि घटती विश्वसनीयता है। भरोसा एक बार टूट जाए तो लौटना आसान नहीं होता।

इसी खाली जगह को सोशल मीडिया ने भर दिया है।

हाल का जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन इसका बड़ा उदाहरण है। एक व्यंग्यात्मक ऑनलाइन अभियान देखते ही देखते राष्ट्रीय आंदोलन बन गया। युवाओं ने टीवी चैनलों या अखबारों का इंतज़ार नहीं किया। उन्होंने अपनी बात खुद दुनिया तक पहुँचाई।

इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब शॉर्ट्स और एक्स पर वीडियो, मीम, भाषण और पोस्ट कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुँच गए। अब किसी संपादक की मंजूरी की ज़रूरत नहीं रही। मोबाइल फोन ही कैमरा भी है, न्यूज़रूम भी और प्रसारण केंद्र भी।

इस आंदोलन का हास्य, व्यंग्य और मीम पारंपरिक पत्रकारिता से कहीं तेज़ फैला। युवा गंभीर संपादकीय से ज़्यादा चुटीले पोस्ट और छोटे वीडियो से जुड़ते दिखे।

बेशक सोशल मीडिया की अपनी कमियाँ भी हैं। अफवाहें तेज़ी से फैलती हैं, एल्गोरिद्म सनसनी को बढ़ावा देते हैं और तथ्य जांच हमेशा समय पर नहीं हो पाती। फिर भी इसने लाखों लोगों को बोलने का मंच दिया है।

अब यह बदलाव लौटने वाला नहीं है। भारत की नई पीढ़ी रात नौ बजे के टीवी बुलेटिन या अगली सुबह के अखबार का इंतज़ार नहीं करती। वह खुद खबर बनाती है, साझा करती है और उस पर बहस करती है।

यही कारण है कि मुख्यधारा का मीडिया धीरे-धीरे हाशिये पर जा रहा है, जबकि सोशल मीडिया नई जन-चौपाल बन चुका है। आज राजनीति, आंदोलन और जनमत का बड़ा हिस्सा वहीं आकार लेता है।

एक आज़ाद मीडिया का काम सत्ता की जय-जयकार करना नहीं, उससे सवाल पूछना है। अगर मुख्यधारा का मीडिया अपनी यह भूमिका नहीं निभाएगा, तो जनता अपनी आवाज़ के लिए नए मंच खोजती रहेगी।

Tuesday, July 28, 2026

 स्कूल खाली हो रहे हैं, जंतर-मंतर भर रहा है! क्या भारत की शिक्षा व्यवस्था जवाब देगी?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

30 जुलाई 2026

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अगर बच्चा एक साधारण पैराग्राफ भी नहीं पढ़ सकता, तो नए स्कूल भवन बनाने का क्या मतलब है?

अगर सरकारी स्कूल इतने अच्छे हैं, तो लाखों माता-पिता उन्हें छोड़कर निजी स्कूलों की ओर क्यों जा रहे हैं?

और अगर हमारी शिक्षा व्यवस्था सही दिशा में है, तो हजारों युवा हाल ही में जंतर-मंतर पर नीट के खिलाफ न्याय और जवाबदेही की मांग लेकर सड़कों पर क्यों उतर आए?

ये अलग-अलग सवाल नहीं हैं। ये एक ही संकट की अलग-अलग तस्वीरें हैं।

जंतर-मंतर पर गूंजा जनाक्रोश केवल नीट परीक्षा के खिलाफ नहीं था। वह पूरे शिक्षा तंत्र के खिलाफ बढ़ते अविश्वास का विस्फोट था। देश की जेन ज़ी पीढ़ी अब केवल एक परीक्षा पर सवाल नहीं उठा रही। वह उस व्यवस्था को चुनौती दे रही है, जो समझ से ज्यादा रटने को, सीखने से ज्यादा कोचिंग को और प्रतिभा से ज्यादा किस्मत को महत्व देती है।

यूडीआईएसई+ (UDISE+) 2025-26 की ताज़ा रिपोर्ट इस बेचैन करने वाली सच्चाई की पुष्टि करती है। भारत की स्कूली शिक्षा एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां कुछ उपलब्धियां दिखती हैं, लेकिन उनसे कहीं बड़े संकट भी सामने आते हैं। एक तरफ सुधार होता है, दूसरी तरफ व्यवस्था की कोई और कमजोरी उसे पीछे धकेल देती है।

देश में कुल छात्र संख्या 24.80 करोड़ से घटकर 24.72 करोड़ रह गई। अकेले सरकारी स्कूलों से लगभग 86 लाख बच्चे कम हुए, जबकि निजी स्कूलों में 88 लाख से अधिक नए छात्र जुड़े। माता-पिता अपने फैसले से साफ संदेश दे रहे हैं। एक ही वर्ष में 8,000 से अधिक सरकारी स्कूल बंद हो गए। अनुसूचित जाति के विद्यार्थियों की संख्या भी घटी। आज भी एक लाख से अधिक स्कूल केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं, जहां लगभग 34 लाख बच्चों को एक साथ कई कक्षाओं में पढ़ाया जाता है।

लेकिन सबसे बड़ा संकट स्कूल की इमारतों में नहीं, कक्षाओं के भीतर है।

एएसईआर 2024 बताता है कि महामारी के बाद कुछ सुधार जरूर हुआ है, लेकिन हालात अभी भी चिंताजनक हैं। कक्षा तीन के केवल लगभग एक चौथाई बच्चे ही कक्षा दो का पाठ ठीक से पढ़ सकते हैं। लगभग दो-तिहाई बच्चे साधारण घटाव तक नहीं कर पाते। पारख (PARAKH) और नीति आयोग की रिपोर्टें बताती हैं कि कक्षा छह के अनेक विद्यार्थी साधारण भिन्न और रोजमर्रा की गणितीय समझ में भी कमजोर हैं। आठवीं तक पहुंचते-पहुंचते पढ़ने की क्षमता भी पहले से गिर चुकी है।

यानी बच्चे कक्षा तो पास कर रहे हैं, लेकिन सीख नहीं रहे। उनके हाथ में प्रमाणपत्र है, पर आत्मविश्वास नहीं। अंक हैं, लेकिन ज्ञान नहीं।

स्कूलों में बिजली, शौचालय और पेयजल जैसी सुविधाएं बढ़ी हैं। यह स्वागतयोग्य है। लेकिन हजारों स्कूलों में आज भी खेल का मैदान नहीं है, दिव्यांगों के लिए सुविधाएं नहीं हैं, कंप्यूटर काम नहीं करते और इंटरनेट केवल कागज़ों में मौजूद है।

शिक्षा पर सरकारी खर्च भी चिंता बढ़ाता है। पिछले एक दशक में केंद्रीय बजट में शिक्षा की हिस्सेदारी लगातार घटी है। कम निवेश का सीधा असर शिक्षकों की नियुक्ति, प्रशिक्षण और पढ़ाई की गुणवत्ता पर पड़ता है। इमारतें जल्दी बन सकती हैं, लेकिन भरोसा धीरे-धीरे बनता है।

देश की स्कूली शिक्षा पांच बड़ी बीमारियों से जूझ रही है।

सबसे बड़ी बीमारी है कमजोर सीखने की क्षमता। बच्चे वर्षों तक स्कूल जाते हैं, लेकिन पढ़ना, लिखना और साधारण गणित तक ठीक से नहीं सीख पाते।

दूसरी समस्या है बीच रास्ते पढ़ाई छोड़ देना। पहली कक्षा में प्रवेश लेने वाले लगभग आधे बच्चे बारहवीं तक पहुंच ही नहीं पाते। हर स्तर पर स्कूल बदलने की मजबूरी ड्रॉपआउट का खतरा बढ़ाती है।

तीसरी चुनौती है शिक्षकों की भारी कमी। एक लाख से अधिक स्कूल आज भी केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं।

चौथी समस्या है शिक्षा व्यवस्था का बिखराव। प्राथमिक स्कूल बहुत हैं, लेकिन माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्कूल अपेक्षाकृत कम। बच्चों को बार-बार स्कूल बदलना पड़ता है, जिससे पढ़ाई की निरंतरता टूट जाती है।

पांचवीं चुनौती है गहरी असमानता। राज्यों, आय वर्गों और सामाजिक समूहों के बीच शिक्षा की गुणवत्ता में भारी अंतर है। अनुसूचित जाति और जनजाति के बच्चों की सीखने की क्षमता अब भी पीछे है।

समस्या यहीं खत्म नहीं होती।

देश में दर्जनों शिक्षा बोर्ड, अलग-अलग पाठ्यक्रम और अलग-अलग परीक्षा प्रणालियां चल रही हैं। सीबीएसई, सीआईएससीई, एनआईओएस, राज्य बोर्ड, संस्कृत बोर्ड, मदरसा बोर्ड और अंतरराष्ट्रीय बोर्ड; सब अपनी-अपनी दिशा में चल रहे हैं। यह विविधता कम और भ्रम ज्यादा पैदा करती है।

भारत का एक छात्र लगभग पच्चीस वर्ष तक किसी न किसी परीक्षा की तैयारी करता रहता है। स्कूल, कॉलेज, प्रतियोगी परीक्षा, नौकरी। लेकिन जीवन जीने की कला, आलोचनात्मक सोच, रचनात्मकता और समस्या समाधान जैसे कौशल अक्सर पीछे छूट जाते हैं।

नीट को लेकर जंतर-मंतर पर जो गुस्सा दिखाई दिया, वह अचानक नहीं फूटा। उसकी शुरुआत उन कक्षाओं में हुई थी जहां समझने से ज्यादा रटाया गया। उन कोचिंग सेंटरों में हुई, जहां स्कूलों से ज्यादा भरोसा पैदा हो गया। उन घरों में हुई, जहां माता-पिता अपनी सारी जमा-पूंजी एक अनिश्चित भविष्य पर दांव लगाने को मजबूर हैं।

भारत कभी नालंदा और तक्षशिला जैसी विश्वविख्यात शिक्षा परंपरा का केंद्र था। आज भी आईआईटी और कुछ चुनिंदा संस्थान दुनिया में सम्मान पाते हैं। लेकिन पूरी शिक्षा व्यवस्था अभी भी उस स्तर तक नहीं पहुंच सकी, जिसकी एक उभरती महाशक्ति से उम्मीद की जाती है।

भारत को केवल अधिक स्कूलों की जरूरत नहीं है। बेहतर स्कूलों की जरूरत है।

केवल अधिक दाखिलों की नहीं, बेहतर सीखने की जरूरत है।

केवल अधिक परीक्षाओं की नहीं, बेहतर शिक्षा की जरूरत है।

जेन ज़ी अपना फैसला सुना चुकी है। वह सड़कों पर उतर चुकी है। अब परीक्षा सरकार, नीति-निर्माताओं और पूरे समाज की है।

देश का हर छात्र आज सिर्फ एक सवाल पूछ रहा है—

क्या हमारी शिक्षा हमें जिंदगी के लिए तैयार करेगी, या सिर्फ अगली परीक्षा के लिए?

यही सवाल भारत के भविष्य का भी फैसला करेगा।

 


जब कॉकरोचों ने हिला दिया सत्ता का सिंहासन: जेन ज़ी ने कर दिखाया, जो विपक्ष नहीं कर सका

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

29 जुलाई 2026

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साल 2026 का सबसे बड़ा राजनीतिक धमाका संसद में नहीं हुआ। वह एक मीम से शुरू हुआ।

कुछ छात्रों को "कॉकरोच" कहा गया। उन्होंने बुरा मानने के बजाय उसी नाम को अपना झंडा बना लिया। फिर वे जंतर-मंतर पहुंचे, डटे रहे और आखिरकार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। महीनों तक संसद में हंगामा करने वाला पूरा विपक्ष जो नहीं कर सका, वह काम कुछ हजार युवाओं ने मोबाइल फोन, मीम और मुस्कान के सहारे कर दिखाया।

कहावत है, "जहाँ चाह, वहाँ राह।" इस बार राह इंस्टाग्राम से होकर निकली।

कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी), पहले मज़ाक लगती थी। लेकिन मज़ाक ही आंदोलन बन गया। युवाओं ने कहा, "अगर हमें कॉकरोच कहते हो, तो याद रखो, एक को कुचलोगे, सौ और निकल आएँगे।"

फिर आया नीट-यूजी पेपर लीक।

परीक्षा रद्द हुई। करीब बीस लाख छात्रों को दोबारा परीक्षा की चिंता सताने लगी। कई छात्रों की आत्महत्या की खबरों ने पूरे देश को झकझोर दिया। वर्षों से जमा गुस्सा, पेपर लीक, महँगी कोचिंग, बेरोज़गारी और सुस्त व्यवस्था, अब ज्वालामुखी बन चुका था।

चिंगारी मिली और आग फैल गई।

सीजेपी ने वही भाषा बोली जो आज का युवा समझता है। प्रेस कॉन्फ्रेंस की जगह इंस्टाग्राम रील्स थीं। लंबे भाषणों की जगह मीम थे। गुस्से को हँसी में बदलकर उन्होंने व्यवस्था पर सबसे तीखा वार किया।

जंतर-मंतर धीरे-धीरे धरना स्थल नहीं, युवा गणराज्य बन गया। गीत गूंजे, पोस्टर बने, बहस हुई, कविताएँ पढ़ी गईं। माता-पिता भी साथ आए। शिक्षकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने समर्थन दिया। सोनम वांगचुक का 26 दिन का अनशन आंदोलन को नैतिक ताकत दे गया। पुलिस की लाठी और आँसू गैस ने भी आंदोलन की आग बुझाने के बजाय और हवा दे दी।

इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत उसकी सादगी थी।

सिर्फ एक मांग थी: जवाबदेही।

व्यवस्था की नाकामी की लंबी बहसों में सरकारें अक्सर बच निकलती हैं। लेकिन जब उंगली सीधे एक जिम्मेदार व्यक्ति की ओर उठे, तब बचना आसान नहीं होता।

आखिरकार सरकार ने हालात भाँप लिए। संसद लगातार ठप थी। देशभर में छात्रों का समर्थन बढ़ रहा था। तस्वीरें सोशल मीडिया पर फैल रही थीं। टकराव लंबा खिंचता तो नुकसान और बढ़ता।

धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दिया। सरकार ने जांच, मुआवजे और किसी तरह की प्रताड़ना न होने का भरोसा दिया। तत्काल संकट टल गया।

दिलचस्प बात यह रही कि विपक्ष इस पूरी लड़ाई में अगली कतार में नहीं, पीछे की सीट पर बैठा दिखाई दिया।

वर्षों से विपक्ष शिक्षा, बेरोज़गारी और संस्थाओं की विफलता पर सरकार को घेरता रहा है। लेकिन जब असली जनआंदोलन उठा, तब उसकी भूमिका दर्शक जैसी रही। वह आंदोलन का नेतृत्व नहीं कर पाया, केवल समर्थन देने पहुँचा।

यहीं उसकी सबसे बड़ी कमजोरी सामने आई।

आज का विपक्ष विरोध तो करता है, लेकिन भरोसा नहीं जगा पाता।

इंडिया गठबंधन की सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि उसे जोड़ने वाला धागा कोई साझा विचार नहीं, बल्कि केवल भाजपा विरोध है। चुनाव आते ही सीटों पर झगड़े शुरू हो जाते हैं। राज्यों में साथी दल एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी बन जाते हैं। "एक अनार, सौ बीमार" जैसी हालत हो जाती है।

नेतृत्व का सवाल भी अब तक अनसुलझा है।

राहुल गांधी कांग्रेस का चेहरा हैं, लेकिन ममता बनर्जी, अखिलेश यादव और दूसरे क्षेत्रीय नेता भी अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन छोड़ने को तैयार नहीं। जहाँ कई नाविक हों, वहाँ नाव अक्सर भँवर में फँस जाती है।

संगठन भी विपक्ष की कमजोर कड़ी है।

भाजपा ने दशकों तक बूथ स्तर तक अपना संगठन खड़ा किया। दूसरी ओर कांग्रेस सहित कई विपक्षी दल स्थानीय कार्यकर्ताओं, अनुशासन और जमीनी नेटवर्क की कमी से जूझ रहे हैं। कई राज्यों में गुटबाजी अलग सिरदर्द है।

वंशवाद भी विपक्ष के गले की हड्डी बना हुआ है।

अधिकांश बड़े विपक्षी दल अब भी परिवारों के इर्द-गिर्द घूमते हैं। नई पीढ़ी के नेताओं को आगे बढ़ने का अवसर सीमित दिखाई देता है। इसके उलट भाजपा खुद को कार्यकर्ता आधारित संगठन के रूप में पेश करने में सफल रही है। राजनीति में धारणा भी आधी लड़ाई जीत लेती है।

विपक्ष की एक और समस्या है कि उसके पास आलोचना तो बहुत है, लेकिन विकल्प कम हैं।

महँगाई, बेरोज़गारी, पेपर लीक और संस्थागत संकट जैसे मुद्दे वास्तविक हैं। लेकिन मतदाता केवल शिकायत नहीं, समाधान भी सुनना चाहता है। केवल सरकार को कोसने से चुनाव नहीं जीते जाते।

जन टिप्पणीकार प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी का मानना है कि लगातार चुनावी हार ने विपक्ष को गहरी निराशा में धकेल दिया है। उसका पूरा ध्यान केवल मोदी सरकार को हटाने पर केंद्रित हो गया है। कॉकरोच आंदोलन उसे एक सुनहरा अवसर लगा। लेकिन राजनीति में बाजी उसी की होती है जो समय रहते चाल बदल ले।

यहीं नरेंद्र मोदी ने अपनी राजनीतिक चतुराई दिखाई।

सरकार ने टकराव को लंबा नहीं खींचा। प्रदर्शनकारियों की मुख्य माँगें मान लीं। मंत्री ने इस्तीफा दिया। बातचीत हुई। आंदोलन का तत्काल कारण समाप्त हो गया।

इसे कहते हैं "साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।"

सरकार ने एक मंत्री खोया, लेकिन बड़ा राजनीतिक संकट टाल दिया। विपक्ष के हाथ का सबसे तेज़ हथियार भी कुंद हो गया। संसद में शोर चलता रहा, लेकिन जनता का ध्यान दूसरी ओर मुड़ चुका था।

इसका मतलब यह नहीं कि समस्याएँ खत्म हो गई हैं। परीक्षा प्रणाली में सुधार की ज़रूरत अब भी है। युवाओं की बेरोज़गारी और शिक्षा व्यवस्था पर सवाल भी बने हुए हैं। छात्रों का भरोसा वापस जीतना आसान नहीं होगा।

लेकिन फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि मोदी इस मुश्किल इम्तिहान से निकलने में कामयाब रहे हैं।

कॉकरोच जनता पार्टी ने साबित कर दिया कि आज का युवा केवल वोटर नहीं, एजेंडा तय करने वाली ताकत भी बन सकता है।

और विपक्ष के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है:

अगर कुछ छात्रों ने मीम और मोबाइल के दम पर वह कर दिखाया, जो अनुभवी नेता वर्षों में नहीं कर सके, तो असली आत्ममंथन किसे करना चाहिए: सरकार को या विपक्ष को?

Sunday, July 26, 2026

 इंस्टाग्राम से जंतर-मंतर तक, बदल गई सियासत

नीट से निकला गुस्सा, लोकतंत्र का नया चेहरा

जब जेन ज़ी ने अपनी आवाज़ बुलंद की

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

28 जुलाई, 2026

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जंतर-मंतर बगावत के एक रंगीन मेले में बदल गया। जेन ज़ी के नौजवान गा रहे थे, नाच रहे थे, मीम्स बना रहे थे, ताकतवर नेताओं का मज़ाक उड़ा रहे थे और बर्गर, पिज़्ज़ा, भटूरे खाते हुए ऐसे मस्ती कर रहे थे, मानो राजनीति किसी कॉलेज फेस्ट में आ घुसी हो।

लेकिन इस हंसी-मज़ाक और शोर-शराबे के पीछे एक साफ़ और मज़बूत पैगाम था: जवाबदेही चाहिए। हिंसा भी इस आंदोलन का जोश कम नहीं कर सकी। युवाओं के नए झुंड लगातार पहुंचते रहे। बेखौफ, पूरे हौसले के साथ। देखते ही देखते यह धरना लोकतंत्र के एक जीवंत उत्सव में बदल गया।

यह युवा आंदोलन भारत के लोकतांत्रिक सफर का एक अहम पड़ाव बन गया। शुरुआत परीक्षा व्यवस्था के खिलाफ गुस्से से हुई थी, लेकिन जल्द ही यह एक बड़े संदेश में बदल गई; देश के युवाओं की आवाज़ को अब नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

जिस जनदबाव के बाद धर्मेंद्र प्रधान को पद छोड़ना पड़ा, प्रधानमंत्री से इंस्टाग्राम पर सीधे युवाओं से बात करने की मांग उठी, और नंदन नीलेकणी समेत विशेषज्ञों की नई टास्क फोर्स बनाने का फैसला हुआ, उसने एक बात साबित कर दी। शांतिपूर्ण, संगठित और स्पष्ट जनदबाव सरकारों को फैसले बदलने पर मजबूर कर सकता है।

इस आंदोलन ने सोशल मीडिया की असली ताकत भी दिखा दी। जो काम कभी बड़े मीडिया संस्थान तय करते थे, वह इस बार पूरी तरह इंटरनेट पर हुआ। कहानी वहीं बनी, वहीं फैली और वहीं से पूरे देश तक पहुंची। पारंपरिक मीडिया को इस बार युवाओं के पीछे-पीछे चलना पड़ा।

जेन ज़ी की अपनी अलग भाषा थी; बेबाक, अचानक, प्रतीकों से भरी और बिना किसी बनावट के। उसने राजनीतिक आंदोलनों के पुराने तौर-तरीकों को तोड़ दिया। उसकी सादगी और सच्चाई ने हर विचारधारा के लोगों का ध्यान खींचा।

यह आंदोलन दलगत राजनीति से ऊपर उठ गया। छोटा था, लेकिन रंगों और उम्मीदों से भरा हुआ। जैसे तपती गर्मी के बाद पहली बारिश राहत लेकर आती है, वैसे ही इसने पहली बार सड़कों पर उतरे युवाओं, डिजिटल दौर की पीढ़ी और आम छात्रों को एक मंच पर ला दिया। बिना किसी लिखी हुई स्क्रिप्ट के यह लोकतंत्र का ऐसा नज़ारा था, जिसने नई ऊर्जा और नई उम्मीद जगाई। इसने संकेत दिया कि देश में एक बड़े युवा जागरण की शुरुआत हो चुकी है।

सरकार ने समय रहते कुछ कदम उठाए, जिससे आंदोलन और नहीं भड़का। इस पूरे घटनाक्रम ने लोकतंत्र की एक पुरानी सच्चाई फिर याद दिला दी; शांतिपूर्ण जनआंदोलन लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं होते, बल्कि उसकी सबसे बड़ी ताकत होते हैं। खासकर युवाओं की आवाज़ को अनसुना करना किसी भी सरकार के लिए आसान नहीं होता।

राजनीति हमेशा एक सबक देती है; नेता जितनी ऊंचाई पर पहुंचता है, अहंकार आने पर उसका गिरना उतना ही दर्दनाक होता है। भारतीय पुराण ऐसी मिसालों से भरे पड़े हैं। सत्ता के नशे में चूर इंद्र को तब विनम्र होना पड़ा, जब बालक कृष्ण ने अपनी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया। अपनी विद्वता पर गर्व करने वाले नारद मुनि का अहंकार भी भगवान विष्णु ने तोड़ा। घमंड इंसान की सोच पर पर्दा डाल देता है, जबकि विनम्रता उसे सही रास्ता दिखाती है।

नीट विवाद नरेंद्र मोदी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन गया । यह केवल एक परीक्षा का मामला नहीं रहा। यह भरोसे का ऐसा संकट बन गया, जिसने उन लाखों छात्रों और परिवारों को झकझोर दिया है, जो शिक्षा को अपनी तरक्की की सबसे मजबूत सीढ़ी मानते हैं।

कई वर्षों तक नरेंद्र मोदी ने एक आत्मविश्वासी और सक्षम "विश्वगुरु भारत" की छवि बनाई। लेकिन नीट विवाद ने उस तस्वीर में गहरी दरार डाल दी। पेपर लीक, गड़बड़ियों और प्रशासनिक अव्यवस्था के आरोपों ने एक राष्ट्रीय परीक्षा को सरकारी व्यवस्था की नाकामी का प्रतीक बना दिया।

सबसे बड़ी भूल संकट का पैदा होना नहीं थी। असली गलती थी सरकार की धीमी और हिचकिचाती प्रतिक्रिया। सच्चा नेतृत्व वही होता है, जो गलती स्वीकार करे, निष्पक्ष जांच कराए और दोषियों पर तुरंत कार्रवाई करे। लेकिन यहां जवाब बचाव वाला ज़्यादा था, समाधान वाला कम। हर बीतते दिन के साथ लोगों का शक बढ़ता गया कि सरकार हालात को संभाल नहीं रही, बल्कि घटनाओं के पीछे-पीछे चल रही है।

नेतृत्व का मतलब ज़िम्मेदारी लेने का साहस भी होता है। संसदीय लोकतंत्र में कई बार मंत्री अपने विभाग की बड़ी विफलताओं की नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे देते हैं, चाहे उनकी व्यक्तिगत गलती साबित न हुई हो। ऐसे कदम जनता का भरोसा मज़बूत करते हैं। लेकिन नीट मामले में जवाबदेही की मांग को लगभग नज़रअंदाज़ कर दिया गया। इससे यही संदेश गया कि सरकार के लिए अपनी सियासी ताकत बचाना, जनता का भरोसा लौटाने से ज़्यादा अहम है।

इस विवाद ने एक और गहरी कमजोरी उजागर की। जब किसी सरकार को लगातार भारी चुनावी जीत मिलने लगती है, तो अक्सर वह आलोचना सुनना कम कर देती है। लोकतंत्र तभी मजबूत रहता है, जब सवाल पूछने वालों को दुश्मन नहीं, बल्कि चेतावनी देने वाला समझा जाए। आलोचना छोटी समस्याओं को बड़े राष्ट्रीय संकट बनने से रोकती है।

हमारी प्राचीन परंपरा भी यही सिखाती है। रामायण का वह धोबी, जिसकी कड़ी बात भी भगवान राम तक पहुंची, हमें याद दिलाता है कि शासक सबसे साधारण नागरिक की आवाज़ भी अनसुनी नहीं कर सकता। जनमत चाहे कितना भी कड़वा क्यों न लगे, वही समाज की असली नब्ज़ होता है।

आज की सरकारें संस्थाओं, स्वतंत्र मीडिया, विशेषज्ञों और नागरिक समाज के सहारे ही सही फैसले ले पाती हैं। यही उनकी आंखें और कान होते हैं। जब इन संस्थाओं पर भरोसा कम होने लगता है या उनकी बात सुनी नहीं जाती, तब सरकारें अपने ही बनाए दायरे में कैद हो जाती हैं। वहां सिर्फ वही आवाज़ सुनाई देती है, जो अच्छी लगे। असुविधाजनक सच बहुत देर से सामने आता है। नीट विवाद ने यही दिखाया। छात्र सड़कों पर थे, माता-पिता परेशान थे, अदालतें दखल दे रही थीं, लेकिन सरकारी बयान कानूनी दलीलों तक सीमित रहे। उनमें संवेदना और आत्ममंथन की कमी साफ़ दिखाई दी।

इतिहास भी ऐसी कई चेतावनियां देता है। 1975 की आपातकालीन अवधि सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण और जनता से बढ़ती दूरी का नतीजा थी। अंत में जनता ने उसी सत्ता को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया। आज हालात अलग हैं, लेकिन सबक वही है। लोकतंत्र में अति-आत्मविश्वास, सत्ता का केंद्रीकरण और आलोचना की अनदेखी हमेशा भारी पड़ती है।

नीट का पूरा घटनाक्रम केवल एक परीक्षा की विफलता नहीं है। यह शासन व्यवस्था के लिए चेतावनी है। किसी भी संस्था की साख पारदर्शिता, निष्पक्षता और जवाबदेही से बनती है। राजनीतिक ताकत की असली नींव अजेय होने का भ्रम नहीं, बल्कि जनता का भरोसा होती है।

नरेंद्र मोदी के सामने अभी भी एक अवसर है। वह दिखा सकते हैं कि मजबूत नेतृत्व का मतलब कभी गलती न करना नहीं होता। मजबूत नेता वही होता है, जो अपनी भूल स्वीकार करे, दोषियों को सज़ा दे, संस्थाओं में सुधार लाए और आम नागरिक की आवाज़ सुने।

तालियां अहंकार को कुछ समय तक ज़रूर मिल जाती हैं, लेकिन जनता का भरोसा केवल विनम्रता, ईमानदारी और जवाबदेही से लौटता है। भारत की प्राचीन कथाओं से लेकर आधुनिक लोकतंत्र तक यही सबसे बड़ा सबक रहा है।