Friday, July 3, 2026

 


शादी का न्योता, वंदे भारत का सफर और बदलते भारत की नई रेल कहानी

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पटरियों पर दौड़ता नया हिंदुस्तान, मुस्कुराता मध्यवर्ग और मजबूत होती राष्ट्रीय एकता

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बृज खंडेलवाल द्वारा

4 जुलाई 2026

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एक ज़माना था, जब शादी का कार्ड मिलते ही सबसे पहले रेल यात्रा की चिंता शुरू हो जाती थी। टिकट मिलेगा या नहीं? ट्रेन समय पर चलेगी या नहीं? भीड़ कितनी होगी? रात कैसे कटेगी? बच्चे संभलेंगे या नहीं?बिस्तरबंद, संदूकों, सुराही, खाने में पूरी सब्जी, नमकीन, डकार के लिए चूर्ण! फुल टेंशन।

आज तस्वीर बदल रही है।

इस सप्ताह चेन्नई में हमारे परिवार की एक शादी है। लेकिन यह सिर्फ एक शादी नहीं, बदलते भारत की एक खूबसूरत राष्ट्रीय एकता की  कहानी भी है। रिश्तेदार देश के अलग-अलग शहरों से आ रहे हैं। कोई बेंगलुरु से, कोई कोयंबटूर से, लड़के वाले दिल्ली से,  रिश्तेदार हैदराबाद से और कोलकाता से भी। हम दोनों, मैं और मेरी पत्नी, मैसूर से वंदे भारत एक्सप्रेस में सवार हुए और पांच घंटे में बैंगलोर होकर चेन्नई पहुंचे।

सफर शुरू होते ही लगा कि मंज़िल से पहले ही जश्न शुरू हो गया है।

कोच चमचमा रहा था। सीटें आरामदेह थीं। झटके नाममात्र के थे। न खाने की फिक्र, न पानी की चिंता। गर्मागर्म नाश्ता और चाय अपनी सीट पर ही मिल गए। साफ-सुथरे शौचालय, शांत माहौल और बड़ी खिड़कियों से बाहर भागते खेत, पहाड़ और गांव।

चेन्नई कब आ गया, पता ही नहीं चला।

स्टेशन पर उतरे तो ऐसा नहीं लगा कि कई घंटे की यात्रा करके आए हैं। हम सीधे शादी की रौनक में शामिल होने के लिए तैयार थे।

यही सबसे बड़ा बदलाव है।

एक समय रेल यात्रा अपने आप में इम्तिहान होती थी। लोग घर से पूड़ी-सब्ज़ी, अचार, पानी की बोतलें और दवाइयों का थैला लेकर चलते थे। पूरी रात सामान की रखवाली करनी पड़ती थी। शादी में पहुंचते-पहुंचते आधी थकान चेहरे पर साफ दिखाई देती थी।

आज वंदे भारत ने सफर की पूरी तासीर बदल दी है।

अब यात्रा बोझ नहीं, छुट्टियों और खुशियों का हिस्सा बन गई है।

भारत का नया आकांक्षी मध्यवर्ग यही चाहता था। वह हवाई यात्रा जितना आराम चाहता है, लेकिन परिवार के साथ रेल यात्रा का अपनापन भी नहीं छोड़ना चाहता। वंदे भारत ने दोनों के बीच का रास्ता निकाल दिया है।

ट्रेन के भीतर भी भारत की एक छोटी-सी तस्वीर दिखाई देती है। कोई लैपटॉप पर काम कर रहा है। बच्चे खिड़की से बाहर झांक रहे हैं। बुजुर्ग आराम से अखबार पढ़ रहे हैं। अलग-अलग भाषाएं सुनाई देती हैं, लेकिन मुस्कान की भाषा सबकी एक होती है। मोबाइल प्रेम इतना बढ़ गया है, की पहले जैसे आपस में अजनबी बात नहीं करते! 


भारतीय रेल केवल लोहे की पटरियां और इंजन नहीं है। यह देश की धड़कन है। यह गांवों को शहरों से, पहाड़ों को समुद्र से और दिलों को दिलों से जोड़ती है।

आज भारतीय रेल दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्कों में शामिल है। करीब 68 हजार किलोमीटर लंबे नेटवर्क पर रोज़ लगभग 13 हजार यात्री ट्रेनें दौड़ती हैं। हर दिन 2 करोड़ 30 लाख से अधिक लोग रेल से सफर करते हैं। यानी कई देशों की पूरी आबादी से भी ज़्यादा लोग रोज़ भारतीय रेल पर भरोसा करते हैं।

साल 2019 में पहली वंदे भारत एक्सप्रेस नई दिल्ली और वाराणसी के बीच शुरू हुई थी। आज 2026 तक देश के अलग-अलग हिस्सों में 160 से अधिक वंदे भारत सेवाएं चल रही हैं। इन ट्रेनों का निर्माण चेन्नई की इंटीग्रल कोच फैक्टरी में 'मेक इन इंडिया' अभियान के तहत हुआ है। यह केवल एक ट्रेन नहीं, बल्कि आत्मविश्वास से भरे नए भारत की पहचान बन चुकी है।

समय की बरबादी और सिरदर्दियों से तो बचते ही हैं, इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि रिश्ते और भी करीब आ गए हैं।

अब मैसूर का परिवार आराम से चेन्नई की शादी में शामिल हो सकता है। बेंगलुरु का बेटा सुबह निकलकर दोपहर तक घर पहुंच सकता है। बुजुर्ग बिना ज़्यादा थके बच्चों और पोते-पोतियों से मिलने जा सकते हैं।

रेल अब केवल यात्रियों को नहीं, उम्मीदों को भी मंज़िल तक पहुंचा रही है।

यह भी सच है कि भारतीय रेल की असली ताकत केवल वंदे भारत नहीं है। लाखों लोगों के लिए आज भी साधारण मेल, एक्सप्रेस और पैसेंजर ट्रेनें जीवनरेखा हैं। किसान, मज़दूर, छात्र, व्यापारी और तीर्थयात्री, सबके लिए रेल बराबरी का सफर उपलब्ध कराती है।

इसी बराबरी में भारत की असली ताकत छिपी है।

रेल हमें केवल एक शहर से दूसरे शहर नहीं ले जाती। वह हमें एक-दूसरे के और करीब भी ले आती है। रास्ते में मिलने वाले लोग, बदलते नज़ारे, अलग-अलग बोलियां और साझा मुस्कानें हमें याद दिलाती हैं कि विविधता के बावजूद हम एक ही देश की संतान हैं।

इस बार चेन्नई की शादी में हमारे परिवार को जोड़ने का काम केवल रिश्तों ने नहीं किया। वंदे भारत ने भी उतनी ही अहम भूमिका निभाई।

कभी-कभी राष्ट्र निर्माण बड़े-बड़े भाषणों से नहीं होता। वह तब होता है, जब दादा-दादी बिना थके शादी में पहुंच जाएं। जब बच्चे सफर का आनंद लें। जब रिश्तेदार समय पर मिलें। जब यात्रा शिकायत नहीं, खुशगवार याद बन जाए।

भारतीय रेल पिछले 170 वर्षों से देश को जोड़ती आई है। वंदे भारत उस लंबी यात्रा का नया पड़ाव है। यह केवल तेज़ रफ्तार ट्रेन नहीं, बल्कि उस नए भारत की तस्वीर है जो अपने नागरिकों को सुविधा, सम्मान और बेहतर जीवन देना चाहता है।

मैसूर से चेन्नई तक के इस सफर में हमने सिर्फ दूरी तय नहीं की। हमने बदलते भारत की रफ्तार को अपनी आंखों से देखा, महसूस किया और जिया।

Thursday, July 2, 2026

 


सोडा वाटर की फिज़ क्यों फुस्स हो गई?

क्या वेलफेयर की मिठास ने भारत के जनआंदोलनों की आग ठंडी कर दी है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

3 जुलाई 2026

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कभी भारत में आंदोलन खड़ा करना सोडा वाटर की बोतल खोलने जैसा था। ढक्कन खुला नहीं कि झाग आसमान छूने लगता था। एक नारा लगता था और हजारों लोग सड़कों पर उतर आते थे। छात्र, किसान, मजदूर, कर्मचारी। हर तरफ उबाल था। सत्ता की पेशानी पर पसीना आ जाता था।


आज भी गुस्सा है। शिकायतें भी हैं। महंगाई है। बेरोजगारी है। किसानों की परेशानियां हैं। लेकिन फिर भी पूरे देश को हिला देने वाले जनआंदोलन पहले जैसे क्यों नहीं दिखाई देते?


क्या जनता बदल गई है? या राजनीति का मिज़ाज बदल गया है? या फिर सरकार ने नाराजगी की आग पर वेलफेयर का पानी डाल दिया है?


यही सवाल आज की भारतीय राजनीति की सबसे दिलचस्प पहेली है।


इतिहास कहता है कि क्रांतियां सिर्फ भूख से नहीं होतीं। वे टूटती उम्मीदों से जन्म लेती हैं। फ्रांसीसी चिंतक एलेक्सिस डी टॉकविल ने बहुत पहले कहा था कि सबसे बड़ा विस्फोट तब होता है, जब लोगों की उम्मीदें तेजी से बढ़ें, लेकिन व्यवस्था उनका साथ न दे। जेम्स सी. डेविस और सैमुअल पी. हंटिंगटन ने भी इसी सोच को आगे बढ़ाया।


भारत का स्वतंत्रता संग्राम हो, सत्तर के दशक का जेपी आंदोलन हो, गुजरात का नव निर्माण आंदोलन हो, रेलवे की ऐतिहासिक हड़ताल हो या 2011 का अन्ना आंदोलन, इन सबकी जड़ में गहरा मोहभंग था। लोगों को लगने लगा था कि सत्ता सुन नहीं रही। जब उम्मीद दम तोड़ देती है, तब इंकलाब जन्म लेता है।


लेकिन 2014 के बाद कहानी का रुख बदलता दिखाई देता है।


सरकार ने विकास के साथ कल्याणकारी योजनाओं का ऐसा ताना-बाना बुना, जिसे कुछ अर्थशास्त्री "सॉफ्ट कैपिटलिज्म" कहते हैं। यानी बाजार भी चले और गरीब का चूल्हा भी जले।


जनधन खाते खुले। आधार जुड़ा। मोबाइल हाथ में आया। डीबीटी के जरिए पैसा सीधे बैंक खातों में पहुंचने लगा। उज्ज्वला का गैस सिलेंडर मिला। पीएम किसान की मदद आई। मुफ्त राशन, पेंशन, छात्रवृत्ति और दूसरी योजनाओं का लाभ सीधे लोगों तक पहुंचने लगा। बिचौलियों की दुकान धीरे-धीरे सिमटने लगी।


यह बदलाव केवल जेब में नहीं, दिमाग में भी हुआ।

जिस गरीब ने पहली बार बैंक में अपना नाम देखा, जिसके घर बिजली आई, नल से पानी आया, राशन की चिंता घटी या इलाज का भरोसा मिला, उसके भीतर व्यवस्था के प्रति पूरी मायूसी की जगह एक उम्मीद ने जन्म लिया।


क्रांतियां उम्मीद से नहीं, निराशा से पैदा होती हैं।

यही शायद सबसे बड़ा बदलाव है।

पिछले एक दशक में करोड़ों लोग औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से जुड़े। गांवों तक सड़कें पहुंचीं। डिजिटल भुगतान ने रेहड़ी वाले तक को क्यूआर कोड पकड़ा दिया। मोबाइल इंटरनेट ने गांव और शहर के बीच की कई दीवारें गिरा दीं। स्टार्टअप और स्वरोजगार ने युवाओं के सामने नए सपने रख दिए।


अब लोगों की बातचीत भी बदल गई है।

पहले सवाल होता था, "सरकार कब जाएगी?"

अब सवाल है, "बेटे को नौकरी कब मिलेगी?" "बेटी की पढ़ाई कैसे पूरी होगी?" "अपना घर कब बनेगा?" "दुकान कैसे बढ़ेगी?"

यानी सामूहिक गुस्से की जगह निजी उम्मीदों ने ले ली।


लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं कि भारत में विरोध खत्म हो गया है।

किसान आंदोलन ने दिखा दिया कि जब मुद्दा गहरा हो, तो लाखों लोग आज भी एकजुट हो सकते हैं। नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शन हुए। कई राज्यों में स्थानीय आंदोलनों ने सरकारों को मुश्किल में डाला। लोकतंत्र में असहमति अब भी जिंदा है।


फिर भी एक फर्क साफ दिखाई देता है। आज के आंदोलन अक्सर किसी खास मुद्दे या इलाके तक सीमित रह जाते हैं। वे पूरे देश में वैसी आग नहीं लगा पाते, जैसी पहले लगती थी।

इसके पीछे सिर्फ वेलफेयर योजनाएं ही जिम्मेदार नहीं हैं। मजबूत सरकारी तंत्र, सोशल मीडिया पर बिखरती बहस, कमजोर विपक्ष, बदलती चुनावी राजनीति और युवाओं की नई महत्वाकांक्षाएं भी इस बदलाव की अहम वजह हैं।


सच यह है कि समाज बदल रहा है।

जिस नागरिक के पास बैंक खाता, गैस कनेक्शन, राशन की गारंटी, स्वास्थ्य बीमा और डिजिटल पहचान है, वह व्यवस्था को आग लगाने से पहले दस बार सोचता है। वह क्रांति से ज्यादा सुधार चाहता है। उसे सड़क पर संघर्ष से ज्यादा अपने बच्चों का भविष्य दिखाई देता है।


लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।

बेरोजगारी आज भी बड़ा सवाल है। आय की खाई अब भी चौड़ी है। किसान और युवा अब भी परेशान हैं। अगर उम्मीदें टूटने लगीं, अवसर सिकुड़ गए और विकास की रफ्तार थम गई, तो वही दबा हुआ लावा फिर बाहर भी आ सकता है। इतिहास यही सिखाता है।


इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत में जनआंदोलनों का दौर खत्म हो गया है। इतना जरूर कहा जा सकता है कि उनकी शक्ल बदल गई है। राजनीति का तापमान बदल गया है। विरोध की भाषा बदल गई है।


सोडा वाटर की बोतल अब भी बंद है। उसके भीतर दबाव भी है। फर्क सिर्फ इतना है कि ढक्कन अब पहले जितनी आसानी से नहीं खुलता।


भविष्य किस करवट बैठेगा, यह आने वाला वक्त बताएगा। लेकिन फिलहाल इतना साफ दिखता है कि जिस समाज के पास उम्मीदें बची हों, वह हर सुबह क्रांति का बिगुल नहीं बजाता। वह अपने बच्चों के लिए बेहतर कल बनाने निकल पड़ता है।


Wednesday, July 1, 2026

 पेठे की मिठास, पेड़े की महक... 

ब्रज का स्वाद अब भी दुनिया का दिल जीत रहा है!

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

2 जुलाई 2026

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मुगल बादशाह जहांगीर ने  चाँदी की कटोरी में रखी ठंडी खीर का एक चम्मच उठाया। फिर गरमागरम गुलाब जामुन का छोटा-सा टुकड़ा उसमें डुबोया। एक कौर लिया और मुस्कुरा उठे। कहते हैं, शाही रसोइयों की यही सबसे बड़ी दाद थी। 

कहते हैं, ताजमहल बन रहा था। शाहजहां ने चाशनी में पके पेठे का स्वाद चखा और ऐसे मुरीद हुए कि आगरा का पेठा हमेशा के लिए शाही पहचान बन गया। खासतौर पर पंछी! 

इतिहास इन किस्सों की  तस्दीक करे या न करे, लेकिन इतना तय है कि आगरा की मिठाइयों का रिश्ता सिर्फ़ स्वाद से नहीं, तहज़ीब, विरासत और जज़्बात से भी रहा है।

आज वही मिठास एक नए इम्तिहान से गुज़र रही है। एक तरफ़ बदलती जीवनशैली, चॉकलेट और बेकरी उत्पादों की बढ़ती घुसपैठ है। दूसरी तरफ़ सरकारी नियम, लगातार निरीक्षण और काग़ज़ी अनुपालन का बोझ। 

फिर भी आगरा, मथुरा, वृंदावन और हाथरस के हलवाई हार मानने को तैयार नहीं हैं। वे परंपरा को बचाते हुए नए स्वाद गढ़ रहे हैं।

ब्रज मंडल सदियों से मिठाइयों का इलाक़ा रहा है। मथुरा और वृंदावन अपने दूध, खोए और पेड़ों, खुरचन के लिए मशहूर हैं। हाथरस की रबड़ी और सोन पपड़ी की अलग पहचान है। आगरा की पहचान देसी घी की मिठाइयों, गुलाब जामुन, बूंदी के लड्डुओं, बर्फियों और दुनिया भर में मशहूर पेठे से है। यहाँ शादी हो, जन्मदिन हो, मंदिर का भोग हो या किसी मेहमान का इस्तकबाल, या फिर मृत्यु भोज, मिठाई के बिना बात अधूरी मानी जाती है। हलवे के नाम पर सबसे ज्यादा डिमांड सीजन में गाजर का हलवा, बाकी टाइम मूंग की दाल का  देशी घी वाला हलवा, की रहती है। गर्मी में रस गुल्ले, रस मलाई, सर्दी में पिस्ते की बर्फी, खूब बिकती हैं।

ख़ऊओं की नगरी मथुरा के चौबेजी कहते हैं, "ब्रज के ठाकुरजी भी मानो मिठास के सबसे बड़े रसिक हैं। कहीं बूंदी के लड्डू चढ़ते हैं, कहीं पेड़ा, कहीं माखन-मिश्री और कहीं तरह-तरह की बर्फियाँ, मोहन थाल, ठौर, मीठी मठरी, खुरमा, बालू शाही। यही धार्मिक परंपरा इस कारोबार को पीढ़ियों से सहारा देती आई है। जलेबी, इमरती, माल पुओं की तो शान निराली है। माखन का समोसा, परमल भरमा, खोए की गुजिया, रबड़ी आम नहीं चखा तो ब्रज दर्शन बेकार।"

मथुरा-वृंदावन की सबसे प्रसिद्ध और पहचान बन चुकी मिठाई मथुरा का पेड़ा है। यह खोया (मावा), चीनी और इलायची से तैयार किया जाता है। इसका हल्का दानेदार, मुलायम और मुंह में घुल जाने वाला स्वाद इसे खास बनाता है। श्रीकृष्ण भक्ति परंपरा से जुड़े इस पेड़े का मंदिरों में प्रसाद के रूप में भी विशेष महत्व है।

मथुरा के प्रसिद्ध मिठाई विक्रेताओं में बृजवासी स्वीट्स सबसे अधिक चर्चित है। इसके अलावा राधिका स्वीट्स, शंकर मिठाई वाला और श्रीजी पेड़ा भंडार भी अपनी गुणवत्ता के लिए जाने जाते हैं।

पोद्दारजी बताते हैं, "मथुरा की अन्य लोकप्रिय मिठाइयों में खुरचन, रबड़ी और मालपुआ प्रमुख हैं। खुरचन गाढ़े दूध की परतों से बनाई जाने वाली अनोखी मिठाई है, जबकि रबड़ी और मालपुआ का स्वाद एक-दूसरे के साथ और भी लाजवाब लगता है।

इसके अलावा बूंदी लड्डू, बेसन लड्डू, मेवा लड्डू, विभिन्न प्रकार की बर्फियां, जलेबी, बालूशाही, रेवड़ी और गजक भी यहां खूब पसंद की जाती हैं। ब्रज की मिठाइयों में दूध, मावा और घी का भरपूर उपयोग होता है, जो भगवान श्रीकृष्ण की गोपाल संस्कृति और ब्रज की समृद्ध दुग्ध परंपरा का प्रतीक है।"

अगले माह सावन की आहट के साथ घेवर का मौसम शुरू होने वाला है। लेकिन इस बार सिर्फ़ पारंपरिक घेवर नहीं, बल्कि केसर, चॉकलेट, ब्लूबेरी, पान, ड्राई फ्रूट और फ्यूज़न फ्लेवर वाले घेवर भी बाज़ार में उतर रहे हैं। यही नहीं, आगरा के पुराने हलवाई काजू अनारकली, पान पेठा, चॉकलेट पेठा, ड्राई फ्रूट बर्फी और कई नई प्रयोगधर्मी मिठाइयाँ तैयार कर रहे हैं।

करीब तीन सौ साल पुराने भगत हलवाई जैसे प्रतिष्ठानों ने साबित किया है कि परंपरा का मतलब ठहर जाना नहीं होता। पुराने स्वाद को बचाते हुए नई पीढ़ी की पसंद के हिसाब से मिठाइयों में नए रंग, नए आकार और नए फ्लेवर जोड़े जा सकते हैं। गोपाल दास, ब्रज भोग, जीएमबी, डबल हाथरस, मोर मुकुट, सत्तो , देवीराम, हीरालाल और कई अन्य प्रतिष्ठान भी इसी राह पर आगे बढ़ रहे हैं। यह फ्यूज़न सिर्फ़ फैशन नहीं, बल्कि बदलते बाज़ार की ज़रूरत बन चुका है।

मगर तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। आगरा और मथुरा का अधिकांश मिठाई उद्योग आज भी असंगठित है। हज़ारों छोटी दुकानों और पारिवारिक कारोबारों पर इसकी नींव टिकी है। पिछले कुछ वर्षों में मशीनें आई हैं, पैकेजिंग सुधरी है और सफ़ाई के मानकों पर भी काम हुआ है। फिर भी अधिकतर काम आज भी हाथों से होता है। यही इसकी पहचान भी है और चुनौती भी।

खाद्य सुरक्षा के लिए निरीक्षण और निगरानी ज़रूरी हैं। मिलावट करने वालों पर सख़्त कार्रवाई भी होनी चाहिए। लेकिन ईमानदार हलवाइयों का कहना है कि कई बार अलग-अलग विभागों की लगातार छापेमारी, नोटिस और काग़ज़ी औपचारिकताएँ कारोबार पर बेवजह का दबाव बना देती हैं। उनका तर्क है कि सरकार का ध्यान उद्योग को बेहतर बनाने पर होना चाहिए, न कि सिर्फ़ दंडात्मक कार्रवाई पर।

एक नई चिंता मिठाइयों पर स्वास्थ्य संबंधी चेतावनी छापने की संभावित योजना को लेकर भी है। मधुमेह के बढ़ते मामलों के कारण चीनी की मात्रा पर सख़्त नियम बनाने की चर्चा चल रही है। कुछ हलवाई इसे ज़रूरी बहस मानते हैं, लेकिन कई का कहना है कि भारतीय भोजन की परंपरा में थोड़ा-सा मीठा हमेशा से शामिल रहा है। उनके अनुसार स्थानीय दूध, घी, गुड़ और सूखे मेवों से बनी पारंपरिक मिठाइयों की तुलना चॉकलेट, मफ़िन या अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों से नहीं की जानी चाहिए।

हलवाई यह आरोप भी लगाते हैं कि बड़े चॉकलेट और कन्फेक्शनरी ब्रांड भारतीय मिठाइयों को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं ताकि उनके उत्पादों की बिक्री बढ़े। इस दावे का स्वतंत्र प्रमाण भले न हो, लेकिन इतना सच है कि बदलती उपभोक्ता आदतों ने पारंपरिक मिठाई कारोबार पर दबाव ज़रूर बढ़ाया है।

फिर भी उम्मीद की वजहें कम नहीं हैं। आगरा आने वाला शायद ही कोई पर्यटक पेठा खरीदे बिना लौटता हो। मथुरा का पेड़ा आज भी श्रद्धा और स्वाद, दोनों का प्रतीक है। ऑनलाइन ऑर्डर, आकर्षक पैकेजिंग, वैक्यूम सील तकनीक और लंबी शेल्फ लाइफ़ ने देश-विदेश तक पहुँचने के नए रास्ते खोल दिए हैं।

ज़रूरत इस बात की है कि सरकार और उद्योग एक-दूसरे के विरोधी नहीं, साझेदार बनें। सफ़ाई, गुणवत्ता और प्रशिक्षण पर निवेश हो। छोटे हलवाइयों को आधुनिक तकनीक और आसान ऋण मिले। साथ ही ब्रज की इस मीठी विरासत को भौगोलिक पहचान, पर्यटन और सांस्कृतिक धरोहर से भी जोड़ा जाए।

आगरा की मिठाइयाँ केवल चीनी और घी का मेल नहीं हैं। इनमें इतिहास की खुशबू है, ब्रज की भक्ति है, मुग़ल रसोई की झलक है और हर भारतीय त्योहार की रौनक बसती है। अगर इस विरासत को समझदारी से सँभाला गया, तो इसकी मिठास आने वाली पीढ़ियों की ज़ुबान पर भी उसी तरह घुलती रहेगी, जैसे कभी बादशाहों की खीर में डूबा एक गुलाब जामुन।

Tuesday, June 30, 2026

 पहले खुद का इलाज कीजिए, डॉक्टर साहब!

डॉक्टर्स डे पर चिकित्सा जगत के सामने खड़े नैतिक सवाल!!

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

30 जून 2026

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डॉक्टर को धरती पर भगवान का दूसरा रूप कहा जाता है। बीमार इंसान अपनी ज़िंदगी, अपना भरोसा और अपने परिवार की उम्मीदें डॉक्टर के हाथों में सौंप देता है। डॉक्टर्स डे पर हम उन लाखों चिकित्सकों को सलाम करते हैं जो ईमानदारी, रहमदिली और समर्पण के साथ दिन-रात लोगों की जान बचाते हैं। उनका पेशा सिर्फ़ रोज़गार नहीं, बल्कि इंसानियत की ख़िदमत है।

लेकिन हर बाग़ में कुछ सूखे पेड़ भी होते हैं। डॉक्टरों की दुनिया भी इससे अछूती नहीं रही। एक छोटा मगर बढ़ता हुआ तबका पूरे पेशे की साख पर दाग़ लगा रहा है। सेवा की जगह मुनाफ़ा, हमदर्दी की जगह कारोबार और मरीज़ की जगह ग्राहक दिखाई देने लगा है। सबसे बड़ी दवा भरोसा होता है। वही भरोसा अब दरकने लगा है।

इस बीमारी की शुरुआत मेडिकल कॉलेज के दरवाज़े से ही हो जाती है।

हर साल 22 लाख से ज़्यादा विद्यार्थी नीट परीक्षा देते हैं। लेकिन सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सीटें बहुत कम हैं। जिन छात्रों को सरकारी कॉलेज नहीं मिलते, उनके सामने निजी मेडिकल कॉलेजों की लाखों नहीं, करोड़ों रुपये तक की फीस खड़ी होती है। कई परिवार ज़मीन बेचते हैं, मकान गिरवी रखते हैं या जीवन भर की जमा-पूंजी खर्च कर देते हैं। हज़ारों छात्र मजबूरी में रूस, जॉर्जिया, कज़ाख़स्तान और फ़िलीपींस जैसे देशों का रुख़ करते हैं।

जब डॉक्टर बनने की कीमत ही करोड़ों में चुकानी पड़े, तो कुछ लोगों के मन में बाद में उस रकम की भरपाई करने का लालच पैदा होना कोई हैरानी की बात नहीं। यहीं से चिकित्सा सेवा धीरे-धीरे कारोबार में बदलने लगती है।

देश में मेडिकल कॉलेज और एमबीबीएस सीटें बढ़ी हैं। इसके बावजूद गाँवों और सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की भारी कमी बनी हुई है। बड़े शहरों में विशेषज्ञ डॉक्टर मिल जाते हैं, लेकिन दूर-दराज़ के इलाक़ों में लोग आज भी बुनियादी इलाज के लिए भटकते हैं। कई योग्य डॉक्टर बेहतर वेतन और सुविधाओं के लिए विदेश चले जाते हैं।

सबसे बड़ी कीमत मरीज़ चुकाता है।

मेडिकल लापरवाही के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। ग़लत इलाज, बीमारी की देर से पहचान, ऑपरेशन में चूक और निगरानी की कमी जैसी घटनाएँ आए दिन सामने आती हैं। हर ऐसी घटना के पीछे किसी परिवार का टूटा हुआ सपना, किसी माँ की सूनी गोद या किसी बच्चे का उजड़ा भविष्य छिपा होता है। अधिकांश डॉक्टर ईमानदार हैं, लेकिन कुछ लोगों की लापरवाही पूरे पेशे की साख पर सवाल खड़े कर देती है।

कई निजी नर्सिंग होम भी सवालों के घेरे में हैं। कहीं बेवजह महँगे टेस्ट लिखे जाते हैं, कहीं अनावश्यक ऑपरेशन की सलाह दी जाती है, तो कहीं अस्पताल का बिल बीमारी से भी बड़ा हो जाता है। बीमारी किसी परिवार की मजबूरी होती है, कमाई का मौक़ा नहीं।

एक और गंभीर बीमारी है कमीशन का खेल।

कुछ पैथोलॉजी लैब डॉक्टरों को जाँच लिखने पर कमीशन देती हैं। कुछ दवा कंपनियाँ महँगी ब्रांडेड दवाइयाँ लिखवाने के लिए तरह-तरह के लालच देती हैं। इसका बोझ आख़िरकार मरीज़ की जेब पर पड़ता है। इलाज महँगा होता जाता है और भरोसा सस्ता।

फिर आता है आईसीयू का सबसे दर्दनाक सच।

कई बार ऐसे मरीज़ों को भी लंबे समय तक आईसीयू में रखा जाता है जिनके बचने की उम्मीद लगभग समाप्त हो चुकी होती है। परिवार चमत्कार की आस में घर, ज़मीन और गहने तक बेच देता है। लेकिन अस्पताल का बिल बढ़ता ही जाता है। ऐसे कठिन फ़ैसलों में इंसानियत सबसे आगे होनी चाहिए, मुनाफ़ा नहीं।

इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि पूरा चिकित्सा जगत दोषी है। सच तो यह है कि देश के लाखों डॉक्टर आज भी पूरी निष्ठा और ईमानदारी से सेवा कर रहे हैं। सरकारी अस्पतालों की भीड़ हो या दूर-दराज़ का गाँव, वे सीमित संसाधनों में भी लोगों की जान बचाने में जुटे रहते हैं। यही डॉक्टर इस पेशे का असली चेहरा हैं।

लेकिन कुछ लोगों की ग़लतियों पर पर्दा डालना भी उचित नहीं। समय आ गया है कि चिकित्सा जगत आत्ममंथन करे। अस्पतालों की फ़ीस पारदर्शी हो, मेडिकल लापरवाही पर सख़्त कार्रवाई हो, अनैतिक कमीशन पर पूरी तरह रोक लगे और मेडिकल शिक्षा में नैतिक मूल्यों को उतनी ही अहमियत दी जाए जितनी आधुनिक तकनीक को।

मरीज़ों को भी अपने अधिकारों की जानकारी होनी चाहिए। इलाज का पूरा ब्यौरा साफ़-साफ़ बताया जाए। हर जाँच और हर ख़र्च का कारण समझाया जाए। भरोसा छिपाने से नहीं, पारदर्शिता से पैदा होता है।

इस डॉक्टर्स डे पर हम उन सभी चिकित्सकों को दिल से सलाम करते हैं जो चिकित्सा को सेवा मानते हैं, सौदा नहीं।

सफ़ेद कोट केवल सम्मान का प्रतीक नहीं, ज़िम्मेदारी का भी प्रतीक है।

अस्पताल मंदिर बने रहें, बाज़ार नहीं।

हिप्पोक्रेटिक शपथ का पहला संदेश है: इंसानियत की सेवा। शायद इस डॉक्टर्स डे की सबसे ज़रूरी दवा भी यही है; दूसरों का इलाज करने से पहले, चिकित्सा व्यवस्था को अपना इलाज ख़ुद करना होगा।


Monday, June 29, 2026

 


मानसून जो रास्ते से भटक गया, आसमान जो बरसना भूल गया

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अल्लाह, मेघ दे, पानी दे !

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आगरा  बढ़ते जल संकट की चपेट में है। भीषण गर्मी ने लोगों का जीना मुश्किल कर दिया है। मानसून की बेरुखी ने हालात और बिगाड़ दिए हैं। यमुना नदी महीनों से सूखी और प्रदूषित पड़ी है। कई घाटों पर पानी की जगह रेत और गंदगी दिखाई देती है। भूजल लगातार नीचे जा रहा है। ट्यूबवेल जवाब देने लगे हैं। अगर जुलाई में भी अच्छी बारिश नहीं हुई, तो ताजमहल का शहर प्यास, गर्मी और जल संकट की त्रासदी से जूझने को मजबूर हो जाएगा।

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

1 जुलाई 2026

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जून गुजर गया। कैलेंडर ने नया महीना दिखा दिया, लेकिन खेत अब भी सूखे पड़े हैं। 

उत्तर प्रदेश के बांदा जिले का किसान रामदीन रोज़ सुबह आसमान की तरफ देखता है। उसे बादलों का इंतज़ार है, मगर नज़र आती है सिर्फ़ धूल। खेतों की मिट्टी जगह-जगह फट गई है। धरती की दरारें जैसे किसी गहरे ज़ख्म की कहानी सुना रही हों।


इस साल जून ने किसानों की उम्मीदों पर पानी नहीं, मायूसी बरसाई। देश के कई हिस्सों में बारिश सामान्य से 30 से 40 प्रतिशत कम हुई। कहीं-कहीं तो आधी से भी कम बारिश दर्ज की गई। 

दक्षिण-पश्चिम मानसून, जो हर साल जून की शुरुआत में केरल से दस्तक देकर पूरे देश को राहत देता है, इस बार जैसे रास्ता ही भटक गया। कई इलाकों तक वह समय पर पहुंच ही नहीं पाया।


रामदीन अकेला नहीं है। देश के करोड़ों किसान इसी बेचैनी से आसमान निहार रहे हैं। मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक और बुंदेलखंड जैसे इलाकों में खेत सूने पड़े हैं। जहां इस समय तक धान, सोयाबीन, दालें और मोटे अनाज की हरियाली लहलहाती थी, वहां अब धूल उड़ रही है। खरीफ की बुवाई काफी पीछे चल रही है। कई जगह ट्रैक्टर खड़े हैं, बीज और खाद की दुकानों पर सन्नाटा पसरा है।


देश के विभिन्न क्षेत्रों में पानी का संकट पहले ही पुराना है। हर कमजोर मानसून यहां की मुश्किलें कई गुना बढ़ा देता है। किसान साहूकारों से ऊंचे ब्याज पर कर्ज लेकर बीज खरीदते हैं। अगर बारिश न हो तो फसल चौपट हो जाती है। फिर पूरा साल कर्ज़ चुकाने की जद्दोजहद में निकल जाता है। गरीब किसान की ज़िंदगी जैसे उम्मीद और मायूसी के बीच झूलती रहती है।


देश के बड़े जलाशयों की तस्वीर भी तसल्ली देने वाली नहीं है। पानी का भंडार लगातार घट रहा है। इसका असर सिर्फ खेती पर नहीं पड़ेगा, बल्कि पीने के पानी, सिंचाई और बिजली उत्पादन पर भी दिखाई देगा। कई जिलों में सूखे जैसे हालात बनने लगे हैं।


अब यह संकट गांवों तक सीमित नहीं रहा। शहर भी प्यासे होने लगे हैं।

मुंबई के जलाशयों में पानी तेजी से घट रहा है। बेंगलुरु में पानी के टैंकरों की मांग अचानक बढ़ गई है। दिल्ली, चेन्नई, हैदराबाद, पुणे और दूसरे बड़े शहरों में भी भूजल का स्तर लगातार नीचे जा रहा है। कई जगह पानी की कटौती शुरू हो चुकी है। स्विमिंग पूलों और निर्माण कार्यों में पानी के इस्तेमाल पर पाबंदियां लगाई जानी चाहिए।

सबसे बड़ी चिंता भूजल की है। हर साल हम ज़मीन के नीचे से लाखों लीटर पानी निकाल लेते हैं, लेकिन उसे वापस पहुंचाने का इंतज़ाम नहीं करते। नतीजा सामने है। टैंकर माफिया फिर सक्रिय हो गया है। लोग घंटों पानी का इंतज़ार कर रहे हैं। अगर जुलाई में भी अच्छी बारिश नहीं हुई, तो कई शहरों में पानी का गंभीर संकट खड़ा हो सकता है।


कमज़ोर मानसून का असर सिर्फ खेतों तक नहीं रहेगा। इसका सीधा असर आम आदमी की जेब पर भी पड़ेगा। अगर फसल कम हुई तो दाल, खाद्य तेल, सब्जियां और अनाज महंगे हो जाएंगे। महंगाई का बोझ हर घर तक पहुंचेगा। गांवों की आमदनी घटेगी तो बाज़ार की रौनक भी फीकी पड़ जाएगी। उद्योगों से लेकर छोटे कारोबार तक इसकी मार झेलेंगे।


मौसम वैज्ञानिक इसके पीछे एल नीनो और बदलती जलवायु को बड़ी वजह मान रहे हैं। उनका कहना है कि मौसम अब पहले जैसा भरोसेमंद नहीं रहा। कभी बादल अचानक फट पड़ते हैं, तो कभी हफ्तों तक आसमान साफ रहता है। जलवायु परिवर्तन ने मौसम का मिज़ाज ही बदल दिया है।


सरकार राहत पैकेज, फसल बीमा, सूखा-रोधी बीज और खाद पर सब्सिडी जैसी योजनाओं पर काम कर रही है। मगर किसान का दर्द सरकारी फाइलों से नहीं, खेतों में बरसने वाली बारिश से कम होगा। जब तक बादल मेहरबान नहीं होंगे, सारी योजनाएं अधूरी लगेंगी।


शाम ढल रही है। सूरज लाल होकर क्षितिज के पीछे छिपने लगा है। रामदीन अपने औजार समेटते हुए धीमी आवाज़ में कहता है, "मुश्किल साल पहले भी आए हैं, लेकिन तब दिल में उम्मीद थी। इस बार लगता है जैसे आसमान ही हमसे रूठ गया है।"


रामदीन सिर्फ एक किसान नहीं है। वह इस मुल्क के लाखों किसानों की आवाज़ है। उसकी आंखों में झलकती फ़िक्र, हर उस परिवार की फ़िक्र है जिसकी रोज़ी-रोटी खेतों से जुड़ी है।


अब सबकी निगाहें जुलाई पर टिकी हैं। अगर बादल जल्द नहीं बरसे, तो सिर्फ खेत ही नहीं सूखेंगे, शहरों की प्यास भी बढ़ेगी, महंगाई भी चढ़ेगी और देश की अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर पड़ेगा।

आसमान अभी भी ख़ामोश है। सवाल सिर्फ इतना है; क्या जुलाई यह ख़ामोशी तोड़ेगी, या फिर यह सूखा आने वाले दिनों की सबसे बड़ी कहानी बन जाएगा?

Sunday, June 28, 2026

 इतिहास का वो अद्भुत स्वाद: 

कैसे चाट, गोल गप्पे बने भारत की सबसे लोकतांत्रिक डिश

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

30 जून 2026

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आगरा से लेकर कोलकाता, चेन्नई से लेकर मुंबई, अहमदाबाद, भारत का सबसे लोकप्रिय स्ट्रीट फूड बन चुका है गोल गप्पा, पानी पूरी, पानी की टिकिया!


क्या आपने कभी सोचा है कि पहला गोलगप्पा  किसने खाया होगा? किसी बादशाह ने, किसी रानी ने, या किसी भूखे राहगीर ने?


दिल्ली की चाँदनी चौक से लेकर आगरा, मथुरा, लखनऊ, बनारस और कोलकाता तक, चाट सिर्फ़ एक नाश्ता नहीं, बल्कि हमारी तहज़ीब का ज़िंदा हिस्सा है। यह अमीर-गरीब, छोटे-बड़े, बच्चे-बूढ़े, सबकी पसंद है। सड़क किनारे ठेले पर मिलने वाली यह मामूली-सी दिखने वाली चीज़ सदियों का इतिहास अपने भीतर समेटे हुए है।

आगरा के हॉस्पिटल रोड पर शाम ढलते ही वही पुरानी खुशबू हवा में घुल जाती है। गरम तेल की महक, हरे धनिये की ताज़गी और इमली की खटास। ठेले पर खड़े बुलाकी चाट वाले अपनी उँगली से फुर्ती से गोलगप्पे में छेद करते हैं, मसालेदार पानी भरते हैं और ग्राहक के हाथ में पकड़ा देते हैं।

"अभी खाइए," वे मुस्कराकर कहते हैं। "गोलगप्पा किसी का इंतज़ार नहीं करता।"

शायद यही बात चाट पर भी लागू होती है। इसे हमेशा ताज़ा ही खाना पड़ता है, और इसकी कहानी भी हर पीढ़ी के साथ नई हो जाती है।

सबसे मशहूर किस्सा यह है कि मुगल बादशाह चाँदनी चौक की नहर में नाव की सैर करते हुए चाट खाते थे। कहा जाता है कि रात में चाँद की रोशनी पानी पर पड़ती थी, संगीत बजता था और शाही मेहमान चटपटी चाट का लुत्फ़ उठाते थे।

सुनने में यह कहानी बेहद ख़ूबसूरत लगती है। लेकिन इतिहास इसकी पूरी तस्दीक़ नहीं करता।

इतिहासकार मानते हैं कि चाँदनी चौक की नहर सचमुच थी। इसे शाहजहाँ की बेटी जहाँआरा बेगम ने बनवाया था। उसी नहर की वजह से इस बाज़ार का नाम चाँदनी चौक पड़ा। लेकिन कहीं भी ऐसा कोई भरोसेमंद दस्तावेज़ नहीं मिलता जिसमें लिखा हो कि बादशाह नाव में बैठकर चाट खाते थे।

यह शायद उन कहानियों में से एक है जो हर बार सुनाए जाने पर थोड़ी और रंगीन होती चली गईं।

एक और कहानी कुछ ज़्यादा भरोसेमंद लगती है। कहा जाता है कि शाहजहाँ के हकीमों ने दिल्ली के खारे पानी से होने वाली बदहज़मी दूर करने के लिए दही, इमली और मसालों वाली चाट खाने की सलाह दी थी। इसका भी कोई पक्का सबूत नहीं है, लेकिन यह बात पूरी तरह नामुमकिन भी नहीं लगती।

असलियत यह है कि चाट मुगलों से भी कहीं ज़्यादा पुरानी है।

गोलगप्पे की कहानी तो दो हज़ार साल पहले के मगध साम्राज्य तक पहुँच जाती है। एक और मशहूर दास्तान महाभारत से जुड़ी है। कहा जाता है कि द्रौपदी ने बचे हुए आटे और सब्ज़ियों से पांडवों के लिए पहला गोलगप्पा बनाया था।

इन दोनों बातों का कोई ठोस प्रमाण नहीं है, लेकिन इतना तय है कि यह व्यंजन सदियों से आम लोगों का साथी रहा है।

हाँ, उस समय आलू नहीं था। आलू तो सोलहवीं सदी में पुर्तगाली भारत लाए थे। इसलिए शुरुआती गोलगप्पों में दाल, अनाज या मसालेदार साग भरा जाता होगा।

फूडी दर्शन भाई बताते हैं, "मुगलों ने चाट बनाई नहीं, लेकिन उसे नया मुक़ाम ज़रूर दिया। उनके दौर में दिल्ली, आगरा और मथुरा के बाज़ार तेज़ी से आबाद हुए। हिन्दू और जैन समाज की शाकाहारी परंपराओं ने आलू, दही, दाल और मसालों से बनने वाले सस्ते और स्वादिष्ट नाश्तों को खूब बढ़ावा दिया। यही बाज़ार आगे चलकर चाट की असली पहचान बने।"

दिल्ली की पापड़ी चाट, आगरा की करारी आलू टिक्की और मथुरा की भक्तिभाव से जुड़ी चाट आज भी उसी विरासत की याद दिलाती हैं। दिल्ली में शाह जहां रोड पर दही भल्ले की चाट खाने नेताओं की भीड़ लगी रहती थी, लोग बताते हैं मेनका गांधी भी इनकी चाट की शौकीन थीं।

फिर रेल आई। लोग एक शहर से दूसरे शहर पहुँचे। बँटवारे के बाद लाखों शरणार्थी दिल्ली आए और अपने साथ चाट के नए स्वाद भी ले आए। मुंबई ने भेलपूरी बनाई, कोलकाता ने पुछका को और तीखा कर दिया, जबकि हर शहर ने अपनी ज़ुबान में चाट का नया अध्याय लिख दिया।

आज चाट करोड़ों रुपये का कारोबार है। शादियों की दावतों में सबसे ज्यादा भीड़ चाट स्टॉल पर रहती है। बड़े बड़े इमरतबानों में तरह तरह के मसालेदार पानी रहते हैं। पाँच सितारा होटलों के मेन्यू में भी है और सोशल मीडिया की तस्वीरों में भी। 

बादशाहों के किस्से सच हों या अफ़साने, इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता। सच यह है कि चाट ने हर सल्तनत को पीछे छोड़ दिया। आज भी भारत की गलियों में वही सबसे बड़ा बादशाह है, जिसके सामने हर कोई बराबर खड़ा होता है; जेब चाहे भरी हो या खाली।

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मानसून जो रास्ते से भटक गया, आसमान जो बरसना भूल गया

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अल्लाह, मेघ दे, पानी दे !

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

1 जुलाई 2026

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जून गुजर गया। कैलेंडर ने नया महीना दिखा दिया, लेकिन खेत अब भी सूखे पड़े हैं। 

उत्तर प्रदेश के बांदा जिले का किसान रामदीन रोज़ सुबह आसमान की तरफ देखता है। उसे बादलों का इंतज़ार है, मगर नज़र आती है सिर्फ़ धूल। खेतों की मिट्टी जगह-जगह फट गई है। धरती की दरारें जैसे किसी गहरे ज़ख्म की कहानी सुना रही हों।


इस साल जून ने किसानों की उम्मीदों पर पानी नहीं, मायूसी बरसाई। देश के कई हिस्सों में बारिश सामान्य से 30 से 40 प्रतिशत कम हुई। कहीं-कहीं तो आधी से भी कम बारिश दर्ज की गई। 

दक्षिण-पश्चिम मानसून, जो हर साल जून की शुरुआत में केरल से दस्तक देकर पूरे देश को राहत देता है, इस बार जैसे रास्ता ही भटक गया। कई इलाकों तक वह समय पर पहुंच ही नहीं पाया।


रामदीन अकेला नहीं है। देश के करोड़ों किसान इसी बेचैनी से आसमान निहार रहे हैं। मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक और बुंदेलखंड जैसे इलाकों में खेत सूने पड़े हैं। जहां इस समय तक धान, सोयाबीन, दालें और मोटे अनाज की हरियाली लहलहाती थी, वहां अब धूल उड़ रही है। खरीफ की बुवाई काफी पीछे चल रही है। कई जगह ट्रैक्टर खड़े हैं, बीज और खाद की दुकानों पर सन्नाटा पसरा है।


देश के विभिन्न क्षेत्रों में पानी का संकट पहले ही पुराना है। हर कमजोर मानसून यहां की मुश्किलें कई गुना बढ़ा देता है। किसान साहूकारों से ऊंचे ब्याज पर कर्ज लेकर बीज खरीदते हैं। अगर बारिश न हो तो फसल चौपट हो जाती है। फिर पूरा साल कर्ज़ चुकाने की जद्दोजहद में निकल जाता है। गरीब किसान की ज़िंदगी जैसे उम्मीद और मायूसी के बीच झूलती रहती है।


देश के बड़े जलाशयों की तस्वीर भी तसल्ली देने वाली नहीं है। पानी का भंडार लगातार घट रहा है। इसका असर सिर्फ खेती पर नहीं पड़ेगा, बल्कि पीने के पानी, सिंचाई और बिजली उत्पादन पर भी दिखाई देगा। कई जिलों में सूखे जैसे हालात बनने लगे हैं।


अब यह संकट गांवों तक सीमित नहीं रहा। शहर भी प्यासे होने लगे हैं।

मुंबई के जलाशयों में पानी तेजी से घट रहा है। बेंगलुरु में पानी के टैंकरों की मांग अचानक बढ़ गई है। दिल्ली, चेन्नई, हैदराबाद, पुणे और दूसरे बड़े शहरों में भी भूजल का स्तर लगातार नीचे जा रहा है। कई जगह पानी की कटौती शुरू हो चुकी है। स्विमिंग पूलों और निर्माण कार्यों में पानी के इस्तेमाल पर पाबंदियां लगाई जानी चाहिए।

सबसे बड़ी चिंता भूजल की है। हर साल हम ज़मीन के नीचे से लाखों लीटर पानी निकाल लेते हैं, लेकिन उसे वापस पहुंचाने का इंतज़ाम नहीं करते। नतीजा सामने है। टैंकर माफिया फिर सक्रिय हो गया है। लोग घंटों पानी का इंतज़ार कर रहे हैं। अगर जुलाई में भी अच्छी बारिश नहीं हुई, तो कई शहरों में पानी का गंभीर संकट खड़ा हो सकता है।


कमज़ोर मानसून का असर सिर्फ खेतों तक नहीं रहेगा। इसका सीधा असर आम आदमी की जेब पर भी पड़ेगा। अगर फसल कम हुई तो दाल, खाद्य तेल, सब्जियां और अनाज महंगे हो जाएंगे। महंगाई का बोझ हर घर तक पहुंचेगा। गांवों की आमदनी घटेगी तो बाज़ार की रौनक भी फीकी पड़ जाएगी। उद्योगों से लेकर छोटे कारोबार तक इसकी मार झेलेंगे।


मौसम वैज्ञानिक इसके पीछे एल नीनो और बदलती जलवायु को बड़ी वजह मान रहे हैं। उनका कहना है कि मौसम अब पहले जैसा भरोसेमंद नहीं रहा। कभी बादल अचानक फट पड़ते हैं, तो कभी हफ्तों तक आसमान साफ रहता है। जलवायु परिवर्तन ने मौसम का मिज़ाज ही बदल दिया है।


सरकार राहत पैकेज, फसल बीमा, सूखा-रोधी बीज और खाद पर सब्सिडी जैसी योजनाओं पर काम कर रही है। मगर किसान का दर्द सरकारी फाइलों से नहीं, खेतों में बरसने वाली बारिश से कम होगा। जब तक बादल मेहरबान नहीं होंगे, सारी योजनाएं अधूरी लगेंगी।


शाम ढल रही है। सूरज लाल होकर क्षितिज के पीछे छिपने लगा है। रामदीन अपने औजार समेटते हुए धीमी आवाज़ में कहता है, "मुश्किल साल पहले भी आए हैं, लेकिन तब दिल में उम्मीद थी। इस बार लगता है जैसे आसमान ही हमसे रूठ गया है।"


रामदीन सिर्फ एक किसान नहीं है। वह इस मुल्क के लाखों किसानों की आवाज़ है। उसकी आंखों में झलकती फ़िक्र, हर उस परिवार की फ़िक्र है जिसकी रोज़ी-रोटी खेतों से जुड़ी है।


अब सबकी निगाहें जुलाई पर टिकी हैं। अगर बादल जल्द नहीं बरसे, तो सिर्फ खेत ही नहीं सूखेंगे, शहरों की प्यास भी बढ़ेगी, महंगाई भी चढ़ेगी और देश की अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर पड़ेगा।

आसमान अभी भी ख़ामोश है। सवाल सिर्फ इतना है; क्या जुलाई यह ख़ामोशी तोड़ेगी, या फिर यह सूखा आने वाले दिनों की सबसे बड़ी कहानी बन जाएगा?

Friday, June 26, 2026

 पासपोर्ट है, नागरिकता नहीं!

भारतीय पहचान का नया गणित

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क्रिकेट मैच देखने के लिए टिकट खरीदने से आप क्रिकेटर नहीं बन सकते, वोट डालने से नेताजी नहीं बन सकते, लाल टोपी पहनने से क्रांतिकारी नहीं हो सकते, सिर्फ शादी होने से बाप नहीं कहलाए जा सकते, तो फिर पासपोर्ट बनवाने से भारतीय नागरिक कैसे?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

28 जून 2026

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बधाई हो! आपके पास भारतीय पासपोर्ट है। उसके पहले पन्ने पर बड़े गर्व से लिखा है: "Nationality: Indian."

लेकिन ज़्यादा खुश मत होइए। अब पता चला है कि यह किताब आपको दुनिया घुमा सकती है, पर यह साबित नहीं कर सकती कि आप भारतीय नागरिक हैं।

वाह रे कागज़ी लोकतंत्र!

यानी आप हवाई जहाज़ में चढ़ते समय भारतीय हैं। विदेश में फँस जाएँ तो भारतीय दूतावास आपको अपना नागरिक मान लेगा। लेकिन अगर किसी बाबू का मूड खराब हो गया तो वही पासपोर्ट अचानक "सिर्फ़ यात्रा दस्तावेज़" बन जाएगा। नागरिकता? वह तो किसी दूसरी फाइल में बंद होगी।

गजब की सोच! आप एक साथ नागरिक भी हैं और नहीं भी। जब तक बाबू फाइल नहीं खोलता, आपकी नागरिकता हवा में झूलती रहती है।

बेचारा आम आदमी सोच रहा है कि आखिर साबित क्या करे?

आधार है। नहीं चलेगा। पैन कार्ड है। नहीं चलेगा। वोटर आईडी है। नहीं चलेगा। राशन कार्ड है। नहीं चलेगा। पासपोर्ट है। अरे भाई, वह भी नहीं चलेगा!

तो फिर चलेगा क्या?

शायद दादी की दाई का हलफ़नामा। या उस पीपल के पेड़ का प्रमाणपत्र जिसके नीचे आपके दादा जी  पहली बार दादी जी से मिले थे। हो सकता है अगले आदेश में कहा जाए कि अपने गाँव की मिट्टी का नमूना, तीन पड़ोसियों के बयान और बचपन की स्कूल की स्लेट या जांघिया भी साथ लाना अनिवार्य है।

हमारा नौकरशाही तंत्र भी कमाल का है। पहले पुलिस सत्यापन। फिर दस्तावेज़ों की जाँच। फिर फीस। फिर महीनों का इंतज़ार। अंत में आपको एक चमचमाता पासपोर्ट सौंपा जाता है और मुस्कुराकर कहा जाता है, "शुभ यात्रा! हाँ, एक छोटी-सी बात... इससे नागरिकता सिद्ध नहीं होती।"

यह वैसा ही है जैसे डॉक्टर आपको फिटनेस सर्टिफिकेट दे और नीचे लिख दे: "मरीज स्वस्थ है, लेकिन इसे स्वस्थ मानना कानूनी रूप से आवश्यक नहीं है।"

अब तो लगता है भारतीयों को अपने जन्म प्रमाणपत्र बैंक लॉकर में रखने पड़ेंगे। कुछ लोग उसे प्लास्टिक में लपेटकर ज़मीन में गाड़ देंगे। आने वाली पीढ़ियाँ सोना नहीं, जन्म प्रमाणपत्र खोदेंगी।

दुनिया के कई देशों में पासपोर्ट पहचान का अंतिम प्रमाण माना जाता है। भारत में यह शायद सबसे सुंदर भ्रम है। एक महँगी किताब, जिसमें आपकी फोटो है, आपका नाम है, आपकी राष्ट्रीयता लिखी है, लेकिन नागरिकता का सवाल अभी भी लंबित है।

कहते हैं, भारत चाँद पर पहुँच गया है। डिजिटल क्रांति कर चुका है। दुनिया की सबसे तेज़ अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। लेकिन भारतीय होने का प्रमाण ढूँढने की यात्रा अभी भी जारी है।

सावधान रहिए। अगली बार कोई पूछे, "क्या आप भारतीय नागरिक हैं?" तो पासपोर्ट मत दिखाइए। पहले पूछ लीजिए: "सर, आज कौन-सा प्रमाणपत्र मान्य चल रहा है?"

और हाँ, भविष्य के लिए तैयार रहिए। हो सकता है अगला सरकारी परिपत्र आए: "पासपोर्ट, आधार, पैन, वोटर आईडी और जन्म प्रमाणपत्र के साथ कृपया अपनी पहली किलकारी की ऑडियो रिकॉर्डिंग, नाल काटने वाली दाई का शपथपत्र, बचपन में लगवाए गए चेचक के टीके का निशान और पड़ोस के शर्मा जी का चरित्र प्रमाणपत्र भी संलग्न करें।"

कल्पना कीजिए, हवाई अड्डे पर इमिग्रेशन अधिकारी पूछ रहा है, "पासपोर्ट तो ठीक है, लेकिन क्या आपके पास यह प्रमाण है कि आपके परदादा 1912 में गलती से नेपाल घूमने नहीं गए थे?" पीछे खड़ी कतार में लोग फाइलों के बोरे लेकर खड़े हैं। एक ट्रॉली पर सूटकेस नहीं, दस्तावेज़ों के बंडल हैं। ट्रैवल एजेंसियाँ अब "स्विट्ज़रलैंड टूर" के साथ "नागरिकता प्रमाण परामर्श" का पैकेज भी बेच रही हैं। और बेचारा भारतीय सोच रहा है कि काश नागरिकता भी रेलवे की वेटिंग लिस्ट की तरह होती। कम से कम चार्ट लगने पर पता तो चल जाता कि कन्फर्म हूँ या अभी भी आरएसी में लटका हुआ हूँ!

सरकार को एक 'नागरिकता वेरिफिकेशन ऐप' बना देना चाहिए, जहाँ हर पाँच साल में साबित करना पड़े कि आप अब भी वही इंसान हैं जो पैदा हुआ था। शायद भविष्य में डीएनए टेस्ट और जन्मस्थान की मिट्टी की लैब रिपोर्ट भी ज़रूरी हो जाए: सिर्फ़ यह साबित करने के लिए कि आप अपने ही जीवन के नागरिक हैं!


 नमक की दीवार: जब अंग्रेजों ने कांटों का साम्राज्य खड़ा कर दिया

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बृज खंडेलवाल द्वारा

27 जून 2026

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क्या मुंशी प्रेमचंद की अमर कहानी "नमक का दरोगा" सिर्फ एक कल्पना थी? या उसके पीछे उस दौर की कड़वी हक़ीक़त छिपी थी, जब अंग्रेजी हुकूमत ने नमक जैसे मामूली सामान को भी अपने ज़ुल्म का हथियार बना दिया था?

दाल में नमक कम हो जाए तो खाना बेस्वाद लगता है। किसी को नमकहराम कह दें तो बरसों का रिश्ता टूट सकता है। नमक सिर्फ रसोई की चीज़ नहीं है। यह ईमान, भरोसे और इंसान की बुनियादी ज़रूरत का प्रतीक है। सदियों से नमक की बड़ी अहमियत रही है। कभी यह सोने के बराबर कीमती माना जाता था। लेकिन भारत में एक ऐसा दौर भी आया, जब अंग्रेजों ने नमक पर इतना भारी कर लगा दिया कि गरीब आदमी के लिए एक मुट्ठी नमक खरीदना भी मुश्किल हो गया।

प्रेमचंद के ईमानदार दरोगा वंशीधर की कहानी पढ़ते समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि नमक की चोरी रोकने के लिए अंग्रेजों ने पूरे भारत में कांटों की एक विशाल जीवित दीवार खड़ी कर दी थी। यह कोई अफ़साना नहीं, बल्कि इतिहास का सच्चा पन्ना है। बबूल, करोंदा, बेर और दूसरी कांटेदार झाड़ियों से बनी यह दीवार हजारों किलोमीटर तक फैली हुई थी।

उन्नीसवीं सदी के मध्य में ब्रिटिश सरकार के सामने एक बड़ी मुश्किल थी। भारत के समुद्री तटों पर नमक आसानी से तैयार हो जाता था। लेकिन अंग्रेजी इलाकों में उस पर भारी टैक्स लगाया गया था। गरीब लोग और छोटे व्यापारी टैक्स से बचने के लिए नमक एक इलाके से दूसरे इलाके में ले जाते थे। इससे सरकार की आमदनी घट रही थी। अंग्रेजों ने इसे राजस्व का नुकसान माना और इसका अजीब समाधान निकाला।

उन्होंने ईंट या पत्थर की दीवार नहीं बनाई। उन्होंने प्रकृति को ही पहरेदार बना दिया। बबूल, करोंदा और दूसरी कांटेदार झाड़ियों की लंबी बाड़ लगाई गई। कुछ ही वर्षों में यह इतनी घनी हो गई कि ऊंट भी इसे पार नहीं कर सकता था। इसकी ऊंचाई आठ से बारह फीट तक पहुंच गई थी। यह सिर्फ झाड़ियां नहीं थीं, बल्कि अंग्रेजी हुकूमत की एक ज़िंदा दीवार थीं। इसे इनलैंड कस्टम्स लाइन कहा गया, जहां नमक समेत कई सामानों पर कर वसूला जाता था।

इस योजना को मज़बूत बनाने में एलन ऑक्टेवियन ह्यूम की अहम भूमिका रही। वे 1867 से 1870 तक इनलैंड कस्टम्स के कमिश्नर रहे। उन्होंने सूखी कांटेदार बाड़ की जगह जीवित हेज तैयार करवाई। बाद में यही ह्यूम भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापकों में भी शामिल हुए। उनके समय में यह कांटों की दीवार हिमालय की तलहटी से लेकर कटक तक फैल गई। पूरी कस्टम्स लाइन लगभग चार हजार किलोमीटर लंबी थी। यह दुनिया की सबसे अनोखी और सबसे लंबी जीवित दीवारों में गिनी जाती है।

इस दीवार की रखवाली के लिए हजारों कर्मचारी तैनात किए गए थे। वे दिन-रात पहरा देते थे। जगह-जगह चौकियां थीं। आने-जाने वालों की तलाशी ली जाती थी। नमक लेकर जाने वाले लोगों से पूछताछ होती थी। ऐसा लगता था मानो अपने ही देश में लोग किसी विदेशी सीमा को पार कर रहे हों।

लेकिन इस पूरी कहानी का सबसे दर्दनाक पहलू गरीब भारतीयों की तकलीफ थी। भारत जैसे गर्म देश में शरीर को नमक की बेहद ज़रूरत होती है। पसीने के साथ शरीर से नमक निकल जाता है। इसके बावजूद अंग्रेज सरकार ने इस बुनियादी ज़रूरत पर भारी टैक्स लगा दिया। नमक महंगा होता गया। गरीबों की थाली से स्वाद ही नहीं, सेहत भी गायब होने लगी। यह सिर्फ टैक्स नहीं था, बल्कि इंसान की बुनियादी ज़रूरत पर लगाया गया अन्याय था।

धीरे-धीरे लोगों के दिलों में गुस्सा भरने लगा। यही गुस्सा आगे चलकर आज़ादी की लड़ाई की ताक़त बना। महात्मा गांधी ने इस दर्द को समझा। 1930 में उन्होंने दांडी मार्च शुरू किया। समुद्र तक पैदल पहुंचकर उन्होंने अपने हाथों से नमक बनाया और अंग्रेजी कानून को खुली चुनौती दी। यह सिर्फ नमक उठाने की घटना नहीं थी। यह पूरे देश के स्वाभिमान को जगाने वाली पुकार थी।

1870 के दशक के आखिर तक अंग्रेज पूरे भारत में नमक उत्पादन पर अपना नियंत्रण कायम कर चुके थे। 1879 में नमक कर पूरे देश में एक जैसा कर दिया गया। इसके बाद कांटों की दीवार की ज़रूरत खत्म होने लगी। उसकी देखभाल महंगी पड़ रही थी। झाड़ियां सूख गईं। किसानों ने उस जमीन पर खेती शुरू कर दी। देखते ही देखते यह विशाल दीवार इतिहास की धूल में गुम हो गई।

करीब सौ साल बाद ब्रिटिश लेखक रॉय मोक्सहम ने पुरानी सरकारी फाइलों में इस दीवार का ज़िक्र पढ़ा। वे भारत आए और इसके निशान खोजने निकल पड़े। 1998 में उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में उन्हें मिट्टी की एक छोटी-सी बची हुई पट्टी मिली। बाद में उनकी पुस्तक "द ग्रेट हेज ऑफ इंडिया" ने दुनिया को बताया कि टैक्स वसूलने के लिए अंग्रेजी साम्राज्य किस हद तक जा सकता था।

आज उस कांटों की दीवार का कोई निशान दिखाई नहीं देता। लेकिन उसकी कहानी अब भी हमें सोचने पर मजबूर करती है। आखिर एक हुकूमत अपनी ही रियाया से नमक का एक दाना छीनने के लिए हजारों किलोमीटर लंबी कांटों की दीवार क्यों खड़ी करती है?

शायद मुंशी प्रेमचंद ने इसका जवाब बहुत पहले दे दिया था। "नमक का दरोगा" सिर्फ साहित्य नहीं था। वह उस दौर का आईना था, जब नमक भी सत्ता का हथियार बन चुका था।

नमक आज भी हमें सिर्फ खाने का स्वाद नहीं देता। वह हमें आज़ादी की कीमत, अन्याय के खिलाफ संघर्ष और इंसान के स्वाभिमान की याद भी दिलाता है। इतिहास की यह भूली-बिसरी कहानी बताती है कि जब हुकूमत इंसान की सबसे छोटी ज़रूरत पर भी पहरा बैठा देती है, तब वही ज़ुल्म एक दिन इंक़लाब की चिंगारी बन जाता है।

Wednesday, June 24, 2026

 


सेक्स का बुखार: क्या दुनिया अब बिस्तर के इर्द-गिर्द घूम रही है?

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मोबाइल स्क्रीन से बेडरूम तक, कारोबार से राजनीति तक... आखिर सेक्स है क्या: सुख, शक्ति, सनक या सभ्यता का सबसे बड़ा जुनून?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

26 जून 2026

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रात के दो बजे हैं।

दुनिया के तमाम शहर सो रहे हैं । सड़कें खाली हैं। लेकिन करोड़ों उंगलियां अब भी मोबाइल स्क्रीन पर फिसल रही हैं। कोई डेटिंग ऐप पर प्रेम खोज रहा है। कोई अश्लील सामग्री देख रहा है। कोई सोशल मीडिया पर अपनी खूबसूरती को "लाइक्स" में बदल रहा है। और कोई अकेलेपन, आकर्षण और इच्छाओं के बीच झूल रहा है।

तो क्या दुनिया को सचमुच सेक्स का बुखार चढ़ गया है?

आज सेक्स हर जगह दिखाई देता है। फिल्मों में, विज्ञापनों में, वेब सीरीज में, गीतों में, फैशन में और सोशल मीडिया में। देह एक उत्पाद बन गई है। आकर्षण एक पूंजी बन गया है। और इच्छा एक बाजार। किसी को सेक्सी बोलो तो खुशी होती है।

ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या इंसान पहले से ज्यादा कामुक हो गया है, या फिर सेक्स केवल पहले से ज्यादा दिखाई देने लगा है?

सच शायद दोनों के बीच कहीं छिपा है।

सेक्स केवल शारीरिक संबंध नहीं है। यह जीवन की निरंतरता का आधार है। प्रकृति ने इसे प्रजनन के लिए बनाया था। लेकिन इंसान ने इसे प्रेम, आनंद, शक्ति, पहचान, कला, मनोरंजन और व्यापार से जोड़ दिया। आज सेक्स एक बहु-अरब डॉलर का वैश्विक उद्योग है। यह मनोरंजन का साधन भी है और कई लोगों के लिए सामाजिक प्रतिष्ठा तथा व्यक्तिगत उपलब्धि का प्रतीक भी।

लेकिन क्या यह हमेशा ऐसा ही था?

इतिहास बताता है कि सेक्स के प्रति मानव समाज का नजरिया समय के साथ बदलता रहा है। प्राचीन यूनान और रोम में प्रेम, सौंदर्य और कामुकता कला और साहित्य के महत्वपूर्ण विषय थे। मूर्तियों, चित्रों और कविताओं में इसका खुला चित्रण मिलता है। तब इसे जीवन का स्वाभाविक हिस्सा माना जाता था।

फिर समय बदला।

यूरोप में ईसाई धार्मिक प्रभाव बढ़ने के साथ सेक्स को मुख्य रूप से विवाह और संतानोत्पत्ति तक सीमित करने की कोशिश हुई। मध्यकाल और बाद के विक्टोरियन युग में नैतिकता के नाम पर इच्छाओं पर नियंत्रण बढ़ा। विशेष रूप से महिलाओं की कामनाओं को संदेह और पाप की दृष्टि से देखा गया।

कुछ धर्मों, सभ्यताओं में सेक्स को पाप के रूप में देखा गया, लेकिन, भारत की कहानी कुछ अलग है।

करीब दो हजार वर्ष पहले रचित कामसूत्र आज भी दुनिया के सबसे चर्चित ग्रंथों में गिना जाता है। लेकिन यह केवल यौन मुद्राओं की किताब नहीं थी, जैसा कि आम धारणा बना दी गई है। इसके रचयिता वात्स्यायन ने इसे जीवन जीने की कला के रूप में प्रस्तुत किया था। इसमें प्रेम, आकर्षण, संवाद, सामाजिक व्यवहार, सौंदर्यबोध, विवाह और भावनात्मक संतुलन तक की चर्चा मिलती है।

सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि कामसूत्र स्त्री की इच्छा और उसके सुख को भी महत्व देता है। उस दौर के अनेक समाजों की तुलना में यह दृष्टिकोण कहीं अधिक प्रगतिशील माना जा सकता है।

फिर ऐसा क्या हुआ कि आज दुनिया में सेक्स को लेकर इतनी खुली चर्चा दिखाई देती है?

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं कि इसका सबसे बड़ा कारण 1960 के दशक की यौन क्रांति थी। गर्भनिरोधक गोलियों के व्यापक उपयोग ने पहली बार करोड़ों लोगों को गर्भधारण के भय से काफी हद तक मुक्त कर दिया। सेक्स और प्रजनन के बीच का पारंपरिक संबंध कमजोर पड़ने लगा।

यहीं से समाज में बड़ा बदलाव शुरू हुआ।

लोगों ने विवाह पूर्व संबंधों को अधिक स्वीकार करना शुरू किया। शादी की उम्र बढ़ी। शिक्षा और करियर प्राथमिकता बने। इंटरनेट ने सांस्कृतिक सीमाओं को ध्वस्त कर दिया। पोर्नोग्राफी, डेटिंग ऐप्स और सोशल मीडिया ने यौन अभिव्यक्ति को अभूतपूर्व दृश्यता प्रदान की।

आज का युवा उस दुनिया में बड़ा हो रहा है जहां सेक्स हर जगह मौजूद है।

लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी है।

कई अध्ययनों से संकेत मिलता है कि कुछ देशों में किशोरों और युवाओं के बीच वास्तविक यौन गतिविधियों में कमी आई है। यौन रोगों, सहमति, व्यक्तिगत सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता ने व्यवहार को प्रभावित किया है। यानी सेक्स की चर्चा और दृश्यता बढ़ी है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर व्यक्ति पहले से अधिक यौन सक्रिय है।

सोशल एक्टिविस्ट पद्मिनी अय्यर का मानना है कि अत्यधिक व्यावसायीकरण ने सेक्स को एक उत्पाद में बदल दिया है। सोशल मीडिया की तुलना संस्कृति, अवास्तविक अपेक्षाएं और पोर्नोग्राफी की लत रिश्तों को कमजोर कर सकती है। कई युवा प्रदर्शन के दबाव, शरीर की छवि और आत्मविश्वास की कमी से भी जूझ रहे हैं।

दूसरी ओर, डॉ. विजयधूत का तर्क है कि खुलापन लोगों को शर्म और अपराधबोध से मुक्त करता है। सहमति, लैंगिक समानता और विविध यौन पहचानों को स्वीकार करना आधुनिक समाज की महत्वपूर्ण उपलब्धियां हैं। उनके अनुसार चुप्पी से अधिक नुकसान होता है, जबकि स्वस्थ संवाद समझ पैदा करता है।

यहीं आधुनिक पश्चिमी सोच और भारतीय कामसूत्र दर्शन के बीच एक दिलचस्प अंतर दिखाई देता है।

समाजशास्त्री टी.पी. श्रीवास्तव के अनुसार आधुनिक पश्चिमी दृष्टिकोण अक्सर व्यक्तिगत स्वतंत्रता और व्यक्तिगत संतुष्टि पर जोर देता है। व्यक्ति की इच्छा सर्वोपरि मानी जाती है। इसके विपरीत कामसूत्र आनंद को जीवन के व्यापक संतुलन का हिस्सा मानता है। वहां सुख है, लेकिन जिम्मेदारी भी है। आकर्षण है, लेकिन भावनात्मक जुड़ाव भी है। इच्छा है, लेकिन उसके साथ संयम और संतुलन भी है।

शायद यही कारण है कि अनेक विद्वान मानते हैं कि भारत की प्राचीन सोच आज भी प्रासंगिक हो सकती है।

सामाजिक कार्यकर्ता विद्या जी कहती हैं कि इंसान की जैविक प्रकृति हजारों वर्षों में बहुत नहीं बदली है। बदला है उसका परिवेश। तकनीक ने इच्छाओं तक पहुंच आसान कर दी है। गर्भनिरोधकों ने पुराने भय कम कर दिए हैं। इंटरनेट ने कल्पनाओं को वैश्विक बना दिया है।

लेकिन एक सवाल आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना सदियों पहले था।

क्या सेक्स केवल मनोरंजन है, या उससे कहीं अधिक?

इतिहास, संस्कृति और मानवीय अनुभव बताते हैं कि यह केवल शरीर का मामला नहीं है। इसमें भावनाएं हैं। रिश्ते हैं। जिम्मेदारियां हैं। संवेदनाएं हैं। जीवन की निरंतरता है। कुछ दार्शनिक और आध्यात्मिक परंपराएं तो इसे आत्मिक ऊर्जा का स्रोत भी मानती हैं।

अब तो जमाना प्राकृतिक सेक्स से काफी आगे निकल चुका है, एनिमल सेक्स से लेकर, LGBTQ और न जाने क्या क्या तक!!

शायद आधुनिक दुनिया की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह स्वतंत्रता और संतुलन के बीच रास्ता खोजे। आनंद और जिम्मेदारी के बीच पुल बनाए। बाजार और मानवीय संवेदना के बीच सामंजस्य स्थापित करे।

क्योंकि सेक्स जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है। लेकिन जब वह केवल उपभोग की वस्तु बन जाता है, तो उसकी मानवीय गहराई कहीं खोने लगती है।

और शायद यही बहस आने वाले वर्षों में और तेज होने वाली है।

आखिर सवाल सेक्स का नहीं है।

सवाल यह है कि हम इंसान होने का अर्थ किस तरह समझते हैं।


 काफी हुआ है, बहुत बाकी है!

चमकते एक्सप्रेसवे, जर्जर इंसाफ़: क्या सिर्फ़ सड़कें बन जाने से देश विकसित हो जाता है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

24 जून 2026

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एक तरफ़ देश में एक्सप्रेसवे, मेट्रो, एयरपोर्ट और डिजिटल क्रांति की नई इबारत लिखी जा रही है। दूसरी तरफ़ समाज का एक बड़ा हिस्सा अब भी सदियों पुराने पूर्वाग्रहों और सामंती सोच की जंजीरों में जकड़ा हुआ है। ओडिशा में दलितों को अपमानित कर सिर मुंडवाने, घुटनों के बल चलने और गंदा पानी पीने पर मजबूर किया जाता है। झारखंड में अंधविश्वास के नाम पर महिलाओं को डायन बताकर मार दिया जाता है, जिनमें अक्सर जमीन हड़पने की साज़िशें छिपी होती हैं। उत्तर प्रदेश में अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाह करने वाले युवाओं को ऑनर किलिंग का शिकार होना पड़ता है। दहेज के दानव ने आज भी घरों को नहीं छोड़ा है और लगभग हर दिन दर्जनों महिलाएं इसकी भेंट चढ़ जाती हैं।

औपनिवेशिक दौर की लालफीताशाही अब भी आम नागरिक का रास्ता रोकती है। राजनीति और कारोबार में परिवारवाद तथा जातिगत नेटवर्क सत्ता और अवसरों पर अपना शिकंजा बनाए हुए हैं। कानून बदल गए, इमारतें बदल गईं, तकनीक बदल गई, लेकिन मानसिकता बदलने की रफ़्तार बेहद धीमी रही।

यही भारत का सबसे बड़ा विरोधाभास है। देश का हार्डवेयर इक्कीसवीं सदी में पहुंच चुका है, लेकिन उसका सामाजिक और प्रशासनिक सॉफ्टवेयर अब भी कई जगह उन्नीसवीं सदी के कोड पर चल रहा है। यही वह खाई है जो चमकते विकास और वास्तविक प्रगति के बीच मौजूद है।

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क्या विकास का मतलब सिर्फ़ चौड़ी सड़कें हैं?

क्या हवाई अड्डों की चमक किसी नागरिक को इंसाफ़ दिला सकती है?

क्या बुलेट ट्रेन की रफ़्तार उस मुकदमे को तेज़ कर सकती है जो बीस साल से अदालत में धूल खा रहा है?

और सबसे बड़ा सवाल। अगर थाना आज भी सत्ता के इशारे पर काम करे, अदालत में तारीख़ पर तारीख़ मिलती रहे और भ्रष्टाचार नए कपड़े पहनकर सामने खड़ा रहे, तो क्या हम सचमुच विकसित भारत की तरफ़ बढ़ रहे हैं?

पिछले बारह वर्षों में भारत का चेहरा बदला है। यह बात स्वीकार करनी होगी। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र और भाजपा शासित राज्यों की तथाकथित "डबल इंजन" सरकारों ने बुनियादी ढांचे के निर्माण में अभूतपूर्व गति दिखाई है।

2014 में राष्ट्रीय राजमार्गों की लंबाई लगभग 91 हजार किलोमीटर थी। आज यह डेढ़ लाख किलोमीटर के करीब पहुंच चुकी है। हवाई अड्डों की संख्या दोगुनी से अधिक हो गई है। वंदे भारत ट्रेनें देश के कई हिस्सों को जोड़ रही हैं। यूपीआई ने भुगतान की दुनिया बदल दी है। करोड़ों लोगों तक सरकारी योजनाओं का पैसा सीधे पहुंच रहा है। नए मेडिकल कॉलेज खुले हैं। गांवों तक नल का पानी पहुंचा है। लाखों घर बने हैं।

यह उपलब्धियां वास्तविक हैं। इन्हें नकारना नाइंसाफी होगी।

लेकिन कहानी का दूसरा हिस्सा कहीं अधिक अहम है।

देश का हार्डवेयर बदल गया है, मगर सॉफ्टवेयर आज भी पुराना है।

नई सड़कें बन गईं, लेकिन पुरानी व्यवस्था जस की तस खड़ी है। कंक्रीट और इस्पात का ढांचा आधुनिक हो गया, मगर पुलिस, अदालतें, प्रशासनिक संस्कृति और जवाबदेही की व्यवस्था अब भी औपनिवेशिक दौर की परछाइयों में जी रही है।

साल 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रकाश सिंह मामले में पुलिस सुधारों के लिए ऐतिहासिक निर्देश दिए थे। अदालत ने कहा था कि पुलिस को राजनीतिक दबाव से मुक्त किया जाए, अधिकारियों को निश्चित कार्यकाल मिले, स्वतंत्र शिकायत प्राधिकरण बने और जांच तथा कानून-व्यवस्था के काम अलग-अलग हों।

बीस साल बीत गए।

आज तक कोई भी राज्य इन निर्देशों को पूरी तरह लागू नहीं कर पाया।

कई राज्यों में पुलिस अब भी 1861 के उस कानून की मानसिकता के तहत काम कर रही है जिसे अंग्रेजों ने जनता की सेवा नहीं, बल्कि जनता को नियंत्रित करने के लिए बनाया था।

कानून बदलना आसान है। व्यवस्था बदलना मुश्किल।

भारतीय न्याय संहिता और अन्य नए आपराधिक कानूनों ने पुराने आईपीसी और सीआरपीसी की जगह ले ली है। इनमें कई सकारात्मक बदलाव भी हैं। अपराध स्थल की वीडियोग्राफी, पीड़ितों के अधिकार और समयबद्ध प्रक्रियाओं जैसे प्रावधान स्वागत योग्य हैं।

लेकिन सवाल फिर वही है।

अगर कानून लागू करने वाला तंत्र पुराना ही रहे तो नया कानून कितना नया साबित होगा?

न्यायपालिका की हालत भी कम चिंताजनक नहीं है।

देश की अदालतों में पांच करोड़ से अधिक मुकदमे लंबित हैं। सुप्रीम कोर्ट में ही नब्बे हजार से ज्यादा मामले प्रतीक्षा में हैं। अनेक हाईकोर्ट  न्यायाधीश_कमी के साथ काम कर रहे हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट में कई बार आधे से अधिक पद खाली रहे हैं।

नतीजा यह है कि एक सामान्य नागरिक को संपत्ति विवाद जैसे मामलों में न्याय पाने के लिए दो दशक तक इंतजार करना पड़ सकता है।

सोचिए।

जिस देश में एक्सप्रेसवे दो साल में बन जाते हैं, वहां न्याय मिलने में बीस साल क्यों लगते हैं?

कमी संसाधनों की नहीं दिखती। कमी प्राथमिकता की दिखती है।

भ्रष्टाचार के मोर्चे पर भी तस्वीर मिली-जुली है।

डिजिटल व्यवस्था ने छोटे स्तर की रिश्वतखोरी में कमी जरूर की है। सरकारी योजनाओं का पैसा सीधे खातों में पहुंचने लगा है। बिचौलियों की भूमिका घटी है।

फिर भी अंतरराष्ट्रीय सूचकांकों में भारत का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं कहा जा सकता। राजनीतिक चंदे की पारदर्शिता पर सवाल बने हुए हैं। मुखबिरों की सुरक्षा कमजोर है। बड़े भ्रष्टाचार मामलों में सजा की दर बेहद कम है।

उधर वीआईपी संस्कृति अब भी जीवित है।

काफिले दौड़ते हैं। सड़कें खाली कराई जाती हैं। प्रभावशाली लोगों के लिए नियम अलग दिखाई देते हैं। आम आदमी और खास आदमी के बीच की खाई अब भी पूरी तरह नहीं पटी।

जाति और लिंग आधारित भेदभाव भी कानून की किताबों से भले हट गए हों, लेकिन व्यवहारिक जीवन में उनकी मौजूदगी महसूस की जा सकती है।

राजनीति में भी तस्वीर बहुत अलग नहीं है। भ्रष्टाचार विरोधी भाषण खूब सुनाई देते हैं, लेकिन चुनावों में धनबल और बाहुबल का प्रभाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।

यहीं सबसे बड़ा खतरा छिपा है।

जब हार्डवेयर तेज़ी से आगे बढ़े और सॉफ्टवेयर पीछे छूट जाए, तो विकास का भ्रम पैदा होता है।

उपग्रह से देखने पर शहर चमक सकते हैं। रात में रोशन एक्सप्रेसवे किसी विदेशी पर्यटक को प्रभावित कर सकते हैं। कांच के टर्मिनल और आधुनिक रेलवे स्टेशन तस्वीरों में शानदार लग सकते हैं।

लेकिन किसी राष्ट्र की असली परीक्षा उसकी सड़कों पर नहीं, उसके थानों और अदालतों में होती है।

एक ऐसा देश जहां नागरिक को निष्पक्ष पुलिस न मिले, समय पर न्याय न मिले और सत्ता को जवाबदेह ठहराने वाली संस्थाएं कमजोर हों, वह केवल दिखने में विकसित हो सकता है, वास्तव में नहीं।

2047 के विकसित भारत का सपना केवल बुलेट ट्रेनों, एयरपोर्टों और एक्सप्रेसवे से पूरा नहीं होगा।

विकसित भारत तब बनेगा जब नागरिक को यह भरोसा होगा कि कानून सबके लिए बराबर है, पुलिस सत्ता की नहीं संविधान की सेवक है, और अदालत में इंसाफ़ उसकी उम्र से लंबा नहीं चलेगा।

सड़कें देश को जोड़ती हैं। लेकिन न्याय, जवाबदेही और समानता ही राष्ट्र को मजबूत बनाते हैं। यही वह बुनियाद है, जिसके बिना विकास की सबसे चमकदार इमारत भी खोखली साबित हो सकती है।

Monday, June 22, 2026

 बीस लाख सपने, सवा लाख सीटें: भारत को और मेडिकल कॉलेज चाहिए या नई परीक्षा व्यवस्था ?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

24 जून 2026

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हर साल भारत के लाखों घरों में एक ही सपना पलता है। बेटा या बेटी डॉक्टर बने। हर साल यह सपना एक कठिन परीक्षा से गुजरता है। और हर साल उम्मीदों का पहाड़ आंकड़ों की दीवार से टकरा जाता है।

इस वर्ष नीट-यूजी परीक्षा में 20 लाख से अधिक विद्यार्थियों ने भाग लिया। दूसरी ओर, देश में एमबीबीएस की कुल सीटें लगभग 1.29 लाख हैं। देशभर के 823 मेडिकल कॉलेजों में 1,29,602 सीटें उपलब्ध हैं। यानी एक सीट के लिए औसतन 16 से अधिक अभ्यर्थियों के बीच मुकाबला है। सरकारी मेडिकल कॉलेजों की सीटों के लिए यह प्रतिस्पर्धा और भी भयावह है।

140 करोड़ की आबादी वाले देश का स्वास्थ्य भविष्य इतनी सीमित सीटों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।

यह सच है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत ने मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। कुछ साल पहले जहां एमबीबीएस सीटों की संख्या करीब 1.09 लाख थी, वह बढ़कर लगभग 1.30 लाख तक पहुंच गई है। नए मेडिकल कॉलेज खुले हैं और कई संस्थानों में सीटें बढ़ाई गई हैं। लेकिन मांग की रफ्तार आपूर्ति से कहीं तेज है।

डॉक्टर बनने का सपना अब केवल महानगरों या संपन्न परिवारों तक सीमित नहीं रहा। छोटे शहरों, कस्बों और गांवों के छात्र दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। कई युवा कोचिंग संस्थानों में वर्षों बिताते हैं। परिवार अपनी जमा-पूंजी खर्च कर देते हैं। फिर भी सरकारी सीटें इतनी कम हैं कि मेहनत और प्रतिभा के बावजूद हजारों योग्य छात्र पीछे छूट जाते हैं।

आलोचकों का मानना है कि राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) ने अनजाने में एक विशाल कोचिंग उद्योग को जन्म दिया है, जो छात्रों की आशंकाओं और सपनों से मुनाफा कमाता है। उनका तर्क है कि यह परीक्षा अब प्रतिभा, संवेदनशीलता और वास्तविक समझ से अधिक महंगी कोचिंग, परीक्षा तकनीकों और रटंत शिक्षा को बढ़ावा देती है। इससे ग्रामीण, गरीब और सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों के लिए अवसर असमान हो जाते हैं। कोचिंग संस्थानों की बढ़ती संख्या, ऊंची फीस और प्रश्नपत्र लीक जैसी घटनाओं ने इस धारणा को मजबूत किया है कि शिक्षा के इर्द-गिर्द एक शक्तिशाली व्यावसायिक तंत्र विकसित हो चुका है। हालांकि, नीट को “माफियाओं की साजिश” कहना एक राय है, स्थापित तथ्य नहीं, क्योंकि इसके समर्थन में संगठित आपराधिक गठजोड़ का कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

जब सफलता केवल योग्यता से नहीं, बल्कि फीस भरने की क्षमता से तय होने लगे, तब व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

देश की कुल एमबीबीएस सीटों में लगभग 63 हजार सीटें सरकारी संस्थानों में हैं। शेष सीटें निजी और डीम्ड विश्वविद्यालयों में हैं, जहां फीस लाखों रुपये सालाना से लेकर पूरे पाठ्यक्रम के लिए करोड़ों रुपये तक पहुंच जाती है।

ऐसे में गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए डॉक्टर बनने का सपना अक्सर अधूरा रह जाता है।

यह केवल छात्रों की समस्या नहीं है। यह देश के सार्वजनिक स्वास्थ्य का सवाल है।

आज भी भारत के अनेक ग्रामीण और दूरदराज़ इलाकों में डॉक्टरों की भारी कमी है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र विशेषज्ञों के बिना चल रहे हैं। सरकारी अस्पतालों पर मरीजों का बोझ बढ़ता जा रहा है। डॉक्टर और मरीज के अनुपात में सुधार की जरूरत लगातार महसूस की जा रही है।

मेडिकल शिक्षा का विस्तार केवल शैक्षणिक मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आवश्यकता है।

समाधान मानकों को कम करना नहीं, अवसरों को बढ़ाना है। साल में दो बार अगर नीट परीक्षा अगर आयोजित हो जाए, तो कोई आफत नहीं आ जाएगी।

हर जिले में एक सुसज्जित मेडिकल कॉलेज और उससे जुड़ा शिक्षण अस्पताल होना चाहिए। जिला अस्पतालों को चरणबद्ध तरीके से मेडिकल कॉलेजों में बदला जाए। शिक्षकों की कमी दूर करने के लिए बेहतर वेतन, पारदर्शी भर्ती और आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।

सड़कें, हवाई अड्डे और औद्योगिक गलियारे जितने महत्वपूर्ण हैं, उतना ही महत्वपूर्ण स्वास्थ्य ढांचा भी है। डॉक्टर किसी देश की सबसे बड़ी पूंजी होते हैं।

उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश और पूर्वोत्तर राज्यों जैसे अधिक आबादी वाले क्षेत्रों में नए मेडिकल कॉलेज खोलने की विशेष जरूरत है।

साथ ही, निजी मेडिकल शिक्षा की फीस पर प्रभावी नियंत्रण और पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए। किसी भी प्रतिभाशाली छात्र का सपना केवल आर्थिक मजबूरी के कारण नहीं टूटना चाहिए।

नीट में शामिल होने वाले 20 लाख से अधिक छात्र केवल आंकड़े नहीं हैं। वे देश की ऊर्जा हैं, उसकी आकांक्षाएं हैं और भविष्य की स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ हैं।

डॉक्टर बनने का अवसर कुछ लोगों का विशेषाधिकार नहीं, हर योग्य छात्र का अधिकार होना चाहिए।

Sunday, June 21, 2026

 सियासत के कीचड़ में बेटियाँ क्यों?

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राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के नाम पर परिवारों, खासकर बेटियों को निशाना बनाना लोकतंत्र नहीं, सामाजिक पतन का संकेत है।

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बेटी तो बेटी होती है

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बृज खंडेलवाल द्वारा

23 जून 2026

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सूरज ढल चुका था, लेकिन लखनऊ की एक पुरानी हवेली में रोशनी अभी भी जल रही थी। अखबारों के बिखरे पन्नों और टीवी चैनलों के शोर के बीच 22 वर्षीय प्रिया अपनी किताबों में डूबी थी। तभी फोन की घंटी बजी। दोस्त का संदेश था, “प्रिया, तुम ठीक हो? सोशल मीडिया पर क्या चल रहा है?”

स्क्रीन खुलते ही उसकी दुनिया बदल गई।

कहीं चोरी की अफवाह, कहीं गुमशुदगी की मनगढ़ंत कहानी, कहीं फोटोशॉप की गई तस्वीरें। एक ट्रोल ने लिखा, “नेता की बेटी का असली चेहरा सामने आ गया।” देखते ही देखते लाइक्स, कमेंट्स और शेयरों की बाढ़ आ गई। कुछ लोग इसे मजाक समझ रहे थे, कुछ इसे राजनीतिक हथियार बना रहे थे।

घर में सन्नाटा था। माँ की आँखों में आँसू थे। पिता की खामोशी में गुस्सा और बेबसी।

राजनीति हमेशा ऐसी नहीं थी। मतभेद होते थे, तीखी बहसें भी होती थीं, लेकिन परिवारों को निशाना बनाने की परंपरा नहीं थी। विरोधियों पर वैचारिक हमले होते थे, निजी जीवन पर नहीं। आज बहस का मंच कीचड़ उछालने का अखाड़ा बनता जा रहा है। मुद्दे गायब हैं, मर्यादा लापता है।

देश के अलग-अलग हिस्सों से ऐसी घटनाएँ लगातार सामने आ रही हैं। कभी किसी नेता की बेटी को फर्जी वीडियो से बदनाम किया जाता है, कभी किसी की पत्नी या माँ को अभद्र टिप्पणियों का शिकार बनाया जाता है। चुनावी रैलियों से लेकर सोशल मीडिया तक, राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता अब निजी हमलों में बदलती जा रही है।

तमिलनाडु, महाराष्ट्र, बिहार, राजस्थान या उत्तर प्रदेश, कोई प्रदेश इससे अछूता नहीं है। सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और खतरनाक बना दिया है। एक झूठी पोस्ट मिनटों में लाखों लोगों तक पहुँच जाती है। किसी को सनसनी चाहिए, किसी को लाइक्स चाहिए, तो किसी को अपने विरोधी को नीचा दिखाने का अवसर।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हाल में कहा, “बेटी तो बेटी होती है।” यह केवल एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि हमारी साझा संस्कृति और तहजीब की याद दिलाने वाला संदेश है। बेटियों का सम्मान किसी दल, धर्म, जाति या विचारधारा का विषय नहीं हो सकता।

इस मामले में पुलिस ने त्वरित कार्रवाई की। विभिन्न राजनीतिक दलों ने भी एक स्वर में इसकी निंदा की। यह स्वागतयोग्य है, लेकिन समस्या केवल एक घटना तक सीमित नहीं है। जब तक राजनीतिक दल अपने समर्थकों को संयम और जवाबदेही का पाठ नहीं पढ़ाएँगे, तब तक ऐसी घटनाएँ रुकने वाली नहीं हैं।

जरा उस लड़की की कल्पना कीजिए, जिसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं। वह स्कूल जाती है, सपने देखती है, दोस्तों के साथ हँसती है। अचानक पिता की राजनीतिक पहचान उसकी अपनी पहचान पर भारी पड़ जाती है। उसकी तस्वीरें वायरल होने लगती हैं। संदर्भ बदल दिए जाते हैं। स्कूल में सवाल उठते हैं, मोहल्ले में कानाफूसी शुरू हो जाती है। परिवार की नींद उड़ जाती है।

लोकतंत्र में असहमति जरूरी है। सरकार की आलोचना होनी चाहिए, विपक्ष से सवाल पूछे जाने चाहिए। लेकिन जब बहस परिवारों तक पहुँच जाती है, तब असली मुद्दे दम तोड़ देते हैं। बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, महँगाई और किसानों की समस्याएँ पीछे छूट जाती हैं। चर्चा अफवाहों और अपमान तक सिमट जाती है।

हमें ठहरकर सोचना होगा।

हर सनसनीखेज पोस्ट को साझा करने से पहले उसकी सच्चाई परखें। राजनीतिक कार्यकर्ता हों, इन्फ्लुएंसर हों या आम नागरिक, सभी को संयम दिखाना होगा। झूठ फैलाने वाला दोषी है, लेकिन बिना जाँच उसे आगे बढ़ाने वाला भी उतना ही जिम्मेदार है।

सत्ता बदलती रहती है। नेता आते-जाते रहते हैं। लेकिन समाज की शालीनता एक बार टूट जाए, तो उसे जोड़ने में पीढ़ियाँ लग जाती हैं।

बेटी तो बेटी होती है। यह कोई नारा नहीं, हमारी सामूहिक चेतना का हिस्सा होना चाहिए। क्योंकि जब सियासत बेटियों को निशाना बनाती है, तब हार किसी एक दल की नहीं होती, पूरे समाज की होती है। और इस हार की भरपाई कोई चुनावी जीत नहीं कर सकती।

Saturday, June 20, 2026

 सुप्रीम कोर्ट ने पैदल चलने को मौलिक अधिकार बनाया, अब परीक्षा आगरा की है

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बृज खंडेलवाल द्वारा

21 जून 2026

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आगरा में सुबह की सैर अब सैर नहीं, संघर्ष बन गई है। स्कूल जाते बच्चे तेज़ बाइकों से बचते हुए सड़क पार करते हैं, बुज़ुर्ग फुटपाथ न होने पर जान जोखिम में डालकर चलते हैं, और ताज देखने आए पर्यटक पार्क की गाड़ियों, आवारा पशुओं, ठेलों और खुले नालों के बीच रास्ता तलाशते हैं। प्रेम के इस शहर में पैदल चलना आज एक साहसिक एडवेंचर,  काम बन गया है।

यह तस्वीर अब बदल सकती है। 19 जून 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा कि सुरक्षित, सुस्पष्ट और सुव्यवस्थित फुटपाथ पर चलना नागरिकों का मौलिक अधिकार है ,  संविधान के अनुच्छेद 19(1)(डी) और 21 के तहत। न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और ए.एस. चंदूरकर की पीठ ने स्पष्ट किया कि सड़क पर पहला हक मोटर वाहनों का नहीं, पैदल यात्री का है। पीठ ने दिव्यांगजनों के लिए सुगम सुविधाओं और एक अलग राष्ट्रीय पैदल-सुरक्षा कानून की सिफारिश की, और कहा कि उल्लंघन की स्थिति में नागरिक मोटर वाहन अधिनियम से स्वतंत्र मुआवज़े और कानूनी राहत के हकदार होंगे।

यह फैसला अचानक नहीं आया। ठीक एक साल पहले, मई 2025 में, न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ केंद्र को फुटपाथ-दिशा-निर्देश और एक राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा बोर्ड बनाने का आदेश दे चुकी थी। मौजूदा फैसला उसी सिलसिले की अगली कड़ी है : अदालत ने मामले को अनुच्छेद 32 की याचिका के रूप में फिर दर्ज किया, केंद्र को पक्ष बनाया, और 1985 के ओल्गा टेलिस बनाम बॉम्बे म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन फैसले का हवाला देकर कहा कि फुटपाथ तक सुरक्षित पहुँच गरिमा से जीने के अधिकार का हिस्सा है।

आगरा के लिए यह चेतावनी है

यह शहर दशकों से वाहनों के हिसाब से बढ़ा, इंसानों के हिसाब से नहीं। सड़कें चौड़ी हुईं, फ्लाईओवर बने, पार्किंग बढ़ी ;  पर फुटपाथ या तो बने ही नहीं, या अतिक्रमण की भेंट चढ़ गए। एम.जी. रोड, फतेहाबाद रोड, सिकंदरा, शाहगंज और यमुना किनारा मार्ग पर एक ही कहानी दिखती है: दुकानों ने फुटपाथ निगल लिए हैं, वाहन उन पर खड़े हैं, बिजली के खंभे और टूटे स्लैब राह रोकते हैं, खुले मैनहोल जान जोखिम में डालते हैं। इसकी सबसे बड़ी कीमत वही चुकाते हैं जिनके पास निजी वाहन नहीं ;  बच्चे, महिलाएँ, बुज़ुर्ग, दिव्यांगजन।

विरोधाभास भी चुभता है: हर साल लाखों पर्यटक ताज देखने आते हैं, पर शहर की सड़कों पर वे खुद को असुरक्षित पाते हैं। यह सिर्फ सुविधा का मामला नहीं । इसका असर सड़क सुरक्षा, जनस्वास्थ्य और पर्यावरण पर भी पड़ता है, क्योंकि पैदल चलना हतोत्साहित होने पर ट्रैफिक और प्रदूषण बढ़ते हैं।

मांगें जो अब संवैधानिक ताकत पा गई हैं

शहर के नागरिक अधिकार कार्यकर्ता वर्षों से इस संकट को उठाते रहे हैं ;  लेखों, अभियानों और रिपोर्टों के ज़रिए फुटपाथों की कमी, तेज़ रफ्तार वाहनों, आवारा पशुओं और अव्यवस्थित यातायात के खतरे सामने लाते रहे हैं। उनकी मांग रही है: यमुना किनारा मार्ग समेत हर इलाके से अतिक्रमण हटाया जाए, भारतीय सड़क कांग्रेस के मानकों के अनुरूप फुटपाथ और साइकिल ट्रैक बनें, और अवैध पार्किंग पर सख्ती हो। सुप्रीम कोर्ट का फैसला अब इन्हीं मांगों को कानूनी आधार देता है।

अब परीक्षा प्रशासन की है

देश की सर्वोच्च अदालत का संदेश साफ है: सड़कें सिर्फ गाड़ियों के लिए नहीं हैं, उन पर पहला हक पैदल चलने वालों का है। अब आगरा विकास प्राधिकरण, नगर निगम, लोक निर्माण विभाग और ट्रैफिक पुलिस की बारी है ,  हर नई सड़क परियोजना में सुरक्षित फुटपाथ, सुगम क्रॉसिंग, साइकिल ट्रैक और दिव्यांगजन-अनुकूल सुविधाएँ अनिवार्य करनी होंगी, पुराने मार्गों का पुनर्विकास करना होगा, और अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई लगातार चलानी होगी।

जो शहर अपने पैदल यात्रियों की रक्षा नहीं कर सकता, वह खुद को स्मार्ट या विश्वस्तरीय नहीं कह सकता। आगरा ने दशकों मशीनों के लिए सड़कें बनाई हैं। अब समय इंसानों के लिए रास्ते बनाने का है ,  क्योंकि हर नागरिक और हर पर्यटक को बिना डर के चलने का अधिकार है।

असली सवाल यह है कि यह अदालती आदेश कागज़ों तक सीमित तो नहीं रह जाएगा। जवाबदेही अब केवल नैतिक नहीं, क़ानूनी भी है। आगरा के नागरिक संगठनों, मीडिया और स्थानीय निकायों को इस मौके का इस्तेमाल प्राधिकरणों से स्पष्ट समय-सीमा और जवाबदेही माँगने के लिए करना चाहिए, ताकि यह ऐतिहासिक फैसला सिर्फ एक और रिपोर्ट बनकर फाइलों में दफ़न न हो जाए।

Thursday, June 18, 2026

 युद्ध तो खत्म, लेकिन पर्यावरण और मानसूनी बारिश गड़बड़ाने का हिसाब कौन चुकाएगा?

जब बम बरसते हैं, तब जलवायु लहूलुहान होती है: युद्ध को पर्यावरण पर हमला माना जाए

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

20 जून 2026

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उनके लिए युद्ध एक खेल था। वो आए, धमाकेदार आतिशबाजी की, बम, मिसाइल, ड्रोन खूब चले, हजारों मरे, रिहाइशें तबाह हुईं, हवा जहरीली हुई, तापमान बढ़ा, समुद्र खौला, जंगल नष्ट हुए। वो तो गए। मानसून की चाल बिगड़ गई। अब भुगतो।

मानसून भारत की धड़कन है। यही हमारे खेतों को सींचता है, नदियों को भरता है, भूजल को पुनर्जीवित करता है और करोड़ों लोगों की रोज़ी-रोटी का आधार बनता है। लेकिन अब यह धड़कन कुछ बेताल-सी लगने लगी है।

मार्च 2026 में उत्तर भारत ने सामान्य से अधिक पश्चिमी विक्षोभ झेले। आमतौर पर मार्च में पाँच से छह पश्चिमी विक्षोभ आते हैं, लेकिन इस बार उनकी संख्या लगभग आठ रही। बेमौसम बारिश हुई। ओलों ने फसलों को पीटा। तापमान ऊपर-नीचे होता रहा। गर्मी की दस्तक बार-बार टलती रही।

अप्रैल, मई और जून के शुरुआती दिनों में भी यह सिलसिला जारी रहा।

मौसम वैज्ञानिक सावधानी बरतते हुए कहते हैं कि किसी एक मौसमीय घटना को सीधे जलवायु परिवर्तन से जोड़ना उचित नहीं होगा। लेकिन वे इस बात पर सहमत हैं कि मानव गतिविधियाँ वायुमंडल के संतुलन को बदल रही हैं। सदियों से चले आ रहे मौसम चक्र अस्थिर हो रहे हैं। चरम मौसमी घटनाएँ बढ़ रही हैं।

सवाल सीधा है। प्रकृति आखिर कितना बोझ और झेले?

दशकों से पर्यावरणविद् जीवाश्म ईंधन, वनों की कटाई और औद्योगिक प्रदूषण के खतरों की चेतावनी देते रहे हैं। लेकिन एक बड़ा प्रदूषक अक्सर हमारी नज़रों से ओझल रहता है: युद्ध।

हर मिसाइल, हर लड़ाकू विमान, हर टैंक और हर ध्वस्त शहर अपने पीछे एक विशाल कार्बन पदचिह्न छोड़ता है। सैन्य अभियान बेहिसाब ईंधन निगलते हैं। विस्फोट जहरीले रसायन छोड़ते हैं। जलती इमारतें और तबाह होता बुनियादी ढाँचा वातावरण में कालिख और ग्रीनहाउस गैसें छोड़ता है। पुनर्निर्माण के लिए सीमेंट, इस्पात और ऊर्जा की भारी खपत होती है।

युद्ध सिर्फ इंसानों को नहीं मारता। वह नदियों को ज़हरीला करता है, जंगलों को उजाड़ता है, मिट्टी को दूषित करता है और जलवायु को अस्थिर बनाता है।

संघर्षों की पर्यावरणीय कीमत सीमाओं में कैद नहीं रहती। धुएँ को पासपोर्ट की ज़रूरत नहीं होती। कार्बन उत्सर्जन वीज़ा लेकर नहीं चलता। प्रदूषण हवाओं के साथ महाद्वीपों को पार कर जाता है।

यह कहना वैज्ञानिक रूप से गलत होगा कि किसी एक युद्ध या सैन्य कार्रवाई ने सीधे भारत के मानसून को प्रभावित किया है। ऐसा कोई ठोस प्रमाण अभी उपलब्ध नहीं है। लेकिन यह भी उतना ही गैर-जिम्मेदाराना होगा कि हम युद्धों के जलवायु पर पड़ने वाले संचयी प्रभावों को नज़रअंदाज़ कर दें।

जलवायु परिवर्तन किसी एक देश, एक सेना या एक युद्ध का नतीजा नहीं है। यह मानव गतिविधियों के लंबे सिलसिले का परिणाम है, जिसमें युद्ध की मशीनरी भी शामिल है।

हैरानी की बात यह है कि सैन्य उत्सर्जन आज भी वैश्विक जलवायु विमर्श के सबसे कम चर्चित मुद्दों में से एक है।

जब उद्योगों को अपने कार्बन उत्सर्जन का हिसाब देना पड़ता है, तो युद्धों की पर्यावरणीय लागत का पूरा ब्योरा क्यों नहीं लिया जाता? जलवायु सम्मेलन कार्बन बजट की बात करते हैं, लेकिन युद्ध बिना किसी जवाबदेही के उसे राख में क्यों बदल देते हैं?

दुनिया को अब एक नए सिद्धांत की ज़रूरत है: युद्धकालीन पर्यावरणीय जवाबदेही।

सैन्य उत्सर्जन का आकलन हो। उनका स्वतंत्र सत्यापन हो। युद्धों में नष्ट होने वाले पारिस्थितिक तंत्रों को मानवता की साझा धरोहर माना जाए। संघर्षों से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान को जलवायु न्याय के वैश्विक एजेंडे में शामिल किया जाए।

शांति केवल राजनीतिक आवश्यकता नहीं है, यह पारिस्थितिक अनिवार्यता भी है।

भारतीय मानसून समुद्र, पर्वत, हवाओं और तापमान के नाज़ुक संतुलन पर टिका है। बढ़ते पश्चिमी विक्षोभ, गर्म होते महासागर और बदलती जेट स्ट्रीम हमें चेतावनी दे रहे हैं कि यह संतुलन बेहद नाज़ुक है।

जब हम एक-दूसरे के खिलाफ युद्ध छेड़ते हैं, तब हम धरती के खिलाफ भी युद्ध छेड़ते हैं।

और वायुमंडल हर वार का हिसाब रखता है।

अगर हमें अपने मानसून, अपने किसानों और अपने भविष्य को बचाना है, तो हमें सुरक्षा की परिभाषा बदलनी होगी। राष्ट्रीय सुरक्षा को पर्यावरणीय सुरक्षा से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

युद्धग्रस्त दुनिया स्थिर जलवायु नहीं बना सकती।

इक्कीसवीं सदी का अगला बड़ा शांति आंदोलन, एक हरित आंदोलन भी होना चाहिए।

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Wednesday, June 17, 2026

 बंगाल का भूचाल और बदलते भारतीय राजनीतिक नक्शे

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बृज खंडेलवाल  द्वारा 

19 जून 2026

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पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव 2026 का नतीजा केवल एक राज्य में सत्ता के बदलने का संकेत नहीं है; यह भारतीय राजनीति की जलवायु में आ रहे व्यापक बदलावों की पहली प्रभावी आहट भी है। जो क्षेत्रीय किले तकरीबन अपराजेय माने जाते थे, वहां दरारें उभर आई हैं और पुरानी बिसात उलटने लगी है। 

भाजपा की प्रचंड उपस्थिति और तृणमूल कांग्रेस की अप्रत्याशित कुर्सी‑घटती स्थिति केवल सीटों का गणित नहीं बता रही; यह बताती है कि भारतीय राजनीति के खेल के नियम बदल रहे हैं। भाजपा ने लगभग 207 सीटें पाकर बंगाल में नया अध्याय लिखा, जबकि ममता बनर्जी की पार्टी करीब 80 सीटों पर सिमट गई; यह बदलाव सिर्फ़ आंकड़ों का मुआयना नहीं, उन परिस्थितियों का परिणाम है जिनमें करिश्माई नेतृत्व, संगठन का थकना और सत्ता‑विरोधी लहरों का संगम दिखता है। 

लंबे समय तक ममता बनर्जी का व्यक्तित्व और उनकी जमीन‑से‑सभा तक की लडाई उन्हें बंगाल की राजनीति में मजबूती देता रहा, पर अब भ्रष्टाचार के आरोप, संगठनात्मक थकावट और विशेषकर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा शहरी मतदाताओं के बीच भाजपा की बढ़ती पैठ ने तृणमूल की नींव हिला दी है। नतीजों के बाद भीतर से उठ रही बगावत की फुसफुसाहटें, नेताओं की नाराज़गी और पाला बदलने की अटकलें संकेत देती हैं कि दीवारों में पहले ही दरारें आ चुकी थीं।

यह बदलाव केवल बंगाल तक सीमित नहीं दिखता। देश भर में क्षेत्रीय दल आज अस्तित्व और प्रासंगिकता की चुनौती से जूझ रहे हैं। महाराष्ट्र की शिवसेना, दिल्ली‑पंजाब की आम आदमी पार्टी या तमिलनाडु की एआईएडीएमके; हर जगह राजनीतिक समीकरण दबाव में हैं। कई बार विचारधारा मंचों पर सुंदर दिखती है, पर सियासत की बिसात पर अंकगणित और हित सिद्धांतों पर भारी पड़ते हैं; इसीलिए आज सत्ता के गलियारों में दल‑बदल, गठबंधन और नए समीकरणों की फुसफुसाहटें तेज़ हैं। कल तक जो नेता एक‑दूसरे पर तीखे हमले करते थे, वे अब साथ आने की संभावनाएँ तलाश रहे हैं, क्योंकि राजनीति में न कोई स्थायी दोस्त होता है, न स्थायी दुश्मन; स्थायी रहता है सत्ता और हित का समीकरण। इसी उथल‑पुथल के बीच विपक्षी एकता की परतें भी उधड़ती दिख रही हैं; बाहरी चुनौतियाँ जितनी महत्वपूर्ण हैं, उससे कहीं अधिक भीतर की असहमति और क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएँ उन गठजोड़ों को कमजोर कर रही हैं जिनका लक्ष्य भाजपा को चुनौती देना है।

राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में भाजपा अपनी चुनावी बढ़त को दीर्घकालिक राजनीतिक ताकत में बदलने की रणनीति पर काम कर रही है। 2024 के लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनने के बाद पूर्ण बहुमत न मिलने ने उसे और सक्रिय कर दिया है; परमुख मुद्दों में परिसीमन जैसे संवेदनशील विषय पर वह व्यापक समर्थन जुटाने की कोशिश कर रही है। 

संसदीय क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण का प्रस्ताव विशेषकर दक्षिणी राज्यों में चिंता का कारण बना हुआ है; उन राज्यों का तर्क है कि जनसंख्या नियंत्रण में सफलता के अनुपात में प्रतिनिधित्व घटाना उन्हें दंडित करने जैसा होगा। भाजपा इसे प्रतिनिधित्व और शासन की प्रभावशीलता बढ़ाने वाला कदम बताती है, जबकि आलोचक इसे संघीय ढाँचे पर असंतुलन पैदा करने का प्रयास मानते हैं। आने वाले वर्षों में यह बहस भारतीय राजनीति का एक बड़ा और स्थायी मुद्दा बन सकती है।

राज्य‑स्तरीय परिदृश्य भी उस बदलते नक्शे की तरह अनिश्चित है। बिहार में नीतीश कुमार के लंबे राजनीतिक दौर के बाद नए समीकरण आकार ले रहे हैं; सहयोगी बेचैन हैं और दावेदार सक्रिय। तमिलनाडु में अभिनेता से नेता बने विजय की एंट्री पारंपरिक द्रविड़ राजनीति को चुनौती देती नजर आ रही है और नई ताकतें मैदान बदल रही हैं। पुरानी बिसात उलट रही है, नए खिलाड़ी उतर रहे हैं और राजनीति के पुरानी पैटर्न अब उतने स्थायी नहीं रह गए हैं। कांग्रेस भी तमाम उतार‑चढ़ाव के बावजूद नए समीकरण तलाश रही है, और कभी कट्टर विरोधी रहे दलों के बीच संवाद की संभावनाएँ उभर रही हैं। समाजवादी पार्टी में भी उथल पुथल चालू है। बसपा सुप्रीमो मायावती भी नींद से जाग उठीं हैं, उधर उवैसी साहब मैदान में उतर चुके हैं।

अंततः इसका निर्णायक पहलू मतदाता का व्यवहार है।  क्षेत्रीय दल समाप्त नहीं हो रहे, पर अब सिर्फ़ करिश्माई नेतृत्व, जातीय समीकरण या पहचान‑राजनीति पर निर्भर रहकर लगातार सफलता पाना आसान नहीं रहा। संगठन, प्रदर्शन और जनता के साथ सतत संवाद पहले से कहीं अधिक अहम हो गया है। 

बंगाल का जनादेश इसलिए सिर्फ़ एक राज्य का फैसला नहीं है, बल्कि पूरे देश की राजनीति के लिए एक स्पष्ट संदेश है: इस नए दौर में वही टिकेगा जो समय के साथ खुद को बदल सकेगा; अकड़ नहीं, लचीलापन काम आएगा, क्योंकि राजनीति में हवा का रुख़ बदलते देर नहीं लगती।

Tuesday, June 16, 2026

 क्या 1947 का विभाजन एक सही निर्णय था? 

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एक दर्दनाक फैसले ने भारत की सभ्यतागत धारा को बचाए रखा

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बृज खंडेलवाल द्वारा

17 जून 2026

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1947 का विभाजन भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा ज़ख्म है। लाखों लोग बेघर हुए। अनगिनत परिवार बिछड़ गए। नफ़रत की आग में पूरा उपमहाद्वीप झुलस गया। आज भी उस दौर की कहानियाँ सुनकर रूह काँप उठती है।

लेकिन इतिहास केवल आँसुओं से नहीं लिखा जाता। कभी-कभी मुल्कों को दिल नहीं, दिमाग से फैसले लेने पड़ते हैं। कई बार हालात ऐसे बन जाते हैं कि चुनना अच्छे और बुरे के बीच नहीं, बल्कि बुरे और उससे भी बुरे के बीच पड़ता है।

1947 का विभाजन ऐसा ही फैसला था।

आज, लगभग अस्सी साल बाद, यह सवाल फिर उठता है कि अगर भारत अखंड रहता, तो क्या वह एक स्थिर और मजबूत राष्ट्र बन पाता? क्या वह अपनी सांस्कृतिक पहचान और सभ्यतागत विरासत को सुरक्षित रख पाता? या फिर वह लगातार सांप्रदायिक टकराव, राजनीतिक खींचतान और संवैधानिक गतिरोध में उलझा रहता?

सच यह है कि विभाजन किसी जश्न का नतीजा नहीं था। यह राजनीतिक हक़ीक़त को स्वीकार करने का फैसला था।

जून 1947 में कांग्रेस ने माउंटबेटन योजना को मंजूरी दी। तब तक हालात हाथ से निकल चुके थे। मुस्लिम लीग अलग देश की मांग पर अड़ी थी। उसने बार-बार साफ कर दिया था कि हिंदू और मुसलमान दो अलग राजनीतिक क़ौमें हैं।

साझा सत्ता, संघीय ढाँचे और समझौते के कई प्रस्ताव सामने आए, लेकिन बात नहीं बनी। 1946 के "डायरेक्ट एक्शन डे" के बाद भड़की हिंसा ने साफ संकेत दे दिया कि सत्ता का हस्तांतरण शांतिपूर्ण नहीं होगा।

बंगाल से पंजाब तक दंगे फैल गए। खून-खराबा बढ़ता गया। कांग्रेस नेतृत्व के सामने सवाल था—क्या देश को गृहयुद्ध की आग में झोंक दिया जाए या एक कड़वा फैसला लेकर आगे बढ़ा जाए?

कहावत है, "नासूर बन चुके घाव का इलाज कभी-कभी सर्जरी ही होती है।"

विभाजन उसी सर्जरी जैसा था।

1941 की जनगणना के मुताबिक, ब्रिटिश भारत की लगभग एक-चौथाई आबादी मुस्लिम थी और कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में उनका बहुमत था। ऐसे में अखंड भारत में सत्ता साझेदारी, प्रांतीय अधिकार और धार्मिक पहचान के मुद्दे लगातार टकराव का कारण बन सकते थे।

यह कहना मुश्किल है कि ऐसा भारत कितना स्थिर रहता। लेकिन आज़ादी से पहले के हालात देखकर इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि साझा शासन की राह दिन-ब-दिन कठिन होती जा रही थी।

विभाजन के बाद भारत एक स्पष्ट बहुसंख्यक जनसंख्या और मजबूत राजनीतिक केंद्र के साथ उभरा। नए गणराज्य ने धर्मनिरपेक्ष संविधान अपनाया, लेकिन उसकी सांस्कृतिक जड़ें हजारों साल पुरानी भारतीय परंपराओं में गहराई से जुड़ी रहीं।

आलोचक कह सकते हैं कि यह केवल एक अनुमान है, लेकिन यह भी सच है कि अखंड भारत में पहचान आधारित राजनीति और ज़्यादा तीखी हो सकती थी। संवैधानिक सौदेबाज़ी, क्षेत्रीय असंतोष और अलगाववादी दबाव लोकतंत्र को लगातार अस्थिर कर सकते थे।

दूसरे शब्दों में कहें तो विभाजन ने एक बड़ा संघर्ष पैदा किया, लेकिन शायद कई और बड़े संघर्षों को टाल भी दिया।

पाकिस्तान और बाद में बांग्लादेश में हिंदू और सिख आबादी में आई तेज़ गिरावट भी इस बहस को नया आयाम देती है। कई इतिहासकार मानते हैं कि किसी भी सभ्यता की निरंतरता के लिए जनसांख्यिकीय संतुलन अहम भूमिका निभाता है।

उधर भारत ने अपनी विविधता को बनाए रखते हुए लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत किया। यही स्थिरता आगे चलकर हरित क्रांति, आर्थिक उदारीकरण, तकनीकी प्रगति और मजबूत लोकतंत्र की नींव बनी।

यह भी एक विचारधारा का पक्ष है कि आज जिस तरह हिंदू सांस्कृतिक पुनर्जागरण और सांस्कृतिक आत्मविश्वास की चर्चा होती है, उसका स्वरूप अखंड भारत में अलग हो सकता था।

इतना जरूर कहा जा सकता है कि विभाजन कोई जीत नहीं था। वह एक सुरक्षा कवच था। उसने उस राजनीतिक हक़ीक़त को स्वीकार किया, जिसे लंबे समय तक नज़रअंदाज़ करना मुमकिन नहीं रह गया था।

जो लोग भारत को हिंदू सभ्यता की ऐतिहासिक मातृभूमि मानते हैं, उनके लिए विभाजन ने यह सुनिश्चित किया कि बहुसंख्यक समाज को अपनी सांस्कृतिक पहचान बचाने के लिए निरंतर राजनीतिक संघर्ष न करना पड़े।

विभाजन के घाव आज भी हरे हैं। उसकी पीड़ा कभी भुलाई नहीं जा सकती।

लेकिन इतिहास का एक कठोर सच यह भी हो सकता है कि उस दौर में उपलब्ध विकल्पों में विभाजन सबसे कम विनाशकारी फैसला था।

कभी-कभी मुल्कों को ज़िंदा रहने के लिए अपने दिल पर पत्थर रखना पड़ता है।

 


"जानते नहीं, मैं कौन हूँ?" : तमीज़ हार रही है, रसूख जीत रहा है

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बृज खंडेलवाल द्वारा

18 जून 2026

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"घट गए इंसाँ, बढ़ गए साए।"

हमारे शहर बड़े हो गए हैं। इमारतें आसमान छू रही हैं। गाड़ियाँ चमक रही हैं। जेबें भर रही हैं। लेकिन दिल सिकुड़ते जा रहे हैं।

सवाल सीधा है। क्या तरक़्क़ी का मतलब सिर्फ़ दौलत, ओहदा और शोहरत है? या फिर तमीज़, तहज़ीब और इंसानियत भी उसकी पहचान हैं?

लखनऊ के एक सरकारी अस्पताल का मंज़र याद आता है।

ओपीडी के बाहर एक महिला घंटों से अपनी बारी का इंतज़ार कर रही थी। हाथ में रेफ़रल पर्ची थी। चेहरे पर थकान थी। आँखों में उम्मीद।

तभी एक साहब आए। झकाझक कुर्ता। साथ में दो लोग। उन्होंने अटेंडेंट से कुछ कहा और सीधे डॉक्टर के कमरे में दाख़िल हो गए।

लाइन में खड़े एक व्यक्ति ने एतराज़ किया।

जवाब आया, "जानते नहीं, मैं कौन हूँ?"

महिला चुपचाप फिर अपनी कुर्सी पर बैठ गई।

यह सिर्फ़ एक अस्पताल की कहानी नहीं है। यह आज के समाज का आईना है।

अस्पताल हो, हवाई अड्डा हो, स्कूल हो या सरकारी दफ़्तर। हर जगह एक अनकहा नियम चलता दिखता है। क़ानून सबके लिए बराबर है, लेकिन कुछ लोग ख़ुद को क़ानून से ऊपर समझते हैं।

आज हैसियत सिर्फ़ पैसे से तय नहीं होती। पहचान, रसूख, संपर्क, उपनाम और दिखावा मिलकर एक ऐसा नशा पैदा करते हैं, जिसमें इंसान अपनी असल औक़ात भूल जाता है।

हमने एक नया जुमला गढ़ लिया है: "जुगाड़ है तो सब मुमकिन है।"

वीआईपी संस्कृति इसी सोच का सबसे बदसूरत चेहरा है।

सड़क पर किसी काफ़िले की सायरन बजाती गाड़ी दिखते ही ट्रैफ़िक थम जाता है। एम्बुलेंस रास्ता तलाशती रह जाती है। सड़क, जो सबकी है, कुछ लोगों की जागीर बन जाती है।

आलीशान सोसायटियों में घरेलू कामगारों के लिए अलग गेट होते हैं। अलग लिफ्ट होती है। आने-जाने के अलग नियम होते हैं। इसे सुरक्षा का नाम दिया जाता है, लेकिन सच यह है कि यह भेदभाव का नया लिबास है।

विडंबना देखिए। जिन हाथों से हमारा घर चलता है, हम उन्हीं हाथों को सम्मान देने में कतराते हैं।

स्कूलों में दाख़िला भी अब कई बार योग्यता से ज़्यादा पहुँच और पहचान का खेल बन गया है। सिफ़ारिशी ख़त, ऊँची जान-पहचान और मोटे दान के दम पर सीटें हासिल की जाती हैं।

बच्चे बहुत जल्दी सीख जाते हैं कि नियम कमज़ोरों के लिए होते हैं।

हम अक्सर मान लेते हैं कि अच्छी शिक्षा इंसान को बेहतर बना देती है। लेकिन क्या सचमुच ऐसा है?

ऊँची डिग्रियाँ तहज़ीब की गारंटी नहीं होतीं। फ़र्राटेदार अंग्रेज़ी, अच्छे व्यवहार का प्रमाणपत्र नहीं है।

हम सबने ऐसे पढ़े-लिखे लोग देखे हैं जो ड्राइवर से बदतमीज़ी करते हैं, फुटपाथ पर गाड़ी चढ़ा देते हैं और सफ़ाई कर्मचारियों को नाम से नहीं, इशारों से बुलाते हैं।

हमारे स्कूल और कॉलेज प्रतियोगिता तो सिखाते हैं, मगर हमदर्दी नहीं। आगे निकलना सिखाते हैं, साथ लेकर चलना नहीं।

सच तो यह है कि बराबरी का एहसास छोटी-छोटी बातों से पैदा होता है।

लाइन में लगना।

अपनी बारी का इंतज़ार करना।

सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करना।

दूसरों की सुविधा का ख़याल रखना।

तहज़ीब की शुरुआत यहीं से होती है।

जब लोग यह मान लेते हैं कि व्यवस्था ताक़तवरों के आगे झुक जाती है, तब उनका भरोसा टूटने लगता है।

अस्पताल की लाइन में खड़ा व्यक्ति अगली बार किसी अजनबी की मदद करने से पहले सोचेगा। कॉलोनी के गेट पर रोकी गई घरेलू सहायिका ख़ुद को अपमानित महसूस करेगी।

बदतमीज़ी संक्रामक होती है।

एक बुरा व्यवहार, कई और बुरे व्यवहारों को जन्म देता है।

कहा भी गया है, "अदब इंसान का सबसे ख़ूबसूरत ज़ेवर है।"

बदलाव की शुरुआत घर से होगी।

बच्चों को सिखाइए कि सफ़ाई कर्मचारी, चौकीदार, ड्राइवर और घरेलू सहायिका सिर्फ़ सेवा देने वाले लोग नहीं, बल्कि सम्मान के हक़दार इंसान हैं।

उन्हें लाइन में लगना सिखाइए। अपनी बारी का इंतज़ार करना सिखाइए। हर किसी से आँख मिलाकर बात करना और शुक्रिया कहना सिखाइए।

याद रखिए, किसी समाज की पहचान उसकी ऊँची इमारतों से नहीं, बल्कि उसके लोगों के बर्ताव से होती है।

जिस समाज में दौलत, इंसानियत से बड़ी हो जाए, वहाँ दीवारें तो बहुत खड़ी होती हैं, लेकिन दिलों के बीच पुल नहीं बन पाते।

तमीज़ कमज़ोरी नहीं है।

तहज़ीब दिखावा नहीं है।

विनम्रता किसी ओहदे की मोहताज नहीं होती।

असल हैसियत आपके बैंक बैलेंस से नहीं, आपके व्यवहार से झलकती है।

और शायद यही सबक हम सबसे ज़्यादा भूलते जा रहे हैं।

Monday, June 15, 2026

 नाचने वाली से रियासत की मलिका तक: बेगम समरू की हैरतअंगेज़ दास्तान

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

17 जून 2026

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इतिहास कभी-कभी ऐसी कहानियां रचता है जिन पर यकीन करना मुश्किल हो जाता है। एक किशोरी नाचने वाली, जो हालात के थपेड़ों में बहती हुई सत्ता के गलियारों तक पहुंच जाए, हजारों सैनिकों की कमान संभाले, बादशाहों, मराठों और अंग्रेजों से बराबरी की बातचीत करे और लगभग छह दशक तक एक समृद्ध रियासत पर राज करे। यह कहानी है बेगम समरू की।

लगभग 1753 में फ़र्ज़ाना ज़ेब-उन-निसा के रूप में जन्मी इस महिला ने भारतीय इतिहास में वह मुकाम हासिल किया, जिसकी कल्पना भी उस दौर में किसी महिला के लिए आसान नहीं थी। मुगल साम्राज्य बिखर रहा था। मराठा शक्ति उभर रही थी। अंग्रेज अपनी जड़ें मजबूत कर रहे थे। ऐसे उथल-पुथल भरे दौर में बेगम समरू ने अपनी अक्ल, हिम्मत और सियासी दूरदर्शिता के बल पर खुद को स्थापित किया।

उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी तथा इतिहास शोधकर्ता राज गोपाल सिंह वर्मा अपनी पुस्तक "बेगम समरू का सच" में लिखते हैं, "यह एक साधारण-सी प्रतीत होने वाली नाचने वाली लड़की की असाधारण कहानी है, जिसने लगभग अट्ठावन वर्षों तक सरधना पर शासन किया।"

फ़र्ज़ाना की जिंदगी तब बदली जब उनकी मुलाकात यूरोपीय भाड़े के सैनिक वाल्टर रेनहार्ट समरू से हुई। रेनहार्ट एक साहसी लेकिन विवादास्पद सैनिक था, जिसने उत्तर भारत की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई थी। उसका उपनाम "सम्ब्रे" था, जो भारतीय बोलचाल में बदलकर "समरू" हो गया।

फ़र्ज़ाना और रेनहार्ट केवल जीवनसाथी नहीं बने, बल्कि राजनीतिक और सैन्य साझेदार भी बने। मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय ने रेनहार्ट को मेरठ के निकट सरधना की जागीर प्रदान की थी। यह उपजाऊ और समृद्ध इलाका था, जिससे अच्छी आय होती थी। धीरे-धीरे फ़र्ज़ाना भी प्रशासन और सैन्य मामलों में सक्रिय भूमिका निभाने लगीं।

4 मई 1778 को आगरा में वाल्टर रेनहार्ट की अचानक मृत्यु हो गई। बहुतों को लगा कि अब फ़र्ज़ाना का प्रभाव समाप्त हो जाएगा। लेकिन इतिहास ने दूसरा मोड़ लिया। फ़र्ज़ाना ने न केवल सरधना की जागीर संभाली, बल्कि लगभग चार हजार सैनिकों वाली प्रशिक्षित फौज की कमान भी अपने हाथों में ले ली। यही वह क्षण था जब वे "बेगम समरू" के रूप में उभरीं।

आगरा से बेगम समरू का रिश्ता बेहद गहरा था। राज गोपाल सिंह वर्मा के शोध के अनुसार, शाहगंज क्षेत्र में रेनहार्ट समरू का विशाल आवास और बाग था। आज उसके अवशेष इतिहास की खामोश कहानी सुनाते हैं। रेनहार्ट को पहले वहीं दफनाया गया और बाद में उनका मकबरा आगरा के रोमन कैथोलिक कब्रिस्तान में बनाया गया। यह मकबरा आज भी मौजूद है और उस दौर की याद दिलाता है।

बेगम समरू अक्सर आगरा आती थीं। उन्होंने चर्चों और धार्मिक संस्थानों को आर्थिक सहायता दी। शाहगंज और भोगीपुरा क्षेत्र में उनकी संपत्तियां थीं। उनके सौतेले पुत्र ज़फ़र याब खान का मकबरा भी आगरा में ही स्थित है। इस तरह आगरा उनके जीवन और विरासत का अहम हिस्सा बना रहा।

पति की मृत्यु के बाद बेगम समरू ने जिस कुशलता से सत्ता संभाली, वह अपने आप में अनोखी मिसाल है। उन्होंने मुगल दरबार से संबंध बनाए रखे। मराठा सरदार महादजी सिंधिया के साथ भी उनके मधुर संबंध रहे। दूसरी ओर अंग्रेज ईस्ट इंडिया कंपनी से भी टकराव के बजाय समझदारी भरा व्यवहार किया। यही संतुलन उनकी सबसे बड़ी ताकत बना।

राज गोपाल सिंह वर्मा अपनी पुस्तक में बताते हैं कि बेगम समरू केवल नाम की शासक नहीं थीं। वे फैसले स्वयं लेती थीं, सैन्य अभियानों का नेतृत्व करती थीं और राजनीतिक रणनीतियां तैयार करती थीं। उस दौर में जब महिलाओं को सार्वजनिक जीवन से दूर रखा जाता था, बेगम समरू सत्ता के केंद्र में खड़ी दिखाई देती हैं।

1781 में उन्होंने ईसाई धर्म स्वीकार किया और जोआना नोबिलिस समरू नाम धारण किया। हालांकि धर्म परिवर्तन के बाद भी उन्होंने स्थानीय संस्कृति और परंपराओं से दूरी नहीं बनाई। उनकी पहचान भारतीय और यूरोपीय प्रभावों के अद्भुत संगम के रूप में बनी रही।

उनकी सबसे बड़ी धरोहरों में से एक है सरधना का भव्य चर्च, बेसिलिका ऑफ आवर लेडी ऑफ ग्रेसेज़। 1829 में पूर्ण हुआ यह चर्च उत्तर भारत के सबसे सुंदर और विशाल गिरजाघरों में गिना जाता है। इसके अलावा उन्होंने आगरा, कलकत्ता, बंबई और मद्रास के चर्चों को भी उदारतापूर्वक सहायता दी। सड़कें, भवन, बाग और जनकल्याण के अनेक कार्य उनके शासनकाल की पहचान बने।

हालांकि उनका जीवन संघर्षों से मुक्त नहीं था। उन्हें अपने ही परिवार से विरोध झेलना पड़ा। एक समय ऐसा भी आया जब उनके सौतेले पुत्र ने उन्हें सत्ता से हटाकर नजरबंद कर दिया। लेकिन उनकी लोकप्रियता और प्रभाव इतने मजबूत थे कि वे फिर सत्ता में लौट आईं। इस वापसी में महादजी सिंधिया और उनके अन्य सहयोगियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

बेगम समरू के जीवन से जुड़ी अनेक किंवदंतियां भी प्रचलित हैं। कुछ कथाएं उन्हें बेहद कठोर और निर्मम शासक के रूप में पेश करती हैं। लेकिन राज गोपाल सिंह वर्मा स्पष्ट करते हैं कि ऐसी कई कहानियां लोककथाओं और अफवाहों पर आधारित हैं। उनके समर्थन में ठोस ऐतिहासिक प्रमाण बहुत कम मिलते हैं। इसलिए इतिहास और किंवदंती के बीच अंतर करना जरूरी है।

27 जनवरी 1836 को सरधना में बेगम समरू का निधन हो गया। उन्हें उसी भव्य चर्च में दफनाया गया जिसे उन्होंने स्वयं बनवाया था। उनके निधन के साथ भारतीय इतिहास का एक अनोखा अध्याय समाप्त हुआ।

अपनी 272 पृष्ठों की पुस्तक "बेगम समरू का सच" में राज गोपाल सिंह वर्मा लिखते हैं, "यह पुस्तक पाठकों को बेगम समरू और उनके पति वाल्टर रेनहार्ट समरू के जीवन की उस ऐतिहासिक यात्रा से परिचित कराती है, जिसने उत्तर भारत की राजनीति को गहरे स्तर पर प्रभावित किया।"

वास्तव में, बेगम समरू की कहानी केवल एक महिला शासक की कहानी नहीं है। यह साहस, महत्वाकांक्षा, कूटनीति और नेतृत्व की कहानी है। यह उस महिला की दास्तान है जिसने अपने समय की सभी सामाजिक सीमाओं को तोड़ा और इतिहास में अपना नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज कराया। मुगल साम्राज्य के पतन और अंग्रेजी सत्ता के उदय के बीच चमकता हुआ यह सितारा आज भी इतिहास प्रेमियों को आकर्षित करता है और याद दिलाता है कि असाधारण लोग अक्सर साधारण परिस्थितियों से ही जन्म लेते हैं।

Saturday, June 13, 2026

 भारत की सबसे बड़ी ताकत: यहां अच्छी ज़िंदगी अभी भी आम आदमी की पहुंच में है

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माना कि ग़म बहुत हैं जमाने में,

पर दिल बहलाने के बहाने भी बहुत हैं

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अक्सर यात्रा करने वालों को हकीकत, यानी ग्राउंड रियलिटीज से नजदीकी रिश्ता हो जाता है, जो नेताओं के बयानों, या अखबारी संपादकीयों से भिन्न होता है। दो घंटे पड़ोसी यात्री,  जो अमेरिका से हाल ही में लौटा है, से बतिया के, बंगलौर के नए बने एयर टर्मिनल पर उतरते ही नए भारत की एक आकर्षक तस्वीर से सामना हुआ। 

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बृज खंडेलवाल द्वारा

15 जून 2026

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सुबह दूध वाला घंटी बजाता है।

अख़बार दरवाज़े पर आ गिरता है।

मोबाइल पर एक क्लिक करते ही सब्ज़ी, दवा और खाना घर पहुंच जाता है। डॉक्टर उसी दिन मिल जाता है। घर की सफाई हो चुकी होती है।

भारत में करोड़ों लोगों के लिए यह कोई विलासिता नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा है। सर्विस सेक्टर का चौंकाने वाला विस्तार हुआ है, हर तरह की सेवा, किसी ऐप के द्वारा, फटाफट उपलब्ध है।

यही वजह है कि आज भारत दुनिया के सबसे आकर्षक देशों में से एक बनकर उभर रहा है।

दशकों तक भारतीयों की निगाहें पश्चिम की ओर लगी रहीं। अमेरिका अवसरों की धरती माना गया। यूरोप समृद्धि का प्रतीक था। विदेशी नौकरी और पासपोर्ट सफलता का पर्याय समझे जाते थे। यह सपना आज भी बहुतों को आकर्षित करता है। लेकिन विदेशों में बसे अनेक भारतीय अब एक नई सच्चाई को समझ रहे हैं। अच्छी ज़िंदगी केवल ऊंची तनख्वाह से नहीं मिलती।

कई बार उसकी असली पहचान रोज़मर्रा की सुविधाओं से होती है।

मोबाइल इंटरनेट इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। भारत ने डिजिटल क्रांति को आम आदमी तक पहुंचा दिया है। दुनिया में सबसे सस्ते डेटा प्लान यहीं मिलते हैं। कुछ सौ रुपये में महीने भर वीडियो कॉल, ऑनलाइन पढ़ाई, मनोरंजन और कारोबार चल सकता है। जिन सुविधाओं पर पश्चिमी देशों में हजारों रुपये खर्च होते हैं, वे भारत में बेहद सुलभ हैं।

फिर आती है यूपीआई की कहानी।

चाय वाला हो या सब्ज़ी बेचने वाला, रिक्शा चालक हो या बड़ा शोरूम, हर कोई एक ही डिजिटल भुगतान व्यवस्था से जुड़ा है। न छुट्टे पैसे की चिंता, न बैंक के चक्कर। मोबाइल का एक स्कैन और भुगतान पूरा। भारत ने डिजिटल भुगतान का ऐसा मॉडल बनाया है जिसकी चर्चा दुनिया भर में हो रही है।

विदेशी पर्यटक अक्सर हैरान रह जाते हैं जब सड़क किनारे नारियल बेचने वाला भी क्यूआर कोड से भुगतान स्वीकार करता है।

स्वास्थ्य सेवाओं की तस्वीर भी कम दिलचस्प नहीं है।

दुनिया के कई देशों में डॉक्टर के पास जाना जेब पर भारी पड़ सकता है। भारत में अब भी बड़ी आबादी के लिए चिकित्सा अपेक्षाकृत सुलभ और किफायती है। आधुनिक अस्पतालों में दुनिया भर से मरीज इलाज कराने आते हैं। वहीं मोहल्लों के क्लीनिक आज भी लाखों लोगों की जरूरतें पूरी कर रहे हैं।

भारत का मेडिकल टूरिज्म उद्योग केवल कम लागत की वजह से नहीं, बल्कि बेहतर चिकित्सा सुविधाओं के कारण भी तेजी से बढ़ रहा है।

लेकिन शायद भारत की सबसे बड़ी सुविधा समय है।

मध्यम वर्ग का परिवार भी घरेलू सहायक, रसोइया, ड्राइवर या देखभाल करने वाले कर्मचारी की मदद ले सकता है। इससे कामकाजी लोगों को परिवार, करियर और अपने शौक के लिए अधिक समय मिलता है।

पश्चिमी देशों में ऐसी सेवाएं अक्सर केवल अमीरों तक सीमित रहती हैं।

भारत में किफायत और सुविधा मिलकर जीवन को आसान बनाती हैं।

ट्रांसपोर्ट भी इस कहानी का अहम हिस्सा है।

मेट्रो, बस, ऑटो और रेल आज भी आम आदमी की पहुंच में हैं। नई एक्सप्रेसवे परियोजनाएं, आधुनिक हवाई अड्डे, मेट्रो नेटवर्क और तेज़ रेल सेवाएं देश को पहले से कहीं बेहतर तरीके से जोड़ रही हैं।

यह बदलाव किसी चमत्कार से कम नहीं।

जिस देश को कभी लालफीताशाही और धीमी व्यवस्था के लिए जाना जाता था, वही आज डिजिटल प्रशासन और बुनियादी ढांचे के विकास का उदाहरण बनता जा रहा है।

लेकिन भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि न तो इंटरनेट है, न यूपीआई और न ही सड़कें।

उसकी सबसे बड़ी ताकत है यहां की जीवंत जीवनशैली।

कहां मिलेगा ऐसा देश जहां शहरों  में दिवाली, ईद, क्रिसमस, गुरुपर्व और होली की रौनक दिखाई दे? कहां मिलेगा ऐसा देश जहां बर्फीले पहाड़, रेगिस्तान, समुद्र तट, वर्षावन और महानगर एक ही राष्ट्र की पहचान हों?

भारत केवल एक देश नहीं है।

यह अनेक संसारों का संगम है।

यहां त्योहार सड़कों पर उतर आते हैं। शादियां पूरे समाज का उत्सव बन जाती हैं। पड़ोसी परिवार जैसे लगते हैं। दादा-दादी और नाना-नानी बच्चों के जीवन का हिस्सा बने रहते हैं। दोस्तियां दशकों तक चलती हैं।

दुनिया के कई हिस्सों में यह सामाजिक ताना-बाना धीरे-धीरे कमजोर पड़ रहा है।

बेशक भारत के सामने चुनौतियां भी हैं। यातायात की अव्यवस्था है। प्रदूषण चिंता का विषय है। बुनियादी सुविधाओं में असमानता है। 

लेकिन इन सबके बावजूद भारत एक अनमोल चीज़ देता है। कम खर्च में बेहतर जीवन।

इसीलिए कई प्रवासी भारतीय वापस लौट रहे हैं। इसीलिए विदेशी पेशेवर भारत को अपना ठिकाना बना रहे हैं।

इसीलिए उद्यमी, डिजिटल नोमैड, सेवानिवृत्त लोग और युवा परिवार भारत को नए नजरिए से देखने लगे हैं।

आधुनिक भारत की कहानी केवल आर्थिक विकास या तकनीकी प्रगति की कहानी नहीं है।

यह उस देश की कहानी है जहां जीवन अब भी रिश्तों से चलता है। जहां छोटी-छोटी खुशियां बड़ी दौलत मानी जाती हैं। जहां घर, परिवार और समुदाय आज भी सबसे बड़ी पूंजी हैं।

अच्छी ज़िंदगी जीने के लिए हमेशा अमीर होना जरूरी नहीं। और शायद यही भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

Thursday, June 11, 2026

 गर्मियों की छुट्टी का मजा, रोमांच हुआ गायब

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नानी तेरी मोरनी को...

बचपन बिकाऊ है!

नानी के घर से स्पोर्ट्स कोचिंग तक का सफर

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

13 जून 2026

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वे भी क्या दिन थे।

गर्मी की छुट्टियां शुरू होते ही बच्चों की दुनिया बदल जाती थी। कोई नानी के घर भागता था, कोई दादा-दादी के गांव। कोई पहाड़ों में ट्रेकिंग करता, कोई आम के बागों में चढ़ जाता। दोपहरें कॉमिक्स पढ़ते गुजरती थीं। शामें गिल्ली-डंडा, पतंगबाजी और बेवजह की शरारतों में बीतती थीं।

घड़ी का कोई महत्व नहीं था। कोई लक्ष्य नहीं था। कोई प्रदर्शन नहीं था। छुट्टियां आत्मा की मरम्मत का मौसम थीं।

फिर भारत बदल गया।

अब गर्मी की छुट्टियां भी बच्चों की नहीं रहीं।

सुबह स्विमिंग क्लास। फिर क्रिकेट अकादमी। फिर गिटार सीखना। फिर डांस क्लास। फिर कोडिंग कोर्स। फिर स्पोकन इंग्लिश। शाम को ऑनलाइन वर्कशॉप।

बच्चा स्कूल से छुट्टी पाता है, लेकिन बचपन से नहीं।

आज भारत में जन्म लेते ही प्रतिस्पर्धा शुरू हो जाती है। डेढ़-दो साल के बच्चों को प्ले स्कूल भेजा जा रहा है, जब वे ठीक से बोलना भी नहीं सीख पाए होते। मध्यमवर्गीय परिवार सालाना पचास हजार से एक लाख रुपये तक फीस भर रहे हैं। माता-पिता को डर है कि कहीं उनका बच्चा दौड़ में पीछे न रह जाए।

और यह डर काल्पनिक नहीं है।

भारत में अवसर सीमित हैं और दावेदार करोड़ों। अच्छी नौकरियां कम हैं। सरकारी नौकरियां और भी कम। प्रतिष्ठित कॉलेजों में सीटें मुट्ठी भर हैं। यही वजह है कि कोचिंग संस्कृति एक समानांतर शिक्षा व्यवस्था बन चुकी है। बच्चा स्कूल में पढ़ता है, फिर कोचिंग में पढ़ता है, फिर टेस्ट सीरीज में बैठता है। उसकी पूरी किशोरावस्था प्रतियोगिता की प्रयोगशाला बन जाती है।

लेकिन अब यह होड़ केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं है।

खेल भी कमाई का नया टिकट बन गए हैं।

माता-पिता क्रिकेटरों की करोड़ों की नीलामी देखते हैं। ओलंपिक पदक विजेताओं को मिलने वाले नकद पुरस्कार देखते हैं। सरकारी नौकरियां और विज्ञापन अनुबंध देखते हैं। फिर वे अपने बच्चों को खेल अकादमियों में भेज देते हैं। खेल अब स्वास्थ्य, आनंद और मित्रता का माध्यम कम, करियर की रणनीति अधिक बनता जा रहा है।

सच यह है कि कुछ बच्चे सितारे बनेंगे, लेकिन लाखों नहीं। हर सफल खिलाड़ी के पीछे हजारों ऐसे बच्चे होंगे जो वर्षों का समय, मेहनत और उम्मीदें लगाकर भी मंजिल तक नहीं पहुंच पाएंगे।

इसी बीच मनोरंजन उद्योग ने भी बचपन को बाजार में उतार दिया है।

गायन प्रतियोगिताएं, नृत्य प्रतियोगिताएं, टैलेंट शो और क्विज कार्यक्रम बच्चों को सफलता के शॉर्टकट के रूप में बेच रहे हैं। माता-पिता ऑडिशन दर ऑडिशन भटक रहे हैं। बच्चे कैमरों, जजों और वोटिंग के दबाव में बड़े हो रहे हैं।

कुछ को शोहरत मिलती है। कुछ को पुरस्कार मिलते हैं। लेकिन अधिकांश बच्चे कुछ वर्षों बाद गुमनामी में लौट आते हैं। पीछे छूट जाती है थकान, निराशा और खोया हुआ बचपन।

सबसे दुखद बात यह है कि बच्चों के पास अब खाली समय नहीं बचा।

खाली समय, जिसे आधुनिक समाज लगभग अपराध मानने लगा है।

किताबें पढ़ना समय की बर्बादी समझा जाता है। पेड़ों पर चढ़ना अनुपयोगी गतिविधि बन गया है। दादा-दादी और नाना-नानी की कहानियां किसी पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं हैं। गांव की गलियां, खेतों की पगडंडियां, रिश्तेदारों के घरों की चहल-पहल और बेफिक्र आवारागर्दी अब धीरे-धीरे स्मृतियों का हिस्सा बनती जा रही हैं। जिन बच्चों को कुछ नहीं करना वो मोबाइल वाचिंग करते हैं, या रील बनाते हैं।

हर शौक को करियर में बदला जा रहा है। गाना सीखो ताकि स्टार बनो। नाचो ताकि टीवी पर आ सको। खेलो ताकि करोड़पति बन सको। कोडिंग सीखो ताकि नौकरी मिल सके। अंग्रेजी सीखो ताकि इंटरव्यू निकल जाए।

मानो जीवन का हर क्षण किसी भविष्य की कमाई में निवेश किया जाना चाहिए।

पैसे की चमक इतनी तेज हो गई है कि बचपन उसकी रोशनी में धुंधला पड़ गया है।

समस्या खेल, संगीत, पढ़ाई या प्रतियोगिताओं में नहीं है। समस्या उस मानसिकता में है जो हर बच्चे को एक परियोजना, एक निवेश और एक संभावित आय स्रोत की तरह देखने लगी है।

माता-पिता दोषी नहीं हैं। वे डरे हुए हैं। महंगाई बढ़ रही है। रोजगार अनिश्चित हैं। भविष्य धुंधला है। वे अपने बच्चों के लिए सुरक्षा चाहते हैं।

लेकिन इस प्रक्रिया में एक बड़ा सवाल अनुत्तरित रह जाता है।

यदि बच्चा बचपन में ही थक गया, तो वह जीवन कब जिएगा?

यदि छुट्टियां भी प्रशिक्षण शिविर बन गईं, तो यादें कहां बनेंगी?

यदि हर प्रतिभा का मूल्य रुपये में तय होगा, तो खुशी का मूल्य कौन तय करेगा?

शायद हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी यही है।

हम बच्चों को भविष्य के लिए तैयार करते-करते उनका वर्तमान छीन रहे हैं।

और एक दिन जब वे सफल होकर पीछे मुड़कर देखेंगे, तो शायद पूछेंगे: 

वे गर्मियां कहां चली गईं, जिनमें जिंदगी कमाई नहीं, खुशियां हुआ करती थी?

Wednesday, June 10, 2026

 


धार्मिक स्थलों को उन्मादी भीड़ से बचाओ

तीर्थ स्थान या थीम पार्क?

रीलबाज़ों, सेल्फीबाज़ों और धार्मिक पर्यटन की भीड़ ने पवित्र स्थलों का क्या हाल कर दिया है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

12 जून 2026

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क्या भगवान अब भक्तों से मिलते हैं या कैमरे के लेंस से?

क्या तीर्थयात्रा अब आत्मा की यात्रा है या इंस्टाग्राम की स्टोरी?

इन दिनों किसी भी पवित्र धाम का दृश्य देख लीजिए। वृंदावन हो, केदारनाथ हो, बद्रीनाथ हो या वैष्णो देवी। ऐसा लगता है जैसे किसी धार्मिक स्थल पर नहीं, बल्कि किसी मेले, पिकनिक स्पॉट या मनोरंजन पार्क में पहुँच गए हों। हाथ में माला कम, मोबाइल ज्यादा हैं। भक्ति कम, रील ज्यादा है। श्रद्धा कम, प्रदर्शन ज्यादा है।

भारत की प्राचीन परंपरा में तीर्थयात्रा जीवन के उत्तरार्ध का विषय मानी जाती थी। जब व्यक्ति संसार के मोह-माया, दौड़-धूप और महत्वाकांक्षाओं से कुछ दूरी बनाता था, तब वह ईश्वर की ओर मुड़ता था। साठ वर्ष की आयु के बाद वानप्रस्थ और आध्यात्मिक जीवन की परिकल्पना यूँ ही नहीं की गई थी। इसके पीछे गहरा सामाजिक और मनोवैज्ञानिक अनुभव था।

लेकिन आज तस्वीर उलट गई है।

कॉलेज से छुट्टी मिली नहीं कि चलो वृंदावन। नई कार खरीदी नहीं कि चलो चारधाम। शादी की सालगिरह है तो केदारनाथ।  हनीमून, चलो तिरुपति जी के दर्शन से शुरू करें, वेरी गुड idea!! जन्मदिन है तो महाकाल। मंदिर अब मन की शांति के स्थान नहीं रहे, बल्कि "चेक-इन" करने और सोशल मीडिया पर दिखाने के मंच बनते जा रहे हैं।

इन धार्मिक स्थलों पर पहुँचने वाली विशाल युवा भीड़ अपने साथ क्या ला रही है?

प्लास्टिक की बोतलें। चिप्स के पैकेट। डिस्पोज़ेबल कप। लाउडस्पीकर जैसी आवाजें। सड़क किनारे फैला कचरा। शराब की खाली बोतलें। सेल्फी के लिए धक्का-मुक्की। ऊँची आवाज में फिल्मी गाने। और सबसे बढ़कर, पवित्रता के प्रति उदासीनता।

हिमालय के नाज़ुक पारिस्थितिकी तंत्र पर इसका असर साफ दिख रहा है। पहाड़ कूड़ेदान बन रहे हैं। नदियाँ प्लास्टिक से भर रही हैं। तीर्थ मार्गों पर कूड़े के ढेर लग रहे हैं। जहाँ कभी घंटियों और मंत्रों की ध्वनि सुनाई देती थी, वहाँ अब मोबाइल नोटिफिकेशन और रीलों का शोर गूँजता है।

भक्ति अब एक उपभोक्ता उत्पाद बन गई है।

एक पैकेज टूर खरीदिए। हेलीकॉप्टर से दर्शन कीजिए। पाँच मिनट मंदिर में बिताइए। दस सेल्फियाँ लीजिए। फिर लौटकर घोषणा कर दीजिए कि आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त हो गया।

यह आध्यात्मिकता नहीं है। यह धार्मिक उपभोक्तावाद है।

कड़वा लग सकता है, लेकिन शायद समय आ गया है कि हम एक असहज प्रश्न पूछें। क्या सभी तीर्थस्थल पर्यटन के लिए खुले रहने चाहिए? क्या हर धार्मिक स्थल को मनोरंजन और अवकाश उद्योग का हिस्सा बना देना चाहिए?

शायद नहीं।

देश के प्रमुख तीर्थस्थलों पर आयु-आधारित प्रतिबंधों पर गंभीर बहस होनी चाहिए। कम से कम पचास या साठ वर्ष से कम आयु के लोगों की सामान्य पर्यटक एंट्री सीमित की जा सकती है। विशेष धार्मिक, शैक्षिक या पारिवारिक कारणों को छोड़कर तीर्थस्थलों को वरिष्ठ नागरिकों और वास्तविक साधकों के लिए प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

यह किसी पीढ़ी के खिलाफ युद्ध नहीं होगा। बल्कि पवित्र स्थलों की गरिमा बचाने का प्रयास होगा।

युवाओं के लिए घूमने-फिरने के हजार विकल्प हैं। पहाड़ हैं। समुद्र तट हैं। ट्रैकिंग है। खेल हैं। सांस्कृतिक यात्राएँ हैं। रोमांचक पर्यटन है। जीवन का आनंद लीजिए। दुनिया देखिए। काम कीजिए। सपने पूरे कीजिए।

लेकिन हर जगह को पर्यटन स्थल बना देना बुद्धिमानी नहीं है।

कुछ स्थान ऐसे भी होने चाहिए जहाँ शांति हो। मौन हो। ध्यान हो। अनुशासन हो। जहाँ लोग फोटो खिंचवाने नहीं, आत्मचिंतन करने जाएँ।

आज वृंदावन की गलियाँ, गंगा के घाट, हिमालय के धाम और अनेक मंदिर उस भीड़ के बोझ तले कराह रहे हैं जो दर्शन से अधिक प्रदर्शन में विश्वास करती है। यह "टच एंड गो" संस्कृति तीर्थों को आध्यात्मिक केंद्रों से मनोरंजन केंद्रों में बदल रही है।

यदि अभी नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ियाँ मंदिर तो देखेंगी, लेकिन उनकी आत्मा खो चुकी होगी।

तीर्थ यात्रा कोई वीकेंड पिकनिक नहीं है। यह मन की तैयारी, अनुशासन, संयम और श्रद्धा की यात्रा है।

जब तक हम इस अंतर को नहीं समझेंगे, तब तक हमारे पवित्र स्थल भीड़ तो जुटाएँगे, लेकिन भक्ति नहीं। श्रद्धालु तो आएँगे, लेकिन शांति नहीं। मंदिर तो बचेंगे, मगर उनकी मर्यादा धीरे-धीरे भीड़ के पैरों तले कुचलती चली जाएगी।