Monday, May 4, 2026

 कब तक 80 प्रतिशत आबादी खुद को कमजोर समझती रहेगी? कब तक बहुसंख्यक होकर भी राजनीतिक रूप से बिखरे रहेंगे? क्या सच में यह देश अपने ही मूल समाज से कटता जा रहा था? और सबसे बड़ा सवाल; क्या ‘सेक्युलरिज्म’ के नाम पर एक खामोश अन्याय चल रहा था? दशकों तक यह सवाल हवा में तैरते रहे, लेकिन जवाब किसी ने नहीं दिया। फिर अचानक कुछ बदल गया। एक खामोशी टूटी। एक गुस्सा फूटा। और जो समाज सदियों से सहनशीलता का प्रतीक था, वही अब सवाल पूछने लगा। क्या यह सिर्फ राजनीति का बदलाव है, या एक सोया हुआ शेर सच में जाग उठा है?

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हिंदू बहुमत: वो सोए हुए शेर जो जाग उठे

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बृज खंडेलवाल द्वारा

5 मई, 2026

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2014 से पहले, भारत में हिंदू बहुसंख्यक एक बेहद अजीब और विरोधाभासी स्थिति में थे। करीब 80 प्रतिशत आबादी होने के बावजूद, यह समाज राजनीतिक रूप से बंटा हुआ, वैचारिक रूप से कमजोर और अपनी सामूहिक ताकत को लेकर उदासीन था।

उस दौर में समाजवादी और कम्युनिस्ट विचारधारा के नेताओं ने ‘सेक्युलरिज्म’ को एक चादर की तरह ओढ़ रखा था। मगर इसके नीचे सच्चाई कुछ और थी। हिंदू समाज को जातियों और क्षेत्रों में उलझाए रखना ही उनकी राजनीति का मूल था।

कांग्रेस और परिवारवादी पार्टियों ने इस बिखराव को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया। उनका गणित सीधा था; अल्पसंख्यकों और चुनिंदा जातियों का गठजोड़ बनाओ, सत्ता पाओ। यह खेल दशकों तक चला। मगर हर खेल की एक सीमा होती है।

धीरे-धीरे यह ‘तुष्टीकरण’ एक चुभन बन गया। एक ऐसा जख्म, जो दिखता नहीं था, मगर दर्द देता था। यही दर्द आगे चलकर विस्फोट बना।

आज़ादी के बाद भारत ने खुद को आधुनिक राष्ट्र बनाने की कोशिश की। 1950 के दशक में जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने हिंदू कोड बिल लागू किया। यह सुधार जरूरी था। इससे महिलाओं को अधिकार मिले, समाज में बदलाव आया।

लेकिन सवाल यहीं खड़ा होता है, क्या यही साहस मुस्लिम पर्सनल लॉ में दिखाया गया? जवाब साफ है; नहीं।

यहां से एक असमानता शुरू हुई। सरकार हिंदुओं के लिए सुधारक बनी, और अल्पसंख्यकों के लिए रक्षक।

संविधान का अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यकों को अपने शिक्षण संस्थान चलाने की आजादी देता है। मगर बहुसंख्यकों को यह अधिकार नहीं मिला।

फिर आया 1991 का पूजा स्थल कानून। इसने 1947 की स्थिति को स्थिर कर दिया। काशी और मथुरा जैसे विवादों के रास्ते कानूनी तौर पर बंद हो गए।

दूसरी ओर, हिंदू मंदिर सरकारी नियंत्रण में आ गए। तिरुपति जैसे मंदिरों की आय सरकार के अधीन हो गई।

यह एक विचित्र स्थिति थी। दुनिया में शायद ही कोई ऐसा देश होगा जहां बहुसंख्यकों के धार्मिक संस्थानों पर सरकार का नियंत्रण हो, और अल्पसंख्यकों के संस्थान पूरी तरह स्वतंत्र हों।

अगर इस पूरी कहानी का ‘टर्निंग पॉइंट’ तलाशना हो, तो वह 1985 का शाहबानो केस था।

एक 62 वर्षीय महिला, जिसे उसके पति ने तीन तलाक देकर छोड़ दिया। सुप्रीम कोर्ट ने उसके पक्ष में फैसला दिया। उसे गुजारा भत्ता मिलना चाहिए।

मगर तब के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने बहुमत होने के बावजूद पीछे कदम खींच लिया। उन्होंने संसद में नया कानून बनाकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट दिया।

यह सिर्फ एक फैसला नहीं था। यह एक संदेश था। यह संदेश साफ था; राजनीति न्याय से बड़ी है।

यहीं से लोगों को समझ आया कि ‘सेक्युलरिज्म’ का अर्थ बराबरी नहीं, बल्कि झुकाव है। यही वह क्षण था जब हिंदू समाज को अपनी राजनीतिक कमजोरी का अहसास हुआ।

1990 में V. P. सिंह ने मंडल आयोग लागू किया। उद्देश्य था पिछड़ों को आरक्षण देना। मगर इसके पीछे राजनीति का गहरा खेल था। यह उस हिंदू एकता को तोड़ने की कोशिश थी जो राम मंदिर आंदोलन से बन रही थी।

देश में उबाल आया। विरोध प्रदर्शन हुए। युवाओं ने आत्मदाह तक किया।

इसके जवाब में लाल कृष्ण आडवाणी ने रथ यात्रा निकाली। सोमनाथ से अयोध्या तक की यह यात्रा सिर्फ एक यात्रा नहीं थी। यह एक प्रतीक थी।

इसने जातियों में बंटे हिंदुओं को एक सूत्र में बांधना शुरू किया।

यहीं से ‘हिंदू वोट’ की अवधारणा जन्मी। जिसे पहले असंभव माना जाता था।

UPA सरकार के समय तुष्टीकरण एक नीति बन गया। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट आई। उसने मुसलमानों की आर्थिक स्थिति को उजागर किया। मगर इसका इस्तेमाल समाधान के लिए नहीं, बल्कि राजनीति के लिए हुआ।

मनमोहन सिंह का बयान: “देश के संसाधनों पर अल्पसंख्यकों का पहला हक है”, एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया।

इसके साथ ही ‘भगवा आतंकवाद’ का नैरेटिव गढ़ा गया। हिंदू संगठनों को आतंकी गतिविधियों से जोड़ने की कोशिश हुई।

बाद में अदालतों में ये दावे कमजोर साबित हुए।

लेकिन तब तक एक धारणा बन चुकी थी, सरकार बहुसंख्यकों के साथ खड़ी नहीं है।

2014 में जो हुआ, वह अचानक नहीं था। यह दशकों की नाराजगी का परिणाम था।

यह किसी एक पार्टी की रणनीति नहीं थी। यह समाज के भीतर पनप रही भावना थी।

हिंदू समाज अब खुद को सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि शक्ति के रूप में देखने लगा।

2026 के पश्चिम बंगाल चुनाव इसका ताजा उदाहरण हैं। जो राज्य कभी वामपंथी और बौद्धिक राजनीति का गढ़ था, वहां भी यह बदलाव दिख रहा है।

यह बदलाव सिर्फ वोट का नहीं है। यह सोच का है।

जो लोग यह मानकर बैठे थे कि बहुसंख्यक समाज हमेशा बंटा रहेगा, उनकी गणना अब गलत साबित हो रही है।

सोए हुए शेर अब जाग चुके हैं।

और जब शेर जागता है, तो जंगल का संतुलन बदलता है।

आज का हिंदू समाज सवाल पूछ रहा है। जवाब मांग रहा है।

वह अब सिर्फ सहनशील नहीं, सजग भी है।

राजनीति अब बदल रही है। वोट बैंक का गणित कमजोर पड़ रहा है।

उसकी जगह एक नई सोच उभर रही है, राष्ट्रवाद की। भारत और भारतीयता की। तमिल राजनीति भी इस से प्रभावित हो रही है।

यह बदलाव स्थायी होगा या अस्थायी, यह भविष्य बताएगा।

लेकिन इतना तय है; अब बहुसंख्यक समाज को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। शेर की दहाड़ गूंज चुकी है। अब सन्नाटा पहले जैसा नहीं रहेगा।


Sunday, May 3, 2026

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पूंजीवाद का कुरूप चेहरा:

लोकतांत्रिक समाजवाद की वापसी की पुकार

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

4 मई 2026

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लाल झंडे अब कम दिखते हैं। मई दिवस की रौनक भी फीकी पड़ गई है। कभी जो दिन मेहनतकशों की  एकता का पैग़ाम देता था, आज वह बस एक रस्म सा लगता है। मगर सच यह है कि ज़मीन के नीचे अंगारे अब भी सुलग रहे हैं। सवाल वही है; क्या तरक़्क़ी सिर्फ कुछ लोगों के लिए है, या सबके लिए?

तीन दशकों से भारत में उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण का निज़ाम  चला। कहा गया कि विकास होगा, दौलत बढ़ेगी, सबका भला होगा। हुआ क्या? अमीर और अमीर हो गए। ग़रीब वहीं खड़े रह गए, कई जगह और पीछे चले गए। शहर चमक उठे, लेकिन गाँव सूने हो गए। अमीरी-गरीबी का फासला अब खाई बन चुका है।

दुनिया के मंच पर यह पूंजीवाद अब और भी बेनक़ाब हो चुका है। डोनाल्ड ट्रंप इस सिस्टम का सबसे बदसूरत चेहरा बनकर उभरे। उनकी सियासत में तहज़ीब  कम, घमंड ज़्यादा दिखाई दिया है। व्यापार युद्ध, ऊँचे टैरिफ, कमज़ोर देशों को “hell hole” कहना; यह सब सिर्फ लफ्ज़ नहीं, बल्कि उस सोच की झलक है जहाँ ताक़त ही सच बन जाती है।

यह पूंजीवाद का वही चेहरा है, जो इंसान को इंसान नहीं, माल (commodity) समझता है। कामगार एक नंबर बन जाता है। मज़दूर एक लागत बन जाता है। और इंसानियत? वह कहीं गुम हो जाती है।

कार्ल मार्क्स ने बहुत पहले चेतावनी दी थी: यह सिस्टम इंसान के रिश्तों को सिर्फ पैसे के लेन-देन में बदल देगा। आज गिग इकॉनमी, ठेके पर काम, और प्रवासी मज़दूरों की हालत देखिए। सब कुछ वही कहानी कह रहे हैं।

रोजा लक्जेमबर्ग ने कहा था, या तो समाजवाद आएगा, या बर्बरता। आज दुनिया जिस मोड़ पर खड़ी है, यह बात और भी सच्ची लगती है। नफ़रत की राजनीति, धर्म और नस्ल के नाम पर बँटवारा; यह सब उसी बर्बरता की आहट है।

भारत में समाजवाद की सोच कोई पराई चीज़ नहीं है। डॉ राम मनोहर लोहिया ने साफ कहा था: बराबरी के बिना भाईचारा एक झूठ है। जब तक आर्थिक समानता नहीं होगी, तब तक समाज में सच्ची मोहब्बत नहीं पनपेगी।

आचार्य नरेंद्र देव ने लोकतंत्र और समाजवाद को एक-दूसरे का पूरक माना। उनका मानना था कि पूंजीवाद के तहत लोकतंत्र सिर्फ दिखावा है, असल ताक़त कुछ लोगों के हाथ में सिमट जाती है।

आज भारत में यह सच्चाई साफ दिखती है। शहरों में ऊँची-ऊँची इमारतें हैं, लेकिन उनके साये में झुग्गियाँ भी हैं। कॉर्पोरेट मुनाफा आसमान छू रहा है, लेकिन किसान कर्ज़ में डूबकर जान दे रहा है। नौजवान पढ़-लिखकर भी बेरोज़गार है। यह कैसी तरक़्क़ी है?

दुनिया में भी हालात कुछ अलग नहीं। ट्रंप की नीतियों ने दिखा दिया कि पूंजीवाद अब सिर्फ बाज़ार नहीं, बल्कि ताक़त का खेल बन चुका है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ कमज़ोर हो रही हैं। नियमों की जगह मनमानी चल रही है।

ऐसे में लोकतांत्रिक समाजवाद एक उम्मीद बनकर उभरता है। यह कोई ख़याली पुलाव नहीं है। यह एक संतुलित रास्ता है, जहाँ लोकतंत्र भी हो, और आर्थिक न्याय भी।

समाजवाद का मतलब सिर्फ सरकार का नियंत्रण नहीं। इसका मतलब है; हर इंसान को इज़्ज़त से जीने का हक़ मिले। अच्छी शिक्षा, सस्ती स्वास्थ्य सेवा, और रोजगार के मौके सबको मिलें।

नॉर्डिक देशों का मॉडल सामने है। वहाँ बाज़ार भी है, लेकिन मज़बूत यूनियन भी हैं। अमीर टैक्स देते हैं, और ग़रीबों को सहारा मिलता है। यही संतुलन समाज को स्थिर बनाता है।

भारत में भी कुछ कोशिशें हुई हैं। मनरेगा, मिड-डे मील जैसी योजनाओं ने राहत दी है। लेकिन ये आधे-अधूरे कदम हैं। ज़रूरत है एक बड़े बदलाव की: नीतियों में, सोच में, और सियासत में।

आज सबसे ज़रूरी है इंसान को केंद्र में रखना। मुनाफा नहीं, इंसानियत अहम हो। विकास का मतलब सिर्फ जीडीपी नहीं, बल्कि लोगों की खुशहाली हो।

मई दिवस भले फीका पड़ गया हो, लेकिन उसका पैग़ाम आज भी ज़िंदा है। यह हमें याद दिलाता है कि हक़ माँगने से नहीं, लड़ने से मिलते हैं।

पूंजीवाद ने हमें बहुत कुछ दिया, लेकिन बहुत कुछ छीन भी लिया। अब वक़्त है सोचने का; क्या हम उसी रास्ते पर चलते रहेंगे, या कोई नया रास्ता चुनेंगे?

लोकतांत्रिक समाजवाद कोई पुरानी किताब का सपना नहीं। यह आज की ज़रूरत है। यह वह रास्ता है, जहाँ इंसान, इंसान बना रहता है, न कि सिर्फ एक ग्राहक या मजदूर।

और शायद यही सबसे बड़ी लड़ाई है: इंसान को इंसान बनाए रखने की।

Saturday, May 2, 2026

 ख़ऊओं का शहर आगरा!  

बृज मंडल की मिठास की अनंत परंपरा  

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बृज खंडेलवाल द्वारा  

3 मई 2026  

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बृज मंडल: आगरा, मथुरा और हाथरस का यह पवित्र त्रिकोण कृष्ण प्रेम की मीठी धुन पर थिरकता है। यमुना की लहरों और ब्रज की धूल में दूध, घी और खोए की महक आज भी घुली हुई है। 

यहां की मिठाइयां सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि भक्ति, संस्कृति और सदियों पुरानी विरासत का संगम हैं। मंदिरों में “लाल कू मीठी खीर भौत भावे” कहकर भोग चढ़ाया जाता है, जहां मठरी, लड्डू, ठौर, पेड़ा और रबड़ी, मोहन थाल जैसे प्रसाद कृष्ण भक्ति को और मिठास देते हैं।  वृन्दावन में ठंडी दही लस्सी के बिना यात्रा अधूरी मानी जाती है, तो मथुरा में खुरचन और मेवा-युक्त खौलते दूध का कुल्लड़ चटकाए बिना मनोकामना पूरी नहीं होती।

बृज क्षेत्र की मिठाइयां सांस्कृतिक धरोहर हैं। इनमें मुगल काल की समृद्धि और ब्रज की सादगी का अनोखा मेल दिखता है। आगरा का विश्व प्रसिद्ध पेठा तो गरीब- अमीर सभी का पसंदीदा है, लेकिन घेवर, कलाकंद, बर्फी, गुलाब जामुन, खुरमी, बालूशाही, पेड़ा, रबड़ी, सोन पपड़ी और दूध की मलाई जैसी रचनाएं ब्रज की आत्मा को छूती हैं। घी और खोया इन मिठाइयों की जान हैं, जबकि बंगाल चेना पर और दक्षिण भारत नारियल पर निर्भर रहता है। यहां गोंद जैसे पौष्टिक तत्व और मुगल शाही रबड़ी की गाढ़ापन ब्रज की खास पहचान है।

भारत में मिठाइयों का इतिहास वैदिक काल से जुड़ा है, लेकिन आगरा की भगत हलवाई इसे जीवंत उदाहरण बनाती है। 1795 में लेख राज भगत द्वारा यमुना किनारे बेलंगंज में स्थापित यह दुकान भारत की सबसे पुरानी मिठाई की दुकानों में से एक मानी जाती है। लगभग 231 वर्ष पुरानी इस संस्था ने पीढ़ी दर पीढ़ी पारंपरिक रेसिपी और बनाने के तरीके संभालकर रखे हैं। शुरू में बेड़इं, जलेबी, लड्डू और साधारण मिठाइयों से सफर शुरू करने वाली यह संस्थान आज सैकड़ों आइटम्स, मिठाई, चाट, बेकरी और कन्फेक्शनरी, तक पहुंच चुकी है। NDTV समेत कई मीडिया संस्थानों ने इसे भारत की सबसे पुरानी मिठाई दुकान के रूप में मान्यता दी है। मक्खन का समोसा, पिस्ते की बर्फी, खास हैं।

बेलनगंज में भगत हलवाई के सामने एक जमाने में राजनीतिक सभाएं होती थीं और बड़े-बड़े राष्ट्रीय नेता यहां नाश्ता करते थे। आज इसके 7-8 आउटलेट्स हैं, लेकिन स्वाद वही पुराना, शुद्ध घी-खोया वाला बना हुआ है। 

कई दुकानों पर आज भी दोपहर को कढ़ाई में पका गाढ़ा दूध पीना आगरा की अनोखी शान है।

आगरा में तिकोनिया इलाके की दुकानें भी कम प्रसिद्ध नहीं। शहर के विभिन्न हिस्सों में हीरा लाल मिष्ठान, गोपाल दास पेठे वाले, देवी राम, दाऊजी, गोपिका और GMB जैसे ब्रांड्स लंबे समय  से स्वाद की सेवा कर रहे हैं। गोपाल दास तो पेठा और दालमोठ के लिए मशहूर है। रबड़ी इतनी गाढ़ी होती है कि चम्मच उसमें खड़ा रह जाता है। धीमी आंच पर घंटों पकाई जाने वाली यह रबड़ी ब्रज की धैर्यपूर्ण परंपरा का प्रतीक है।

मथुरा में पेड़ा कृष्ण भक्ति का प्रतीक है। यहां का पारंपरिक पेड़ा खोए, शुद्ध घी और सूखे मेवों से बना नरम, हल्का पीला गोला मुंह में घुल जाता है। कान्हा स्वीट्स और बसंती मिठाई की रबड़ी दूध को उबाल-उबालकर बनाई जाती है, जिसमें पिस्ता की बारीक कतरनें स्वाद बढ़ाती हैं। मक्खन संदेश मक्खन की मलाई में फल-मेवे मिलाकर ब्रज का अनूठा स्वाद प्रस्तुत करता है। खुरचन भी यहां लोकप्रिय है, दूध की मलाई को रगड़कर बनाया गया चिपचिपा, इलायची-केसर युक्त आनंद।

हाथरस हींग कचौड़ी के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन मिठाइयों में भी पीछे नहीं। यहां का घेवर मेवों से भरा आता है। सोन पपड़ी पतली-कुरकुरी चादरों वाली, लंबे समय तक टिकने वाली मिठाई है। हाथरस के हलवाई पारंपरिक चूल्हों पर घी डालकर स्वाद को और गहराई देते हैं। खुरचन यहां भी चिपचिपी और सुगंधित बनती है।

बृज के छोटे कस्बे भी अपनी विशेषताएं रखते हैं। पिनाहट की खोए की गुजियां त्योहारों में खास होती हैं, खोया भरी कुरकुरी परतें, गुड़ या चीनी से मीठी। किरावली के पेड़े छोटे, घने खोए वाले और बेहद स्वादिष्ट होते हैं। ये छोटी जगहें ब्रज की गहरी सांस्कृतिक जड़ों को दर्शाती हैं।

बृज मिठाइयों की सबसे बड़ी खूबी उनकी सादगी और पौष्टिकता है। शुद्ध घी, ताजा खोया और मेवों से बनी ये मिठाइयां न सिर्फ स्वाद देती हैं बल्कि ऊर्जा भी। आज के दौर में जब पैकेटबंद मिठाइयां बाजार में छाई हुई हैं, तब भी बृज मंडल के हलवाई पुरानी परंपराओं को जीवित रखे हुए हैं।

ताजमहल देखने आने वाले पर्यटक अब सिर्फ पत्थर की सुंदरता नहीं, बल्कि ब्रज की मीठी विरासत का भी रसास्वादन जरूर करें। आगरा, मथुरा और हाथरस की गलियों में घूमते हुए एक कौर पेड़ा, एक चम्मच रबड़ी या एक टुकड़ा सोन पपड़ी मुंह में रखें, तो महसूस होगा कि कृष्ण की लीला अभी भी यहां जीवंत है। 

बृज मंडल की मिठास अनंत है, ठीक उसी तरह जैसे कान्हा का प्रेम। एक बार चख लो, तो बार-बार याद आएगी। 


Friday, May 1, 2026

 कब तक तेल के भरोसे? अब सूरज से चलेगा भारत

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पश्चिम एशिया के संकट के बीच, सोलर एनर्जी की चमक से भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिखी जा रही है

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

3 मई 2026

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पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष। दूर जल रही आग की तपिश भारत तक साफ महसूस हो रही है। तेल और गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव, आपूर्ति की अनिश्चितता और आयात पर बढ़ती निर्भरता भारत के लिए गंभीर खतरे हैं। देश अभी भी अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयातित ईंधन से पूरा करता है। ऐसे में वैश्विक तनाव सीधे हमारे ऊर्जा बिल पर असर डालते हैं।

हर संकट अवसर भी लेकर आता है।  एक रिपोर्ट

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धूप में नहाया, उत्तर प्रदेश का एक छोटा सा गांव। सरसों के पीले खेतों के बीच से गुजरती कच्ची पगडंडी। दूर कहीं एक घर की छत पर चमकते सोलर पैनल। आंगन में धीरे-धीरे घूमता पंखा, मोबाइल चार्ज हो रहा है, और शाम ढलते ही बच्चों की किताबों पर स्थिर, चमकदार रोशनी फैल रही है, टिमटिमाती ढिबरी या लालटेन की जगह।

यकीन करना मुश्किल है, लेकिन यही वो भारत है जो महज 25 साल पहले अंधेरे से जूझ रहा था। तब सूरज ढलते ही गांव सिमट जाता था। दीए की कांपती लौ में रात कटती, और बिजली एक  मेहमान की तरह आती-जाती रहती। इन्वर्टर अमीरों की शान था, जनरेटर शोर मचाता और डीजल की तेज गंध हवा में घुली रहती। 

आज तस्वीर पूरी तरह पलट चुकी है। छतों पर सोलर पैनल चमक रहे हैं, खेतों के किनारे मिनी ग्रिड काम कर रहे हैं, और गांव खुद अपनी ऊर्जा गढ़ रहा है। 

भारत आज ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक स्थिर लेकिन निर्णायक यात्रा पर है। यह कोई अचानक छलांग नहीं, बल्कि निरंतर प्रयासों की कहानी है। 

वित्तीय वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही में देश की बिजली मांग ने नया रिकॉर्ड बनाया। 25 अप्रैल 2026 को दोपहर करीब 3:38 बजे पीक डिमांड 256.1 गीगावॉट तक पहुंच गई। गर्मी की लहर और बढ़ती आर्थिक गतिविधियों ने इस मांग को और तेज किया। बढ़ती अर्थव्यवस्था, हर घर बिजली पहुंचाने के प्रयास, शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन से तेज होती गर्मी; सब मिलकर ऊर्जा की भूख को बढ़ा रहे हैं। 

सोलर ऊर्जा का उत्पादन साल-दर-साल 24 प्रतिशत बढ़ा है। कुल बिजली उत्पादन में करीब 3 प्रतिशत की वृद्धि हुई, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से गैर-जीवाश्म स्रोतों से आई। कोयला और लिग्नाइट आधारित उत्पादन में 1 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। यानी विकास और प्रदूषण के पुराने रिश्ते में अब दरार पड़ रही है। 

संकेत और भी साफ हैं। पिछले 90 दिनों में से 88 दिन ऐसे रहे जब बिजली की सबसे ज्यादा मांग दिन के समय दर्ज हुई, जब सूरज चरम पर होता है। इसका मतलब है कि सोलर ऊर्जा अब महज विकल्प नहीं रह गई है, बल्कि मुख्यधारा बनती जा रही है।

इसी बदलाव को घर-घर तक पहुंचाने वाली एक बड़ी पहल है पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना। इस योजना का उद्देश्य साधारण परिवारों की छतों को छोटे-छोटे पावर प्लांट में बदलना है। सरकार सब्सिडी मुहैया करा रही है, आसान ऋण की व्यवस्था कर रही है और लोगों को अपनी बिजली खुद उत्पन्न करने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। अब तक इस योजना के तहत 31 लाख से ज्यादा घरों को फायदा पहुंच चुका है, जबकि लाखों आवेदन लंबित हैं।

गांवों में जहां कभी बिजली आने का इंतजार किया जाता था, वहां अब लोग खुद बिजली पैदा कर रहे हैं। बिजली का बिल काफी कम हो रहा है, और अतिरिक्त ऊर्जा को ग्रिड में बेचकर अतिरिक्त आय का नया जरिया भी बन रहा है। यह सिर्फ एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि ऊर्जा के लोकतंत्रीकरण की दिशा में एक सामाजिक बदलाव है। आम आदमी अब ऊर्जा का उपभोक्ता नहीं, बल्कि उत्पादक भी बन रहा है।

महंगे आयातित तेल-गैस के मुकाबले सोलर और पवन ऊर्जा अब केवल पर्यावरणीय विकल्प नहीं, बल्कि आर्थिक मजबूरी भी बन गई है। जब वैश्विक बाजार अस्थिर हों, तब सूरज की रोशनी और हवा की ताकत सबसे भरोसेमंद साथी साबित होते हैं।

इसलिए सरकार सोलर पार्क, विंड एनर्जी कॉरिडोर और ग्रीन हाइड्रोजन जैसी परियोजनाओं पर तेजी से काम कर रही है। निजी क्षेत्र का निवेश भी बढ़ रहा है, क्योंकि साफ ऊर्जा अब भविष्य की बात नहीं, तुरंत की जरूरत बन गई है। ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु लक्ष्य दोनों एक ही रास्ते पर दिख रहे हैं।

हालांकि सोलर और पवन ऊर्जा की क्षमता तेजी से बढ़ रही है, लेकिन इसका पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा। “कर्टेलमेंट”; यानी पैदा हुई साफ ऊर्जा को व्यर्थ जाना, एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। चौथी तिमाही में करीब 27 गीगावॉट सोलर और 4 गीगावॉट पवन ऊर्जा को सीधे कर्टेल किया गया, जबकि ट्रांसमिशन रिजर्व के तहत और भी बड़ी मात्रा प्रभावित हुई।

यह विडंबना है, एक ओर देश प्रदूषण कम करने की कोशिश कर रहा है, दूसरी ओर साफ ऊर्जा को मजबूरी में रोकना पड़ रहा है। समस्या उत्पादन की नहीं, बल्कि व्यवस्था की है। हमने सोलर प्लांट तो तेजी से लगाए, लेकिन बिजली को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने वाले ट्रांसमिशन नेटवर्क की गति उससे मेल नहीं खा पाई। राजस्थान, गुजरात और तमिलनाडु जैसे राज्यों में सूरज और हवा से भरपूर ऊर्जा पैदा हो रही है, लेकिन उसे उपभोक्ता केंद्रों तक पहुंचाने में अड़चनें बनी हुई हैं।

भंडारण की कमी भी एक बड़ी बाधा है। दिन में पैदा हुई अतिरिक्त सोलर ऊर्जा को शाम या रात के लिए संग्रहित करने की क्षमता अभी सीमित है। बैटरी स्टोरेज और पंप्ड स्टोरेज हाइड्रो जैसी तकनीकें अभी शुरुआती चरण में हैं। नतीजा यह होता है कि दोपहर में बिजली की अधिकता और शाम को फिर वही दबाव।

कोयला आधारित प्लांट्स की कहानी भी बदल रही है। प्लांट लोड फैक्टर 72 प्रतिशत से घटकर 69 प्रतिशत रह गया है। कोयला अब “राजा” की जगह बैकअप की भूमिका निभा रहा है। पर्यावरण की दृष्टि से यह सकारात्मक है, लेकिन पुराने प्लांट्स की कार्यक्षमता और लागत पर नए सवाल खड़े हो रहे हैं।

तो क्या भारत की ऊर्जा स्वतंत्रता की राह रुक गई है? बिल्कुल नहीं। रुकावटें जरूर हैं: ट्रांसमिशन नेटवर्क की कमी, भंडारण की चुनौती, नीतिगत स्पष्टता की जरूरत और राज्यों के बीच समन्वय की कमी। लेकिन राह बंद नहीं है।

असल जरूरत संतुलित विकास की है। उत्पादन के साथ-साथ वितरण, भंडारण और स्मार्ट ग्रिड पर बराबर ध्यान देना होगा। ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर को तेजी से पूरा करना, बैटरी स्टोरेज में बड़े पैमाने पर निवेश और टाइम-ऑफ-डे टैरिफ जैसी व्यवस्थाएं इस संक्रमण को आसान बना सकती हैं। अगर निवेशकों को नीतिगत निश्चितता और समय पर भुगतान मिले, तो निजी क्षेत्र और तेजी से आगे आएगा।

आज गांव की छत पर चमकता सोलर पैनल सिर्फ बिजली नहीं दे रहा। वह आत्मनिर्भरता, पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक सशक्तिकरण का प्रतीक बन गया है। जहां कभी अंधेरा स्थायी लगता था, वहां अब रोशनी अपने दम पर जल रही है।

भारत की यह यात्रा अभी अधूरी है। बढ़ते भारत की यह “ग्रोइंग पेन” की कहानी है; पुरानी ऊर्जा से नई, स्वच्छ और आत्मनिर्भर ऊर्जा की ओर एक साहसिक संक्रमण की।

 चुनाव संपन्न: अब चार तक, काटे नहीं कटते दिन और रात

बदलाव की आहट ने बढ़ाई सियासी हलचल

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

2 मई 2026

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चार मई को तय हो जाएगा ;  दीदी लौटेंगी या दादा के हाथ आएगी पश्चिम बंगाल की कमान। लेकिन तब तक बड़े-बड़े नेताओं के दिलों की धड़कनें बगावत पर उतारू हैं, और दिल्ली से कोलकाता तक सियासी गलियारों में बेचैनी का आलम है।

चुनाव तो कई प्रांतों में हुए हैं ;  पश्चिम बंगाल, केरल, असम, तमिलनाडु और पुदुचेरी , लेकिन सबकी निगाहें बंगाल पर टिकी हैं। 294 सीटों वाली इस विधानसभा में बहुमत का जादुई आंकड़ा 148 है, और इस बार की लड़ाई इसी आंकड़े के इर्द-गिर्द घूम रही है।

इस बार पश्चिम बंगाल में कुल 68,251,008 पंजीकृत मतदाताओं में से दोनों चरणों में औसत मतदान लगभग 91.57 प्रतिशत रहा। पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं: "इतनी बड़ी भागीदारी यह इशारा करती है कि जनता इस बार कुछ नया सोचकर आई है , शायद बदलाव की ओर।"

राज्य की राजनीति में इस बार सीधा मुकाबला सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच रहा। टीएमसी ने अपनी सामाजिक योजनाओं, महिला मतदाताओं, अल्पसंख्यक समर्थन और 'बंगाली अस्मिता' को ढाल बनाया। भाजपा ने भ्रष्टाचार, कानून-व्यवस्था, बेरोजगारी और 15 साल की सत्ता के विरुद्ध उठी थकान को अपना हथियार बनाया। वामपंथी दल और कांग्रेस इस बार हाशिये पर नज़र आए । 2021 में इनके संयुक्त मोर्चे को महज़ एक सीट मिली थी, हालाँकि उनका वोट-शेयर 117 सीटों पर जीत के अंतर से अधिक रहा था।

चुनाव प्रचार के दौरान एक बड़ा विवाद मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (SIR) को लेकर उठा, जिसमें अक्टूबर 2025 के बाद से लगभग 91 लाख मतदाताओं के नाम काटे गए — यानी कुल मतदाताओं का करीब 12 प्रतिशत। टीएमसी ने इसे राजनीतिक षड्यंत्र बताया, जबकि भाजपा ने इसे अवैध घुसपैठियों की सफाई करार दिया।


मतदान के बाद जारी एग्जिट पोल्स ने तस्वीर को और रोमांचक बना दिया है। रिपब्लिक टीवी के 'पोल ऑफ पोल्स' में भाजपा को 155 से 158 सीटें मिलती दिख रही हैं , बहुमत के आंकड़े से साफ ऊपर। अधिकांश एजेंसियाँ भाजपा को 146 से 175 सीटों के बीच रख रही हैं, जबकि टीएमसी 120 से 140 सीटों पर सिमटती नजर आ रही है। कुछ सर्वे टीएमसी को 177 से 195 सीटें भी देते हैं, जिससे साफ है कि सर्वे एकमत नहीं हैं।

उल्लेखनीय यह भी है कि एक्सिस माई इंडिया जैसी बड़ी एजेंसी ने इस बार बंगाल का एग्जिट पोल जारी नहीं किया, जिससे अटकलों का बाजार और गर्म है।

ममता बनर्जी ने सभी सर्वे खारिज करते हुए कहा कि उनकी पार्टी 226 से ज्यादा सीटें जीतेगी। दूसरी ओर भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी 180 से अधिक सीटों का दावा कर रहे हैं।

हालाँकि एग्जिट पोल्स हमेशा सही नहीं होते। 2021 में कई सर्वे गलत साबित हुए थे, जब भाजपा को बड़ी बढ़त दिखाने के बावजूद टीएमसी ने 215 सीटें जीती थीं। इस बार त्रिशंकु विधानसभा की संभावना पूरी तरह नकारी नहीं जा सकती।


उधर, असम में सत्तारूढ़ भाजपा गठबंधन के पक्ष में रुझान हैं। ज्यादातर सर्वे मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा की सरकार की वापसी के संकेत दे रहे हैं।

केरल में इस बार पारंपरिक ढर्रा टूटता दिख रहा है। मनोरमा न्यूज़-सीवोटर सर्वे में यूडीएफ को 82 से 94 सीटें और एलडीएफ को 44 से 56 सीटें मिलती दिख रही हैं। टुडेज़ चाणक्य का अनुमान है कि यूडीएफ 69, एलडीएफ 64 और भाजपा 7 सीटों के आसपास रहेगी। अगर ये रुझान सही निकले तो पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाला वाम मोर्चा लगातार दूसरी बार सत्ता में आने का रिकॉर्ड नहीं बना पाएगा।

तमिलनाडु में लोकल एक्टिविस्ट गोपाल कृष्णन के मुताबिक अधिकांश सर्वे डीएमके गठबंधन को बढ़त दे रहे हैं और मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन की वापसी की संभावना मजबूत दिखाई दे रही है। पुदुचेरी में एनडीए के पक्ष में संकेत हैं।

4 मई का इंतज़ार

4 मई की सुबह 8 बजे से मतगणना शुरू होगी। अगर बंगाल में भाजपा सत्ता में आई, तो यह 2011 के बाद पहली बार होगा जब ममता बनर्जी की पार्टी सत्ता से बाहर जाएगी। और अगर टीएमसी वापसी करती है, तो यह उन तमाम सर्वेक्षणों के मुँह पर एक और तमाचा होगा जो बंगाल की जनता को समझने का दावा करते हैं।

सस्पेंस अपने चरम पर है। चार मई का इंतज़ार है।

Thursday, April 30, 2026

 क्या कभी जूते भी सांस लेते हैं?

जंग की आंच से आगरा के जूतों की अटकने लगीं धड़कनें! 

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

1 मई, 2026

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आगरा का विश्वप्रसिद्ध फुटवियर हब इन दिनों एक ऐसे अभूतपूर्व संकट की चपेट में है, जिसने इस ऐतिहासिक शहर की आर्थिक रीढ़ को हिलाकर रख दिया है। पश्चिम एशिया के सुलगते मैदानों से उठी युद्ध की लपटें अब सात समंदर पार आगरा की उन तंग गलियों तक पहुँच चुकी हैं, जहाँ सदियों से जूतों के निर्माण की कला फलती-फूलती रही है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के छिन्न-भिन्न होने से निर्यात का पहिया थम सा गया है और अंतरराष्ट्रीय बाजारों से मिलने वाले नए ऑर्डर प्रभावित हो रहे हैं। इस भू-राजनीतिक अस्थिरता ने न केवल व्यापारिक मुनाफे को चोट पहुँचाई है, बल्कि उन लाखों हाथों को भी अनिश्चितता के अंधेरे में धकेल दिया है, जो हर सुबह उम्मीद के साथ कारखानों का रुख करते थे।

उद्योग के जानकारों और अनुभवी निर्यातकों का मानना है कि वर्तमान तनाव के कारण माल की आवाजाही लंबी देरी हो रही है। समुद्री रास्तों के असुरक्षित होने से माल ढुलाई की लागत में  वृद्धि हुई है, जिसने वैश्विक खरीदारों के बीच एक गहरा अविश्वास पैदा कर दिया है। सबसे गंभीर मार कच्चे माल की कीमतों पर पड़ी है। पेट्रोलियम उत्पादों से तैयार होने वाले कृत्रिम चमड़े और विभिन्न प्रकार के तलवों जैसे सिंथेटिक सामग्री की कीमतों में तीस प्रतिशत तक का उछाल आया है। यह वृद्धि उस उद्योग के लिए कमर तोड़ने वाली साबित हो रही है, जो पहले से ही अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के कारण बहुत ही कम मार्जिन पर काम करने को मजबूर था। अब स्थिति यह है कि उत्पादन की लागत और बिक्री मूल्य के बीच का संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका है।

आर्थिक आंकड़ों के आइने में देखें तो आगरा का फुटवियर उद्योग प्रतिवर्ष लगभग चार से पांच हजार करोड़ रुपये का विदेशी मुद्रा भंडार देश के लिए जुटाता है। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए कारोबारियों में इस बात का भारी भय व्याप्त है कि व्यापार में बीस से पच्चीस प्रतिशत की सीधी गिरावट आ सकती है। यदि युद्ध की यह स्थिति लंबी खिंचती है, तो नुकसान का यह आंकड़ा चालीस प्रतिशत तक भी पहुँच सकता है। यूरोप और अमेरिका जैसे संपन्न बाजारों तक पहुँचने में लगने वाले अतिरिक्त समय ने उत्पादन के पूरे चक्र को ही अस्त-व्यस्त कर दिया है। जब समय पर माल नहीं पहुँचता, तो विदेशी खरीदार अपने ऑर्डर रद्द कर देते हैं, जिससे न केवल आर्थिक क्षति होती है बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में आगरा की साख पर भी बट्टा लगता है।

इस संकट का सबसे मार्मिक और मानवीय पक्ष उन सूक्ष्म एवं लघु इकाइयों से जुड़ा है, जो इस पूरे उद्योग का आधार हैं। आगरा की लगभग पांच हजार छोटी इकाइयाँ आज अपनी उत्पादन क्षमता के न्यूनतम स्तर पर काम कर रही हैं। इन कारखानों में काम करने वाले साढ़े तीन से चार लाख श्रमिक आज असमंजस में हैं। सुबह की पहली किरण के साथ जिस शहर में मशीनों की घरघराहट और हथौड़ों की गूँज सुनाई देती थी, वहाँ अब एक अजीब सा सन्नाटा पसरने लगा है। कई छोटी कार्यशालाओं में काम आधा हो चुका है और मजदूरों को मजबूरी में छुट्टी पर भेजा जा रहा है। दूर देश में छिड़ी जंग की लहरें यहाँ के कारीगरों की रसोई तक पहुँच गई हैं, जिससे उनकी दैनिक आजीविका पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।

आगरा का जूता उद्योग केवल ईंट-पत्थर की फैक्ट्रियां नहीं, बल्कि एक जीवंत विरासत है जो मुगल काल से निरंतर चली आ रही है। पीढ़ी दर पीढ़ी कारीगरों ने अपने खून-पसीने से इस हुनर को सींचा है। भारत के कुल फुटवियर निर्यात में लगभग अट्ठाइस से तीस प्रतिशत का योगदान देने वाला यह शहर घरेलू बाजार की भी पैंसठ प्रतिशत मांग को पूरा करता है। आधुनिकता की दौड़ में यहाँ के कारीगरों ने खुद को बदला भी है और मशीनी तकनीक को हाथ की सफाई के साथ जोड़ा है। चीन और वियतनाम जैसे देशों के दबाव के बावजूद आगरा अपनी रचनात्मकता और छोटे ऑर्डरों को कुशलता से पूरा करने की क्षमता के कारण टिका हुआ है। भौगोलिक संकेतक अर्थात जीआई टैग मिलने से इस शहर की पहचान को एक नई संजीवनी मिली थी, लेकिन युद्ध के इस दौर ने उन तमाम कोशिशों पर पानी फेरने की चुनौती पेश की है।

आज जब हम भविष्य की ओर देखते हैं, तो जेवर के पास बन रहे नए हवाई अड्डे और प्रस्तावित फुटवियर पार्क जैसी बुनियादी ढांचागत योजनाएं उम्मीद तो जगाती हैं, लेकिन तात्कालिक चुनौतियां कहीं अधिक विकराल हैं। महंगे कर्ज, जटिल नियम और पर्यावरण संबंधी चिंताओं के बीच अब युद्ध की यह मार इस उद्योग के लिए 'करेला और नीम चढ़ा' वाली स्थिति बन गई है। फिर भी, इस शहर की मिट्टी में संघर्ष और सृजन का अद्भुत संगम है। यहाँ के युवा डिजाइनर और महिलाएं अब नए प्रयोगों के साथ इस संकट से निकलने की राह खोज रहे हैं। सवाल अब केवल आर्थिक लाभ का नहीं, बल्कि उस हुनर को बचाने का है जिसने सदियों से आगरा को दुनिया के नक्शे पर चमकाया है। ताजमहल को निहारने आने वाली दुनिया को शायद अब उन कारीगरों के हाथों के छालों और उनकी मेहनत को भी पहचानना होगा, क्योंकि हर जूते की जोड़ी के पीछे एक परिवार की जीवटता और संघर्ष की अनकही कहानी छिपी होती है।


Wednesday, April 29, 2026

 स्कूलों की दहलीज़ पर खून: जब मासूमियत हथियारों से हारने लगे

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

30 अप्रैल 2026

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एक खूनी लोहे का मुक्का… बस एक। और बचपन टूटकर बिखर गया।

स्कूल का गलियारा था, कोई जंग का मैदान नहीं। मगर उस दिन, सन्नाटा चीखों में बदल गया। भरोसा टूटा, और मासूमियत ज़मीन पर बिखर गई।

हम स्कूलों को सुरक्षित पनाहगाह समझते हैं। तहज़ीब और तालीम का घर। मगर 25 अप्रैल 2026 को आगरा के शास्त्रीपुरम स्थित दिल्ली पब्लिक स्कूल में जो हुआ, उसने इस  कल्पना को चूर-चूर  कर दिया। हिंसा ने दरवाज़ा नहीं खटखटाया, वो अंदर आई, और बेरहमी  से वार किया।

15 साल का एक लड़का। जबड़ा टूट गया। तीन दांत गिर गए। और जो सबसे ज्यादा ख़ौफ़नाक  है; हमले में कथित तौर पर मेटल नकल्स का इस्तेमाल हुआ। ये कोई अचानक भड़की हुई झड़प नहीं थी। ये सोचा-समझा हमला था। हथियार चुना गया, साथ लाया गया, और इस्तेमाल किया गया।

सवाल उठता है; क्या ये सिर्फ एक हादसा है? या फिर एक खतरनाक रुझान का इशारा?

हर बार की तरह, मामला अब फाइलों में दौड़ेगा। किशोर न्याय बोर्ड, सीसीटीवी फुटेज, जांच कमेटियां, सिस्टम अपनी रफ्तार से चलेगा। मगर आंकड़े कुछ और ही कहानी कहते हैं।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक, 2017 से 2022 के बीच कानून से टकराने वाले किशोरों की कुल संख्या घटी है। सुनने में राहत मिलती है। लेकिन असल हकीकत कहीं ज्यादा स्याह  है। इन मामलों में हिंसक अपराधों का हिस्सा लगभग दोगुना हो गया है—2016 में 32.5% से बढ़कर 2022 में 49.5%।

मतलब साफ है। अपराधी बच्चे कम हो रहे हैं, मगर जो हैं, वो ज्यादा खतरनाक हो गए हैं।

2025 तक ऐसे मामलों की संख्या 17,000 के पार जाने का अंदेशा  है। अब ये छोटी-मोटी शरारत नहीं रही। अब बात कत्ल, हथियारों से हमले और गंभीर जख्मों तक पहुंच चुकी है।

ये सिलसिला न इत्तेफाक  है, न ही कोई अपवाद । देशभर में क्लासरूम अब धीरे-धीरे संघर्ष के मैदान जैसे लगने लगे हैं।

कर्नाटक, मार्च 2026: 15 साल का छात्र, हॉस्टल में हमला। एक की मौत, कई घायल।

सूरत: क्लास 9 के छात्र को मामूली विवाद में चाकू मार दिया गया।

जमशेदपुर: 13 साल का बच्चा हथियार के साथ पकड़ा गया। वोट देने की उम्र नहीं, मगर हथियार उठाने का जज़्बा  पैदा हो चुका था।

दिल्ली: 18 साल का लड़का देशी पिस्तौल लेकर स्कूल पहुंचा, “बुलीज़ को डराने” के लिए।

भुवनेश्वर से लेकर उत्तराखंड तक, तस्वीर एक सी है। उम्र घट रही है, हिंसा बढ़ रही है। और नीयत ? वो और ज्यादा संगीन  हो रही है।

आख़िर ऐसा क्यों हो रहा है?

जवाब शायद उस  भावनात्मक खालीपन” में छिपा है, जिसमें आज का बच्चा पल रहा है। मां-बाप व्यस्त हैं। स्कूल दबाव में हैं। और असली बातचीत; वो गुम हो गई है।

जब बच्चा अपनी बात कह नहीं पाता, तो गुस्सा अंदर ही अंदर सड़ता है। और फिर एक दिन… वो फट पड़ता है।

आगरा का वो लड़का जिसने मेटल नकल्स इस्तेमाल किए; उसने अचानक फैसला नहीं लिया। उसने तैयारी की।

ये बदलाव डराता है। “बच्चे हैं, गलती हो गई” वाली बात अब पुरानी हो गई है। अब ये सोची-समझी क्रूरता है।

स्कूल अब सिर्फ पढ़ाने की जगह नहीं रह गए। शिक्षक अब गुरु कम, संकट प्रबंधक ज्यादा बनते जा रहे हैं। हर दिन एक नया खतरा, एक नई फिक्र।

और सिस्टम? हमेशा की तरह, रिएक्टिव।

कानून हैं; जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, पॉक्सो। मगर शुरुआती हस्तक्षेप की कोई मज़बूत व्यवस्था नहीं।

स्कूलों में काउंसलिंग? नाम मात्र। मानसिक स्वास्थ्य? एक खामोश  मुद्दा।

हमें उस गुस्से को समझना होगा, जो हथियार बनने से पहले पलता है।

ये जो दरारें हैं; ये एक्स-रे में नहीं दिखतीं।

आगरा का वो बच्चा शायद शारीरिक रूप से ठीक हो जाएगा। जबड़ा जुड़ जाएगा, दांत लग जाएंगे।

मगर अंदर जो टूटा है? उसका इलाज कौन करेगा?

जब स्कूल में डर बसने लगे, तो सीखने की जगह सिकुड़ जाती है। भरोसा उड़ जाता है।

हर आवाज़ पर चौंकना, हर चेहरे में शक देखना; ये जख्म बहुत गहरे होते हैं।

हमें इन घटनाओं को “अलग-अलग केस” समझना बंद करना होगा। ये एक बढ़ते हुए पैटर्न के टुकड़े हैं।

अगर हमने जड़ों को नहीं पकड़ा, हमदर्दी  की कमी, मानसिक सहारे की गैरमौजूदगी, और झगड़े सुलझाने की कला का खत्म होना; तो ये सिलसिला थमेगा नहीं।

असल सवाल ये नहीं कि “ये कैसे हुआ?”

असल सवाल ये है; हम कैसी दुनिया बना रहे हैं, जहां बच्चों को किताबों के बजाय हथियार उठाने की जरूरत महसूस हो रही है?

क्योंकि जब स्कूल सुरक्षित नहीं रहेंगे… तो फिर बचपन कहां बचेगा?

 आओ डांस करें

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नृत्य दिवस, 29 अप्रैल

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सीटी, पायल और सिनेमा: जब बॉलीवुड ने नृत्य को दी नई ज़िंदगी

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सीटी बजाती रेल दूर अंधेरे में गुम हो रही है। धुएं की लकीर हवा में तैरती है। कोठे की रोशनी में पायल छनकती है, और मीना कुमारी धीमे-धीमे थिरक उठती हैं।

पाकीज़ा का “यूँ ही कोई मिल गया था”: यह सिर्फ एक गीत नहीं, दर्द, नज़ाकत और तड़प का नृत्य है। जैसे हर कदम में एक अधूरी मोहब्बत सांस ले रही हो।

यहीं से समझ आता है; नृत्य केवल शरीर की गति नहीं, आत्मा की अभिव्यक्ति है।

इंसान नाचता है, जब खुशी छलकती है। और तब भी, जब भीतर कुछ टूटता है।

भारत में नृत्य भक्ति है, साधना है, तड़पन है, विरक्ति है। तांडव डराता है, रास लीला लुभाती है। हर नृत्य का रंग  गहरा है। नृत्य जीवन का हिस्सा है। और इस जीवन को सबसे ज्यादा गति, सबसे ज्यादा ऑक्सीजन, अगर किसी ने दी है, तो वह है बॉलीवुड, जहां हर कदम कहानी कहता है, हर थिरकन में भाव है, संदेश है। बॉलीवुड  में हर इशारा एक संवाद है। हर ठुमका एक कथानक।

फिल्म दिल से का “छैयां छैयां”, चलती ट्रेन पर शाहरुख खान का नृत्य, सिनेमा की सबसे साहसी कल्पनाओं में से एक है।

वहीं देवदास का “ढोला रे ढोला”, माधुरी दीक्षित और ऐश्वर्या राय के साथ शास्त्रीय सौंदर्य की जीवंत तस्वीर बन जाता है।

बॉलीवुड ने नृत्य को सिर्फ दिखाया नहीं, उसे जिया है, उसे कहानी का हिस्सा बनाया है। शास्त्रीय और लोक को नई सांस दी है।

एक समय था जब भरतनाट्यम, कथक और ओडिसी मंदिरों और विशेष मंचों तक सीमित थे।

फिल्मों ने इन्हें घर-घर पहुंचाया। अब ये सिर्फ परंपरा नहीं, लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा हैं।

लोक नृत्य भी फिल्मों में खिल उठे। घूमर, गरबा और भांगड़ा; इनकी मिट्टी की खुशबू अब दुनिया भर में महसूस होती है।

पद्मावत का घूमर हो या बाजीराव मस्तानी का “पिंगा”, बॉलीवुड ने लोक को ग्लैमर और पहचान दी।

भावनाओं का सबसे सच्चा रूप होता है नृत्य। नृत्य तब जन्म लेता है जब शब्द कम पड़ जाते हैं।

एक दूजे के लिए में कमल हासन का नृत्य, गुस्से और हताशा का विस्फोट है। हर हरकत में बेचैनी है।

वहीं गाइड में वहीदा रहमान का “आज फिर जीने की तमन्ना”, जैसे आत्मा को आज़ादी मिल गई हो।

बॉलीवुड ने इन भावनाओं को दृश्य बना दिया। उन्हें एक चेहरा दिया, एक लय दी।

और आजकल, कंटेंपरेरी शैलियां तो कमाल कर रही हैं।

बॉलीवुड नृत्य की सबसे बड़ी ताकत है उसका फ्यूजन।

यह परंपरा और आधुनिकता का संगम है, जहां कथक के चक्कर, भरतनाट्यम की मुद्राएं और लोक की ऊर्जा, ट्विस्ट, रॉक एंड रोल और हिप-हॉप के साथ मिलकर कुछ नया रचते हैं। मिथुन दा का डिस्को डांसर एक नए युग का आगाज था। 

तेज़ाब का “एक दो तीन”, इस फ्यूजन का क्लासिक उदाहरण है।

और आरआरआर का “नाटू नाटू”, जिसने ऑस्कर जीतकर दुनिया को भारतीय नृत्य की ताकत दिखाई।

टीवी शो जैसे डांस इंडिया डांस ने इस क्रांति को और गति दी। अब हर गली, हर शहर से नर्तक उभर रहे हैं।

नृत्य जो कभी थमता नहीं

बॉलीवुड ने नृत्य को सिर्फ मंच नहीं दिया, उसे जीवन दिया।

हर फिल्म, हर गीत, एक नई सांस है, एक नया विस्तार।

और शायद यही इसकी सबसे बड़ी खूबसूरती है; यह बदलता है, लेकिन अपनी जड़ों को नहीं छोड़ता। जब भी कहीं संगीत बजता है, जब भी दिल में कोई लहर उठती है; नृत्य जन्म लेता है। क्योंकि नृत्य…सिर्फ देखा नहीं जाता, महसूस किया जाता है।

Tuesday, April 28, 2026

 जामनगर दूर गुजरात में है, पर जाम-ए-फजीहत ताज नगरी में!

लाइफ इन आगरा,  अपनी ही सड़कों में कैद

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

29 अप्रैल 2026

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ताज की चमक धुंधली क्यों है? जवाब हवा में नहीं, सड़कों पर अटका है। आगरा आज किसी शहर से ज़्यादा एक लंबा, अंतहीन जाम लगता है; जहाँ समय भी रेड लाइट पर खड़ा-खड़ा दम तोड़ देता है।

यह वही शहर है जहाँ कभी तांगे की टापें थीं, जहाँ सफर का मतलब सुकून था। आज वही आगरा अपनी ही रफ्तार के बोझ तले कराह रहा है। ताज महल की परछाई में खड़ा यह शहर अब पर्यटकों को इतिहास नहीं, हताशा का अनुभव देता है।

पाँच मिलियन से ऊपर जाती आबादी। बीस लाख से ज्यादा वाहन। ऊपर से एक्सप्रेसवे का ट्रैफिक। नतीजा? शहर नहीं, धड़कन रुकती हुई एक मशीन।

एमजी रोड से लेकर भगवान टॉकीज चौराहा। यमुना किनारा रोड से सुल्तानगंज पुलिया। हर रास्ता एक ही कहानी कहता है: “आगे जाम है।” यह जाम अब अस्थायी समस्या नहीं, स्थायी पहचान बन चुका है।

और यह सिर्फ गाड़ियों का जमावड़ा नहीं। यह समय की चोरी है। रोज़ाना की लूट।

स्कूल के बच्चे बसों में बैठकर धुएँ को फेफड़ों में भरते हैं। ऑफिस जाने वाले लोग अपनी आधी ऊर्जा सड़क पर ही गंवा देते हैं। एक किलोमीटर का सफर, आधे घंटे का संघर्ष बन जाता है।

विडंबना देखिए। आगरा को आधुनिक बनाने के लिए बनाए गए यमुना एक्सप्रेसवे और Agra–Lucknow Expressway अब शहर के लिए आफत बन गए हैं। ये हाई-स्पीड रास्ते ट्रैफिक को सीधे शहर के दिल में उगल देते हैं, उस दिल में जो पहले ही बीमार है।

समस्या सिर्फ गाड़ियों की संख्या नहीं है। समस्या सोच की है।

शहर की सड़कों को इंसानों के लिए नहीं, मशीनों के लिए डिजाइन किया गया। फुटपाथ? या तो हैं ही नहीं, या फिर दुकानों और ठेलों के कब्जे में हैं। पैदल चलना यहाँ साहस का काम है।

और अगर आप साइकिल चला रहे हैं, तो खुद को भाग्यशाली समझिए अगर घर सुरक्षित लौट आएं।

इस अराजकता में ट्रैफिक प्लानिंग मज़ाक बन चुकी है। कहीं भी यू-टर्न। कहीं भी कट। कोई स्पष्ट वन-वे सिस्टम नहीं। हर मोड़ एक जाल है, हर चौराहा एक जंग का मैदान।

ऊपर से “पार्किंग संस्कृति”।

गाड़ी खरीदना आसान। उसे रखने की जगह? कोई पूछने वाला नहीं। सड़कें अब सार्वजनिक नहीं रहीं। वे निजी गैरेज बन चुकी हैं।

और जब व्यवस्था की बात आती है, तो तस्वीर और भयावह हो जाती है।

चौराहों पर पुलिस गायब। जहाँ है, वहाँ व्यस्त, मोबाइल स्क्रीन में। ट्रैफिक खुद को संभालने के लिए छोड़ दिया गया है, जैसे कोई अनाथ बच्चा।

इस शहर की त्रासदी यहीं खत्म नहीं होती।

यहाँ ट्रैफिक सिर्फ इंसानों का नहीं है। बंदर, कुत्ते, गाय: सब सड़क के खिलाड़ी हैं। नियम? किसी के लिए नहीं। पैदल चलने वाला नागरिक दोहरी मार झेलता है; एक तरफ बेकाबू गाड़ियाँ, दूसरी तरफ अनियंत्रित जानवर।

बुजुर्गों के लिए यह शहर अब डर का पर्याय बन गया है। बिना गाड़ी के निकलना, जैसे किसी युद्ध क्षेत्र में प्रवेश करना।

सबसे बड़ा दोषी कौन? जवाब भी उतना ही उलझा हुआ है जितना ट्रैफिक।

नगर निगम, विकास प्राधिकरण, टीटीजेड: हर संस्था अपनी दिशा में खींच रही है। कोई एकीकृत योजना नहीं। कोई स्पष्ट नेतृत्व नहीं। परिणाम: नीतिगत लकवा।

शहर की सड़कों पर जो अराजकता दिखती है, वह दरअसल प्रशासनिक विफलता का आईना है।

और इस सबके बीच, सबसे बड़ा सवाल खड़ा है: क्या आगरा सिर्फ कारों के लिए जिएगा या इंसानों के लिए?

आज प्राथमिकता गाड़ियों को दी जा रही है। इंसान पीछे छूट गया है।

पैदल चलने वाला, साइकिल चलाने वाला; ये इस शहर के “अदृश्य नागरिक” बन चुके हैं।

अगर यही हाल रहा, तो आगरा सिर्फ जाम का शहर बनकर रह जाएगा, जहाँ इतिहास धुएँ में घुटता है और भविष्य हॉर्न की आवाज़ में खो जाता है।

समाधान क्या है?

पहला कदम: सोच बदलना। ट्रैफिक नहीं, मोबिलिटी की बात करनी होगी।

फुटपाथ वापस लेने होंगे। पब्लिक ट्रांसपोर्ट को मजबूत करना होगा।

गाड़ियों पर नियंत्रण। पार्किंग नियम सख्त।

और सबसे जरूरी, इंसान को केंद्र में रखना होगा। क्योंकि शहर गाड़ियों से नहीं बनते। शहर लोगों से बनते हैं।

 ब्रह्मांड का लोकप्रिय संत: नारद मुनि की लीला और हलचल की राजनीति

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बृज खंडेलवाल द्वारा

29 अप्रैल 2026

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कहानी शुरू होती है एक मुस्कान से।

हाथ में तंबूरा, होंठों पर “नारायण, नारायण”, और आंखों में चमक, जैसे कोई राज़ अभी-अभी जन्मा हो।

नारद मुनि, देवताओं के बीच संवाददाता, ऋषियों के बीच सलाहकार, और कथाओं के भीतर वह चिंगारी, जो आग भी लगाती है और उजाला भी करती है। उन्हें यूँ ही “ब्रह्मांड का पहला पत्रकार” नहीं कहा जाता। वे खबर नहीं सुनाते, खबर बनाते हैं।

और कमाल देखिए, बिना तलवार उठाए, बिना युद्ध छेड़े।

सिर्फ शब्दों से।

नारद मुनि की असली ताकत उनका संवाद है। वे जानते हैं, कब क्या कहना है, किससे क्या छिपाना है, और किस बात में कितना “मसाला” डालना है। वे झूठ नहीं बोलते, बस सच को इस अंदाज़ में पेश करते हैं कि सामने वाला बेचैन हो उठे। एक आधा-सच, एक हल्की चिंगारी, और फिर घटनाओं की ऐसी श्रृंखला शुरू होती है, जिसे रोकना किसी के बस में नहीं रहता।

राजा को धैर्य की सलाह भी इस तरह देंगे कि वह घबरा जाए।

देवी को किसी और के गहनों की तारीफ इस तरह बताएंगे कि तुलना की आग सुलग उठे।

ये शरारत नहीं, रणनीति है।

नारद मुनि उस “पुश-नोटिफिकेशन” की तरह हैं, जो समय पर आकर पूरी कहानी का रुख बदल देता है। वे सिर्फ संदेशवाहक नहीं, वे उत्प्रेरक हैं, कहानी को धक्का देने वाले, पात्रों को आईना दिखाने वाले।

कभी-कभी वे अराजकता भी पैदा करते हैं।

लेकिन वह अराजकता अंधेरी नहीं होती; उसमें बदलाव की रोशनी छिपी होती है।

उनका मशहूर “नारायण, नारायण” सिर्फ एक जप नहीं, एक ढाल है। जैसे कोई मासूम बनकर कह रहा हो; “मैं तो बस कह गया, अब आप जानें।” और फिर वे किनारे बैठकर पूरे घटनाक्रम को ऐसे देखते हैं, जैसे कोई अनुभवी समीक्षक फिल्म का क्लाइमैक्स देख रहा हो।

यही कारण है कि कथाओं में नारद मुनि न तो खलनायक हैं, न ही नायक।

वे उस बीच की जगह पर खड़े हैं, जहां से कहानी जन्म लेती है।

बॉलीवुड ने भी इस किरदार की ताकत को जल्दी पहचान लिया।

हर पौराणिक फिल्म में एक ऐसा चरित्र चाहिए होता है, जो कहानी को आगे बढ़ाए, जो नायक को मुश्किल में डाले, ताकि वह कुछ सीख सके। नारद मुनि वही “इनसाइडर” हैं, जो हल्की सी ठोकर देकर नायक को रास्ता दिखाते हैं।

वे साज़िश नहीं रचते, वे परिस्थितियाँ गढ़ते हैं।

वे टकराव पैदा करते हैं, लेकिन उस टकराव से ही समाधान जन्म लेता है।

सोचिए, अगर नारद न होते, तो कितनी कथाएं अधूरी रह जातीं?

कितने प्रेम, कितनी ईर्ष्याएं, कितने युद्ध, शायद कभी घटित ही न होते।

उनकी सबसे बड़ी खासियत उनकी नीयत है।

वे उथल-पुथल मचाते हैं, पर अंत में संतुलन लाते हैं। वे रिश्तों को उलझाते हैं, ताकि वे और मजबूत बन सकें।

आज के दौर में, जब शब्द हथियार बन चुके हैं, नारद मुनि एक आईना भी हैं और चेतावनी भी।

वे बताते हैं, एक वाक्य, एक संकेत, एक अफवाह… कितना बड़ा तूफान खड़ा कर सकती है।

और फिर मुस्कुराते हुए याद दिलाते हैं, 

कभी-कभी, थोड़ा सा व्यवधान ही सबसे बड़ा सुधार लाता है।

नारद मुनि इसलिए अमर हैं।

क्योंकि वे हमें सिखाते हैं, कहानी चलाने के लिए,

थोड़ी शरारत…

और बहुत समझदारी चाहिए।

 

Monday, April 27, 2026

 ग्रीन से ब्राऊन हो रही ब्रज भूमि!

काग़ज़ी जंगलों के साए में सुलगता भारत

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बृज खंडेलवाल द्वारा

28 अप्रैल 2026

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श्री कृष्ण राधा की लीलाभूमि हरे से भूरी, काली, क्यों हो रही है? पक्षियों का कलरव बेसुरा क्यों लग रहा है? नदी, तालाब, कुएं गुमसुम क्यों हैं?

सुबह की पहली रोशनी जब यमुना के खामोश सतह पर या सूर सरोवर (कीठम झील) पर उतरती है, तो पानी में अजीब सी बेचैनी की कशिश का एहसास होता है। पक्षियों की आवाज़ें कम हैं, पेड़ों की छाँव पतली है, और हवा में एक अदृश्य घुटन है। दूर से सब हरा दिखता है। पास जाइए तो हरियाली के भीतर एक धीमी तबाही साँस ले रही होती है। यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं। यह इंसानी उदासीनता का दस्तावेज़ है; हरे काग़ज़ पर लिखा हुआ, मगर ज़मीन पर जलता हुआ।

जब पर्यावरणविद् डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य ने इस क्षेत्र से विलायती बबूल हटाने की माँग को लेकर  कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया, तो उन्होंने केवल एक पौधे का सवाल नहीं उठाया। उन्होंने उस सुस्त, सुन्न और सुविधाजनक शासन-व्यवस्था को कटघरे में खड़ा किया, जिसने एक विदेशी आक्रामक प्रजाति को हमारी सबसे संवेदनशील आर्द्रभूमियों में जड़ें जमाने दीं। सालों तक सब देखते रहे। कोई हिला नहीं। एक नागरिक अदालत पहुँचा, तब आशा है कहीं फाइलें खुलेगी, सवाल पूछे जाएंगे, और शायद एक्शन भी होगा।

विलायती बबूल, नाम भले विदेशी लगे, इसका असर विनाशकारी है। यह पेड़ नहीं, एक पारिस्थितिक हमलावर है। यह भूजल को बेरहमी से खींचता है, देशी पौधों को दबा देता है, और पक्षियों के घर उजाड़ देता है। जो ज़मीन कभी विविधता से भरी थी, वहाँ अब एकरूपता की वीरानी पसरी है। रामसर सूची में दर्ज यह आर्द्रभूमि किसी बाढ़ या सूखे से नहीं, बल्कि फाइलों में सोती सरकार से मर रही है।

लेकिन यह कहानी सिर्फ एक झील की नहीं। यह उस बड़े छल की कहानी है, जो पिछले दो दशकों से देश को सुनाया जा रहा है; हरियाली का भ्रम, विकास का मुखौटा।

साल 2001 में एक खामोश बदलाव हुआ। “वन” की परिभाषा बदल दी गई। अब कोई भी ज़मीन, जहाँ 10 प्रतिशत पेड़ हों; चाहे वह बाग हो, व्यावसायिक प्लांटेशन हो या सजावटी हरियाली: उसे “वन” माना जाने लगा। बस, यहीं से खेल शुरू हुआ। काग़ज़ों पर जंगल बढ़ने लगे। रिपोर्टें चमकने लगीं। सरकारें, चाहे कांग्रेस की हों या भाजपा की, इन आँकड़ों को ढाल बनाकर पर्यावरण-रक्षक होने का दावा करती रहीं।

ज़मीन पर क्या हुआ? असली जंगल चुपचाप कटते रहे। सड़कें बढ़ीं, रेल लाइनें बिछीं, शहर फैले। और बदले में जो उगा, वह जंगल नहीं था; वह हरियाली का एक सस्ता विकल्प था। नीलगिरी के कतारबद्ध यूकेलिप्टस पेड़, या विलायती बबूल के झुंड, ये जंगल नहीं होते। इनमें न छाया की गहराई होती है, न जीवन की परतें। ये नदियों को नहीं बचाते, हवा को नहीं ठंडा करते, न ही जीव-जंतुओं को घर देते हैं। लेकिन स्प्रेडशीट में ये हरे दिखते हैं। और सरकार को श्रेय मिल जाता है।

इस भ्रम का सबसे खतरनाक पड़ाव 2023 में आया, जब “डीम्ड फॉरेस्ट्स” से कानूनी सुरक्षा हटा दी गई। एक झटके में, वे ज़मीनें जो वर्षों से अदालतों के आदेशों से सुरक्षित थीं, खुली छूट में आ गईं। नतीजा, कटाई तेज़ हुई, हरे गलियारे टूटे, और प्रकृति का संतुलन और डगमगाया।

क्या यह संयोग है कि उत्तर भारत अब हर साल रिकॉर्ड तोड़ गर्मी झेल रहा है? क्या यह महज़ मौसम का खेल है कि बाढ़ और सूखा एक ही भूगोल में बारी-बारी से दस्तक देते हैं? या यह उसी “काग़ज़ी हरियाली” का परिणाम है, जिसने असली जंगलों की जगह ले ली?

जल संकट इस आग में घी का काम कर रहा है। नदियों के कैचमेंट सिकुड़ रहे हैं। बारिश का पानी ज़मीन में उतर नहीं पा रहा। भूजल खाली हो रहा है: तेज़, लगातार। और विलायती बबूल जैसी प्रजातियाँ इस संकट को और गहरा कर रही हैं। उनकी जड़ें धरती के भीतर तक जाकर पानी खींच लेती हैं, जैसे कोई प्यासा आख़िरी बूंद तक चूस ले। शहरों के नल सूख रहे हैं। गाँवों के कुएँ जवाब दे रहे हैं।

लेकिन नीतियाँ? वही पुराना राग: और निर्माण करो, और प्लांटेशन लगाओ, और काग़ज़ हरा करो।

पर्यटन ने इस जख्म को और चौड़ा कर दिया है। जहाँ कभी नियंत्रित, संवेदनशील पर्यटन होता था, वहाँ अब भीड़ का मेला है। मथुरा वृंदावन में पर्यटक वाहनों की संख्या सौ गुना बढ़ चुकी है। प्रकृति के नाम पर व्यापार फल-फूल रहा है। स्थानीय ठेकेदार, आतिथ्य उद्योग और राजनीतिक दलाल, सब इस खामोश लूट में हिस्सेदार हैं। और प्रशासन? वह दर्शक बना बैठा है।

डॉ. भट्टाचार्य की याचिका कोई असंभव माँग नहीं रखती। वह कहती है, विलायती बबूल को वैज्ञानिक तरीके से हटाओ, देशी प्रजातियाँ लगाओ, और एक स्वतंत्र निगरानी तंत्र बनाओ। यह न्यूनतम है। यह बुनियादी है। लेकिन असल सवाल इससे बड़ा है: क्या सरकार सच को स्वीकार करेगी? क्या वह आँकड़ों के इस खेल से बाहर आएगी?

क्योंकि अगर नहीं, तो आने वाली पीढ़ियाँ एक अजीब विरासत पाएँगी। उनके पास रिपोर्टें होंगी, ग्राफ होंगे, उपलब्धियों के दावे होंगे। लेकिन जब वे पेड़ के नीचे खड़े होंगे, तो छाँव नहीं मिलेगी। जब वे नदी के किनारे जाएँगे, तो पानी नहीं मिलेगा।

उनके पास “वन क्षेत्र” होगा; पर जंगल नहीं। और तब शायद वे पूछेंगे, क्या हमने सचमुच विकास किया था, या सिर्फ़ काग़ज़ हरा किया था?

Saturday, April 25, 2026

 क्या यह सिर्फ़ चुनावी जीत है, या भारत में हिंदू चेतना का पुनर्जागरण?

गैर-हिंदी राज्यों में बढ़ता वोट-प्रतिशत क्या किसी बड़े बदलाव की दस्तक है?

विभाजन के खून से ‘भगवा उभार’ तक: बदलते भारत की सियासी कहानी

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

26 अप्रैल, 2026

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1947 :  एक लकीर खिंची। नक्शे पर भी, दिलों पर भी। भारत का विभाजन ने उपमहाद्वीप को धर्म के नाम पर दो टुकड़ों में बाँट दिया। मुहम्मद अली जिन्ना की दो-राष्ट्र की सोच ने साफ़ कहा: हिंदू और मुसलमान दो अलग सभ्यताएँ हैं। नतीजा भयावह था। खून-खराबा। अफरा-तफरी। लाखों लाशें। करोड़ों बेघर।

लेकिन आज़ादी के बाद एक दूसरी कहानी गढ़ी गई। सत्ता ने धर्म को निजी मामला घोषित कर दिया; कम से कम बहुसंख्यक हिंदुओं के लिए।

वहीं, अल्पसंख्यकों के लिए धर्म धीरे-धीरे सार्वजनिक नीति और राजनीति का हिस्सा बन गया।

यहीं से शुरू हुआ वह दौर जिसे आलोचक “छद्म-धर्मनिरपेक्षता” कहते हैं। बराबरी का तराजू था, मगर अक्सर वोट-बैंक के बोझ से झुका हुआ।

1985 में यह सच खुलकर सामने आया। शाह बानो मामला ने एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला को गुज़ारा भत्ता देने का रास्ता खोला। अदालत ने संविधान की बात की, इंसाफ़ की बात की।

फिर राजनीति ने दस्तक दी। राजीव गांधी की सरकार ने कानून बदल दिया। 

सवाल उठे। 

क्या कानून सबके लिए बराबर है?

या वह चुनावी गणित के हिसाब से बदलता है?

इसी बीच, अयोध्या धीरे-धीरे एक प्रतीक बनता गया। 1949 में मूर्तियाँ प्रकट हुईं। 1986 में ताले खुले। फिर शुरू हुई लंबी कानूनी जंग। 1990 के दशक में यह मुद्दा जन-आंदोलन बन गया। लाल कृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा ने इसे देश के कोने-कोने तक पहुँचा दिया।

और 6 दिसंबर 1992। बाबरी मस्जिद विध्वंस ने देश की राजनीति को झकझोर दिया। हिंसा हुई। बहस हुई। लेकिन एक बात साफ़ हो गई; हिंदू पहचान अब दबकर नहीं रहेगी।

राजनीति ने करवट ली। भारतीय जनता पार्टी धीरे-धीरे हाशिए से निकलकर मुख्यधारा में आ गई।

1984 में 2 सीटें। 1989 में 88 सीटें।

फिर लगातार विस्तार।

2014 में निर्णायक बदलाव आया।

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत।

नारा था; “सबका साथ, सबका विकास।” लेकिन इसके पीछे एक और परत थी: सांस्कृतिक आत्मविश्वास।

2019 में अनुच्छेद 370 का निरसन।

उसी वर्ष नागरिकता संशोधन अधिनियम।

और 2024 में राम मंदिर का उद्घाटन।

समर्थकों के लिए यह ऐतिहासिक न्याय है। आलोचकों के लिए यह बहुसंख्यक वर्चस्व का संकेत।

सच शायद दोनों के बीच कहीं खड़ा है।

लेकिन असली कहानी अब उत्तर भारत से बाहर लिखी जा रही है: गैर-हिंदी राज्यों में।

पश्चिम बंगाल में भाजपा का वोट-प्रतिशत लगातार बढ़ रहा है।

असम में उसने अपनी पकड़ मजबूत की है।

यह सिर्फ़ सीटों का खेल नहीं है।

यह सामाजिक बदलाव का संकेत है।

दक्षिण भारत में तस्वीर अलग जरूर है, लेकिन स्थिर नहीं।

तमिलनाडु और केरल में भाजपा बढ़त ले चुकी  है,  युवा मतदाताओं में उसकी स्वीकार्यता धीरे-धीरे बढ़ रही है।

यह बदलाव क्यों?

एक वजह है: उभरता हुआ मध्यम वर्ग। वह अब सिर्फ़ रोज़गार नहीं चाहता। वह पहचान और आत्मसम्मान भी चाहता है।

दूसरी वजह: सुरक्षा और स्थिरता का वादा।

तीसरी: सांस्कृतिक पुनर्प्रस्तुति।

मंदिर, त्योहार, प्रतीक: अब सिर्फ़ परंपरा नहीं, राजनीति का हिस्सा बन चुके हैं।

और सबसे अहम: “पीड़ित बहुसंख्यक” की भावना का क्षरण।उसकी जगह ले रहा है एक नया आत्मविश्वास।

क्या यह सचमुच हिंदू पुनर्जागरण है?

इतिहास बताता है, पुनर्जागरण सिर्फ़ धर्म का नहीं होता।

वह पहचान, सत्ता और मनोविज्ञान का संगम होता है। भारत में जो हो रहा है, वह कुछ वैसा ही दिखता है। धर्म अब सिर्फ़ आस्था नहीं रहा; वह राजनीतिक ऊर्जा में बदल चुका है।

लेकिन हर उभार अपने साथ जोखिम भी लाता है। क्या यह समावेशी रहेगा? या नई दीवारें खड़ी करेगा?

आज का भारत एक चौराहे पर खड़ा है।

एक रास्ता: सांस्कृतिक आत्मविश्वास के साथ समावेश।

दूसरा: पहचान की टकराहट और ध्रुवीकरण।

फैसला जनता करेगी। लेकिन संकेत साफ़ हैं। हवा बदल रही है।

और इस बार उसकी दिशा सिर्फ़ दिल्ली तय नहीं कर रही, कोलकाता, गुवाहाटी, चेन्नई और तिरुवनंतपुरम भी इस नई हवा को आकार दे रहे हैं।


Friday, April 24, 2026

 AI का तूफ़ान या बाज़ार का बहाना? असली चोट कहाँ लगी है।

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बाज़ार में सन्नाटा है, पर शोर बहुत है।

कहीं कंपनियाँ गिर रही हैं, कहीं कहानियाँ गढ़ी जा रही हैं।

और इस पूरे खेल में एक नाम बार-बार उछलता है: AI.

पर सच यह है कि हर गिरती दीवार के पीछे तूफ़ान नहीं होता… कभी-कभी नींव ही कमजोर होती है।

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

25 अप्रैल 2026 

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एक दावा हवा में तैर रहा है,  बहुत सारी व्यावसायिक कंपनियाँ मर रही हैं, और कातिल है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, यानी AI.

कहा जा रहा है कि Chegg (एक ट्यूशन, होमवर्क कराने वाली संस्था) लगभग खत्म है। अपने चरम (2021 में ~$108 प्रति शेयर) से 99% नीचे गिर चुका है। 2025 में कंपनी ने 45% कर्मचारियों (388 लोगों) की छंटनी की और “new realities of AI” को वजह बताया। छात्र अब ChatGPT जैसे फ्री टूल्स से होमवर्क सॉल्यूशन ले रहे हैं। Chegg की Q4 2025 राजस्व 49% गिरकर $72.7 मिलियन रह गया। पहले जो टेक्स्टबुक किराए, Chegg Study, एक्सपर्ट जवाब और ट्यूटरिंग का बिज़नेस था, वह अब AI के सस्ते-तेज़ विकल्पों से दबाव में है।

सुनने में सीधा-सपाट। पर सच इतना सीधा कब होता है?

सूची लंबी है। Fiverr का स्टॉक 2026 में 35-49% तक गिरा, AI के कारण लो-एंड गिग वर्क पर दबाव बढ़ने से। Duolingo अपने पीक से 83% नीचे आया, क्योंकि AI भाषा सीखने के कुछ हिस्सों को आसान बना रहा है। Getty Images और Shutterstock भी हिले, AI इमेज जेनरेटर (जैसे DALL-E, Midjourney) के आने से क्रिएटिव सेगमेंट पर असर पड़ा, जिसके जवाब में दोनों कंपनियाँ 2025 में $3.7 बिलियन के मर्जर की बात कर रही हैं और खुद AI टूल्स लॉन्च कर रही हैं। Pearson और अन्य edtech प्लेयर्स के शेयर भी 30-40% तक गिरे।

तो क्या यह सब “AI का कत्लेआम” है?

सच थोड़ा कड़वा है। और थोड़ा पेचीदा भी।

पहली बात :  शेयर गिरना और कंपनी मरना दो अलग बातें हैं। बाज़ार डर से चलता है। निवेशक भविष्य सूंघते हैं ,  कभी सही, कभी हवा में। Chegg अब स्किलिंग और प्रोफेशनल कोर्सेज की तरफ मुड़  रहा है, उम्मीद है कि यह नया क्षेत्र डबल-डिजिट ग्रोथ देगा।

दूसरी बात: AI ने दरवाज़ा ज़रूर तोड़ा है। जानकारी अब जेब में है। पहले जो “पेड नॉलेज” था, वह अब “फ्री कन्वर्सेशन” बन गया। होमवर्क हेल्प, बेसिक कंटेंट राइटिंग, ट्रांसलेशन और सिंपल इमेज क्रिएशन पर दबाव है।

पर क्या इससे बिज़नेस हमेशा के लिए खत्म हो जाते हैं? या सिर्फ बदल जाते हैं?

समय के साथ रास्ते और दिशाएं बदलती हैं।

जब Google आया, तो क्या किताबें खत्म हो गईं? नहीं। जब कैमरा फोन (2007 में iPhone) आया, तो क्या प्रोफेशनल फोटोग्राफर गायब हो गए? नहीं। Kodak जैसी कंपनियाँ जो पुराने मॉडल पर अड़ी रहीं, वे टूटीं। लेकिन जो अनुकूलित हुए, वे मजबूत बने। फोटोग्राफी आज भी फल-फूल रही है ;  सिर्फ फॉर्म बदल गया।

Chegg की मुश्किल सिर्फ AI नहीं है। उसका मूल मॉडल ,  रेडीमेड जवाब और परीक्षा-केंद्रित संस्कृति ,  पहले से ही सवालों में था। AI की लहर ने सिर्फ दीवारें हिला दीं।

फ्रीलांस प्लेटफॉर्म्स (Fiverr, Upwork) की कहानी भी यही है। सस्ता, रूटीन काम AI कर सकता है। लेकिन गहरी समझ, क्रिएटिविटी, रणनीति, कल्चरल कॉन्टेक्स्ट और जटिल प्रोजेक्ट्स अभी भी मानवीय ताकत मांगते हैं। Fiverr खुद अब हाई-वैल्यू वर्क और AI-native टूल्स पर फोकस कर रहा है।

स्टॉक इमेज कंपनियाँ क्यों हिलीं? क्योंकि AI अब तस्वीर बना सकता है। लेकिन ब्रांडेड, लाइसेंस्ड, लीगल रूप से सुरक्षित, इंडेम्निफाइड कंटेंट की ज़रूरत खत्म नहीं हुई। Getty और Shutterstock अब खुद AI जनरेशन ऑफर कर रहे हैं ;  लेकिन ट्रेनिंग उनके ही लाइसेंस्ड डेटा पर, ताकि कमर्शियल यूज सुरक्षित रहे।

यहाँ असली खेल “वैल्यू” का है। जो सिर्फ जानकारी बेच रहा था → फिसलेगा।  जो समझ, अनुभव, भरोसा, संदर्भ और मानवीय स्पर्श बेचता है → टिकेगा और बढ़ेगा।

यहीं भारत के लिए एक बड़ा मौका छिपा है। सस्ती, समझदार और स्थानीय समाधान देने में भारत का कोई सानी नहीं।  लेकिन शॉर्ट नोट्स, कुंजियां, guess papers, guide बनाने वाले प्रकाशकों के लिए खतरे की घंटी बज चुकी है। ट्यूशन बाजार भी ढीला पड़ेगा। बहुत से डॉक्टर्स की पोल खुलने को धरी है। AI prescriptions जांचेगा, tests की जरूरत भी मॉनिटर करेगा। पुराने नए पर्चों की मिलान करेगा।

टेलीमेडिसिन, किफायती हेल्थ काउंसलिंग, AI-सहायता प्राप्त शिक्षा (खासकर हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं में), और छोटे निवेशकों के लिए सरल वित्तीय सलाह :  ये क्षेत्र हैं जहाँ भारतीय प्रोफेशनल्स कम लागत में हाई-रिलेवेंस मॉडल बना सकते हैं। IndiaAI Mission के तहत हेल्थकेयर और एजुकेशन में sovereign AI मॉडल्स पर काम चल रहा है, जो लोकल डेटा और भाषाओं पर ट्रेन हो रहे हैं। AI यहाँ दुश्मन नहीं, साझेदार है,  डॉक्टर, शिक्षक और सलाहकार को और सक्षम बनाता है, उन्हें बदलने के बजाय उनके हाथ मजबूत करता है। छोटे शहरों से वैश्विक बाज़ार तक “लो-कॉस्ट, हाई-रिलेवेंस” सेवाएँ हमारी ताकत बन सकती हैं।

डर का धंधा खूब चलता है। “AI सब खा जाएगा” ,  यह हेडलाइन बिकती है। पर ज़मीन पर तस्वीर अलग है। AI एक औज़ार है। हथौड़ा है। घर भी बना सकता है, उंगली भी कुचल सकता है।

सवाल यह नहीं कि AI आएगा या नहीं।  

सवाल यह है: आप क्या बेच रहे हैं?

अगर जवाब है “सिर्फ जानकारी”, तो खतरा सामने खड़ा है।  

अगर जवाब है “समझ, संदर्भ, अनुभव और मानवीय स्पर्श”, तो खेल अभी बाकी है।

तकनीक तूफान है।  

पर हर तूफान के बाद, कुछ पेड़ और मज़बूत खड़े मिलते हैं।

अब देखना यह है: आप पेड़ हैं या पत्ते।

Thursday, April 23, 2026

 यमुना की कराह: ब्रज में आस्था पर गंदगी का साया

NGT का सख्त कदम

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

24 अप्रैल 2026

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हाल ही में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने आखिरकार नींद तोड़ी। उसने जल शक्ति मंत्रालय, उत्तर प्रदेश सरकार, मथुरा-वृंदावन नगर निगम, विकास प्राधिकरण और प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को नोटिस थमाया। वजह साफ है: यमुना की बिगड़ती हालत। यह कदम देर से आया, मगर जरूरी था।

यह मामला विजय किशोर गोस्वामी की याचिका से उठा। वे ब्रज वृंदावन देवालय समिति के संयुक्त सचिव हैं और श्री राधा मदन मोहन मंदिर के मुख्य सेवायत भी। उन्होंने साफ कहा; 17 दिसंबर 2021 के आदेशों की खुलेआम अवहेलना हुई है। तब ट्रिब्यूनल ने सीवेज ट्रीटमेंट सुधारने, अतिक्रमण हटाने और किनारों पर हरियाली बढ़ाने का हुक्म दिया था। लेकिन हकीकत वही ढाक के तीन पात। गंदा पानी आज भी बेखौफ बह रहा है। यमुना का दम घुट रहा है।

यह सिर्फ पर्यावरण का मसला नहीं है। यह तहज़ीब का सवाल है। करोड़ों लोगों के लिए यमुना सिर्फ नदी नहीं, “माँ यमुना” है। यही ब्रज की रगों में बहती है। यहीं श्रीकृष्ण की लीलाएं हुईं। भक्त आज भी आचमन करते हैं, आरती उतारते हैं। मगर आज का पानी नहाने लायक भी नहीं रहा। पवित्रता तो दूर की बात है।

विशेषज्ञों ने भी खतरे की घंटी बजाई है। यमुना का पानी केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ‘क्लास D’ श्रेणी में है। यानी यह पानी केवल जलीय जीवों के लिए ठीक है, इंसानों के लिए नहीं। इसमें घुलित ऑक्सीजन कम है। बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड ज्यादा है। और सबसे खतरनाक—फीकल कॉलिफॉर्म की मात्रा हजारों गुना ऊपर।

दिल्ली का हाल तो और भी बदतर है। यमुना की कुल लंबाई 1376 किलोमीटर है, लेकिन सिर्फ 22 किलोमीटर का दिल्ली हिस्सा 80 फीसदी प्रदूषण ढोता है। यहां फीकल कॉलिफॉर्म 92,000 MPN/100ml तक पहुंच चुका है, जबकि नहाने के लिए सीमा 2,500 है। कई जगहों पर ऑक्सीजन लगभग शून्य है। पानी जिंदा नहीं, सड़ा हुआ लगता है।

दिल्ली रोजाना करोड़ों लीटर गंदा पानी यमुना में उड़ेलती है। 37 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट होने के बावजूद हालात जस के तस हैं। कहीं पाइपलाइन अधूरी है, कहीं मशीनें बंद हैं। नतीजा: अधपका या कच्चा सीवेज सीधे नदी में गिरता है। यही जहर मथुरा-वृंदावन तक पहुंचता है।

ब्रज में भी हालत कुछ कम नहीं। दर्जनों नाले यमुना में गिरते हैं। कई बिना ट्रीटमेंट के। ऊपर से अतिक्रमण की मार। 2025 के ड्रोन सर्वे में वृंदावन के बाढ़ क्षेत्र में 1,266 अवैध निर्माण मिले। ये न सिर्फ नदी के बहाव को रोकते हैं, बल्कि प्रदूषण को भी बढ़ाते हैं। रेत खनन, गाद जमाव और बंद हो चुकी सहायक नदियां: सब मिलकर यमुना को बीमार बना रहे हैं।

बरसात के अलावा महीनों में यमुना का प्रवाह बेहद कम हो जाता है। पानी ठहर जाता है। सड़ांध बढ़ती है। नदी नाला बन जाती है। विशेषज्ञ कहते हैं कि न्यूनतम जल प्रवाह तय होना चाहिए, ताकि नदी जिंदा रहे। मगर इस पर अमल ढीला है।

अधिवक्ता आकाश वशिष्ठ पूछते हैं, "सवाल उठता है; इतनी योजनाओं का क्या हुआ? 1990 के दशक से यमुना एक्शन प्लान चल रहा है। फिर राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन आया। अरबों रुपये खर्च हुए। घाट बने, पाइप बिछे, प्लांट लगे। लेकिन जमीन पर नतीजा नदारद। यह सब कागजी घोड़े लगते हैं।"

आगरा में इसका असर साफ दिखता है। यमुना का गंदा पानी ताजमहल तक पहुंचता है। झाग, बदरंग पानी और मछलियों की मौत आम बात है। शाम की आरती में दीये तो जलते हैं, मगर पानी मुस्कुराता नहीं। उसकी चमक कहीं खो गई है।

रिवर कनेक्ट से जुड़े एक्टिविस्ट्स कहते हैं, असल बीमारी सिस्टम में है। विभाग अलग-अलग दिशा में भाग रहे हैं। तालमेल गायब है। कानून का डर नहीं। विकास के नाम पर कंक्रीट जंगल उग रहे हैं। नदी का सीना सिकुड़ रहा है।

ब्रज वृंदावन देवालय समिति ने भी साफ कहा; “निर्मल यमुना जल” मंदिर परंपराओं के लिए जरूरी है। मगर हुकूमत के कानों पर जूं नहीं रेंगती। आदेश आते हैं, फाइलों में दब जाते हैं। अतिक्रमण हटाने की बातें होती हैं, मगर बुलडोजर नहीं चलता।

अब रास्ता क्या है? जवाब आसान नहीं, मगर जरूरी है।

पहला कदम; मथुरा-वृंदावन के सभी नालों को तुरंत ट्रीटमेंट प्लांट से जोड़ा जाए। प्लांट की क्षमता बढ़े और निगरानी सख्त हो।

दूसरा: बाढ़ क्षेत्र से अवैध निर्माण हटाने की समयबद्ध मुहिम चले। 1,266 निर्माण सिर्फ आंकड़ा नहीं, खतरे की घंटी हैं।

तीसरा: साल भर न्यूनतम जल प्रवाह सुनिश्चित हो। ऊपर के बैराज से पानी छोड़ा जाए। सहायक नदियों को जिंदा किया जाए।

चौथा: नदी को “जीवित इकाई” मानकर सख्त कानून बने। उल्लंघन पर भारी जुर्माना हो।

साथ ही, समाज को भी आगे आना होगा।  आगरा में हालात पर रिवर कनेक्ट अभियान के कार्यकर्ताओं का दर्द छलकता है। डॉ देवाशीष भट्टाचार्य ने तल्ख़ लहजे में कहा, “आगरा में यमुना अब नदी नहीं, ज़हरीली नाली बन चुकी है। यह गंदा पानी इंसानों की सेहत के लिए ख़तरा है और ताजमहल जैसे ऐतिहासिक स्मारकों पर भी असर डाल रहा है।" 

यमुना भक्त डॉ ज्योति खंडेलवाल और विशाल झा कहते हैं, "हमने बरसों से यमुना बैराज की मांग उठाई है, ताकि पानी का स्तर सुधरे और प्रवाह बना रहे, मगर सरकार की रफ़्तार कछुए से भी धीमी है। हर साल वादे होते हैं, हर साल फाइलें घूमती हैं, मगर ज़मीन पर कुछ नहीं बदलता। अगर अब भी हुकूमत ने होश नहीं लिया, तो आने वाली नस्लें हमें माफ़ नहीं करेंगी।”

रिवर एक्टिविस्ट पद्मिनी अय्यर कहती हैं, "NGT का नोटिस एक चेतावनी है। आखिरी नहीं, मगर अहम। अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह भी कागज बनकर रह जाएगा।"

यमुना ब्रज की धड़कन है। अगर यह धड़कन थम गई, तो ब्रज की रूह सूख जाएगी। बात साफ है; यमुना को बचाइए, वरना इतिहास हमें माफ नहीं करेगा।

अब वक्त है। फैसले का। इरादे का। और असली कार्रवाई का।

 


समर्पण, प्रेम, करुणा की गाथा

फ्रांसीसी क्रांति की आग से आई रौशनी

आगरा की खामोश गलियों में जगी एक अनकही कहानी

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

23 अप्रैल 2026

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बरसात के बाद की भीगी मिट्टी की खुशबू हवा में तैर रही थी। धूल का महीन परदा पेड़ों, दीवारों और रास्तों पर चुपचाप बैठा था। आगरा अपनी रफ्तार में धीमा, ठहरा हुआ, लगभग सुकून से भरा दिखता है। लेकिन इस सुकून की तह में एक पुरानी दास्तान दबी है; डर, तकलीफ और हिम्मत की।

यह कहानी  की शुरुआत बहुत दूर, फ्रांस की उस उथल-पुथल से होती है, जिसे हम फ्रेंच रिवोल्यूशन के नाम से जानते हैं। उसी दौर में एक औरत का दिल बुरी तरह टूटा: क्लाउडिन थेबनेट। उसने अपने भाइयों को गिलोटिन पर मरते देखा। यह सदमा उसे तोड़ सकता था, मगर उसने इसे अपना मकसद बना लिया।

उसने ठान लिया कि उसे गरीबों और लड़कियों के लिए काम करना है। उन्हें तालीम देनी है, इज़्ज़त देनी है, और डर से आज़ादी भी।

इसी सोच से जन्म हुआ कांग्रगेशन आफ जीसस एंड मेरी का। वक्त बीता, और यह मिशन यूरोप से निकलकर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों तक पहुँचा। भारत भी उनमें शामिल था।

उन्नीसवीं सदी के मध्य में, कुछ युवा सिस्टर्स कोलकाता से इलाहाबाद होते हुए आगरा  की तरफ रवाना हुईं। सफर आसान नहीं था। रास्ते लंबे थे, साधन सीमित, और हर मोड़ पर अनिश्चितता। स्थानीय चर्च अभिलेखों और मौखिक परंपराओं में उस सफर की मुश्किलों का जिक्र मिलता है; डर, थकान और अनजाने रास्तों का बोझ।

कहा जाता है कि रास्ते में लूट-पाट जैसी घटनाओं का सामना भी करना पड़ा।  यह सफर इम्तिहान से कम नहीं था।

आखिरकार वे आगरा पहुँचीं। उस समय शहर मुग़ल इतिहास की छाया में जी रहा था, लेकिन सामाजिक ढांचे में कई कमियां थीं; खासतौर पर लड़कियों की तालीम और गरीबों की देखभाल के मामले में।

उनके आगमन के पीछे एक स्थानीय बिशप की अपील थी। ज़रूरत थी: स्कूल की, देखभाल की, और ऐसे हाथों की जो बिना भेदभाव के सेवा कर सकें।

शुरुआत छोटी थी। St. Patrick's Convent जैसे संस्थान उस दौर में आकार लेने लगे। यह जगह सिर्फ एक इमारत नहीं थी। यह पनाहगाह थी। एक स्कूल, एक अनाथालय, और एक ऐसा घर जहाँ सहारा मिलता था।

समय के साथ यह केंद्र उत्तर भारत के सबसे पुराने कैथोलिक संस्थानों में शुमार होने लगा।

यहाँ की तालीम अलग थी। किताबों से आगे की बात थी। उनका मकसद था; ऐसी औरतें तैयार करना जो खुद पर भरोसा करें, अपने पैरों पर खड़ी हो सकें, और दूसरों के लिए रहमदिल हों। अच्छी माँ, समझदार नागरिक, और ज़रूरत पड़े तो अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाने वाली शख्सियतें।यह सिस्टम सिर्फ शिक्षा नहीं, एक जीवन दृष्टि थी।

सिस्टर्स ने कई भूमिकाएँ निभाईं। वे टीचर भी थीं, नर्स भी। रसोई संभालतीं, बीमारों की सेवा करतीं, और अनाथ बच्चों को माँ का साया देतीं।

शुरुआत में शहर ने उन्हें अजनबी नज़रों से देखा। सवाल उठे। एतराज़ हुए। खासकर तब, जब उन्होंने समाज के निचले तबकों और बीमारों की बराबरी से सेवा की।

मगर वक्त के साथ सोच बदली।

लोगों ने देखा, यह काम दिखावे का नहीं है। इसमें खामोश सच्चाई है।

धीरे-धीरे यह संस्थान एक पहचान बन गया। यहाँ पढ़ी लड़कियाँ आगे बढ़ीं। डॉक्टर बनीं, अध्यापिका बनीं, प्रशासन में गईं। कुछ ने समाज से सवाल भी पूछे।

यही इस मिशन की असली कामयाबी थी।

क्लॉडीन का सपना भी जैसे बदलता गया। अब यह सिर्फ धार्मिक संदेश नहीं रहा। यह आत्मविश्वास की आवाज़ बन गया, डर से बाहर निकलने की ताकत।

बीसवीं सदी के अंत तक, यह कहानी आगरा के ताने-बाने का हिस्सा बन चुकी थी। स्थानीय अभिलेख बताते हैं कि इस संस्थान ने दशकों तक शिक्षा और सेवा का सिलसिला जारी रखा।

आज अगर आप सेंट पैट्रिक के शांत आँगन में खड़े हों, तो सब कुछ सामान्य लगता है। पेड़ों की छाया, बच्चों की आवाज़ें, और एक सुकून।

लेकिन ध्यान से सुनिए।

जैसे कहीं दूर से बैलगाड़ी के पहियों की धीमी आवाज़ आती हो। जैसे कोई पुरानी दुआ हवा में घुल रही हो।

Claudine Thévenet कभी भारत नहीं आईं। मगर उनका एहसास यहाँ आज भी जिंदा है।

धूल में। खामोशी में। और उन जिंदगियों में, जो इस तालीम से बदलीं।

यह कहानी हमें एक सीधी-सी बात सिखाती है; दर्द अगर मकसद बन जाए, तो वह रौशनी बन सकता है।

Tuesday, April 21, 2026

 हवा का रुख बदल रहा!

2026 की सियासत में किसकी बाज़ी, किसकी मात?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

22 अप्रैल 2026

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हवा का मिज़ाज बदल रहा है। रंग भी। गलियों से लेकर गलीचों तक, चौपालों से लेकर चाय की दुकानों तक, एक हल्की-सी केसरिया आभा तैरती नजर आ रही है। सवाल यह नहीं कि हवा चल रही है या नहीं। सवाल यह है कि यह हवा किस दिशा में बह रही है, और किसे अपने साथ उड़ा ले जाएगी।

2026 के विधानसभा चुनाव अब सिर्फ चुनाव नहीं रहे। यह एक दौर का इम्तिहान बन गए हैं। असम, वेस्ट बंगाल, तमिल नाडु और केरलम जैसे अहम राज्यों में जो कुछ हो रहा है, वह आने वाले भारत की तस्वीर गढ़ रहा है। यहां जंग सिर्फ कुर्सी की नहीं है, बल्कि सोच, सियासत और समाज के बदलते रंगों की है।

एक तरफ नेशनल डेमोक्रेटिक एलायंस है, जिसकी बागडोर नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के हाथ में है। दूसरी तरफ विपक्ष है, जो अपने-अपने इलाकों में मजबूत तो है, मगर एकजुट नहीं। जैसे कोई बारात हो जिसमें बाजा तो बज रहा हो, मगर बाराती कायदे से न नाच रहे हैं, न गा रहे हैं।

NDA ने इस बार अपना दांव सोच-समझकर चला है। विकास, वेलफेयर, राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक पहचान का ऐसा कॉकटेल तैयार किया गया है, जो गांव के किसान से लेकर शहर के युवा तक, सबको छूता है। यह सिर्फ भाषणों की सियासत नहीं, बल्कि एक नैरेटिव की सियासत है। और सियासत में नैरेटिव वही जीतता है, जो दिल और दिमाग दोनों पर असर करे। महिला आरक्षण, परिसीमन, उत्तर दक्षिण खाई, सबका विकास बनाम क्षेत्रीय पहचान, भाषा, आदि का क्या असर पड़ेगा, ये मत गणना के बाद पता चलेगा।

असम की तस्वीर सबसे साफ नजर आती है। हिमांता बिस्वा सरमा ने यहां सियासत को जमीन से जोड़ा है। अवैध घुसपैठ, जमीन अतिक्रमण और सांस्कृतिक अस्मिता जैसे मुद्दों पर उनकी सख्ती ने एक खास संदेश दिया है। विकास योजनाओं के साथ यह सख्त रवैया NDA को यहां मजबूत बनाता दिख रहा है। ऐसा लगता है कि तीसरी बार सत्ता में वापसी की पटकथा लगभग लिखी जा चुकी है। विपक्ष यहां जैसे धुंध में रास्ता खोज रहा है, मगर मंज़िल अभी दूर है।

वेस्ट बंगाल में कहानी थोड़ी अलग है। ममता बनर्जी की पकड़ अब भी मजबूत है, मगर वक्त के साथ एंटी-इन्कम्बेंसी की हल्की दरारें दिखने लगी हैं। भारतीय जनता पार्टी यहां 2021 की जमीन पर नई फसल उगाने की कोशिश में है। मुद्दे भी बदल गए हैं। अब बहस सिर्फ ध्रुवीकरण की नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार, महिला सुरक्षा और बेरोजगारी की है। SIR के बाद अगर मतदाता बिना खौफ के वोट डालता है, तो नतीजे चौंका सकते हैं। BJP यहां दरवाजे तक पहुंच चुकी है। बस एक धक्का और।

तमिल नाडु में सियासत का रंग सबसे ज्यादा दिलचस्प है। द्रविड़ राजनीति के बीच अब नई कहानी लिखी जा रही है। द्रविड़ मुनेत्र काझागम के खिलाफ माहौल तो बन रहा है, मगर अभिनेता विजय की एंट्री ने खेल को त्रिकोणीय बना दिया है। तीन कोनों की इस लड़ाई में अक्सर वही जीतता है, जिसकी रणनीति सबसे मजबूत हो। यहां NDA को विपक्ष के बिखराव का सीधा फायदा मिलता दिख रहा है। सियासत में एक कहावत है, “जब नाव में छेद ज्यादा हों, तो डूबना तय होता है।” कोयंबटूर के गोपाल कृष्णन के मुताबिक 150 सीटें NDA को मिल सकती हैं, पिछली बार की गलतियों से सबक सीखा है, फील्डिंग बढ़िया सजाई है। 

केरलम में तस्वीर धीमी है, मगर बदलाव की आहट साफ सुनाई देती है। पारंपरिक तौर पर LDF और UDF के बीच सिमटी राजनीति में अब बीजेपी धीरे-धीरे अपनी जगह बना रही है। पिनाराई विजयन सरकार के खिलाफ हल्की नाराजगी NDA के लिए एक खिड़की खोलती है। यहां एक-दो सीटें भी बड़ी कहानी लिख सकती हैं। सियासत में कभी-कभी छोटी चिंगारी ही बड़ा शोला बन जाती है।

कुल मिलाकर तस्वीर यही कहती है कि NDA इस वक्त “फुल स्विंग” में है। मजबूत नेतृत्व, स्पष्ट संदेश और जमीनी संगठन उसकी सबसे बड़ी ताकत हैं। नरेंद्र मोदी का चेहरा अब भी सबसे बड़ा चुनावी ब्रांड बना हुआ है। उनके नाम पर वोट पड़ता है, यह बात अब किसी से छुपी नहीं।

विपक्ष की सबसे बड़ी परेशानी यह है कि वह रिएक्शन में खेल रहा है। उसके पास मुद्दे हैं, मगर एकजुट कहानी नहीं। जैसे शतरंज में सारे मोहरे हों, मगर खिलाड़ी की चाल ही उलझी हुई हो। राजनीति में सिर्फ विरोध काफी नहीं होता, विकल्प भी देना पड़ता है। और यही वह जगह है जहां विपक्ष लड़खड़ाता नजर आता है।

अब सबकी नजरें 4 मई पर टिकी हैं। यह तारीख सिर्फ नतीजों की नहीं होगी, बल्कि दिशा की भी होगी। यह तय करेगी कि देश की सियासत किस ओर मुड़ रही है।

एक बात साफ है। अब सियासत सिर्फ वादों की बाजीगरी नहीं रही। जनता अब सवाल पूछती है। हिसाब मांगती है। और जवाब भी चाहती है। यही लोकतंत्र की असली रूह है। और शायद यही वजह है कि इस बार हवा का रंग सिर्फ बदल नहीं रहा, बल्कि एक नई कहानी लिखने को बेचैन दिख रहा है।

Monday, April 20, 2026

 ताज के साए में बगावत की कलम: जब आगरा ने रानी लक्ष्मीबाई की लड़ाई को आवाज दी

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

22 अप्रैल 2026

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कभी सोचा है, आगरा सिर्फ संगमरमर की चमक नहीं, इतिहास की स्याही भी है? वही आगरा, जहाँ एक विदेशी कलम ने भारतीय स्वाभिमान की कहानी लिखी।

साल 1854 में, आगरा में बसे एक ऑस्ट्रेलियाई वकील और लेखक John Lang को एक असाधारण तलबनामा मिला। यह कोई आम खत नहीं था। झाँसी की रानी Rani Lakshmibai ने फारसी में, सुनहरे कागज पर लिखकर उन्हें बुलाया था। मामला संगीन था। East India Company “Doctrine of Lapse” के नाम पर झाँसी को हड़पना चाहती थी।

महाराजा Gangadhar Rao के निधन के बाद, रानी के दत्तक पुत्र दामोदर राव को वारिस मानने से कंपनी ने इनकार कर दिया। कानून का खेल था, मगर दांव पर एक रियासत की अस्मिता थी। रानी ने सुना था कि जॉन लैंग ने पहले लाला ज्योति प्रसाद का मुकदमा जीतकर कंपनी को मात दी है। यही भरोसा उन्हें आगरा तक खींच लाया।

रानी ने लैंग के लिए खास पालकी और सेवक भेजे। आगरा से झाँसी तक का सफर आसान नहीं था। रास्ता ग्वालियर से होकर जाता था। दो दिन की थकान, लेकिन मंजिल पर एक इतिहास इंतजार कर रहा था। झाँसी पहुंचकर लैंग ने रानी से मुलाकात की। यह सिर्फ वकील और मुवक्किल की भेंट नहीं थी। यह हक और हुकूमत का आमना-सामना था।

अपनी किताब Wanderings in India में लैंग ने इस मुलाकात का जीवंत चित्र खींचा है। उन्होंने रानी के आत्मविश्वास, उनके दरबार और छोटे दामोदर राव का जिक्र किया। वही मशहूर जज्बा, जिसे इतिहास ने अमर कर दिया :  “मैं अपनी झाँसी नहीं दूंगी।” यह सिर्फ एक वाक्य नहीं, आने वाले तूफान की दस्तक थी।

लैंग ने रानी की ओर से एक मजबूत पिटीशन तैयार की। उन्होंने तर्क दिए, कानून रखा, न्याय की गुहार लगाई। मगर कंपनी की अदालतें पहले ही फैसला लिख चुकी थीं। मुकदमा हार गया। लेकिन कहानी जीत गई। यह घटना Indian Rebellion of 1857 के  गदर या संग्राम से पहले की एक महत्वपूर्ण प्रस्तावना बन गई।

आगरा में जॉन लैंग का जीवन भी कम दिलचस्प नहीं था। 1842 में कलकत्ता आने के बाद उन्हें वह शहर रास नहीं आया। वे उत्तर भारत की ओर बढ़े ,  अंबाला, मेरठ और फिर आगरा। यहीं उन्होंने अपनी पहचान बनाई। वे हिंदी-उर्दू और फारसी में दक्ष थे। भारतीय मुवक्किलों के लिए वे अक्सर कंपनी के खिलाफ खड़े होते थे।

1845 में उन्होंने The Mofussilite नाम का अखबार शुरू किया। “मुफस्सिल” यानी छोटे शहरों की आवाज। यह अखबार अंग्रेजी हुकूमत पर तीखे व्यंग्य और सच्चाई के तीर चलाता था। कलकत्ता से शुरू हुआ यह सफर अंबाला, मेरठ होते हुए आखिरकार आगरा आकर ठहर गया। 1853 से 1859 तक यह आगरा से प्रकाशित होता रहा।

लैंग की कलम तलवार से तेज थी। वे कंपनी की नीतियों, अन्याय और भ्रष्टाचार को बेनकाब करते थे। नतीजा यह हुआ कि अंग्रेज अफसर उन्हें आंख की किरकिरी मानने लगे। लेकिन भारतीय समाज में उनकी इज्जत बढ़ती गई। वे एक विदेशी होकर भी हिंदुस्तान की आवाज बन गए।

जॉन लैंग की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। वे कभी ऑस्ट्रेलिया नहीं लौटे। करीब 22 साल भारत में रहे। महान लेखक Charles Dickens की पत्रिका Household Words में भी उन्होंने लेख लिखे। उन्हें हिमालय की वादियां इतनी भा गईं कि उन्होंने अपने अंतिम दिन लैंडौर, मसूरी के पास बिताए।

20 अगस्त 1864 को, मात्र 48 वर्ष की उम्र में उनका निधन हुआ। उन्हें मसूरी के कैमल्स बैक कब्रिस्तान में दफनाया गया। वक्त के साथ उनकी याद धुंधली पड़ गई थी, लेकिन 1964 में मशहूर लेखक Ruskin Bond ने उनकी कब्र को खोज निकाला। जैसे इतिहास ने फिर करवट ली, और लैंग की कहानी दोबारा जीवित हो उठी।

यह रिश्ता यहीं नहीं रुका। 2014 में, जब प्रधान मंत्री Narendra Modi ऑस्ट्रेलिया की संसद में बोले, तो उन्होंने जॉन लैंग का जिक्र किया। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री Tony Abbott को 1854 की उस पिटीशन की प्रति भेंट की, जो लैंग ने रानी लक्ष्मीबाई के लिए तैयार की थी। यह सिर्फ एक दस्तावेज नहीं, दो देशों के बीच साझा इतिहास की कड़ी थी।

आगरा को हम अक्सर ताजमहल तक सीमित कर देते हैं। लेकिन यह शहर सिर्फ इमारतों का नहीं, इरादों का भी है। जॉन लैंग जैसे “मुफस्सिलाइट” ने यहां रहकर अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई। उनकी वकालत, उनकी पत्रकारिता और रानी लक्ष्मीबाई से उनका जुड़ाव,  यह सब मिलकर आजादी की कहानी में एक अनसुना, मगर जरूरी अध्याय जोड़ते हैं।

यह कहानी याद दिलाती है कि सच और साहस की कोई सरहद नहीं होती। कभी-कभी, सबसे मजबूत आवाज दूर देश से आती है, और दिलों में घर कर जाती है।


 स्वच्छता मिशन की कामयाबी पर सवाल?

कब सीखेंगे "सफाई सबकी ज़िम्मेदारी है"

आगरा के हालात बदले हैं, पर मंजिल अभी दूर है

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

21 अप्रैल, 2026

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कभी आगरा में कदम रखते ही नाक सिकुड़ जाती थी। हवा में बदबू का एक ऐसा साया था, जो हर गली, हर मोड़ पर पीछा करता था। नालियां जैसे सड़ांध की दास्तान सुनाती थीं।

बड़े नाले, मंटोला, भैरों, नदी में खुलते हैं  और यमुना, जो कभी शाही अक्स का आईना थी, को एक बीमार, सुस्त दरिया में तब्दील कर दिया हैं।।

कुछ वर्षों पहले तक, कूड़े के पहाड़ शहर की तक़दीर पर तंज कसते खड़े रहते थे। लगता था, ये गंदगी कभी नहीं हटेगी। शहर जैसे अपने ही बोझ तले दबा हुआ था।

आज वही आगरा कुछ और दिखता है। हवा में एक अजीब सी साफ़गोई है। सड़कें झाड़ू की लय में पहले की अपेक्षा साफ दिखती हैं। और कुबेरपुर का कूड़ा घर, जो कभी शहर की शर्म था, अब सुधरा दिखता है, कूड़े से खाद बनने लगी है। यमुना किनारा रोड पर भैंसों के विचरण पर प्रभावी रोक ने मदद की है। आगरा नगर निगम ने इस क्षेत्र में अच्छा कार्य किया है। लेकिन यह बदलाव यूं ही नहीं आया। यह एक लंबे संघर्ष की कहानी है, जिसे स्वच्छ भारत मिशन ने आकार दिया।

आगरा कोई मामूली शहर नहीं। यह दुनिया का एक अब्बल टूरिस्ट डेस्टिनेशन है, जहां हर साल लाखों सैलानी आते हैं। करीब 44 लाख की आबादी वाला यह शहर दोहरी ज़िम्मेदारी उठाता है। एक तरफ अपने बाशिंदों के लिए साफ़ रहना, दूसरी तरफ दुनिया के सामने अपनी सूरत पेश करना।

साल 2014 से 2019 तक की शुरुआत इज़्ज़त से जुड़ी थी। घर-घर शौचालय बने। मोहल्लों में सामुदायिक टॉयलेट खड़े हुए। खुले में शौच की मजबूरी धीरे-धीरे कम हुई। 2019 तक आगरा ने खुद को खुले में शौच से मुक्त घोषित कर दिया। यह एक बड़ी कामयाबी थी, मगर मंज़िल नहीं। एक वक्त था जब यमुना आरती स्थल के सामने ही लोग खुले में बेशर्मी से निपटते थे, अब सफाई कर्मी अलर्ट रहते हैं।

आगरा शहर की असल जंग तो कूड़े के साथ थी। कुबेरपुर इसका सबसे बड़ा ज़ख्म था। करीब 19 लाख मीट्रिक टन कूड़ा वहां सालों से सड़ रहा था। बायोमाइनिंग और बायोरेमेडिएशन के जरिए उस ज़मीन को वापस हासिल किया गया। आज वहीं दस एकड़ में मियावाकी जंगल लहलहा रहा है। पास ही  प्रोसेसिंग प्लांट लगे हैं। यानी जो कचरा कभी मुसीबत था, वही अब उपयोगी उत्पाद बन रहा है।

शहर का ढांचा भी बदला। हर वार्ड में डोर-टू-डोर कलेक्शन शुरू हुआ। बड़े-बड़े मटेरियल रिकवरी सेंटर रोज़ सैकड़ों टन कचरा छांटते हैं। सीवर और ट्रीटमेंट प्लांट के लिए “वन सिटी, वन ऑपरेटर” मॉडल लागू हुआ। सिस्टम में एक तरह की रवानी आई।

आंकड़े भी गवाही देते हैं। 2024-25 के स्वच्छ सर्वेक्षण में आगरा ने 12,500 में से 11,532 अंक हासिल किए। शहर को 5-स्टार गार्बेज फ्री का दर्जा मिला।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।

चमकती सड़कों से हटकर जब आप पुराने शहर की तंग गलियों में जाते हैं, तो तस्वीर  धुंधली हो जाती है। कागज़ों में भले 100% कचरा अलग-अलग करने का दावा हो, हकीकत में गीला-सूखा कचरा अक्सर एक साथ ही फेंका जाता है। प्रोसेसिंग प्लांट हैं, मगर उनकी पूरी क्षमता का इस्तेमाल हमेशा नहीं हो पाता।

और यमुना अब भी चुपचाप सब देख रही है। गंदा पानी आज भी उसमें गिरता है। किनारे साफ़ हैं, मगर दरिया अब भी बीमार है। यह एक अधूरी कहानी का सबसे दर्दनाक हिस्सा है।

सार्वजनिक शौचालय बने जरूर, मगर कई जगह उनकी हालत ठीक नहीं। झुग्गी बस्तियों में सफाई का इंतज़ाम डगमगाता रहता है। सफाई कर्मचारी, जो इस पूरी व्यवस्था की रीढ़ हैं, उन्हें अक्सर सुरक्षा के पूरे साधन नहीं मिलते। तनख्वाह में देरी भी एक आम शिकायत है।

सबसे बड़ा मसला शायद सिस्टम नहीं, लोगों का रवैया है। सफाई को आज भी ज़्यादातर लोग सरकारी काम समझते हैं, अपना नहीं। घर के अंदर चमक-दमक, मगर कचरा चुपचाप बाहर सड़क पर सरका देना; यह दोहरी सोच अब भी ज़िंदा है। मोहल्लों में बैठकर शिकायतें तो खूब होती हैं, मगर जब हाथ बंटाने की बात आए, तो खामोशी छा जाती है। जागरूकता की बातें सुनने में अच्छी लगती हैं, मगर अमल के वक्त लोग किनारा कर लेते हैं। यह बेपरवाही, यह उदासीनता, पूरी मेहनत पर पानी फेर देती है।

यह तस्वीर सिर्फ आगरा की नहीं, पूरे मुल्क की झलक है। 2014 के बाद देश में कचरा प्रोसेसिंग 16% से बढ़कर 80% से ऊपर पहुंची। यह छोटी बात नहीं।

मगर दूसरी पारी, 2021 से 2026, थोड़ी मुश्किल दिख रही है। पूरे देश में कचरे का सही बंटवारा अभी भी 60% से नीचे है। और आने वाले साल में बजट में कटौती की बात एक नया सवाल खड़ा करती है। क्या यह मिशन अपनी रफ्तार बनाए रख पाएगा?

शुरुआत में गांधी जी के चश्मे वाला प्रतीक लोगों को जोड़ता था। एक जज़्बा था। मगर अब खतरा यह है कि अगर सिर्फ ढांचा बने और आदतें न बदलें, तो लोग इस मुहिम से दूर हो सकते हैं।

आगे का रास्ता साफ़ है, मगर आसान नहीं। अब जरूरत बड़े अभियानों की नहीं, रोज़ की आदतों की है।

हर वार्ड में कचरे का निपटान हो, तो लैंडफिल पर दबाव कम होगा। सफाई कर्मचारियों को इज़्ज़त, सुरक्षा और वक्त पर मेहनताना मिले, तो व्यवस्था मजबूत होगी। फंडिंग ऐसे हो, जिसमें नतीजों को अहमियत मिले, सिर्फ गिनती को नहीं।

सबसे अहम बात, सफाई सरकार का काम नहीं, लोगों की आदत बने।

आगरा ने साबित किया है कि बदलाव मुमकिन है।  मगर असली इम्तिहान अब है।

2014 का आगरा और आज का आगरा।  फर्क तो दिखता है। मगर आज का आगरा और एक पूरी तरह से स्वस्थ, टिकाऊ शहर; इस फासले को पाटना अभी बाकी है।

शहर एक दिन में साफ़ नहीं होता। यह रोज़ के छोटे-छोटे अमल से चमकता है। अगर ये सिलसिला टूटा, तो बदबू फिर लौट आएगी।

और इस बार, जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की नहीं होगी। यह हर उस हाथ की होगी, जिसने कचरा फेंका और मुंह फेर लिया।


Sunday, April 19, 2026

 क्या भारत में चुनाव जीतने का असली पासपोर्ट आज भी जाति का प्रमाणपत्र है?

क्यों जाति गणना ?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

20, अप्रैल 2026

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क्या सचमुच भारत में चुनाव जीतने के लिए जाति का प्रमाण पत्र ही असली पासपोर्ट है। सवाल चुभता है, पर जवाब बहुतों को मालूम है। सच यह है कि हाँ, आज भी काफी हद तक यही हकीकत है। लोकतंत्र का मैदान खुला है, पर खेल के नियम अब भी पुरानी पहचानें तय करती हैं।

हमारे संविधान ने उम्मीद का दरवाजा खोला था। मंशा साफ थी। सदियों के अन्याय को तोड़ना था, बराबरी की राह बनानी थी। आरक्षण को एक अस्थायी सहारे की तरह सोचा गया था। जैसे टूटी टांग पर प्लास्टर। ठीक होते ही हट जाना चाहिए। संविधान सभा की बहसों में यह भावना बार बार झलकी। अनुच्छेद 15(4) और 16(4) ने पिछड़ों को आगे लाने का रास्ता दिया। पर समय सीमा तय नहीं हुई। शायद भरोसा था कि समाज खुद बदल जाएगा। सर्वोच्च न्यायालय ने भी कई बार संकेत दिया कि यह व्यवस्था हमेशा के लिए नहीं हो सकती। पर राजनीति ने इस भरोसे को धीरे धीरे अपनी जरूरत के हिसाब से ढाल लिया।

राजनीति की भाषा आदर्शों से नहीं, अंकों से चलती है। यहाँ दर्द भी गिना जाता है, उम्मीद भी तौली जाती है। जो एक पुल होना था, वह मोर्चा बन गया। जो एक उपचार था, वह पहचान बन गया। पढ़ा लिखा शहरी मतदाता भी इस जाल से बाहर नहीं निकल पाया। फर्क बस इतना है कि अब जाति की गणित और ज्यादा परिष्कृत हो गई है। डेटा शीट में दर्ज है। एक्सेल फाइल में सजी है। भावनाएं भी अब कैलकुलेट होती हैं।

शुरुआत में सोच कुछ और थी। सुधारकों ने इसे एक तेज सर्जरी की तरह देखा। एक ऐसा वार जो बराबरी का रास्ता साफ कर दे। लक्ष्य था कि जाति धीरे धीरे अप्रासंगिक हो जाए। पर जमीन पर आते ही कहानी बदल गई। राजनीति ने इस औजार को हथियार बना दिया। वोट बैंक की फैक्ट्री चल पड़ी। पहचानें संगठित हुईं। गुस्सा दिशा पा गया।

राम मनोहर लोहिया ने पिछड़ों की राजनीति को विचार दिया। उनका नारा पिछड़ा पावे सौ में साठ केवल शब्द नहीं था। यह सामाजिक संतुलन का खाका था। पर जैसे ही यह जमीन पर उतरा, वोट की भाषा में बदल गया। आदर्श पीछे छूट गए। गणित आगे आ गया।

फिर आया वह मोड़ जिसने देश की राजनीति की धुरी ही बदल दी। वी.पी. सिंह की सरकार ने 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू कीं। अन्य पिछड़ा वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण मिला। देश सड़कों पर उतर आया। विरोध हुआ। आत्मदाह तक हुए। सरकार गिरी। पर एक नया राजनीतिक युग जन्म ले चुका था। उत्तर भारत की राजनीति ने नई करवट ली। क्षेत्रीय दल उभरे। जाति अब सिर्फ पहचान नहीं रही, सत्ता की सीढ़ी बन गई।

इसी सीढ़ी पर चढ़कर मायावती ने 2007 में उत्तर प्रदेश में इतिहास रचा। दलित, ब्राह्मण, मुस्लिम, कई धाराएं एक साथ आईं। 206 सीटों का बहुमत मिला। संदेश साफ था। जाति को जोड़कर भी सत्ता पाई जा सकती है। यह राजनीति का नया व्याकरण था।

दक्षिण भारत में कहानी का रंग अलग दिखता है, पर धागा वही है। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने गैर ब्राह्मण राजनीति को संस्थागत रूप दिया। तमिलनाडु में 69 प्रतिशत आरक्षण दशकों पुराने सामाजिक समझौते की तरह है। सत्ता का चक्र वहीं घूमता है। कर्नाटक में लिंगायत और वोक्कालिगा समीकरण ने दशकों तक राजनीति की चाबी थामे रखी। एच.डी. देवेगौड़ा का उदय इसी गणित का नतीजा था।

आज चुनाव विचारों से कम, आंकड़ों से ज्यादा तय होते हैं। हर पार्टी के पास जाति का पूरा नक्शा है। किस सीट पर कौन भारी है, किसे टिकट देना है, किसे क्या वादा करना है। उत्तर प्रदेश इसका सबसे खुला उदाहरण है। यादव बहुल इलाके, दलित बहुल क्षेत्र, हर जगह अलग रणनीति। विचारधारा अक्सर परदे के पीछे चली जाती है। मंच पर जाति खड़ी रहती है।

कम्युनिस्टों ने वर्ग संघर्ष का सपना देखा था। लगा था कि आर्थिक बराबरी आएगी तो जाति खुद मिट जाएगी। पर बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में उनके आंदोलन भी जातियों में बंट गए। केरल और पश्चिम बंगाल में कुछ सफलता मिली, पर जाति की छाया पूरी तरह कभी नहीं हटी। भारतीय समाज में जाति रोजमर्रा का सच है। शादी से लेकर जमीन तक, रिश्तों से लेकर अवसर तक, हर जगह इसकी मौजूदगी है। वर्ग की लड़ाई, ठोस लाभ के सामने कमजोर पड़ गई।

आज की तस्वीर साफ है। शिक्षा बढ़ी है। शहर फैले हैं। नौकरियों का स्वरूप बदला है। पर जाति अब भी जिंदा है। क्योंकि यह सीधे लाभ से जुड़ी है। डिग्री के साथ साथ जाति का प्रमाण पत्र अब भी जरूरी है। राजनीति के लिए यह सोने की खान है। हर चुनाव से पहले नई मांगें उठती हैं। नए वादे किए जाते हैं। नया ध्रुवीकरण होता है।

कहानी यहीं नहीं रुकती। एक ही जाति के भीतर भी असमानता है। कुछ उप समूह सारे लाभ ले जाते हैं। बाकी पीछे छूट जाते हैं। यह एक चक्र है जो खुद को पोषित करता है। जाति वोट देती है। वोट सत्ता देता है। सत्ता जाति को बनाए रखती है।

अब सवाल यह नहीं कि आरक्षण सही है या गलत। सवाल यह है कि क्या यह साधन रहा या लक्ष्य बन बैठा। क्या हम मंजिल तक पहुंचे या रास्ते में ही डेरा डाल दिया।

जाति की गणना की मांग इसी उलझन से निकली है। 2023 में बिहार के सर्वेक्षण ने तस्वीर का एक हिस्सा दिखाया। पिछड़े और अति पिछड़े मिलाकर करीब 63 प्रतिशत निकले। अब केंद्र भी अगली जनगणना में जाति आंकड़े शामिल करने की तैयारी में है। यह डेटा नीति बनाने में मदद कर सकता है। पर खतरा भी उतना ही बड़ा है। अगर इसे केवल नए आरक्षण की मांग और नए विभाजन के लिए इस्तेमाल किया गया, तो दरार और गहरी होगी।

भारतीय लोकतंत्र आज भी एक नई भाषा की तलाश में है। एक ऐसा भरोसा जो जाति से ऊपर उठ सके। जब तक वह भाषा नहीं मिलती, मतपत्र पर जाति की स्याही सबसे गहरी रहेगी। यह स्याही आसानी से नहीं धुलेगी। पर इसे धोए बिना तस्वीर साफ भी नहीं होगी।

सवाल फिर वही खड़ा है। पासपोर्ट बदलना है या सिर्फ कवर। जवाब हमें ही लिखना है।

Saturday, April 18, 2026

 हेरिटेज डे हर साल 18 अप्रैल को मनाया जाता है। इसे International Day for Monuments and Sites भी कहते हैं। इसका उद्देश्य दुनिया भर की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और प्राकृतिक धरोहरों ;  स्मारकों, पुरातत्व स्थलों और साइटों ,  के संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाना है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हमारी विरासत कितनी मूल्यवान है, लेकिन कितनी नाजुक और कमजोर भी। खासकर 2026 में, जब थीम living heritage और आपातकालीन संरक्षण पर केंद्रित है, तो यह और भी प्रासंगिक हो जाता है।

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हेरिटेज डे: संगमरमर से आगे, आगरा की रूह पुकारती है

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

18 अप्रैल 2026

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आगरा की दास्तान संगमरमर से शुरू नहीं होती। और न ही वहीं खत्म होती है।  

यह कहानी तंग गलियों में सांस लेती है, मंदिरों की घंटियों में गूंजती है, हुनरमंदों की उंगलियों में चमकती है और बाजारों की भीड़ में जीवंत हो उठती है। हेरिटेज डे पर वक्त आ गया है कि इस शहर से पर्दा उठाया जाए। आगरा कोई एक स्मारक का शहर नहीं है, बल्कि सदियों की तहज़ीब का जीवंत संगम है।  

दुनिया इसे अक्सर एक ही तस्वीर में कैद कर लेती है ; सफेद संगमरमर की वह अनुपम इमारत, ताज महल, मोहब्बत की निशानी और भारत की पहचान। कोई मुसाफिर पूछे तो जवाब फौरन आता है: “ताज महल।” दिल्ली से सैलानी आते हैं, सेल्फी लेते हैं और लौट जाते हैं। इस तरह सदियों का शहर एक लम्हे में सिमट जाता है। एक ठहराव बन जाता है, कोई पूरी कहानी नहीं।  

यह तंग नज़र एक गहरी सच्चाई को छुपाती है। आगरा सिर्फ मुगल राजधानी नहीं था। यह एक सांस्कृतिक संगम था; जहाँ फ़ारसी नज़ाकत हिंदुस्तानी रूह से मिली, इबादत हुनर से टकराई और ताकत शायरी बन गई। जो बना, वह सिर्फ इमारतें नहीं थीं ; एक पूरी तहज़ीब थी, जो आज भी जीवित है, लेकिन अक्सर अनसुनी रह जाती है।


ताजगंज की तंग गलियों में जाइए। ज़रा कान लगाकर सुनिए ,  पत्थर पर चलती छैनी की धीमी, लयबद्ध आवाज़ आएगी। यह है पच्चीकारी (पार्चिन कारी या pietra dura)  पत्थरों में सांस भरने का जादुई हुनर। शाहजहाँ के ज़माने में जन्मा यह फन सब्र और सटीकता की इबादत है। लैपिस लाजुली, कार्नेलियन, मलाकाइट, जेड और अन्य बारीक पत्थरों को तराशा जाता है, जड़ा जाता है और इतनी महीन चमक दी जाती है कि वे फूलों और लताओं की तरह जीवंत लगने लगते हैं।  

यह फैक्ट्री का काम नहीं। यह खानदानी विरासत है। बाप-बेटे, मां-बेटी, पीढ़ी दर पीढ़ी यह हुनर संभाला जाता है। कारखाने मदरसों में बदल जाते हैं, जहां वक़्त ठहर सा जाता है। लेकिन चुनौतियां कम नहीं। नई पीढ़ी तेज़ कमाई की ओर खिंच रही है। पुराना हुनर फीका पड़ रहा है। फिर भी कई कारीगर डटे हुए हैं, क्योंकि उनके लिए विरासत सिर्फ याद नहीं ,  रोज़ी-रोटी और आत्मसम्मान है।

इसी तरह करघों पर कालीन बुनते हैं। फ़ारसी नक्शे हिंदुस्तानी रंगों में ढलते हैं। हर गांठ अतीत को वर्तमान से जोड़ती है। साथ ही ज़री-ज़र्दोज़ी, संगमरमर की नक्काशी और अन्य शिल्प भी जीवित हैं।


अगर स्मारक जमी हुई तारीख़ हैं, तो आगरा के बाजार उसके जीवंत रंगमंच हैं। सदर बाजार में कदम रखिए  हवा में कबाब और मुगलई व्यंजनों की खुशबू, सौदेबाज़ी की आवाज़ें और हंसी की गूंज। फिर किनारी बाजार की तंग गलियों में खो जाइए ,  रंग-बिरंगे कपड़े, छनकती ज्वेलरी, मसालों की महक और चमड़े के जूतों की दुकानें।  

यहां विरासत दिखाई नहीं जाती ;  जी जाती है। दुकानदार दो ग्राहकों के बीच इतिहास सुना देते हैं। कारीगर अपने हुनर का राज़ खोल देते हैं। ये बाजार म्यूज़ियम नहीं, दिल की धड़कन हैं।


आगरा की रूह सिर्फ रौनक में नहीं, इबादत में भी बसी है। मनकामेश्वर मंदिर (Rawatpara, आगरा किला के पास) में घंटियां सदियों की दुआएं दोहराती हैं। यह शहर के चार प्राचीन शिव मंदिरों में से एक है, जिसकी कथा द्वापर युग से जुड़ी है ,  भगवान शिव ने यहां विश्राम किया था, जब कृष्ण मथुरा में जन्मे थे। भक्त शिव से मनोकामनाएं मांगते हैं।

करीब 70 किमी दूर यमुना किनारे बटेश्वर मंदिर समूह है ,  100 से अधिक शिव मंदिरों का प्राचीन परिसर (कई अब भी खड़े हैं), जो गुरजरा-प्रतिहार काल से जुड़ा है और ASI द्वारा पत्थर दर पत्थर पुनर्स्थापित किया गया है। यह जगह शांति और आस्था का अनूठा संगम है।

और फिर राधा स्वामी समाधि (सोमी बाग) ; संगमरमर में ढली एक शांत, आधुनिक आस्था। खामोशी यहां शब्दों से ज़्यादा बोलती है। यहां विरासत सिर्फ देखी नहीं जाती, महसूस की जाती है।


लेकिन सच्चाई थोड़ी कड़वी है। आगरा की कहानी अधूरी सुनाई जाती है। एक स्मारक चमकता है, बाकी साए में रह जाते हैं। ताज के संरक्षण के नियम ज़रूरी हैं, लेकिन इन्होंने आसपास की सांसें भी थाम ली हैं। ताजगंज के कारखाने सिमट गए, होटल ठहर गए, स्थानीय कारीगरों के मौके कम हो गए। शाम ढलते ही शहर जैसे सो जाता है।

सबसे बड़ा खतरा अपनापन का खत्म होना है। कई स्थानीय लोग इन धरोहरों को अब “अपना” नहीं मानते। जब रिश्ता टूटता है, तो हिफाजत भी कमज़ोर पड़ती है। विरासत बोझ बन जाती है, नेमत नहीं रहती। पर्यटन के दबाव से हुनर प्रभावित हो रहा है ;  बाजार कमजोर, कच्चा माल महंगा, स्वास्थ्य जोखिम और युवा पीढ़ी का पलायन।


इस हेरिटेज डे पर आगरा को नई कहानी चाहिए। छोटे-छोटे कदम बड़े बदलाव ला सकते हैं:

- कारीगरी के ट्रेल्स और वर्कशॉप्स बनें, जहां सैलानी खुद पच्चीकारी सीख सकें।

- आध्यात्मिक सर्किट विकसित हों — मनकामेश्वर, बटेश्वर, यमुना घाट और सोमी बाग एक धागे में पिरोए जाएं।

- शाम के बाजार सांस्कृतिक मेलों में बदलें, जहां हुनर, खानपान और कहानियां एक साथ जी सकें।

- स्कूलों में स्थानीय इतिहास पढ़ाया जाए। युवा अपनी कहानियां दर्ज करें। समुदाय खुद संरक्षण की कमान संभाले।

- सैलानियों को भी बदलना होगा — जल्दबाजी कम, गहराई ज़्यादा। स्थानीय हुनर, खानपान (पेठा, दालमोठ) और उत्पाद (चमड़े के जूते, हैंडीक्राफ्ट्स, फाउंड्री, ग्लास) खरीदें।

आगरा के उद्योग भी विरासत का हिस्सा हैं ; चमड़े और जूते का विश्व प्रसिद्ध कारोबार, पेठा-दालमोठ, हैंडीक्राफ्ट्स, फाउंड्री और ग्लास वर्क। ये सब मिलकर आगरा को पूरा बनाते हैं।

आगरा एक कहानी नहीं ;  कई किस्सों का शहर है। यह झुके हुए कारीगर का सब्र है, मंदिर की घंटी की गूंज है, बाजार की पुकार है। यह शोर भी है, सुकून भी है। यह सिलसिला है, जो सदियों से चल रहा है।

इस हेरिटेज डे पर सवाल सीधा है:  

क्या हम सिर्फ दिखावे के पीछे भागते रहेंगे? या पूरी तस्वीर देखेंगे?  

क्योंकि आगरा ध्यान नहीं मांगता। समझ मांगता है।  

जब आप इसे समझ लेते हैं, तो आगरा सिर्फ देखा नहीं जाता ;  दिल में बस जाता है।

यह शहर पत्थर से ज़्यादा अपनी कहानियों, हुनर, खानपान और रूह से बना है। इसे पूरा देखिए, पूरा जीिए। विरासत सेल्फी नहीं, एक गहरा रिश्ता है।

Friday, April 17, 2026

 उत्तर भारत की लुप्त हो रही छत संस्कृति:

वो गर्मी की रातें!

छतों का आसमान: जब रातें इश्क़ लिखती थीं और मोहल्ले एक जान हो जाते थे

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बृज खंडेलवाल द्वारा

19 अप्रैल 2026

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शाम ढलती नहीं थी। बस ऊपर खिसक जाती थी। घर की धड़कन सीढ़ियाँ चढ़कर छत पर आ बैठती थीं।

दिन भर की लू बदन को झुलसा देती। दीवारें तवे की तरह तपतीं। हवा भी जैसे रूठ जाती। मगर जैसे ही सूरज थककर ढलता, आसमान बैंगनी चादर ओढ़ लेता। और उसी पल, उम्मीद का एक दरवाज़ा खुलता; छत का दरवाज़ा। वो छत सिर्फ छत नहीं थी। वो जिंदगी का खुला कमरा थी।

तैयारियाँ किसी छोटे त्योहार जैसी होतीं। बाल्टियों में पानी भरा जाता। लोटे से छिड़काव शुरू होता। गरम फर्श “छssss” की आवाज़ के साथ ठंडा पड़ता। मिट्टी की सोंधी खुशबू उठती, जैसे धरती ने इत्र लगा लिया हो। बिना बारिश की बरसात।

फिर चारपाइयाँ निकलतीं। डोरी से बुनी, हल्की, मगर भरोसेमंद। उन पर सफेद सूती चादरें बिछतीं। तकियों के नीचे पंखे दबे रहते, एहतियातन। अगर हवा फिर से नाराज़ हो जाए तो?

अँधेरा उतरते ही छत बदल जाती। जगह से एहसास बन जाती। न टीवी। न मोबाइल। बस लोग… और आसमान। बच्चे पीठ के बल लेट जाते। तारे गिनते।

“देखो, वो सप्तऋषि!”

“अरे, वो टूटता तारा!”

हँसी हवा में उछलती। कोई आकाशगंगा जोड़ने में लगा। कोई दुआ माँग रहा। और दादी की आवाज़, धीमी, मगर जादुई, रात को कहानी में बदल देती। जिन्न आते। राजा जाते। भूत हँसते। और हम, नींद और ख्वाब के बीच झूलते रहते।

नीचे कमरों में घुटन थी। ऊपर छत पर राहत। नीचे सन्नाटा था। ऊपर गुफ़्तगू।

सबसे खूबसूरत रिश्ता था, छतों का रिश्ता। दीवारें थीं, मगर बस नाम की। एक छत से दूसरी छत, बस एक आवाज़ की दूरी पर।

“भाभी, ज़रा नमक देना!” “आज क्या बना?” “अरे सुनो तो…”

आवाज़ें उड़तीं। हँसी पार जाती। पूरा मोहल्ला एक साँस में जीता। जैसे हर घर, एक ही घर हो।

खाना भी छत पर ही। सादा, मगर दिल का। और फिर असली सितारे; आम और खरबूजे। घंटों पानी में डूबे फल। ठंडे, मीठे, रस से भरे। फाँकें कटतीं। रस टपकता। हाथ चिपचिपे। दिल खुश।

कोई औपचारिकता नहीं। कोई दूरी नहीं। बस बाँटना… और साथ होना।

कहीं कोने में ट्रांजिस्टर खड़खड़ाता। कभी आकाशवाणी। कभी मोहम्मद रफ़ी। गाना एक घर से उठता, पूरे मोहल्ले का हो जाता। कहीं दूर मंदिर की घंटी। बीच में बच्चों की हँसी। यही था असली संगीत।

हर रात हल्की नहीं होती थी। कुछ रातें भारी भी होतीं। बंटवारे की यादें। बिछड़े घरों की कसक।

कोई नानी आसमान को ताकती रहती। जैसे पुराने घर की छत वहीं कहीं छुपी हो। खुले आकाश में उसे सुकून मिलता। चार दीवारें उसे कैद लगतीं।

मगर ज़्यादातर रातें जिंदा थीं। नंगे पैर दौड़ते बच्चे। जुगनू पकड़ते हाथ। और जवान दिल… उनके लिए छत सबसे प्यारी जगह थी। नीची मुँडेर। ऊँचे अरमान। एक नज़र उधर। एक मुस्कान इधर।

चारपाई ठीक करने का बहाना। आसमान देखने का बहाना। मोहब्बत अपनी राह खुद बना लेती। ज़्यादा जगह नहीं चाहिए होती उसे। बस एक छत… और थोड़ी सी हवा।

सिनेमा ने भी इन छतों के जादू को खूब पकड़ा। Garam Hawa की उदास छतें, जहाँ यादें भी सोती थीं और दर्द भी जागता था। Delhi-6 की जुड़ी छतें, जहाँ दोस्ती और मोहब्बत एक ही हवा में सांस लेते थे। Vicky Donor की हल्की-फुल्की रातें, जहाँ नजरें चुपके से मिलती थीं। और Manmarziyaan के बेचैन दिल, जिन्हें छतों पर खुला आसमान मिलता था। फिल्मों ने जो दिखाया, वो कोई कल्पना नहीं थी। वो हमारे मोहल्लों की रोज़मर्रा की हकीकत थी। वो सिनेमा नहीं था। वो हमारी जिंदगी थी। हर मोहल्ला एक कहानी था। हर छत, एक राज़।

रिटायर्ड मास्साब विश्वास सर कहते हैं, “खाने के बाद सब ऊपर आ जाते थे। नानी पंखा झलतीं। अब्बा किस्से सुनाते। अम्मा लोरी गाती। कहीं से चमेली की खुशबू आती। और कोई आशिक़… चुपके से दिल की बात कह जाता।”

उषा दादी हँसकर जोड़ती हैं, “छत हर घर को थिएटर बना देती थी। जहाँ खुशी भी खेलती, ग़म भी… और रिश्ते भी।”

उन रातों में जादू था। न स्क्रीन की नीली रोशनी। न मशीनों का शोर। बस तारे। कभी टूटते हुए। और सबकी एक साथ निकली आवाज़: “ओह!” दिन की लू, रात में लोरी बन जाती। हवा थपकी देती। नींद आ जाती।

फिर वक्त बदला। छतें खाली होने लगीं। एसी आ गया। दरवाज़े बंद। खिड़कियाँ सील। हवा भी अब मशीन से आने लगी। मुँडेरें ऊँची हो गईं। रिश्ते नीचले। पड़ोसी दिखते नहीं। आवाज़ें सुनाई नहीं देतीं।

और हाँ, बंदरों ने भी कब्ज़ा कर लिया।

छत अब सुकून नहीं, जोखिम लगती है। अब कोई चारपाई नहीं बिछाता।कोई तारे नहीं गिनता। कोई दादी की कहानी नहीं सुनता।

बस स्क्रीन है। और स्क्रीन के पीछे… एक लंबी खामोशी। मगर यादें जिंदा हैं। गरम हवा जब चलती है, कुछ फुसफुसाती है: “याद है वो रातें? जब आसमान अपना था?”


Thursday, April 16, 2026

 भोर की हल्की गुलाबी रोशनी जैसे ही गोवर्धन परिक्रमा मार्ग को छूती है, घंटियों की ध्वनि और “राधे-राधे” की गूंज हवा में तैरती है। पर उसी हवा में एक कड़वी सच्चाई भी घुली होती है,  तीखी बदबू, जो श्रद्धा के इस पवित्र अनुभव को झकझोर देती है। भक्ति और बेबसी यहाँ साथ-साथ चलती हैं।

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ज्यादातर तीर्थ स्थलों की सबसे बड़ी समस्या है: हंगना

पर्याप्त संख्या में जब पब्लिक शौचालय हैं ही नहीं, तो जाएं तो जाएं कहां?

बृज का स्वच्छता संकट: हर साल 10 करोड़ श्रद्धालु, पर न के बराबर उपयोगी शौचालय

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बृज खंडेलवाल द्वारा

18 अप्रैल, 2026

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श्री कृष्ण और राधा रानी के प्रति अटूट आस्था लेकर हर दिन हजारों श्रद्धालु वृंदावन, मथुरा, गोवर्धन, बरसाना, गोकुल और नंदगांव की ओर खिंचे चले आते हैं। त्योहारों पर यह संख्या सैलाब बन जाती है। आस्था का यह समुद्र हर साल और गहरा होता जा रहा है।

आंकड़े भी यही कहानी कहते हैं। 2023 में मथुरा-वृंदावन में लगभग 7.9 करोड़ पर्यटक आए। 2024 में यह आंकड़ा 9 करोड़ पार कर गया। 2025 तक पूरे बृज क्षेत्र में श्रद्धालुओं की संख्या 10 करोड़ से अधिक हो गई। लेकिन इस बढ़ती भीड़ के साथ जो नहीं बढ़ा, वह है बुनियादी स्वच्छता ढांचा। साफ-सुथरे और चालू सार्वजनिक शौचालय आज भी गिनती के हैं, और जो हैं, वे अक्सर बदहाल।

अब यह समस्या केवल असुविधा नहीं रही। यह जन-स्वास्थ्य का गंभीर खतरा बन चुकी है। खुले में शौच से न केवल बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है, बल्कि पवित्र यमुना और घाट भी प्रदूषित हो रहे हैं। आस्था की यह भूमि अब गंदगी के बोझ तले कराह रही है।

गोवर्धन और मानसी गंगा क्षेत्र इसका सबसे सटीक उदाहरण हैं। 21 किलोमीटर की परिक्रमा मार्ग पर लाखों श्रद्धालु दिन-रात चलते हैं। लेकिन शौचालय की सुविधा न के बराबर है। सुबह का दृश्य चौंकाने वाला होता है, लोग खेतों और रास्तों के किनारे मजबूरी में शौच करते दिखते हैं।

गोवर्धन के बुजुर्ग पंडा बिरजो बाबा कहते हैं, “यह दृश्य बहुत अपवित्र है। धर्मशालाओं में कुछ शौचालय हैं, पर उनकी हालत खराब है। प्रशासन केवल तमाशा देख रहा है।”

मानसी गंगा और अन्य पवित्र कुंडों की स्थिति भी बेहतर नहीं। खुले में शौच से इनका जल दूषित हो रहा है। यह प्रदूषण अंततः यमुना तक पहुंचता है, जिससे समस्या और विकराल हो जाती है।

सबसे ज्यादा मार महिलाओं पर पड़ रही है। मथुरा के बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन के पास दीवारों के किनारे खड़ी कतारें इस मजबूरी की गवाही देती हैं। मौजूदा शौचालय इतने गंदे और असुरक्षित हैं कि लोग उनका इस्तेमाल करने से कतराते हैं।

महिलाओं के लिए यह स्थिति और भी भयावह है। या तो शौचालय हैं ही नहीं, या इतने असुरक्षित कि जाना खतरे से खाली नहीं। डॉक्टर चेतावनी देते हैं कि लंबे समय तक शौच रोकने से महिलाओं में यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन (UTI) का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। यह केवल असुविधा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य संकट है।

वृंदावन में वर्षों पहले बने सुलभ शौचालय अब जर्जर हो चुके हैं। सामाजिक कार्यकर्ता जॉय बताते हैं कि रखरखाव की भारी कमी है। सफाई, पानी और निगरानी, तीनों का अभाव है।

बरसाना, नंदगांव और गोकुल जैसे छोटे तीर्थस्थलों की स्थिति तो और भी खराब है। स्थानीय गाइड गोविंद शर्मा कहते हैं, “यहाँ शौचालय ऊँट के मुँह में जीरे के समान हैं। जो हैं भी, उनकी गंदगी सड़कों तक फैलती है।”

व्यापारी वर्ग भी अब खुलकर सामने आ रहा है। वृंदावन के व्यवसायी अंशु गोपाल का कहना है कि सरकार को भव्य परियोजनाओं के बजाय बुनियादी सुविधाओं पर ध्यान देना चाहिए। वहीं राजेंद्र अग्रवाल का मानना है कि केवल नए शौचालय बनाना काफी नहीं, उनका नियमित रखरखाव ज्यादा जरूरी है।

व्यापारी कन्हाई लाल सुझाव देते हैं कि मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण को हर नए निर्माण के साथ शौचालय और सीवर कनेक्शन अनिवार्य करना चाहिए। जब तक यह नियम सख्ती से लागू नहीं होगा, समस्या जस की तस रहेगी।

सच यह है कि बृज में स्वच्छता का संकट केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक प्राथमिकताओं का आईना है। मंदिरों के लिए करोड़ों का दान आता है, भव्य गलियारे बनते हैं, लेकिन शौचालय जैसी बुनियादी जरूरत आज भी हाशिये पर है।

सवाल सीधा है, क्या भक्ति केवल मंदिर की देहरी तक सीमित है? क्या पवित्रता का अर्थ केवल पूजा है, स्वच्छता नहीं?

श्री कृष्ण और राधा की यह पावन भूमि इससे कहीं बेहतर की हकदार है। 10 करोड़ श्रद्धालुओं की आस्था का सम्मान तभी होगा, जब उन्हें सम्मानजनक और स्वच्छ सुविधाएं मिलें।

अब समय आ गया है कि हर मंदिर, हर घाट और हर परिक्रमा मार्ग पर साफ, सुरक्षित और सुलभ शौचालयों का मजबूत नेटवर्क बनाया जाए। क्योंकि जहां स्वच्छता नहीं, वहां पवित्रता अधूरी है।

Wednesday, April 15, 2026

 


लुप्त हुए ट्रंक और कनस्तर: जब घरों में यादें ताला लगाकर रखी जाती थीं

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

17 अप्रैल 2026

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कभी घर सिर्फ ईंट और छत नहीं होते थे, यादों के गोदाम होते थे। उन यादों की रखवाली करते थे: कई भारी-भरकम ट्रंक और  खनखनाते कनस्तर।

दिल की गहराइयों में आज भी वो पुराना  ट्रंक चुपके से साँस लेता है। भारी, जिसके ऊपर पेंट से परिवार का नाम लिखा होता था “शर्मा परिवार, दिल्ली”। उसकी सलवटें, उसकी जंग लगी कुंडियाँ और वो मीठी-सी पुरानी  खुशबू… हर बार ढक्कन खोलते ही बचपन की गर्मियाँ लौट आती थीं। फौजी और रेलवही के गार्ड बाबू अभी भी काले चद्दर के बक्से उपयोग करते हैं।

घर के अंदर बड़े संदूकों में कपूर की सफेद गोलियाँ नीम के पत्तों के साथ सोई रहतीं। गर्मियों के हल्के सूती कपड़े एक तरफ, सर्दियों की ऊनी रजाइयाँ और गद्दे दूसरी तरफ। शादी-ब्याह के मौके पर वो ट्रंक जादू की तरह खुलता;  चादरें, गद्दे, रजाइयाँ निकलतीं और पूरा संयुक्त परिवार एक साथ हँसता-बोलता सज जाता। ट्रंक कभी पढ़ने की मेज बन जाता, कभी सोफा, कभी रेडियो का सिंहासन।

ट्रेन की छुट्टियों में जब पूरा कुनबा स्टेशन पहुँचता, कुली सिर पर होल्डॉल और ट्रंक रखे, कंधे पर बैग, हाथ में सुराही लिए आगे-आगे चलता। सीट न मिलने पर बच्चे ट्रंक पर ही बैठकर खिड़की से बाहर उड़ते बादलों को गिनते। दादी माँ उसी ट्रंक में खोया-पाया, पुरानी चिट्ठियाँ, थैले और हर जुगाड़ संभाल कर रखतीं। हर बच्चे का अपना छोटा ट्रंक;  लड़कियों के अंदर गुड़िया, चूड़ियाँ और गुप्त डायरी।

फिर आता कनस्तर। चमकता हुआ टिन का, जिसमें दादी छिपाकर लड्डू-मठरी रखतीं। चूहे डर के मारे भागते। गेहूँ, आटा, गुड़, चीनी… कई महीनों का वारदाना उसमें सोया रहता। इमरतबान में आम का मीठा आचार और नींबू की खट्टी खुशबू घर भर में फैलती।

आज अलमारी और पहिए वाले सूटकेस आ गए। दिल छोटे हो गए। न ट्रंक की वो गरिमा बची, न कनस्तर की वो मासूमियत। बच्चे अब बिस्तरबंद और होल्डॉल का नाम भी नहीं जानते। 

ट्रंक… लोहे का, हरे या नीले रंग का, ऊपर सफेद पेंट से लिखा नाम। जैसे कोई पहचान पत्र। हर घर में एक नहीं, कई ट्रंक। छोटा, बड़ा, दहेज वाला, बच्चों वाला। खोलते ही  खुशबू उड़ती थी। सर्दियों के स्वेटर, गर्मियों की मलमल, तह करके रखी साड़ियाँ, जैसे मौसम भी उनमें सांस लेता हो।

पुराने ज़माने के सख्त मास्साब रघुनाथ प्रसाद यादों के समंदर में खो जाते हैं: "संयुक्त परिवार की धड़कन थे ये ट्रंक। शादी-ब्याह का मौसम आता, तो वही ट्रंक गद्दे, रजाई, चादरों से भर उठते। मेहमान आते, तो वही ट्रंक मेज बन जाता। रेडियो उस पर सजता, बच्चे उस पर उछलते, और बड़े उस पर बैठकर किस्से बुनते। ट्रंक कोई चीज़ नहीं था, घर का चुपचाप खड़ा बुजुर्ग था।"

सुशीला ताई कहती हैं: "छुट्टियाँ आतीं, तो ट्रंक का असली सफर शुरू होता। ट्रेन की सीट कम पड़ जाए, तो बच्चे उसी पर बैठ जाते। साथ में होल्डोल, कसकर बांधा हुआ बिस्तरबंद, और एक सुराही, जिसका पानी रास्ते भर मीठा लगता था। स्टेशन पर कुली सिर पर ट्रंक, कंधे पर बैग, हाथ में सुराही, और पीछे हमारा भरपूर परिवार, जैसे कोई चलता-फिरता जुलूस हो।"

दादी का ट्रंक तो जैसे खजाना था। खोया-पाया, पुराने खत, टूटे खिलौने, और अचानक जरूरत पड़ने पर निकल आने वाले थैले: सब उसी में। हर सवाल का जवाब, हर कमी का जुगाड़, उसी ट्रंक के भीतर छिपा होता था।

और उधर, रसोई का सम्राट था: कनस्तर। टीन का, मोटा, ढक्कन पर कुंडी लगी हुई। उसमें घी की खुशबू बसती थी, तेल की चमक झलकती थी। चूहों से बचाने का किला था वह। लड्डू, मठरी, सेव, सब उसमें छिपाकर रखे जाते, दादी की गुप्त तिजोरी।

कनस्तर में महीनों का राशन सांस लेता था। गेहूं, आटा, दाल, चीनी, गुड़, सब। इमरतबान में आम और नींबू का अचार धूप में पकता था। कुछ घरों में टेंटी और लिसौड़े का भी स्वाद बसता था। साइकिल पर कनस्तर रखकर चक्की जाना, वह भी एक छोटा सा उत्सव था।

आज घर बड़े हैं, पर जगह छोटी। अलमारी और कपबोर्ड ने ट्रंक को बेदखल कर दिया। पहियों वाले सूटकेस और बैकपैक ने सफर का रोमांस चुरा लिया है। बच्चों को पता भी नहीं कि बिस्तरबंद कैसे कसते हैं, होल्डोल क्या होता है।

और कनस्तर? वह तो जैसे कहानी बन गया। अब सब कुछ छोटे पैकेट में आता है। जरूरत जितनी, खरीद उतनी। न भंडारण, न इंतजार, न वो धैर्य।

कभी-कभी लगता है, उन ट्रंकों में सिर्फ कपड़े नहीं, रिश्ते तह करके रखे जाते थे। कनस्तर में सिर्फ अनाज नहीं, घर की खुशहाली बंद होती थी। आज सब खुला है, सब उपलब्ध है, फिर भी कुछ कमी सी है।

शायद सच यही है: घर सिकुड़ गए, सामान सिमट गया, और दिल भी थोड़े छोटे हो गए।

ट्रंक , कनस्तर और इमरतबान चले गए… और साथ ले गए एक पूरा जमाना, जो अब सिर्फ यादों में धीरे-धीरे खनकता है।