Saturday, June 13, 2026

 भारत की सबसे बड़ी ताकत: यहां अच्छी ज़िंदगी अभी भी आम आदमी की पहुंच में है

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माना कि ग़म बहुत हैं जमाने में,

पर दिल बहलाने के बहाने भी बहुत हैं

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अक्सर यात्रा करने वालों को हकीकत, यानी ग्राउंड रियलिटीज से नजदीकी रिश्ता हो जाता है, जो नेताओं के बयानों, या अखबारी संपादकीयों से भिन्न होता है। दो घंटे पड़ोसी यात्री,  जो अमेरिका से हाल ही में लौटा है, से बतिया के, बंगलौर के नए बने एयर टर्मिनल पर उतरते ही नए भारत की एक आकर्षक तस्वीर से सामना हुआ। 

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बृज खंडेलवाल द्वारा

15 जून 2026

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सुबह दूध वाला घंटी बजाता है।

अख़बार दरवाज़े पर आ गिरता है।

मोबाइल पर एक क्लिक करते ही सब्ज़ी, दवा और खाना घर पहुंच जाता है। डॉक्टर उसी दिन मिल जाता है। घर की सफाई हो चुकी होती है।

भारत में करोड़ों लोगों के लिए यह कोई विलासिता नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा है। सर्विस सेक्टर का चौंकाने वाला विस्तार हुआ है, हर तरह की सेवा, किसी ऐप के द्वारा, फटाफट उपलब्ध है।

यही वजह है कि आज भारत दुनिया के सबसे आकर्षक देशों में से एक बनकर उभर रहा है।

दशकों तक भारतीयों की निगाहें पश्चिम की ओर लगी रहीं। अमेरिका अवसरों की धरती माना गया। यूरोप समृद्धि का प्रतीक था। विदेशी नौकरी और पासपोर्ट सफलता का पर्याय समझे जाते थे। यह सपना आज भी बहुतों को आकर्षित करता है। लेकिन विदेशों में बसे अनेक भारतीय अब एक नई सच्चाई को समझ रहे हैं। अच्छी ज़िंदगी केवल ऊंची तनख्वाह से नहीं मिलती।

कई बार उसकी असली पहचान रोज़मर्रा की सुविधाओं से होती है।

मोबाइल इंटरनेट इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। भारत ने डिजिटल क्रांति को आम आदमी तक पहुंचा दिया है। दुनिया में सबसे सस्ते डेटा प्लान यहीं मिलते हैं। कुछ सौ रुपये में महीने भर वीडियो कॉल, ऑनलाइन पढ़ाई, मनोरंजन और कारोबार चल सकता है। जिन सुविधाओं पर पश्चिमी देशों में हजारों रुपये खर्च होते हैं, वे भारत में बेहद सुलभ हैं।

फिर आती है यूपीआई की कहानी।

चाय वाला हो या सब्ज़ी बेचने वाला, रिक्शा चालक हो या बड़ा शोरूम, हर कोई एक ही डिजिटल भुगतान व्यवस्था से जुड़ा है। न छुट्टे पैसे की चिंता, न बैंक के चक्कर। मोबाइल का एक स्कैन और भुगतान पूरा। भारत ने डिजिटल भुगतान का ऐसा मॉडल बनाया है जिसकी चर्चा दुनिया भर में हो रही है।

विदेशी पर्यटक अक्सर हैरान रह जाते हैं जब सड़क किनारे नारियल बेचने वाला भी क्यूआर कोड से भुगतान स्वीकार करता है।

स्वास्थ्य सेवाओं की तस्वीर भी कम दिलचस्प नहीं है।

दुनिया के कई देशों में डॉक्टर के पास जाना जेब पर भारी पड़ सकता है। भारत में अब भी बड़ी आबादी के लिए चिकित्सा अपेक्षाकृत सुलभ और किफायती है। आधुनिक अस्पतालों में दुनिया भर से मरीज इलाज कराने आते हैं। वहीं मोहल्लों के क्लीनिक आज भी लाखों लोगों की जरूरतें पूरी कर रहे हैं।

भारत का मेडिकल टूरिज्म उद्योग केवल कम लागत की वजह से नहीं, बल्कि बेहतर चिकित्सा सुविधाओं के कारण भी तेजी से बढ़ रहा है।

लेकिन शायद भारत की सबसे बड़ी सुविधा समय है।

मध्यम वर्ग का परिवार भी घरेलू सहायक, रसोइया, ड्राइवर या देखभाल करने वाले कर्मचारी की मदद ले सकता है। इससे कामकाजी लोगों को परिवार, करियर और अपने शौक के लिए अधिक समय मिलता है।

पश्चिमी देशों में ऐसी सेवाएं अक्सर केवल अमीरों तक सीमित रहती हैं।

भारत में किफायत और सुविधा मिलकर जीवन को आसान बनाती हैं।

ट्रांसपोर्ट भी इस कहानी का अहम हिस्सा है।

मेट्रो, बस, ऑटो और रेल आज भी आम आदमी की पहुंच में हैं। नई एक्सप्रेसवे परियोजनाएं, आधुनिक हवाई अड्डे, मेट्रो नेटवर्क और तेज़ रेल सेवाएं देश को पहले से कहीं बेहतर तरीके से जोड़ रही हैं।

यह बदलाव किसी चमत्कार से कम नहीं।

जिस देश को कभी लालफीताशाही और धीमी व्यवस्था के लिए जाना जाता था, वही आज डिजिटल प्रशासन और बुनियादी ढांचे के विकास का उदाहरण बनता जा रहा है।

लेकिन भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि न तो इंटरनेट है, न यूपीआई और न ही सड़कें।

उसकी सबसे बड़ी ताकत है यहां की जीवंत जीवनशैली।

कहां मिलेगा ऐसा देश जहां शहरों  में दिवाली, ईद, क्रिसमस, गुरुपर्व और होली की रौनक दिखाई दे? कहां मिलेगा ऐसा देश जहां बर्फीले पहाड़, रेगिस्तान, समुद्र तट, वर्षावन और महानगर एक ही राष्ट्र की पहचान हों?

भारत केवल एक देश नहीं है।

यह अनेक संसारों का संगम है।

यहां त्योहार सड़कों पर उतर आते हैं। शादियां पूरे समाज का उत्सव बन जाती हैं। पड़ोसी परिवार जैसे लगते हैं। दादा-दादी और नाना-नानी बच्चों के जीवन का हिस्सा बने रहते हैं। दोस्तियां दशकों तक चलती हैं।

दुनिया के कई हिस्सों में यह सामाजिक ताना-बाना धीरे-धीरे कमजोर पड़ रहा है।

बेशक भारत के सामने चुनौतियां भी हैं। यातायात की अव्यवस्था है। प्रदूषण चिंता का विषय है। बुनियादी सुविधाओं में असमानता है। 

लेकिन इन सबके बावजूद भारत एक अनमोल चीज़ देता है। कम खर्च में बेहतर जीवन।

इसीलिए कई प्रवासी भारतीय वापस लौट रहे हैं। इसीलिए विदेशी पेशेवर भारत को अपना ठिकाना बना रहे हैं।

इसीलिए उद्यमी, डिजिटल नोमैड, सेवानिवृत्त लोग और युवा परिवार भारत को नए नजरिए से देखने लगे हैं।

आधुनिक भारत की कहानी केवल आर्थिक विकास या तकनीकी प्रगति की कहानी नहीं है।

यह उस देश की कहानी है जहां जीवन अब भी रिश्तों से चलता है। जहां छोटी-छोटी खुशियां बड़ी दौलत मानी जाती हैं। जहां घर, परिवार और समुदाय आज भी सबसे बड़ी पूंजी हैं।

अच्छी ज़िंदगी जीने के लिए हमेशा अमीर होना जरूरी नहीं। और शायद यही भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

Thursday, June 11, 2026

 गर्मियों की छुट्टी का मजा, रोमांच हुआ गायब

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नानी तेरी मोरनी को...

बचपन बिकाऊ है!

नानी के घर से स्पोर्ट्स कोचिंग तक का सफर

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

13 जून 2026

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वे भी क्या दिन थे।

गर्मी की छुट्टियां शुरू होते ही बच्चों की दुनिया बदल जाती थी। कोई नानी के घर भागता था, कोई दादा-दादी के गांव। कोई पहाड़ों में ट्रेकिंग करता, कोई आम के बागों में चढ़ जाता। दोपहरें कॉमिक्स पढ़ते गुजरती थीं। शामें गिल्ली-डंडा, पतंगबाजी और बेवजह की शरारतों में बीतती थीं।

घड़ी का कोई महत्व नहीं था। कोई लक्ष्य नहीं था। कोई प्रदर्शन नहीं था। छुट्टियां आत्मा की मरम्मत का मौसम थीं।

फिर भारत बदल गया।

अब गर्मी की छुट्टियां भी बच्चों की नहीं रहीं।

सुबह स्विमिंग क्लास। फिर क्रिकेट अकादमी। फिर गिटार सीखना। फिर डांस क्लास। फिर कोडिंग कोर्स। फिर स्पोकन इंग्लिश। शाम को ऑनलाइन वर्कशॉप।

बच्चा स्कूल से छुट्टी पाता है, लेकिन बचपन से नहीं।

आज भारत में जन्म लेते ही प्रतिस्पर्धा शुरू हो जाती है। डेढ़-दो साल के बच्चों को प्ले स्कूल भेजा जा रहा है, जब वे ठीक से बोलना भी नहीं सीख पाए होते। मध्यमवर्गीय परिवार सालाना पचास हजार से एक लाख रुपये तक फीस भर रहे हैं। माता-पिता को डर है कि कहीं उनका बच्चा दौड़ में पीछे न रह जाए।

और यह डर काल्पनिक नहीं है।

भारत में अवसर सीमित हैं और दावेदार करोड़ों। अच्छी नौकरियां कम हैं। सरकारी नौकरियां और भी कम। प्रतिष्ठित कॉलेजों में सीटें मुट्ठी भर हैं। यही वजह है कि कोचिंग संस्कृति एक समानांतर शिक्षा व्यवस्था बन चुकी है। बच्चा स्कूल में पढ़ता है, फिर कोचिंग में पढ़ता है, फिर टेस्ट सीरीज में बैठता है। उसकी पूरी किशोरावस्था प्रतियोगिता की प्रयोगशाला बन जाती है।

लेकिन अब यह होड़ केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं है।

खेल भी कमाई का नया टिकट बन गए हैं।

माता-पिता क्रिकेटरों की करोड़ों की नीलामी देखते हैं। ओलंपिक पदक विजेताओं को मिलने वाले नकद पुरस्कार देखते हैं। सरकारी नौकरियां और विज्ञापन अनुबंध देखते हैं। फिर वे अपने बच्चों को खेल अकादमियों में भेज देते हैं। खेल अब स्वास्थ्य, आनंद और मित्रता का माध्यम कम, करियर की रणनीति अधिक बनता जा रहा है।

सच यह है कि कुछ बच्चे सितारे बनेंगे, लेकिन लाखों नहीं। हर सफल खिलाड़ी के पीछे हजारों ऐसे बच्चे होंगे जो वर्षों का समय, मेहनत और उम्मीदें लगाकर भी मंजिल तक नहीं पहुंच पाएंगे।

इसी बीच मनोरंजन उद्योग ने भी बचपन को बाजार में उतार दिया है।

गायन प्रतियोगिताएं, नृत्य प्रतियोगिताएं, टैलेंट शो और क्विज कार्यक्रम बच्चों को सफलता के शॉर्टकट के रूप में बेच रहे हैं। माता-पिता ऑडिशन दर ऑडिशन भटक रहे हैं। बच्चे कैमरों, जजों और वोटिंग के दबाव में बड़े हो रहे हैं।

कुछ को शोहरत मिलती है। कुछ को पुरस्कार मिलते हैं। लेकिन अधिकांश बच्चे कुछ वर्षों बाद गुमनामी में लौट आते हैं। पीछे छूट जाती है थकान, निराशा और खोया हुआ बचपन।

सबसे दुखद बात यह है कि बच्चों के पास अब खाली समय नहीं बचा।

खाली समय, जिसे आधुनिक समाज लगभग अपराध मानने लगा है।

किताबें पढ़ना समय की बर्बादी समझा जाता है। पेड़ों पर चढ़ना अनुपयोगी गतिविधि बन गया है। दादा-दादी और नाना-नानी की कहानियां किसी पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं हैं। गांव की गलियां, खेतों की पगडंडियां, रिश्तेदारों के घरों की चहल-पहल और बेफिक्र आवारागर्दी अब धीरे-धीरे स्मृतियों का हिस्सा बनती जा रही हैं। जिन बच्चों को कुछ नहीं करना वो मोबाइल वाचिंग करते हैं, या रील बनाते हैं।

हर शौक को करियर में बदला जा रहा है। गाना सीखो ताकि स्टार बनो। नाचो ताकि टीवी पर आ सको। खेलो ताकि करोड़पति बन सको। कोडिंग सीखो ताकि नौकरी मिल सके। अंग्रेजी सीखो ताकि इंटरव्यू निकल जाए।

मानो जीवन का हर क्षण किसी भविष्य की कमाई में निवेश किया जाना चाहिए।

पैसे की चमक इतनी तेज हो गई है कि बचपन उसकी रोशनी में धुंधला पड़ गया है।

समस्या खेल, संगीत, पढ़ाई या प्रतियोगिताओं में नहीं है। समस्या उस मानसिकता में है जो हर बच्चे को एक परियोजना, एक निवेश और एक संभावित आय स्रोत की तरह देखने लगी है।

माता-पिता दोषी नहीं हैं। वे डरे हुए हैं। महंगाई बढ़ रही है। रोजगार अनिश्चित हैं। भविष्य धुंधला है। वे अपने बच्चों के लिए सुरक्षा चाहते हैं।

लेकिन इस प्रक्रिया में एक बड़ा सवाल अनुत्तरित रह जाता है।

यदि बच्चा बचपन में ही थक गया, तो वह जीवन कब जिएगा?

यदि छुट्टियां भी प्रशिक्षण शिविर बन गईं, तो यादें कहां बनेंगी?

यदि हर प्रतिभा का मूल्य रुपये में तय होगा, तो खुशी का मूल्य कौन तय करेगा?

शायद हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी यही है।

हम बच्चों को भविष्य के लिए तैयार करते-करते उनका वर्तमान छीन रहे हैं।

और एक दिन जब वे सफल होकर पीछे मुड़कर देखेंगे, तो शायद पूछेंगे: 

वे गर्मियां कहां चली गईं, जिनमें जिंदगी कमाई नहीं, खुशियां हुआ करती थी?

Wednesday, June 10, 2026

 


धार्मिक स्थलों को उन्मादी भीड़ से बचाओ

तीर्थ स्थान या थीम पार्क?

रीलबाज़ों, सेल्फीबाज़ों और धार्मिक पर्यटन की भीड़ ने पवित्र स्थलों का क्या हाल कर दिया है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

12 जून 2026

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क्या भगवान अब भक्तों से मिलते हैं या कैमरे के लेंस से?

क्या तीर्थयात्रा अब आत्मा की यात्रा है या इंस्टाग्राम की स्टोरी?

इन दिनों किसी भी पवित्र धाम का दृश्य देख लीजिए। वृंदावन हो, केदारनाथ हो, बद्रीनाथ हो या वैष्णो देवी। ऐसा लगता है जैसे किसी धार्मिक स्थल पर नहीं, बल्कि किसी मेले, पिकनिक स्पॉट या मनोरंजन पार्क में पहुँच गए हों। हाथ में माला कम, मोबाइल ज्यादा हैं। भक्ति कम, रील ज्यादा है। श्रद्धा कम, प्रदर्शन ज्यादा है।

भारत की प्राचीन परंपरा में तीर्थयात्रा जीवन के उत्तरार्ध का विषय मानी जाती थी। जब व्यक्ति संसार के मोह-माया, दौड़-धूप और महत्वाकांक्षाओं से कुछ दूरी बनाता था, तब वह ईश्वर की ओर मुड़ता था। साठ वर्ष की आयु के बाद वानप्रस्थ और आध्यात्मिक जीवन की परिकल्पना यूँ ही नहीं की गई थी। इसके पीछे गहरा सामाजिक और मनोवैज्ञानिक अनुभव था।

लेकिन आज तस्वीर उलट गई है।

कॉलेज से छुट्टी मिली नहीं कि चलो वृंदावन। नई कार खरीदी नहीं कि चलो चारधाम। शादी की सालगिरह है तो केदारनाथ।  हनीमून, चलो तिरुपति जी के दर्शन से शुरू करें, वेरी गुड idea!! जन्मदिन है तो महाकाल। मंदिर अब मन की शांति के स्थान नहीं रहे, बल्कि "चेक-इन" करने और सोशल मीडिया पर दिखाने के मंच बनते जा रहे हैं।

इन धार्मिक स्थलों पर पहुँचने वाली विशाल युवा भीड़ अपने साथ क्या ला रही है?

प्लास्टिक की बोतलें। चिप्स के पैकेट। डिस्पोज़ेबल कप। लाउडस्पीकर जैसी आवाजें। सड़क किनारे फैला कचरा। शराब की खाली बोतलें। सेल्फी के लिए धक्का-मुक्की। ऊँची आवाज में फिल्मी गाने। और सबसे बढ़कर, पवित्रता के प्रति उदासीनता।

हिमालय के नाज़ुक पारिस्थितिकी तंत्र पर इसका असर साफ दिख रहा है। पहाड़ कूड़ेदान बन रहे हैं। नदियाँ प्लास्टिक से भर रही हैं। तीर्थ मार्गों पर कूड़े के ढेर लग रहे हैं। जहाँ कभी घंटियों और मंत्रों की ध्वनि सुनाई देती थी, वहाँ अब मोबाइल नोटिफिकेशन और रीलों का शोर गूँजता है।

भक्ति अब एक उपभोक्ता उत्पाद बन गई है।

एक पैकेज टूर खरीदिए। हेलीकॉप्टर से दर्शन कीजिए। पाँच मिनट मंदिर में बिताइए। दस सेल्फियाँ लीजिए। फिर लौटकर घोषणा कर दीजिए कि आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त हो गया।

यह आध्यात्मिकता नहीं है। यह धार्मिक उपभोक्तावाद है।

कड़वा लग सकता है, लेकिन शायद समय आ गया है कि हम एक असहज प्रश्न पूछें। क्या सभी तीर्थस्थल पर्यटन के लिए खुले रहने चाहिए? क्या हर धार्मिक स्थल को मनोरंजन और अवकाश उद्योग का हिस्सा बना देना चाहिए?

शायद नहीं।

देश के प्रमुख तीर्थस्थलों पर आयु-आधारित प्रतिबंधों पर गंभीर बहस होनी चाहिए। कम से कम पचास या साठ वर्ष से कम आयु के लोगों की सामान्य पर्यटक एंट्री सीमित की जा सकती है। विशेष धार्मिक, शैक्षिक या पारिवारिक कारणों को छोड़कर तीर्थस्थलों को वरिष्ठ नागरिकों और वास्तविक साधकों के लिए प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

यह किसी पीढ़ी के खिलाफ युद्ध नहीं होगा। बल्कि पवित्र स्थलों की गरिमा बचाने का प्रयास होगा।

युवाओं के लिए घूमने-फिरने के हजार विकल्प हैं। पहाड़ हैं। समुद्र तट हैं। ट्रैकिंग है। खेल हैं। सांस्कृतिक यात्राएँ हैं। रोमांचक पर्यटन है। जीवन का आनंद लीजिए। दुनिया देखिए। काम कीजिए। सपने पूरे कीजिए।

लेकिन हर जगह को पर्यटन स्थल बना देना बुद्धिमानी नहीं है।

कुछ स्थान ऐसे भी होने चाहिए जहाँ शांति हो। मौन हो। ध्यान हो। अनुशासन हो। जहाँ लोग फोटो खिंचवाने नहीं, आत्मचिंतन करने जाएँ।

आज वृंदावन की गलियाँ, गंगा के घाट, हिमालय के धाम और अनेक मंदिर उस भीड़ के बोझ तले कराह रहे हैं जो दर्शन से अधिक प्रदर्शन में विश्वास करती है। यह "टच एंड गो" संस्कृति तीर्थों को आध्यात्मिक केंद्रों से मनोरंजन केंद्रों में बदल रही है।

यदि अभी नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ियाँ मंदिर तो देखेंगी, लेकिन उनकी आत्मा खो चुकी होगी।

तीर्थ यात्रा कोई वीकेंड पिकनिक नहीं है। यह मन की तैयारी, अनुशासन, संयम और श्रद्धा की यात्रा है।

जब तक हम इस अंतर को नहीं समझेंगे, तब तक हमारे पवित्र स्थल भीड़ तो जुटाएँगे, लेकिन भक्ति नहीं। श्रद्धालु तो आएँगे, लेकिन शांति नहीं। मंदिर तो बचेंगे, मगर उनकी मर्यादा धीरे-धीरे भीड़ के पैरों तले कुचलती चली जाएगी।

 10 जून 2026

बैडमिंटन लंदन में 

जब माई लार्ड बैडमिंटन खेलने विलायत गए!!!


बृज खंडेलवाल द्वारा 


भारत की न्याय व्यवस्था का पेंडिंग, लंबित मामलों का पहाड़ किसी अजूबे से कम नहीं। पांच करोड़ से अधिक मुकदमे अदालतों की अलमारियों और कंप्यूटरों में धूल फांक रहे हैं।


विचाराधीन कैदी अपनी संभावित सजा से भी ज्यादा समय जेलों में काट देते हैं। किसान, मजदूर, पीड़ित महिलाएं और आम नागरिक एक तारीख से दूसरी तारीख तक भटकते रहते हैं। कई मामलों में न्याय तब मिलता है, जब पीड़ित के बाल सफेद हो चुके होते हैं और अगली पीढ़ी जवान हो जाती है।


लेकिन इस विशाल बोझ तले दबे देश के मुख्य न्यायाधीश लंदन में हैं। बैडमिंटन कोर्ट पर। रैकेट हाथ में, शटलकॉक हवा में, पांच लाख रुपये की पुरस्कार राशि दांव पर, और पूरा आयोजन पूरे शबाब पर।


वही न्यायपालिका, जिसने कभी बेरोजगार युवाओं को "कॉकरोच" कहकर संबोधित किया था, अब न्याय की हथौड़ी छोड़ रैकेट थामे हुए है। अदालतों की फाइलें धूल खाती रहें, लेकिन स्मैश शानदार होने चाहिए।

दृश्य वाकई मनमोहक है। चतुर गुणी जन कहते हैं हमारी महान  न्यायपालिका पूरी तरह स्वतंत्र दिखाई देती है: जवाबदेही से, तात्कालिकता से, और कभी-कभी तो भारतीय धरती से भी। लगभग डेढ़ सौ न्यायाधीश और वरिष्ठ वकील लंदन पहुंच गए। किसी न्यायिक सुधार सम्मेलन के लिए नहीं। लंबित मामलों के एवरेस्ट जैसे संकट पर मंथन करने के लिए नहीं। बल्कि शटलकॉक कूटनीति के लिए।

और कानून मंत्री किरेन रिजिजू? उनका काम न्याय व्यवस्था की चरमराती मशीनरी को दुरुस्त करना है। मगर वे भी इस खेल महोत्सव का हिस्सा बने। लंदन पहुंचे, टूर्नामेंट का उद्घाटन किया, और शामें भारत को "विश्वगुरु" बनाने की चर्चाओं में बिताईं। रैलियों, स्वागत समारोहों और सौहार्दपूर्ण मुलाकातों के बीच भविष्य के भारत का खाका भी खींचा गया।

ज़रा कल्पना कीजिए। दिन में बैडमिंटन, रात में नेटवर्किंग। कार्यपालिका और न्यायपालिका विदेशी धरती पर इतने आत्मीय भाव से साथ दिख रही हैं कि शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत भी शायद दर्शक दीर्घा में बैठकर असहज महसूस कर रहा हो।

न्याय भले ही आंखों पर पट्टी बांधता हो, लेकिन वह फिटनेस के मामले में पूरी तरह सजग दिखाई देता है। चुस्त, फुर्तीला और पांच करोड़ लंबित मामलों की मूक पुकारों को अनसुना करने की अद्भुत क्षमता से लैस।

इस भव्य रंगमंच में असली विजेता कौन हैं? शटलकॉक।

और पराजित? वे करोड़ों भारतीय जो अब भी यह भोली उम्मीद लगाए बैठे हैं कि अदालतों में न्याय सिर्फ मिलेगा ही नहीं, समय पर भी मिलेगा।

खेल खत्म। सेट पूरा। और जीत एक बार फिर बैकलॉग के नाम।


Tuesday, June 9, 2026

 क्या भारत की एग्जाम फैक्ट्री कॉकरोच पैदा कर रही है!

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भारत का 58,000 करोड़ रुपये का कोचिंग उद्योग बच्चों को बचा भी रहा है और बर्बाद भी.....

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

10 जून 2026

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पहले जमाने में, कमजोर बच्चों को प्राइवेट ट्यूशन की जरूरत पड़ती थी, अब हर किसी को......

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भारत की शिक्षा व्यवस्था के अंधेरे गलियारों में आखिर रेंगता क्या है?

सपने? महत्वाकांक्षाएं? उम्मीदें?

या फिर कुछ और?

आधी रात को मेज पर झुका एक टीनएजर । लाल आंखें। थका हुआ शरीर। सामने बिखरे टेस्ट पेपर। दूसरी ओर माता-पिता, जो कोचिंग की फीस भरने के लिए कर्ज़ और कुर्बानियों का हिसाब लगा रहे हैं। बच्चे, जो खुद को इंसान नहीं, बल्कि एक रैंक और प्रतिशत के रूप में देखने लगे हैं।

कोचिंग उद्योग इसे तैयारी कहता है।

बहुत से छात्र इसे जद्दोजहद और जीवित रहने की लड़ाई कहते हैं।

जून 2026 में पटना की सड़कों पर जो कुछ हुआ, उसने इस विरोधाभास को नंगा कर दिया। खान ग्लोबल स्टडीज़ के बाहर विरोध प्रदर्शन, तोड़फोड़, आरोप और प्रत्यारोपों का तूफान उठ खड़ा हुआ। सोशल मीडिया गरज उठा। नेता भी मैदान में कूद पड़े।

और उधर दिल्ली के जंतर मंतर पर कॉकरोचों का अजीब प्रदर्शन!

यह सिर्फ एक स्थानीय विवाद नहीं था। यह भारत के कोचिंग उद्योग की आत्मा की एक झलक थी।

एक ऐसी दुनिया, जहां कुछ शिक्षक फिल्मी सितारों जैसी लोकप्रियता रखते हैं। जहां शैक्षणिक संस्थान कॉरपोरेट साम्राज्य की तरह काम करते हैं। जहां प्रतिस्पर्धा, मुनाफा और जवाबदेही की कमी आपस में टकराती है। और जहां सबसे बड़ी कीमत अक्सर छात्रों को चुकानी पड़ती है।

सवाल असहज है।

कैसा है ये समाज जो अपने सोलह साल के बच्चे से कहता है कि अगले दो साल उसकी पूरी जिंदगी की कीमत तय करेंगे?

कैसे कुछ लोग इस विश्वास के इर्द-गिर्द 58,000 करोड़ रुपये का उद्योग खड़ा कर देते हैं?

कोचिंग अब शिक्षा का सहायक साधन नहीं रही। यह समानांतर शिक्षा व्यवस्था बन चुकी है। सात करोड़ से अधिक छात्र किसी न किसी रूप में कोचिंग से जुड़े हुए हैं। अनुमान है कि अगले कुछ वर्षों में यह उद्योग 1.3 लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा पार कर सकता है।

आंकड़े इस दीवानगी की वजह बताते हैं।

हर साल 11 लाख से अधिक छात्र जेईई की परीक्षा देते हैं। करीब 20 लाख छात्र नीट में बैठते हैं। देश के प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश पाने की संभावना कई बार पांच प्रतिशत से भी कम होती है।

जब मुकाबला इतना बेरहम हो, तो माता-पिता केवल स्कूलों पर भरोसा करना छोड़ देते हैं।

वे अपने बच्चों को कोटा भेजते हैं। पटना भेजते हैं। सीकर भेजते हैं। हैदराबाद भेजते हैं। ऐसे छात्रावासों में, जहां जिंदगी व्हाइटबोर्ड, रैंकिंग, टेस्ट और प्रदर्शन चार्ट के बीच सिमट जाती है।

कोचिंग उद्योग का उभार कोई हादसा नहीं था। यह उस शिक्षा व्यवस्था का स्वाभाविक नतीजा है जो योग्यता का वादा तो करती है, मगर कई बार लॉटरी जैसी महसूस होती है। करोड़ों मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए आईआईटी या एम्स का प्रवेश पत्र आर्थिक असुरक्षा से मुक्ति का सुनहरा टिकट माना जाता है।

स्कूल अब भी रटने को पुरस्कृत करते हैं। प्रतियोगी परीक्षाएं तेजी, रणनीति और विशेष कौशल मांगती हैं। कक्षा और परीक्षा कक्ष के बीच एक विशाल खाई मौजूद है।

कोचिंग उद्योग उस खाई को भरने आया था। फिर उसे एहसास हुआ कि यही खाई उसकी सबसे बड़ी कमाई बन सकती है।

तकनीक ने इस कारोबार को और विस्तार दिया है। ऑनलाइन कक्षाएं, रिकॉर्डेड लेक्चर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और व्यक्तिगत शिक्षण उपकरणों ने कोचिंग को महानगरों की सीमाओं से बाहर पहुंचा दिया है। अब छोटे शहर का छात्र भी वही व्याख्यान सुन सकता है जो दिल्ली या मुंबई का छात्र सुनता है।

उद्योग इसे लोकतंत्रीकरण कहता है।

आलोचक इसे बाज़ारीकरण कहते हैं।

दोनों में कुछ न कुछ सच्चाई है।

लेकिन इस उद्योग के सबसे काले अध्याय तब सामने आते हैं जब भारी दबाव और भारी पैसा एक साथ मिलते हैं।

नीट पेपर लीक कांड पूरे देश को झकझोर गया। जांच में ऐसे नेटवर्क सामने आए जो परीक्षा केंद्रों से कहीं आगे तक फैले थे। वर्षों से मेहनत कर रहे छात्रों को अचानक महसूस हुआ कि जिस व्यवस्था पर उन्होंने भरोसा किया था, वह भीतर से खोखली भी हो सकती है।

नुकसान केवल प्रश्नपत्र लीक होने का नहीं था।

भरोसा भी लीक हो गया था।

सुर्खियों से दूर कुछ और त्रासदियां भी हैं।

'डमी एडमिशन' अब आम बात बन चुकी है। छात्र स्कूलों में सिर्फ कागजों पर नामांकित रहते हैं, जबकि उनका अधिकांश समय कोचिंग संस्थानों में गुजरता है। कक्षाएं खाली होती जाती हैं। स्कूलों की भूमिका कमजोर पड़ती जाती है।

फिर आती है मानसिक स्वास्थ्य की समस्या।

चिंता। अवसाद। अकेलापन। थकान।

छात्र समीकरण हल करना सीखते हैं।

निराशा से निपटना नहीं।

असमानता का पहलू भी कम चिंताजनक नहीं है। संपन्न परिवार महंगी कोचिंग, निजी मार्गदर्शन और अनगिनत टेस्ट सीरीज़ खरीद सकते हैं। गरीब परिवारों के बच्चे वही लड़ाई कहीं कम संसाधनों के साथ लड़ते हैं।

कागज पर दौड़ सबके लिए समान है।

हकीकत में कुछ धावकों के पैरों में पहले से ही बोझ बंधा होता है।

समाधान कोचिंग संस्थानों को खलनायक घोषित करने में नहीं है। वे इसलिए पैदा हुए क्योंकि व्यवस्था ने उनकी जरूरत पैदा की।

असली सुधार कहीं और है।

आईआईटी, एम्स और अच्छे सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में सीटें बढ़ाई जाएं। प्रवेश परीक्षाओं को रटंत प्रणाली से हटाकर समझ और विश्लेषण पर आधारित बनाया जाए। कोचिंग संस्थानों को अपनी वास्तविक सफलता दर सार्वजनिक करने के लिए बाध्य किया जाए। स्कूलों को इतना मजबूत बनाया जाए कि कोचिंग शिक्षा का विकल्प नहीं, सहयोगी बने।

सबसे महत्वपूर्ण बात, छात्र के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को नीति के केंद्र में रखा जाए।

भारत का कोचिंग उद्योग जल्द खत्म होने वाला नहीं है। जिन आकांक्षाओं को वह पोषित करता है, वे वास्तविक हैं। जिस प्रतिस्पर्धा से वह छात्रों को लड़ने में मदद करता है, वह भी वास्तविक है।

लेकिन एक ऐसा देश, जो अपने बच्चों के सपनों को 58,000 करोड़ रुपये की परीक्षा मशीन के हवाले कर देता है, उसे खुद से एक कठिन सवाल पूछना चाहिए।

क्या सफलता की हमारी परिभाषा इतनी संकरी हो गई है कि पूरी एक पीढ़ी यह मान बैठी है कि जिंदगी एक रैंक से शुरू होती है और उसी पर खत्म?

शिक्षा का उद्देश्य नागरिक, चिंतक और नवप्रवर्तक तैयार करना था।

अगर हम सावधान नहीं हुए, तो यह व्यवस्था ऐसे लाखों थके हुए युवाओं को जन्म देगी जो परीक्षा की भूलभुलैया में दौड़ना तो जानते हैं, मगर जीवन का रास्ता भूल चुके होंगे।


Monday, June 8, 2026

 पेड़ों की आवाज़ कौन बनेगा जब प्रगति दस्तक देगी?

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 लंबे समय से हरित प्रहरी लड़ रहे हैं, और कई जंगें जीत भी चुके हैं, लेकिन अब अदालतों को पर्यावरणविद खटकते हैं!

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

9 जून, 2026

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जब जेसीबी और  बुलडोज़र तरक्की का परचम लेकर आएं ,  तब नदियों, जंगलों, वन्यजीवों और आने वाली नस्लों की तरफ़ से कौन बोलेगा?

और अगर पर्यावरण की हिफाज़त करने वालों को ही तरक्की का दुश्मन समझ लिया जाए, तो फिर प्रकृति की पैरवी कौन करेगा?

ये सवाल आज इसलिए और अहम हो गए हैं क्योंकि 11 मई 2026 को प्रस्तावित पीपावाव बंदरगाह विस्तार परियोजना की सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत ने पर्यावरण कार्यकर्ताओं की भूमिका पर सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि क्या पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने कभी किसी विकास परियोजना का स्वागत किया है? साथ ही यह चिंता भी जताई कि मुकदमेबाज़ी विकास की रफ्तार रोक रही है।

इन टिप्पणियों पर देशभर के 600 से अधिक नागरिकों, पर्यावरण संगठनों, शिक्षाविदों और सेवानिवृत्त अधिकारियों ने एतराज़ जताया। उन्होंने इन टिप्पणियों को परेशान करने वाला बताया और उन्हें वापस लेने की मांग की।

उनकी चिंता वाजिब है।

पर्यावरण आंदोलन कुछ पेशेवर प्रदर्शनकारियों का शौक नहीं है। इसकी जड़ें भारत के संविधान और लोकतांत्रिक परंपराओं में गहराई तक मौजूद हैं। संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को जीवन का अधिकार देता है, जिसमें स्वच्छ और स्वस्थ पर्यावरण का अधिकार भी शामिल है। संविधान राज्य और नागरिकों दोनों को देश की प्राकृतिक विरासत की रक्षा करने का दायित्व भी सौंपता है।

इतिहास गवाह है कि कई बार पर्यावरण कार्यकर्ता सही साबित हुए हैं।

सत्तर के दशक में हिमालयी क्षेत्र में चला चिपको आंदोलन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। गांवों की महिलाओं ने पेड़ों से लिपटकर उनकी कटाई रोकी। उस समय उन्हें विकास विरोधी कहा गया था। आज वही लोग पर्यावरण संरक्षण के अग्रदूत माने जाते हैं। उनके संघर्ष ने भारत की वन नीति को नई दिशा दी।

कर्नाटक में अप्पिको आंदोलन ने भी यही संदेश दिया। स्थानीय समुदायों ने अंधाधुंध कटाई का विरोध किया और टिकाऊ वन प्रबंधन की पैरवी की। केरल में साइलेंट वैली वर्षावन को बचाने के लिए नागरिकों, वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों ने लंबी लड़ाई लड़ी। अगर वे हार जाते, तो भारत की सबसे समृद्ध जैव विविधता वाली धरोहरों में से एक हमेशा के लिए मिट सकती थी।

भारत के आदिवासी समुदायों ने भी प्रकृति की हिफाज़त में अहम भूमिका निभाई है। उन्होंने देश को याद दिलाया कि जंगल सिर्फ़ लकड़ी और खनिजों के भंडार नहीं हैं। वे जीवित संसार हैं, जो समाज, संस्कृति और पारिस्थितिकी को सहारा देते हैं।

नर्मदा बचाओ आंदोलन सभी बांध परियोजनाओं को नहीं रोक सका, लेकिन उसने विस्थापन, पुनर्वास और पर्यावरणीय प्रभाव जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बना दिया।

पर्यावरण आंदोलनों ने कई बार कॉरपोरेट लापरवाही का भी पर्दाफाश किया है।

केरल के प्लाचीमाडा में ग्रामीणों ने कोका-कोला के बॉटलिंग प्लांट पर भूजल के दोहन और स्थानीय संसाधनों को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया। वर्षों के संघर्ष के बाद संयंत्र बंद हुआ।

तमिलनाडु के तूतीकोरिन में लोगों ने स्टरलाइट कॉपर संयंत्र के खिलाफ प्रदूषण को लेकर आंदोलन किया। बाद की जांचों और अदालती कार्यवाहियों ने उनकी कई आशंकाओं को सही साबित किया।

हाथियों के संरक्षण के लिए दायर एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के ऊटी क्षेत्र में स्थित सिगुर पठार हाथी गलियारे को बचाने का ऐतिहासिक फैसला दिया। रिसॉर्टों और अवैध निर्माणों से घिरे इस मार्ग को अदालत ने हाथियों का "आवागमन का अधिकार" मानते हुए अतिक्रमण हटाने के आदेश दिए। यह फैसला पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण के इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाता है।

वृंदावन में भी पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने कई विवादास्पद परियोजनाओं के खिलाफ अदालतों में सफल लड़ाइयां लड़ी हैं।

शायद भारत की सबसे प्रसिद्ध पर्यावरणीय कानूनी जीत ताजमहल से जुड़ी है।

सत्तर के दशक में मथुरा में तेल रिफाइनरी लगाने के प्रस्ताव का पर्यावरणविदों ने विरोध किया था। उन्हें डर था कि इससे ताजमहल को नुकसान पहुंचेगा। बाद में पर्यावरण वकील एम.सी. मेहता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। उन्होंने दलील दी कि आगरा के आसपास का औद्योगिक प्रदूषण ताजमहल के संगमरमर को नुकसान पहुंचा रहा है।

वैज्ञानिक अध्ययनों ने उनकी बात की तस्दीक की। अदालत ने ताज ट्रेपेजियम ज़ोन का गठन किया, उद्योगों को स्वच्छ ईंधन अपनाने के निर्देश दिए और कई प्रदूषणकारी इकाइयों को स्थानांतरित कराया।

आज शायद ही कोई कहे कि ताजमहल को बचाना विकास विरोधी कदम था। इसे भारत की सबसे बड़ी पर्यावरणीय सफलताओं में गिना जाता है।

मैसूर की चामुंडी पहाड़ियों का मामला भी ऐसा ही है। वहां प्रस्तावित रोपवे परियोजना का पर्यावरणविदों, विरासत विशेषज्ञों, स्थानीय निवासियों और सांस्कृतिक संगठनों ने विरोध किया। उनकी चिंताएं वनों की कटाई, मिट्टी के कटाव और धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत के व्यावसायीकरण को लेकर थीं। जनविरोध के चलते सरकारों को कई बार अपने फैसले पर पुनर्विचार करना पड़ा।

बार-बार पर्यावरण आंदोलनों ने एक शुरुआती चेतावनी प्रणाली का काम किया है।

उन्होंने कुएं सूखने से पहले भूजल संकट की चेतावनी दी। उन्होंने स्वास्थ्य संकट पैदा होने से पहले प्रदूषण के खतरे बताए। उन्होंने आपदा आने से पहले पारिस्थितिक जोखिमों की ओर ध्यान दिलाया।

असल खतरा तब पैदा होता है जब हर पर्यावरणीय चिंता को विकास का दुश्मन बताकर खारिज कर दिया जाता है। इससे वैज्ञानिकों, नागरिकों, वकीलों और स्थानीय समुदायों की आवाज़ दब सकती है। सवाल पूछने का लोकतांत्रिक हक़ कमज़ोर पड़ सकता है।

भारत का पर्यावरणीय इतिहास हमें एक सीधी-सी सीख देता है।

विकास और पर्यावरण दुश्मन नहीं हैं। दोनों एक-दूसरे के साझेदार हैं। सबसे सफल परियोजनाएं वही होती हैं जो प्रकृति की सीमाओं का सम्मान करती हैं, स्थानीय समुदायों की रक्षा करती हैं और दूरगामी सोच के साथ आगे बढ़ती हैं।

जलवायु परिवर्तन, जल संकट और प्रदूषण के बढ़ते दौर में भारत को पर्यावरणीय सतर्कता की ज़रूरत पहले से कहीं ज़्यादा है।

कठिन सवाल पूछने वालों को चुप नहीं कराया जाना चाहिए। उनकी बात सुनी जानी चाहिए।

भारत की सबसे बड़ी पर्यावरणीय जीतें इसलिए संभव हुईं क्योंकि आम नागरिक खामोश नहीं बैठे। उन्होंने ताकतवर हितों को चुनौती दी, सरकारी फैसलों पर सवाल उठाए और यह आग्रह किया कि विकास की कीमत अपूरणीय विनाश नहीं हो सकती।

यह रुकावट नहीं है।

यही लोकतंत्र का असली काम है।

Saturday, June 6, 2026

 मौत का लाइसेंस

ये हादसे नहीं, हस्ताक्षरित हत्याएँ हैं 

मौत आती नहीं, बुलाई जाती है निगरानी की नाकामी और जवाबदेही की कब्र पर खड़ा भारत

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"ये हादसे नहीं, प्रशासनिक हत्याएँ हैं"

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

8 जून 2026

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आगरा चौपाटी पर झूले का जिप लॉक खुला, एक नौजवान ने स्वर्ग की यात्रा शुरू की। बेलनगंज क्षेत्र में मकान खुदाई में पूरी बैंक धंस गई।आए दिन जूता फैक्ट्रियों में आग लग रही है, घटिया मेंटिनेंस से लिफ्टों में लोग फंस रहे हैं। एक्सप्रेसवे पर डेली हादसों की संख्या गिनती से बाहर हो चली है। इस क्रूर व्यवस्था के चंगुल से बाहर सिर्फ नेता हैं, जो इत्तेफाकन हमेशा उठावनी या मृत्यु भोज में ही पहुंचते हैं।

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रात गहरी होती है। शहर सो जाता है। लेकिन कहीं न कहीं एक इमारत ऐसी होती है जो आग का इंतजार कर रही होती है। कोई पुल होता है जो अपने आख़िरी सहारे पर टिका होता है। किसी फैक्ट्री का बॉयलर अपनी सीमा पार कर चुका होता है। किसी गोदाम में नियमों की धज्जियाँ उड़ रही होती हैं। और किसी सरकारी फाइल पर वह आखिरी हस्ताक्षर हो चुका होता है जो सुनिश्चित करता है कि हादसा होने पर भी जिम्मेदार कोई नहीं होगा।

फिर सुबह अखबारों में खबर छपती है।

हम उसे "दुर्घटना" कहते हैं।

लेकिन सच यह है कि यह दुर्घटना नहीं होती। यह एक लंबी प्रक्रिया का अंतिम दृश्य होता है। एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें लालच, लापरवाही और मिलीभगत वर्षों तक साथ-साथ चलते हैं।

चार दशक पहले भोपाल गैस त्रासदी ने दुनिया को झकझोर दिया था। हजारों लोग जहरीली गैस के बादलों में घुटकर मर गए। दुनिया ने उस त्रासदी से सबक लिया। सुरक्षा नियम मजबूत हुए। कॉर्पोरेट जवाबदेही पर नए मानदंड बने।

भारत ने क्या सीखा?

यह सवाल आज भी उतना ही असहज है जितना 1984 में था।

मौत कभी अचानक नहीं आती

दिल्ली के एक होटल में इक्कीस लोग जिंदा जल गए। बाद में पता चला कि छह कमरों के लाइसेंस पर पच्चीस कमरे चल रहे थे। फायर एनओसी नहीं थी। निकास द्वार अवरुद्ध थे। खिड़कियां बंद थीं। निरीक्षण भी हुए थे। कागज भी पूरे थे। फाइलें भी चलती रहीं।

बस सुरक्षा कहीं नहीं थी।

जब आग लगी तो लोगों के पास बचने का रास्ता नहीं था।

इसे दुर्घटना कहना सच्चाई से भागना है। यह मौत को पहले से दिया गया निमंत्रण था।

छत्तीसगढ़ के बिजली संयंत्र में बॉयलर फटा। मजदूर मारे गए। गुजरात के मोरबी में मरम्मत के बाद खोला गया पुल टूट गया और 135 लोग नदी में समा गए। राजकोट के गेमिंग ज़ोन में आग लगी तो अवैध निर्माण की परतें खुलने लगीं। महाराष्ट्र और पंजाब में जहरीली शराब गरीबों की जान लेती रही।

घटनाएं अलग-अलग थीं।

कारण एक ही था।

नियमों को बोझ समझने वाली व्यवस्था।

इतिहास बार-बार चेतावनी देता है

1995 में हरियाणा के डबवाली में स्कूल समारोह के दौरान पंडाल में आग लगी। तीन सौ से अधिक लोग मारे गए। अधिकांश बच्चे थे।

1997 में दिल्ली के उपहार सिनेमा में 59 लोग फिल्म देखने गए थे। वे लौटकर घर नहीं आए। बंद निकास, अवैध निर्माण और सुरक्षा नियमों की अनदेखी ने उन्हें मौत के हवाले कर दिया।

2001 में तमिलनाडु के एरवाडी में मानसिक रोगियों को जंजीरों से बांधकर रखा गया था। आग लगी तो वे भाग भी नहीं सके। 28 लोग जिंदा जल गए।

2004 में कुंभकोणम के स्कूल में फूस की छत और संकरी सीढ़ियां 94 बच्चों की चिता बन गईं।

2011 में कोलकाता का एएमआरआई अस्पताल, जो जीवन बचाने के लिए बना था, खुद मौत का जाल बन गया। 95 लोगों की दम घुटने से मौत हुई।

हर बार जांच बैठी।

हर बार रिपोर्ट आई।

हर बार वादे किए गए।

और हर बार कुछ महीनों बाद सब कुछ सामान्य हो गया, मानो कुछ हुआ ही न हो।

सिवाकासी की पटाखा फैक्ट्रियां आज भी समय-समय पर फटती हैं। अखबारों में तस्वीरें छपती हैं। नेता संवेदना व्यक्त करते हैं। मुआवजे घोषित होते हैं। फिर वही पुराना खेल शुरू हो जाता है।

एक राष्ट्रीय बीमारी

इसे मैं "भोपाल त्रासदी सिंड्रोम" कहता हूं।

यह कोई चिकित्सकीय बीमारी नहीं है। यह हमारी प्रशासनिक संस्कृति का स्थायी रोग है।

इसके लक्षण बेहद परिचित हैं।

नियमों को विकास विरोधी बताओ।

निरीक्षण को आय का स्रोत बना दो।

शिकायतों को फाइलों में दबा दो।

चेतावनियों को नजरअंदाज करो।

हादसा होने दो।

फिर जांच समिति बना दो।

कुछ छोटे अधिकारियों को निलंबित कर दो।

मुआवजे की घोषणा कर दो।

और अगले हादसे का इंतजार करो।

इस पूरी प्रक्रिया में वे लोग शायद ही कभी पकड़े जाते हैं जिन्होंने अवैध निर्माण को संरक्षण दिया, जिन्होंने एनओसी को व्यापार बना दिया, जिन्होंने जहरीली शराब या असुरक्षित फैक्ट्रियों को राजनीतिक और प्रशासनिक छतरी प्रदान की।

व्यवस्था के बड़े खिलाड़ी अक्सर बच निकलते हैं।

बलि हमेशा छोटे लोग चढ़ते हैं।

बयान कभी नहीं बदलते

देश बदल गया।

तकनीक बदल गई।

सरकारें बदल गईं।

लेकिन हर त्रासदी के बाद सुनाई देने वाले वाक्य नहीं बदले।

"दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।"

"उच्च स्तरीय जांच के आदेश दे दिए गए हैं।"

"मृतकों के परिजनों को उचित मुआवजा दिया जाएगा।"

इन वाक्यों को सुनते-सुनते देश की कई पीढ़ियां बड़ी हो चुकी हैं।

भोपाल ने दुनिया को सिखाया था कि सुरक्षा पर खर्च किया गया पैसा कभी व्यर्थ नहीं जाता।

हमने उससे शायद एक अलग ही सबक सीखा।

कि समय सबसे बड़ा क्लीनर है।

कुछ साल बीत जाएंगे।

जनता भूल जाएगी।

मीडिया नया विषय ढूंढ लेगा।

फाइलों पर धूल जम जाएगी।

और दोषी फिर किसी नई फाइल पर हस्ताक्षर कर रहे होंगे।

आखिर कब तक?

जब बिना फायर एनओसी के होटल चलते हैं, जब अवैध मंजिलें खड़ी होती हैं, जब पुलों का निरीक्षण केवल कागजों पर होता है, जब फैक्ट्रियां सुरक्षा नियमों को मजाक समझती हैं, तब मौत अचानक नहीं आती।

उसे बुलाया जाता है।

उसके लिए रास्ता बनाया जाता है।

इन मौतों को "दुर्घटना" कहना एक राष्ट्रीय आत्म-छल है।

इनके जन्म प्रमाण पत्र पर पहले से ही लालच, भ्रष्टाचार और मिलीभगत के हस्ताक्षर दर्ज होते हैं।

जब तक बड़े संरक्षक बचते रहेंगे और छोटे कर्मचारी बलि के बकरे बनते रहेंगे, तब तक हर आग, हर ढहती इमारत, हर जहरीली बोतल और हर टूटा पुल हमें एक ही बात याद दिलाता रहेगा: 

मौत नई होती है।

लापरवाही पुरानी होती है।

शव बदल जाते हैं।

व्यवस्था नहीं।

और शायद यही इस देश की सबसे बड़ी त्रासदी है कि भोपाल कभी गया ही नहीं।


Friday, June 5, 2026

 


भगवा लहर या सभ्यतागत बदलाव?

असम और बंगाल की जीत ने बदल दी भारतीय राजनीति की दिशा

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

6 जून 2026

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इतिहास हर रोज़ नहीं बदलता। कभी-कभी एक चुनाव ऐसा मोड़ लेकर आता है जो आने वाले दशकों की दिशा तय कर देता है। 2026 के विधानसभा चुनावों में असम और पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की बड़ी जीत को उसके समर्थक ऐसे ही एक मोड़ के रूप में देख रहे हैं।

उनका मानना है कि यह सिर्फ सरकार बदलने की कहानी नहीं है। यह उस लंबे राजनीतिक और सांस्कृतिक सफर का नया पड़ाव है जो सदियों पहले शुरू हुआ था।

भारत ने लगभग आठ सौ वर्षों तक पहले मुस्लिम सल्तनतों और बाद में ब्रिटिश हुकूमत का दौर देखा। आज़ादी के बाद सत्ता भारतीय हाथों में आई, लेकिन राजनीति का केंद्र लंबे समय तक कांग्रेस के इर्द-गिर्द रहा। भाजपा और उसके समर्थकों का आरोप रहा है कि समय के साथ धर्मनिरपेक्षता का मतलब संतुलन नहीं, बल्कि अल्पसंख्यक तुष्टीकरण बन गया। उनका कहना है कि बहुसंख्यक समाज की सांस्कृतिक पहचान को अक्सर संकोच और अपराधबोध के साथ देखने की कोशिश की गई।

असम और बंगाल के नतीजे इस सोच के खिलाफ जनता के फैसले के रूप में पेश किए जा रहे हैं।

पश्चिम बंगाल में भाजपा ने अभूतपूर्व प्रदर्शन करते हुए दो सौ से अधिक सीटें जीत लीं। एक दशक पहले तक राज्य में उसकी मौजूदगी लगभग नगण्य थी। दूसरी ओर, ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस, जो वर्षों से बंगाल की राजनीति पर छाई हुई थी, बुरी तरह सिमट गई।

असम में भी भाजपा ने लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल की। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा के नेतृत्व में पार्टी ने अपना जनाधार और मजबूत किया। यह जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि असम में पहचान, घुसपैठ और स्थानीय संस्कृति जैसे मुद्दे लंबे समय से राजनीतिक बहस के केंद्र में रहे हैं।

इन चुनाव परिणामों ने 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद उभरी उस धारणा को भी कमजोर किया है जिसमें कहा जा रहा था कि भाजपा का प्रभाव घट रहा है। भले ही पार्टी को लोकसभा में पहले से कम सीटें मिली थीं, लेकिन उसके बाद हुए कई राज्यों के चुनावों ने दिखाया कि उसका संगठन और जनाधार अब भी मजबूत है।

भाजपा की सफलता के पीछे केवल सांस्कृतिक मुद्दे ही नहीं हैं। पार्टी ने पिछले वर्षों में गरीबों के लिए आवास, गैस कनेक्शन, शौचालय, स्वास्थ्य बीमा और बुनियादी सुविधाओं की योजनाओं को भी बड़े पैमाने पर आगे बढ़ाया। समर्थकों का तर्क है कि सांस्कृतिक आत्मविश्वास और विकास की राजनीति का यह मेल भाजपा की सबसे बड़ी ताकत बन गया है।

वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी ने बंगाल के परिणाम को "वैचारिक भूकंप" बताया है। उनके अनुसार यह चुनाव दिखाता है कि हिंदू पहचान और सनातन परंपराओं को अब राजनीतिक विमर्श के केंद्र से बाहर नहीं रखा जा सकता। उनका कहना है कि केवल भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही इस विचारधारा का विश्वसनीय प्रतिनिधित्व करते हैं।

हालांकि आलोचक इस दावे से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि लोकतंत्र में किसी भी एक विचारधारा का वर्चस्व स्वस्थ नहीं माना जा सकता। लेकिन यह भी सच है कि आज भारतीय राजनीति में सांस्कृतिक पहचान का सवाल पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।

दक्षिण भारत में भी राजनीतिक बदलाव के संकेत दिखाई दे रहे हैं। तमिलनाडु में द्रविड़ राजनीति को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जबकि केरल में भी पारंपरिक राजनीतिक समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं। भले ही भाजपा अभी वहां सत्ता से दूर हो, लेकिन उसकी मौजूदगी पहले की तुलना में कहीं अधिक दिखाई देने लगी है।

भारत की राजनीति अब पहले जैसी नहीं रही। जाति, वर्ग और क्षेत्रीय समीकरणों के साथ-साथ धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान भी चुनावी फैसलों को प्रभावित कर रही है। यही वजह है कि भाजपा का संदेश देश के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग रूपों में असर डाल रहा है।

बंगाल की जीत का असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ सकता है। यह राज्य लंबे समय से विपक्ष का एक बड़ा गढ़ माना जाता था। यदि भाजपा वहां स्थायी रूप से अपनी जड़ें जमा लेती है, तो विपक्षी गठबंधनों की रणनीति पर गहरा असर पड़ सकता है।

लेकिन इतना तय है कि असम और बंगाल के चुनावों ने एक नया संदेश दिया है। भारत का एक बड़ा वर्ग अब अपनी सांस्कृतिक पहचान को खुलकर राजनीतिक अभिव्यक्ति देने लगा है। भाजपा के समर्थक इसे सभ्यतागत पुनर्जागरण कहते हैं, जबकि आलोचक इसे राजनीतिक ध्रुवीकरण का परिणाम मानते हैं।

सच जो भी हो, भारतीय राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है। और फिलहाल ऐसा लगता है कि भगवा राजनीति केवल चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि एक लंबी वैचारिक यात्रा का हिस्सा बन चुकी है

Thursday, June 4, 2026

 वो रात जब रोशनी टिकी रही

अंधेरे से आत्मनिर्भरता तक: भारत की सौर क्रांति की गाथा

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

5 जून 2026

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सावित्री देवी को वह शाम आज भी याद है जब उनकी बेटी ने किताब पढ़ते समय आंखें सिकोड़ना बंद कर दिया था।

उत्तराखंड के एक छोटे से पहाड़ी गांव में वर्षों तक बारह साल की प्रिया मिट्टी के तेल की ढिबरी के सामने बैठकर पढ़ती थी। पीली, कांपती हुई लौ। धुएं से भरा कमरा। आंखों में जलन। कई बार तेल खत्म हो जाता और पढ़ाई भी।

फिर पिछले साल उनकी छत पर एक सौर पैनल लग गया।

"पहली रात वह बल्ब को ही देखती रह गई," सावित्री हंसते हुए बताती हैं। "उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि रोशनी यूं ही बनी रहेगी।"

रोशनी बनी रही।

आज प्रिया अपनी कक्षा में अव्वल आई है और डॉक्टर बनने का सपना देख रही है।

यह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं है। यह उस भारत की कहानी है जहां कभी अंधेरा ही उस की पहचान थी और अब उजाला बदलाव का प्रतीक बन रहा है।

हिमालय की दुर्गम घाटियों से लेकर राजस्थान के तपते रेगिस्तान तक, गांवों की तस्वीर बदल रही है। छतों पर चमकते सौर पैनल दिखाई देते हैं। पंचायत भवनों के बाहर सौर लाइटें जगमगाती हैं। स्वास्थ्य केंद्र, स्कूल, आंगनबाड़ी और सामुदायिक भवन सौर ऊर्जा से रोशन हो रहे हैं। घरों में इन्वर्टर, बैटरियां और सोलर लैम्प आम होते जा रहे हैं।

जहां कभी शाम ढलते ही जिंदगी ठहर जाती थी, वहां अब रात भी काम और पढ़ाई का समय बन रही है।

कर्नाटक के नांजानगुड़ कस्बे के पास एक गांव में मीरा नाम की दर्जिन पहले सूर्यास्त के साथ अपना काम समेट देती थीं। बिजली का कोई भरोसा नहीं था। कभी आती, कभी नहीं। कई बार वोल्टेज इतना तेज होता कि मशीन खराब हो जाती। फिर सरकारी योजना के तहत उन्हें सोलर इन्वर्टर और बैटरी सिस्टम मिला।

अब वह रात नौ-दस बजे तक सिलाई करती हैं। उनकी आमदनी लगभग दोगुनी हो गई है। उन्होंने अपनी भतीजी को भी काम पर रख लिया है।

वह मुस्कुराकर कहती हैं, "पहले मैं सूरज के पीछे भागती थी, अब सूरज मेरे लिए काम करता है।"

यह एक साधारण-सा मजाक है, लेकिन इसके पीछे भारत की बड़ी ऊर्जा कहानी छिपी है।

दशकों तक भारत की अर्थव्यवस्था आयातित तेल और गैस पर निर्भर रही। आज भी देश अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। दुनिया में कहीं युद्ध छिड़े या तेल उत्पादक देशों में संकट आए, असर भारत के पेट्रोल पंपों और रसोईघरों तक पहुंच जाता है।

यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने ऊर्जा आत्मनिर्भरता को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया है।

इस बदलाव का सबसे विशाल प्रतीक गुजरात के कच्छ के रण में दिखाई देता है।

जहां कभी केवल नमक, रेत और वीरानी थी, वहां आज दुनिया की सबसे बड़ी नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं में से एक आकार ले रही है। लगभग 72,600 हेक्टेयर में फैला खावड़ा रिन्यूएबल एनर्जी पार्क भविष्य में 30 गीगावाट बिजली उत्पादन करने की क्षमता रखेगा।

यह इतनी बिजली होगी कि लगभग डेढ़ से दो करोड़ घर रोशन हो सकें।

सौर पैनलों की अंतहीन कतारें। दूर-दूर तक घूमती पवन चक्कियां। और उनके बीच बहती रेगिस्तानी हवा।

एक इंजीनियर ने वहां काम करते हुए कहा था, "ऐसा लगता है जैसे भविष्य यहां बाकी दुनिया से पहले आ गया हो।"

लेकिन इस क्रांति का असली अर्थ उन लोगों की जिंदगी में दिखाई देता है जिनके लिए बिजली कभी एक विलासिता थी।

बिहार के किसान मिथलेश की समस्या रोशनी नहीं, पानी थी। डीजल पंप चलाने में खर्च बहुत आता था। कभी सिंचाई करते, कभी खर्च बचाते। दोनों साथ संभव नहीं थे।

सरकारी सहायता से उन्होंने अपने खेत में सोलर पंप लगवाया।

आज उनकी सिंचाई लगभग मुफ्त है। इस वर्ष उन्होंने दूसरी फसल भी उगाई है। हरे-भरे खेत को देखते हुए वह कहते हैं, "मुझे लगा था यह भी किसी सरकारी वादे जैसा होगा। लेकिन यह चल रहा है, और अच्छी तरह चल रहा है।"

देशभर में ऐसी लाखों कहानियां जन्म ले रही हैं।

आंध्र के रमेश रेड्डी जो एक इंजीनियर हैं, कहते हैं, "लद्दाख में विशाल सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाएं विकसित हो रही हैं। राजस्थान अपनी सौर क्षमता बढ़ा रहा है। तमिलनाडु, कर्नाटक और मध्य प्रदेश में बड़े नवीकरणीय ऊर्जा पार्क बन रहे हैं। गुजरात और तमिलनाडु के समुद्री तटों पर अपतटीय पवन ऊर्जा परियोजनाओं की तैयारी चल रही है।"

ऊर्जा विशेषज्ञ बताते हैं कि भारत अब हरित हाइड्रोजन के क्षेत्र में भी बड़ा दांव लगा रहा है। 2030 तक प्रतिवर्ष 50 लाख टन ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। रिलायंस, अडानी, एनटीपीसी और ओएनजीसी जैसी कंपनियां इस दिशा में भारी निवेश कर रही हैं।

नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता 190 गीगावाट से आगे निकल चुकी है। पीएम सूर्य घर और पीएम-कुसुम जैसी योजनाएं लाखों परिवारों और किसानों तक सौर ऊर्जा पहुंचा रही हैं।

चुनौतियां अभी भी हैं। भंडारण तकनीक महंगी है। कई क्षेत्रों में बिजली ग्रिड कमजोर है। हर गांव तक चौबीसों घंटे भरोसेमंद बिजली पहुंचाने का सफर अभी अधूरा है।

लेकिन बदलाव शुरू हो चुका है।

दूरस्थ स्वास्थ्य केंद्रों में अब टीके सुरक्षित रखे जा सकते हैं। दुकानदार देर तक दुकानें खोलते हैं। बच्चे रात में पढ़ते हैं। महिलाएं अतिरिक्त काम कर आय बढ़ा रही हैं। किसान कम लागत में अधिक उत्पादन कर रहे हैं।

और उत्तराखंड की वह लड़की, प्रिया?

वह अब रात के खाने के बाद पढ़ती है। एक ऐसे बल्ब की रोशनी में जो कांपता नहीं। जो बुझता नहीं। जो हर शाम उसे यह भरोसा देता है कि उसके सपनों का रास्ता अब अंधेरे में नहीं खोएगा।

भारत की सौर क्रांति की असली कहानी शायद गीगावाट, निवेश और सरकारी योजनाओं में नहीं छिपी है।

वह उस स्थिर रोशनी में दिखाई देती है जो पहली बार करोड़ों लोगों के घरों, खेतों और सपनों में टिक गई है।

Tuesday, June 2, 2026

 State of the environment in Taj Trapezium Zone

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विश्व पर्यावरण दिवस 2026

ताज ट्रेपेजियम ज़ोन की पर्यावरणीय स्थिति रिपोर्ट

रिवर कनेक्ट अभियान

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Introduction 

ताज बचाना है तो पर्यावरण बचाना होगा

ताजमहल केवल एक स्मारक नहीं है। यह भारत की पहचान, सांस्कृतिक विरासत और करोड़ों लोगों की भावनाओं का प्रतीक है। लेकिन विडम्बना यह है कि जिस पर्यावरण ने सदियों तक ताजमहल को सुरक्षित रखा, वही आज गंभीर संकट में है। वायु प्रदूषण, यमुना नदी की दुर्दशा, घटती हरियाली, बढ़ता शोर और अनियंत्रित शहरीकरण ताज ट्रेपेजियम ज़ोन (टीटीज़ेड) की पर्यावरणीय सेहत को लगातार कमजोर कर रहे हैं।

टीटीज़ेड क्या है?

ताज ट्रेपेजियम ज़ोन लगभग 10,400 वर्ग किलोमीटर का पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र है, जिसमें आगरा, मथुरा, फिरोजाबाद, हाथरस, एटा तथा राजस्थान का भरतपुर क्षेत्र शामिल है। इस क्षेत्र में ताजमहल, आगरा किला, फतेहपुर सीकरी सहित 40 से अधिक राष्ट्रीय महत्व के स्मारक स्थित हैं।

1993 से शुरू हुई जनहित याचिकाओं और सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक हस्तक्षेप ने इस क्षेत्र के संरक्षण की नींव रखी। न्यायालय ने प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर नियंत्रण, कोयला और कोक के उपयोग पर प्रतिबंध तथा स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देने जैसे महत्वपूर्ण कदम उठाए।

अदालत के आदेशों से क्या बदला?

1990 के दशक में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बाद लगभग 292 प्रदूषणकारी इकाइयों को प्राकृतिक गैस अपनानी पड़ी या उन्हें स्थानांतरित किया गया। इससे शुरुआती वर्षों में सल्फर डाइऑक्साइड और धूलकणों के स्तर में उल्लेखनीय कमी आई।

टीटीज़ेड प्राधिकरण का गठन हुआ, हरित पट्टियों के विकास की योजनाएँ बनीं और प्रदूषण नियंत्रण को कानूनी आधार मिला। 

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लेकिन तीन दशक बाद स्थिति फिर चिंताजनक होती दिखाई दे रही है।

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वर्तमान पर्यावरणीय स्थिति : 2025-26

1. वायु प्रदूषण : ताज की सबसे बड़ी चुनौती

आगरा की वायु गुणवत्ता लगातार खराब बनी हुई है। पीएम-10 का वार्षिक औसत स्तर राष्ट्रीय मानक से तीन गुना से अधिक दर्ज किया गया है। सर्दियों और मानसून के बाद स्थिति और गंभीर हो जाती है।

प्रमुख कारण हैं:

• वाहनों की तेजी से बढ़ती संख्या

• निर्माण कार्यों से उड़ती धूल

• डीजल जनरेटर

• छोटे और मध्यम उद्योगों से उत्सर्जन

• कूड़ा एवं जैविक अवशेषों का खुले में जलाया जाना

हवा में मौजूद सूक्ष्म कण ताजमहल के संगमरमर पर जमकर उसे पीला और मटमैला बना रहे हैं। विशेषज्ञ इसे "स्टोन कैंसर" की प्रक्रिया बताते हैं।

2. यमुना नदी : जीवनदायिनी से नाले तक

ताजमहल के पीछे बहने वाली यमुना नदी आज अपने अस्तित्व के सबसे बड़े संकट से गुजर रही है।

नदी में बिना उपचारित सीवर, औद्योगिक अपशिष्ट और नालों का पानी लगातार गिर रहा है। कई स्थानों पर जैविक ऑक्सीजन मांग (बीओडी) निर्धारित सीमा से कई गुना अधिक है, जबकि घुलित ऑक्सीजन का स्तर इतना कम हो जाता है कि जलीय जीवों का जीवन संकट में पड़ जाता है।

स्थिति की भयावहता के संकेत:

• नदी में दुर्गंध और विषैली गैसों का उत्सर्जन

• मछलियों और अन्य जलीय जीवों का लुप्त होना

• लाखों की संख्या में फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया

• सूखते नदी तल से उड़ती धूल

यमुना का सूखा और उजाड़ स्वरूप ताजमहल की सुंदरता तथा उसकी नींव दोनों के लिए खतरा बनता जा रहा है।

3. शोर प्रदूषण : बढ़ता हुआ अदृश्य खतरा

आगरा के कई व्यस्त चौराहों और स्मारकों के आसपास ध्वनि स्तर निर्धारित मानकों से काफी ऊपर दर्ज किए गए हैं।

लगातार बढ़ता ट्रैफिक, निर्माण गतिविधियाँ और अनियंत्रित हॉर्न संस्कृति न केवल पर्यटकों के अनुभव को प्रभावित कर रही हैं बल्कि स्थानीय नागरिकों के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल असर डाल रही हैं।

4. घटती हरियाली

टीटीज़ेड में वन क्षेत्र और हरित आवरण में गिरावट दर्ज की गई है। शहरी विस्तार, भूमि उपयोग परिवर्तन और अवैध कटान के कारण पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ रहा है।

सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर चल रही वृक्ष गणना से वास्तविक स्थिति सामने आने की उम्मीद है, लेकिन वृक्षारोपण के साथ उनके संरक्षण और रखरखाव पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा।

विरासत और पर्यावरण : एक ही सिक्के के दो पहलू

ताजमहल की सुरक्षा केवल स्मारक संरक्षण का विषय नहीं है। यह हवा, पानी, मिट्टी और जैव विविधता के संरक्षण से सीधे जुड़ा हुआ प्रश्न है।

प्रदूषित हवा संगमरमर को नुकसान पहुंचाती है। प्रदूषित यमुना ताज की पृष्ठभूमि और पारिस्थितिकी को प्रभावित करती है। सूखा नदी तल धूल का स्रोत बनता है। बढ़ता तापमान और घटती हरियाली पूरे क्षेत्र के पर्यावरणीय स्वास्थ्य को कमजोर कर रही है।

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रिवर कनेक्ट अभियान की प्रमुख मांगें

यमुना पुनर्जीवन को सर्वोच्च प्राथमिकता

सभी नालों के उपचार, सीवेज शोधन संयंत्रों की क्षमता वृद्धि और नदी में न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह सुनिश्चित किया जाए।

ताज डाउनस्ट्रीम बैराज का शीघ्र निर्माण

ताजमहल से लगभग डेढ़ किलोमीटर नीचे प्रस्तावित रबर डैम अथवा बैराज परियोजना को प्राथमिकता के आधार पर पूरा किया जाए ताकि नदी में जल उपलब्ध रहे, धूल कम हो और पारिस्थितिकी को सहारा मिले।

प्रदूषण की रियल टाइम निगरानी

वायु, जल और शोर प्रदूषण की निगरानी के लिए आधुनिक स्टेशन स्थापित कर आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं।

हरित क्षेत्र का विस्तार

स्थानीय प्रजातियों के बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण और कम से कम तीन वर्षों तक उनके रखरखाव की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।

स्वच्छ परिवहन व्यवस्था

भारी वाहनों को शहर से बाहर मोड़ा जाए, इलेक्ट्रिक वाहनों को प्रोत्साहन दिया जाए और निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण अनिवार्य बनाया जाए।

जवाबदेही और पारदर्शिता

टीटीज़ेड प्राधिकरण द्वारा प्रतिवर्ष पर्यावरणीय स्थिति रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए तथा स्वतंत्र ऑडिट की व्यवस्था हो।

निष्कर्ष

तीन दशक पहले न्यायपालिका ने ताजमहल और उसके पर्यावरण को बचाने की दिशा दिखाई थी। आज आवश्यकता है कि सरकार, उद्योग, वैज्ञानिक संस्थान, नागरिक समाज और आम जनता मिलकर उस संकल्प को फिर से जीवित करें।

विश्व पर्यावरण दिवस 2026 पर रिवर कनेक्ट अभियान यह स्पष्ट संदेश देता है कि ताजमहल का भविष्य यमुना के भविष्य से जुड़ा है। यदि नदी बचेगी, हरियाली बचेगी और हवा स्वच्छ होगी, तभी आने वाली पीढ़ियाँ ताजमहल की वास्तविक सुंदरता देख सकेंगी।

ताज की रक्षा केवल विरासत संरक्षण नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का राष्ट्रीय संकल्प है।

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Released by

River Connect Campaign 

Convener Brij Khandelwal 

7895852750

Monday, June 1, 2026

 जब शाह जहां ताज देख कर रोया

विश्व पर्यावरण दिवस पर ताज की पुकार

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जब बादशाह शाहजहाँ रो पड़ा, और मुमताज़ ने नज़रें झुका लीं: 


दम तोड़ता ताज और हमारी विकास गाथा"

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

4 जून 2026

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कल्पना कीजिए। विश्व पर्यावरण दिवस की पूर्व संध्या है। पूर्णिमा की चांदनी ताजमहल पर बिखरी हुई है। अचानक संगमरमर की सीढ़ियों पर दो परछाइयाँ उतरती हैं। एक शाहजहाँ की। दूसरी मुमताज़ की। दोनों अपने प्रेम की इस अमर निशानी को देखते हैं।

शाहजहाँ की आंखें नम हो जाती हैं।

"क्या यही वह ताज है जिसे मैंने दुनिया के लिए छोड़ा था?"

मुमताज़ धीरे से संगमरमर की दीवार छूती हैं। उंगलियों पर पीली धूल चिपक जाती है।

दोनों खामोश हो जाते हैं।

शायद आज ताजमहल खुद भी रो रहा है।

यह कहानी किसी कविता की नहीं, एक कड़वी हकीकत की है।

करीब चालीस वर्ष पहले, 1983 में, पर्यावरणविद् और वकील एम.सी. मेहता ने ताजमहल के रंग में बदलाव देखा। वह दूधिया सफेद संगमरमर, जिसे मुगल कारीगरों ने बेमिसाल मेहनत से तराशा था, धीरे-धीरे पीला पड़ रहा था। खतरे की घंटी बज चुकी थी।

1984 में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

देश की सबसे बड़ी अदालत ने हस्तक्षेप किया। उम्मीद जगी कि ताज बच जाएगा।

लेकिन चार दशक बाद भी सवाल वहीं खड़ा है।

क्या हमने सचमुच ताज को बचाया?

ताज ट्रेपेज़ियम ज़ोन, जिसे टीटीजेड कहा जाता है, लगभग 10,400 वर्ग किलोमीटर में फैला क्षेत्र है। इसमें ताजमहल समेत तीन यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल आते हैं।

1980 के दशक में इस इलाके में 250 से 300 तक कोयला आधारित फाउंड्रियां धुआं उगल रही थीं। दूसरी ओर मथुरा रिफाइनरी से निकलने वाली सल्फर डाइऑक्साइड हवा के साथ आगरा पहुंचती थी। नमी से मिलकर यह सल्फ्यूरिक अम्ल बनाती थी। वैज्ञानिकों ने इसे "मार्बल कैंसर" नाम दिया।

संगमरमर धीरे-धीरे बीमार पड़ने लगा।

1996 में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया। 292 उद्योगों को प्राकृतिक गैस अपनाने या क्षेत्र छोड़ने का आदेश मिला। हरित पट्टियां विकसित करने, प्रदूषण की निगरानी करने और प्रभावित मजदूरों के पुनर्वास के निर्देश दिए गए।

यह फैसला पर्यावरण न्यायशास्त्र की मिसाल बन गया।

कुछ बदलाव हुए भी।

अधिकांश कोयला आधारित उद्योग या तो बंद हुए या गैस पर चले गए। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

पुराने दुश्मन गए तो नए आ गए।

आज ताज को कारखानों से कम, वाहनों से ज्यादा खतरा है। लाखों पर्यटक, बढ़ती ट्रैफिक, निर्माण कार्यों की धूल, आसपास के ईंट-भट्ठे और यमुना की बदहाली नया संकट बन चुके हैं।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्टें बताती हैं कि हवा में धूल कणों का स्तर आज भी सुरक्षित सीमा से कई गुना अधिक है। सर्दियों में हालात और बिगड़ जाते हैं।

ताज का रंग फिर भी बदल रहा है।

यमुना, जो कभी ताज का प्राकृतिक दर्पण थी, अब एक बीमार नदी बन चुकी है। उसके सूखे और प्रदूषित किनारों से उठती धूल सीधे ताज तक पहुंचती है। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट पूरी क्षमता से नहीं चल रहे। हरित पट्टियां जगह-जगह सिकुड़ रही हैं।

कागजों में योजनाएं बनती हैं।

बैठकों में भाषण होते हैं।

फाइलें घूमती हैं।

लेकिन ताज का संगमरमर हर दिन थोड़ा और बूढ़ा हो जाता है।

विडंबना देखिए।

जिस स्मारक ने मुगल साम्राज्य के उतार-चढ़ाव देखे, जिसने औपनिवेशिक उपेक्षा झेली, जिसने युद्धों और राजनीतिक उथल-पुथल को सहा, वह आज हमारी प्रशासनिक उदासीनता के सामने असहाय खड़ा है।

हम विकास के नाम पर ऊंची सड़कें बना रहे हैं, नई इमारतें खड़ी कर रहे हैं, निवेश सम्मेलनों में तालियां बजा रहे हैं।

लेकिन यदि ताज का रंग ही खो गया तो दुनिया आगरा को किसलिए याद रखेगी?

विश्व पर्यावरण दिवस केवल पौधे लगाने का उत्सव नहीं है। यह आईना देखने का दिन भी है।

ताजमहल केवल एक मकबरा नहीं। यह भारत की पहचान है। यह हमारी सांस्कृतिक पूंजी है। यह करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार है।

वाहन प्रदूषण पर कठोर नियंत्रण, यमुना का पुनर्जीवन, हरित क्षेत्रों की कानूनी सुरक्षा और सरकारी जवाबदेही अब विकल्प नहीं, आवश्यकता हैं।

क्योंकि संगमरमर के पास अब और चालीस साल इंतजार करने का समय नहीं है।

और शायद अगली पूर्णिमा की रात, यदि शाहजहाँ और मुमताज़ फिर लौटें, तो वे अपने ताज को देखकर मुस्कुरा सकें; रोएं नहीं।

 विश्व पर्यावरण दिवस पांच जून को

Curtain raiser

आगरा तौ गयो!!

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विकास की दौड़ या विनाश की ओर कदम? भारत के पर्यावरण पर मंडराता संकट

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

3 जून 2026

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क्या हम अपने बच्चों के लिए एक हरा-भरा भारत छोड़ेंगे, या धूल, धुएं और सूखी नदियों का देश?

यह सवाल आज किसी पर्यावरणविद् की चिंता भर नहीं है। यह आगरा की यमुना के किनारे खड़े हर नागरिक का सवाल है। यह हिमालय की गोद में बसे गांवों की चिंता है। यह उन लाखों लोगों का डर है जो हर सर्दी जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर हैं।

भारत विकास की हाइ स्पीड ट्रेन पर सवार है। नई सड़कें बन रही हैं। मेट्रो दौड़ रही हैं। उद्योग बढ़ रहे हैं। शहर फैल रहे हैं। 

लेकिन इस चमकदार तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। जंगल सिकुड़ रहे हैं। नदियां दम तोड़ रही हैं। हवा जहरीली होती जा रही है। प्रकृति की कीमत पर विकास का यह मॉडल कहीं हमें बहुत महंगा न पड़ जाए।

आगरा इसका जीता-जागता उदाहरण है। एक ओर विश्व प्रसिद्ध ताजमहल है, दूसरी ओर सूखती और प्रदूषित यमुना। करोड़ों रुपये के सौंदर्यीकरण प्रोजेक्ट चल रहे हैं, लेकिन नदी का प्रवाह लगातार घट रहा है। नदी में बहता काला पानी और झाग विकास के दावों पर सवाल खड़े करते हैं।

देश भर में वनों की कटाई चिंता का विषय बनी हुई है। पूर्वोत्तर राज्यों, मध्य भारत और पश्चिमी घाटों में बड़ी मात्रा में वन भूमि को सड़क, खनन और औद्योगिक परियोजनाओं के लिए परिवर्तित किया जा रहा है। शहरों के आसपास के खेत और हरित क्षेत्र तेजी से कंक्रीट के जंगलों में बदल रहे हैं। पेड़ केवल ऑक्सीजन नहीं देते, वे तापमान नियंत्रित करते हैं, भूजल बचाते हैं और जैव विविधता का आधार हैं। जब जंगल कटते हैं तो केवल पेड़ नहीं गिरते, पूरा पारिस्थितिक तंत्र घायल होता है।

वायु प्रदूषण अब मौसमी समस्या नहीं रहा। दिल्ली, आगरा, कानपुर, लखनऊ और अनेक शहर दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में लगातार दिखाई देते हैं। निर्माण स्थलों की धूल, वाहनों का धुआं और उद्योगों से निकलने वाले उत्सर्जन ने स्थिति को गंभीर बना दिया है। अस्थमा, फेफड़ों के रोग और हृदय संबंधी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं।

जल प्रदूषण की तस्वीर और भी भयावह है। गंगा और यमुना जैसी नदियां करोड़ों लोगों की जीवनरेखा हैं, लेकिन इनमें हर दिन लाखों लीटर अनुपचारित सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट गिराया जा रहा है। आगरा में यमुना कई बार नदी कम और नाला अधिक दिखाई देती है। नदी पुनर्जीवन की योजनाएं बनती हैं, बजट आवंटित होते हैं, लेकिन जमीनी बदलाव अक्सर दिखाई नहीं देता।

शहरों की अव्यवस्थित वृद्धि भी संकट को बढ़ा रही है। हर व्यक्ति निजी वाहन चाहता है। सार्वजनिक परिवहन अब भी अपर्याप्त है। परिणामस्वरूप ट्रैफिक जाम, प्रदूषण और गर्म होते शहर। कंक्रीट और डामर की बढ़ती परतों ने प्राकृतिक जल निकासी को बाधित कर दिया है। थोड़ी सी बारिश में शहर डूब जाते हैं, जबकि गर्मियों में तापमान नए रिकॉर्ड बना रहा है।

कुछ विकास परियोजनाएं विशेष चिंता पैदा करती हैं। उत्तराखंड में हरिद्वार के निकट प्रस्तावित परमाणु परियोजनाओं को लेकर भूकंपीय जोखिमों और हिमालयी पारिस्थितिकी पर प्रभाव की आशंकाएं व्यक्त की गई हैं। वहीं ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना में विशाल वन क्षेत्र की कटाई, समुद्री पारिस्थितिकी और दुर्लभ जीवों के आवासों पर खतरे की चर्चा लगातार हो रही है। सवाल यह नहीं कि विकास हो या नहीं। सवाल यह है कि विकास किस कीमत पर हो।

जलवायु परिवर्तन इस पूरी चुनौती को और जटिल बना रहा है। मानसून का अनिश्चित व्यवहार, लू की बढ़ती घटनाएं, बाढ़ और सूखे का बढ़ता चक्र गरीब और कमजोर वर्गों को सबसे अधिक प्रभावित कर रहा है। किसान मौसम की मार झेल रहा है। शहर जल संकट का सामना कर रहे हैं।

भारत के पास कानूनों और संस्थाओं की कमी नहीं है। पर्यावरण मंत्रालय, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड मौजूद हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी अनेक ऐतिहासिक फैसले दिए हैं। ताज ट्रेपेजियम जोन में प्रदूषण नियंत्रण से लेकर जल और वायु संरक्षण तक न्यायपालिका ने कई बार हस्तक्षेप किया है। हाल ही में यमुना पुनर्जीवन पर सर्वोच्च न्यायालय की सक्रियता ने भी उम्मीद जगाई है।

लेकिन कानून केवल किताबों में नहीं, जमीन पर दिखने चाहिए। सबसे बड़ी समस्या क्रियान्वयन की है। पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्टें अक्सर औपचारिकता बनकर रह जाती हैं। कई परियोजनाओं को बाद में मंजूरी दे दी जाती है। निगरानी कमजोर है और जवाबदेही सीमित।

समाधान क्या है?

सबसे पहले नियामक संस्थाओं को अधिक स्वतंत्रता और संसाधन दिए जाएं। प्रदूषण की निगरानी रियल टाइम तकनीकों से हो। पर्यावरणीय उल्लंघनों पर भारी आर्थिक दंड और परियोजनाओं को रोकने जैसी कठोर कार्रवाई हो।

दूसरा, विकास को हरित प्रोत्साहन से जोड़ा जाए। नवीकरणीय ऊर्जा, वृक्षारोपण, जल संरक्षण और परिपत्र अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने वाले उद्योगों को कर छूट और वित्तीय सहायता मिले। प्रदूषण फैलाने वालों को वास्तविक पर्यावरणीय लागत चुकानी पड़े।

तीसरा, शहरों की योजना नए सिरे से बनाई जाए। पैदल यात्रियों, साइकिल चालकों और सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता मिले। हर नए शहरी विकास में न्यूनतम हरित क्षेत्र अनिवार्य हो। आगरा जैसे शहरों में यमुना के किनारे हरित गलियारे विकसित किए जाएं।

तकनीक भी बड़ी भूमिका निभा सकती है। उपग्रह निगरानी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेंसर आधारित प्रदूषण मापन और जीआईएस मैपिंग पर्यावरण प्रबंधन को अधिक प्रभावी बना सकते हैं। लेकिन तकनीक तभी सफल होगी जब उसके पीछे राजनीतिक इच्छाशक्ति और पारदर्शिता होगी।

अंततः पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। उद्योग, नागरिक समाज, विश्वविद्यालय, स्थानीय समुदाय और आम नागरिक सभी भागीदार हैं। नदी बचाने, पेड़ लगाने और प्रदूषण कम करने की लड़ाई अदालतों या मंत्रालयों में नहीं जीती जाएगी। यह लड़ाई समाज के भीतर लड़ी जाएगी।

भारत के सामने विकल्प स्पष्ट है। एक रास्ता तात्कालिक लाभ और दीर्घकालिक विनाश की ओर जाता है। दूसरा कठिन जरूर है, लेकिन टिकाऊ विकास और पर्यावरणीय संतुलन की ओर ले जाता है।

प्रकृति चेतावनी दे रही है। यमुना की सूखी धाराएं, हिमालय की खिसकती ढलानें और जहरीली होती हवा यही संदेश दे रही हैं। सवाल यह है कि क्या हम सुन रहे हैं, या फिर बहुत देर होने का इंतजार कर रहे हैं?

Sunday, May 31, 2026

 गलत नंबर, छूटी ट्रेन और फिसला संतरा: जब कामदेव ने किस्मत की पटकथा लिखी

अनेक रूपों में प्रेम की कृपा

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बृज खंडेलवाल द्वारा

1 जून 2026

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प्रेम रस, प्रेम रोग या प्रेम का बीज आखिर कैसे  अंकुरित होता है?

क्या प्रेम गुलाब का फूल लेकर दरवाजे पर दस्तक देता है? क्या चांदनी रात में कोई मधुर संगीत बजने लगता है? क्या आसमान से फूल बरसते हैं?

फिल्में और धारावाहिक तो यही दिखाते हैं। लेकिन जिंदगी की पटकथा कुछ और ही होती है।

असल जीवन में प्रेम अक्सर बिना सूचना के आता है। कभी गलत नंबर बनकर फोन करता है। कभी भीड़ भरी ट्रेन में बगल की सीट पर बैठ जाता है। कभी किसी मामूली दुर्घटना में छिपा होता है। और कभी किसी ऐसी घटना में, जिसे याद करके इंसान पहले शर्मिंदा होता है और बाद में मुस्कुराता है।

लगता है प्रेम के देवता कामदेव को सीधे रास्ते पसंद ही नहीं हैं।

भारतीय मिथकों में भी प्रेम की राहें बड़ी टेढ़ी रही हैं। राजा दुष्यंत शिकार खेलने निकले थे, विवाह करने नहीं। लेकिन वन के एक आश्रम में शकुंतला से भेंट हुई और इतिहास बदल गया। नल और दमयंती ने पहले एक-दूसरे को देखा तक नहीं था। संदेशवाहक हंसों ने दोनों के बीच प्रेम का पुल बनाया। भगवान शिव की तपस्या भंग करने भेजे गए कामदेव स्वयं भस्म हो गए, लेकिन प्रेम का बीज बो गए।

शायद तभी से प्रेम संयोगों का सबसे बड़ा खिलाड़ी बना हुआ है।

आगरा के अध्यापक डॉ. राज की कहानी सुनिए। एक बरसाती शाम वे अपने एक सहयोगी को फोन मिलाने की कोशिश कर रहे थे। जल्दबाजी में नंबर गलत लग गया। दूसरी तरफ से एक महिला की आवाज आई। “उम्मीद है आप कोई टेलीमार्केटिंग वाले नहीं हैं।” राज हंस पड़े। बातचीत शुरू हुई। दस मिनट एक घंटे में बदल गए। फिर रोज बात होने लगी। फोन के उस पार ऋषिकेश की शिक्षिका अनीता थीं। आवाज पहचान बनी, पहचान अपनापन बनी और अपनापन रिश्ते में बदल गया। एक गलत नंबर ने सही जीवनसाथी दिला दिया।

लखनऊ की नेहा की प्रेम कहानी तो एक फिसलन से शुरू हुई। सुपरमार्केट का फर्श गीला था। पैर फिसला और संतरे पूरे गलियारे में बिखर गए। नेहा शर्म से भर उठीं। तभी एक युवा इंजीनियर अर्जुन उनकी मदद के लिए दौड़े। दोनों संतरे समेटते रहे और साथ-साथ हंसते रहे।

बाद में कॉफी हुई। फिर मुलाकातें। और फिर शादी। आज भी दोनों मजाक में कहते हैं कि उनकी शादी में सबसे बड़ा योगदान संतरे का था।

मथुरा के करण गोविंद की कहानी भारतीय रेलवे की सौजन्य से शुरू हुई। मुंबई जाने वाली ट्रेन में वह इतनी गहरी नींद में सो गए कि अपना स्टेशन ही पार कर गए। पहले तो उन्हें गुस्सा आया, लेकिन अगले कुछ घंटे उन्होंने सहयात्री अदिति के साथ बातचीत में बिताए। किताबों, यात्राओं, सपनों और संघर्षों पर चर्चा होती रही। सुबह तक मोबाइल नंबरों का आदान-प्रदान हो चुका था। दो साल बाद सात फेरे भी हो गए।

बेंगलुरु मेट्रो में रोहित ने एक युवती को अपनी सीट देने की पेशकश की। युवती ने मना कर दिया। रोहित ने फिर आग्रह किया। उसने फिर मना कर दिया। कुछ ही देर में दोनों के बीच यह बहस छिड़ गई कि आखिर सीट पर बैठने का ज्यादा अधिकार किसका है। पूरी बोगी मुस्कुरा रही थी। बहस बातचीत में बदली, बातचीत दोस्ती में और दोस्ती प्रेम में। कुछ वर्षों बाद वही दोनों विवाह के मंडप में थे।

पुणे की मीरा को नहीं मालूम था कि जन्मदिन पर मंगाया गया पिज्जा उनकी जिंदगी बदल देगा। मूसलाधार बारिश में भीगते हुए डिलीवरी बॉय समीर पिज्जा लेकर पहुंचे। दोस्तों ने उन्हें अंदर बुला लिया। चाय पिलाई, बातें हुईं और नंबरों का आदान-प्रदान हो गया। अगले दिन पिज्जा का डिब्बा कूड़े में चला गया, लेकिन रिश्ता बचा रहा।

चेन्नई के दो मेडिकल छात्रों अनन्या और विकी की कहानी और भी अलग है। उनकी पहली मुलाकात किसी पार्क या कैफे में नहीं हुई थी। एनाटॉमी लैब में घंटों साथ पढ़ते-पढ़ते दोनों के बीच दोस्ती हुई। फॉर्मेलिन की गंध, मोटी किताबों और कठिन परीक्षाओं के बीच प्रेम ने चुपचाप अपनी जगह बना ली।

आज दोनों डॉक्टर हैं, पति-पत्नी हैं और दो बच्चों के माता-पिता भी।

गुरुग्राम की पूजा की प्रेम कहानी एक छोटी-सी कार दुर्घटना से शुरू हुई।

पार्किंग करते समय उनकी कार दूसरे वाहन से हल्की-सी टकरा गई। नुकसान कम हुआ लेकिन बातचीत ज्यादा हो गई। बीमा की जानकारी साझा हुई, फिर कॉफी हुई, फिर मुलाकातें शुरू हुईं। कार का डेंट कुछ दिनों में गायब हो गया। रिश्ता नहीं।

और शायद सबसे खूबसूरत कहानी अहमदाबाद के हरीश और सुनीता की है। दोनों साठ वर्ष की आयु पार कर चुके थे। एक सार्वजनिक पुस्तकालय में मरम्मत का काम चल रहा था। हरीश को अपनी नियमित सीट छोड़नी पड़ी। खाली कुर्सी केवल सुनीता जी के पास थी। पहले अखबारों पर चर्चा हुई। फिर किताबों पर। फिर जीवन की स्मृतियों पर।

धीरे-धीरे अकेलापन साथ में बदल गया। दोनों ने विवाह कर लिया। प्रेम ने एक बार फिर साबित कर दिया कि उसे कैलेंडर पढ़ना नहीं आता।

इन सभी कहानियों में एक बात समान है। जिंदगी अपने सबसे बड़े मोड़ों की घोषणा नहीं करती। न कोई बिगुल बजता है, न कोई चेतावनी मिलती है। बस एक साधारण-सा पल आता है और चुपचाप जीवन की दिशा बदल देता है।

एक गलत नंबर। एक छूटी हुई ट्रेन।एक बिखरा हुआ संतरा। एक छोटी-सी टक्कर। या फिर पुस्तकालय की एक खाली कुर्सी।

फिल्में परफेक्ट प्रेम कहानियां गढ़ने पर करोड़ों रुपये खर्च करती हैं। जिंदगी वही काम मुफ्त में कर देती है।

शायद इसलिए हमारे पूर्वजों ने कामदेव को पुष्प-बाणधारी कहा था। उनके बाण दिखाई नहीं देते। कोई आवाज नहीं करते। लेकिन कब किसे लग जाएं, कोई नहीं जानता।

कभी वे दुष्यंत को शकुंतला तक ले जाते हैं। कभी नल और दमयंती के बीच हंसों को संदेशवाहक बना देते हैं। और कभी आगरा के किसी अध्यापक से एक गलत नंबर डायल करा देते हैं।

हजारों वर्षों से प्रेम की लीला यही है।

सिर्फ माध्यम बदल गए हैं।

Saturday, May 30, 2026

 अवैध घुसपैठ: भारत के विकास और सामाजिक संतुलन के सामने बढ़ती चुनौती

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क्या भारत की सीमाएं केवल नक्शे पर खींची गई रेखाएं हैं?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

31 मई 2026

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यदि किसी दिन आपको पता चले कि आपके शहर की आबादी लाखों बढ़ गई है, स्कूलों में सीटें कम पड़ रही हैं, अस्पतालों में कतारें लंबी होती जा रही हैं, मजदूरी घट रही है और सरकारी योजनाओं का बोझ लगातार बढ़ रहा है, तो क्या आप इसे महज संयोग मानेंगे?

यह सवाल केवल सीमा राज्यों का नहीं है। यह सवाल देश के हर करदाता, हर बेरोजगार युवक, हर किसान और हर उस नागरिक का है जो बेहतर जीवन, बेहतर सुविधाओं और सुरक्षित भविष्य का सपना देखता है। अवैध घुसपैठ का मुद्दा वर्षों से राजनीति के अखाड़े में उछलता रहा है, लेकिन इसके सामाजिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय प्रभाव अब धीरे-धीरे पूरे देश में महसूस किए जाने लगे हैं।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं, "भारत आज दुनिया की सबसे तेज़ी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है। लेकिन विकास की इस दौड़ के बीच एक ऐसी समस्या लगातार बढ़ रही है, जिस पर राजनीति तो खूब होती है, पर समाधान कम दिखाई देता है। यह समस्या है अवैध घुसपैठ और अनधिकृत प्रवासन की।

यह विषय केवल सीमा सुरक्षा का प्रश्न नहीं है। इसका संबंध रोजगार, संसाधनों, जनसंख्या संतुलन, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय सुरक्षा से भी है।

अवैध प्रवासियों की वास्तविक संख्या का सटीक अनुमान लगाना कठिन है, क्योंकि वे सरकारी अभिलेखों में दर्ज नहीं होते। फिर भी समय-समय पर विभिन्न सरकारी बयानों में इनकी संख्या लाखों से लेकर करोड़ों तक बताई गई है। अधिकांश अवैध प्रवासी बांग्लादेश से आने वाले लोगों के रूप में चिन्हित किए जाते रहे हैं, जबकि म्यांमार से आए रोहिंग्या शरणार्थियों की भी एक उल्लेखनीय संख्या भारत के विभिन्न राज्यों में निवास कर रही है।"

पूर्वोत्तर भारत के राज्यों, विशेषकर असम, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल, ने दशकों से इस दबाव को महसूस किया है। असम आंदोलन का इतिहास इसी चिंता से जुड़ा रहा। स्थानीय लोगों का आरोप रहा कि लगातार हो रही घुसपैठ ने न केवल जनसंख्या का स्वरूप बदला, बल्कि भूमि, रोजगार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर भी असर डाला।

कल्पना कीजिए कि किसी छोटे शहर की आबादी अचानक कुछ वर्षों में लाखों बढ़ जाए। अस्पतालों में भीड़ बढ़ेगी, स्कूलों पर दबाव पड़ेगा, पानी और बिजली की मांग बढ़ेगी, और सस्ते श्रम की उपलब्धता स्थानीय मजदूरों की आय को प्रभावित कर सकती है। यही स्थिति कई सीमावर्ती क्षेत्रों और महानगरों में देखने को मिलती है।

दिल्ली, मुंबई, जयपुर, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे शहरों में निर्माण कार्यों, घरेलू श्रम, रिक्शा संचालन और असंगठित क्षेत्र में बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर कार्यरत हैं। इनमें अधिकांश वैध भारतीय नागरिक होते हैं, लेकिन सुरक्षा एजेंसियों ने समय-समय पर अवैध विदेशी नागरिकों के नेटवर्क भी उजागर किए हैं। नकली आधार कार्ड, फर्जी राशन कार्ड और जाली पहचान पत्रों का कारोबार इस समस्या को और जटिल बनाता है। समूचा नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद, गुरुग्राम के अर्बन क्लस्टर्स में डोमेस्टिक हेल्प के रूप में हजारों बाहरी तत्व कार्यरत हैं। दक्षिण भारत की चाय और काफी बागानों में बाहर के घुसपैठी काम कर रहे हैं, सस्ती लेबर के रूप में।

समाजशास्त्री टीपी श्रीवास्तव के मुताबिक, "आर्थिक दृष्टि से भी यह चुनौती कम नहीं है। भारत पहले ही अपने करोड़ों नागरिकों को बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और रोजगार उपलब्ध कराने के संघर्ष से जूझ रहा है। ऐसे में यदि बड़ी संख्या में अवैध लोग सार्वजनिक सुविधाओं का उपयोग करें, तो सरकारी संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ना स्वाभाविक है। करदाताओं के पैसे से चलने वाली योजनाओं का लाभ वास्तविक पात्र नागरिकों तक कम पहुंचने का खतरा भी बढ़ जाता है।"

मामला केवल आर्थिक नहीं है। कई क्षेत्रों में जनसांख्यिकीय परिवर्तन सामाजिक तनाव का कारण बने हैं। स्थानीय समुदायों को अपनी सांस्कृतिक पहचान, भाषा और पारंपरिक जीवन शैली पर खतरा महसूस होने लगता है। इतिहास गवाह है कि जब संसाधन सीमित हों और आबादी तेजी से बढ़े, तो सामाजिक टकराव की आशंका भी बढ़ जाती है।

भारत को इस चुनौती का समाधान संतुलित और व्यावहारिक तरीके से खोजना होगा। सीमाओं की बेहतर निगरानी, आधुनिक तकनीक आधारित सर्विलांस, पहचान प्रणालियों को मजबूत बनाना और पड़ोसी देशों के साथ प्रभावी प्रत्यर्पण एवं सत्यापन व्यवस्था विकसित करना आवश्यक है। साथ ही यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि मानवीय आधार पर संरक्षण पाने वाले लोगों के अधिकारों का सम्मान हो।

अवैध घुसपैठ किसी एक राज्य या राजनीतिक दल का मुद्दा नहीं है। यह राष्ट्रीय संसाधनों, सामाजिक स्थिरता और भविष्य की विकास योजनाओं से जुड़ा प्रश्न है। यदि इसे समय रहते गंभीरता से नहीं लिया गया, तो इसका बोझ आने वाली पीढ़ियों को उठाना पड़ सकता है।

एक विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा, जब उसकी सीमाएं सुरक्षित हों, नागरिकों के अधिकार संरक्षित हों और प्रवासन की व्यवस्था कानून तथा मानवीय मूल्यों दोनों के अनुरूप संचालित हो। संवेदनशीलता आवश्यक है, लेकिन संप्रभुता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।



Friday, May 29, 2026

 रात का खाना जानलेवा बन गया: वैवाहिक जीवन में पाक-विवादों का बढ़ता खतरा

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जब रसोई बनी रणभूमि: नमक, चिकन करी और मौत की थाली

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रात का खाना क्या बनेगा?

यह सवाल हर घर में पूछा जाता है। कभी मुस्कुराहट के साथ, कभी शिकायत के साथ। 

लेकिन जब यही सवाल मौत का कारण बन जाए, तब समाज को आईना देखने की जरूरत है।

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

31 मई 2026

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भारत समेत दुनिया भर के घरों में रसोई, जो कभी देखभाल और प्यार की जगह मानी जाती थी, अब झगड़ों का अखाड़ा बनती जा रही है। छोटी-मोटी बातों पर खाने को लेकर विवाद इतने उग्र रूप ले रहे हैं कि हत्या तक हो जा रही है। यह वैवाहिक संबंधों की गहरी दरारों को उजागर करता है।

तेलंगाना के कामारेड्डी में 28 वर्षीय कबाड़ विक्रेता कोडंडम शिवाजी ने अपनी पत्नी लक्ष्मी से रात के खाने में चिकन करी न बनाने पर झगड़ा किया। रिश्तेदारों ने शांत कराया, लेकिन थोड़ी देर बाद विवाद फिर भड़क उठा। पत्नी ने दरांती से हमला कर उसकी गर्दन पर वार किया। अत्यधिक खून बहने से वह मौके पर ही मर गया।

इसी तरह वडोदरा, गुजरात में मजदूर अमित देवीपूजक ने पत्नी मंजू द्वारा बनाए गए दोपहर के खाने को खाने से इनकार कर दिया। झगड़ा बढ़ा तो पत्नी ने चाकू से उसके सीने और सिर पर वार कर दी। अमित की मौत हो गई और मंजू को हत्या का मामला दर्ज कर गिरफ्तार किया गया।

ये घटनाएं अकेली नहीं हैं। ठाणे, महाराष्ट्र में एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी को “साबुदाना खिचड़ी में नमक ज्यादा” होने पर गला घोंटकर मार डाला। मुंबई में बिरयानी में नमक ज्यादा होने पर पत्नी की हत्या कर दी गई। उत्तर प्रदेश में गर्भवती पत्नी के साथ खाने को लेकर झगड़े में मौत हो गई। तेलंगाना में मटन करी न बनाने पर पत्नी की पिटाई कर हत्या का मामला भी सामने आया है। विदेशों में भी बुजुर्ग दंपति पैनकेक पर झगड़कर एक-दूसरे को मार डालने और ब्रिटेन में जन्मदिन के भोजन पर पत्नी द्वारा पति की हत्या जैसे मामले दर्ज हैं।

नमक-मिर्च, नॉन-वेज खाने की मांग, समय पर न बनाना या खाने से इनकार। ये विवाद रात के खाने या दोपहर के समय भूख और थकान में सबसे ज्यादा भड़कते हैं। हथियार आमतौर पर रसोई के चाकू या दरांती होते हैं। आर्थिक तनाव, शराब, बार-बार के झगड़े और खाना पकाने की जिम्मेदारी को लेकर लिंग-भेद की अपेक्षाएं इन छोटी घटनाओं को खूनी बना देती हैं।

ये “पाक-विवाद” बड़े सामाजिक विफलताओं : संघर्ष सुलझाने की कमी, मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा और वैवाहिक भूमिकाओं के दबाव , के लक्षण हैं। जब डिनर टेबल अपराध स्थल बन जाए तो समझ लीजिए कि घर में कुछ गलत पक रहा है। जागरूकता, काउंसलिंग और घरेलू जिम्मेदारियों को बांटने की जरूरत है।


हैदराबाद के पास कामारेड्डी में एक युवक ने पत्नी से पूछा कि चिकन करी क्यों नहीं बनी। बात बढ़ी। आवाजें ऊंची हुईं। रिश्तेदार आए, समझा-बुझाकर चले गए। लेकिन भीतर सुलग रही आग शांत नहीं हुई। कुछ देर बाद पत्नी ने घर में रखा हंसिया उठाया और पति पर वार कर दिया। युवक की मौके पर ही मौत हो गई।

उधर गुजरात के वडोदरा में एक आदमी ने पत्नी के बनाए खाने को खाने से इनकार कर दिया। बहस शुरू हुई। आरोप है कि पति ने पहले पत्नी को मारा। जवाब में पत्नी ने धारदार हथियार उठा लिया। कुछ मिनटों में एक और परिवार बिखर गया। दो बच्चे अनाथ जैसे हालात में पहुंच गए।

पहली नजर में ये घटनाएं हास्यास्पद लग सकती हैं। "चिकन करी के लिए हत्या?" "दोपहर के खाने पर मौत?" लेकिन पुलिस फाइलें और मनोवैज्ञानिक कुछ और कहानी बताते हैं।

असल में मौत चिकन करी से नहीं हुई। मौत उस तनाव से हुई जो वर्षों से जमा हो रहा था।

नमक ज्यादा था, जिंदगी कम पड़ गई

महाराष्ट्र के भायंदर में एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी की हत्या इसलिए कर दी क्योंकि साबूदाना खिचड़ी में नमक ज्यादा था। उनका बेटा यह सब देख रहा था।

मुंबई में एक अन्य मामले में बिरयानी में नमक ज्यादा होने की शिकायत ने पति-पत्नी के झगड़े को हत्या तक पहुंचा दिया।

उत्तर प्रदेश में एक गर्भवती महिला की जान चली गई। कारण वही पुराना था, खाने में नमक को लेकर विवाद।

सोचिए, एक चुटकी नमक। जिसकी कमी या अधिकता भोजन का स्वाद बदलती है। वही चुटकी कभी-कभी पूरे परिवार का भविष्य भी बदल देती है।

यह केवल भारत की कहानी नहीं है।

अमेरिका के विस्कॉन्सिन में एक युवती अपने प्रेमी के साथ बाहर जाना चाहती थी। प्रेमी ने कहा कि वह घर पर एयर फ्रायर में चिकन ड्रमस्टिक बना लेगा। मामूली लगने वाली बहस हिंसा में बदल गई और युवक की जान चली गई।

ब्रिटेन में एक महिला ने जन्मदिन के भोजन को लेकर हुए विवाद में अपने पति की हत्या कर दी।

वॉशिंगटन डीसी में एक बुजुर्ग दंपती के बीच पैनकेक को लेकर शुरू हुआ विवाद हत्या पर समाप्त हुआ।

महाद्वीप बदल जाते हैं। भाषा बदल जाती है। लेकिन कहानी लगभग वही रहती है।

रसोई में पकता भोजन कभी-कभी रिश्तों की कड़वाहट भी उबाल देता है।असल कारण खाना नहीं, कुछ और होता है

सवाल यह है कि क्या कोई सचमुच केवल नमक या चिकन के लिए हत्या कर सकता है? विशेषज्ञों का जवाब है: आमतौर पर नहीं। खाना सिर्फ ट्रिगर होता है। असली विस्फोटक सामग्री पहले से जमा रहती है।

आर्थिक तनाव। बेरोजगारी। शराब की लत। ससुराल के झगड़े। शक और अविश्वास। घरेलू हिंसा का पुराना इतिहास। अधूरी अपेक्षाएं। दबी हुई नाराजगी।

जब ये सब एक साथ जमा हो जाते हैं तो फिर एक वाक्य काफी होता है।

"आज चिकन क्यों नहीं बनाया?"

"इतना नमक किसने डाला?"

"मैं यह खाना नहीं खाऊंगा।"

और फिर शब्द हथियार बन जाते हैं। उसके बाद अक्सर असली हथियार भी निकल आते हैं।

भारतीय समाज में खाना केवल खाना नहीं है। यह प्रेम का प्रतीक है। कर्तव्य का प्रतीक है। सम्मान का प्रतीक है।विशेषकर महिलाओं के लिए रसोई को आज भी उनके मूल्यांकन का पैमाना माना जाता है।

खाना अच्छा बना तो तारीफ कम मिलती है। खराब बना तो आलोचना तुरंत मिल जाती है।

कई घरों में पत्नी की मेहनत को स्वाभाविक मान लिया जाता है। वहीं दूसरी ओर पुरुषों पर कमाने और परिवार चलाने का दबाव रहता है। दोनों पक्ष तनाव में रहते हैं।

नतीजा? रात का भोजन कभी-कभी तनाव का अखाड़ा बन जाता है।

थाली में परोसी दाल केवल दाल नहीं रहती। उसमें आर्थिक संघर्ष, सामाजिक अपेक्षाएं और वैवाहिक तनाव भी परोस दिए जाते हैं।

भूख और गुस्से का खतरनाक रिश्ता

मनोविज्ञान में एक दिलचस्प शब्द है "हैंग्री"। यानी भूख और गुस्से का मिश्रण।

शोध बताते हैं कि भूखे व्यक्ति में चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है। निर्णय लेने की क्षमता कमजोर पड़ती है। छोटी बात बड़ी लगने लगती है।

भारत में अधिकांश ऐसे झगड़े शाम या रात के भोजन के समय होते हैं।

दिन भर की थकान। पैसों की चिंता।काम का दबाव। और फिर भूख। इन सबका मिश्रण कई बार विस्फोटक साबित होता है।

रसोई के बर्तन नहीं, रिश्ते तेज हो रहे हैं । इन घटनाओं में एक और समानता दिखाई देती है। हथियार अक्सर घर में ही मौजूद होते हैं। चाकू। हंसिया।कैंची। बेलन। यानी हत्या की तैयारी नहीं होती। गुस्से का क्षण होता है।

एक क्षण जो पूरी जिंदगी बदल देता है। पांच मिनट का क्रोध कई बार पचास वर्षों की सजा बन जाता है।

एक समय था जब भारतीय परिवार साथ बैठकर भोजन करते थे और बातचीत भी करते थे। आज कई घरों में बातचीत खत्म हो रही है, केवल शिकायतें बची हैं।

चिकन करी, बिरयानी, खिचड़ी या पैनकेक किसी की जान नहीं लेते।

लेकिन अनियंत्रित क्रोध, लगातार अपमान, घरेलू हिंसा और संवाद की कमी जरूर जान ले सकती है।

रसोई में आग का काम भोजन पकाना है। जब वही आग रिश्तों को जलाने लगे, तब समाज को चेत जाना चाहिए। क्योंकि मौत कभी नमक से नहीं होती। मौत उस कड़वाहट से होती है जो वर्षों से रिश्तों में घुलती रहती है।


 ये रस्साकशी कब तक?

तीन भाषा फार्मूला: स्कूल की घंटी से क्यों कांप उठता है भारत?

अब सुप्रीम कोर्ट को करना है फैसला।

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

30 मई 2026

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भारत में भाषा केवल बोली नहीं जाती। भाषा यहां छाती ठोककर चलती है। झंडा बन जाती है। राजनीति बन जाती है। और कभी-कभी बारूद भी।

एक मामूली सा स्कूल सर्कुलर फिर तूफान ले आया है।

सीबीएसई ने कहा है कि जुलाई 2026 से कक्षा 9 के बच्चों को तीन भाषाएं पढ़नी होंगी। दो भारतीय भाषाएं जरूरी होंगी। सुनने में बात सीधी लगती है। लेकिन भारत में भाषा का मामला कभी सीधा नहीं होता। यहां तो खीर में भी राजनीति ढूंढ ली जाती है।

बस फिर क्या था। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। अभिभावक परेशान। बच्चे हक्के-बक्के। शिक्षक माथा पकड़कर बैठे हैं। लोग पूछ रहे हैं : गांव के स्कूल में गणित का मास्टर नहीं मिलता, अब तमिल और कन्नड़ कौन पढ़ाएगा? बच्चे बोर्ड परीक्षा की तैयारी करें या भाषा प्रयोगशाला खोलें?

भारत में भाषा की आग नई नहीं है। यह चिंगारी आजादी के साथ ही पैदा हो गई थी। संविधान सभा में सवाल उठा :  देश आखिर बोलेगा क्या?

हिंदी समर्थक चाहते थे कि अंग्रेजी का बोरिया-बिस्तर बांध दिया जाए। दक्षिण भारत डर गया। उन्हें लगा दिल्ली धीरे-धीरे हिंदी का बुलडोजर चला देगी।

आखिर समझौता हुआ। हिंदी राजभाषा बनी। अंग्रेजी को 15 साल की मोहलत मिली। लेकिन, भारत में असली लड़ाई मोहलत खत्म होने पर ही शुरू होती है।

1965 आया।

तमिलनाडु सुलग उठा। छात्र सड़क पर उतर आए। रेल रोकी गईं। नारे गूंजे।आग लगी। लाठियां चलीं। लाशें गिरीं।

दक्षिण भारत को लगा कि हिंदी अब सिर पर बैठाई जा रही है। आंदोलन ऐसा उठा कि कांग्रेस तमिलनाडु में बह गई। द्रविड़ राजनीति का सूरज वहीं से निकला। दिल्ली को पीछे हटना पड़ा। अंग्रेजी बच गई। हिंदी रुक गई। लेकिन शक का कांटा दिल में धंसा रह गया।

इधर, उत्तर भारत की यूनिवर्सिटीज में सोशलिस्टों ने अंग्रेजी हटाओ आंदोलन को आगे बढ़ाया, स्ट्राइक, प्रदर्शन, बोर्ड पुताई, उपद्रव!

इसी तूफान से निकला “तीन भाषा फार्मूला”।

सोच बड़ी सुंदर थी। एक भारत, श्रेष्ठ भारत। हर बच्चा तीन भाषाएं सीखे।मातृभाषा भी। हिंदी भी। अंग्रेजी भी।

सपना ऐसा कि काशी वाला बच्चा तमिल कविता समझे और चेन्नई वाला बच्चा कबीर पढ़े। भाषा दिलों को जोड़े। देश को गोंद की तरह चिपका दे।

लेकिन भारत में नीति और जमीन का रिश्ता अक्सर सास-बहू जैसा रहता है।

कागज पर फार्मूला चमकता रहा।जमीन पर लड़खड़ाता रहा।

तमिलनाडु ने साफ कह दिया :  हमें नहीं चाहिए तीन भाषा फार्मूला। वहां आज भी तमिल और अंग्रेजी की दो भाषा नीति चलती है। दूसरी तरफ हिंदी पट्टी के कई राज्यों ने भी चालाकी दिखाई। दक्षिण भारतीय भाषाएं पढ़ाने की जगह संस्कृत डाल दी। सांप भी मर गया, लाठी भी नहीं टूटी।

यही बात दक्षिण भारत को चुभती है।

एक तमिल बच्चा हिंदी सीखे।

लेकिन उत्तर भारत का बच्चा तमिल क्यों नहीं सीखता?

यही सवाल आज भी राजनीति की हांडी में उबलता रहता है।

भाषा का मामला यहां सीधा कभी नहीं रहा। इसके पीछे सत्ता छिपी रहती है। नौकरी छिपी रहती है।पहचान छिपी रहती है।

नई शिक्षा नीति कहती है कि बहुभाषी बच्चे ज्यादा रचनात्मक होते हैं। कई भाषाएं सीखने से सोचने की क्षमता बढ़ती है। बात गलत भी नहीं है। यूरोप में लोग तीन-चार भाषाएं आराम से बोल लेते हैं।

लेकिन भारत यूरोप नहीं है। यहां गांव के स्कूल में ब्लैकबोर्ड टूटा पड़ा है। कहीं पंखा नहीं। कहीं शिक्षक नहीं।कहीं बच्चे फर्श पर बैठते हैं।

ऐसे में लोग पूछते हैं :  पहले स्कूल तो संभाल लो, फिर भाषाई महल बनाना।

और सबसे बड़ा व्यंग्य देखिए।

नेता मंच से भारतीय भाषाओं का गुणगान करते हैं। लेकिन अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूल में भेजते हैं। घर में हिंदी। भाषण में संस्कृत। और करियर के लिए अंग्रेजी।

यानी मुंह में राम, बगल में अंग्रेजी कॉन्वेंट।

सच्चाई यह है कि भारत में अंग्रेजी आज भी नौकरी का पासपोर्ट है। आईटी कंपनी से लेकर अदालत तक, मेडिकल कॉलेज से लेकर कॉरपोरेट दफ्तर तक, अंग्रेजी का सिक्का चलता है। गरीब आदमी भी जानता है कि टूटी-फूटी अंग्रेजी कई बार अच्छी हिंदी से ज्यादा कमाई करा देती है।

यहीं भाषा राजनीति का असली दर्द छिपा है।

दक्षिण भारत को डर है कि भाषा के नाम पर धीरे-धीरे केंद्रीकरण बढ़ेगा। उत्तर भारत को लगता है कि हिंदी राष्ट्रीय पहचान की डोर है। अंग्रेजी चुपचाप दोनों के सिर पर बैठी मुस्कुरा रही है।

भारत का नक्शा भी भाषा ने बदला है। आंध्र प्रदेश भाषा आंदोलन से बना। महाराष्ट्र और गुजरात भाषाई मांगों से निकले।

भाषा ने सरकारें गिराईं। नेता पैदा किए। और कई बार देश को बांटने की धमकी भी दी।

इसलिए भारत में भाषा केवल विषय नहीं है। यह भावनाओं का ज्वालामुखी है।

अब सुप्रीम कोर्ट फैसला करेगा।

लेकिन अदालत कानून समझा सकती है, दिल नहीं बदल सकती।

तीन भाषा फार्मूला आज भी रस्सी पर चलने जैसा है।

हर सरकार संतुलन बनाती है। हर राज्य शक की नजर से देखता है। हर अभिभावक डरता है कि कहीं प्रयोग का बोझ उसके बच्चे पर न टूट पड़े।

भारत की भाषाएं उसकी सबसे बड़ी ताकत हैं। लेकिन यही उसकी सबसे बड़ी सिरदर्दी भी हैं।

यहां भाषा केवल पढ़ाई नहीं जाती।उसकी पहरेदारी होती है। उसके सहारे राजनीति होती है। 1956 में भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन करना सबसे बड़ी गलती थी। 

Thursday, May 28, 2026

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यमुना पुनर्जीवन हेतु आगरा-विशिष्ट माँगों के संबंध में

प्रेषक:

ब्रज खंडेलवाल एवं सदस्यगण

रिवर कनेक्ट अभियान (यमुना आरती सभा), आगरा

एतमाद्दौला व्यू प्वाइंट पार्क, यमुना किनारा रोड, आगरा

प्रति:

माननीय प्रधानमंत्री, भारत सरकार

श्री नरेंद्र मोदी जी

साउथ ब्लॉक, नई दिल्ली

तथा

माननीय मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश सरकार

श्री योगी आदित्यनाथ जी

लखनऊ, उत्तर प्रदेश

विषय: 27 मई 2026 को माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यमुना पुनर्जीवन के संबंध में दिए गए निर्देशों के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु आगरा-विशिष्ट माँगों के संबंध में ज्ञापन।

दिनांक: 28 मई 2026

मान्यवर,

27 मई 2026 को माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यमुना नदी की दयनीय स्थिति पर स्वतः संज्ञान लेते हुए केंद्रीय गृह सचिव की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति गठित की गई है, जिसे आठ सप्ताह के भीतर व्यापक “यमुना एक्शन प्लान” प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है। यह निर्णय करोड़ों लोगों की भावनाओं, पर्यावरणीय चिंताओं तथा सांस्कृतिक विरासत की रक्षा की दिशा में एक ऐतिहासिक और स्वागतयोग्य कदम है।

हम, रिवर कनेक्ट अभियान (यमुना आरती सभा), आगरा के सदस्य एवं समर्थक, आपके समक्ष यह ज्ञापन प्रस्तुत कर यमुना नदी की आगरा क्षेत्र में अत्यंत गंभीर स्थिति की ओर ध्यान आकृष्ट करना चाहते हैं तथा कुछ अत्यावश्यक और व्यावहारिक माँगें रखना चाहते हैं, जिनका तत्काल समाधान यमुना पुनर्जीवन के लिए अनिवार्य है।

यमुना, जो कभी ब्रज संस्कृति, आस्था, कृषि और जीवन का आधार थी, आज आगरा में एक मौसमी नाले में बदल चुकी है। वर्ष के अधिकांश समय नदी का पाट सूखा पड़ा रहता है। बहाव के स्थान पर केवल सीवर का काला पानी दिखाई देता है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा व्यक्त यह पीड़ा कि “यमुना अब एक सीवेज नाले से अधिक कुछ नहीं रह गई”, आगरा की जनता प्रतिदिन अपनी आँखों से देख रही है।

ताजमहल की संरचनात्मक स्थिरता भी यमुना के जलस्तर और आर्द्रता पर निर्भर मानी जाती है। यदि नदी सूखती रही तो यह केवल पर्यावरणीय संकट नहीं रहेगा, बल्कि विश्व धरोहर और भारत की सांस्कृतिक पहचान पर भी खतरा बन जाएगा। अतः यह समय केवल घोषणाओं का नहीं, बल्कि निर्णायक और समयबद्ध कार्रवाई का है।

रिवर कनेक्ट अभियान की प्रमुख आगरा-विशिष्ट माँगें

1. ताजमहल के डाउनस्ट्रीम क्षेत्र में बैराज /  डैम का तत्काल निर्माण

पिछले लगभग 25-30 वर्षों से ताजमहल के डाउनस्ट्रीम क्षेत्र में बैराज अथवा रबर चेक डैम निर्माण का प्रस्ताव सरकारी फाइलों में लंबित पड़ा है। अनेक बार माँग उठने के बावजूद यह परियोजना नौकरशाही उदासीनता का शिकार रही है।

यह संरचना अत्यंत आवश्यक है ताकि ताजमहल के आसपास तथा उसके आगे लगभग 20-25 किलोमीटर क्षेत्र में न्यूनतम जलस्तर बना रहे और नदी में बारहमासी प्रवाह सुनिश्चित हो सके। वर्तमान में नदी का सूखा पाट अतिक्रमण, कचरा फेंकने, गाद जमाव तथा प्रदूषण का स्थायी केंद्र बन गया है।

हम माँग करते हैं कि:

- इस परियोजना को “राष्ट्रीय महत्व” की परियोजना घोषित किया जाए।

- राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन एवं जल शक्ति मंत्रालय के माध्यम से विशेष निधि आवंटित की जाए।

- निर्माण हेतु स्पष्ट समयसीमा तय की जाए।

- तकनीकी एवं पर्यावरणीय स्वीकृतियों की प्रक्रिया में अनावश्यक विलंब समाप्त किया जाए।

अब और देरी यमुना तथा ताजमहल दोनों के लिए विनाशकारी सिद्ध होगी।

2. न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह (E-Flow) एवं पर्याप्त स्वच्छ जल छोड़े जाने की व्यवस्था

आगरा तक पहुँचते-पहुँचते यमुना में स्वच्छ जल लगभग समाप्त हो जाता है। गैर-मानसूनी महीनों में नदी में जो प्रवाह दिखाई देता है, उसका अधिकांश भाग सीवर, नालों और औद्योगिक अपशिष्टों का होता है।

हम माँग करते हैं कि:

- हरियाणा एवं उत्तराखंड के बैराजों से वर्षभर न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह कानूनी रूप से सुनिश्चित किया जाए।

- Upper Yamuna River Board के माध्यम से रियल-टाइम टेलीमेट्री आधारित निगरानी प्रणाली लागू हो।

- जल बँटवारे के नियमों को सख्ती से लागू किया जाए।

- गर्मियों एवं सूखे मौसम में अतिरिक्त स्वच्छ जल छोड़ा जाए।

पर्याप्त जल प्रवाह के बिना यमुना का पुनर्जीवन असंभव है। जल ही नदी का प्राण है।

3. आगरा के शहरी क्षेत्र में वैज्ञानिक डी-सिल्टिंग एवं ड्रेजिंग

आगरा में यमुना का तल भारी मात्रा में गाद, प्लास्टिक, निर्माण मलबे और विषैले अवशेषों से भर चुका है। इससे नदी की जलधारण क्षमता और भूजल पुनर्भरण की प्रक्रिया गंभीर रूप से प्रभावित हुई है।

हम माँग करते हैं कि:

- आगरा के लगभग 20-25 किलोमीटर शहरी हिस्से में चरणबद्ध वैज्ञानिक डी-सिल्टिंग एवं ड्रेजिंग कराई जाए।

- इस कार्य में IITs, पर्यावरण विशेषज्ञों, पुरातत्व विभाग एवं जल वैज्ञानिकों की निगरानी सुनिश्चित हो।

- पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) के आधार पर सुरक्षित तकनीक अपनाई जाए।

- निकाली गई गाद एवं अपशिष्ट के वैज्ञानिक निस्तारण की व्यवस्था हो।

यदि यह कार्य सावधानीपूर्वक किया जाए, तो इससे नदी की गहराई, प्रवाह क्षमता और भूजल पुनर्भरण में उल्लेखनीय सुधार होगा।

4. यमुना के बाढ़क्षेत्रों एवं नदी तल से अतिक्रमण हटाया जाए

नदी के प्राकृतिक बाढ़क्षेत्रों पर अवैध कब्जों, कंक्रीटीकरण और निर्माण कार्यों ने यमुना की प्राकृतिक जीवन प्रणाली को बाधित कर दिया है।

हम माँग करते हैं कि:

- सभी अवैध अतिक्रमणों के विरुद्ध विशेष अभियान चलाया जाए।

- बाढ़क्षेत्रों को पुनर्स्थापित किया जाए।

- नदी किनारों के अनियंत्रित कंक्रीटीकरण पर पूर्ण प्रतिबंध लगे।

- जैव-विविधता संरक्षण हेतु प्राकृतिक हरित पट्टियाँ विकसित की जाएँ।

नदी केवल जलधारा नहीं होती; उसका बाढ़क्षेत्र भी उसके शरीर का हिस्सा होता है।

5. प्रदूषण नियंत्रण एवं आधारभूत ढाँचे को सुदृढ़ किया जाए

यमुना में गिरने वाले अधिकांश नाले आज भी अपर्याप्त शोधन व्यवस्था के कारण प्रदूषण फैला रहे हैं।

हमारी माँगें हैं:

- आगरा के सभी नालों का 100 प्रतिशत सीवेज शोधन सुनिश्चित किया जाए।

- STP एवं CETP की क्षमता बढ़ाई जाए तथा उनकी नियमित मॉनिटरिंग हो।

- औद्योगिक प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों पर कठोर दंडात्मक कार्रवाई हो।

- यमुना घाटों का सौंदर्यीकरण पर्यावरणीय संवेदनशीलता के साथ किया जाए।

- नदी संरक्षण कानूनों के पालन हेतु विशेष “रिवर पुलिस स्क्वॉड” गठित किया जाए।

6. जनभागीदारी एवं पारदर्शी निगरानी व्यवस्था

किसी भी नदी पुनर्जीवन अभियान की सफलता स्थानीय समाज की भागीदारी पर निर्भर करती है।

अतः हम माँग करते हैं कि:

- रिवर कनेक्ट अभियान सहित स्थानीय सामाजिक संगठनों, पर्यावरणविदों एवं नागरिक समूहों को योजना निर्माण एवं निगरानी में शामिल किया जाए।

- जल गुणवत्ता, प्रवाह, प्रदूषण स्तर और परियोजनाओं की प्रगति हेतु सार्वजनिक डिजिटल डैशबोर्ड बनाया जाए।

- प्रत्येक तीन माह में प्रगति रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।

- स्कूलों, कॉलेजों और सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से “यमुना जन-जागरण अभियान” चलाया जाए।

माननीय प्रधानमंत्री जी एवं मुख्यमंत्री जी,

आगरा की जनता दशकों से यमुना के पुनर्जीवन की प्रतीक्षा कर रही है। सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप एक ऐतिहासिक अवसर लेकर आया है। यदि अब भी निर्णायक कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें कभी क्षमा नहीं करेंगी।

अतः हम आपसे विनम्र निवेदन करते हैं कि:

1. उपर्युक्त आगरा-विशिष्ट माँगों को यमुना एक्शन प्लान में तत्काल शामिल किया जाए।

2. आगरा हेतु विशेष टास्क फोर्स एवं पृथक बजट आवंटित किया जाए।

3. सभी परियोजनाओं के लिए समयबद्ध कार्ययोजना बनाई जाए।

4. डाउनस्ट्रीम बैराज परियोजना पर लंबित नौकरशाही बाधाओं को समाप्त करने हेतु व्यक्तिगत हस्तक्षेप किया जाए।

यमुना का पुनर्जीवन केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं है। यह भारत की सभ्यता, संस्कृति, आस्था, इतिहास और भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। ब्रजभूमि की आत्मा यमुना से ही जीवित है।

हम पूर्ण सहयोग का आश्वासन देते हुए आपसे आग्रह करते हैं कि शीघ्र, ठोस और प्रभावी कदम उठाए जाएँ ताकि आने वाली पीढ़ियाँ पुनः एक स्वच्छ, निर्मल और अविरल यमुना का दर्शन कर सकें।


सादर,


रिवर कनेक्ट अभियान (यमुना आरती सभा)

एतमाद्दौला व्यू प्वाइंट पार्क

यमुना किनारा रोड, आगरा

मोबाइल: ___7895852750

ईमेल: agrabrij@gmail.com 

प्रतिलिपि:

- माननीय केंद्रीय जल शक्ति मंत्री, भारत सरकार

- मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश सरकार

- सदस्य सचिव, राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन

- अध्यक्ष, अपर यमुना नदी बोर्ड

- जिलाधिकारी, आगरा

- नगर आयुक्त, आगरा नगर निगम

Wednesday, May 27, 2026

 नई कुली अर्थव्यवस्था: 

क्या भारत के स्टार्टअप आधुनिक गुलामी गढ़ रहे हैं?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

29 मई 2026

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28 वर्षीय युवक, उदय नाथ पीठ पर भारी बैग लटकाए ट्रैफिक चीरता भाग रहा है।

बिहार से आया रमेश चौधरी चार मंज़िल सीढ़ियाँ चढ़कर राशन का सामान पहुँचा रहा है।

उधर हलवाई की दुकान के बाहर बाबू लाल मोबाइल स्क्रीन पर टकटकी लगाए अगले ऑर्डर का इंतज़ार कर रहा है।

मोतियाबिंदी अर्थ शास्त्री इसे “स्टार्टअप क्रांति” कहते हैं। लेकिन क्या यह सचमुच क्रांति है? या फिर पुरानी सामंती व्यवस्था का नया डिजिटल संस्करण?

चेहरे बदल गए हैं। लठैत जमींदार की जगह अब हूडी पहनने वाले फाउंडर हैं। कुली अब सूटकेस नहीं, फूड पैकेट और किराने के बैग ढो रहा है।

ढांचा मगर वही है। भारत के महानगरों में लाखों प्रवासी युवक आज क्विक कॉमर्स, डिलीवरी ऐप्स, लॉजिस्टिक्स और प्लेटफॉर्म कंपनियों की रीढ़ बने हुए हैं। निवेशक अरबों डॉलर की वैल्यूएशन पर ताली बजाते हैं। स्टार्टअप फाउंडर नए भारत के “आइकॉन” कहलाते हैं। विज्ञापन इन्हें “डिलीवरी हीरो” और “पार्टनर” बताते हैं। लेकिन चमकदार शब्दों के पीछे एक कड़वी सच्चाई छिपी है। ये नव युग के कुली मेहनत करते हैं, कौशल प्रदर्शन नहीं।

दो सौ वर्षों से कुली गिरी चल रही है, पहले अंग्रेजों की, अब अमेरिकन्स की। या तो गोरे आदमी का मैन फ्राइडे, या बाबुओं का सामान ढोता कुली! बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश या राजस्थान से आया युवक दस-दस घंटे बाइक चलाता है। बारिश, धूप, प्रदूषण, दुर्घटना: सब झेलता है। पाँच साल बाद उसके पास क्या बचता है? बस टूटता शरीर और अनिश्चित भविष्य। यह रोजगार अवसर कम, श्रम दोहन अधिक है।

मैन्युफैक्चरिंग और इंजीनियरिंग सेक्टर्स तो कुछ ज्यादा आगे नहीं बढ़ सके, लेकिन हौले हौले हमारी अर्थव्यवस्था “सुविधा सेवा” आधारित समाज बनती जा रही है। एक ऐसा समाज जहाँ मध्यम वर्ग अपनी सुविधा के लिए अलादीन का बटन दबाता है और कोई अदृश्य भूत, यानी श्रमिक दस मिनट में सामान लेकर दरवाज़े पर हाज़िर हो जाता है।

आराम अब नया धर्म बन चुका है।

देश कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल इंडिया और नवाचार की बातें करता है, मगर करोड़ों युवा आज भी बेहद प्राथमिक श्रम चक्र में फँसे हुए हैं। शहरों की सुविधा का बोझ इन्हीं कुलियों के कंधों पर लदा है, कहते हैं पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी।

समाज शास्त्री टीपी श्रीवास्तव के मुताबिक, "हमारी भाषा भी अब सच्चाई छिपाने लगी है। कुली अब “गिग पार्टनर” बन गया है। नौकरी “फ्लेक्सिबिलिटी” कहलाने लगी। शोषण “ऑपर्च्युनिटी” बन गया। स्टार्टअप संस्कृति कई बार नई रंगाई-पुताई वाला पुराना हवेली तंत्र लगती है।"

यह समस्या केवल डिलीवरी ऐप्स तक सीमित नहीं है। भारत पहले भी ऐसा दौर देख चुका है।

बीपीओ और आईटी सर्विस सेक्टर के उभार के समय लाखों युवा कॉल सेंटर और आउटसोर्सिंग नौकरियों में चुक गए। शुरुआती वर्षों में यह आर्थिक चमत्कार जैसा लगा। वेतन बढ़े। अंग्रेज़ी बोलने वाली पीढ़ी तैयार हुई। परिवार खुश हुए। लेकिन दो दशक बाद तस्वीर उतनी चमकदार नहीं दिखती।

बहुत बड़ी संख्या में युवाओं ने सीमित और दोहराव वाले कौशल सीखे। वे वैश्विक सेवा उद्योग के “रिप्लेसेबल पार्ट” बनकर रह गए। देश ने डिग्रीधारी युवाओं की फौज तो पैदा कर ली, मगर नवाचार, अनुसंधान और विनिर्माण क्षमता उतनी विकसित नहीं हुई।

आज की गिग अर्थव्यवस्था उसी गलती को और बड़े पैमाने पर दोहरा रही है। एक डिलीवरी बॉय रोज़ी तो कमा सकता है, मगर क्या यही किसी युवा राष्ट्र का सपना होना चाहिए? रोजगार अगर व्यक्ति को ऊपर उठाने की बजाय वहीं जकड़ दे, तो वह विकास नहीं, संगठित ठहराव है।सबसे खतरनाक असर मानसिक है।

शहरी भारत आज प्रवासी श्रमिकों पर पूरी तरह निर्भर है। गरम खाना इसलिए पहुँचता है क्योंकि कोई बारिश में भीग रहा है। रातोंरात पार्सल इसलिए आता है क्योंकि किसी ने नींद छोड़ी है। दस मिनट में किराना इसलिए मिलता है क्योंकि किसी ने अपनी सेहत दाँव पर लगाई है।

लेकिन कोई यह नहीं पूछता;

चालीस साल की उम्र में उस डिलीवरी राइडर का क्या होगा? उसकी टूटी कमर का इलाज कौन करेगा?एल्गोरिद्म उसे बेकार कर देंगे तो नया कौशल कौन देगा?

किसी सभ्यता की असली पहचान उसके अरबपतियों से नहीं, उसके श्रमिकों की गरिमा से होती है।

मज़दूरी सीढ़ी बननी चाहिए, दलदल नहीं। देश तब आगे बढ़ते हैं जब श्रमिक मांसपेशियों से कौशल की ओर बढ़ते हैं। 

यह आधुनिकता नहीं। यह डिजिटल सामंतवाद है। स्टार्टअप कहानी केवल यूनिकॉर्न पैदा करने की नहीं होनी चाहिए। उसे कुशल नागरिक भी पैदा करने चाहिए। क्योंकि जो अर्थव्यवस्था दस मिनट में बर्गर पहुँचा सकती है, लेकिन दस साल में श्रमिक को गरिमा नहीं दे सकती, वह वास्तव में प्रगति नहीं कर रही। वह बस गोल-गोल दौड़ रही है,  लाइक एलिस इन वंडरलैंड।

Monday, May 25, 2026

 क्या यही वह गौरवशाली, पूजनीय श्रीकृष्ण की भूमि है, जो आज बूंद-बूंद पानी के लिए तड़प रही है?

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प्यासा ब्रज: तालाबों-कुंडों की धरती श्रीकृष्ण नगरी आखिर पानी को क्यों तरस रही है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

28 मई 2026

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ब्रज मंडल की प्रकृति, यमुना तट, कुंज गलियों, मोरों, गायों और कृष्ण लीलाओं का सुंदर वर्णन अनेक लोकप्रिय भजनों और गीतों में मिलता है। “श्याम तेरी बंसी पुकारे,” “राधे राधे बरसाने वाली,” “मैया मोरी,” और “जय राधा माधव” जैसे भजन वृंदावन, बरसाना और गोकुल की आध्यात्मिक सुंदरता को जीवंत करते हैं। सूरदास और रसखान के पद विशेष रूप से प्रकृति का मार्मिक वर्णन करते हैं।

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कभी यह धरती बांसुरी की तान पर झूमती थी। यमुना किनारे कदंब की छांव थी। कुंडों में कमल खिलते थे।तालाब गांवों की धड़कन होते थे।

आज उसी ब्रज मंडल में सुबह का पहला दृश्य क्या है? हाथों में बाल्टियां लिए महिलाएं। सूखे नलों के नीचे टकटकी लगाए बच्चे। और पानी के टैंकर के पीछे भागती भीड़।

यह वही ब्रज है, जहां श्रीकृष्ण ने गोपियों संग रास रचाया था। वही भूमि, जिसे संतों ने “धरा पर स्वर्ग” कहा। लेकिन अब यह स्वर्ग प्यास से फटे होंठों वाला मरुस्थल बनता जा रहा है। विडंबना देखिए । यमुना किनारे बसे शहरों में लोग पीने के पानी के लिए जूझ रहे हैं।

कभी ब्रज का हर गांव एक छोटे जल-संसार जैसा था। कुंड थे। पोखर थे। बावड़ियां थीं। बरसात का पानी सहेजने की अद्भुत लोक-व्यवस्था थी।

बूढ़े लोग बताते हैं कि मथुरा और वृंदावन में बीस तीस फीट खोदो तो मीठा पानी मिल जाता था। अब डेढ़ सौ फीट नीचे भी कई बार सिर्फ गाद या हवा निकलती है। धरती का सीना खाली हो चुका है। जैसे किसी ने भीतर का सारा जीवन चूस लिया हो।

गर्मियों में हालात और भयावह हो जाते हैं। मोहल्लों में,  गांवों में पानी के लिए रोज छोटे-छोटे युद्ध होते हैं। टैंकर आता है तो ऐसा लगता है जैसे रेगिस्तान में बादल उतर आया हो। 

यह संकट अचानक नहीं आया। यह वर्षों की लापरवाही का नतीजा है।

ब्रज के तालाब और सरोवर सिर्फ सजावट नहीं थे। वे धरती के बैंक थे। बरसात का पानी जमा करते थे, भूजल रिचार्ज करते थे, गर्मी कम करते थे। लेकिन विकास के नाम पर इन जलाशयों को मिटा दिया गया। कहीं कॉलोनियां उग आईं। कहीं पार्किंग बन गई। कई कुंड कूड़ाघर में बदल गए।

कंक्रीट ने मिट्टी की सांस रोक दी।

धरती पानी पीना भूल गई।

राजनीति ने भी अपना खेल खेला। चुनावों में बड़े-बड़े वादे हुए। यमुना सफाई की बातें हुईं। हर घर जल पहुंचाने के दावे हुए। घाट चमकाए गए। रंगीन लाइटें लगीं। पर्यटन को बढ़ावा मिला। लेकिन गांवों के सूखे हैंडपंप किसी भाषण का हिस्सा नहीं बने।

मथुरा से सांसद बनीं हेमा मालिनी ने भी यमुना और जल संकट पर कई घोषणाएं कीं। करोड़ों रुपये योजनाओं में खर्च हुए। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बने। “नमामि गंगे” और “जल जीवन मिशन” जैसे अभियानों का खूब प्रचार हुआ। मगर जमीन पर तस्वीर अब भी अधूरी है। शहर के कुछ हिस्सों में पाइपलाइन पहुंची, लेकिन बाहरी बस्तियां और गांव अब भी भूजल के भरोसे हैं।

सबसे दुखद हालत यमुना की है।

जिस नदी को ब्रज की मां कहा जाता था, वह कई जगहों पर नाले जैसी दिखती है। दिल्ली और दूसरे शहरों का प्रदूषण बहता हुआ यहां पहुंचता है। काले झाग, बदबू और गंदगी ने नदी की आत्मा को घायल कर दिया है। श्रद्धालु आरती उतारते हैं, लेकिन नदी खुद जैसे मदद की गुहार लगा रही हो।

एक समय था जब बच्चे यमुना में छलांग लगाकर तैरना सीखते थे। आज माता-पिता बच्चों को नदी के पास जाने से डरते हैं। पानी में बीमारी है। जहरीले रसायन हैं। गांवों के कई इलाकों में भूजल में फ्लोराइड और TDS की मात्रा खतरनाक स्तर तक पहुंच चुकी है। लोग धीरे-धीरे बीमार हो रहे हैं। दांत खराब हो रहे हैं। किडनी रोग बढ़ रहे हैं। टाइफाइड और हेपेटाइटिस आम बात बनते जा रहे हैं।

पर्यटन ने भी दबाव बढ़ाया है।

हर साल करोड़ों श्रद्धालु ब्रज पहुंच रहे हैं। होटल, धर्मशालाएं, रेस्टोरेंट और नई कॉलोनियां तेजी से बढ़ रही हैं। पानी की मांग आसमान छू रही है। लेकिन जल संरक्षण की रफ्तार घोंघे जैसी है। विकास हो रहा है या विनाश? 

स्थानीय नेतृत्व की विफलता अब खुली किताब है।

भव्य परियोजनाओं पर ध्यान रहा। फोटो खिंचवाने पर ध्यान रहा। लेकिन तालाब बचाने, वर्षा जल संचयन लागू करने और अतिक्रमण हटाने जैसे बुनियादी काम पीछे छूट गए। विकास का ढोल बजता रहा, मगर धरती भीतर से सूखती रही।

फिर भी उम्मीद पूरी तरह मरी नहीं है।

कुछ गांवों में लोग खुद चंदा इकट्ठा कर तालाब साफ करा रहे हैं। कुछ पर्यावरण कार्यकर्ता पुराने कुंडों को पुनर्जीवित करने में जुटे हैं। युवा वृक्षारोपण अभियान चला रहे हैं। कुछ NGO वर्षा जल संचयन और चेक डैम बनाने की मांग उठा रहे हैं।

असल लड़ाई पाइपलाइन की नहीं, सोच की है।

जब तक विकास और प्रकृति साथ नहीं चलेंगे, तब तक कोई योजना स्थायी नहीं होगी। चमचमाती सड़कें प्यास नहीं बुझातीं। रंगीन घाट सूखे भूजल को नहीं भरते।

ब्रज आज पूरे देश को चेतावनी दे रहा है।

यदि श्रीकृष्ण की भूमि प्यास से तड़प सकती है, तो कोई शहर सुरक्षित नहीं। प्रकृति देर से हिसाब करती है, मगर बहुत सख्ती से करती है।

अब समय आ गया है कि नेता भाषणों से आगे बढ़ें।

तालाब बचाए जाएं।

कुंड पुनर्जीवित हों।

वर्षा जल संचयन अनिवार्य बने।

यमुना में गिरता गंदा पानी रोका जाए।

क्योंकि आखिर सवाल सिर्फ विकास का नहीं है। सवाल जीवन का है।

ब्रज की पुकार आज बहुत साफ सुनाई दे रही है :

“भव्य चमकीली परियोजनाएं बाद में बनाना, पहले हमारे कुंड, तालाब, वन, बगीचे, नदी सुरक्षित करो।

 

Who Hijacked India’s Mindspace?

The smartphone has not merely replaced newspapers and television; it has transformed how Indians think, read, interact, and remember. Once, mornings began with newspapers and evenings united families around television screens, creating shared conversations and collective experiences. Today, billions of scrolling thumbs have replaced deep reading with instant consumption.

With over 800 million smartphone users, India’s attention economy now runs on reels, viral clips, and algorithm-driven outrage. Traditional newspapers struggle to survive, while television loses viewers to endless digital content. Algorithms feed users only what excites, angers, or entertains them, shrinking attention spans and weakening thoughtful reflection.

The result is a society flooded with information but starved of wisdom. Families sit together yet live in separate digital worlds. The smartphone has become the new emperor of attention, raising an unsettling question: are humans controlling screens, or are screens controlling humans?

Sunday, May 24, 2026

 गायब होता अख़बार, फीकी पड़ती टीवी की चमक और मुट्ठीभर स्क्रीन का साम्राज्य

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क्या स्मार्टफोन बन चुका है भारत की नई ‘ध्यान सत्ता’ का सम्राट?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

27 मई 2026

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एक जमाना था सुबह का अखबार पढ़े बिना लोग निच्चू नहीं हो पाते थे, शाम को हम लोग, या महाभारत देखे बगैर सो नहीं पाते थे। घंटों तक बच्चे टीवी जिसे इलेक्ट्रॉनिक निप्पल कहा जाता था, चिपके रहते थे। क्रिकेट मैच मोहल्लों को जोड़ देते थे। धारावाहिक घर-घर की बातचीत बन जाते थे। समाचार चैनल देश की राजनीतिक धड़कन तय करते थे। मीडिया सिर्फ सूचना का माध्यम नहीं था, वह सामाजिक संस्कृति का हिस्सा था।

और अब?

क्या आपने गौर किया है कि  घरों में अख़बार की सरसराहट कम सुनाई देती है और टीवी के सामने परिवारों की भीड़ भी पहले जैसी नहीं रही?

एक खामोश क्रांति हमारे सामने घट रही है। बिना शोर। बिना मातम। बिना किसी औपचारिक घोषणा के। भारत में पारंपरिक मीडिया, खासकर प्रिंट और टेलीविजन, धीरे-धीरे अपनी पकड़ खोते जा रहे हैं। उनकी जगह अब स्मार्टफोन ने ले ली है। वही छोटा-सा चमकता पर्दा, जिसने दुनिया को हथेली में समेट लिया है और इंसानी ध्यान को अपनी गिरफ्त में कर लिया है।

कम्युनिकेशन क्रांति के गुरु मार्शल मैकलुहान ने ठीक ही कहा था:  “मीडियम ही संदेश है।”

आज वह संदेश बदल चुका है।

तेज़। छोटा। उत्तेजक। और बेहद नशे की तरह असर करने वाला।

स्मार्टफोन ने केवल टीवी या अख़बार को चुनौती नहीं दी, उसने इंसानी व्यवहार ही बदल दिया।

आंकड़े कहानी साफ़ बताते हैं। भारत में टीवी दर्शकों की संख्या धीरे-धीरे घट रही है। करोड़ों लोग डीटीएच कनेक्शन छोड़ चुके हैं। विज्ञापन आय ठहर गई है। कभी मनोरंजन का बादशाह रहा टीवी उद्योग अब असुरक्षा के दौर से गुजर रहा है।

लेकिन असली चिंता टीवी नहीं, अख़बारों की गिरती हालत है।

प्रिंट पत्रकारिता, जो लोकतंत्र की रीढ़ मानी जाती थी, डिजिटल तूफान में हांफती नजर आ रही है। नई पीढ़ी अब खबरें अख़बार में नहीं, इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब शॉर्ट्स, व्हाट्सऐप फॉरवर्ड और एल्गोरिदम से चलने वाली सोशल मीडिया फीड्स में ढूंढती है। लंबी रिपोर्ट पढ़ने का धैर्य घटता जा रहा है। लोग अब खबर को “समझना” नहीं, “स्क्रॉल” करना चाहते हैं।

सुबह का अख़बार अब किसी दूसरे अख़बार से नहीं, बल्कि मोबाइल की लगातार बजती नोटिफिकेशनों से लड़ रहा है।

यह बदलाव केवल तकनीकी नहीं, सामाजिक भी है।

अख़बार पाठक को ठहरना सिखाते थे। सोचने का समय देते थे। अलग-अलग विचारों से परिचय कराते थे। संपादकीय, विश्लेषण और खोजी रिपोर्टें समाज को गहराई देती थीं। दूसरी ओर स्मार्टफोन की दुनिया तेज़ प्रतिक्रिया, सनसनी और तात्कालिक उत्तेजना पर चलती है। सूचना अब टूटी हुई कांच के टुकड़ों की तरह बिखरकर आती है। लोग सब कुछ जानते हुए भी बहुत कम समझ पा रहे हैं।

माध्यम बदला है, इसलिए संदेश भी बदल गया है।

आज भारत में 80 करोड़ से अधिक स्मार्टफोन उपयोगकर्ता हैं और यह संख्या लगातार बढ़ रही है। सस्ते इंटरनेट ने डिजिटल दुनिया को हर हाथ तक पहुंचा दिया। सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने मनोरंजन को पूरी तरह व्यक्तिगत बना दिया है। अब हर व्यक्ति अपनी अलग डिजिटल दुनिया में जी रहा है।

टीवी सामूहिक अनुभव था। स्मार्टफोन व्यक्तिगत कैदखाना बन गया।

पहले पूरा परिवार एक कार्यक्रम साथ देखता था। अब एक ही कमरे में बैठे चार लोग चार अलग-अलग स्क्रीन पर अलग-अलग दुनिया देख रहे होते हैं। साझा सामाजिक संवाद बिखर रहा है। राष्ट्रीय बहसें अब स्वतः नहीं बनतीं, उन्हें एल्गोरिदम गढ़ते हैं।

आज की सबसे बड़ी पूंजी है : इंसानी ध्यान।

विज्ञापन कंपनियों ने यह बदलाव सबसे पहले समझ लिया। बड़े ब्रांड अब टीवी से ज्यादा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर पैसा लगा रहे हैं, जहां हर क्लिक, हर स्क्रॉल और हर सेकंड का हिसाब मिलता है। डिजिटल विज्ञापन तेजी से बढ़ रहा है जबकि टीवी और प्रिंट की विज्ञापन आय सिकुड़ती जा रही है।

और अख़बार?

वे चुपचाप लहूलुहान हो रहे हैं।

कई शहरों में प्रसार घट रहा है। विज्ञापन ऑनलाइन चले गए हैं। न्यूजप्रिंट की लागत बढ़ती जा रही है। छोटे और क्षेत्रीय अख़बार अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। अनुभवी पत्रकारों को डर है कि समाज केवल एक उद्योग नहीं खो रहा, बल्कि पढ़ने और गहराई से सोचने की आदत भी खो रहा है।

विडंबना देखिए : सूचना बढ़ी है, लेकिन ध्यान घट गया है।

तीस सेकंड की रील अब हजार शब्दों के विश्लेषण पर भारी पड़ रही है। वायरल कंटेंट बनाने वाले कई बार स्थापित न्यूज़रूम से ज्यादा प्रभावशाली हो गए हैं। इस डिजिटल जंगल में विश्वसनीयता से ज्यादा दृश्यता मायने रखती है।

असल लड़ाई अब टीवी बनाम डिजिटल की नहीं रही।

यह लड़ाई है इंसानी ध्यान पर कब्जे की।

और फिलहाल यह जंग सबसे छोटी स्क्रीन जीत रही है।

मैकलुहान की बात आज पहले से ज्यादा सच लगती है। माध्यम केवल संदेश नहीं देता, वह समाज की सोच, व्यवहार और रिश्तों को भी आकार देता है। स्मार्टफोन ने अभिव्यक्ति को लोकतांत्रिक बनाया, लेकिन साथ ही ध्यान भंग, ध्रुवीकरण और मानसिक बेचैनी भी बढ़ाई।

उत्तर प्रदेश के किसी गांव का युवा अब रातोंरात वायरल स्टार बन सकता है। किसान लाखों लोगों तक अपनी बात पहुंचा सकता है। यह बदलाव क्रांतिकारी भी है और खतरनाक भी।

सवाल यह है कि क्या समाज बिना गहराई से पढ़े स्वस्थ लोकतंत्र बचा पाएगा?

क्या लोग केवल स्क्रॉल करते-करते सोचने की क्षमता खो देंगे?

पारंपरिक मीडिया अब चौराहे पर खड़ा है।

अख़बारों और टीवी चैनलों को पुराने ढांचे से बाहर निकलना होगा। डिजिटल पत्रकारिता, क्षेत्रीय भाषाओं की ताकत, मल्टीमीडिया स्टोरीटेलिंग और विश्वसनीय कंटेंट ही उनका भविष्य तय करेंगे।

लेकिन एक सच्चाई साफ़ दिख रही है।

मीडिया के अधिकार का युग समाप्त हो रहा है।

एल्गोरिदम के प्रभाव का युग शुरू हो चुका है।

परिवार अब भी एक ही छत के नीचे रहते हैं, लेकिन मानसिक रूप से अलग-अलग डिजिटल दुनियाओं में बंट चुके हैं। टीवी अब भी जलता है। अख़बार अब भी कुछ दरवाजों तक पहुंचते हैं। मगर समाज का केंद्र अब हथेली में चमकती उस छोटी स्क्रीन पर खिसक चुका है।

ध्यान का नया सम्राट अब स्मार्टफोन है।

और हर अंतहीन स्क्रॉल के साथ, पुरानी मीडिया दुनिया थोड़ा और धुंधली पड़ती जा रही है।