Wednesday, April 15, 2026

 


लुप्त हुए ट्रंक और कनस्तर: जब घरों में यादें ताला लगाकर रखी जाती थीं

________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा 

17 अप्रैल 2026

_________________________

कभी घर सिर्फ ईंट और छत नहीं होते थे, यादों के गोदाम होते थे। उन यादों की रखवाली करते थे: कई भारी-भरकम ट्रंक और  खनखनाते कनस्तर।

दिल की गहराइयों में आज भी वो पुराना  ट्रंक चुपके से साँस लेता है। भारी, जिसके ऊपर पेंट से परिवार का नाम लिखा होता था “शर्मा परिवार, दिल्ली”। उसकी सलवटें, उसकी जंग लगी कुंडियाँ और वो मीठी-सी पुरानी  खुशबू… हर बार ढक्कन खोलते ही बचपन की गर्मियाँ लौट आती थीं। फौजी और रेलवही के गार्ड बाबू अभी भी काले चद्दर के बक्से उपयोग करते हैं।

घर के अंदर बड़े संदूकों में कपूर की सफेद गोलियाँ नीम के पत्तों के साथ सोई रहतीं। गर्मियों के हल्के सूती कपड़े एक तरफ, सर्दियों की ऊनी रजाइयाँ और गद्दे दूसरी तरफ। शादी-ब्याह के मौके पर वो ट्रंक जादू की तरह खुलता;  चादरें, गद्दे, रजाइयाँ निकलतीं और पूरा संयुक्त परिवार एक साथ हँसता-बोलता सज जाता। ट्रंक कभी पढ़ने की मेज बन जाता, कभी सोफा, कभी रेडियो का सिंहासन।

ट्रेन की छुट्टियों में जब पूरा कुनबा स्टेशन पहुँचता, कुली सिर पर होल्डॉल और ट्रंक रखे, कंधे पर बैग, हाथ में सुराही लिए आगे-आगे चलता। सीट न मिलने पर बच्चे ट्रंक पर ही बैठकर खिड़की से बाहर उड़ते बादलों को गिनते। दादी माँ उसी ट्रंक में खोया-पाया, पुरानी चिट्ठियाँ, थैले और हर जुगाड़ संभाल कर रखतीं। हर बच्चे का अपना छोटा ट्रंक;  लड़कियों के अंदर गुड़िया, चूड़ियाँ और गुप्त डायरी।

फिर आता कनस्तर। चमकता हुआ टिन का, जिसमें दादी छिपाकर लड्डू-मठरी रखतीं। चूहे डर के मारे भागते। गेहूँ, आटा, गुड़, चीनी… कई महीनों का वारदाना उसमें सोया रहता। इमरतबान में आम का मीठा आचार और नींबू की खट्टी खुशबू घर भर में फैलती।

आज अलमारी और पहिए वाले सूटकेस आ गए। दिल छोटे हो गए। न ट्रंक की वो गरिमा बची, न कनस्तर की वो मासूमियत। बच्चे अब बिस्तरबंद और होल्डॉल का नाम भी नहीं जानते। 

ट्रंक… लोहे का, हरे या नीले रंग का, ऊपर सफेद पेंट से लिखा नाम। जैसे कोई पहचान पत्र। हर घर में एक नहीं, कई ट्रंक। छोटा, बड़ा, दहेज वाला, बच्चों वाला। खोलते ही  खुशबू उड़ती थी। सर्दियों के स्वेटर, गर्मियों की मलमल, तह करके रखी साड़ियाँ, जैसे मौसम भी उनमें सांस लेता हो।

पुराने ज़माने के सख्त मास्साब रघुनाथ प्रसाद यादों के समंदर में खो जाते हैं: "संयुक्त परिवार की धड़कन थे ये ट्रंक। शादी-ब्याह का मौसम आता, तो वही ट्रंक गद्दे, रजाई, चादरों से भर उठते। मेहमान आते, तो वही ट्रंक मेज बन जाता। रेडियो उस पर सजता, बच्चे उस पर उछलते, और बड़े उस पर बैठकर किस्से बुनते। ट्रंक कोई चीज़ नहीं था, घर का चुपचाप खड़ा बुजुर्ग था।"

सुशीला ताई कहती हैं: "छुट्टियाँ आतीं, तो ट्रंक का असली सफर शुरू होता। ट्रेन की सीट कम पड़ जाए, तो बच्चे उसी पर बैठ जाते। साथ में होल्डोल, कसकर बांधा हुआ बिस्तरबंद, और एक सुराही, जिसका पानी रास्ते भर मीठा लगता था। स्टेशन पर कुली सिर पर ट्रंक, कंधे पर बैग, हाथ में सुराही, और पीछे हमारा भरपूर परिवार, जैसे कोई चलता-फिरता जुलूस हो।"

दादी का ट्रंक तो जैसे खजाना था। खोया-पाया, पुराने खत, टूटे खिलौने, और अचानक जरूरत पड़ने पर निकल आने वाले थैले: सब उसी में। हर सवाल का जवाब, हर कमी का जुगाड़, उसी ट्रंक के भीतर छिपा होता था।

और उधर, रसोई का सम्राट था: कनस्तर। टीन का, मोटा, ढक्कन पर कुंडी लगी हुई। उसमें घी की खुशबू बसती थी, तेल की चमक झलकती थी। चूहों से बचाने का किला था वह। लड्डू, मठरी, सेव, सब उसमें छिपाकर रखे जाते, दादी की गुप्त तिजोरी।

कनस्तर में महीनों का राशन सांस लेता था। गेहूं, आटा, दाल, चीनी, गुड़, सब। इमरतबान में आम और नींबू का अचार धूप में पकता था। कुछ घरों में टेंटी और लिसौड़े का भी स्वाद बसता था। साइकिल पर कनस्तर रखकर चक्की जाना, वह भी एक छोटा सा उत्सव था।

आज घर बड़े हैं, पर जगह छोटी। अलमारी और कपबोर्ड ने ट्रंक को बेदखल कर दिया। पहियों वाले सूटकेस और बैकपैक ने सफर का रोमांस चुरा लिया है। बच्चों को पता भी नहीं कि बिस्तरबंद कैसे कसते हैं, होल्डोल क्या होता है।

और कनस्तर? वह तो जैसे कहानी बन गया। अब सब कुछ छोटे पैकेट में आता है। जरूरत जितनी, खरीद उतनी। न भंडारण, न इंतजार, न वो धैर्य।

कभी-कभी लगता है, उन ट्रंकों में सिर्फ कपड़े नहीं, रिश्ते तह करके रखे जाते थे। कनस्तर में सिर्फ अनाज नहीं, घर की खुशहाली बंद होती थी। आज सब खुला है, सब उपलब्ध है, फिर भी कुछ कमी सी है।

शायद सच यही है: घर सिकुड़ गए, सामान सिमट गया, और दिल भी थोड़े छोटे हो गए।

ट्रंक , कनस्तर और इमरतबान चले गए… और साथ ले गए एक पूरा जमाना, जो अब सिर्फ यादों में धीरे-धीरे खनकता है।

Tuesday, April 14, 2026

 ईरान का आत्मघाती रास्ता: शांति से इनकार और पश्चिम एशिया की तबाही को निमंत्रण

___________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा 

16 अप्रैल 2026

_________________________

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से शिष्टाचार और दया की उम्मीद करना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है। बड़बोला ट्रंप न खुदा से डरता हैं, न विश्व जनमत से। नैतिकता और अंतरराष्ट्रीय कानून का खुला मजाक उड़ा रहा है, विश्व संगठनों का अपमान कर रहा है। ऐसे कपटी और मूर्ख नेता से उलझने से किसी को कोई लाभ नहीं मिलेगा। 

प्रश्न ये है कि ईरान और उसके समर्थक देश आत्मघाती कदम उठाकर खाड़ी देशों और तमाम विकासशील राष्ट्रों को तबाही का न्योता क्यों दे रहे हैं? ऊर्जा संकट से भारत समेत कई देशों की अर्थव्यवस्था को घातक झटके लगेंगे, जबकि इस संघर्ष में पीड़ितों की कोई भूमिका नहीं है।

2026 की तपती सियासत में, जब पूरा क्षेत्र बारूद के ढेर पर बैठा है, तेहरान की सरकार ने सुलह के दरवाजे बंद कर दिए हैं और टकराव जारी रखने की जिद जताई है। शांति की पेशकश आई भी, लेकिन जवाब मिला: खामोशी, तना हुआ लहजा और संघर्ष का इरादा। यह जिद अब सिर्फ राजनीति नहीं रही; यह सीधा आत्मघाती रास्ता बन चुकी है।

ईरान की आर्थिक स्थिति पहले ही डांवाडोल है। मुद्रास्फीति 40 प्रतिशत से ऊपर है, कुछ अनुमानों के अनुसार 42-48 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। रियाल की कीमत जमीन में गड़ चुकी है, एक डॉलर के लिए 10 लाख से 17 लाख रियाल तक। अर्थव्यवस्था सिकुड़ रही है, प्रतिबंधों की मार पड़ रही है और अंदरूनी असंतोष बढ़ रहा है। अगर फारस की खाड़ी में नौसैनिक नाकाबंदी लंबी खिंची, तो ईरान की सांस की नली दब जाएगी।

सच कड़वा है, लेकिन कहना जरूरी है। ईरान अपनी जरूरत का ज्यादातर सामान समुद्री रास्तों से मंगाता है। अगर यह रास्ता बंद हुआ, तो फैक्टरियां ठप पड़ जाएंगी, दवाइयां गायब हो जाएंगी, बिजली व्यवस्था लड़खड़ा जाएगी और जनता बेबस होकर सड़कों पर उतर आएगी। यह सब अचानक नहीं हुआ है। यह सालों की गलत नीतियों का हिसाब है।

ईरान ने अपनी विदेश नीति को जिद में बदल दिया। क्रांतिकारी नारे, परमाणु महत्वाकांक्षा, मिसाइलों का जुनून और प्रॉक्सी युद्ध का खेल: इन सबका नतीजा दुनिया से अलगाव, एकाकीपन और आर्थिक घुटन है। चीन के साथ दोस्ती को सहारा समझा गया, लेकिन यह बैसाखी साबित हुई। तेहरान ने सस्ता तेल बेचा; बदले में कुछ निवेश और थोड़ी राहत मिली, लेकिन भारी निर्भरता बढ़ गई। 80-90 प्रतिशत तेल एक ही खरीदार (चीन) को बेचना मजबूरी है, रणनीति नहीं। चीन ने अपने फायदे देखे, जबकि ईरान ने अपनी स्वतंत्रता गिरवी रख दी।

अब जब हालात बिगड़ रहे हैं, तो वही पुरानी जिद। सवाल उठता है: ईरान ऐसा क्यों कर रहा है? क्या तेहरान को इराक का अंजाम याद नहीं? 1990 के दशक में नाकाबंदी ने इराक को तोड़ दिया था; भूख, बीमारी, बेरोजगारी और समाज का चरमरा जाना। क्या ईरान उसी रास्ते पर चलना चाहता है?

आज ईरान के प्रमुख क्षेत्र पहले ही कमजोर हैं। दुनिया का सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस क्षेत्र; साउथ पार्स, हमलों से क्षतिग्रस्त हो चुका है। तेल निर्यात खतरे में है। उद्योग आयात पर निर्भर हैं। अगर आपूर्ति रुकी, तो उत्पादन ठप पड़ जाएगा। कारखाने बंद, नौकरियां गायब, रियाल और गिरेगा, मुद्रास्फीति आग बन जाएगी और सड़कों पर गुस्सा फूट पड़ेगा।

यह सिर्फ आर्थिक कहानी नहीं है। यह क्षेत्रीय शांति-अमान की भी कहानी है। ईरान के प्रॉक्सी गुट: हिजबुल्लाह, हूती विद्रोही और विभिन्न मिलिशिया, पहले ही दबाव में हैं। पैसा कम हुआ तो बौखलाहट बढ़ेगी। बौखलाहट बढ़ने पर गोलियां चलेंगी। खाड़ी में जहाजों पर खतरा मंडराएगा। दुनिया का करीब 20 प्रतिशत तेल इसी रास्ते से गुजरता है। जरा सी चिंगारी पूरी दुनिया में आग लगा सकती है।

तेहरान की नीति अब अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रही है। दोस्त कम, दुश्मन ज्यादा। और जो दोस्त बचे हैं, वे भी अपने स्वार्थ के। हकीकत यह है कि ईरान के पास अभी भी मौका है। ट्रंप ने समय सीमा बढ़ाई है, लेकिन वक्त तेजी से फिसल रहा है।

जरूरत है जिद छोड़ने की, बातचीत की मेज पर लौटने की, परमाणु मुद्दे पर समझौता करने की, खाड़ी देशों से रिश्ते सुधारने की और सबसे महत्वपूर्ण; अपने लोगों के भविष्य के बारे में सोचने की। मुल्क सिर्फ मिसाइलों और नारों से नहीं चलता। मुल्क चलता है रोजगार से, बिजली से, दवाइयों से और उम्मीद से।

अगर सरकार अब भी आंखें मूंदे रखी, तो अंजाम साफ है; लंबी नाकाबंदी, गिरती अर्थव्यवस्था और अंदरूनी बगावत। इतिहास गवाह है: जो देश समय पर नहीं झुकते, वे टूट जाते हैं।

ईरान के सामने दो रास्ते हैं। पहला: शांति, समझदारी और सुधार का रास्ता। दूसरा: टकराव, एकाकीपन और तबाही का रास्ता। चुनाव उनकी है, लेकिन इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा, खासकर भारत जैसे ऊर्जा आयातक देशों पर। ऊर्जा कीमतों में उछाल से मुद्रास्फीति बढ़ेगी, औद्योगिक उत्पादन प्रभावित होगा और विकासशील अर्थव्यवस्थाएं झटके खाएंगी।

ईरान को समझना चाहिए कि जिद से कोई फायदा नहीं। परमाणु कार्यक्रम की जिद ने उसे अलग-थलग कर दिया है। प्रॉक्सी युद्ध ने संसाधनों को बर्बाद किया है। अब समय है कि तेहरान अपनी जनता की भलाई को प्राथमिकता दे। बातचीत से ही समाधान निकल सकता है; परमाणु संयम, प्रतिबंधों में राहत और क्षेत्रीय स्थिरता।

पश्चिम एशिया की स्थिरता न सिर्फ क्षेत्रीय देशों के लिए, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी है। भारत जैसे देश, जो खाड़ी से तेल आयात करते हैं, इस अस्थिरता का सबसे बड़ा शिकार हो सकते हैं। ईरान को आत्मघाती रास्ते से मुड़ना चाहिए, वरना इतिहास उसे एक और इराक के रूप में याद रखेगा; जिसकी जिद ने पूरे देश को तबाह कर दिया।

शांति की राह चुनना ही एकमात्र समझदारी भरा कदम है। जिद छोड़ो, बात करो, और अपने लोगों को बचाओ। वरना तबाही का निमंत्रण न सिर्फ ईरान को, बल्कि पूरे क्षेत्र को बर्बाद कर देगा। 


 Epstein Files Unmasked: Power, Secrets, and a Story Still Unfolding

_______________________

By Brij Khandelwal

April 15, 2026

__________________________

Let’s cut to the chase. The story just got stranger.

The U.S. Department of Justice released 3.5 million pages, thousands of photos, and hundreds of videos linked to Jeffrey Epstein. This happened because of the Epstein Files Transparency Act, signed by President Trump in 2025. Public pressure forced the hand. But here’s the catch: large chunks of the documents are blacked out. The message is clear ,  not every truth is meant for our eyes.

Epstein was no loner. He was a master of access, moving between mansions in New York, a compound in Florida, and a private island in the Caribbean. Cameras were hidden. Doors were locked. His private jet, nicknamed the "Lolita Express," carried names you know: Bill Clinton, Donald Trump, Prince Andrew. Were they all involved in crimes? Not necessarily. Some were acquaintances. Some did business with him. But where there’s that much smoke, you can’t ignore the fire.

The accusations are brutal. Epstein is said to have run an industrial-scale operation, targeting underage girls with promises of massage work, modeling gigs, or just quick cash. His partner, Ghislaine Maxwell, acted as the recruiter. She’s now in prison. So how did this horror show go on for decades?

Let’s talk about the missing piece. There is no client list. No ledger of powerful men who paid for abuse. That crushed a lot of hopes. People wanted names. They wanted arrests. Instead, we got redactions. Epstein died in 2019 , officially a suicide. Many still don’t buy it.

Now comes the twist, straight out of a spy thriller. Whispers of Mossad. An FBI informant claimed Epstein was an intelligence asset. Emails linked him to former Israeli Prime Minister Ehud Barak, including one joke: “Clarify I’m not Mossad.” Ghislaine’s father, Robert Maxwell, was an alleged spy who died under mysterious circumstances. Coincidence? Maybe. But there’s no hard proof. Israel and the U.S. deny everything. Netanyahu laughed it off. Sensational? Yes. But it might also be a distraction from the real rot.

The files paint a simpler, uglier picture. Epstein was a cunning parasite who used wealth to buy access and protection. The system let him operate because power shields power. Victims were silenced. Justice was mocked.

Why the slow movement? No new criminal cases have been filed. Redactions block full transparency. The public is angry. Victims are begging for closure. Instead, they’re drowning in paperwork.

This isn’t just one man’s evil. It’s a playbook. Silence buys survival. When elites decide they’re above the law, ordinary people pay the price. Consider this a wake-up call. Unchecked power always crushes the innocent first.


Monday, April 13, 2026

 बड़ा बबाल काटा है है इस अतीत के प्रेत ने!!

एप्सटीन फाइल्स का खुलासा: दौलत, रसूख और खौफ की सच्चाई

_______________________

बृज खंडेलवाल द्वारा 

15 अप्रैल 2026

_________________________

बड़ा धमाका हुआ। पर्दे उठे। लेकिन कहानी और उलझ गई।

अमेरिका के न्याय विभाग ने जेफ्री एप्सटीन से जुड़ी लाखों फाइलें जनता के सामने रख दीं। करीब साढ़े तीन मिलियन पन्ने। हजारों तस्वीरें। सैकड़ों वीडियो। कानून बना, दबाव बढ़ा, और आखिरकार सच का दरवाज़ा थोड़ा खुला।

यह काम Epstein Files Transparency Act के तहत हुआ, जिस पर Donald Trump ने 2025 में दस्तखत किए थे। लेकिन सच कहें तो यह दरवाज़ा पूरी तरह नहीं खुला। कई कागज़ अब भी काले स्याह निशानों से ढंके हुए हैं।

कहानी यहीं से दिल दहला देती है।

एप्सटीन कोई आम आदमी नहीं था। वह दौलत, ताकत और रसूख का खिलाड़ी था। उस पर आरोप है कि उसने नाबालिग लड़कियों का शोषण किया। उन्हें झांसा दिया गया। कभी मसाज का लालच, कभी मॉडलिंग का सपना, कभी पैसों की मजबूरी।

इस खेल में उसकी साथी थी Ghislaine Maxwell। वह लड़कियों को फंसाने और तैयार करने में अहम कड़ी बनी। आज वह जेल में है।

फाइलें पढ़कर एक ही सवाल उठता है: यह सब इतने साल कैसे चलता रहा?

एप्सटीन की दुनिया बहुत बड़ी थी। न्यूयॉर्क की हवेली। फ्लोरिडा का घर। कैरिबियन का निजी द्वीप। हर जगह कैमरे, हर जगह बंद दरवाज़े। जैसे कोई जाल बुना गया हो।

उसके प्राइवेट जेट को लोग “लोलिता एक्सप्रेस” कहते थे। फ्लाइट लॉग्स में कई बड़े नाम सामने आए। जैसे Bill Clinton, Donald Trump, और Prince Andrew।

यहाँ एक कानूनी  बात साफ समझ लीजिए। किसी का नाम फाइल में होना मतलब वह गुनहगार है: ऐसा नहीं है। कई लोग सिर्फ जान-पहचान में थे। कुछ बिजनेस मीटिंग्स में मिले। कुछ के नाम सिर्फ सुनी-सुनाई बातों में आए।

फिर भी, धुआं है तो आग की बू आती है।

सबसे बड़ा झटका यह था कि इतनी बड़ी साजिश के बावजूद कोई “क्लाइंट लिस्ट” नहीं मिली। यानी ऐसा कोई पक्का सबूत नहीं मिला कि किसने पैसे देकर नाबालिगों का शोषण किया।

लोगों को उम्मीद थी कि एक लंबी सूची सामने आएगी। नाम उजागर होंगे। गिरफ्तारी होगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।

सवाल फिर वही; क्या सच अभी भी छिपा है?

2019 में एप्सटीन की जेल में मौत हो गई। आधिकारिक तौर पर इसे आत्महत्या बताया गया। मगर शक का साया आज भी मंडरा रहा है।

अब कहानी में एक और मोड़ आता है। थोड़ा फिल्मी, थोड़ा खतरनाक।

कुछ फाइलों में दावा किया गया कि एप्सटीन का संबंध इजरायली खुफिया एजेंसी Mossad से हो सकता है। एक FBI नोट में एक मुखबिर ने शक जताया कि एप्सटीन “मोसाद का एजेंट” था।

उसका नाम Ehud Barak से भी जोड़ा गया। दोनों के बीच मेल और मुलाकातें हुईं। एक मेल में एप्सटीन ने मजाक में लिखा: “साफ कर दो कि मैं मोसाद के लिए काम नहीं करता।”

अब यह मजाक था या इशारा; कोई नहीं जानता।

कहानी यहीं और दिलचस्प हो जाती है।

एप्सटीन की करीबी Ghislaine Maxwell के पिता Robert Maxwell पर भी पहले से मोसाद से जुड़े होने के आरोप लगते रहे थे। उनकी मौत भी रहस्यमयी थी।

तो क्या यह पूरा जाल किसी खुफिया एजेंसी का था?

सीधा जवाब है; कोई ठोस सबूत नहीं मिला।

न अमेरिका ने माना। न इजरायल ने। Benjamin Netanyahu और Naftali Bennett ने इन आरोपों को बेबुनियाद बताया।

असलियत शायद इतनी सनसनीखेज नहीं है।

फाइलें यह दिखाती हैं कि एप्सटीन एक शातिर, लालची और खतरनाक इंसान था। उसने अपने संपर्कों का इस्तेमाल किया। पैसे और ताकत का सहारा लिया। और सालों तक बचता रहा।

यही असली डर है।

इस खुलासे ने एक और सच्चाई सामने रखी; बड़े लोग अक्सर बच निकलते हैं। सिस्टम कई बार आंखें मूंद लेता है। पीड़ितों की आवाज दब जाती है।

आज भी कई सवाल अधूरे हैं।

क्यों कार्रवाई धीमी रही?

क्यों नए केस नहीं खुले?

क्यों कई दस्तावेज अब भी छिपे हैं?

पीड़ित इंसाफ मांग रहे हैं। जनता जवाब चाहती है।

लेकिन फाइलों का यह समंदर इतना बड़ा है कि सच उसमें कहीं डूब सा गया है।

आखिर में बस यही बात बचती है।

यह कहानी सिर्फ एक आदमी की नहीं है। यह सिस्टम की कहानी है। यह उस खामोशी की कहानी है, जो पैसे के सामने झुक जाती है।

और यह एक चेतावनी है: 

जब ताकत बेकाबू हो जाए, तो इंसानियत सबसे पहले कुचली जाती है।

Humour Times

 एप्सटीन फाइल्स: सवालों की बौछार, जवाबों का धुंधलका  

(Humour Times के हाथ लगा वो इंटरव्यू जो कभी हुआ ही नहीं, और शायद होना भी नहीं चाहिए था , क्योंकि सच बोलने वाले 110 साल के जासूस भी अब इस दुनिया में नहीं बचे!)

इंटरव्यूअर: Humour Times (HT) के एडिटर बृज खंडेलवाल 

मेहमान: डॉ. बर्ट्रेंड शॉ, 110 साल के रहस्यमयी जासूस, जो fortunately अब इस दुनिया में नहीं हैं, पर फिर भी इंटरव्यू दे रहे हैं।  

वाह री पत्रकारिता! मरने के बाद भी काम चल रहा है।

─────────────────

कमरा धुंधला है। बिजली का बिल शायद “Under Review” में है, इसलिए रोशनी भी आधी-अधूरी, ठीक वैसे ही जैसे एप्सटीन फाइल्स।  

सामने बैठे हैं डॉ. बर्ट्रेंड शॉ। 110 साल। आंखें अब भी तेज ,  जैसे सब कुछ देख लिया हो… और जो नहीं देखना चाहते, उसे सुविधानुसार भूल चुके हों।

HT: डॉ. शॉ, ये एप्सटीन फाइल्स… इतना शोर क्यों मचा है भाई?  

शॉ: अरे बेटा, शोर तो ट्रेन मिस होने पर भी होता है। असली सवाल ये है कि ट्रेन जा कहाँ रही थी? फाइलें खुलीं तो सबने ताली बजाई, लेकिन पूरी कहानी अभी भी “Season 2 Coming Soon” में अटकी हुई है।

HT: लेकिन लाखों पन्ने जारी कर दिए गए न? ये तो पारदर्शिता है!  

शॉ: (हँसते हुए) पारदर्शिता? ये तो सरकारी दफ्तर की खिड़की जैसी है , आधा शीशा साफ, आधा काला पेंट, और बीच में बाबूजी चाय पीते हुए “फाइल पेंडिंग” बोल रहे हैं।  

ट्रंप ने कानून बनाया, फाइलें निकालीं… लेकिन जो सबसे जरूरी था, वो शायद “गलती से” अभी भी प्रिंटर में फंस गया।

HT: असल कहानी क्या है?  

शॉ: सीधी और डरावनी। एक आदमी — Jeffrey Epstein। पैसा इतना कि कैलकुलेटर भी थक के “Error 404: Too Much Money” दिखाने लगा। ताकत इतनी कि कानून भी “सर जी, आप आराम से” कहकर सलाम ठोकता था।  

उसने कमजोर लड़कियों को फंसाया, इस्तेमाल किया, और पूरा सिस्टम खड़ा-खड़ा तमाशा देखता रहा, जैसे पड़ोस में किसी की गाड़ी खराब हो गई हो ; “अरे यार, हमें क्या?”

HT: अकेला था या पूरा नेटवर्क?  

शॉ: अकेला आदमी इतना बड़ा खेल नहीं खेल पाता। Ghislaine Maxwell दरवाजा खोलती थी, Epstein अंदर घुसता था, और कानून बाहर खड़ा “मैं छुट्टी पर हूँ” का बोर्ड लगाकर सो जाता था।

HT: बड़े-बड़े नाम क्यों आए ? Clinton, Trump, Prince Andrew?  

शॉ: क्योंकि वो बड़े लोगों के बीच घूमता था न! नाम तो आएंगे ही। लेकिन नाम आना और गुनाह साबित होना, ये दो अलग-अलग Netflix सीरीज हैं।  

एक तो “The Crown” जैसी लगती है, दूसरी “Courtroom Drama” : जो सालों से “Delayed Release” मोड में पड़ी है।

HT: तो “क्लाइंट लिस्ट” वाली बात?  

शॉ: अरे लोग तो शादी की गेस्ट लिस्ट की तरह चाहते थे : कौन आया, कौन नहीं, किसने क्या खाया।  

हकीकत में ऐसी कोई पक्की लिस्ट नहीं मिली। या मिली होगी, लेकिन “फाइल मिसिंग” का पुराना, भरोसेमंद बहाना अभी भी जिंदा और स्वस्थ है।

HT: उसकी मौत… आत्महत्या या साजिश?  

शॉ: (हल्की मुस्कान के साथ) जासूसी दुनिया में “आत्महत्या” सबसे सुविधाजनक शब्द है। 2019 में मरा, CCTV उस दिन छुट्टी पर था, गार्ड सो रहे थे, और कैमरे “Loading…” पर अटक गए।  

कहते हैं जवाब उसके साथ चला गया… या फिर किसी ने “ politely” ले जाया।

HT: क्या वो खुद जासूस था? Mossad वाला कनेक्शन?  

शॉ: (झुककर फुसफुसाते हुए) अफवाहें तो चुनावी वादों जैसी गर्म हैं। Ehud Barak का नाम आता है, Mossad का नाम आता है। लेकिन सबूत? वो अभी भी “Under Construction ; Expected Completion: Never” मोड में हैं।

HT: हनीट्रैप की बातें भी तो चल रही हैं…  

शॉ: हनीट्रैप तो जासूसी में होता है, लेकिन इतना गंदा, इतना अनियंत्रित? एजेंसियां आमतौर पर इतना बड़ा रिस्क नहीं लेतीं। यहां तो रिस्क भी VIP था और स्कैंडल भी red-carpet पर चल रहा था।

HT: Ghislaine Maxwell का परिवार भी संदिग्ध है?  

शॉ: हाँ। पापा Robert Maxwell के पुराने राज, पुराने शक। बेटी ने धागा पकड़ा, लेकिन कोई गांठ बांधना नहीं चाहता। कहीं ऐसा न हो कि धागा खींचते-खींचते पूरा स्वेटर खुल जाए और सब नंगे खड़े रह जाएं।

HT: इजरायल ने क्या कहा?  

शॉ: साफ इनकार। Netanyahu और Bennett ने कहा ; “ये तो साजिश है!”  

राजनीति में सच और बयान अलग-अलग बसों में बैठकर अलग-अलग रूट पर चलते हैं, दिल्ली ट्रैफिक की तरह।

HT: तो आखिर सच्चाई क्या है?  

शॉ: (धीरे से) सच्चाई कई परतों वाली प्याज है। ऊपर अपराधी दिखता है, बीच में सिस्टम की नाकामी, और सबसे नीचे वो तह है जहां फाइलें भी “भाई मैं नहीं जाना” कहकर भाग जाती हैं।

HT: जनता इतनी बेचैन क्यों है?  

शॉ: क्योंकि लोग देख रहे हैं कि पैसा कितना मजबूत ढाल बन जाता है। ताकत कितने सारे दरवाजे खोल देती है। और गरीब की आवाज? वो वाई-फाई सिग्नल की तरह सबसे कमजोर जगह पर गायब हो जाती है।

HT: क्या न्याय मिलेगा?  

शॉ: न्याय बहुत धीमा है। कभी अंधा, कभी छुट्टी पर, कभी “फाइल गुम”।  

पीड़ित लड़ रहे हैं, सच धीरे-धीरे निकल रहा है ; ठीक सरकारी रिपोर्ट की तरह, पांच साल लेट।  

लेकिन पूरा सच? वो अभी भी “Top Secret” की चादर ओढ़कर आराम से सो रहा है।

HT: आखिरी सवाल :  इस पूरे तमाशे से क्या सीख?  

शॉ: (आँखें चमकाते हुए)  

याद रखो बेटा:  

- जाल हमेशा दिखता नहीं, लेकिन फंसाता बहुत पक्का है।  

- शिकार चिल्ला नहीं पाता, क्योंकि माइक अक्सर “म्यूट” होता है।  

- और शिकारी?  

  वो प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुस्कुराते हुए “No Comments” बोलता है।

कमरे में सन्नाटा छा गया।  

घड़ी अब भी टिक-टिक कर रही है।  

और सच?  

वो अभी भी “Loading… 3%” पर अटका हुआ है।  

Humour Times की सलाह:  

अगर कभी एप्सटीन फाइल्स का पूरा संस्करण आए, तो सबसे पहले चेक करना ,  लाइट का बिल भरा हुआ है या नहीं।


Sunday, April 12, 2026

 ट्रंप का अमेरिका या मोदी का भारत:

कौन सा लोकतंत्र बेहतर?

रंग-बिरंगी अफरातफरी बनाम सख्त ढांचा: क्यों भारत की जम्हूरियत ज्यादा नुमाइंदा और बहु-स्तरीय है

____________________________


बृज खंडेलवाल द्वारा 

14 अप्रैल 2026

__________________________


हालिया घटनाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भारत का लोकतांत्रिक ढांचा, अपनी अव्यवस्था और उलझनों के बावजूद, अमेरिका की सख्त और कुछ हद तक जड़ प्रणाली से ज्यादा जवाबदेह और नुमाइंदगी करने वाला है। 

अमेरिका जहां कम आबादी, कम विविधता और ज्यादा खुशहाली वाला मुल्क है, वहीं भारत की सियासी बनावट कहीं ज्यादा पेचीदा और जमीनी हकीकत से जुड़ी हुई है।

अमेरिका खुद को दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र कहता है और भारत सबसे बड़ा। लेकिन गौर से देखें तो भारत की जम्हूरियत ज्यादा जिंदा, ज्यादा नुमाइंदा और कई परतों में बंटी हुई दिखती है। अमेरिका की राष्ट्रपति प्रणाली, अपनी तमाम शान और इतिहास के बावजूद, एक शख्स के हाथ में बेहिसाब ताकत समेट कर, उसे  चार साल के लिए  एक तरह से “इलेक्टेड बादशाह” बना देती है।

भारत और अमेरिका, दोनों लोकतंत्र के बड़े उदाहरण हैं, मगर उनकी राहें अलग हैं। भारत ने 1947 में आजादी के बाद ब्रिटिश मॉडल पर आधारित संसदीय प्रणाली अपनाई। यहां प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद संसद से आते हैं और हर वक्त जवाबदेह रहते हैं। अविश्वास प्रस्ताव का खतरा हमेशा सिर पर मंडराता रहता है। साथ ही एक मजबूत और पेशेवर नौकरशाही, जिसे अक्सर “स्टील फ्रेम” कहा जाता है, देश को स्थिरता देती है।

वहीं अमेरिका का संविधान (1787) राष्ट्रपति प्रणाली पर टिका है। वहां राष्ट्रपति सीधे चुना जाता है और चार साल तक सरकार और राज्य दोनों का मुखिया रहता है। संसद और न्यायपालिका उसे रोकने के लिए हैं, मगर रोजमर्रा की जवाबदेही लगभग न के बराबर है।

भारत की वेस्टमिंस्टर शैली की लोकतांत्रिक व्यवस्था भले धीमी, बोझिल और कभी-कभी परेशान करने वाली लगे, लेकिन यही उसकी असली ताकत है। यहां हर फैसले पर सवाल उठते हैं, बहस होती है, और नेता हर पल जनता और संसद के सामने जवाब देने को मजबूर रहता है।

अमेरिका में राष्ट्रपति एक तय चार साल के लिए चुना जाता है। इस दौरान उसके पास पूरी कार्यकारी ताकत होती है। न कोई रोज का सवाल-जवाब, न अविश्वास प्रस्ताव, न संसद के पास सरकार गिराने का कोई सीधा जरिया। नतीजा यह कि अगर कोई जिद्दी या मनमौजी नेता सत्ता में आ जाए, तो पूरा निजाम उसकी मर्जी का गुलाम बन सकता है।

अमेरिका में “चेक्स एंड बैलेंस” की बहुत बात होती है, मगर असलियत में राष्ट्रपति ही बड़े अफसरों और जजों की नियुक्ति करता है। यह “स्पॉइल्स सिस्टम” वफादारों को इनाम देने का जरिया बन जाता है। विपक्ष, सत्ता से बाहर होते ही लगभग बेजान हो जाता है। उसकी आवाज सीमित रह जाती है और वह रोजमर्रा के मसलों पर सरकार को घेर नहीं पाता।

इसके अलावा, अमेरिका की दो-पार्टी प्रणाली भी एक बड़ी कमी है। यह सिस्टम छोटे दलों, क्षेत्रीय आवाजों और अल्पसंख्यक नजरियों को हाशिए पर धकेल देता है। लोकतंत्र दो खेमों की लड़ाई बनकर रह जाता है।

भारत में तस्वीर बिल्कुल अलग है। यहां लोकतंत्र कभी सुकून में नहीं रहता। हर वक्त हलचल, बहस और टकराव चलता रहता है। ब्रिटिश विरासत से मिली नौकरशाही, यानी आईएएस, एक मजबूत ढांचा देती है। यह सिस्टम धीमा जरूर है, मगर नियमों को लागू करता है और जल्दबाजी में फैसले लेने से रोकता है। अदालतें भी अक्सर सरकार के फैसलों पर ब्रेक लगा देती हैं, जिससे कानून की हुकूमत कायम रहती है।

भारत में प्रधानमंत्री की कुर्सी कभी पूरी तरह सुरक्षित नहीं होती। हर वक्त चुनाव का दबाव रहता है। कहीं न कहीं चुनाव चलते रहते हैं; नगरपालिका, विधानसभा या लोकसभा। यहां सियासत में कोई “ऑफ-सीजन” नहीं होता। चुनाव आयोग की स्वायत्तता भी इस सिस्टम को मजबूत बनाती है।

सबसे अहम बात, भारत का बहुदलीय सिस्टम। यहां क्षेत्रीय पार्टियां, जाति आधारित समूह और छोटे-छोटे विचार भी संसद तक पहुंच जाते हैं। गठबंधन सरकारें आम बात हैं। इससे बातचीत, समझौता और सबको साथ लेकर चलने की मजबूरी पैदा होती है।

यहां विपक्ष भी कमजोर नहीं है। वह अविश्वास प्रस्ताव ला सकता है, संसद में बहस छेड़ सकता है और सरकार को हर दिन कटघरे में खड़ा कर सकता है।

जो लोग भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था को “धीमी” या “उलझी हुई” कहते हैं, वही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। यही देरी, यही प्रक्रियाएं और यही ताकत का बंटवारा तानाशाही के रास्ते को रोकता है।

इसके उलट, अमेरिका का तेज और सीधा सिस्टम एक व्यक्ति को चार साल के लिए लगभग बेइंतहा ताकत दे देता है। उसे बीच में रोकने के रास्ते बहुत सीमित हैं।

भारत की जम्हूरियत जिंदा इसलिए है क्योंकि वह कभी आराम नहीं करती। हर वक्त इम्तिहान मोड में रहती है। बार-बार चुनाव, बहुदलीय मुकाबला, आजाद न्यायपालिका और मजबूत नौकरशाही: ये सब मिलकर ताकत को बांटते हैं, जांचते हैं और चुनौती देते हैं।

अमेरिका का सिस्टम आसान और तेज हो सकता है, मगर भारत का लोकतंत्र ज्यादा गहरा, ज्यादा नुमाइंदा और आखिरकार ज्यादा मजबूत नजर आता है।


Saturday, April 11, 2026

 वर्चस्व की लड़ाई: पर्यावरण की तबाही

पश्चिम एशिया की 40 दिन की आग मानसून झेलेगा?

_____________________

बृज खंडेलवाल द्वारा

13 अप्रैल 2026

__________________________

फारस की खाड़ी का आसमान अब नीला नहीं रहा। धुएँ से सना, बैंगनी और बोझिल दिखता है। चालीस दिन तक चली जंग ने ज़मीन ही नहीं, फिज़ा को भी ज़ख़्मी कर दिया है।

धुआंधार बमबारी फिलहाल थामी है, मगर ख़तरा ज़िंदा है। अब बारूद नहीं, हवा चल रही है। जानकारों के मुताबिक ज़हरीला धुआँ, सल्फर और बारीक गर्द का एक बड़ा गुबार अरब सागर के ऊपर से भारत की तरफ बढ़ने को बेकरार है। ये सिर्फ जंग का धुंधलका नहीं, ये एक “मौसमी बम” है, जो धीरे-धीरे पाकिस्तान के सिर पर फटने को तैयार है, जिसका खामियाजा भुगतेगा समूचा क्षेत्र।

खाड़ी देशों में हुए हमलों ने तेल रिफाइनरियों, गैस प्लांट्स और इंडस्ट्रियल हब्स को निशाना बनाया। आग भड़की, और आसमान में ज़हर भर गया। तेहरान में “काली बारिश” देखी गई, जहाँ कार्बन और धुआँ पानी के साथ गिरा। ये मंजर खौफनाक है। और अब यही हवा भारत की ओर रुख कर सकती है।

भारत का मानसून कोई मामूली घटना नहीं। ये एक नाज़ुक समूह गान है। ज़मीन की गर्मी और समंदर की नमी की जुगलबंदी बारिश को जन्म देते हैं। लेकिन जंग ने इस तालमेल में खलल डाल दिया है। अब ये सुर बिखर सकते है।

वैज्ञानिक तीन बड़े खतरे गिना रहे हैं, और हर एक खतरा अपने आप में आफ़त है।

पहला है ब्लैक कार्बन। तेल और ईंधन के जलने से निकला ये महीन धुआँ सूरज की गर्मी को सोख लेता है। इससे हवा असामान्य रूप से गर्म हो जाती है। नतीजा? अचानक तेज़ और बेकाबू बारिश। कुछ घंटों में महीनों का पानी गिर सकता है। शहर डूब सकते हैं, गाँव बह सकते हैं। और जो पानी गिरेगा, वो साफ नहीं, बल्कि तेजाबी हो सकता है, जो मिट्टी की उर्वरता छीन लेगा।

दूसरा खतरा है सल्फेट एरोसोल। ये कण सूरज की रोशनी को वापस अंतरिक्ष में भेज देते हैं। इससे ज़मीन ठंडी पड़ जाती है। इसके फलस्वरूप मानसून की ताकत घट सकती है। बारिश में देरी, बीच-बीच में रुकावट,  और कई इलाकों में बिल्कुल गायब भी  हो सकती है। किसान आसमान निहारता रहेगा, खेत प्यासे रह जाएंगे।

तीसरा खतरा सबसे खौफनाक है। अगर ये धुआँ ऊपरी वायुमंडल तक पहुँच गया, तो ये ज्वालामुखी जैसा असर डाल सकता है। सूरज की रोशनी कम हो जाएगी, तापमान गिरेगा, और मानसून कई सालों तक कमजोर पड़ सकता है। यानी एक लंबा सूखा दौर, जो खेती और खाने की सुरक्षा दोनों को हिला देगा।

इतिहास गवाह है। 1991 में कुवैत के तेल कुओं में लगी आग ने दुनिया को झकझोर दिया था। उस धुएँ के असर हिमालय तक महसूस हुए। मगर आज हालात और भी संगीन हैं। इस बार आग ज्यादा बड़ी है, और समय भी बेहद नाज़ुक। मानसून आने ही वाला है।

इस पर एल नीनो का साया भी है। प्रशांत महासागर का ये चक्र अक्सर भारत में कमजोर मानसून लाता है। अब एक अजीब जंग छिड़ गई है। एक तरफ जंग से बना धुआँ बारिश को तेज़ कर सकता है, दूसरी तरफ एल नीनो उसे दबायेगा। नतीजा होगा  कहीं बाढ़, कहीं सूखा। पंजाब में पानी ही पानी, गुजरात में प्यास ही प्यास।

समंदर भी अब बीमार है। खाड़ी में फैले तेल ने पानी की सतह को ढक लिया है। इससे भाप कम उठेगी, बादल कम बनेंगे, और बारिश की ताकत घटेगी। ये एक खतरनाक सिलसिला है। गंदा समंदर, कमजोर बादल, सूखी धरती।

भारत की खेती मानसून पर टिकी है। हर फसल का एक तय वक्त होता है। जब बारिश वक्त पर नहीं आती, तो बीज या तो सूख जाते हैं या बह जाते हैं। किसान की मेहनत मिट्टी में मिल जाती है। राजस्थान, हरियाणा, पंजाब जैसे इलाके सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं।

सच कड़वा है, मगर साफ है। आज की दुनिया में कोई जंग सीमित नहीं रहती। खाड़ी में लगी आग, केरल की बारिश को भी बदल सकती है। हवा की कोई सरहद नहीं होती।

इस साल जब मानसून के पहले बादल उठेंगे, लोग सिर्फ बारिश नहीं, उसकी फितरत भी देखेंगे। क्या ये राहत लाएगा या आफ़त? ये सवाल हर किसान, हर शहरवासी के दिल में होगा।

कुदरत अपना हिसाब चुकाती है, और अक्सर बिल किसी और के नाम भेजती है। युद्ध की इस आग का बिल भगवान न करे,  भारत के किसान को चुकाना पड़े।


Friday, April 10, 2026

 कांड ताज नगरी में, गूंज ज़माने में!

जब मोहब्बत बन जाए मौत: डिजिटल भारत का खौफनाक सच

_________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा

12 अप्रैल 2026

__________________________

प्यार अंधा होता है, यह कहावत पुरानी है। पर अब प्यार खून भी करने लगा है, यह नया सच है।

आगरा की एक घटना ने दिल दहला दिया। एक मां ने अपनी ही मासूम बच्ची को मार डाला। वजह गुस्सा नहीं थी, गरीबी नहीं थी। वजह था एक नया रिश्ता। बच्ची “रास्ते की दीवार” बन गई थी।

सवाल सीधा है। क्या अब रिश्ते बोझ बनते जा रहे हैं?

यह कोई एक घटना नहीं है। देश के अलग-अलग कोनों से ऐसी खबरें लगातार आ रही हैं। मां-बाप, पति-पत्नी, बच्चे, कोई भी सुरक्षित नहीं। कारण एक ही:  "नया प्यार: ये  रिश्ता क्या कहलाता है?"

आज के “क्राइम ऑफ पैशन” पहले जैसे नहीं रहे। पहले गुस्से में खून होता था। अब सोच-समझकर, योजना बनाकर हत्या हो रही है।

पंजाब में एक मां ने अपने दो बच्चों को जहर दे दिया। दिल्ली में एक प्रेमी ने गर्भवती महिला को सरेआम चाकू मार दिया। ग्वालियर में मां ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर बेटे को छत से फेंक दिया। तमिलनाडु में पांच महीने के बच्चे को इसलिए मार दिया गया क्योंकि वह “रिश्ते में बाधा” था।मुजफ्फरनगर में दो बच्चों को जहर देकर खत्म कर दिया गया, ताकि नई जिंदगी शुरू हो सके।

हर कहानी अलग है। पर दर्द एक जैसा है। इन घटनाओं में एक खतरनाक सोच सामने आती है: “जो प्यार के रास्ते में आए, उसे मुक्ति दो।”

मनोवैज्ञानिक कहते हैं, इन हत्याओं में नफरत कम होती है। असल में यह स्वार्थ होता है।

नया रिश्ता इतना बड़ा हो जाता है कि पुराना रिश्ता बोझ लगने लगता है।जब दिल पर हवस हावी हो जाए, तो इंसान अंधा ही नहीं, बेरहम भी हो जाता है।

भारत में शादी को पवित्र माना जाता है। तलाक आज भी बदनामी समझा जाता है। लोग टूटे रिश्ते से बाहर निकलने से डरते हैं। समाज की उंगली से बचने के लिए, लोग कानून तोड़ने लगते हैं।

पहले संयुक्त परिवार होते थे। घर में बड़े-बुजुर्ग होते थे। गलत कदम उठाने से पहले कोई रोकने वाला होता था।

आज परिवार छोटे हो गए हैं। निगरानी खत्म हो गई है। आज़ादी बढ़ी है, पर समझ कम हो गई है।

मोबाइल फोन ने दुनिया को हथेली पर ला दिया। पर साथ ही, रिश्तों को भी खेल बना दिया। आज एक क्लिक में नया रिश्ता बन जाता है।

व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम, डेटिंग ऐप, सब कुछ आसान हो गया है। छिपकर बात करना अब मुश्किल नहीं रहा। झूठ बोलना भी आसान हो गया है।डिजिटल दुनिया ने प्यार को तेज कर दिया है।

जल्दी जुड़ते हैं, जल्दी टूटते हैं। और जब टूटते हैं, तो शोर बहुत होता है।शक बढ़ता है। फोन चेक होते हैं। मैसेज पढ़े जाते हैं। झगड़े बढ़ते हैं।

और कई बार, यह झगड़े खून तक पहुंच जाते हैं। सोशल मीडिया आग में घी डालता है। हर घटना वायरल हो जाती है। लोग बहस करते हैं। न्याय करने लगते हैं।

पर असली सवाल छूट जाता है: हम बदल क्यों रहे हैं?

पचास साल पहले भी अफसाने होते थे। पर छुपकर होते थे। समाज का डर था। इज्जत का सवाल था।

आज डर कम हो गया है। इच्छाएं बढ़ गई हैं। आज लोग “खुशी” चाहते हैं।पर उसके लिए कीमत चुकाने को तैयार नहीं।

जब जिम्मेदारी भारी लगती है, तो लोग गलत रास्ता चुन लेते हैं।

यह केवल कानून का मामला नहीं है।यह समाज का आईना है।

डिजिटल प्लेटफॉर्म दोषी नहीं हैं। वे केवल हमारी सोच को दिखाते हैं।असल समस्या भीतर है। अधूरापन, असंतोष, और अधीरता।

आज का इंसान इंतजार नहीं करना चाहता। समझौता नहीं करना चाहता।जो चाहिए, अभी चाहिए। और अगर कोई बीच में आए, तो उसे हटाने का ख्याल आता है।

यह खतरनाक है। बहुत खतरनाक।जरूरत है सोच बदलने की। रिश्तों को समझने की। अगर रिश्ता नहीं चल रहा, तो उसे खत्म करने का रास्ता है: कानून।

हत्या कोई हल नहीं है। यह केवल जिंदगी बर्बाद करता है। परिवारों को फिर से मजबूत करना होगा। बातचीत बढ़ानी होगी। बच्चों को सिखाना होगा कि प्यार जिम्मेदारी है, खेल नहीं।

समाज को भी बदलना होगा। तलाक को कलंक की तरह देखना बंद करना होगा। जब तक हम यह नहीं समझेंगे, ऐसी घटनाएं रुकेंगी नहीं।

आगरा की वह मासूम बच्ची एक सवाल छोड़ गई है।

क्या हम रिश्तों को निभाना भूल रहे हैं? अगर जवाब “हां” है, तो खतरे की घंटी बज चुकी है।

 नदियों के नाम से नई टाउनशिप्स बनाना: सम्मान या मुसीबतों को न्यौतना

ग्रेटर आगरा प्रोजेक्ट पर कुछ सवाल

_________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा 

11 अप्रैल 2026

___________________________

सुनहरे सपनों में हकीकत के कांटे!

आगरा के बाहरी इलाके में “ग्रेटर आगरा” के नाम से 10 नदी-थीम टाउनशिप बसने जा रही हैं। सिंधुपुरम, गोमतीपुरम, यमुनापुरम: नाम सुनकर लगता है जैसे कोई काव्य-नगरी बन रही हो। लेकिन 8 अप्रैल 2026 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा एत्मादपुर के रैपुर और रहान कलां में ₹5,142 करोड़ की इस परियोजना का शिलान्यास होते ही कुछ सवाल खड़े हो गए हैं। आगरा विकास प्राधिकरण (ADA) 449 हेक्टेयर में ये टाउनशिप बसाने जा रहा है। दावा है; “दूसरा नोएडा”। एक बड़ा अर्बन क्लस्टर ग्वालियर रोड पर अटल नगर के नाम से विकसित हो रहा है।

रहनकलां क्षेत्र में नई रिहायशी बस्तियों को लेकर संशय है। सवाल है: क्या यह विकास है, या जल्दबाजी में बुना गया खतरनाक ख्वाब? क्या हम नदी के नाम पर शहर बसा रहे हैं या नदी और विरासत को हमेशा के लिए खतरे में डाल रहे हैं?

पीने का पानी गंगा जल पाइपलाइन से डायवर्ट होगा क्या, और लॉन्ग टर्म कनेक्टिविटी प्लान क्या हैं?

आगरा का भूजल स्तर पहले ही 147 प्रतिशत से अधिक दोहन झेल रहा है। यानी जितना पानी धरती प्राकृतिक रूप से रिचार्ज कर सकती है, उससे कहीं ज्यादा खींचा जा रहा है। अब डेढ़ लाख नई आबादी बसने वाली है। हर परिवार औसतन 150-200 लीटर पानी रोज इस्तेमाल करेगा। 5-7 साल में गर्मियों के दौरान बोरवेल सूख जाएंगे। पानी टैंकर माफिया के कब्जे में चला जाएगा। हर गली में रोज झगड़े होंगे। जमीन नीचे धंसने लगेगी, मकानों की नींव दरक जाएगी। यह कोई काल्पनिक डर नहीं; यह कई भारतीय शहरों का देखा हुआ सच है, जहां भूजल संकट ने पूरा इलाका बंजर बना दिया।

यमुना का किनारा: बाढ़ का बुलावा

परियोजना यमुना किनारे से महज 500 मीटर दूर बताई गई  है। पुराने दस्तावेज बताते हैं कि करीब 98 हेक्टेयर जमीन बाढ़ या डूब क्षेत्र में आती है। नदी का बाढ़ मैदान उसका प्राकृतिक सेफ्टी वाल्व होता है। जब उस पर कंक्रीट बिछा दिया जाता है, तो पानी का रास्ता बंद हो जाता है। नतीजा? बारिश में यमुना उफनती है, पानी घरों में घुसता है, सीवर का गंदा पानी उसमें मिल जाता है। हैजा, टाइफाइड और अन्य जलजनित बीमारियां दस्तक देती हैं। यह “अर्बन फ्लडिंग” का क्लासिक फॉर्मूला है, जिसे दुनिया बार-बार दोहरा रही है, और हम सीख नहीं रहे। आगरा की पुरानी बाढ़ की घटनाएं याद दिलाती हैं कि नदी कभी माफ नहीं करती।

ताजमहल: सफेदी से पीली पड़ती विरासत

ताज ट्रेपेजियम जोन पहले ही प्रदूषण से जूझ रहा है। हवा में पार्टिकुलेट मैटर 350 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुंच चुका है, जबकि सुरक्षित मानक मात्र 100 है। अब इस मेगा प्रोजेक्ट से उठने वाली धूल, डीजल वाहनों की कतारें और बढ़ती आबादी ताज को और क्या हालत में ले जाएगी? मार्बल धीरे-धीरे पीला पड़ेगा। चमक फीकी पड़ जाएगी। दुनिया का यह अजूबा थका-हारा दिखने लगेगा। पर्यटन गिरेगा। आगरा की अर्थव्यवस्था, जो मुख्य रूप से ताज पर टिकी है, डगमगाएगी। नदी के नाम पर शहर बसाना और उसी नदी व विरासत को बीमार करना, क्या यही विकास है? क्या हम सात अरब रुपये खर्च करके दुनिया के सबसे खूबसूरत स्मारक को धीरे-धीरे मरने के लिए छोड़ रहे हैं?

हवा और गर्मी: शहर या भट्ठी?

आगरा में हरियाली मात्र 6 प्रतिशत से भी कम है। राष्ट्रीय लक्ष्य 33 प्रतिशत है। पेड़ नहीं तो शहर तंदूर बन जाएगा। “अर्बन हीट आइलैंड” इफेक्ट से तापमान 5-6 डिग्री बढ़ जाएगा। हीट स्ट्रोक के मामले बढ़ेंगे। सबसे पहले बुजुर्ग और गरीब चपेट में आएंगे। हवा पहले ही जहरीली है। नया कंक्रीट, नई धूल, नई गाड़ियां, यह शहर सांस ले पाएगा भी या नहीं? गर्मी की लहरें और प्रदूषण मिलकर जीवन को मुश्किल बना देंगे।

सीवर और गंदगी: यमुना की अंतिम सांस?

आगरा के ज्यादातर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट पहले से नाकाम हैं। 90 से ज्यादा नाले बिना ट्रीटमेंट के सीधे यमुना में गिर रहे हैं। डेढ़ लाख लोगों का अतिरिक्त गंदा पानी कहां जाएगा? नए प्लांट बने भी तो क्या वे ईमानदारी से चलेंगे? या फिर वही पुरानी कहानी, कागज पर साफ, जमीन पर गंदा? यमुना पहले ही मरने की कगार पर है। इस प्रोजेक्ट से उसकी अंतिम सांस भी छिन जाएगी।

कागजी मंजूरी, जमीनी खतरा

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि पूरे प्रोजेक्ट का पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं की गई। पहले शिलान्यास, बाद में अध्ययन। पहले ताली, फिर तफ्तीश। यह उल्टी गाड़ी है। नियम कहते हैं: EIA पहले, जन सुनवाई पहले। यहां सब कुछ उलट-पुलट हो रहा है। राज्य स्तर की SEIAA मंजूरी अक्सर औपचारिकता बनकर रह जाती है। केंद्र की सख्त नजर से बचने के लिए परियोजना को “कैटेगरी B” में रखा जाता है। यही सबसे बड़ा छेद है, जिससे पूरी नाव डूब सकती है।

खेत से कंक्रीट: किसकी कीमत पर विकास?

रैपुर और रहान कलां की जमीन उपजाऊ “खादर” क्षेत्र है। पीढ़ियों से खेती का आधार। इसे कंक्रीट में बदलना सिर्फ जमीन का नहीं, एक पूरी जीवनशैली का नुकसान है। किसान कहां जाएंगे? उनकी फसलें, उनकी आय, उनकी पहचान: सब खत्म। और क्या आगरा को सचमुच इतनी नई जमीन की जरूरत है, जब पुराने प्रोजेक्ट आधे-अधूरे पड़े हैं?

 कल का भूतिया शहर?

पानी नहीं, सीवर नहीं, हवा जहरीली, तो लोग रहेंगे क्यों? भारत में ऐसे कई “मॉडर्न टाउनशिप” पहले से आधे खाली पड़े हैं। धीरे-धीरे वे स्लम बन गए। यह परियोजना भी उसी रास्ते पर जा सकती है, आज का सपना, कल का वीरान मंजर।

नदियों के नाम पर शहर बसाना आसान है। नदियों को बचाना मुश्किल। यमुना पहले ही कराह रही है। ताज पहले ही थक चुका है। तो यह परियोजना इलाज है… या आखिरी चोट?


Thursday, April 9, 2026

 आरोग्य वन

अब हाईवे सिर्फ़ सड़क नहीं, दवा भी देंगे।

_________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा 

9 अप्रैल 2026

________________________

9 अप्रैल 2026 को राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण भारत ने ‘आरोग्य वन’ पहल शुरू की। राजमार्गों के किनारे अब औषधीय पेड़ों के जंगल उगेंगे। सफ़र होगा, और साथ में सेहत का पैग़ाम भी मिलेगा।

सड़कें दौड़ती थीं। अब पेड़ भी साथ दौड़ेंगे। हवा में सिर्फ़ धूल नहीं, शिफ़ा की ख़ुशबू भी होगी।

अब ज़रा पीछे चलते हैं।

National Highways Authority of India यानी NHAI, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के तहत एक अहम संस्था है। 1995 में बनी। आज देश के लगभग 1,32,500 किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्गों में से 92,000 किलोमीटर से ज़्यादा इसकी निगरानी में हैं।

पिछले साल 2025-26 में 5,313 किलोमीटर नई सड़कें बनीं। लक्ष्य से 15 फ़ीसदी ज़्यादा। काग़ज़ पर यह तरक़्क़ी है। ज़मीनी हक़ीक़त में? कुछ सवाल भी हैं।

सड़क बनी, तो जंगल कटा। वहां बढ़े, तो धुआँ बढ़ा। रफ़्तार आई, तो ख़ामोशी भागी। यही कसक ‘आरोग्य वन’ की वजह बनी।

विकास की दौड़ में प्रकृति हाँफने लगी थी। अब उसे थोड़ा सहारा दिया जा रहा है।

योजना क्या है? सरल लफ़्ज़ों में, जहाँ हाईवे के किनारे खाली ज़मीन है, वहाँ औषधीय पेड़ लगाए जाएंगे। इसे थीमैटिक मेडिसिनल ट्री प्लांटेशन कहा गया है। नाम थोड़ा भारी है, मंशा सीधी, धरती को फिर से ज़िंदा करना।

पहले चरण में 17 जगहों पर काम शुरू होगा। कुल 62.8 हेक्टेयर ज़मीन पर 67,462 पेड़ लगाए जाएंगे। 11 राज्यों में यह हरियाली फैलेगी; मध्य प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली-एनसीआर, गुजरात, कर्नाटक, ओडिशा, तमिलनाडु, राजस्थान, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश।

योजना छोटी नहीं है। 188 हेक्टेयर ज़मीन चिन्हित हो चुकी है। मानसून 2026 में असली इम्तिहान होगा। बारिश आई, तो पौधे भी मुस्कुराएँगे।

कौन से पेड़ लगेंगे? यह कोई साधारण हरियाली नहीं। यह ‘इलाज वाली हरियाली’ है।

नीम होगा, कड़वा, मगर कारगर।आँवला होगा, खट्टा, मगर फ़ायदेमंद।जामुन होगा, मीठा, मगर शुगर का दुश्मन। इमली, नींबू, गूलर, मौलसरी, हर पेड़ अपनी दास्तान, अपनी दवा।

कुल 36 तरह के पेड़ चुने गए हैं। इलाक़े के मौसम के हिसाब से लगाए जाएंगे। यानी, सिर्फ़ दिखावा नहीं—समझदारी भी। इन पेड़ों से सिर्फ़ इंसान नहीं, परिंदे भी लौटेंगे। मधुमक्खियाँ गुनगुनाएँगी। छोटे जीव फिर से घर बसाएँगे।

हाईवे अब ‘ग्रीन कॉरिडोर’ ही नहीं, ‘लाइफ़ कॉरिडोर’ बन सकते हैं।

कहाँ दिखेंगे ये आरोग्य वन? जहाँ नज़र सबसे ज़्यादा जाती है। टोल प्लाज़ा। इंटरचेंज। वेज़-साइड सुविधाएँ। यानी, सरकार चाहती है कि लोग देखें। देखें, समझें, और शायद थोड़ा बदलें। यह पहल सिर्फ़ पेड़ लगाने की नहीं। यह एक पैग़ाम है; “तरक़्क़ी और तबीयत, दोनों साथ चल सकते हैं।”

मक़सद क्या है? पहले पेड़ लगते थे—बस हरियाली के लिए। अब पेड़ लगेंगे: सोच के साथ। यह पहल आयुर्वेद को भी सलाम करती है। हमारी पुरानी दवा, हमारी पुरानी दास्तान।

आरोग्य वन एक तरह का खुला मदरसा होंगे; जहाँ पेड़ किताब हैं, और छाँव उनका सबक। फ़ायदे भी गिन लीजिए हवा साफ़ होगी। मिट्टी बचेगी।कार्बन घटेगा। लोग सीखेंगे। रोज़गार मिलेगा। गाँव जुड़ेगा। और सबसे अहम, हम अपनी जड़ों से फिर जुड़ेंगे।

Green Highways Policy 2015 पहले से ही हरित गलियारों की बात करती है। ‘आरोग्य वन’ उसी क़दम को आगे बढ़ाता है। थोड़ा और दिल से, थोड़ा और दिमाग़ से।

लेकिन एक सवाल अभी भी हवा में तैर रहा है।

क्या यह पहल ज़मीन पर भी उतनी ही हरी होगी, जितनी काग़ज़ पर है?

पेड़ लगाना आसान है। उन्हें बचाना, असल इम्तिहान है।

अंत में, हाईवे अब सिर्फ़ मंज़िल तक नहीं ले जाएंगे। शायद, बेहतर ज़िंदगी तक भी ले जाएँ। अगर ‘आरोग्य वन’ सच में फलते-फूलते हैं, तो यह पहल मिसाल बन सकती है।

वरना, फाइलों की धूल में एक और सपना दफ़न हो जाएगा। सड़कें बनाना हुनर है। प्रकृति बचाना ज़िम्मेदारी।


 ___________________________

जो डांसते हैं वो ही जीते हैं!

आओ डांस करें और स्वस्थ रहें!

_______________________

बृज खंडेलवाल द्वारा 

11 अप्रैल, 2026

_______________________

नाचो… या यूँ कहें, जी लो?

आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में साँस भी हाँफने लगती है। दिल थका-थका सा महसूस होता है। ऑफिस, ट्रैफिक, स्क्रीन, डेडलाइन, सब कुछ शरीर और दिमाग पर बोझ बन जाता है। ऐसे में क्या करें? जवाब बेहद सरल है, नाचो। खुलकर, बेपरवाह, बिना किसी नियम-कानून के। 

विश्व नृत्य दिवस सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि एक याद दिलाने वाला संदेश है कि हमारे जिस्म और रूह दोनों को हरकत की ज़रूरत है। 

कोई महँगा जिम नहीं, कोई भारी मशीनरी नहीं। आपका छोटा सा कमरा ही आपका रंगमंच है। आपका दिल ही संगीत है। बस एक हल्की-फुल्की धुन, थोड़ी जगह और आप तैयार। 

यहां प्रस्तुत है आपके लिए एक छोटा-सा लेकिन बेहद खुशगवार डांस रूटीन । 

इसमें मॉडर्न डांस की आज़ादी है, जहाँ शरीर अपनी मर्ज़ी से बहता है, और क्लासिकल डांस की नफासत है, जहाँ हर हरकत में सुंदरता और अनुशासन है। 

शुरुआत करने वाले लोग आसानी से कर सकते हैं। जो थोड़ा-बहुत जानते हैं, वे इसमें और गहराई डाल सकते हैं। कुल मिलाकर तीन मिनट का यह सफर आपकी ज़िंदगी को नई ताज़गी देगा।

नाच के फायदे, सिर्फ पसीना नहीं, अंदर तक सुकून मिलेगा, शुरू तो करो।

कंटेम्परेरी डांस में बहाव है। जैसे नदी अपनी राह खुद बनाती है। शरीर ढीला पड़ता है, तनाव पिघलने लगता है। क्लासिकल डांस में अनुशासन है। हर कदम नाप-तौल कर उठाया जाता है, हर मुद्रा में तहज़ीब होती है। दोनों जब मिलते हैं तो जादू हो जाता है। 

शरीर मजबूत होता है। संतुलन सुधरता है। मांसपेशियाँ धीरे-धीरे टोन होती हैं बिना जोर-जबर्दस्ती के। दिमाग शांत होता है। एंडोर्फिन हार्मोन का तूफान उठता है और मूड एकदम खिल जाता है; जैसे बारिश के बाद सूरज निकल आए। साँस और हरकत का तालमेल ध्यान की तरह काम करता है। मन के अंदर का शोर कम होता है, शांति फैलती है। 

एक बात हमेशा याद रखें, जल्दबाज़ी मत कीजिए। घुटने नरम रखिए। अगर कहीं दर्द महसूस हो तो तुरंत रुक जाएँ। दर्द दुश्मन नहीं, बस शरीर का एक इशारा है। 

अब आइए, इस तीन मिनट के रूटीन को स्टेप-बाय-स्टेप, आसान भाषा में समझते हैं। कमरा छोटा हो या बड़ा, कोई फर्क नहीं। बस एक शांत, सुखदायक गाना चला लीजिए, जैसे सॉफ्ट इंस्ट्रुमेंटल, लो-फाई बीट या कोई प्यारा ग़ज़ल।

वार्म-अप: शरीर को तैयार करने का अदब (45 सेकंड)

1. सीधे खड़े हो जाएँ। पैर कंधे की चौड़ाई जितने अलग। घुटने हल्के झुके रहें। 

2. गर्दन को धीरे-धीरे दाएँ-बाएँ घुमाएँ। जैसे सुबह उठकर आलस्य में अंगड़ाई ले रहे हों। 4-5 बार प्रत्येक दिशा में। साँस अंदर लेते हुए ऊपर की तरफ और छोड़ते हुए नीचे। 

3. कंधों को कान की तरफ ऊपर खींचें, फिर पीछे की तरफ गोल घुमाते हुए नीचे छोड़ दें। 6 बार। यह कंधों का सारा तनाव निकाल देगा। 

4. दोनों हाथ कमर पर रखें। कमर को धीरे-धीरे गोल-गोल घुमाएँ, पहले दाएँ, फिर बाएँ। जैसे कोई पुरानी घड़ी धीरे-धीरे चल रही हो। कोई ज़ोर नहीं, सिर्फ लय। 4-4 बार प्रत्येक साइड। 

मुख्य रूटीन: आज़ादी और अनुशासन का खूबसूरत मेल (1 मिनट 30 सेकंड)

पहले कंटेम्परेरी हिस्सा, शरीर को लहराने दो:

1. सिर से शुरू करें। रीढ़ की हड्डी को लहर की तरह आगे झुकाएँ। सिर पहले झुके, फिर गर्दन, फिर छाती, फिर कमर। जैसे हवा में पेड़ की डाल हिल रही हो। फिर धीरे-धीरे सीधे हो जाएँ। इसे 6-7 बार दोहराएँ। साँस को पूरी तरह छोड़ते हुए झुकें और अंदर लेते हुए सीधे हों। 

2. अब बॉडी आइसोलेशन। सिर्फ कंधे हिलाएँ, ऊपर-नीचे, बिना बाकी शरीर हिलाए। 8 बार। फिर सिर्फ कूल्हे दाएँ-बाएँ घुमाएँ। बाकी शरीर बिल्कुल स्थिर। यह नियंत्रण सिखाता है और कोर मसल्स को मजबूत करता है। 

अब क्लासिकल हिस्सा, सुंदरता और संतुलन:

1. हाथों को दोनों तरफ फैलाएँ, हथेलियाँ ऊपर की तरफ। फिर उन्हें धीरे-धीरे दिल की तरफ खींचें। गोल-गोल घुमाते हुए फिर फैलाएँ। जैसे कोई पुरानी कहानी हाथों से बयान कर रहे हों। 6-7 बार। नज़र आगे रखें, गर्दन सीधी। 

2. पैरों से हल्का साइड स्टेप। दाएँ पैर को दाईं तरफ ले जाएँ, पंजे पर वजन डालें। फिर बाएँ पैर को जोड़ें। शरीर एकदम सीधा, कमर न झुके। 8 स्टेप्स दाईं तरफ, फिर 8 बाईं तरफ। यह नजाकत और संतुलन सिखाता है। 

अंत: ठहराव का सुकून (45 सेकंड)

1. सीधे खड़े हो जाएँ। आँखें बंद करें। गहरी साँस अंदर लें (4 सेकंड), रोकें (4 सेकंड), धीरे छोड़ें (6 सेकंड)। 

2. दोनों हाथ ऊपर उठाएँ, हथेलियाँ आसमान की तरफ। फिर धीरे-धीरे नीचे लाएँ जैसे कुछ आशीर्वाद ले रहे हों। 

3. अब एक पैर पर खड़े होकर संतुलन बनाएँ। दूसरे पैर को घुटने से मोड़कर रखें। 10 सेकंड। फिर पैर बदलें। यह पूरा शरीर को शांत करता है। 

आदत कैसे बनाएँ, ताकि असर गहरा हो

हफ्ते में सिर्फ तीन-चार दिन काफी हैं। रोज़ 10 मिनट भी करें तो जीवन बदल जाएगा। एक छोटी डायरी रख लें। हर दिन लिखें—“आज कैसा महसूस हुआ?” संगीत बदलते रहें। कभी दोस्त को बुलाकर साथ नाचें—मज़ा दोगुना हो जाएगा। 

शुरुआत में स्टेप्स धीरे करें। धीरे-धीरे स्पीड बढ़ाएँ। हर छोटी प्रगति का जश्न मनाएँ। एक हफ्ते बाद आप खुद महसूस करेंगे कि ऊर्जा बढ़ गई है, नींद अच्छी आती है और चेहरे पर मुस्कान रहती है। 

इस विश्व नृत्य दिवस पर नाच को अपना हमसफर बना लीजिए। दिल से हिलिए, खुलकर मुस्कुराइए। क्योंकि जब आप नाचते हैं, तभी सच में जीते हैं। 

Wednesday, April 8, 2026

 तमाशा

दस नई टाउनशिप्स का नाम नदियों पर रखने से यमुना नहीं बचेगी

________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा

10 अप्रैल 2026

_______________________

आगरा के चमकदार रियल एस्टेट ब्रोशरों में एक खामोश सा तमाशा सजाया जा रहा है। दस नई टाउनशिप्स: सिंधुपुरम, गंगापुरम, यमुनापुरम, नर्मदापुरम, अपने नामों में पवित्र नदियों की याद संजोए हुए हैं। पहली नज़र में यह एक श्रद्धांजलि लगती है, जैसे हमारी सभ्यता अपने जलस्रोतों को सलाम कर रही हो। कागज़ पर बने नक्शे हरे-भरे दिखते हैं, भाषणों में तरक़्क़ी और पर्यावरण का ज़िक्र होता है। मगर इस चमक के पीछे एक कड़वी हक़ीक़त छुपी है, जो हर दिन और भी गहरी होती जा रही है।

कुछ ही दूरी पर बहती यमुना एक बिल्कुल अलग दास्तान कहती है। वह नदी कम, एक थकी हुई, दम तोड़ती धारा ज़्यादा लगती है। काला पड़ चुका पानी, बदबू, झाग और ठहराव; ये सब मिलकर उस दर्द की तस्वीर बनाते हैं जिसे हम देखना नहीं चाहते। हज़ारों लोग नदी किनारे घरों का ख़्वाब खरीद रहे हैं, लेकिन उसी नदी की साँसें घुट रही हैं। यह विरोधाभास नहीं, एक संगीन विडंबना है।

यही हमारे दौर का सबसे बड़ा फ़रेब है। हम नामों में पवित्रता ढूंढ लेते हैं, मगर ज़मीनी हक़ीक़त से आँख चुरा लेते हैं। यमुना को किसी टाउनशिप के नाम में जगह नहीं चाहिए। उसे साफ़ पानी चाहिए, बहाव चाहिए, और एक ईमानदार कोशिश चाहिए जो उसे ज़िंदा रख सके।

यमुना कोई मामूली नदी नहीं है। यमुनोत्री से लेकर प्रयागराज तक लगभग 1,376 किलोमीटर का सफ़र तय करती यह धारा करोड़ों लोगों के जीवन से जुड़ी है। यह आस्था है, रोज़गार है, विरासत है। लेकिन दिल्ली से गुजरने वाला इसका छोटा सा हिस्सा दुनिया के सबसे प्रदूषित हिस्सों में गिना जाता है। यहाँ पानी में घुली ऑक्सीजन लगभग नदारद है। जलीय जीवन की कोई गुंजाइश नहीं बची।

त्योहारों के समय जो दृश्य सामने आता है, वह दिल दहला देता है। लोग श्रद्धा से डुबकी लगाते हैं, मगर पानी झाग से भरा होता है। यह झाग किसी चमत्कार का नहीं, बल्कि डिटर्जेंट और रसायनों का नतीजा है। एक तरह से हम एक बीमार नदी से जीवन की दुआ मांगते हैं।

सरकारों के पास इसका जवाब अक्सर बजट के आंकड़ों में मिलता है। हज़ारों करोड़ रुपये खर्च किए जाते हैं। योजनाएँ बनती हैं, घोषणाएँ होती हैं, और हर बार उम्मीद जगाई जाती है कि अब हालात बदलेंगे। लेकिन सच यह है कि निवेश और नतीजों के बीच एक गहरी खाई बनी हुई है। पैसा बहता है, मगर नदी साफ़ नहीं होती।

दिल्ली की सफाई योजनाएँ मुख्यतः सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स पर टिकी हैं। इनकी संख्या बढ़ाने, उन्हें आधुनिक बनाने और ड्रेनेज सुधारने की बातें होती हैं। यह सब ज़रूरी है, मगर काफ़ी नहीं। शहर हर दिन भारी मात्रा में सीवेज पैदा करता है, और मौजूदा संयंत्र उस दबाव को झेल नहीं पा रहे। कई प्लांट आधी क्षमता पर चलते हैं। तकनीक पुरानी है, रखरखाव अधूरा है, और व्यवस्था बिखरी हुई है।

और सबसे बड़ी समस्या यह है कि सारा सीवेज इन प्लांट्स तक पहुँचता ही नहीं। टूटे-फूटे सीवर, अवैध कनेक्शन और लापरवाही का आलम यह है कि गंदा पानी सीधे नदी में गिरता है। ऐसे में कितनी भी बड़ी योजना बना ली जाए, उसका असर सीमित ही रहेगा।

गुरुग्राम की कहानी इस संकट को और गहरा करती है। तेज़ी से बढ़ते इस शहर ने विकास तो देखा, मगर बुनियादी ढांचे को उसी गति से नहीं बढ़ाया। नतीजा यह हुआ कि भारी मात्रा में प्रदूषण यमुना तक पहुँचने लगा। सीवेज और औद्योगिक कचरा बिना पर्याप्त उपचार के नदी में जाता है। क़ानून मौजूद हैं, लेकिन उनका पालन कमज़ोर है।

यह पूरा परिदृश्य एक बड़ी प्रशासनिक नाकामी की तरफ़ इशारा करता है। अलग-अलग राज्य अपनी-अपनी सीमाओं में काम करते हैं, जबकि नदी किसी सरहद को नहीं मानती। अगर एक जगह सुधार हो और दूसरी जगह से प्रदूषण जारी रहे, तो पूरी मेहनत बेकार हो जाती है।

अब ज़रूरत है सोच बदलने की। परियोजनाओं के स्तर से आगे बढ़कर एक समग्र व्यवस्था बनानी होगी। छोटे और विकेंद्रीकृत समाधान अपनाने होंगे। स्थानीय स्तर पर ट्रीटमेंट की व्यवस्था करनी होगी। प्राकृतिक तरीकों; जैसे आर्द्रभूमि और हरित बफर ज़ोन, को अपनाना होगा।

इसके साथ ही जवाबदेही तय करनी होगी। जो प्रदूषण फैलाए, उसे इसकी क़ीमत चुकानी पड़े। निगरानी पारदर्शी हो, आंकड़े सार्वजनिक हों, और उल्लंघन पर सख़्त कार्रवाई हो। यह तभी मुमकिन है जब नीयत साफ़ हो और अमल सख़्त।

सबसे अहम बात, एक ऐसा तंत्र बने जो पूरे यमुना बेसिन को एक इकाई की तरह देखे। राज्यों के बीच तालमेल हो, साझा लक्ष्य हों, और नियमों का पालन सुनिश्चित किया जाए।

यमुना का संकट केवल पर्यावरण का मसला नहीं है। यह हमारे शासन, हमारी प्राथमिकताओं और हमारी संवेदनशीलता का आईना है। नदी को नामों से नहीं, काम से बचाया जा सकता है।

हमें यह मानना होगा कि पैसा अकेला हल नहीं है। जब तक नीयत में खोट, व्यवस्था में ढील और सोच में दिखावा रहेगा, तब तक यमुना की हालत नहीं सुधरेगी।

वक़्त अभी हाथ से पूरी तरह निकला नहीं है, लेकिन मोहलत कम है। लोग प्रार्थना कर चुके हैं, नेता वादे कर चुके हैं, और बाज़ार अपने सपने बेच चुका है। अब ज़रूरत है एक सच्ची, ठोस और ईमानदार कोशिश की।

यमुना को बस एक चीज़ चाहिए; जीने का हक़।


Tuesday, April 7, 2026

 समय से नहीं, समय के ऊपर चलते हम?

लेट लतीफी नहीं, अच्छे समय का गायन, भारतीय जीवन की असली टाइमिंग


बृज खंडेलवाल द्वारा 



घड़ी टिक-टिक करती है। हम मुस्कुराते हैं। जितने बजे का कार्यक्रम होता है, उतने बजे हम तैयार होना शुरू करते हैं। टैम से पहुंचकर होस्ट को टेंशन नहीं देने का। अपने यहाँ समय चलता नहीं… बहता है।

पश्चिम के पास जीपीएस है। हमारे पास उससे कहीं आगे की चीज़ है। एक अदृश्य, आत्मिक नेविगेशन सिस्टम। रास्ते में ट्रैफिक हो, बरसात हो, अचानक कोई बारात मिल जाए, या बस मन कहे कि अभी बैठकर चाय पी लो… समय खुद एडजस्ट हो जाता है। कई बार ऐन वक्त कुतिया हंगासी हो जाती है।

हम देर को संदर्भ के साथ पहुँचना कहते हैं। सवाल यह नहीं कि आप लेट हैं। सवाल यह है कि आप खाली तो नहीं आए?

अपनी सोसायटी में समय सीधी रेखा नहीं है। यह गोल है। लचीला है। बिल्कुल भारतीय लोकतंत्र की तरह। सुबह 10 बजे की मीटिंग दो दुनियाओं में एक साथ चलती है। एक में एक बेचारा समय पर पहुँचकर कुर्सियाँ गिन रहा होता है। दूसरी में लोग 10:47 पर प्रवेश करते हैं, पेट भरा हुआ, चेहरे पर शांति, और पहला वाक्य यही… यह मीटिंग व्हाट्सऐप पर हो सकती थी।

पश्चिम का मिनट लोहे की छड़ है।

भारत का मिनट रबर बैंड है।

खींचो, मोड़ो, जी लो।

इतिहास उठाकर देख लीजिए। ताजमहल 22 साल में बना। क्या शाहजहाँ हर देरी पर माथा पकड़कर बैठ गया था? नहीं। उसने चाय पी। इंतजार किया। गुंबद आखिर आ ही गया। आज दुनिया फोटो खिंचवाती है, ठेकेदार का “बस पाँच मिनट” इतिहास बन गया।

रेलवे अंग्रेज लाए थे, टाइम टेबल के साथ। हमने उसे आत्मा दे दी। अब ट्रेनें समय पर नहीं चलतीं, आस्था पर चलती हैं। 6:15 की शताब्दी लेट नहीं है। वह बस इरादे और वास्तविकता के बीच कहीं ध्यान लगा रही है।

और बहाने? अरे वह तो हमारी सांस्कृतिक धरोहर है।

नौसिखिया कहेगा, ट्रैफिक था।

मध्यम स्तर वाला कहानी गढ़ेगा, जुलूस था, शायद त्योहार, शायद राजनीति, सड़कों ने साथ छोड़ दिया।

मास्टर खिलाड़ी आएगा, बैठेगा, पानी मांगेगा, और बोलेगा, ड्राइवर के चचेरे भाई के पड़ोसी की तबीयत… छोड़िए, बहुत मुश्किल सुबह थी। आपने खाना खाया?

असली कला तब है जब आप देर से आएँ और सामने वाला माफी माँगने लगे कि वह गलत जगह इंतजार करता रहा।

हमारे वादे भी सीधे नहीं होते। “मैं पहुँच रहा हूँ” का मतलब है कि इस क्षण मेरी आत्मा पहुँचने की इच्छा रखती है। शरीर का क्या होगा, वह भगवान जाने।

“जल्द मिलते हैं” एक भावना है, योजना नहीं।

“एंड ऑफ डे” किस दिन का अंत है, यह शोध का विषय है।

और शादी? वह तो समय की अंतिम परीक्षा है।

निमंत्रण में 7 बजे लिखा होता है।

सच्चाई में रात 10 बजे भी लोग पूछ रहे होते हैं, दूल्हा आया क्या?

बारात तीन घंटे देर से।

लड़की वाले खुश। तैयारी पूरी हुई।

फेरे तब शुरू जब पंडित और कैटरर की बहस खत्म।

डिनर आधी रात।

डीजे मंगलवार तक।

यह अव्यवस्था नहीं है। यह सामूहिक सहमति है कि समय को इतना गंभीर मत लो।

जो लोग समय पर पहुँचते हैं, उनसे एक छोटा सा सवाल है। इतना समय था आपके पास? 7:30 पर तैयार होकर गाड़ी में बैठे रहे? मोबाइल रिफ्रेश करते रहे? और फिर 8 बजे पहुँचकर मौसम पर चर्चा की?

जो 10 बजे आता है, वह दिन जीकर आता है। उसके पास किस्से होते हैं। वही पार्टी है।

और अगर कोई टोक दे, आपने 6 बजे कहा था…

तो मुस्कुराइए।

कहिए, हाँ, और मैं आ गया।

स्पष्टीकरण मत दीजिए। स्पष्टीकरण अपराधबोध की निशानी है। आप उस सभ्यता के नागरिक हैं जिसने शून्य दिया। आपको पता है कि शून्य और 6 बजे में गहरा रिश्ता है… दोनों ही लचीले हैं।

सच तो यह है कि हम इसी आईएसटी पर चलते हुए दुनिया की सबसे बड़ी लोकतंत्र बन गए। मंगल तक पहुँच गए। अर्थव्यवस्था दौड़ा दी।

हम समय से नहीं बंधे। समय हमसे बंधा है।

और अगर कभी हम सचमुच समय पर हो गए…तो शायद यह सारा जादू खत्म हो जाए। इसलिए हम देर नहीं करते।हम बस समय को थोड़ा और जी लेते हैं।

 


वीआईपी संस्कृति: हमारे 'भव्य' समाजवाद का 'आलीशान' सलाम

______________________

बृज खंडेलवाल द्वारा

9 अप्रैल 2026 

________________________


अहा, असली भारतीय पल! आप लेट हैं। फैशनेबली लेट नहीं। बॉलीवुड हीरो की एंट्री वाली लेट नहीं। नहीं, बल्कि सही मायने में, ट्रैजिकली, “हे भगवान, बॉस मुझे नौकरी से निकाल ही देगा” वाली लेट। पसीना आपकी रीढ़ से टपकता है जैसे किसी दिवालिया कंपनी की तिमाही रिपोर्ट। और फिर: धमाका! सड़क जम जाती है। धीमी नहीं। जाम नहीं। जम जाती है। जैसे आपकी सैलरी का इंक्रीमेंट, जो कभी आता ही नहीं।

क्यों?

क्योंकि कहीं, किसी आम आदमी की औकात से परे, एक वीआईपी... चल रहा है। पहुंच नहीं रहा। सेवा नहीं कर रहा। बस... चल रहा है। जैसे किसी फिल्म का सेट हो, और आप एक्स्ट्रा हों।

सायरन फट पड़ते हैं जैसे दिवाली के वो पटाखे, जो टैक्सपेयर के पैसे से ही नहीं, बल्कि हमारे धैर्य की भी धज्जियाँ उड़ाते हुए स्पॉन्सर किए गए हों। ट्रैफिक पुलिस हवा से प्रकट हो जाती है, परेशान कबूतरों की तरह हाथ लहराती हुई, जो शायद खुद सोच रहे हों कि ये कबूतर क्यों नहीं हैं। बैरिकेड्स, जो चुनावी वादों से भी तेज खड़े हो जाते हैं, आपकी उम्मीदों को और भी धीमा कर देते हैं। और आप? आप वहीं खड़े रहते हैं। हेलमेट हाथ में, उम्मीद जेब में, और गरिमा कब की कहीं और, शायद किसी वीआईपी की गाड़ी के नीचे कुचली जा चुकी है। जैसे कोई बाराती जिसका बैंड वाला, दूल्हे की जगह दुल्हन के साथ ही हवा हो गया हो।

स्वागत है दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में, जहाँ समानता एक खूबसूरत थ्योरी है, और वीआईपी काफिले उसकी रोजाना की 'मौत' के जनाजे।

हमें बताया गया था कि समाजवाद का मतलब 'सब बराबर'। पर किसी ने ये नहीं बताया कि कुछ ‘इक्वल-प्लस’, ‘इक्वल-प्रीमियम’ और ‘इक्वल-विद-लाइफटाइम-फ्री-फास्टैग’ के स्पेशल पैकेज भी आते हैं, जो सिर्फ 'खास' लोगों के लिए होते हैं।

इस महान गणराज्य में, आपका वोट पवित्र है। आपका समय? अरे, वो तो कबाड़ है, जब तक वीआईपी की मर्ज़ी हो।

आप सिग्नल पर रुकते हैं। वे सिग्नल को 'वैकल्पिक' मानकर 'मिटा' देते हैं।

आप कतार में खड़े होते हैं। वे कतार को "महत्वपूर्ण लोगों के लिए, जो आम जनता से 'अलग' हैं, के लिए विशेष प्रवेश" करार दे देते हैं।

आप अपॉइंटमेंट बुक करते हैं। वे पूरे शहर को 'अपने लिए' बुक कर लेते हैं।

मंदिर की लाइन छह घंटे लंबी। भक्त भजन गाते हैं, ध्यान करते हैं, शानदार तरीके से बूढ़े हो रहे हैं। अचानक, 'द ग्रेट एंट्री' होती है। नेताजी, परिवार, विस्तारित परिवार, भावनात्मक समर्थन वाले चचेरे भाई, और एक कन्फ्यूज्ड कुत्ता (शायद वो भी वीआईपी कैटेगरी में हो!)। वे सीधे अंदर चले जाते हैं। भगवान स्पष्ट रूप से वीआईपी ड्यूटी पर हैं, या शायद वीआईपी की पूजा कर रहे हैं।

“हे भक्त, थोड़ा रुकिए। भगवान अभी ‘प्राथमिकता दर्शन’ में व्यस्त हैं, जो सिर्फ वीआईपी के लिए आरक्षित है।”

याद है वो महान लाल बत्ती क्रांति? वो भव्य घोषणा भाजपा सरकार की। वो भावुक राष्ट्रीय डिटॉक्स। “अब कोई लाल बत्ती नहीं!” गर्जा सिस्टम, जैसे कोई नया एड-ब्लॉकर लॉन्च हुआ हो।

और बस, 'पुफ्फ'! वीआईपी संस्कृति गायब हो गई।

...सिवाय, वो गायब नहीं हुई। उसने सिर्फ अवतार बदल लिया। लाल बत्ती ने आध्यात्मिक यात्रा कर ली। उसने मोक्ष प्राप्त किया। वो अब नीली लाइट्स, पायलट कारों, काली फिल्म वाली खिड़कियों और उस अनोखे MEP (मोर इक्वल पर्सन) के ऑरा में प्रकट होती है।

क्योंकि चलिए, ईमानदार बनें। जब आपका अहंकार बत्ती से ज्यादा चमकता हो, तो बत्ती की क्या ज़रूरत?

हम औपनिवेशिक नशे को दोष देते हैं। लेकिन कम से कम ब्रिटिश, अपनी 'राज' वाली दादागिरी में, ब्रांडिंग में ईमानदार थे। उन्होंने इसे “राज” कहा। हम इसे “पब्लिक सर्विस” कहते हैं, जहां पब्लिक सर्विस खुद इंतजार करती है, जब तक कि 'खास' लोग अपनी सर्विस पूरी न कर लें।

1947 में शासक बदल गए। नियम? वो तो बस, 'अपडेट' हो गए।

ताज गायब हो गए। काफिले 'अपग्रेड' हो गए।

पहले साहब कहता था, “मेरे रास्ते से हटो।”

अब 'नेताजी' कहते हैं, “मेरे लोकतंत्र से हटो।”

और सुरक्षा; ओह, वो भव्य, सिनेमाई, स्लो-मोशन सुरक्षा।

जेड-प्लस। जेड-माइनस। जेड-इनफिनिटी। इस रफ्तार से तो उनकी परछाइयां भी जल्दी 'आर्म्ड प्रोटेक्शन' मांगने लगेंगी।

ये आधे नेता ऐसे चलते हैं जैसे राष्ट्र का आखिरी बचा वाई-फाई पासवर्ड उनके पास हो। काली एसयूवी फॉर्मेशन में सरकती हुई निकल जाती हैं। जवान, मासूम पैदल यात्रियों को ऐसे घूरते हैं जिनका सबसे बड़ा अपराध है "दो-पहिया" होना।

खतरे की धारणा? बिल्कुल।

इधर, पब्लिक सर्विसेज ने भी चुपके से वही 'फिलॉसफी' अपना ली है। एयरपोर्ट्स पर वीआईपी लाउंज, जहां समय अलग 'वीआईपी स्पीड' से बहता है। हॉस्पिटल्स में वीआईपी वार्ड, जहां बीमारियां भी सम्मान दिखाती हैं और विनम्रता से इंतजार करती हैं (शायद वीआईपी की मर्ज़ी हो तो)। रेलवे में वीआईपी कोटा, जहां वेटिंग लिस्ट भी खुद को 'हीन' महसूस करती है।

आपकी इमरजेंसी उनकी 'छोटी-मोटी' असुविधा।

उनकी (वीआईपी की) 'छोटी-मोटी' असुविधा? राष्ट्रिय इमरजेंसी!

ये असमानता नहीं। ये तो 'कोरियोग्राफी' है। विशेषाधिकार का खूबसूरती से रिहर्स्ड बैले, जहाँ आम आदमी 'बैकग्राउंड प्रॉप नंबर 47' का रोल प्ले करता है।

और समाधान?

अहा, शाश्वत भारतीय समाधान। कमेटियां। पैनल। घोषणाएं। हैशटैग।

“इक्वालिटी इनिशिएटिव 2.0”

“मिशन समता”

“सबका टाइम, सबका ट्रैफिक”

फोटो ऑप्स होंगे। नेता कैमरे पर सादा भोजन खाएंगे, क्रॉस-लेग्ड 11 मिनट के लिए, बिल्कुल, फिर वापस बुलेटप्रूफ बुफे पर लौटेंगे। उनके बच्चे विदेश में समानता पढ़ेंगे, एसी क्लासरूम में, जबकि आप लाल बत्तियों पर धैर्य की शिक्षा लेंगे, जो सिर्फ और सिर्फ आपके लिए हैं।

तो हम यहीं हैं। इंजन ऑफ। गुस्सा ऑन। लोकतंत्र पॉज।

काफिला दूर गायब हो जाता है। सड़क फिर खुल जाती है, जैसे कुछ हुआ ही न हो। जिंदगी फिर से अपनी गति पकड़ लेती है। आप एक्सीलरेट करते हैं। लेट। फिर से।

और कहीं गहरे अंदर, एक शांत अहसास, किसी सायरन से तेज हॉर्न बजाता है:

हमने सामंतवाद खत्म नहीं किया।

हमने उसे 'अपग्रेड' किया है।

अब अगर माफ़ करेंगे, वही काफिला उल्टी दिशा से लौट रहा लगता है।

शायद समानता दूसरी लेन में फंस गई है, या फिर 'विशेष अनुमति' का इंतजार कर रही है।

Monday, April 6, 2026

 क्या भारत सिर्फ वोट डाल रहा है… या सत्ता का हिसाब भी मांग रहा है?

___________________

बृज खंडेलवाल द्वारा

8 अप्रैल 2026

________________

पड़ोस में युद्ध की गूंज है। सीमाओं के पार बारूद की गंध है। और इसी बीच भारत के चार राज्य वोट डालने निकल पड़े हैं। सवाल सीधा है, लेकिन जवाब धुंधला। क्या ये चुनाव सिर्फ सरकार चुनने के लिए हैं… या सत्ता का लेखा-जोखा मांगने के लिए?

ऊपरी तस्वीर शांत दिखती है। कोई बड़ा उलटफेर नहीं। अनुमान कहते हैं असम में भाजपा की पकड़ बनी रहेगी। तमिलनाडु में स्टालिन की सरकार टिकी रहेगी। केरल में समीकरण ज्यादा नहीं बदलेंगे। पश्चिम बंगाल में हलचल है, पर भूकंप नहीं। यानी नतीजे शायद चौंकाएं नहीं।

लेकिन चुनाव सिर्फ नतीजों का खेल नहीं होते। वे मन की हलचल का आईना भी होते हैं।

इस बार मतदाता एक आवाज में नहीं बोल रहा। चार दिशाओं से चार अलग सुर उठ रहे हैं। केरल की सोच अलग है। बंगाल की धड़कन अलग। असम की बेचैनी अलग। तमिलनाडु का मिजाज अलग। एक शरीर है लोकतंत्र का, लेकिन दिल चार जगह धड़क रहा है।

केरल में मतदाता आज भी पढ़ता हुआ बूथ तक जाता है। वहां विचारधारा अब भी जिंदा है। लेकिन इस बार उस विचार में एक थकान घुली है। मतदान प्रतिशत में मामूली गिरावट आंकड़ा नहीं, संकेत है। लंबे संघर्ष के बाद आई हुई एक धीमी सांस।

पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र कभी शांत नहीं रहता। यहां वोट देना भी एक प्रदर्शन है। भीड़, नारे, जोश। यहां फुसफुसाहट भी फैसला बन जाती है। हर वोट एक बयान है। हर बूथ एक जंग का मैदान।

असम में मामला और गहरा है। यहां वोट सिर्फ सरकार के लिए नहीं डाला जाता। यहां पहचान दांव पर होती है। कौन अपना, कौन पराया। कागज, नागरिकता, जमीन। वोट यहां अधिकार से ज्यादा अस्तित्व बन जाता है।

तमिलनाडु में राजनीति एक रंगमंच है। चेहरे वही हैं, संवाद भी जाने-पहचाने। लेकिन दर्शकों का मूड बदल रहा है। शहरों में एक ठंडापन है। गांवों में अब भी गर्मी बची है। बीच में खड़ा मतदाता सोच रहा है, क्या कहानी अब भी वही रहेगी?

इन सबके नीचे एक अदृश्य धागा है जो चारों राज्यों को जोड़ता है। थकान। महंगाई। और वादों से उपजी निराशा।

वादे तेज होते जा रहे हैं। लेकिन उनका निभना धीमा पड़ता जा रहा है। रसोई में महंगाई की आंच तेज है। युवाओं के हाथ में डिग्री है, लेकिन नौकरी नहीं। घर के बजट में खामोशी है, लेकिन चिंता बहुत बोलती है।

केरल में कल्याण योजनाएं अब सवालों के घेरे में हैं। भरोसा टूट नहीं रहा, लेकिन घिस जरूर रहा है।

बंगाल में बेरोजगारी और कानून व्यवस्था नारों में बदल चुके हैं। राजनीति यहां सीधी टक्कर में है।

असम में पहचान की बहस हर घर तक पहुंच चुकी है। यह मुद्दा नहीं, रोजमर्रा की सच्चाई है।

तमिलनाडु में कर्ज, अपराध और अधूरे वादों की परतें एक जटिल तस्वीर बनाती हैं।

और तभी राजनीति एक पुराना दरवाजा खटखटाती है। आसमान की ओर देखती है। ज्योतिष की एंट्री होती है। ग्रह-नक्षत्रों की चाल पढ़ी जाती है। राजयोग खोजे जाते हैं। मानो जमीन के सवालों का जवाब आसमान में छिपा हो।

लेकिन सच यह है कि चुनाव न तो पूरी तरह गणित हैं, न पूरी तरह किस्मत। यह मनोविज्ञान है। एक छोटी सी लहर पूरी तस्वीर बदल सकती है। तीन प्रतिशत का झटका सत्ता हिला सकता है। एक वीडियो, एक बयान, एक गलती महीनों की मेहनत पर पानी फेर सकती है।

तो यह चुनाव आखिर है क्या?

जनादेश?

एक और पड़ाव?

या एक खामोश ऑडिट?

शायद यह तीनों का मिश्रण है।

अगर सत्ताधारी गठबंधन नए इलाकों में पैर पसारता है, तो उसकी ताकत बढ़ेगी। अगर क्षेत्रीय दल टिके रहते हैं, तो संदेश साफ होगा कि भारत एक नहीं, कई भारतों का देश है।

यहां हर राज्य अपनी भाषा में वोट करता है।

केरल विचारधारा में बोलता है। बंगाल व्यक्तित्व में। असम पहचान में। तमिलनाडु विरासत में।

और इनके बीच खड़ा है आम मतदाता। न नारों में, न बहसों में। चुप। धैर्यवान। थोड़ा थका हुआ। वह वोट देता है उम्मीद में नहीं, राहत की तलाश में। महंगाई से राहत। अनिश्चितता से राहत। अधूरे वादों के बोझ से राहत।

मतपेटी बंद हो जाएगी। स्याही सूख जाएगी। टीवी स्टूडियो का शोर थम जाएगा।

लेकिन असली सवाल वहीं रहेगा। क्या यह सिर्फ वोट था… या सत्ता के खिलाफ दर्ज एक खामोश हिसाब?

 स्क्रीन का साम्राज्य: लोकतंत्र या एल्गोरिद्म का राज?

_____________________

बृज खंडेलवाल द्वारा

7 अप्रैल 2026

________________________

दरवाज़ा खुला है। भीतर कुर्सी पर सरकार नहीं, एक स्क्रीन बैठी है। उंगली रखिए, पहचान हो जाएगी। क्लिक कीजिए, हक मिल जाएगा। सुविधा इतनी सहज कि सवाल पूछना असभ्यता लगे। मगर असली मालिक कौन है? नागरिक या चुपचाप गणना करता एल्गोरिद्म?

भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने की दौड़ में है। अब यह दौड़ सड़कों और कारखानों से आगे निकलकर सर्वरों और प्लेटफॉर्मों पर आ चुकी है। डिजिटल गवर्नेंस अब महज़ औज़ार नहीं रहा, यह राज्य और नागरिक के बीच नए सामाजिक अनुबंध का शिल्पकार बन गया है। पहचान, भुगतान, शिकायत, सब कुछ एक क्लिक पर। लेकिन जहां रोशनी है, वहीं परछाईं भी लंबी होती है।

डिजिटल गवर्नेंस का अर्थ सीधा है। शासन में डेटा, तकनीक और प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल। लक्ष्य भी साफ है। सेवाएं तेज हों, पारदर्शिता बढ़े, नागरिक की भागीदारी मजबूत हो। भारत ने इसे “डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर” के रूप में गढ़ा है। आधार, यूपीआई, ओएनडीसी जैसे प्लेटफॉर्म ने राज्य की क्षमता को कई गुना बढ़ा दिया। 2024-25 में आधार ने 2700 करोड़ से अधिक प्रमाणीकरण किए। डीबीटी के जरिए 90 करोड़ से अधिक लोगों तक सीधे लाभ पहुंचे। MyGov जैसे मंचों ने नागरिक को नीति-निर्माण में आवाज दी।

यहीं लोकतंत्र का डिजिटल रूप दिखता है। लाइनें खत्म। संवाद शुरू।

अब जरा खाड़ी देशों की तरफ देखिए। यूएई और सऊदी अरब ने डिजिटल गवर्नेंस को दक्षता के हथियार की तरह इस्तेमाल किया है। वहां सब कुछ तेज है, सटीक है, केंद्रीकृत है।

फर्क साफ दिखता है। भारत में खुला, सहभागिता आधारित मॉडल, बहस और फीडबैक के साथ। उधर टॉप-डाउन व्यवस्था, नियंत्रण के साथ सेवा। सऊदी अरब में 2024 तक 87 प्रतिशत सरकारी सेवाएं डिजिटल हो चुकी हैं। यूएई “पुलिस विदाउट पुलिसमैन” जैसे मॉडल पर काम कर रहा है, जहां निगरानी इंसान नहीं, तकनीक करती है।

भारत का रास्ता अलग है। यहां डिजिटल लोकतंत्र की कोशिश है। मगर यह रास्ता अभी असमान है। इंटरनेट पहुंच 72 प्रतिशत है, पर ग्रामीण भारत में यह लगभग 55 प्रतिशत तक सिमटी है। लोकतंत्र डिजिटल है, बराबरी अभी अधूरी है।

इस बदलाव ने रिश्ता बदल दिया है। पहले सरकार दूर थी, नागरिक लाइन में खड़ा था। अब सरकार स्क्रीन पर है, नागरिक ऐप में सिमट गया है। यह सिर्फ सुविधा नहीं, सत्ता का पुनर्वितरण है। नागरिक अब डेटा का स्रोत भी है और निगरानी का विषय भी।

खतरा यहीं छिपा है।

डेटा का केंद्रीकरण बढ़ रहा है। आधार, यूपीआई, स्वास्थ्य और शिक्षा पोर्टल, सब एक-दूसरे से जुड़े हैं। इससे दक्षता बढ़ती है, पर एक विशाल डेटा बैंक भी बनता है। अगर यह डेटा गलत हाथों में गया, तो निजता हवा हो जाएगी।

और जब सिस्टम “ना” कह दे, तो जवाबदेह कौन होगा? कोड, अधिकारी या मंत्री? यह धुंध अभी छंटी नहीं है।

डिजिटल डिवाइड भी कम चुनौती नहीं। शहरों में ऐप, गांवों में अब भी कागज़। एक ही देश में दो तरह की नागरिकता उभरती दिख रही है। एक क्लिक करने वाली, दूसरी इंतजार करने वाली।

समाधान का रास्ता सीधा है, मगर आसान नहीं। संतुलन और सख्त कानूनी सुरक्षा। डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट 2023 एक अहम कदम है। कंसेंट आधारित डेटा उपयोग, डेटा न्यूनतमकरण, डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड। पर असली परीक्षा लागू करने की है। सरकारी एजेंसियों को मिली छूट पर कड़ी निगरानी जरूरी है। नियमित ऑडिट और स्वतंत्र निगरानी संस्थाएं अनिवार्य बनानी होंगी।

डिजिटल समावेशन के बिना यह क्रांति अधूरी रहेगी। भारतनेट का विस्तार, 2030 तक 90 प्रतिशत कनेक्टिविटी, PMGDISHA के जरिए डिजिटल साक्षरता, स्थानीय भाषाओं में एआई सेवाएं, कॉमन सर्विस सेंटर के जरिए सहायक पहुंच। और सबसे अहम, डिजिटल को सुविधा नहीं, अधिकार बनाना होगा।

विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं। हर बड़े डिजिटल प्रोजेक्ट के लिए एल्गोरिद्मिक इम्पैक्ट असेसमेंट जरूरी हो। ओपन सोर्स को बढ़ावा मिले। नागरिक ऑडिट की व्यवस्था बने।

क्योंकि तकनीक तटस्थ नहीं होती। वह जिस हाथ में होती है, उसी की ताकत बनती है।

खाड़ी देशों से सबक साफ है। दक्षता और नियंत्रण का आकर्षण तेज होता है। सब कुछ व्यवस्थित, बिना शोर, बिना बहस। मगर यही खामोशी सबसे बड़ा जोखिम है। वहां डिजिटल गवर्नेंस ने राज्य को मजबूत किया, नागरिक को नहीं।

भारत अगर आंख मूंदकर इस राह पर चला, तो डिजिटल लोकतंत्र चुपचाप डिजिटल अधिनायकवाद में बदल सकता है।

इसलिए असली लड़ाई कोड में है। एल्गोरिद्म में है।

तकनीक को लोकतंत्र के अधीन रखना होगा, लोकतंत्र को तकनीक के हवाले नहीं करना होगा।

विकसित भारत 2047 का सपना सिर्फ तेज सर्वर और स्मार्ट ऐप से पूरा नहीं होगा।

यह पूरा होगा नागरिक अधिकारों की सुरक्षा से, पारदर्शी एल्गोरिद्म से, और समावेशी पहुंच से।

अंतिम सवाल वही है।

क्या हम स्क्रीन को अपना सेवक बनाए रखेंगे, या खुद उसके नागरिक बन जाएंगे?

स्क्रीन चमक रही है।

फैसला अभी भी हमारे हाथ में है।

Sunday, April 5, 2026

 हम तो कठपुतलियां हैं, नचाता तो कोई और ही है!

हर शख्स पूछ रहा है ,  कब अंधेरी रात की सुबह होगी?  

नेता नहीं बता पा रहे, पूछते हैं ज्योतिषियों से।  

क्या सचमुच आसमान युद्ध का फैसला लिख रहा है? या फिर इतिहास अब भी ट्रंप के हाथों में है?

──────────────────────────────────

बृज खंडेलवाल द्वारा  

6 अप्रैल 2026

──────────────────────────────────

आसमान अशांत है। आग लगी हुई है। चीन और रूस ऐसे खामोश हैं जैसे कुछ हुआ ही न हो। जबकि ज़मीन पर धुआँ है, बारूद है और बेचैनी है।

बेचारा ट्रंप क्या करे। ग्रह-नक्षत्र उसे चैन से रहने नहीं दे रहे। ज्योतिषियों का दावा है कि ऊपर ग्रहों की चाल ही नीचे युद्ध की दिशा तय कर रही है। अमेरिका और इज़राइल की अगुवाई में ईरान के खिलाफ छिड़ा संघर्ष छह दिनों की जगह अब छठे हफ्ते में प्रवेश कर चुका है। शुरुआत का पलड़ा साफ तौर पर एक तरफ झुका दिखता है। लेकिन अंत अब भी धुंध में लिपटा है ;  लंबा, उलझा हुआ, थकाने वाला।

“इतिहास की सबसे बड़ी लड़ाइयाँ पहले आसमान में लड़ी जाती हैं, धरती तो सिर्फ उसका मंच बनती है,” एक पश्चिमी ज्योतिषी की यह टिप्पणी इन दिनों खूब दोहराई जा रही है।

कहानी 28 फरवरी की उस रात अचानक रफ्तार पकड़ती है। मिसाइलें आसमान चीरती हैं। ठिकाने ढहते हैं। और ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मौत इस संघर्ष को एक नए मोड़ पर ला खड़ा करती है। सैन्य ढांचे को गहरी चोट लगती है। दुनिया सन्न रह जाती है।

ज्योतिषी इसे महज संयोग नहीं मानते। मंगल और यूरेनस का टकराव। राहु और मंगल की युति। यही विस्फोटक संयोजन है जिसे शास्त्रों में उथल-पुथल का संकेत माना गया है।

“जब मंगल उग्र होता है, तो तलवारें खुद रास्ता खोज लेती हैं,” एक वैदिक ज्योतिषी का कहना है।

शुरुआती दौर में यह युद्ध एकतरफा दिखता है। अमेरिकी वायु शक्ति का दबदबा साफ नजर आता है। सटीक हमले। सीमित नुकसान। मजबूत पकड़। लेकिन यही वह क्षण है जहाँ कहानी पलटने को बेकरार है।

कुंडलियाँ इशारा कर रही हैं कि यह संघर्ष जल्द थमने वाला नहीं। अप्रैल और मई आग से भरे महीने बताए जा रहे हैं। शनि और मंगल की युति तनाव को लंबा खींचेगी।

“शनि सिखाता है, मंगल सज़ा देता है। दोनों साथ हों तो समय कठोर हो जाता है,” यह पुरानी ज्योतिषीय कहावत फिर प्रासंगिक लगने लगी है।

आगे क्या? जवाब बेचैन करने वाला है। ड्रोन हमले बढ़ेंगे। मिसाइलों की बरसात होगी। प्रॉक्सी युद्ध गहराएंगे। होरमुज़ जलडमरूमध्य पर खतरे मंडराएंगे। पूरा पश्चिम एशिया इस आग की तपिश महसूस करेगा।

लेकिन हर भविष्यवाणी सिर्फ अंधेरा नहीं दिखाती। नास्त्रेदमस के लंबे सात महीनों के युद्ध का भी हवाला दिया जा रहा है।

कुछ ज्योतिषी दावा कर रहे हैं कि यह संकट अपने भीतर एक बदलाव का बीज भी लिए हुए है। गर्मियों के आखिर तक ईरान के लिए “मुक्ति” और एक तरह का पुनर्जन्म संभव है।

“हर विनाश अपने भीतर सृजन का बीज छुपाए होता है,” यह कथन जैसे इस पूरे परिदृश्य पर फिट बैठता है।

वैदिक ज्योतिष के कई चेहरे इसे सिर्फ सैन्य संघर्ष नहीं, बल्कि एक गहरे राजनीतिक और सांस्कृतिक भूकंप की शुरुआत मानते हैं। उनके मुताबिक दबाव बढ़ेगा, सत्ता डगमगाएगी और अंततः एक नई पहचान उभरेगी। शायद “प्राचीन पर्शिया” की स्मृति फिर सिर उठाए।

इस अंधेरे में एक हल्की रोशनी भी है।

जब बृहस्पति कर्क राशि में प्रवेश करेगा, तब संवाद के दरवाजे खुल सकते हैं। कुछ ज्योतिषी जुलाई के अंतिम सप्ताह की ओर इशारा कर रहे हैं। कुछ सितंबर और अक्टूबर में चरणबद्ध समझौते की संभावना देखते हैं। लेकिन इतिहास बार-बार साबित कर चुका है : “शांति कभी सीधे रास्ते से नहीं आती, वह संघर्ष के काँटों से होकर गुजरती है।”

भविष्यवक्ताओं की मानें तो एक और संकेत चिंता बढ़ाता है। यूरेनस का मिथुन राशि में प्रवेश। इतिहास गवाह है ;  जब-जब ऐसा हुआ, अमेरिका बड़े युद्धों में उलझा है। आशंका है कि यह संघर्ष सीमाओं से बाहर फैल सकता है। तेल की कीमतें उछल सकती हैं। दूसरी शक्तियां परोक्ष रूप से मैदान में उतर सकती हैं।

ज्योतिषियों की भाषा अलग है, लेकिन निष्कर्ष एक सा है। फिलहाल युद्ध का मैदान अमेरिका और इज़राइल के पक्ष में झुका हुआ दिखता है। लेकिन जीत का ताज अभी दूर है। यह लड़ाई सिर्फ गोलियों और बमों से तय नहीं होगी। इसका असली हिसाब वक्त करेगा।

एक वरिष्ठ ज्योतिषी के शब्दों में गूंजती सच्चाई है:

“युद्ध मैदान में जीते जाते हैं, लेकिन उनका अर्थ समय तय करता है।”

नीचे धरती पर सैनिक आगे बढ़ रहे हैं। मोर्चा संभाले खड़े हैं। ऊपर आसमान में ग्रह अपनी चाल चल रहे हैं। और दुनिया ठहरी हुई सांसों के साथ देख रही है।

आखिर फैसला कौन करेगा?  

सितारे?  

या इंसान की जिद, उसकी बुद्धि और उसका साहस?

“ग्रह दिशा देते हैं, लेकिन मंज़िल इंसान खुद चुनता है।”

 क्या भारत में चुनाव जीतने का असली पासपोर्ट आज भी जाति का प्रमाणपत्र है?

_____________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा 

6 अप्रैल 2026

______________________________

जी, ऐसा ही है।

दरवाज़ा संविधान ने खोला था, इरादा साफ था। सदियों की अन्याय-भरी सीढ़ियाँ तोड़नी थीं। आरक्षण उस वक़्त एक बैसाखी था, स्थायी बैरिकेड नहीं। लेकिन सियासत ने उसे हथियार बना दिया। वोटों की गिनती ने समाज की दरारों को भरने के बजाय और गहरा कर दिया। जो अस्थायी पुल होना था, वही स्थायी मोर्चा बन गया। आज हाल यह है कि पढ़ा-लिखा मतदाता भी उसी खांचे में खड़ा है, जहां उसके दादा खड़े थे। फर्क बस इतना है कि अब गणित और ज्यादा परिष्कृत हो गया है।

शुरुआत में सोच अलग थी। सुधारकों के लिए आरक्षण एक सर्जिकल स्ट्राइक था। एक झटका, जो बराबरी का रास्ता साफ करे। उनका लक्ष्य जाति को स्थायी पहचान बनाना नहीं था, बल्कि उसे धीरे-धीरे अप्रासंगिक कर देना था। लेकिन राजनीति की गंध अलग होती है। यहां आदर्श नहीं, अंकगणित चलता है। यहां दर्द भी वोट में बदलता है और उम्मीद भी।

फिर आए वे खिलाड़ी, जिन्होंने जाति को स्थायी इंजन बना दिया। कांशी राम, मायावती, मुलायम, अखिलेश आदि  ने जातिगत आक्रोश को अनुशासित वोट बैंक में ढाला। यह सिर्फ सामाजिक आंदोलन नहीं था, यह सटीक चुनावी गणित था। बसपा सुप्रीमो बहन मायावती ने और धार दी। 2007 में उन्होंने जो किया, वह एक केस स्टडी है। दलित, ब्राह्मण, मुस्लिम, सबको जोड़कर सत्ता का समीकरण गढ़ा। 206 सीटें सिर्फ आंकड़ा नहीं थीं, वह संदेश था कि जाति को जोड़कर भी जीता जा सकता है, तोड़कर भी।

शुरुआत डॉ राम मनोहर लोहिया ने पिछड़ों की राजनीति को वैचारिक धार देकर की। उनका 60 प्रतिशत का नारा सिर्फ नारा नहीं था, सामाजिक पुनर्संतुलन का प्रस्ताव था। लेकिन जैसे ही यह जमीन पर उतरा, वह भी वोट की भाषा में अनुवादित हो गया। और फिर आया वह क्षण जिसने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी। मंडल कमीशन की सिफारिशें जब लागू हुईं, तो देश दो खेमों में बंट गया। वीपी सिंह ने इसे लागू किया, सरकार चली गई, लेकिन राजनीति बदल गई। उत्तर भारत में नई जातीय ताकतें उभरीं। समाजवादी पार्टियां, क्षेत्रीय दल, सबने अपने-अपने खांचे बना लिए।

दक्षिण में कहानी अलग दिखती है, पर सार वही है। तमिलनाडु में द्रविड़ मुनेत्र काझागम ने गैर-ब्राह्मण राजनीति को संस्थागत रूप दिया। 69 प्रतिशत आरक्षण सिर्फ नीति नहीं था, एक स्थायी सामाजिक समझौता था। नतीजा यह हुआ कि दशकों से सत्ता उन्हीं खेमों में घूम रही है। कर्नाटक में लिंगायत और वोक्कालिगा समीकरण ने सरकारों की चाबी अपने पास रखी।  देव गौडा का उदय इसी गणित की देन था।

चुनाव अब विचारों से कम, जातीय नक्शों से ज्यादा तय होते हैं। हर पार्टी के पास अपना डेटा है। कौन-सी सीट पर कौन-सी जाति भारी है, किसे टिकट देना है, किसे वादा करना है। उत्तर प्रदेश में यह फार्मूला खुलकर दिखता है। यादव बहुल सीटों पर समाजवादी टिकट, दलित बहुल इलाकों में अलग रणनीति। यह ठंडा, सटीक, बेरहम गणित है। यहां विचारधारा अक्सर बैक सीट पर बैठी रहती है।

कम्युनिस्टों ने एक अलग सपना देखा था। वर्ग संघर्ष का। उन्हें लगा कि आर्थिक बराबरी से जाति मिट जाएगी। लेकिन जमीन ने उनका भ्रम तोड़ दिया। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में आंदोलन खुद जातियों में बंट गए। केरल और बंगाल में कुछ सफलता मिली, लेकिन वहां भी जाति की छाया कभी पूरी तरह नहीं गई। सच्चाई यह है कि आदमी रोजमर्रा की जिंदगी में जाति जीता है। शादी में, जमीन में, रिश्तों में। ऐसे में  वर्ग संघर्ष ठोस आरक्षण के सामने कमजोर पड़ गया।

आज तस्वीर साफ है। शिक्षा बढ़ी, शहर फैले, नौकरियां बदलीं। लेकिन जाति जिंदा है, क्योंकि उसका सीधा रिश्ता लाभ से जुड़ा है। एक डिग्री के साथ भी जाति प्रमाणपत्र चाहिए। राजनीति के लिए यह सोने की खान है। हर चुनाव से पहले नई मांग, नया वादा, नया ध्रुवीकरण। भीतर ही भीतर असमानता भी बढ़ती है। एक ही जाति के भीतर कुछ समूह सारा लाभ समेट लेते हैं, बाकी किनारे खड़े रह जाते हैं।

यह एक चक्र है, जो खुद को लगातार मजबूत करता है। जाति वोट देती है। वोट सत्ता देता है। सत्ता जाति को बचाए रखती है। और फिर वही कहानी दोहराई जाती है। सवाल यह नहीं कि आरक्षण सही है या गलत। सवाल यह है कि क्या हमने उसे लक्ष्य तक पहुंचने का साधन बनाया या रास्ते में ही उसका स्थायी शिविर खड़ा कर लिया।

भारतीय लोकतंत्र अभी भी उस जवाब की तलाश में है। जब तक कोई नई राजनीति, नई भाषा, नया भरोसा नहीं उभरेगा, तब तक यह कोड नहीं टूटेगा। जाति की स्याही अभी सूखी नहीं है। बैलेट पेपर पर उसका नाम अब भी सबसे गाढ़ा लिखा है।

Saturday, April 4, 2026

 सात फेरे से पहले सात सवाल: बदलती पीढ़ी का ‘न’ जो सिर्फ इंकार नहीं, इकरार है अपने आप से

__________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा

5 अप्रैल 2026

____________________________

दरवाज़ा आधा खुला था। भीतर पीली-सी रोशनी तैर रही थी। लैपटॉप की स्क्रीन पर एक लाइन चमक रही थी, “वन वे, पेरिस।”

फोन पर माँ की आवाज़ अटक कर रह गई, “बेटा, शादी कब…?”

उसने रुककर, जैसे अपने ही भीतर झाँककर कहा, “माँ, शायद… कभी नहीं।”

और फिर एक खामोशी। ऐसी, जैसे दीवार से पुरानी कील निकल जाए। तस्वीर अब भी टंगी है, पर सहारा बदल चुका है।

यह कहानी सिर्फ एक लड़की की नहीं है। यह उस पीढ़ी की कहानी है जो शादी को मंज़िल नहीं, विकल्प मानती है। और विकल्प भी ऐसा, जिसे टाल देना अब बगावत नहीं, सामान्य बात है।

कभी शादी जीवन का पासपोर्ट हुआ करती थी। समाज की मुहर। परिवार की गारंटी। इज़्ज़त का बीमा।

आज वही पासपोर्ट कई युवाओं को बेड़ियों जैसा लगता है।

बदलाव ने कोई शोर नहीं किया। वह दबे पांव आया। पहले करियर ने दरवाज़ा खटखटाया। फिर आत्मनिर्भरता भीतर आई। और फिर एक सवाल उठा, सीधा और असहज, “शादी क्यों?”

जब इस “क्यों” का जवाब ठोस नहीं मिला, तो परंपरा की दीवार में पहली दरार पड़ी।

आंकड़े भी अब कहानी कहने लगे हैं। 1993 में जहां 80 प्रतिशत किशोर शादी को अपना भविष्य मानते थे, आज यह संख्या 67 प्रतिशत पर आ गई है। महिलाओं में गिरावट और तेज़ है। यह सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं, सोच का भूकंप है।

आज की युवती कमाती है, निवेश करती है, अकेले दुनिया घूम आती है। उसे सहारे की ज़रूरत नहीं, साथ की तलाश है।

और फर्क यहीं है।

सहारा मजबूरी है। साथ चुनाव है।

दिल्ली की 29 साल की एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर। शानदार सैलरी। अपना घर। अपने फैसले। उसने अपने दोस्तों की शादियाँ देखीं। किसी ने करियर छोड़ा, किसी ने शहर, और किसी ने खुद को।

उसने तय किया, संबंध रहेंगे,  पर बिना कागज़ के। बिना औपचारिक रिश्ते के।

वह मुस्कराकर कहती है, “रिश्ता दिल से होना चाहिए, दस्तावेज़ से नहीं।”

यह सोच अब किनारे की लहर नहीं रही। यह बीच धारा में उतर चुकी है। सहजीवन बढ़ रहा है। रिश्ते हैं, पर बिना स्थायी मुहर के। जैसे लोग ऐप डाउनलोड करते हैं। जरूरत हो तो रखें, नहीं तो डिलीट।

कठोर लगता है। पर यही सच्चाई है।

इस कहानी में पैसा भी एक बड़ा किरदार है। बच्चा पालना अब सिर्फ भावनात्मक नहीं, आर्थिक प्रोजेक्ट बन चुका है। अमेरिका में एक बच्चे पर 18 साल में करीब 3.8 करोड़ रुपये खर्च होते हैं। भारत में भी शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवनशैली की कीमतें आसमान छू रही हैं।

करीब 70 प्रतिशत लोग मानते हैं कि बच्चों की परवरिश अब बहुत महंगी हो गई है।

तो युवा खुद से पूछता है, “क्या मैं अपनी ज़िंदगी जी पाऊंगा?”

और जवाब अक्सर ‘नहीं’ की तरफ झुक जाता है।

इसके ऊपर अनिश्चितता का बादल है। महामारी की यादें अभी सूखी नहीं हैं। नौकरियों का बाज़ार भरोसेमंद नहीं रहा। जलवायु संकट भविष्य पर सवालिया निशान लगा रहा है।

ऐसे में स्थायी बंधन कई लोगों को जोखिम लगता है।

लेकिन सबसे गहरी दरार घर के भीतर से आती है।

बचपन में देखे गए रिश्ते। माँ-बाप की खामोश लड़ाइयाँ। बच्चों के नाम पर खिंचती लंबी चुप्पियाँ। “समझौता” जो प्यार बनकर पेश किया गया।

इन दृश्यों ने शादी की चमक फीकी कर दी।

एक युवा कहता है, “मैंने अपने घर में प्यार नहीं, समझौता देखा है।” और वहीं वह तय करता है कि वह वही कहानी दोहराएगा नहीं।

संयुक्त परिवार अब धीरे-धीरे किस्सों में सिमट रहे हैं। न दादी की गोद, न नानी का सहारा। आज के दादा-दादी भी अपनी जिंदगी जीना चाहते हैं। बच्चे अलग शहरों में, अलग दुनिया में।

बच्चा पालना अब अकेले का प्रोजेक्ट है। भारी। थकाने वाला। कभी-कभी डरावना।

तो युवा क्या करता है?

वह रुकता है। सोचता है। और कई बार साफ कह देता है, “नहीं।”

यह “नहीं” गुस्सा नहीं है। यह हिसाब है। जिंदगी की बैलेंस शीट।

शादी अब अनिवार्यता नहीं रही। वह विकल्प है। और हर विकल्प हर किसी के लिए जरूरी नहीं होता।

कुछ लोग अकेले खुश हैं। कुछ बिना शादी के रिश्तों में संतुष्ट हैं। कुछ अपने काम में ही अपना संसार ढूंढ लेते हैं। बिना शादी के प्रेम भी है, सेक्स संबंध भी हैं, और बिन फेरे हम तेरे की स्वीकृति भी बढ़ रही है।

समाज असहज है। माता-पिता बेचैन हैं। पर सवाल अब भी खड़ा है, क्या शादी सिर्फ इसलिए होनी चाहिए क्योंकि वह हमेशा से होती आई है?

परंपरा का सम्मान जरूरी है। लेकिन परंपरा का बोझ हर पीढ़ी को खुद तौलना होगा।

यह बदलाव डराता है। पर इसमें एक ईमानदारी भी है।

अब लोग शादी इसलिए नहीं कर रहे क्योंकि करनी है। वे इसलिए कर रहे हैं क्योंकि चाहते हैं।

और जब चाहत सच्ची होती है, तभी रिश्ता टिकता है।

दरवाज़ा अब भी आधा खुला है।

माँ अब भी इंतज़ार में है।

लेकिन बेटी अब अपराधबोध में नहीं, अपने फैसले में खड़ी है।

यही इस कहानी का असली मोड़ है।

शादी खत्म नहीं हो रही। वह अपना रूप बदल रही है।

और हर बदलाव, अंत नहीं होता। वह एक नई शुरुआत की दस्तक होता है।

बस फर्क इतना है कि अब सात फेरे लेने से पहले, लोग सात सवाल पूछ रहे हैं।

 हंसी का भारत: ठहाकों में छिपी तहज़ीब, तंज में लिपटी सच्चाई

____________________

बृज खंडेलवाल द्वारा 

4 अप्रैल 2026

_____________________________


हंसी कब सिर्फ हंसी रहती है?

कब वह एक हथियार बन जाती है, और कब मरहम?

भारत में यह फर्क समझना आसान नहीं। यहां ठहाका भी दर्शन है, मुस्कान भी राजनीति है, और चुटकुला कई बार अदालत से ज्यादा सटीक फैसला सुनाता है।

दो हजार साल से भी ज्यादा वक्त से हंसी इस देश की नसों में बह रही है। मंदिरों की कथाओं से लेकर चौपाल की गपशप तक, कविताओं से लेकर कटाक्ष तक, यह सिर्फ मनोरंजन नहीं रही। यह एक सांस्कृतिक औजार रही है। कभी समाज को आईना दिखाने के लिए, कभी दर्द को हल्का करने के लिए, और कभी सत्ता के कान खींचने के लिए।

भारत जितना विविध है, उसकी हंसी भी उतनी ही बहुरंगी है। भाषा बदलती है, लहजा बदलता है, पर व्यंग्य का तीर वही रहता है। कहीं यह सीधे सीने में उतरता है, कहीं धीरे से चुभता है। यही उसकी ताकत है। यही उसकी खूबसूरती।

उत्तर भारत की हंसी को देखिए। यहां शब्द तलवार हैं। फुर्तीली, चुटीली, और कई बार चुभती हुई। मुगल दरबारों की परंपरा ने इसे धार दी। अकबर और बीरबल की कहानियां आज भी गलियों में जिंदा हैं। एक किस्सा सुनिए। बादशाह ने कहा, राज्य के पांच सबसे बड़े मूर्ख ढूंढो। बीरबल ने आम लोगों में ही उन्हें खोज निकाला। एक आदमी जिसने अपनी दाढ़ी में तिनका बांध रखा था ताकि खोई हुई अंगूठी का दावा कर सके। हास्यास्पद? हां। पर साथ ही यह लालच और मूर्खता पर सटीक वार भी है।

यह शैली सीधी है। बात घुमा कर नहीं कहती। नौटंकी और लोकनाट्य में यही रंग और गहरा होता है। मंच पर हंसी, पर भीतर सवाल। सत्ता पर तंज, समाज पर चोट।

अब दक्षिण की ओर चलिए। यहां हंसी धीमी है, पर गहरी। यह तुरंत ठहाका नहीं मांगती। यह सोचने पर मजबूर करती है। तेनालीराम की कहानियां इसका बेहतरीन उदाहरण हैं। एक व्यापारी ने दावा किया कि वह किसी को भी मूर्ख बना सकता है। तेनाली ने एक फुसफुसाहट में पूरा खेल पलट दिया। व्यापारी खुद मजाक बन गया।

यहां व्यंग्य परतों में चलता है। ओट्टमथुल्लल जैसे लोकनृत्य, तमिल और तेलुगु कथाएं, सबमें यही खासियत दिखती है। हंसी यहां शोर नहीं करती। यह चुपचाप अंदर तक उतर जाती है।

फिर भी, यह विभाजन दीवार नहीं है। यह सिर्फ अलग-अलग रास्ते हैं, जो एक ही मंजिल की ओर जाते हैं। एक साझा समझ। एक साझा मुस्कान।

इस पूरे ताने-बाने की जड़ें और गहरी हैं। संस्कृत साहित्य ने हंसी को सिद्धांत दिया। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र ने ‘हास्य रस’ को परिभाषित किया। हल्की मुस्कान से लेकर ठहाके तक, हर रूप का स्थान तय किया गया। विदूषक का किरदार इसी का प्रतीक था। वह राजा के सामने सच कह सकता था, क्योंकि वह हंसा रहा था।

शूद्रक का ‘मृच्छकटिकम’ देखिए। प्रेम, गरीबी, चालाकी, और गलतफहमियों के बीच पैदा होती हंसी। यह सिर्फ मनोरंजन नहीं, समाज की विसंगतियों पर टिप्पणी भी है। लालच, वर्गभेद, और सत्ता के खेल, सब पर एक साथ वार।

समय के साथ यह परंपरा जनता के बीच उतर आई। भक्ति आंदोलन ने इसे और धार दी। कबीर ने दोहों में ऐसी चुभन भरी कि पाखंड हिल गया। महाराष्ट्र में पु. ल. देशपांडे ने रोजमर्रा की जिंदगी में हास्य खोजा। बंगाल में सुकुमार राय ने बेतुकी कविताओं से औपनिवेशिक सोच पर व्यंग्य किया।

हर दौर में कुछ चेहरे उभरे, जो हंसी के जरिए समाज से संवाद करते रहे। बीरबल ने राजाओं को आईना दिखाया। हरिशंकर परसाई ने नौकरशाही की परतें उधेड़ीं। वैकोम मुहम्मद बशीर ने गांव की साधारण जिंदगी में छिपी असाधारण विडंबनाओं को उजागर किया।

और फिर आया व्यंग्य का वह रूप, जिसने सीधी टक्कर ली। पंचतंत्र की कहानियों में जानवरों के जरिए इंसानों की पोल खोली गई। अंग्रेजों के दौर में ‘अवध पंच’ जैसे प्रकाशनों ने कलम को हथियार बनाया। कार्टून और कविताओं में साम्राज्य और उसके पिट्ठुओं की खबर ली गई।

आज यह परंपरा नए मंचों पर जिंदा है। स्टैंडअप कॉमेडी, सोशल मीडिया, मीम्स। फर्क सिर्फ इतना है कि मंच बदल गया है, इरादा नहीं। भ्रष्टाचार पर तंज आज भी उतना ही असरदार है, जितना कभी दरबार में था।

कार्टूनिंग इस विरासत का जीवंत उदाहरण है। R. K. Laxman का ‘कॉमन मैन’ कुछ नहीं कहता था, फिर भी सब कह जाता था। खामोश चेहरा, पर भीतर पूरा देश बोलता था। आज Satish Acharya जैसे कलाकार उसी परंपरा को डिजिटल युग में आगे बढ़ा रहे हैं। Rachita Taneja अपनी कॉमिक्स के जरिए जटिल मुद्दों को आसान बनाती हैं।

हंसी यहां अब भी लोकतंत्र का आईना है। यह चुभती है, पर तोड़ती नहीं। यह सवाल पूछती है, पर जवाब थोपती नहीं।

और शायद यही भारत की हंसी की असली पहचान है। यह जोड़ती है, तोड़ती नहीं। यह सिखाती है, बिना उपदेश दिए। यह चोट करती है, पर मरहम भी साथ लाती है।

ठहाका यहां सिर्फ आवाज नहीं है। यह एक विचार है। एक परंपरा है। एक प्रतिरोध है।

और जब अगली बार कोई चुटकुला सुनकर आप हंसें, तो जरा ठहरिए।

हो सकता है, वह सिर्फ मजाक न हो।

हो सकता है, वह सच बोल रहा हो।

Friday, April 3, 2026

 युद्ध के डरावने काले बादलों के पार एक चांदनी रेखा दिख रही है!

क्या पश्चिम एशिया की राख में भारत का सुनहरा बीज अंकुरित होगा: संकट में अवसर की कहानी

__________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा 

4 अप्रैल, 2026

__________________________

युद्ध सिर्फ शहर नहीं जलाता। वह नक्शे बदल देता है। ताकत की परिभाषा बदल देता है। और सबसे बढ़कर, वह खाली जगह छोड़ जाता है। यही खाली जगह इतिहास की सबसे बड़ी बोली होती है।

पश्चिम एशिया इस वक्त धधक रहा है। इमारतें मलबा हैं। सप्लाई चेन टूट चुकी है। लोग अपने ही घरों में बेघर हैं। लेकिन हर युद्ध की एक मियाद होती है। गोलियां थमती हैं। और फिर शुरू होती है असली जंग। पुनर्निर्माण की जंग। भरोसे की जंग। प्रभाव की जंग।

यहीं भारत की एंट्री होती है। चुपचाप। बिना शोर। बिना दुश्मनी।

नई दिल्ली ने एक संतुलित रास्ता चुना है: नीतिगत खामोश दूरी। सऊदी अरब से रिश्ते। यूएई से साझेदारी। कतर से संवाद। ईरान से जुड़ाव। इज़रायल से सहयोग। किसी से संबंधों का पुल नहीं जलाया। यही सबसे बड़ी पूंजी है। जब धुआं छंटेगा, तब वही देश बुलाया जाएगा जिसने आग में घी नहीं डाला।

सबसे बड़ा मौका पुनर्निर्माण का है। खाड़ी के शहर हों या ईरान के औद्योगिक इलाके, सबको फिर से खड़ा होना है। बंदरगाह चाहिए। एयरपोर्ट चाहिए। अस्पताल चाहिए। सड़कें और बिजली चाहिए। भारतीय कंपनियां पहले से वहां भरोसे का नाम हैं। अब वे तेजी से फैल सकती हैं।

भारतीय इंजीनियर, आर्किटेक्ट, प्रोजेक्ट मैनेजर, टेक्नीशियन। ये सिर्फ कामगार नहीं, चलते फिरते समाधान हैं। इनके साथ आएंगे डॉलर। रेमिटेंस बढ़ेगा। और भारत का चालू खाता सांस लेगा।

स्वास्थ्य क्षेत्र भी मौका है। सस्ती और भरोसेमंद जेनेरिक दवाएं। अस्पताल चेन। भारत इलाज दे सकता है, वह भी ऐसे दामों पर जिनसे पश्चिम और चीन दोनों असहज हो जाएं।

ऊर्जा सुरक्षा की कहानी भी यहीं बदलती है। होरमुज जलडमरूमध्य की नाजुकता ने दुनिया को जगा दिया है। तेल की कीमतें ऊपर नीचे होंगी। लेकिन युद्ध के बाद स्थिर सप्लाई की दौड़ शुरू होगी। भारत को यहीं सौदेबाजी करनी है। लंबी अवधि के अनुबंध। बेहतर शर्तें।

साथ ही यह मौका है अपने घर को ठीक करने का। गैर जरूरी ईंधन खपत पर लगाम। कड़े दक्षता मानक। सौर, पवन, जल और परमाणु ऊर्जा को तेज रफ्तार। युद्ध एक राजनीतिक ढाल भी देता है। कठिन फैसले लेना आसान हो जाता है। अगर यह मौका चूक गए तो फिर वही पुराना आयात जाल।

रक्षा क्षेत्र में भी हवा बदल रही है। कम लागत, ज्यादा संख्या वाले प्लेटफॉर्म इस युद्ध में कारगर साबित हुए हैं। यही भारत की ताकत है। ड्रोन, मिसाइल, सुरक्षित संचार, डिफेंस सॉफ्टवेयर। आत्मनिर्भर भारत का असली इम्तिहान अब है।

जरूरत है दिमाग में निवेश की। और ज्यादा वैज्ञानिक। और ज्यादा इंजीनियर। डीआरडीओ, निजी लैब, विश्वविद्यालय। अगर आज बीज बोया, तो कल भारत आयातक नहीं, निर्यातक बनेगा। नौकरियां आएंगी। तकनीक नागरिक क्षेत्र में भी उतरेगी।

भू-राजनीति का खेल भी पलट रहा है। चीन की चालें अब उतनी रहस्यमय नहीं रहीं। कर्ज के जाल और अपारदर्शी सौदों ने उसकी छवि को चोट पहुंचाई है। भारत यहां अलग दिखता है। बिना एजेंडा। बिना दबाव। भरोसेमंद साझेदार।

यही वह जगह है जहां भारत क्षेत्र का पसंदीदा विकास सहयोगी बन सकता है। भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा फिर से रफ्तार पकड़ सकता है। नियम आधारित विकल्प के तौर पर। धीरे धीरे, भारत केंद्र में आ सकता है।

देश के भीतर भी तस्वीर दिलचस्प है। चुनावी मौसम। आईपीएल का शोर। तपती गर्मी। रबी की फसल। आम आदमी की नजर अपने घर आंगन पर है। यह ध्यान भटकाव नहीं, अवसर है। सरकार बिना घबराहट के तैयारी कर सकती है।

यह युद्ध स्थायी संकट नहीं है। यह अस्थायी झटका है। जैसे ही बंदूकें शांत होंगी, पश्चिम एशिया की मांग फूट पड़ेगी। ऑर्डर आएंगे। निवेश आएगा। भारतीय कामगारों के लिए नए दरवाजे खुलेंगे।

अब सवाल है, क्या हम तैयार हैं।

सरकार को तुरंत खाका बनाना होगा। विदेश, वाणिज्य, ऊर्जा और रक्षा मंत्रालय एक साथ बैठें। एक टास्क फोर्स बने। कौशल मानचित्र तैयार हो। नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा मिले। रक्षा अनुसंधान को रफ्तार दी जाए।

तटस्थता कमजोरी नहीं है। यह धैर्य की रणनीति है। सही वक्त पर सही कदम।

पश्चिम एशिया के घाव भरने में साल लगेंगे। लेकिन मरहम वही लगाएगा जो भरोसेमंद हो। भारत के पास सस्ता कौशल है। भरोसे का इतिहास है। और तकनीक की बढ़ती ताकत है।

मौका दरवाजे पर है। सवाल सिर्फ इतना है। क्या हम उसे पहचानते हैं, या फिर इतिहास की तरह उसे गुजरते देखते रहेंगे।

Thursday, April 2, 2026

 डगमगाता दरबान: कागज़ी शेर बना नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल

______________________

बृज खंडेलवाल द्वारा

3 अप्रैल, 2026

____________________________

हवा घुट रही है। नदियाँ सड़ रही हैं।कचरे के पहाड़ शहरों को निगल रहे हैं। और सवाल सीधा है; न्याय कहाँ है?

2010 में एक सपना बेचा गया था। नाम: नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल। कहा गया, अब पर्यावरण को अदालत में प्राथमिकता मिलेगी। तेज फैसले होंगे।विशेषज्ञ बैठेंगे। कागज़ नहीं, न्याय दौड़ेगा।

यह संस्था उम्मीद का चेहरा बनकर आई थी। लोगों ने सोचा, अब पेड़ों की भी सुनवाई होगी, नदियों को भी आवाज मिलेगी।

लेकिन आज तस्वीर उलटी है।

सोलह साल बाद NGT एक सबक बन चुका है: अच्छी नीयत, कमजोर व्यवस्था में कैसे दम तोड़ देती है।

सबसे बड़ी दरार इसकी आत्मा में है, स्वतंत्रता की कमी। जिस मंत्रालय पर इसे नजर रखनी है, वही इसे पैसा देता है, वही स्टाफ देता है। नियुक्तियाँ भी वहीं से।

नतीजा? निगरानी कम, नज़दीकी ज़्यादा। 2017 के बदलावों ने इसे और कमजोर किया। रीढ़ थी, अब झुक चुकी है।

दूसरी चोट: संसाधनों की कमी।

जज नहीं। विशेषज्ञ नहीं। बेंच बंद।

चेन्नई और कोलकाता जैसे शहर ठंडे पड़ गए। दूर बैठे लोग क्या करें?

दिल्ली आएँ। वक्त गंवाएँ। पैसा झोंकें।

न्याय अब भी दूर। नियम भी अजीब हैं। छह महीने में शिकायत करो, वरना दरवाज़ा बंद।

पर्यावरण का जख्म धीरे-धीरे दिखता है। जब तक दिखे, न्याय का समय निकल चुका होता है।

फैसलों की हालत भी अजीब है।

कभी बहुत सख्त। कभी बेहद नरम।कभी व्यक्ति-आधारित। कभी हद से आगे।

भरोसा टूटता है। मुआवजे का खेल और भी धुंधला है।

वैज्ञानिक आधार कमजोर। पैसा तय होता है, पर सही जगह नहीं पहुँचता।

पर्यावरण राहत कोष तक रकम कम ही जाती है। बीच में ही रास्ता बदल जाता है। प्रक्रिया भी कटघरे में है।

सुप्रीम कोर्ट तक कह चुका है: प्राकृतिक न्याय का पालन नहीं हो रहा। यहाँ फैसले अक्सर समितियों को सौंप दिए जाते हैं। रिपोर्टें आती हैं।पीड़ित गायब रहते हैं।

सबसे बड़ा सवाल: फैसलों को लागू कौन करेगा?

NGT आदेश देता है। सुर्खियाँ बनती हैं। तालियाँ बजती हैं। फाइल बंद।जमीन पर? कुछ नहीं बदलता।

दिल्ली वायु प्रदूषण संकट: निर्माण, वाहनों और पराली जलाने पर प्रतिबंध से PM2.5 में थोड़ी कमी आई, लेकिन दिवाली के बाद प्रदूषण फिर बढ़ जाता है। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से ही कुछ सुधार हुआ है।

गंगा नदी प्रदूषण: दशकों से प्रदूषण रोकने के नियम और कानपुर में चमड़ा कारखाने बंद करने के बावजूद विषैले पदार्थ और मल-जनित बैक्टीरिया नहीं रुके। नदी की हालत लगातार खराब हो रही है।

यमुना प्रदूषण और अतिक्रमण: नालों, कचरे और 'आर्ट ऑफ लिविंग' जैसे आयोजनों पर जुर्माने से भी यमुना साफ नहीं हो पाई। अदालती दबाव ही एकमात्र उम्मीद है।

देशभर में ठोस कचरा प्रबंधन की विफलता: बिहार और शहरी लैंडफिल में कचरा निपटान के नियमों के बावजूद कचरे का ढेर लगातार बढ़ रहा है।

जलवायु परिवर्तन याचिका (ऋधिमा पांडे, 2019) की खारिजी: एनजीटी ने बच्ची की याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि कानून पर्याप्त हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे पुनर्जीवित किया।

अवैध खनन और रेत निकासी: उत्तर प्रदेश और राजस्थान में प्रतिबंध के बाद भी नदियों का कटाव नहीं रुका। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद ही कुछ पालन हुआ।

औद्योगिक मामलों में प्रक्रियागत अतिक्रमण: ग्रासिम और सिंगरौली संयंत्र मामलों में एनजीटी के आदेशों को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया।

ग्रेट निकोबार परियोजना: एनजीटी ने वनों, मूंगों, जनजातियों के जोखिम के बावजूद रणनीतिक जरूरतों के नाम पर परियोजना को मंजूरी दे दी।

मुआवजा राशि का उपयोग न होना: प्रदूषण और खनन मामलों में अरबों रुपये की मुआवजा राशि राहत कोष में डाले बिना गलत तरीके से खर्च हो जाती है।

पदों के खाली होने से कामकाज ठप: एनजीटी में बेंचों के खाली होने और देरी के कारण वादियों को दिल्ली जाना पड़ता है, जिससे समयबद्ध मामले अटक जाते हैं। कुछ दिन राहत। फिर वही ज़हर।आख़िर में सुप्रीम कोर्ट की सख्ती ही काम करती है।

सच साफ है।

NGT सुर्खियाँ बनाने में माहिर है। पर अमल में कमजोर। यह अदालत फाइलों में तेज है, जमीन पर बेअसर।पर्यावरण की हालत बिगड़ती गई। हवा जहरीली। नदियाँ बीमार। कचरा बेलगाम। और असली पहरेदार कौन बना?

सुप्रीम कोर्ट।

NGT? एक कागज़ी शेर।

अब भी वक्त है। इसे आज़ाद करना होगा। सरकारी पकड़ से निकालना होगा। खाली पद भरने होंगे। फैसलों को लागू करने की ताकत देनी होगी।कानूनी दायरा बढ़ाना होगा।

वरना यह संस्था इतिहास में एक पंक्ति बनकर रह जाएगी; “इरादा नेक था, लेकिन हिम्मत आधी थी।”और तब तक; हम वही हवा सांस में भरते रहेंगे,

जिसमें सिर्फ धुआँ नहीं, न्याय भी घुट रहा है।

Wednesday, April 1, 2026

 मंदिरों में प्लास्टिक पर प्रहार… अब आस्था भी होगी ‘ग्रीन’!

__________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा 

2 अप्रैल 2026

___________________________

घंटी बजती है। भीड़ उमड़ती है। प्रसाद मिलता है। और पीछे छूट जाता है… प्लास्टिक का पहाड़।

क्या यही हमारी आस्था की पहचान है?

अब तस्वीर बदलने की कोशिश शुरू हो गई है।

Temple Connect ने Blueprint Water के साथ हाथ मिलाया है। मिशन साफ है; मंदिरों और तीर्थस्थलों से एकल-उपयोग प्लास्टिक बोतलों को धीरे-धीरे बाहर का रास्ता दिखाना।

आसान नहीं है। लेकिन जरूरी है।

भारत के मंदिर सिर्फ पूजा के स्थल नहीं, भीड़ के महासागर हैं। रोज़ लाखों लोग आते हैं। पानी पीते हैं। बोतल फेंकते हैं। और देखते ही देखते पवित्र परिसर कूड़ाघर में बदलने लगता है।

आस्था पवित्र… लेकिन आसपास गंदगी। यह विरोधाभास अब चुभने लगा है।

यहीं से इस पहल की शुरुआत होती है।

अब प्लास्टिक की जगह आएगी कागज आधारित, रिसाइकिल होने वाली पैकेजिंग। हल्की। सुविधाजनक। और सबसे बड़ी बात, धरती पर बोझ कम डालने वाली।

Blueprint Water का दावा है कि यह व्यवस्था मंदिरों की रोजमर्रा की जरूरतों से लेकर बड़े मेलों की भारी भीड़ तक आसानी से लागू हो सकती है। मतलब, न श्रद्धालु परेशान होंगे, न व्यवस्था चरमराएगी।

पर असली लड़ाई सिर्फ बोतल बदलने की नहीं है। आदत बदलने की है।

इसीलिए ‘इको-हीरो’ अभियान भी साथ चलाया जाएगा। संदेश सीधा है, अपनी बोतल साथ लाओ, जिम्मेदारी निभाओ।

सवाल उठता है, क्या श्रद्धालु सुनेंगे?

शायद हाँ। क्योंकि जब बात धर्म की हो, तो असर गहरा होता है।

गिरीश वासुदेव कुलकर्णी कहते हैं, धर्म सिर्फ पूजा नहीं सिखाता, जिम्मेदारी भी सिखाता है। और अगर मंदिर खुद उदाहरण बन जाएं, तो समाज को बदलने में देर नहीं लगती।

दूसरी तरफ, अनुज शाह इसे एक बड़े अवसर के रूप में देखते हैं। उनके शब्दों में, मंदिर देश के सबसे बड़े उपभोग केंद्र हैं। यहां छोटा बदलाव भी बड़ा असर पैदा कर सकता है।

बात में दम है।

अगर हर श्रद्धालु एक प्लास्टिक बोतल कम इस्तेमाल करे, तो सोचिए… हर दिन कितना कचरा कम होगा।

यह पहल धीरे-धीरे लागू होगी। पहले चुनिंदा मंदिर। फिर बड़े आयोजन। और फिर शायद पूरा देश।

लक्ष्य बड़ा है, धार्मिक स्थलों पर ‘ग्रीन वाटर’ को नया सामान्य बनाना।

आस्था अब सिर्फ सिर झुकाने तक सीमित नहीं रहेगी।

आस्था अब जिम्मेदारी भी निभाएगी।

और शायद पहली बार…

मंदिरों में पूजा के साथ-साथ प्रकृति भी मुस्कुराएगी।


Tuesday, March 31, 2026

 राक्षस और असुरों की लड़ाई से भारत दूर रहे।

कुछ युद्ध जरूरी होते हैं! दोनों पक्ष हल्के हों, तब ही शांति होगी!

इतिहास की एक अनिवार्य भिड़ंत

___________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा 

अप्रैल 1, 2026

__________________________

आसमान लाल है। सायरन चीख रहे हैं। मिसाइलें रात को चीरती हुई इतिहास पर अपने हस्ताक्षर कर रही हैं।

और इसी शोर के बीच एक असहज सवाल सिर उठाता है; क्या हर युद्ध सिर्फ त्रासदी होता है? या कुछ युद्ध इतिहास की अनिवार्य सफाई भी करते हैं?

पश्चिम एशिया सुलग रहा है। संयुक्त राज्य अमेरिका, इज़राइल और ईरान, तीनों आमने-सामने खड़े हैं। यह सिर्फ हथियारों की लड़ाई नहीं है। यह अहंकारों की भिड़ंत है। यह विचारधाराओं का टकराव है। यह उन कहानियों का युद्ध है, जिन्हें हर पक्ष सच मानता है और बदलना नहीं चाहता।

वॉशिंगटन और तेल अवीव इसे अस्तित्व की लड़ाई बताते हैं। उनके लिए तेहरान सिर्फ एक देश नहीं, एक खतरा है, परमाणु महत्वाकांक्षाओं से लैस, और पूरे क्षेत्र में फैले अपने नेटवर्क के साथ। हिज़्बुल्लाह, हमास, यमन के हूती; हर मोर्चे पर तनाव, हर दिन एक नई चिंगारी।

उनकी नजर में यह युद्ध कोई विकल्प नहीं, मजबूरी है।

लेकिन तेहरान की कहानी अलग है।

वह खुद को घिरा हुआ देखता है। प्रतिबंधों से जकड़ा हुआ। सौदे टूटते हुए। वैज्ञानिक मारे जाते हुए। उसके लिए यह प्रतिरोध है; अपनी संप्रभुता, अपनी पहचान, अपने अस्तित्व की रक्षा।

दोनों कहानियाँ आधी सच हैं।

और आधी झूठ।

अमेरिका लोकतंत्र की बात करता है, लेकिन इतिहास उसके हस्तक्षेपों से भरा पड़ा है। इज़राइल अपने अस्तित्व का तर्क देता है, लेकिन उस पर अंतरराष्ट्रीय नियमों को तोड़ने के आरोप भी कम नहीं।

ईरान अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाता है, लेकिन अपने ही लोगों की आवाज दबाने में पीछे नहीं रहता। धर्म के नाम पर सत्ता का खेल: पुराना, पर अब भी असरदार।

तीनों चेहरे अलग हैं।

लेकिन आईना एक ही है।

और अब वह आईना दरक रहा है।

“रूल्स-बेस्ड ऑर्डर” की बातें खोखली लगने लगी हैं। नियम अब किताबों में नहीं, ताकत के तराजू पर तय हो रहे हैं। दूसरी तरफ, इस्लामी एकता का मिथक भी बिखर चुका है।

सऊदी अरब चुप है।

तुर्की अपने हिसाब से चाल चल रहा है।

पाकिस्तान संतुलन साध रहा है।

“उम्मा” का नारा हकीकत की दीवार से टकराकर लौट आया है।

हर देश अपने लिए खेल रहा है।

बाकी दुनिया?

वह देख रही है।

भारत अपने हित साध रहा है। बेवजह विपक्ष के महाज्ञानी भारत को युद्ध में धकेलना चाहते हैं, मोदी सरकार की किरकिरी करने को। लेकिन भारत की भलाई चुप्पी साधने में ही है। गली के गुंडे भिड़ रहे हों, तो समझदार लोग किनारा कर लेने में ही भलाई समझते हैं।

चीन मौके तलाश रहा है।

यूरोप बयान दे रहा है: संतुलित, सधे हुए, और लगभग बेअसर।

कोई इस आग में कूदना नहीं चाहता।

कोई इस युद्ध का मालिक बनना नहीं चाहता।

और शायद यहीं सबसे कड़वी सच्चाई छिपी है।

कुछ युद्ध बीच में रुकते नहीं।

उन्हें थकना पड़ता है।

उन्हें खुद को खत्म करना पड़ता है।

सीज़फायर अच्छे लगते हैं, लेकिन कई बार वे सिर्फ सांस लेने का मौका देते हैं, समाधान नहीं। जब जिद, विचारधारा और बदले की आग बहुत गहरी हो जाए, तो बातचीत भी सतही लगने लगती है।

तब बचता क्या है?

एक कठोर विकल्प: इंतज़ार।

यह कोई जश्न का आह्वान नहीं है।

यह यथार्थ की स्वीकारोक्ति है।

इतिहास बताता है; कई बार शांति समझौतों से नहीं, थकान से जन्म लेती है। जब गोलियां इसलिए रुकती हैं क्योंकि चलाने की ताकत नहीं बचती। जब अहंकार इसलिए झुकते हैं क्योंकि उन्हें उठाने वाला ढांचा टूट चुका होता है।

लेकिन इसकी कीमत बहुत भारी होती है।

आम लोग। उजड़े शहर। टूटी अर्थव्यवस्थाएँ। जली हुई धरती।

यह आग साफ-सुथरी नहीं होती।

यह सब कुछ जलाती है।

फिर भी, हर युद्ध एक आईना होता है।

वह दिखाता है कि ताकत की सीमा क्या है।

वह खोलता है कि नैतिकता कितनी लचीली होती है।

वह याद दिलाता है कि सबसे ऊँची आवाजें भी अंततः खामोश हो जाती हैं।

और जब धुआं छंटेगा: कभी न कभी, तो सिर्फ नक्शे नहीं बदलेंगे।

सच भी बदलेंगे।

शायद तब दुनिया थोड़ा समझदार होगी।

शायद तब शांति थोड़ी सच्ची होगी।

क्योंकि कभी-कभी, इंसान सीखता नहीं; उसे सिखाया जाता 

Monday, March 30, 2026

 भारत में मरम्मत संस्कृति की मौत और ई-वेस्ट का पहाड़: क्या हम खुद को जहर दे रहे हैं?

________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा 

31 मार्च 2026

_________________________

क्या हमने सच में मरम्मत संस्कृति,  "ठीक करो" को भुला दिया है? या "फेंको और नया लाओ" को ही आधुनिक जीवन का मंत्र मान लिया है?

भारत के घरों में इलेक्ट्रॉनिक सामान की बाढ़ आ गई है, स्मार्टफोन, लैपटॉप, स्मार्ट टीवी, वॉशिंग मशीन, फ्रिज और एसी। लेकिन साथ ही एक खतरनाक चीज भी तेजी से बढ़ रही है, ई-वेस्ट,  (इलेक्ट्रॉनिक कचरा)। यह जहरीला कचरा है, जिसमें सीसा, पारा, कैडमियम जैसे भारी धातु और जहरीले रसायन होते हैं, जो मिट्टी, पानी और हवा को जहर देते हैं।

ताजा आंकड़ों के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2025-26 में भारत ने 14.14 लाख मीट्रिक टन (लगभग 1.41 मिलियन टन) ई-वेस्ट उत्पन्न किया है। इसमें से मात्र 9.79 लाख मीट्रिक टन का ही औपचारिक रिसाइक्लिंग हुआ है। यानी बड़ा हिस्सा अनियंत्रित तरीके से अनौपचारिक क्षेत्र में जा रहा है या खुले में फेंका जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में ई-वेस्ट की मात्रा लगातार बढ़ रही है—2023-24 में 12.54 लाख टन, 2024-25 में 13.97 लाख टन, और अब 14.14 लाख टन। यह संख्या चिंताजनक है, क्योंकि वैश्विक स्तर पर भी ई-वेस्ट 2022 में 62 मिलियन टन पहुंच चुका था और 2030 तक 82 मिलियन टन होने का अनुमान है। भारत दुनिया के सबसे बड़े ई-वेस्ट उत्पादकों में शुमार है।

एक हालिया अध्ययन और रिपोर्ट्स इस दुखद बदलाव को उजागर करती हैं। भारत की पुरानी मरम्मत संस्कृति तेजी से खत्म हो रही है। पहले हम जुगाड़ और रिपेयर से चीजों को सालों चलाते थे, लेकिन अब "रिप्लेसमेंट कल्चर" हावी है। दिल्ली और हैदराबाद जैसे महानगरों में हर वर्ग के लोग पुराने सामान को ठीक करने की बजाय नया खरीद रहे हैं। नागपुर में अमीर वर्ग अपग्रेड करता है, जबकि मध्यम वर्ग अभी भी मरम्मत पर निर्भर है। कोलकाता में पुरानी रिपेयर संस्कृति कुछ हद तक बची हुई है, और रांची जैसे छोटे शहरों में सादगी, बचत और टिकाऊपन की सोच अभी मजबूत है। लेकिन कुल मिलाकर, शहरों में रिपेयर की जगह नया खरीदना प्रमुख ट्रेंड बन गया है।

इसके पीछे कई कड़वे कारण हैं। मरम्मत अब महंगी पड़ती है। असली स्पेयर पार्ट्स मिलना मुश्किल है, क्योंकि कंपनियां उन्हें सीमित रखती हैं या महंगे बेचती हैं। कुशल तकनीशियन कम हो गए हैं, और उनके पास आधुनिक डायग्नोस्टिक टूल्स की कमी है। अनधिकृत रिपेयर सेंटरों पर भरोसा नहीं रहा; वारंटी नहीं, गुणवत्ता का डर, और कीमत अक्सर नए प्रोडक्ट के बराबर। नतीजा? ग्राहक मजबूरन नया खरीद लेता है।

यह सिर्फ व्यक्तिगत फैसला नहीं, बल्कि एक बड़ा सामाजिक और आर्थिक बदलाव है। पर्यावरण की चिंता अभी भी उपभोक्ताओं के फैसलों में बहुत कम भूमिका निभाती है। अमीर के लिए सुविधा और स्टेटस महत्वपूर्ण है, गरीब के लिए मजबूरी मरम्मत करवाती है। लेकिन इस चक्र से ई-वेस्ट का ढेर लगता जा रहा है। यह संसाधनों की बर्बादी है, कीमती धातुएं, दुर्लभ अर्थ मिनरल्स बर्बाद हो रहे हैं। कार्बन उत्सर्जन बढ़ रहा है, और अर्थव्यवस्था क्षणिक उपभोग पर टिकी है, जो टिकाऊ नहीं।

फिर भी उम्मीद है। सरकार और विशेषज्ञ एक स्पष्ट रोडमैप सुझा रहे हैं। राइट टू रिपेयर,  को मजबूत कानून बनाना जरूरी है। 2025 में सरकार ने मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए रिपेयरेबिलिटी इंडेक्स को मंजूरी दी है, और राइट टू रिपेयर पोर्टल शुरू किया गया है। कंपनियों को मजबूर किया जाए कि वे रिपेयर मैनुअल, असली स्पेयर पार्ट्स और डायग्नोस्टिक टूल्स उपलब्ध कराएं। मरम्मत सेक्टर के लिए सर्टिफिकेशन, मानक और ट्रेनिंग प्रोग्राम चलाए जाएं। स्पेयर पार्ट्स की सप्लाई चेन मजबूत हो। तकनीशियनों को स्किल्ड बनाया जाए।

सरकार की भूमिका सबसे अहम है। ई-वेस्ट (मैनेजमेंट) रूल्स 2022 लागू हैं, लेकिन इन्हें सख्ती से लागू करना होगा। अगर मरम्मत को नीति का हिस्सा नहीं बनाया गया, तो ई-वेस्ट का संकट और गहराएगा।

आखिरी सवाल आपके लिए है: क्या हम हर खराब चीज को कचरे में बदलते रहेंगे? या उसे ठीक करके नया जीवन देंगे?

भारत कभी जुगाड़ और मरम्मत की दुनिया में मशहूर था, सस्ता, टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल। वक्त है उस संस्कृति को फिर से जिंदा करने का। वरना ई-वेस्ट के पहाड़ हमारे विकास की कड़वी सच्चाई बन जाएंगे