Monday, May 25, 2026

 क्या यही वह गौरवशाली, पूजनीय श्रीकृष्ण की भूमि है, जो आज बूंद-बूंद पानी के लिए तड़प रही है?

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प्यासा ब्रज: तालाबों-कुंडों की धरती श्रीकृष्ण नगरी आखिर पानी को क्यों तरस रही है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

28 मई 2026

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ब्रज मंडल की प्रकृति, यमुना तट, कुंज गलियों, मोरों, गायों और कृष्ण लीलाओं का सुंदर वर्णन अनेक लोकप्रिय भजनों और गीतों में मिलता है। “श्याम तेरी बंसी पुकारे,” “राधे राधे बरसाने वाली,” “मैया मोरी,” और “जय राधा माधव” जैसे भजन वृंदावन, बरसाना और गोकुल की आध्यात्मिक सुंदरता को जीवंत करते हैं। सूरदास और रसखान के पद विशेष रूप से प्रकृति का मार्मिक वर्णन करते हैं।

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कभी यह धरती बांसुरी की तान पर झूमती थी। यमुना किनारे कदंब की छांव थी। कुंडों में कमल खिलते थे।तालाब गांवों की धड़कन होते थे।

आज उसी ब्रज मंडल में सुबह का पहला दृश्य क्या है? हाथों में बाल्टियां लिए महिलाएं। सूखे नलों के नीचे टकटकी लगाए बच्चे। और पानी के टैंकर के पीछे भागती भीड़।

यह वही ब्रज है, जहां श्रीकृष्ण ने गोपियों संग रास रचाया था। वही भूमि, जिसे संतों ने “धरा पर स्वर्ग” कहा। लेकिन अब यह स्वर्ग प्यास से फटे होंठों वाला मरुस्थल बनता जा रहा है। विडंबना देखिए । यमुना किनारे बसे शहरों में लोग पीने के पानी के लिए जूझ रहे हैं।

कभी ब्रज का हर गांव एक छोटे जल-संसार जैसा था। कुंड थे। पोखर थे। बावड़ियां थीं। बरसात का पानी सहेजने की अद्भुत लोक-व्यवस्था थी।

बूढ़े लोग बताते हैं कि मथुरा और वृंदावन में बीस तीस फीट खोदो तो मीठा पानी मिल जाता था। अब डेढ़ सौ फीट नीचे भी कई बार सिर्फ गाद या हवा निकलती है। धरती का सीना खाली हो चुका है। जैसे किसी ने भीतर का सारा जीवन चूस लिया हो।

गर्मियों में हालात और भयावह हो जाते हैं। मोहल्लों में,  गांवों में पानी के लिए रोज छोटे-छोटे युद्ध होते हैं। टैंकर आता है तो ऐसा लगता है जैसे रेगिस्तान में बादल उतर आया हो। 

यह संकट अचानक नहीं आया। यह वर्षों की लापरवाही का नतीजा है।

ब्रज के तालाब और सरोवर सिर्फ सजावट नहीं थे। वे धरती के बैंक थे। बरसात का पानी जमा करते थे, भूजल रिचार्ज करते थे, गर्मी कम करते थे। लेकिन विकास के नाम पर इन जलाशयों को मिटा दिया गया। कहीं कॉलोनियां उग आईं। कहीं पार्किंग बन गई। कई कुंड कूड़ाघर में बदल गए।

कंक्रीट ने मिट्टी की सांस रोक दी।

धरती पानी पीना भूल गई।

राजनीति ने भी अपना खेल खेला। चुनावों में बड़े-बड़े वादे हुए। यमुना सफाई की बातें हुईं। हर घर जल पहुंचाने के दावे हुए। घाट चमकाए गए। रंगीन लाइटें लगीं। पर्यटन को बढ़ावा मिला। लेकिन गांवों के सूखे हैंडपंप किसी भाषण का हिस्सा नहीं बने।

मथुरा से सांसद बनीं हेमा मालिनी ने भी यमुना और जल संकट पर कई घोषणाएं कीं। करोड़ों रुपये योजनाओं में खर्च हुए। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बने। “नमामि गंगे” और “जल जीवन मिशन” जैसे अभियानों का खूब प्रचार हुआ। मगर जमीन पर तस्वीर अब भी अधूरी है। शहर के कुछ हिस्सों में पाइपलाइन पहुंची, लेकिन बाहरी बस्तियां और गांव अब भी भूजल के भरोसे हैं।

सबसे दुखद हालत यमुना की है।

जिस नदी को ब्रज की मां कहा जाता था, वह कई जगहों पर नाले जैसी दिखती है। दिल्ली और दूसरे शहरों का प्रदूषण बहता हुआ यहां पहुंचता है। काले झाग, बदबू और गंदगी ने नदी की आत्मा को घायल कर दिया है। श्रद्धालु आरती उतारते हैं, लेकिन नदी खुद जैसे मदद की गुहार लगा रही हो।

एक समय था जब बच्चे यमुना में छलांग लगाकर तैरना सीखते थे। आज माता-पिता बच्चों को नदी के पास जाने से डरते हैं। पानी में बीमारी है। जहरीले रसायन हैं। गांवों के कई इलाकों में भूजल में फ्लोराइड और TDS की मात्रा खतरनाक स्तर तक पहुंच चुकी है। लोग धीरे-धीरे बीमार हो रहे हैं। दांत खराब हो रहे हैं। किडनी रोग बढ़ रहे हैं। टाइफाइड और हेपेटाइटिस आम बात बनते जा रहे हैं।

पर्यटन ने भी दबाव बढ़ाया है।

हर साल करोड़ों श्रद्धालु ब्रज पहुंच रहे हैं। होटल, धर्मशालाएं, रेस्टोरेंट और नई कॉलोनियां तेजी से बढ़ रही हैं। पानी की मांग आसमान छू रही है। लेकिन जल संरक्षण की रफ्तार घोंघे जैसी है। विकास हो रहा है या विनाश? 

स्थानीय नेतृत्व की विफलता अब खुली किताब है।

भव्य परियोजनाओं पर ध्यान रहा। फोटो खिंचवाने पर ध्यान रहा। लेकिन तालाब बचाने, वर्षा जल संचयन लागू करने और अतिक्रमण हटाने जैसे बुनियादी काम पीछे छूट गए। विकास का ढोल बजता रहा, मगर धरती भीतर से सूखती रही।

फिर भी उम्मीद पूरी तरह मरी नहीं है।

कुछ गांवों में लोग खुद चंदा इकट्ठा कर तालाब साफ करा रहे हैं। कुछ पर्यावरण कार्यकर्ता पुराने कुंडों को पुनर्जीवित करने में जुटे हैं। युवा वृक्षारोपण अभियान चला रहे हैं। कुछ NGO वर्षा जल संचयन और चेक डैम बनाने की मांग उठा रहे हैं।

असल लड़ाई पाइपलाइन की नहीं, सोच की है।

जब तक विकास और प्रकृति साथ नहीं चलेंगे, तब तक कोई योजना स्थायी नहीं होगी। चमचमाती सड़कें प्यास नहीं बुझातीं। रंगीन घाट सूखे भूजल को नहीं भरते।

ब्रज आज पूरे देश को चेतावनी दे रहा है।

यदि श्रीकृष्ण की भूमि प्यास से तड़प सकती है, तो कोई शहर सुरक्षित नहीं। प्रकृति देर से हिसाब करती है, मगर बहुत सख्ती से करती है।

अब समय आ गया है कि नेता भाषणों से आगे बढ़ें।

तालाब बचाए जाएं।

कुंड पुनर्जीवित हों।

वर्षा जल संचयन अनिवार्य बने।

यमुना में गिरता गंदा पानी रोका जाए।

क्योंकि आखिर सवाल सिर्फ विकास का नहीं है। सवाल जीवन का है।

ब्रज की पुकार आज बहुत साफ सुनाई दे रही है :

“भव्य चमकीली परियोजनाएं बाद में बनाना, पहले हमारे कुंड, तालाब, वन, बगीचे, नदी सुरक्षित करो।

 

Who Hijacked India’s Mindspace?

The smartphone has not merely replaced newspapers and television; it has transformed how Indians think, read, interact, and remember. Once, mornings began with newspapers and evenings united families around television screens, creating shared conversations and collective experiences. Today, billions of scrolling thumbs have replaced deep reading with instant consumption.

With over 800 million smartphone users, India’s attention economy now runs on reels, viral clips, and algorithm-driven outrage. Traditional newspapers struggle to survive, while television loses viewers to endless digital content. Algorithms feed users only what excites, angers, or entertains them, shrinking attention spans and weakening thoughtful reflection.

The result is a society flooded with information but starved of wisdom. Families sit together yet live in separate digital worlds. The smartphone has become the new emperor of attention, raising an unsettling question: are humans controlling screens, or are screens controlling humans?

Sunday, May 24, 2026

 गायब होता अख़बार, फीकी पड़ती टीवी की चमक और मुट्ठीभर स्क्रीन का साम्राज्य

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क्या स्मार्टफोन बन चुका है भारत की नई ‘ध्यान सत्ता’ का सम्राट?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

27 मई 2026

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एक जमाना था सुबह का अखबार पढ़े बिना लोग निच्चू नहीं हो पाते थे, शाम को हम लोग, या महाभारत देखे बगैर सो नहीं पाते थे। घंटों तक बच्चे टीवी जिसे इलेक्ट्रॉनिक निप्पल कहा जाता था, चिपके रहते थे। क्रिकेट मैच मोहल्लों को जोड़ देते थे। धारावाहिक घर-घर की बातचीत बन जाते थे। समाचार चैनल देश की राजनीतिक धड़कन तय करते थे। मीडिया सिर्फ सूचना का माध्यम नहीं था, वह सामाजिक संस्कृति का हिस्सा था।

और अब?

क्या आपने गौर किया है कि  घरों में अख़बार की सरसराहट कम सुनाई देती है और टीवी के सामने परिवारों की भीड़ भी पहले जैसी नहीं रही?

एक खामोश क्रांति हमारे सामने घट रही है। बिना शोर। बिना मातम। बिना किसी औपचारिक घोषणा के। भारत में पारंपरिक मीडिया, खासकर प्रिंट और टेलीविजन, धीरे-धीरे अपनी पकड़ खोते जा रहे हैं। उनकी जगह अब स्मार्टफोन ने ले ली है। वही छोटा-सा चमकता पर्दा, जिसने दुनिया को हथेली में समेट लिया है और इंसानी ध्यान को अपनी गिरफ्त में कर लिया है।

कम्युनिकेशन क्रांति के गुरु मार्शल मैकलुहान ने ठीक ही कहा था:  “मीडियम ही संदेश है।”

आज वह संदेश बदल चुका है।

तेज़। छोटा। उत्तेजक। और बेहद नशे की तरह असर करने वाला।

स्मार्टफोन ने केवल टीवी या अख़बार को चुनौती नहीं दी, उसने इंसानी व्यवहार ही बदल दिया।

आंकड़े कहानी साफ़ बताते हैं। भारत में टीवी दर्शकों की संख्या धीरे-धीरे घट रही है। करोड़ों लोग डीटीएच कनेक्शन छोड़ चुके हैं। विज्ञापन आय ठहर गई है। कभी मनोरंजन का बादशाह रहा टीवी उद्योग अब असुरक्षा के दौर से गुजर रहा है।

लेकिन असली चिंता टीवी नहीं, अख़बारों की गिरती हालत है।

प्रिंट पत्रकारिता, जो लोकतंत्र की रीढ़ मानी जाती थी, डिजिटल तूफान में हांफती नजर आ रही है। नई पीढ़ी अब खबरें अख़बार में नहीं, इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब शॉर्ट्स, व्हाट्सऐप फॉरवर्ड और एल्गोरिदम से चलने वाली सोशल मीडिया फीड्स में ढूंढती है। लंबी रिपोर्ट पढ़ने का धैर्य घटता जा रहा है। लोग अब खबर को “समझना” नहीं, “स्क्रॉल” करना चाहते हैं।

सुबह का अख़बार अब किसी दूसरे अख़बार से नहीं, बल्कि मोबाइल की लगातार बजती नोटिफिकेशनों से लड़ रहा है।

यह बदलाव केवल तकनीकी नहीं, सामाजिक भी है।

अख़बार पाठक को ठहरना सिखाते थे। सोचने का समय देते थे। अलग-अलग विचारों से परिचय कराते थे। संपादकीय, विश्लेषण और खोजी रिपोर्टें समाज को गहराई देती थीं। दूसरी ओर स्मार्टफोन की दुनिया तेज़ प्रतिक्रिया, सनसनी और तात्कालिक उत्तेजना पर चलती है। सूचना अब टूटी हुई कांच के टुकड़ों की तरह बिखरकर आती है। लोग सब कुछ जानते हुए भी बहुत कम समझ पा रहे हैं।

माध्यम बदला है, इसलिए संदेश भी बदल गया है।

आज भारत में 80 करोड़ से अधिक स्मार्टफोन उपयोगकर्ता हैं और यह संख्या लगातार बढ़ रही है। सस्ते इंटरनेट ने डिजिटल दुनिया को हर हाथ तक पहुंचा दिया। सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने मनोरंजन को पूरी तरह व्यक्तिगत बना दिया है। अब हर व्यक्ति अपनी अलग डिजिटल दुनिया में जी रहा है।

टीवी सामूहिक अनुभव था। स्मार्टफोन व्यक्तिगत कैदखाना बन गया।

पहले पूरा परिवार एक कार्यक्रम साथ देखता था। अब एक ही कमरे में बैठे चार लोग चार अलग-अलग स्क्रीन पर अलग-अलग दुनिया देख रहे होते हैं। साझा सामाजिक संवाद बिखर रहा है। राष्ट्रीय बहसें अब स्वतः नहीं बनतीं, उन्हें एल्गोरिदम गढ़ते हैं।

आज की सबसे बड़ी पूंजी है : इंसानी ध्यान।

विज्ञापन कंपनियों ने यह बदलाव सबसे पहले समझ लिया। बड़े ब्रांड अब टीवी से ज्यादा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर पैसा लगा रहे हैं, जहां हर क्लिक, हर स्क्रॉल और हर सेकंड का हिसाब मिलता है। डिजिटल विज्ञापन तेजी से बढ़ रहा है जबकि टीवी और प्रिंट की विज्ञापन आय सिकुड़ती जा रही है।

और अख़बार?

वे चुपचाप लहूलुहान हो रहे हैं।

कई शहरों में प्रसार घट रहा है। विज्ञापन ऑनलाइन चले गए हैं। न्यूजप्रिंट की लागत बढ़ती जा रही है। छोटे और क्षेत्रीय अख़बार अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। अनुभवी पत्रकारों को डर है कि समाज केवल एक उद्योग नहीं खो रहा, बल्कि पढ़ने और गहराई से सोचने की आदत भी खो रहा है।

विडंबना देखिए : सूचना बढ़ी है, लेकिन ध्यान घट गया है।

तीस सेकंड की रील अब हजार शब्दों के विश्लेषण पर भारी पड़ रही है। वायरल कंटेंट बनाने वाले कई बार स्थापित न्यूज़रूम से ज्यादा प्रभावशाली हो गए हैं। इस डिजिटल जंगल में विश्वसनीयता से ज्यादा दृश्यता मायने रखती है।

असल लड़ाई अब टीवी बनाम डिजिटल की नहीं रही।

यह लड़ाई है इंसानी ध्यान पर कब्जे की।

और फिलहाल यह जंग सबसे छोटी स्क्रीन जीत रही है।

मैकलुहान की बात आज पहले से ज्यादा सच लगती है। माध्यम केवल संदेश नहीं देता, वह समाज की सोच, व्यवहार और रिश्तों को भी आकार देता है। स्मार्टफोन ने अभिव्यक्ति को लोकतांत्रिक बनाया, लेकिन साथ ही ध्यान भंग, ध्रुवीकरण और मानसिक बेचैनी भी बढ़ाई।

उत्तर प्रदेश के किसी गांव का युवा अब रातोंरात वायरल स्टार बन सकता है। किसान लाखों लोगों तक अपनी बात पहुंचा सकता है। यह बदलाव क्रांतिकारी भी है और खतरनाक भी।

सवाल यह है कि क्या समाज बिना गहराई से पढ़े स्वस्थ लोकतंत्र बचा पाएगा?

क्या लोग केवल स्क्रॉल करते-करते सोचने की क्षमता खो देंगे?

पारंपरिक मीडिया अब चौराहे पर खड़ा है।

अख़बारों और टीवी चैनलों को पुराने ढांचे से बाहर निकलना होगा। डिजिटल पत्रकारिता, क्षेत्रीय भाषाओं की ताकत, मल्टीमीडिया स्टोरीटेलिंग और विश्वसनीय कंटेंट ही उनका भविष्य तय करेंगे।

लेकिन एक सच्चाई साफ़ दिख रही है।

मीडिया के अधिकार का युग समाप्त हो रहा है।

एल्गोरिदम के प्रभाव का युग शुरू हो चुका है।

परिवार अब भी एक ही छत के नीचे रहते हैं, लेकिन मानसिक रूप से अलग-अलग डिजिटल दुनियाओं में बंट चुके हैं। टीवी अब भी जलता है। अख़बार अब भी कुछ दरवाजों तक पहुंचते हैं। मगर समाज का केंद्र अब हथेली में चमकती उस छोटी स्क्रीन पर खिसक चुका है।

ध्यान का नया सम्राट अब स्मार्टफोन है।

और हर अंतहीन स्क्रॉल के साथ, पुरानी मीडिया दुनिया थोड़ा और धुंधली पड़ती जा रही है।

 छोटे परिवार, टूटते रिश्ते: क्या परिवार नियोजन ने भारत की संयुक्त परिवार व्यवस्था को कमजोर कर दिया है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

26 मई 2026

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मदर्स डे पर बेटे ने अपनी ही मां को गोली मार दी।

भाई खेत के टुकड़े के लिए एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए।

बुजुर्ग मां फ्लैट के एक कोने में पड़ी रही, जैसे घर का कोई बेकार सामान।

एक युवा प्रोफेशनल अकेलेपन से टूटकर आत्महत्या की कोशिश कर बैठा।

यह किसी अपराध फिल्म की पटकथा नहीं। यह बदलते भारत की भयावह सामाजिक तस्वीर है। वही भारत, जिसने कभी पूरे उत्साह से “हम दो, हमारे दो” का नारा अपनाया था।

देश ने जनसंख्या नियंत्रण में उल्लेखनीय सफलता हासिल की। लेकिन इस सफलता की छाया में रिश्तों की जमीन धीरे-धीरे बंजर होती चली गई। सदियों तक भारतीय समाज को सहारा देने वाली संयुक्त परिवार व्यवस्था अब तेजी से दरक रही है। और इस बदलाव के पीछे परिवार नियोजन कार्यक्रमों की सफलता भी एक महत्वपूर्ण, मगर कम चर्चित कारण बनकर उभरी है।

दशकों तक सरकारों ने छोटे परिवार को आदर्श बताया। तर्क भी मजबूत था; कम बच्चे होंगे तो गरीबी घटेगी, शिक्षा बेहतर होगी, स्वास्थ्य सुधरेगा और आर्थिक विकास तेज होगा। अभियान सफल रहा।

NFHS-5 (2019-21) के अनुसार भारत की कुल प्रजनन दर घटकर 2.0 रह गई है, जो प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से भी नीचे है। 1960 के दशक में यही दर लगभग 5.7 थी। शहरों में एक या दो बच्चों का चलन सामान्य हो चुका है। गांव भी उसी दिशा में बढ़ रहे हैं।

NFHS-5 डेटा बताता है कि देश में 58.2% घरेलू इकाइयां अब न्यूक्लियर फैमिली हैं। औसत परिवार का आकार 1999 के 5.2 से घटकर 2021 में 4.4 रह गया है।

लेकिन हर सफलता की एक सामाजिक कीमत होती है। भारत अब वही कीमत चुका रहा है।

हाल की घटनाएं इस संकट का दर्दनाक चेहरा दिखाती हैं।

उत्तर प्रदेश में पुश्तैनी जमीन के विवाद में एक किसान ने अपनी मां और छोटे भाई की हत्या कर दी।

मध्य प्रदेश में सात एकड़ खेत के बंटवारे को लेकर भाइयों की लड़ाई खून-खराबे में बदल गई।

दिल्ली में पढ़ा-लिखा दंपती तलाक, दहेज और बच्चे की कस्टडी के मुकदमों में वर्षों से उलझा है।

हरियाणा में दहेज के लिए नई बहू को प्रताड़ित किया गया, क्योंकि छोटे परिवार में रोकने-टोकने वाला कोई बुजुर्ग नहीं था।

बेंगलुरु में बुजुर्ग मां बेटे के फ्लैट में उपेक्षा की शिकार हुई।

पंजाब में दो भाई दस वर्षों से अदालतों के चक्कर काट रहे हैं।

चेन्नई में एक युवक पारिवारिक अलगाव और अकेलेपन से टूटकर आत्महत्या का प्रयास कर बैठा।

ये सिर्फ घटनाएं नहीं हैं। ये बदलते भारत का सामाजिक एक्स-रे हैं।

संयुक्त परिवार कभी आदर्श व्यवस्था नहीं था। उसमें पितृसत्ता भी थी, दबाव भी थे, झगड़े भी होते थे। लेकिन उसके भीतर एक सुरक्षा कवच भी मौजूद था। दादा-दादी बच्चों को संभालते थे। चाचा-ताऊ संकट में साथ खड़े रहते थे। विधवाओं को सहारा मिलता था। घर के बड़े विवाद सुलझा देते थे। अकेलापन इतना गहरा नहीं होता था कि जानलेवा बन जाए।

आज वही ढांचा बिखर रहा है।

शहरीकरण, पलायन, बढ़ती महत्वाकांक्षाएं, उपभोक्तावाद और महिलाओं की शिक्षा-आर्थिक स्वतंत्रता ने इस प्रक्रिया को तेज किया। लेकिन परिवार नियोजन ने रिश्तों की पूरी गणित बदल दी।

पहले बड़े परिवारों में जिम्मेदारियां बंट जाती थीं। चार भाई खेत संभालते थे। कई बच्चे बुजुर्ग माता-पिता का सहारा बनते थे। चचेरे भाई-बहन भी सगे रिश्तों की तरह साथ पलते थे। परिवार सिर्फ खून का रिश्ता नहीं, सामाजिक बीमा भी था।

अब कई घरों में सिर्फ एक या दो बच्चे हैं। ऐसे में विवाद पैदा हो तो बीच-बचाव कौन करे?

एक तलाक पूरे व्यक्ति को अकेला कर देता है।

एक बेटा जिम्मेदारी छोड़ दे तो बुजुर्ग माता-पिता बेसहारा हो जाते हैं।

दो भाइयों का झगड़ा सीधे हत्या तक पहुंच जाता है।

छोटे परिवारों ने संपत्ति विवाद भी अधिक तीखे बना दिए हैं। खेती की जमीन छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटती गई। शहरों में मकान सोने की खान बन गए। जहां वारिस कम हों, वहां लालच और टकराव ज्यादा विस्फोटक हो जाते हैं। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स भी बताती हैं कि भारत में जमीन और संपत्ति विवाद हिंसक अपराधों का बड़ा कारण बनते जा रहे हैं।

UN Global Study on Homicide जैसे रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत में संपत्ति-जमीन विवाद हत्याओं का बड़ा कारण हैं।

आज अदालतें पारिवारिक मुकदमों से भरी पड़ी हैं। तलाक, गुजारा भत्ता, घरेलू हिंसा, संपत्ति विवाद और बुजुर्ग उपेक्षा के मामले न्याय तंत्र पर भारी पड़ रहे हैं। केरल जैसे राज्यों में रोज औसतन 75 तलाक के मामले दर्ज होते हैं। पुलिस थाने अब आधे पारिवारिक पंचायत बन चुके हैं।

आज अदालतें पारिवारिक मुकदमों से भरी पड़ी हैं। तलाक, गुजारा भत्ता, घरेलू हिंसा, संपत्ति विवाद और बुजुर्ग उपेक्षा के मामलों ने न्याय व्यवस्था पर भारी दबाव डाल दिया है। पुलिस थाने धीरे-धीरे पारिवारिक पंचायतों में बदलते जा रहे हैं।

लेकिन सबसे बड़ा संकट मानसिक है।

अकेलापन बढ़ रहा है। अवसाद बढ़ रहा है। बुजुर्ग भावनात्मक उपेक्षा झेल रहे हैं। न्यूक्लियर फैमिली कई बार छोटे द्वीपों जैसी बन गई है। एक रिश्ता टूटा नहीं कि पूरा भावनात्मक ढांचा ढह जाता है।

भारत की पारंपरिक सामाजिक समझ कहती थी कि इंसान अकेले नहीं, साथ रहकर बचता है। आधुनिक जीवन ने व्यक्ति को केंद्र में रख दिया और समुदाय को धीरे-धीरे पीछे धकेल दिया।

यह भी सच है कि परिवार नियोजन ने भारत को जनसंख्या विस्फोट से बचाया। मातृ स्वास्थ्य सुधरा। शिक्षा के अवसर बढ़े। गरीबी पर कुछ नियंत्रण हुआ। इन उपलब्धियों को नकारा नहीं जा सकता। लेकिन नीति निर्माताओं ने शायद इसके सामाजिक और मनोवैज्ञानिक दुष्प्रभावों का पूरा आकलन नहीं किया।

पश्चिमी देशों ने संयुक्त परिवार छोड़े तो बदले में मजबूत सामाजिक सुरक्षा, बुजुर्ग देखभाल और काउंसलिंग सिस्टम विकसित किए। भारत ने पुरानी व्यवस्था को कमजोर तो कर दिया, मगर नई सुरक्षा दीवारें समय पर खड़ी नहीं कर पाया।

नतीजा सामने है: 

छोटे घर।

छोटे परिवार।

छोटे रिश्ते।

और बड़ा अकेलापन।

अब चुनौती परिवार नियोजन को उलटने की नहीं है। असली चुनौती टूटते सामाजिक ताने-बाने को फिर से जोड़ने की है। भारत को पारिवारिक मध्यस्थता तंत्र, बुजुर्ग देखभाल योजनाएं, मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं और सामुदायिक सहयोग मॉडल मजबूत करने होंगे। स्कूलों और समाज को भी रिश्तों की सामूहिक जिम्मेदारी का महत्व फिर सिखाना होगा।

वरना आने वाले समय में भारत के पास मकान तो होंगे, मगर घर नहीं बचेंगे।


Saturday, May 23, 2026

 चौराहे पर खड़ी कांग्रेस: राहुल गांधी नेतृत्व कर रहे हैं या पार्टी को गर्त में धकेल रहे हैं?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

25 मई 2026

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कांग्रेस की राजनीति आज जंगल में भटकते कारवां जैसी लगती है। रास्ता भी धुंधला। रहबर भी असमंजस में।

राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी बार-बार ऐसी राजनीतिक “कौवा-भोज” करती दिखती है, जहां हर अधूरा बयान, हर जल्दबाजी और हर कमजोर रणनीति उसकी साख को थोड़ा और खोखला कर देती है। 

देश मजबूत विपक्ष चाहता है, मगर कांग्रेस अक्सर घायल मुसाफिर जैसी नजर आती है, जो मंजिल से ज्यादा बहानों की तलाश में है।

सबसे बड़ा संकट नेतृत्व का नहीं, भरोसे का है। कांग्रेस के पास अब वैसी दमदार, ईमानदार और ज़मीनी क्षेत्रीय फौज नहीं बची, जो अपने बूते जनाधार खड़ा कर सके। पुराने चेहरे थक चुके हैं। नए चेहरों को उभरने नहीं दिया जाता। अंदरूनी लोकतंत्र बंद कमरे में कैद है। परिवारवाद की धूल इतनी मोटी जम चुकी है कि प्रतिभा की पौध धूप तक नहीं देख पाती।

कांग्रेस की मौजूदा राजनीति भी अजीब प्रतीक्षा में फंसी दिखती है। कभी उम्मीद कि सरकार किसी संकट में फंस जाए। कभी आस कि महंगाई जनता को भड़का दे। कभी भरोसा कि विदेश नीति की उलझनें सत्ता को कमजोर कर देंगी। लेकिन राजनीति केवल विरोध का खेल नहीं है। जनता विकल्प चाहती है। विजन चाहती है। भरोसा चाहती है।

राजनीति के जानकार कहते हैं कि राहुल गांधी के आक्रामक बयान सुर्खियां जरूर बटोरते हैं, लेकिन बिना मजबूत संगठन, बिना बूथ नेटवर्क और बिना स्पष्ट आर्थिक सोच के वे हवा में छोड़े गए तीर लगते हैं। कांग्रेस आज तक तय नहीं कर पाई कि वह गरीबों की पार्टी है, उदार बाजार की समर्थक है या सिर्फ भाजपा विरोध का मंच।

अगर पार्टी ने जल्द नेतृत्व संस्कृति नहीं बदली, साफ छवि वाले युवा नेताओं को आगे नहीं लाया और नई आर्थिक तथा संघीय सोच पेश नहीं की, तो उसका राष्ट्रीय आधार और सिकुड़ जाएगा। कुछ राज्यों में छिटपुट जीत मिल सकती है, मगर राष्ट्रीय राजनीति में उसकी जगह क्षेत्रीय दल तेजी से भर देंगे।

साल 2026 आते-आते खतरे की घंटियां अब धीमे नहीं बज रहीं। वे किसी जलती इमारत के फायर अलार्म की तरह चीख रही हैं। जिस पार्टी ने दशकों तक भारतीय राजनीति पर राज किया, वही आज थके हुए हाथी जैसी दिखती है, जो चढ़ाई पर हांफ रही है, जबकि उसके प्रतिद्वंद्वी तेज रफ्तार घोड़ों की तरह आगे निकल चुके हैं।

पश्चिम बंगाल चुनावों ने कांग्रेस की हालत को और बेरहमी से उजागर कर दिया। भाजपा ने मजबूत प्रदर्शन किया, जबकि कांग्रेस तस्वीर से लगभग गायब रही। कभी कांग्रेस भारतीय राजनीति का बरगद थी। आज कई राज्यों में वह धूल खाए पुराने साइनबोर्ड जैसी लगती है, जिसे लोग देखते तो हैं, मगर पढ़ते नहीं।

कांग्रेस के सामने फिलहाल चार रास्ते दिखाई देते हैं।

पहला रास्ता है धीरे-धीरे क्षेत्रीय अप्रासंगिकता की ओर फिसलना। पार्टी खत्म नहीं होगी, मगर लगातार सिमटती जाएगी। कर्नाटक, हिमाचल, तेलंगाना या केरल जैसे कुछ जेबनुमा इलाकों तक सीमित रह सकती है। बाकी राज्यों में उसे क्षेत्रीय दलों की बैसाखियों पर चलना पड़ेगा। उत्तर प्रदेश, बंगाल, ओडिशा और दिल्ली में कांग्रेस पहले ही दर्शक दीर्घा की पार्टी बनती जा रही है।

दूसरा रास्ता पुनर्निर्माण का है। कठिन, मगर संभव। इसके लिए गांधी परिवार को रोजमर्रा की पकड़ ढीली करनी होगी। पार्टी में वास्तविक लोकतंत्र लाना होगा। राज्यों के नेताओं को ताकत देनी होगी। गैर वंशवादी युवा चेहरों को आगे बढ़ाना होगा। सबसे महत्वपूर्ण, कांग्रेस को अपनी वैचारिक पहचान साफ करनी होगी। फिलहाल उसका संदेश कभी इधर, कभी उधर झूलते पुराने रेडियो जैसा लगता है।

भाजपा ने हिंदू पहचान और कल्याणकारी राष्ट्रवाद को एक साथ जोड़ दिया है। कांग्रेस उसके मुकाबले कोई भावनात्मक और विश्वसनीय कथा खड़ी नहीं कर पाई। केवल सेक्युलरिज्म अब चुनावी जादू नहीं पैदा करता। केवल कल्याणकारी वादे भी काफी नहीं। आज का मतदाता पहचान, राष्ट्रवाद, विकास और आकांक्षा सब कुछ एक ही पैकेज में चाहता है।

तीसरा रास्ता सबसे खतरनाक है : आंतरिक टूट और बिखराव। इतिहास इसके संकेत पहले ही दे चुका है। तृणमूल कांग्रेस और एनसीपी जैसी पार्टियां कांग्रेस से टूटकर निकलीं। राज्यों में कई नेताओं को लगता है कि दिल्ली का हाईकमान उनकी राजनीतिक सांसें रोक रहा है। जब योग्यता से ज्यादा वफादारी मायने रखने लगे, तो असंतोष धीरे-धीरे विस्फोट बन जाता है।

अगर हार का सिलसिला जारी रहा, तो और नेता भाजपा या क्षेत्रीय दलों की ओर जा सकते हैं। राजनीति डूबते जहाज पर ज्यादा देर खड़े रहने का खेल नहीं है। कार्यकर्ता सत्ता की तरफ भागते हैं। नेता अवसर की तरफ। विचारधारा अक्सर बाद में प्रेस कॉन्फ्रेंस में आती है।

चौथा रास्ता है लंबी मगर फीकी राजनीतिक जिंदगी। इस स्थिति में कांग्रेस खत्म नहीं होगी, मगर दोबारा शिखर पर भी नहीं पहुंचेगी। वह विपक्षी गठबंधनों की धुरी बनी रहेगी। संसद में इतनी सीटें लाती रहेगी कि उसकी उपयोगिता बनी रहे। कुछ राज्यों में सरकारें भी बना सकती है। कभी-कभी गठबंधन राजनीति में किंगमेकर भी बन सकती है। शायद यही सबसे यथार्थवादी संभावना है। लेकिन केवल जीवित रहना किसी राजनीतिक आंदोलन को प्रेरित नहीं करता।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं: "आज कांग्रेस उस पुराने थिएटर समूह जैसी लगती है, जो अब भी पुराने नाटक खेल रहा है, जबकि दर्शक डिजिटल मंचों पर जा चुके हैं। युवा मतदाता कांग्रेस को उसके वर्तमान कामों से कम, सोशल मीडिया के मजाक, पुराने घोटालों और वंशवाद की बहसों से ज्यादा पहचानते हैं। यह बेहद खतरनाक संकेत है।"

फिर भी कांग्रेस को पूरी तरह खत्म मान लेना जल्दबाजी होगी। भारतीय राजनीति में कई बार मृत घोषित खिलाड़ी वापसी कर चुके हैं। लेकिन वापसी विरासत के सहारे नहीं होती। वापसी भूख, अनुशासन, विनम्रता और पुनर्निर्माण से होती है, दक्षिण भारत की राजनीति के विश्लेषक वेंकट सुब्रमनियन ने कहा।

आखिरकार कांग्रेस की सबसे बड़ी लड़ाई चुनावी नहीं, मानसिक है। क्या पार्टी अब भी खुद को भारत का नेतृत्व करने योग्य मानती है? या उसने भीतर ही भीतर स्थायी विपक्ष बनने को स्वीकार कर लिया है?

सच में, जिस राजनीतिक दल के भीतर विश्वास ही खत्म हो जाए, वह बिना हवा की पतंग बन जाता है। कुछ देर आसमान में जरूर दिखता है, मगर अंत में गुरुत्वाकर्षण ही जीतता है।

Friday, May 22, 2026

 डिग्रियों का ढेर, ज्ञान का अकाल: भारत के क्लासरूम में आखिर हो क्या रहा है?

रिपोर्ट कार्ड चमक रहे हैं, शिक्षा दम तोड़ रही है

जब शिक्षक ही तैयार नहीं, तो बच्चे क्या सीखेंगे?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

24 मई 2026

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एक पुराना किस्सा आज भी भारतीय शिक्षा व्यवस्था का आईना लगता है।

स्कूल इंस्पेक्टर अचानक क्लास में पहुंचा। मास्टरजी बच्चों को स्पेलिंग पढ़ा रहे थे :  “Girl बोलो… ग्रिल्ड।” इंस्पेक्टर भड़क गया, “ये क्या पढ़ा रहे हो?”

मास्टरजी ने भी तल्ख़ी से जवाब दिया, “तीन महीने से तनख्वाह नहीं मिली। जब तक वेतन नहीं मिलेगा, गर्ल को ग्रिल्ड ही पढ़ाऊंगा।”

यह सिर्फ मज़ाक नहीं। यह उस टूटती हुई व्यवस्था की कहानी है, जहां शिक्षक भी हताश है और छात्र भी भटक रहा है।

एक अंग्रेज़ी शिक्षक खुद ढंग से अंग्रेज़ी नहीं बोल पाता, लेकिन बच्चों को ग्रामर पढ़ा रहा है।

मई की तपती दोपहर में साठ बच्चों की क्लास में पंखा बंद पड़ा है। बच्चे कॉपियों से हवा कर रहे हैं।

बी.एड. में टॉप करने वाला नया शिक्षक पहली ही क्लास में शोर मचाते बच्चों के सामने घबरा जाता है।

मां-बाप शादी में गुरुजनों के पैर छूते हैं, लेकिन स्कूल में टीचर की सैलरी पर ऐसे मोलभाव करते हैं जैसे सब्ज़ी खरीद रहे हों।

यही है आज की भारतीय शिक्षा व्यवस्था का कड़वा विरोधाभास।

जिस देश में सरस्वती की पूजा होती है, वहीं शिक्षक धीरे-धीरे हाशिये पर धकेला जा रहा है।

डिग्रियां बढ़ रही हैं। कोचिंग सेंटर हर गली में उग रहे हैं। चमचमाते स्कूलों के विज्ञापन आसमान छू रहे हैं। लेकिन असली शिक्षा जेठ की धूप में सूखते तालाब की तरह सिकुड़ती जा रही है।

कभी भारत में शिक्षक सिर्फ नौकरीपेशा कर्मचारी नहीं था। गांव का “मास्टरजी” समाज का नैतिक स्तंभ माना जाता था। बच्चे उनसे डरते भी थे और सम्मान भी करते थे। मां-बाप अपने बच्चों की पढ़ाई ही नहीं, संस्कार भी शिक्षक के भरोसे छोड़ देते थे।

आज वह सम्मान चॉक की धूल की तरह हवा में उड़ रहा है।

भारत एक गहरे शैक्षणिक संकट से गुजर रहा है। कमजोर शिक्षक प्रशिक्षण, रटंत शिक्षा, गिरता स्तर, घटती सामाजिक प्रतिष्ठा और प्रेरणाहीन कक्षाओं ने शिक्षण पेशे को भीतर से खोखला कर दिया है। यह अब सिर्फ शिक्षा विभाग की समस्या नहीं रही। यह देश के भविष्य का संकट बन चुकी है।

सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि देश में लाखों शिक्षक भारी-भरकम डिग्रियां लेकर घूम रहे हैं : बी.एड., एम.एड., डिप्लोमा, सर्टिफिकेट , लेकिन उनमें से कई के पास न विषय की गहराई है, न पढ़ाने की कला, न आत्मविश्वास, न संवाद क्षमता।

डिग्रियां दीवार पर टंगी रहती हैं, लेकिन क्लासरूम में शिक्षक असहाय दिखता है।

सिर्फ डिग्री हासिल कर लेना किसी को अच्छा शिक्षक नहीं बना देता। मगर हमारी व्यवस्था इसी भ्रम में जी रही है।

सरकारी स्कूलों की हालत कई जगह बेहद चिंताजनक है। अंग्रेज़ी पढ़ाने वाले कई शिक्षक खुद धाराप्रवाह अंग्रेज़ी नहीं बोल पाते। उच्चारण कमजोर है। शब्दावली सीमित है। साहित्य पढ़ने की आदत लगभग खत्म हो चुकी है।

बच्चे तोते की तरह उत्तर रट लेते हैं, लेकिन सामान्य सवालों पर चुप हो जाते हैं।

उत्तर प्रदेश के एक ग्रामीण स्कूल का निरीक्षण करने गए एक रिटायर्ड अफसर ने बताया कि वहां का अंग्रेज़ी शिक्षक खुद सामान्य बातचीत तक नहीं कर पा रहा था। बच्चे पूरे पैराग्राफ याद करके सुना रहे थे, लेकिन अपने दम पर दो वाक्य नहीं बना पा रहे थे।

यह शिक्षा नहीं। यह रटी हुई नकल का कारखाना है।

समस्या सिर्फ सरकारी स्कूलों तक सीमित नहीं। बड़े-बड़े “इंटरनेशनल” और “स्मार्ट” स्कूल भी कई बार चमकदार पैकेजिंग भर साबित होते हैं। वहां कम वेतन पाने वाले, अनुभवहीन और असुरक्षित शिक्षक काम कर रहे हैं। कई शिक्षकों की तनख्वाह मॉल कर्मचारियों या डिलीवरी बॉय से भी कम है।

जिस पेशे में सम्मान और आर्थिक सुरक्षा दोनों न हों, वहां प्रतिभाशाली लोग क्यों आएंगे?

कभी शिक्षक बनना गर्व की बात थी। आज कई लोग मजबूरी में इस पेशे में आते हैं, क्योंकि दूसरी नौकरी नहीं मिली।

सबसे गहरी बीमारी हमारी शिक्षण पद्धति में है।

भारतीय शिक्षा व्यवस्था में आज भी जिज्ञासा को अनुशासनहीनता समझ लिया जाता है। रचनात्मकता परीक्षा के ढांचे में फिट नहीं बैठती।

शिक्षक बोलता रहता है। छात्र कॉपी करते रहते हैं। परीक्षा याददाश्त को मापती है, समझ को नहीं।

नतीजा यह है कि बच्चे डिग्रियां तो ले आते हैं, लेकिन आत्मविश्वास, संवाद क्षमता और स्वतंत्र सोच विकसित नहीं हो पाती। कई पढ़े-लिखे युवा ठीक से ईमेल नहीं लिख पाते, इंटरव्यू में बात नहीं कर पाते और व्यावहारिक समस्याओं का हल नहीं ढूंढ पाते।

त्रासदी की शुरुआत तो शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों से ही हो जाती है।

बी.एड. कॉलेजों में आज भी फाइलें भरने और सैद्धांतिक बातें रटाने पर ज़ोर है। वास्तविक क्लासरूम की चुनौतियों पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है।

दिल्ली की एक प्रशिक्षु शिक्षिका ने कहा, “बी.एड. ने मुझे लेसन प्लान बनाना सिखाया, लेकिन कमजोर बच्चे को पढ़ाना या शोरगुल वाली क्लास संभालना नहीं सिखाया।”

यही एक वाक्य पूरे संकट की तस्वीर पेश कर देता है।

इंटर्नशिप कई जगह सिर्फ औपचारिकता बन चुकी है। अनुभवी शिक्षकों से मार्गदर्शन कमजोर है। नए शिक्षक बिना तैयारी के क्लास में पहुंच जाते हैं।

उधर स्कूलों का बुनियादी ढांचा भी हालात बिगाड़ रहा है। भीड़भाड़ वाली कक्षाएं। टूटी बेंचें। खाली लाइब्रेरियां। इंटरनेट की कमी। शिक्षकों की भारी कमी। एक ही शिक्षक कई क्लासें संभाल रहा है।

ऐसे माहौल में व्यक्तिगत शिक्षा संभव ही नहीं।

सामाजिक बदलावों ने भी स्थिति को उलझाया है।

पश्चिमी सोच की नकल करते हुए हमने कई जगह शिक्षक और छात्र के रिश्ते में अनुशासन का महत्व ही कम कर दिया। “टीचर सिर्फ दोस्त हो” वाली सोच ने सम्मान और जवाबदेही दोनों को कमजोर किया है।

कई शिक्षक निजी बातचीत में मानते हैं कि आज छात्रों में शिक्षकों और यहां तक कि माता-पिता के प्रति भी सम्मान घटता जा रहा है। मोबाइल की लत, घटती पढ़ने की आदत और सिकुड़ती ध्यान क्षमता ने समस्या और बढ़ा दी है।

गांव का वह सख्त लेकिन समर्पित “मास्टरजी” अब धीरे-धीरे सार्वजनिक जीवन से गायब हो रहा है।

और जब शिक्षक का अधिकार कमजोर पड़ता है, तो क्लासरूम दिशा खो देता है।

समाधान मुश्किल नहीं, लेकिन राजनीतिक भाषणों से नहीं आएंगे।

शिक्षक प्रशिक्षण को फाइलों और औपचारिक भाषणों से निकालकर वास्तविक क्लासरूम से जोड़ना होगा। लंबी इंटर्नशिप, अनुभवी शिक्षकों की मेंटरशिप, नियमित प्रशिक्षण और व्यावहारिक अभ्यास जरूरी हैं।

भर्ती में सिर्फ परीक्षा अंक नहीं, बल्कि संवाद क्षमता, विषय ज्ञान, भावनात्मक समझ और पढ़ाने की प्रतिभा को महत्व देना होगा।

शिक्षकों को बेहतर वेतन, सामाजिक सम्मान और स्पष्ट करियर रास्ते देने होंगे। स्कूलों में लाइब्रेरी, डिजिटल सुविधाएं और बेहतर शिक्षण संसाधन उपलब्ध कराने होंगे।

सबसे जरूरी बात यह है कि भारत को शिक्षा को सिर्फ आंकड़ों और योजनाओं का खेल समझना बंद करना होगा। शिक्षा आखिरकार इंसानों द्वारा इंसानों को गढ़ने की प्रक्रिया है।

कोई भी देश अपने शिक्षकों की गुणवत्ता से ऊपर नहीं उठ सकता।

अगर भारत ने अपने शिक्षक, अपनी शिक्षण पद्धति और अपने क्लासरूम को बचाने की गंभीर कोशिश नहीं की, तो “शिक्षा महाशक्ति” बनने का सपना सरकारी फाइलों और भाषणों तक ही सीमित रह जाएगा, जबकि देश की असली कक्षाएं चुपचाप टूटती रहेंगी।

 चौंकाने वाला सच!!!

भारत के असली निर्माता चमचमाते एलीट स्कूल नहीं, साधारण स्कूल हैं

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बृज खंडेलवाल द्वारा

23 मई 2026

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आगरा में ही आधा दर्जन एलीट एक्सक्लूसिव स्कूल्स खुल चुके हैं जहां का खर्चा मां बाप से पूछिए

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आख़िर इंसान को कामयाब क्या बनाता है?

एयर कंडीशन्ड स्मार्ट क्लासरूम, विदेशी सिलेबस और चमकदार कैंपस?

या फिर संघर्ष, मेहनत, भूख और आगे बढ़ने का जुनून?

आज भारत में एक अजीब मानसिकता घर कर गई है। महंगे, हाई प्रोफाइल और “इंटरनेशनल” स्कूलों को सफलता की गारंटी माना जाने लगा है। लाखों रुपये फीस। अंग्रेज़ी लहजे पर गर्व। स्कूल कम, फाइव स्टार होटल ज़्यादा लगते हैं। माता-पिता भी अक्सर स्कूल नहीं, “स्टेटस सिंबल” खरीदते दिखाई देते हैं।

लेकिन भारत का इतिहास कुछ और कहानी सुनाता है।

आज़ाद भारत के असली निर्माता : प्रधानमंत्री, वैज्ञानिक, सैनिक, डॉक्टर, अफसर, उद्योगपति और खिलाड़ी , ज़्यादातर साधारण सरकारी स्कूलों, केन्द्रीय विद्यालयों, नगर निगम स्कूलों और सामान्य प्राइवेट स्कूलों से निकले हैं। देश की रीढ़ एलीट बोर्डिंग स्कूलों ने नहीं, आम स्कूलों ने तैयार की है।

गुजरात के वडनगर में एक साधारण स्कूल में पढ़ने वाला एक लड़का आगे चलकर भारत का प्रधानमंत्री बना। उसका नाम था नरेंद्र मोदी। न कोई स्मार्ट क्लास। न आलीशान कैंपस। न विदेशी सिलेबस।

ऐसी कहानियां पूरे भारत में बिखरी पड़ी हैं।

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने तमिलनाडु के साधारण स्कूल में पढ़ाई की। लाल बहादुर शास्त्री सामान्य स्कूलों से निकलकर देश के प्रधानमंत्री बने। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और रामनाथ कोविंद भी सरकारी और स्थानीय शिक्षा व्यवस्था से आगे बढ़े।

इन लोगों को विरासत में सुविधाएं नहीं मिलीं। इन्होंने भारत को करीब से देखा। गरीबी देखी। संघर्ष देखा। असमानता देखी। इन्हीं अनुभवों ने इन्हें मजबूत बनाया। इन्हें जमीन से जोड़े रखा।

बड़े एलीट स्कूलों से पढ़े लोग भी सफल होते हैं। उनमें आत्मविश्वास, नेटवर्क और एक्सपोजर होता है। लेकिन जब देश निर्माण की बात आती है, तब तस्वीर बदल जाती है।

कारोबारी दुनिया को ही देख लीजिए।

धीरूभाई अंबानी ने गुजरात के एक साधारण स्कूल से पढ़ाई की और फिर रिलायंस जैसा साम्राज्य खड़ा किया। इन्फोसिस के नारायण मूर्ति सरकारी स्कूलों में पढ़े। गौतम अडानी, शिव नाडर और सुनील मित्तल भी किसी शाही बोर्डिंग स्कूल की पैदाइश नहीं थे।

इन लोगों ने संघर्ष से सीख हासिल की। अभाव ने इन्हें जुगाड़, धैर्य और जोखिम उठाना सिखाया। यही असली बिजनेस स्कूल था।

भारतीय सेना की कहानी भी यही कहती है।

कारगिल के हीरो कैप्टन विक्रम बत्रा साधारण स्कूलों में पढ़े। फील्ड मार्शल करियप्पा सामान्य शिक्षा पृष्ठभूमि से आए। आज भी भारत की सीमाओं पर खड़े हजारों सैनिक और अफसर सरकारी स्कूलों, सैनिक स्कूलों और केन्द्रीय विद्यालयों से निकलते हैं।

जंग के मैदान में गोली यह नहीं पूछती कि सैनिक किस “इंटरनेशनल स्कूल” से पढ़ा है।

सेना में साहस, अनुशासन और प्रदर्शन मायने रखता है।

UPSC की परीक्षा तो इस मिथक को पूरी तरह तोड़ देती है।

हर साल IAS, IPS और IFS के टॉपर छोटे शहरों, गांवों, केन्द्रीय विद्यालयों, नवोदय विद्यालयों और सामान्य स्कूलों से निकलते हैं। कई हिंदी माध्यम से पढ़े होते हैं। कई बेहद साधारण परिवारों से आते हैं।

उनकी सफलता साबित करती है कि भारत में अब भी मेहनत, लगन और अनुशासन स्कूल के ब्रांड नाम से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।

डॉक्टरों और वैज्ञानिकों की दुनिया में भी यही तस्वीर दिखती है।

AIIMS के कई डॉक्टर, वैज्ञानिक और सर्जन साधारण स्कूलों से आए हैं। NEET के टॉपर भी अक्सर सरकारी या सामान्य स्कूलों से निकलते हैं। उनकी सफलता महंगे कैंपस नहीं, घंटों की पढ़ाई और अथक मेहनत से बनती है।

खेल जगत को देखिए।

सचिन तेंदुलकर शारदाश्रम विद्यालय से पढ़े। महेंद्र सिंह धोनी जवाहर विद्या मंदिर से निकले। पी.टी. ऊषा ने सरकारी स्कूल में पढ़ाई की। इनकी प्रतिभा एयर कंडीशनर में नहीं, संघर्ष में निखरी।

फिर भी समाज महंगे स्कूलों का इतना दीवाना क्यों है?

क्योंकि हमारे भीतर अब भी औपनिवेशिक मानसिकता जिंदा है। अंग्रेज़ी बोलने, चमकदार यूनिफॉर्म पहनने और महंगे स्कूल में पढ़ने को लोग श्रेष्ठता समझते हैं।

आज स्कूल शिक्षा का मंदिर कम, सामाजिक दिखावे का मंच ज्यादा बन गए हैं।

लेकिन शिक्षा फैशन शो नहीं है।

बच्चे की सफलता इस बात पर ज्यादा निर्भर करती है कि उसमें अनुशासन कितना है, मेहनत कितनी है, जिज्ञासा कितनी है, और परिवार व शिक्षक उसे कितनी सही दिशा देते हैं।

साधारण स्कूल एक और बड़ी चीज़ सिखाते हैं , जीवन से लड़ना।

वहां पढ़ने वाले बच्चे अक्सर बिजली कटौती में पढ़ते हैं। भीड़भाड़ वाली बसों में सफर करते हैं। किताबें बांटकर पढ़ते हैं। सीमित संसाधनों में सपने देखते हैं। यही संघर्ष उन्हें मानसिक रूप से मजबूत बनाता है।

यही कारण है कि मुख्यधारा के स्कूल भारत की असली ताकत हैं।

वे करोड़ों बच्चों को सपने देखने का अधिकार देते हैं। वे पहली पीढ़ी के अफसर, इंजीनियर, डॉक्टर और उद्यमी पैदा करते हैं। वे अवसरों की सीढ़ी को खुला रखते हैं।

भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था भी बराबरी का मौका देती है। IIT, AIIMS, NDA और UPSC जैसी परीक्षाएं गांव के बच्चे को भी राष्ट्रीय स्तर पर मुकाबला करने का अवसर देती हैं।

यही भारत की असली खूबसूरती है।

इसका मतलब यह नहीं कि सरकारी स्कूलों में समस्याएं नहीं हैं। वहां शिक्षक की कमी है। बुनियादी सुविधाओं की दिक्कत है। पुरानी पढ़ाई पद्धति है। इन कमियों को दूर करना बेहद जरूरी है।

लेकिन समाधान यह नहीं कि सिर्फ कुछ चमकदार एलीट स्कूल बना दिए जाएं।

समाधान यह है कि हर बच्चे को अच्छी शिक्षा मिले।

जब ओडिशा के किसी गांव का स्कूल अगला कलाम पैदा करता है, जब हिमाचल का साधारण स्कूल अगला विक्रम बत्रा देता है, तब भारत जीतता है।

आधुनिक भारत की कहानी एलीट स्कूलों की नहीं, साधारण स्कूलों की कहानी है।

यहीं भारत की असली प्रतिभा तैयार होती है।

यहीं से देश के असली निर्माता निकलते हैं।

Wednesday, May 20, 2026

 


यमुना नदी में सीवेज, मलबा, इंडस्ट्रियल वेस्ट और लाशें बह रही हैं, और सरकारी तंत्र मूक दर्शक बना खड़ा है

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बृज खंडेलवाल द्वारा

21 मई 2026

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यमुना छठ पर विशेष रिपोर्ट

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12 मई 2026 की शाम आगरा के एक घाट पर जो हुआ, वह कोई संयोग या महज़ दुर्भाग्य नहीं था। जन्मदिन मनाने आए छह युवा यमुना में उतरे। दो घंटे तक उन्हें बचाने की कोशिशें चलती रहीं, लेकिन अंततः चार बच्चों के शव बाहर निकाले गए। आए दिन ये दुर्घटनाएं हो रही हैं। पुलिस ने घाटों पर होर्डिंग्स लगाए हैं, सावधान किया है, पर लोग हैं कि मानते नहीं। वाकई, परिवारों का दुख शब्दों से परे है। वही यमुना, जिसके किनारे हमारी आस्था, इतिहास और सभ्यता सांस लेती आई है, आज मौत की गवाह बनती जा रही है।

इस घटना से कुछ ही सप्ताह पहले वृंदावन के केशी घाट पर नाव पलटने से 15 से अधिक तीर्थयात्रियों की मौत हुई थी। नाव में क्षमता से अधिक सवारियाँ थीं। लाइफ जैकेट नहीं थीं। निगरानी लगभग नदारद थी। सवाल यह है कि आखिर हर हादसे के बाद केवल शोक और मुआवज़े की रस्म क्यों निभाई जाती है?

इन घटनाओं को केवल “दुर्घटना” कहना सच्चाई से आँख चुराना होगा। यह प्रशासनिक विफलता, सरकारी लापरवाही और टूटी हुई व्यवस्था का नतीजा है। जब नदी जहरीली हो, उसका प्राकृतिक बहाव सिकुड़ चुका हो, सुरक्षा इंतज़ाम कागज़ों में सिमट जाएँ और निगरानी तंत्र सोया रहे, तब मौतें केवल समय का इंतज़ार बन जाती हैं। अरबों रुपये खर्च होने के दावों के बावजूद ज़मीनी हालात जस के तस हैं।

यमुना की हालत किसी से छिपी नहीं। लगभग 1,376 किलोमीटर लंबी यह नदी हिमालय से निकलकर हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश से गुजरती है। लेकिन दिल्ली के बाद इसका बड़ा हिस्सा एक बहती हुई नाली में बदल जाता है। करोड़ों लीटर बिना शोधन का सीवेज प्रतिदिन नदी में गिरता है। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट या तो अधूरे हैं, या उनकी क्षमता कम है, या फिर वे ठीक से चल ही नहीं रहे। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और अन्य पर्यावरणीय रिपोर्टें बार-बार बता चुकी हैं कि नदी में बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड और फीकल कॉलिफॉर्म का स्तर सुरक्षित सीमा से कई गुना ऊपर है। कई जगह पानी नहाने लायक भी नहीं बचा।

दिल्ली का प्रदूषण मथुरा, वृंदावन और आगरा तक पहुँचता है। धार्मिक नगरी होने के कारण इन शहरों के घाटों पर हर दिन भारी भीड़ उमड़ती है, लेकिन दूसरी ओर नाले सीधे नदी में गिरते रहते हैं। आगरा में ताजमहल के पीछे बहती यमुना अक्सर झाग, काले पानी और बदबू के कारण चर्चा में रहती है। यह केवल सौंदर्य का प्रश्न नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरणीय आपदा का संकेत है।

समस्या यहीं खत्म नहीं होती। यमुना की बाढ़ पट्टी पर तेजी से अतिक्रमण हुआ है। वृंदावन और मथुरा क्षेत्र में ड्रोन सर्वेक्षणों में सैकड़ों अवैध निर्माण सामने आए। नदी का प्राकृतिक फैलाव सिकुड़ता गया। जहाँ पानी फैलकर खुद को साफ करता था, वहाँ अब कंक्रीट और अवैध कॉलोनियाँ खड़ी हैं। नतीजा साफ है : जल ठहराव बढ़ा, प्रदूषण जमा हुआ और नदी का दम घुटने लगा। दुखद यह है कि ऐसे अतिक्रमण अक्सर प्रभावशाली लोगों के संरक्षण में पनपते हैं।

तीन दशक से योजनाएँ बन रही हैं। यमुना एक्शन प्लान आया। राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के तहत परियोजनाएँ चलीं। हजारों करोड़ रुपये खर्च होने के दावे किए गए। लेकिन सवाल वही है : अगर इतना पैसा लगा, तो नदी अब भी ज़हरीली क्यों है? अधूरी पाइपलाइनें, बंद पड़े प्लांट, कमजोर निगरानी और भ्रष्ट तंत्र ने योजनाओं को कागज़ी सफलता में बदल दिया। जनता को यह जानने का अधिकार है कि पैसा कहाँ गया, किसने निगरानी की और जवाबदेही किसकी तय हुई।

घाटों पर सुरक्षा व्यवस्था भी बेहद कमजोर है। आगरा के बल्केश्वर घाट सहित कई स्थानों पर न तो पर्याप्त लाइफगार्ड हैं, न गहराई के स्पष्ट संकेत, न मजबूत बैरियर और न ही आपातकालीन बचाव तंत्र। नाव संचालन में भी भारी लापरवाही है। क्षमता से अधिक यात्रियों को बैठाना आम बात है। फिटनेस सर्टिफिकेट और लाइफ जैकेट जैसे नियम केवल औपचारिकता बन चुके हैं।

रेत खनन ने स्थिति को और खतरनाक बना दिया है। अवैध खनन से नदी तल में गहरे गड्ढे और अदृश्य भंवर बन गए हैं। ऊपर से शांत दिखने वाला पानी अचानक किसी को निगल लेता है। यह केवल पर्यावरणीय अपराध नहीं, बल्कि सीधे-सीधे मानव जीवन से खिलवाड़ है।

सबसे बड़ी विफलता विभागों के बीच तालमेल की कमी है। जल शक्ति मंत्रालय, नगर निगम, विकास प्राधिकरण, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य सरकार :  सबकी जिम्मेदारियाँ अलग-अलग बंटी हैं, लेकिन समन्वय लगभग गायब है। हर हादसे के बाद फाइलें चलती हैं, बैठकें होती हैं, बयान दिए जाते हैं, फिर सब ठंडा पड़ जाता है।

न्यायालयों और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने समय-समय पर सख्त निर्देश दिए हैं। सीवेज रोकने, अतिक्रमण हटाने और नदी संरक्षण के आदेश जारी हुए। लेकिन अधिकतर आदेश कागज़ों तक सीमित रह गए। बिना सख्त निगरानी और जवाबदेही के आदेश केवल सरकारी फाइलों की शोभा बन जाते हैं।

अब केवल भाषणों से काम नहीं चलेगा। ठोस और तत्काल कार्रवाई की जरूरत है।

सबसे पहले, नदी में गिरने वाले सभी नालों को तत्काल ट्रीटमेंट प्लांट से जोड़ा जाए और बंद पड़े प्लांट 30 दिनों के भीतर चालू किए जाएँ। घाटों पर प्रशिक्षित लाइफगार्ड, गहराई संकेतक, चेतावनी बोर्ड और आपातकालीन बचाव व्यवस्था अनिवार्य हो। नाव संचालन पर सख्ती से नियम लागू किए जाएँ और हर नाव में लाइफ जैकेट अनिवार्य हो।

वृंदावन, मथुरा और आगरा की बाढ़ पट्टी में बने अवैध निर्माणों को चिन्हित कर पारदर्शी तरीके से हटाया जाए। अवैध रेत खनन पर तत्काल रोक लगे और दोषी अधिकारियों तथा माफिया पर आपराधिक कार्रवाई हो। यमुना में न्यूनतम जल प्रवाह सुनिश्चित करने के लिए जल प्रबंधन नीतियों की समीक्षा जरूरी है। सबसे महत्वपूर्ण, हर परियोजना का सार्वजनिक ऑडिट हो और उसकी प्रगति रिपोर्ट जनता के सामने रखी जाए।

ये माँगें कठोर जरूर हैं, लेकिन हालात उससे कहीं अधिक भयावह हैं। राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना कोई बदलाव संभव नहीं। जब तक प्रशासनिक अधिकारियों और राजनीतिक नेतृत्व की व्यक्तिगत जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक योजनाएँ केवल घोषणाओं में ही जीवित रहेंगी।

यमुना केवल एक नदी नहीं है। यह ब्रज की स्मृति, संस्कृति और जनजीवन की धड़कन है। इसके किनारे पीढ़ियाँ पली हैं। अगर यह नदी मरती है, तो केवल पर्यावरण नहीं मरता : समाज, संस्कृति और भविष्य भी घायल होते हैं।

कन्हा, महक, रिया और विक्की केवल चार नाम नहीं हैं। वे हमारी सामूहिक उदासीनता की कीमत हैं। केशी घाट और आगरा के हादसे चेतावनी हैं कि अब भी अगर हमने आँखें बंद रखीं, तो आने वाले वर्षों में ऐसी त्रासदियाँ और बढ़ेंगी।

सरकार के पास अभी भी अवसर है। पारदर्शिता दिखाई जाए, जवाबदेही तय की जाए और जनता को साझेदार बनाकर यमुना को पुनर्जीवित करने की गंभीर शुरुआत की जाए। नागरिकों को भी जागना होगा। सवाल पूछने होंगे। रिपोर्ट माँगनी होगी। स्थानीय निगरानी में भाग लेना होगा।

क्योंकि जब नदियाँ मरती हैं, तब सभ्यताएँ भी धीरे-धीरे दम तोड़ने लगती हैं। यमुना को बचाना केवल एक नदी को बचाना नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति, अपनी स्मृतियों और आने वाली पीढ़ियों को बचाना है।

आज भी समय है। फैसला हमें करना है : क्या हम यमुना को किस्मत के हवाले छोड़ देंगे, या समझदारी, संवेदनशीलता और कार्रवाई से उसका भविष्य बचाएँगे?


 


यमुना नदी में, सीवेज, मलवा, इंडस्ट्रियल वेस्ट और लाशें बह रही हैं, और सरकारी तंत्र मूक,  लाचार चश्मदीद बना खड़ा है

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

21 मई 2026

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12 मई 2026 की शाम आगरा के एक घाट पर जो हुआ, वह संयोग या दुर्भाग्य नहीं था। जन्मदिन मनाने आए छह युवा नदी में उतरे; दो घंटे तक बचाने की कोशिशें चलीं, पर चार बच्चों के शव निकले। पीड़ित परिवारों का शोक अपूरणीय है। वही यमुना, जिसके किनारे हमारी इतिहास‑कथाएँ, आरतियाँ और आस्थाएँ जुड़ी हैं, आज मौत की गवाही दे रही है। इस घटना के ठीक कुछ हफ्ते पहले वृंदावन के केशी घाट पर भी एक नाव पलटी थी, जिसमें 15‑16 तीर्थयात्रियों की मौत हुई, नाव में अधिक सवारियाँ, बिना लाइफ जैकेट के संचालन और निगरानी का अभाव मुख्य कारण बताया गया।

इन हादसों को केवल दुर्घटना कहना कानूनी और नैतिक दोनों तरह से हर्ज़ है। यह प्रणालीगत विफलता और व्यापक लापरवाही का परिणाम है, न सिर्फ स्थानीय प्रशासन की, बल्कि राज्य और केंद्रीय संस्थाओं की भी। जब नदी ही जहरीली है, संरक्षण का दायरा सिकुड़ चुका है और सुरक्षा मानक सिर्फ घोषणाओं में रह गए हैं, तब मानव जीवन का जोखिम बढ़ना स्वाभाविक है। सरकारों के वादों और खर्चों के बावजूद जमीन पर स्थितियाँ नहीं बदलीं।

यमुना की मौजूदा हालत समझने के लिए कुछ ठोस तथ्य देखें। यमुना की कुल लंबाई लगभग 1,376 किलोमीटर है और यह हिमालय की पिघलती चोटियों से उठकर उत्तर प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली होते हुए पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में बहती है। एनवायरनमेंटल मॉनिटर्स और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली के पास के हिस्से में कुल प्रदूषण का बहुत बड़ा हिस्सा उत्पन्न होता है। दिल्ली से प्रतिदिन करोड़ों लीटर सीवेज का रिसाव यमुना में होता रहा है; कई ट्रीटमेंट प्लांट हैं, पर पाइपलाइन अधूरी, प्लांट की क्षमता सीमित या संचालन ठप मिलती है। सीपीसीबी और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्टों में बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड और फीकल कॉलिफॉर्म के उच्च स्तर दर्ज हैं, जो नहाने के काबिल पानी से बहुत ऊपर हैं। उदाहरण के तौर पर दिल्ली के कुछ नापों में फीकल कॉलिफॉर्म हजारों से लेकर लाखों MPN प्रति 100 मिलीलीटर पाए गए, सुरक्षित मानक से कई गुना अधिक। ये आँकड़े सार्वजनिक रिपोर्टों और सर्वे रिपोर्टों में दर्ज हैं।

प्रदूषण दिल्ली से शुरू होकर आगरा, मथुरा और वृंदावन तक पहुँचता है। मथुरा और वृंदावन में धार्मिक गतिविधियों के चलते घाटों पर जनसैलाब होता है; वहीँ बिना उपचार के नाले सीधे नदी में गिरते हैं। आगरा में ताजमहल के पास यमुना का पानी झाग और गंदगी के कारण अक्सर चर्चा में रहता है। स्थानीय नागरिक और पर्यावरणविद यह कहते रहे हैं कि किसी ऐतिहासिक धरोहर के पास बहने वाली नदी का ऐसा हाल न सिर्फ पर्यटन के लिए नुकसानदेह है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा है।

अतिक्रमण और अवैध निर्माण समस्या को और बढ़ाते हैं। ड्रोन सर्वे और अन्य भू‑अवलोकन ने वृंदावन के बाढ़ पट्टी और किनारों पर सैकड़ों अवैध निर्माण दर्शाए हैं। 2025 के कुछ सर्वे में वृंदावन के बाढ़ क्षेत्र में कई सौ अवैध संरचनाएँ सामने आईं। जब नदी का प्राकृतिक दायरा सिकुड़ता है, बहाव बाधित होता है और जल का ठहराव बढ़ता है; इससे पानी का स्वच्छता स्तर गिरता है और प्लास्टिक, सीवेज व औद्योगिक अपशिष्ट का जमाव बढ़ता है। अतिक्रमण अक्सर स्थानीय शक्तिशाली वर्गों के संरक्षण में होता है, जिससे उचित कार्रवाई नहीं हो पाती।

सरकारी योजनाएँ और खर्च भी यहाँ संदिग्धता पैदा करते हैं। 1990 के दशक से अलग‑अलग योजनाएँ चलीं: यमुना एक्शन प्लान, राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन से जुड़े कार्यक्रम और अन्य परियोजनाएँ। अरबों रुपये खर्च किए जाने का दावा है, पर कई जगहों पर ट्रीटमेंट प्लांट अधूरी पाइपलाइन, बंद इकाइयाँ या अपर्याप्त संचालन के कारण प्रभावी नहीं रहे। इस असंगति का असर साफ दिखता है: निवेश जहाँ होना चाहिए था, वहाँ परिणाम कम दिखे। इससे नागरिकों में सवाल उठते हैं, वित्त कहाँ गया, परियोजनाओं की निगरानी और ऑडिट किसने की, जवाबदेही किसकी है।

जीवित निगरानी और आपदा प्रबंधन के अभाव ने कई मौतों को आम बना दिया है। आगरा के बल्केश्वर घाट जैसी जगहों पर घाट का डिजाइन, गहराई‑मार्किंग, बेरियर, लाइफगार्ड की नियुक्ति और आकस्मिक बचाव व्यवस्था की कमी थी। वाहन या नाव संचालन की मानक गतिविधियाँ: लाइफ जैकेट का अनिवार्य इस्तेमाल, नावों का फिटनेस सर्टिफिकेट, क्षमता नियंत्रण और सीसीटीवी निगरानी: इनका अनुपालन अक्सर नहीं किया जाता। रेत खनन ने नदी तल को असमान कर दिया है; अनियंत्रित खनन से तल में गहरे गड्ढे और भंवर बन गए हैं जो सतह से अप्रकट होते हैं और तैरने वाले लोगों के लिए जानलेवा सिद्ध होते हैं। इन सबका दायरा सिर्फ तकनीकी नहीं, बल्कि प्रशासनिक और कानूनी भी है।

प्रमुख समस्या कई विभागों के बीच समन्वय की कमी है। जल शक्ति मन्त्रालय, राज्य सरकार, नगर निगम, विकास प्राधिकरण और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड: ये सभी अलग जिम्मेदारियाँ निभाते हैं, पर अंतर्निहित तालमेल की कमी से कार्य अक्सर ढीला पड़ जाता है। यमुना जैसे पारिस्थितिक तंत्र को बचाने के लिए एक संयुक्त प्रशासनिक फ्रेमवर्क चाहिए, जिसमें समयबद्ध लक्ष्यों, पारदर्शी फंडिंग और सार्वजनिक ऑडिट का स्पष्ट तंत्र हो। राजनीति में इस मुद्दे का इस्तेमाल चुनावी वादों के लिए होता है, पर चुनावों के बाद दीर्घकालिक नीतियाँ और निगरानी गायब रहती है।

न्यायालयों और पर्यावरण ट्रिब्यूनलों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल और उच्च न्यायालय ने समय‑समय पर निर्देश जारी किए हैं: सीवेज ट्रीटमेंट बढ़ाने, अतिक्रमण हटाने और नदियों की बहाल व्यवस्था के आदेश दिए गए हैं। पर समस्या यह है कि कई बार ये आदेश प्रकृति में कागजी ही रह जाते हैं; आदेशों का पालन सुनिश्चित करने के लिए नियमित निगरानी, अनुशासनात्मक कार्रवाई और समय सीमा का पालन जरूरी है। बिना कठोर पालन के नोटिस भी रिक्त घोषणाएँ बनकर रह जाते हैं।

अब समय है मांगों का, न सिर्फ नारेबाजी का। यमुना और उससे जुड़े समुदायों की सुरक्षा और नदी‑पुनरुद्धार के लिए ठोस उपाय तत्काल लागू होने चाहिए। कुछ तत्काल और व्यावहारिक कदम जो लागू होने चाहिए, वे निम्न हैं:

1. नदी किनारे के सभी नालों और सीवरेज आउटलेट को प्राथमिकता के आधार पर ट्रीटमेंट प्लांट से जोड़ा जाए और 30 दिनों के भीतर बंद प्लांट को चालू किया जाए। इसके लिये केंद्रीय और राज्य स्तर पर संयुक्त निगरानी टीम गठित की जाए और सार्वजनिक रिपोर्टिंग अनिवार्य हो।

2. घाटों पर जीवनरक्षक सुविधाएँ अनिवार्य की जाएँ: प्रशिक्षित लाइफगार्ड, स्पष्ट गहराई‑मार्किंग, दृढ़ बेरियर और रियल‑टाइम धारा चेतावनी प्रणाली। घाटों का संरचनात्मक निरीक्षण रेलवे जैसी नियमितता से किया जाए।

3. नाव संचालन पर सख्त नियम लागू हों—प्रत्यक्ष क्षमता सीमाएँ, हर नाव पर लाइफ जैकेट अनिवार्य, फिटनेस सर्टिफिकेट अनिवार्य और उल्लंघन पर लाइसेंस रद्द एवं दंडात्मक कार्रवाई। यात्रियों की संख्या पर कठोर निगरानी रखी जाए।

4. वृंदावन‑मथुरा‑आगरा के बाढ़ पट्टी में पाए गए अवैध निर्माणों की स्वतः पहचान के लिए उपग्रह और ड्रोन सर्वे नियमित रूप से हो और अनुमत समयसीमा के भीतर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई पारदर्शी ढंग से की जाए। किसी भी तरह का राजनीतिक प्रोटेक्शन स्वीकार नहीं किया जाएगा।

5. रेत खनन पर तत्काल प्रतिबंध और जो अवैध खनन पाया जाए, उसके खिलाफ कड़ी आपराधिक और आर्थिक कार्रवाई की जाए। जिन अधिकारियों की मिलीभगत पाई जाए उनकी संपत्ति जब्त करने और मुकदमा चलाने जैसी रोक‑थाम की व्यवस्था लागू हो।

6. यमुना को पारिस्थितिक दृष्टि से सुदृढ़ करने के लिये न्यूनतम निर्बाध जलप्रवाह सुनिश्चित करने के उद्देश्य से जलप्रबंधन नीतियाँ लागू की जाएं। सहायक नदियों एवं धाराओं के बहाव को बहाल करने के लिए जल आवंटन और सिंचाई नीतियों में समन्वय अत्यावश्यक है।

7. सार्वजनिक पारदर्शिता और जवाबदेही के लिये हर परियोजना का आर्थिक ऑडिट सार्वजनिक किया जाए और परियोजना के समय‑समय पर प्रगति‑रिपोर्ट नागरिक मंचों पर उपलब्ध कराई जाए। कोई भी खर्च बिना स्वतंत्र ऑडिट के स्वीकृत नहीं किया जाए।

ये मांगें कठोर हैं, पर आवश्यक भी। राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना कोई भी नीति टिकाऊ नहीं होती। जब तक प्रशासनिक अधिकारियों और राजनीतिक नेतृत्व की व्यक्तिगत जवाबदेही तय नहीं की जाती, तब तक प्रक्रियाएँ अधूरी रहेंगी। जिन्हें जनता का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुना गया है, उन्हें उन्हें मिलने वाली जवाबदेही का बोझ वहन करना होगा।

यमुना सिर्फ पानी नहीं है; यह ब्रज की स्मृति है, संस्कृति है और जन‑जीवन का स्रोत है। यह हमारे इतिहास का वह धागा है जो पीढ़ियों से जुड़ा हुआ है। अगर हम इसे न बचाएंगे तो न केवल पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ेगा, बल्कि सामाजिक और आर्थिक तबाही भी गहरी होगी। बच्चों की हँसी खत्म नहीं हो सकती; किन्तु अगर नदी को बचाने के लिए हम आज कदम नहीं उठाएंगे, तो भविष्य में और अधिक प्राण जाएंगे।

कन्हा, महक, रिया और विक्की ; ये नाम सिर्फ चार परिवारों के सदस्यों के नहीं हैं; वे हमारी उदासीनता की वह तस्वीर हैं जिसे हम अब और नकार नहीं सकते। केशी घाट और आगरा के घाट की इन घटनाओं का अर्थ केवल व्यक्तिगत दुख नहीं है; यह चेतावनी है कि शासन और समाज ने मिलकर जो जिम्मेदारियाँ ठानी थीं, उन्हें पूरा करना अब जीवन और मृत्यु का प्रश्न बन गया है।

सरकार के पास अभी भी मौका है, कदम उठाइए, पारदर्शिता दिखाइए, और जनता के साथ साझेदारी में यमुना को पुनः जीवित कीजिए। और नागरिकों को भी जागृत होना होगा: सवाल पूछिए, रिपोर्ट माँगिए, स्थानीय निगरानी में भाग लीजिए। अगर नदियाँ मरती हैं तो हमारी सभ्यता का भी दम घुटने लगता है। यमुना बचाने का अर्थ सिर्फ नदी को नहीं बचाना है; यह अपने आप को, अपनी संस्कृति को और आने वाली पीढ़ियों को बचाने का काम है।

अगर आज हम इन मांगों को गंभीरता से लागू कर दें तो और मौतों को रोका जा सकता है। अगर नहीं तो इतिहास और जनता दोनों ही उन लोगों से हिसाब सवाल करेंगे जिन्होंने जानबूझकर आंखें बंद कर रखीं। यमुना को बचाना अब किसी दल विशेष का मुद्दा नहीं रह गया; यह हर नागरिक और हर संवेदनशील संस्थान की नैतिक आवश्यकता बन गया है।

यमुना की रक्षा की लड़ाई अभी बाकी है। और यह लड़ाई जितनी ज़रूरी है, उतनी ही अविलंब भी है। हमें चुनना होगा: किस्मत के हवाले कर देना, या समझदारी और कार्रवाई से अपने भविष्य को सुरक्षित करना।

 दोहरा मापदंड: भारत पर सख़्त, चीन पर नरम क्यों है पश्चिमी मीडिया?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

21 मई 2026

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मई 2026 में जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नॉर्वे दौरे पर गए, तो एक नॉर्वेजियन पत्रकार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस खत्म होने के बाद उनसे सवाल उछाल दिया। सवाल था :  भारत प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में नॉर्वे से बहुत नीचे क्यों है?

वीडियो वायरल हो गया। पश्चिमी मीडिया ने इसे भारत में लोकतंत्र के “गिरते स्तर” की मिसाल बना दिया।

लेकिन ज़रा ठहरिए। आख़िरी बार कब किसी पश्चिमी पत्रकार ने चीन के प्रेस फ्रीडम रिकॉर्ड पर इसी तरह सार्वजनिक तमाशा खड़ा किया था?

चीन उन्हीं सूचियों में सबसे नीचे बैठा है। फिर भी उसकी आलोचना वैसी सुर्खियां नहीं बनाती जैसी भारत की बनती हैं।

यहीं से दोहरे मापदंड की कहानी शुरू होती है। पश्चिमी मीडिया भारत की कमियों को अक्सर तेज़ रोशनी में दिखाता है।

सीएए को मुसलमानों के खिलाफ़ कदम बताया गया। किसान आंदोलन को “तानाशाही प्रवृत्ति” का सबूत कहा गया। कोविड की दूसरी लहर की भयावह तस्वीरें पूरी दुनिया में दिखाई गईं। चुनावों की कवरेज में “हिंदू राष्ट्रवाद” और बहुसंख्यकवाद पर लगातार सवाल उठे।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी पूछते हैं, "इन मुद्दों पर रिपोर्टिंग होना गलत नहीं है। पत्रकारिता का काम ही सवाल पूछना है। मगर सवाल यह है कि भारत के लिए इस्तेमाल होने वाला लहजा इतना कड़ा क्यों होता है, जबकि चीन के मामले में वही तीखापन अक्सर गायब दिखता है?"

चीन पर आरोप हैं कि उसने शिनजियांग में लाखों उइगर मुसलमानों को कैंपों में रखा। यह खबरें भी छपती हैं। लेकिन चीन को लेकर पश्चिमी मीडिया में वैसा लगातार नैरेटिव नहीं बनता कि “लोकतंत्र खतरे में है” या “सिस्टम टूट रहा है।”

क्यों?

क्योंकि दुनिया ने चीन से लोकतंत्र की उम्मीद ही नहीं की।

भारत लोकतांत्रिक देश है, इसलिए उससे ऊंचे आदर्शों की उम्मीद की जाती है। और जब वह उन आदर्शों पर पूरी तरह खरा नहीं उतरता, तो आलोचना कहीं ज्यादा कठोर हो जाती है।

शब्दों की राजनीति बहुत कुछ कहती है । मीडिया सिर्फ खबरों से नहीं, शब्दों से भी धारणा बनाता है, कहते हैं वरिष्ठ पत्रकार  जोज़फ।

भारत के लिए अक्सर शब्द सुनाई देते हैं ;  “बैकस्लाइडिंग”, “मेजॉरिटेरियन”, “हिंदू नेशनलिज्म”। हिंदू-मुस्लिम तनाव की रिपोर्टिंग में कई बार वही पुरानी औपनिवेशिक सोच झलकती है कि भारत एक बंटा हुआ, भावनात्मक और अव्यवस्थित समाज है।

दूसरी तरफ चीन के लिए “स्थिरता”, “कुशल प्रशासन” और “विकास” जैसे शब्द इस्तेमाल होते हैं। उसकी सख़्त सरकारी कार्रवाइयों को कभी-कभी “मजबूत शासन” कहकर पेश किया जाता है। आर्थिक विकास की तारीफ होती है, जबकि मानवाधिकार का मुद्दा पीछे छूट जाता है।

यह सिर्फ मीडिया बायस नहीं, इतिहास की परछाईं भी है।

ब्रिटिश औपनिवेशिक दौर में भारत को अक्सर अंधविश्वासी, अव्यवस्थित और “पश्चिमी मार्गदर्शन” का मोहताज बताकर शासन को जायज़ ठहराया गया था। आज वही सोच नए और अधिक परिष्कृत रूप में कई रिपोर्टों में दिखाई देती है।

खुलापन भी बनता है वजह; एक बड़ा कारण व्यावहारिक भी है।

भारत में प्रेस अपेक्षाकृत खुला है, आजाद है। विदेशी पत्रकार यहां घूम सकते हैं, लोगों से मिल सकते हैं, विवादित मुद्दों पर रिपोर्ट कर सकते हैं। इसलिए भारत की कमियां ज्यादा बाहर आती हैं।

चीन में विदेशी मीडिया पर सख़्त नियंत्रण है। वहां रिपोर्टिंग आसान नहीं। नतीजा यह कि कम खबरें बाहर निकलती हैं।

इसका मतलब यह नहीं कि भारत बदतर है। कई बार इसका मतलब सिर्फ इतना होता है कि भारत ज्यादा खुला समाज है।

पश्चिमी देशों के चीन से बड़े कारोबारी और रणनीतिक रिश्ते हैं। यह हक़ीक़त मीडिया के माहौल को भी प्रभावित करती है, चाहे खुलकर हो या परोक्ष रूप से।

चीन पर बहुत आक्रामक आलोचना कूटनीतिक तनाव बढ़ा सकती है।

भारत पर सवाल उठाना अपेक्षाकृत आसान है, क्योंकि भारत लोकतांत्रिक साझेदार माना जाता है और वहां आलोचना की कुछ गुंजाइश मौजूद है।

यह फर्क क्यों मायने रखता है

मीडिया की छवि सिर्फ अखबार तक सीमित नहीं रहती।

यह निवेशकों, नीति निर्माताओं और आम लोगों की सोच को प्रभावित करती है। व्यापार, विदेश नीति और वैश्विक जनमत पर इसका असर पड़ता है।

1.4 अरब लोगों का देश, जो करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकाल रहा है, दुनिया की सबसे बड़ी चुनावी प्रक्रिया चला रहा है और तेजी से टेक्नोलॉजी शक्ति बन रहा है ;  उसे अगर लगातार नकारात्मक चश्मे से दिखाया जाए, तो तस्वीर अधूरी बन जाती है।

अगर पश्चिमी मीडिया अपनी सारी नैतिक नाराज़गी सिर्फ खुले लोकतंत्रों पर खर्च कर देगा, तो बंद और कठोर व्यवस्थाओं पर जवाबदेही का दबाव कम हो जाएगा।

पश्चिमी न्यूज़रूम में भारत और ग्लोबल साउथ की आवाज़ों को ज्यादा जगह मिलनी चाहिए।

भारत की तुलना सिर्फ  पश्चिमी मॉडल से नहीं, बल्कि समान सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों वाले देशों से भी होनी चाहिए।

भारत में समस्याएं हैं। प्रेस फ्रीडम, सांप्रदायिक तनाव और राजनीतिक ध्रुवीकरण पर सवाल उठने चाहिए। लेकिन वही कसौटी चीन समेत हर देश पर भी बराबरी से लागू होनी चाहिए।

फिलहाल ऐसा नहीं दिखता।

और भारत तथा चीन की कवरेज में यही फर्क पश्चिमी मीडिया के नजरिए के बारे में उतना ही बताता है, जितना इन दोनों देशों के बारे में।


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Tuesday, May 19, 2026

 ज्योतिष, विज्ञान है या कला?

सत्ता के सौदागरों का सबसे बड़ा “कॉस्मिक झांसा”

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बृज खंडेलवाल द्वारा

20 मई 2026

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तमिलनाडु के नए मुख्यमंत्री C. जोसफ विजय ने हाल ही में अपने निजी ज्योतिषी को मुख्यमंत्री कार्यालय में OSD नियुक्त कर दिया। खबर जंगल की आग की तरह फैली। कहा गया कि इसी ज्योतिषी ने वर्षों पहले “भविष्यवाणी” की थी कि विजय एक दिन सत्ता की कुर्सी तक पहुंचेंगे। कुछ ही घंटों में राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई। सहयोगी दलों ने सवाल उठाए। तर्कवाद, वैज्ञानिक सोच और संविधान की दुहाई दी जाने लगी। आखिरकार सरकार को कदम पीछे खींचना पड़ा।

लेकिन असली सवाल अब भी हवा में गूंज रहा है। क्या लोकतंत्र  ग्रहों की चाल से चलेगा? क्या करोड़ों लोगों की किस्मत शनि, राहु और मंगल तय करेंगे? या फिर यह डर, असुरक्षा और सत्ता का वही पुराना कारोबार है, जिसे हर दौर में नया रंग-रोगन लगाकर बेच दिया जाता है?

भारत में सत्ता और ज्योतिष का रिश्ता नया नहीं है। सदियों से राजा-महाराजा युद्ध से पहले राज ज्योतिषियों से सलाह लेते रहे। ज्यादातर लोग कुंडलियों को मिलकर शादियां करते हैं, फिर भी बिगड़ते रिश्तों की संख्या बढ़ रही है।  व्यापारी लंबी यात्राओं से पहले कुंडली दिखाते थे।  सुबह की चाय के साथ राशिफल पढ़ना लगभग सामाजिक आदत बन चुका है। मानो आसमान से हर दिन कोई गुप्त फरमान उतरता हो।

लेकिन चुनाव आते ही यह कारोबार अचानक रॉकेट की रफ्तार पकड़ लेता है। टीवी स्टूडियो किसी “कॉस्मिक कंट्रोल रूम” में बदल जाते हैं। हर चैनल पर कोई “सितारों का विशेषज्ञ” मौजूद रहता है। कोई शनि देखकर सरकार गिरा देता है। कोई राहु के सहारे चुनाव जिता देता है। कोई बुध की चाल से गठबंधन की उम्र बता देता है। लोकतंत्र कम, ग्रहों का रियलिटी शो ज्यादा दिखने लगता है।

राजनीतिक दल भी इस तमाशे में पीछे नहीं रहते। उम्मीदवार “शुभ मुहूर्त” देखकर नामांकन भरते हैं। रैलियों की तारीखें ग्रहों की चाल से तय होती हैं। पार्टी दफ्तरों में रत्न बेचने वाले, अंकशास्त्री और भविष्यवक्ता ऐसे घूमते हैं, जैसे लोकतंत्र नहीं, कोई तांत्रिक मेला लगा हो।

असल में चुनाव डर और बेचैनी का मौसम होते हैं। नेता सत्ता के लिए बेताब रहते हैं। टीवी चैनलों को टीआरपी चाहिए। जनता महंगाई, बेरोजगारी और तनाव से परेशान रहती है। ऐसे माहौल में  लोग तर्क नहीं, तसल्ली खोजने लगते हैं।

मीडिया की भूमिका भी कम दिलचस्प नहीं। कई चैनल सेलिब्रिटी ज्योतिषियों को वैज्ञानिकों जैसी गंभीरता से पेश करते हैं। कोई आर्थिक तबाही की भविष्यवाणी करता है। कोई राजनीतिक भूचाल की चेतावनी देता है। कोई “देश पर संकट” का ऐलान कर देता है। अगर कुछ नहीं होता, तो कोई जवाबदेही नहीं। अगले हफ्ते वही चेहरा नई चमक के साथ फिर स्क्रीन पर लौट आता है।

सबसे खतरनाक वे “कयामत वाले बाबा” हैं, जो डर बेचते हैं। वे ग्रहों के बहाने युद्ध, महामारी, बर्बादी और राष्ट्रीय संकट की बातें फैलाते हैं। डर हमेशा बिकता है। ठंडी समझदारी नहीं।

भारत की आध्यात्मिक परंपरा बेहद समृद्ध रही है। यहां दर्शन, चिंतन और आत्ममंथन की लंबी विरासत है। लेकिन टीवी पर परोसी जा रही अंधभक्ति और सनसनीखेज भविष्यवाणियों पर आंख मूंदकर भरोसा करना समाज की तार्किक सोच को कमजोर कर रहा है। लोकतंत्र को जागरूक नागरिक चाहिए, डरे हुए राशिफल भक्त नहीं।

सच यह है कि ज्योतिष हर बड़े वैज्ञानिक परीक्षण में कमजोर साबित हुआ है। दावा किया जाता है कि ग्रह-नक्षत्र इंसान के स्वभाव, रिश्तों और भविष्य को प्रभावित करते हैं। मगर आज तक कोई वैज्ञानिक यह नहीं समझा पाया कि करोड़ों किलोमीटर दूर मौजूद मंगल या शनि किसी की नौकरी, शादी या चुनावी किस्मत कैसे तय कर सकते हैं।

भौतिक विज्ञान के अनुसार ग्रहों का गुरुत्वाकर्षण असर तो होता है, लेकिन वह इतना सूक्ष्म है कि जन्म के समय पास खड़े अस्पताल के उपकरणों का प्रभाव कई बार उससे अधिक हो सकता है। फिर भी लोग विश्वास क्यों करते हैं?

क्योंकि ज्योतिष का धंधा विज्ञान से ज्यादा मनोविज्ञान पर चलता है। इंसान स्वभाव से पैटर्न खोजता है। हम अव्यवस्था में अर्थ तलाशते हैं। मुश्किल वक्त में उम्मीद और सहारा चाहते हैं। ज्योतिष वही देता है, रहस्यमयी शब्दों और चमकीली भाषा में।

राशिफल अक्सर इतने धुंधले होते हैं कि हर किसी पर फिट बैठ जाएं।

“आज कोई चुनौती आ सकती है।”

“पुराना संबंध फिर सामने आ सकता है।”

“धन के मामलों में सावधानी रखें।”

ऐसी बातें लगभग हर इंसान पर लागू हो सकती हैं। मनोविज्ञान में इसे “बार्नम इफेक्ट” कहा जाता है, जहां सामान्य बातें भी हमें अपनी निजी सच्चाई लगने लगती हैं।

1985 में वैज्ञानिक पत्रिका Nature में प्रकाशित एक चर्चित प्रयोग और बाद के कई अध्ययनों ने दिखाया कि पेशेवर ज्योतिषियों की भविष्यवाणियां अनुमान से बेहतर नहीं थीं। अलग-अलग ज्योतिषी एक ही कुंडली की अलग व्याख्या करते मिले।  कई चर्चित ज्योतिषियों की भविष्यवाणियां बार-बार गलत साबित हुईं। सही निकले कुछ तुक्कों को खूब प्रचार मिलता है, लेकिन असफल भविष्यवाणियां जल्दी भुला दी जाती हैं।

सुबह चाय के साथ राशिफल पढ़ लेना कोई गुनाह नहीं। समस्या तब शुरू होती है जब लोग जिंदगी के बड़े फैसले तर्क और जानकारी की जगह ग्रहों के भरोसे लेने लगते हैं। कोई व्यापारी निवेश टाल देता है क्योंकि “बुध वक्री” है। कोई परिवार अच्छा रिश्ता ठुकरा देता है क्योंकि कुंडली नहीं मिली। कोई मरीज इलाज छोड़ देता है क्योंकि “शनि भारी” है। कोई नेता जनता की जरूरत नहीं, ज्योतिषी की सलाह सुनने लगता है।

रात का आसमान बेहद खूबसूरत है। तारों को देखकर हैरत होती है। ग्रह कल्पना को उड़ान देते हैं। लेकिन खूबसूरती सबूत नहीं होती। रहस्य हमेशा सच नहीं होता।


Sunday, May 17, 2026

 आगरा जल त्रासदी: 21 मई 1993

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अब भी नहीं सीखे सबक: अगली जल त्रासदी से पहले क्या भारत जागेगा?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

19 मई 2026

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21 मई 1993 को आगरा की पानी की टोंटियों से मौत बह निकली थी।

घटिया, खटीक पाड़ा और मंडी सईद खान की तंग गलियों में लोगों ने रोज़ की तरह वाटर वर्क्स का पानी पिया। कुछ ही घंटों में घरों में अफरा-तफरी मच गई। बच्चों को उल्टियाँ और तेज़ बुखार होने लगा। पूरे परिवार अस्पतालों की तरफ भागे। 200 से ज़्यादा लोग बुरी तरह बीमार पड़े। दूषित पानी पीने से 21 लोगों की जान चली गई।

ग़ुस्सा बहुत था। वादे भी हुए। अफसरों ने जांच और जवाबदेही की बातें कीं। लेकिन वक्त बीतता गया और शोर खामोशी में बदल गया। किसी को सचमुच सज़ा नहीं मिली। पीड़ित परिवार आज भी जवाब तलाश रहे हैं। गीता देवी जैसी महिलाएं, जिन्होंने इस हादसे में अपना पति खोया, आज भी कहती हैं कि गंदा पानी पाइपलाइनों से बहता रहता है।

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यह त्रासदी सिर्फ गंदे पानी की नहीं थी। इसने भारत की पानी प्रबंधन, शहरों की योजना और सरकारी जवाबदेही की पुरानी लापरवाही को नंगा कर दिया। सिस्टम आगे बढ़ गया, मगर सबक पीछे छूट गया।

अब 2026 में फिर एक खतरे की घंटी बज रही है। सवाल फिर डरावनी शक्ल में सामने खड़ा है। क्या हमने कुछ बदला भी है?

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का आसमान पहले से थका हुआ दिखने लगा है। तपती गर्मी में धरती जगह-जगह फट रही है। गांवों के तालाब अब कीचड़ भरे गड्ढों जैसे लगते हैं। भैंसें सिकुड़ते पानी में चुपचाप खड़ी मक्खियां उड़ाती रहती हैं। किसान दूर आसमान को ऐसे देखते हैं जैसे कोई अधूरा वादा लौटने वाला हो।

यमुना भी अब थकी हुई लगती है। कई जगह नदी एक पतली, संघर्ष करती धारा में बदल गई है। कई इलाकों में भूजल स्तर 300 फीट से नीचे चला गया है। हैंडपंप हांफ रहे हैं। बोरवेल हर साल और गहरे खोदे जा रहे हैं।

अब मौसम विभाग की चेतावनी ने बेचैनी बढ़ा दी है।

भारतीय मौसम विभाग ने कहा है कि 2026 का दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से कम रह सकता है। अनुमान है कि बारिश औसत का लगभग 92 प्रतिशत ही होगी। मौसम वैज्ञानिक इसके पीछे प्रशांत महासागर में मजबूत होते एल नीनो प्रभाव को जिम्मेदार मान रहे हैं। यही असर भारत में मानसून को कमजोर करता है और सूखे जैसे हालात पैदा करता है।

करोड़ों भारतीयों के लिए यह सिर्फ मौसम की खबर नहीं, बल्कि आर्थिक खतरे की घंटी है।

चाय की दुकानों, अनाज मंडियों और गांव की चौपालों पर बातचीत का रंग बदल चुका है। किसान अब मुनाफे की नहीं, बचने की बात कर रहे हैं। डीजल महंगा हो रहा है। नहरें सूखी पड़ी हैं। पशुओं का चारा महंगा होता जा रहा है। गर्म हवा में बेचैनी तैर रही है।

आगरा के पास एक बुजुर्ग किसान माथे का पसीना पोंछते हुए कहता है, “अगर जुलाई सूखी निकल गई, तो हम खत्म हो जाएंगे।”

भारत आज भी बारिश पर खतरनाक हद तक निर्भर है। देश की सालाना बारिश का 70 से 80 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ चार मानसूनी महीनों में आता है। आधे से ज्यादा खेत अब भी सिंचाई नहीं, बल्कि आसमान की मेहरबानी पर टिके हैं। एक कमजोर मानसून फसल बर्बादी, महंगाई, बेरोजगारी और गांवों की बदहाली ला सकता है।

लेकिन असली खतरा सिर्फ कम बारिश नहीं, बेतरतीब बारिश है।

एक जिला डूब सकता है, दूसरा प्यासा रह सकता है। देर से आने वाला मानसून, अचानक बादल फटना या लंबे सूखे दौर, कई बार पूरे सूखे से ज्यादा नुकसान करते हैं। खेती को कमी से ज्यादा अनिश्चितता डराती है।

फिर भी भारत हर मानसून के पहले लगभग बिना तैयारी के खड़ा मिलता है।

नदियां गाद से भरी पड़ी हैं। झीलें और तालाब अतिक्रमण, कूड़े और कंक्रीट के नीचे गायब हो चुके हैं। गांवों की जीवनरेखा रहे पारंपरिक जल स्रोत दशकों से उपेक्षित पड़े हैं। वर्षा जल संचयन अब ज्यादातर भाषणों, सरकारी फाइलों और चमकदार सेमिनारों के बैनरों तक सीमित है।

विडंबना देखिए।

हर मानसून में शहर कुछ घंटों की बारिश में डूब जाते हैं। सड़कें तालाब बन जाती हैं। पानी नालों में बहाकर बर्बाद कर दिया जाता है। फिर कुछ महीनों बाद वही शहर टैंकरों के पानी पर निर्भर हो जाते हैं। कुदरत दिल खोलकर देती है, मगर बदइंतजामी सब लूट लेती है।

उत्तर भारत का भूजल संकट अब खामोश खतरे में बदल चुका है। जरूरत से ज्यादा दोहन, कमजोर रिचार्ज सिस्टम और घटती बारिश ने जमीन के नीचे इमरजेंसी पैदा कर दी है। धरती को जितनी तेजी से खाली किया जा रहा है, उतनी तेजी से वह भर नहीं पा रही।

हल कोई रहस्य नहीं हैं। और नामुमकिन भी नहीं।

नहरों, जलाशयों और नदियों की तुरंत सफाई और गाद निकासी होनी चाहिए। गांवों के तालाब बचाए और दोबारा जिंदा किए जाएं। शहरों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग अनिवार्य हो। किसानों को ड्रिप सिंचाई और सूखा सहने वाली फसलों के लिए मदद मिले। मनरेगा जैसी योजनाओं का इस्तेमाल जल संरक्षण के कामों में कहीं बेहतर तरीके से हो सकता है।

सरकारें “वॉर फुटिंग” की बातें करती हैं, मगर हजारों गांवों में बुनियादी जल ढांचा टूटा या गायब है। बड़ी घोषणाएं सुर्खियां बनती हैं, जबकि जमीन पर रिसती पाइपलाइनें, सूखे हैंडपंप और मरते तालाब ही हकीकत बयान करते हैं।

आगरा के यमुना घाटों पर अच्छी बारिश के लिए विशेष प्रार्थनाएं शुरू हो चुकी हैं। आस्था मुश्किल समय में हौसला देती है। मगर सिर्फ दुआएं भूजल नहीं भर सकतीं, नहरें नहीं सुधार सकतीं और गंदी पाइपलाइनों को साफ नहीं कर सकतीं।

विज्ञान हमें पहले ही चेतावनी दे चुका है। अनुभव भी चेता चुका है। इतिहास भी अपना सबक दे चुका है।

1993 की आगरा जल त्रासदी को भारत की जल सुरक्षा और प्रशासनिक सोच बदल देनी चाहिए थी। लेकिन वह भी सरकारी बेरुखी की धूल में दबा एक भूला हुआ अध्याय बन गई।

बादल अभी दूर हैं। मगर डर पहले ही पहुंच चुका है।

2026 की असली परीक्षा सिर्फ बारिश की नहीं होगी। यह याददाश्त, शासन और जिम्मेदारी की परीक्षा होगी। जो देश अपनी जल त्रासदियों से सबक नहीं सीखता, वह उन्हें बार-बार दोहराने के लिए मजबूर हो जाता है। और हर बार इंसानी कीमत पहले से ज्यादा भारी होती है।

 तिलचट्टा, परजीवी.......

शब्दों की मर्यादा और अदालतों की गरिमा

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मान भी लें कि कुछ गलत एलिमेंट्स मीडिया में दाखिल हो चुके हैं, और कई एक्टिविस्ट्स सूचनाधिकार का दुरुपयोग करते हैं, तो क्या समूची बिरादरी को कटघरे में खड़ा करना उचित है? वकालत में, डाक्टरी में, न्यायिक व्यवस्था में, राजनीति में, सभी जगह काली भेड़ें अमर्यादित कार्य कर रही हैं, लेकिन क्या पूरा सिस्टम दोषी है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

18 मई 2026

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अदालतों की इमारतें सिर्फ पत्थर और दीवारों से नहीं बनतीं। उनका असली आधार जनता का भरोसा होता है। इसलिए जब न्यायपालिका जैसे सर्वोच्च संवैधानिक मंचों से कठोर शब्द निकलते हैं, तो वे सिर्फ एक टिप्पणी नहीं रहते, समाज के लिए एक व्यापक संदेश बन जाते हैं। 

हाल में “तिलचट्टे” और “परजीवी” जैसे शब्दों के इस्तेमाल ने एक नई बहस को उकसाया है।

15 मई 2026 को वरिष्ठ अधिवक्ता पदनाम से जुड़ी सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने उन लोगों पर चिंता जताई, जो वैध योग्यता या पेशेवर क्षमता के बिना मीडिया, सोशल मीडिया और आरटीआई एक्टिविज्म के जरिए संस्थाओं पर लगातार हमला करते हैं। उन्होंने कुछ तत्वों के लिए “तिलचट्टे” और “परजीवी” जैसे शब्दों का प्रयोग किया। 

हालांकि, बाद में उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणी पूरे युवावर्ग या सभी एक्टिविस्टों के लिए नहीं थी, बल्कि उन लोगों के लिए थी जो गलत तरीकों से व्यवस्था का दुरुपयोग करते हैं। यह स्पष्टीकरण जरूरी था और उसका स्वागत होना चाहिए।

लेकिन इसके बावजूद एक असहज सवाल बना रहता है। क्या इतनी तीखी भाषा जरूरी थी?

भारत का युवा पहले ही भारी दबाव में जी रहा है। बेरोजगारी बढ़ रही है। प्रतियोगिता लगातार कठिन होती जा रही है। लाखों पढ़े-लिखे युवा नौकरी, अवसर और पहचान की तलाश में भटक रहे हैं। ऐसे माहौल में जब ऊंचे संवैधानिक पदों से व्यापक टिप्पणियां आती हैं, तो कई लोगों को लगता है कि उनकी निराशा और संघर्ष को समझने के बजाय उनका मजाक बनाया जा रहा है। लोकतंत्र में असहमति रखने वाला हर व्यक्ति दुश्मन नहीं होता।

यह भी उतना ही सच है कि मीडिया, सोशल मीडिया और आरटीआई का दुरुपयोग हुआ है। कुछ लोग व्यक्तिगत एजेंडा चलाते हैं। कुछ यूट्यूब चैनल सनसनी बेचते हैं। कुछ लोग आरटीआई को सूचना के अधिकार की जगह निजी बदले का हथियार बना देते हैं। अदालतों पर भी कई बार बिना तथ्यों के आरोप लगाए जाते हैं। सोशल मीडिया पर न्यायपालिका के खिलाफ फर्जी अभियान चलाए जाते हैं। यह सब चिंता का विषय है।

मीडिया ट्रायल के उदाहरण हमारे सामने हैं। जेसिका लाल हत्याकांड, आरुषि तलवार मामला और सुशांत सिंह राजपूत केस में टीवी स्टूडियो अदालत से पहले फैसले सुनाने लगे थे। चीखती बहसों और सनसनीखेज रिपोर्टिंग ने निष्पक्ष सुनवाई पर असर डाला। सुप्रीम कोर्ट खुद कई बार मीडिया को चेतावनी दे चुका है कि sub-judice मामलों में संयम जरूरी है।

इसी तरह अदालतों ने आरटीआई के दुरुपयोग पर भी चिंता जताई है। कई मामलों में अधिकारियों ने कहा कि निरर्थक और बार-बार दाखिल आरटीआई आवेदन कामकाज को प्रभावित करते हैं। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी कुछ मामलों में माना कि बदले की भावना से डाली गई आरटीआई व्यवस्था में “fear and paralysis” पैदा करती हैं। यह चिंता पूरी तरह गलत नहीं कही जा सकती।

लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं: "इसी आरटीआई कानून ने भ्रष्टाचार के कई बड़े मामलों को उजागर किया। इसी ने आम नागरिक को सवाल पूछने की ताकत दी। कई स्वतंत्र पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सत्ता के दुरुपयोग को सामने लाने का साहस दिखाया। लोकतंत्र में असहज सवाल पूछना अपराध नहीं होना चाहिए।"

समस्या यह है कि आज हर आलोचना को दुश्मनी और हर सवाल को षड्यंत्र मान लेने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। यही प्रवृत्ति संस्थाओं और जनता के बीच दूरी पैदा करती है। अदालतों की ताकत सिर्फ अवमानना की शक्ति में नहीं, बल्कि जनता के नैतिक विश्वास में होती है।

एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि अदालत की गरिमा बनाए रखने का सबसे अच्छा तरीका उसके फैसलों की गुणवत्ता और न्यायपूर्ण व्यवहार है। यह बात आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। बड़े पदों पर बैठे लोगों के शब्दों में कठोरता नहीं, संतुलन ज्यादा दिखाई देना चाहिए।

न्यायिक स्वतंत्रता लोकतंत्र की रीढ़ है और उसकी रक्षा हर हाल में होनी चाहिए। लेकिन सम्मान और रचनात्मक आलोचना एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। दोनों साथ-साथ चल सकते हैं।

एक विविध, बेचैन और तनावग्रस्त समाज में अदालतों की भूमिका सिर्फ कानून लागू करने की नहीं, भरोसा पैदा करने की भी है। इसलिए न्यायपालिका से निकले शब्द ऐसे होने चाहिए जो लोगों को जोड़ें, तोड़ें नहीं। अदालतों की असली ताकत डर पैदा करने में नहीं, बल्कि न्याय और संवेदनशीलता के साथ विश्वास कायम करने में है।

Saturday, May 16, 2026

 मोदी जी की गांधीवादी अपील, लेकिन सरकारी नीतियां गांधी-विरोधी

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

17 मई 2026

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लोकतंत्र की सड़क पर दौड़ता नया सामंतवाद

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देश बदलने का दावा था।

लेकिन सड़कों पर अब भी वही पुराना दृश्य है। आगे लाल बत्ती जैसी अकड़। पीछे सायरनों की चीख। आम आदमी ट्रैफिक में पसीना बहाता खड़ा है और नेताओं के काफिले हवा चीरते निकल जाते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पुराने राजा हाथी पर चलते थे, नए शासक एसयूवी के झुंड में चलते हैं।

यह वीआईपी संस्कृति केवल सुरक्षा का सवाल नहीं रही। यह सत्ता के प्रदर्शन का सार्वजनिक तमाशा बन चुकी है। रोड शो, फूल वर्षा, दर्जनों गाड़ियाँ, बंद सड़कें, विशेष लाउंज, अलग कतारें, सरकारी संसाधनों का खुला दुरुपयोग। लोकतंत्र के नाम पर एक नई वर्ण व्यवस्था खड़ी की जा रही है। ऊपर “विशेष नागरिक” और नीचे धक्के खाती जनता।

विडंबना देखिए। चुनावों में नेता खुद को “जनसेवक” कहते हैं। जीतते ही वे जनता से भौतिक दूरी बना लेते हैं। उनके लिए सड़कें खाली कराई जाती हैं, अस्पतालों में वार्ड रोके जाते हैं, पुलिस सुरक्षा ढाल बन जाती है। जनता टैक्स देती है, फिर उसी पैसे से पैदा हुई असुविधा झेलती है।

यह परिवर्तन नहीं है। यह एलीट सामंतवाद का नया संस्करण है। लोकतंत्र की आत्मा बराबरी में बसती है, विशेषाधिकारों में नहीं। जिस दिन सत्ता का काफिला आम आदमी के ट्रैफिक में फँसने लगेगा, शायद उसी दिन असली लोकतंत्र सड़क पर दिखाई देगा।

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महात्मा गांधी की धरती पर, जहां सादगी, आत्मनिर्भरता और संयम हमेशा से हमारी संस्कृति का हिस्सा रहा है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हालिया ऑस्टेरिटी का आह्वान ज़रूरी तो है, मगर बेहद विडंबनापूर्ण भी है। पश्चिम एशिया के संकट और बढ़ते तेल के दामों के बीच मोदी जी ने लोगों से अपील की कि वर्क-फ्रॉम-होम करें, पेट्रोल-डीज़ल बचाएं, पब्लिक ट्रांसपोर्ट और इलेक्ट्रिक गाड़ियां इस्तेमाल करें, विदेश यात्राएं और सोने की खरीदारी टालें, खाने के तेल का कम इस्तेमाल करें और लोकल चीज़ें खरीदें।

ये अपील सही है क्योंकि हमारा देश वेस्ट एशिया से आने वाले क्रूड ऑयल पर बहुत निर्भर है। लेकिन ये उपदेश खोखले लगते हैं जब हम देखते हैं कि पिछले दस साल से सरकार ने ठीक उसी हाई-कंज़म्पशन, मशीन-निर्भर और कार-केंद्रित जीवनशैली को बढ़ावा दिया है जिसके खिलाफ गांधी जी ने चेतावनी दी थी।

गांधी जी की ऑस्टेरिटी सिर्फ संकट का हल नहीं थी, बल्कि जीवन की पूरी दर्शनशैली थी। उन्होंने कहा था कि “मैं हर तरह की विनाशकारी मशीनरी का कड़ा विरोधी हूँ”। वे ऐसी मशीनें चाहते थे जो इंसान को गुलाम न बनाएँ, बल्कि मदद करें। गांधी जी शारीरिक मेहनत, गांव की आत्मनिर्भरता और प्रकृति के साथ सामंजस्य पर ज़ोर देते थे। 

लेकिन मोदी सरकार ने $3 ट्रिलियन इकॉनमी का सपना पूरा करने के चक्कर में बुलेट ट्रेन और विशाल एक्सप्रेसवे जैसे मेगा प्रोजेक्ट्स पर ज़ोर दिया। ये प्रोजेक्ट्स तेज़ रफ़्तार और अमीरों की कार मोबिलिटी को बढ़ावा देते हैं। लग्ज़री कारों की बिक्री बढ़ रही है, जबकि आम मध्यवर्गी परिवार पेट्रोल-डीज़ल और LPG के महंगे दामों से परेशान हैं। अमीर लोग विदेश घूमते रहते हैं, शादी-ब्याह धूमधाम से करते हैं, सोना खरीदते हैं – उनकी ज़िंदगी पर कोई असर नहीं। सिर्फ आम आदमी को कष्ट झेलना पड़ता है।

सबसे निंदनीय बात ये है कि इंसानी गतिशीलता (human mobility) को पूरी तरह नज़रअंदाज़ किया गया। हमारे सड़कें अब कमज़ोरों के लिए कत्लगाह बन गई हैं। हर साल 1.75 लाख से ज़्यादा लोग सड़क दुर्घटनाओं में मरते हैं, जिनमें ज़्यादातर पैदल चलने वाले, साइकिल वाले और दोपहिया वाहन चलाने वाले होते हैं। फुटपाथ या तो हैं ही नहीं या अतिक्रमण से भरे हैं। साइकिल लेन लगभग नदारद हैं। एक्सप्रेसवे स्पीड के लिए बने हैं, सुरक्षा के लिए नहीं। 

गांधी जी जो खुद पैदल चलते थे और शारीरिक श्रम को महत्व देते थे, इस कार-केंद्रित मॉडल को देखकर दुखी होते। सरकार ने गांधीवादी रास्ते से मुड़कर चमक-दमक वाली आधुनिकता को अपनाया है। अब संकट के वक्त सादगी का उपदेश दिया जा रहा है। 

ये उपदेश सिर्फ़ शब्दों तक सीमित न रहें। असली बदलाव तब आएगा जब पैदल चलने वालों और साइकिलिस्टों के लिए सुरक्षित रास्ते बनाए जाएंगे, कार मोबिलिटी की जगह इंसानी मोबिलिटी को तरजीह दी जाएगी, तेज़ी और लग्ज़री का राग अलापना कम होगा और लोकल, सादा और आत्मनिर्भर जीवनशैली को बढ़ावा मिलेगा।

इस संकट के वक्त मोदी जी के शब्द गांधी को याद दिलाते हैं, लेकिन नीतियां और इंफ्रास्ट्रक्चर कुछ और ही कहानी बयान करते हैं। अगर एक्सट्रावगैंजा (फिजूलखर्ची) से इक्विटी (न्याय) की तरफ नहीं बदला गया तो ये उपदेश सिर्फ़ दिखावा बनकर रह जाएंगे। 

भारत को गांधी के सिद्धांत को सिर्फ़ तेल के संकट में नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बनाना होगा : सादगी, संयम और सबके लिए विकास। 






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Wednesday, May 13, 2026

 क्यों डूब रहे हैं यमुना में लोग?

लापरवाही या साजिश? 

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

15 मई 2026

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गर्मियों की शाम को यमुना किनारे का माहौल बेहद आकर्षक होता है। ठंडी हवा, परिवारों की चहल-पहल, बच्चों की हँसी-खिलखिलाहट और नदी का शांत बहाव: सब कुछ मन को सुकून देता है। 

लेकिन यही यमुना अचानक अपना रौद्र रूप दिखा देती है। ऊपर से शांत दिखता पानी नीचे तेज़ धारा और खतरनाक भंवर छिपाए रखता है। 

12 मई 2026 को आगरा के एक घाट पर ठीक यही हुआ। एक परिवार जन्मदिन की खुशी मना रहा था। छह युवा नदी में नहाने उतरे। शुरू में पानी घुटनों तक था, सब हँस रहे थे, वीडियो बना रहे थे। लेकिन कुछ कदम आगे बढ़ते ही पैर फिसले, पानी गहरा हो गया और तेज़ धारा ने चार जिंदगियों को निगल लिया।

मृतकों में 22 वर्षीय कन्हा सिंह, 19 वर्षीय महक कुमारी, 17 वर्षीय रिया और मात्र 13 वर्षीय विक्की सिंह शामिल थे। दो लोग बच गए—उनमें महक और अंशु भाई-बहन थे। एक भाई अपनी बहन को डूबते देख रहा हो, यह दृश्य कल्पना से परे है। पुलिस और गोताखोरों ने दो घंटे तक रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया, लेकिन परिवार की खुशियाँ लौट नहीं सकीं।

यह कोई पहली घटना नहीं है। कुछ हफ्ते पहले अप्रैल 2026 में वृंदावन के केशी घाट के पास एक बड़ा नाव हादसा हुआ। पंजाब से आए तीर्थयात्रियों से भरी नाव (लगभग 30-37 लोग) पोंटून पुल से टकराकर पलट गई। क्षमता से ज्यादा सवारियाँ, लाइफ जैकेट्स की कमी: इन सबके चलते 15-16 लोगों की जान चली गई। कई शव घंटों बाद मिले। ऐसे हादसे आगरा, मथुरा और वृंदावन के इलाके में हर गर्मी में दोहराते रहते हैं—नहाते समय, सेल्फी लेते समय या नाव पलटने से।

क्यों बार-बार होती हैं ये त्रासदियाँ?

पहला बड़ा कारण: घाटों पर सुरक्षा की भयानक कमी। चेतावनी बोर्ड अक्सर टूटे या फीके पड़े रहते हैं। लाइफगार्ड की तैनाती न के बराबर। बैरिकेडिंग अधूरी, गहरे पानी की सही मार्किंग नहीं। पुलिस गश्त अनियमित। कई घाटों पर कोई सिस्टम नहीं जो नदी की अचानक बदलती धारा के बारे में लोगों को सचेत कर सके। बल्केश्वर घाट पर भी यही हुआ: शुरुआती उथला पानी लोगों को गुमराह कर गया।

दूसरा कारण: नदी का बदला हुआ स्वरूप। यमुना अब अपनी पुरानी प्राकृतिक अवस्था में नहीं है। अनियंत्रित रेत खनन (sand mining) ने नदी के तल को गहरा और अनियमित बना दिया है। अचानक गड्ढे बन गए हैं, कटाव बढ़ा है और रेत खिसकती रहती है। बैराजों (जैसे हथनीकुंड, वजीराबाद आदि) से अचानक पानी छोड़े जाने से धारा तेज़ हो जाती है। ऊपर शांत दिखने वाला पानी नीचे बहुत तेज़ गति से बहता है। अध्ययनों में पाया गया है कि रेत खनन नदी के flow regime को बदल देता है, जिससे localized high-velocity currents बनते हैं, जो तैराकों के लिए घातक साबित होते हैं।

तीसरा कारण: मानवीय लापरवाही।शराब पीकर नदी में उतरना, बच्चों को बिना निगरानी छोड़ देना, गहराई का अंदाज़ा न लगाना और सबसे बड़ा, सेल्फी का खतरनाक जुनून। युवा अक्सर उथले पानी से आगे बढ़ जाते हैं, बिना यह सोचे कि नीचे क्या छिपा है। नावों में भी क्षमता से ज्यादा भीड़, लाइफ जैकेट न पहनना और बोटमैन की लापरवाही आम है। केशी घाट हादसे में यही देखा गया; नाव पोंटून से टकराई क्योंकि नियंत्रण नहीं था।

चौथा कारण: विकास बनाम सुरक्षा का असंतुलन। आगरा-मथुरा-वृंदावन धार्मिक पर्यटन के बड़े केंद्र हैं। करोड़ों रुपये घाटों को सजाने, लाइटें लगाने और पर्यटकों को आकर्षित करने में खर्च हो रहे हैं। लेकिन सुरक्षा इंतजाम अभी भी भगवान भरोसे हैं। श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ रही है, पर उनकी जान-माल की सुरक्षा पर पर्याप्त ध्यान नहीं। हर हादसे के बाद “जांच होगी, सुरक्षा बढ़ेगी” जैसे बयान आते हैं, लेकिन कुछ दिनों बाद सब भूल जाता है।

क्या कहते हैं आंकड़े और वास्तविकता?

इस इलाके में हर साल गर्मियों में कई मौतें होती हैं। कुछ मामलों में अचानक पानी बढ़ने या कीचड़,  sludge में फंसने से भी हादसे हुए हैं। राष्ट्रीय स्तर पर भारत में डूबने से होने वाली मौतों में बच्चों और युवाओं का बड़ा हिस्सा होता है, और नदियों के किनारे की लापरवाही इसका प्रमुख कारण है। यमुना में प्रदूषण तो अलग मुद्दा है, लेकिन safety के लिहाज से यह “मौत का दरवाजा” बन चुकी है।

सरकारी स्तर पर तत्काल कदम जरूरी हैं:

- हर घाट पर मजबूत बैरिकेडिंग, स्पष्ट गहराई मार्किंग और रियल-टाइम धारा चेतावनी सिस्टम।

- प्रशिक्षित लाइफगार्ड और गोताखोरों की स्थायी तैनाती।

- नाव संचालन के लिए सख्त नियम: क्षमता सीमा, लाइफ जैकेट अनिवार्य, बोट फिटनेस सर्टिफिकेट और CCTV निगरानी।

- रेत खनन पर सख्त नियंत्रण और नदी तल का वैज्ञानिक अध्ययन।

लेकिन सिर्फ सरकारी कार्रवाई काफी नहीं। सामाजिक जागरूकता भी उतनी ही जरूरी है। नदी कोई पिकनिक स्पॉट नहीं है। परिवारों को बच्चों को अकेले पानी में नहीं जाने देना चाहिए। गहराई जांचे बिना न उतरें। स्थानीय चेतावनियों को नजरअंदाज न करें। नाव में हमेशा लाइफ जैकेट पहनें।

यमुना हमारी संस्कृति और आस्था का अभिन्न अंग है। भगवान कृष्ण की लीला से जुड़ी यह नदी श्रद्धा का प्रतीक है। लेकिन आस्था का मतलब आँखें बंद करके खतरे में कूदना नहीं। सावधानी भी श्रद्धा का ही हिस्सा है। जब तक हम व्यक्तिगत जिम्मेदारी और सामूहिक सतर्कता नहीं अपनाएंगे, यमुना का पानी दर्पण की जगह मौत का आईना बनता रहेगा।

ये त्रासदियाँ हमें याद दिलाती हैं कि प्रकृति के साथ खिलवाड़ और लापरवाही की कीमत इंसान को अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है। अब वक्त है कि हम सिर्फ शोक व्यक्त न करें, बल्कि ठोस बदलाव लाएँ—ताकि कोई और परिवार इस यमुना के छलावे का शिकार न बने।

Tuesday, May 12, 2026

 


आगरा: सभ्यता का शहर या अव्यवस्था का दलदल?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

14 मई 2026

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तीन सांसद, एक दर्जन विधायक, सौ पार्षद और एक मेयर बताएं, "कैसे एक ऐसा शहर, जिसने दुनिया को ताजमहल जैसा अजूबा दिया, खुद इंसानों के लिए सज़ा बनता जा रहा है?"

कैसे मुगल तहज़ीब, नफ़ासत और खूबसूरती का प्रतीक शहर आज धुएँ, शोर, ट्रैफिक जाम, टूटी सड़कों, कब्ज़ों, आवारा पशुओं और प्रशासनिक लापरवाही के नीचे दम तोड़ रहा है?

और क्या यह हमारे दौर की सबसे बड़ी विडंबना नहीं कि दुनिया भर से लोग ताजमहल देखने आते हैं, लेकिन आगरा की सड़कों पर चलना  पानीपत की युद्धभूमि पार करने जैसा अनुभव बन जाता है?

लोकल सिविल सोसाइटी लीडर्स मानते हैं कि आगरा अब केवल भीड़भाड़ वाला शहर नहीं रहा। यह धीरे धीरे एक सभ्यतागत दलदल में बदलता जा रहा है। ऐसा शहर, जहाँ विकास का मतलब केवल गाड़ियाँ बढ़ाना, फ्लाईओवर बनाना और इंसानों को किनारे करना रह गया है।

दिक्कत यह नहीं कि शहर बढ़ रहा है। हर शहर बढ़ता है। असली त्रासदी यह है कि आगरा बिना सोच, बिना योजना और बिना इंसानी संवेदनाओं के फैल रहा है।

हर सुबह लाखों लोग ऐसी सड़कों पर निकलते हैं जहाँ पैदल चलना किसी जोखिम से कम नहीं। फुटपाथ या तो हैं नहीं, या टूटे पड़े हैं, या दुकानदारों और ठेलों ने कब्ज़ा कर रखा है। जहाँ थोड़ी जगह बचती है, वहाँ मोटरसाइकिलें और कारें पार्क मिलती हैं। मजबूर होकर लोग सड़क पर चलते हैं, जहाँ बसें, ट्रक, ई रिक्शा, बाइक और तेज रफ्तार कारें हर पल उन्हें निगलने को तैयार रहती हैं।

"कमज़ोर आदमी यहाँ ट्रैफिक में नहीं चलता, बस बचने की कोशिश करता है," पद्मिनी अय्यर, एक सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा।

बुज़ुर्ग घर से निकलने से डरते हैं। बच्चे सड़क पार करना सीखने से पहले खतरा पहचानना सीख जाते हैं। महिलाओं के लिए रास्ता केवल सफर नहीं, संघर्ष बन चुका है। साइकिल चलाने वाला आदमी तो मानो शहर की नज़रों में गुनहगार हो, एक जूता फैक्ट्री वर्कर ने कहा। 

यह शहरीकरण नहीं, संगठित अव्यवस्था है।

सुप्रीम कोर्ट ने मई 2025 में साफ कहा कि बाधारहित और दिव्यांग अनुकूल फुटपाथ नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है। लेकिन आगरा जैसे शहरों में यह फैसला भी दीवार पर टंगे एक और सरकारी नारे की तरह रह गया। स्थानीय प्रशासन अब भी फुटपाथ को इंसानों की जरूरत नहीं, खाली पड़ी ज़मीन मानता है।

विडंबना देखिए। विदेशों से आने वाले पर्यटक उन शहरों से आते हैं जहाँ पैदल चलना सभ्यता की निशानी माना जाता है। आगरा में पैदल चलना जान जोखिम में डालने जैसा है। एक विदेशी पर्यटक ने कहा कि यहाँ केवल बेलगाम वाहन ही नहीं, बल्कि आवारा कुत्ते और पशु भी सड़कों को खतरनाक बनाते हैं। 

आगरा की हालत अचानक नहीं बिगड़ी। यह दशकों की गलत नीतियों और लापरवाही का नतीजा है।

जनसंख्या पचास लाख के करीब पहुँच रही है। दो मिलियन से ज्यादा वाहन सड़कों पर दौड़ रहे हैं। लेकिन सड़कें वही पुरानी, संकरी और थकी हुई हैं। ऊपर से मेट्रो निर्माण, टूटे पुल, अवैध पार्किंग, अतिक्रमण, अव्यवस्थित बाजार और बेतरतीब ट्रैफिक ने शहर को स्थायी जाम में बदल दिया है।

सिकंदरा का इलाका हर दिन घुटता है। बेलनगंज क्षेत्र के बाजारों में आधी सड़क पार्किंग निगल जाती है। हॉर्न अब आगरा की नई भाषा बन चुका है। धुआँ और धूल शहर की पहचान बनते जा रहे हैं।

सबसे दुखद बात यह है कि समाधान भी वही पुराने हैं। सड़क चौड़ी करो। फ्लाईओवर बना दो। और गाड़ियाँ आने दो। फिर अगला जाम झेलो।

असल बीमारी सोच में है। शहर अब इंसानों के लिए नहीं, वाहनों के लिए डिज़ाइन हो रहे हैं। नगर नियोजन का मकसद इंसानी गरिमा नहीं, ट्रैफिक का बहाव और ठेकेदारी बचा है।

यमुना किनारा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। ताजमहल से वाटर वर्क्स तक का इलाका दुनिया के सबसे खूबसूरत वॉकिंग कॉरिडोर में बदल सकता था। पेड़ों से घिरे रास्ते, साइकिल ट्रैक, घाट, सांस्कृतिक स्थल और नदी के मनोरम दृश्य आगरा की पहचान बन सकते थे। लेकिन वहाँ धूल, कब्ज़े, टूटे फुटपाथ और प्रशासनिक उदासीनता पसरी हुई है। ट्रांसपोर्ट कंपनीज ने हालत और खराब कर दी है।

जिस सभ्यता ने कभी नदी किनारे बेमिसाल वास्तुकला खड़ी की, वही आज एक ढंग का फुटपाथ बनाने में नाकाम रहे है।

और शायद सबसे बड़ा खतरा यही है कि लोग अब इस अव्यवस्था के आदी हो चुके हैं। ट्रैफिक जाम मौसम की तरह स्वीकार कर लिया गया है। प्रदूषण किस्मत बन चुका है। अवैध कब्ज़े सामान्य बात लगते हैं। अराजकता अब संस्कृति बनती जा रही है।

यही असली पतन है।

सिर्फ सड़कों का नहीं, सोच का पतन।

आगरा आज उस भारतीय शहरी संकट का प्रतीक बन गया है जहाँ नगर निगम, विकास प्राधिकरण, ट्रैफिक पुलिस, पर्यटन विभाग और पर्यावरण एजेंसियाँ सब मौजूद हैं, लेकिन जवाबदेही कहीं नहीं है। हर संस्था के पास थोड़ी ताकत है, मगर पूरी जिम्मेदारी किसी के पास नहीं।

फिर भी उम्मीद बाकी है।

जो नागरिक पैदल चलने वालों के अधिकार की बात कर रहे हैं, वे सही हैं। जो लोग साइकिल और फुटपाथ को प्राथमिकता देने की मांग कर रहे हैं, वे सही हैं। शहर का भविष्य और फ्लाईओवर, और कारें, और कंक्रीट नहीं बचा सकते।

एक सभ्य शहर की पहचान उसकी ऊँची इमारतें नहीं होतीं। असली पहचान यह होती है कि क्या एक बुज़ुर्ग महिला सुरक्षित सड़क पार कर सकती है। क्या एक बच्चा बिना डर साइकिल चला सकता है। क्या हवा सांस लेने लायक है। क्या सार्वजनिक जगहों पर इंसानों का हक बचा है।

आगरा कभी सुंदरता, संतुलन और तहज़ीब का प्रतीक था। आज खतरा यह है कि वह गलत विकास मॉडल, लालच, उदासीनता और अव्यवस्था का प्रतीक बनता जा रहा है।

ताजमहल आज भी खामोश खड़ा है।

लेकिन उसके आसपास का शहर चीख रहा है।

 मुद्दों के मेले ,  हम हैं अकेले !!

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

13 मई 2026

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मेला देखकर लौट रहे हम लोग,  एक अजीब चौराहे पर अटके हुए हैं।

जनता पूछ रही है, “रोजगार कहाँ है?”

सत्ता पूछ रही है, “वंदे मातरम् बोला कि नहीं?”

विपक्ष पूछ रहा है, “EVM का प्लग निकाला कि नहीं!”

और मीडिया पूछ रहा है, “आम चूसकर खाना चाहिए या काटकर?”

वाह रे तांत्रिक लोकतंत्र। जिस घर में चूल्हा ठंडा हो, वहां टीवी पर बहस गरम है।

एक तरफ बेरोजगार डिग्रियां लेकर धूप में लाइन लगा रहे हैं। दूसरी तरफ नेता माइक्रोफोन लेकर इतिहास की कब्रें खोद रहे हैं।

किसी को अस्पताल की बदहाली नहीं दिखती। पर कौन किस धर्म का है, यह सबको एक्स-रे मशीन की तरह साफ दिख जाता है।

गरीब आदमी महंगाई से पिस रहा है।

आम जरूरत की चीजों के भाव सुनकर  BP  की गोलियों की सेल बढ़ती  है। गैस सिलेंडर देखकर सांस फूलती है, अस्थमा अटैक हो रहे हैं।

लेकिन टीवी पर अर्बन ज्ञाणी द्वारा राष्ट्रवाद का ऑक्सीजन मुफ्त बांटा जा रहा है।

इसी बीच त्याग और सादगी की नदियों बहने लगी हैं।   मितव्ययिता मंत्र दिया गया है। कम खर्च करो।फिजूलखर्ची छोड़ो। सादगी अपनाओ।

पूरा देश  ये सुनकर भावुक हो गया है। कइयों ने विदेश यात्रा स्थगित कर दी हैं।  सरकारी बाबुओं ने AC की हवा में बैठकर त्याग पर सेमिनार किया। कुछ नेताओं ने पांच सितारा होटल में “सादगी सम्मेलन” रखा। किसी ने कहा, “विदेश यात्रा जरूरी है, आखिर मितव्ययिता का वैश्विक संदेश देना है।”

नई राजनीति का नया योग सूत्र है।जनता कटौती करे। सरकार प्रेरणा दे।

कहा गया, शादी समारोह सादगी से हों। वाह! यह बात उन लोगों ने कही जिनके काफिले निकलते समय ट्रैफिक खुद लोकतंत्र को सलाम करता है।

कहा गया, सरकारी खर्च कम हो।

और उसी शाम नई LED स्क्रीन पर “ऐतिहासिक उपलब्धियों” का विज्ञापन चमक उठा।

कहा गया, अनावश्यक यात्राएं बंद हों।

देश मुस्कुराया। एयरपोर्ट थोड़ा घबराया। त्याग का ऐसा अलौकिक वातावरण बना कि मध्यम वर्ग ने चाय में चीनी आधी कर दी। गरीब ने दाल में पानी बढ़ा दिया। और अमीर ने ट्वीट कर दिया, “Nation First.”

व्यवस्था तंत्र के पास मुद्दों की पूरी जादुई पोटली है। जनता फिर पांच किलो मुफ्त राशन और पंद्रह सेकंड के गुस्से में सब भूल जाती है।

उधर विपक्ष भी कम कलाकार नहीं।

देश जल रहा हो, पर उनकी प्राथमिकता EVM का पोस्टमार्टम है।

हार गए तो मशीन चोर। कुछ नहीं तो इनको हटाओ, उनको हटाओ। जीत गए तो लोकतंत्र जिंदाबाद। हार गए तो लोगों  को डेमोक्रेसी खतरे में दिखती है।

इस बीच पूरा देश एक दूसरे की गिनती करने में लगा है। जाति जनगणना से अगले कुंभ तक गरीबी भाग जाएगी।

विपक्ष कहता है इतने खतरे तो पुराने जमाने में डाकुओं से भरे जंगल में भी नहीं थे।

और मीडिया! अरे मीडिया तो इस महान लोकतांत्रिक सर्कस का रिंग मास्टर है। देश में किसान आत्महत्या करे, नदी सूख जाए, बच्चे कुपोषण से मर जाएं, कोई फर्क नहीं। ज्योतिषियों की चांदी कट रही है, सब कुछ सितारों के हवाले। हम क्या साथ लाए थे, क्या ले जाएंगे!

वर्ल्ड बेस्ट टीवी एंकर्स भारत में हैं, उनके रहते सरकारी प्रवक्ताओं की कोई जरूरत ही नहीं। अगर किसी ने कहा कि आम काटकर खाना चाहिए या चूसकर, तो तीन घंटे की “राष्ट्रव्यापी बहस” तय है।

“सीमा हैदर का छठा बच्चा।”

“ जेल में बेटी हुई।”

“फिल्म स्टार ने किस रंग की चप्पल या चड्डी पहनी?”

ब्रेकिंग न्यूज ऐसे दौड़ती है जैसे रॉकेट चांद पर नहीं, पाताल में उतर चुका हो।

पत्रकारिता अब सवाल नहीं पूछती।

TRP की भिक्षा मांगती है।

एंकर ऐसे चिल्लाते हैं जैसे देश की सारी समस्याएं डेसिबल से हल होंगी।

स्क्रीन पर आठ खिड़कियां खुलती हैं।

आठ लोग एक साथ चीखते हैं।

और दर्शक सोचता है, शायद यही लोकतंत्र का नया राष्ट्रीय गीत है।

शिक्षा?

उसकी हालत उस रिश्तेदार जैसी हो गई है जिसे शादी में कोई पूछता नहीं।

स्वास्थ्य व्यवस्था ICU में पड़ी है।

रोजगार फाइलों में लटका है।

गरीबी आंकड़ों में छिपी बैठी है।

लेकिन चुनाव आते ही सबको मंदिर, मस्जिद, भाषा, लोकल अस्मिता, पाकिस्तान और जाति याद आ जाती है।

मानो देश नहीं, कोई अनंतकालीन टीवी सीरियल चल रहा हो।

सब अपना अपना धंधा चमका रहे हैं।

जनता सिर्फ ताली बजाने वाली ऑडियंस है।

देश के असली मुद्दे फुटपाथ पर बैठे हैं।

और नकली मुद्दे लाल बत्ती वाली गाड़ियों में घूम रहे हैं।

कभी कभी लगता है भारत समस्याओं से नहीं, “प्रायोजित बहसों” से चल रहा है।

फिर भी उम्मीद जिंदा है।

क्योंकि इस देश का आम आदमी बहुत सहनशील है।

वह हर पांच साल बाद फिर लाइन में खड़ा हो जाता है।

उसे लगता है, शायद इस बार कोई रोटी, रोजगार और राहत की बात करेगा।

लेकिन सिस्टम को पक्ष, विपक्ष के बाजीगर ही चलते हैं। टोपी से कभी धर्म निकालता है। कभी डर। कभी दुश्मन। कभी मितव्ययिता का नया मंत्र। और जनता? वह फिर ताली बजाती है। क्योंकि असली मुद्दों की आवाज अब शोर में दब चुकी है

Sunday, May 10, 2026

 फर्क है पश्चिम बंगाल और तमिल नाडु में सत्ता परिवर्तन में। एक में हिंदुत्व बदलाव का जरिया बना। दूसरे में  नई राजनैतिक दिशा को पंख लगे। आजाद भारत में एक ऐतिहासिक दिशा परिवर्तन जिससे लोकतंत्र और मजबूत हुआ है।

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क्यों और कैसे एक एक्टर से नेता बने विजय ने मचाया सियासी तूफान 

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

12 मई 2026

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एक फिल्म स्टार ने तमिलनाडु की राजनीति का खेल ही बदल दिया

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साठ के दशक में कामराज को मात देने वाले अन्ना दुरई से लेकर टीवीके के नायक विजय तक, तमिलनाडु की राजनीति हमेशा से फिल्मों जैसी रही है। बड़े बड़े कटआउट। जोशीले नारे। भावुक भाषण। हीरो की पूजा। 

लेकिन इस बार  विजय का उभार कुछ अलग ही कहानी बन गया है। दो साल पहले तक वह सिर्फ सुपरस्टार अभिनेता थे। फिर अचानक राजनीति में आए और देखते ही देखते मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गए। डीएमके और एआईएडीएमके जैसी पुरानी ताकतों का किला डोल गया।

शुरू में बहुत लोगों ने उनका मजाक उड़ाया। कहा, “एक और अभिनेता राजनीति में आ गया।” तमिलनाडु में यह नया नहीं था। पहले भी कई सितारे राजनीति में आए। कुछ बीच रास्ते गायब हो गए। कुछ जनता से जुड़ नहीं पाए। लेकिन विजय ने लोगों का मूड सही समय पर समझ लिया।

तमिलनाडु की जनता पुराने नेताओं और पुरानी राजनीति से थक चुकी थी। डीएमके पर परिवारवाद और भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे थे। एआईएडीएमके जयललिता जी के बाद कमजोर हो चुकी थी। लोगों को नया चेहरा चाहिए था। विजय ने खुद को उसी “नई उम्मीद” के रूप में पेश किया।

उनकी सबसे बड़ी ताकत उनकी भाषा और बोलने का अंदाज बना। बाकी नेताओं की तरह लंबे, भारी भरकम भाषण नहीं। छोटी, सीधी, दिल को छूने वाली बातें। ऐसा लगता था जैसे कोई आम आदमी गुस्सा और उम्मीद दोनों साथ लेकर बोल रहा हो।

उनकी एक लाइन बहुत मशहूर हुई:

 “सत्ता किसी परिवार की जागीर नहीं है। सरकार जनता की है।”

यह बात लोगों के दिल में उतर गई। तमिलनाडु में परिवारवादी राजनीति से लोग परेशान थे। विजय ने सीधे उसी नस पर हाथ रखा।

एक और भाषण में उन्होंने कहा:

 “मैं कुर्सी के लिए राजनीति में नहीं आया। मैं इसलिए आया हूं क्योंकि अब चुप रहना खतरनाक हो गया है।”

इसमें फिल्मी ड्रामा भी था और सच्चाई का एहसास भी। खासकर युवाओं को यह लाइन बहुत पसंद आई। उन्हें लगा कि विजय सिर्फ नेता बनने नहीं, कुछ बदलने आए हैं।

एक और बयान ने खूब तालियां बटोरीं:

 “जनता को नेताओं से डरना नहीं चाहिए। नेताओं को जनता से डरना चाहिए।”

सीधी बात। लेकिन असरदार। विजय खुद को जनता का आदमी दिखाना चाहते थे, ऊपर बैठा शासक नहीं।

युवाओं के लिए उनका संदेश भी बहुत असरदार रहा:

 “आपका भविष्य अगली पीढ़ी तक टाला नहीं जा सकता।”

चेन्नई के रिटायर्ड टीचर कृष्णस्वामी बताते हैं, "बेरोजगारी, महंगाई और नौकरी की चिंता में फंसे युवाओं को लगा कि कोई उनकी भाषा बोल रहा है। यही वजह रही कि पहली बार वोट डालने वाले लाखों युवा विजय के पीछे खड़े हो गए।"

उनकी सबसे बड़ी खासियत यह रही कि उन्होंने फिल्मों को पूरी तरह छोड़ दिया। यह कदम बहुत बड़ा संदेश बन गया। लोगों को लगा कि विजय राजनीति को गंभीरता से ले रहे हैं। सिर्फ टाइमपास नहीं कर रहे।

उनके पुराने फैन क्लब भी बड़ी ताकत बने। सालों से ये लोग रक्तदान शिविर, बाढ़ राहत, गरीबों की मदद और सामाजिक काम करते रहे थे। राजनीति में आने से पहले ही विजय के पास जमीनी नेटवर्क तैयार था। यही उनकी असली ताकत बनी।

अब सवाल उठता है कि रजनीकांत और कमल हासन क्यों सफल नहीं हुए?

कोयंबटूर के एक्टिविस्ट गोपाल कृष्णन कहते हैं, "रजनीकांत के पास जबरदस्त स्टार पावर थी। शायद विजय से भी ज्यादा। लेकिन उन्होंने बहुत देर कर दी। सालों तक राजनीति में आने के संकेत देते रहे, फिर पीछे हटते रहे। जनता कन्फ्यूज हो गई। लोगों को लगा कि वह खुद तय नहीं कर पा रहे कि राजनीति करनी है या नहीं। राजनीति में हिचकिचाहट बहुत महंगी पड़ती है।"

उधर, कमल हासन पढ़े लिखे, समझदार और गंभीर नेता दिखे। लेकिन उनकी राजनीति आम जनता से थोड़ी दूर नजर आई। उनके भाषण कई बार बहुत बौद्धिक और शहरी लगते थे। गांव और छोटे शहरों के वोटरों से भावनात्मक रिश्ता नहीं बन पाया। लोग उनका सम्मान करते थे, लेकिन उनके पीछे जुनून से नहीं जुटे।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं,"विजय ने यही फर्क पैदा किया। वह बड़े विचारक की तरह नहीं, बदलाव लाने वाले आम आदमी की तरह सामने आए। उनकी भाषा आसान थी। अंदाज अपनापन वाला था। और सबसे बड़ी बात, वह सही समय पर मैदान में उतरे।"

तमिल राजनीति के जानकर वेंकट सुब्रमनियन के मुताबिक, "तमिलनाडु की राजनीति में फिल्मी सितारे पहले भी आए हैं। लेकिन विजय ने स्टारडम, युवा ऊर्जा, साफ छवि, मजबूत संगठन और जनता की नाराजगी, सबको जोड़कर एक बड़ा सियासी तूफान खड़ा कर दिया।"

यह सिर्फ चुनाव जीतने की कहानी नहीं थी। यह उस जनता की कहानी थी जो नए हीरो का इंतजार कर रही थी।

Saturday, May 9, 2026

 बंद करो यूपी को बीमारू कहना!

उत्तर प्रदेश है भारत की धड़कन, कोई बोझ नहीं

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बिन काशी, मथुरा, अयोध्या, हिन्दू धर्म में क्या?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

11 मई 2026

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जब दूसरे राज्य अपनी क्षेत्रीय शान का ढोल पीटते हैं, (तमिल प्राइड, मराठा गौरव, पंजाबियत, कश्मीरियत, बंगाली अस्मिता) तब उत्तर प्रदेश हमेशा “एक भारत” की बात करता है। पश्चिम और दक्षिण भारत के कुछ लोग जब यूपी को पिछड़ा बताकर उसकी जीडीपी या राष्ट्र निर्माण में योगदान पर सवाल उठाते हैं, तब वे एक बड़ी सच्चाई भूल जाते हैं। उत्तर प्रदेश सिर्फ नक्शे पर बना एक राज्य नहीं है। यह भारत की रूह, दिल, तहज़ीब और सियासत की धड़कन है।

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उत्तर प्रदेश के प्राचीन घाटों से लेकर ताज महल की संगमरमरी शायरी तक, उत्तर प्रदेश, मां भारती के माथे पर सजे चमकते मुकुट जैसा दिखाई देता है। यहां गंगा, यमुना और सरयू की पवित्र धाराएं संतों, क्रांतिकारियों, कवियों और बादशाहों की कहानियां सुनाती हैं। यही वह धरती है जहां तुलसीदास ने अमर रामचरितमानस लिखी, जहां कबीर ने पाखंड पर करारी चोट की, और जहां मुंशी प्रेमचंद ने गांव, गरीब और भूले हुए इंसानों की आवाज़ दुनिया तक पहुंचाई। अयोध्या की घंटियों से लेकर वाराणसी की अनंत आरती तक, लखनऊ की तहज़ीब से प्रयागराज की सियासी विरासत तक, उत्तर प्रदेश कोई मामूली सूबा नहीं। यह भारत की सभ्यता की धड़कन है।

दशकों तक उत्तर प्रदेश को “बीमारू राज्य” कहकर हिकारत  से देखा गया। इसे ऐसा बोझ बताया गया जो भारत की तरक्की रोक रहा है। टीवी बहसों, अखबारों और ड्रॉइंग रूम की चर्चाओं में यह शब्द फैशन बन गया। लेकिन जिन्होंने यह तमगा चिपकाया, उन्होंने कभी समझने की कोशिश नहीं की कि यूपी आखिर है क्या। उत्तर प्रदेश को सिर्फ गरीबी या आंकड़ों से मापना, हमारी सभ्यता को न समझ पाने जैसा है।

आज भारत में एक अजीब रुझान बढ़ रहा है। क्षेत्रीय पहचान अब संकीर्ण सोच में बदलती जा रही है। हर राज्य अपनी अलग दीवार खड़ी करता दिखाई देता है। पहले भारत की बात होती थी, अब क्षेत्रों की।

लेकिन यूपी ने हमेशा अलग रास्ता चुना। उसने खुद को सिर्फ अपनी सीमाओं तक सीमित नहीं किया। यहां “बाहरी” और “भीतरी” की राजनीति कम हुई। उत्तर प्रदेश ने हमेशा जोड़ने का काम किया, तोड़ने का नहीं। उसकी पहचान भारत से अलग नहीं, बल्कि भारत के भीतर घुली हुई है।

गंगा जमुनी तहज़ीब कोई किताबों का जुमला नहीं। यह सदियों की साझी जिंदगी का नतीजा है। यहां हिंदू, मुस्लिम, जैन, बौद्ध और सिख परंपराएं साथ साथ सांस लेती रहीं। त्योहार साझा हुए, खानपान मिला, शायरी और संगीत ने दिलों को जोड़ा। अवध में अदब संस्कृति बन गया। बनारस में आस्था दर्शन बन गई। मथुरा और वृंदावन में भक्ति उत्सव बन गई।

यूपी की नदियां सिर्फ नदियां नहीं हैं। गंगा, यमुना और सरयू बहती हुई पवित्र कथाएं हैं। इनके किनारों ने संत, फकीर, सुधारक, बागी और सपने देखने वाले पैदा किए। आदि शंकराचार्य ने काशी में ज्ञान की बहसों को नई जान दी। चैतन्य महाप्रभु वृंदावन की भक्ति में डूब गए। सूफी संतों ने इंसानियत का पैगाम फैलाया। बौद्ध भिक्षु इन्हीं रास्तों से एशिया तक ज्ञान ले गए। सल्तनतें आईं और चली गईं, मगर सभ्यता की यह धारा बहती रही।

भारत के दो सबसे लोकप्रिय आराध्य भी इसी मिट्टी से जुड़े हैं। भगवान राम अयोध्या के हैं। भगवान कृष्ण मथुरा और वृंदावन के। करोड़ों भारतीयों की नैतिकता, भक्ति और कल्पना इन दोनों से आकार लेती है। यही वजह है कि उत्तर प्रदेश को भारत की आत्मा का केंद्र माना जाता है।

आजादी की लड़ाई में भी यूपी सबसे आगे रहा। 1857 की क्रांति मेरठ से ज्वालामुखी की तरह फूटी। कानपुर, लखनऊ और झांसी तक आग फैल गई। बेगम हजरत महल अंग्रेजों के सामने डटकर खड़ी रहीं। नाना साहब ने संघर्ष किया। हजारों गुमनाम गांव वालों ने बिना किसी इनाम की उम्मीद के अपनी जान दे दी। बाद में महात्मा गांधी के नेतृत्व में भी यूपी राष्ट्रीय आंदोलन का दिल बना रहा।

साहित्य की दुनिया में भी यूपी की विरासत बेमिसाल है। मीर तकी मीर, मिर्जा गालिब, नज़ीर अकबराबादी, हरिवंश राय बच्चन, महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और प्रेमचंद ने सिर्फ यूपी के लिए नहीं लिखा। उन्होंने पूरे हिंदुस्तान की आत्मा को शब्द दिए।

वास्तुकला में भी उत्तर प्रदेश किसी खुले संग्रहालय जैसा है। ताजमहल आज भी संगमरमर में जमी मोहब्बत की धुन लगता है। आगरा किला, फतेहपुर सीकरी, सारनाथ और अनगिनत मंदिर, मस्जिदें और मठ बताते हैं कि यहां कितनी सभ्यताएं आकर मिलीं। हिंदू, बौद्ध, जैन, फारसी, इस्लामी और लोक परंपराओं ने यहां एक दूसरे को अपनाया और नया रंग दिया।

राजनीति में भी उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है। सबसे ज्यादा सांसद यहीं से संसद पहुंचते हैं। ज्यादातर प्रधानमंत्री या तो यूपी से निकले या यूपी की जनता के सहारे दिल्ली पहुंचे। दिल्ली की सत्ता की सांसें आज भी यूपी से जुड़ी हैं।

अब “बीमारू” शब्द पुराना, खोखला और नासमझी भरा लगता है। उत्तर प्रदेश कोई बीमार मरीज नहीं जो अपनी अहमियत बचाने के लिए जूझ रहा हो। यह एक विशाल, जीवंत, आध्यात्मिक और जुझारू प्रदेश है, जो अपनी ताकत फिर पहचान रहा है। यहां समस्याएं हैं, भीड़ है, विरोधाभास हैं, मगर जिंदगी भी है, ऊर्जा भी है और अद्भुत सहनशक्ति भी।

असल में उत्तर प्रदेश भारत का छोटा रूप है। यहां भारत का दर्द भी है, गरीबी भी, आस्था भी, विविधता भी, संघर्ष भी और उम्मीद भी। यूपी को समझना, भारत को समझना है। शायद इसी कारण, तमाम आलोचनाओं के बावजूद, उत्तर प्रदेश आज भी भारत पर बोझ नहीं, बल्कि उसकी धड़कन बनकर खड़ा है।

Friday, May 8, 2026

 सेल्फी की बीमारी!!!

एक तस्वीर के लिए मौत का खेल

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

10 मई 2026

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डेली यमुना किनारे, आरती स्थल के पास लड्डू गोपाल की विशाल मूर्ति के इर्द गिर्द, तमाम लोग सेल्फी लेते हैं, अजीब डांस करते हुए रील बनाते हैं। रोड पर कोई गिर जाए तो पहले वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हैं, बाद में हाल चल पूछते हैं। मैं और मेरा मोबाइल फोन, बस, और कुछ नहीं!

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दूर से ट्रेन की सीटी सुनाई देती है। चार लड़के मुस्कराते हुए मोबाइल कैमरे की तरफ देखते हैं। एक लड़का हाथ और आगे बढ़ाता है ताकि “परफेक्ट सेल्फी” आ सके। अगले ही पल तेज रफ्तार ट्रेन उन्हें कुचल देती है। उनकी तस्वीर कभी सोशल मीडिया तक नहीं पहुंचती।

भारत में सेल्फी का जुनून अब सिर्फ एक मासूम शौक नहीं रहा। यह एक खतरनाक सामाजिक बीमारी बन चुका है। रेलवे ट्रैक, नदी किनारे, पहाड़, झरने, पानी की टंकियां, चलती ट्रेनें, सब अब “रील” और “वायरल वीडियो” के मंच बन गए हैं। लाइक्स और व्यूज़ की भूख ने युवाओं को मौत से खेलना सिखा दिया है।

भारत को अब दुनिया की “सेल्फी रिपब्लिक” कहा जाने लगा है। कुछ लोग इसे “किलफी” संस्कृति भी कहते हैं, यानी ऐसी सेल्फी जो जान ले ले।

घटनाएं दिल दहला देती हैं।

2015 में मथुरा के पास तीन कॉलेज छात्र ताजमहल जाते समय रेलवे ट्रैक पर रुक गए। उन्हें पीछे आती ट्रेन के साथ एक “डेरिंग सेल्फी” चाहिए थी। ट्रेन नहीं रुकी। उनकी जिंदगी रुक गई।

2017 में दिल्ली में दो किशोर रेलवे ट्रैक पर सेल्फी लेते हुए ट्रेन की चपेट में आ गए। उन्हें लगा कि आखिरी पल में हट जाएंगे। मगर मौत ज्यादा तेज निकली।

2019 में पानीपत में तीन युवक एक ट्रेन से बचने के लिए दूसरे ट्रैक पर कूद गए। वहां दूसरी ट्रेन आ रही थी। तीनों की मौके पर मौत हो गई।

कानपुर में 2016 में सात छात्र गंगा में डूब गए। एक लड़का बांध के किनारे सेल्फी लेते समय फिसल गया। बाकी दोस्त उसे बचाने कूद पड़े। कोई वापस नहीं लौटा।

हाल ही में उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर में पांच किशोर वायरल रील बनाने के लिए पानी की ऊंची टंकी पर चढ़ गए। उतरते समय जंग लगी सीढ़ी टूट गई। एक की मौत हो गई, कई गंभीर घायल हुए।

फिर भी लोग नहीं संभल रहे।

आखिर क्यों?

मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि यह डिजिटल दौर की नई बीमारी है। सोशल मीडिया के एल्गोरिद्म (तरीके) सनसनी, खतरा और ड्रामा पसंद करते हैं। जितना खतरनाक वीडियो, उतने ज्यादा व्यूज़। मोबाइल स्क्रीन पर मिलने वाला हर “लाइक” दिमाग को छोटी सी खुशी देता है। धीरे धीरे यही आदत नशा बन जाती है।

आज का युवा सिर्फ जिंदगी नहीं जी रहा, वह हर पल “परफॉर्म” कर रहा है। हर किसी को वायरल होना है। हर कोई इंटरनेट का सितारा बनना चाहता है।

दोस्त भी उकसाते हैं।

“भाई, ये रील फाड़ देगी।”

“थोड़ा और आगे जा।”

“ट्रेन के पास खड़े हो, मजा आएगा।”

बस, यहीं हादसा जन्म लेता है।

सबसे दुखद बात यह है कि संवेदनाएं  भी कमजोर पड़ रही हैं। सड़क हादसों में घायल लोगों की मदद करने के बजाय लोग वीडियो बनाते हैं। बाढ़, आग, अंतिम संस्कार, अस्पताल, यहां तक कि मौत के पास भी लोग सेल्फी लेते नजर आते हैं।

दुनिया अब दर्द को भी “कंटेंट” बना रही है।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं: "यह सिर्फ भारत की समस्या नहीं है। अमेरिका में लोग खाई और पहाड़ों से गिरकर मरे हैं। रूस में सरकार को “सेफ सेल्फी कैंपेन” चलाना पड़ा क्योंकि लोग हथियारों और चलती गाड़ियों के साथ तस्वीरें लेते हुए मर रहे थे। स्पेन और ऑस्ट्रेलिया में भी समुद्र किनारे और चट्टानों पर सेल्फी लेते हुए कई पर्यटकों की मौत हुई। मगर भारत की हालत ज्यादा गंभीर है।"

एक अरब से ज्यादा मोबाइल फोन। सस्ता इंटरनेट। युवा आबादी। सोशल मीडिया की अंधी दौड़। और कमजोर कानून व्यवस्था। यह मिश्रण बेहद खतरनाक है।

सरकार ने कई जगह “नो सेल्फी ज़ोन” बनाए हैं। रेलवे स्टेशन और झरनों के पास चेतावनी बोर्ड लगाए गए हैं। पुलिस जागरूकता अभियान चलाती है। मगर असर बहुत कम दिखता है।

सिर्फ बोर्ड लगाने से नशा नहीं रुकता।

असल सवाल कहीं ज्यादा गहरा है। क्या आज का इंसान “अनदेखा” होने से डरने लगा है? क्या हर खुशी, हर सफर, हर दुख, हर खाना, हर पल दुनिया को दिखाना जरूरी हो गया है?

अब जिंदगी जीने से ज्यादा उसे पोस्ट करना जरूरी लगता है।

मोबाइल कैमरा नया आईना बन चुका है। लोग खुद को दूसरों की नजर से देखने लगे हैं।

और इस “सेल्फी रिपब्लिक” की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि लोग जिंदगी रिकॉर्ड करते करते जिंदगी खो रहे हैं।

कोई भी सेल्फी इतनी जरूरी नहीं कि उसके बदले जनाज़ा  उठे। कोई भी सेल्फी इतनी खूबसूरत नहीं कि उसकी कीमत एक मौत हो।

फिल्टर चेहरे बदल सकता है। कब्र नहीं।