Sunday, September 6, 2026

 नेता मौज में, अफसर उदासीन, आगरा का भविष्य अधर में 

ताज की छाया में ठहरा आगरा: T T Z के उद्योगों का उजड़ा हुआ सपना

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

7 सितंबर 2026

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कभी आगरा भारत के औद्योगिक नक्शे पर अपनी अलग पहचान रखता था।

यह शहर केवल ताजमहल और पेठे के लिए नहीं जाना जाता था।

यहां भट्टियां जलती थीं, कारखाने चलते थे और हुनर बिकता था। देश विदेश में उद्योगों की पहचान थी। ताज महल से ज्यादा कमाई व्यापार उद्योगों से थी।

आज वही आगरा औद्योगिक विकास की दौड़ में पिछड़ रहा है।

तीन दशक पहले ताज बचाने के लिए उठाए गए कदम जरूरी थे। लेकिन उनकी कीमत आज भी आगरा और पूरे टीटीजेड को चुकानी पड़ रही है।

1990 के दशक में आगरा के उद्योगों पर संकट मंडराया। ताजमहल को प्रदूषण से बचाना राष्ट्रीय प्राथमिकता बन गया। सुप्रीम कोर्ट ने 1993 से सख्त कदम उठाने शुरू किए।

1996 के ऐतिहासिक एम.सी. मेहता फैसले ने तस्वीर बदल दी। कोयला और कोक इस्तेमाल करने वाली इकाइयों को गैस अपनानी थी। या फिर उन्हें टीटीजेड से बाहर जाना था।

ताज ट्रेपेजियम जोन करीब 10,400 वर्ग किलोमीटर में फैला है। इसमें आगरा, फिरोजाबाद, मथुरा, हाथरस और एटा शामिल हैं। राजस्थान का भरतपुर भी इसका हिस्सा है। यह इलाका पर्यावरण की दृष्टि से बेहद संवेदनशील घोषित हुआ।

करीब 292 प्रदूषणकारी इकाइयों पर कार्रवाई हुई। कई बंद हुईं, कई दूसरी जगह चली गईं।

2017 के एक सर्वे ने तस्वीर और साफ कर दी। 1996 तक चल रही करीब 1,168 इकाइयों में केवल 250 बचीं।

बाकी बंद हुईं या दूसरे राज्यों की ओर निकल गईं। कई उद्यमी राजस्थान और मध्य प्रदेश चले गए। निवेश गया, रोजगार गया और औद्योगिक आत्मविश्वास भी कमजोर हुआ।

यहां एक सवाल उठना स्वाभाविक है।

क्या ताज को बचाने के लिए उद्योगों को खत्म करना जरूरी था?

जवाब इतना सीधा नहीं है।

पर्यावरण की हिफाजत जरूरी थी और आज भी है। लेकिन उद्योगों के लिए वैकल्पिक रास्ते तैयार करना भी जरूरी था। यहीं नीति और अमल के बीच बड़ी खाई दिखाई देती है।

आगरा की उद्यमशीलता पर कभी शक नहीं रहा। यहां लोगों ने हमेशा कम साधनों से बड़ा काम किया।

कच्चा माल दूर-दराज के इलाकों से आता रहा। लोहा, कोयला, गैस, शीशे का कच्चा माल बाहर से आया।

चमड़ा दक्षिण भारत से आया और फिर जूते बने। गुजरात और राजस्थान से सिलिका सैंड और सोडा ऐश आया।

लौकी से पेठा बना और पूरी दुनिया तक पहुंचा।

यही आगरा की असली ताकत थी। यहां प्राकृतिक संसाधन कम थे, लेकिन हुनर भरपूर था। फाउंड्री, कांच, जूते और हस्तशिल्प ने पहचान बनाई।

कारीगरों ने मामूली चीजों में भी बड़ी कीमत पैदा की। व्यापारियों ने छोटे कारोबार को बड़े बाजार से जोड़ा।

लेकिन आज वही ऊर्जा ठहराव से जूझ रही है।

आगरा का फुटवियर उद्योग अब भी सबसे मजबूत आधार है। यह सीधे और परोक्ष रूप से लाखों लोगों को रोजगार देता है।अनुमान है कि चार से पांच लाख आजीविकाएं इससे जुड़ी हैं। देश की घरेलू फुटवियर मांग में आगरा की हिस्सेदारी बड़ी है।

निर्यात में भी शहर की पुरानी मजबूत मौजूदगी है।

लेकिन बढ़ती लागत और वैश्विक प्रतिस्पर्धा ने मुश्किलें बढ़ाई हैं।

फिरोजाबाद का कांच उद्योग भी अपनी पुरानी चमक खो चुका है।

तकनीक बदली, लेकिन आधुनिकीकरण की रफ्तार धीमी रही।

कभी कृषि उपकरण और पाइप बनाने वाली फाउंड्रियां भी सिकुड़ गईं।

पारंपरिक उद्योगों के सामने ईंधन और प्रदूषण की पाबंदियां हैं।

नई पीढ़ी को इनमें भविष्य कम दिखाई देता है।

इसका असर केवल कारखानों पर नहीं पड़ा।

रोजगार की तलाश में गांवों से पलायन बढ़ा।

कई युवा दिल्ली-एनसीआर की तरफ निकल गए।

जहां मजदूरी बेहतर मिली, वहीं उन्होंने डेरा डाल लिया।

आगरा में हुनर रहा, लेकिन अवसर कम होते गए।

यह किसी भी शहर के लिए बेहद अफसोसनाक स्थिति है।

सरकारों को भी पूरी तरह कठघरे में खड़ा करना उचित नहीं होगा।

मूल प्रतिबंध सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से आए थे।

वे आज की सरकारों से बहुत पहले के फैसले हैं।

बाद की सरकारों ने गैर-प्रदूषणकारी उद्योगों का वादा किया।

लेकिन योजनाओं का जमीन पर असर असमान रहा।

वर्तमान सरकार ने भी कई पहल की हैं।

फुटवियर और हस्तशिल्प को ओडीओपी में बढ़ावा मिला है।

कौशल प्रशिक्षण से बड़ी संख्या में कारीगर जुड़े हैं।

नई फुटवियर और लेदर नीति भी सामने आई है।

आगरा में इंटीग्रेटेड मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर की योजना बनी है। शास्त्रीपुरम में एसटीपीआई सुविधा भी पूरी हुई है।एक्सप्रेसवे और ग्रेटर आगरा की योजनाएं भी उम्मीद जगाती हैं। फिर भी असली अड़चनें खत्म नहीं हुई हैं।

अछनेरा का प्रस्तावित लेदर पार्क इसका बड़ा उदाहरण है। सालों से यह परियोजना कागजी और कानूनी पेच में फंसी है। जमीन अधिग्रहण और मुआवजे के बाद भी रास्ता साफ नहीं है।

गैस की आपूर्ति भी कई बार उद्योगों के लिए संकट बनी। प्रदूषण नियंत्रण की अपनी चुनौतियां भी बरकरार हैं।

सवाल यह नहीं कि ताज बचे या उद्योग।सवाल यह है कि दोनों साथ क्यों नहीं बच सकते?

दुनिया में स्वच्छ तकनीक के साथ उद्योग चलते हैं। आगरा को भी उसी दिशा में आगे बढ़ना होगा।

भविष्य प्रदूषणकारी भारी उद्योगों में नहीं है। लेकिन स्वच्छ विनिर्माण, आईटी, डिजाइन और सेवाओं में है।

ताज की हिफाजत हमारी जिम्मेदारी है।लेकिन ताज की छाया में पलती युवा पीढ़ी भी हमारी जिम्मेदारी है।

आगरा को केवल पर्यटन शहर बनाकर नहीं छोड़ा जा सकता। यह मेहनती लोगों और उद्यमियों का शहर भी है। उसकी औद्योगिक रूह को फिर से जगाना होगा। तीन दशक का अनुभव एक साफ सबक देता है।

सिर्फ बंद करना आसान है, विकल्प बनाना मुश्किल।

अब विकल्प बनाने का वक्त है।

साफ उद्योगों के लिए जमीन, गैस और बिजली चाहिए। अनुमतियों की प्रक्रिया सरल और पारदर्शी होनी चाहिए। अटकी परियोजनाओं पर तेज फैसला होना चाहिए।

ताज चमकता रहे और कारखाने भी जलें।यमुना साफ रहे और रोजगार भी बढ़े। यही आगरा के लिए सही तरक्की होगी।

वरना इतिहास गवाही देगा कि हमने ताज तो बचा लिया, लेकिन उसके आसपास की औद्योगिक दुनिया को मुरझाने दिया।

Saturday, September 5, 2026

 


हैप्पी टीचर्स डे कहना काफी नहीं!

मास्टरजी की छड़ी गई, बदतमीजी आई!

बेबाक होना अच्छी बात है, बेलगाम होना नहीं।

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जब शिक्षक की आवाज धीमी और बच्चे की आवाज ऊँची हो गई

बढ़ती अनुशासनहीनता पर गंभीर सवाल

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अनुशासनहीनता की समस्या सड़क पर शुरू नहीं होती।

वह स्कूल की पहली घंटी के साथ शुरू होती है।

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बृज खंडेलवाल द्वारा

5 सितंबर 2026

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कभी स्कूल में मास्टरजी की एक नजर पड़ती थी और पूरी कक्षा शांत हो जाती थी। आज कई शिक्षक कहते हैं, “बच्चो, प्लीज शोर मत करो।” और पीछे से आवाज आती है, “शीला मैम आप हमें ट्रॉमा, स्ट्रेस मत दो!” 

रिटायर्ड मास्साब शर्माजी बता रहे थे, "एक बार एक स्टूडेंट होम असाइनमेंट करके नहीं लाया, पूछने पर बोला: "तो क्या हुआ?" मैंने बात इग्नोर करने में भलाई समझी। लेकिन उसके बाद, हर टोकने के सवाल पर उत्तर मिलने लगा: तो क्या हुआ?  उस दिन अगर सख्त कदम लिया होता तो ये समस्या नहीं झेलनी पड़ती।"

वाह! शिक्षा ने सचमुच लंबी छलांग लगाई है। लेकिन यह मजाक जितना दिलचस्प है, हकीकत उतनी ही चिंताजनक है। पिछले दिनों, देश के अलग-अलग हिस्सों से सामने आए कई मामलों ने कक्षा में घटते अनुशासन और शिक्षकों के प्रति कम होते सम्मान पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

आंध्र प्रदेश में दसवीं के एक छात्र ने बहस के बाद शिक्षक को कक्षा में मुक्का मार दिया। केरल में फुटबॉल मैच के विवाद के बाद छात्रों के एक समूह ने शारीरिक शिक्षा के शिक्षकों पर हमला किया।

उत्तर प्रदेश में छेड़छाड़ के आरोप के बाद एक छात्रा और उसके परिवार ने कोचिंग शिक्षक की सार्वजनिक रूप से पिटाई की। राजस्थान में एक छात्र ने पहले हुई अनुशासनात्मक कार्रवाई से नाराज होकर शिक्षक पर सड़क पर हमला कर दिया।

कन्नूर, केरल में परीक्षा के दौरान दो छात्रों ने शिक्षक को पीट दिया। दिल्ली का 2016 का मामला तो और भी भयावह था। परीक्षा और अनुशासन से जुड़े विवाद के बाद दो छात्रों ने शिक्षक मुकेश कुमार पर चाकू से हमला किया और बाद में उनकी मौत हो गई।

हर मामले की परिस्थितियां अलग थीं। कुछ मामलों में शिक्षकों पर दुर्व्यवहार के आरोप भी लगे, जिनकी निष्पक्ष जांच जरूरी है। लेकिन शिकायत, गुस्सा या असहमति किसी को हिंसा का लाइसेंस नहीं दे सकती।

सवाल यह है कि आखिर हम यहां तक पहुंचे कैसे?


पुराने जमाने में शिक्षक के हाथ में छड़ी होती थी। आज शिक्षक के हाथ में नियमों की मोटी फाइल होती है।

छड़ी चलाना तो दूर, कई बार ऊंची आवाज में बोलना भी जोखिम भरा हो गया है। अभिभावक नाराज हो सकते हैं। प्रशासन सवाल पूछ सकता है। सोशल मीडिया तो पहले से तैयार बैठा है।

“देखिए, शिक्षक ने बच्चे को डांट दिया!”

नतीजा यह है कि कुछ जगह शिक्षक अनुशासन लागू करने से पहले दस बार सोचते हैं। दूसरी तरफ कुछ बच्चे यह समझने लगते हैं कि उन्हें कोई रोक नहीं सकता।

लेकिन यहां एक जरूरी फर्क समझना होगा। शारीरिक दंड शिक्षा का आदर्श तरीका नहीं है। बच्चे को पीटना, अपमानित करना या डराना शिक्षा नहीं, ज्यादती है।

लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि शिक्षक के हाथ पूरी तरह बांध दिए जाएं। कक्षा में नियम होंगे तो नियम तोड़ने पर उचित परिणाम भी होना चाहिए।

“अनुशासन स्वतंत्रता का दुश्मन नहीं, उसकी बुनियाद है।”

समय पर नहीं आए? जवाब देना होगा।

कक्षा में बदतमीजी की? कार्रवाई होगी।

दूसरों को पढ़ने नहीं दिया? अभिभावकों को बुलाया जाएगा।

बार-बार नियम तोड़े? निर्धारित अनुशासनात्मक कदम उठेंगे।

यह सब शिक्षक की निजी सनक से नहीं, बल्कि स्पष्ट और पारदर्शी नियमों के तहत होना चाहिए। वरना नियम दीवार पर टंगे खूबसूरत पोस्टर बनकर रह जाएंगे।


एक और सच्चाई को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जो बच्चे पढ़ना चाहते हैं, उनका भी अधिकार है। कुछ शरारती बच्चों की अराजकता पूरी कक्षा को बंधक नहीं बना सकती।

शिक्षा का अधिकार केवल स्कूल आने का अधिकार नहीं है। उसमें शांत वातावरण में सीखने का अधिकार भी शामिल है।

हम बच्चों से कहते हैं, “अपनी बात खुलकर कहो।”

बहुत अच्छी बात है।

लेकिन साथ में यह भी सिखाना होगा, “दूसरे की बात सुनो।”

हम कहते हैं, “अपने अधिकार पहचानो।”

उन्हें यह भी बताना होगा, “अपने कर्तव्य मत भूलो।”

हम कहते हैं, “सवाल पूछो।”

उन्हें यह भी समझाना होगा कि सवाल और बदतमीजी में फर्क होता है।

यही फर्क आज कई जगह धुंधला पड़ रहा है।

आधुनिकता का मतलब बेलगाम होना नहीं


आत्मविश्वास अच्छी चीज है, अहंकार नहीं। सवाल करना बुद्धिमानी है, हर नियम को ठुकराना नहीं।

जो बच्चा स्कूल में लाइन तोड़ना सामान्य समझता है, वह आगे चलकर ट्रैफिक नियम भी तोड़ सकता है। जो शिक्षक का अपमान करना अपना अधिकार समझता है, वह कल संस्थाओं का सम्मान भी भूल सकता है।

छोटी आदतें ही आगे चलकर बड़े नागरिक चरित्र का निर्माण करती हैं।

मास्टरजी दोस्त नहीं, मार्गदर्शक भी हैं

आज शिक्षा में शिक्षक को बच्चों का “दोस्त” बनाने पर बहुत जोर दिया जाता है। दोस्ताना माहौल अच्छा है, लेकिन शिक्षक की भूमिका केवल दोस्त की नहीं है।

शिक्षक मार्गदर्शक है। वह सिर्फ किताब नहीं पढ़ाता, व्यवहार भी सिखाता है।

स्कूल परीक्षा पास करने की फैक्ट्री नहीं है। वह नागरिक बनाने की वर्कशॉप भी है।

बच्चों में आत्मसंयम, समय की पाबंदी, जिम्मेदारी और दूसरों के प्रति सम्मान पैदा करना भी शिक्षा का हिस्सा है।

माता-पिता की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। घर में हर मांग पूरी करके स्कूल से अनुशासन की उम्मीद करना बेमानी है।

जिस बच्चे को घर में कभी “नहीं” सुनने की आदत नहीं, वह स्कूल में नियम क्यों मानेगा?

फिर आता है मोबाइल और सोशल मीडिया का सवाल।

आज बच्चे ऐसी दुनिया में पल रहे हैं जहां हर मिनट मनोरंजन उपलब्ध है। कुछ सेकंड में वीडियो बदल जाता है। एक क्लिक में नया कंटेंट सामने आ जाता है।

ऐसे माहौल में धैर्य, एकाग्रता और इंतजार जैसे पुराने गुण कमजोर पड़ रहे हैं।

स्कूल को ऐसे समय में और मजबूत अनुशासन चाहिए, कम नहीं।

क्योंकि किताब पढ़ने के लिए धैर्य चाहिए। शिक्षक को सुनने के लिए एकाग्रता चाहिए। परीक्षा के लिए आत्मसंयम चाहिए। और जीवन में सफल होने के लिए इन तीनों की जरूरत पड़ती है।


पुराने मास्टरजी की छड़ी शायद वापस न आए। लेकिन उसकी आत्मा जरूर लौटनी चाहिए।

मर्यादा।

जवाबदेही।

समय की पाबंदी।

नियमों का सम्मान।

और अपने कर्म के परिणाम का बोध।

मास्टरजी को तानाशाह मत बनाइए।

लेकिन उन्हें इतना कमजोर भी मत बनाइए कि बच्चे ही कक्षा के हाकिम बन जाएं।

कक्षा लोकतंत्र की चुनावी रैली नहीं है। वहां शिक्षक नेतृत्व करता है और विद्यार्थी सीखते हैं।

डर से शिक्षा नहीं होती। लेकिन हर कर्म का परिणाम होता है, यह समझाना भी शिक्षा का ही हिस्सा है।

शिक्षक का रौब नहीं, उसकी गरिमा लौटाइए। उसकी आवाज में फिर से वह विश्वास लाइए कि वह बिना डर के अनुशासन कायम कर सकता है।

वरना कल का नागरिक स्कूल से यही सीखकर निकलेगा:

“नियम दूसरों के लिए होते हैं, मेरे लिए नहीं।”

और फिर हम हैरान होंगे कि ट्रैफिक क्यों नहीं सुधरता। कतारें क्यों नहीं बनतीं। सार्वजनिक संपत्ति की कद्र क्यों नहीं होती।

इसलिए इस शिक्षक दिवस पर सिर्फ “हैप्पी टीचर्स डे” कहना काफी नहीं है।

मास्टरजी को सम्मान दीजिए।

बच्चों को अधिकार दीजिए।

लेकिन अनुशासन को भी उसका अधिकार दीजिए।

क्योंकि अच्छे स्कूल केवल अच्छे विद्यार्थी नहीं बनाते।

वे अच्छे नागरिक बनाते हैं।


Thursday, September 3, 2026

 क्या आगरा का ट्रैफिक कभी सुधरेगा?

उपेक्षा, अव्यवस्था और अधूरे मेट्रो निर्माण ने शहर को जाम का अखाड़ा बना दिया है

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बृज खंडेलवाल द्वारा

5 सितंबर 2026

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आगरा की सड़कें अब सफर का रास्ता कम और रोज का रणक्षेत्र ज्यादा लगती हैं। 

कहीं ऑटो चालक नियमों को ठेंगा दिखाते हैं, कहीं गलत दिशा में दौड़ते वाहन जान जोखिम में डालते हैं और कहीं मेट्रो निर्माण ने पहले से परेशान यातायात की कमर तोड़ रखी है। 

शहर में सुरक्षित आवागमन जैसे प्रशासन की प्राथमिकताओं की सूची से ही बाहर हो गया है।

एमजी रोड, शहर की प्रमुख जीवनरेखा, पर बेतरतीब ऑटो संचालन और यातायात नियमों की धज्जियां उड़ने के कारण पाबंदियां लगाई गईं। लेकिन समस्या खत्म नहीं हुई। वह बस दूसरी सड़कों पर स्थानांतरित हो गई। 

अब ऑटो मुख्य मार्गों के अलावा लिंक रोड और हाईवे तक को घेरते दिखाई देते हैं। लो-फ्लोर बसें चलाने से सार्वजनिक परिवहन की समस्या का दिखावटी समाधान जरूर हुआ, लेकिन यातायात की बुनियादी बीमारी जस की तस है।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि सड़क पर नियम तोड़ने वाला दिखाई देता है, लेकिन व्यवस्था की विफलता दिखाई नहीं देती। पुलिस और नगर नियोजन तंत्र दोनों इस अव्यवस्था के लिए जवाबदेह हैं।


आंकड़े इस अराजकता की भयावह तस्वीर पेंट कर रहे हैं। वर्ष 2024 में आगरा जिले में 1,223 सड़क दुर्घटनाएं दर्ज हुईं और 586 लोगों की जान गई। यानी औसतन हर दिन लगभग चार दुर्घटनाएं और एक से अधिक मौत।

गलत दिशा में वाहन चलाना, लाल बत्ती पार करना, तेज रफ्तार, मोबाइल पर बात करना और दोपहिया वाहनों पर तीन सवारियां बैठाना आम बात है। पुलिस चालान काटती है, लेकिन उसका असर कितना है, यह सड़कें रोज बता देती हैं। कार्रवाई अक्सर छिटपुट होती है। ब्लैक स्पॉट पर लगातार निगरानी, लाइसेंस निलंबन और वाहन जब्ती जैसे कठोर कदम विरले ही दिखाई देते हैं।

आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे का अनुभव भी आंखें खोलने वाला है। 2021 से 2025 के मध्य तक 7,000 से अधिक दुर्घटनाओं में आधे से ज्यादा मामलों में चालक की थकान एक प्रमुख कारण रही। सवाल उठता है कि सड़क सुरक्षा को लेकर निगरानी और जागरूकता व्यवस्था आखिर कितनी गंभीर है?


आगरा में मेट्रो निर्माण यातायात सुधार की उम्मीद लेकर आया था। लेकिन निर्माण की धीमी गति, लंबे समय तक खुले पड़े कार्यक्षेत्र, संकरे डायवर्जन और जगह-जगह टूटे मार्गों ने स्थानीय यातायात को बेहाल कर दिया है। शुरू में ही समझदार लोगों ने अंडरग्राउंड मेट्रो रेल नेटवर्क की डिमांड की थी, मगर लागत  कम करने के चक्कर में सारे शहर की यातायात व्यवस्था भंग कर दी।

अब, जहां पांच मिनट में पहुंच जाना चाहिए, वहां 20-25 मिनट लगना अब सामान्य बात है। कई जगह सड़क का एक बड़ा हिस्सा बैरिकेडिंग में घिरा है और बची हुई सड़क पर ऑटो, ई-रिक्शा, दोपहिया, कार और बसें एक-दूसरे को रास्ता देने से कतराते  हैं।

मेट्रो जैसी बड़ी परियोजना के लिए कुछ समय की परेशानी समझी जा सकती है। लेकिन तैयारी और निर्माण की समयसीमा के बीच तालमेल न हो तो असुविधा यातना बन जाती है। निर्माण स्थल की सफाई, बैरिकेडिंग, डायवर्जन की स्पष्ट सूचना और वैकल्पिक मार्गों का बेहतर प्रबंधन जरूरी है। शहर को यह जानने का अधिकार है कि कौन सा काम कब पूरा होगा और देरी क्यों हो रही है।


आगरा की आबादी लगभग 30 लाख तक पहुंच चुकी है। इसके अलावा हर वर्ष करोड़ों पर्यटक ताजमहल और अन्य ऐतिहासिक स्थलों को देखने आते हैं। दशकों पहले की आबादी और यातायात को ध्यान में रखकर बनी सड़कें अब इस बोझ के सामने छोटी पड़ रही हैं।

पीक आवर में कई प्रमुख मार्गों पर वाहन गति लगभग 15 किलोमीटर प्रति घंटा तक गिर जाती है। जाम केवल समय नहीं खाता, ईंधन और उत्पादकता भी निगलता है। एक अनुमान के अनुसार यातायात जाम, अतिरिक्त ईंधन और समय की बर्बादी से शहर को हर साल लगभग 500 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान होता है।

पर्यटक भी इस अनुभव को लेकर अच्छी यादें लेकर नहीं लौटते। ताज देखने आए व्यक्ति को अगर आधा दिन सड़क पर फंसे रहना पड़े, तो विश्व धरोहर शहर की छवि पर भी सवाल उठता है।


जाम के साथ जहरीली हवा का बोनस

यातायात की समस्या केवल समय और धैर्य नहीं निगलती। यह हवा को भी जहरीला बनाती है।

वाहनों से निकलने वाला प्रदूषण शहर के PM2.5 में महत्वपूर्ण योगदान देता है। सड़क की धूल इसका बड़ा हिस्सा हो सकती है, लेकिन यातायात ऐसा स्रोत है जिस पर प्रशासन तत्काल नियंत्रण कर सकता है।

सर्दियों में प्रदूषण का स्तर खतरनाक सीमा तक पहुंच जाता है। चौराहों पर घंटों खड़े वाहन धुआं छोड़ते रहते हैं और पैदल चलने वाले उसी हवा में सांस लेते हैं। बच्चे और बुजुर्ग इसकी सबसे बड़ी कीमत चुकाते हैं।

ताजमहल की सुरक्षा के लिए ताज ट्रेपेजियम जोन बनाया गया था। लेकिन अगर ताज के आसपास का यातायात ही प्रदूषण का बड़ा स्रोत बना रहे, तो केवल कागजी संरक्षण से विरासत नहीं बच सकती।

इलाज मुश्किल नहीं, इच्छाशक्ति चाहिए

आगरा को किसी चमत्कारी यातायात योजना की जरूरत नहीं है। जरूरत है नियमों के लगातार और निष्पक्ष पालन की।

तेज रफ्तार, गलत दिशा, लाल बत्ती तोड़ने और खतरनाक ड्राइविंग पर नियमित कार्रवाई हो। लाइसेंस निलंबन और वाहन जब्ती जैसे कदम वास्तव में लागू हों। सड़कों पर फुटपाथ, स्पष्ट जेब्रा क्रॉसिंग, बेहतर संकेतक और सुरक्षित पैदल मार्ग बनाए जाएं।

सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना होगा। कुछ लो-फ्लोर बसें समस्या का समाधान नहीं हैं। उच्च आवृत्ति वाली विश्वसनीय बस सेवा, व्यवस्थित ऑटो और ई-रिक्शा स्टैंड तथा बेहतर पार्किंग व्यवस्था निजी वाहनों का दबाव कम कर सकती है।


हर सार्वजनिक निर्माण में भी समयसीमा और जवाबदेही तय होनी चाहिए। हर निर्माण स्थल पर स्पष्ट डायवर्जन, पर्याप्त रोशनी, पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित रास्ता और नियमित यातायात प्रबंधन अनिवार्य होना चाहिए।

कैमरा आधारित निगरानी, स्मार्ट सिग्नल, रियल-टाइम ट्रैफिक मॉनिटरिंग और तेज आपातकालीन प्रतिक्रिया व्यवस्था अब विलासिता नहीं, आवश्यकता है।

भारी वाणिज्यिक यातायात को शहर के भीतरी हिस्सों से बाहर रखने के लिए उपलब्ध बाईपास और एक्सप्रेसवे का अधिक प्रभावी इस्तेमाल किया जा सकता है।

आगरा का ट्रैफिक संकट किसी दैवी आपदा का परिणाम नहीं है। यह वर्षों की प्रशासनिक उदासीनता, कमजोर प्रवर्तन, खराब नियोजन और अधूरे समन्वय का नतीजा है।

शहर को जाम से निकालना असंभव नहीं है। सड़कें पर्याप्त हो सकती हैं, यदि व्यवस्था पर्याप्त हो।

सवाल केवल यह है कि जिम्मेदार अधिकारी कब समझेंगे कि ट्रैफिक जाम सिर्फ गाड़ियों को नहीं रोकता। यह शहर की अर्थव्यवस्था, पर्यावरण, पर्यटन और नागरिकों की जिंदगी रोक देता है।

आगरा को ताज का शहर बने रहना है या जाम का। फैसला अब सड़कों पर नहीं, प्रशासनिक इच्छाशक्ति में होगा।

 श्रीकृष्ण: प्रकृति के रक्षक और यमुना के प्रियतम

क्या इस जन्माष्टमी हम कृष्ण को केवल याद ही नहीं, बल्कि उनकी प्रिय यमुना को बचाने का संकल्प भी ले सकते हैं?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

4 सितंबर 2026

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देशभर में आज जन्माष्टमी की धूम है। मंदिर रोशनी से जगमगा रहे हैं। गलियां सज रही हैं। घंटियां बज रही हैं और भक्त आधी रात को भगवान कृष्ण के जन्म का इंतजार कर रहे हैं।

मथुरा और वृंदावन से लेकर द्वारका, मुंबई, दिल्ली, अहमदाबाद और देश के छोटे-बड़े शहरों तक जन्माष्टमी आस्था का सबसे बड़ा उत्सव बन चुकी है। कहीं रासलीला हो रही है, कहीं झांकियां सज रही हैं और कहीं दही-हांडी के लिए मानव पिरामिड बनाए जा रहे हैं।

लेकिन इस उत्सव के बीच एक सवाल हमें जरूर पूछना चाहिए।

अगर कृष्ण आज हमारे बीच होते, तो नदियों, जंगलों, पहाड़ों और पशुओं की हालत देखकर क्या सोचते?

कृष्ण केवल मंदिरों में विराजमान देवता नहीं थे। उनका बचपन जंगलों, गायों, बछड़ों, पक्षियों, पेड़ों, पहाड़ों और नदियों के बीच बीता। उनका जीवन हमें बताता है कि प्रकृति कोई सामान नहीं है, जिसे मनुष्य अपनी सुविधा के लिए इस्तेमाल करे। प्रकृति हमारे जीवन और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है।

कृष्ण और ब्रज की जीवंत प्रकृति

“वृंदावन कृष्ण की बाल लीलाओं की केवल पृष्ठभूमि नहीं था। वहां पेड़, पक्षी, गाय, नदी और मनुष्य एक ही परिवार का हिस्सा थे।”

यह कहना है आगरा के श्री मथुराधीश मंदिर के गोस्वामी नंदन श्रोत्रिय का।

कृष्ण और कदंब का रिश्ता आज भी ब्रज की कल्पना का हिस्सा है। कहा जाता है कि कदंब के पेड़ की छांव में कृष्ण की बांसुरी गूंजती थी। उनके साथ केवल ग्वाल-बाल और गोपियां ही नहीं थीं। गाय, बछड़े, पक्षी और पूरा प्राकृतिक संसार उनकी दुनिया का हिस्सा थे।

फिर आता है गोवर्धन पर्वत का प्रसंग।

जब ब्रज पर मूसलाधार बारिश का संकट आया, तो कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाकर लोगों और पशुओं को आश्रय दिया। इस कथा को हम धार्मिक दृष्टि से देखें या प्रतीक के रूप में, इसका पर्यावरणीय संदेश बहुत स्पष्ट है।

पर्यावरणविद् डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य के अनुसार, गोवर्धन केवल एक पहाड़ नहीं था। वह जंगल, जल, चारा, भोजन और पूरे समुदाय की सुरक्षा का प्रतीक था।

कृष्ण का संदेश आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है, मनुष्य का जीवन प्रकृति की सुरक्षा पर निर्भर है।

कृष्ण और यमुना का रिश्ता

कृष्ण की कहानी में यमुना का स्थान सबसे खास है।

रिवर कनेक्ट अभियान से जुड़ी पद्मिनी अय्यर कहती हैं, “कृष्ण का यमुना से रिश्ता बहुत गहरा था। वसुदेव उन्हें शिशु अवस्था में यमुना पार कराकर गोकुल ले गए। कृष्ण ने यमुना के किनारे खेला और कालिया नाग का सामना भी यमुना में ही किया।”

कृष्ण की कथा में यमुना केवल पानी की धारा नहीं है। वह एक जीवंत पात्र है।

लेकिन आज यही यमुना मथुरा, वृंदावन और आगरा से गुजरते हुए गंदे नालों, सीवर और प्रदूषण का बोझ ढो रही है। करोड़ों लोग कृष्ण का नाम लेते हैं, लेकिन उनकी प्रिय नदी लगातार मर रही है।

आगरा में यह विडंबना और भी बड़ी है। यमुना विश्व प्रसिद्ध ताजमहल के सामने से गुजरती है। एक ओर दुनिया का सबसे सुंदर स्मारक है और दूसरी ओर उसकी जीवनरेखा प्रदूषण से जूझ रही है।

यमुना भक्त चतुर्भुज तिवारी कहते हैं कि नदी को वह सम्मान नहीं मिल रहा, जिसकी वह हकदार है।

आईएमए अध्यक्ष डॉ. हरेंद्र गुप्ता सवाल करते हैं, “क्या हम कृष्ण के भक्त कहलाकर उनकी प्रिय यमुना को नाले में बदल सकते हैं?”

मथुरा में भव्य जन्माष्टमी

4 सितंबर को जन्माष्टमी मनाई जा रही है और आधी रात के बाद तक कृष्ण जन्मोत्सव चलेगा।

मथुरा में इस बार विशेष उत्साह है। हजारों श्रद्धालु मथुरा-वृंदावन पहुंच रहे हैं। कृष्ण जन्मभूमि पर आधी रात को विशेष पूजा होगी। ब्रज तीर्थ विकास परिषद ने कृष्ण के जीवन और जन्म को दर्शाने वाले 500 ड्रोन का विशेष कार्यक्रम भी तैयार किया है।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 3 सितंबर को मथुरा का दौरा किया। उन्होंने स्वामी हरिदास सभागार और कई विकास परियोजनाओं का उद्घाटन किया। उन्होंने यह भी कहा कि विकास के साथ सांस्कृतिक विरासत की रक्षा जरूरी है।

यह बात ब्रज के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

ब्रज का विकास केवल चौड़ी सड़कों और ज्यादा पर्यटकों से नहीं हो सकता। अगर मथुरा की पहचान कृष्ण हैं, तो उसकी यमुना, कुंड, गोवर्धन, वन, गाय और पुराने घाट भी उसी विरासत का हिस्सा हैं।

कृष्ण के पोस्टरों से सजा कंक्रीट का जंगल ब्रज नहीं हो सकता। ब्रज इतना सुंदर रहना चाहिए कि कृष्ण खुद उसे पहचान सकें।

द्वारका से पूरे भारत तक

दूर गुजरात में द्वारका भी जन्माष्टमी के लिए तैयार है। इस वर्ष पांच दिन के उत्सव में लगभग सात लाख श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है। द्वारकाधीश मंदिर में आधी रात की पूजा के लिए बड़ी संख्या में भक्त जुटेंगे।

मथुरा और द्वारका कृष्ण के जीवन के दो अलग-अलग पड़ाव हैं। एक ओर ब्रज की नदी, जंगल और गांव हैं। दूसरी ओर समुद्र के किनारे बसी द्वारका है।

कृष्ण हमें नदी से लेकर समुद्र तक और गांव से लेकर शहर तक जोड़ते हैं।

महाराष्ट्र में दही-हांडी उत्सव सड़कों को उत्सव के मैदान में बदल देता है। मुंबई के गोविंदा दल मानव पिरामिड बनाकर कृष्ण की माखन चोरी की लीला को रोमांचक रूप देते हैं।

दिल्ली, लखनऊ, बंगाल, गुजरात और देश के अनेक हिस्सों में मंदिरों और सार्वजनिक स्थानों पर विशेष कार्यक्रम हो रहे हैं। कहीं कृष्ण लीला है, कहीं रासलीला और कहीं शास्त्रीय नृत्य।

लेकिन कृष्ण की प्रकृति से जुड़ी विरासत ब्रज में सबसे ज्यादा महसूस होती है।

गायों से कृष्ण का रिश्ता

कृष्ण को गोपाल और गोविंद कहा गया। गाय उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा थीं।

वृंदावन टुडे के मुख्य संपादक और फ्रेंड्स ऑफ वृंदावन के संयोजक जगन्नाथ पोद्दार कहते हैं कि ब्रज में गाय केवल आर्थिक संपत्ति नहीं थी। वह परिवार और धार्मिक जीवन का हिस्सा थी।

आज स्थिति बदल गई है।

हम गाय की पूजा तो करते हैं, लेकिन उसके भोजन और स्वास्थ्य की चिंता कम करते हैं। प्लास्टिक, कचरा और गंदा पानी पशुओं के जीवन को नुकसान पहुंचा रहे हैं।

यह कैसी भक्ति है, जिसमें भगवान का नाम तो है, लेकिन उनकी प्रिय गायों की चिंता नहीं?

गीता का संदेश और आज की दुनिया

भगवद्गीता में जलवायु परिवर्तन या जैव विविधता जैसे आधुनिक शब्द नहीं मिलते। फिर भी कृष्ण का दर्शन मनुष्य और प्रकृति के गहरे संबंध की बात करता है।

गीता में कृष्ण पृथ्वी की सुगंध और सभी जीवों में जीवन को अपनी ही अभिव्यक्ति बताते हैं। एक पत्ता, फूल, फल या जल भी सच्ची श्रद्धा से अर्पित किया जाए तो उसका महत्व है।

गीता का संदेश आज भी साफ है,

प्रकृति को नष्ट करके मनुष्य सुखी नहीं रह सकता।

इस जन्माष्टमी कुछ बदलें

हम हजारों दीप जला सकते हैं। विशाल झांकियां निकाल सकते हैं। भव्य जुलूस कर सकते हैं। पूरी रात “राधे-राधे” और “जय श्रीकृष्ण” का जयघोष कर सकते हैं।

लेकिन अगर यमुना मरती रही, तो हमारी भक्ति अधूरी रहेगी।

ब्रज में कृष्ण की विरासत बचाने का अर्थ है, यमुना को साफ करना, गोवर्धन की प्रकृति बचाना, पुराने कुंडों को पुनर्जीवित करना, पवित्र उपवनों की रक्षा करना और गायों की बेहतर देखभाल करना।

आगरा में इसका अर्थ है ताजमहल के सामने बहती यमुना को फिर जीवित नदी बनाना।

मथुरा और वृंदावन में तीर्थयात्रा के साथ पर्यावरण की जिम्मेदारी जोड़नी होगी।

देशभर के मंदिर भी पहल कर सकते हैं। हर जन्माष्टमी पर एक पेड़ लगाया जा सकता है। कोई तालाब साफ किया जा सकता है। प्लास्टिक कम किया जा सकता है। पशु कल्याण के लिए सहयोग किया जा सकता है।

यही भक्ति को कर्म में बदलना होगा।

कृष्ण हमारे लिए राधा के प्रियतम हैं। वे यशोदा के नटखट कन्हैया हैं। वे गोपाल हैं, गोविंद हैं, कालिया के संहारक हैं और गोवर्धन उठाने वाले हैं। वे अर्जुन के सारथी और गीता के महान उपदेशक भी हैं।

लेकिन आज हमें एक और कृष्ण को याद करना चाहिए, 

पेड़ों के मित्र, गायों के रक्षक, गोवर्धन के संरक्षक और यमुना के प्रियतम कृष्ण।

जन्माष्टमी की भव्यता जरूरी है। यह हमारी संस्कृति और आस्था को जीवित रखती है। लेकिन असली जन्माष्टमी आधी रात के बाद शुरू होनी चाहिए।

अगली सुबह एक साफ नदी हो।

एक हरा-भरा उपवन हो।

एक स्वस्थ गाय हो।

एक सुरक्षित पहाड़ी हो।

और एक ऐसा मनुष्य हो, जो प्रकृति की जिम्मेदारी समझता हो।

अगर कृष्ण हर जीव में हैं, तो प्रकृति की रक्षा केवल पर्यावरण सेवा नहीं है।

वह भक्ति है।

इस जन्माष्टमी कृष्ण को यही सबसे सुंदर शुभकामना हो सकती है, 

जय श्रीकृष्ण!

और यमुना को जीने दो।



Wednesday, September 2, 2026

 यमुना रिवर कनेक्ट : एक नदी को संरक्षित रखने की जिद  

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बृज खंडेलवाल  द्वारा 

4 सितंबर 2026  

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ताजमहल आगरा की पहचान है, लेकिन यमुना उसकी आत्मा है। पिछले एक दशक से अधिक समय से रिवर कनेक्ट अभियान इसी भूली हुई नदी को शहर की चेतना में वापस लाने की कोशिश कर रहा है।  

2014-15 में शुरू हुई यह नागरिक मुहिम महज सफाई अभियान नहीं थी। इसका असली मकसद था लोगों को यमुना से फिर जोड़ना। इसके लिए आरती हुई, श्रमदान हुए, पदयात्राएं निकलीं, हवन हुए, हस्ताक्षर अभियान चले और कभी-कभी विरोध का तरीका इतना अनोखा रहा कि राष्ट्रीय मीडिया का भी ध्यान खींच गया।  

आरती से आंदोलन तक  

एत्माद-उद-दौला व्यू पॉइंट पर शुरू हुई दैनिक यमुना आरती इस अभियान की सबसे स्थायी पहचान बन गई। 2015 से हर शाम बड़ी संख्या में लोग आरती के लिए जुटने लगे। अभियान के सदस्य गोस्वामी नंदन श्रोत्रिय बताते हैं कि श्रद्धालुओं और कार्यकर्ताओं की संख्या लगातार बढ़ती गई।  

लेकिन यह आरती सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं थी। आरती के बाद यमुना की हालत, प्रदूषण, कचरा, पानी की कमी और सरकारी वादों पर चर्चा होती थी। एनडीटीवी स्वच्छ इंडिया ने भी अभियान की दैनिक आरती और रविवार के सफाई अभियानों को प्रमुखता दी। इन सफाई अभियानों में आमतौर पर 30-40 स्वयंसेवक आते थे और कई बार संख्या सौ से ऊपर पहुंच जाती थी।  

रिवर कनेक्ट का दर्शन साफ था; पहले लोगों को नदी तक वापस लाओ, फिर नदी बचाने की लड़ाई को जन आंदोलन बनाओ।  

जब पानी नहीं था, हुआ रेत स्नान  

मई 2016 में अभियान ने ऐसा प्रदर्शन किया जिसे लंबे समय तक याद रखा गया। कार्यकर्ताओं ने यमुना किनारे रेत स्नान किया। पानी की जगह शरीर पर नदी की सूखी रेत मलकर उन्होंने एक असहज सवाल खड़ा किया: जब नदी में पानी ही नहीं है, तो स्नान कैसे होगा? उन्होंने याद दिलाया कि यमुना का जल संकट हर चुनाव में मुद्दा बनता है, लेकिन चुनाव खत्म होते ही मुद्दा भी गायब हो जाता है।  

गंगा दशहरा पर भी इसी तरह का प्रदर्शन हुआ। आईएएनएस ने इसे “रॉयल सैंड बाथ” के रूप में रिपोर्ट किया। संदेश सीधा था: यमुना को सिर्फ भाषण नहीं, पानी चाहिए।  

कागज की नावों में डूबे सरकारी वादे  

सरकारी वादों पर व्यंग्य करना भी अभियान की खास शैली रही। दिल्ली-आगरा जल परिवहन के वादे की याद दिलाने के लिए कार्यकर्ताओं ने यमुना में कागज और थर्मोकोल की नावें उतारीं।  

द इंडियन एक्सप्रेस ने 2017 में रिपोर्ट किया कि ये नावें ताजमहल की ओर कुछ दूर जाकर डूब गईं। दृश्य अपने आप में पूरा व्यंग्य था: नावें चलाने की तैयारी थी, लेकिन नदी चलने लायक नहीं थी।  

इसी दौरान अभियान ने निर्बाध जलप्रवाह, नदी की सफाई, बाढ़ क्षेत्र की सुरक्षा, राष्ट्रीय नदी नीति और केंद्रीय नदी प्राधिकरण की मांग भी उठाई।  

सफाई से आगे की लड़ाई  

रविवार के सफाई अभियानों में स्वयंसेवकों ने प्लास्टिक, पॉलीथिन, मूर्तियां, कचरा और निर्माण मलबा हटाया। मगर रिवर कनेक्ट ने हमेशा कहा कि नदी किनारे झाड़ू लगाने भर से नदी जीवित नहीं होगी।  

अभियान की असली मांगें कहीं ज्यादा व्यापक हैं: नालों को टैप करना, सीवेज का उपचार, नदी तल की गाद निकालना, ड्रेजिंग, बाढ़ क्षेत्र से अतिक्रमण हटाना और पूरे साल न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह सुनिश्चित करना।  

2023 के विश्व जल दिवस पर सफाई और आरती के साथ इन मांगों को फिर उठाया गया। 2025 में नगर निगम के साथ संयुक्त सफाई अभियानों में स्कूली बच्चे, नागरिक और अधिकारी शामिल हुए। एक बड़े अभियान में करीब 25 ट्रैक्टर-ट्रॉलियां कचरे से भरी गईं।  

झुनझुना दिवस : जब आंदोलन ने व्यंग्य का सहारा लिया  

दिसंबर 2021 में रिवर कनेक्ट ने ‘झुनझुना दिवस’ मनाया। कार्यकर्ताओं ने पांच मिनट तक झुनझुने बजाकर जनप्रतिनिधियों की कथित निष्क्रियता के खिलाफ विरोध जताया।  

बृज खंडेलवाल ने जनप्रतिनिधियों पर यमुना के प्रति उदासीनता का आरोप लगाया। डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य ने व्यंग्य में कहा कि यमुना पहले भी गंदी थी, आज भी गंदी है और जनप्रतिनिधियों की कृपा रही तो आगे भी गंदी रहेगी।  

यह आंदोलन की शैली का नमूना था; जब ज्ञापन बेअसर हों, तो झुनझुना बजाकर सत्ता को जगाओ।  

यमुना केवल नदी नहीं, विरासत है  

रिवर कनेक्ट ने लगातार कहा है कि यमुना का सवाल सिर्फ पर्यावरण का सवाल नहीं है। यह आगरा की विरासत, पर्यटन और अर्थव्यवस्था का भी सवाल है।  

ताजमहल, आगरा किला और कई ऐतिहासिक स्मारक यमुना के किनारे खड़े हैं। द इंडियन एक्सप्रेस ने भी यमुना के प्रदूषण और ताजमहल की सुरक्षा के बीच संबंध को रेखांकित किया है।  

अभियान का सवाल सरल है; अगर ताजमहल के आसपास का संगमरमर बचाया जा सकता है, तो उसके पीछे की नदी क्यों नहीं?  

बारह साल बाद भी मांगें वही  

रिवर कनेक्ट की प्रमुख मांगों में ताजमहल के नीचे बैराज, सालभर न्यूनतम जलप्रवाह, ड्रेजिंग और डी-सिल्टिंग, नालों का टैपिंग, सीवेज ट्रीटमेंट, बाढ़ क्षेत्र से अतिक्रमण हटाना, घाटों का पुनरुद्धार और प्रदूषण फैलाने वालों पर कार्रवाई शामिल हैं।  

इसके साथ अभियान लंबे समय से राष्ट्रीय नदी नीति और केंद्रीय नदी प्राधिकरण की मांग करता रहा है। तर्क है कि नदी प्रशासनिक सीमाओं को नहीं मानती, इसलिए उसका संरक्षण भी विभागों और राज्यों की सीमाओं में बंटा नहीं रह सकता।  

सबसे बड़ी उपलब्धि : नदी को याद रखना  

रिवर कनेक्ट की उपलब्धि सिर्फ हटाए गए कचरे या आयोजित कार्यक्रमों में नहीं है। उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने आगरा को उसकी नदी याद दिलाई।  

दैनिक आरती ने यमुना को सार्वजनिक जीवन में लौटाया। सफाई अभियानों ने नागरिक भागीदारी पैदा की। रेत स्नान ने पानी की त्रासदी दिखाई। कागज की नावों ने सरकारी वादों का मजाक उड़ाया। झुनझुना दिवस ने राजनीतिक उदासीनता पर चोट की।  

सरकारें बदलती रहीं। योजनाएं आती रहीं। समितियां बनती रहीं। घोषणाएं होती रहीं। लेकिन यमुना आज भी पानी और प्रवाह के लिए तरस रही है।  

फिर भी उसकी शामें पूरी तरह अंधेरी नहीं हैं। एत्माद-उद-दौला के किनारे हर शाम जलते दीप एक सवाल उठाते हैं: क्या ताजमहल को बचाकर उसकी नदी को मरने दिया जा सकता है?  

रिवर कनेक्ट का जवाब है: नहीं।  

यमुना को सिर्फ साफ नहीं करना है। उसे फिर से जीवित, अविरल, निर्मल और सम्मानित नदी बनाना है।


 भारत सरकार श्वेत पत्र जारी करे।

कोविड का रहस्य सुलझाने के लिए UN कराए निष्पक्ष जांच

छह साल बाद भी वह खौफनाक रात हमारा पीछा कर रही है

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

3 सितंबर 2026

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मार्च 2020 की वह काली रात याद है? सन्नाटा चीरती एंबुलेंस की चीखें। वीरान सड़कें, बंद हवाई अड्डे, ताले लगे स्कूल, अस्पतालों के बाहर मौत का इंतज़ार करती कतारें। एक खांसी डर बन जाती थी, एक छींक आफत। लोग अपने ही घरों में क़ैद थे, परिवार दूर, डॉक्टर-नर्सें टूटते जा रहे थे। कई लोग अपनों को आखिरी बार छू भी नहीं सके।

दुनिया उस बुरे सपने से बाहर तो निकल आई, लेकिन उसके सवाल अब भी जागते हैं।

वायरस आया कहां से? प्रकृति से, या इंसान और वन्यजीवों के बढ़ते टकराव से? यह वायरस के प्राकृतिक विकास की घटना थी, या इसमें किसी प्रयोगशाला की भी भूमिका रही? छह साल बाद भी इनका पूरा जवाब हमारे पास नहीं है।

मास्क गायब हो चुके हैं, हवाई अड्डे फिर भीड़ से भरे हैं, बच्चे स्कूल लौट आए हैं ,  मगर सामान्य जीवन का लौटना सवालों का अंत नहीं है। इसीलिए संयुक्त राष्ट्र को कोविड-19 की उत्पत्ति और महामारी से निपटने के तरीके की एक स्वतंत्र, निष्पक्ष, अंतरराष्ट्रीय जांच का समर्थन करना चाहिए। यह किसी को दोषी ठहराने की मांग नहीं, सच जानने की मांग है।


SARS-CoV-2 अचानक सामने आया और पूरी दुनिया में फैल गया। प्राकृतिक उत्पत्ति की संभावना आज भी गंभीरता से मौजूद है, और प्रयोगशाला दुर्घटना की बहस भी खत्म नहीं हुई ,  लेकिन किसी एक को निर्णायक रूप से साबित करने वाला पूरा प्रमाण अब तक सामने नहीं आया। यह फर्क समझना ज़रूरी है: प्रयोगशाला की संभावना का मतलब जानबूझकर वायरस फैलाना नहीं, और रहस्य बने रहना अपने आप में साजिश का सबूत नहीं। पर इतनी बड़ी ऐतिहासिक त्रासदी के साथ अनिश्चितता को हमेशा के लिए स्वीकार भी नहीं किया जा सकता। शुरुआती आंकड़ों, नमूनों और रिकॉर्ड तक पहुंच पर सवाल उठते रहे हैं। कोई निश्चित मध्यवर्ती पशु मेजबान भी आज तक नहीं मिला। दुनिया को अटकलें नहीं, सबूत चाहिए।


किसी के लिए यह कुछ दिनों की खांसी थी, किसी दूसरे के लिए मौत। कुछ स्वस्थ लोग अचानक गंभीर हालत में पहुंचे, तो कुछ संक्रमित परिवार के साथ रहकर भी बचे रहे — इन्हें अनौपचारिक रूप से "सुपरडॉजर" कहा गया। उम्र, जेनेटिक्स और प्रतिरक्षा इस अंतर की काफी हद तक व्याख्या करते हैं, फिर भी विज्ञान अब तक इस पहेली के सारे टुकड़े नहीं जोड़ पाया , एक ही वायरस किसी में हल्का तूफान क्यों बनता है और किसी दूसरे में तबाही?


लाखों लोगों के लिए कोविड बुखार उतरने के साथ खत्म नहीं हुआ। थकान, सांस फूलना, ब्रेन फॉग, नसों की परेशानी ;  आज इसे लॉन्ग कोविड कहा जाता है। प्रतिरक्षा प्रणाली में बदलाव, लगातार सूजन, ऑटोइम्यून प्रतिक्रिया और शरीर में वायरस के अवशेष रहने जैसी कई परिकल्पनाएं जांची जा रही हैं, पर एक भी सार्वभौमिक व्याख्या, आसान जांच या जादुई इलाज नहीं मिला। लाखों के लिए यह रहस्य आज भी निजी त्रासदी है।


आधिकारिक आंकड़े ही भयावह हैं, पर असली कीमत कहीं ज्यादा हो सकती है। अतिरिक्त मृत्यु दर के अध्ययन बताते हैं कि प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष मौतें दर्ज संख्या से काफी अधिक रही होंगी। कुछ अस्पताल न मिलने से मरे, कुछ ऑक्सीजन के अभाव में, कुछ का टला कैंसर इलाज या ऑपरेशन जानलेवा साबित हुआ, कुछ बुजुर्ग बिल्कुल अकेले चले गए। और आंकड़ों से बाहर भी एक विशाल नुकसान हुआ ;  पढ़ाई रुकी, रोजगार गए, अकेलापन और मानसिक आघात बढ़ा। महामारी की पूरी कीमत शायद अब तक गिनी ही नहीं गई।


आंकड़े उस दर्द को नहीं बताते जो अस्पतालों के भीतर था। मरीज परिवार का हाथ थामे बिना मर रहे थे, रिश्तेदार मोबाइल स्क्रीन पर आखिरी बार अपनों को देख रहे थे, डॉक्टर-नर्स लगातार काम करते हुए इस डर में जी रहे थे कि संक्रमण उनके घर न पहुंच जाए। जो बचकर लौटे, उनमें से कई तुरंत सामान्य जीवन में नहीं लौट पाए ,  कमजोरी, डर और सामने हुई मौतों की यादें आज भी उनका पीछा करती हैं। कोविड सिर्फ स्वास्थ्य संकट नहीं था; यह डर, अकेलेपन, शोक और इंसानी सहनशक्ति की वैश्विक परीक्षा थी।


इंसान दशकों से जंगल काट रहा है, वन्यजीवों के करीब बढ़ रहा है, शहर लगातार फैला रहा है ,  इंसान और दूसरे जीवों के बीच दूरी घट रही है। ऐसे में नई संक्रामक बीमारियों का खतरा काल्पनिक नहीं है। हो सकता है कोविड इस बढ़ते असंतुलन की चेतावनी हो, या वायरस के प्राकृतिक विकास की घटना हो, या मानव गतिविधियों ने किसी प्राकृतिक जोखिम को वैश्विक आपदा में बदलने में भूमिका निभाई हो। सच जो भी हो, हमें पूरी तरह मालूम नहीं ,  और यही वजह है कि जांच जरूरी है।


दुनिया कोविड को भूलना चाहती है, यह स्वाभाविक है। पर इतिहास को भूलना अगली त्रासदी को न्योता देना है। हमें उत्पत्ति पर पारदर्शिता चाहिए, बेहतर महामारी निगरानी चाहिए, मजबूत जैव-सुरक्षा चाहिए, लॉन्ग कोविड पर गंभीर शोध चाहिए, और यह जांचने की ज़रूरत है कि कुछ देशों की स्वास्थ्य व्यवस्थाएं संकट में इतनी जल्दी क्यों चरमरा गईं। यह जांच किसी सरकार, संस्था या विचारधारा के नियंत्रण में नहीं होनी चाहिए ,  स्वतंत्र, निष्पक्ष, अंतरराष्ट्रीय और सबूतों पर आधारित होनी चाहिए। यह किसी पसंदीदा सिद्धांत को सही ठहराने या साजिश की कहानियां फैलाने की कवायद नहीं, तथ्यों की तलाश है।

विज्ञान तब कमजोर नहीं होता जब वह कहता है "हमें नहीं पता" ,  वह तब मजबूत होता है जब कहता है "आइए, पता लगाते हैं।"

एक अदृश्य सूक्ष्म जीव ने अर्थव्यवस्थाएं रोक दीं, शहर खाली कर दिए, परिवार बांट दिए, और उस सभ्यता के अहंकार को चोट पहुंचाई जो मानती थी कि उसने प्रकृति को काबू में कर लिया है। सच जो भी हो, उसे जानना ज़रूरी है ,  क्योंकि अगली महामारी शायद हमें छह साल का समय न दे।

छह साल बाद दुनिया आगे बढ़ चुकी है, पर कोविड के सवाल अब भी जिंदा हैं। उन्हें दफनाने के बजाय, अब समय है उनका सामना करने का। संयुक्त राष्ट्र निष्पक्ष अंतरराष्ट्रीय जांच का रास्ता खोले। इतिहास को जवाब चाहिए, भविष्य को सबक।

Monday, August 31, 2026

 बहुतों को नहीं पता !!

किसने की थी साज़िश? 

संस्कृत का वो गीत जो नहीं बन सका राष्ट्र गान!!

जब भारत माता संस्कृत में गाने लगीं, तो दिल्ली ने कान क्यों बंद कर लिए?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

3 सितंबर 2026

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जयति जयति भारत माता!

कितना सरल, कितना मधुर और कितना भारतीय उद्घोष है। 

फिर सवाल उठता है, आज़ादी के बाद जब देश अपनी नई पहचान तलाश रहा था, तब ऐसा सुंदर संस्कृत गीत राष्ट्रीय मंच तक क्यों नहीं पहुंच पाया?

यह गीत दक्षिण भारत के महान कर्नाटक संगीतकार मयूरम विश्वनाथ शास्त्री (1893–1958) ने रचा था। आजादी के आसपास उन्होंने भारत माता और महात्मा गांधी की प्रशंसा में संस्कृत गीतों का संग्रह भारत भजन तैयार किया था जिसमें 18 गीत थे।

जयति जयति भारत माता उन्हीं गीतों में से एक था। इसकी धुन राग खमास में है। शब्द सरल हैं और भाव बहुत व्यापक है। भारत माता सभी की माता हैं। वह किसी जाति, भाषा या क्षेत्र में भेद नहीं करतीं। वह सज्जनों की रक्षा करती हैं और गिरे हुए लोगों को भी अपनाती हैं।

यानी आज के भारत की 'एकता में अनेकता' वाली भावना इसमें खूब दिखाई देती है।

फिर यह गीत राष्ट्रीय गीत क्यों नहीं बना?

यहीं से कहानी थोड़ी दिलचस्प हो जाती है।

आज़ादी के बाद राष्ट्रीय पहचान के प्रतीकों को लेकर काफी विचार-विमर्श हुआ। अंततः जन गण मन को राष्ट्रगान बनाया गया और वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत का सम्मान मिला।

दोनों के पीछे लंबा स्वतंत्रता आंदोलन था। जन गण मन को देशभर में पहचान मिल चुकी थी। वंदे मातरम् तो आजादी की लड़ाई का जोशीला नारा बन चुका था।

जयति जयति भारत माता की स्थिति अलग थी। यह अपेक्षाकृत नया गीत था। इसका प्रसार मुख्यतः दक्षिण भारत और कर्नाटक संगीत की दुनिया में था। दिल्ली की राजनीतिक गलियों में इसकी उतनी पहुंच नहीं थी।

लेकिन यहीं एक सवाल पैदा होता है।

क्या आजादी के शुरुआती वर्षों में कांग्रेस नेतृत्व, नेहरू सरकार और सांस्कृतिक संस्थाओं को भारत की दूसरी भाषाई और संगीत परंपराओं को राष्ट्रीय मंच देने की ज्यादा कोशिश नहीं करनी चाहिए थी?

नेहरू और उस दौर के नेताओं के सामने एक विशाल और जटिल देश था। राष्ट्रगान चुनना कोई संगीत प्रतियोगिता नहीं थी। उसमें इतिहास, स्वतंत्रता आंदोलन, सामूहिक स्वीकार्यता और सरकारी समारोहों में प्रस्तुति जैसे कई सवाल जुड़े थे।

फिर भी, दक्षिण भारत से आए इस संस्कृत गीत को राष्ट्रीय स्तर पर ज्यादा प्रचार क्यों नहीं मिला, यह सवाल पूछने में कोई हर्ज नहीं है।

संस्कृत होने का भी सवाल है

संस्कृत भारत की प्राचीन भाषा है। वह उत्तर की भी है और दक्षिण की भी। मंदिरों, दर्शन, साहित्य और शास्त्रीय संगीत की विशाल परंपरा उससे जुड़ी है।

फिर भी आजादी के बाद राष्ट्र निर्माण की राजनीति में भाषा का सवाल बेहद संवेदनशील था। हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी और क्षेत्रीय भाषाओं के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं था।

ऐसे माहौल में संस्कृत के किसी गीत को राष्ट्रीय प्रतीक बनाना शायद राजनीतिक रूप से आसान विकल्प नहीं माना गया।

लेकिन अगर ऐसा था, तो सवाल और बड़ा हो जाता है: 

क्या भारत की प्राचीन भाषाई विरासत को राजनीति के डर से पीछे कर दिया गया?

इसका सीधा दोष केवल जवाहरलाल नेहरू पर डालना इतिहास को कुछ ज्यादा सरल बना देना होगा। लेकिन नेहरू और तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व से यह सवाल जरूर पूछा जा सकता है कि उन्होंने भारत की विविध सांस्कृतिक परंपराओं को राष्ट्रीय मंच पर लाने के लिए कितना प्रयास किया।

गीत बच गया, लेकिन इतिहास की किताब में नहीं आया।

दिलचस्प बात यह है कि जयति जयति भारत माता , मरा नहीं। दक्षिण भारत के कर्नाटक संगीत जगत ने इसे अपने दिल में बचाए रखा।

महान गायक जी. एन. बालसुब्रमण्यम, जिन्हें संगीत की दुनिया में असाधारण स्थान प्राप्त था, ने इसे गाया। मदुरै मणि अय्यर और दूसरे कलाकारों ने भी इसे लोकप्रिय बनाया।

आज भी स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के अवसर पर यह गीत सुनाई देता है।

लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर इसकी पहचान अभी भी सीमित है।

भारत में अक्सर ऐसा होता है।

दिल्ली में जो गूंजता है, वह पूरे देश का गीत बन जाता है। जो चेन्नई, मैसूर, तंजावुर या मदुरै में गूंजता है, उसे 'क्षेत्रीय' कहकर छोड़ दिया जाता है।

शायद यही इस गीत की सबसे बड़ी विडंबना है।

भारत माता की स्तुति संस्कृत में हुई, धुन दक्षिण भारत से आई, भाव पूरे भारत का था, लेकिन राष्ट्रीय मंच ने उसे पूरी तरह अपना नहीं पाया।

आज, आजादी के इतने वर्षों बाद, इस गीत को फिर से सुनने की जरूरत है।

राष्ट्रगान बदलने की जरूरत नहीं है। राष्ट्रीय गीत की गरिमा भी अपनी जगह है।

लेकिन भारत की सांस्कृतिक विरासत कोई सरकारी फाइल नहीं है, जिसमें केवल दो-चार नाम दर्ज हों।

भारत माता के गीत जितने ज्यादा होंगे, भारत की आवाज उतनी ही समृद्ध होगी।

और शायद आज फिर कोई पूछ सकता है: 

जयति जयति भारत माता तो तब भी थीं, आज भी हैं।

फिर हमने उनकी यह आवाज इतनी देर से क्यों सुनी?

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जयति जयति भारत माता

जयति जयति भारत-माता बुध-गीता।

निखिल-माता वन-निरता नत-जन-सुहिता॥

सरल अर्थ:

भारत माता की जय हो, जय हो। विद्वान लोग उनका गुणगान करते हैं। वे सभी की माता हैं और प्रकृति तथा वनों से प्रेम करने वाली हैं। जो लोग उनके सामने श्रद्धा से झुकते हैं, उनका वे कल्याण करती हैं।

सकल-जीव-समता साधु-साधु-विदिता।

अखिल-लोक-पृथिता परमानन्द-समुदिता॥

सरल अर्थ:

भारत माता सभी जीवों को समान मानती हैं। सज्जन उनके गुणों को जानते और पहचानते हैं। उनकी ख्याति पूरे संसार में फैली है और वे परम आनंद से भरी हुई हैं।

अगणित-गुण-शीला अति-दयाल-बाला।

प्रकटित-शुभ-जाला पतित-प्राण-लोला॥

सरल अर्थ:

भारत माता अनगिनत गुणों से सम्पन्न हैं। वे अत्यंत दयालु हैं। उनके भीतर शुभ और मंगलकारी गुणों का प्रकाश है। गिरे हुए और दुखी लोगों के प्रति भी उनका हृदय करुणा से भर जाता है।

पण्डित-परिपूजिता पाप-सङ्ग-विवर्जिता।

खण्डित-खल-चेष्टिता अखण्ड-देश-वेष्टिता॥

सरल अर्थ:

विद्वान लोग भारत माता की पूजा और सम्मान करते हैं। वे पाप और बुराई से दूर हैं। वे दुष्टों की बुरी कोशिशों को विफल करती हैं और पूरे अखंड भारत को अपने आँचल में समेटे हुए हैं।

गीत का मूल भाव

इस गीत की सबसे सुंदर बात यह है कि इसमें भारत माता को किसी एक धर्म, जाति या क्षेत्र की माता नहीं, बल्कि सभी की माता के रूप में देखा गया है। समानता, करुणा, प्रकृति-प्रेम, सद्गुण और अखंडता इसके प्रमुख भाव हैं।

और शायद यही बात इसे आज भी प्रासंगिक बनाती है: भारत की कल्पना केवल एक भूगोल के रूप में नहीं, बल्कि एक करुणामयी और सबको साथ लेकर चलने वाली माता के रूप में की गई है।

 कब तक पुकारें?

प्रिय आगरा के नेताओं, 

कुछ तो शर्म करो


अब ताज की आड़ में मत छिपिए!

नया टूरिस्ट सीजन शुरू होने को है।

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

2 सितंबर 2026

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ताजमहल बेशक चमक रहा है। मगर आगरा परेशान है। दुनिया ताज की तस्वीरें खींचती है। आगरा के लोग गड्ढों, जाम, गंदे नालों, सीवर, जलभराव और धूल की तस्वीरें खींच रहे हैं।

प्रिय आगरा के नेताओं और शहरी नियोजकों, अब फैसला आपको करना है: आप ताज को बचा रहे हैं या सिर्फ ताज की चमक को बेच रहे हैं?

अक्टूबर से पर्यटन सीजन शुरू होगा। देश-विदेश से लाखों लोग आगरा आएंगे। उन्हें ताजमहल तो शानदार मिलेगा। लेकिन उसके आसपास का शहर क्या उन्हें शर्मिंदा करेगा?

आप के पास बहाने नहीं, सत्ता है।

2022 में भाजपा ने आगरा की सभी नौ विधानसभा सीटें जीतीं। दोनों लोकसभा सीटें भी भाजपा के पास हैं। नगर निगम में भी भाजपा का नेतृत्व है।

इतना मजबूत राजनीतिक जनादेश किसी भी शहर को बदलने के लिए पर्याप्त होना चाहिए।

फिर सवाल उठता है:

यमुना अब भी गंदी क्यों है?

सड़कें बार-बार क्यों धंसती हैं?

हर बारिश में शहर क्यों डूबता है?

ट्रैफिक रोज क्यों रेंगता है?

जनादेश सिर्फ कुर्सी नहीं देता।

जनादेश जवाबदेही भी देता है।

यमुना: घोषणाओं की नदी

यमुना के नाम पर योजनाएं बनती रही हैं। करोड़ों रुपये स्वीकृत होते रहे हैं। एसटीपी बनते रहे हैं। नालों की टैपिंग के निर्देश जारी होते रहे हैं।

लेकिन नदी आज भी सीवर ढो रही है।

आगरा रोज करीब 280-300 एमएलडी सीवेज पैदा करता है। नई उपचार क्षमता जुड़ रही है। फिर भी सभी नालों का पूरा इंटरसेप्शन और एसटीपी का लगातार मानकों के अनुसार संचालन अभी अधूरा है।

तो सवाल सीधा है?

पैसा कहां गया, काम कितना हुआ और नदी कब साफ होगी?

यमुना को एक और योजना नहीं चाहिए। उसे परिणाम चाहिए।

जब पार्षद को नाले में उतरना पड़े

जून में एक  पार्षद ने गंदे नाले में खड़े होकर अपना जन्मदिन मनाया। उनका दावा था कि तीन साल में 30 से ज्यादा शिकायतें देने के बावजूद समस्या जस की तस रही।

तस्वीर वायरल हुई। सवाल भी उठा।

लेकिन असली सवाल यह है: 

क्या किसी निर्वाचित प्रतिनिधि को अपनी ही व्यवस्था जगाने के लिए नाले में उतरना चाहिए?

अगर पार्षद की शिकायत नहीं सुनी गई, तो आम आदमी किस उम्मीद से दरवाजा खटखटाए?

सड़कें विकास की परीक्षा हैं

अगस्त की बारिश में कई जगह सड़कें धंस गईं। कहीं विशाल गड्ढे बने। कहीं एक महीने में दूसरी या तीसरी बार सड़क बैठ गई।

अधिकारी कभी सीवर लीकेज, कभी पाइपलाइन को कारण बताते हैं।

लेकिन जनता पूछ रही है:

सड़क बनाने से पहले नीचे की जमीन और पाइपलाइन किसने जांची?

किसने डिजाइन मंजूर किया?

किसने गुणवत्ता प्रमाणित की?

किस ठेकेदार ने काम किया?

गारंटी क्या थी?

और सड़क टूटने पर जिम्मेदारी किसकी तय हुई?

हर बार सड़क बनाना समाधान नहीं है।

पहले यह पता लगाइए कि सड़क बार-बार टूट क्यों रही है।

हर मानसून शहर क्यों डूबता है?

बालूगंज से दयालबाग तक। शास्त्रीपुरम से आईएसबीटी तक। यमुना किनारे से वीआईपी रोड तक।

बारिश होते ही कई सड़कें तालाब बन जाती हैं।

फिर वही दृश्य: जाम, डूबे वाहन, दुकानों में पानी और परेशान नागरिक।

क्या बारिश अचानक होती है?

नहीं।

मानसून हर साल आता है।

फिर तैयारी हर साल अधूरी क्यों रहती है?

यह मौसम की समस्या कम और शहरी नियोजन की विफलता ज्यादा है।

ट्रैफिक: डायवर्जन कोई नीति नहीं

आगरा में ट्रैफिक प्रबंधन अक्सर डायवर्जन के भरोसे चलता है।

त्योहार आया: डायवर्जन।

धार्मिक आयोजन हुआ: डायवर्जन।

भारी वाहन बढ़े: डायवर्जन।

पर्यटक बढ़े: फिर डायवर्जन।

लेकिन कब बनेगा स्थायी समाधान?

आगरा को चाहिए: 

एक दीर्घकालिक मोबिलिटी प्लान।

बेहतर सार्वजनिक परिवहन।

व्यवस्थित पार्किंग।

सुरक्षित फुटपाथ।

पैदल पर्यटकों के लिए रास्ते।

बेहतर ट्रैफिक सिग्नल समन्वय।

एक विश्वस्तरीय पर्यटन शहर जुगाड़ से नहीं चलता।

वह योजना से चलता है।

शहरी नियोजकों से भी हिसाब चाहिए

सारी जिम्मेदारी नेताओं की नहीं है।

नगर नियोजक, इंजीनियर, आर्किटेक्ट और संबंधित विभाग भी उतने ही जवाबदेह हैं।

क्या मास्टर प्लान आज की आबादी और वाहनों के हिसाब से तैयार है?

क्या नए निर्माण से पहले जलनिकासी की क्षमता देखी जाती है?

क्या तालाब, प्राकृतिक नाले और जलमार्ग सुरक्षित हैं?

क्या फुटपाथ वास्तव में पैदल चलने वालों के लिए हैं?

क्या शहर कारों के लिए बनाया जा रहा है या नागरिकों के लिए?

अगर इन सवालों के जवाब नहीं हैं, तो विकास किस दिशा में जा रहा है?

स्मार्ट सिटी या स्मार्ट मेकअप?

नई दीवार। नया रंग। नया गेट। नया उद्घाटन।

फोटो खिंचती है। खबर छपती है। फीता कटता है।

लेकिन क्या इससे सीवर रुकता है?

क्या इससे जलभराव खत्म होता है?

क्या इससे ट्रैफिक कम होता है?

क्या इससे सड़क मजबूत होती है?

सजावट विकास नहीं है।

आगरा को फोटो के लिए सुंदर नहीं, जीवन के लिए बेहतर बनाना होगा।

अब हर नेता से एक सवाल

अक्टूबर में पर्यटक आएंगे।

इसलिए आगरा के हर सांसद, विधायक, मेयर और पार्षद से पूछिये।

एक अक्टूबर तक क्या बदलेगा?

कौन-से नाले पूरी तरह टैप होंगे?

कौन-से एसटीपी पूरी क्षमता से चलेंगे?

कौन-सी सड़कें स्थायी रूप से ठीक होंगी?

कहां जलभराव खत्म होगा?

ट्रैफिक के लिए क्या स्थायी कदम उठेंगे?

कितने पार्क और तालाब बचेंगे?

हर घोषणा के साथ समयसीमा हो। जिम्मेदार अधिकारी का नाम हो। प्रगति की सार्वजनिक रिपोर्ट हो।

और अगर काम नहीं हुआ?

तो जिम्मेदारी भी सार्वजनिक हो।

व्हाट्सऐप से आगे बढ़िए

आगरा के नागरिक भी अब सिर्फ शिकायतकर्ता न रहें।

हर गड्ढे की तस्वीर डालना काफी नहीं है। हर बारिश में वीडियो बनाना काफी नहीं है। हर बार व्हाट्सऐप पर गुस्सा निकालना भी काफी नहीं है।

सवाल पूछिए।

जनसुनवाई मांगिए।

समयसीमा मांगिए।

प्रगति रिपोर्ट मांगिए।

लोकतंत्र में वोट पांच साल में एक बार पड़ता है। सवाल हर दिन पूछा जा सकता है।

ताजमहल को किसी प्रचार की जरूरत नहीं है।

उसे बनाने वाले लोग सदियों पहले चले गए। उसकी खूबसूरती आज भी कायम है।

अब आज के नेताओं की बारी है।

वे इतिहास में क्या छोड़ेंगे?

एक और उद्घाटन पट्टिका?

या ऐसा आगरा, जहां यमुना साफ हो, सड़कें मजबूत हों, बारिश में शहर न डूबे, ट्रैफिक चले और नागरिक सम्मान से जी सकें?

ताज दुनिया की धरोहर है।

आगरा यहां के लोगों का घर है।

ताज को दुनिया बचा लेगी।

आगरा को उसके नेताओं और नागरिकों को बचाना होगा।

अब ताज की चमक के पीछे छिपने का वक्त खत्म हुआ।

प्रिय नेताओं,

ताज की तस्वीरें बहुत हो गईं।

अब आगरा का रिपोर्ट कार्ड दिखाइए।

Sunday, August 30, 2026

 


सितंबर आते ही बज उठती थी Come September 

पूरा इंडिया नचा था हॉलीवुड की इस फिल्मी टयून पर

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

1 September 2026

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जरा आंखें बंद कीजिए। धूल भरी सड़क है, आगे घोड़ी पर दूल्हा है, पीछे बारातियों की भीड़। अचानक बैंड वाला अपनी तुरही उठाता है और ऐसी धुन छेड़ देता है कि बूढ़े की मूंछ भी फड़कने लगे और जवान के पैर अपने-आप थिरकने लगें। 

यही था वह दौर, जब ‘Come September’ की धुन ने भारत की शादियों, पिकनिकों और महफिलों में ऐसी दस्तक दी कि वह विदेशी होकर भी बिल्कुल अपनी लगने लगी।

साठ के दशक में हॉलीवुड फिल्म Come September  भारत पहुंची और देखते ही देखते उसकी धुन दिलों पर छा गई।

इस धुन को बॉबी डैरिन ने रचा था। फिल्म में उनके साथ रॉक हडसन, जीना लोलोब्रिजिडा और सैंड्रा डी जैसे सितारे थे। डैरिन ने बारह-तार वाले गिटार पर इसकी शुरुआती धुन तैयार की थी। मकसद था: रोमांस भी हो, लय भी हो और उसमें थोड़ी शरारत भी। नतीजा ऐसा निकला कि गिटार, मैंडोलिन, एकॉर्डियन और बोंगो की आवाजें मिलकर ऐसी दिलकश रवानी पैदा कर गईं, कि बस हर कोई ट्विस्ट करने को आतुर।

भारत में इस धुन को किसी तर्जुमे की जरूरत नहीं पड़ी। इसमें बोल नहीं थे, लेकिन कहानी पूरी थी। उसमें जवानी थी, आजादी का अहसास था और जिंदगी को थोड़ा खुलकर जीने की गुंजाइश भी। मोहल्लों में बारात निकलती तो बैंड वाले फिल्मी गीतों के साथ पश्चिमी धुनों का भी तड़का लगा देते। ‘Come September’ बजते ही बारात का अनुशासन अक्सर छुट्टी पर चला जाता था। दूल्हे के रिश्तेदार, पड़ोसी और रास्ते के तमाशबीन, सबके पैर अपनी-अपनी पॉलिटिक्स करने लगते थे।

फिर बहुत सालों बाद आई: दूसरी कमाल की धुन, ब्राजील। आर्य बारोसो की मशहूर ब्राजीली रचना Aquarela do Brasil, जिसे दुनिया ने अलग-अलग वाद्य और ऑर्केस्ट्रा संस्करणों में जाना, भारत में भी एक खास पहचान बना चुकी थी। खासकर बैंड बाजों और ऑर्केस्ट्रा की दुनिया में इसकी लय ऐसी घुसी कि शहर ही नहीं, दूरदराज के कस्बों और गांवों की शादियों तक में इसकी गूंज सुनाई देती थी। कई बार बारातियों को यह भी मालूम नहीं होता था कि धुन ब्राज़ील की है। उनके लिए वह बस ‘बैंड वाले की जबरदस्त धुन’ थी।

यही तो संगीत का कमाल है। पासपोर्ट उसका अपना होता है, लेकिन दिलों पर कोई वीजा नहीं लगता।

‘Come September’ और ‘Brazil’ जैसी धुनों ने भारत में एक अजीब सांस्कृतिक घालमेल पैदा किया। ब्राज़ील की लय, हॉलीवुड की धुन और भारतीय बारात, तीनों एक ही सड़क पर मिल गए।  शादी की रौनक में ऐसा घुल जाता था जैसे समोसे में चटनी।

‘Come September’ की सबसे बड़ी ताकत उसकी सादगी थी। धुन ऊपर जाती, नीचे आती और कानों में अटक जाती।  उस समय के ‘ट्विस्ट’ और आज के ‘फ्री स्टाइल’ के बीच शायद कोई औपचारिक समझौता नहीं था, लेकिन पैर अपना फैसला खुद कर लेते थे। विदेशी धुन भारतीय शादी के लिए तैयार थी, बस उसमें ढोल, नगाड़ा और थोड़ी देसी बेफिक्री जोड़नी थी।

बॉलीवुड भी भला पीछे कैसे रहता?

भारतीय संगीतकारों ने ‘Come September’ की लय और सुरों से प्रेरणा ली। इसकी छाप कई गीतों और बैकग्राउंड स्कोर में दिखाई दी। Hamraaz जैसी फिल्मों में इसकी गूंज महसूस हुई। बाद के दशकों में भी इसकी धुन नए रूपों में लौटती रही। राजा का ‘नजरें मिलीं, दिल धड़का’ और दूसरे लोकप्रिय गीतों में भी इस तरह की पश्चिमी लय का असर सुनाई दिया। भारतीय संगीतकार विदेशी धुनों को सुनते, उनमें से कोई टुकड़ा पकड़ते और उसे अपनी मिट्टी में रोप देते। फिर उससे एक नया पौधा निकलता, जिसमें विदेशी खुशबू भी होती और देसी रंग भी।


साठ और सत्तर के दशक की शादियों को याद कीजिए। न डीजे था, न लेजर लाइट, न कान फोड़ने वाले स्पीकर। एक बैंड था, कुछ चमकती तुरहियां थीं, ढोल था और उत्साहित बाराती थे। फिर भी मजा कम नहीं था। बल्कि शायद ज्यादा था।

आज बारात में डीजे होता है और गाने की आवाज इतनी तेज होती है कि दूल्हे को भी पता नहीं चलता कि उसकी शादी हो रही है या चुनाव प्रचार। उस जमाने में एक अच्छी धुन ही काफी थी।

‘Come September’ इसलिए याद रह गई क्योंकि उसने संगीत को केवल सुनने की चीज नहीं रहने दिया। उसने लोगों को चलाया, झुमाया और कुछ देर के लिए सामाजिक लिहाज की जंजीरें ढीली कर दीं।

‘Brazil’ ने भी यही काम अपनी अलग लय में किया। उसकी मस्ती भरी चाल ने भारतीय बारातों को बताया कि दुनिया बहुत बड़ी है, लेकिन नाचने के लिए जगह हर जगह मिल सकती है।

साठ साल से ज्यादा गुजर गए। लेकिन कभी-कभी किसी पुराने विवाह समारोह में वह धुन सुनाई पड़ जाती है तो बीता हुआ जमाना अचानक लौट आता है।

धूल उड़ती सड़क, रंगीन कपड़े, घोड़ी पर बैठा दूल्हा, हाथ में फूलों की माला और आगे-आगे उछलता बाराती।

तुरही बजती है: ‘Come September…’

और कहीं दूर से ‘Brazil’ की लय मिल जाती है।

तब समझ आता है कि संगीत की कोई सरहद नहीं होती। हॉलीवुड की धुन हो या ब्राज़ील की लय; भारत की बारात उसे अपना बना लेती है।

Saturday, August 29, 2026

 


यूपी की हवा में कौन-सा रुख? तिलचट्टों का शोर या योगी की हैट्रिक?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

31 अगस्त 2026

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एक तरफ योगी की मजबूत सत्ता, सख्त कानून-व्यवस्था और चमकते एक्सप्रेसवे हैं। दूसरी तरफ बेरोजगार युवा, पेपर लीक और सोशल मीडिया पर गरजता एक अजीब नारा: “हम कॉकरोच हैं!”

चुनावी बिगुल अभी बजा भी नहीं है, लेकिन उत्तर प्रदेश की सियासी गलियों में सवाल गूंज रहा है: हवा किस तरफ है?

2027 की गर्मियों में 403 विधानसभा सीटों पर फैसला होगा। बहुमत के लिए 202 सीटें चाहिए। अगस्त 2026 के उपलब्ध सर्वेक्षणों में मुकाबला फिलहाल कांटे का दिखता है। भाजपा-एनडीए और सपा के नेतृत्व वाला विपक्षी गठबंधन लगभग बराबरी की जमीन पर खड़े नजर आते हैं।

लेकिन एक दिलचस्प फर्क है। मुख्यमंत्री पद की पसंद में योगी आदित्यनाथ अभी भी अखिलेश यादव से काफी आगे दिखाई देते हैं। यानी पार्टी बनाम पार्टी मुकाबला कड़ा है, मगर चेहरे की लड़ाई में योगी का पलड़ा भारी है।

2012 में सपा ने 224 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। 2017 में भाजपा ने 312 सीटों के साथ ऐतिहासिक जीत दर्ज की। 2022 में भाजपा 255 सीटों पर सिमटी, जबकि सपा 111 सीटों के साथ मजबूत विपक्ष बनकर उभरी।

यूपी की राजनीति अब काफी हद तक भाजपा बनाम सपा हो चुकी है। बसपा कमजोर जरूर हुई है, लेकिन उसका वोट बैंक पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। दो अंकों में रहने वाला उसका वोट प्रतिशत कई सीटों पर नतीजों का गणित बदल सकता है।

बूढ़ा हाथी अब अकेले युद्ध नहीं जीत सकता, लेकिन उसकी चिंघाड़ अभी भी कई मैदान हिला सकती है।

और अब मैदान में एक नया जीव चर्चा में है: कॉकरोच।

नाम सुनते ही मुस्कान आती है। मगर राजनीति में कभी-कभी मजाक भी गंभीर संकेत बन जाता है।

“हम कॉकरोच हैं”; यह नारा पहली नजर में हास्यास्पद लगता है। लेकिन इसके भीतर युवाओं की गहरी बेचैनी छिपी है। 18 से 25 वर्ष के लाखों मतदाता डिजिटल दुनिया में जीते हैं। उन्हें लंबे भाषणों से ज्यादा मीम, रील और वायरल वीडियो प्रभावित करते हैं।

उनके सामने सवाल बहुत असली हैं, नौकरी कहां है? भर्ती कब होगी? पेपर लीक क्यों होते हैं? परीक्षा होगी तो परिणाम कब आएगा?

यहीं से “कॉकरोच जनता पार्टी” जैसा व्यंग्यात्मक नैरेटिव गंभीर हो जाता है। संदेश सीधा है: अगर व्यवस्था हमें बार-बार कुचलती है, तो हम कॉकरोच की तरह फिर उठ खड़े होंगे।

इस नैरेटिव की खासियत यह है कि इसमें जाति का झंडा नहीं है। इसमें हिंदुत्व का नारा भी नहीं है। यह सीधे रोजगार, शिक्षा और भर्ती व्यवस्था की नाकामी पर चोट करता है।

अगर यह आंदोलन सड़क से सोशल मीडिया तक फैलता है, तो भाजपा के युवा वोट में हलचल पैदा कर सकता है। तीन से पांच प्रतिशत वोट का मामूली झटका भी करीबी मुकाबलों वाली दर्जनों सीटों पर फर्क डाल सकता है।

राजनीति में जीत हमेशा अपने वोट बढ़ाने से नहीं मिलती। कभी-कभी सामने वाले के वोटर को घर बैठा देना ही काफी होता है।

फिर भी योगी सरकार की जमीन कमजोर नहीं है।

कानून-व्यवस्था उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी है। एक्सप्रेसवे, सड़कें, एयरपोर्ट, बिजली, राशन, आवास और निवेश जैसे मुद्दों ने सरकार को डिलीवरी और विकास की छवि दी है। राम मंदिर ने सांस्कृतिक राजनीति को भी नई ऊर्जा दी।

सबसे महत्वपूर्ण बात: भाजपा का संगठन मजबूत है। बूथ स्तर तक उसकी पकड़ है। कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों का बड़ा वर्ग भी उसके साथ खड़ा दिखाई देता है।

लेकिन दो कार्यकाल के बाद सवाल भी बदलते हैं।

अब आगे क्या?

यही भाजपा की असली परीक्षा है।

बेरोजगारी, पेपर लीक, भर्ती में देरी, महंगाई, किसान, शिक्षा और स्वास्थ्य चुनावी बहस के बड़े मुद्दे बन सकते हैं। युवा अब भाषण नहीं, नियुक्ति चाहता है।

स्थानीय विधायकों के प्रति नाराजगी भी भाजपा के लिए सिरदर्द बन सकती है। मतदाता सरकार से संतुष्ट हो सकता है, लेकिन अपने विधायक से नहीं।

मतदाता की भाषा में कहें तो; “लखनऊ ठीक है साहब, लेकिन हमारे मोहल्ले का विधायक बदलना चाहिए!” आगरा में यही स्थिति है। जनता विधायकों से नाराज है, मगर झुकाव भाजपा की तरफ है। 

कुछ ब्राह्मण वर्गों में नाराजगी की चर्चाएं भी तेज हैं। “ठाकुर राज” जैसी शिकायतें सुनाई देती हैं। प्रतिनिधित्व और प्रशासनिक प्रभाव को लेकर असंतोष के स्वर हैं।

अखिलेश यादव इस मौके को भुनाना चाहते हैं। PDA की राजनीति में ‘P’ को पंडित तक ले जाने की कोशिश इसका संकेत है।

लेकिन नाराजगी का अर्थ वोट का पूरा हस्तांतरण नहीं होता। ब्राह्मणों का भाजपा से रिश्ता कई दशकों पुराना है। सपा की पुरानी यादव-केंद्रित छवि और कानून-व्यवस्था की पुरानी स्मृतियां भी उसके रास्ते में हैं।

अखिलेश ने 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा को नई ऊर्जा दी। PDA के जरिए दलितों और गैर-यादव पिछड़ों तक पहुंच बढ़ी। लेकिन विधानसभा का चुनाव अलग खेल है।

यहां उम्मीदवार, बूथ प्रबंधन, स्थानीय समीकरण और छोटे सामाजिक गठजोड़ बहुत मायने रखते हैं। कांग्रेस अभी जूनियर पार्टनर है। छोटे दल और AIMIM जैसे खिलाड़ी कुछ सीटों पर वोट काट सकते हैं।

विपक्ष के पास मुद्दे हैं। संगठन भी धीरे-धीरे मजबूत हो रहा है। लेकिन अभी लहर दिखाई नहीं देती।

और मुद्दा होना तथा लहर होना; दो अलग चीजें हैं।

तो फिर हवा किस तरफ है?

अगस्त 2026 की तस्वीर में हवा किसी एक दिशा में तूफानी रफ्तार से नहीं बह रही। मुकाबला पिछली बार से निश्चित रूप से कठिन है। सत्ता विरोधी भावना मौजूद है, लेकिन अभी वह सुनामी नहीं बनी है।

कॉकरोच आंदोलन भाजपा के युवा वोट को प्रभावित कर सकता है। लेकिन उसका गैर-दलीय चरित्र विपक्ष के लिए भी जोखिम है। वह वोट में बदलेगा, मतदान से दूरी बनाएगा या केवल सोशल मीडिया का शोर रहेगा; यह कहना अभी जल्दबाजी होगी।

आखिरकार चुनाव अभी दूर है। अगले दस महीनों में उम्मीदवार, गठबंधन, जातीय समीकरण और अंतिम समय का नैरेटिव बहुत कुछ बदल सकते हैं।

फिलहाल भाजपा के पास कई ठोस फायदे हैं, योगी की लोकप्रियता, मजबूत संगठन, कानून-व्यवस्था की छवि, कल्याणकारी योजनाएं और दिखाई देने वाला विकास।

इसलिए शुरुआती तस्वीर साफ है:

मुकाबला कड़ा है, मगर हवा पूरी तरह बदली नहीं है।

अगर योगी सरकार बेरोजगारी और भर्ती की समस्या पर निर्णायक कदम उठाती है, युवाओं की नाराजगी कम करती है, स्थानीय विधायकों के खिलाफ असंतोष साधती है और सामाजिक संतुलन बनाए रखती है, तो भाजपा की बढ़त कायम रह सकती है।

2027 की कहानी अभी खुली किताब है। मगर शुरुआती पन्नों पर योगी का नाम साफ दिखाई देता है।

कॉकरोच शोर मचा सकते हैं। विपक्ष चुनौती दे सकता है। लेकिन चुनाव का फैसला अंततः काम, भरोसे और मतदाता के मूड से होगा।

और अगर अगले दस महीनों में सरकार प्रदर्शन मजबूत करती है, संगठन एकजुट रहता है और युवा असंतोष को समय रहते साध लिया जाता है, तो उत्तर प्रदेश में फिर इतिहास लिखा जा सकता है; 

योगी आदित्यनाथ की हैट्रिक।

क्योंकि चुनाव में नारा कुछ दिनों तक चलता है।

काम का हिसाब पांच साल तक चलता है।

 जब पूरा हिंदुस्तान गाता था: दूरदर्शन के यादगार विज्ञापन जिंगल

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

31 अगस्त 2026

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एक ज़माना था जब हिंदुस्तान में टीवी का मतलब दूरदर्शन था। चैनल एक था, बातचीत एक थी और शाम को पूरा परिवार एक ही कमरे में बैठकर टीवी देखता था।

रिमोट का आतंक नहीं था। मोबाइल की घंटी नहीं थी। रील्स और शॉर्ट्स नाम की कोई आफ़त नहीं थी। विज्ञापन आते थे तो लोग उठकर पानी लेने नहीं जाते थे। कई बार विज्ञापन ही कार्यक्रम से ज़्यादा याद रह जाते थे।

सत्तर से अस्सी और नब्बे के दशक,  भारतीय टेलीविजन विज्ञापन का सुनहरा दौर था। केबल टीवी ने अभी दस्तक नहीं दी थी। इंटरनेट तो किसी साइंस-फिक्शन कहानी का हिस्सा लगता था।

विज्ञापन छोटे थे, मगर उनका असर लंबा था। धुन सीधी थी, बोल आसान थे और संदेश दिल में उतर जाता था। आज के करोड़ों रुपये वाले विज्ञापन देखकर कभी-कभी लगता है, तब विज्ञापन बनाए जाते थे, आज विज्ञापन बनाए जाते हैं ताकि विज्ञापन बनते हुए दिखाई दें!

आइए, उन दिनों के कुछ दिलचस्प,  यादगार जिंगल याद करें।

निरमा — कानों में बस जाने वाला जिंगल

“Washing powder Nirma…”

इसके आगे किसी परिचय की जरूरत नहीं।

सफेद कपड़ों में घूमती लड़कियां, झाग और दूध जैसी सफेदी का दावा। निरमा का जिंगल घर-घर की धुन बन गया था।

मां गुनगुनाती थीं, बच्चे गुनगुनाते थे और पिताजी भी बोल भूलने का नाटक करते हुए पूरा जिंगल जानते थे।

निरमा ने साबित किया कि विज्ञापन में शेक्सपियर नहीं चाहिए। एक आसान धुन, कुछ सीधे शब्द और भरपूर दोहराव: बस, काम तमाम।

हमारा बजाज :  मध्यमवर्ग का राष्ट्रगीत

“बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर, हमारा बजाज।”

यह सिर्फ स्कूटर का विज्ञापन नहीं था। यह उभरते हुए भारतीय मध्यमवर्ग का सपना था।

स्कूटर पर बच्चे, पत्नी, पति और कभी-कभी रिश्तेदार भी। वही स्कूटर दफ्तर जाता था, बच्चों को स्कूल छोड़ता था और रविवार को पूरा परिवार पिकनिक पर ले जाता था।

बजाज ने वाहन नहीं बेचा। उसने आकांक्षा बेची।

लिरिल :  झरने के नीचे आज़ादी

“ला ला ला ला… लिरिल।”

झरना, झाग, ताजगी और बेफिक्री।

लिरिल ने साबुन को नहाने की चीज़ से उठाकर आज़ादी का प्रतीक बना दिया। नहाना अचानक एक रोमांचक अनुभव लगने लगा।

विज्ञापन ने साबुन कम बेचा, कल्पना ज्यादा बेची।

लाइफबॉय :  सेहत की पहरेदारी

“तंदुरुस्ती की रक्षा करता है लाइफबॉय।”

लाइफबॉय का अंदाज़ सीधा था। बीमारी और कीटाणुओं के खिलाफ मोर्चा खोलो और साबुन का इस्तेमाल करो।

न कोई बड़ी फिल्मी कहानी, न लंबा भाषण। बस समस्या, समाधान और याद रह जाने वाली धुन।

विक्स:  खिच-खिच का इलाज

“विक्स की गोली लो, खिच-खिच दूर करो।”

क्या शानदार सादगी थी!

गले में खिच-खिच हुई, विक्स की गोली आई और समस्या गई।

आज के विज्ञापन में पहले समस्या खोजी जाती है, फिर उपभोक्ता की मनोवैज्ञानिक प्रोफाइल बनाई जाती है और अंत में उत्पाद आता है। विक्स ने मामला दो पंक्तियों में निपटा दिया।

विको टर्मरिक :  छह शब्दों की बाज़ीगरी

“Vicco Turmeric, नहीं cosmetic.”

बस छह शब्द।

परंपरा, आयुर्वेद और भारतीयता को आधुनिक विज्ञापन भाषा में पैक कर दिया गया।

पीली ट्यूब घर-घर पहचानी जाने लगी। आज भी उसका नाम सुनते ही पुराना दूरदर्शन सामने आ जाता है।

रसना :  बचपन का स्वाद

“I love you, Rasna.”

रसना सिर्फ पेय नहीं था। वह गर्मियों की छुट्टियां थीं। घर में आए रिश्तेदार थे। रसोई में तैयार होता ठंडा शरबत था। बच्चों की खुशी थी।

उस छोटी-सी बच्ची की आवाज़ ने एक पाउडर को बचपन की याद बना दिया।

मैगी :  “मम्मी, मैं भूखा हूं!”

मैगी ने भारतीय रसोई में समय की नई परिभाषा लिखी।

“Fast to cook, good to eat.”

बच्चा भूखा है। मां व्यस्त है। समाधान सामने है, दो मिनट की मैगी।

बाद में दो मिनट पर बहस हो सकती है। लेकिन भारतीय मां और बच्चे के बीच मैगी की दोस्ती पर बहस की जरूरत नहीं।

पान पराग :  स्वागत में क्या है?

“पान पराग से स्वागत कीजिए।”

शम्मी कपूर, अशोक कुमार, बाराती और शादी का पूरा फिल्मी माहौल।

पान पराग ने भारतीय मेहमाननवाज़ी को विज्ञापन में बदल दिया। थोड़ा नाच, थोड़ा गाना, थोड़ा दिखावा और खूब सारा उत्सव।

भारतीय शादी में जितना ड्रामा होता है, विज्ञापन ने उतना ही स्क्रीन पर डाल दिया।

ओनिडा :  पड़ोसी की जलन

“Neighbour’s envy, owner’s pride.”

और वह शैतान!

ओनिडा ने टीवी को मनोरंजन के साधन से उठाकर प्रतिष्ठा का प्रतीक बना दिया।

आपके घर में टीवी है? तो पड़ोसी को जलना चाहिए!

यह उस बदलते भारत की निशानी थी, जहां उपभोक्तावाद धीरे-धीरे दरवाजे पर दस्तक दे रहा था।

और भी बहुत कुछ था

लिज्जत पापड़ का “कुर्रम कुर्रम”, अमूल के चुटीले विज्ञापन, बजाज के भावुक अभियान और सबसे बढ़कर “मिले सुर मेरा तुम्हारा”, ये सब सिर्फ विज्ञापन नहीं थे। ये उस दौर की सामूहिक याददाश्त का हिस्सा थे।

पियूष पांडे, प्रह्लाद कक्कड़ और कई दूसरे रचनात्मक लोगों ने भारतीय विज्ञापन को एक अलग ज़बान दी। उसमें हास्य था, भावना थी, संगीत था और सबसे बड़ी बात, भारतीय मिट्टी की खुशबू थी।

आज विज्ञापन की दुनिया बहुत बड़ी हो गई है। टीवी के साथ यूट्यूब, इंस्टाग्राम, फेसबुक, रील्स और शॉर्ट्स की पूरी फौज खड़ी है।

ध्यान की अवधि घट गई है। हर कोई अगले तीन सेकंड में दर्शक को पकड़ लेना चाहता है। रचनात्मकता भी जैसे इंस्टेंट नूडल बन गई है, डालो, पकाओ और भूल जाओ।

आज का मोबाइल वह नया घरेलू तानाशाह है, जिसके सामने पूरा परिवार अलग-अलग स्क्रीन पर झुका बैठा है। रील्स और शॉर्ट्स हमारी जेबों में ऐसे घुस आए हैं जैसे बरसात में कॉकरोच।

शोर ज्यादा है। सनसनी ज्यादा है। उत्तेजना ज्यादा है। लेकिन याद रहने वाली रचनात्मकता शायद कम है।

तब एक जिंगल सालों चलता था। आज कई विज्ञापन एक सप्ताह में कूड़ेदान में चले जाते हैं।

शायद हमें दूरदर्शन के विज्ञापन नहीं, वह हिंदुस्तान याद आता है जो उनके साथ जुड़ा था।

एक चैनल था।

एक ड्राइंग रूम था।

पूरा परिवार था।

एक जिंगल बजता था।

और देखते-देखते पूरा हिंदुस्तान गाने लगता था:

“वॉशिंग पाउडर निरमा…”

क्या वह सचमुच बेहतर दौर था?

शायद नहीं।

लेकिन यकीनन वह ज्यादा अपना था।

Friday, August 28, 2026

 


छिपकलियों, कॉकरोचों और मेंढकों को भी समझना होगा: मौजूदा निज़ाम की निरंतरता क्यों ज़रूरी है

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

30 अगस्त, 2026

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किसी भी मुल्क की सियासत में बदलाव ज़रूरी है, लेकिन हर बदलाव बेहतर हो, यह ज़रूरी नहीं। कभी-कभी जो व्यवस्था मुश्किलों के बावजूद स्थिर हो गई हो, उसे अचानक बदलना खुद एक बड़ा जोखिम बन जाता है। भारत के लिए 2014 के बाद का दौर इसी सवाल को बार बार उठाता है। क्या निरंतरता को सिर्फ इसलिए छोड़ दिया जाए कि बदलाव आकर्षक लगता है?

2014 के बाद भारत के राजनीतिक सफर की सबसे बड़ी खूबी सियासी स्थिरता रही है। सरकारें अपना कार्यकाल पूरा कर रही हैं और नीतियों को समय मिल रहा है। पहले की तरह बार-बार सत्ता बदलने और नीतियों के पलटने की बेचैनी अपेक्षाकृत कम हुई है।

निरंतरता का सबसे बड़ा फायदा यह है कि किसी नीति को नतीजा देने का मौका मिलता है। हर नई सरकार अगर पुरानी लकीर मिटाकर नई लकीर खींचे, तो देश आगे बढ़ने के बजाय फाइलों में ही उलझा रहेगा।


भारत जैसे विशाल और विविध देश में केंद्र और राज्यों के रिश्ते बेहद अहम हैं। पिछले बारह वर्षों में विपक्षी दलों की सरकार वाले राज्यों के साथ केंद्र के रिश्तों को लेकर बहस और आरोप जरूर हुए हैं, लेकिन राष्ट्रपति शासन को सामान्य राजनीतिक हथियार बनाने की कोई परंपरा नहीं बनी।

संवैधानिक संस्थाओं ने भी अपनी भूमिका निभाई है। संसद, अदालतें, चुनाव व्यवस्था और पंचायतों से लेकर राज्यों तक लोकतांत्रिक संस्थाएं लगातार काम करती रही हैं। असहमति भी रही, विरोध भी हुआ और सड़कों पर आंदोलन भी हुए। मगर लोकतंत्र का पहिया चलता रहा।

यही किसी लोकतंत्र की असली परीक्षा है। सरकार से सहमत होना लोकतंत्र नहीं है। असहमति के बावजूद व्यवस्था का चलते रहना लोकतंत्र है।


पिछले बारह साल फूलों की सेज नहीं रहे। आतंकवादी हमले हुए, नागरिक आंदोलनों ने सरकार को चुनौती दी और विपक्ष ने कई मुद्दों पर तीखा विरोध किया। संसद में भी खूब हंगामा हुआ और सियासी बयानबाज़ी ने कई बार मर्यादा की सीमा छुई।

फिर भी व्यवस्था बिखरी नहीं। विरोध अपनी जगह रहा और शासन अपनी जगह। आंदोलन हुए, लेकिन देश चलता रहा। यही सिस्टम की सहनशक्ति है।

लोकतंत्र कोई ऐसा पंखा नहीं है जिसे स्विच दबाते ही चलना शुरू कर दें। इसे चलाए रखने के लिए संस्थाओं, परंपराओं और जनता के भरोसे की जरूरत होती है।


अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी भारत की हैसियत बदली है। Brand India को लेकर आत्मविश्वास बढ़ा है। विदेशों में बसे भारतीयों ने स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं और समाजों में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई है।

बड़ी ताकतों के दबाव के बीच भारत ने अपने हितों को प्राथमिकता देने की कोशिश की है। अमेरिका हो, रूस हो या कोई और ताकत; नई दुनिया में भारत ने किसी एक खेमे का पिछलग्गू बनने के बजाय अपने विकल्प खुले रखने की नीति अपनाई है।

बहुध्रुवीय दुनिया में यही रणनीतिक स्वायत्तता है। कभी दोस्ती, कभी दूरी और कभी दो टूक बात; कूटनीति में यही तो हुनर है।


अर्थव्यवस्था में चुनौतियां कम नहीं हैं। निर्यात पर दबाव है, वैश्विक बाजार अनिश्चित है और रोजगार से लेकर महंगाई तक कई सवाल हैं। फिर भी भारतीय अर्थव्यवस्था ने झटकों को झेलने की क्षमता दिखाई है।

कारोबार को आसान बनाने, उद्यमिता को बढ़ावा देने और नए कारोबारियों को अवसर देने की कोशिशों के नतीजे दिखाई देने लगे हैं। करोड़ों युवाओं की महत्वाकांक्षाएं भी अब नौकरी से आगे बढ़कर कारोबार और स्टार्टअप की ओर देख रही हैं।

अर्थव्यवस्था को सबसे ज्यादा जरूरत होती है भरोसे और स्थिर माहौल की। कारोबारी यह नहीं चाहते कि आज बनाई गई नीति कल किसी नए राजनीतिक प्रयोग के साथ कूड़ेदान में चली जाए।

इसका मतलब यह नहीं कि सब कुछ ठीक है

मौजूदा व्यवस्था को बनाए रखने की बात का अर्थ यह कतई नहीं कि सरकार से सवाल न पूछे जाएं। लोकतंत्र में आलोचना जरूरी है। गलत नीतियों पर सवाल उठना चाहिए और जहां सुधार की जरूरत हो, वहां सुधार होना चाहिए।

सरकार कोई दूध की धुली संस्था नहीं होती। सत्ता में रहते हुए गलतियां भी होती हैं और फैसलों पर बहस भी होनी चाहिए। मगर आलोचना और अराजकता में फर्क है।

देश को मजबूत विपक्ष भी चाहिए और जवाबदेह सरकार भी। लेकिन सिर्फ सरकार बदलने के लिए सरकार बदलना कोई नीति नहीं हो सकती।


सियासत में कुछ लोग हर पांच साल बाद नई बोतल में पुरानी शराब बेचने निकल पड़ते हैं। कोई कहता है सब बदल दो, कोई कहता है पूरा सिस्टम उलट दो। छिपकलियां दीवार पर चढ़ती-उतरती रहें, कॉकरोच इधर-उधर भागते रहें और मेंढक तालाब में टर्राते रहें; देश को आखिर आगे तो बढ़ना है।

बदलाव लोकतंत्र की खूबसूरती है, लेकिन बदलाव अपने आप में उपलब्धि नहीं है। सवाल यह होना चाहिए कि बदलाव से देश मजबूत होगा या कमजोर।

बारह साल में कोई व्यवस्था परिपूर्ण नहीं हो जाती। लेकिन अगर संस्थाएं काम कर रही हों, चुनाव हो रहे हों, सत्ता संवैधानिक दायरे में चल रही हो, अर्थव्यवस्था झटके झेल रही हो और दुनिया में भारत की आवाज पहले से ज्यादा सुनी जा रही हो, तो अचानक सब कुछ दांव पर लगाने की जरूरत क्या है?


मौजूदा निज़ाम को जारी रखने का तर्क किसी पार्टी के प्रति अंधभक्ति नहीं, बल्कि व्यावहारिक सोच का सवाल है। निरंतरता का अर्थ यह नहीं कि सरकार को खुली छूट दे दी जाए। इसका अर्थ है: जो अच्छा हुआ है, उसे आगे बढ़ाया जाए; जो गलत है, उसे सुधारा जाए।

देश बनाना कोई पांच साल का प्रोजेक्ट नहीं। यह पीढ़ियों का काम है। संस्थाएं और नीतियां बनने में साल लगते हैं, लेकिन उन्हें बिगाड़ने में ज्यादा वक्त नहीं लगता।

इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं कि कौन आएगा? सवाल यह भी है कि जो व्यवस्था बनी है, उसे कौन संभालेगा?

भारत को प्रयोगशाला बनाने से पहले यह देखना होगा कि प्रयोग की कीमत कौन चुकाएगा।

स्थिरता को बचाना जड़ता नहीं है। कभी-कभी यही सबसे समझदार बदलाव होता है; बिना व्यवस्था बदले, व्यवस्था को बेहतर बनाना

 हिमालय में  मंडराता खतरा

चीन की हरकतों से सावधान रहना होगा

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

29 अगस्त 2026

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26 अगस्त 2026 को नेपाल-तिब्बत (चीन) सीमा पर एक भयंकर बाढ़ और मिट्टी का सैलाब आया। ऊँचाई पर स्थित एक ग्लेशियर का हिस्सा टूटकर गिर गया। करीब 5,200 मीटर की ऊँचाई से बर्फ और चट्टान का बड़ा हिस्सा नीचे गिरा और ल्हेंदे नदी (नेपाल में भोटेकोशी) में जा गिरा। यह जगह रसुवागढ़ी-ग्यीरोंग सीमा चौकी से करीब 20 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में है। मलबा नदी को कुछ देर के लिए रोक दिया। फिर पानी, कीचड़ और पत्थरों का तेज सैलाब नीचे की तरफ दौड़ पड़ा।

इस आपदा ने नेपाल के रसुवा और नuwाकोट जिलों (जिसमें स्याब्रुबेसी शामिल है) और चीन के ग्यीरोंग काउंटी को प्रभावित किया। अब तक 160 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं और आंकड़ा बढ़ रहा है। दोनों तरफ सैकड़ों से लेकर एक हजार से ज्यादा लोग लापता बताए जा रहे हैं। इनमें कई विदेशी पर्यटक और तीर्थयात्री भी शामिल हैं। गाँव, पुल, सड़कें और कई निर्माण नष्ट हो गए। बचाव कार्य जारी है, लेकिन आगे बाढ़ का खतरा बना हुआ है।

यह सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा नहीं है। यह एक चेतावनी है। हिमालय दुनिया के सबसे कमजोर पहाड़ी क्षेत्रों में से एक है। चीन ने भारत और नेपाल की सीमा पर सड़कें, सैन्य ठिकाने, सुरंगें, बाँध और बिजली परियोजनाएँ बड़े पैमाने पर बनाई हैं। इन कामों से पहाड़ों की ढलानें, नदियों का रास्ता और मिट्टी का संतुलन बिगड़ा है। चीन ने वैज्ञानिकों की चेतावनियों और नीचे रहने वाले देशों पर पड़ने वाले असर को बार-बार कम करके आँका है।

1978 में मैंने टिहरी बाँध के विवाद पर लिखा था और हिमालय में बड़े बाँध बनाने के खतरों के बारे में चेतावनी दी थी। पानी, बिजली और विकास के फायदे तो हैं। लेकिन भूकंप वाले इलाके में और चीन की सीमा के पास इतने बड़े निर्माण के खतरे भी बहुत हैं। आलोचकों ने कहा था कि बड़ा भूकंप या कोई हादसा होने पर बाढ़ उत्तर भारत के मैदानों तक पहुँच सकती है। वही सवाल आज भी खड़ा है: क्या फायदे इतने बड़े खतरे के लायक हैं?

भूवैज्ञानिक लंबे समय से कहते आए हैं कि हिमालय पृथ्वी की पपड़ी का कमजोर और सक्रिय हिस्सा है। यहाँ लगातार उठान, दरारें और दबाव चल रहे हैं। ऊपरी शिवालिक की ढलानें चिकनी मिट्टी और रेत की वजह से अस्थिर हैं। बड़े निर्माण पहाड़ी पर्यावरण को नुकसान पहुँचा सकते हैं। पहाड़ों का तेज उठना और भूकंप की गतिविधि उनकी अस्थिरता को साफ दिखाती है। इसलिए इस इलाके में बड़े बाँध और जलाशय खास तौर पर खतरनाक हैं। ये बातें नई नहीं हैं। दशकों से वैज्ञानिक यही चेतावनी देते आए हैं।

चीन ने इन चेतावनियों को ज्यादातर नजरअंदाज किया है। शोधकर्ताओं ने बार-बार कहा है कि बाँध टूटने या ग्लेशियर झीलों के फटने से बड़ी तबाही हो सकती है। खुदाई, सुरंगें और बड़े जलाशय ढलानों को कमजोर कर सकते हैं और पानी के सिस्टम को बिगाड़ सकते हैं। फिर भी निर्माण काम चलते रहे, और नीचे वाले देशों को पूरी जानकारी कम ही दी गई। इस हफ्ते ग्लेशियर टूटा तो सैलाब ऐसे इलाके से गुजरा जहाँ पहले से काफी बदलाव हो चुके थे। तात्कालिक कारण प्राकृतिक लगता है: बर्फ और चट्टान का गिरना। लेकिन इतने बड़े निर्माण से पूरे इलाके का खतरा बढ़ जाता है। छोटे बदलाव भी यहाँ बड़ी तबाही ला सकते हैं।

पूर्व में भी यही रवैया दिखता है। चीन ब्रह्मपुत्र (यारलुंग त्सांगपो) पर एक बहुत बड़ा बाँध बना रहा है, जो थ्री गॉर्जेस बाँध से भी बड़ा होगा। उस जगह के पास सक्रिय दरार भी पाई गई है। अगर भूकंप या कोई और हादसा हुआ तो पूर्वोत्तर भारत और बांग्लादेश के बड़े हिस्से बाढ़ की चपेट में आ सकते हैं। नीचे वाले देशों ने चिंता जताई है, लेकिन चीन निर्माण जारी रखे हुए है और खतरों की बात को कम करके बता रहा है।

26 अगस्त की यह आपदा सिर्फ स्थानीय घटना नहीं है। यह एक साफ चेतावनी है। चीन की तेज रफ्तार वाली ऊँचाई वाली परियोजनाओं ने इस कमजोर पहाड़ी क्षेत्र में खतरा बढ़ा दिया है। वैज्ञानिकों और नीचे रहने वाले लोगों की चेतावनियों को कम आँककर, और अपनी महत्वाकांक्षा को प्राथमिकता देकर, चीन ने और बड़ी घटनाओं की संभावना बढ़ा दी है। जलवायु परिवर्तन से ग्लेशियर पहले से कमजोर हो रहे हैं। गलत जगह पर भारी निर्माण इस खतरे को और बढ़ा देता है।

क्षेत्रीय सरकारों, वैज्ञानिक संस्थाओं और नीचे रहने वाले लोगों को चीन की परियोजनाओं की पूरी जानकारी चाहिए। ग्लेशियर झीलों और कमजोर ढलानों की स्वतंत्र निगरानी जरूरी है। सबसे ज्यादा खतरे वाले इलाकों में और बड़े निर्माण पर लगाम लगानी होगी। वरना ऐसी तबाही बार-बार हो सकती है। इस हफ्ते मारे गए लोगों और उजड़े गाँवों को सिर्फ प्राकृतिक हादसा मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। ये उन फैसलों का नतीजा हैं जो ऐसे पहाड़ों में लिए गए जहाँ अस्थिरता की चेतावनी पीढ़ियों से दी जा रही है; और जिन्हें अभी भी नजरअंदाज किया जा रहा है।

Thursday, August 27, 2026

 बदलाव की दहलीज पर आगरा: ताज के साये से विकास के नए क्षितिज तक

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बृज खंडेलवाल द्वारा  

28 अगस्त 2026

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आगरा शायद अब खुद को भी चौंकाने की तैयारी में है। सदियों से यह शहर एक खूबसूरत मगर कठिन दुविधा में जीता आया है। ताजमहल ने आगरा को दुनिया भर में शोहरत दी, लेकिन उसी ताज की हिफाजत के नाम पर औद्योगिक विकास पर तरह-तरह की पाबंदियां भी लगती रहीं। कारखाने शक की निगाह से देखे गए, नए प्रोजेक्ट्स को मंजूरियों के जंगल से गुजरना पड़ा और हर बड़ी योजना फाइलों, समितियों, एनओसी व अदालतों के चक्कर काटती रही।

अब यह तस्वीर बदलती दिख रही है। जुलाई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने ताज ट्रेपेजियम जोन (लगभग 10,400 वर्ग किमी) में दो साल पुराना व्यापक प्रतिबंध हटाया। कोर्ट ने गैर-प्रदूषणकारी सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के करीब 400 लंबित आवेदनों पर टीटीजेड प्राधिकरण को विशेषज्ञ निगरानी (नीरी व सीईसी के प्रतिनिधियों की सहमति) के साथ आगे बढ़ने की अनुमति दी। इससे पर्यावरण मानकों के भीतर स्वच्छ उद्योगों के लिए रास्ता खुला है। विधानसभा चुनाव (अपेक्षित फरवरी-मार्च 2027) से पहले अगले महीने-वर्ष आगरा के इतिहास में निर्णायक साबित हो सकते हैं। कई परियोजनाएं पूरी होने के करीब हैं, अनेक निर्माणाधीन हैं और कई पाइपलाइन में हैं।

असली सवाल विकास और विरासत के बीच संतुलन साधने का है। आगरा को धुआं उगलती चिमनियां नहीं चाहिएं; उसे चाहिए स्वच्छ उद्योग, नई तकनीक, सेवा क्षेत्र, पर्यटन आधारित कारोबार और आधुनिक मैन्युफैक्चरिंग। ताज की हिफाजत भी जरूरी है और आगरा के नौजवानों को रोजगार भी।

आगरा की आर्थिक बुनियाद पहले से मजबूत है। यह देश के सबसे बड़े पर्यटन केन्द्रों में शामिल है। जूता उद्योग, संगमरमर की जड़ाई, हस्तशिल्प, कालीन, फाउंड्री, कांच के सामान और पेठा जैसे छोटे-मझोले कारोबार यहां की पुरानी पहचान हैं। शिक्षा क्षेत्र भी फैल रहा है। भौगोलिक स्थिति इसकी बड़ी ताकत है; दिल्ली, जयपुर, ग्वालियर, लखनऊ से सड़क-रेल कनेक्टिविटी शानदार है। यमुना एक्सप्रेसवे और अन्य मार्गों ने यात्रा का नक्शा बदल दिया है।

सबसे बड़ा बदलाव आगरा मेट्रो ला रही है। ताज ईस्ट गेट से मनकामेश्वर (करीब 6 किमी) प्राथमिक खंड मार्च 2024 से संचालित है। मनकामेश्वर से आईएसबीटी तक ट्रायल और सीएमआरएस निरीक्षण अगस्त 2026 में सफल रहे। कॉरिडोर-1 (सिकंदरा से ताज ईस्ट गेट, 14.25 किमी) नवंबर 2026 में पूर्ण संचालन के लक्ष्य पर है; सिकंदरा से ताज तक यात्रा समय घटकर करीब 28 मिनट रह जाएगा। कॉरिडोर-2 (आगरा कैंट से कालिंदी विहार) पर भी निर्माण तेज है। कभी तांगे-रिक्शे और जाम की पहचान वाला शहर आधुनिक जन परिवहन के युग में प्रवेश कर रहा है।

हवाई अड्डे का नया सिविल टर्मिनल भी उम्मीद जगा रहा है। अगस्त 2026 तक करीब 70 प्रतिशत काम पूरा; 30 नवंबर 2026 तक हैंडओवर का लक्ष्य। क्षमता बढ़कर लगभग 1400 यात्रियों तक पहुंचेगी, मल्टीलेवल पार्किंग, एयरोब्रिज और आधुनिक सुविधाएं होंगी। बेहतर कनेक्टिविटी पर्यटकों को दिल्ली से दिनभर की यात्रा के बजाय दो-तीन दिन रुकने के लिए प्रेरित कर सकती है।

सड़कों पर चौड़ीकरण, फ्लाईओवर, रेलवे ओवरब्रिज, नए पुल और ड्रेनेज योजनाएं शहर की सूरत बदल रही हैं। यमुना पर मेट्रो पुल समेत कई पुलों का काम आगे बढ़ रहा है। ग्रेटर आगरा की टाउनशिप और अटल टाउनशिप योजनाएं भीड़भाड़ वाले पुराने शहर से बाहर विकास फैलाने की कोशिश हैं; कई टाउनशिप में प्लॉट आवंटन प्रक्रिया चल रही है।

शिल्पग्राम के पास यूनिटी मॉल (लगभग 128 करोड़ रुपये) उत्तर प्रदेश के ओडीओपी व जीआई टैग उत्पादों और पारंपरिक हस्तशिल्प को बड़ा बाजार दे सकता है। अगस्त 2026 तक करीब 42 प्रतिशत काम पूरा; नवंबर लक्ष्य है, हालांकि गति पर प्रशासनिक निगरानी बढ़ी है। पर्यटन अब सिर्फ ताजमहल तक सीमित नहीं रहना चाहिए। आगरा किला, फतेहपुर सीकरी, मेहताब बाग, बटेश्वर और ब्रज क्षेत्र मिलकर बड़ा सर्किट बना रहे हैं। हेरिटेज वॉक, होमस्टे और बेहतर सुविधाएं रुकने की अवधि बढ़ा सकती हैं।

छत्रपति शिवाजी महाराज म्यूजियम (पहले मुगल म्यूजियम का नाम बदला गया) तेज गति से तैयार हो रहा है; लक्ष्य 2026 का अंत। कोठी मीना बाजार में शिवाजी स्मारक (50 फुट प्रतिमा, म्यूजियम आदि) पर भी काम आगे बढ़ रहा है। स्वास्थ्य क्षेत्र में एसएन मेडिकल कॉलेज को मिनी एम्स स्तर पर विकसित किया जा रहा है: किडनी ट्रांसप्लांट शुरू, क्रिटिकल केयर यूनिट और अन्य ब्लॉक निर्माणाधीन; पूर्ण रूप 2027 तक अपेक्षित। लेडी लॉयल अस्पताल का विस्तार भी चल रहा है। साइंस पार्क व नक्षत्रशाला (लगभग 40 करोड़) भूमि संबंधी बाधाओं के बावजूद आगे बढ़ रहा है। कैलाश मंदिर का कायाकल्प चरणबद्ध तरीके से हो रहा है। हाईकोर्ट बेंच की मांग अभी भी लंबित है और अधिवक्ता आंदोलनरत हैं।

ताज के पास प्रस्तावित बैराज/रबर डैम वर्षों से एनओसी और अध्ययनों में अटका है; बजट आवंटित होने के बावजूद निर्माण शुरू नहीं हुआ। पर्यावरण संबंधी चिंताएं जायज हैं, मगर फाइलों को धूल खाने देना भी संरक्षण नहीं कहलाता। ब्यूरोक्रेसी की सुस्ती विकास की बड़ी बाधा बनी हुई है।

आगरा शहर की आबादी लाखों में है; मेट्रो क्षेत्र अनुमानित 25 लाख से अधिक। तेज बढ़ोतरी ने मकान, पानी, सीवर, सड़क, कचरा प्रबंधन और परिवहन पर दबाव डाला है। समाधान शहर की बढ़त रोकना नहीं, बल्कि समझदारी से बढ़ाना है।

अगले बारह महीने अहम हैं। मेट्रो का विस्तार, एयरपोर्ट टर्मिनल, नई सड़कें-पुल, टाउनशिप, पर्यटन परियोजनाएं और स्वच्छ उद्योगों पर नीतिगत फैसले मिलकर तकदीर बदल सकते हैं। आगरा चौराहे पर खड़ा है; एक रास्ता जाम, प्रदूषण और लालफीताशाही की तरफ; दूसरा स्वच्छ उद्योगों, बेहतर कनेक्टिविटी, रोजगार और आधुनिक विकास की ओर। अगर स्वच्छ उद्योग, आधुनिक बुनियादी ढांचा और पर्यावरण संरक्षण हमसफर बन जाएं, तो आगरा सिर्फ ताज का शहर नहीं, उत्तर भारत का बड़ा विकास केन्द्र बन सकता है।

Tuesday, August 25, 2026

 द ग्रेट समन्वय:

जब पूरब और पश्चिम की बनी खिचड़ी!

कितना भारतीय है आज का एवरेज इंडियन?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

27 अगस्त 2026

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देश भ्रमण के अनेक फायदे हैं। कूपमंडूकता और कई दृष्टि-भ्रम रास्ते में ही टूट जाते हैं। उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम निकलें, तो बहुत से पूर्वाग्रह अपने आप ध्वस्त होते चलते हैं।

खूबसूरती से बदल रहा है भारत।

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आसमान को छूती कांच की इमारतें खड़ी हैं। बाजू में पुराना हनुमान जी का मंदिर है।

इमारत के भीतर युवा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स और ग्लोबल मार्केट की बातें कर रहे हैं। बाहर कोई जूते उतारकर मंदिर की घंटी बजाता है और श्रद्धा से हाथ जोड़ लेता है।

किसी को यह विरोधाभास नहीं लगता। यही तो आज का भारत है।

बेंगलुरु, मुंबई, हैदराबाद, चेन्नई, गुरुग्राम या चंडीगढ़ चले जाइए। नज़ारा बदलता जाएगा, मगर कहानी एक ही मिलेगी। एक्सप्रेसवे, मेट्रो, चमचमाते एयरपोर्ट, शॉपिंग मॉल और गगनचुंबी इमारतें शहरों का चेहरा बदल रही हैं। मोबाइल फोन हाथ का हिस्सा बन गया है। डिजिटल पेमेंट ने बटुए की जगह ले ली है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस दफ्तरों, स्कूलों और घरों में दस्तक दे रही है।

भारत तेज़ी से भविष्य की ओर दौड़ रहा है। लेकिन अपना अतीत पीछे नहीं छोड़ रहा।

यहीं भारत की मौजूदा यात्रा की खूबसूरती है। यह केवल पश्चिमीकरण की कहानी नहीं है। न ही पुराने ज़माने में लौटने की ज़िद है।

यह दिलचस्प समन्वय है। पूरब की आत्मा और पश्चिम की आधुनिकता का संगम।

पुराने को कबाड़खाने में नहीं फेंका जा रहा। नए को आंख मूंदकर अपनाया भी नहीं जा रहा। भारत चुन रहा है, परख रहा है और फिर अपने रंग में ढाल रहा है।

हैदराबाद का रोहित अमेरिकी टेक्नोलॉजी कंपनी में काम करता है। दफ्तर में अंग्रेज़ी बोलता और नवीनतम तकनीक इस्तेमाल करता है। शाम को पूजा में शामिल होता है या परिवार के साथ त्योहार की तैयारी करता है। दोनों दुनिया उसके भीतर रहती हैं और आराम से साथ चलती हैं।

आज का भारतीय सिलिकॉन वैली की तरक्की से प्रभावित हो सकता है, मगर वाराणसी की गलियों से रिश्ता भी बनाए रखता है। वह क्वांटम फिजिक्स पढ़ सकता है और गीता में जीवन का अर्थ खोज सकता है। हवाई जहाज़ से सात समंदर पार जा सकता है, फिर भी गांव की मिट्टी नहीं भूलता।

एक ही मेज़ पर लैपटॉप और दीपक रखे हो सकते हैं। यही भारत का नया मिज़ाज है।

यह समन्वय अचानक पैदा नहीं हुआ।

भारत और पश्चिम के संपर्क ने अनेक संस्थागत बदलाव किए। औपनिवेशिक शासन शोषण और लूट से भरा था। फिर भी स्वतंत्र भारत ने कुछ आधुनिक संस्थाओं को अपनाया और लोकतांत्रिक उद्देश्यों के अनुसार ढाला।

संसदीय लोकतंत्र, स्वतंत्र न्यायपालिका, सिविल सर्विस, आधुनिक विश्वविद्यालय और लिखित कानून इसी प्रक्रिया का हिस्सा बने।

इन संस्थाओं ने आम आदमी के लिए नए रास्ते खोले।

कभी जन्म, जमीन और खानदान ही इंसान की हैसियत तय करते थे। आधुनिक शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं ने नए दरवाज़े खोले। साधारण परिवार का बच्चा विश्वविद्यालय पहुंच सकता था। गांव का लड़का या लड़की सरकारी नौकरी के लिए मुकाबला कर सकता था। नागरिक अदालत का दरवाज़ा खटखटा सकता था।

व्यवस्था आज भी मुकम्मल नहीं है। कमियां भी हैं, खामियां भी।

मगर ऊपर चढ़ने के लिए नई सीढ़ियां जरूर बनी हैं। एस्केलेटर्स भी हैं।

लोकतंत्र ने इस बदलाव में एक और ताकत जोड़ी।

मतपत्र ने उन लोगों को भी राजनीतिक महत्व दिया, जो सदियों तक सत्ता के गलियारों से दूर रहे। सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार ने करोड़ों लोगों को राष्ट्रीय संवाद में शामिल किया।

भारत ने लोकतंत्र को रेडीमेड मशीन की तरह नहीं अपनाया। उसने इसे अपने ढंग से भारतीय बनाया।

चुनाव जनभागीदारी के बड़े मेले बन गए। जाति, भाषा, क्षेत्र और समुदाय राजनीति में आए, लेकिन उनके साथ नई उम्मीदें और आकांक्षाएं भी आईं।

जिनकी आवाज़ पहले कमजोर थी, वे धीरे-धीरे मंच तक पहुंचने लगे।

पश्चिम से आया संस्थागत ढांचा भारतीय समाज की धड़कन से जुड़ गया।

सामाजिक सुधार की कहानी भी कुछ ऐसी ही रही।

स्वतंत्रता, समानता और अधिकारों के आधुनिक विचारों ने भारतीय चिंतकों को प्रभावित किया। मगर सुधार केवल बाहर से नहीं आया। समाज सुधारकों ने आधुनिक तर्क और अपनी नैतिक-धार्मिक परंपराओं, दोनों का सहारा लेकर कुरीतियों को चुनौती दी।

एक तरफ नए विचार थे। दूसरी तरफ अपनी जड़ें थीं। दोनों ने मिलकर बदलाव की जमीन तैयार की।

शिक्षा पूरब और पश्चिम के बीच सबसे मजबूत पुल बनी। आधुनिक स्कूलों और विश्वविद्यालयों ने वैज्ञानिक सोच, सवाल करने की आदत और व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया। अंग्रेज़ी, औपनिवेशिक विरासत के बावजूद, अनेक भाषाओं वाले देश में उपयोगी संपर्क भाषा बनी।

तमिलनाडु का वेंकटेश दिल्ली में काम कर सकता है। बिहार का इंजीनियर दिनेश चेन्नई में नौकरी पा सकता है। बंगाल का सुब्रतो बेंगलुरु में पढ़ सकता है।

आधुनिक संचार ने दूरी घटाई।

दूरी घटी तो अवसर बढ़े।

रेलवे, तार और डाक व्यवस्था पहले प्रशासनिक जरूरतों के लिए बनाई गई थीं। बाद में उन्होंने भारत के लोगों को एक-दूसरे से जोड़ दिया। विचार तेजी से फैले। अखबारों की पहुंच बढ़ी। राष्ट्रीय आंदोलन को नई ताकत मिली।

इतिहास भी कभी-कभी अजीब मज़ाक करता है। साम्राज्य के लिए बनी सुविधाएं राष्ट्रीय एकता की ताकत बन गईं।

आर्थिक आधुनिकता ने भी समाज का ढांचा बदला। उद्योग, व्यापार, बैंकिंग और शहरों में रोजगार ने पारंपरिक पेशों की दीवारें कमजोर कीं। बेटे को हमेशा पिता का काम नहीं करना पड़ा। बेटी को भी पुरानी सीमाओं में कैद रहना जरूरी नहीं रहा।

शिक्षा और रोजगार ने महिलाओं के लिए नए आसमान खोले। आर्थिक आत्मनिर्भरता, कानूनी अधिकार और पेशेवर अवसरों ने सामाजिक सोच बदली।

आधुनिकता ने जीवन का बाहरी ढांचा बदला। मगर भारत की सांस्कृतिक धड़कन कायम रही।

त्योहार आज भी कैलेंडर को रंग देते हैं। शादियां बड़े पारिवारिक आयोजन हैं। धार्मिक यात्राओं में युवाओं की भीड़ बढ़ रही है।

परंपरा गायब नहीं हुई। उसने अपग्रेड होना सीख लिया है।

दीवाली अब एलईडी की रोशनी में चमकती है। मंदिर की घंटियां मोबाइल कैमरे में कैद होती हैं। पूजा की सामग्री ऑनलाइन मंगाई जाती है। दर्शन के लिए ऐप से बुकिंग होती है। योग की कक्षाएं दुनिया भर में ऑनलाइन चल रही हैं। पुरानी परंपराएं डिजिटल युग में प्रवेश कर चुकी हैं।

मगर अपनी पहचान के साथ।

यह बदलाव है। यह अनुकूलन है।

भारत की सभ्यता हमेशा विचारों के आदान-प्रदान से समृद्ध हुई है। बाहर से आई चीजों को उसने जस का तस स्वीकार नहीं किया। उन्हें अपनी जरूरतों और संस्कारों के अनुसार ढाला।

आज का दौर उसी लंबी प्रक्रिया का नया अध्याय है। पश्चिम ने विज्ञान, तकनीक और आधुनिक संस्थाओं के शक्तिशाली औजार दिए। कानून, प्रशासन और लोकतांत्रिक भागीदारी के नए तरीके दिए।

भारतीय परंपरा ने परिवार, कर्तव्य, समुदाय और नैतिक जिम्मेदारी के विचारों को मजबूत रखा।

एक ने प्रगति का रास्ता दिखाया।

दूसरी ने पूछा—प्रगति किसके लिए और किस दिशा में?

यही सवाल आज पहले से अधिक महत्वपूर्ण है।

कोई समाज तकनीकी रूप से बहुत आगे बढ़ सकता है, मगर भीतर से खाली हो सकता है। वह अमीर हो सकता है, मगर अकेला भी। व्यक्तिगत आज़ादी हो सकती है, मगर सामुदायिक रिश्ते कमजोर पड़ सकते हैं।

भारत का परिवार और समाज से जुड़ाव केवल रूढ़िवाद नहीं है। यह इंसानी रिश्तों को बचाए रखने की कोशिश भी है। बेशक, हर परंपरा आलोचना से ऊपर नहीं हो सकती।

जो परंपरा इंसान की गरिमा या समानता को चोट पहुंचाती है, उस पर सवाल उठना चाहिए। केवल पुरानी होने से कोई बात पवित्र नहीं हो जाती।

उसी तरह, केवल नया और विदेशी होने से हर विचार श्रेष्ठ नहीं बन जाता।

असली समझ संतुलन में है।

भारत के सामने चुनौती है कि वह अपनी विरासत की श्रेष्ठ चीजों को बचाए और आधुनिक ज्ञान को खुले मन से अपनाए।

पूरब और पश्चिम किसी जंग के मैदान में आमने-सामने खड़े नहीं हैं। वे अब एक ही चौराहे पर मिल रहे हैं। एक के पास पुरानी स्मृतियां, सांस्कृतिक निरंतरता और आध्यात्मिक अनुभव हैं।

दूसरे के पास आधुनिक संस्थाएं, वैज्ञानिक ज्ञान और तकनीकी शक्ति है। दोनों मिलकर नया भारतीय समन्वय रच रहे हैं।

भारत शायद दुनिया को यही दिखा रहा है कि आधुनिक बनने का मतलब सांस्कृतिक समर्पण नहीं है। परंपरा का अर्थ ठहराव भी नहीं है।

कोई देश कल की ओर देख सकता है, बिना अपनी सदियों पुरानी स्मृतियों को मिटाए।

शायद यही भारत की आधुनिक यात्रा का सबसे बड़ा सबक है।

भविष्य बनाने के लिए हमेशा अतीत को जलाना जरूरी नहीं।

कभी-कभी भविष्य की सबसे मजबूत इमारत उसी नींव पर खड़ी होती है, जिसमें अतीत की अच्छी ईंटें भी लगी हों।

भारत पीछे नहीं जा रहा।

वह आंख मूंदकर पश्चिम की ओर भी नहीं दौड़ रहा।

वह अपने रास्ते पर आगे बढ़ रहा है।

और इस यात्रा में पूरब और पश्चिम प्रतिद्वंद्वी नहीं हैं।

वे भारत के नए युग के दो साथी हैं।

 गिफ्ट का सूट, जूतों की लूट और पत्रकारों की जलवा-ए-फ़ज़ीहत!

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खरांची से बृज खंडेलवाल द्वारा 

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दक्षिण प्रांत के पाजीपुर कस्बे की यह दास्तान पत्रकारिता के इतिहास में सुनहरे अक्षरों से नहीं, बल्कि रेडीमेड सूट के कपड़े पर कढ़ाई करके लिखी जानी चाहिए।

हुआ यूँ कि एक बड़ी रेडीमेड वस्त्र कंपनी ने अपना शानदार शोरूम खोला। उद्घाटन पर पत्रकारों को खास तौर पर दावत दी गई। पत्रकार भी कैमरे, कलम और उम्मीदों की बड़ी-बड़ी जेबें लेकर तशरीफ ले आए।

कार्यक्रम खत्म हुआ तो राज़ खुला।

गिफ्ट में थे सिर्फ आठ सूट।

मगर पत्रकार थे पूरे बाईस।

बस हुज़ूर, फिर क्या था!

प्रेस फ्रीडम खतरे में पड़ गई। पत्रकारिता की अस्मिता पर हमला हो गया। ऐसा संकट आया, मानो किसी ने संपादकीय पन्ने की जगह साबुन का इश्तिहार छाप दिया हो।

कंजूस मालिक ने मासूमियत से पूछा, “कितने आदमी  थे?”

एक बुज़ुर्ग पत्रकार का ख़ून खौल उठा। “यह मीडिया की तौहीन है!” दूसरे ने दहाड़ लगाई, “आठ सूट और बाईस आदमी! जनाब, यह कैसा हिसाब है? यह गणित आपने किस मदरसे में पढ़ा?”

देखते ही देखते कांच की बोतलें हवा में उड़ने लगीं। उद्घाटन समारोह कम और आईपीएल का फाइनल ज्यादा लगने लगा। कुछ लोगों को मामूली चोटें भी आईं। अगले दिन शहर में कंपनी के शोरूम से ज्यादा चर्चा सूटों की हो रही थी।

रविवार को लोकल प्रेस क्लब की हंगामी बैठक बुलाई गई।

चेहरे गंभीर थे। आवाजें भारी थीं। माहौल में इंकलाब की खुशबू थी।

फैसला हुआ कि अब कोई पत्रकार गिफ्ट नहीं लेगा। गिफ्टबाजी का बहिष्कार होगा। और अगर कोई गिफ्ट देगा भी, तो प्रेस क्लब के सभी 213 सदस्यों को बराबर मिलेगा।

वाह! पत्रकारिता बच गई।

नैतिकता ने अंगड़ाई ली। उसूलों ने सीना फुलाया। सिद्धांतों ने खड़े होकर सलाम ठोंका।

फिर शादी का मौसम आ गया।

एक नेताजी के बड़े साहबज़ादे की शादी का निमंत्रण आया। प्रेस क्लब के पत्रकारों को बाकायदा कार्ड मिला। खुशियों की लहर दौड़ गई। किसी ने नया कुर्ता निकाला, किसी ने इत्र लगाया, किसी ने बरसों पुराना कैमरा चमकाया।

पंद्रह तारीख की शाम आंधी और बारिश ने बारातघर पर धावा बोल दिया। बिजली गुल। जनरेटर में डीजल खत्म। मोमबत्तियां जल रही थीं और लालटेनें अपनी आखिरी सरकारी नौकरी निभा रही थीं।

नेताजी खुद पत्रकारों की खातिरदारी में लगे थे।

तभी,

भक्क्काटा!

बिजली आ गई।

संगीत शुरू हुआ। जाम छलके। महफ़िल जवान हुई।

और फिर सबकी नजर एक ही दिशा में जम गई।

आठ पत्रकार।

आठों ने एक ही रंग के।

एक ही डिजाइन के।

एक ही कंपनी के सूट पहन रखे थे।

बाकी चौदह पत्रकारों की आंखों में शरारत चमक उठी।

“क्यों उमर भाई, आजकल फैशन में यूनिफॉर्म चल रहा है क्या?”

“ख़ां साहब, कहीं किसी जमींदार के अब्बाजान के मातम में तो नहीं गए थे?”

“सुना है, मुफ्त के कपड़े मिले थे उधर!”

बस जनाब, पार्टी का सारा लुत्फ़ गया तेल लेने।

आठों सूटधारी पत्रकार ऐसे खिसके, जैसे बिजली विभाग का बिल देखकर आम आदमी खिसकता है। कोई पंडाल के पीछे, कोई खाने की मेज के पास, कोई अंधेरे कोने में जाकर अपनी पत्रकारिता तलाशने लगा।

मगर किस्सा यहीं खत्म नहीं हुआ।

उधर, तुमकाडा जिले से खबर आई कि एक पत्रकार के दादाजी की शोकसभा में बड़ी तादाद में मीडिया वाले पहुंचे। मातमपुर्सी खत्म हुई, लोग बाहर निकले, तो जूते-चप्पलों का ऐसा महाभारत सामने था कि ईरान-अमेरिका भी शर्मिंदा हो जाएं।

दर्जनों जूते। एक ही रंग। एक ही ठप्पा। एक ही डिजाइन। एक ही कंपनी।

किसका कौन सा? पहचानने का कोई चांस नहीं।

तभी रैम्बो बाबू ने मंजर देखा। उनसे चुप रहा नहीं गया।

बोले, “क्यों बे! तुम सब जूते वाली फैक्ट्री में आग लगने की खबर कवर करने गए थे न?”

सन्नाटा।

ऐसा सन्नाटा कि अगर कोई पिन गिरती, तो शायद वही अपना जूता पहचान लेती।

फिर सब बगलें झांकने लगे।

आखिर लोकतांत्रिक फैसला हुआ, जिसके पैर में जो फिट हो जाए, वही उसका।

बस, फिर क्या था!

मीडिया वाले एक-एक करके निकल लिए। किसी के पैर में अपना जूता था, किसी के पैर में किसी और का। एक साहब का दायां जूता शायद उनका था, बायां किसी दूसरे अखबार का।

पत्रकारिता की इज्जत पीछे रह गई।

जूते आगे निकल गए।

व्याकुल दुनिया के संपादक ने इस तमाम फ़ज़ीहत पर गहरी सांस लेकर फरमाया:

“सबक सिर्फ इतना है कि मुफ्त का सूट हो या मुफ्त का जूता, मीडिया की पहचान छिपाए नहीं छिपती। कभी सभी के सूट एक जैसे होते हैं, कभी जूते। कभी घरों में एक जैसे शोपीस, बेडशीट, घड़ियां और क्रॉकरी बरामद होती हैं। गिफ्ट देने वाले भी वही घिसे-पिटे सामान बांटते रहते हैं, और बाकी दुनिया तमाशा देखकर ठहाके लगाती रहती है।”

आखिर पत्रकारिता का भी अपना एक उसूल है।

खबर चाहे अलग-अलग हो, मगर गिफ्ट सबको एक जैसा चाहिए

Monday, August 24, 2026


बादल, कंप्यूटर और पवित्र अग्नि: भारत का दोमुखी यथार्थवाद

न्यूटन और नास्त्रेदमस, दोनों का सम्मान है!

पढ़े लिखे होने का मतलब वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं है

______________________

बृज खंडेलवाल द्वारा 

26 अगस्त, 2026

_________________________

कर्नाटक के आसमान में बादल तो नहीं थे, पर सरकार की तैयारी पूरी थी।

एक टीम ने विमान और मौसम विज्ञान की तरफ देखा; दूसरी टीम ने मंदिर, पवित्र अग्नि और मंत्रों की ओर। अजीब!  पर दोनों सरकारी जवाब थे।

राज्य ने सूखे से निपटने के लिए 28.52 करोड़ रुपये के आपात क्लाउड-सीडिंग अभियान की घोषणा की। 31 जिलों में से 29 बारिश की कमी से जूझ रहे थे। विमान बादल ढूंढेंगे, वैज्ञानिक हालात पर निगरानी रखेंगे, सैकड़ों उड़ान घंटे तय किए गए।

उसी सुबह कोडागु के पाडी इग्गुथप्पा मंदिर में रुद्र होम होना था; कृषि मंत्री पी.एम. नरेंद्रस्वामी शामिल होने वाले थे। बताया गया कि मुख्यमंत्री के निर्देश पर यह अनुष्ठान रखा गया, उम्मीद यही थी कि देवता कर्नाटक पर मेहरबान होंगे।

एक तस्वीर सोचिए: एक तरफ वैज्ञानिक क्लाउड-इंजीनियरिंग, दूसरी तरफ हवनों का धुआँ; दोनों का मकसद समान है: बारिश।

यह भारत की दोहरी ज़िंदगी है।

हम रॉकेट बनाते हैं, पर अहम काम से पहले मुहूर्त पूछते हैं। उपग्रह भेजते हैं, पर नए व्यापार के लिए सितारों की सलाह लेते हैं। हम दुनिया के बेहतरीन इंजीनियर तैयार करते हैं, पर कई बार दफ्तरों का नक्शा वास्तु और अंकशास्त्र तय करते हैं। विज्ञान और अंधविश्वास यहां सिर्फ पड़ोसी नहीं, कभी-कभी वे एक ही बेडरूम शेयर करते हैं।

ISRO की सफलताएँ और वैज्ञानिक क्षमता बहुमूल्य हैं। फिर भी बड़े कार्यक्रमों से पहले “मुहूर्त शुभ है या नहीं” जैसे सवाल उठते हैं। गणित रॉकेट को चलाता है; इंसान अक्सर ग्रह-नक्षत्रों पर भरोसा कर लेता है।

यह विरोधाभास शिक्षा और व्यावहारिक जीवन में भी दिखता है। हमारे पास विश्वस्तरीय मेडिकल संस्थान हैं, पर डिजिटल बाजार पर वही फोन चमत्कारी दवाइयाँ, कुंडली-वाले ऐप और तांत्रिक इलाज भी बेचते हैं। इतिहास पर गर्व करना ठीक है, पर पुरानी कथाओं से आधुनिक आविष्कार निकालना सबूत नहीं है।

पर्यावरण की भी यही कहानी  है। वैज्ञानिक नदियों की सफाई, जलवायु परिवर्तन और भूजल घटने की चेतावनी दे रहे हैं; अदालतें आदेश दे रही हैं; पर त्यौहारों में टनों सामग्री उन्हीं नदियों में विसर्जित कर दी जाती है। आस्था कहती है नदी पवित्र है; नदी के पास पीआर टीम नहीं है: वह कचरा ढोती आगे बढ़ती है।

हमारा संविधान वैज्ञानिक सोच की बात करता है, पर सामाजिक फैसलों में जाति, कुंडली और परंपरा का प्रभाव आज भी दिखता है। एक हाथ में आधुनिक डिग्री हो सकती है; दूसरे हाथ में जन्मपत्री मजबूती से थमी रहती है।

कर्नाटक का मामला इसलिए आँख खोलने वाला है क्योंकि विज्ञान और आस्था एक साथ सामने आए। क्लाउड-सीडिंग कोई जादू नहीं; यह सही परिस्थितियों पर निर्भर एक तकनीक है। रुद्र होम आस्था और परंपरा का मामला है। प्रार्थना उम्मीद देती है; पर उम्मीद हाइड्रोलॉजी की जगह नहीं ले सकती। हवन सूखी नहर की मरम्मत नहीं कर सकता; मंत्र खाली जलाशय भर नहीं देते।

प्राचीन ज्ञान का अध्ययन ज़रूरी है; पर पुराने किस्सों को साक्ष्य मान लेना खतरे की घंटी है। अखबार हो या टीवी, डिजिटल मीडिया, ज्योतिषियों की भरमार है। तमाम लोग राशिफल पढ़कर ही दिन शुरू करते हैं। 

सुबह प्रार्थना कीजिए; दोपहर तक जलाशय बना लीजिए। यही मिश्रित तर्कहीनता से निकलने की असली चुनौती है।

भारत ज्ञान, तकनीक और नेतृत्व बनने का सपना देखता है। सपने अच्छे हैं। पर पहले फर्क सीखिए। ज्ञान और विश्वास, सबूत और भावना, शोध और आत्म–प्रशंसा के बीच। वरना हम दो दुनियाओं में यूं ही जीते रहेंगे: एक हाथ उपग्रह छोड़ेगा, दूसरा शुभ मुहूर्त खोजेगा; एक विमान बादल में बीज डालेगा, दूसरा सरकारी दल पवित्र अग्नि में आहुति देगा, और विरोधाभास धुएँ और बादलों के बीच नाचता रहेगा। 


 












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बादल, कंप्यूटर और पवित्र अग्नि: भारत का दोमुखी यथार्थवाद

न्यूटन और नास्त्रेदमस, दोनों का सम्मान है!

पढ़े लिखे होने का मतलब वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं है

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

26 अगस्त, 2026

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कर्नाटक के आसमान में बादल तो नहीं थे, पर सरकार की तैयारी पूरी थी।

एक टीम ने विमान और मौसम विज्ञान की तरफ देखा; दूसरी टीम ने मंदिर, पवित्र अग्नि और मंत्रों की ओर। अजीब!  पर दोनों सरकारी जवाब थे।

राज्य ने सूखे से निपटने के लिए 28.52 करोड़ रुपये के आपात क्लाउड-सीडिंग अभियान की घोषणा की। 31 जिलों में से 29 बारिश की कमी से जूझ रहे थे। विमान बादल ढूंढेंगे, वैज्ञानिक हालात पर निगरानी रखेंगे, सैकड़ों उड़ान घंटे तय किए गए।

उसी सुबह कोडागु के पाडी इग्गुथप्पा मंदिर में रुद्र होम होना था; कृषि मंत्री पी.एम. नरेंद्रस्वामी शामिल होने वाले थे। बताया गया कि मुख्यमंत्री के निर्देश पर यह अनुष्ठान रखा गया, उम्मीद यही थी कि देवता कर्नाटक पर मेहरबान होंगे।

एक तस्वीर सोचिए: एक तरफ वैज्ञानिक क्लाउड-इंजीनियरिंग, दूसरी तरफ हवनों का धुआँ; दोनों का मकसद समान है: बारिश।

यह भारत की दोहरी ज़िंदगी है।

हम रॉकेट बनाते हैं, पर अहम काम से पहले मुहूर्त पूछते हैं। उपग्रह भेजते हैं, पर नए व्यापार के लिए सितारों की सलाह लेते हैं। हम दुनिया के बेहतरीन इंजीनियर तैयार करते हैं, पर कई बार दफ्तरों का नक्शा वास्तु और अंकशास्त्र तय करते हैं। विज्ञान और अंधविश्वास यहां सिर्फ पड़ोसी नहीं, कभी-कभी वे एक ही बेडरूम शेयर करते हैं।

ISRO की सफलताएँ और वैज्ञानिक क्षमता बहुमूल्य हैं। फिर भी बड़े कार्यक्रमों से पहले “मुहूर्त शुभ है या नहीं” जैसे सवाल उठते हैं। गणित रॉकेट को चलाता है; इंसान अक्सर ग्रह-नक्षत्रों पर भरोसा कर लेता है।

यह विरोधाभास शिक्षा और व्यावहारिक जीवन में भी दिखता है। हमारे पास विश्वस्तरीय मेडिकल संस्थान हैं, पर डिजिटल बाजार पर वही फोन चमत्कारी दवाइयाँ, कुंडली-वाले ऐप और तांत्रिक इलाज भी बेचते हैं। इतिहास पर गर्व करना ठीक है, पर पुरानी कथाओं से आधुनिक आविष्कार निकालना सबूत नहीं है।

पर्यावरण की भी यही कहानी  है। वैज्ञानिक नदियों की सफाई, जलवायु परिवर्तन और भूजल घटने की चेतावनी दे रहे हैं; अदालतें आदेश दे रही हैं; पर त्यौहारों में टनों सामग्री उन्हीं नदियों में विसर्जित कर दी जाती है। आस्था कहती है नदी पवित्र है; नदी के पास पीआर टीम नहीं है: वह कचरा ढोती आगे बढ़ती है।

हमारा संविधान वैज्ञानिक सोच की बात करता है, पर सामाजिक फैसलों में जाति, कुंडली और परंपरा का प्रभाव आज भी दिखता है। एक हाथ में आधुनिक डिग्री हो सकती है; दूसरे हाथ में जन्मपत्री मजबूती से थमी रहती है।

कर्नाटक का मामला इसलिए आँख खोलने वाला है क्योंकि विज्ञान और आस्था एक साथ सामने आए। क्लाउड-सीडिंग कोई जादू नहीं; यह सही परिस्थितियों पर निर्भर एक तकनीक है। रुद्र होम आस्था और परंपरा का मामला है। प्रार्थना उम्मीद देती है; पर उम्मीद हाइड्रोलॉजी की जगह नहीं ले सकती। हवन सूखी नहर की मरम्मत नहीं कर सकता; मंत्र खाली जलाशय भर नहीं देते।

प्राचीन ज्ञान का अध्ययन ज़रूरी है; पर पुराने किस्सों को साक्ष्य मान लेना खतरे की घंटी है। अखबार हो या टीवी, डिजिटल मीडिया, ज्योतिषियों की भरमार है। तमाम लोग राशिफल पढ़कर ही दिन शुरू करते हैं। 

सुबह प्रार्थना कीजिए; दोपहर तक जलाशय बना लीजिए। यही मिश्रित तर्कहीनता से निकलने की असली चुनौती है।

भारत ज्ञान, तकनीक और नेतृत्व बनने का सपना देखता है। सपने अच्छे हैं। पर पहले फर्क सीखिए। ज्ञान और विश्वास, सबूत और भावना, शोध और आत्म–प्रशंसा के बीच। वरना हम दो दुनियाओं में यूं ही जीते रहेंगे: एक हाथ उपग्रह छोड़ेगा, दूसरा शुभ मुहूर्त खोजेगा; एक विमान बादल में बीज डालेगा, दूसरा सरकारी दल पवित्र अग्नि में आहुति देगा, और विरोधाभास धुएँ और बादलों के बीच नाचता रहेगा। 


Sunday, August 23, 2026

 (A Mass communication study)

मोदी के मैजिक मंत्र: 

कैसे एक माहिर संचारक (कम्युनिकेटर) विचारों को राष्ट्रीय मिशन में बदल देता है

_________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा

25 अगस्त, 2026

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देश अपने घरों में बंद था। सड़कें सुनसान थीं, बाजार खामोश थे और कारखानों के पहिए थम गए थे। कोरोना का अदृश्य खौफ लगभग हर घर में दाखिल हो चुका था। किसी को नहीं मालूम था कि यह संकट कब खत्म होगा।

तभी टेलीविजन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आवाज गूंजी।

शाम के पांच बजे ताली बजाइए। घंटी बजाइए। थाली बजाइए। डॉक्टरों, नर्सों, सफाईकर्मियों, पुलिसकर्मियों और कोरोना योद्धाओं का शुक्रिया अदा कीजिए।

कुछ दिन बाद एक और अपील आई।

रात नौ बजे घर की बत्तियां बुझाइए। दरवाजे या बालकनी में खड़े होकर नौ मिनट तक दिया, मोमबत्ती या मोबाइल की रोशनी जलाइए।

निर्देश आसान थे। समय तय था। काम सबके लिए एक था। लाखों लोगों ने उसका पालन किया।

कोई इन प्रतीकों से सहमत था, कोई असहमत। उनके व्यावहारिक असर पर भी बहस हुई। मगर एक बात साफ थी, संप्रेषण बेहद स्पष्ट था।


यही शायद नरेंद्र मोदी की राजनीतिक संचार शैली का सबसे दिलचस्प पहलू है। पिछले एक दशक से ज्यादा समय में उन्होंने कठिन नीतियों, आर्थिक रणनीतियों और राष्ट्रीय लक्ष्यों को छोटे-छोटे सूत्रों, मंत्रों, नारों और याद रह जाने वाले वाक्यों में बदलने की कला विकसित की है।

तीन शब्द। पांच बिंदु। सात संकल्प।

3S, 5T, 5F, पंच प्रण और सप्तधारा।

इनमें वैज्ञानिक स्पष्टता भी है और संचार की समझ भी। ग्रामीण विकास हो, आर्थिक तरक्की हो, युवाओं के कौशल की बात हो, आत्मनिर्भर भारत का सपना हो या 2047 तक विकसित भारत बनाने का लक्ष्य; संदेश में अक्सर लक्ष्य साफ होता है, रास्ता बताया जाता है और नागरिक की भूमिका भी तय की जाती है। कई बार लगता है किसी कॉरपोरेट कंपनी के हेड का प्रेजेंटेशन चल रहा है: यह लक्ष्य है। यह रणनीति है। यह आपकी भूमिका है। और यह समय सीमा है।


रेडियो पर मन की बात हो, संसद में भाषण हो, चुनावी सभा हो या लाल किले से स्वतंत्रता दिवस का संबोधन, मोदी की भाषा में आम तौर पर बहुत कम अस्पष्टता दिखाई देती है।

हंसी-मजाक, दोहरे अर्थ वाले वाक्य और बेवजह की हल्की-फुल्की टिप्पणियां उनकी शैली का मुख्य हिस्सा नहीं हैं। इसके बजाय वे अक्सर ऐसे दिखाई देते हैं जैसे कोई विश्वविद्यालय का प्रोफेसर पूरी तैयारी के साथ कक्षा में आया हो। नोट्स तैयार हैं। विषय स्पष्ट है। और विद्यार्थियों के लिए संदेश भी। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां विद्यार्थी पूरा देश है।

तीन, पांच और सात का जादू

मोदी के शुरुआती सूत्रों में एक था 5T—Talent, Tradition, Tourism, Trade और Technology।

इन पांच शब्दों में भारत की एक पूरी तस्वीर खींच दी गई। परंपरा के साथ तकनीक। पर्यटन के साथ व्यापार। पुरानी सभ्यता के साथ नई अर्थव्यवस्था।

संदेश साफ है: भारत को अपने अतीत और भविष्य में से किसी एक को चुनने की जरूरत नहीं है।

फिर आया 3S: Speed, Skill और Scale।

विकास तेज होना चाहिए। युवाओं के पास कौशल होना चाहिए। काम बड़े पैमाने पर होना चाहिए।

तीन शब्दों में आर्थिक नीति का एक बड़ा खाका सामने आ जाता है।

5F भी इसी शैली का शानदार उदाहरण है: Farm, Fibre, Fabric, Fashion और Foreign।

खेत से फाइबर, फाइबर से कपड़ा, कपड़े से फैशन और फैशन से विदेशी बाजार।

पूरी वैल्यू चेन पांच शब्दों में।

फिर आया एक ऐसा सूत्र जो स्कूल की ब्लैकबोर्ड पर लिखे किसी समीकरण जैसा लगता है: 

IT + IT = IT

यानी Indian Talent + Information Technology = India Tomorrow.

लोग समीकरण याद रखते हैं। शायद इसीलिए यह सूत्र भी याद रह गया।

मोदी की भाषा में यही संचार-कला बार-बार दिखाई देती है।

नारे नहीं, याद रखने की तकनीक

Reform, Perform, Transform: 

पहले सुधार, फिर बेहतर प्रदर्शन और अंत में बदलाव।

Per Drop More Crop; हर बूंद से ज्यादा फसल।

कृषि, सिंचाई और जल संरक्षण जैसे जटिल विषय को चार शब्दों में समेट दिया गया।

इसी तरह Make in India, Atmanirbhar Bharat, Vocal for Local और Swadeshi एक-दूसरे को मजबूत करते हैं।

एक ही विचार अलग-अलग नारों के जरिए बार-बार सामने आता है।

और यही दोहराव संदेश को सार्वजनिक भाषा का हिस्सा बना देता है।

मोदी की सबसे लोकप्रिय राजनीतिक पंक्तियों में से एक है; 

सबका साथ, सबका विकास।

बाद में इसमें दो और शब्द जुड़ गए: 

सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास।

साथ, विकास, विश्वास और प्रयास।

चार शब्द, लेकिन एक पूरी राजनीतिक सोच।

यही शैली पार्टी संगठन तक भी पहुंचती है। भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए बताए गए सात मंत्र: सेवाभाव, संतुलन, संयम, समन्वय, सकारात्मकता, संवेदना और संवाद; सिर्फ विचार नहीं हैं। समान ध्वनि वाले शब्दों के कारण वे आसानी से याद भी रहते हैं। यहां भाषा केवल सूचना नहीं देती। भाषा स्मृति बनाती है।


कोविड-19 महामारी ने मोदी की संचार शैली को सबसे नाटकीय तरीके से सामने रखा।

देश डरा हुआ था। अस्पतालों पर दबाव था। कारोबार बंद हो रहे थे। करोड़ों लोगों के रोजगार और भविष्य को लेकर चिंता थी। ऐसे समय में संचार खुद शासन का एक महत्वपूर्ण औजार बन गया।

पहले आया जनता कर्फ्यू।

फिर शाम पांच बजे कोरोना योद्धाओं के सम्मान में ताली, घंटी और थाली बजाने की अपील हुई।

इस प्रतीक पर बहस हुई। आलोचना भी हुई। लेकिन संचार की दृष्टि से इसका एक असर जरूर हुआ।

डॉक्टर, नर्स, सफाईकर्मी और दूसरे फ्रंटलाइन वर्कर अचानक राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में आ गए।

इसके बाद आया 21 दिन का लॉकडाउन।

मोदी ने इसे समझाने के लिए भारतीय सांस्कृतिक स्मृति से एक जाना-पहचाना रूपक निकाला: लक्ष्मण रेखा।

आपका घर आपकी सीमा है।

बेवजह बाहर मत निकलो।

घर में रहो।

संक्रमण की कड़ी तोड़ो।

फिर आया रात नौ बजे, नौ मिनट का संदेश।

बत्तियां बुझाइए।

दीया जलाइए।

मोमबत्ती जलाइए।

मोबाइल की रोशनी जलाइए।

नौ मिनट तक एक साझा प्रतीक बनाइए।

इसके बाद सात बिंदुओं वाली अपील में बुजुर्गों की रक्षा करने, सामाजिक दूरी रखने, प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, आरोग्य सेतु का इस्तेमाल करने, गरीब परिवारों की मदद करने, कर्मचारियों की चिंता करने और कोरोना योद्धाओं का सम्मान करने की बात कही गई।

पूरे अभियान का सबसे महत्वपूर्ण संदेश शायद यही था: सरकार अकेली कोरोना से नहीं लड़ रही है। आप भी इस लड़ाई का हिस्सा हैं।

यही सहभागी संप्रेषण है।

घर में बंद डरा हुआ नागरिक भी किसी काम का हिस्सा बन गया।

संकट के समय एक छोटा-सा साझा काम भी लोगों में सामूहिकता और भरोसे की भावना पैदा कर सकता है।

संकट से 2047 तक

कोरोना के बाद यही संचार शैली तत्काल संकट से निकलकर भारत के दीर्घकालीन सपने तक पहुंची।

2022 में आया पंच प्रण।

2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाना। औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति। अपनी विरासत पर गर्व। एकता को मजबूत करना। नागरिक कर्तव्यों को निभाना।

2047 बहुत दूर का सपना है।

लेकिन पांच संकल्प उसे समझने योग्य बना देते हैं।

इसके बाद डेमोग्राफी, डेमोक्रेसी और डायवर्सिटी यानी जनसांख्यिकी, लोकतंत्र और विविधता का त्रिफलक सामने आया।

दूसरी तरफ भ्रष्टाचार, परिवारवाद और तुष्टीकरण जैसे मुद्दों को भी तीन के ढांचे में पेश किया गया।

फिर आया सप्तधारा का विचार।

विकसित भारत के रास्ते में सात बड़ी धाराएं: मैन्युफैक्चरिंग, कृषि और खाद्य प्रसंस्करण, तकनीक और नवाचार, गति शक्ति और कनेक्टिविटी, रक्षा शक्ति, ग्रीन और ब्लू इकोनॉमी तथा भारत की सॉफ्ट पावर।

यहां प्रतीक और आधुनिकता का अनोखा मेल दिखाई देता है।

प्राचीन भारत में सप्त सिंधु की कल्पना थी।

आज के भारत के सामने सप्तधारा है।

एक तरफ कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम टेक्नोलॉजी, रोबोटिक्स, ग्रीन हाइड्रोजन और आधुनिक लॉजिस्टिक्स हैं। दूसरी तरफ योग, आयुर्वेद, संस्कृति और पर्यटन।

एक पैर सभ्यतागत स्मृति में है।

दूसरा 2047 में।

यह शैली मोदी तक सीमित नहीं

यह संचार शैली अब दूसरे वरिष्ठ मंत्रियों में भी दिखाई देती है।

विदेश मंत्री एस. जयशंकर का उदाहरण लिया जा सकता है। उन्होंने बदलती दुनिया को 3 Cs: Competition, Conflict और Choke Points, के जरिए समझाया है।

जवाब के लिए 4 Ds: Derisking, Diversification, distortions से निपटना और सुरक्षा का एक मार्जिन बनाए रखना, जैसी शब्दावली सामने आती है। पुरानी सोच थी: Just in Time। नई दुनिया कह रही है: Just in Case। जटिल भू-राजनीति भी कुछ याद रहने वाले शब्दों में बदल जाती है।

मगर नारा शासन नहीं है

यहां एक जरूरी सवाल भी है।

सूत्र और नारे प्रभावशाली हो सकते हैं, लेकिन वे शासन का विकल्प नहीं हैं।

सिर्फ नारे से कारखाना नहीं बनता।

मंत्र से रोजगार पैदा नहीं होता।

दिया जलाने से बीमारी ठीक नहीं होती।

कोई आकर्षक वाक्य नदी को साफ नहीं कर सकता।

अंततः असली परीक्षा काम की है।

नीतियों के परिणामों को आंकना जरूरी है। सरकार के दावों को जांचना जरूरी है। नागरिकों, अर्थशास्त्रियों, पत्रकारों और विपक्षी दलों को सवाल पूछने का पूरा अधिकार है।

राजनीतिक संचार लोगों को जोड़ सकता है।

लेकिन परिणाम ही उसकी अंतिम कसौटी हैं।

फिर भी संचार को कम करके नहीं आंका जा सकता।

1.4 अरब से ज्यादा लोगों के देश में कोई नीति अगर सरकारी फाइलों में बंद रह जाए तो वह जनभागीदारी का अभियान नहीं बन सकती।

पहले लोगों को बात समझनी होगी।

फिर वे उससे जुड़ेंगे।

यहीं मोदी की संचार शक्ति सबसे दिलचस्प बन जाती है।

वे जानते हैं कि लोग तीन शब्द तीस पैराग्राफ से ज्यादा आसानी से याद रखते हैं।

लोग लंबे भाषण से ज्यादा आसानी से कोई ठोस काम याद रखते हैं।

और अस्पष्ट वादे से ज्यादा आसानी से एक तय समय सीमा याद रखते हैं।


भारत के राजनीतिक इतिहास में संक्षिप्त और ताकतवर नारों की परंपरा पुरानी है।

महात्मा गांधी के दौर में "भारत छोड़ो" और "करो या मरो" जैसे छोटे वाक्यों ने विशाल जनसमूह को आंदोलित किया था।

समय बदल गया है।

माइक की जगह टेलीविजन, मोबाइल, यूट्यूब और सोशल मीडिया ने ले ली है।

लेकिन संचार का मूल सिद्धांत आज भी वही है।

लोगों को एक वाक्य दीजिए।

एक उद्देश्य दीजिए।

और उसमें उनकी भूमिका तय कर दीजिए।

मोदी के 3S, 5T, 5F, पंच प्रण, सप्तधारा और Per Drop More Crop जैसे सूत्र इसी आधुनिक संचार परंपरा के अध्ययन का विषय बन सकते हैं।

ये सिर्फ नारे नहीं हैं। ये याद रखने की तकनीक हैं।

इनके जरिए जटिल नीतियों को सरल बनाया जाता है, भावनात्मक जुड़ाव पैदा किया जाता है और लोगों को किसी बड़े राष्ट्रीय अभियान का हिस्सा बनने के लिए प्रेरित किया जाता है।

आखिर असली कमाल केवल आकर्षक नारा गढ़ने में नहीं है।

कमाल है किसी विचार को साझी जिम्मेदारी में बदल देने में।

पानी बचाइए।

स्थानीय सामान खरीदिए।

नई स्किल सीखिए।

बुजुर्गों की रक्षा कीजिए।

गरीब की मदद कीजिए।

कोरोना योद्धाओं का सम्मान कीजिए।

और विकसित भारत बनाने में अपना योगदान दीजिए।

भाषा छोटी है।

मगर लक्ष्य बहुत बड़ा है।

भाषण खत्म होता है।

कैमरे बंद हो जाते हैं।

लेकिन संदेश का सफर शुरू हो जाता है।

वह अखबार की हेडलाइन बनता है। टीवी की पट्टी बनता है। गांव की सभा में दोहराया जाता है। व्हाट्सऐप पर घूमता है। घर की बातचीत में पहुंचता है।

यही है नारे के पीछे का विज्ञान।

एक अच्छा वक्ता लोगों को सोचने के लिए कुछ देता है।

एक माहिर संचारक उन्हें याद रखने और कुछ करने के लिए देता है।