क्या भारत की एग्जाम फैक्ट्री कॉकरोच पैदा कर रही है!
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भारत का 58,000 करोड़ रुपये का कोचिंग उद्योग बच्चों को बचा भी रहा है और बर्बाद भी.....
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बृज खंडेलवाल द्वारा
10 जून 2026
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पहले जमाने में, कमजोर बच्चों को प्राइवेट ट्यूशन की जरूरत पड़ती थी, अब हर किसी को......
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भारत की शिक्षा व्यवस्था के अंधेरे गलियारों में आखिर रेंगता क्या है?
सपने? महत्वाकांक्षाएं? उम्मीदें?
या फिर कुछ और?
आधी रात को मेज पर झुका एक टीनएजर । लाल आंखें। थका हुआ शरीर। सामने बिखरे टेस्ट पेपर। दूसरी ओर माता-पिता, जो कोचिंग की फीस भरने के लिए कर्ज़ और कुर्बानियों का हिसाब लगा रहे हैं। बच्चे, जो खुद को इंसान नहीं, बल्कि एक रैंक और प्रतिशत के रूप में देखने लगे हैं।
कोचिंग उद्योग इसे तैयारी कहता है।
बहुत से छात्र इसे जद्दोजहद और जीवित रहने की लड़ाई कहते हैं।
जून 2026 में पटना की सड़कों पर जो कुछ हुआ, उसने इस विरोधाभास को नंगा कर दिया। खान ग्लोबल स्टडीज़ के बाहर विरोध प्रदर्शन, तोड़फोड़, आरोप और प्रत्यारोपों का तूफान उठ खड़ा हुआ। सोशल मीडिया गरज उठा। नेता भी मैदान में कूद पड़े।
और उधर दिल्ली के जंतर मंतर पर कॉकरोचों का अजीब प्रदर्शन!
यह सिर्फ एक स्थानीय विवाद नहीं था। यह भारत के कोचिंग उद्योग की आत्मा की एक झलक थी।
एक ऐसी दुनिया, जहां कुछ शिक्षक फिल्मी सितारों जैसी लोकप्रियता रखते हैं। जहां शैक्षणिक संस्थान कॉरपोरेट साम्राज्य की तरह काम करते हैं। जहां प्रतिस्पर्धा, मुनाफा और जवाबदेही की कमी आपस में टकराती है। और जहां सबसे बड़ी कीमत अक्सर छात्रों को चुकानी पड़ती है।
सवाल असहज है।
कैसा है ये समाज जो अपने सोलह साल के बच्चे से कहता है कि अगले दो साल उसकी पूरी जिंदगी की कीमत तय करेंगे?
कैसे कुछ लोग इस विश्वास के इर्द-गिर्द 58,000 करोड़ रुपये का उद्योग खड़ा कर देते हैं?
कोचिंग अब शिक्षा का सहायक साधन नहीं रही। यह समानांतर शिक्षा व्यवस्था बन चुकी है। सात करोड़ से अधिक छात्र किसी न किसी रूप में कोचिंग से जुड़े हुए हैं। अनुमान है कि अगले कुछ वर्षों में यह उद्योग 1.3 लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा पार कर सकता है।
आंकड़े इस दीवानगी की वजह बताते हैं।
हर साल 11 लाख से अधिक छात्र जेईई की परीक्षा देते हैं। करीब 20 लाख छात्र नीट में बैठते हैं। देश के प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश पाने की संभावना कई बार पांच प्रतिशत से भी कम होती है।
जब मुकाबला इतना बेरहम हो, तो माता-पिता केवल स्कूलों पर भरोसा करना छोड़ देते हैं।
वे अपने बच्चों को कोटा भेजते हैं। पटना भेजते हैं। सीकर भेजते हैं। हैदराबाद भेजते हैं। ऐसे छात्रावासों में, जहां जिंदगी व्हाइटबोर्ड, रैंकिंग, टेस्ट और प्रदर्शन चार्ट के बीच सिमट जाती है।
कोचिंग उद्योग का उभार कोई हादसा नहीं था। यह उस शिक्षा व्यवस्था का स्वाभाविक नतीजा है जो योग्यता का वादा तो करती है, मगर कई बार लॉटरी जैसी महसूस होती है। करोड़ों मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए आईआईटी या एम्स का प्रवेश पत्र आर्थिक असुरक्षा से मुक्ति का सुनहरा टिकट माना जाता है।
स्कूल अब भी रटने को पुरस्कृत करते हैं। प्रतियोगी परीक्षाएं तेजी, रणनीति और विशेष कौशल मांगती हैं। कक्षा और परीक्षा कक्ष के बीच एक विशाल खाई मौजूद है।
कोचिंग उद्योग उस खाई को भरने आया था। फिर उसे एहसास हुआ कि यही खाई उसकी सबसे बड़ी कमाई बन सकती है।
तकनीक ने इस कारोबार को और विस्तार दिया है। ऑनलाइन कक्षाएं, रिकॉर्डेड लेक्चर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और व्यक्तिगत शिक्षण उपकरणों ने कोचिंग को महानगरों की सीमाओं से बाहर पहुंचा दिया है। अब छोटे शहर का छात्र भी वही व्याख्यान सुन सकता है जो दिल्ली या मुंबई का छात्र सुनता है।
उद्योग इसे लोकतंत्रीकरण कहता है।
आलोचक इसे बाज़ारीकरण कहते हैं।
दोनों में कुछ न कुछ सच्चाई है।
लेकिन इस उद्योग के सबसे काले अध्याय तब सामने आते हैं जब भारी दबाव और भारी पैसा एक साथ मिलते हैं।
नीट पेपर लीक कांड पूरे देश को झकझोर गया। जांच में ऐसे नेटवर्क सामने आए जो परीक्षा केंद्रों से कहीं आगे तक फैले थे। वर्षों से मेहनत कर रहे छात्रों को अचानक महसूस हुआ कि जिस व्यवस्था पर उन्होंने भरोसा किया था, वह भीतर से खोखली भी हो सकती है।
नुकसान केवल प्रश्नपत्र लीक होने का नहीं था।
भरोसा भी लीक हो गया था।
सुर्खियों से दूर कुछ और त्रासदियां भी हैं।
'डमी एडमिशन' अब आम बात बन चुकी है। छात्र स्कूलों में सिर्फ कागजों पर नामांकित रहते हैं, जबकि उनका अधिकांश समय कोचिंग संस्थानों में गुजरता है। कक्षाएं खाली होती जाती हैं। स्कूलों की भूमिका कमजोर पड़ती जाती है।
फिर आती है मानसिक स्वास्थ्य की समस्या।
चिंता। अवसाद। अकेलापन। थकान।
छात्र समीकरण हल करना सीखते हैं।
निराशा से निपटना नहीं।
असमानता का पहलू भी कम चिंताजनक नहीं है। संपन्न परिवार महंगी कोचिंग, निजी मार्गदर्शन और अनगिनत टेस्ट सीरीज़ खरीद सकते हैं। गरीब परिवारों के बच्चे वही लड़ाई कहीं कम संसाधनों के साथ लड़ते हैं।
कागज पर दौड़ सबके लिए समान है।
हकीकत में कुछ धावकों के पैरों में पहले से ही बोझ बंधा होता है।
समाधान कोचिंग संस्थानों को खलनायक घोषित करने में नहीं है। वे इसलिए पैदा हुए क्योंकि व्यवस्था ने उनकी जरूरत पैदा की।
असली सुधार कहीं और है।
आईआईटी, एम्स और अच्छे सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में सीटें बढ़ाई जाएं। प्रवेश परीक्षाओं को रटंत प्रणाली से हटाकर समझ और विश्लेषण पर आधारित बनाया जाए। कोचिंग संस्थानों को अपनी वास्तविक सफलता दर सार्वजनिक करने के लिए बाध्य किया जाए। स्कूलों को इतना मजबूत बनाया जाए कि कोचिंग शिक्षा का विकल्प नहीं, सहयोगी बने।
सबसे महत्वपूर्ण बात, छात्र के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को नीति के केंद्र में रखा जाए।
भारत का कोचिंग उद्योग जल्द खत्म होने वाला नहीं है। जिन आकांक्षाओं को वह पोषित करता है, वे वास्तविक हैं। जिस प्रतिस्पर्धा से वह छात्रों को लड़ने में मदद करता है, वह भी वास्तविक है।
लेकिन एक ऐसा देश, जो अपने बच्चों के सपनों को 58,000 करोड़ रुपये की परीक्षा मशीन के हवाले कर देता है, उसे खुद से एक कठिन सवाल पूछना चाहिए।
क्या सफलता की हमारी परिभाषा इतनी संकरी हो गई है कि पूरी एक पीढ़ी यह मान बैठी है कि जिंदगी एक रैंक से शुरू होती है और उसी पर खत्म?
शिक्षा का उद्देश्य नागरिक, चिंतक और नवप्रवर्तक तैयार करना था।
अगर हम सावधान नहीं हुए, तो यह व्यवस्था ऐसे लाखों थके हुए युवाओं को जन्म देगी जो परीक्षा की भूलभुलैया में दौड़ना तो जानते हैं, मगर जीवन का रास्ता भूल चुके होंगे।
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