Saturday, August 22, 2026

 इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों की दुकानदारी: 

जब शिक्षा से ज्यादा जरूरी हो जाए मुनाफा

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बृज खंडेलवाल द्वारा

24 अगस्त, 2026

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नई इमारत तैयार है। चमचमाता बोर्ड लग गया है। रंगीन ब्रोशर छप चुके हैं।

"एडमिशन शुरू हैं!"

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस। डेटा साइंस। साइबर सिक्योरिटी। मशीन लर्निंग। रोबोटिक्स।

नाम सुनकर लगता है, बस दाखिला लो और भविष्य जेब में डाल लो। मगर कई कॉलेजों के भीतर जाइए। खाली कुर्सियां आपका स्वागत करती मिलेंगी।

यही भारतीय उच्च शिक्षा की सबसे बड़ी विडम्बना है।

कर्नाटक के उच्च शिक्षा मंत्री ने हाल में कहा कि राज्य अब नए सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज नहीं खोलेगा। पहली नजर में यह फैसला पीछे हटने जैसा लग सकता है। असल में, यह देर से आया हुआ एक समझदार फैसला है।


पिछले तीन दशकों में प्रोफेशनल शिक्षा का ऐसा विस्तार हुआ कि हर शहर और कस्बे में कॉलेज कुकुरमुत्तों की तरह उग आए। इंजीनियरिंग, मेडिकल, डेंटल, फार्मेसी, मैनेजमेंट और होम्योपैथी कॉलेजों की बाढ़ आ गई।

शिक्षा धीरे-धीरे कारोबार बन गई।कॉलेज की सीट एक उत्पाद बन गई। छात्र ग्राहक बन गया।

कर्नाटक में हर साल करीब 28 से 30 हजार इंजीनियरिंग सीटें खाली रह जाती हैं। देश भर में इंजीनियरिंग की लगभग 30 से 40 प्रतिशत सीटों पर दाखिला नहीं हो पाता। यानी हर साल तीन से पांच लाख सीटें खाली रह सकती हैं।

तमिलनाडु की तस्वीर भी कम परेशान करने वाली नहीं है। टीएनईए काउंसलिंग के तीसरे दौर के बाद भी करीब 37,943 इंजीनियरिंग सीटें खाली थीं। लगभग 1,57,570 सीटें भर गईं, लेकिन बड़ी संख्या में सीटें फिर भी खाली रह गईं। राज्य में करीब 418 इंजीनियरिंग कॉलेज हैं।

सवाल यह नहीं कि छात्रों ने इंजीनियरिंग छोड़ दी है। असली बात यह है कि छात्र अब हर कॉलेज में दाखिला लेने को तैयार नहीं हैं।

अच्छे और पुराने संस्थानों में आज भी भीड़ है। शहरों के प्रतिष्ठित कॉलेज, जहां पढ़ाई और प्लेसमेंट बेहतर हैं, छात्रों की पहली पसंद बने हुए हैं।

लेकिन छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों के कई निजी कॉलेजों की हालत पतली है। कुछ कॉलेजों में एक भी छात्र नहीं पहुंचा। कुछ को गिनती के विद्यार्थी मिले।

संदेश साफ है। सीटें बढ़ा देने से मांग पैदा नहीं होती।

निजी कॉलेजों ने एक नया नुस्खा खोज लिया है। पुराने कंप्यूटर साइंस कोर्स के नाम के साथ कोई फैशनेबल शब्द जोड़ दीजिए। नया कोर्स तैयार।

एआई एंड मशीन लर्निंग। एआई एंड डेटा साइंस। साइबर सिक्योरिटी।इंटरनेट ऑफ थिंग्स। डेटा एनालिटिक्स। नाम अलग-अलग हैं। कई बार पढ़ाई का बड़ा हिस्सा लगभग एक जैसा होता है।

ब्रोशर नया है, सीटें नई हैं और फीस भी नई।

मुश्किल यह नहीं कि एआई पढ़ाई जा रही है। मुश्किल यह है कि कई जगह एआई सिर्फ एक चमकदार लेबल बन गया है। अच्छी लैब बनाना महंगा है। योग्य शिक्षक रखना महंगा है। रिसर्च कराना महंगा है। ब्रोशर बदलना सस्ता है। मुनाफे की दुनिया अक्सर आसान रास्ता चुनती है।

दूसरी तरफ मैकेनिकल, सिविल और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की सीटें खाली रह रही हैं। यह एक अजीब विरोधाभास है।

देश मैन्युफैक्चरिंग की बात करता है। बड़े-बड़े कारखानों की बात करता है। नई सड़कें, पुल, बिजली, सेमीकंडक्टर और ग्रीन एनर्जी की बातें होती हैं।

मगर युवाओं को एक ही दिशा में धकेला जा रहा है। सॉफ्टवेयर की तरफ।

कल को हमारे पास कोड लिखने वाले बहुत होंगे, लेकिन मशीन बनाने वाले कम। पुल बनाने वाले कम। बिजली और ऊर्जा व्यवस्था संभालने वाले कम।

इसे शिक्षा नीति नहीं, शैक्षिक सट्टेबाजी कहना ज्यादा ठीक होगा।


आईआईआईटी-बेंगलुरु के पूर्व निदेशक एस. सदागोपन की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति ने एक बेहद चिंताजनक तस्वीर पेश की।अनुमान यह था कि इंजीनियरिंग ग्रेजुएट्स में केवल करीब 17 प्रतिशत ही सीधे नौकरी के लिए तैयार माने जा सकते हैं।

जरा सोचिए। मां-बाप लाखों रुपये खर्च करते हैं। बच्चा चार साल पढ़ता है। डिग्री हाथ में आती है। फिर नौकरी का दरवाजा कहता है: अभी आप तैयार नहीं हैं।


समिति ने कंप्यूटर साइंस सीटों में कमी, एक जैसे कोर्सों पर रोक और एआई को अलग-अलग शाखाओं में शामिल करने की सिफारिश की।

बात बिल्कुल वाजिब है।



निजीकरण के समर्थकों ने कहा था कि इससे प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। गुणवत्ता सुधरेगी। दक्षता आएगी। लेकिन शिक्षा के एक बड़े हिस्से में हुआ कुछ और।

अगर एक कॉलेज मुनाफा कमा सकता है, तो दूसरा खोलो। अगर 60 सीटें बिकती हैं, तो 120 कर दो।कंप्यूटर साइंस चल रहा है, तो उसके पांच नए संस्करण निकाल दो। दाखिले कम हों, तो विज्ञापन बढ़ा दो।


मगर बड़ी तस्वीर से आंखें नहीं मूंदी जा सकतीं।

शिक्षा के विस्तार में राजनीतिक रसूख, ट्रस्ट, सोसायटी और कारोबारी हितों की भूमिका लगातार बढ़ती गई।हर सरकार ने कॉलेज खोलने को विकास का तमगा बना दिया। मगर किसी ने ठीक से नहीं पूछा: क्या हमें सचमुच एक और कॉलेज चाहिए?

उत्तर प्रदेश में 2026 में निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों में मांग और सीटों के बीच बड़ा असंतुलन दिखाई दे रहा है। AKTU की UPTAC काउंसलिंग के बाद करीब 74,000 बीटेक सीटें खाली रह गईं, जिनमें अधिकांश निजी कॉलेजों की हैं। लोकप्रिय CSE में भी 22,000 से अधिक सीटें खाली रहीं। छात्र नोएडा, गाजियाबाद और ग्रेटर नोएडा के प्रतिष्ठित कॉलेजों को तरजीह दे रहे हैं। कई निजी संस्थानों में JEE Main के बिना 12वीं के अंकों पर सीधे दाखिले की व्यवस्था करनी पड़ी। जरूरत से ज्यादा सीटें बढ़ने से कई कॉलेज आर्थिक दबाव और भविष्य के संकट से जूझ रहे हैं।

यही कहानी मेडिकल शिक्षा में भी दिखाई देती है। नए मेडिकल कॉलेजों की घोषणाएं बड़ी सुर्खियां बनती हैं। लेकिन मेडिकल कॉलेज केवल एक इमारत का नाम नहीं है।

उसे अनुभवी डॉक्टर चाहिए। शिक्षक चाहिए। लैब चाहिए। अस्पताल चाहिए। मरीज चाहिए। क्लीनिकल ट्रेनिंग चाहिए।

इनके बिना मेडिकल कॉलेज सिर्फ एक बड़ा भवन और चमकदार नामपट्ट बनकर रह सकता है।

होम्योपैथी और दूसरे प्रोफेशनल कोर्सों में भी कई संस्थान सीटें भरने के लिए जूझ रहे हैं। फिर भी नए संस्थान खोलने की होड़ खत्म नहीं होती।

यह कैसी तरक्की है?

जब पुरानी दुकान में ग्राहक नहीं हैं, तब नई दुकान क्यों खोली जा रही है?


हर साल नई इमारतें खड़ी करना बंद कीजिए। मौजूदा कॉलेजों को मजबूत बनाइए। खाली पड़े परिसरों का बेहतर इस्तेमाल कीजिए। उन्हें स्किलिंग और री-स्किलिंग सेंटर बनाइए। अच्छे शिक्षक लाइए। लैब सुधारिए। उद्योगों से सीधा रिश्ता जोड़िए।

और सबसे जरूरी बात; जितनी वास्तविक जरूरत है, उतनी ही सीटें रखिए। देश को 500 कमजोर इंजीनियरिंग कॉलेजों की जरूरत नहीं है। 100 अच्छे संस्थान शायद ज्यादा बेहतर काम कर सकते हैं।


खाली सीटें केवल दाखिले की समस्या नहीं हैं। वे व्यवस्था के खिलाफ छात्रों का खामोश फैसला हैं।


कई वर्षों से उच्च शिक्षा को समाज सेवा का लिबास पहनाकर एक बड़े कारोबार की तरह चलाया जा रहा है।

कॉलेज खोलने वालों को फायदा हुआ। राजनीतिक रसूख बढ़ा। इमारतें बनती गईं। सीटें बढ़ती गईं। मगर बेरोजगार डिग्रीधारियों की फौज भी बढ़ती गई।

समस्या निजी संस्थानों के होने की नहीं है। समस्या यह है कि शिक्षा को केवल मुनाफे की नजर से नहीं देखा जा सकता। कॉलेज इसलिए नहीं चलना चाहिए कि वह सीटें बेच सकता है। सरकार को तय करना होगा कि देश को किस तरह के पेशेवर चाहिए। कितने इंजीनियर चाहिए। कितने डॉक्टर चाहिए। किस इलाके में कॉलेज की जरूरत है।

सिर्फ वोट, जमीन और मुनाफे के लिए कॉलेज नहीं खुलने चाहिए।


Friday, August 21, 2026

 जब बड़े सो रहे थे, बच्चों ने घंटी बजा दी!  

जंतर-मंतर से यूपी के गांवों तक उठती आवाज़

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

23 अगस्त, 2026

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कल्पना कीजिए, श्याम बेनेगल की मशहूर फिल्म अंकुर का वह आखिरी दृश्य। गांव का एक छोटा लड़का सब कुछ चुपचाप देख रहा है: जमींदार की हुकूमत, गरीबों की बेबसी और अन्याय का खेल।

फिर अचानक वह एक पत्थर उठाता है।

पत्थर हवेली की ओर उछलता है। स्क्रीन लाल हो जाती है। एक छोटा-सा पत्थर, मगर उसके भीतर बगावत का एक बड़ा बीज छिपा है।

आज 2026 के भारत में वही दृश्य फिर याद आता है।

इस बार पत्थर असली नहीं है। कभी वह परीक्षा में पेपर लीक के खिलाफ नारा बनता है। कभी सोशल मीडिया का मीम बनता है। कभी जंतर-मंतर पर छात्रों की भीड़ बन जाता है। और अब वही आवाज उत्तर प्रदेश के गांवों के स्कूलों तक पहुंच रही है।

उन्नाव, लखनऊ, कन्नौज और हमीरपुर में बच्चे सवाल पूछ रहे हैं। खाना ठीक क्यों नहीं? पीने का पानी कहां है? शिक्षक पूरे क्यों नहीं हैं? स्कूल तक पहुंचने के लिए सड़क क्यों नहीं है?

हमीरपुर के चंदूपुर और आसपास के गांवों में सैकड़ों बच्चे अपनी मांग लेकर कलेक्ट्रेट तक पहुंच गए। उनकी मांग कोई आसमान से तारे तोड़ने वाली नहीं थी। बस स्कूल तक जाने के लिए एक ठीक सड़क चाहिए थी।

बच्चों को समझाने और दबाव डालने की कोशिशें हुईं। मगर इस बार बच्चे चुप रहने को तैयार नहीं थे। 


असल में यह आग कहीं और भड़की थी।

दिल्ली के जंतर-मंतर पर।

शुरुआत हुई परीक्षा के पेपर लीक से। खासकर NEET-UG जैसी बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा ने लाखों युवाओं का भरोसा हिला दिया। छात्रों को लगा कि वे सालों पढ़ें, कोचिंग में लाखों खर्च करें और आखिर में कोई पेपर चुरा ले जाए; तो मेहनत का मतलब क्या रह जाता है?

कुछ युवा प्रदर्शनकारियों ने अपने समूह को मजाकिया अंदाज में “कॉकरोच जनता पार्टी” कहा। नाम अजीब था, तरीका भी नया था। पुराने छात्र संगठनों और लंबे-लंबे भाषणों की जगह मीम थे, इंस्टाग्राम था, वीडियो थे और सोशल मीडिया का शोर था।

मगर धीरे-धीरे हंसी के पीछे का गुस्सा साफ दिखाई देने लगा।

सोनम वांगचुक भूख हड़ताल पर बैठे। 20 जुलाई को संसद की ओर बढ़ रहे प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच तनाव पैदा हुआ। पुलिस ने रोका, प्रदर्शनकारियों ने दबाव बनाए रखा।

और फिर हुआ वह, जिसकी शायद किसी ने उम्मीद नहीं की थी।

सड़क का दबाव सत्ता के दरवाजे तक पहुंच गया।

25 जुलाई को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। यह मोदी दौर की राजनीति में एक असाधारण घटना मानी गई। पहली बार लगा कि सड़क पर खड़े साधारण छात्रों की आवाज किसी बड़े मंत्री की कुर्सी तक पहुंच सकती है।

इसके बाद कार्रवाई का सिलसिला शुरू हुआ। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी से जुड़े करीब 600 अधिकारियों को हटाया गया। परीक्षा प्रश्नपत्रों की जांच के लिए नई चार-स्तरीय व्यवस्था बनाई गई। परीक्षा केंद्रों और गोपनीयता की सुरक्षा और कड़ी की गई।

15 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं के लिए मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग और एक करोड़ युवाओं को एआई प्रशिक्षण देने की घोषणा की। इसके बाद मंत्री विश्वविद्यालय परिसरों में सीधे पहुंचने लगे। “वन डे, वन यूनिवर्सिटी” जैसे कार्यक्रम शुरू हुए।

सवाल यह है कि यह सब किसने कराया?

न कोई बड़ा विपक्षी आंदोलन।

न कोई अनुभवी राजनीतिक दल।

न कोई स्थापित छात्र यूनियन।

यह काम उन युवाओं ने किया, जिन्हें राजनीति अक्सर नासमझ समझती रही है।

दिलचस्प बात यह भी रही कि जिस विपक्ष से सरकार को चुनौती देने की उम्मीद थी, वह लंबे समय से दिशा खोजता नजर आया। राहुल गांधी के नेतृत्व वाला विपक्ष लगातार चुनावी हार और संगठनात्मक कमजोरियों से जूझता रहा। INDIA गठबंधन भी कोई ऐसी साफ कहानी नहीं बना पाया, जो आम मतदाता को एक मजबूत विकल्प दिखाई दे।

संसद में हंगामा हुआ, विरोध हुआ, नारे लगे। मगर सत्ता की चमक पर कोई खास खरोंच नहीं आई।

फिर अचानक जंतर-मंतर पर यह अजीब-सी हलचल शुरू हुई।

“कॉकरोच” वाला तमाशा, तीखी भाषा, गालियां और निजी हमले:  कुछ  लोगों को भद्दा लगा लड़कियों द्वारा गालियां बकना; लड़के तो लड़के होते हैं!  मगर राजनीति के ठहरे हुए तालाब में किसी ने पत्थर जरूर फेंक दिया था।

लहरें उठीं।

इसे 1970 के दशक के जयप्रकाश नारायण आंदोलन से मिलाना आसान है। तब भी छात्र फीस, भ्रष्टाचार और व्यवस्था से परेशान थे। बाद में आंदोलन “संपूर्ण क्रांति” तक पहुंच गया। लोकनायक जयप्रकाश नारायण एक नैतिक चेहरा बने। इस बार सोनम वांगचुक ने भी युवाओं के गुस्से को एक नैतिक ताकत देने की अधूरी कोशिश की।

मगर दोनों आंदोलनों में बड़ा फर्क है।

जेपी आंदोलन पूरी व्यवस्था बदलना चाहता था। 2026 के छात्रों की मांगें ज्यादा सीधी थीं: पेपर लीक बंद करो, जिम्मेदारों को हटाओ, परीक्षा व्यवस्था ठीक करो।

और सबसे बड़ी बात, इनकी राजनीति व्हाट्सऐप, मीम और इंस्टाग्राम पर बनी।

यह यूनियन के दफ्तरों की राजनीति नहीं थी।

यह मोबाइल फोन की राजनीति थी।

लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई है।

जंतर-मंतर का छोटा पत्थर अब उत्तर प्रदेश के गांवों तक पहुंच गया है। अब बच्चे पेपर लीक के खिलाफ ही नहीं, स्कूल पहुंचने की सड़क, साफ पानी, अच्छा खाना और शिक्षक की मांग कर रहे हैं।

यही असली इम्तिहान है।

मंत्री का इस्तीफा हो जाना आसान है। कुछ अफसरों को हटाना भी आसान है। नई नीति की घोषणा करना तो सबसे आसान काम है।

मुश्किल काम है व्यवस्था को बदलना।

भारत की कोचिंग संस्कृति अभी भी जवान है। परीक्षा का जुनून अभी भी बेकाबू है। गांवों के स्कूलों की हालत कई जगह खराब है। डिग्री और रोजगार के बीच की खाई भी जस की तस है।

फिर भी एक बात साफ हो गई है।

जब बड़े लोग सो जाते हैं, कभी-कभी बच्चे घंटी बजा देते हैं।

अंकुर के उस बच्चे ने एक पत्थर फेंका था।

2026 के बच्चों ने भी पत्थर फेंका है।

अब देखना यह है कि सत्ता पक्ष उस पत्थर को सिर्फ एक शरारत समझती है, या उसके भीतर उगते नए अंकुर को पहचानती है। गनीमत है कि केंद्र सरकार ने इसे पॉजिटिव दृष्टि से लिया है, और तत्परता से आवश्यक पहलें  की हैं।


 रेगिस्तान की रेत से बोर्डरूम तक: शेखावाटी के मारवाड़ियों ने कैसे खड़े किए भारत के कारोबारी साम्राज्य

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बृज खंडेलवाल द्वारा

22 अगस्त 2026

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कैमरा घूमता है। पर्दे पर एक भव्य हवेली दिखाई देती है। मोटे-से सेठजी अपनी गद्दी पर बैठे हैं। आसपास बही-खाते, तिजोरियां और रुपयों के बक्से रखे हैं। पास में पुराने हिन्दी सिनेमा के परिचित मुनीमजी खड़े हैं, एक्टर कन्हैया लाल, चेहरे पर चालाक मुस्कान और हाथ में मोटा हिसाब-किताब।

कोई मदद मांगता है, तो पहले खर्च का हिसाब होता है। कोई कर्ज मांगता है, तो ब्याज की नई दर खुल जाती है। दशकों तक हिन्दी फिल्मों ने मारवाड़ी व्यापारी की एक ऐसी छवि बनाई; चतुर, कंजूस और हर समय मुनाफे के पीछे भागने वाला।

लेकिन पूरी सच्चाई इतनी भर नहीं थी।

यह छवि दर्शकों का मनोरंजन जरूर करती रही, मगर एक जीवंत और कर्मठ समुदाय को मजाकिया या खलनायक जैसे किरदारों तक सीमित कर दिया गया। मारवाड़ियों ने केवल दौलत नहीं कमाई। उन्होंने कारखाने लगाए, रोजगार पैदा किए, स्कूल और अस्पताल बनाए और आधुनिक भारत के उद्योगों की बुनियाद मजबूत की।

इस कहानी की शुरुआत राजस्थान के शेखावाटी इलाके से होती है; चूरू, सीकर और झुंझुनूं का सूखा और कठिन भूभाग। यहां पानी कम था, खेती अनिश्चित थी और गर्मियों में धरती अंगारों जैसी तपती थी। इस इलाके ने लोगों को वह सब सिखाया, जो उपजाऊ मैदान शायद ही सिखा पाते हैं; मुश्किल हालात में जीना और कमी को अवसर में बदलना।

इन्हीं धूल भरे कस्बों से भारत के कई बड़े कारोबारी घराने निकले: बिड़ला, बजाज, डालमिया, गोयनका, सिंघानिया, पोद्दार, रूइया, पीरामल और अनेक अन्य। पीढ़ी-दर-पीढ़ी इन परिवारों ने देश के उद्योग, व्यापार और वित्तीय दुनिया की तस्वीर बदली।

मगर शेखावाटी का योगदान केवल कारोबार तक सीमित नहीं रहा। झुंझुनूं को शहीदों की नगरी भी कहा जाता है। यहां के गांवों से पीढ़ियों से नौजवान सेना में जाते रहे हैं। एक तरफ सीमा पर देश की रक्षा करने वाला जवान था, दूसरी तरफ देश की आर्थिक ताकत बढ़ाने वाला उद्यमी। दोनों को हिम्मत, अनुशासन और सब्र की जरूरत थी।

नक्शे को गौर से देखिए, तो व्यापार का इतिहास एकदम निजी और जीवंत लगने लगता है।

पिलानी का नाम बिड़ला परिवार से जुड़ा है। उन्नीसवीं सदी में शिव नारायण बिड़ला बंबई गए और उनके वंशजों ने भारत के सबसे बड़े औद्योगिक घरानों में से एक खड़ा किया। चिड़ावा डालमियाओं से जुड़ा रहा। नवलगढ़ ने गोयनका, पोद्दार, केड़िया, सेक्सारिया और मोरारका जैसे कारोबारी परिवारों को जन्म दिया। रामगढ़ का रिश्ता रूइया और पोद्दार परिवारों से है, जबकि बगर पीरामल परिवार से जुड़ा है।

सीकर के पास काशी का बास में जमनालाल बजाज का जन्म हुआ। आगे चलकर वे बड़े उद्योगपति ही नहीं, बल्कि आजादी की लड़ाई के प्रमुख समर्थक भी बने। चूरू के सादुलपुर ने लक्ष्मी मित्तल को जन्म दिया, जिन्होंने दुनिया भर में इस्पात का विशाल साम्राज्य खड़ा किया। सिंघानिया, सर्राफ, मोदी और अनेक परिवारों ने भी अपने-अपने ढंग से ऐसी ही राह तय की।

दिलचस्प बात यह है कि इनमें से अधिकतर दौलत शेखावाटी में नहीं बनी। रेगिस्तान ने उन्हें जड़ें दीं, जबकि कोलकाता, बंबई और दूसरे व्यापारिक शहरों ने उन्हें बड़ा मंच दिया।

मारवाड़ियों की सफलता केवल मितव्ययिता या बचत का नतीजा नहीं थी। इसके पीछे भरोसा, अनुशासन और बदलते समय के साथ ढलने की क्षमता थी। आर्थिक इतिहासकार थॉमस ए. टिम्बर्ग ने इस सफलता के कई महत्वपूर्ण कारण बताए हैं।

सबसे पहले था समुदाय का मजबूत नेटवर्क। शेखावाटी से निकलने वाला कोई युवा आर्थिक मायने में कभी अकेला नहीं होता था। रिश्तेदार उसे व्यापारियों से मिलवाते, रहने की जगह देते, उधार दिलाते और कारोबार की तालीम का इंतजाम करते। एक व्यापारी की सफलता दूसरे के लिए रास्ता खोलती। गांव और परिवार के रिश्ते धीरे-धीरे देशव्यापी कारोबारी नेटवर्क बन गए।

दूसरी बड़ी चीज थी साख।

नकद पैसा जरूरी था, लेकिन आदमी का वचन अक्सर उससे भी ज्यादा कीमती माना जाता था। व्यापारी पैसा खोकर फिर संभल सकता था, लेकिन साख खोने पर कारोबार के दरवाजे बंद हो सकते थे।

टिम्बर्ग ने मारवाड़ी व्यापारियों के कड़े वित्तीय अनुशासन पर भी जोर दिया। पारंपरिक बही-खाता केवल हिसाब लिखने की किताब नहीं था। वह रोजाना मुनाफे, नुकसान और जिम्मेदारियों पर नजर रखने की पूरी संस्कृति थी। साथ ही, जरूरत पड़ने पर सोच-समझकर जोखिम उठाने का साहस भी था, खासकर वस्तुओं के व्यापार और सट्टे में।

सबसे बड़ी खूबी थी उनकी अनुकूलन क्षमता।

मुगल दौर में मारवाड़ी वित्तदाता और साहूकार बने। अंग्रेजों के समय वे दलाल, ब्रोकर और व्यापारिक मध्यस्थ बने। बाद में उन्होंने तेजी से उद्योगों की तरफ कदम बढ़ाया। संयुक्त परिवार और आपसी भरोसे की पुरानी व्यवस्था आधुनिकता के रास्ते में रुकावट नहीं बनी। उलटे, इनसे पूंजी जुटाने, जोखिम बांटने और लंबे कारोबारी रिश्ते निभाने में मदद मिली।

भूगोल ने भी इस सफलता में अपना हिस्सा निभाया। अठारहवीं सदी में स्थानीय शासकों ने रास्ते के कर कम किए और व्यापार को बढ़ावा दिया। कपास, ऊन और मसालों से भरे काफिले इस इलाके से गुजरते थे। उन्नीसवीं सदी में रेलवे के आने से व्यापार की दुनिया बदल गई। कोलकाता और बंबई नए आकर्षण केंद्र बन गए।

शेखावाटी के व्यापारी वहां पहुंचे। पहले व्यापारी और वित्तदाता के रूप में, फिर मिलों, कारखानों और बड़े औद्योगिक घरानों के मालिक के रूप में। बीसवीं सदी तक वे कपड़ा, जूट, इस्पात, सीमेंट, मोटर उद्योग और वित्त की दुनिया के बड़े खिलाड़ी बन चुके थे।

रेगिस्तान ने उन्हें चलना सिखाया, बाजार ने उन्हें विस्तार करना सिखाया।

कमी एक सख्त उस्ताद थी। अनिश्चित बारिश, कीमती पानी और स्थानीय अवसरों की कमी ने लोगों को बाहर निकलने के लिए मजबूर किया। सेना की परंपरा को मजबूत करने वाला अनुशासन और धैर्य ही कारोबारियों के भी काम आया।

धर्म और सामुदायिक संस्थाओं ने भी सामाजिक रिश्तों को मजबूत रखा। रानी सती, खाटू श्यामजी और सालासर बालाजी जैसे तीर्थ आज भी आस्था के बड़े केंद्र हैं। मंडावा, नवलगढ़, फतेहपुर और रामगढ़ की रंगीन हवेलियां एक और कहानी कहती हैं। ये उन परिवारों की निशानियां हैं, जिन्होंने दूर-दराज के शहरों में दौलत कमाई, लेकिन अपने रेगिस्तान को सजाने के लिए लौट आए।

शेखावाटी की कहानी को केवल जाति या व्यापार की कहानी नहीं कहा जा सकता। राजपूत समुदायों ने मजबूत सैन्य और जमींदारी परंपराएं विकसित कीं। अग्रवाल, माहेश्वरी, ओसवाल और दूसरे व्यापारी समुदायों ने शक्तिशाली कारोबारी नेटवर्क बनाए।

दोनों ने देश को अलग-अलग तरह की ताकत दी; एक ने सरहदों की हिफाजत की, दूसरे ने देश की आर्थिक मांसपेशियां मजबूत कीं।

एक पुरानी कहावत इस जज्बे को खूब बयान करती है; जहां बैलगाड़ी पहुंच सकती है, वहां आखिरकार मारवाड़ी भी पहुंच जाएगा।

कुदरत ने इस इलाके को बहुत कम दिया था। मगर इसके लोगों ने भरोसे, साख, अनुशासन, गतिशीलता और लगातार मेहनत से मौके पैदा किए।

रेगिस्तान ने न तो जादू से अरबपति पैदा किए, न सैनिक। उसने बस ऐसे हालात पैदा किए, जिनमें संघर्ष करने की क्षमता आदत बनी ; और वही आदत, वक्त के साथ, इतिहास बन गई।

Thursday, August 20, 2026

 

तिब्बती भारत में: क्या वे कभी लौटेंगे, या हमेशा के मेहमान बन जाएंगे?


बृज खंडेलवाल द्वारा
20 अगस्त, 2026


एक मातृभूमि रोज़मर्रा की जिंदगी से दूर हो सकती है, लेकिन यादों से नहीं मिटती। भारत में रह रहे हजारों तिब्बतियों के लिए तिब्बत आज भी एक सपना भी है और एक ज़ख्म भी—एक ऐसी धरती, जिसे उनमें से बहुतों ने कभी देखा तक नहीं, फिर भी अपना घर मानते हैं।

तिब्बतियों के बड़े पलायन को छह दशक से अधिक समय बीत चुका है। लेकिन एक कठिन सवाल आज भी पीछा नहीं छोड़ता—क्या तिब्बती कभी अपनी मातृभूमि लौट पाएंगे, या अस्थायी निर्वासन चुपचाप एक स्थायी बसावट में बदल चुका है?

इस सप्ताह कर्नाटक में यह सवाल फिर चर्चा में आया। तिब्बती प्रतिनिधियों ने राज्य के वरिष्ठ राजनीतिक नेताओं से मुलाकात की और अपने समुदाय के लिए अधिक सहयोग तथा तिब्बती मुद्दे पर नए सिरे से ध्यान देने की मांग की।

बेंगलुरु में नवनिर्वाचित तिब्बती सांसद चोपेल ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार से मुलाकात की। उन्होंने कल्याण, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और तिब्बती संस्कृति के संरक्षण के लिए राज्य सरकार से सहायता मांगी। विशेष रूप से दक्षिण भारत की सबसे बड़ी तिब्बती बस्तियों में से एक, बायलाकुप्पे के तिब्बतियों की समस्याएं उठाई गईं।

बताया जाता है कि शिवकुमार ने सहयोग का भरोसा दिया। उन्होंने तिब्बती संस्कृति को अधिक स्थान देने और मैसूरु दशहरा समारोह में तिब्बती समुदाय की भागीदारी बढ़ाने का भी आश्वासन दिया।

मैसूरु में, हुंसूर के निकट गुरुपुरा तिब्बती बस्ती के एक अन्य प्रतिनिधिमंडल ने सांसद यदुवीर वाडियार से मुलाकात की। उन्होंने उनसे संसद और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तिब्बती मुद्दा उठाने का आग्रह किया।

प्रतिनिधिमंडल ने 2 जुलाई को न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के बाहर तिब्बती कार्यकर्ता लोबगा रंगजेन के आत्मदाह का मुद्दा भी उठाया। यह दर्दनाक घटना याद दिलाती है कि तिब्बत का सवाल आज भी जिंदा है और लोगों की भावनाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है।

तिब्बती नेताओं की मांगें केवल राजनीति तक सीमित नहीं थीं। उन्होंने स्कूलों, स्वास्थ्य सेवाओं, कल्याणकारी योजनाओं तथा तिब्बती भाषा, धर्म और संस्कृति के संरक्षण के लिए भी सहायता मांगी।

लेकिन इन तात्कालिक मांगों के पीछे एक और बड़ा सवाल छिपा है—जब निर्वासन पीढ़ियों तक चलने लगे, तो आखिर उसका भविष्य क्या होता है?

भारत में तिब्बती निर्वासन की कहानी 1959 में शुरू हुई। चीन के शासन के खिलाफ विद्रोह के बाद दलाई लामा तिब्बत से निकल आए। हजारों तिब्बती खतरनाक हिमालयी दर्रों को पार करते हुए उनके पीछे भारत पहुंचे। वे अपने घर, परिवार और सदियों पुरानी जीवन-पद्धति पीछे छोड़ आए थे।

तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में भारत ने उन्हें शरण दी। बस्तियां बसाने, मठ बनाने और स्कूल खोलने के लिए जमीन उपलब्ध कराई गई। धीरे-धीरे और बड़ी मुश्किलों के बीच एक उजड़ा हुआ समुदाय फिर से अपनी जिंदगी बनाने लगा।

धर्मशाला तिब्बती निर्वासित समुदाय का आध्यात्मिक और राजनीतिक केंद्र बन गया। वहीं से केंद्रीय तिब्बती प्रशासन आज भी काम करता है। यह संस्था शिक्षा, कल्याण, संस्कृति और विदेशों में रह रहे तिब्बतियों के लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व से जुड़े कार्यों को संभालती है।

समय के साथ भारत के अनेक हिस्सों में तिब्बती बस्तियां बस गईं। कर्नाटक में बायलाकुप्पे, मुंडगोड और गुरुपुरा जैसी बड़ी बस्तियां विकसित हुईं। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में भी महत्वपूर्ण तिब्बती समुदाय बस गए।

पहली पीढ़ी के शरणार्थियों ने भारी कठिनाइयां झेलीं। उन्होंने जमीन साफ की, खेती शुरू की और लगभग शून्य से अपने घर बसाए। मठ फिर खड़े हुए। स्कूलों में तिब्बती भाषा और इतिहास पढ़ाया जाने लगा। हस्तशिल्प, खेती, रेस्तरां और छोटे कारोबारों ने परिवारों को सहारा दिया।

जो शुरुआत में शरणार्थियों के अस्थायी शिविर थे, वे धीरे-धीरे एक संगठित समुदायों के नेटवर्क में बदल गए।

भारत वह पनाहगाह था, जिसकी तिब्बतियों को सख्त जरूरत थी। लेकिन वक्त गुजरने के साथ वही पनाहगाह धीरे-धीरे घर जैसा लगने लगा।

यहीं से असली विरोधाभास शुरू होता है।

भारत में जन्मे अनेक युवा तिब्बतियों ने कभी तिब्बत देखा ही नहीं। वे भारतीय भाषाएं बोलते हैं, भारतीय स्कूलों और विश्वविद्यालयों में पढ़ते हैं तथा भारतीय दोस्तों और पड़ोसियों के बीच बड़े होते हैं। फिर भी उनकी पहचान में तिब्बत की जगह बेहद गहरी है।

तिब्बत उनकी प्रार्थनाओं में बसता है। उनके गीतों, मठों और परिवारों की कहानियों में तिब्बत जिंदा रहता है।

एक युवा तिब्बती शायद ल्हासा की गलियों से ज्यादा मैसूरु की सड़कों को जानता हो। फिर भी तिब्बत की स्मृति उसके अपनेपन और पहचान की भावना को तय करती रहती है।

इस बीच निर्वासित समुदाय भी बदल रहा है। कड़े सीमा नियंत्रण के कारण तिब्बत से नए लोगों का आना काफी कम हो गया है। दूसरी ओर, कई युवा तिब्बती उच्च शिक्षा और बेहतर करियर के लिए अमेरिका, कनाडा, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया जा रहे हैं।

नतीजा एक अजीब और दर्दनाक विडंबना है।

जो समुदाय तिब्बत से कभी वापस लौटने की उम्मीद लेकर निकला था, वह अब दुनिया भर में बिखर गया है। हर नई पीढ़ी के साथ तिब्बत से उसकी भौतिक दूरी और बढ़ती जा रही है।

निकट भविष्य में बड़े पैमाने पर तिब्बतियों की वापसी की संभावना धुंधली दिखाई देती है। तिब्बती आकांक्षाओं और बीजिंग की नीतियों के बीच राजनीतिक मतभेद अभी तक सुलझे नहीं हैं। निर्वासन में रह रहे अनेक तिब्बतियों को चीन के शासन में धर्म, भाषा और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति पर प्रतिबंधों की चिंता है।

फिर भी उम्मीद बड़ी ज़िद्दी चीज़ है।

बुजुर्ग तिब्बतियों के लिए वापसी आज भी एक पवित्र सपना है। युवा पीढ़ी के लिए यह सपना व्यावहारिक सवालों से जुड़ गया है—शिक्षा, रोजगार, नागरिकता, पहचान और अनिश्चित भविष्य।

इस पूरी कहानी में भारत की जगह बहुत खास है। भारत तिब्बत नहीं है। फिर भी अनेक तिब्बतियों के लिए भारत ही एकमात्र घर है, जिसे उन्होंने अपनी आंखों से जाना है।

शायद लंबे निर्वासन की सबसे बड़ी त्रासदी यही है। एक अस्थायी पनाहगाह बिना किसी औपचारिक फैसले के स्थायी घर बन सकता है।

वापसी की प्रार्थना आज भी जारी है। निर्वासित बस्तियों में तिब्बती झंडा अब भी लहराता है। मठ पुरानी परंपराओं को संभाले हुए हैं। बच्चे उस मातृभूमि की भाषा सीख रहे हैं, जो उनकी पहुंच से बहुत दूर है।

लेकिन इतिहास अपनी चाल चलता रहता है।

क्या तिब्बती कभी तिब्बत लौटेंगे? इसका जवाब कोई निश्चित रूप से नहीं दे सकता।

फिलहाल वे स्मृति और हकीकत के बीच जी रहे हैं—एक घर को दिल में संभाले हुए और दूसरे घर में अपनी जिंदगी बनाते हुए।

भारत ने कभी मजबूर और बेघर शरणार्थियों के लिए अपने दरवाजे खोले थे। साठ साल से अधिक समय बाद वे मेहमान अब पड़ोसी, सहकर्मी, विद्यार्थी, भिक्षु, कारोबारी और भारत के व्यापक सामाजिक परिदृश्य का हिस्सा बन चुके हैं।

तिब्बत का सपना आज भी जिंदा है। लेकिन हर गुजरती पीढ़ी के साथ भारत थोड़ा कम निर्वासन और थोड़ा ज्यादा घर बनता जा रहा है।

Wednesday, August 19, 2026

 विश्व फोटोग्राफी डे: 

ताज कैमरे की आंख में कैद होती एक अनंत कहानी

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बृज खंडेलवाल द्वारा

19 अगस्त 2026

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एक क्लिक होता है और सदियों पुरानी इमारत अचानक जिंदा हो उठती है। संगमरमर पर ठहरी रोशनी बदलती है, यमुना की लहरें करवट लेती हैं और ताजमहल एक नए चेहरे के साथ कैमरे में उतर जाता है। 

सवाल यह है कि आखिर इस इमारत में ऐसा क्या है, जो लाखों तस्वीरों के बाद भी कैमरे को फिर से क्लिक करने के लिए मजबूर करता है?

यही ताज का जादू है। सदियां गुजर गईं, कैमरे बदल गए, तकनीक आसमान छू गई, लेकिन ताज की तस्वीर का आकर्षण कम नहीं हुआ।

विश्व फोटोग्राफी दिवस, 19 अगस्त, पर ताजमहल एक बार फिर कैमरे की दुनिया के केंद्र में है। 17वीं सदी का यह मकबरा फोटोग्राफी की कई पीढ़ियों का गवाह रहा है। भारी लकड़ी के कैमरों और कांच की प्लेटों से शुरू हुई कहानी आज स्मार्टफोन, ड्रोन और हाई-रिजॉल्यूशन कैमरों तक पहुंच चुकी है।

आगरा में फोटोग्राफी की यह दास्तान भी कम दिलचस्प नहीं है। एमजी रोड का प्रिया लाल एंड सन्स फोटो स्टूडियो इसका जिंदा सबूत है। वर्ष 1878 में शुरू हुआ यह स्टूडियो आज भी मौजूद है और परिवार की छठी पीढ़ी इस विरासत को आगे बढ़ा रही है।

उस दौर में तस्वीर खींचना चुटकी का खेल नहीं था। बिजली आम नहीं थी। कैमरे भारी थे और तस्वीर तैयार करने के लिए अंधेरे कमरे में घंटों मेहनत करनी पड़ती थी। प्रिया लाल के डार्करूम में प्राकृतिक रोशनी को पर्दों और शीशों की मदद से नियंत्रित किया जाता था। फोटोग्राफी तब तकनीक से ज्यादा सब्र, हुनर और बारीक नजर का इम्तिहान थी।

प्रिया लाल खंडेलवाल ने ताजमहल और आगरा के दूसरे ऐतिहासिक स्मारकों की अनेक तस्वीरें तैयार कीं। उनकी तस्वीरें इंग्लैंड की महारानी तक पहुंचीं और उन्हें स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया। उनकी पुस्तक ‘Pictorial Agra’ में आगरा के स्मारकों की 25 हाफ-टोन तस्वीरें और उनका संक्षिप्त इतिहास दर्ज है। यह सिर्फ तस्वीरों की किताब नहीं, बल्कि उस दौर के आगरा की एक दृश्य स्मृति है।

लेकिन आगरा और ताज की फोटोग्राफी की कहानी राजा दीन दयाल के बिना अधूरी है। 1844 में जन्मे दीन दयाल ने 19वीं सदी के भारत को कैमरे की नजर से दुनिया के सामने रखा। वे हैदराबाद के निजाम के दरबारी फोटोग्राफर बने और उन्हें ‘राजा मुसव्विर जंग’ की उपाधि मिली।

उनका कैमरा आज के मोबाइल फोन की तरह जेब में नहीं समाता था। विशाल लकड़ी के कैमरे, कांच की प्लेटें और भारी ट्राइपॉड लेकर वे बैलगाड़ियों और सहायकों के साथ लंबी यात्राएं करते थे। महल, किले, मंदिर, मस्जिदें, स्मारक, राजसी जुलूस, हाथी और शिकार; उन्होंने भारत की पूरी शानो-शौकत को अपने लेंस में समेटने की कोशिश की।

हैदराबाद में उनके कैमरे ने केवल इमारतों की खूबसूरती नहीं दिखाई। उसने रियासती जिंदगी, पहनावे, रस्मों, दरबारों और शाही ठाठ को भी हमेशा के लिए दर्ज कर दिया। आज उनके भारी कैमरे और कांच की नेगेटिव प्लेटें किसी संग्रहालय की वस्तु लग सकती हैं, लेकिन उन तस्वीरों में उन्नीसवीं सदी का भारत आज भी सांस लेता दिखाई देता है।

दीन दयाल की तस्वीरें एक अहम बात सिखाती हैं; बेहतरीन तस्वीर कैमरा नहीं, नजर बनाती है।

ताजमहल इस कहावत को हर रोज सही साबित करता है। फोटोग्राफर के सामने यहां केवल एक इमारत नहीं होती। रोशनी, पानी, आसमान, बादल, पेड़ और छाया मिलकर हर पल नया फ्रेम बनाते हैं।

सुबह की नरम धूप संगमरमर को गुलाबी और सुनहरा कर देती है। दोपहर में उसकी सफेदी तेज चमकती है। शाम ढलते ही ताज किसी पुराने ख्वाब की तरह नजर आता है। पूर्णिमा की रात वही इमारत चांदनी में तैरती हुई लगती है।

यमुना इस दृश्य की खामोश साझेदार है। पानी में ताज का प्रतिबिंब तस्वीर को एक अलग गहराई देता है। धुंध आए तो रहस्य बढ़ जाता है। बादल घिरें तो दृश्य में नाटकीयता उतर आती है। मेहताब बाग से नदी पार का दृश्य हो या मुख्य द्वार से लिया गया क्लासिक फ्रेम, हर कोण अपनी अलग कहानी कहता है।

ताज की तस्वीरों की लोकप्रियता को डायना बेंच ने भी नया आयाम दिया। 1992 में राजकुमारी डायना की यहां खींची गई तस्वीर ने इस जगह को दुनिया के सबसे चर्चित फोटो स्पॉट्स में शामिल कर दिया।

ताजमहल 1983 से यूनेस्को विश्व धरोहर है और 2007 में न्यू सेवन वंडर्स ऑफ द वर्ल्ड में शामिल हुआ। हर साल लाखों पर्यटक आगरा आते हैं। आज लगभग हर हाथ में स्मार्टफोन है। लिहाजा ताज की तस्वीरें अब सिर्फ पेशेवर कैमरों से नहीं, मोबाइल स्क्रीन से भी पैदा होती हैं।

सेल्फी, रील और सोशल मीडिया ने ताज को एक नया डिजिटल जीवन दिया है। कभी फोटोग्राफर घंटों एक सही फ्रेम का इंतजार करता था। आज पर्यटक कुछ सेकंड में दर्जनों तस्वीरें खींच लेते हैं।

फिर भी सवाल अपनी जगह कायम है: लाखों तस्वीरों के बाद भी ताज पुराना क्यों नहीं पड़ता?

शायद इसलिए कि ताज सिर्फ पत्थर का स्मारक नहीं, एहसास का स्मारक है। हर आंख उसे अलग ढंग से देखती है और हर फोटोग्राफर उसमें कोई नया कोण खोज लेता है।

राजा दीन दयाल के भारी कैमरे से लेकर आज के स्मार्टफोन तक तकनीक ने लंबा सफर तय किया है। कैमरा छोटा होता गया, तस्वीर ज्यादा साफ होती गई, शूटिंग आसान होती गई। मगर ताज के सामने खड़ी हैरत आज भी वैसी ही है।

विश्व फोटोग्राफी दिवस पर ताज का पैगाम साफ है; कैमरा छोटा हो सकता है, मगर नजर बड़ी होनी चाहिए।

 राखी के धागे में देशभक्ति का रंग, बाजार में ‘स्वदेशी’ की धूम

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

20 अगस्त 2026

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ढोलक की थाप, रंग-बिरंगी राखियां और मिठाइयों की खुशबू से बाजार गुलजार हैं। दुकानों पर बहनें राखियां चुन रही हैं, बच्चे उत्साह में हैं और भाई भी इस बार कलाई पर सिर्फ प्यार नहीं, देशभक्ति का धागा बांधने को तैयार हैं।

28 अगस्त को मनाए जाने वाले रक्षाबंधन से पहले देशभर के बाजारों में स्वदेशी राखियों की मांग तेजी से बढ़ी है। इस बार राखी का त्योहार भाई-बहन के रिश्ते के साथ आत्मनिर्भर भारत के संदेश का भी वाहक बनता दिख रहा है।

कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAIT) के मुताबिक, इस साल राखी से जुड़े कारोबार का अनुमान करीब 25 हजार करोड़ रुपये है। पिछले साल यह आंकड़ा करीब 17 हजार करोड़ रुपये था। मिठाई, कपड़े, उपहार और पैकेजिंग को जोड़ दें तो त्योहार का कुल कारोबार 30 हजार करोड़ रुपये से ऊपर जाने की उम्मीद है।

राखी में ‘विकसित भारत’ का संदेश

बाजार में पारंपरिक राखियों के साथ कई थीम आधारित राखियां भी खूब पसंद की जा रही हैं। इनमें ‘विकसित भारत’, ‘मोदी गारंटी’, ‘आत्मनिर्भर भारत’, ‘वोकल फॉर लोकल’, ‘भारत गौरव’, ‘ब्रह्मोस’, ‘राष्ट्र रक्षा सूत्र’ और ‘अमृत काल’ जैसी राखियां शामिल हैं।

‘नारी वंदन’, ‘लखपति दीदी’ और ‘नमामि गंगे’ जैसी राखियां भी लोगों का ध्यान खींच रही हैं। बच्चों और युवाओं में खास तौर पर ब्रह्मोस, राष्ट्र रक्षा सूत्र और विकसित भारत वाली राखियों को लेकर उत्साह दिखाई दे रहा है।

CAIT के महासचिव और चांदनी चौक के सांसद प्रवीण खंडेलवाल के मुताबिक, ‘वोकल फॉर लोकल’, ‘लोकल फॉर ग्लोबल’ और आत्मनिर्भर भारत की सोच ने ग्राहकों का भरोसा बढ़ाया है। उनके अनुसार, स्वदेशी राखी अब सिर्फ एक सामान नहीं, बल्कि देश के प्रति गर्व का प्रतीक बन रही है।

CAIT के राष्ट्रीय अध्यक्ष बी.सी. भरतिया का कहना है कि इन राखियों के जरिए बहनें केवल कलाई पर पवित्र धागा नहीं बांध रहीं। वे राष्ट्र निर्माण, महिला सशक्तीकरण, स्वदेशी आंदोलन, पर्यावरण संरक्षण और राष्ट्रीय सुरक्षा का संदेश भी दे रही हैं।

राखी में भारत की कारीगरी

इस बार राखियों का बाजार सिर्फ देशभक्ति तक सीमित नहीं है। इसमें भारत की विविध लोक कला और कारीगरी भी खूब नजर आ रही है।

नागपुर की खादी राखियां, जयपुर की सांगानेरी कला, पुणे की बीज राखियां और असम की चाय-पत्ती से बनी राखियां ग्राहकों को आकर्षित कर रही हैं। कोलकाता की जूट, मुंबई की रेशम, बिहार की मधुबनी कला और बेंगलुरु की फूलों वाली राखियां भी खूब बिक रही हैं।

आदिवासी कारीगरों की बांस से बनी राखियों और कानपुर की मोती राखियों की भी मांग बढ़ी है। इन राखियों ने छोटे कारीगरों, स्वयं सहायता समूहों और महिला उद्यमियों के लिए कमाई के नए दरवाजे खोले हैं।

CAIT के राष्ट्रीय चेयरमैन बृजमोहन अग्रवाल ने व्यापारियों और ग्राहकों से त्योहारों में भारतीय उत्पादों को प्राथमिकता देने की अपील की है। उनका संदेश है—‘स्वदेशी अपनाएं, भारत मजबूत बनाएं।’

चीनी राखियां बाजार से बाहर

पिछले कुछ वर्षों में जिस बदलाव की आहट सुनाई दे रही थी, वह अब बाजार में साफ दिखाई दे रही है। चीनी राखियों की मांग लगभग खत्म हो चुकी है और दुकानों पर भारतीय राखियों ने उनकी जगह ले ली है।

CAIT अब देश के अलग-अलग शहरों में विशेष स्वदेशी मेले लगाने की तैयारी कर रहा है। इन मेलों में महिला उद्यमियों, स्वयं सहायता समूहों और स्थानीय कारीगरों को अपने हाथ से बनाए उत्पाद बेचने का मौका मिलेगा।

इस बदलाव का सीधा फायदा छोटे कारोबारियों और कुटीर उद्योगों को मिल रहा है। राखी का छोटा-सा धागा अब रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था से भी जुड़ गया है।

वृंदावन की विधवाओं की खास राखियां

इस साल एक भावुक पहल ने भी लोगों का ध्यान खींचा है। वृंदावन की विधवाओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए 1,100 से अधिक विशेष राखियां तैयार की हैं।

इन राखियों में सिर्फ धागा नहीं, बल्कि अपनापन, उम्मीद और सामाजिक जुड़ाव का संदेश भी है। यह परंपरा कई वर्षों से स्नेह और एकजुटता की मिसाल बनी हुई है।

राखी भेजने के लिए डाक विभाग ने भी बड़े शहरों में विशेष काउंटर लगाए हैं, ताकि दूर रहने वाले भाइयों तक समय पर राखियां पहुंच सकें।

रक्षाबंधन अभी एक सप्ताह से अधिक दूर है, लेकिन बाजारों में त्योहार का रंग चढ़ चुका है। इस बार राखी की कलाई पर प्यार के साथ स्वदेशी, कारीगरी, रोजगार और राष्ट्र गौरव का धागा भी बंधता नजर आ रहा है।

कहने को राखी कुछ इंच का धागा है, लेकिन इस बार उसका संदेश काफी लंबा है—अपना खरीदिए, स्थानीय को बढ़ाइए और भारत को आत्मनिर्भर बनाइए।

Monday, August 17, 2026

 


नई पीढ़ी को भा रही है धर्म की राह:

पहले बुढ़ापे में होती थी तीर्थ यात्रा, और अब, चाहे जब! 


नव _पुरातन वाद का उत्थान?

“The Resurgence of Neo-Traditionalism”

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बृज खंडेलवाल द्वारा

18 अगस्त 2026

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सुबह की ठंडी हवा में घंटियों की आवाज गूंजती है। दूर तक युवाओं के जत्थे दिखाई देते हैं। किसी के कंधे पर कांवर है, कोई नंगे पांव परिक्रमा कर रहा है, तो कोई दोस्तों के साथ भजन गाते हुए पहाड़ चढ़ रहा है। मोबाइल जेब में है, सेल्फी भी चल रही है और भगवान का नाम भी।

यही भारत की नई तीर्थयात्रा है।

धर्म अब केवल बुजुर्गों की चिंता नहीं रहा। आज का युवा मंदिर जा रहा है, परिक्रमा कर रहा है, कांवर उठा रहा है और कठिन यात्राओं में शामिल हो रहा है। मगर उसकी यात्रा का मकसद केवल पूजा नहीं है। इसमें आध्यात्मिक सुकून, सांस्कृतिक पहचान, दोस्ती, रोमांच और घूमने-फिरने का आनंद भी शामिल है।

यानी आस्था और पर्यटन का नया मेल सामने आ रहा है। बीयर के साथ भांग भी!

चारधाम, अमरनाथ, वैष्णो देवी, करौली माता यात्रा, श्री बांके बिहारी, नाथद्वारा दर्शन, सबरीमाला, वृंदावन और गोवर्धन की परिक्रमा में युवाओं की मौजूदगी अब आम बात है। सावन में गंगा जल लेकर शिव मंदिरों की ओर बढ़ते कांवरियों के जत्थों में बड़ी संख्या युवा चेहरों की होती है। लड़कियां भी शामिल हो रहीं हैं। मैसूर, ऋषिकेश के योग केंद्रों में गोरे विदेशियों के साथ भारतीय युवजन भी आस्था और नव_पुरातन संस्कृति में डुबकी लगा रहे हैं! 

इसे केवल धार्मिक उत्साह कहकर नजरअंदाज करना आसान होगा। मगर तस्वीर इससे कहीं बड़ी है।

धर्म की ओर क्यों लौट रहा है युवा?

आधुनिक जीवन ने सुविधाएं तो खूब दी हैं, लेकिन सुकून कम कर दिया है। नौकरी का दबाव, प्रतियोगिता, सोशल मीडिया की लगातार हलचल, रिश्तों में दूरी और अकेलापन युवा मन को थका रहे हैं।

ऐसे में मंदिर, आश्रम और तीर्थस्थल एक अलग दुनिया देते हैं। कुछ दिन मोबाइल और दफ्तर से दूरी, सुबह जल्दी उठना, पैदल चलना, भजन सुनना और हजारों लोगों के साथ समय बिताना मन को राहत देता है।

धर्म का यह नया आकर्षण युवाओं की पहचान से भी जुड़ रहा है। अपनी जड़ों, परंपराओं और संस्कृति को करीब से देखने की इच्छा बढ़ी है। सोशल मीडिया ने भी इसे हवा दी है। यात्रा की तस्वीरें, रील और वीडियो दूसरे युवाओं को भी इन रास्तों पर खींच रहे हैं।

एक तरह से धार्मिक यात्रा अब आस्था के साथ अनुभव की यात्रा बन रही है।

तीर्थ या थेरेपी?

लंबी पैदल यात्रा शरीर को सक्रिय रखती है। नियमित दिनचर्या मन को कुछ अनुशासन देती है। सामूहिक भजन और प्रार्थना अकेलेपन को कम कर सकते हैं।

गोवर्धन की 21 किलोमीटर परिक्रमा हो या सबरीमाला की कठिन चढ़ाई, शरीर पसीना बहाता है और मन एक लक्ष्य पर टिकता है। यात्रा पूरी होने के बाद मिलने वाला संतोष कई यात्रियों के लिए खास अनुभव बन जाता है।

कुंभ, माघ मेला और बड़े धार्मिक आयोजनों में भी सामूहिक स्नान, ध्यान, हवन, उपवास और भजन जैसी गतिविधियां लोगों को एक साझा माहौल देती हैं। कई लोगों को ऐसी यात्राओं के बाद मन हल्का और अधिक शांत महसूस होता है।

इसीलिए ‘पिलग्रिमेज थेरेपी’ की बात होने लगी है। हालांकि इसे किसी बीमारी का इलाज मानना सही नहीं होगा। मानसिक बीमारी होने पर डॉक्टर की सलाह और उपचार जरूरी है। लेकिन तनाव और रोजमर्रा की मानसिक थकान से राहत के लिए आध्यात्मिक वातावरण मददगार हो सकता है।


युवाओं की बढ़ती धार्मिक भागीदारी भारतीय समाज में एक बड़े बदलाव का संकेत भी है। धर्म अब निजी पूजा तक सीमित नहीं है। वह पहचान, सामाजिक जुड़ाव और सामूहिक उत्सव का हिस्सा बन रहा है।

कांवर यात्रा इसका बड़ा उदाहरण है। हजारों युवा एक साथ चलते हैं। रास्ते में संगीत है, नारे हैं, भोजन और सेवा शिविर हैं। दोस्ती है और सामूहिक जोश भी है।

इसी तरह वृंदावन और गोवर्धन में युवा भक्ति के साथ यात्रा का आनंद लेते हैं। मंदिर दर्शन के बाद बाजार, स्थानीय भोजन, संगीत और सांस्कृतिक स्थलों का अनुभव भी यात्रा का हिस्सा बन जाता है।

इंस्टा रील बनाने की धुन ने भी इस ट्रेंड को लोकप्रिय बनाया है। सोशल मीडिया पर धर्म, आस्था से जुड़े विडियोज की बाढ़ आ गई है। हर त्यौहार एक महा सेलिब्रेशन, अक्रॉस इंडिया बन चुका है।


तीर्थयात्रा अब बड़ा कारोबार भी है। होटल, धर्मशालाएं, टैक्सी, बसें, फूल, प्रसाद, पूजा सामग्री, स्थानीय भोजन और हस्तशिल्प से हजारों लोगों की रोजी जुड़ी है।

तिरुमला तिरुपति, वैष्णो देवी, शिरडी, काशी, वृंदावन और अयोध्या जैसे केंद्रों ने आसपास की अर्थव्यवस्था को नई रफ्तार दी है। बड़े धार्मिक आयोजनों में रेलवे, परिवहन, होटल और छोटे दुकानदारों को भी फायदा मिलता है।

डिजिटल दुनिया ने इसे और आसान बना दिया है। ऑनलाइन दर्शन, डिजिटल दान, पूजा बुकिंग और धार्मिक ऐप युवाओं को सुविधा दे रहे हैं।

सरकार भी धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा दे रही है। PRASAD जैसी योजनाओं का उद्देश्य तीर्थस्थलों की सुविधाएं और बुनियादी ढांचा बेहतर करना है।

लेकिन विकास का मतलब केवल चमकदार गलियां और बड़े कॉरिडोर नहीं होना चाहिए। साफ पानी, स्वच्छ शौचालय, सस्ता ठहराव, सुरक्षित रास्ते और कचरा प्रबंधन भी उतने ही जरूरी हैं।


बढ़ती धर्मयात्राओं का एक दूसरा पहलू भी है। जब आस्था पर्यटन और बाजार से जुड़ती है, तो खतरा रहता है कि श्रद्धा कहीं केवल कारोबार न बन जाए।

युवाओं को धार्मिक यात्रा में जगह मिलना अच्छी बात है। लेकिन धर्म के नाम पर नफरत, दिखावा और अंधविश्वास बढ़ना चिंता की बात होगी।

तीर्थ का मतलब केवल भीड़ बढ़ाना नहीं है। इसका मतलब मनुष्य को भीतर से बेहतर बनाना भी है।

युवा अगर मंदिर जा रहा है, तो उसे करुणा, सहिष्णुता और सेवा भी सीखनी चाहिए। अगर वह परिक्रमा कर रहा है, तो रास्ते में पड़े कूड़े को देखकर आंखें नहीं मूंदनी चाहिए। अगर वह नदी में स्नान कर रहा है, तो उसी नदी को गंदा करने से भी बचना चाहिए।

यही असली धार्मिकता होगी।

मंदिर तक जाने वाला रास्ता भीतर भी जाता है

भारत में तीर्थयात्रा का पुराना रास्ता फिर जवान हो रहा है। कांवर उठाते कंधे, पहाड़ चढ़ते कदम और परिक्रमा करते युवा इसके गवाह हैं।

आज का युवा शायद मोक्ष की तलाश में नहीं निकला है। वह सुकून खोज रहा है। वह अपनी जड़ों को समझना चाहता है। दोस्तों के साथ यात्रा करना चाहता है। कुछ दिन जिंदगी की भागदौड़ से दूर रहना चाहता है।

और हां, वह घूमना भी चाहता है।

इसलिए नई तीर्थयात्रा में धर्म भी है, पर्यटन भी; आस्था भी है और आनंद भी; शरीर की मेहनत भी है और मन की तलाश भी।

सवाल यह नहीं कि युवा धर्म की ओर क्यों लौट रहा है। बड़ा सवाल यह है कि धर्म उसे किस दिशा में ले जा रहा है।

अगर यह यात्रा उसे अधिक संवेदनशील, स्वस्थ, अनुशासित और सहिष्णु बनाती है, तो शायद तीर्थ सचमुच एक तरह की देसी थेरेपी बन सकता है।

पुरानी कहावत है: चलते रहो, रास्ता खुद रास्ता दिखाएगा।

शायद भारत के ये प्राचीन तीर्थमार्ग आज के युवा को यही रास्ता दिखा रहे हैं; भगवान तक पहुंचने का ही नहीं, बल्कि खुद तक लौटने का भी।

Saturday, August 15, 2026

 दक्षिण में आज़ादी का जश्न: विजय के संदेश से बदली तमिलनाडु की तस्वीर

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

चेन्नई, 16 अगस्त 2026

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भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस पर दक्षिण भारत देशभक्ति के रंग में रंगा नजर आया। तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक में तिरंगा फहराया गया, सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए और स्वतंत्रता सेनानियों को याद किया गया। 

लेकिन इस बार तमिलनाडु का समारोह खास रहा। वजह थी मुख्यमंत्री और अभिनेता से नेता बने विजय का पहला स्वतंत्रता दिवस संबोधन।

चेन्नई के ऐतिहासिक फोर्ट सेंट जॉर्ज में विजय ने राष्ट्रीय ध्वज फहराया और परेड की सलामी ली। खुली गाड़ी में परेड का निरीक्षण करते हुए उनका अंदाज किसी फिल्मी दृश्य से कम नहीं लगा। लेकिन असली ध्यान उनके भाषण पर रहा।

विजय ने कहा कि आज की असली आज़ादी केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं है। भ्रष्टाचार से मुक्ति भी उतनी ही जरूरी है। उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी सरकार के ‘मिशन मोड’ में काम करने की बात कही और साफ संदेश दिया कि सुशासन से कोई समझौता नहीं होगा।

उनका संदेश युवाओं पर भी केंद्रित था। विजय ने तमिलनाडु के युवाओं और दुनिया भर में बसे तमिल लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि राज्य के हितों की रक्षा उनकी प्राथमिकता है। जाति और धर्म की दीवारों से ऊपर उठकर समानता और सामाजिक न्याय को असली आज़ादी बताया।

समारोह में अभिनेत्री त्रिशा कृष्णन की मौजूदगी ने भी खूब सुर्खियां बटोरीं। वह विजय के माता-पिता के साथ अग्रिम पंक्ति में बैठी दिखाई दीं। विजय ने उन्हें और अपने माता-पिता को सलाम किया। यह भावुक दृश्य सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ।

तमिलनाडु से बाहर भी स्वतंत्रता दिवस पूरे उत्साह से मनाया गया। केरल में स्कूलों, सरकारी संस्थानों और विश्वविद्यालयों में ध्वजारोहण तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए। राज्य के स्कूलों के लिए जारी निर्देशों में विद्यार्थियों और कर्मचारियों की अधिकतम भागीदारी पर जोर दिया गया।

कर्नाटक में बेंगलुरु सहित विभिन्न शहरों में तिरंगा फहराया गया। विधानसभा और सरकारी इमारतों पर रोशनी की गई तथा देशभक्ति से जुड़े सांस्कृतिक आयोजन हुए। बेंगलुरु का प्रसिद्ध फ्रीडम जैम भी स्वतंत्रता दिवस की संगीत परंपरा का हिस्सा रहा है।

फिर भी दक्षिण के इस पूरे जश्न में तमिलनाडु और विजय सबसे ज्यादा चर्चा में रहे। अभिनेता से मुख्यमंत्री बने विजय के लिए यह केवल रस्मी परेड और भाषण नहीं था। यह उनके राजनीतिक सफर की नई पारी का सार्वजनिक ऐलान भी था।

उनकी भाषा में तमिल अस्मिता, युवा उम्मीद और भ्रष्टाचार के खिलाफ तेवर साफ दिखाई दिए। सवाल अब यही है कि मंच पर दिया गया यह जोशीला पैगाम ज़मीन पर कितनी तेजी से अमल में आता है।

केरल और कर्नाटक में भी 80वें स्वतंत्रता दिवस को देशभक्ति के जोश के साथ मनाया गया। कर्नाटक में मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने पहली बार मुख्यमंत्री के रूप में तिरंगा फहराया, बेंगलुरु में विधान सौध के सामने भव्य ‘फ्रीडम हब्बा’ का आयोजन हुआ जिसमें विविध सांस्कृतिक परंपराओं (यक्षगान, गरबा, ढोल-ताशा आदि) की परेड और कार्यक्रम शामिल थे, जबकि उत्तर कर्नाटक समेत विभिन्न जिलों में परेड, सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ और उपलब्धि हासिल करने वालों का सम्मान किया गया। केरल में मुख्यमंत्री वीडी सतीशन ने तिरुवनंतपुरम के सेंट्रल स्टेडियम में राष्ट्रीय ध्वज फहराया, जिला स्तर पर परेड और सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए, कोझिकोड में 10,000 आवाजों वाला गायन कार्यक्रम तथा महिलाओं की सुरक्षा को लेकर ‘रिसर्ज’ जैसी पहलें भी हुईं, हालांकि रिपोर्ट्स के मुताबिक, राज्य-स्तरीय समारोह में वंदे मातरम् नहीं गाया गया जिससे राजनीतिक चर्चा भी हुई।

 आंदोलन नहीं, आवेदन करो

बेरोजगारों की कतार: इनकी फिक्र किसे है?  

परिभाषाएं बदलीं, समस्या नहीं

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बृज खंडेलवाल  द्वारा 

16 अगस्त 2026

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पचास साल पहले बेरोजगार लोग एम्प्लॉयमेंट एक्सचेंज  के बाहर खड़े होते थे। आज वे कोचिंग सेंटरों, भर्ती वेबसाइटों और परीक्षा पोर्टलों के सामने खड़े हैं। जगह बदल गई है। इंतजार वही है। जॉब नहीं मिले, एम्प्लॉयमेंट news मिला।

तब कुछ क्लर्कों की नौकरियों के लिए हजारों आवेदन आते थे। आज भी हजारों,  अक्सर लाखों, उम्मीदवार कुछ सौ सरकारी पदों के लिए भिड़ते हैं। ग्रेजुएट चपरासी की नौकरी के लिए आवेदन करता है। पोस्ट ग्रेजुएट क्लर्क बनने की दौड़ में शामिल होता है। इंजीनियर ऐसी परीक्षा की तैयारी करता है जिसका उसके ज्ञान से कोई लेना-देना नहीं।

शिक्षा बढ़ी है। रोजगार उतनी तेजी से नहीं बढ़ा। और इन दोनों के बीच भारतीय युवा खड़ा है; एक हाथ में डिग्री और दूसरे में आवेदन-पत्र लेकर।


पुराना रोजगार कार्यालय अब इतिहास बन चुका है। उसकी जगह स्मार्टफोन ने ले ली है। युवा नौकरी पोर्टल पर रजिस्टर करता है, भर्ती ऐप डाउनलोड करता है, रिज्यूमे अपलोड करता है। रिजेक्शन भी अब डिजिटल हो गया है। इसे भी प्रगति ही कहिए।


सरकारी आंकड़ों में बेरोजगारी बेहतर दिखती है। लेकिन औसत आंकड़े बहुत कुछ छिपा लेते हैं। युवाओं में बेरोजगारी कहीं ज्यादा है। पढ़े-लिखे युवाओं के सामने समस्या और भी पेचीदा है।


मामला अब सिर्फ बेरोजगारी का नहीं। कम रोजगार, अधूरा रोजगार और अपनी योग्यता से नीचे का रोजगार भी बड़ा सवाल है। कोई काम कर रहा है, लेकिन कमाई इतनी नहीं कि अपने पैरों पर खड़ा हो सके। कोई नौकरी में है, लेकिन कल की गारंटी नहीं। कोई सालों से प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा है और परीक्षा बार-बार टल जाती है। भारतीय युवा ने इंतजार करने में शायद पीएचडी कर ली है।


भारत में सरकारी नौकरी का आकर्षण किसी धार्मिक आस्था से कम नहीं। नौकरी पक्की। इज्जत पक्की। छुट्टियां पक्की। भविष्य की चिंता कुछ कम। इसलिए 500 पदों पर लाखों आवेदन आ जाते हैं।


क्योंकि निजी नौकरी सिर्फ रोजगार देती है। सरकारी नौकरी रोजगार के साथ प्रतिष्ठा भी देती है। माता-पिता आज भी कहते हैं: “पहले सरकारी नौकरी की कोशिश करो।” मानो नियुक्ति-पत्र खानदानी विरासत हो।


युवा मामूली निजी नौकरी छोड़कर सरकारी परीक्षा की तैयारी में कई साल लगा देता है। उम्र बढ़ती है। प्रयास खत्म होते जाते हैं। एक दिन नौकरी की तैयारी ही उसका सबसे स्थायी रोजगार बन जाती है।


भारत ने करोड़ों पढ़े-लिखे युवाओं की फौज तैयार की है। डिग्रियां बढ़ीं। कॉलेज बढ़े। कोचिंग सेंटर और तेजी से बढ़े। हर कोई यूपीएससी, एसएससी, बैंकिंग, रेलवे, पुलिस या शिक्षक भर्ती की तैयारी कर रहा है।कई उम्मीदवार वर्षों लगा देते हैं ऐसी परीक्षाओं में, जहां पद ऊंट के मुंह में जीरा हैं।

कोचिंग उद्योग ने शानदार मॉडल खोज लिया है:  उम्मीद मत छोड़िए। फेल हुए? “अगली बार कोशिश कीजिए।”  फिर फेल? “रणनीति बदलिए।”  फिर भी फेल? “सफलता बस आने वाली है।”  सफलता जरूर आती है; अक्सर कोचिंग बेचने वाले की।

डिग्री नौकरी नहीं है। शिक्षा व्यवस्था की बड़ी विडंबना यह है कि उसने युवाओं को परीक्षा पास करना सिखाया है, समस्या हल करना नहीं। बच्चा परिभाषाएं याद करता है, उत्तर रटता है, प्रमाणपत्र जमा करता है। फिर कंपनी पूछती है: “आप बात कर सकते हैं? टीम के साथ काम कर सकते हैं? व्यावहारिक समस्या हल कर सकते हैं?”

सन्नाटा।


फिर गिग इकोनॉमी आई। कहा गया,मोबाइल उठाइए और डिलीवरी कीजिए, गाड़ी चलाइए, फ्रीलांस कीजिए। खूबी है लचीलापन। दिक्कत यह है कि लचीली आमदनी इतनी लचीली होती है कि अगले महीने का भरोसा नहीं रहता।


तकनीक ने नए अवसर पैदा किए हैं। उसने असुरक्षित रोजगार के लिए नई शब्दावली भी दी है। पहले अस्थायी या दिहाड़ी कहते थे। अब “गिग वर्क” कहते हैं। नाम आधुनिक हो गया। अनिश्चितता उतनी नहीं।


जब युवा नौकरियों के लिए संघर्ष सीख ही रहा था, एआई मैदान में उतर आया। नई नौकरियां पैदा करेगा, उत्पादकता बढ़ाएगा। लेकिन कई दोहराव वाले काम भी निगल सकता है।युवा अक्सर पहली सीढ़ी से शुरुआत करता है। वहीं अनुभव मिलता है। अगर एआई ने पहली सीढ़ी हटा दी तो ऊपर कौन पहुंचेगा?

कल के युवा को डिग्री, कौशल और एआई को सही आदेश देने की कला; तीनों चाहिए।


रोजगार की कहानी महिलाओं के बिना अधूरी है। शिक्षा और भागीदारी बढ़ी है, फिर भी बड़ा अंतर बना हुआ है। बाधाएं पुरानी हैं, बिना वेतन वाला घर का काम, सुरक्षा, बच्चों की देखभाल, सामाजिक दबाव।

विडंबना देखिए। हम कहते हैं: लड़कियों को पढ़ाओ। फिर पूछते हैं; नौकरी क्यों करनी है? हम कहते हैं; आत्मनिर्भर बनाओ। फिर पूछते हैं; घर कौन संभालेगा।


रोजगार योजनाओं की कमी नहीं: कौशल विकास, स्वरोजगार, उद्यमिता, अप्रेंटिसशिप, ग्रामीण रोजगार, ऋण, प्रशिक्षण, पोर्टल। कभी-कभी लगता है हर चीज के लिए योजना है, बस उसे सफल बनाने की योजना नहीं।

असली सवाल सीधा होना चाहिए: कितने लोगों को अच्छी नौकरी मिली? प्रशिक्षण और प्रमाणपत्र नहीं। स्थायी और सम्मानजनक रोजगार गिनिए। वहीं असली हिसाब होगा।


ग्रामीण बेरोजगारी ने रूप बदल लिया है। खेती सबको रोजगार नहीं दे सकती। युवा गांव छोड़कर शहर जा रहे हैं। सपने लेकर आते हैं। शहर किराया और ट्रैफिक का बिल थमा देता है।


प्रवास बुरा नहीं। मजबूरी में किया गया पलायन अलग बात है। युवा शहर इसलिए जाए कि वहां अवसर हैं; इसलिए नहीं कि गांव में कुछ बचा ही नहीं है। अगर गांव युवाओं को खो दें और शहर सम्मानजनक काम न दे पाएं, तो दोनों जगह हार होगी।


सरकारें योजनाएं घोषित करती हैं। विश्वविद्यालय डिग्रियां बांटते हैं। कंपनियां कौशल मांगती हैं। कोचिंग सेंटर उम्मीद बेचते हैं। माता-पिता फीस भरते हैं। युवा आवेदन करता रहता है।

भारत को एक और नारा नहीं, ईमानदार रोजगार नीति चाहिए। श्रम-प्रधान उद्योग बढ़ाने होंगे। अप्रेंटिसशिप मजबूत करनी होगी। व्यावसायिक शिक्षा बेहतर बनानी होगी। छोटे कारोबार को बढ़ने देना होगा। महिलाओं के लिए सुरक्षित रोजगार बढ़ाने होंगे।

सबसे जरूरी, प्रशिक्षण की संख्या नहीं, नौकरी की संख्या गिननी होगी। प्रमाणपत्र से किराया नहीं भरता। पोर्टल से घर नहीं चलता।

नौकरी मांगने वाला युवा बहुत बड़ी मांग नहीं कर रहा। वह चाहता है: एक काम, उचित वेतन और थोड़ी इज्जत।

कतार अब डिजिटल हो गई है। आवेदन एक क्लिक में चला जाता है। रिज्यूमे एआई बना देता है। लेकिन सवाल आज भी इंसानी है; जब एक पढ़ा-लिखा भारतीय युवा नौकरी मांगते हुए दरवाजे पर दस्तक देता है, तो दरवाजा खोलने की जिम्मेदारी किसकी है?  और अगर कोई दरवाजा नहीं खोलता, तो वह दस्तक कब तक देता रहेगा?

 लाल किले से मोदी का संदेश: आत्मनिर्भर भारत, युवा शक्ति और विकसित भारत

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

15 अगस्त 2026

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भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किला देशभक्ति के जज़्बे से सराबोर था। सेना के बैंड ने वंदे मातरम् की धुन छेड़ी और उसके बाद स्वदेशी 21 तोपों की सलामी दी गई। तिरंगे की छांव में Mi-17 हेलीकॉप्टरों ने पुष्पवर्षा की। ज्ञानपथ पर एनसीसी कैडेट और युवा स्वयंसेवक मौजूद थे। माहौल गंभीर भी था और उल्लासपूर्ण भी। हर तरफ राष्ट्रगौरव और विकसित भारत का संकल्प दिखाई दे रहा था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2026 को लाल किले से दिए अपने भाषण में मजबूत, आत्मनिर्भर और तकनीक के मामले में सक्षम भारत का खाका पेश किया। उनका मकसद साफ था: 2047 तक, यानी आजादी के 100 साल पूरे होने पर, भारत को विकसित राष्ट्र बनाना।

भाषण का सबसे अहम मुद्दा आत्मनिर्भर भारत रहा। मोदी ने मेक इन इंडिया, स्वदेशी और वोकल फॉर लोकल पर जोर दिया। उनका कहना था कि भारत को विदेशी निर्भरता कम करनी होगी। विनिर्माण, खेती, खाद्य प्रसंस्करण, तकनीक और नए आविष्कार देश की तरक्की के अहम आधार बन सकते हैं।

मोदी ने राष्ट्रीय ताकत की सात धाराओं की बात की, जिसे उन्होंने “शक्ति की सप्त धारा” कहा। इनमें विनिर्माण, कृषि और खाद्य प्रसंस्करण, तकनीक और नवाचार, संपर्क और कनेक्टिविटी, रक्षा, हरित और नीली अर्थव्यवस्था तथा भारत की सॉफ्ट पावर शामिल हैं। उनका मानना है कि इन सात क्षेत्रों को मजबूत करके देश की अर्थव्यवस्था को नई रफ्तार दी जा सकती है।

तकनीक को भाषण में खास जगह मिली। प्रधानमंत्री ने अगले एक साल में एक करोड़ युवाओं को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई का प्रशिक्षण देने की घोषणा की। सेमीकंडक्टर निर्माण पर भी जोर दिया गया। मकसद भारत को दुनिया की तकनीकी सप्लाई चेन का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनाना है।

छात्रों और नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए भी कुछ अहम घोषणाएं हुईं। मोदी ने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग की बात कही, खासकर गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के युवाओं के लिए। उनका संदेश था कि देश के बदलाव की धुरी युवा होने चाहिए। खेलों और नई खेल प्रतिभाओं को खोजने पर भी उन्होंने जोर दिया।

महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी भी भाषण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रही। मोदी ने विधानसभाओं और संसद में महिलाओं की 33 प्रतिशत भागीदारी की जरूरत पर जोर दिया। यह कदम महिलाओं को निर्णय लेने की प्रक्रिया में बराबर की जगह देने की दिशा में अहम माना जा सकता है।

ऊर्जा सुरक्षा को भी राष्ट्रीय विकास से जोड़ा गया। मोदी ने 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा पैदा करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा। उनके मुताबिक ऊर्जा में आत्मनिर्भरता आर्थिक विकास के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी जरूरी है।

राष्ट्रीय सुरक्षा पर भी प्रधानमंत्री का रुख सख्त रहा। उन्होंने सशस्त्र नक्सलवाद के साथ-साथ “दिमागी नक्सलवाद” से भी सावधान किया। उनका तर्क था कि विकास के लिए देश की एकता, अमन और आंतरिक सुरक्षा बेहद जरूरी है।

इस पूरे भाषण में वंदे मातरम् का विशेष महत्व रहा। राष्ट्रीय गीत के 150 साल पूरे होने के मौके पर लाल किले में उसका गूंजना इतिहास, संस्कृति और राष्ट्रभावना को एक साथ जोड़ गया।

कुल मिलाकर मोदी का भाषण आर्थिक महत्वाकांक्षा और राष्ट्रवाद का मेल था। आत्मनिर्भरता, तकनीक, युवा, ऊर्जा, विनिर्माण और राष्ट्रीय एकता इसके प्रमुख स्तंभ रहे।

लेकिन असली इम्तिहान घोषणाओं के बाद शुरू होगा। बड़े लक्ष्य तभी मायने रखते हैं जब वे नौकरी, आमदनी, अवसर और बेहतर जिंदगी में बदलें। 2047 का विकसित भारत सिर्फ आंकड़ों और नारों से नहीं बनेगा। उसे करोड़ों आम भारतीयों की जिंदगी में महसूस होना चाहिए।

Thursday, August 13, 2026

 शीला की जवानी बुढ़ापा बन गई; फैसला आना है, रेप हुआ या नहीं!

सार्वजनिक जीवन में यौन आरोपों और जवाबदेही की लंबी कहानी

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

15 अगस्त 2026

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कितनी बार एक औरत को बोलना पड़ेगा, तब जाकर व्यवस्था सुनेगी? कितनी सुर्खियाँ चीखेंगी, तब किसी ताकतवर आदमी से कथित यौन अपराध का हिसाब माँगा जाएगा?

भारत में यह दृश्य अब अनजाना नहीं रहा। किसी नेताजी पर आरोप लगता है। मीडिया में तूफान आता है। कार्यकर्ता सड़क पर उतरते हैं। हैशटैग ट्रेंड करते हैं। पीड़िता से कहा जाता है: बोलो, साबित करो, फिर बोलो और उस दर्द को बार-बार जीओ।

फिर कानून की गाड़ी चलती है। धीरे-धीरे, बेहद धीरे। इतनी धीमी कि हिम्मत चुकने लगती है, पैसा खत्म होने लगता है, गवाह थक जाते हैं और सबूत कमजोर पड़ने लगते हैं। उधर जनता का गुस्सा भी नई खबर की तलाश में निकल जाता है।

कल का आक्रोश आज की पुरानी खबर बन जाता है।

सामाजिक कार्यकर्ता पद्मिनी अय्यर सवाल उठाती हैं, “इंसाफ के लिए पीड़िता को ही हर बार इतना सब्र क्यों करना पड़ता है, जबकि सत्ता के पास वक्त भी है, रसूख भी और बच निकलने के रास्ते भी?”

जन टिप्पणीकार पारस नाथ चौधरी कहते हैं कि पिछले दो दशकों में भारत ने राजनीति, फिल्म, मीडिया और धार्मिक संस्थाओं में एक ही तरह का तमाशा बार-बार देखा है,: एक ताकतवर आदमी, कुछ गंभीर आरोप, मीडिया का शोर और कभी-कभी वर्षों बाद अदालत का फैसला। किसी को उम्रकैद मिली। कोई बरी हो गया। किसी ने चुपचाप इस्तीफा दिया। किसी ने खुलेआम आरोप नकार दिए। लेकिन इन तमाम मामलों ने एक बड़ा सवाल जरूर छोड़ा है: क्या ताकतवर लोगों के लिए कानून की चाल अलग होती है?


पूर्व सांसद और पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवगौड़ा के पोते प्रज्वल रेवन्ना का मामला हाल के सबसे सनसनीखेज मामलों में रहा।

अप्रैल 2024 में कर्नाटक के हासन में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले सैकड़ों कथित यौन वीडियो वाले पेन ड्राइव सामने आए। आरोप कई महिलाओं के यौन उत्पीड़न से जुड़े थे। रेवन्ना देश छोड़कर चले गए और मई 2024 में लौटने पर गिरफ्तार हुए।

चार मामलों में चार्जशीट दाखिल हुई। अगस्त 2025 में विशेष अदालत ने एक घरेलू कामगार से बार-बार बलात्कार के मामले में उन्हें दोषी ठहराया। वीडियो, डीएनए और फॉरेंसिक सबूतों पर भरोसा करते हुए अदालत ने प्राकृतिक जीवन के शेष समय तक जेल की सजा सुनाई। रेवन्ना ने अपील की है और मामला अभी आगे की कानूनी प्रक्रिया में है।


उत्तर प्रदेश के उन्नाव के पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को नाबालिग लड़की से बलात्कार के मामले में दोषी ठहराया गया।

मामले ने देश को झकझोर दिया। आरोप लगे कि पीड़िता के पिता की हिरासत में मौत और बाद में हुए सड़क हादसे में परिवार के सदस्यों तथा वकील की मौत के पीछे सेंगर के सहयोगियों का हाथ था।

सेंगर को उम्रकैद हुई। दिल्ली हाईकोर्ट ने 2025 के आखिर में सजा निलंबित की। लेकिन मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश को पलट दिया और मुख्य अपील पर जल्द फैसला करने को कहा। एक दूसरे मामले में मिली सजा के कारण सेंगर जेल में बने हुए हैं।


भाजपा सांसद और 2023 तक भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष रहे बृज भूषण शरण सिंह पर कई महिला पहलवानों ने यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए। इनमें ओलंपिक पदक विजेता भी शामिल थीं।

जंतर-मंतर पर पहलवानों का आंदोलन देशभर में चर्चा का विषय बना। एफआईआर दर्ज हुई। बृज भूषण ने आरोपों से इनकार किया।

अगस्त 2026 में दिल्ली की अदालत ने उन्हें और एक सह-आरोपी को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि आरोप संदेह से परे साबित नहीं हुए। आदेश के कुछ हिस्सों में आरोपों को राजनीतिक रूप से प्रेरित दिखाई देने की बात भी कही गई। शिकायतकर्ताओं ने फैसले के खिलाफ अपील करने की बात कही है।

यहाँ कानून ने अपना फैसला सुना दिया है। लेकिन बहस अभी खत्म नहीं हुई।


राजस्थान के पूर्व मंत्री महिपाल मदेरणा का नाम 2011 में एएनएम भंवरी देवी के लापता होने और कथित हत्या के मामले में सामने आया।

उन्होंने संबंध होने की बात स्वीकार की, लेकिन हत्या में शामिल होने से इनकार किया। इस कांड ने उनका राजनीतिक करियर खत्म कर दिया। मुकदमा वर्षों तक चलता रहा। देरी के आधार पर कई आरोपियों को जमानत मिली। 2021 में मदेरणा की मौत हो गई, जबकि मामला अभी लंबित था।

कानून की किताब में तारीखें होती हैं। पीड़ित की जिंदगी में इंतजार होता है।


आसाराम बापू और गुरमीत राम रहीम सिंह जैसे स्वयंभू धर्मगुरुओं के मामले भी इसी बहस का हिस्सा हैं।

आसाराम को आश्रम में नाबालिग से बलात्कार के मामले में उम्रकैद हुई। मई 2026 में राजस्थान हाईकोर्ट ने बलात्कार की सजा बरकरार रखी, हालांकि कुछ अन्य आरोपों में राहत दी। मामला सुप्रीम कोर्ट में है।

डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को 2017 में दो बलात्कार मामलों में दोषी ठहराया गया था। उन्हें 20 साल की सजा मिली। उन्हें कई बार पैरोल भी मिली। हाल में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पत्रकार की हत्या के मामले में उन्हें बरी किया, लेकिन उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।

यहीं एक और सवाल पैदा होता है; क्या जेल की सलाखें सबके लिए बराबर होती हैं?


भारत में #MeToo आंदोलन ने 2018 में जोर पकड़ा। अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने 2009 की फिल्म शूटिंग के दौरान अभिनेता नाना पाटेकर पर उत्पीड़न का आरोप लगाया। पाटेकर ने आरोपों से इनकार किया।

टीवी निर्माता विंटा नंदा ने अभिनेता आलोक नाथ पर 1990 के दशक में यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया। एफआईआर दर्ज हुई और नाथ ने आरोपों से इनकार किया।

आंदोलन धीरे-धीरे राजनीति और मीडिया तक भी पहुँचा।

तत्कालीन केंद्रीय मंत्री एम.जे. अकबर पर कई महिला पत्रकारों ने उत्पीड़न के आरोप लगाए। उन्होंने इस्तीफा दिया और पत्रकार प्रिया रमानी पर मानहानि का मुकदमा किया। 2021 में दिल्ली की अदालत ने रमानी के पक्ष में फैसला दिया।


#MeToo दौर का शायद सबसे लंबा कानूनी सफर तरुण तेजपाल का रहा।

तहलका के संस्थापक और पूर्व प्रधान संपादक पर 2013 में गोवा के एक होटल की लिफ्ट में एक युवा सहकर्मी के यौन उत्पीड़न का आरोप लगा।

2021 में ट्रायल कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया। फैसले में पीड़िता के घटना के बाद के व्यवहार पर की गई टिप्पणियों की काफी आलोचना हुई। गोवा सरकार ने फैसले को चुनौती दी।

और फिर आया 6 अगस्त 2026,

करीब तेरह साल बाद बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा बेंच ने निचली अदालत का फैसला पलट दिया। तेजपाल को बलात्कार और संबंधित अपराधों में दोषी ठहराया गया। उन्हें दस साल की कठोर कैद और पीड़िता को देने के लिए भारी जुर्माने की सजा सुनाई गई। तेजपाल ने सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही है।

तेरह साल।

एक मुकदमे के लिए शायद सिर्फ एक संख्या। एक पीड़िता के लिए जिंदगी का बड़ा हिस्सा।


सभी मामले बलात्कार या यौन उत्पीड़न के नहीं थे। कुछ मामलों में निजी वीडियो सामने आए और आरोपों से इनकार हुआ।

एन.डी. तिवारी का 2009 का सेक्स-वीडियो विवाद और बाद में डीएनए जांच से विवाहेतर बेटे की पुष्टि हुई। अभिषेक मनु सिंघवी का 2012 का वीडियो विवाद भी खूब उछला। अदालतों ने उसके प्रसार पर रोक लगाने की कोशिश की।

स्वामी नित्यानंद का वीडियो विवाद, अभिनेता शाइनी आहूजा की बलात्कार में सजा और 1970 के दशक का सुरेश राम से जुड़ा राजनीतिक सेक्स-फोटो विवाद बताते हैं कि यह बीमारी नई नहीं है।

नई सिर्फ कैमरे की ताकत है। सोशल मीडिया की रफ्तार है। और शायद समाज की याददाश्त भी थोड़ी तेज हुई है।

पैटर्न साफ दिखाई देता है

इन मामलों को साथ रखिए तो कुछ बातें साफ दिखती हैं।

आरोप और अंतिम कानूनी फैसले के बीच अक्सर बहुत लंबा फासला होता है। तेजपाल का मामला तेरह साल चला। कई मामलों में अपीलें वर्षों तक चलती रहती हैं।

नतीजे भी अलग-अलग रहे। कहीं दोषसिद्धि हुई। कहीं बरी किया गया। कहीं मामला अभी अदालतों में है। इसलिए आरोप को फैसला मानना भी गलत है और बरी होने को हर सवाल का अंत मान लेना भी।

कई मामलों में पीड़ित महिलाएँ उस व्यक्ति पर संस्थागत रूप से निर्भर थीं। घरेलू कामगार, नाबालिग लड़कियाँ और खेल संघों के अधीन रहने वाली महिला खिलाड़ी इसका उदाहरण हैं।

सामाजिक कार्यकर्ता मुक्ता गुप्ता कहती हैं, “सूची में आरोपी और दोषी सभी पुरुष हैं। महिलाएँ आरोप लगाने वाली, पीड़ित या सर्वाइवर के रूप में दिखाई देती हैं।”

उनका कहना है कि यह केवल भारत की कहानी नहीं है। दुनिया भर में सार्वजनिक जीवन के ताकतवर पुरुषों पर यौन दुर्व्यवहार के आरोप सामने आते रहे हैं। सत्ता, राजनीतिक पद, फिल्मी हैसियत और धार्मिक प्रभाव जैसे पद अक्सर एक असमान शक्ति-संबंध स्थापित करते हैं।

महिला सार्वजनिक हस्तियों पर भी विवाद होते हैं। लेकिन भारत में उनके खिलाफ मामले अधिकतर भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद या निजी जीवन से जुड़े विवादों के रूप में सामने आते हैं।

असली सवाल अभी बाकी है

मामले आते रहते हैं। अदालतें अपनी रफ्तार से चलती रहती हैं। वकील तारीखें लेते रहते हैं। गवाह थकते रहते हैं। पीड़ित इंतजार करते रहते हैं।

और जनता?

जनता कुछ दिन गुस्सा करती है। फिर अगली खबर पर चली जाती है।

यही शायद इस पूरी कहानी का सबसे कड़वा सच है।

कानून अंधा हो सकता है, लेकिन सत्ता कभी-कभी बहुत अच्छी तरह देखती है कि रास्ता कहाँ से निकलेगा।

तो सवाल फिर वही है: 

एक औरत को कितनी बार बोलना पड़ेगा, तब जाकर व्यवस्था सचमुच सुनेगी?


Tuesday, August 11, 2026

 अमेरिका में सपने टूटे, भारत में कहानी मिली

संतोष नायर की जिंदगी का कड़वा-मीठा सफर

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पुस्तक समीक्षा

Silver Linings in the Dark Sky

278 पृष्ठ | अंग्रेज़ी

प्रकाशक: Pink Lotus, Varanasi

उपलब्ध: Amazon

लेखक: Santosh Nayar

संपादक: Dr Alok Gupta, PhD

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

13 अगस्त 2026

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अमेरिका सपनों की धरती है। कम-से-कम विज्ञापन यही कहते हैं। वहाँ सपने डॉलर में आते हैं और कभी-कभी उनकी ईएमआई जिंदगी भर चुकानी पड़ती है।

संतोष नायर भी सपने लेकर अमेरिका गए थे। लेकिन जिंदगी ने उन्हें ऐसा पैकेज थमा दिया, जिसमें सफलता के साथ बीमारी, शराब, टूटते रिश्ते, अदालत, जेल और आखिर में भारत वापसी भी शामिल थी। कहानी में इतना मसाला है कि बॉलीवुड की कोई पटकथा पढ़कर भी कह सकती है: भाई, थोड़ा कम करो!

लेकिन यह फिल्म नहीं, एक असली जिंदगी थी। और असली जिंदगी की पटकथा सबसे ज्यादा निर्दयी होती है।

संतोष नायर को आखिरकार कुछ ठहराव मैसूर में मिला। मगर अंतिम वर्षों में खराब सेहत ने उन्हें फिर घेर लिया। 2024 में उनका निधन हो गया। पीछे रह गई एक अधूरी पांडुलिपि, और एक ऐसी जिंदगी, जिसमें जितने मोड़ थे, उतने शायद किसी हाईवे में भी नहीं होते।

यही पांडुलिपि बाद में Silver Linings in the Dark Sky बनी।

जिंदगी ने कोई सीधी सड़क नहीं दी

नायर पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट थे। महत्वाकांक्षी थे। प्रतिभाशाली थे। अमेरिका में बेहतर भविष्य का सपना था। शादी हुई। परिवार बना। पेशेवर सफलता मिली।

फिर जिंदगी ने अचानक गियर बदल दिया।

बाइपोलर डिसऑर्डर ने उनके जीवन में प्रवेश किया। मानसिक उन्माद के दौर आए। शराब ने मुश्किलों को और उलझाया। रिश्ते कमजोर हुए। गलत फैसले हुए। कानून सामने आया और अंततः जेल की सलाखें भी आ गईं।

तीन शादियाँ, पारिवारिक तनाव, कभी गजब का आत्मविश्वास और कभी बच्चों जैसी मासूमियत; नायर एक ही व्यक्ति में कई व्यक्तित्वों का चलता-फिरता संस्करण लगते हैं।

लेकिन यही बाइपोलर डिसऑर्डर की पेचीदगी भी है। यह बीमारी सिर्फ मूड बदलने का मामला नहीं है। इसमें व्यक्ति की सोच, ऊर्जा, निर्णय क्षमता और व्यवहार तक प्रभावित हो सकते हैं।

मेनिया के दौरान इंसान को अपने फैसले बिल्कुल सही लग सकते हैं। दिमाग एक्सप्रेस ट्रेन की रफ्तार से दौड़ता है और विवेक बेचारा अगले स्टेशन पर छूट जाता है।

फिर जिंदगी बिल भेजती है।

रिश्तों का बिल।

पैसों का बिल।

नौकरी का बिल।

परिवार की चिंता का बिल।

और अंत में कानून का बिल, जिसमें ब्याज सबसे ज्यादा होता है।

नायर कई बार दवा लेना भूल जाते थे। इसके बाद उनका व्यवहार बदल जाता था। वे चिड़चिड़े, रूखे या हिंसक हो सकते थे। उनके अनुभव से पता चलता है कि मानसिक बीमारी को समझे बिना केवल व्यवहार को देखना कितना खतरनाक हो सकता है।

लेकिन नायर सिर्फ अपनी बीमारी नहीं थे

यही इस किताब की सबसे महत्वपूर्ण बात है।

नायर को सिर्फ बाइपोलर डिसऑर्डर वाला व्यक्ति मान लेना उनके साथ नाइंसाफी होगी। वे बुद्धिमान थे। जिज्ञासु थे। महत्वाकांक्षी थे। उनमें हास्यबोध था। वे अच्छे पेशेवर, पति, पिता, मित्र और प्रवासी भी थे।

बीमारी उनकी कहानी का हिस्सा थी।

पूरी कहानी नहीं।

यही फर्क इस आत्मकथा को महज बीमारी की कहानी बनने से रोकता है।

नायर अपनी जिंदगी को चमकदार पैकेजिंग में बेचने की कोशिश नहीं करते। वे खुद को महान नायक नहीं बनाते। अपनी गलतियों पर पर्दा नहीं डालते। अपनी कमजोरियों को भी सामने रखते हैं।

कभी वे बेहद समझदार लगते हैं। कभी लापरवाह। कभी अजीब। कभी बेहद मासूम।

और कई बार इतने मजेदार कि पाठक सोचता है, यह आदमी अपनी जिंदगी का दुख भी स्टैंड-अप कॉमेडी में बदल सकता था।

अध्यायों के नाम भी चुगली करते हैं

नायर की किताब के अध्यायों के नाम उनके मिजाज की पूरी चुगली करते हैं।

पहली शादी का नाम है—“Made in Heaven, Deep Fried on Earth.”

दूसरी शादी—“Until Mania Do Us Apart.”

और जेल?

उसे उन्होंने अपनी “Favorite Alma Mater” बना दिया।

आम आदमी कॉलेज से डिग्री लेकर निकलता है।

नायर जेल से अनुभव लेकर निकले।

जिंदगी ने उन्हें शायद गलत जगह दाखिला दिया था, लेकिन उन्होंने वहाँ भी नोट्स बना लिए।

हँसी के पीछे हालांकि दर्द बहुत गहरा है।

बीमारी और अपराध के बीच की धुंध

नायर के जेल अनुभव अमेरिकी न्याय व्यवस्था पर असहज सवाल उठाते हैं।

मानसिक बीमारी से जूझता व्यक्ति जब कानून के सामने आता है, तो क्या सिस्टम उसके मन को समझता है या सिर्फ उसके व्यवहार को सजा देता है?

सवाल आसान हैं।

जवाब नहीं।

बीमारी कब व्यवहार बन जाती है?

व्यवहार कब गलती बनता है?

और गलती कब अपराध?

किताब इन सवालों का कोई आसान फार्मूला नहीं देती। शायद इसलिए कि जिंदगी भी ऐसा कोई फार्मूला नहीं देती।

मानसिक उन्माद में लिया गया फैसला बाद में पागलपन लग सकता है। लेकिन उस समय वही फैसला व्यक्ति को पूरी तरह सही लगता है।

आत्मविश्वास लापरवाही बन जाता है। ऊर्जा जुनून में बदल जाती है। विचार इतनी तेजी से दौड़ते हैं कि उनके परिणाम पीछे छूट जाते हैं।

और जब परिणाम आते हैं, तब तक ट्रेन काफी दूर निकल चुकी होती है।

अँधेरे में भी हास्य की एक खिड़की

नायर की सबसे बड़ी खूबियों में एक उनका हास्यबोध था।

वे अपनी जिंदगी के सबसे खराब अध्यायों में भी विडंबना खोज लेते थे। शायद यही उनकी मानसिक ताकत थी।

यह किताब इसलिए कोई मोटिवेशनल पोस्टर नहीं बनती।

यह वह किताब नहीं है जिसमें लिखा हो; “मुश्किलों से मैंने सीखे जीवन के दस महान सबक।”

न कोई बनावटी ज्ञान।

न हर पन्ने पर चमकदार जीवन-दर्शन।

बस एक आदमी है जो कहता है; मेरे साथ यह हुआ।

और फिर पाठक खुद तय करता है कि इससे क्या समझना है।

यही ईमानदारी किताब को असरदार बनाती है।

जेल में शुरू हुई कहानी

नायर ने जेल में रहते हुए अपनी आत्मकथा लिखना शुरू किया था। 2013 में उन्होंने पांडुलिपि डॉ. आलोक गुप्ता को भेजी।

भारत लौटने के बाद डॉ. गुप्ता ने उन्हें Glowtronics में काम करने का अवसर दिया। लगा कि शायद जिंदगी अब दूसरी पारी खेलने के लिए तैयार है।

लेकिन बीमारी ने फिर दस्तक दी।

नौकरी चली गई। पांडुलिपि भी जिंदगी की फाइलों में दब गई।

और जिंदगी, जैसा कि अक्सर करती है, आगे बढ़ गई।

फिर 2024 में नायर का निधन हो गया।

लेकिन कहानी खत्म नहीं हुई थी।

2026 में डॉ. गुप्ता को वह पुरानी पांडुलिपि फिर मिली।

एक भूली हुई आवाज ने अचानक दरवाजा खटखटाया।

नायर अब सफाई देने के लिए मौजूद नहीं थे। वे किसी घटना पर अपना पक्ष नहीं रख सकते थे। अपनी गलती को सही नहीं ठहरा सकते थे। किसी पुराने फैसले का संदर्भ नहीं समझा सकते थे।

इसलिए किताब में उनकी आवाज जैसी थी, वैसी ही बची रही।

कच्ची।

बेबाक।

मजेदार।

कभी गुस्सैल।

कभी कमजोर।

और सबसे बढ़कर: इंसानी।

किताब न बरी करती है, न सजा देती है

Silver Linings in the Dark Sky नायर को निर्दोष साबित करने की कोशिश करती है, न उन्हें कटघरे में खड़ा करती है।

वह सिर्फ हमसे थोड़ी समझ मांगती है।

और थोड़ी इंसानियत।

मानसिक बीमारी को लेकर हमारा समाज अभी भी अजीब तरह से असहज है। शारीरिक बीमारी हो तो हम दवा, डॉक्टर और आराम की सलाह देते हैं। मानसिक बीमारी हो तो सलाह देने वालों की पूरी बारात निकल आती है।

“हिम्मत रखो।”

“अपने आपको कंट्रोल करो।”

“ज्यादा मत सोचो।”

काश दिमाग भी रिमोट कंट्रोल से चलता!

बाइपोलर डिसऑर्डर गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्या है। इसमें मूड, ऊर्जा और व्यवहार में अत्यधिक उतार-चढ़ाव आ सकता है। समय पर उपचार, दवा, थेरेपी और परिवार का सहयोग व्यक्ति को स्थिर और सार्थक जीवन जीने में मदद कर सकते हैं।

नायर की कहानी इसी समझ की जरूरत को सामने लाती है।

जिंदगी ने सब कुछ दिया, लेकिन पूरा नहीं दिया

नायर की जिंदगी में उपलब्धियाँ थीं, लेकिन नुकसान भी कम नहीं थे।

प्रतिभा हमेशा सफलता में नहीं बदल सकी।

रिश्ते टूटे।

मौके हाथ से निकले।

बीमारी ने रास्ता रोका।

गलत फैसलों ने कीमत वसूली।

फिर भी कोशिश चलती रही।

अमेरिका से भारत तक।

कामयाबी से गिरावट तक।

जेल से नई शुरुआत तक।

और एक भूली हुई पांडुलिपि से प्रकाशित किताब तक।

यही इस कहानी की असली ताकत है।

आखिर में कहानी किसकी है?

Silver Linings in the Dark Sky अँधेरे पर विजय की कहानी नहीं है।

यह उस आदमी की कहानी है जिसने लंबे समय तक अँधेरे में जिंदगी गुजारी। कई बार रास्ता खोया। कई बार खुद से हारा। कई बार दूसरों को दुख दिया। लेकिन उसी अँधेरे में कभी-कभी हँसी की एक किरण भी खोज ली।

किताब पढ़ते हुए लगता है कि जिंदगी ने नायर को कोई आसान रास्ता नहीं दिया।

लेकिन शायद उन्होंने भी जिंदगी को आसानी से छोड़ने से इनकार कर दिया था।

और अंत में जिंदगी ने उन्हें एक आखिरी, बेहद विडंबनापूर्ण तोहफा दिया।

संतोष नायर शायद अपनी जिंदगी पूरी तरह वापस नहीं पा सके।

लेकिन अंततः उन्हें अपनी कहानी वापस मिल गई।

और कभी-कभी, शायद यही हमारी सबसे बड़ी silver lining होती है; जब जिंदगी की सारी रोशनियाँ बुझ जाएँ, तब भी हमारी कहानी कहीं बची रह जाए।

 सेहत के नए हकीमों ने छेड़ी वेलनेस की जंग 

अमीरों ने शांत सुबह को बना दिया स्टेडियम!

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

१३ अगस्त 2026

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आजकल  बड़े शहरों में चमचमाती ऊंची इमारतों में रहने वाले लोगों की जिंदगी बदल गई है। ग्रेनाइट, शीशे और एयर-कंडीशनर से सजे इन आलीशान घरों में अब सूरज निकलने के बाद आराम से सोना लगभग गुनाह समझा जाता है।

अपने शर्माजी, भोर सुबह, सज संवर के जिम के लिए ड्राइव करते हैं, जहां हूरों से मिलकर उनका रक्तचाप नॉर्मल हो जाता है। उधर चौधरी साहब अपने फ्लैट की खिड़की से नजारा ताक रहे होते हैं। वो बताते हैं, "सुबह साढ़े छह बजे से ही फिटनेस का युद्ध शुरू हो जाता है। कोई जिम की तरफ भाग रहा है, कोई तैराकी कर रहा है। योगा मैट अलग-अलग “माइंडफुलनेस ज़ोन” में ऐसे बिछाए जाते हैं, जैसे कोई धार्मिक अनुष्ठान होने वाला हो। कुछ लोग तेज़-तेज़ चलते हैं, कुछ जॉगिंग करते हैं। सबके चेहरों पर ऐसा भाव होता है, जैसे सुबह पसीना बहाना ही इंसानियत की सबसे बड़ी सेवा हो।"

जिम इतना भरा रहता है कि सांस लेना मुश्किल हो जाए। स्विमिंग पूल में इतनी हलचल होती है कि पानी भी शायद आराम मांगने लगे। ध्यान लगाने वाले लोग इतनी गंभीरता से आंखें बंद करते हैं कि लगता है, अभी संतोष और आत्ममुग्धता के सहारे हवा में उड़ने लगेंगे।

हर सुबह ग्रेटर नोएडा की एक पूरी सोसाइटी स्वास्थ्य सुधारने के एक बड़े अभियान में बदल जाती है। सवाल बस इतना है कि क्या इससे सचमुच स्वास्थ्य सुधर रहा है? कभी-कभी यह फिटनेस से ज्यादा एक महंगा जुनून लगता है।

मेरा एक दोस्त, जो खुद जिम भक्त है, कहता है कि इतनी योगा, प्राणायाम और माइंडफुलनेस के बावजूद दुनिया पहले से ज्यादा स्वस्थ नजर नहीं आती। अस्पताल बढ़ रहे हैं, निजी क्लीनिक बढ़ रहे हैं और वेलनेस सेंटर भी हर गली में खुल रहे हैं।

अगर योगा के दावे आधे भी सच होते, तो शहर के आधे हृदय रोग विशेषज्ञ बेरोजगार हो जाते और बाकी आधे प्राणायाम सिखा रहे होते।

उधर, पुराने विचारों वाले एक पंडित जी, इस मामले को बहुत सीधे शब्दों में समझाते हैं। उनका कहना है कि अपनी ताकत बचाने का फायदा, सुबह-सुबह उसे बेकार में खर्च करने से कहीं ज्यादा है। ट्रैफिक झेलना, दफ्तर की राजनीति सहना, बढ़ती महंगाई और कभी-कभी जीवन के अर्थ पर चिंता करना: ये सब अपने आप में काफी बड़ी एक्सरसाइज हैं।

वह कहते हैं, “सुबह-सुबह तंग छोटे गारमेंट्स पहनकर खुद को क्यों सताते हो? जिंदगी खुद ही कम कसरत नहीं कराती क्या ?”

बात में दम है। अमीर लोग सुबह अंधेरे में अपने शरीर को सज़ा देते हैं, ताकि बाद में गर्व से एवोकाडो टोस्ट खा सकें। शायद लंबी उम्र का असली राज जिम में नहीं, बल्कि आराम से सोने में हो। हाइ सोसाइटी के तमाम लोग सुबह वर्क आउट इसलिए करते हैं ताकि देर रात तक चलने वाली पार्टियों में मजे लें।

हो सकता है असली फिटनेस यह हो कि इंसान एक सभ्य समय तक बिस्तर में पड़ा रहे, अपनी ऊर्जा बचाए और उसे दुनिया की सबसे कठिन एक्सरसाइज के लिए इस्तेमाल करे, इस पागल होती दुनिया में थोड़ा-बहुत सामान्य बने रहने के लिए।

आज फिटनेस एक नया धर्म बन चुकी है। फर्क बस इतना है कि पहले लोग मोक्ष के लिए तपस्या करते थे, अब लोग सिक्स-पैक के लिए।

एक तरफ जॉगर्स हैं। दूसरी तरफ योगा योद्धा। तीसरी तरफ जिम के पहलवान। चौथी तरफ वे लोग हैं, जो हाथ में महंगी पानी की बोतल लेकर सिर्फ इसलिए घूम रहे हैं ताकि सबको पता चले: भाई साहब, ये आज भी “हाइड्रेटेड” हैं। अब सुबह सोना पुराने जमाने की आदत हो गई है। जो आठ बजे उठता है, उसे शक की निगाह से देखा जाता है। लोग सोचते हैं, “बेचारा जिंदगी में कितना पीछे रह गया!” जबकि आदमी बेचारा बस नींद पूरी कर रहा होता है। और उधर गेट पर कंपटीशन के नतीजे आने लगे हैं: 

“आज कितने कदम चले?”

“दस हजार।”

“बस? मैंने पंद्रह हजार किए।”

“मैंने बीस हजार।”

तभी एक सज्जन मोबाइल निकालकर कहते हैं, “मेरी स्मार्टवॉच कह रही है कि मैं आज बहुत स्ट्रेस में हूं।”

बाकी लोग गंभीर हो जाते हैं। इतनी दौड़-भाग, इतनी योगा, इतना ध्यान और इतना प्राणायाम करने के बाद भी घड़ी बता रही है कि आदमी तनाव में है। अब घड़ी से बहस कौन करे?

जिम में भी हालत कम मजेदार नहीं है। ट्रेडमिल पर लोग ऐसे दौड़ते हैं जैसे पीछे ईडी, सीबीआई और इनकम टैक्स विभाग तीनों लगे हों। मजे की बात यह है कि आधे घंटे बाद वही सज्जन लिफ्ट से ऊपर अपने फ्लैट में जाते हैं। सेकंड फ्लोर तक सीढ़ियों से जाने में कष्ट होता है।

स्विमिंग पूल में लोग पानी को इतना मथते हैं कि लगता है समुद्र मंथन का ट्रायल चल रहा है। योगा क्लास में सब आंखें बंद करके “मन की शांति” खोज रहे हैं। क्लास खत्म होते ही पार्किंग में कार खड़ी करने को लेकर दो लोगों में युद्ध शुरू हो जाता है।

एक सज्जन रोज सुबह ध्यान करते हैं।

दूसरे सज्जन पूछते हैं, “कितनी देर?”

“एक घंटा।”

“फायदा?”

“बहुत शांति मिलती है।”

इतने में उनकी मेड छुट्टी मांग लेती है। सज्जन की आध्यात्मिक शांति तुरंत व्हाट्सऐप कॉल पर चली जाती है।

आधुनिक जीवनशैली का सबसे बड़ा चमत्कार यही है। आदमी स्वास्थ्य पाने के लिए पहले खुद को बीमार करता है। सुबह अलार्म से नींद खराब करो। ठंडे पानी से नहाओ। जिम में शरीर तोड़ो। फिर प्रोटीन शेक पियो। उसके बाद ऑफिस जाकर आठ घंटे कुर्सी पर बैठो और शाम को डॉक्टर से पूछो, “डॉक्टर साहब, कमर दर्द क्यों रहता है?”

पहले इंसान खेत में काम करता था, पैदल चलता था, कुएं से पानी खींचता था। उसे फिटनेस ऐप की जरूरत नहीं पड़ती थी। आज आदमी एयर-कंडीशनर में बैठता है, कार से जिम जाता है, ट्रेडमिल पर पांच किलोमीटर दौड़ता है और फिर कार से घर लौट आता है।

इसे आधुनिक प्रगति कहते हैं।

अब खाना भी पेट भरने के लिए नहीं खाया जाता। पहले उसकी फोटो खींची जाती है। एवोकाडो टोस्ट, क्विनोआ सलाद और ग्रीन जूस के साथ सेल्फी जरूरी है। आखिर दुनिया को कैसे पता चलेगा कि आप स्वस्थ हैं?

स्वास्थ्य से ज्यादा जरूरी है: स्वस्थ दिखना।

सोशल मीडिया ने तो फिटनेस को पूरा तमाशा बना दिया है। कोई आसन कर रहा है, कोई प्रोटीन पी रहा है, कोई “नो शुगर चैलेंज” चला रहा है। अगले दिन वही आदमी आधी रात को फ्रिज खोलकर रसगुल्ले ढूंढ रहा होता है।

सच तो यह है कि आधुनिक इंसान ने हर चीज को प्रतियोगिता बना दिया है। पहले नौकरी की दौड़ थी। फिर पैसे की दौड़ हुई। अब नींद छोड़कर स्वस्थ होने की भी दौड़ शुरू हो गई है।

शायद असली वेलनेस का राज इतना ही है; थोड़ा कम भागिए, थोड़ा कम दिखाइए और कभी-कभी बिना अपराधबोध के देर तक सो जाइए।

क्योंकि इस दुनिया में जहां हर कोई फिटनेस का महर्षि बनने पर तुला है, सबसे बड़ा योगासन शायद यही है: 

आराम से करवट बदलो, चादर ओढ़ो और कहो; आज नहीं, कल से जिम पक्का

Monday, August 10, 2026

 


महिला नेता दिखी नहीं कि गाली शुरू! 

सियासत में मुद्दों से ज्यादा आसान क्यों है चरित्र पर हमला?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

12 अगस्त 2026

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कल्पना कीजिए, चुनावी मंच पर एक महिला नेता खड़ी होती है। वह सरकार से तीखे सवाल पूछती है। विपक्ष को चुनौती देती है। अपनी पार्टी का बचाव करती है। कुछ ही मिनटों में सोशल मीडिया का माहौल बदल जाता है। उसके तर्कों पर कम, कपड़ों पर ज्यादा चर्चा होने लगती है। उसकी नीतियों को छोड़कर उम्र, शादी, शक्ल और निजी जिंदगी की चीरफाड़ शुरू हो जाती है।

बस, यहीं हमारी राजनीति का सबसे बदसूरत चेहरा दिखाई देता है।

पुरुष नेता गरजे तो उसे दमदार कहा जाता है। महिला नेता उसी अंदाज में जवाब दे दे, तो उसे “अहंकारी” या “बदतमीज” बता दिया जाता है। पुरुष नेता महत्वाकांक्षी हो तो दूरदर्शी कहलाता है। महिला महत्वाकांक्षी हो तो उसके इरादों पर शक किया जाता है। जैसे राजनीति में महिला का सबसे बड़ा अपराध सिर्फ इतना हो कि उसने चुप रहने से इनकार कर दिया।

महिला चुनाव लड़ सकती है, जीत सकती है और सत्ता की कुर्सी तक पहुंच सकती है। लेकिन जैसे ही वह मुखर होती है, बहस अक्सर मुद्दों से भटक जाती है। फिर शुरू होता है कपड़ों, चरित्र, रिश्तों और निजी जिंदगी पर हमला।

मानो सियासत का कोई अनलिखा नियम हो, महिला को हराना मुश्किल लगे, तो पहले उसे ज़लील कर दो।

पुरुष नेताओं को चोर, भ्रष्ट, निकम्मा या नाकाम कहना “तीखी राजनीतिक बहस” माना जाता है। महिला नेता आंख में आंख डालकर जवाब दे दे, तो शब्दों की तलवार अचानक उसके विचारों को छोड़कर उसकी देह और निजी जिंदगी की तरफ मुड़ जाती है। नीति-विचार पीछे छूट जाते हैं। तर्क दम तोड़ देते हैं। गाली सबसे आसान हथियार बन जाती है।

यह बीमारी किसी एक पार्टी की नहीं है। अफसोस, पूरा राजनीतिक तंत्र इससे संक्रमित दिखाई देता है। अपनी पार्टी की महिला नेता पर फूहड़ टिप्पणी हो, तो बयान जारी होते हैं और आक्रोश उमड़ पड़ता है। लेकिन विरोधी दल की महिला पर वही कीचड़ उछले, तो कई चेहरे अचानक मौन साध लेते हैं।

महिला सम्मान अब सिद्धांत कम, सियासी स्विच ज्यादा बन गया है, अपने लिए ऑन, विरोधियों के लिए ऑफ।

सुनंदा पुष्कर के मामले में भी सार्वजनिक चर्चा कई बार उनकी पहचान से ज्यादा सनसनी के इर्द-गिर्द घूमती रही। जयललिता जैसी शक्तिशाली मुख्यमंत्री को भी कई मौकों पर सिर्फ एक महिला होने के चश्मे से देखा गया। बसपा सुप्रीमो बहन मायावती पर जाति और लिंग, दोनों को मिलाकर तंज कसे गए। उमा भारती को भी ऐसी निजी टिप्पणियां सुननी पड़ीं, जिनका उनकी नीतियों या राजनीतिक काम से कोई संबंध नहीं था।

कंगना रनौत के विचारों से असहमति हो सकती है। उनकी राजनीति और बयानों की आलोचना भी होनी चाहिए। लोकतंत्र में किसी को आलोचना से छूट नहीं मिलती। लेकिन असहमति का अर्थ यह नहीं कि महिला होने के कारण उस पर हर तरह की गाली और गंदगी फेंक दी जाए।

किसी महिला नेता की आलोचना लोकतंत्र है। उसकी निजी जिंदगी नोंचना बदतमीजी है।

दोनों में फर्क है। मगर हमारी राजनीति अक्सर यह फर्क जानबूझकर भूल जाती है।

हम महिलाओं को राजनीति में लाने की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। सम्मेलन होते हैं। मंच सजते हैं। “नारी शक्ति” के नारे गूंजते हैं। भाषणों में महिलाओं के लिए आसमान तक खोल दिया जाता है। फिर टिकट बांटने का वक्त आता है, तो कई दरवाजे बंद मिलते हैं।

महिला आरक्षण का कानून बनना निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन असली सवाल सिर्फ सीटों का नहीं है। सवाल उस माहौल का भी है, जिसमें महिला राजनीति करेगी।

मान लीजिए, किसी महिला को सीट मिल गई। वह चुनाव जीत गई। मंत्री भी बन गई। फिर क्या?

क्या उसे वही सम्मान मिलेगा, जो उसके पुरुष सहयोगी को मिलता है? या फिर उसके कपड़ों पर टीवी बहस होगी? शादी पर सवाल उठेंगे? उम्र पर तंज कसे जाएंगे? और उसकी निजी जिंदगी को व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी के हवाले कर दिया जाएगा?

यही वह दलदल है, जिसमें हमारी राजनीति फंसी हुई है।

इसका सबसे बड़ा नुकसान लोकतंत्र को होता है। कई काबिल महिलाएं शायद राजनीति की तरफ देखकर सोचती होंगी; “यह मैदान मेरे लिए बहुत महंगा पड़ सकता है। यहां काम कम और निजी जिंदगी की सफाई ज्यादा देनी पड़ेगी।”

पुरुष नेता को शायद ही रोज यह सोचना पड़ता हो कि चुनाव लड़ने के बाद उसकी शादी, शरीर या चरित्र राष्ट्रीय बहस का विषय बन जाएगा। यही असमानता है। और यही असली समस्या है।

हम अक्सर शिकायत करते हैं कि राजनीति में अच्छे लोग नहीं आते। शिकायत सही हो सकती है। लेकिन एक सवाल हमसे भी पूछना चाहिए, क्या हम अच्छे और काबिल लोगों के लिए राजनीति का माहौल आसान बनाते हैं?

खासकर महिलाओं के लिए?

जितनी अधिक महिलाएं राजनीति में आएंगी, उन्हें दो-चार गालियों से चुप कराना उतना ही मुश्किल होगा। संख्या ताकत है। संगठन ताकत है। और सबसे बड़ी ताकत आर्थिक आजादी है।

जिस महिला के पास अपनी कमाई, अपना काम और अपना मजबूत नेटवर्क है, उसे डराना आसान नहीं होता। देश भर में लाखों महिला उद्यमी आज यही साबित कर रही हैं। वे कारोबार खड़ा कर रही हैं। रोजगार दे रही हैं। फैसले ले रही हैं। उन्हें किसी नेता की कृपा का इंतजार नहीं।

वे अपने पैरों पर खड़ी हैं। यही असली सशक्तिकरण है।

सिर्फ मंच पर “नारी शक्ति जिंदाबाद” बोलने से कुछ नहीं बदलेगा। महिला को अच्छी शिक्षा चाहिए, तो दीजिए। बैंक लोन चाहिए, तो रास्ते आसान कीजिए। काम का मौका चाहिए, तो दीजिए। सुरक्षित माहौल चाहिए, तो सुनिश्चित कीजिए।

और अगर वह राजनीति में आकर आपसे असहमत हो जाए, तो उसके विचारों से लड़िए, उसके कपड़ों से नहीं।

उसके काम पर सवाल उठाइए, चरित्र पर कीचड़ मत फेंकिए।

उसकी नीति की आलोचना कीजिए, निजी जिंदगी को चुनावी पोस्टर मत बनाइए।

लोकतंत्र में कोई भी नेता आलोचना से ऊपर नहीं है। न पुरुष, न महिला। लेकिन आलोचना और गाली में फर्क होता है। बहस और बेहूदगी में फर्क होता है। सवाल और चरित्रहनन में फर्क होता है।

अफसोस, हमारी सियासत में यह फर्क तेजी से धुंधला होता जा रहा है।

सबसे बड़ा पाखंड तब दिखाई देता है, जब कोई नेता सुबह महिला सम्मान पर लंबा भाषण देता है और शाम तक उसकी पार्टी के समर्थक किसी महिला विरोधी पर सोशल मीडिया में गंदगी उछाल रहे होते हैं। फिर पार्टी कहती है, “हमने तो नहीं कहा।”

यह कोई जवाब नहीं है।

घर में आग लगी हो और मालिक कहे कि माचिस मैंने नहीं जलाई, तो क्या घर बच जाएगा?

राजनीतिक दलों को समझना होगा कि उनकी ट्रोल सेना उनसे पूरी तरह अलग नहीं है। लगातार गाली, धमकी और निजी हमले होते रहें और पार्टी चुप बनी रहे, तो वह चुप्पी भी समर्थन का संदेश देती है।

कई बार चुप रहना समर्थन की सबसे आरामदेह भाषा होता है।

महिलाओं को राजनीति में देवी बनाकर रखने की जरूरत नहीं है। उन्हें आलोचना से बचाने की भी जरूरत नहीं है। बस, उन्हें इंसान और बराबर का नागरिक मानने की जरूरत है।

बहुत बड़ी मांग नहीं है।

वे गलत हों, तो खुलकर आलोचना कीजिए। भ्रष्ट हों, तो जांच कीजिए। काम कमजोर हो, तो चुनाव में हराइए। लेकिन सिर्फ इसलिए हमला मत कीजिए कि वे महिला हैं और शायद जवाब नहीं देंगी।

अब वक्त बदल रहा है। महिलाएं जवाब दे रही हैं। अदालतों का दरवाजा खटखटा रही हैं। कारोबार खड़ा कर रही हैं। राजनीति में अपनी जगह बना रही हैं। धीरे-धीरे संदेश साफ हो रहा है कि पुरानी गाली-गलौज वाली सियासत हमेशा नहीं चलेगी।

महिला-विरोधी सोच कोई प्राकृतिक आपदा नहीं है। यह न मानसून है, न भूकंप। इसे इंसानों ने बनाया है। इसलिए इंसान ही इसे बदल सकते हैं।

शुरुआत उस सबसे आसान बहाने को छोड़कर करनी होगी, “अरे, राजनीति में तो यह सब चलता है।”

नहीं। बहुत चल लिया।

बहुत गालियां दे लीं। बहुत चरित्र उछाल लिए। बहुत निजी जिंदगियां नीलाम कर लीं। अब मुद्दों पर लौटिए।

किसी महिला नेता को सिर्फ मुखर, सक्रिय और महत्वाकांक्षी होने की सजा देना उसके साथ ही नहीं, लोकतंत्र के साथ भी नाइंसाफी है। सियासत की असली लड़ाई विचारों की होनी चाहिए, गालियों की नहीं। नीतियों की होनी चाहिए, निजी जिंदगी की नहीं।

और याद रखिए, जिस लोकतंत्र में आधी आबादी को बोलने से पहले गाली की कीमत सोचनी पड़े, वहां लोकतंत्र का माइक तो चालू है, लेकिन उसकी आवाज अभी भी आधी है।

Sunday, August 9, 2026

 राजनीति को चाहिए नया खून: छात्र संघों की वापसी अब क्यों जरूरी है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

11 अगस्त 2026

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कहते हैं, जब राजनीति में नया खून नहीं आता, तो पुरानी नसों में जंग लगने लगती है। वही चेहरे, वही नारे, वही वादे और वही कुर्सी की दौड़। देश की राजनीति आज कुछ ऐसी ही थकी हुई दिखाई देती है।

इधर एक अजीब-सी जेन-ज़ी मुहिम ने सबका ध्यान खींचा है। दावा किया जा रहा है कि “कॉकरोचों के नेतृत्व” में चल रही यह नई पीढ़ी की हलचल युवाओं की बेचैनी और बगावत का प्रतीक बन गई है। नाम भले ही मज़ाकिया हो, मगर सवाल गंभीर है। जब युवा अपनी बात कहने के लिए इतने अजीब प्रतीक खोज रहे हैं, तब हमारे कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में उनके अपने लोकतांत्रिक मंच आखिर कहाँ हैं?

जवाब साफ है: हमने छात्र राजनीति का दरवाज़ा ही बंद कर दिया।

छात्र संघ कभी विश्वविद्यालयों की जान हुआ करते थे। पढ़ाई के साथ बहस होती थी, चुनाव होते थे, भाषण होते थे, सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे। छात्र अपनी शिकायतें लेकर संगठित ढंग से प्रशासन के सामने जाते थे। नेतृत्व सीखते थे, हारना सीखते थे और जीत को संभालना भी सीखते थे।

आज हम चाहते हैं कि युवा सीधे आईएएस बनें, सीईओ बनें, वैज्ञानिक बनें और नेता भी बनें। मगर नेता बनने की नर्सरी बंद कर दी गई है। फिर हम शिकायत करते हैं कि राजनीति में अच्छे लोग क्यों नहीं आते। यह तो वही बात हुई: खेत को पानी न दो और फसल से शिकायत करो।

1960 के दशक में शिक्षा आयोग ने भी छात्र संघों को महत्वपूर्ण माना था। सोच यह थी कि संगठित छात्र गतिविधियाँ युवाओं में आत्म-अनुशासन, स्वशासन और नेतृत्व की भावना पैदा करती हैं। कई जगह छात्र संघ कैंटीन चलाते थे, सहकारी दुकानें संभालते थे और साहित्यिक व सांस्कृतिक कार्यक्रम कराते थे।

मतलब साफ था। विश्वविद्यालय केवल डिग्री बाँटने की फैक्टरी नहीं है। वह नागरिक तैयार करने की जगह भी है।

भारत के इतिहास में छात्र आंदोलनों ने कई बार राजनीति की दिशा बदल दी। 1965 का तमिलनाडु का हिंदी-विरोधी आंदोलन हो या 1974 का गुजरात का नवनिर्माण आंदोलन, छात्रों ने अपनी ताकत दिखाई। मामूली-सी मेस फीस बढ़ने से शुरू हुआ गुजरात का आंदोलन भ्रष्टाचार और महंगाई के खिलाफ बड़ा जनांदोलन बन गया।

बिहार में छात्र आंदोलन से जयप्रकाश नारायण की “संपूर्ण क्रांति” का नारा उठा। उसी दौर ने देश की राजनीति को झकझोर दिया। बाद में आपातकाल और 1977 के चुनावों ने भारतीय लोकतंत्र का नया अध्याय लिखा।

कई बड़े राष्ट्रीय नेता छात्र राजनीति की ही देन रहे हैं। अरुण जेटली ने दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति सीखी। लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार बिहार के छात्र आंदोलनों से उभरे। सीताराम येचुरी और प्रकाश करात ने जेएनयू की छात्र राजनीति में अपने कदम जमाए। ममता बनर्जी ने भी छात्र जीवन से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की।

नितिन गडकरी, राजनाथ सिंह और अशोक गहलोत जैसे अनेक नेताओं ने भी युवावस्था में संगठन और सार्वजनिक जीवन का अनुभव पाया।

आज सवाल यह है कि अगली पीढ़ी कहाँ से आएगी?

व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी से?

इंस्टाग्राम रील से?

या किसी “कॉकरोच आंदोलन” के वायरल मीम से?

युवा ऊर्जा को आप दबा सकते हैं, खत्म नहीं कर सकते। जब उसे लोकतांत्रिक रास्ता नहीं मिलता, वह किसी और रास्ते से बाहर आती है। कभी अचानक विरोध प्रदर्शन बनकर, कभी सोशल मीडिया के गुस्से में और कभी किसी अजीब प्रतीक के पीछे।

खाली जगह कभी खाली नहीं रहती। लोकतंत्र में भी नहीं।

छात्र संघों को खत्म करने का एक तर्क हमेशा दिया गया: हिंसा, गुटबाजी और बाहरी राजनीतिक दलों का दखल। यह बात पूरी तरह गलत नहीं थी। कई छात्र संघ सचमुच राजनीति के अखाड़े बन गए। पढ़ाई पीछे छूट गई और पोस्टरबाजी आगे आ गई। कैंपस में बहस की जगह कभी-कभी लाठी और धमकी ने ले ली।

मगर बीमारी के कारण मरीज को मार देना इलाज नहीं होता।

गलत छात्र राजनीति को सुधारना चाहिए था, छात्र राजनीति को दफन नहीं करना चाहिए था।

उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों और विश्वविद्यालयों में छात्र संघ चुनाव बंद या सीमित किए गए। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, लखनऊ विश्वविद्यालय और कई अन्य संस्थानों में निर्वाचित छात्र प्रतिनिधित्व कमजोर पड़ता गया या खत्म हो गया। प्रशासन ने शांति तो पा ली, मगर छात्रों की लोकतांत्रिक आवाज भी काफी हद तक खो गई।

अब हमें नई सोच के साथ छात्र संघों को वापस लाना चाहिए।

पुराने ढर्रे पर नहीं। नए संविधान और साफ नियमों के साथ।

छात्र संघों का मुख्य काम चुनावी राजनीति नहीं होना चाहिए। उनका ध्यान छात्रों की असली समस्याओं पर रहे: फीस, छात्रावास, पुस्तकालय, खेल, सुरक्षा, परिवहन और कैंपस सुविधाएँ। बहस, वाद-विवाद, सांस्कृतिक कार्यक्रम और खेलों को भी बढ़ावा दिया जाए।

हर चुने हुए छात्र प्रतिनिधि को नेतृत्व का प्रशिक्षण मिले। उसे बातचीत करना, बजट बनाना, विवाद सुलझाना और अलग राय रखने वालों को साथ लेकर चलना सिखाया जाए। चुनाव लड़ना आसान है, लोकतांत्रिक ढंग से काम करना मुश्किल है। यही हुनर सीखना जरूरी है।

विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्र प्रतिनिधियों की नियमित बैठकें हों। शिकायत सड़क पर पहुँचने से पहले बातचीत की मेज तक पहुँचे। अध्यापक मार्गदर्शन करें, मगर छात्रों की आवाज दबाएँ नहीं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राजनीति में नए लोगों की आमद का कोई विकल्प नहीं है। लोकतंत्र को हर पीढ़ी अपना नया नेतृत्व देती है। यदि युवाओं को कॉलेज में बोलने, बहस करने, हारने, जीतने और जिम्मेदारी लेने का मौका नहीं मिलेगा, तो राजनीति बूढ़ी होती जाएगी।

आज जेन-ज़ी अपनी भाषा खुद बना रही है। कभी मीम, कभी हैशटैग, कभी अजीबोगरीब प्रतीक और कभी “कॉकरोच” जैसा नाम। हमें इस पर केवल हँसना नहीं चाहिए। इसके पीछे छिपी बेचैनी को समझना चाहिए।

युवा कहना चाहते हैं: “हमें सुना जाए।”

कॉलेज और विश्वविद्यालय इस आवाज के लिए सबसे स्वाभाविक जगह हैं।

राजनीति को नया खून चाहिए। उसे किसी प्रयोगशाला से नहीं लाया जा सकता। वह कैंपस की बहसों, छात्र सभाओं, चुनावों और आंदोलनों से ही निकलेगा। छात्र संघ लोकतंत्र की वह पाठशाला हैं, जहाँ भविष्य के नेता पहली बार जनता का सामना करते हैं।

परीक्षा पास करने से नौकरी मिल सकती है। मगर समाज चलाने के लिए जिम्मेदारी, संवाद और नेतृत्व चाहिए।

इनकी कोई गाइडबुक नहीं होती।

इन्हें जीना पड़ता है।

छात्र संघों को फिर से जीवित कीजिए। उन्हें अनुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ चलाइए। बाहरी दलों की कठपुतली बनने से बचाइए। मगर युवाओं का लोकतांत्रिक मंच मत छीनिए।

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Saturday, August 8, 2026

 


कुर्सी जनता की, तिजोरी अपनी? 

भ्रष्ट अफसरशाही के लालच का कड़वा सच

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बृज खंडेलवाल द्वारा

10 अगस्त 2026

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दिल्ली के कोचिंग सेंटरों के बाहर खड़े युवाओं से पूछिए: क्या कर रहे हो? जवाब लगभग एक जैसा मिलेगा: “UPSC की तैयारी कर रहे हैं।”

क्यों?

“देश की सेवा करनी है। समाज बदलना है। संविधान की रक्षा करनी है।”

इरादे नेक हैं। सपने बड़े हैं। मगर कहानी का अगला अध्याय हमेशा इतना खूबसूरत नहीं होता।

कुर्सी मिलते ही कुछ लोगों की सेवा का दायरा बदल जाता है। देश पीछे छूट जाता है और खुद आगे आ जाता है।

सरकारी अफसर को तनख्वाह मिलती है। सरकारी मकान मिलता है। गाड़ी मिलती है। चिकित्सा सुविधा मिलती है। भत्ते मिलते हैं। रुतबा मिलता है। नौकरी के बाद पेंशन भी मिलती है।

तो फिर सवाल सीधा है; 

साहब को और क्या चाहिए?

यही सवाल उन अधिकारियों से पूछा जाना चाहिए जिन पर रिश्वत, कमीशन, सरकारी धन की हेराफेरी या पद के दुरुपयोग के आरोप लगते रहे हैं।

IAS और IPS कोई मामूली नौकरी नहीं है। UPSC की कठिन परीक्षा पास करके अधिकारी प्रशासन और शासन की सबसे ताकतवर गलियों तक पहुंचते हैं। उनके हाथ में फैसले होते हैं। फाइलें होती हैं। ठेके होते हैं। नीतियों को लागू करने की ताकत होती है।

कभी भारतीय नौकरशाही को “Steel Frame of India” कहा गया था।

लेकिन लोहे का फ्रेम भी जंग खा सकता है।

खतरा वहीं शुरू होता है जहां ताकत बहुत हो और निगरानी कम। विवेकाधिकार बड़ा हो और जवाबदेही छोटी। फाइल रोकने की ताकत हो, लेकिन जवाब देने की मजबूरी न हो।

फिर तनख्वाह कम नहीं पड़ती।

नीयत छोटी पड़ जाती है।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी भ्रष्टाचार के पीछे कई कारण गिनाते हैं: अत्यधिक विवेकाधिकार, पारदर्शिता की कमी, राजनीतिक-नौकरशाही गठजोड़, कमजोर जवाबदेही, धीमी न्याय प्रक्रिया, कम सजा दर और व्यक्तिगत लालच। इन सबके मेल से पद सेवा का माध्यम न रहकर निजी लाभ का जरिया बन सकता है।

भ्रष्टाचार के लिए अक्सर कम वेतन, महंगाई और आर्थिक मजबूरी का बहाना दिया जाता है। लेकिन वरिष्ठ नौकरशाहों के मामले में यह दलील ज्यादा दूर तक नहीं जाती।

जिस अधिकारी को सम्मानजनक वेतन, सरकारी आवास, वाहन, चिकित्सा सुविधा और दूसरी सुविधाएं मिल रही हों, उसके लिए रिश्वतखोरी को मजबूरी कहना जनता के जख्म पर नमक छिड़कना है।

सोशल एक्टिविस्ट पद्मिनी अय्यर इसे ज्यादा कड़वे अंदाज में कहती हैं:

“झोला लेकर सिस्टम में दाखिल होते हैं, ट्रकों का काफिला लेकर निजी महल के लिए विदा होते हैं।”

बात कड़वी है, लेकिन सवाल जरूरी है।

नाम बड़े हैं। मामले पुराने हैं। और पैटर्न बार-बार सामने आता है।

पूर्व कोयला सचिव एच.सी. गुप्ता को कोयला आवंटन से जुड़े कई मामलों में अदालत ने दोषी ठहराया। झारखंड की IAS अधिकारी पूजा सिंघल पर मनरेगा धन और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े गंभीर आरोप लगे। छत्तीसगढ़ के अनिल टुटेजा का नाम कथित शराब सिंडिकेट मामले में सामने आया।

हरियाणा में पंकज अग्रवाल और प्रदीप कुमार से जुड़े मामलों में बैंक फंड की कथित हेराफेरी और फर्जी दस्तावेजों के आरोप सामने आए। राजस्थान के सुबोध अग्रवाल का नाम जल जीवन मिशन की टेंडर प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं से जोड़ा गया। उत्तर प्रदेश के अभिषेक प्रकाश पर रिश्वत और कमीशन से जुड़े आरोप लगे। झारखंड के छवि रंजन भूमि से जुड़े मामलों में जांच के घेरे में आए।

इनमें से जहां अदालत का अंतिम फैसला नहीं आया है, वहां आरोप को दोषसिद्धि कहना नाइंसाफी होगी।

लेकिन सवाल फिर भी खड़ा होता है; 

आखिर इतने मामले क्यों सामने आते हैं?

क्या सरकारी कुर्सी सचमुच सेवा का माध्यम है?

या कुछ लोगों के लिए वह कमाई का सबसे सुरक्षित रास्ता बन चुकी है?

भ्रष्टाचार का कोई जेंडर नहीं होता

भ्रष्टाचार को भी अब जेंडर की नजर से देखने की जरूरत नहीं।

भ्रष्टाचार न पुरुष होता है, न महिला।

जिस तरह कोई पुरुष अधिकारी कानून तोड़ सकता है, उसी तरह महिला अधिकारी भी जांच और कानून के दायरे में आ सकती है। पूजा सिंघल का मामला इसका चर्चित उदाहरण है।

NEET-UG पेपर लीक की जांच में भी महिलाओं समेत कई लोगों के नाम सामने आए। कुछ विशेषज्ञों और अन्य आरोपियों पर प्रश्न याद करने, साझा करने या पैसे के बदले उपलब्ध कराने जैसे आरोप लगे।

संदेश साफ है:

ईमानदारी का कोई जेंडर नहीं। बेईमानी का भी नहीं।

हर भ्रष्टाचार कांड के बाद वही राजनीतिक तमाशा शुरू होता है।

विपक्ष कहता है: सरकार नाकाम है।

सरकार कहती है: हमने कार्रवाई की।

फिर प्रेस कॉन्फ्रेंस होती है। बयान आते हैं। जांच एजेंसियां सक्रिय होती हैं। गिरफ्तारियां होती हैं। चार्जशीट दाखिल होती है।

और उसके बाद?

मामला अदालत पहुंचता है।

फिर तारीख पर तारीख।

गिरफ्तारी खबर बन जाती है, लेकिन सजा इतिहास बन जाती है।

CBI और ED जैसी एजेंसियों ने भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामलों में जांच और कार्रवाई की है। राज्य सरकारों ने भी अधिकारियों को निलंबित किया और विभागीय जांच शुरू की।

लेकिन छापा, गिरफ्तारी या चार्जशीट अपने आप में भ्रष्टाचार का इलाज नहीं है।

अंतिम कसौटी अदालत का फैसला है।

और फैसला जितना देर से आएगा, व्यवस्था की कमजोरी पर भ्रष्टाचारी का भरोसा उतना ही बढ़ेगा।

सिर्फ वेतन बढ़ाने से भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा।

अधिकारी को अच्छा वेतन दीजिए। सम्मान दीजिए। सुविधाएं दीजिए। लेकिन अगर नीयत में खोट है, तो लालच का पेट कभी नहीं भरता।

लालच की कोई सैलरी स्लिप नहीं होती।

सरकारी अधिकारी जनता के पैसे और अधिकारों के रखवाले हैं। वे सरकारी कुर्सी के मालिक नहीं हैं। सरकारी पद निजी जागीर नहीं है।

इसलिए भ्रष्टाचार रोकना है तो सिर्फ भाषण नहीं, नतीजे चाहिए।

तेज सुनवाई चाहिए।

संपत्ति की सख्त जांच चाहिए।

फैसलों में पारदर्शिता चाहिए।

जहां जरूरत हो, विवेकाधिकार सीमित करना होगा।

और सबसे जरूरी: कानून की नजर में कोई बड़ा नहीं होना चाहिए।

न IAS।

न IPS।

न नेता।

न कोई रसूखदार।

कुर्सी चाहे कितनी भी ऊंची हो, कानून उससे ऊंचा होना चाहिए।

क्योंकि कुर्सी जनता देती है।

कुर्सी के साथ तिजोरी नहीं देती।

और जिस दिन अफसर यह फर्क भूल जाएगा, उसी दिन लोकसेवा, निजी सेवा में बदल जाएगी।

Friday, August 7, 2026

 


आरटीआई या रंगदारी का नया धंधा?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

8 अगस्त 2026

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सूचना का अधिकार कानून कभी भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार माना जाता था। इसे जनता की आंख और कान कहा गया। उम्मीद थी कि सरकारी फाइलों में छिपे सच बाहर आएंगे और अफसर जवाबदेह बनेंगे। लेकिन आज तस्वीर बदलती दिख रही है। कई जगह आरटीआई जनहित का नहीं, बल्कि निजी फायदे, ब्लैकमेल और उगाही का औजार बन चुकी है। कानून की आड़ में कुछ लोगों ने पूरा कारोबार खड़ा कर लिया है।

मैसूर विश्वविद्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम में कर्नाटक के पूर्व सूचना आयुक्त डॉ. एल. कृष्णमूर्ति ने इसी खतरे की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि फर्जी आरटीआई कार्यकर्ताओं की बढ़ती संख्या इस कानून की आत्मा को खत्म कर रही है। उनके अनुसार, जिस कानून ने 2जी जैसे बड़े घोटाले उजागर किए, उसी का इस्तेमाल अब सरकारी दफ्तरों को परेशान करने और बेवजह हजारों पन्नों की सूचनाएं मांगने में हो रहा है।

देशभर से सामने आए मामले इस चिंता को और बढ़ा रहे हैं।

हिमाचल प्रदेश के ऊना में एक स्वयंभू आरटीआई कार्यकर्ता पर आरोप लगा कि उसने पत्थर खदान संचालकों से 75 लाख रुपये की मांग की। आरटीआई से दस्तावेज जुटाए गए और फिर शिकायत करने की धमकी देकर रकम मांगी गई। सतर्कता विभाग ने जाल बिछाकर उसे पहली किश्त लेते हुए गिरफ्तार किया।

असम में दुलाल बोरा का मामला और भी चौंकाने वाला है। उस पर उगाही और धोखाधड़ी के दर्जनों मुकदमे दर्ज हुए। बताया गया कि उसने दो हजार से अधिक दूसरी अपीलें दायर कीं और कई बार एक ही दिन में सौ से ज्यादा आरटीआई आवेदन भेज दिए। आरोप था कि बाद में अधिकारियों और ठेकेदारों से पैसे लेकर मामलों को ठंडे बस्ते में डालने का खेल चलता था।

हरियाणा के गुरुग्राम में एक आरटीआई कार्यकर्ता और एक यूट्यूबर पर स्कूल प्रबंधन से लाखों रुपये की उगाही का आरोप लगा। पहले लगातार आरटीआई लगाई गईं, फिर अदालत और आयकर विभाग की कार्रवाई का डर दिखाया गया। अंत में शिकायतें वापस लेने के बदले मोटी रकम मांगी गई।

गुजरात के सूरत में तो यह पूरा नेटवर्क बन गया। पुलिस ने दर्जनों मुकदमे दर्ज किए। आरोप था कि कुछ लोग नगर निगम से भवनों की जानकारी आरटीआई के जरिए हासिल करते, फिर मापने वाली फीता लेकर खुद को निरीक्षक बताकर निर्माण स्थलों पर पहुंच जाते। बिल्डरों और मकान मालिकों को कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर हजारों से लेकर लाखों रुपये तक वसूले जाते।

आंध्र प्रदेश में दो लोगों पर सूचना आयोग ने आगे आरटीआई लगाने तक पर रोक लगा दी। आयोग ने पाया कि वे एक के बाद एक दर्जनों अपीलें और शिकायतें दायर कर सरकारी अधिकारियों को लगातार परेशान कर रहे थे। कई आवेदन वर्षों पुराने रिकॉर्ड मांगते थे, जिनका जनहित से कोई सीधा संबंध नहीं था।

तमिलनाडु के थेनी में एक व्यक्ति ने 781 आरटीआई आवेदन केवल जिला न्यायालय के खिलाफ दायर कर दिए। नतीजा यह हुआ कि सरकारी कामकाज प्रभावित होने लगा। सूचना आयोग ने उस पर जुर्माना लगाया और इसे कानून के खुले दुरुपयोग का मामला बताया।

यह केवल कुछ अलग-थलग घटनाएं नहीं हैं। इन मामलों का तरीका लगभग एक जैसा है। पहले आरटीआई डालो। फिर दस्तावेज जुटाओ। उसके बाद शिकायत, जांच या मीडिया में बदनामी का डर दिखाओ। आखिर में समझौते के नाम पर पैसे मांगो। कई जगह निजी दुश्मनी निकालने के लिए भी आरटीआई का इस्तेमाल किया गया। कहीं एक ही विषय पर सैकड़ों आवेदन भेजे गए, तो कहीं पूरे विभाग को कागजों के ढेर में दबा दिया गया।

सर्वोच्च न्यायालय भी कई बार ऐसी प्रवृत्ति पर चिंता जता चुका है। अदालत ने कहा कि आरटीआई का इस्तेमाल ईमानदार अधिकारियों को डराने या सरकारी कामकाज रोकने के लिए नहीं होना चाहिए। एक अन्य टिप्पणी में अदालत ने यहां तक कहा कि आरटीआई एक्टिविज्म कुछ मामलों में नया कारोबार बनता जा रहा है।

सबसे दुखद बात यह है कि ऐसे लोग खुद को समाजसेवी और भ्रष्टाचार विरोधी योद्धा बताकर कानून की साख को चोट पहुंचाते हैं। जनता का भरोसा कमजोर होता है। सरकारी दफ्तर हर आवेदक को शक की नजर से देखने लगते हैं। असली और नकली के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है।

आरटीआई कानून का जन्म जनता को ताकत देने के लिए हुआ था, लेकिन कुछ स्वार्थी तत्वों ने इसे दबाव, धमकी और वसूली के हथियार में बदलने की कोशिश की है। जब अधिकार की आड़ में कारोबार शुरू हो जाए, तो सबसे बड़ा नुकसान उसी कानून की विश्वसनीयता को होता है। आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि सूचना मांगने का अधिकार कहीं कुछ लोगों के लिए डर और सौदेबाजी का लाइसेंस तो नहीं बनता जा रहा।

Monday, August 3, 2026

 अंग दान, महा दान

बीस हज़ार नई ज़िंदगियाँ: अंगदान ने बदली भारत की तस्वीर

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

5 अगस्त 2026

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आगरा का सरोजिनी नायडू मेडिकल कॉलेज अब अंग प्रत्यारोपण सेवाओं के विस्तार की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। सुपर स्पेशियलिटी विंग में किडनी प्रत्यारोपण की सभी प्रमुख तैयारियां पूरी हो चुकी हैं और जल्द नियमित प्रत्यारोपण शुरू होने की उम्मीद है। यहां कॉर्निया प्रत्यारोपण की सुविधा पहले से उपलब्ध है, जबकि भविष्य में लिवर, हृदय और फेफड़ों के प्रत्यारोपण की भी योजना है। मेडिकल कॉलेज का एनाटॉमी विभाग देहदान (कैडवर डोनेशन) भी स्वीकार करता है। दान किए गए शरीरों का उपयोग एमबीबीएस और पीजी छात्रों के प्रशिक्षण, एनाटॉमी अध्ययन तथा सर्जिकल शिक्षा में किया जाता है। देहदान के लिए इच्छुक व्यक्ति एनाटॉमी विभाग में पंजीकरण करा सकते हैं।

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हाल ही में गुजरात में वंदे भारत एक्सप्रेस ने ग्रीन कॉरिडोर की मदद से जीवित हृदय समय पर पहुँचाकर इतिहास रचा।

एक परिवार अपने प्रियजन को हमेशा के लिए विदा कर रहा था। उसी समय, किसी दूसरे अस्पताल में एक मरीज नई जिंदगी की उम्मीद से ऑपरेशन थिएटर में ले जाया जा रहा था। एक घर का ग़म, दूसरे घर की खुशी बन गया। 

अंगदान की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि इंसान इस दुनिया से जाने के बाद भी कई लोगों की धड़कनों में ज़िंदा रह सकता है।

भारत ने वर्ष 2025 में अंग प्रत्यारोपण के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की। पहली बार देश में 20,138 अंग प्रत्यारोपण किए गए। यह पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 6-7 प्रतिशत अधिक है। वर्ष 2013 में यह संख्या केवल 4,990 थी। यानी एक दशक में अंग प्रत्यारोपण चार गुना से भी अधिक बढ़ गया। दिल्ली-एनसीआर सबसे आगे रहा, जहाँ 4,500 से अधिक प्रत्यारोपण हुए। इसके बाद तमिलनाडु, महाराष्ट्र, तेलंगाना और केरल का स्थान रहा। मृत्यु के बाद अंगदान करने वालों में तमिलनाडु ने फिर मिसाल पेश की। महाराष्ट्र, तेलंगाना और कर्नाटक भी इस दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं।

आज भारत जीवित दाताओं से अंग प्रत्यारोपण में दुनिया का अग्रणी देश है। कुल प्रत्यारोपण की संख्या के मामले में भारत अब केवल अमेरिका और चीन से पीछे है। यह उपलब्धि देश के डॉक्टरों, सर्जनों, नर्सों और स्वास्थ्यकर्मियों की मेहनत का नतीजा है। साथ ही, यह उन परिवारों की संवेदनशील सोच को भी सलाम है, जिन्होंने अपने दुःख के बीच किसी अनजान व्यक्ति को जीवन देने का फैसला किया।

एक दाता परिवार के सदस्य ने कहा, “हमारा बेटा तो चला गया, लेकिन उसकी किडनी और लीवर अब दो और परिवारों में धड़क रहे हैं। हमें लग रहा है कि वो अब भी कहीं ज़िंदा है।” एक लाभार्थी, जो कई साल से डायलिसिस पर था, भावुक होकर बोला, “जब डॉक्टर ने कहा कि अंग मिल गया है, तो लगता था जैसे मौत के मुँह से वापस लौट आया हूँ। अब मैं बच्चों के साथ खेल सकता हूँ। दाता परिवार का शुक्रिया अदा करने के शब्द नहीं हैं।”

विशेषज्ञ भी इस बदलाव को सराहते हैं। प्रसिद्ध ट्रांसप्लांट सर्जन  कहते हैं, “अंगदान सबसे बड़ा उपहार है। कृपया अपने अंग स्वर्ग न ले जाएँ; स्वर्ग को पता है कि हमें यहाँ उनकी ज़रूरत है।” 

राष्ट्रीय डिजिटल पोर्टल पर 2023 से अब तक पाँच लाख से अधिक लोगों ने अंगदान का संकल्प लिया है। ‘जुग-जुग जियो अभियान’, NOTTO मोबाइल ऐप और ‘वन नेशन, वन पॉलिसी’ ने प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया है। कई नए एम्स में किडनी और लीवर प्रत्यारोपण की सुविधाएँ बढ़ी हैं। 

फिर भी चुनौती बाकी है। हर साल लाखों मरीज अंगों की प्रतीक्षा में हैं। बहुत से लोग समय पर अंग न मिलने से जान गँवा देते हैं। 

यही कमी ग्रे मार्केट को बढ़ावा देती है। ग़रीबों से किडनी चुराकर या जबरदस्ती बेचने के मामले समय-समय पर सामने आते रहते हैं। दलाल ग़रीब किसानों, मजदूरों और कर्ज में डूबे लोगों को फुसलाते हैं। नकली रिश्ते, फर्जी दस्तावेज़ बनाकर अवैध प्रत्यारोपण कराए जाते हैं। महाराष्ट्र, तमिलनाडु, दिल्ली-एनसीआर और यहाँ तक कि बांग्लादेश-कम्बोडिया से जुड़े अंतरराष्ट्रीय रैकेट भी पकड़े गए हैं। ग़रीब दाता को थोड़े पैसे मिलते हैं, जबकि मरीज से लाखों वसूले जाते हैं। कई बार किडनी चुरा ली जाती है या धोखे से निकाल ली जाती है। यह काला व्यापार मानवीय गरिमा का घोर अपमान है।

कानून सख्त है, लेकिन जागरूकता और पारदर्शिता बढ़ाकर ही इस ग्रे मार्केट पर अंकुश लगाया जा सकता है। 

जब मृत्यु के बाद अंगदान समाज की स्वाभाविक संस्कृति बनेगी, तभी असली सफलता मिलेगी। आख़िरकार, इंसान की सबसे बड़ी विरासत उसकी दौलत नहीं, बल्कि वह जीवन है जो वह दूसरों को देकर जाता है। अंगदान सचमुच मृत्यु के बाद भी जीवन का सबसे सुंदर उत्सव है।