जब पूरा हिंदुस्तान गाता था: दूरदर्शन के यादगार विज्ञापन जिंगल
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बृज खंडेलवाल द्वारा
31 अगस्त 2026
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एक ज़माना था जब हिंदुस्तान में टीवी का मतलब दूरदर्शन था। चैनल एक था, बातचीत एक थी और शाम को पूरा परिवार एक ही कमरे में बैठकर टीवी देखता था।
रिमोट का आतंक नहीं था। मोबाइल की घंटी नहीं थी। रील्स और शॉर्ट्स नाम की कोई आफ़त नहीं थी। विज्ञापन आते थे तो लोग उठकर पानी लेने नहीं जाते थे। कई बार विज्ञापन ही कार्यक्रम से ज़्यादा याद रह जाते थे।
सत्तर से अस्सी और नब्बे के दशक, भारतीय टेलीविजन विज्ञापन का सुनहरा दौर था। केबल टीवी ने अभी दस्तक नहीं दी थी। इंटरनेट तो किसी साइंस-फिक्शन कहानी का हिस्सा लगता था।
विज्ञापन छोटे थे, मगर उनका असर लंबा था। धुन सीधी थी, बोल आसान थे और संदेश दिल में उतर जाता था। आज के करोड़ों रुपये वाले विज्ञापन देखकर कभी-कभी लगता है, तब विज्ञापन बनाए जाते थे, आज विज्ञापन बनाए जाते हैं ताकि विज्ञापन बनते हुए दिखाई दें!
आइए, उन दिनों के कुछ दिलचस्प, यादगार जिंगल याद करें।
निरमा — कानों में बस जाने वाला जिंगल
“Washing powder Nirma…”
इसके आगे किसी परिचय की जरूरत नहीं।
सफेद कपड़ों में घूमती लड़कियां, झाग और दूध जैसी सफेदी का दावा। निरमा का जिंगल घर-घर की धुन बन गया था।
मां गुनगुनाती थीं, बच्चे गुनगुनाते थे और पिताजी भी बोल भूलने का नाटक करते हुए पूरा जिंगल जानते थे।
निरमा ने साबित किया कि विज्ञापन में शेक्सपियर नहीं चाहिए। एक आसान धुन, कुछ सीधे शब्द और भरपूर दोहराव: बस, काम तमाम।
हमारा बजाज : मध्यमवर्ग का राष्ट्रगीत
“बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर, हमारा बजाज।”
यह सिर्फ स्कूटर का विज्ञापन नहीं था। यह उभरते हुए भारतीय मध्यमवर्ग का सपना था।
स्कूटर पर बच्चे, पत्नी, पति और कभी-कभी रिश्तेदार भी। वही स्कूटर दफ्तर जाता था, बच्चों को स्कूल छोड़ता था और रविवार को पूरा परिवार पिकनिक पर ले जाता था।
बजाज ने वाहन नहीं बेचा। उसने आकांक्षा बेची।
लिरिल : झरने के नीचे आज़ादी
“ला ला ला ला… लिरिल।”
झरना, झाग, ताजगी और बेफिक्री।
लिरिल ने साबुन को नहाने की चीज़ से उठाकर आज़ादी का प्रतीक बना दिया। नहाना अचानक एक रोमांचक अनुभव लगने लगा।
विज्ञापन ने साबुन कम बेचा, कल्पना ज्यादा बेची।
लाइफबॉय : सेहत की पहरेदारी
“तंदुरुस्ती की रक्षा करता है लाइफबॉय।”
लाइफबॉय का अंदाज़ सीधा था। बीमारी और कीटाणुओं के खिलाफ मोर्चा खोलो और साबुन का इस्तेमाल करो।
न कोई बड़ी फिल्मी कहानी, न लंबा भाषण। बस समस्या, समाधान और याद रह जाने वाली धुन।
विक्स: खिच-खिच का इलाज
“विक्स की गोली लो, खिच-खिच दूर करो।”
क्या शानदार सादगी थी!
गले में खिच-खिच हुई, विक्स की गोली आई और समस्या गई।
आज के विज्ञापन में पहले समस्या खोजी जाती है, फिर उपभोक्ता की मनोवैज्ञानिक प्रोफाइल बनाई जाती है और अंत में उत्पाद आता है। विक्स ने मामला दो पंक्तियों में निपटा दिया।
विको टर्मरिक : छह शब्दों की बाज़ीगरी
“Vicco Turmeric, नहीं cosmetic.”
बस छह शब्द।
परंपरा, आयुर्वेद और भारतीयता को आधुनिक विज्ञापन भाषा में पैक कर दिया गया।
पीली ट्यूब घर-घर पहचानी जाने लगी। आज भी उसका नाम सुनते ही पुराना दूरदर्शन सामने आ जाता है।
रसना : बचपन का स्वाद
“I love you, Rasna.”
रसना सिर्फ पेय नहीं था। वह गर्मियों की छुट्टियां थीं। घर में आए रिश्तेदार थे। रसोई में तैयार होता ठंडा शरबत था। बच्चों की खुशी थी।
उस छोटी-सी बच्ची की आवाज़ ने एक पाउडर को बचपन की याद बना दिया।
मैगी : “मम्मी, मैं भूखा हूं!”
मैगी ने भारतीय रसोई में समय की नई परिभाषा लिखी।
“Fast to cook, good to eat.”
बच्चा भूखा है। मां व्यस्त है। समाधान सामने है, दो मिनट की मैगी।
बाद में दो मिनट पर बहस हो सकती है। लेकिन भारतीय मां और बच्चे के बीच मैगी की दोस्ती पर बहस की जरूरत नहीं।
पान पराग : स्वागत में क्या है?
“पान पराग से स्वागत कीजिए।”
शम्मी कपूर, अशोक कुमार, बाराती और शादी का पूरा फिल्मी माहौल।
पान पराग ने भारतीय मेहमाननवाज़ी को विज्ञापन में बदल दिया। थोड़ा नाच, थोड़ा गाना, थोड़ा दिखावा और खूब सारा उत्सव।
भारतीय शादी में जितना ड्रामा होता है, विज्ञापन ने उतना ही स्क्रीन पर डाल दिया।
ओनिडा : पड़ोसी की जलन
“Neighbour’s envy, owner’s pride.”
और वह शैतान!
ओनिडा ने टीवी को मनोरंजन के साधन से उठाकर प्रतिष्ठा का प्रतीक बना दिया।
आपके घर में टीवी है? तो पड़ोसी को जलना चाहिए!
यह उस बदलते भारत की निशानी थी, जहां उपभोक्तावाद धीरे-धीरे दरवाजे पर दस्तक दे रहा था।
और भी बहुत कुछ था
लिज्जत पापड़ का “कुर्रम कुर्रम”, अमूल के चुटीले विज्ञापन, बजाज के भावुक अभियान और सबसे बढ़कर “मिले सुर मेरा तुम्हारा”, ये सब सिर्फ विज्ञापन नहीं थे। ये उस दौर की सामूहिक याददाश्त का हिस्सा थे।
पियूष पांडे, प्रह्लाद कक्कड़ और कई दूसरे रचनात्मक लोगों ने भारतीय विज्ञापन को एक अलग ज़बान दी। उसमें हास्य था, भावना थी, संगीत था और सबसे बड़ी बात, भारतीय मिट्टी की खुशबू थी।
आज विज्ञापन की दुनिया बहुत बड़ी हो गई है। टीवी के साथ यूट्यूब, इंस्टाग्राम, फेसबुक, रील्स और शॉर्ट्स की पूरी फौज खड़ी है।
ध्यान की अवधि घट गई है। हर कोई अगले तीन सेकंड में दर्शक को पकड़ लेना चाहता है। रचनात्मकता भी जैसे इंस्टेंट नूडल बन गई है, डालो, पकाओ और भूल जाओ।
आज का मोबाइल वह नया घरेलू तानाशाह है, जिसके सामने पूरा परिवार अलग-अलग स्क्रीन पर झुका बैठा है। रील्स और शॉर्ट्स हमारी जेबों में ऐसे घुस आए हैं जैसे बरसात में कॉकरोच।
शोर ज्यादा है। सनसनी ज्यादा है। उत्तेजना ज्यादा है। लेकिन याद रहने वाली रचनात्मकता शायद कम है।
तब एक जिंगल सालों चलता था। आज कई विज्ञापन एक सप्ताह में कूड़ेदान में चले जाते हैं।
शायद हमें दूरदर्शन के विज्ञापन नहीं, वह हिंदुस्तान याद आता है जो उनके साथ जुड़ा था।
एक चैनल था।
एक ड्राइंग रूम था।
पूरा परिवार था।
एक जिंगल बजता था।
और देखते-देखते पूरा हिंदुस्तान गाने लगता था:
“वॉशिंग पाउडर निरमा…”
क्या वह सचमुच बेहतर दौर था?
शायद नहीं।
लेकिन यकीनन वह ज्यादा अपना था।
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