Saturday, August 1, 2026

 


ताज ट्रेपेज़ियम ज़ोन में उद्योगों को अनुमति देने में जल्दबाज़ी न हो।

______________________

बृज खंडेलवाल द्वारा 

2 अगस्त 2026

_________________________

क्या हम ताजमहल को बचा रहे हैं, या धीरे-धीरे उसे धूल, धुंध और धुएँ में दफ़न कर रहे हैं?

आगरा की हवा साल के अधिकांश दिनों में ज़हरीली बनी रहती है। हर दिन उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम जाने वाले हज़ारों ट्रक, डंपर, बसें और भारी वाहन इस शहर की साँसों पर नया बोझ डालते हैं। यमुना और उसकी सहायक नदियाँ सूख रही हैं, तालाब और झीलें ग़ायब हो चुके हैं, पेड़ों की हरियाली सिमटती जा रही है और सड़कों पर बेकाबू ट्रैफिक दम घोंट रहा है। ऐसे नाज़ुक हालात में ताज ट्रेपेज़ियम ज़ोन में नए उद्योगों को अनुमति देने से पहले उसके हर फ़ायदे और हर संभावित नुक़सान का बेहद गहराई और वैज्ञानिक नज़रिए से आकलन करना ज़रूरी है। कहीं ऐसा न हो कि आज का छोटा-सा फ़ैसला आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बड़ी पर्यावरणीय त्रासदी बन जाए।

___________________________

ताज महल के आसपास के संरक्षित क्षेत्र TTZ (लगभग 10,400 वर्ग किमी, जिसमें आगरा और आसपास के जिले शामिल हैं) में 1990 के दशक की शुरुआत से वाहनों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। 1990 के आसपास या 1990 के दशक के मध्य-अंत में आगरा क्षेत्र में लगभग 1.9–2.1 लाख वाहन थे। 2026 के मध्य तक आगरा जिले में निजी वाहनों की संख्या लगभग 8.5 लाख पहुँच गई है (एक आधिकारिक रिपोर्ट में आगरा आरटीओ का कुल आँकड़ा करीब 16.9 लाख बताया गया है)। यह लगभग 35 वर्षों में 4 से 8 गुना या उससे भी अधिक की वृद्धि है।

स्थानीय वाहनों की यह वृद्धि पारगमन यातायात से और बढ़ जाती है। आगरा यमुना एक्सप्रेसवे (रोज़ाना 50,000 से अधिक वाहन) और आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे (2020 से 2025 के बीच दैनिक यातायात लगभग दोगुना) जैसे प्रमुख मार्गों पर स्थित है। राष्ट्रीय राजमार्गों और एक्सप्रेसवे कनेक्शनों से भी हज़ारों ट्रक, पर्यटक बसें और कारें गुज़रती रहती हैं। स्थानीय वाहनों और बढ़ते पारगमन/पर्यटक यातायात से ज़ोन के अंदर वाहन-किलोमीटर लगातार बढ़ रहे हैं। वाहनों की इतनी बड़ी वृद्धि ने कई उपलब्धियों को बेअसर कर दिया है, जिससे प्रदूषण स्तर सुरक्षित सीमा तक  नहीं आ पा रहा। अध्ययन और आधिकारिक आकलन बार-बार वाहनों (स्थानीय + पारगमन) को ताजमहल और पूरे TTZ के लिए हवा की गुणवत्ता की समस्या का प्रमुख कारण बताते हैं। “वाहन विस्फोट” अभी भी प्रदूषण की चुनौती को बनाए रखे हुए है।

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में 2024 में लगाए गए पूर्ण प्रतिबंध में कुछ राहत देते हुए ताज ट्रेपेज़ियम ज़ोन (TTZ) में लगभग 400 लंबित गैर-प्रदूषणकारी सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों (एमएसएमई) के आवेदनों पर विचार करने की इजाज़त दी है। लेकिन इसे उद्योगों के लिए खुला निमंत्रण नहीं समझना चाहिए। अदालत ने रोज़गार और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है। हर आवेदन को नीरी (NEERI) और केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (CEC) के विशेषज्ञों की सर्वसम्मति से मंज़ूरी लेनी होगी। किसी विवाद की स्थिति में अंतिम फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट करेगा। इसके बावजूद भविष्य में किसी भी तरह की और ढील बेहद एहतियात के साथ ही दी जानी चाहिए। इस पूरे क्षेत्र की हवा अब भी चिंताजनक है और पर्यावरण पर मंडरा रहे खतरे अभी टले नहीं हैं।

साल 1996 में सुप्रीम कोर्ट ने कोयला और कोक से चलने वाले सैकड़ों उद्योगों, खासकर फाउंड्रियों, को प्राकृतिक गैस अपनाने या बंद करने का आदेश दिया था। उस समय सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) का स्तर 17 से 22 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था और हवा में धूल-कण (SPM) 400 से 750 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुँच जाते थे। यही प्रदूषण ताजमहल के संगमरमर को पीला कर रहा था और अम्लीय वर्षा का कारण बन रहा था।

अदालत के उस फैसले से बड़ा फ़ायदा हुआ। सल्फर डाइऑक्साइड का स्तर घटकर 4 से 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रह गया। नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO₂) में भी कमी आई। इससे ताजमहल को सबसे ज़्यादा नुकसान पहुँचाने वाली जहरीली गैसों से काफी हद तक राहत मिली।

लेकिन पूरी तस्वीर अभी भी तसल्लीबख्श नहीं है। हवा में मौजूद बारीक धूल-कण अब भी बेहद ज़्यादा हैं। पीएम-10 (PM₁₀) का स्तर कई स्थानों पर 120 से 180 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर या उससे भी अधिक दर्ज किया जाता है, जबकि संवेदनशील क्षेत्रों के लिए तय सीमा केवल 60 है। पीएम-2.5 (PM₂.₅) का वार्षिक औसत भी अक्सर 80 से 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर या उससे अधिक रहता है। सर्दियों में यह और खतरनाक हो जाता है। मानसून में वायु गुणवत्ता कभी-कभी सामान्य रहती है, लेकिन सर्दियों में अक्सर "खराब", "बहुत खराब" या "गंभीर" श्रेणी में पहुँच जाती है। यही बारीक धूल ताजमहल पर जमती है और लोगों की सेहत पर भी बुरा असर डालती है। पिछले तीस वर्षों में सुधार तो हुआ है, लेकिन मंज़िल अभी दूर है।

इस लगातार बने हुए प्रदूषण का कारण केवल उद्योग नहीं हैं। इसके पीछे कई गहरे पर्यावरणीय संकट भी हैं। यमुना नदी लगभग सूख चुकी है और उसका पानी बुरी तरह प्रदूषित है। नदी अब वह नमी और ठंडक नहीं दे पाती, जो कभी ताजमहल के आसपास का प्राकृतिक वातावरण बनाए रखती थी। आसपास की ज़मीन तेज़ी से बंजर होती जा रही है। मिट्टी का कटाव बढ़ रहा है और हरियाली लगातार घट रही है। ज़िले के कुछ हिस्सों में हरित क्षेत्र केवल लगभग 7 प्रतिशत रह गया है। पेड़-पौधे कम होने से धूल को रोकने की प्राकृतिक क्षमता घट गई है। सड़कों की धूल, निर्माण कार्य, छोटे उद्योग, वाहनों का धुआँ और दूसरे राज्यों में पराली व बायोमास जलाने का धुआँ भी इस संकट को और बढ़ा रहा है।

ऐसी हालत में पूरे टीटीज़ेड को उद्योगों के लिए और खोलना, चाहे वे "गैर-प्रदूषणकारी" ही क्यों न हों, ख़तरे से खाली नहीं है। अभी तक इस क्षेत्र की पर्यावरणीय वहन क्षमता (Carrying Capacity) का पूरा अध्ययन भी नहीं हुआ है और लंबे समय से लंबित विज़न डॉक्यूमेंट भी तैयार नहीं हो पाया है। एक बार उद्योग लग जाने के बाद ईंधन और उत्सर्जन के नियमों का सख़्ती से पालन कराना हमेशा आसान नहीं रहा है। नए उद्योगों से यातायात, निर्माण और ऊर्जा की माँग बढ़ेगी, जिससे अब तक मिले पर्यावरणीय लाभ कमज़ोर पड़ सकते हैं।

इसलिए आगे बढ़ने का रास्ता बेहद सोच-समझकर तय करना होगा। केवल उन्हीं व्हाइट और ग्रीन श्रेणी के एमएसएमई को अनुमति मिले, जो बिजली या प्राकृतिक गैस का उपयोग करें और जिनकी हर आवेदन पर विशेषज्ञों द्वारा अलग-अलग गहराई से जाँच हो। पूरी प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए।

इसके साथ-साथ यमुना में पर्याप्त स्वच्छ जल प्रवाह बहाल करना, बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण करना, मिट्टी संरक्षण के उपाय अपनाना, सड़कों की धूल और वाहनों से होने वाले प्रदूषण पर सख़्त नियंत्रण रखना तथा वायु गुणवत्ता की लगातार निगरानी कर उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक करना भी उतना ही ज़रूरी है। जब तक हवा में धूल-कणों का स्तर लगातार और स्पष्ट रूप से कम न हो जाए तथा क्षेत्र की पर्यावरणीय क्षमता मज़बूत न हो जाए, तब तक उद्योगों के लिए और छूट देने पर विचार नहीं किया जाना चाहिए।

ताजमहल केवल एक इमारत नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के पर्यावरण की सेहत का आईना है। 1996 में सुप्रीम कोर्ट ने साबित किया था कि सख़्त नियमों से प्रदूषण पर काबू पाया जा सकता है। 

No comments:

Post a Comment