बारह साल बाद भी अधूरी तस्वीर!
क्या यही है 'नया भारत' का सपना, या सिर्फ़ नारों का शोर?
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बृज खंडेलवाल द्वारा
31 जुलाई 2026
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क्या सिर्फ़ चमचमाती सड़कें, ऊँची इमारतें और डिजिटल ऐप्स ही किसी देश की तरक्की का पैमाना हैं? अगर चुनाव पैसे के दम पर लड़े जाएँ, अदालतों में इंसाफ़ वर्षों तक अटका रहे, सरकारी स्कूल कमज़ोर होते जाएँ, पुलिस पर भरोसा घटता जाए और इलाज जेब खाली कर दे, तो क्या सचमुच हम "नए भारत" की मंज़िल पर पहुँच गए हैं?
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार को सत्ता में आए अब बारह साल हो चुके हैं। इस दौरान बड़े-बड़े वादे हुए, कई उपलब्धियाँ भी मिलीं। सड़कों, डिजिटल सेवाओं, आधारभूत ढाँचे और कल्याणकारी योजनाओं में उल्लेखनीय प्रगति हुई। लेकिन देश के बुनियादी संस्थानों की हालत पर नज़र डालें तो तस्वीर उतनी रोशन नहीं दिखती। कई पुराने मसले आज भी जस के तस हैं, बल्कि कुछ और पेचीदा हो गए हैं। इनका असर सीधे करोड़ों आम नागरिकों की ज़िंदगी पर पड़ता है।
सबसे बड़ा अधूरा काम चुनाव सुधार है। वर्षों से अदालतें, चुनाव विशेषज्ञ और कई समितियाँ राजनीतिक व्यवस्था में सुधार की सिफारिश करती रही हैं। फिर भी राजनीति में धनबल और बाहुबल का दबदबा कम नहीं हुआ।
2024 के लोकसभा चुनाव में चुने गए लगभग 46 प्रतिशत सांसदों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज थे। इनमें से करीब एक-तिहाई मामलों में हत्या, बलात्कार और अपहरण जैसे गंभीर आरोप शामिल थे। औसतन हर सांसद की घोषित संपत्ति लगभग 38 करोड़ रुपये रही। चुनावी खर्च का अनुमान करीब एक लाख करोड़ रुपये लगाया गया। वहीं एजेंसियों ने 8,800 करोड़ रुपये से अधिक नकदी और अन्य प्रलोभन जब्त किए। यह तस्वीर लोकतंत्र के लिए कई सवाल खड़े करती है।
2017 में शुरू की गई इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को पारदर्शिता बढ़ाने का उपाय बताया गया था। लेकिन 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने इसे असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया। तब तक लगभग दो अरब डॉलर के बराबर चंदा इस व्यवस्था से गुजर चुका था, जिसका बड़ा हिस्सा सत्तारूढ़ दल को मिला। आज भी चुनावों के लिए सरकारी फंडिंग नहीं है, राजनीतिक दलों के खर्च पर प्रभावी सीमा नहीं है और कमजोर जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने जैसी व्यवस्था मौजूद नहीं है। वोटर सूची से नाम हटाने के आरोप भी बार-बार सामने आते हैं। कुल मिलाकर चुनाव जीतना, ईमानदारी से अधिक अहम है।
शिक्षा के क्षेत्र में भी देश दो हिस्सों में बँटता जा रहा है। एक ओर महँगे निजी स्कूल हैं, दूसरी ओर लगातार कमजोर होते सरकारी विद्यालय। पिछले दस वर्षों में लगभग 90 हजार सरकारी स्कूल बंद हुए, यानी औसतन हर दिन करीब 25 स्कूल। उधर निजी स्कूलों की संख्या लगातार बढ़ती रही।
आज सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आते हैं। यानी कमज़ोर शिक्षा व्यवस्था का सबसे बड़ा बोझ उन्हीं पर पड़ रहा है जिनके पास विकल्प सबसे कम हैं।
देश में शिक्षा के कई अलग-अलग ढाँचे हैं; सीबीएसई, राज्य बोर्ड, अंतरराष्ट्रीय पाठ्यक्रम, मदरसे और पंचायत स्कूल। लेकिन सबके लिए एक समान गुणवत्ता मानक नहीं है। भाषा नीति पर विवाद जारी है। स्वतंत्र सर्वेक्षण बताते हैं कि बड़ी संख्या में बच्चे बुनियादी पढ़ाई और गणित में भी अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँच पा रहे हैं। नई शिक्षा नीति ने बड़े बदलावों का वादा किया था, लेकिन अमीर और गरीब की शिक्षा के बीच की खाई और चौड़ी हो गई है।
भ्रष्टाचार खत्म नहीं हुआ, बल्कि उसका अंदाज़ बदल गया है। रोजमर्रा के सरकारी कामों में रिश्वत की शिकायतें अब भी आम हैं। अक्सर आरोप लगते हैं कि कंपनियाँ राजनीतिक दलों को चंदा देती हैं और बाद में सरकारी ठेके हासिल कर लेती हैं। कुछ उद्योगों, खासकर खनन और दवा क्षेत्र में, नियामक संस्थाओं की निष्पक्षता पर भी सवाल उठते रहे हैं।
राजनीतिक गलियारों में "वॉशिंग मशीन" शब्द भी खूब चर्चा में रहा। विपक्ष के जिन नेताओं पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप थे, वे सत्ता पक्ष में शामिल होते ही कानूनी दबाव से राहत पाते दिखाई दिए। उच्च स्तर के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए बना लोकपाल भी अब तक अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ पाया है।
न्यायपालिका की हालत भी चिंताजनक है। देशभर की अदालतों में 5.6 करोड़ से अधिक मुकदमे लंबित हैं। इनमें से लगभग पाँच करोड़ मामले जिला अदालतों में हैं। कई उच्च न्यायालयों में दस-दस वर्षों से मुकदमे लंबित पड़े हैं। बड़ी संख्या में न्यायाधीशों के पद खाली हैं। आम नागरिक इंसाफ़ के इंतज़ार में बूढ़ा हो जाता है, जबकि प्रभावशाली लोग लंबी कानूनी प्रक्रिया का बोझ आसानी से झेल लेते हैं।
पुलिस व्यवस्था भी आज़ादी के डेढ़ सौ साल पुराने ढाँचे पर टिकी हुई है। अधिकांश राज्यों में अब भी 1861 के पुलिस कानून की सोच हावी है। पुलिस बल में बड़ी संख्या में पद खाली हैं। राजनीतिक दखल, हिरासत में हिंसा और पक्षपातपूर्ण कार्रवाई की शिकायतें लगातार आती रहती हैं। 2006 में सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस सुधार के कई निर्देश दिए थे, लेकिन अधिकांश आज भी अधूरे हैं।
स्वास्थ्य व्यवस्था में भी कई कमियाँ बनी हुई हैं। दवाओं की कीमतों में पारदर्शिता नहीं है। निजी अस्पताल अक्सर दवाओं और जाँचों के लिए वास्तविक लागत से कई गुना अधिक शुल्क वसूलते हैं। आयुष्मान भारत योजना में फर्जीवाड़े के कारण हजारों अस्पतालों पर कार्रवाई करनी पड़ी। मिलावटी दवाओं से बच्चों की मौत जैसी घटनाओं ने भी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। सरकारी अस्पतालों में संसाधनों की कमी और मरीजों की परेशानी आज भी जारी है।
इन सभी समस्याओं को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। ये मिलकर उस फ़ासले की कहानी कहती हैं जो बड़े वादों और ज़मीनी हकीकत के बीच मौजूद है। चुनाव सुधार, बेहतर शिक्षा, ईमानदार प्रशासन, तेज़ न्याय, आधुनिक पुलिस व्यवस्था और भरोसेमंद स्वास्थ्य सेवाएँ आज भी अधूरा एजेंडा हैं।
यह भी सच है कि पिछले दशक में भारत ने बुनियादी ढाँचे, डिजिटल तकनीक और कल्याणकारी योजनाओं में उल्लेखनीय प्रगति की है। लेकिन कोई भी राष्ट्र केवल एक्सप्रेसवे, ऐप्स और ऊँची इमारतों से महान नहीं बनता। उसकी असली ताकत इस बात से तय होती है कि वह आम आदमी की रोज़मर्रा की परेशानियों को कितनी ईमानदारी से हल करता है।
आज भी छह बड़े सवाल देश के सामने खड़े हैं:
बेरोज़गारी, किसानों की बदहाली, महँगाई, पर्यावरण संकट, शिक्षा और स्वास्थ्य की असमानता, तथा सामाजिक सौहार्द को मजबूत करना। करोड़ों युवा अच्छी नौकरियों की तलाश में हैं। किसान अनिश्चित आमदनी से जूझ रहे हैं। महँगाई हर परिवार का बजट बिगाड़ रही है। हवा और पानी का प्रदूषण लोगों की सेहत पर हमला कर रहा है। समाज में बढ़ती दूरियाँ लोकतंत्र को भी कमज़ोर करती हैं।
सरकार की आलोचना करना देश-विरोध नहीं है। एक मज़बूत लोकतंत्र में रचनात्मक आलोचना ही बेहतर शासन की बुनियाद होती है। किसी भी सरकार की सबसे बड़ी कामयाबी केवल उपलब्धियाँ गिनाने में नहीं, बल्कि अपनी कमियों को स्वीकार कर उन्हें दूर करने में होती है। भारत को ऐसा विकास चाहिए जो सबको साथ लेकर चले, टिकाऊ हो और हर नागरिक तक उसका लाभ पहुँचे।
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