बिना मरीज के डॉक्टर!!!
शोध के कुली: नाम के आगे 'डॉ.' लगाने की दौड़ या ज्ञान की तलाश?
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बृज खंडेलवाल द्वारा
20 जुलाई, 2026
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आजकल भारत में पीएचडी की बड़ी धूम है। हर साल करीब 30 से 35 हजार लोग डॉक्टरेट की डिग्री हासिल कर रहे हैं। विश्वविद्यालयों में शोधार्थियों (रिसर्च स्कॉलरों) की संख्या साढ़े तीन लाख के आसपास पहुँच चुकी है। कागज़ पर यह तस्वीर बहुत शानदार दिखती है। लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और ही कहानी सुनाती है।
पीएचडी का मक़सद नए विचार पैदा करना, देश की समस्याओं का हल ढूँढ़ना और समाज को आगे बढ़ाना था। अफ़सोस, कई जगह यह डिग्री सिर्फ़ नाम के आगे "डॉ." लगाने का ज़रिया बनकर रह गई है। ज्ञान की जगह दिखावा, गुणवत्ता की जगह संख्या और मौलिक सोच की जगह औपचारिकता ने ले ली है।
आज कई शोधार्थी खुद को शोधकर्ता नहीं, बल्कि "रिसर्च कुली" महसूस करते हैं। वे वर्षों तक मेहनत करते हैं, लेकिन सम्मान, मार्गदर्शन और सुरक्षा के बजाय उन्हें दबाव, अनिश्चितता और शोषण का सामना करना पड़ता है।
सबसे बड़ी बीमारी है "छापो या मिट जाओ" की संस्कृति। विश्वविद्यालयों और शिक्षकों के मूल्यांकन में शोध-पत्रों की संख्या को बहुत अहमियत दी जाती है। नतीजा यह हुआ कि अच्छी रिसर्च करने के बजाय ज़्यादा से ज़्यादा शोध-पत्र छापने की होड़ मच गई।
इस होड़ ने एक पूरा कारोबार खड़ा कर दिया है। पैसे देकर शोध-पत्र लिखवाना, नकली या घटिया पत्रिकाओं में उन्हें छपवाना और एक ही शोध को कई हिस्सों में बाँटकर अलग-अलग प्रकाशित करना आम बात बन गई है। ऐसे कई शोध-पत्र बाद में वापस भी लेने पड़े। इससे भारतीय शोध की साख पर सवाल उठे हैं।
दुख की बात यह है कि इन शोधों का बड़ा हिस्सा न उद्योग के काम आता है, न किसानों के, न अस्पतालों के और न समाज के। वे सिर्फ़ विश्वविद्यालय की अलमारी या ऑनलाइन भंडार में धूल खाते रहते हैं।
एक और बड़ी समस्या है शोध-निर्देशक और शोधार्थी के बीच असमान ताक़त का रिश्ता। कई जगह मार्गदर्शक (गाइड) छात्रों पर इतना नियंत्रण रखते हैं कि उनका भविष्य पूरी तरह उन्हीं के हाथ में होता है।
कई संस्थानों से शिकायतें सामने आई हैं कि शोधार्थियों से निजी काम कराए जाते हैं। किसी से गाड़ी चलवाई जाती है, किसी से घरेलू काम करवाए जाते हैं। कई बार सेक्सुअल हरासमेंट की खबरें भी आई हैं। कहीं थीसिस पास कराने के बदले महंगे तोहफ़ों या नक़द की माँग तक के आरोप लगे। जो छात्र विरोध करे, उसकी थीसिस महीनों या वर्षों तक अटक सकती है। यह रिश्ता गुरु-शिष्य का कम और मालिक-मज़दूर का ज़्यादा लगता है।
देश के बड़े और प्रतिष्ठित संस्थान भी इस बीमारी से पूरी तरह अछूते नहीं हैं। लंबे कार्य घंटे, सप्ताह में सत्तर-अस्सी घंटे लैब में रहने का दबाव और लगातार प्रदर्शन साबित करने की मजबूरी ने अनेक शोधार्थियों को मानसिक तनाव की तरफ़ धकेला है।
पीएचडी का सफ़र वैसे ही आसान नहीं होता। कम छात्रवृत्ति, भविष्य की अनिश्चितता, अकेलापन और लगातार दबाव कई छात्रों को चिंता और अवसाद की ओर ले जाता है। बहुत-से विश्वविद्यालयों में मानसिक स्वास्थ्य की समुचित सुविधा भी उपलब्ध नहीं है।
डिग्री पूरी होने के बाद भी तस्वीर बहुत उत्साहजनक नहीं है। हर साल हज़ारों नए पीएचडी धारक नौकरी की तलाश में निकलते हैं। लेकिन विश्वविद्यालयों में स्थायी पद सीमित हैं और उद्योग जगत अभी भी शोधकर्ताओं का पूरा उपयोग नहीं कर पा रहा है।
नतीजा यह होता है कि अनेक पीएचडी धारक अतिथि शिक्षक, अस्थायी व्याख्याता या अपनी योग्यता से बिल्कुल अलग काम करने को मजबूर हो जाते हैं। वर्षों की मेहनत के बाद भी उन्हें वह सम्मान और अवसर नहीं मिलता जिसकी उन्होंने उम्मीद की थी।
भारत में पेटेंट की संख्या बढ़ी है, लेकिन उनमें से बहुत कम तकनीक बाज़ार तक पहुँच पाती है। कुछ आईआईटी, आईआईएससी और चुनिंदा संस्थानों को छोड़ दें, तो अधिकांश विश्वविद्यालयों का शोध प्रयोगशाला से बाहर निकल ही नहीं पाता। उसका लाभ न उद्योग को मिलता है और न आम नागरिक को।
यही वजह है कि डिग्रियाँ बढ़ रही हैं, लेकिन नवाचार (इनोवेशन) उसी रफ़्तार से नहीं बढ़ रहा। शोध का उद्देश्य समस्या का समाधान होना चाहिए, केवल शोध-पत्रों की गिनती नहीं।
सरकार ने अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फ़ाउंडेशन (एएनआरएफ), उद्योग से जुड़े पीएचडी कार्यक्रम और बेहतर वित्तीय सहायता जैसी कई पहल शुरू की हैं। ये अच्छी शुरुआत हैं, लेकिन पूरे तंत्र को बदलने के लिए अभी लंबा सफ़र तय करना बाकी है।
ज़रूरत इस बात की है कि शोध-निर्देशकों की जवाबदेही तय हो, छात्रों को सम्मानजनक माहौल मिले, मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान दिया जाए और विश्वविद्यालयों तथा उद्योगों के बीच मज़बूत साझेदारी बने। सबसे ज़रूरी यह है कि शोध का लक्ष्य देश की असली समस्याओं का हल निकालना हो।
भारत को केवल आँकड़ों में सबसे ज़्यादा पीएचडी नहीं चाहिए। देश को ऐसे शोध चाहिए जो खेतों की पैदावार बढ़ाएँ, अस्पतालों को बेहतर बनाएँ, कारखानों को नई तकनीक दें, रोज़गार पैदा करें और लोगों का जीवन आसान बनाएँ।
जब तक पीएचडी केवल प्रतिष्ठा (शोहरत) का तमगा बनी रहेगी, तब तक शोधार्थी ज्ञान के निर्माता नहीं, बल्कि व्यवस्था के "शोध के कुली" बने रहेंगे। डिग्री की असली कीमत उसके काग़ज़ में नहीं, बल्कि उससे पैदा होने वाले बदलाव में होती है। वही बदलाव भारत की सबसे बड़ी ज़रूरत है।
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