Friday, July 31, 2026

 बारह साल बाद भी अधूरी तस्वीर!

क्या यही है 'नया भारत' का सपना, या सिर्फ़ नारों का शोर?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

31 जुलाई 2026

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क्या सिर्फ़ चमचमाती सड़कें, ऊँची इमारतें और डिजिटल ऐप्स ही किसी देश की तरक्की का पैमाना हैं? अगर चुनाव पैसे के दम पर लड़े जाएँ, अदालतों में इंसाफ़ वर्षों तक अटका रहे, सरकारी स्कूल कमज़ोर होते जाएँ, पुलिस पर भरोसा घटता जाए और इलाज जेब खाली कर दे, तो क्या सचमुच हम "नए भारत" की मंज़िल पर पहुँच गए हैं?

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार को सत्ता में आए अब बारह साल हो चुके हैं। इस दौरान बड़े-बड़े वादे हुए, कई उपलब्धियाँ भी मिलीं। सड़कों, डिजिटल सेवाओं, आधारभूत ढाँचे और कल्याणकारी योजनाओं में उल्लेखनीय प्रगति हुई। लेकिन देश के बुनियादी संस्थानों की हालत पर नज़र डालें तो तस्वीर उतनी रोशन नहीं दिखती। कई पुराने मसले आज भी जस के तस हैं, बल्कि कुछ और पेचीदा हो गए हैं। इनका असर सीधे करोड़ों आम नागरिकों की ज़िंदगी पर पड़ता है।

सबसे बड़ा अधूरा काम चुनाव सुधार है। वर्षों से अदालतें, चुनाव विशेषज्ञ और कई समितियाँ राजनीतिक व्यवस्था में सुधार की सिफारिश करती रही हैं। फिर भी राजनीति में धनबल और बाहुबल का दबदबा कम नहीं हुआ।

2024 के लोकसभा चुनाव में चुने गए लगभग 46 प्रतिशत सांसदों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज थे। इनमें से करीब एक-तिहाई मामलों में हत्या, बलात्कार और अपहरण जैसे गंभीर आरोप शामिल थे। औसतन हर सांसद की घोषित संपत्ति लगभग 38 करोड़ रुपये रही। चुनावी खर्च का अनुमान करीब एक लाख करोड़ रुपये लगाया गया। वहीं एजेंसियों ने 8,800 करोड़ रुपये से अधिक नकदी और अन्य प्रलोभन जब्त किए। यह तस्वीर लोकतंत्र के लिए कई सवाल खड़े करती है।

2017 में शुरू की गई इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को पारदर्शिता बढ़ाने का उपाय बताया गया था। लेकिन 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने इसे असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया। तब तक लगभग दो अरब डॉलर के बराबर चंदा इस व्यवस्था से गुजर चुका था, जिसका बड़ा हिस्सा सत्तारूढ़ दल को मिला। आज भी चुनावों के लिए सरकारी फंडिंग नहीं है, राजनीतिक दलों के खर्च पर प्रभावी सीमा नहीं है और कमजोर जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने जैसी व्यवस्था मौजूद नहीं है। वोटर सूची से नाम हटाने के आरोप भी बार-बार सामने आते हैं। कुल मिलाकर चुनाव जीतना,  ईमानदारी से अधिक अहम  है।

शिक्षा के क्षेत्र में भी देश दो हिस्सों में बँटता जा रहा है। एक ओर महँगे निजी स्कूल हैं, दूसरी ओर लगातार कमजोर होते सरकारी विद्यालय। पिछले दस वर्षों में लगभग 90 हजार सरकारी स्कूल बंद हुए, यानी औसतन हर दिन करीब 25 स्कूल। उधर निजी स्कूलों की संख्या लगातार बढ़ती रही।

आज सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आते हैं। यानी कमज़ोर शिक्षा व्यवस्था का सबसे बड़ा बोझ उन्हीं पर पड़ रहा है जिनके पास विकल्प सबसे कम हैं।

देश में शिक्षा के कई अलग-अलग ढाँचे हैं; सीबीएसई, राज्य बोर्ड, अंतरराष्ट्रीय पाठ्यक्रम, मदरसे और पंचायत स्कूल। लेकिन सबके लिए एक समान गुणवत्ता मानक नहीं है। भाषा नीति पर विवाद जारी है। स्वतंत्र सर्वेक्षण बताते हैं कि बड़ी संख्या में बच्चे बुनियादी पढ़ाई और गणित में भी अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँच पा रहे हैं। नई शिक्षा नीति ने बड़े बदलावों का वादा किया था, लेकिन अमीर और गरीब की शिक्षा के बीच की खाई और चौड़ी हो गई है।

भ्रष्टाचार खत्म नहीं हुआ, बल्कि उसका अंदाज़ बदल गया है। रोजमर्रा के सरकारी कामों में रिश्वत की शिकायतें अब भी आम हैं। अक्सर आरोप लगते हैं कि कंपनियाँ राजनीतिक दलों को चंदा देती हैं और बाद में सरकारी ठेके हासिल कर लेती हैं। कुछ उद्योगों, खासकर खनन और दवा क्षेत्र में, नियामक संस्थाओं की निष्पक्षता पर भी सवाल उठते रहे हैं।

राजनीतिक गलियारों में "वॉशिंग मशीन" शब्द भी खूब चर्चा में रहा। विपक्ष के जिन नेताओं पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप थे, वे सत्ता पक्ष में शामिल होते ही कानूनी दबाव से राहत पाते दिखाई दिए। उच्च स्तर के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए बना लोकपाल भी अब तक अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ पाया है।

न्यायपालिका की हालत भी चिंताजनक है। देशभर की अदालतों में 5.6 करोड़ से अधिक मुकदमे लंबित हैं। इनमें से लगभग पाँच करोड़ मामले जिला अदालतों में हैं। कई उच्च न्यायालयों में दस-दस वर्षों से मुकदमे लंबित पड़े हैं। बड़ी संख्या में न्यायाधीशों के पद खाली हैं। आम नागरिक इंसाफ़ के इंतज़ार में बूढ़ा हो जाता है, जबकि प्रभावशाली लोग लंबी कानूनी प्रक्रिया का बोझ आसानी से झेल लेते हैं।

पुलिस व्यवस्था भी आज़ादी के डेढ़ सौ साल पुराने ढाँचे पर टिकी हुई है। अधिकांश राज्यों में अब भी 1861 के पुलिस कानून की सोच हावी है। पुलिस बल में बड़ी संख्या में पद खाली हैं। राजनीतिक दखल, हिरासत में हिंसा और पक्षपातपूर्ण कार्रवाई की शिकायतें लगातार आती रहती हैं। 2006 में सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस सुधार के कई निर्देश दिए थे, लेकिन अधिकांश आज भी अधूरे हैं।

स्वास्थ्य व्यवस्था में भी कई कमियाँ बनी हुई हैं। दवाओं की कीमतों में पारदर्शिता नहीं है। निजी अस्पताल अक्सर दवाओं और जाँचों के लिए वास्तविक लागत से कई गुना अधिक शुल्क वसूलते हैं। आयुष्मान भारत योजना में फर्जीवाड़े के कारण हजारों अस्पतालों पर कार्रवाई करनी पड़ी। मिलावटी दवाओं से बच्चों की मौत जैसी घटनाओं ने भी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। सरकारी अस्पतालों में संसाधनों की कमी और मरीजों की परेशानी आज भी जारी है।

इन सभी समस्याओं को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। ये मिलकर उस फ़ासले की कहानी कहती हैं जो बड़े वादों और ज़मीनी हकीकत के बीच मौजूद है। चुनाव सुधार, बेहतर शिक्षा, ईमानदार प्रशासन, तेज़ न्याय, आधुनिक पुलिस व्यवस्था और भरोसेमंद स्वास्थ्य सेवाएँ आज भी अधूरा एजेंडा हैं।


यह भी सच है कि पिछले दशक में भारत ने बुनियादी ढाँचे, डिजिटल तकनीक और कल्याणकारी योजनाओं में उल्लेखनीय प्रगति की है। लेकिन कोई भी राष्ट्र केवल एक्सप्रेसवे, ऐप्स और ऊँची इमारतों से महान नहीं बनता। उसकी असली ताकत इस बात से तय होती है कि वह आम आदमी की रोज़मर्रा की परेशानियों को कितनी ईमानदारी से हल करता है।

आज भी छह बड़े सवाल देश के सामने खड़े हैं:

बेरोज़गारी, किसानों की बदहाली, महँगाई, पर्यावरण संकट, शिक्षा और स्वास्थ्य की असमानता, तथा सामाजिक सौहार्द को मजबूत करना। करोड़ों युवा अच्छी नौकरियों की तलाश में हैं। किसान अनिश्चित आमदनी से जूझ रहे हैं। महँगाई हर परिवार का बजट बिगाड़ रही है। हवा और पानी का प्रदूषण लोगों की सेहत पर हमला कर रहा है। समाज में बढ़ती दूरियाँ लोकतंत्र को भी कमज़ोर करती हैं।

सरकार की आलोचना करना देश-विरोध नहीं है। एक मज़बूत लोकतंत्र में रचनात्मक आलोचना ही बेहतर शासन की बुनियाद होती है। किसी भी सरकार की सबसे बड़ी कामयाबी केवल उपलब्धियाँ गिनाने में नहीं, बल्कि अपनी कमियों को स्वीकार कर उन्हें दूर करने में होती है। भारत को ऐसा विकास चाहिए जो सबको साथ लेकर चले, टिकाऊ हो और हर नागरिक तक उसका लाभ पहुँचे।

 जब पहरेदार ही राग दरबारी गाने लगे!!

क्यों मुख्यधारा का मीडिया हाशिये पर जा रहा है और सोशल मीडिया नई चौपाल बन गया है

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बृज खंडेलवाल द्वारा

1 अगस्त 2026

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आज भारत की सबसे बड़ी खबर वह नहीं है जो हर रात टीवी स्टूडियो में चीख-चीखकर दिखाई जाती है। सबसे बड़ी खबर वह है, जिसे दिखाने से बचा जाता है।

लोकतंत्र केवल तब कमजोर नहीं होता, जब सरकारें मीडिया पर सेंसर लगा दें। वह तब भी कमजोर होता है, जब पत्रकार खुद सवाल पूछना छोड़ दें। आज देश के बड़े हिस्से का मुख्यधारा का मीडिया सत्ता से जवाब मांगने के बजाय उसकी आवाज़ दोहराता दिखाई देता है।

कभी मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता था। उसका काम था भ्रष्टाचार उजागर करना, सरकार से सवाल पूछना और आम आदमी की आवाज़ बनना। आज उसकी बड़ी भूमिका सत्ता का बचाव करती नज़र आती है। पहरेदार अब गोद में बैठा हुआ लगता है।

यह बदलाव अचानक नहीं आया। बड़े मीडिया संस्थानों का मालिकाना हक़ कुछ बड़े कॉरपोरेट घरानों के हाथों में सिमट गया है। उनके कारोबार केवल मीडिया तक सीमित नहीं हैं। ऐसे माहौल में संपादकीय आज़ादी अक्सर मुनाफ़े और राजनीतिक रिश्तों के आगे पीछे छूट जाती है।

विज्ञापनों ने भी इस संकट को गहरा किया है। मीडिया संस्थानों की बड़ी आय सरकार और कॉरपोरेट विज्ञापनों से आती है। जिनसे कमाई होती है, उनके खिलाफ़ जांच करना आसान नहीं होता। खामोशी फ़ायदेमंद बन जाती है और सवाल महंगे पड़ने लगते हैं।

टीवी बहसें भी अब एक जैसी लगती हैं। वही चेहरे, वही प्रवक्ता और वही तयशुदा बहसें। किसान, मज़दूर, शिक्षक, वैज्ञानिक और आम नागरिक शायद ही कभी राष्ट्रीय चर्चा का हिस्सा बनते हैं। एजेंडा ताकतवर तय करते हैं और बाकी लोग उसे देखते रहते हैं।

जो पत्रकार अलग रास्ता चुनते हैं, उन्हें मुकदमों, ट्रोलिंग, आर्थिक दबाव और ऑनलाइन गालियों का सामना करना पड़ता है। डर धीरे-धीरे आत्म-सेंसरशिप में बदल जाता है। जब डर काम करने लगे, तब सेंसरशिप की ज़रूरत भी नहीं पड़ती।

हर शाम टीवी पर शोर बढ़ता है, लेकिन सच कम होता जाता है। बहस की जगह हंगामा ले लेता है। तथ्यों की जगह नारे आ जाते हैं। बेरोज़गारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों की परेशानियाँ और पर्यावरण जैसे मुद्दे स्टूडियो की राजनीति में कहीं खो जाते हैं।

विद्वानों एडवर्ड हरमन और नोम चॉम्स्की ने वर्षों पहले लिखा था कि मीडिया पर मालिकाना हक़, विज्ञापन और राजनीतिक दबाव यह तय करते हैं कि जनता क्या देखेगी और क्या नहीं। हमेशा झूठ नहीं दिखाया जाता, लेकिन पूरा सच भी नहीं दिखाया जाता।

इसीलिए "गोदी मीडिया" जैसा शब्द आम बोलचाल का हिस्सा बन गया है। कोई इससे सहमत हो या नहीं, लेकिन इतना साफ़ है कि लाखों लोगों का टीवी समाचारों पर भरोसा कम हुआ है।

विडंबना यह है कि जो मीडिया कभी जनता की आवाज़ था, वह आज कई बार सरकारों, विज्ञापनदाताओं और निवेशकों की ज़्यादा चिंता करता दिखाई देता है। उसकी सबसे बड़ी समस्या टीआरपी नहीं, बल्कि घटती विश्वसनीयता है। भरोसा एक बार टूट जाए तो लौटना आसान नहीं होता।

इसी खाली जगह को सोशल मीडिया ने भर दिया है।

हाल का जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन इसका बड़ा उदाहरण है। एक व्यंग्यात्मक ऑनलाइन अभियान देखते ही देखते राष्ट्रीय आंदोलन बन गया। युवाओं ने टीवी चैनलों या अखबारों का इंतज़ार नहीं किया। उन्होंने अपनी बात खुद दुनिया तक पहुँचाई।

इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब शॉर्ट्स और एक्स पर वीडियो, मीम, भाषण और पोस्ट कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुँच गए। अब किसी संपादक की मंजूरी की ज़रूरत नहीं रही। मोबाइल फोन ही कैमरा भी है, न्यूज़रूम भी और प्रसारण केंद्र भी।

इस आंदोलन का हास्य, व्यंग्य और मीम पारंपरिक पत्रकारिता से कहीं तेज़ फैला। युवा गंभीर संपादकीय से ज़्यादा चुटीले पोस्ट और छोटे वीडियो से जुड़ते दिखे।

बेशक सोशल मीडिया की अपनी कमियाँ भी हैं। अफवाहें तेज़ी से फैलती हैं, एल्गोरिद्म सनसनी को बढ़ावा देते हैं और तथ्य जांच हमेशा समय पर नहीं हो पाती। फिर भी इसने लाखों लोगों को बोलने का मंच दिया है।

अब यह बदलाव लौटने वाला नहीं है। भारत की नई पीढ़ी रात नौ बजे के टीवी बुलेटिन या अगली सुबह के अखबार का इंतज़ार नहीं करती। वह खुद खबर बनाती है, साझा करती है और उस पर बहस करती है।

यही कारण है कि मुख्यधारा का मीडिया धीरे-धीरे हाशिये पर जा रहा है, जबकि सोशल मीडिया नई जन-चौपाल बन चुका है। आज राजनीति, आंदोलन और जनमत का बड़ा हिस्सा वहीं आकार लेता है।

एक आज़ाद मीडिया का काम सत्ता की जय-जयकार करना नहीं, उससे सवाल पूछना है। अगर मुख्यधारा का मीडिया अपनी यह भूमिका नहीं निभाएगा, तो जनता अपनी आवाज़ के लिए नए मंच खोजती रहेगी।

Tuesday, July 28, 2026

 स्कूल खाली हो रहे हैं, जंतर-मंतर भर रहा है! क्या भारत की शिक्षा व्यवस्था जवाब देगी?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

30 जुलाई 2026

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अगर बच्चा एक साधारण पैराग्राफ भी नहीं पढ़ सकता, तो नए स्कूल भवन बनाने का क्या मतलब है?

अगर सरकारी स्कूल इतने अच्छे हैं, तो लाखों माता-पिता उन्हें छोड़कर निजी स्कूलों की ओर क्यों जा रहे हैं?

और अगर हमारी शिक्षा व्यवस्था सही दिशा में है, तो हजारों युवा हाल ही में जंतर-मंतर पर नीट के खिलाफ न्याय और जवाबदेही की मांग लेकर सड़कों पर क्यों उतर आए?

ये अलग-अलग सवाल नहीं हैं। ये एक ही संकट की अलग-अलग तस्वीरें हैं।

जंतर-मंतर पर गूंजा जनाक्रोश केवल नीट परीक्षा के खिलाफ नहीं था। वह पूरे शिक्षा तंत्र के खिलाफ बढ़ते अविश्वास का विस्फोट था। देश की जेन ज़ी पीढ़ी अब केवल एक परीक्षा पर सवाल नहीं उठा रही। वह उस व्यवस्था को चुनौती दे रही है, जो समझ से ज्यादा रटने को, सीखने से ज्यादा कोचिंग को और प्रतिभा से ज्यादा किस्मत को महत्व देती है।

यूडीआईएसई+ (UDISE+) 2025-26 की ताज़ा रिपोर्ट इस बेचैन करने वाली सच्चाई की पुष्टि करती है। भारत की स्कूली शिक्षा एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां कुछ उपलब्धियां दिखती हैं, लेकिन उनसे कहीं बड़े संकट भी सामने आते हैं। एक तरफ सुधार होता है, दूसरी तरफ व्यवस्था की कोई और कमजोरी उसे पीछे धकेल देती है।

देश में कुल छात्र संख्या 24.80 करोड़ से घटकर 24.72 करोड़ रह गई। अकेले सरकारी स्कूलों से लगभग 86 लाख बच्चे कम हुए, जबकि निजी स्कूलों में 88 लाख से अधिक नए छात्र जुड़े। माता-पिता अपने फैसले से साफ संदेश दे रहे हैं। एक ही वर्ष में 8,000 से अधिक सरकारी स्कूल बंद हो गए। अनुसूचित जाति के विद्यार्थियों की संख्या भी घटी। आज भी एक लाख से अधिक स्कूल केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं, जहां लगभग 34 लाख बच्चों को एक साथ कई कक्षाओं में पढ़ाया जाता है।

लेकिन सबसे बड़ा संकट स्कूल की इमारतों में नहीं, कक्षाओं के भीतर है।

एएसईआर 2024 बताता है कि महामारी के बाद कुछ सुधार जरूर हुआ है, लेकिन हालात अभी भी चिंताजनक हैं। कक्षा तीन के केवल लगभग एक चौथाई बच्चे ही कक्षा दो का पाठ ठीक से पढ़ सकते हैं। लगभग दो-तिहाई बच्चे साधारण घटाव तक नहीं कर पाते। पारख (PARAKH) और नीति आयोग की रिपोर्टें बताती हैं कि कक्षा छह के अनेक विद्यार्थी साधारण भिन्न और रोजमर्रा की गणितीय समझ में भी कमजोर हैं। आठवीं तक पहुंचते-पहुंचते पढ़ने की क्षमता भी पहले से गिर चुकी है।

यानी बच्चे कक्षा तो पास कर रहे हैं, लेकिन सीख नहीं रहे। उनके हाथ में प्रमाणपत्र है, पर आत्मविश्वास नहीं। अंक हैं, लेकिन ज्ञान नहीं।

स्कूलों में बिजली, शौचालय और पेयजल जैसी सुविधाएं बढ़ी हैं। यह स्वागतयोग्य है। लेकिन हजारों स्कूलों में आज भी खेल का मैदान नहीं है, दिव्यांगों के लिए सुविधाएं नहीं हैं, कंप्यूटर काम नहीं करते और इंटरनेट केवल कागज़ों में मौजूद है।

शिक्षा पर सरकारी खर्च भी चिंता बढ़ाता है। पिछले एक दशक में केंद्रीय बजट में शिक्षा की हिस्सेदारी लगातार घटी है। कम निवेश का सीधा असर शिक्षकों की नियुक्ति, प्रशिक्षण और पढ़ाई की गुणवत्ता पर पड़ता है। इमारतें जल्दी बन सकती हैं, लेकिन भरोसा धीरे-धीरे बनता है।

देश की स्कूली शिक्षा पांच बड़ी बीमारियों से जूझ रही है।

सबसे बड़ी बीमारी है कमजोर सीखने की क्षमता। बच्चे वर्षों तक स्कूल जाते हैं, लेकिन पढ़ना, लिखना और साधारण गणित तक ठीक से नहीं सीख पाते।

दूसरी समस्या है बीच रास्ते पढ़ाई छोड़ देना। पहली कक्षा में प्रवेश लेने वाले लगभग आधे बच्चे बारहवीं तक पहुंच ही नहीं पाते। हर स्तर पर स्कूल बदलने की मजबूरी ड्रॉपआउट का खतरा बढ़ाती है।

तीसरी चुनौती है शिक्षकों की भारी कमी। एक लाख से अधिक स्कूल आज भी केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं।

चौथी समस्या है शिक्षा व्यवस्था का बिखराव। प्राथमिक स्कूल बहुत हैं, लेकिन माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्कूल अपेक्षाकृत कम। बच्चों को बार-बार स्कूल बदलना पड़ता है, जिससे पढ़ाई की निरंतरता टूट जाती है।

पांचवीं चुनौती है गहरी असमानता। राज्यों, आय वर्गों और सामाजिक समूहों के बीच शिक्षा की गुणवत्ता में भारी अंतर है। अनुसूचित जाति और जनजाति के बच्चों की सीखने की क्षमता अब भी पीछे है।

समस्या यहीं खत्म नहीं होती।

देश में दर्जनों शिक्षा बोर्ड, अलग-अलग पाठ्यक्रम और अलग-अलग परीक्षा प्रणालियां चल रही हैं। सीबीएसई, सीआईएससीई, एनआईओएस, राज्य बोर्ड, संस्कृत बोर्ड, मदरसा बोर्ड और अंतरराष्ट्रीय बोर्ड; सब अपनी-अपनी दिशा में चल रहे हैं। यह विविधता कम और भ्रम ज्यादा पैदा करती है।

भारत का एक छात्र लगभग पच्चीस वर्ष तक किसी न किसी परीक्षा की तैयारी करता रहता है। स्कूल, कॉलेज, प्रतियोगी परीक्षा, नौकरी। लेकिन जीवन जीने की कला, आलोचनात्मक सोच, रचनात्मकता और समस्या समाधान जैसे कौशल अक्सर पीछे छूट जाते हैं।

नीट को लेकर जंतर-मंतर पर जो गुस्सा दिखाई दिया, वह अचानक नहीं फूटा। उसकी शुरुआत उन कक्षाओं में हुई थी जहां समझने से ज्यादा रटाया गया। उन कोचिंग सेंटरों में हुई, जहां स्कूलों से ज्यादा भरोसा पैदा हो गया। उन घरों में हुई, जहां माता-पिता अपनी सारी जमा-पूंजी एक अनिश्चित भविष्य पर दांव लगाने को मजबूर हैं।

भारत कभी नालंदा और तक्षशिला जैसी विश्वविख्यात शिक्षा परंपरा का केंद्र था। आज भी आईआईटी और कुछ चुनिंदा संस्थान दुनिया में सम्मान पाते हैं। लेकिन पूरी शिक्षा व्यवस्था अभी भी उस स्तर तक नहीं पहुंच सकी, जिसकी एक उभरती महाशक्ति से उम्मीद की जाती है।

भारत को केवल अधिक स्कूलों की जरूरत नहीं है। बेहतर स्कूलों की जरूरत है।

केवल अधिक दाखिलों की नहीं, बेहतर सीखने की जरूरत है।

केवल अधिक परीक्षाओं की नहीं, बेहतर शिक्षा की जरूरत है।

जेन ज़ी अपना फैसला सुना चुकी है। वह सड़कों पर उतर चुकी है। अब परीक्षा सरकार, नीति-निर्माताओं और पूरे समाज की है।

देश का हर छात्र आज सिर्फ एक सवाल पूछ रहा है—

क्या हमारी शिक्षा हमें जिंदगी के लिए तैयार करेगी, या सिर्फ अगली परीक्षा के लिए?

यही सवाल भारत के भविष्य का भी फैसला करेगा।

 


जब कॉकरोचों ने हिला दिया सत्ता का सिंहासन: जेन ज़ी ने कर दिखाया, जो विपक्ष नहीं कर सका

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

29 जुलाई 2026

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साल 2026 का सबसे बड़ा राजनीतिक धमाका संसद में नहीं हुआ। वह एक मीम से शुरू हुआ।

कुछ छात्रों को "कॉकरोच" कहा गया। उन्होंने बुरा मानने के बजाय उसी नाम को अपना झंडा बना लिया। फिर वे जंतर-मंतर पहुंचे, डटे रहे और आखिरकार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। महीनों तक संसद में हंगामा करने वाला पूरा विपक्ष जो नहीं कर सका, वह काम कुछ हजार युवाओं ने मोबाइल फोन, मीम और मुस्कान के सहारे कर दिखाया।

कहावत है, "जहाँ चाह, वहाँ राह।" इस बार राह इंस्टाग्राम से होकर निकली।

कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी), पहले मज़ाक लगती थी। लेकिन मज़ाक ही आंदोलन बन गया। युवाओं ने कहा, "अगर हमें कॉकरोच कहते हो, तो याद रखो, एक को कुचलोगे, सौ और निकल आएँगे।"

फिर आया नीट-यूजी पेपर लीक।

परीक्षा रद्द हुई। करीब बीस लाख छात्रों को दोबारा परीक्षा की चिंता सताने लगी। कई छात्रों की आत्महत्या की खबरों ने पूरे देश को झकझोर दिया। वर्षों से जमा गुस्सा, पेपर लीक, महँगी कोचिंग, बेरोज़गारी और सुस्त व्यवस्था, अब ज्वालामुखी बन चुका था।

चिंगारी मिली और आग फैल गई।

सीजेपी ने वही भाषा बोली जो आज का युवा समझता है। प्रेस कॉन्फ्रेंस की जगह इंस्टाग्राम रील्स थीं। लंबे भाषणों की जगह मीम थे। गुस्से को हँसी में बदलकर उन्होंने व्यवस्था पर सबसे तीखा वार किया।

जंतर-मंतर धीरे-धीरे धरना स्थल नहीं, युवा गणराज्य बन गया। गीत गूंजे, पोस्टर बने, बहस हुई, कविताएँ पढ़ी गईं। माता-पिता भी साथ आए। शिक्षकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने समर्थन दिया। सोनम वांगचुक का 26 दिन का अनशन आंदोलन को नैतिक ताकत दे गया। पुलिस की लाठी और आँसू गैस ने भी आंदोलन की आग बुझाने के बजाय और हवा दे दी।

इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत उसकी सादगी थी।

सिर्फ एक मांग थी: जवाबदेही।

व्यवस्था की नाकामी की लंबी बहसों में सरकारें अक्सर बच निकलती हैं। लेकिन जब उंगली सीधे एक जिम्मेदार व्यक्ति की ओर उठे, तब बचना आसान नहीं होता।

आखिरकार सरकार ने हालात भाँप लिए। संसद लगातार ठप थी। देशभर में छात्रों का समर्थन बढ़ रहा था। तस्वीरें सोशल मीडिया पर फैल रही थीं। टकराव लंबा खिंचता तो नुकसान और बढ़ता।

धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दिया। सरकार ने जांच, मुआवजे और किसी तरह की प्रताड़ना न होने का भरोसा दिया। तत्काल संकट टल गया।

दिलचस्प बात यह रही कि विपक्ष इस पूरी लड़ाई में अगली कतार में नहीं, पीछे की सीट पर बैठा दिखाई दिया।

वर्षों से विपक्ष शिक्षा, बेरोज़गारी और संस्थाओं की विफलता पर सरकार को घेरता रहा है। लेकिन जब असली जनआंदोलन उठा, तब उसकी भूमिका दर्शक जैसी रही। वह आंदोलन का नेतृत्व नहीं कर पाया, केवल समर्थन देने पहुँचा।

यहीं उसकी सबसे बड़ी कमजोरी सामने आई।

आज का विपक्ष विरोध तो करता है, लेकिन भरोसा नहीं जगा पाता।

इंडिया गठबंधन की सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि उसे जोड़ने वाला धागा कोई साझा विचार नहीं, बल्कि केवल भाजपा विरोध है। चुनाव आते ही सीटों पर झगड़े शुरू हो जाते हैं। राज्यों में साथी दल एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी बन जाते हैं। "एक अनार, सौ बीमार" जैसी हालत हो जाती है।

नेतृत्व का सवाल भी अब तक अनसुलझा है।

राहुल गांधी कांग्रेस का चेहरा हैं, लेकिन ममता बनर्जी, अखिलेश यादव और दूसरे क्षेत्रीय नेता भी अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन छोड़ने को तैयार नहीं। जहाँ कई नाविक हों, वहाँ नाव अक्सर भँवर में फँस जाती है।

संगठन भी विपक्ष की कमजोर कड़ी है।

भाजपा ने दशकों तक बूथ स्तर तक अपना संगठन खड़ा किया। दूसरी ओर कांग्रेस सहित कई विपक्षी दल स्थानीय कार्यकर्ताओं, अनुशासन और जमीनी नेटवर्क की कमी से जूझ रहे हैं। कई राज्यों में गुटबाजी अलग सिरदर्द है।

वंशवाद भी विपक्ष के गले की हड्डी बना हुआ है।

अधिकांश बड़े विपक्षी दल अब भी परिवारों के इर्द-गिर्द घूमते हैं। नई पीढ़ी के नेताओं को आगे बढ़ने का अवसर सीमित दिखाई देता है। इसके उलट भाजपा खुद को कार्यकर्ता आधारित संगठन के रूप में पेश करने में सफल रही है। राजनीति में धारणा भी आधी लड़ाई जीत लेती है।

विपक्ष की एक और समस्या है कि उसके पास आलोचना तो बहुत है, लेकिन विकल्प कम हैं।

महँगाई, बेरोज़गारी, पेपर लीक और संस्थागत संकट जैसे मुद्दे वास्तविक हैं। लेकिन मतदाता केवल शिकायत नहीं, समाधान भी सुनना चाहता है। केवल सरकार को कोसने से चुनाव नहीं जीते जाते।

जन टिप्पणीकार प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी का मानना है कि लगातार चुनावी हार ने विपक्ष को गहरी निराशा में धकेल दिया है। उसका पूरा ध्यान केवल मोदी सरकार को हटाने पर केंद्रित हो गया है। कॉकरोच आंदोलन उसे एक सुनहरा अवसर लगा। लेकिन राजनीति में बाजी उसी की होती है जो समय रहते चाल बदल ले।

यहीं नरेंद्र मोदी ने अपनी राजनीतिक चतुराई दिखाई।

सरकार ने टकराव को लंबा नहीं खींचा। प्रदर्शनकारियों की मुख्य माँगें मान लीं। मंत्री ने इस्तीफा दिया। बातचीत हुई। आंदोलन का तत्काल कारण समाप्त हो गया।

इसे कहते हैं "साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।"

सरकार ने एक मंत्री खोया, लेकिन बड़ा राजनीतिक संकट टाल दिया। विपक्ष के हाथ का सबसे तेज़ हथियार भी कुंद हो गया। संसद में शोर चलता रहा, लेकिन जनता का ध्यान दूसरी ओर मुड़ चुका था।

इसका मतलब यह नहीं कि समस्याएँ खत्म हो गई हैं। परीक्षा प्रणाली में सुधार की ज़रूरत अब भी है। युवाओं की बेरोज़गारी और शिक्षा व्यवस्था पर सवाल भी बने हुए हैं। छात्रों का भरोसा वापस जीतना आसान नहीं होगा।

लेकिन फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि मोदी इस मुश्किल इम्तिहान से निकलने में कामयाब रहे हैं।

कॉकरोच जनता पार्टी ने साबित कर दिया कि आज का युवा केवल वोटर नहीं, एजेंडा तय करने वाली ताकत भी बन सकता है।

और विपक्ष के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है:

अगर कुछ छात्रों ने मीम और मोबाइल के दम पर वह कर दिखाया, जो अनुभवी नेता वर्षों में नहीं कर सके, तो असली आत्ममंथन किसे करना चाहिए: सरकार को या विपक्ष को?

Sunday, July 26, 2026

 इंस्टाग्राम से जंतर-मंतर तक, बदल गई सियासत

नीट से निकला गुस्सा, लोकतंत्र का नया चेहरा

जब जेन ज़ी ने अपनी आवाज़ बुलंद की

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

28 जुलाई, 2026

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जंतर-मंतर बगावत के एक रंगीन मेले में बदल गया। जेन ज़ी के नौजवान गा रहे थे, नाच रहे थे, मीम्स बना रहे थे, ताकतवर नेताओं का मज़ाक उड़ा रहे थे और बर्गर, पिज़्ज़ा, भटूरे खाते हुए ऐसे मस्ती कर रहे थे, मानो राजनीति किसी कॉलेज फेस्ट में आ घुसी हो।

लेकिन इस हंसी-मज़ाक और शोर-शराबे के पीछे एक साफ़ और मज़बूत पैगाम था: जवाबदेही चाहिए। हिंसा भी इस आंदोलन का जोश कम नहीं कर सकी। युवाओं के नए झुंड लगातार पहुंचते रहे। बेखौफ, पूरे हौसले के साथ। देखते ही देखते यह धरना लोकतंत्र के एक जीवंत उत्सव में बदल गया।

यह युवा आंदोलन भारत के लोकतांत्रिक सफर का एक अहम पड़ाव बन गया। शुरुआत परीक्षा व्यवस्था के खिलाफ गुस्से से हुई थी, लेकिन जल्द ही यह एक बड़े संदेश में बदल गई; देश के युवाओं की आवाज़ को अब नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

जिस जनदबाव के बाद धर्मेंद्र प्रधान को पद छोड़ना पड़ा, प्रधानमंत्री से इंस्टाग्राम पर सीधे युवाओं से बात करने की मांग उठी, और नंदन नीलेकणी समेत विशेषज्ञों की नई टास्क फोर्स बनाने का फैसला हुआ, उसने एक बात साबित कर दी। शांतिपूर्ण, संगठित और स्पष्ट जनदबाव सरकारों को फैसले बदलने पर मजबूर कर सकता है।

इस आंदोलन ने सोशल मीडिया की असली ताकत भी दिखा दी। जो काम कभी बड़े मीडिया संस्थान तय करते थे, वह इस बार पूरी तरह इंटरनेट पर हुआ। कहानी वहीं बनी, वहीं फैली और वहीं से पूरे देश तक पहुंची। पारंपरिक मीडिया को इस बार युवाओं के पीछे-पीछे चलना पड़ा।

जेन ज़ी की अपनी अलग भाषा थी; बेबाक, अचानक, प्रतीकों से भरी और बिना किसी बनावट के। उसने राजनीतिक आंदोलनों के पुराने तौर-तरीकों को तोड़ दिया। उसकी सादगी और सच्चाई ने हर विचारधारा के लोगों का ध्यान खींचा।

यह आंदोलन दलगत राजनीति से ऊपर उठ गया। छोटा था, लेकिन रंगों और उम्मीदों से भरा हुआ। जैसे तपती गर्मी के बाद पहली बारिश राहत लेकर आती है, वैसे ही इसने पहली बार सड़कों पर उतरे युवाओं, डिजिटल दौर की पीढ़ी और आम छात्रों को एक मंच पर ला दिया। बिना किसी लिखी हुई स्क्रिप्ट के यह लोकतंत्र का ऐसा नज़ारा था, जिसने नई ऊर्जा और नई उम्मीद जगाई। इसने संकेत दिया कि देश में एक बड़े युवा जागरण की शुरुआत हो चुकी है।

सरकार ने समय रहते कुछ कदम उठाए, जिससे आंदोलन और नहीं भड़का। इस पूरे घटनाक्रम ने लोकतंत्र की एक पुरानी सच्चाई फिर याद दिला दी; शांतिपूर्ण जनआंदोलन लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं होते, बल्कि उसकी सबसे बड़ी ताकत होते हैं। खासकर युवाओं की आवाज़ को अनसुना करना किसी भी सरकार के लिए आसान नहीं होता।

राजनीति हमेशा एक सबक देती है; नेता जितनी ऊंचाई पर पहुंचता है, अहंकार आने पर उसका गिरना उतना ही दर्दनाक होता है। भारतीय पुराण ऐसी मिसालों से भरे पड़े हैं। सत्ता के नशे में चूर इंद्र को तब विनम्र होना पड़ा, जब बालक कृष्ण ने अपनी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया। अपनी विद्वता पर गर्व करने वाले नारद मुनि का अहंकार भी भगवान विष्णु ने तोड़ा। घमंड इंसान की सोच पर पर्दा डाल देता है, जबकि विनम्रता उसे सही रास्ता दिखाती है।

नीट विवाद नरेंद्र मोदी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन गया । यह केवल एक परीक्षा का मामला नहीं रहा। यह भरोसे का ऐसा संकट बन गया, जिसने उन लाखों छात्रों और परिवारों को झकझोर दिया है, जो शिक्षा को अपनी तरक्की की सबसे मजबूत सीढ़ी मानते हैं।

कई वर्षों तक नरेंद्र मोदी ने एक आत्मविश्वासी और सक्षम "विश्वगुरु भारत" की छवि बनाई। लेकिन नीट विवाद ने उस तस्वीर में गहरी दरार डाल दी। पेपर लीक, गड़बड़ियों और प्रशासनिक अव्यवस्था के आरोपों ने एक राष्ट्रीय परीक्षा को सरकारी व्यवस्था की नाकामी का प्रतीक बना दिया।

सबसे बड़ी भूल संकट का पैदा होना नहीं थी। असली गलती थी सरकार की धीमी और हिचकिचाती प्रतिक्रिया। सच्चा नेतृत्व वही होता है, जो गलती स्वीकार करे, निष्पक्ष जांच कराए और दोषियों पर तुरंत कार्रवाई करे। लेकिन यहां जवाब बचाव वाला ज़्यादा था, समाधान वाला कम। हर बीतते दिन के साथ लोगों का शक बढ़ता गया कि सरकार हालात को संभाल नहीं रही, बल्कि घटनाओं के पीछे-पीछे चल रही है।

नेतृत्व का मतलब ज़िम्मेदारी लेने का साहस भी होता है। संसदीय लोकतंत्र में कई बार मंत्री अपने विभाग की बड़ी विफलताओं की नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे देते हैं, चाहे उनकी व्यक्तिगत गलती साबित न हुई हो। ऐसे कदम जनता का भरोसा मज़बूत करते हैं। लेकिन नीट मामले में जवाबदेही की मांग को लगभग नज़रअंदाज़ कर दिया गया। इससे यही संदेश गया कि सरकार के लिए अपनी सियासी ताकत बचाना, जनता का भरोसा लौटाने से ज़्यादा अहम है।

इस विवाद ने एक और गहरी कमजोरी उजागर की। जब किसी सरकार को लगातार भारी चुनावी जीत मिलने लगती है, तो अक्सर वह आलोचना सुनना कम कर देती है। लोकतंत्र तभी मजबूत रहता है, जब सवाल पूछने वालों को दुश्मन नहीं, बल्कि चेतावनी देने वाला समझा जाए। आलोचना छोटी समस्याओं को बड़े राष्ट्रीय संकट बनने से रोकती है।

हमारी प्राचीन परंपरा भी यही सिखाती है। रामायण का वह धोबी, जिसकी कड़ी बात भी भगवान राम तक पहुंची, हमें याद दिलाता है कि शासक सबसे साधारण नागरिक की आवाज़ भी अनसुनी नहीं कर सकता। जनमत चाहे कितना भी कड़वा क्यों न लगे, वही समाज की असली नब्ज़ होता है।

आज की सरकारें संस्थाओं, स्वतंत्र मीडिया, विशेषज्ञों और नागरिक समाज के सहारे ही सही फैसले ले पाती हैं। यही उनकी आंखें और कान होते हैं। जब इन संस्थाओं पर भरोसा कम होने लगता है या उनकी बात सुनी नहीं जाती, तब सरकारें अपने ही बनाए दायरे में कैद हो जाती हैं। वहां सिर्फ वही आवाज़ सुनाई देती है, जो अच्छी लगे। असुविधाजनक सच बहुत देर से सामने आता है। नीट विवाद ने यही दिखाया। छात्र सड़कों पर थे, माता-पिता परेशान थे, अदालतें दखल दे रही थीं, लेकिन सरकारी बयान कानूनी दलीलों तक सीमित रहे। उनमें संवेदना और आत्ममंथन की कमी साफ़ दिखाई दी।

इतिहास भी ऐसी कई चेतावनियां देता है। 1975 की आपातकालीन अवधि सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण और जनता से बढ़ती दूरी का नतीजा थी। अंत में जनता ने उसी सत्ता को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया। आज हालात अलग हैं, लेकिन सबक वही है। लोकतंत्र में अति-आत्मविश्वास, सत्ता का केंद्रीकरण और आलोचना की अनदेखी हमेशा भारी पड़ती है।

नीट का पूरा घटनाक्रम केवल एक परीक्षा की विफलता नहीं है। यह शासन व्यवस्था के लिए चेतावनी है। किसी भी संस्था की साख पारदर्शिता, निष्पक्षता और जवाबदेही से बनती है। राजनीतिक ताकत की असली नींव अजेय होने का भ्रम नहीं, बल्कि जनता का भरोसा होती है।

नरेंद्र मोदी के सामने अभी भी एक अवसर है। वह दिखा सकते हैं कि मजबूत नेतृत्व का मतलब कभी गलती न करना नहीं होता। मजबूत नेता वही होता है, जो अपनी भूल स्वीकार करे, दोषियों को सज़ा दे, संस्थाओं में सुधार लाए और आम नागरिक की आवाज़ सुने।

तालियां अहंकार को कुछ समय तक ज़रूर मिल जाती हैं, लेकिन जनता का भरोसा केवल विनम्रता, ईमानदारी और जवाबदेही से लौटता है। भारत की प्राचीन कथाओं से लेकर आधुनिक लोकतंत्र तक यही सबसे बड़ा सबक रहा है।


 गटर किसने खोलीं?

फिल्म बनेगी: कॉकरोचों का इंतकाम

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

28 जुलाई 2026

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दिल्ली में फिर वही मौसम लौट आया है। नहीं, यह बरसात का मौसम नहीं। संसद का भी नहीं। यह है सियासी केंचुल बदलने का मौसम।

नेता अपने उसूल साँप से भी तेज़ी से बदल रहे हैं। गठबंधन स्याही सूखने से पहले टूट रहे हैं। धरने-प्रदर्शन देखते ही देखते समेटे जा रहे हैं। कल की इंक़लाबी हुंकार आज प्रेस कॉन्फ़्रेंस बन जाती है। आज का गुस्सा कल इस्तीफे पर खत्म हो जाता है।

ताज़ा ब्लॉकबस्टर भी वक्त पर आ गई। एक इस्तीफा, कुछ नाटकीय ऐलान, सोशल मीडिया पर शानदार तमाशा, और देखते ही देखते कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने जीत का एलान कर दिया। बैनर समेटे गए, लाउडस्पीकर बंद हुए और सब घर लौट गए, जैसे इतिहास की दिशा ही बदल गई हो।

और हाँ... गाजर भी आई।

एक बार नहीं।

दो-दो बार।

जब नेताजी इंस्टाग्राम पर हाथ में गाजर लेकर देश से बातें करने लगें, तो समझ लीजिए कि भारतीय राजनीति अब उस मोड़ पर पहुँच चुकी है, जिसकी कल्पना संविधान बनाने वालों ने भी नहीं की होगी।

अर्थशास्त्री संदेश ढूँढ़ते रहे। मनोवैज्ञानिक उसके मायने तलाशते रहे। किसान सोचने लगे कि क्या अब गाजर भी कोई नई विचारधारा बन गई है। उधर मीम बनाने वालों ने तो गाजर को सीधा कैबिनेट मंत्री घोषित कर दिया।

इस बीच डिचकॉक ने अगली फिल्म का ऐलान कर दिया है:

"कॉकरोच फिर लौटेंगे!"

वैज्ञानिक आज भी कॉकरोच पार्टी पर हैरान हैं। परमाणु बम शहर मिटा सकता है। बाढ़ पुल बहा सकती है। चुनाव सरकारें गिरा सकते हैं। लेकिन तिलचट्टे हर बार मुस्कुराते हुए वापस आ जाते हैं। हाथ में एक तरफ इस्तीफे की माँग, दूसरी तरफ भविष्य के गठबंधन का गुलदस्ता।

इतनी जबरदस्त अनुकूलन क्षमता तो शायद डार्विन ने भी नहीं सोची होगी।

सत्ता पक्ष उस स्कूल के हेडमास्टर जैसा है, जिसे लगता है कि सुबह का सूरज भी उसकी इजाज़त लेकर निकलता है। हर उपलब्धि दूरदर्शी नेतृत्व का कमाल है। हर आलोचना साज़िश है। और जो ज़्यादा सवाल पूछे, उसे विकास-विरोधी, राष्ट्र-विरोधी या हालात खराब हुए तो गाजर-विरोधी भी घोषित किया जा सकता है।

फिर बारी आती है विपक्ष की।

चलते नहीं। दौड़ते भी नहीं। बस... कॉकरोचों की तरह सर्र से निकल लेते हैं।

सीजेपी की सबसे बड़ी ताकत है: जिंदा रहना। इस हफ्ते दहाड़ेंगे। अगले हफ्ते बातचीत करेंगे। उसके अगले हफ्ते लोकतंत्र बचाने का श्रेय भी खुद ले लेंगे।

नई पीढ़ी ने CJP का नया मतलब निकाल लिया है। अब इसका अर्थ कॉकरोच जनता पार्टी नहीं। बल्कि सर्टिफाइड जंपर्स पार्टी है।

इसका चुनाव चिन्ह कमल, हाथ, झाड़ू, साइकिल या हाथी नहीं होना चाहिए। एक घूमता हुआ दरवाज़ा होना चाहिए।

सदस्य बनने के नियम भी आसान हैं। किसी विचारधारा की ज़रूरत नहीं। सिद्धांत हों तो अच्छा, न हों तो और भी अच्छा। बस एक छोटा बैग, तीन माइक, भरपूर नैतिक गुस्सा और ऐसी रीढ़ चाहिए जो बिना दर्द के 360 डिग्री घूम जाए।

सुना है पार्टी की ट्रेनिंग अकादमी में खास कोर्स भी चलते हैं।

"अगली सूचना तक धरना कैसे दें"

"यू-टर्न लेने की उन्नत कला"

और सबसे लोकप्रिय विषय:

"स्कोर चाहे कुछ भी हो, जीत का एलान कैसे करें।"

दीक्षांत समारोह में सबकी फोटो भी खिंचती है। मुश्किल सिर्फ इतनी होती है कि फोटो छपने तक आधे लोग दूसरी पार्टी में पहुँच चुके होते हैं।

आजकल प्रेस कॉन्फ़्रेंस किसी रियलिटी शो से कम नहीं।

पहला एपिसोड—लोकतंत्र खतरे में है।

दूसरा—लोकतंत्र बच गया।

तीसरा—सरकार हमारी वजह से झुकी।

चौथा—धरना समाप्त।

पाँचवाँ—जल्द मिलेंगे, नया आंदोलन लेकर।

OTT प्लेटफॉर्म के लेखक भी अब शिकायत करने लगे हैं कि राजनीति की पटकथा उनकी कल्पना से भी आगे निकल गई है।

राजनीतिक प्रवक्ता भाषा के सबसे बड़े जादूगर हैं। पीछे हटना रणनीतिक जीत बन जाता है। इस्तीफा नैतिक भूकंप कहलाता है। चुप्पी दूरदर्शिता बन जाती है। और उलझन को रणनीति बताया जाता है।

उधर असली कॉकरोचों ने भी नाराज़गी जता दी है।

राष्ट्रीय कॉकरोच प्रतिष्ठा महासंघ ने बयान जारी किया:

"हम इस तुलना का सख्त एतराज़ करते हैं। हम सिर्फ रसोई में घुसते हैं। नेता टीवी स्टूडियो, व्हाट्सऐप ग्रुप, संस्थाओं और कभी-कभी एक-दूसरे की पार्टियों में भी घुस जाते हैं।

शुक्र है, सोशल मीडिया अब देश की सबसे बड़ी व्यंग्य पत्रिका बन चुका है। एक सूटकेस घसीटते कॉकरोच का मीम चार घंटे की टीवी बहस से ज़्यादा सच्चाई दिखा देता है। एक गाजर वाला इमोजी पूरे हफ्ते की राजनीति समझा देता है।

लोकतंत्र कोई टैलेंट शो नहीं है, जहाँ हर ब्रेक के बाद कलाकार नई पोशाक पहनकर लौट आएँ। इसे ऐसे हुक्मरानों की ज़रूरत है जो जवाब दें, ऐसे विपक्ष की जो अपने पाँव पर डटा रहे, ऐसे पत्रकारों की जो मुश्किल सवाल पूछें और ऐसे नागरिकों की जो हर तालियों के इशारे पर ताली न बजाएँ।

वरना हर चुनाव सिर्फ कीटनाशक छिड़कने का नया कार्यक्रम बनकर रह जाएगा।

स्प्रे बड़े शोर-शराबे से छिड़का जाएगा।

और कॉकरोच हर बार मुस्कुराते हुए लौट आएँगे।

तो आख़िर नालियाँ किसने खोलीं?

लेकिन हर चुनाव, हर धरना, हर इस्तीफा और हर सियासी पुनर्जन्म के साथ वही जानी-पहचानी खड़खड़ाहट फिर सुनाई देती है।

रोशनी मंद पड़ती है।

कैमरे बंद हो जाते हैं।

दिल्ली की चमचमाती इमारतों के नीचे कहीं डिचकॉक मुस्कुराता है।

मैनहोल का ढक्कन धीरे-धीरे उठता है।

और एक खुशमिजाज़ आवाज़ फुसफुसाती है—

"फिक्र मत कीजिए... इंटरवल खत्म हो गया है!"

Friday, July 24, 2026

 हर पाँचवाँ भारतीय होगा बुजुर्ग: क्या भारत तैयार है इस नई चुनौती के लिए?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

26 जुलाई 2026

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एक सुबह घर में अजीब-सी ख़ामोशी उतर आती है। बच्चे अपने-अपने शहरों में खो चुके हैं। फ़ोन की घंटी अब कम ही बजती है। घुटनों का दर्द बढ़ता है, यादें धुंधली पड़ने लगती हैं और तन्हाई बिना दस्तक दिए घर की स्थायी मेहमान बन जाती है। यह सिर्फ़ कुछ बुज़ुर्गों की कहानी नहीं, बल्कि उस भारत की तस्वीर है, जहाँ हर पाँचवाँ नागरिक जल्द ही बुज़ुर्ग होगा।

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भारत अब एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां उसकी सबसे बड़ी ताकत ही उसकी सबसे बड़ी चुनौती बनने जा रही है। दुनिया लंबे समय तक भारत को "यंग इंडिया" के नाम से जानती रही, लेकिन आने वाले वर्षों में तस्वीर बदलने वाली है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) की 2023 की रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2050 तक देश में 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की संख्या बढ़कर लगभग 34.7 करोड़ हो जाएगी। यानी हर पांचवां भारतीय वरिष्ठ नागरिक होगा। आज यह संख्या लगभग 15 करोड़ है। यह केवल जनसंख्या का बदलाव नहीं, बल्कि समाज, अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाओं और पारिवारिक व्यवस्था में आने वाले बड़े परिवर्तन का संकेत है।

लोग पहले से अधिक लंबा जीवन जी रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या वे स्वस्थ, सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन भी जी पाएंगे? 

यही वह चुनौती है, जिसके समाधान की दिशा में हेल्पएज इंडिया ने नई दिल्ली में इंस्टीट्यूट फॉर लॉन्गेविटी एंड एजिंग रिसर्च (ILAR) की स्थापना की है। 22 जुलाई 2026 को इसका उद्घाटन नीति आयोग के पूर्व सदस्य (स्वास्थ्य) डॉ. विनोद कुमार पॉल ने किया। उन्होंने कहा कि भारत को वृद्धावस्था के लिए अपना ऐसा मॉडल विकसित करना होगा, जिसमें भारतीय पारिवारिक मूल्यों, सामुदायिक सहयोग और आधुनिक विज्ञान का संतुलित समावेश हो।

भारत में औसत आयु लगातार बढ़ रही है, लेकिन स्वस्थ जीवन की अवधि अब भी सीमित है। बड़ी संख्या में बुजुर्ग मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, गठिया और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे हैं। दूसरी ओर, संयुक्त परिवारों का टूटना, युवाओं का रोज़गार के लिए बड़े शहरों की ओर पलायन और बढ़ता अकेलापन बुजुर्गों के जीवन को और कठिन बना रहा है। महिलाओं की स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण है। विधवा होने की अधिक संभावना और आर्थिक निर्भरता उन्हें अतिरिक्त असुरक्षा की ओर धकेल देती है।

हालांकि इस बदलती तस्वीर का एक सकारात्मक पक्ष भी है। तेजी से बढ़ती वरिष्ठ नागरिक आबादी "सिल्वर इकोनॉमी" के रूप में एक नया अवसर लेकर आ रही है। स्वास्थ्य सेवाएं, दवाइयां, सहायक तकनीक, वरिष्ठ नागरिकों के लिए अनुकूल आवास, बीमा और वित्तीय सेवाओं जैसे क्षेत्रों में बड़ी संभावनाएं उभर रही हैं। लेकिन इन अवसरों का लाभ तभी मिलेगा, जब देश समय रहते अपनी नीतियों और व्यवस्थाओं को तैयार करेगा।

इसी सोच के साथ ILAR को केवल एक शोध संस्थान नहीं, बल्कि नीति निर्माण, अनुसंधान, नवाचार और व्यावहारिक समाधान का राष्ट्रीय मंच बनाया गया है। संस्थान के निदेशक प्रो. अनिल कुमार इंदिरा कृष्णन का कहना है कि लंबी उम्र का अर्थ केवल जीवन के वर्षों में वृद्धि नहीं, बल्कि उन वर्षों में स्वास्थ्य, सम्मान और खुशहाली जोड़ना है। उनका मानना है कि भविष्य की नीतियां तभी प्रभावी होंगी, जब उनके केंद्र में स्वयं बुजुर्गों के अनुभव और उनकी जरूरतें हों।

संस्थान स्वस्थ वृद्धावस्था, सिल्वर इकोनॉमी, वरिष्ठ नागरिकों के अधिकार, उम्र-अनुकूल तकनीक और वृद्धावस्था से जुड़ी सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों पर व्यापक शोध करेगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, टेलीमेडिसिन और स्मार्ट उपकरणों के बेहतर उपयोग से लेकर अकेलेपन, देखभाल और सामुदायिक सहयोग जैसे विषय भी इसकी प्राथमिकताओं में शामिल होंगे। हर वर्ष "स्टेट ऑफ एजिंग इन इंडिया" रिपोर्ट प्रकाशित करने, सिल्वर टेक इनोवेशन लैब स्थापित करने, स्वास्थ्य वेधशाला विकसित करने और युवा शोधकर्ताओं के लिए फेलोशिप कार्यक्रम शुरू करने की भी योजना है।

हेल्पएज इंडिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी रोहित प्रसाद का मानना है कि आने वाले दो दशकों में वृद्धावस्था देश के सामने सबसे बड़ी सामाजिक चुनौतियों में होगी। उनका कहना है कि केवल सरकार के प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे। विश्वविद्यालयों, उद्योग जगत, कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) संस्थाओं और नागरिक समाज को मिलकर काम करना होगा। साक्ष्य-आधारित नीतियों और पर्याप्त निवेश के बिना भविष्य की इस चुनौती का सामना करना कठिन होगा।

हेल्पएज इंडिया स्वयं इस क्षेत्र में कोई नया नाम नहीं है। वर्ष 1978 से संस्था वरिष्ठ नागरिकों के स्वास्थ्य, आजीविका, अधिकारों की रक्षा और आपदा राहत के क्षेत्र में लगातार काम कर रही है। पिछले लगभग पांच दशकों में उसे संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या पुरस्कार और भारत सरकार के वयोश्रेष्ठ सम्मान सहित कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं। ILAR उसी लंबे अनुभव और विशेषज्ञता का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव है।

अब समय आ गया है कि भारत वृद्धावस्था को केवल सामाजिक बोझ के रूप में देखने की मानसिकता बदले। वरिष्ठ नागरिक अनुभव, ज्ञान और सामाजिक पूंजी का महत्वपूर्ण स्रोत हैं। उनके लिए उम्र-अनुकूल शहर, बेहतर सार्वजनिक परिवहन, सामुदायिक देखभाल केंद्र, मजबूत पेंशन व्यवस्था, व्यापक बीमा कवरेज, डिजिटल साक्षरता और ऐसी पीढ़ीगत पहलें विकसित करनी होंगी, जिनसे युवा और बुजुर्ग एक-दूसरे के अनुभवों से सीख सकें।

वर्ष 2050 का भारत आज लिए गए फैसलों पर निर्भर करेगा। यदि अभी दूरदर्शी नीतियां बनाई गईं और पर्याप्त निवेश किया गया, तो देश केवल अधिक आयु वाला समाज नहीं बनेगा, बल्कि ऐसा समाज बनेगा जहां बुजुर्ग स्वस्थ, सक्रिय, आत्मनिर्भर और सम्मानजनक जीवन जी सकेंगे। किसी भी सभ्य समाज की असली पहचान इस बात से होती है कि वह अपने वरिष्ठ नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है। ILAR ने इस दिशा में एक महत्वपूर्ण शुरुआत कर दी है। अब जरूरत है कि सरकार, निजी क्षेत्र और समाज मिलकर इसे राष्ट्रीय जनआंदोलन का रूप दें, ताकि बढ़ती उम्र भारत के लिए चुनौती नहीं, बल्कि नई ताकत बन सके।


Thursday, July 23, 2026

 बृज मंडल की हरियाली कौन निगल रहा है?

फैंसी प्रोजेक्ट बढ़ रहे हैं, पेड़ घट रहे हैं!

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

25 जुलाई 2026

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ब्रज मंडल या ताज ट्रिपेजियम जोन, पर खतरा फिर मंडरा रहा है। इस बार हमला सिर्फ धुएँ या कारखानों से नहीं है। उसके सबसे पुराने पहरेदार, उसके पेड़, तेजी से गायब हो रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने टीटीज़ेड में 10,700 से अधिक पूर्ण विकसित पेड़ों की कटाई को मंजूरी दे दी है। इन पेड़ों की बलि सड़कों, एक्सप्रेसवे, रेलवे लाइन, एयरपोर्ट विस्तार और दूसरे बड़े प्रोजेक्टों के लिए दी जाएगी। विकास ज़रूरी है, इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन सवाल यह है कि क्या विकास हरियाली की कीमत पर होगा? मथुरा, वृन्दावन, गोवर्धन में पिछले कुछ वर्षों में हजारों पेड़ कट चुके हैं।

टीटीज़ेड का गठन 1990 के दशक में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक एम.सी. मेहता मामले के बाद हुआ था। करीब 10,400 वर्ग किलोमीटर में फैला यह क्षेत्र आगरा, मथुरा, वृंदावन और आसपास के जिलों को समेटता है। इसका उद्देश्य था ताजमहल को प्रदूषण और पर्यावरणीय क्षरण से बचाना। आज वही सुरक्षा कवच धीरे-धीरे टूट रहा है।

हर साल हजारों पेड़ गायब हो रहे हैं। कहीं सड़क चौड़ी हो रही है, कहीं एक्सप्रेसवे बन रहा है। कहीं कॉलोनियाँ उग रही हैं, कहीं व्यावसायिक परिसर। शहर फैल रहे हैं, और हरियाली सिमट रही है। कंक्रीट का जंगल बढ़ रहा है, असली जंगल पीछे हट रहे हैं।

ताजमहल को प्रदूषण से बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 1996 में 10,400 वर्ग किमी क्षेत्र में ताज ट्रेपेजियम ज़ोन (TTZ) बनाया। इसके बावजूद हरित क्षेत्र लगातार घट रहा है। 2017 में छह जिलों का वन क्षेत्र 664 वर्ग किमी था, जो 2019 में घटकर 657.71 वर्ग किमी रह गया। आगरा में भी 9.38 वर्ग किमी वन क्षेत्र कम हुआ। शहरीकरण, निर्माण, पेड़ों की कटाई, अतिक्रमण, प्रदूषण और जल संकट इसके प्रमुख कारण हैं। लाखों पौधे लगाए जा रहे हैं, लेकिन रखरखाव की कमी से उनकी जीवित रहने की दर अपेक्षा से कम है। केवल पौधारोपण नहीं, बल्कि पेड़ों का संरक्षण भी जरूरी है।

सरकारें कहती हैं कि एक पेड़ के बदले दस पौधे लगाए जाएंगे। कागज़ पर यह तर्क अच्छा लगता है। मगर प्रकृति फाइलों से नहीं चलती।

एक पुराना पेड़ बनने में कई दशक लगते हैं। वह कार्बन सोखता है, छाया देता है, हवा साफ करता है, पक्षियों को आश्रय देता है और शहर का तापमान कम करता है। एक छोटा पौधा वर्षों तक उसकी बराबरी नहीं कर सकता। ऊपर से लगाए गए अनेक पौधे देखभाल के अभाव में सूख जाते हैं।

आगरा पहले ही खराब हवा से जूझ रहा है। धूल, वाहनों का धुआँ और लगातार निर्माण गतिविधियाँ प्रदूषण बढ़ा रही हैं। ऐसे में पेड़ों की कटाई शहर की प्राकृतिक ढाल को कमजोर कर देगी। गर्मी और बढ़ेगी, हवा और खराब होगी।

यमुना के बाढ़ क्षेत्र भी इससे प्रभावित होंगे। पेड़ मिट्टी को बचाते हैं, भूजल को रिचार्ज करते हैं और जैव विविधता को सहारा देते हैं। उनके खत्म होने से पूरा पारिस्थितिकी तंत्र कमजोर पड़ता है।

पर्यावरणविद् डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य का कहना है, "विकास का विरोध नहीं है। लेकिन हर परियोजना में पहले यह देखा जाना चाहिए कि कितने पुराने पेड़ों को बचाया जा सकता है। हजारों पेड़ काटना आख़िरी विकल्प होना चाहिए, पहला नहीं।"

वरिष्ठ पर्यावरण कार्यकर्ता डॉ मुकुल पांड्या कहते हैं, "आगरा की हरियाली जितनी तेजी से खत्म हो रही है, उतनी तेजी से लौट नहीं रही। पेड़ सिर्फ सौंदर्य नहीं हैं, वे शहर के फेफड़े हैं।"

वृन्दावन के ग्रीन एक्टिविस्ट जगन नाथ पोद्दार कहते हैं, "सरकारें सड़कों और पुलों का उद्घाटन करती हैं, जंगलों का नहीं। पेड़ों को जीवनदाता नहीं, बाधा समझा जाने लगा है। यही सबसे बड़ी त्रासदी है।"

असल सवाल विकास बनाम पर्यावरण का नहीं है। समझदारी भरे विकास का है। सड़कों का मार्ग बदला जा सकता है। एलिवेटेड कॉरिडोर बनाए जा सकते हैं। पेड़ों का वैज्ञानिक प्रत्यारोपण किया जा सकता है। लगाए गए पौधों की स्वतंत्र निगरानी होनी चाहिए और उनकी जीवित रहने की दर सार्वजनिक की जानी चाहिए।

टीटीज़ेड एक दूरदर्शी सोच का परिणाम था। उसे सिर्फ कागज़ी बाघ बनाकर नहीं छोड़ा जा सकता।

विडंबना देखिए। मोहब्बत की सबसे खूबसूरत निशानी ताजमहल अपने प्राकृतिक रखवालों को खो रहा है। एक सौ साल पुराने पेड़ को काटना आसान है, लेकिन उसे वापस लाने में कई पीढ़ियाँ लग जाती हैं।

ताजमहल को सिर्फ चमकदार पत्थरों की नहीं, साफ हवा, बहती यमुना और जीवित जंगलों की ज़रूरत है। प्रकृति को कुर्बान करके मिलने वाला विकास दरअसल विकास नहीं, आने वाली पीढ़ियों पर थोपा गया कर्ज है।


Tuesday, July 21, 2026

 बढ़ती फीस, घटते स्तर

निजी स्कूलों की बढ़ती फीस:

क्या हमें अपनी जेब के हिसाब से तालीम मिल रही है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

23 जुलाई 2026

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साल 1964-65 में मेरे माता-पिता आगरा के सेंट पीटर्स कॉलेज की मासिक फीस सिर्फ 6 से 10 रुपये भरते थे। स्कूल की यूनिफॉर्म साधारण सूती खाकी होती थी और इसके अलावा कोई छिपा हुआ खर्च नहीं था।

आज आगरा के डीपीएस या प्रील्यूड पब्लिक स्कूल जैसे बड़े निजी स्कूल हर महीने 12,000 से 16,000 रुपये तक फीस लेते हैं। यानी साल भर में करीब 1.5 लाख से 4 लाख रुपये का खर्च। यह बढ़ोतरी 1,50,000 प्रतिशत से भी ज्यादा है। इसी दौरान देश में महंगाई लगभग 100 से 120 गुना बढ़ी है।

सवाल यह है कि स्कूलों की फीस बाकी चीजों के मुकाबले इतनी तेज़ी से क्यों बढ़ी? और क्या तालीम की गुणवत्ता भी उतनी ही बेहतर हुई है?

फीस बढ़ने के पीछे कई वजहें हैं। शिक्षकों का वेतन बढ़ा है। स्कूलों की इमारतें आधुनिक हुई हैं। स्मार्ट क्लास, कंप्यूटर, लैब और खेल सुविधाओं पर खर्च बढ़ा है। सरकार के नए नियमों का पालन करना पड़ता है। साथ ही मध्यम वर्ग के परिवार अपने बच्चों को "प्रीमियम" स्कूलों में पढ़ाना चाहते हैं।

आज भारत के लगभग आधे बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं। बड़े स्कूल स्मार्ट क्लासरूम, विज्ञान प्रयोगशालाएं, खेल मैदान, बस सेवा, सह-पाठ्यक्रम गतिविधियां और जेईई तथा नीट जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी कराते हैं।

माता-पिता अब सिर्फ पढ़ाई के लिए नहीं, बल्कि बेहतर माहौल, अच्छे सहपाठियों, सामाजिक रुतबे और कॉलेज में दाखिले की उम्मीद के लिए भी पैसा खर्च कर रहे हैं। पिछले दस वर्षों में शहरों के निजी स्कूलों की फीस करीब 169 प्रतिशत बढ़ी है, जबकि लोगों की आमदनी इतनी तेज़ नहीं बढ़ी।

यहीं से फिक्र शुरू होती है। इसमें कोई शक नहीं कि आज के स्कूल 1960 के दशक की तुलना में कहीं अधिक आधुनिक हैं। भारतीय छात्र बोर्ड परीक्षाओं, जेईई और नीट जैसी कठिन परीक्षाओं में अच्छा प्रदर्शन करते हैं। इसी वजह से भारत बड़ी संख्या में सक्षम इंजीनियर और वैज्ञानिक तैयार करता है।

लेकिन जब बात अंतरराष्ट्रीय स्तर की परीक्षा PISA (Programme for International Student Assessment) की आती है, जो रटने के बजाय सोचने, समझने और वास्तविक जीवन में ज्ञान का इस्तेमाल करने की क्षमता को परखती है, तब भारत का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है।

साल 2009 में, जब भारत ने इस परीक्षा में भाग लिया, तब उसकी रैंकिंग सबसे नीचे रहने वाले देशों में थी। वियतनाम, एस्टोनिया और फिनलैंड जैसे देश भारत से काफी आगे रहे। निजी स्कूलों के छात्र सरकारी स्कूलों से बेहतर थे, लेकिन दुनिया के मानकों तक नहीं पहुंच सके।

उसके बाद भारत ने पीसा में हिस्सा नहीं लिया। लेकिन देश के अपने सर्वे भी यही तस्वीर दिखाते हैं। ASER (Annual Status of Education Report) और NAS (National Achievement Survey), जिसे अब PARAKH राष्ट्रीय सर्वेक्षण कहा जाता है, बताते हैं कि निजी स्कूलों के बहुत से बच्चे भी अपनी कक्षा के स्तर के अनुसार न ठीक से पढ़ पाते हैं और न ही गणित कर पाते हैं।

इसकी एक बड़ी वजह यह है कि हमारे स्कूल अब भी समझ विकसित करने के बजाय रटने पर ज़्यादा ज़ोर देते हैं।

एक सेवानिवृत्त शिक्षक का कहना है कि निजी स्कूलों की बेहतर छवि का एक और राज़ है। इनमें ज़्यादातर दाखिला उन परिवारों के बच्चों को मिलता है, जिनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति पहले से बेहतर होती है। इसलिए अच्छे नतीजों का पूरा श्रेय केवल स्कूलों की पढ़ाई को नहीं दिया जा सकता।

माता-पिता भारी-भरकम फीस इस उम्मीद से भरते हैं कि बच्चों को बेहतरीन तालीम मिलेगी। लेकिन फीस जितनी तेज़ी से बढ़ी है, शिक्षा की गुणवत्ता उतनी नहीं बढ़ी। बड़ी कक्षाएं, शिक्षकों की असमान ट्रेनिंग और परीक्षा-केंद्रित पढ़ाई आज भी आम समस्या हैं।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का मकसद रटने की संस्कृति कम करना और बच्चों में सोचने-समझने, हुनर और व्यवहारिक ज्ञान को बढ़ावा देना है। लेकिन ज़मीन पर इन बदलावों को लागू होने में अभी वक्त लगेगा।

फीस और शिक्षा की गुणवत्ता के बीच बढ़ता यह फ़ासला परिवारों की जेब पर भारी पड़ रहा है। इससे अच्छी शिक्षा सिर्फ़ अमीरों तक सीमित होने का ख़तरा भी बढ़ रहा है। सबसे बड़ी कमी यह है कि स्कूलों से यह साबित करने की कोई ठोस जवाबदेही नहीं मांगी जाती कि बढ़ी हुई फीस से बच्चों की सीखने की क्षमता भी वास्तव में बेहतर हुई है।

अगर 1965 का कोई छात्र आज के स्कूल देखे, तो वह शानदार इमारतों, स्मार्ट क्लासरूम और आधुनिक तकनीक से ज़रूर हैरान होगा। लेकिन शायद वह यह सवाल भी पूछे कि क्या असली तालीम भी उतनी ही आगे बढ़ी है, जितनी फीस बढ़ी है?

जब तक स्कूलों का हिसाब सिर्फ़ चमकदार इमारतों और सुविधाओं से नहीं, बल्कि बच्चों के वास्तविक सीखने के नतीजों से नहीं लिया जाएगा, तब तक माता-पिता शायद अच्छी शिक्षा से ज़्यादा उसकी चमक-दमक की कीमत चुकाते रहेंगे।

Monday, July 20, 2026

 फ्लैट संस्कृति की तरफ बढ़ रहे शहर

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उत्तर प्रदेश कब जागेगा?

फ्लैट खरीदारों को बिल्डरों और आरडब्ल्यूए की मनमानी से बचाना जरूरी

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

2 2 जुलाई, 2026

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घर हर इंसान का सबसे बड़ा सपना होता है। लोग पूरी उम्र की कमाई, भविष्य निधि, बैंक कर्ज और अपनी तमाम बचत लगाकर एक फ्लैट खरीदते हैं। उम्मीद रहती है कि अब परिवार को सुरक्षित और सुकून भरी ज़िंदगी मिलेगी। 

मगर उत्तर प्रदेश के हजारों अपार्टमेंटों में यह सपना धीरे-धीरे एक दर्दनाक हकीकत में बदलता जा रहा है। फ्लैट मिलने के बाद भी लोग राहत नहीं, बल्कि रोज़ नई परेशानियों, झगड़ों और कानूनी लड़ाइयों में उलझ जाते हैं।

भारत में फ्लैट या अपार्टमेंट मुख्य रूप से शहरी इलाकों की पहचान हैं और अभी भी देश के कुल आवासों में इनकी हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम है। शहरी क्षेत्रों में लगभग 31 प्रतिशत परिवार फ्लैटों में रहते हैं, जबकि छोटे शहरों में यह आंकड़ा करीब 24 प्रतिशत है। राष्ट्रीय स्तर पर केवल 10–15 प्रतिशत परिवार ही अपार्टमेंट में रहते हैं, क्योंकि अधिकांश लोग, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में, स्वतंत्र मकानों में रहते हैं। तेज़ी से बढ़ता शहरीकरण, जमीन की कमी, छोटे परिवार और आधुनिक सुविधाओं की बढ़ती मांग फ्लैट संस्कृति को बढ़ावा दे रहे हैं। भारत में हर वर्ष लगभग 12 से 15 लाख नए शहरी फ्लैट बनते हैं, लेकिन देशभर में फ्लैटों की कुल संख्या का कोई एकीकृत और अद्यतन सरकारी आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।

इस बीच कर्नाटक सरकार ने एक ऐसी पहल की है, जिससे दूसरे राज्यों को भी सबक लेना चाहिए। कर्नाटक अपार्टमेंट (ओनरशिप एंड मैनेजमेंट) एक्ट, 2026 का मसौदा तैयार किया गया है। इस कानून को बनाने से पहले राज्य की 500 से अधिक अपार्टमेंट एसोसिएशनों के प्रतिनिधियों से विस्तार से राय ली गई। मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के सामने फ्लैट मालिकों ने साफ कहा कि उन्हें मजबूत कानूनी सुरक्षा, पूरी पारदर्शिता और बिल्डरों की जवाबदेही चाहिए।

अब सवाल यह है कि उत्तर प्रदेश ऐसा कानून कब बनाएगा?

आगरा, मथुरा, वृंदावन, लखनऊ, नोएडा, गाजियाबाद, कानपुर और तेजी से बढ़ते दूसरे शहरों में लाखों लोग बहुमंजिला इमारतों में रह रहे हैं। लेकिन इन सोसाइटियों में रहने वाले परिवार अक्सर तीन तरफ़ा दबाव झेलते हैं। 

एक ओर बिल्डर हैं, जो फ्लैट बेचने के बाद अपनी जिम्मेदारी से किनारा कर लेते हैं। दूसरी ओर कई रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन यानी आरडब्ल्यूए हैं, जिनमें लोकतंत्र की जगह कुछ लोगों का कब्ज़ा बना रहता है। तीसरी ओर सरकारी एजेंसियां हैं, जो अक्सर तब तक सक्रिय नहीं होतीं, जब तक मामला अदालत या बड़े विरोध प्रदर्शन तक नहीं पहुंच जाता।

कई सोसाइटियों में वर्षों से निष्पक्ष चुनाव नहीं हुए हैं। वही लोग लगातार पदों पर बने रहते हैं। रखरखाव शुल्क हर साल बढ़ता जाता है, लेकिन खर्च का पूरा हिसाब निवासियों के सामने नहीं रखा जाता। ऑडिट या तो होता नहीं या फिर उसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाती। आम निवासी यह तक नहीं जान पाते कि उनकी मेहनत की कमाई आखिर खर्च कहां हो रही है।

मुसीबत यहीं खत्म नहीं होती। कई बिल्डर आरडब्ल्यूए बनने के बाद भी साझा सुविधाओं, कॉमन एरिया, रखरखाव निधि और जरूरी दस्तावेज समय पर नहीं सौंपते। इसका नुकसान सीधे फ्लैट मालिकों को उठाना पड़ता है। वे सालों तक अनिश्चितता में जीते रहते हैं।

दूसरी तरफ निर्माण की गुणवत्ता भी गंभीर चिंता का विषय है। कहीं छत टपकती है, कहीं दीवारों में दरारें पड़ जाती हैं। खराब पाइपलाइन, बिजली की अव्यवस्थित वायरिंग और दूसरी तकनीकी खामियां लोगों की सुरक्षा पर सवाल खड़े करती हैं। शिकायत करने पर बिल्डर अक्सर जिम्मेदारी लेने से बचते हैं।

रोजमर्रा की सुविधाओं का हाल भी कम खराब नहीं है। पानी की अनियमित आपूर्ति, बार-बार खराब होने वाली लिफ्ट, बंद पड़े सीसीटीवी कैमरे, कमजोर सुरक्षा व्यवस्था, कूड़े के ढेर और अग्निशमन के अधूरे इंतजाम कई सोसाइटियों की पहचान बन चुके हैं। पूजा स्थल,  क्लब हाउस, जिम, स्विमिंग पूल, पार्क और बच्चों के खेल मैदान का सपना दिखाकर फ्लैट बेचे जाते हैं, वे कई बार सिर्फ विज्ञापनों तक ही सीमित रह जाते हैं।

पार्किंग को लेकर भी विवाद लगातार बढ़ रहे हैं। कई जगह विज़िटर पार्किंग तक बेच दी जाती है। साझा जगहों पर कब्ज़ा हो जाता है और आए दिन झगड़े होते रहते हैं। शिकायत करने वाले लोगों को भी कई बार मानसिक दबाव या उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है।

सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि अलग-अलग कानूनों और नियमों के कारण अधिकार और जिम्मेदारियां साफ नहीं हैं। अदालतों में ऐसे हजारों मामले वर्षों तक लंबित रहते हैं। आम परिवार समय और पैसा दोनों गंवाता है, जबकि बड़े बिल्डर कानूनी पेचीदगियों का फायदा उठाते रहते हैं।

ऐसे में उत्तर प्रदेश को भी कर्नाटक की तर्ज पर एक व्यापक और प्रभावी अपार्टमेंट स्वामित्व एवं प्रबंधन कानून बनाने की जरूरत है। हर सोसाइटी में समयबद्ध और निष्पक्ष चुनाव अनिवार्य हों। आरडब्ल्यूए बनते ही बिल्डर सभी साझा संपत्तियां, रखरखाव निधि और जरूरी दस्तावेज तुरंत सौंपे। हर साल स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए और उसकी रिपोर्ट सभी निवासियों के लिए सार्वजनिक हो। बैठकों में ऑनलाइन भागीदारी की सुविधा भी हो, ताकि अधिक से अधिक लोग निर्णय प्रक्रिया में शामिल हो सकें।

भ्रष्टाचार उजागर करने वाले लोगों को कानूनी सुरक्षा मिले। शिकायतों का निपटारा महीनों में हो, वर्षों में नहीं। साथ ही नियामक संस्थाओं को ऐसे अधिकार दिए जाएं कि वे नियम तोड़ने वाले बिल्डरों और मनमानी करने वाले आरडब्ल्यूए पर भारी जुर्माना लगा सकें और जरूरत पड़ने पर उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई कर सकें।

भारत के शहर तेजी से अपार्टमेंट संस्कृति की ओर बढ़ रहे हैं। आने वाले वर्षों में करोड़ों परिवार बहुमंजिला इमारतों में रहेंगे। ऐसे में पुराने और बिखरे हुए कानून अब पर्याप्त नहीं हैं। समय की मांग है कि फ्लैट खरीदारों के अधिकारों को मजबूत कानूनी सुरक्षा मिले।

कर्नाटक ने इस दिशा में कदम बढ़ा दिया है। अब उत्तर प्रदेश सरकार, रेरा, नगर निकायों, आवास विकास संस्थाओं और उपभोक्ता मंचों को भी मिलकर ठोस फैसला लेना होगा।

फ्लैट मालिक कोई एहसान नहीं मांग रहे। उन्होंने अपने खून-पसीने की कमाई से घर खरीदा है। उन्हें सिर्फ वही हक चाहिए, जिसकी कीमत वे पहले ही चुका चुके हैं। आखिर घर सुकून की जगह होना चाहिए, अदालतों और विवादों का स्थायी मैदान नहीं। उत्तर प्रदेश जितनी जल्दी यह सच समझेगा, उतनी ही जल्दी लाखों परिवारों की जिंदगी आसान हो सकेगी।

Saturday, July 18, 2026

 


बिना मरीज के डॉक्टर!!!

शोध के कुली: नाम के आगे 'डॉ.' लगाने की दौड़ या ज्ञान की तलाश?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

20 जुलाई, 2026

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आजकल भारत में पीएचडी की बड़ी धूम है। हर साल करीब 30 से 35 हजार लोग डॉक्टरेट की डिग्री हासिल कर रहे हैं। विश्वविद्यालयों में शोधार्थियों (रिसर्च स्कॉलरों) की संख्या साढ़े तीन लाख के आसपास पहुँच चुकी है। कागज़ पर यह तस्वीर बहुत शानदार दिखती है। लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और ही कहानी सुनाती है।

पीएचडी का मक़सद नए विचार पैदा करना, देश की समस्याओं का हल ढूँढ़ना और समाज को आगे बढ़ाना था। अफ़सोस, कई जगह यह डिग्री सिर्फ़ नाम के आगे "डॉ." लगाने का ज़रिया बनकर रह गई है। ज्ञान की जगह दिखावा, गुणवत्ता की जगह संख्या और मौलिक सोच की जगह औपचारिकता ने ले ली है।

आज कई शोधार्थी खुद को शोधकर्ता नहीं, बल्कि "रिसर्च कुली" महसूस करते हैं। वे वर्षों तक मेहनत करते हैं, लेकिन सम्मान, मार्गदर्शन और सुरक्षा के बजाय उन्हें दबाव, अनिश्चितता और शोषण का सामना करना पड़ता है।

सबसे बड़ी बीमारी है "छापो या मिट जाओ" की संस्कृति। विश्वविद्यालयों और शिक्षकों के मूल्यांकन में शोध-पत्रों की संख्या को बहुत अहमियत दी जाती है। नतीजा यह हुआ कि अच्छी रिसर्च करने के बजाय ज़्यादा से ज़्यादा शोध-पत्र छापने की होड़ मच गई।

इस होड़ ने एक पूरा कारोबार खड़ा कर दिया है। पैसे देकर शोध-पत्र लिखवाना, नकली या घटिया पत्रिकाओं में उन्हें छपवाना और एक ही शोध को कई हिस्सों में बाँटकर अलग-अलग प्रकाशित करना आम बात बन गई है। ऐसे कई शोध-पत्र बाद में वापस भी लेने पड़े। इससे भारतीय शोध की साख  पर सवाल उठे हैं।

दुख की बात यह है कि इन शोधों का बड़ा हिस्सा न उद्योग के काम आता है, न किसानों के, न अस्पतालों के और न समाज के। वे सिर्फ़ विश्वविद्यालय की अलमारी या ऑनलाइन भंडार में धूल खाते रहते हैं।

एक और बड़ी समस्या है शोध-निर्देशक और शोधार्थी के बीच असमान ताक़त का रिश्ता। कई जगह मार्गदर्शक (गाइड) छात्रों पर इतना नियंत्रण रखते हैं कि उनका भविष्य पूरी तरह उन्हीं के हाथ में होता है।

कई संस्थानों से शिकायतें सामने आई हैं कि शोधार्थियों से निजी काम कराए जाते हैं। किसी से गाड़ी चलवाई जाती है, किसी से घरेलू काम करवाए जाते हैं। कई बार सेक्सुअल हरासमेंट की खबरें भी आई हैं। कहीं थीसिस पास कराने के बदले महंगे तोहफ़ों या नक़द की माँग तक के आरोप लगे। जो छात्र विरोध करे, उसकी थीसिस महीनों या वर्षों तक अटक सकती है। यह रिश्ता गुरु-शिष्य का कम और मालिक-मज़दूर का ज़्यादा लगता है।

देश के बड़े और प्रतिष्ठित संस्थान भी इस बीमारी से पूरी तरह अछूते नहीं हैं। लंबे कार्य घंटे, सप्ताह में सत्तर-अस्सी घंटे लैब में रहने का दबाव और लगातार प्रदर्शन साबित करने की मजबूरी ने अनेक शोधार्थियों को मानसिक तनाव की तरफ़ धकेला है।

पीएचडी का सफ़र वैसे ही आसान नहीं होता। कम छात्रवृत्ति, भविष्य की अनिश्चितता, अकेलापन और लगातार दबाव कई छात्रों को चिंता और अवसाद की ओर ले जाता है। बहुत-से विश्वविद्यालयों में मानसिक स्वास्थ्य की समुचित सुविधा भी उपलब्ध नहीं है।

डिग्री पूरी होने के बाद भी तस्वीर बहुत उत्साहजनक नहीं है। हर साल हज़ारों नए पीएचडी धारक नौकरी की तलाश में निकलते हैं। लेकिन विश्वविद्यालयों में स्थायी पद सीमित हैं और उद्योग जगत अभी भी शोधकर्ताओं का पूरा उपयोग नहीं कर पा रहा है।

नतीजा यह होता है कि अनेक पीएचडी धारक अतिथि शिक्षक, अस्थायी व्याख्याता या अपनी योग्यता से बिल्कुल अलग काम करने को मजबूर हो जाते हैं। वर्षों की मेहनत के बाद भी उन्हें वह सम्मान और अवसर नहीं मिलता जिसकी उन्होंने उम्मीद की थी।

भारत में पेटेंट की संख्या बढ़ी है, लेकिन उनमें से बहुत कम तकनीक बाज़ार तक पहुँच पाती है। कुछ आईआईटी, आईआईएससी और चुनिंदा संस्थानों को छोड़ दें, तो अधिकांश विश्वविद्यालयों का शोध प्रयोगशाला से बाहर निकल ही नहीं पाता। उसका लाभ न उद्योग को मिलता है और न आम नागरिक को।

यही वजह है कि डिग्रियाँ बढ़ रही हैं, लेकिन नवाचार (इनोवेशन) उसी रफ़्तार से नहीं बढ़ रहा। शोध का उद्देश्य समस्या का समाधान होना चाहिए, केवल शोध-पत्रों की गिनती नहीं।

सरकार ने अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फ़ाउंडेशन (एएनआरएफ), उद्योग से जुड़े पीएचडी कार्यक्रम और बेहतर वित्तीय सहायता जैसी कई पहल शुरू की हैं। ये अच्छी शुरुआत हैं, लेकिन पूरे तंत्र को बदलने के लिए अभी लंबा सफ़र तय करना बाकी है।

ज़रूरत इस बात की है कि शोध-निर्देशकों की जवाबदेही तय हो, छात्रों को सम्मानजनक माहौल मिले, मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान दिया जाए और विश्वविद्यालयों तथा उद्योगों के बीच मज़बूत साझेदारी बने। सबसे ज़रूरी यह है कि शोध का लक्ष्य देश की असली समस्याओं का हल निकालना हो।

भारत को केवल आँकड़ों में सबसे ज़्यादा पीएचडी नहीं चाहिए। देश को ऐसे शोध चाहिए जो खेतों की पैदावार बढ़ाएँ, अस्पतालों को बेहतर बनाएँ, कारखानों को नई तकनीक दें, रोज़गार पैदा करें और लोगों का जीवन आसान बनाएँ।

जब तक पीएचडी केवल प्रतिष्ठा (शोहरत) का तमगा बनी रहेगी, तब तक शोधार्थी ज्ञान के निर्माता नहीं, बल्कि व्यवस्था के "शोध के कुली" बने रहेंगे। डिग्री की असली कीमत उसके काग़ज़ में नहीं, बल्कि उससे पैदा होने वाले बदलाव में होती है। वही बदलाव भारत की सबसे बड़ी ज़रूरत है।


Friday, July 17, 2026

 पौराणिक कहानियां क्यों लुभाती हैं?

क्या है मिथकों का मिथक?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

19 जुलाई 2026

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सिनेमा हॉल में सन्नाटा पसरा है। विशाल पर्दे पर देवता और असुर आमने-सामने खड़े हैं। तलवारें चमकती हैं, शंख गूंजते हैं, आकाश में दिव्य अस्त्र बरसते हैं। जैसे ही धर्म की जीत होती है और राक्षस धराशायी होता है, पूरा हॉल तालियों और जयघोष से गूंज उठता है। कई दर्शकों की आंखें नम हैं। यह केवल एक फिल्म का अंत नहीं, बल्कि भीतर दबे डर, उम्मीद और न्याय की चाह का विस्फोट है। सदियों से इंसान ऐसी ही कहानियों में अपने मन का बोझ हल्का करता आया है।

फिल्म खत्म होती है, लेकिन कहानी नहीं। वही दर्शक घर लौटकर अपने बच्चों को भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार, राम की विजय या कृष्ण की लीलाएं सुनाते हैं। कर्नाटक के एक छोटे-से गांव में बरगद के नीचे बैठा एक बूढ़ा किस्सागो भी यही कर रहा है। वह राजा मनु और महाप्रलय की कथा सुनाता है। यही कहानी बाइबिल के नूह और मेसोपोटामिया के उत्नापिष्टिम की दास्तानों में भी सुनाई देती है। हज़ारों साल और हज़ारों किलोमीटर का फ़ासला मिट जाता है। कहानी वही रहती है, सिर्फ़ किरदार बदल जाते हैं. 

इंसान हमेशा से कहानियों का दीवाना रहा है। यही किस्से दुनिया के अलग-अलग मुल्कों और सदियों को एक धागे में पिरो देते हैं।

पौराणिक कथाएँ सिर्फ़ देवताओं, राक्षसों और चमत्कारों की पुरानी दास्तानें नहीं हैं। ये ज़िंदगी और मौत, नेकी और बुराई, उम्मीद और रहस्य को समझने का ज़रिया हैं। जब विज्ञान के पास जवाब नहीं थे, तब मिथकों ने इंसान को मायने दिए। हर सभ्यता ने ऐसे सवालों का जवाब खोजने के लिए अपनी कथाएँ गढ़ीं : हम यहाँ क्यों हैं? मौत के बाद क्या होता है? हमें कैसी ज़िंदगी जीनी चाहिए?

मिथक किसी भी समाज की सोच, आस्था और तहज़ीब की बुनियाद होते हैं। सदियों तक ये कहानियाँ आग के अलाव के पास बैठकर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक सुनाई जाती रहीं। बाद में इन्हें लिखा गया। इनमें कल्पना और प्रतीक ज़रूर हैं, लेकिन इनके भीतर इंसानी फ़ितरत और समाज की गहरी सच्चाइयाँ छिपी हैं। इनका असर धर्मों पर भी साफ़ दिखाई देता है।

मनोवैज्ञानिक कार्ल युंग का मानना था कि मिथक इंसान के "सामूहिक अवचेतन" से जन्म लेते हैं। यानी कुछ भावनाएँ और प्रतीक ऐसे हैं जो पूरी इंसानियत में साझा हैं। इसलिए दुनिया के अलग-अलग हिस्सों की कहानियाँ एक जैसी लगती हैं। जनचिंतक पारस नाथ झा कहते हैं कि मिथक हमें केवल कल्पना नहीं, बल्कि इंसानी अनुभव का आईना दिखाई देते हैं।

मिथकों का एक बड़ा मक़सद इंसान को सही रास्ता दिखाना भी है। देवताओं और नायकों की कहानियाँ साहस, ईमानदारी, दया और त्याग की सीख देती हैं। वहीं लालच, घमंड और जलन जैसी बुराइयों से आगाह करती हैं। स्वर्ग, नरक और परलोक की कथाएँ लोगों को नेक और मक़सद भरी ज़िंदगी जीने की प्रेरणा देती हैं।

हैरानी की बात यह है कि दुनिया की दूर-दराज़ सभ्यताओं में भी कई मिथक लगभग एक जैसे हैं, जबकि उनका आपस में कोई सीधा संपर्क नहीं था। महाप्रलय की कहानी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। हिंदू धर्म में विष्णु मनु को बचाते हैं, बाइबिल में नूह अपनी नाव से जीवन बचाते हैं और मेसोपोटामिया में उत्नापिष्टिम यही भूमिका निभाते हैं। ऐसी कथाएँ यूनान, चीन, ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों और माया सभ्यता में भी मिलती हैं। शायद ये किसी प्राचीन प्राकृतिक आपदा की याद हैं या फिर पानी के प्रति इंसान के साझा डर और सम्मान की अभिव्यक्ति।

एक और साझा विषय है; अराजकता से सृष्टि का जन्म। मिस्र की कथाओं में आदिकालीन जल से सूर्य देव प्रकट होते हैं। बेबीलोन की कथा में एक देवी के शरीर से धरती बनती है। यूनानी और हिंदू परंपराएँ भी बताती हैं कि व्यवस्था अव्यवस्था से पैदा हुई। यह यात्रा इंसान के भ्रम से समझ तक पहुँचने की कहानी भी है।

मिथकों के देवता अक्सर इंसानी समाज का ही प्रतिबिंब होते हैं। जैसे समाज में राजा, योद्धा और मेहनतकश होते हैं, वैसे ही देवताओं की भी अलग-अलग ज़िम्मेदारियाँ होती हैं। यूनानी कथाओं में ज़्यूस आकाश के, पोसाइडन समुद्र के और हेडीज़ पाताल के स्वामी हैं। हिंदू परंपरा में इंद्र वर्षा के देवता हैं, अग्नि अग्नि के और विष्णु सृष्टि के पालनकर्ता। इन कथाओं ने प्राचीन समाज को व्यवस्था, सत्ता और ज़िम्मेदारी समझने में मदद की।

अधिकांश मिथकों में एक संघर्ष हमेशा दिखाई देता है: व्यवस्था और अराजकता का। देवता और असुर, रोशनी और अंधेरा, नेकी और बुराई आमने-सामने खड़े होते हैं। यह केवल रोमांच नहीं, बल्कि इंसान के भीतर और समाज में चलने वाली जद्दोजहद का प्रतीक है।

आज हम पहले जैसी नई पौराणिक कथाएँ नहीं गढ़ते। लेकिन सुपरहीरो फ़िल्में, स्टार वॉर्स, अंतरिक्ष यात्राओं की कहानियाँ और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की दास्तानें उसी परंपरा का नया रूप हैं। विज्ञान ने बिजली, बादल और बाढ़ के रहस्यों को समझा दिया है, लेकिन इंसान की कल्पना और अर्थ की तलाश अब भी ज़िंदा है। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने साझा किस्सों की जगह अलग-अलग डिजिटल दुनिया बना दी है।

पौराणिक फ़िल्में आज इस आकर्षण की सबसे बड़ी मिसाल बन गई हैं। रामायण, महाभारत और यूनानी कथाओं पर बनी फ़िल्में दुनिया भर में करोड़ों दर्शकों को खींचती हैं। इनके विशाल दृश्य, असाधारण नायक और कर्तव्य, त्याग तथा नियति जैसे विषय लोगों को आज भी बाँध लेते हैं।

जेम्स कैमरून की अवतार इसका बेहतरीन उदाहरण है। पेंडोरा की चमकती दुनिया, अद्भुत जीव-जंतु और प्रकृति से गहरा आध्यात्मिक रिश्ता दर्शकों को एक नई, लेकिन बेहद परिचित दुनिया में ले जाते हैं। यह फ़िल्म बताती है कि इंसान आज भी प्रकृति और ब्रह्मांड के साथ अपना रिश्ता तलाशना चाहता है।

विज्ञान के इस दौर में भी इंसान केवल तथ्यों से संतुष्ट नहीं होता। उसे ज़िंदगी का मतलब चाहिए। जलवायु संकट, तेज़ी से बदलती तकनीक और अनिश्चित भविष्य के बीच हम प्रेरणादायक अंतरिक्ष यात्रियों, सच बोलने वाले नायकों और धरती को जीवित माँ मानने वाली कहानियों की ओर लौटते हैं। इन्हीं में हमें उम्मीद और मक़सद मिलता है।

बरगद के नीचे बैठा वह बूढ़ा किस्सागो शायद यह बात बिना किसी किताब के समझता है। उसकी सुनाई महाप्रलय की कहानी आज के बच्चों को हज़ारों साल पुराने अपने पुरखों से जोड़ देती है। विज्ञान हमें बताता है कि दुनिया कैसे चलती है, लेकिन कहानियाँ हमें समझाती हैं कि यह दुनिया हमारे लिए क्यों मायने रखती है। जब तक इंसान रहेगा, मिथक भी रहेंगे। क्योंकि कहानी कहना और सुनना हमारी फ़ितरत का हिस्सा है।

Wednesday, July 15, 2026

 जब सड़कों पर इंसानों से ज़्यादा जानवरों का राज हो जाए

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बेकाबू आवारा कुत्ते, बंदरों के हमले और सड़कों पर घूमते मवेशी ताज नगरी की रफ्तार और लोगों की सुरक्षा पर भारी पड़ रहे हैं

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

17 जुलाई 2026

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सुबह की पहली किरण ताजमहल पर पड़ने से पहले ही आगरा के लोग अपने घरों से निकलते हैं। लेकिन अब उनकी पहली चिंता ट्रैफिक नहीं, बल्कि सड़क पर खड़े या दौड़ते जानवर होते हैं। दयालबाग, कमला नगर, शाहगंज, ताजगंज, सिकंदरा, बल्केश्वर और ट्रांस यमुना कॉलोनियों तक एक जैसा मंजर दिखाई देता है।

कहीं आवारा कुत्तों के झुंड राहगीरों का पीछा करते हैं। कहीं बंदर छतों और बालकनियों पर नज़र गड़ाए बैठे रहते हैं। यमुना किनारा रोड पर भैंसों और गायों के झुंड सड़क को अपना चारागाह समझ लेते हैं। ऐसा लगता है मानो शहर की सड़कें अब इंसानों की नहीं रहीं।

ताजमहल के कारण दुनिया भर में पहचान रखने वाले इस शहर के लिए यह सिर्फ असुविधा नहीं, बल्कि एक गंभीर नागरिक संकट बन चुका है। अस्पतालों, वाहन चालकों, स्कूली बच्चों और सुबह टहलने वालों के लिए हर दिन एक नई परीक्षा बन गया है।

डराने वाले आंकड़े

सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि आगरा में 90 हजार से अधिक आवारा कुत्ते और लगभग 60 हजार पालतू कुत्ते हैं। हर दिन करीब 300 लोग कुत्तों के काटने का शिकार होते हैं। यह संख्या कई बड़े महानगरों से भी अधिक है।

दिल्ली जैसे विशाल शहर में छह महीने के दौरान जितने डॉग बाइट के मामले दर्ज हुए थे, आगरा में लगभग उतने मामले कुछ ही दिनों में सामने आ जाते हैं। यह तुलना बताती है कि ताज नगरी की समस्या कितनी गंभीर हो चुकी है।

गांधी नगर क्षेत्र के एक वरिष्ठ चिकित्सक बताते हैं कि उनके पास आने वाले अधिकांश पीड़ित 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चे होते हैं। कई बच्चे खेलते समय या कुत्तों को खाना खिलाते हुए घायल हो जाते हैं। निजी क्लीनिकों में ही रोज़ सौ से अधिक मरीज पहुंचते हैं। जिला अस्पताल और अन्य स्वास्थ्य केंद्रों पर अलग से भारी दबाव रहता है।

नगर निगम भी बेबस

नगर निगम के अधिकारी मानते हैं कि मौजूदा संसाधनों से इतनी बड़ी संख्या में कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण करना आसान नहीं है। अभियान चल रहे हैं, लेकिन उनकी रफ्तार समस्या के मुकाबले बहुत धीमी है।

इसी कारण अब पूरे शहर में बड़े स्तर पर नसबंदी और वैक्सीनेशन का काम किसी निजी एजेंसी को सौंपने की योजना बनाई जा रही है। लेकिन लोगों का सवाल है कि जब वर्षों से करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं, तब भी हालात क्यों नहीं बदले?

सिर्फ कुत्ते ही नहीं

मुसीबत केवल आवारा कुत्तों तक सीमित नहीं है। मंदिरों, बाजारों और ताजमहल के आसपास बंदरों का आतंक लगातार बढ़ रहा है। वे बच्चों के हाथ से टिफिन छीन लेते हैं, बुजुर्गों के चश्मे और मोबाइल उठा ले जाते हैं। कई पर्यटक भी उनका शिकार बन चुके हैं।

उधर यमुना किनारा रोड पर शाम के समय नदी से लौटते भैंसों और गायों के झुंड पूरी सड़क घेर लेते हैं। दोपहिया और चारपहिया वाहन किसी तरह रास्ता निकालते हैं। कई बार दुर्घटनाएं होते-होते बचती हैं।

रात का समय सबसे खतरनाक होता है। अंधेरे में काले रंग के मवेशी सड़क पर दिखाई नहीं देते। बाइक सवार अक्सर उनसे टकरा जाते हैं। कई हादसों में लोगों को गंभीर चोटें भी आई हैं।

बदल गई है शहर की दिनचर्या

जो पार्क कभी बुजुर्गों की हंसी और बच्चों की खिलखिलाहट से गूंजते थे, वहां अब डर का माहौल है। सुबह की सैर करने वाले लोग बताते हैं कि कुत्तों के झुंड उनका पीछा करते हैं। कई लोगों ने अपनी सैर का समय घटा दिया है।

माता-पिता अब छोटे बच्चों को अकेले बाहर खेलने भेजने से घबराते हैं। स्कूल जाते समय भी बच्चों के साथ किसी बड़े का होना ज़रूरी समझा जाने लगा है।

देशभर की चिंता, आगरा की चुनौती

देश के कई शहरों में आवारा जानवरों की समस्या बढ़ रही है। मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने भी साफ कहा कि नागरिकों को बिना भय के सार्वजनिक स्थानों पर चलने का संवैधानिक अधिकार है। अदालत ने भीड़भाड़ वाले इलाकों से आवारा कुत्तों को हटाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया और स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी तय की।

अब ठोस कार्रवाई की जरूरत

रिवर कनेक्ट अभियान से जुड़े कार्यकर्ताओं का कहना है कि आगरा केवल स्थानीय लोगों का शहर नहीं, बल्कि करोड़ों पर्यटकों की मंज़िल भी है। यदि सड़कों पर असुरक्षा का माहौल बना रहेगा तो शहर की छवि और पर्यटन, दोनों प्रभावित होंगे।

समाधान आधे-अधूरे उपायों से नहीं निकलेगा। बड़े पैमाने पर नसबंदी और टीकाकरण, छोड़े गए मवेशियों के पुनर्वास, बंदरों के वैज्ञानिक प्रबंधन और लापरवाह पशु मालिकों पर सख्त कार्रवाई की जरूरत है।

जब तक ऐसा नहीं होता, ताज नगरी के लोग हर सुबह घर से निकलते समय पहले सड़क पर नज़र डालेंगे और फिर अपने कदम आगे बढ़ाएंगे। किसी भी सभ्य शहर के लिए इससे बड़ी बदकिस्मती और क्या हो सकती है?


Tuesday, July 14, 2026


गांव के मोड़ से ग्लोबल दुनिया तक: अंग्रेज़ी बन रही नई ताक़त 

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

16 जुलाई 2026

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सुबह के आठ बजे हैं। मथुरा ज़िले की गोवर्धन तहसील के एक गांव के मोड़ पर रंग-बिरंगे स्कूल बैग टांगे, टाई और साफ-सुथरी यूनिफॉर्म पहने लड़के और लड़कियों का एक झुंड बस का इंतज़ार कर रहा है। कोई कह रहा है, hi, how are you? दूसरा मुस्कुराकर जवाब देता है, "I am fine, thank you." तीसरी बच्ची अपनी सहेली से पूछती है, "Where is your project ?" उनकी अंग्रेज़ी अभी बहुत साधारण है, मगर  सपने बड़े हैं।

पास खड़े बुज़ुर्ग हैरानी और फ़ख्र से उन्हें देखते हैं। यही बच्चे कुछ साल पहले गांव के हिंदी स्कूल में जाते थे। आज रोज़ कई किलोमीटर दूर एक अंग्रेज़ी माध्यम के पब्लिक स्कूल की बस पकड़ते हैं। यह सिर्फ़ स्कूल बदलने की कहानी नहीं, बदलते भारत की तस्वीर है।

केरल, कर्नाटक, तमिल नाडु के अनेकों शहरों में और ग्रामीण अंचलों में प्राइवेट, मिशनरी अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की भरमार है। ऊटी के रास्ते में मसिनीगुडी कस्बे में एक स्कूली हेड मास्टर ने बताया , " सरकारी स्कूलों में लोकल भाषा माध्यम है जहां अधिकांश गरीब बच्चे पढ़ते हैं, जिनके पास साधन हैं उनके बच्चे प्राइवेट में स्टडी करते हैं, अंग्रेजी सीखते हैं!" गांव गांव से प्राइवेट बसें बच्चों को स्कूलों तक ढोती हैं। दक्षिण भारत के ज्यादातर पेरेंट्स बच्चों को विदेश जाने के लिए पढ़ाते हैं, गल्फ कंट्रीज या अमेरिका!

लोग मानने लगे हैं कि भारत में अंग्रेज़ी अब किसी हुकूमत की छोड़ी हुई निशानी नहीं रही। यह रोज़गार, तरक्की और नए मौकों की ज़ुबान बन चुकी है। करोड़ों भारतीय इसे पढ़ते, समझते और बोलते हैं। अनुमान है कि करीब 26 करोड़ से अधिक लोगों को अंग्रेज़ी की बुनियादी समझ है। हर साल लाखों नए बच्चे इस सफ़र में शामिल हो रहे हैं।

एक दौर था जब अंग्रेज़ी सिर्फ़ बड़े शहरों और अमीर घरों तक सीमित मानी जाती थी। अब यह गांवों की गलियों तक पहुंच चुकी है। किसान, दुकानदार, मज़दूर और छोटे कारोबारी भी चाहते हैं कि उनके बच्चे अंग्रेज़ी सीखें। वे जानते हैं कि बदलती दुनिया में यह हुनर नई राहें खोल सकता है।

देश में अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूलों की संख्या तेज़ी से बढ़ी है। मिशनरी और कॉन्वेंट स्कूलों ने दशकों पहले इसकी बुनियाद रखी। बाद में निजी स्कूल, सीबीएसई और आईसीएसई संस्थान आगे आए। अब कई सरकारी स्कूल भी अंग्रेज़ी माध्यम की पढ़ाई शुरू कर चुके हैं। करोड़ों बच्चे इन स्कूलों में शिक्षा पा रहे हैं।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं,"इस बदलाव के पीछे कोई सियासी नारा नहीं, बल्कि ज़मीनी हक़ीक़त है। भारत जैसे बहुभाषी देश में अंग्रेज़ी अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले लोगों के बीच एक साझा पुल बन गई है। कश्मीर से केरल और गुजरात से असम तक, अलग-अलग प्रदेशों के लोग इसी भाषा के सहारे आसानी से संवाद कर लेते हैं।"

उच्च शिक्षा में भी अंग्रेज़ी की अहमियत लगातार बढ़ी है। इंजीनियरिंग, चिकित्सा, विज्ञान, क़ानून, प्रबंधन और शोध की अधिकांश किताबें और अध्ययन सामग्री अंग्रेज़ी में उपलब्ध हैं। दुनिया के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से जुड़ने में भी यही भाषा सबसे बड़ा सहारा बनती है।

भारत की आईटी क्रांति में अंग्रेज़ी की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे, नोएडा और गुरुग्राम जैसे शहरों ने दुनिया भर की कंपनियों को आकर्षित किया। भारतीय युवाओं ने अपनी मेहनत के साथ अंग्रेज़ी की क्षमता के दम पर वैश्विक बाज़ार में पहचान बनाई। कॉल सेंटर, बीपीओ, सॉफ्टवेयर, डिजिटल सेवाएं और ऑनलाइन कारोबार लाखों लोगों को रोज़गार दे रहे हैं।

आज डिजिटल दुनिया में भी अंग्रेज़ी एक अहम चाबी है। इंटरनेट, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस, ऑनलाइन कोर्स, रिसर्च और नई तकनीकों का बड़ा हिस्सा अंग्रेज़ी में उपलब्ध है। जिसे अंग्रेज़ी आती है, उसके सामने सीखने के रास्ते कहीं ज़्यादा खुल जाते हैं।

लेकिन इसका मतलब यह हरगिज़ नहीं कि हिंदी या दूसरी भारतीय भाषाएं कमज़ोर हो जाएं। अपनी मातृभाषा इंसान की पहचान, संस्कृति और जड़ों से जुड़ी होती है। अंग्रेज़ी उस पहचान की जगह नहीं ले सकती। असली समझदारी दोनों को साथ लेकर चलने में है।

दुनिया के कई विकसित देशों के बच्चे अपनी मातृभाषा के साथ अंग्रेज़ी भी सीखते हैं। भारत में भी यही रास्ता सबसे बेहतर साबित हो सकता है। घर में अपनी भाषा, समाज में अपनी संस्कृति और दुनिया से जुड़ने के लिए अंग्रेज़ी; यही संतुलन भविष्य की ज़रूरत है।

सरकारी स्कूलों में बेहतर अंग्रेज़ी शिक्षा, प्रशिक्षित शिक्षक, आधुनिक तकनीक और अच्छी पाठ्य सामग्री उपलब्ध कराना अब समय की मांग है। अंग्रेज़ी किसी वर्ग विशेष की जागीर नहीं रहनी चाहिए। गांव का बच्चा भी वही अवसर पाए जो महानगर के छात्र को मिलता है।

भारत को अंग्रेज़ी विरासत में मिली थी, लेकिन उसने इसे अपनी मेहनत और ज़रूरत के मुताबिक़ नया रूप दिया। आज यह विदेशी भाषा कम और भारतीय क्षमता का हिस्सा ज़्यादा बन चुकी है।

शायद इसी लिए गोवर्धन के उस गांव के चौराहे पर खड़े वे छोटे-छोटे बच्चे, जो हिचकिचाते हुए कहते हैं, "Good morning, teacher," सिर्फ़ अंग्रेज़ी नहीं बोल रहे होते। वे अपने भविष्य के दरवाज़े पर दस्तक दे रहे होते हैं। उनके होंठों पर कुछ साधारण अंग्रेज़ी के शब्द हैं, लेकिन उनकी आंखों में पूरे हिंदुस्तान के बदलते कल का ख़्वाब चमक रहा होता है।

Monday, July 13, 2026

 


प्रिय आगरा, हमारे फुटपाथ लौटा दो!

सड़कें सिर्फ़ गाड़ियों की नहीं, इंसानों की भी हैं

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बृज खंडेलवाल द्वारा

15 जुलाई 2026

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नेताओं और अफ़सरों से एक छोटी-सी गुज़ारिश है। एक दिन बिना लालबत्ती, बिना सरकारी गाड़ी और बिना सुरक्षा घेरे के आगरा की सड़कों पर पैदल चलकर दिखाइए। तब मालूम होगा कि इस शहर में पैदल चलना अब सफ़र नहीं, रोज़ का इम्तिहान बन चुका है।

आगरा का कोई एक इलाक़ा बता दीजिए, जहाँ आदमी निडर होकर फुटपाथ पर चल सके। योगी सरकार तेज़ रफ़्तार एक्सप्रेसवे बनाने में व्यस्त है, लेकिन पैदल चलने वालों की रफ़्तार और सुरक्षा जैसे किसी की प्राथमिकता ही नहीं रही।

ताजमहल दुनिया की शान है, मगर शहर की असली पहचान उसकी सड़कें होती हैं। और आगरा की सड़कें आज एक कड़वी हक़ीक़त बयान करती हैं: यह शहर पैदल चलने वालों का नहीं रहा।

फुटपाथ, जो आम लोगों के लिए बने थे, अब दुकानों के शो-रूम, ठेलों, पार्किंग और अतिक्रमण की जागीर बन चुके हैं। कहीं सामान फैला है, कहीं शेड खड़े हैं, कहीं मोटरसाइकिलें और कारें कब्ज़ा किए बैठी हैं। नतीजा साफ़ है। पैदल आदमी सड़क पर उतरता है और मौत के साथ चलने को मजबूर हो जाता है।

बेलनगंज, हॉस्पिटल रोड, लोहामंडी, राजा मंडी, किनारी बाज़ार, सदर और शहर के दर्जनों इलाक़ों में यही मंजर दिखाई देता है। कहीं फुटपाथ टूटे हैं, कहीं ग़ायब हैं और जहाँ बचे भी हैं, वहाँ अतिक्रमण ने उनका दम घोंट दिया है।

यह सिर्फ़ असुविधा नहीं, सार्वजनिक सुरक्षा का गंभीर संकट है। "सेफ़ स्ट्रीट्स फ़ॉर आगरा" रिपोर्ट बताती है कि शहर में सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली 88 प्रतिशत मौतें पैदल यात्रियों, साइकिल सवारों और दोपहिया वाहन चालकों जैसी सबसे कमज़ोर श्रेणी के लोगों की होती हैं। यानी जो सबसे कम सुरक्षित हैं, वही सबसे ज़्यादा जान गंवा रहे हैं।

देशभर में हर साल तीस हज़ार से अधिक पैदल यात्री सड़क हादसों में मारे जाते हैं। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार, कुल सड़क दुर्घटना मौतों में लगभग पाँचवाँ हिस्सा पैदल यात्रियों का है। आगरा में टूटे फुटपाथ, खुले मैनहोल, उखड़ी टाइलें और बरसात में पानी से छिपे गड्ढे इस ख़तरे को कई गुना बढ़ा देते हैं।

सबसे ज़्यादा तकलीफ़ बुज़ुर्गों, महिलाओं, बच्चों और दिव्यांग नागरिकों को होती है। रोज़ कोई न कोई गिरता है, घायल होता है। छोटी चोटें अब आम बात हो गई हैं। बड़े हादसे किसी भी दिन किसी के साथ हो सकते हैं।

विडम्बना देखिए। हर साल लाखों पर्यटक आगरा आते हैं। वे इस शहर को पैदल महसूस करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें भी ट्रैफ़िक के बीच जान हथेली पर रखकर चलना पड़ता है। विश्व धरोहर का शहर अगर पैदल यात्रियों के लिए असुरक्षित है, तो यह हमारी शहरी सोच की नाकामी है।

सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में साफ़ कहा है कि स्वच्छ, सुरक्षित और बाधारहित फुटपाथ पर चलना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों का मौलिक अधिकार है। सड़कों पर पहला हक़ पैदल चलने वालों का है, वाहनों का नहीं। मगर आगरा में यह अधिकार हर दिन कुचला जा रहा है।

नगर निगम को अब सिर्फ़ रंग-रोगन और सौंदर्यीकरण से बाहर निकलना होगा। फुटपाथों की मरम्मत, खुले मैनहोल बंद करना, जल निकासी दुरुस्त करना और अतिक्रमण हटाना उसकी पहली ज़िम्मेदारी होनी चाहिए। दुकानदार सार्वजनिक ज़मीन पर कब्ज़ा नहीं कर सकते। रेहड़ी-पटरी वालों के लिए व्यवस्थित वेंडिंग ज़ोन बनाए जाएँ, ताकि उनका रोज़गार भी सुरक्षित रहे और पैदल यात्रियों का रास्ता भी।

अब वक्त आ गया है कि "प्रिय आगरा, फुटपाथ वापस दो" अभियान शुरू किया जाए। नागरिक मोबाइल से टूटे फुटपाथ, खुले मैनहोल और अतिक्रमण की तस्वीरें भेजें। नगर निगम तय समय-सीमा में कार्रवाई करे और हर सप्ताह सार्वजनिक रिपोर्ट जारी करे। स्थानीय अख़बार भी नागरिक शिकायतों के लिए स्थायी कॉलम शुरू करें। जवाबदेही होगी, तभी बदलाव आएगा।

बेंगलुरु समेत कई शहरों ने सख़्ती से फुटपाथ अतिक्रमण हटाने की शुरुआत कर दी है। आगरा कब जागेगा? या फिर हमारे हुक्मरान रिप वैन विंकल की तरह सोते ही रहेंगे?

किसी शहर की पहचान उसकी चौड़ी सड़कों से नहीं होती। उसकी पहचान इस बात से होती है कि वहाँ एक बच्चा, एक बुज़ुर्ग, एक महिला, एक दिव्यांग और एक पर्यटक कितनी बेफ़िक्री से पैदल चल सकता है।

आगरा ने अपने स्मारकों पर करोड़ों रुपये खर्च किए हैं। अब अपने नागरिकों पर भी कुछ निवेश कीजिए।

हमें फुटपाथ वापस चाहिए।

क्योंकि शहर तभी सभ्य कहलाता है, जब सड़क पर सबसे कमज़ोर इंसान भी बिना डर के चल सके। ताजमहल की ख़ूबसूरती तभी मुकम्मल होगी, जब उसके शहर की सड़कें भी इंसानों के लिए सुरक्षित हों

Sunday, July 12, 2026

 क्या वाकई औरतें मर्दों पर भारी पड़ रही हैं? 

एक सनसनीखेज़ हत्या से सदियों की असमानता नहीं मिट जाती

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कुछ वायरल अपराधों से यह मत मान लीजिए कि भारत में पितृसत्ता खत्म हो गई है

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

14 जुलाई 2026

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मेरठ का नीला ड्रम, आगरा में फर्श के नीचे दफन पति, मुंबई-वसई में प्रेमी की हत्या और ऐसी ही कुछ दूसरी सनसनीखेज़ वारदातों ने पूरे देश को झकझोर दिया। टीवी स्टूडियो गरजे, सोशल मीडिया पर मीम्स की बाढ़ आ गई और एक नया निष्कर्ष गढ़ लिया गया: "क्या अब महिलाएँ पुरुषों पर भारी पड़ने लगी हैं?" 

लेकिन क्या कुछ भयावह अपराध सचमुच भारत की सामाजिक हकीकत बदल देते हैं? क्या कुछ वायरल घटनाएँ सदियों पुरानी पितृसत्ता, असमानता और महिलाओं के खिलाफ हिंसा के पहाड़ को मिटा सकती हैं? जवाब भावनाओं में नहीं, आँकड़ों में छिपा है।

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आज के दौर में सच से कहीं तेज़ दौड़ती है सनसनी।

किसी पत्नी पर पति की हत्या का आरोप लगता है। कहीं प्रेमी के साथ मिलकर हत्या की साज़िश रची जाती है। टीवी चैनलों पर दिन-रात वही दृश्य चलते हैं। सोशल मीडिया पर मीम्स की बाढ़ आ जाती है। व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी फ़ौरन फैसला सुना देती है; "अब तो औरतें मर्दों पर भारी पड़ने लगी हैं।" कुछ लोग तो यह तक कहने लगते हैं कि अब पुरुष ही सबसे बड़े पीड़ित हैं।

ऐसी बातें सुनने में आकर्षक लगती हैं, लेकिन आंकड़ों की कसौटी पर टिकती नहीं हैं।

अपराध का कोई लिंग नहीं होता। हत्या करने वाला चाहे पुरुष हो या महिला, कानून की नज़र में दोनों बराबर हैं। दोषी को सज़ा मिलनी ही चाहिए। लेकिन कुछ सनसनीखेज़ घटनाओं के आधार पर पूरे समाज की तस्वीर बदल देना न्याय भी नहीं है और बुद्धिमानी भी नहीं।

कुछ अपराध सदियों की सामाजिक हकीकत को नहीं बदल सकते।

यह सच है कि भारत में महिलाओं की स्थिति पहले से बेहतर हुई है। आज पहले की तुलना में कहीं अधिक लड़कियाँ स्कूल और कॉलेज पहुँच रही हैं। उच्च शिक्षा में महिलाओं का सकल नामांकन अनुपात अब पुरुषों से अधिक है। महिलाएँ लड़ाकू विमान उड़ा रही हैं, अंतरिक्ष अभियानों का नेतृत्व कर रही हैं, उद्योग चला रही हैं, न्यायपालिका और प्रशासन में महत्वपूर्ण पदों पर हैं। पंचायतों में लाखों महिलाएँ जनप्रतिनिधि हैं। मातृ मृत्यु दर घटी है, संस्थागत प्रसव बढ़े हैं और करोड़ों महिलाओं के बैंक खाते खुले हैं।

यह बदलाव स्वागत योग्य है।

लेकिन कुछ सफल महिलाओं की उपलब्धियों को पूरे देश की महिलाओं की वास्तविक स्थिति मान लेना सबसे बड़ी भूल होगी।

असल सवाल यह है कि गाँवों, कस्बों और शहरों की आम महिला कैसी ज़िंदगी जी रही है?

यहीं तस्वीर बदल जाती है। सामाजिक कार्यकर्ता पद्मिनी अय्यर कहती हैं, "भारत में महिलाओं की श्रम भागीदारी दर बढ़ी जरूर है, लेकिन आज भी पुरुषों की तुलना में आधी से भी कम है। जो महिलाएँ काम करती भी हैं, उनमें अधिकांश असंगठित क्षेत्र में हैं, जहाँ न नौकरी की सुरक्षा है, न उचित वेतन और न सामाजिक सुरक्षा। इससे भी बड़ा सच है वह काम जिसका कोई वेतन नहीं मिलता।समय-उपयोग सर्वे बताते हैं कि भारतीय महिलाएँ पुरुषों की तुलना में रोज़ तीन घंटे से अधिक अतिरिक्त समय रसोई, सफाई, बच्चों की परवरिश और बुज़ुर्गों की देखभाल में लगाती हैं। यह श्रम देश की अर्थव्यवस्था को सहारा देता है, लेकिन न इसका कोई वेतन है और न सम्मान।"

संपत्ति का बँटवारा भी बराबरी की कहानी नहीं कहता।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार केवल लगभग 13 प्रतिशत महिलाओं के नाम अकेले मकान है और मात्र 8 से 9 प्रतिशत महिलाओं के पास अपनी भूमि है। आर्थिक निर्भरता आज भी सामाजिक निर्भरता को जन्म देती है।

सोशल एक्टिविस्ट विद्या चौधरी के मुताबिक, "सबसे कठोर सच महिलाओं के खिलाफ हिंसा का है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार वर्ष 2024 में महिलाओं के विरुद्ध 4.41 लाख से अधिक अपराध दर्ज हुए। यानी हर दिन लगभग 1,210 मामले और औसतन हर 71 सेकंड में एक महिला के खिलाफ अपराध। इनमें सबसे अधिक मामले पति और रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता के हैं। इसके बाद दुष्कर्म, अपहरण, यौन उत्पीड़न और दहेज से जुड़े अपराध आते हैं।"

ये केवल दर्ज मामले हैं।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण बताता है कि भारत में लगभग हर तीन विवाहित महिलाओं में से एक ने अपने जीवन में पति या साथी द्वारा शारीरिक, मानसिक या यौन हिंसा झेली है। विशेषज्ञ मानते हैं कि असंख्य महिलाएँ सामाजिक बदनामी, आर्थिक निर्भरता और पारिवारिक दबाव के कारण शिकायत तक दर्ज नहीं करा पातीं।

यही भारत की असली तस्वीर है।

इसके मुकाबले हाल के वर्षों में पतियों की हत्या के कुछ चर्चित मामलों ने पूरे देश का ध्यान खींचा। ये घटनाएँ भयावह हैं और दोषियों को कठोर सज़ा मिलनी चाहिए। लेकिन ये अपवाद हैं, प्रवृत्ति नहीं।

सोशल मीडिया अपवाद को सामान्य बना देता है।

एक सनसनीखेज़ हत्या कई दिनों तक सुर्खियों में रहती है, जबकि घरेलू हिंसा झेल रही सैकड़ों महिलाएँ किसी समाचार की पात्र भी नहीं बनतीं। लगातार दिखाई जाने वाली असाधारण घटनाएँ धीरे-धीरे लोगों को यह भ्रम दे देती हैं कि अब सत्ता का संतुलन बदल गया है।

लेकिन आंकड़े इस भ्रम की पुष्टि नहीं करते।

हाँ, महिलाओं की सुरक्षा के लिए बने कुछ कानूनों के दुरुपयोग के मामले सामने आए हैं। लेकिन कुछ झूठे मामलों के कारण पूरे कानून को गलत नहीं ठहराया जा सकता।

एक और दुखद सच्चाई विधवाओं की है। भारत में करोड़ों विधवाएँ आज भी गरीबी, उपेक्षा, संपत्ति से वंचित किए जाने और सामाजिक तिरस्कार का जीवन जी रही हैं। वृंदावन जैसे शहर आज भी हजारों बेसहारा विधवाओं की पीड़ा के मौन गवाह हैं। उनका दर्द कभी वायरल नहीं होता, क्योंकि ख़ामोश पीड़ा टीआरपी नहीं देती।

एक सनसनीखेज़ हत्या एक सप्ताह तक सुर्खियाँ बना सकती है। लेकिन वह भारत की करोड़ों महिलाओं के हिस्से में आज भी दर्ज असमानता, हिंसा और भेदभाव की सदी पुरानी कहानी को नहीं बदल सकती।

Thursday, July 9, 2026

 ज़िंदाबाद असहमति,

सवाल पूछना जरूरी है!

आलोचना लोकतंत्र का पोषण है

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बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा कि सरकार की आलोचना और शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र का मूल अधिकार है, अपराध नहीं। अदालत ने केवल विरोध के आधार पर एफआईआर और निर्वासन को असंवैधानिक बताया। फैसले ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों की रक्षा पर जोर दिया, हालांकि ऐसे संरक्षण का लाभ अभी सभी असहमत नागरिकों को समान रूप से नहीं मिल रहा।

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

11 जुलाई, 2026

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ज़रा एक पल के लिए ऐसे भारत की कल्पना कीजिए, जहाँ हर नागरिक सरकार की हर बात पर "जी हुज़ूर" कहे। संसद की बहसें कुछ मिनटों में खत्म हो जाएँ। टीवी चैनलों पर बहस की जगह केवल सरकारी प्रेस नोट पढ़े जाएँ। अख़बारों के संपादकों का काम सिर्फ़ अल्पविराम और पूर्णविराम ठीक करना रह जाए। सोशल मीडिया पर हर तरफ़ एक ही नारा गूँजे; "वाह सरकार, कमाल कर दिया!"

सब कुछ शांत दिखाई देगा। कोई विवाद नहीं, कोई बहस नहीं, कोई सवाल नहीं। लेकिन उसी ख़ामोशी में लोकतंत्र धीरे-धीरे पिछले दरवाज़े से बाहर निकल जाएगा।

ख़ुशकिस्मती से भारत कभी अंधी आज्ञाकारिता पर नहीं बना। भारत बहस, तर्क और मतभेद की ज़मीन पर खड़ा हुआ है।

यूरोप में ज्ञानोदय की हवा चलने से बहुत पहले भारत में जंगलों, आश्रमों, मंदिरों, बौद्ध विहारों और गाँव की चौपालों में विचारों की खुली बहस होती थी। यहाँ तलवारें कम, विचार ज़्यादा टकराते थे।

गौतम बुद्ध ने कर्मकांड, ऊँच-नीच और अंधविश्वास पर सवाल उठाए। महावीर ने अहिंसा और समानता का रास्ता दिखाया। चार्वाक ने वेदों की सत्ता तक को चुनौती दे दी। उन्होंने कहा कि बिना प्रमाण किसी बात को मत मानो। उनके अपने ग्रंथ भले न बचे हों, लेकिन उनके विरोधियों ने भी उनके विचारों को दर्ज किया। यही किसी आत्मविश्वासी सभ्यता की सबसे बड़ी पहचान है कि वह अपने विरोधी की आवाज़ भी मिटाती नहीं।

बाद में कबीर ने मंदिर और मस्जिद दोनों में फैले पाखंड पर बराबर चोट की। रैदास ने जाति के घमंड को ललकारा। गुरु नानक ने इंसानों की बराबरी का संदेश दिया। मीराबाई ने राजसत्ता के आगे अपनी अंतरात्मा नहीं बेची। तुकाराम ने सामाजिक अन्याय के खिलाफ़ आवाज़ उठाई।

आधुनिक भारत में राजा राममोहन राय ने सती प्रथा का विरोध किया। ज्योतिराव और सावित्रीबाई फुले ने लड़कियों और वंचित समाज की शिक्षा का बिगुल बजाया। पेरियार ने अंधविश्वास और जातीय वर्चस्व पर करारा हमला किया। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने सदियों पुरानी भेदभाव की दीवारों को चुनौती दी और हमें ऐसा संविधान दिया जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की रक्षा करता है।

इनमें से कोई भी अपने समय की सत्ता का लाड़ला नहीं था। कई लोगों का मज़ाक उड़ाया गया। उन्हें समाज से अलग किया गया। जेल भेजा गया। देशद्रोही, विधर्मी या ख़तरनाक तक कहा गया। लेकिन इतिहास ने आख़िरकार सम्मान उन्हीं लोगों को दिया जिन्होंने सवाल पूछे, न कि उन्हें जिन्होंने सवाल दबाए।

भारत की आज़ादी की लड़ाई भी असहमति की मिसाल है। भगत सिंह ने कहा कि क्रांति विचारों से आती है। सुभाष चंद्र बोस ने अंग्रेज़ी हुकूमत को सीधी चुनौती दी। टीपू सुल्तान और छत्रपति शिवाजी महाराज ने विदेशी और दमनकारी सत्ता के सामने झुकने से इनकार किया। इन सबका संदेश एक था; अन्याय के सामने ख़ामोश रहना सबसे बड़ी ग़लती है।

आज लोकतंत्र उसी विरासत को आगे बढ़ाता है। सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन संविधान स्थायी है। इसी कारण संविधान का अनुच्छेद 19 हर नागरिक को अभिव्यक्ति की आज़ादी देता है। लोकतंत्र में नागरिक प्रजा नहीं होता और सरकार कोई ऐसी संस्था नहीं, जिससे सवाल न पूछा जा सके।

सर्वोच्च न्यायालय भी बार-बार यही बात दोहराता रहा है। केदारनाथ सिंह मामले में अदालत ने साफ़ कहा कि सरकार की आलोचना तब तक देशद्रोह नहीं है, जब तक वह हिंसा भड़काने की कोशिश न करे। श्रेय सिंघल मामले में अदालत ने इंटरनेट पर अभिव्यक्ति को दबाने वाले कानून को रद्द करते हुए कहा कि केवल चर्चा करना या किसी विचार का समर्थन करना अपराध नहीं हो सकता। हाल के वर्षों में भी सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि असहमति लोकतंत्र का सेफ़्टी वाल्व है। यदि यह वाल्व बंद कर दिया जाए तो एक दिन पूरा तंत्र फट सकता है।

यह बात हर सरकारी दफ़्तर की दीवार पर लिखी जानी चाहिए।

फिर भी हर कुछ साल बाद कुछ लोग यह खोज निकालते हैं कि सरकार से सवाल पूछना देशविरोध है। मानो सवाल पूछने से देश कमज़ोर हो जाता है और बिना सोचे-समझे ताली बजाने से देश मज़बूत हो जाता है।

अगर यही तर्क सही है, तो सबसे अच्छा डॉक्टर वह होगा जो कभी बीमारी न बताए। सबसे अच्छा पत्रकार वह होगा जो कभी बुरी ख़बर न छापे। और सबसे अच्छा न्यायाधीश वह होगा जो हर मुक़दमे में सरकार के पक्ष में फ़ैसला सुना दे।

सच्ची देशभक्ति ताली बजाने में नहीं, बल्कि चौकन्ना रहने में है। जो नागरिक ग़लत नीतियों पर सवाल उठाते हैं, वे अक्सर लोकतंत्र की रक्षा कर रहे होते हैं। लोकतंत्र आलोचना से बेहतर होता है, जबकि तानाशाही सिर्फ़ तारीफ़ पर पलती है।

भारत में व्यंग्य और हास्य भी हमेशा सत्ता को आईना दिखाने का ज़रिया रहे हैं। पुराने राजाओं के दरबार में विदूषक वह सच कह देता था, जिसे मंत्री भी कहने से डरते थे। जब विदूषक ख़ामोश हो जाए, तब राजा को हर ताली सच्ची लगने लगती है।

भारत की सबसे बड़ी ताक़त एक जैसी सोच नहीं, बल्कि विविधता है। यहाँ आस्तिक भी रहे, नास्तिक भी। संत भी हुए, संशयवादी भी। कवि भी हुए, क्रांतिकारी भी। तीन हज़ार साल से हम बहस करते आए हैं, फिर भी एक सभ्यता बने हुए हैं। यही हमारी असली पहचान है।

शांतिपूर्ण असहमति को दबाने से देश मज़बूत नहीं होता। केवल इतना होता है कि ग़लतियाँ समय पर दिखाई नहीं देतीं। आत्मविश्वास से भरी सरकार सवालों का जवाब तथ्यों से देती है। असुरक्षित सरकार कानून का डर दिखाती है।

इतिहास का फ़ैसला हमेशा दिलचस्प रहा है। हर पीढ़ी पहले अपने असहमत लोगों को गालियाँ देती है, फिर कुछ दशक बाद उन्हीं की मूर्तियाँ बनवाती है।

शायद समझदारी इसी में है कि मूर्ति बनाने से पहले उनकी बात सुन ली जाए।

असहमति ज़िंदाबाद।

क्योंकि असहमति लोकतंत्र की दुश्मन नहीं, उसकी सबसे पुरानी, सबसे बहादुर और सबसे वफ़ादार साथी है।

याद रहे:  " कमजोर लोकतंत्र शक्तिशाली तानाशाही से बेहतर होता है।"

Wednesday, July 8, 2026

 


करोड़ों पौधे, फिर भी सूनी धरती! आखिर हर साल हरियाली जाती कहाँ है?

12 जुलाई को आगरा में 61.88 लाख पौधे लगाने का लक्ष्य,

पर्यावरणविदों ने मांगा स्वतंत्र सामाजिक और वैज्ञानिक ऑडिट

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ब्रज खंडेलवाल द्वारा

10 जुलाई 2026

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बारिश की पहली फुहार पड़ते ही सरकारी दफ्तरों में हलचल बढ़ जाती है। पौधों से भरे ट्रक निकल पड़ते हैं। अफसर हाथ में फावड़ा लेकर कैमरों के सामने मुस्कुराते हैं। नेता पौधे लगाते हैं। रिकॉर्ड बनते हैं। प्रेस विज्ञप्तियां जारी होती हैं। हर साल करोड़ों पौधे लगाने के नए दावे किए जाते हैं।

लेकिन कुछ महीने बाद वही धरती फिर सूनी दिखाई देती है। धूप पहले से ज्यादा चुभती है। सड़कों पर छांव कम होती जाती है। तब एक सवाल हर बार हवा में तैरता है, अगर हर साल करोड़ों पौधे लगाए जा रहे हैं, तो हरियाली आखिर गायब कहां हो रही है? क्या पेड़ धरती पर उग रहे हैं या सिर्फ सरकारी फाइलों में?

उत्तर प्रदेश सरकार ने 12 जुलाई को महावृक्षारोपण अभियान के तहत 35 करोड़ से अधिक पौधे लगाने का लक्ष्य रखा है। लगभग 30 सरकारी विभाग इसमें भाग लेंगे। उपमुख्यमंत्री ने प्रदेश के सभी जिलों में 150 हाईटेक नर्सरियां स्थापित करने की घोषणा की है, जिन पर करीब 150 करोड़ रुपये खर्च होंगे। सरकार का दावा है कि इस अभियान से नया गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनेगा।

आगरा भी इस मुहिम का बड़ा हिस्सा है। जिलाधिकारी मनीष बंसल ने सभी विभागों को इसे जन आंदोलन बनाने के निर्देश दिए हैं। 12 जुलाई को सुबह सात बजे से शाम छह बजे तक पूरे जिले में वृक्षारोपण होगा। स्कूलों, कॉलेजों, ग्राम पंचायतों और कॉलोनियों में "एक स्कूल-एक गांव" थीम पर पौधे लगाए जाएंगे। स्वयंसेवी संस्थाएं, एनएसएस, रोटरी क्लब, लायंस क्लब, महिला समूह और हजारों विद्यार्थी भी इसमें शामिल होंगे।

इस वर्ष आगरा को 61 लाख 88 हजार पौधे लगाने का लक्ष्य मिला है। इनमें वन विभाग 19.68 लाख और अन्य विभाग 42.20 लाख पौधे लगाएंगे। इससे पहले 5 जून, विश्व पर्यावरण दिवस पर भी लगभग 7.94 लाख पौधे लगाने का दावा किया गया था।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक आगरा में 2018 में 20 लाख, 2019 में 28 लाख, 2020 में 38 लाख और 2021 में 45 लाख पौधे लगाए गए। वन विभाग का दावा है कि इनमें लगभग 70 प्रतिशत पौधे जीवित हैं।

यहीं से सवाल शुरू होता है।

अगर इतने पौधे सचमुच जीवित हैं, तो आगरा पहले से ज्यादा हरा-भरा क्यों नहीं दिखता? शहर का तापमान लगातार क्यों बढ़ रहा है? सड़कों के किनारे छायादार पेड़ क्यों कम होते जा रहे हैं? हर मानसून के बाद नया अभियान शुरू करने की जरूरत आखिर क्यों पड़ती है?

रिवर कनेक्ट कैंपेन से जुड़े पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि पेड़ जमीन पर कम और सरकारी कागजों में ज्यादा दिखाई देते हैं। उनका कहना है कि वृक्षारोपण की सफलता पौधे लगाने से नहीं, बल्कि तीन-चार साल बाद उनके जीवित रहने से मापी जानी चाहिए।

कुछ वर्ष पूर्व यमुना किनारे हुई घटना आज भी लोगों को याद है। तत्कालीन महापौर नवीन जैन ने नदी की तलहटी  में लगभग 12 हजार पौधे लगवाए थे। अगस्त में यमुना का जलस्तर बढ़ा और सभी पौधे बह गए। करोड़ों रुपये की मेहनत कुछ दिनों में पानी में समा गई। इस मामले की जांच आज तक पूरी नहीं हो सकी।

रिवर कनेक्ट कैंपेन की पद्मिनी अय्यर कहती हैं कि पौधे लगाना आसान है, लेकिन उन्हें बचाना मुश्किल। तीन वर्षों तक नियमित सिंचाई, सुरक्षा, खाद और निगरानी के बिना अधिकांश पौधे शुरुआती दौर में ही नष्ट हो जाते हैं। पौधे लगाने के बाद उनकी देखभाल अक्सर भगवान भरोसे छोड़ दी जाती है।

वरिष्ठ पर्यावरणविद् डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य कहते हैं कि ताज ट्रेपेजियम जोन में विकास के नाम पर हरियाली लगातार घटती गई है। यमुना एक्सप्रेसवे, आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे, रिंग रोड, फ्लाईओवर, राष्ट्रीय राजमार्गों का चौड़ीकरण और नई कॉलोनियों ने हजारों पेड़ों की बलि ले ली। इसका असर केवल पर्यावरण पर नहीं, बल्कि ताजमहल की सुरक्षा पर भी पड़ रहा है। राजस्थान की ओर से आने वाली धूल भरी हवाओं को रोकने वाली प्राकृतिक हरित पट्टी कमजोर होती जा रही है।

विडंबना यह है कि ताज ट्रेपेजियम जोन का गठन ही ताजमहल और पर्यावरण की रक्षा के लिए किया गया था। 1996 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद टीटीजेड में प्रदूषण रोकने, उद्योगों को स्थानांतरित करने और बड़े पैमाने पर ग्रीन बेल्ट विकसित करने की योजना बनी। राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (NEERI) ने भी हरित क्षेत्र बढ़ाने की सिफारिश की थी। उस समय उम्मीद जगी थी कि आगरा फिर से हरियाली की चादर ओढ़ेगा।

लेकिन तीन दशक बाद तस्वीर निराशाजनक है। टीटीजेड में वन और हरित आवरण घटकर लगभग छह प्रतिशत या उससे भी कम रह गया है, जबकि राष्ट्रीय लक्ष्य 33 प्रतिशत है। 2021 की रिपोर्ट के अनुसार 2017 से 2019 के बीच वन क्षेत्र सिकुड़कर केवल 657.71 वर्ग किलोमीटर रह गया। कई तालाब और जलाशय सूख गए या प्रदूषण की चपेट में आ गए।

2015 में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को पेड़ लगाने के बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावों पर फटकार भी लगाई थी। दूसरी ओर अवैध पेड़ कटाई लगातार जारी रही। कई मामलों में अदालतों ने प्रति पेड़ 25 हजार रुपये तक का जुर्माना लगाया। इसके बावजूद विकास परियोजनाओं ने हरियाली को लगातार निगल लिया। इसी वर्ष राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने भी टीटीजेड में पर्यावरणीय उल्लंघनों पर नोटिस जारी किया। हवा की गुणवत्ता में अपेक्षित सुधार नहीं आया। नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और सूक्ष्म धूल कणों का स्तर बढ़ता गया। कई पर्यावरण विशेषज्ञ अब टीटीजेड प्राधिकरण की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठा रहे हैं।

वृंदावन के पर्यावरण कार्यकर्ता जगन्नाथ पोद्दार कहते हैं कि कभी पूरे ब्रज में बारह बड़े वन हुआ करते थे। आज उनकी पहचान केवल धार्मिक ग्रंथों और स्थानों के नाम तक सीमित रह गई है। जंगलों की जगह अब सीमेंट और कंक्रीट का जंगल खड़ा हो गया है।

पर्यावरण प्रेमी एक और अहम सवाल उठाते हैं। जब हर साल एक्सप्रेसवे, नई सड़कें, हवाई अड्डे, टाउनशिप, मॉल और औद्योगिक परियोजनाएं हजारों एकड़ जमीन घेर रही हैं, तब हर साल करोड़ों नए पौधे लगाने के लिए इतनी खाली जमीन आखिर आती कहां से है?

एक और मुश्किल बंदरों की है। शहर और गांवों में लगाए गए हजारों पौधे बंदर उखाड़ देते हैं। कई जगह पशु भी पौधों को नुकसान पहुंचाते हैं। पौधों के चारों ओर सुरक्षा जाली, नियमित सिंचाई और निगरानी के बिना उनकी जिंदगी ज्यादा लंबी नहीं होती।

ब्रज मंडल के पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने अब तक हुए सभी वृक्षारोपण अभियानों का स्वतंत्र सामाजिक और वैज्ञानिक ऑडिट कराने की मांग की है। उनका कहना है कि केवल पौधे लगाने की संख्या गिनना काफी नहीं है। हर पौधे को जियो-टैग किया जाए, उसकी तीन साल तक निगरानी हो और जीवित पौधों की सार्वजनिक रिपोर्ट जारी की जाए। तभी जनता को असली तस्वीर मालूम होगी।

पेड़ लगाना आसान है। पेड़ बनाना मुश्किल। एक पौधे को विशाल वृक्ष बनने में वर्षों लगते हैं। उसे पानी, सुरक्षा और देखभाल चाहिए। यही जिम्मेदारी सबसे ज्यादा नदारद दिखाई देती है।

इस मानसून भी लाखों पौधे धरती में रोपे जाएंगे। कैमरे फिर चमकेंगे। रिकॉर्ड फिर बनेंगे। भाषण फिर होंगे। लेकिन असली परीक्षा अगले मानसून में होगी।

तब देश फिर वही सवाल पूछेगा; क्या इस बार पौधे सचमुच पेड़ बनेंगे, या हरियाली एक बार फिर सरकारी फाइलों की हरी स्याही तक ही महदूद रह जाएगी?

Tuesday, July 7, 2026

 अंजीर का पत्ता: क्या हम अपने इतिहास से शर्मिंदा हैं?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

8 जुलाई 2026

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देश इस समय महंगाई, बेरोजगारी, प्रदूषण और बुनियादी ढांचे जैसी बड़ी चुनौतियों से जूझ रहा है। लेकिन इसी बीच  की कक्षा 9 की कला शिक्षा की पुस्तक मधुरिमा ने एक ऐसा विवाद खड़ा कर दिया, जिसने शिक्षा, इतिहास और संस्कृति पर नई बहस छेड़ दी।

मामला मोहनजोदड़ो की विश्वप्रसिद्ध “डांसिंग गर्ल” कांस्य प्रतिमा का है। यह साढ़े चार हजार वर्ष पुरानी कलाकृति भारतीय पुरातत्व की सबसे महत्वपूर्ण धरोहरों में से एक है। वर्षों से यह अपने मूल स्वरूप में पाठ्यपुस्तकों में प्रकाशित होती रही, लेकिन इस बार इसके धड़ पर डिजिटल छाया डालकर उसे ढक दिया गया। इतिहासकारों और शिक्षाविदों ने इसे ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ बताया। बढ़ते विवाद के बाद एनसीईआरटी ने मूल चित्र बहाल करने का फैसला लिया।

इतिहासकार  ने कहा, “यह एक काल्पनिक कलाकृति बनाने जैसा है। माइकलएंजेलो की डेविड प्रतिमा पर गिरजाघर द्वारा अंजीर का पत्ता चिपकाने जैसा।” यह टिप्पणी केवल एक उपमा नहीं थी। उसने पूरे विवाद का सार सामने रख दिया।

यह केवल एक तस्वीर का विवाद नहीं, बल्कि उस सोच का सवाल है जो इतिहास को उसकी असल शक्ल में देखने से हिचकती है। अगर किसी ऐतिहासिक कलाकृति को आज के नैतिक चश्मे से बदलना शुरू कर दिया जाए, तो कल किसी मूर्ति का हाथ, किसी चित्र का चेहरा या किसी शिलालेख की पंक्तियां भी बदली जा सकती हैं। तब इतिहास तथ्य नहीं रहेगा, बल्कि हमारी सुविधानुसार गढ़ी गई कहानी बन जाएगा।

दुनिया का अनुभव भी यही बताता है। यूरोप में कभी अनेक मूर्तियों और चित्रों को नैतिकता के नाम पर ढक दिया गया था। बाद में विद्वानों ने माना कि इससे कला और इतिहास दोनों के साथ अन्याय हुआ। संग्रहालयों ने मूल स्वरूप को फिर से अपनाया और यह स्वीकार किया कि इतिहास को बदलने के बजाय उसे समझाना ही बेहतर रास्ता है।

स्कूल की किताबों में बच्चों की उम्र और संवेदनशीलता का ध्यान रखना निश्चित रूप से ज़रूरी है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि प्रमाणिक ऐतिहासिक वस्तुओं को ही बदल दिया जाए। अगर किसी कलाकृति के बारे में अतिरिक्त व्याख्या की आवश्यकता है, तो वह पाठ, टिप्पणी या शिक्षक के माध्यम से दी जा सकती है। शिक्षा का उद्देश्य सच से परिचित कराना है, सच पर पर्दा डालना नहीं।

एक प्रमुख अखबार ने इस पूरे घटनाक्रम को “इतिहास पर फ़ोटोशॉप” कहा। यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि डिजिटल संपादन केवल तस्वीर नहीं बदलता, बल्कि देखने वाले की समझ भी बदल देता है। विद्यार्थी वही सच मानते हैं जो उनकी पाठ्यपुस्तक में छपा होता है। इसलिए पाठ्यपुस्तकों में तथ्य और प्रमाणिकता की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।

भारतीय सभ्यता ने मानव शरीर को कभी शर्म का विषय नहीं माना।  और  के मंदिर,  और  की भित्तिचित्र कला और मूर्तियां इसी सोच की गवाह हैं। इनमें शरीर को वासना नहीं, बल्कि जीवन, सौंदर्य, सृजन और प्रकृति के प्रतीक के रूप में देखा गया। यही हमारी सांस्कृतिक विरासत की सबसे बड़ी खूबी रही है।

विडंबना यह है कि हम दुनिया भर में योग, आयुर्वेद और अपनी प्राचीन सभ्यता पर फ़ख्र करते हैं, लेकिन उसी विरासत की कलात्मक अभिव्यक्तियों को देखकर असहज हो जाते हैं। यह विरोधाभास हमारी सांस्कृतिक समझ पर भी सवाल खड़ा करता है।

एक हिस्टोरियन ने सही  कहा, “अगर नृत्यांगना को अपनी असली शक्ल में नहीं दिखाया जा सकता, तो भारतीय कला का अध्ययन कैसे होगा?” यह प्रश्न केवल एक प्रतिमा का नहीं, बल्कि पूरे इतिहास बोध का है।

पाठ्यपुस्तकें केवल परीक्षा पास कराने का साधन नहीं होतीं। वे आने वाली पीढ़ियों की सोच, समझ और दृष्टि का निर्माण करती हैं। अधूरा या संशोधित इतिहास अंततः अधूरी समझ ही पैदा करता है। हमारी सभ्यता हजारों वर्षों तक इसलिए जीवित रही क्योंकि उसमें आत्मविश्वास था, जिज्ञासा थी और सच का सामना करने का साहस था।

इसलिए इतिहास को अंजीर के पत्ते से ढकने के बजाय उसकी मूल गरिमा के साथ प्रस्तुत करना चाहिए। संवेदनशीलता आवश्यक है, लेकिन सत्य उससे भी अधिक आवश्यक है। सच से आँखें चुराने वाली शिक्षा कभी आत्मविश्वासी समाज का निर्माण नहीं कर सकती।

Monday, July 6, 2026

 जब खबर बिक गई, और सच हार गया!

सत्ता बाजार के आगे घुटने टेकती  पत्रकारिता 

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

5 जुलाई 2026

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मीडिया की दुनिया में अब सबसे बड़ी खबर क्या है?

यह कि खबर अब खबर नहीं रही।

वह एक उत्पाद बन गई है। बिकती है। पैक होकर आती है। सजती है। चमकती है। और फिर दर्शकों के सामने परोस दी जाती है। सच कहीं पीछे छूट जाता है। उसकी जगह ले लेते हैं प्रचार, सनसनी और कारोबार।

कभी पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कही जाती थी। पत्रकार सत्ता की आंखों में आंखें डालकर सवाल पूछते थे। जेल जाते थे। मुकदमे झेलते थे। धमकियां सहते थे। लेकिन कलम नहीं झुकाते थे।

आज तस्वीर बदल गई है। खबर और प्रचार के बीच की दीवार गिर चुकी है। जनसंपर्क यानी पीआर और पत्रकारिता अब कई जगह एक ही सिक्के के दो पहलू दिखाई देते हैं। सत्ता जो कहना चाहती है, वही सुर्खियां बन जाती हैं। जो सवाल पूछता है, उसे अक्सर किनारे कर दिया जाता है।

आज न्यूज़रूम का सबसे ताकतवर आदमी संपादक नहीं, विज्ञापनदाता है। वही तय करता है कि कौन-सी खबर चलेगी और कौन-सी दब जाएगी। अगर किसी खबर से बड़े कारोबारी या राजनीतिक हित प्रभावित होते हों, तो कई बार वह खबर पैदा होने से पहले ही दम तोड़ देती है।

भारत में मीडिया का बड़ा हिस्सा अब कुछ गिने-चुने हाथों में सिमट चुका है। हिंदी के चार बड़े अखबार अधिकांश पाठकों तक पहुंचते हैं। कई बड़े टीवी नेटवर्क भी विशाल कॉरपोरेट घरानों के नियंत्रण में हैं। ऐसे माहौल में पूरी तरह स्वतंत्र पत्रकारिता करना आसान नहीं रह जाता। मालिक का कारोबार और संपादक की कलम हमेशा एक ही दिशा में नहीं चल सकते।

इधर पीआर एजेंसियों ने भी पत्रकारिता का चेहरा बदल दिया है। तैयार प्रेस विज्ञप्तियां, चमकदार तस्वीरें, पहले से लिखे बयान और वीडियो सीधे न्यूज़रूम में पहुंच जाते हैं। समय की कमी और लागत बचाने की मजबूरी में कई संस्थान इन्हें लगभग ज्यों का त्यों खबर बना देते हैं।

नतीजा सामने है। किसान की तकलीफ पीछे छूट जाती है। बेरोज़गार युवा की कहानी जगह नहीं पाती। प्रदूषण, जल संकट, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे छोटे कोने में सिमट जाते हैं। लेकिन किसी उत्पाद की लॉन्चिंग, किसी फ़िल्मी सितारे की पार्टी या सरकारी कार्यक्रम को घंटों का प्रसारण मिल जाता है।

खोजी पत्रकारिता कभी इस पेशे की पहचान थी। एक ख़बर सरकारें गिरा देती थी। बड़े-बड़े घोटाले उजागर होते थे। आज ऐसे उदाहरण कम दिखाई देते हैं। इसकी एक वजह डर भी है। मुकदमे, कानूनी दबाव, आर्थिक संकट और नौकरी जाने का भय। प्रेस स्वतंत्रता से जुड़े अंतरराष्ट्रीय सूचकांक भी यही संकेत देते हैं कि स्वतंत्र पत्रकारिता पहले से अधिक कठिन होती जा रही है।

टीवी चैनलों की बहसें देखिए। हर शाम वही चेहरे। वही चीख-पुकार। वही तयशुदा संवाद। एंकर कई बार सवाल पूछने वाले पत्रकार कम और किसी पक्ष के वकील ज़्यादा लगते हैं। बहस कम होती है, शोर ज़्यादा होता है। दर्शक जानकारी लेकर नहीं, उलझन लेकर उठता है।

आज तर्क की जगह तमाशा बिकता है। तथ्य से ज़्यादा तेज़ आवाज़ मायने रखती है। वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों से ज़्यादा जगह कई बार ज्योतिषियों, स्वयंभू बाबाओं और सनसनी फैलाने वालों को मिलती है। सोशल मीडिया की रफ्तार ने भी इस बीमारी को बढ़ाया है। पहले खबर की पुष्टि होती थी, अब पहले वायरल होना ज़रूरी समझा जाता है।

प्रेस की आज़ादी का मतलब कभी सत्ता से सवाल पूछने की आज़ादी था। आज कई जगह इसका मतलब बदलता दिखाई देता है। कुछ मीडिया संस्थान सरकारों और बड़े कॉरपोरेट घरानों के साथ इतने करीब हो गए हैं कि आलोचना उन्हें नागवार गुजरती है। सत्ता की प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवाल कम और तारीफ ज़्यादा सुनाई देती है। कई नेता अब कठिन सवालों से बचते हुए सीधे सोशल मीडिया के ज़रिए जनता तक अपना संदेश पहुंचा देते हैं। संवाद की जगह एकतरफा प्रसारण ने ले ली है।

यह संकट केवल भारत का नहीं है। दुनिया के कई लोकतांत्रिक देशों में मीडिया पर लोगों का भरोसा लगातार घट रहा है। लोगों को लगता है कि खबरें निष्पक्ष कम और झुकाव वाली ज़्यादा हो गई हैं। 

हर साल पत्रकारिता के कॉलेज हजारों नए छात्र तैयार कर रहे हैं। लेकिन अच्छी पत्रकारिता केवल डिग्री से नहीं आती। उसके लिए भाषा पर पकड़ चाहिए। इतिहास और समाज की समझ चाहिए। सबसे बढ़कर ईमानदारी चाहिए। अफ़सोस, क्लिकों की दौड़, कम वेतन और नौकरी की असुरक्षा ने नए पत्रकारों पर भी गहरा असर डाला है। बहुत से युवाओं के लिए पत्रकारिता अब केवल पीआर या डिजिटल इन्फ्लुएंसर बनने की सीढ़ी बनकर रह गई है।

इसका सबसे बड़ा नुकसान आम नागरिक उठाता है। जब उसे पूरी और सही जानकारी नहीं मिलती, तब अफ़वाहें फैलती हैं। समाज खेमों में बंटता है। लोग एक-दूसरे को सुनना छोड़ देते हैं। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत, यानी जागरूक नागरिक, धीरे-धीरे भ्रमित नागरिक में बदलने लगता है।

पत्रकारिता का काम सरकार गिराना नहीं है। उसका काम सरकार से सवाल पूछना है। उसका काम किसी दल का विरोध या समर्थन करना नहीं, बल्कि जनता के हित की हिफाज़त करना है। पत्रकार अगर दरबारी बन जाएगा, तो जनता की आवाज़ कौन बनेगा?

सच बोलना कभी आसान नहीं रहा। लेकिन इतिहास गवाह है कि वही समाज आगे बढ़ते हैं, जहां पत्रकार सवाल पूछने से नहीं डरते। जहां कलम बिकती नहीं, झुकती नहीं और सत्ता के दरबार में सलाम करने के बजाय जनता के दरवाज़े पर खड़ी रहती है।

जिस दिन खबर फिर से सच की तरफ लौटेगी, उसी दिन पत्रकारिता भी अपनी खोई हुई इज़्ज़त वापस पा लेगी। वरना अख़बार छपते रहेंगे, चैनल चलते रहेंगे, मोबाइल पर नोटिफिकेशन बजते रहेंगे, लेकिन सच धीरे-धीरे हमारी आंखों के सामने दम तोड़ देगा। और तब सबसे बड़ा नुकसान किसी पत्रकार का नहीं, पूरे लोकतंत्र का होगा।