Tuesday, July 21, 2026

 बढ़ती फीस, घटते स्तर

निजी स्कूलों की बढ़ती फीस:

क्या हमें अपनी जेब के हिसाब से तालीम मिल रही है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

23 जुलाई 2026

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साल 1964-65 में मेरे माता-पिता आगरा के सेंट पीटर्स कॉलेज की मासिक फीस सिर्फ 6 से 10 रुपये भरते थे। स्कूल की यूनिफॉर्म साधारण सूती खाकी होती थी और इसके अलावा कोई छिपा हुआ खर्च नहीं था।

आज आगरा के डीपीएस या प्रील्यूड पब्लिक स्कूल जैसे बड़े निजी स्कूल हर महीने 12,000 से 16,000 रुपये तक फीस लेते हैं। यानी साल भर में करीब 1.5 लाख से 4 लाख रुपये का खर्च। यह बढ़ोतरी 1,50,000 प्रतिशत से भी ज्यादा है। इसी दौरान देश में महंगाई लगभग 100 से 120 गुना बढ़ी है।

सवाल यह है कि स्कूलों की फीस बाकी चीजों के मुकाबले इतनी तेज़ी से क्यों बढ़ी? और क्या तालीम की गुणवत्ता भी उतनी ही बेहतर हुई है?

फीस बढ़ने के पीछे कई वजहें हैं। शिक्षकों का वेतन बढ़ा है। स्कूलों की इमारतें आधुनिक हुई हैं। स्मार्ट क्लास, कंप्यूटर, लैब और खेल सुविधाओं पर खर्च बढ़ा है। सरकार के नए नियमों का पालन करना पड़ता है। साथ ही मध्यम वर्ग के परिवार अपने बच्चों को "प्रीमियम" स्कूलों में पढ़ाना चाहते हैं।

आज भारत के लगभग आधे बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं। बड़े स्कूल स्मार्ट क्लासरूम, विज्ञान प्रयोगशालाएं, खेल मैदान, बस सेवा, सह-पाठ्यक्रम गतिविधियां और जेईई तथा नीट जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी कराते हैं।

माता-पिता अब सिर्फ पढ़ाई के लिए नहीं, बल्कि बेहतर माहौल, अच्छे सहपाठियों, सामाजिक रुतबे और कॉलेज में दाखिले की उम्मीद के लिए भी पैसा खर्च कर रहे हैं। पिछले दस वर्षों में शहरों के निजी स्कूलों की फीस करीब 169 प्रतिशत बढ़ी है, जबकि लोगों की आमदनी इतनी तेज़ नहीं बढ़ी।

यहीं से फिक्र शुरू होती है। इसमें कोई शक नहीं कि आज के स्कूल 1960 के दशक की तुलना में कहीं अधिक आधुनिक हैं। भारतीय छात्र बोर्ड परीक्षाओं, जेईई और नीट जैसी कठिन परीक्षाओं में अच्छा प्रदर्शन करते हैं। इसी वजह से भारत बड़ी संख्या में सक्षम इंजीनियर और वैज्ञानिक तैयार करता है।

लेकिन जब बात अंतरराष्ट्रीय स्तर की परीक्षा PISA (Programme for International Student Assessment) की आती है, जो रटने के बजाय सोचने, समझने और वास्तविक जीवन में ज्ञान का इस्तेमाल करने की क्षमता को परखती है, तब भारत का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है।

साल 2009 में, जब भारत ने इस परीक्षा में भाग लिया, तब उसकी रैंकिंग सबसे नीचे रहने वाले देशों में थी। वियतनाम, एस्टोनिया और फिनलैंड जैसे देश भारत से काफी आगे रहे। निजी स्कूलों के छात्र सरकारी स्कूलों से बेहतर थे, लेकिन दुनिया के मानकों तक नहीं पहुंच सके।

उसके बाद भारत ने पीसा में हिस्सा नहीं लिया। लेकिन देश के अपने सर्वे भी यही तस्वीर दिखाते हैं। ASER (Annual Status of Education Report) और NAS (National Achievement Survey), जिसे अब PARAKH राष्ट्रीय सर्वेक्षण कहा जाता है, बताते हैं कि निजी स्कूलों के बहुत से बच्चे भी अपनी कक्षा के स्तर के अनुसार न ठीक से पढ़ पाते हैं और न ही गणित कर पाते हैं।

इसकी एक बड़ी वजह यह है कि हमारे स्कूल अब भी समझ विकसित करने के बजाय रटने पर ज़्यादा ज़ोर देते हैं।

एक सेवानिवृत्त शिक्षक का कहना है कि निजी स्कूलों की बेहतर छवि का एक और राज़ है। इनमें ज़्यादातर दाखिला उन परिवारों के बच्चों को मिलता है, जिनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति पहले से बेहतर होती है। इसलिए अच्छे नतीजों का पूरा श्रेय केवल स्कूलों की पढ़ाई को नहीं दिया जा सकता।

माता-पिता भारी-भरकम फीस इस उम्मीद से भरते हैं कि बच्चों को बेहतरीन तालीम मिलेगी। लेकिन फीस जितनी तेज़ी से बढ़ी है, शिक्षा की गुणवत्ता उतनी नहीं बढ़ी। बड़ी कक्षाएं, शिक्षकों की असमान ट्रेनिंग और परीक्षा-केंद्रित पढ़ाई आज भी आम समस्या हैं।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का मकसद रटने की संस्कृति कम करना और बच्चों में सोचने-समझने, हुनर और व्यवहारिक ज्ञान को बढ़ावा देना है। लेकिन ज़मीन पर इन बदलावों को लागू होने में अभी वक्त लगेगा।

फीस और शिक्षा की गुणवत्ता के बीच बढ़ता यह फ़ासला परिवारों की जेब पर भारी पड़ रहा है। इससे अच्छी शिक्षा सिर्फ़ अमीरों तक सीमित होने का ख़तरा भी बढ़ रहा है। सबसे बड़ी कमी यह है कि स्कूलों से यह साबित करने की कोई ठोस जवाबदेही नहीं मांगी जाती कि बढ़ी हुई फीस से बच्चों की सीखने की क्षमता भी वास्तव में बेहतर हुई है।

अगर 1965 का कोई छात्र आज के स्कूल देखे, तो वह शानदार इमारतों, स्मार्ट क्लासरूम और आधुनिक तकनीक से ज़रूर हैरान होगा। लेकिन शायद वह यह सवाल भी पूछे कि क्या असली तालीम भी उतनी ही आगे बढ़ी है, जितनी फीस बढ़ी है?

जब तक स्कूलों का हिसाब सिर्फ़ चमकदार इमारतों और सुविधाओं से नहीं, बल्कि बच्चों के वास्तविक सीखने के नतीजों से नहीं लिया जाएगा, तब तक माता-पिता शायद अच्छी शिक्षा से ज़्यादा उसकी चमक-दमक की कीमत चुकाते रहेंगे।

Monday, July 20, 2026

 फ्लैट संस्कृति की तरफ बढ़ रहे शहर

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उत्तर प्रदेश कब जागेगा?

फ्लैट खरीदारों को बिल्डरों और आरडब्ल्यूए की मनमानी से बचाना जरूरी

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

2 2 जुलाई, 2026

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घर हर इंसान का सबसे बड़ा सपना होता है। लोग पूरी उम्र की कमाई, भविष्य निधि, बैंक कर्ज और अपनी तमाम बचत लगाकर एक फ्लैट खरीदते हैं। उम्मीद रहती है कि अब परिवार को सुरक्षित और सुकून भरी ज़िंदगी मिलेगी। 

मगर उत्तर प्रदेश के हजारों अपार्टमेंटों में यह सपना धीरे-धीरे एक दर्दनाक हकीकत में बदलता जा रहा है। फ्लैट मिलने के बाद भी लोग राहत नहीं, बल्कि रोज़ नई परेशानियों, झगड़ों और कानूनी लड़ाइयों में उलझ जाते हैं।

भारत में फ्लैट या अपार्टमेंट मुख्य रूप से शहरी इलाकों की पहचान हैं और अभी भी देश के कुल आवासों में इनकी हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम है। शहरी क्षेत्रों में लगभग 31 प्रतिशत परिवार फ्लैटों में रहते हैं, जबकि छोटे शहरों में यह आंकड़ा करीब 24 प्रतिशत है। राष्ट्रीय स्तर पर केवल 10–15 प्रतिशत परिवार ही अपार्टमेंट में रहते हैं, क्योंकि अधिकांश लोग, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में, स्वतंत्र मकानों में रहते हैं। तेज़ी से बढ़ता शहरीकरण, जमीन की कमी, छोटे परिवार और आधुनिक सुविधाओं की बढ़ती मांग फ्लैट संस्कृति को बढ़ावा दे रहे हैं। भारत में हर वर्ष लगभग 12 से 15 लाख नए शहरी फ्लैट बनते हैं, लेकिन देशभर में फ्लैटों की कुल संख्या का कोई एकीकृत और अद्यतन सरकारी आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।

इस बीच कर्नाटक सरकार ने एक ऐसी पहल की है, जिससे दूसरे राज्यों को भी सबक लेना चाहिए। कर्नाटक अपार्टमेंट (ओनरशिप एंड मैनेजमेंट) एक्ट, 2026 का मसौदा तैयार किया गया है। इस कानून को बनाने से पहले राज्य की 500 से अधिक अपार्टमेंट एसोसिएशनों के प्रतिनिधियों से विस्तार से राय ली गई। मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के सामने फ्लैट मालिकों ने साफ कहा कि उन्हें मजबूत कानूनी सुरक्षा, पूरी पारदर्शिता और बिल्डरों की जवाबदेही चाहिए।

अब सवाल यह है कि उत्तर प्रदेश ऐसा कानून कब बनाएगा?

आगरा, मथुरा, वृंदावन, लखनऊ, नोएडा, गाजियाबाद, कानपुर और तेजी से बढ़ते दूसरे शहरों में लाखों लोग बहुमंजिला इमारतों में रह रहे हैं। लेकिन इन सोसाइटियों में रहने वाले परिवार अक्सर तीन तरफ़ा दबाव झेलते हैं। 

एक ओर बिल्डर हैं, जो फ्लैट बेचने के बाद अपनी जिम्मेदारी से किनारा कर लेते हैं। दूसरी ओर कई रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन यानी आरडब्ल्यूए हैं, जिनमें लोकतंत्र की जगह कुछ लोगों का कब्ज़ा बना रहता है। तीसरी ओर सरकारी एजेंसियां हैं, जो अक्सर तब तक सक्रिय नहीं होतीं, जब तक मामला अदालत या बड़े विरोध प्रदर्शन तक नहीं पहुंच जाता।

कई सोसाइटियों में वर्षों से निष्पक्ष चुनाव नहीं हुए हैं। वही लोग लगातार पदों पर बने रहते हैं। रखरखाव शुल्क हर साल बढ़ता जाता है, लेकिन खर्च का पूरा हिसाब निवासियों के सामने नहीं रखा जाता। ऑडिट या तो होता नहीं या फिर उसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाती। आम निवासी यह तक नहीं जान पाते कि उनकी मेहनत की कमाई आखिर खर्च कहां हो रही है।

मुसीबत यहीं खत्म नहीं होती। कई बिल्डर आरडब्ल्यूए बनने के बाद भी साझा सुविधाओं, कॉमन एरिया, रखरखाव निधि और जरूरी दस्तावेज समय पर नहीं सौंपते। इसका नुकसान सीधे फ्लैट मालिकों को उठाना पड़ता है। वे सालों तक अनिश्चितता में जीते रहते हैं।

दूसरी तरफ निर्माण की गुणवत्ता भी गंभीर चिंता का विषय है। कहीं छत टपकती है, कहीं दीवारों में दरारें पड़ जाती हैं। खराब पाइपलाइन, बिजली की अव्यवस्थित वायरिंग और दूसरी तकनीकी खामियां लोगों की सुरक्षा पर सवाल खड़े करती हैं। शिकायत करने पर बिल्डर अक्सर जिम्मेदारी लेने से बचते हैं।

रोजमर्रा की सुविधाओं का हाल भी कम खराब नहीं है। पानी की अनियमित आपूर्ति, बार-बार खराब होने वाली लिफ्ट, बंद पड़े सीसीटीवी कैमरे, कमजोर सुरक्षा व्यवस्था, कूड़े के ढेर और अग्निशमन के अधूरे इंतजाम कई सोसाइटियों की पहचान बन चुके हैं। पूजा स्थल,  क्लब हाउस, जिम, स्विमिंग पूल, पार्क और बच्चों के खेल मैदान का सपना दिखाकर फ्लैट बेचे जाते हैं, वे कई बार सिर्फ विज्ञापनों तक ही सीमित रह जाते हैं।

पार्किंग को लेकर भी विवाद लगातार बढ़ रहे हैं। कई जगह विज़िटर पार्किंग तक बेच दी जाती है। साझा जगहों पर कब्ज़ा हो जाता है और आए दिन झगड़े होते रहते हैं। शिकायत करने वाले लोगों को भी कई बार मानसिक दबाव या उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है।

सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि अलग-अलग कानूनों और नियमों के कारण अधिकार और जिम्मेदारियां साफ नहीं हैं। अदालतों में ऐसे हजारों मामले वर्षों तक लंबित रहते हैं। आम परिवार समय और पैसा दोनों गंवाता है, जबकि बड़े बिल्डर कानूनी पेचीदगियों का फायदा उठाते रहते हैं।

ऐसे में उत्तर प्रदेश को भी कर्नाटक की तर्ज पर एक व्यापक और प्रभावी अपार्टमेंट स्वामित्व एवं प्रबंधन कानून बनाने की जरूरत है। हर सोसाइटी में समयबद्ध और निष्पक्ष चुनाव अनिवार्य हों। आरडब्ल्यूए बनते ही बिल्डर सभी साझा संपत्तियां, रखरखाव निधि और जरूरी दस्तावेज तुरंत सौंपे। हर साल स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए और उसकी रिपोर्ट सभी निवासियों के लिए सार्वजनिक हो। बैठकों में ऑनलाइन भागीदारी की सुविधा भी हो, ताकि अधिक से अधिक लोग निर्णय प्रक्रिया में शामिल हो सकें।

भ्रष्टाचार उजागर करने वाले लोगों को कानूनी सुरक्षा मिले। शिकायतों का निपटारा महीनों में हो, वर्षों में नहीं। साथ ही नियामक संस्थाओं को ऐसे अधिकार दिए जाएं कि वे नियम तोड़ने वाले बिल्डरों और मनमानी करने वाले आरडब्ल्यूए पर भारी जुर्माना लगा सकें और जरूरत पड़ने पर उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई कर सकें।

भारत के शहर तेजी से अपार्टमेंट संस्कृति की ओर बढ़ रहे हैं। आने वाले वर्षों में करोड़ों परिवार बहुमंजिला इमारतों में रहेंगे। ऐसे में पुराने और बिखरे हुए कानून अब पर्याप्त नहीं हैं। समय की मांग है कि फ्लैट खरीदारों के अधिकारों को मजबूत कानूनी सुरक्षा मिले।

कर्नाटक ने इस दिशा में कदम बढ़ा दिया है। अब उत्तर प्रदेश सरकार, रेरा, नगर निकायों, आवास विकास संस्थाओं और उपभोक्ता मंचों को भी मिलकर ठोस फैसला लेना होगा।

फ्लैट मालिक कोई एहसान नहीं मांग रहे। उन्होंने अपने खून-पसीने की कमाई से घर खरीदा है। उन्हें सिर्फ वही हक चाहिए, जिसकी कीमत वे पहले ही चुका चुके हैं। आखिर घर सुकून की जगह होना चाहिए, अदालतों और विवादों का स्थायी मैदान नहीं। उत्तर प्रदेश जितनी जल्दी यह सच समझेगा, उतनी ही जल्दी लाखों परिवारों की जिंदगी आसान हो सकेगी।

Saturday, July 18, 2026

 


बिना मरीज के डॉक्टर!!!

शोध के कुली: नाम के आगे 'डॉ.' लगाने की दौड़ या ज्ञान की तलाश?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

20 जुलाई, 2026

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आजकल भारत में पीएचडी की बड़ी धूम है। हर साल करीब 30 से 35 हजार लोग डॉक्टरेट की डिग्री हासिल कर रहे हैं। विश्वविद्यालयों में शोधार्थियों (रिसर्च स्कॉलरों) की संख्या साढ़े तीन लाख के आसपास पहुँच चुकी है। कागज़ पर यह तस्वीर बहुत शानदार दिखती है। लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और ही कहानी सुनाती है।

पीएचडी का मक़सद नए विचार पैदा करना, देश की समस्याओं का हल ढूँढ़ना और समाज को आगे बढ़ाना था। अफ़सोस, कई जगह यह डिग्री सिर्फ़ नाम के आगे "डॉ." लगाने का ज़रिया बनकर रह गई है। ज्ञान की जगह दिखावा, गुणवत्ता की जगह संख्या और मौलिक सोच की जगह औपचारिकता ने ले ली है।

आज कई शोधार्थी खुद को शोधकर्ता नहीं, बल्कि "रिसर्च कुली" महसूस करते हैं। वे वर्षों तक मेहनत करते हैं, लेकिन सम्मान, मार्गदर्शन और सुरक्षा के बजाय उन्हें दबाव, अनिश्चितता और शोषण का सामना करना पड़ता है।

सबसे बड़ी बीमारी है "छापो या मिट जाओ" की संस्कृति। विश्वविद्यालयों और शिक्षकों के मूल्यांकन में शोध-पत्रों की संख्या को बहुत अहमियत दी जाती है। नतीजा यह हुआ कि अच्छी रिसर्च करने के बजाय ज़्यादा से ज़्यादा शोध-पत्र छापने की होड़ मच गई।

इस होड़ ने एक पूरा कारोबार खड़ा कर दिया है। पैसे देकर शोध-पत्र लिखवाना, नकली या घटिया पत्रिकाओं में उन्हें छपवाना और एक ही शोध को कई हिस्सों में बाँटकर अलग-अलग प्रकाशित करना आम बात बन गई है। ऐसे कई शोध-पत्र बाद में वापस भी लेने पड़े। इससे भारतीय शोध की साख  पर सवाल उठे हैं।

दुख की बात यह है कि इन शोधों का बड़ा हिस्सा न उद्योग के काम आता है, न किसानों के, न अस्पतालों के और न समाज के। वे सिर्फ़ विश्वविद्यालय की अलमारी या ऑनलाइन भंडार में धूल खाते रहते हैं।

एक और बड़ी समस्या है शोध-निर्देशक और शोधार्थी के बीच असमान ताक़त का रिश्ता। कई जगह मार्गदर्शक (गाइड) छात्रों पर इतना नियंत्रण रखते हैं कि उनका भविष्य पूरी तरह उन्हीं के हाथ में होता है।

कई संस्थानों से शिकायतें सामने आई हैं कि शोधार्थियों से निजी काम कराए जाते हैं। किसी से गाड़ी चलवाई जाती है, किसी से घरेलू काम करवाए जाते हैं। कई बार सेक्सुअल हरासमेंट की खबरें भी आई हैं। कहीं थीसिस पास कराने के बदले महंगे तोहफ़ों या नक़द की माँग तक के आरोप लगे। जो छात्र विरोध करे, उसकी थीसिस महीनों या वर्षों तक अटक सकती है। यह रिश्ता गुरु-शिष्य का कम और मालिक-मज़दूर का ज़्यादा लगता है।

देश के बड़े और प्रतिष्ठित संस्थान भी इस बीमारी से पूरी तरह अछूते नहीं हैं। लंबे कार्य घंटे, सप्ताह में सत्तर-अस्सी घंटे लैब में रहने का दबाव और लगातार प्रदर्शन साबित करने की मजबूरी ने अनेक शोधार्थियों को मानसिक तनाव की तरफ़ धकेला है।

पीएचडी का सफ़र वैसे ही आसान नहीं होता। कम छात्रवृत्ति, भविष्य की अनिश्चितता, अकेलापन और लगातार दबाव कई छात्रों को चिंता और अवसाद की ओर ले जाता है। बहुत-से विश्वविद्यालयों में मानसिक स्वास्थ्य की समुचित सुविधा भी उपलब्ध नहीं है।

डिग्री पूरी होने के बाद भी तस्वीर बहुत उत्साहजनक नहीं है। हर साल हज़ारों नए पीएचडी धारक नौकरी की तलाश में निकलते हैं। लेकिन विश्वविद्यालयों में स्थायी पद सीमित हैं और उद्योग जगत अभी भी शोधकर्ताओं का पूरा उपयोग नहीं कर पा रहा है।

नतीजा यह होता है कि अनेक पीएचडी धारक अतिथि शिक्षक, अस्थायी व्याख्याता या अपनी योग्यता से बिल्कुल अलग काम करने को मजबूर हो जाते हैं। वर्षों की मेहनत के बाद भी उन्हें वह सम्मान और अवसर नहीं मिलता जिसकी उन्होंने उम्मीद की थी।

भारत में पेटेंट की संख्या बढ़ी है, लेकिन उनमें से बहुत कम तकनीक बाज़ार तक पहुँच पाती है। कुछ आईआईटी, आईआईएससी और चुनिंदा संस्थानों को छोड़ दें, तो अधिकांश विश्वविद्यालयों का शोध प्रयोगशाला से बाहर निकल ही नहीं पाता। उसका लाभ न उद्योग को मिलता है और न आम नागरिक को।

यही वजह है कि डिग्रियाँ बढ़ रही हैं, लेकिन नवाचार (इनोवेशन) उसी रफ़्तार से नहीं बढ़ रहा। शोध का उद्देश्य समस्या का समाधान होना चाहिए, केवल शोध-पत्रों की गिनती नहीं।

सरकार ने अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फ़ाउंडेशन (एएनआरएफ), उद्योग से जुड़े पीएचडी कार्यक्रम और बेहतर वित्तीय सहायता जैसी कई पहल शुरू की हैं। ये अच्छी शुरुआत हैं, लेकिन पूरे तंत्र को बदलने के लिए अभी लंबा सफ़र तय करना बाकी है।

ज़रूरत इस बात की है कि शोध-निर्देशकों की जवाबदेही तय हो, छात्रों को सम्मानजनक माहौल मिले, मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान दिया जाए और विश्वविद्यालयों तथा उद्योगों के बीच मज़बूत साझेदारी बने। सबसे ज़रूरी यह है कि शोध का लक्ष्य देश की असली समस्याओं का हल निकालना हो।

भारत को केवल आँकड़ों में सबसे ज़्यादा पीएचडी नहीं चाहिए। देश को ऐसे शोध चाहिए जो खेतों की पैदावार बढ़ाएँ, अस्पतालों को बेहतर बनाएँ, कारखानों को नई तकनीक दें, रोज़गार पैदा करें और लोगों का जीवन आसान बनाएँ।

जब तक पीएचडी केवल प्रतिष्ठा (शोहरत) का तमगा बनी रहेगी, तब तक शोधार्थी ज्ञान के निर्माता नहीं, बल्कि व्यवस्था के "शोध के कुली" बने रहेंगे। डिग्री की असली कीमत उसके काग़ज़ में नहीं, बल्कि उससे पैदा होने वाले बदलाव में होती है। वही बदलाव भारत की सबसे बड़ी ज़रूरत है।


Friday, July 17, 2026

 पौराणिक कहानियां क्यों लुभाती हैं?

क्या है मिथकों का मिथक?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

19 जुलाई 2026

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सिनेमा हॉल में सन्नाटा पसरा है। विशाल पर्दे पर देवता और असुर आमने-सामने खड़े हैं। तलवारें चमकती हैं, शंख गूंजते हैं, आकाश में दिव्य अस्त्र बरसते हैं। जैसे ही धर्म की जीत होती है और राक्षस धराशायी होता है, पूरा हॉल तालियों और जयघोष से गूंज उठता है। कई दर्शकों की आंखें नम हैं। यह केवल एक फिल्म का अंत नहीं, बल्कि भीतर दबे डर, उम्मीद और न्याय की चाह का विस्फोट है। सदियों से इंसान ऐसी ही कहानियों में अपने मन का बोझ हल्का करता आया है।

फिल्म खत्म होती है, लेकिन कहानी नहीं। वही दर्शक घर लौटकर अपने बच्चों को भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार, राम की विजय या कृष्ण की लीलाएं सुनाते हैं। कर्नाटक के एक छोटे-से गांव में बरगद के नीचे बैठा एक बूढ़ा किस्सागो भी यही कर रहा है। वह राजा मनु और महाप्रलय की कथा सुनाता है। यही कहानी बाइबिल के नूह और मेसोपोटामिया के उत्नापिष्टिम की दास्तानों में भी सुनाई देती है। हज़ारों साल और हज़ारों किलोमीटर का फ़ासला मिट जाता है। कहानी वही रहती है, सिर्फ़ किरदार बदल जाते हैं. 

इंसान हमेशा से कहानियों का दीवाना रहा है। यही किस्से दुनिया के अलग-अलग मुल्कों और सदियों को एक धागे में पिरो देते हैं।

पौराणिक कथाएँ सिर्फ़ देवताओं, राक्षसों और चमत्कारों की पुरानी दास्तानें नहीं हैं। ये ज़िंदगी और मौत, नेकी और बुराई, उम्मीद और रहस्य को समझने का ज़रिया हैं। जब विज्ञान के पास जवाब नहीं थे, तब मिथकों ने इंसान को मायने दिए। हर सभ्यता ने ऐसे सवालों का जवाब खोजने के लिए अपनी कथाएँ गढ़ीं : हम यहाँ क्यों हैं? मौत के बाद क्या होता है? हमें कैसी ज़िंदगी जीनी चाहिए?

मिथक किसी भी समाज की सोच, आस्था और तहज़ीब की बुनियाद होते हैं। सदियों तक ये कहानियाँ आग के अलाव के पास बैठकर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक सुनाई जाती रहीं। बाद में इन्हें लिखा गया। इनमें कल्पना और प्रतीक ज़रूर हैं, लेकिन इनके भीतर इंसानी फ़ितरत और समाज की गहरी सच्चाइयाँ छिपी हैं। इनका असर धर्मों पर भी साफ़ दिखाई देता है।

मनोवैज्ञानिक कार्ल युंग का मानना था कि मिथक इंसान के "सामूहिक अवचेतन" से जन्म लेते हैं। यानी कुछ भावनाएँ और प्रतीक ऐसे हैं जो पूरी इंसानियत में साझा हैं। इसलिए दुनिया के अलग-अलग हिस्सों की कहानियाँ एक जैसी लगती हैं। जनचिंतक पारस नाथ झा कहते हैं कि मिथक हमें केवल कल्पना नहीं, बल्कि इंसानी अनुभव का आईना दिखाई देते हैं।

मिथकों का एक बड़ा मक़सद इंसान को सही रास्ता दिखाना भी है। देवताओं और नायकों की कहानियाँ साहस, ईमानदारी, दया और त्याग की सीख देती हैं। वहीं लालच, घमंड और जलन जैसी बुराइयों से आगाह करती हैं। स्वर्ग, नरक और परलोक की कथाएँ लोगों को नेक और मक़सद भरी ज़िंदगी जीने की प्रेरणा देती हैं।

हैरानी की बात यह है कि दुनिया की दूर-दराज़ सभ्यताओं में भी कई मिथक लगभग एक जैसे हैं, जबकि उनका आपस में कोई सीधा संपर्क नहीं था। महाप्रलय की कहानी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। हिंदू धर्म में विष्णु मनु को बचाते हैं, बाइबिल में नूह अपनी नाव से जीवन बचाते हैं और मेसोपोटामिया में उत्नापिष्टिम यही भूमिका निभाते हैं। ऐसी कथाएँ यूनान, चीन, ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों और माया सभ्यता में भी मिलती हैं। शायद ये किसी प्राचीन प्राकृतिक आपदा की याद हैं या फिर पानी के प्रति इंसान के साझा डर और सम्मान की अभिव्यक्ति।

एक और साझा विषय है; अराजकता से सृष्टि का जन्म। मिस्र की कथाओं में आदिकालीन जल से सूर्य देव प्रकट होते हैं। बेबीलोन की कथा में एक देवी के शरीर से धरती बनती है। यूनानी और हिंदू परंपराएँ भी बताती हैं कि व्यवस्था अव्यवस्था से पैदा हुई। यह यात्रा इंसान के भ्रम से समझ तक पहुँचने की कहानी भी है।

मिथकों के देवता अक्सर इंसानी समाज का ही प्रतिबिंब होते हैं। जैसे समाज में राजा, योद्धा और मेहनतकश होते हैं, वैसे ही देवताओं की भी अलग-अलग ज़िम्मेदारियाँ होती हैं। यूनानी कथाओं में ज़्यूस आकाश के, पोसाइडन समुद्र के और हेडीज़ पाताल के स्वामी हैं। हिंदू परंपरा में इंद्र वर्षा के देवता हैं, अग्नि अग्नि के और विष्णु सृष्टि के पालनकर्ता। इन कथाओं ने प्राचीन समाज को व्यवस्था, सत्ता और ज़िम्मेदारी समझने में मदद की।

अधिकांश मिथकों में एक संघर्ष हमेशा दिखाई देता है: व्यवस्था और अराजकता का। देवता और असुर, रोशनी और अंधेरा, नेकी और बुराई आमने-सामने खड़े होते हैं। यह केवल रोमांच नहीं, बल्कि इंसान के भीतर और समाज में चलने वाली जद्दोजहद का प्रतीक है।

आज हम पहले जैसी नई पौराणिक कथाएँ नहीं गढ़ते। लेकिन सुपरहीरो फ़िल्में, स्टार वॉर्स, अंतरिक्ष यात्राओं की कहानियाँ और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की दास्तानें उसी परंपरा का नया रूप हैं। विज्ञान ने बिजली, बादल और बाढ़ के रहस्यों को समझा दिया है, लेकिन इंसान की कल्पना और अर्थ की तलाश अब भी ज़िंदा है। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने साझा किस्सों की जगह अलग-अलग डिजिटल दुनिया बना दी है।

पौराणिक फ़िल्में आज इस आकर्षण की सबसे बड़ी मिसाल बन गई हैं। रामायण, महाभारत और यूनानी कथाओं पर बनी फ़िल्में दुनिया भर में करोड़ों दर्शकों को खींचती हैं। इनके विशाल दृश्य, असाधारण नायक और कर्तव्य, त्याग तथा नियति जैसे विषय लोगों को आज भी बाँध लेते हैं।

जेम्स कैमरून की अवतार इसका बेहतरीन उदाहरण है। पेंडोरा की चमकती दुनिया, अद्भुत जीव-जंतु और प्रकृति से गहरा आध्यात्मिक रिश्ता दर्शकों को एक नई, लेकिन बेहद परिचित दुनिया में ले जाते हैं। यह फ़िल्म बताती है कि इंसान आज भी प्रकृति और ब्रह्मांड के साथ अपना रिश्ता तलाशना चाहता है।

विज्ञान के इस दौर में भी इंसान केवल तथ्यों से संतुष्ट नहीं होता। उसे ज़िंदगी का मतलब चाहिए। जलवायु संकट, तेज़ी से बदलती तकनीक और अनिश्चित भविष्य के बीच हम प्रेरणादायक अंतरिक्ष यात्रियों, सच बोलने वाले नायकों और धरती को जीवित माँ मानने वाली कहानियों की ओर लौटते हैं। इन्हीं में हमें उम्मीद और मक़सद मिलता है।

बरगद के नीचे बैठा वह बूढ़ा किस्सागो शायद यह बात बिना किसी किताब के समझता है। उसकी सुनाई महाप्रलय की कहानी आज के बच्चों को हज़ारों साल पुराने अपने पुरखों से जोड़ देती है। विज्ञान हमें बताता है कि दुनिया कैसे चलती है, लेकिन कहानियाँ हमें समझाती हैं कि यह दुनिया हमारे लिए क्यों मायने रखती है। जब तक इंसान रहेगा, मिथक भी रहेंगे। क्योंकि कहानी कहना और सुनना हमारी फ़ितरत का हिस्सा है।

Wednesday, July 15, 2026

 जब सड़कों पर इंसानों से ज़्यादा जानवरों का राज हो जाए

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बेकाबू आवारा कुत्ते, बंदरों के हमले और सड़कों पर घूमते मवेशी ताज नगरी की रफ्तार और लोगों की सुरक्षा पर भारी पड़ रहे हैं

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

17 जुलाई 2026

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सुबह की पहली किरण ताजमहल पर पड़ने से पहले ही आगरा के लोग अपने घरों से निकलते हैं। लेकिन अब उनकी पहली चिंता ट्रैफिक नहीं, बल्कि सड़क पर खड़े या दौड़ते जानवर होते हैं। दयालबाग, कमला नगर, शाहगंज, ताजगंज, सिकंदरा, बल्केश्वर और ट्रांस यमुना कॉलोनियों तक एक जैसा मंजर दिखाई देता है।

कहीं आवारा कुत्तों के झुंड राहगीरों का पीछा करते हैं। कहीं बंदर छतों और बालकनियों पर नज़र गड़ाए बैठे रहते हैं। यमुना किनारा रोड पर भैंसों और गायों के झुंड सड़क को अपना चारागाह समझ लेते हैं। ऐसा लगता है मानो शहर की सड़कें अब इंसानों की नहीं रहीं।

ताजमहल के कारण दुनिया भर में पहचान रखने वाले इस शहर के लिए यह सिर्फ असुविधा नहीं, बल्कि एक गंभीर नागरिक संकट बन चुका है। अस्पतालों, वाहन चालकों, स्कूली बच्चों और सुबह टहलने वालों के लिए हर दिन एक नई परीक्षा बन गया है।

डराने वाले आंकड़े

सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि आगरा में 90 हजार से अधिक आवारा कुत्ते और लगभग 60 हजार पालतू कुत्ते हैं। हर दिन करीब 300 लोग कुत्तों के काटने का शिकार होते हैं। यह संख्या कई बड़े महानगरों से भी अधिक है।

दिल्ली जैसे विशाल शहर में छह महीने के दौरान जितने डॉग बाइट के मामले दर्ज हुए थे, आगरा में लगभग उतने मामले कुछ ही दिनों में सामने आ जाते हैं। यह तुलना बताती है कि ताज नगरी की समस्या कितनी गंभीर हो चुकी है।

गांधी नगर क्षेत्र के एक वरिष्ठ चिकित्सक बताते हैं कि उनके पास आने वाले अधिकांश पीड़ित 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चे होते हैं। कई बच्चे खेलते समय या कुत्तों को खाना खिलाते हुए घायल हो जाते हैं। निजी क्लीनिकों में ही रोज़ सौ से अधिक मरीज पहुंचते हैं। जिला अस्पताल और अन्य स्वास्थ्य केंद्रों पर अलग से भारी दबाव रहता है।

नगर निगम भी बेबस

नगर निगम के अधिकारी मानते हैं कि मौजूदा संसाधनों से इतनी बड़ी संख्या में कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण करना आसान नहीं है। अभियान चल रहे हैं, लेकिन उनकी रफ्तार समस्या के मुकाबले बहुत धीमी है।

इसी कारण अब पूरे शहर में बड़े स्तर पर नसबंदी और वैक्सीनेशन का काम किसी निजी एजेंसी को सौंपने की योजना बनाई जा रही है। लेकिन लोगों का सवाल है कि जब वर्षों से करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं, तब भी हालात क्यों नहीं बदले?

सिर्फ कुत्ते ही नहीं

मुसीबत केवल आवारा कुत्तों तक सीमित नहीं है। मंदिरों, बाजारों और ताजमहल के आसपास बंदरों का आतंक लगातार बढ़ रहा है। वे बच्चों के हाथ से टिफिन छीन लेते हैं, बुजुर्गों के चश्मे और मोबाइल उठा ले जाते हैं। कई पर्यटक भी उनका शिकार बन चुके हैं।

उधर यमुना किनारा रोड पर शाम के समय नदी से लौटते भैंसों और गायों के झुंड पूरी सड़क घेर लेते हैं। दोपहिया और चारपहिया वाहन किसी तरह रास्ता निकालते हैं। कई बार दुर्घटनाएं होते-होते बचती हैं।

रात का समय सबसे खतरनाक होता है। अंधेरे में काले रंग के मवेशी सड़क पर दिखाई नहीं देते। बाइक सवार अक्सर उनसे टकरा जाते हैं। कई हादसों में लोगों को गंभीर चोटें भी आई हैं।

बदल गई है शहर की दिनचर्या

जो पार्क कभी बुजुर्गों की हंसी और बच्चों की खिलखिलाहट से गूंजते थे, वहां अब डर का माहौल है। सुबह की सैर करने वाले लोग बताते हैं कि कुत्तों के झुंड उनका पीछा करते हैं। कई लोगों ने अपनी सैर का समय घटा दिया है।

माता-पिता अब छोटे बच्चों को अकेले बाहर खेलने भेजने से घबराते हैं। स्कूल जाते समय भी बच्चों के साथ किसी बड़े का होना ज़रूरी समझा जाने लगा है।

देशभर की चिंता, आगरा की चुनौती

देश के कई शहरों में आवारा जानवरों की समस्या बढ़ रही है। मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने भी साफ कहा कि नागरिकों को बिना भय के सार्वजनिक स्थानों पर चलने का संवैधानिक अधिकार है। अदालत ने भीड़भाड़ वाले इलाकों से आवारा कुत्तों को हटाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया और स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी तय की।

अब ठोस कार्रवाई की जरूरत

रिवर कनेक्ट अभियान से जुड़े कार्यकर्ताओं का कहना है कि आगरा केवल स्थानीय लोगों का शहर नहीं, बल्कि करोड़ों पर्यटकों की मंज़िल भी है। यदि सड़कों पर असुरक्षा का माहौल बना रहेगा तो शहर की छवि और पर्यटन, दोनों प्रभावित होंगे।

समाधान आधे-अधूरे उपायों से नहीं निकलेगा। बड़े पैमाने पर नसबंदी और टीकाकरण, छोड़े गए मवेशियों के पुनर्वास, बंदरों के वैज्ञानिक प्रबंधन और लापरवाह पशु मालिकों पर सख्त कार्रवाई की जरूरत है।

जब तक ऐसा नहीं होता, ताज नगरी के लोग हर सुबह घर से निकलते समय पहले सड़क पर नज़र डालेंगे और फिर अपने कदम आगे बढ़ाएंगे। किसी भी सभ्य शहर के लिए इससे बड़ी बदकिस्मती और क्या हो सकती है?


Tuesday, July 14, 2026


गांव के मोड़ से ग्लोबल दुनिया तक: अंग्रेज़ी बन रही नई ताक़त 

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

16 जुलाई 2026

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सुबह के आठ बजे हैं। मथुरा ज़िले की गोवर्धन तहसील के एक गांव के मोड़ पर रंग-बिरंगे स्कूल बैग टांगे, टाई और साफ-सुथरी यूनिफॉर्म पहने लड़के और लड़कियों का एक झुंड बस का इंतज़ार कर रहा है। कोई कह रहा है, hi, how are you? दूसरा मुस्कुराकर जवाब देता है, "I am fine, thank you." तीसरी बच्ची अपनी सहेली से पूछती है, "Where is your project ?" उनकी अंग्रेज़ी अभी बहुत साधारण है, मगर  सपने बड़े हैं।

पास खड़े बुज़ुर्ग हैरानी और फ़ख्र से उन्हें देखते हैं। यही बच्चे कुछ साल पहले गांव के हिंदी स्कूल में जाते थे। आज रोज़ कई किलोमीटर दूर एक अंग्रेज़ी माध्यम के पब्लिक स्कूल की बस पकड़ते हैं। यह सिर्फ़ स्कूल बदलने की कहानी नहीं, बदलते भारत की तस्वीर है।

केरल, कर्नाटक, तमिल नाडु के अनेकों शहरों में और ग्रामीण अंचलों में प्राइवेट, मिशनरी अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की भरमार है। ऊटी के रास्ते में मसिनीगुडी कस्बे में एक स्कूली हेड मास्टर ने बताया , " सरकारी स्कूलों में लोकल भाषा माध्यम है जहां अधिकांश गरीब बच्चे पढ़ते हैं, जिनके पास साधन हैं उनके बच्चे प्राइवेट में स्टडी करते हैं, अंग्रेजी सीखते हैं!" गांव गांव से प्राइवेट बसें बच्चों को स्कूलों तक ढोती हैं। दक्षिण भारत के ज्यादातर पेरेंट्स बच्चों को विदेश जाने के लिए पढ़ाते हैं, गल्फ कंट्रीज या अमेरिका!

लोग मानने लगे हैं कि भारत में अंग्रेज़ी अब किसी हुकूमत की छोड़ी हुई निशानी नहीं रही। यह रोज़गार, तरक्की और नए मौकों की ज़ुबान बन चुकी है। करोड़ों भारतीय इसे पढ़ते, समझते और बोलते हैं। अनुमान है कि करीब 26 करोड़ से अधिक लोगों को अंग्रेज़ी की बुनियादी समझ है। हर साल लाखों नए बच्चे इस सफ़र में शामिल हो रहे हैं।

एक दौर था जब अंग्रेज़ी सिर्फ़ बड़े शहरों और अमीर घरों तक सीमित मानी जाती थी। अब यह गांवों की गलियों तक पहुंच चुकी है। किसान, दुकानदार, मज़दूर और छोटे कारोबारी भी चाहते हैं कि उनके बच्चे अंग्रेज़ी सीखें। वे जानते हैं कि बदलती दुनिया में यह हुनर नई राहें खोल सकता है।

देश में अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूलों की संख्या तेज़ी से बढ़ी है। मिशनरी और कॉन्वेंट स्कूलों ने दशकों पहले इसकी बुनियाद रखी। बाद में निजी स्कूल, सीबीएसई और आईसीएसई संस्थान आगे आए। अब कई सरकारी स्कूल भी अंग्रेज़ी माध्यम की पढ़ाई शुरू कर चुके हैं। करोड़ों बच्चे इन स्कूलों में शिक्षा पा रहे हैं।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं,"इस बदलाव के पीछे कोई सियासी नारा नहीं, बल्कि ज़मीनी हक़ीक़त है। भारत जैसे बहुभाषी देश में अंग्रेज़ी अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले लोगों के बीच एक साझा पुल बन गई है। कश्मीर से केरल और गुजरात से असम तक, अलग-अलग प्रदेशों के लोग इसी भाषा के सहारे आसानी से संवाद कर लेते हैं।"

उच्च शिक्षा में भी अंग्रेज़ी की अहमियत लगातार बढ़ी है। इंजीनियरिंग, चिकित्सा, विज्ञान, क़ानून, प्रबंधन और शोध की अधिकांश किताबें और अध्ययन सामग्री अंग्रेज़ी में उपलब्ध हैं। दुनिया के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से जुड़ने में भी यही भाषा सबसे बड़ा सहारा बनती है।

भारत की आईटी क्रांति में अंग्रेज़ी की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे, नोएडा और गुरुग्राम जैसे शहरों ने दुनिया भर की कंपनियों को आकर्षित किया। भारतीय युवाओं ने अपनी मेहनत के साथ अंग्रेज़ी की क्षमता के दम पर वैश्विक बाज़ार में पहचान बनाई। कॉल सेंटर, बीपीओ, सॉफ्टवेयर, डिजिटल सेवाएं और ऑनलाइन कारोबार लाखों लोगों को रोज़गार दे रहे हैं।

आज डिजिटल दुनिया में भी अंग्रेज़ी एक अहम चाबी है। इंटरनेट, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस, ऑनलाइन कोर्स, रिसर्च और नई तकनीकों का बड़ा हिस्सा अंग्रेज़ी में उपलब्ध है। जिसे अंग्रेज़ी आती है, उसके सामने सीखने के रास्ते कहीं ज़्यादा खुल जाते हैं।

लेकिन इसका मतलब यह हरगिज़ नहीं कि हिंदी या दूसरी भारतीय भाषाएं कमज़ोर हो जाएं। अपनी मातृभाषा इंसान की पहचान, संस्कृति और जड़ों से जुड़ी होती है। अंग्रेज़ी उस पहचान की जगह नहीं ले सकती। असली समझदारी दोनों को साथ लेकर चलने में है।

दुनिया के कई विकसित देशों के बच्चे अपनी मातृभाषा के साथ अंग्रेज़ी भी सीखते हैं। भारत में भी यही रास्ता सबसे बेहतर साबित हो सकता है। घर में अपनी भाषा, समाज में अपनी संस्कृति और दुनिया से जुड़ने के लिए अंग्रेज़ी; यही संतुलन भविष्य की ज़रूरत है।

सरकारी स्कूलों में बेहतर अंग्रेज़ी शिक्षा, प्रशिक्षित शिक्षक, आधुनिक तकनीक और अच्छी पाठ्य सामग्री उपलब्ध कराना अब समय की मांग है। अंग्रेज़ी किसी वर्ग विशेष की जागीर नहीं रहनी चाहिए। गांव का बच्चा भी वही अवसर पाए जो महानगर के छात्र को मिलता है।

भारत को अंग्रेज़ी विरासत में मिली थी, लेकिन उसने इसे अपनी मेहनत और ज़रूरत के मुताबिक़ नया रूप दिया। आज यह विदेशी भाषा कम और भारतीय क्षमता का हिस्सा ज़्यादा बन चुकी है।

शायद इसी लिए गोवर्धन के उस गांव के चौराहे पर खड़े वे छोटे-छोटे बच्चे, जो हिचकिचाते हुए कहते हैं, "Good morning, teacher," सिर्फ़ अंग्रेज़ी नहीं बोल रहे होते। वे अपने भविष्य के दरवाज़े पर दस्तक दे रहे होते हैं। उनके होंठों पर कुछ साधारण अंग्रेज़ी के शब्द हैं, लेकिन उनकी आंखों में पूरे हिंदुस्तान के बदलते कल का ख़्वाब चमक रहा होता है।

Monday, July 13, 2026

 


प्रिय आगरा, हमारे फुटपाथ लौटा दो!

सड़कें सिर्फ़ गाड़ियों की नहीं, इंसानों की भी हैं

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बृज खंडेलवाल द्वारा

15 जुलाई 2026

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नेताओं और अफ़सरों से एक छोटी-सी गुज़ारिश है। एक दिन बिना लालबत्ती, बिना सरकारी गाड़ी और बिना सुरक्षा घेरे के आगरा की सड़कों पर पैदल चलकर दिखाइए। तब मालूम होगा कि इस शहर में पैदल चलना अब सफ़र नहीं, रोज़ का इम्तिहान बन चुका है।

आगरा का कोई एक इलाक़ा बता दीजिए, जहाँ आदमी निडर होकर फुटपाथ पर चल सके। योगी सरकार तेज़ रफ़्तार एक्सप्रेसवे बनाने में व्यस्त है, लेकिन पैदल चलने वालों की रफ़्तार और सुरक्षा जैसे किसी की प्राथमिकता ही नहीं रही।

ताजमहल दुनिया की शान है, मगर शहर की असली पहचान उसकी सड़कें होती हैं। और आगरा की सड़कें आज एक कड़वी हक़ीक़त बयान करती हैं: यह शहर पैदल चलने वालों का नहीं रहा।

फुटपाथ, जो आम लोगों के लिए बने थे, अब दुकानों के शो-रूम, ठेलों, पार्किंग और अतिक्रमण की जागीर बन चुके हैं। कहीं सामान फैला है, कहीं शेड खड़े हैं, कहीं मोटरसाइकिलें और कारें कब्ज़ा किए बैठी हैं। नतीजा साफ़ है। पैदल आदमी सड़क पर उतरता है और मौत के साथ चलने को मजबूर हो जाता है।

बेलनगंज, हॉस्पिटल रोड, लोहामंडी, राजा मंडी, किनारी बाज़ार, सदर और शहर के दर्जनों इलाक़ों में यही मंजर दिखाई देता है। कहीं फुटपाथ टूटे हैं, कहीं ग़ायब हैं और जहाँ बचे भी हैं, वहाँ अतिक्रमण ने उनका दम घोंट दिया है।

यह सिर्फ़ असुविधा नहीं, सार्वजनिक सुरक्षा का गंभीर संकट है। "सेफ़ स्ट्रीट्स फ़ॉर आगरा" रिपोर्ट बताती है कि शहर में सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली 88 प्रतिशत मौतें पैदल यात्रियों, साइकिल सवारों और दोपहिया वाहन चालकों जैसी सबसे कमज़ोर श्रेणी के लोगों की होती हैं। यानी जो सबसे कम सुरक्षित हैं, वही सबसे ज़्यादा जान गंवा रहे हैं।

देशभर में हर साल तीस हज़ार से अधिक पैदल यात्री सड़क हादसों में मारे जाते हैं। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार, कुल सड़क दुर्घटना मौतों में लगभग पाँचवाँ हिस्सा पैदल यात्रियों का है। आगरा में टूटे फुटपाथ, खुले मैनहोल, उखड़ी टाइलें और बरसात में पानी से छिपे गड्ढे इस ख़तरे को कई गुना बढ़ा देते हैं।

सबसे ज़्यादा तकलीफ़ बुज़ुर्गों, महिलाओं, बच्चों और दिव्यांग नागरिकों को होती है। रोज़ कोई न कोई गिरता है, घायल होता है। छोटी चोटें अब आम बात हो गई हैं। बड़े हादसे किसी भी दिन किसी के साथ हो सकते हैं।

विडम्बना देखिए। हर साल लाखों पर्यटक आगरा आते हैं। वे इस शहर को पैदल महसूस करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें भी ट्रैफ़िक के बीच जान हथेली पर रखकर चलना पड़ता है। विश्व धरोहर का शहर अगर पैदल यात्रियों के लिए असुरक्षित है, तो यह हमारी शहरी सोच की नाकामी है।

सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में साफ़ कहा है कि स्वच्छ, सुरक्षित और बाधारहित फुटपाथ पर चलना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों का मौलिक अधिकार है। सड़कों पर पहला हक़ पैदल चलने वालों का है, वाहनों का नहीं। मगर आगरा में यह अधिकार हर दिन कुचला जा रहा है।

नगर निगम को अब सिर्फ़ रंग-रोगन और सौंदर्यीकरण से बाहर निकलना होगा। फुटपाथों की मरम्मत, खुले मैनहोल बंद करना, जल निकासी दुरुस्त करना और अतिक्रमण हटाना उसकी पहली ज़िम्मेदारी होनी चाहिए। दुकानदार सार्वजनिक ज़मीन पर कब्ज़ा नहीं कर सकते। रेहड़ी-पटरी वालों के लिए व्यवस्थित वेंडिंग ज़ोन बनाए जाएँ, ताकि उनका रोज़गार भी सुरक्षित रहे और पैदल यात्रियों का रास्ता भी।

अब वक्त आ गया है कि "प्रिय आगरा, फुटपाथ वापस दो" अभियान शुरू किया जाए। नागरिक मोबाइल से टूटे फुटपाथ, खुले मैनहोल और अतिक्रमण की तस्वीरें भेजें। नगर निगम तय समय-सीमा में कार्रवाई करे और हर सप्ताह सार्वजनिक रिपोर्ट जारी करे। स्थानीय अख़बार भी नागरिक शिकायतों के लिए स्थायी कॉलम शुरू करें। जवाबदेही होगी, तभी बदलाव आएगा।

बेंगलुरु समेत कई शहरों ने सख़्ती से फुटपाथ अतिक्रमण हटाने की शुरुआत कर दी है। आगरा कब जागेगा? या फिर हमारे हुक्मरान रिप वैन विंकल की तरह सोते ही रहेंगे?

किसी शहर की पहचान उसकी चौड़ी सड़कों से नहीं होती। उसकी पहचान इस बात से होती है कि वहाँ एक बच्चा, एक बुज़ुर्ग, एक महिला, एक दिव्यांग और एक पर्यटक कितनी बेफ़िक्री से पैदल चल सकता है।

आगरा ने अपने स्मारकों पर करोड़ों रुपये खर्च किए हैं। अब अपने नागरिकों पर भी कुछ निवेश कीजिए।

हमें फुटपाथ वापस चाहिए।

क्योंकि शहर तभी सभ्य कहलाता है, जब सड़क पर सबसे कमज़ोर इंसान भी बिना डर के चल सके। ताजमहल की ख़ूबसूरती तभी मुकम्मल होगी, जब उसके शहर की सड़कें भी इंसानों के लिए सुरक्षित हों

Sunday, July 12, 2026

 क्या वाकई औरतें मर्दों पर भारी पड़ रही हैं? 

एक सनसनीखेज़ हत्या से सदियों की असमानता नहीं मिट जाती

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कुछ वायरल अपराधों से यह मत मान लीजिए कि भारत में पितृसत्ता खत्म हो गई है

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

14 जुलाई 2026

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मेरठ का नीला ड्रम, आगरा में फर्श के नीचे दफन पति, मुंबई-वसई में प्रेमी की हत्या और ऐसी ही कुछ दूसरी सनसनीखेज़ वारदातों ने पूरे देश को झकझोर दिया। टीवी स्टूडियो गरजे, सोशल मीडिया पर मीम्स की बाढ़ आ गई और एक नया निष्कर्ष गढ़ लिया गया: "क्या अब महिलाएँ पुरुषों पर भारी पड़ने लगी हैं?" 

लेकिन क्या कुछ भयावह अपराध सचमुच भारत की सामाजिक हकीकत बदल देते हैं? क्या कुछ वायरल घटनाएँ सदियों पुरानी पितृसत्ता, असमानता और महिलाओं के खिलाफ हिंसा के पहाड़ को मिटा सकती हैं? जवाब भावनाओं में नहीं, आँकड़ों में छिपा है।

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आज के दौर में सच से कहीं तेज़ दौड़ती है सनसनी।

किसी पत्नी पर पति की हत्या का आरोप लगता है। कहीं प्रेमी के साथ मिलकर हत्या की साज़िश रची जाती है। टीवी चैनलों पर दिन-रात वही दृश्य चलते हैं। सोशल मीडिया पर मीम्स की बाढ़ आ जाती है। व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी फ़ौरन फैसला सुना देती है; "अब तो औरतें मर्दों पर भारी पड़ने लगी हैं।" कुछ लोग तो यह तक कहने लगते हैं कि अब पुरुष ही सबसे बड़े पीड़ित हैं।

ऐसी बातें सुनने में आकर्षक लगती हैं, लेकिन आंकड़ों की कसौटी पर टिकती नहीं हैं।

अपराध का कोई लिंग नहीं होता। हत्या करने वाला चाहे पुरुष हो या महिला, कानून की नज़र में दोनों बराबर हैं। दोषी को सज़ा मिलनी ही चाहिए। लेकिन कुछ सनसनीखेज़ घटनाओं के आधार पर पूरे समाज की तस्वीर बदल देना न्याय भी नहीं है और बुद्धिमानी भी नहीं।

कुछ अपराध सदियों की सामाजिक हकीकत को नहीं बदल सकते।

यह सच है कि भारत में महिलाओं की स्थिति पहले से बेहतर हुई है। आज पहले की तुलना में कहीं अधिक लड़कियाँ स्कूल और कॉलेज पहुँच रही हैं। उच्च शिक्षा में महिलाओं का सकल नामांकन अनुपात अब पुरुषों से अधिक है। महिलाएँ लड़ाकू विमान उड़ा रही हैं, अंतरिक्ष अभियानों का नेतृत्व कर रही हैं, उद्योग चला रही हैं, न्यायपालिका और प्रशासन में महत्वपूर्ण पदों पर हैं। पंचायतों में लाखों महिलाएँ जनप्रतिनिधि हैं। मातृ मृत्यु दर घटी है, संस्थागत प्रसव बढ़े हैं और करोड़ों महिलाओं के बैंक खाते खुले हैं।

यह बदलाव स्वागत योग्य है।

लेकिन कुछ सफल महिलाओं की उपलब्धियों को पूरे देश की महिलाओं की वास्तविक स्थिति मान लेना सबसे बड़ी भूल होगी।

असल सवाल यह है कि गाँवों, कस्बों और शहरों की आम महिला कैसी ज़िंदगी जी रही है?

यहीं तस्वीर बदल जाती है। सामाजिक कार्यकर्ता पद्मिनी अय्यर कहती हैं, "भारत में महिलाओं की श्रम भागीदारी दर बढ़ी जरूर है, लेकिन आज भी पुरुषों की तुलना में आधी से भी कम है। जो महिलाएँ काम करती भी हैं, उनमें अधिकांश असंगठित क्षेत्र में हैं, जहाँ न नौकरी की सुरक्षा है, न उचित वेतन और न सामाजिक सुरक्षा। इससे भी बड़ा सच है वह काम जिसका कोई वेतन नहीं मिलता।समय-उपयोग सर्वे बताते हैं कि भारतीय महिलाएँ पुरुषों की तुलना में रोज़ तीन घंटे से अधिक अतिरिक्त समय रसोई, सफाई, बच्चों की परवरिश और बुज़ुर्गों की देखभाल में लगाती हैं। यह श्रम देश की अर्थव्यवस्था को सहारा देता है, लेकिन न इसका कोई वेतन है और न सम्मान।"

संपत्ति का बँटवारा भी बराबरी की कहानी नहीं कहता।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार केवल लगभग 13 प्रतिशत महिलाओं के नाम अकेले मकान है और मात्र 8 से 9 प्रतिशत महिलाओं के पास अपनी भूमि है। आर्थिक निर्भरता आज भी सामाजिक निर्भरता को जन्म देती है।

सोशल एक्टिविस्ट विद्या चौधरी के मुताबिक, "सबसे कठोर सच महिलाओं के खिलाफ हिंसा का है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार वर्ष 2024 में महिलाओं के विरुद्ध 4.41 लाख से अधिक अपराध दर्ज हुए। यानी हर दिन लगभग 1,210 मामले और औसतन हर 71 सेकंड में एक महिला के खिलाफ अपराध। इनमें सबसे अधिक मामले पति और रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता के हैं। इसके बाद दुष्कर्म, अपहरण, यौन उत्पीड़न और दहेज से जुड़े अपराध आते हैं।"

ये केवल दर्ज मामले हैं।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण बताता है कि भारत में लगभग हर तीन विवाहित महिलाओं में से एक ने अपने जीवन में पति या साथी द्वारा शारीरिक, मानसिक या यौन हिंसा झेली है। विशेषज्ञ मानते हैं कि असंख्य महिलाएँ सामाजिक बदनामी, आर्थिक निर्भरता और पारिवारिक दबाव के कारण शिकायत तक दर्ज नहीं करा पातीं।

यही भारत की असली तस्वीर है।

इसके मुकाबले हाल के वर्षों में पतियों की हत्या के कुछ चर्चित मामलों ने पूरे देश का ध्यान खींचा। ये घटनाएँ भयावह हैं और दोषियों को कठोर सज़ा मिलनी चाहिए। लेकिन ये अपवाद हैं, प्रवृत्ति नहीं।

सोशल मीडिया अपवाद को सामान्य बना देता है।

एक सनसनीखेज़ हत्या कई दिनों तक सुर्खियों में रहती है, जबकि घरेलू हिंसा झेल रही सैकड़ों महिलाएँ किसी समाचार की पात्र भी नहीं बनतीं। लगातार दिखाई जाने वाली असाधारण घटनाएँ धीरे-धीरे लोगों को यह भ्रम दे देती हैं कि अब सत्ता का संतुलन बदल गया है।

लेकिन आंकड़े इस भ्रम की पुष्टि नहीं करते।

हाँ, महिलाओं की सुरक्षा के लिए बने कुछ कानूनों के दुरुपयोग के मामले सामने आए हैं। लेकिन कुछ झूठे मामलों के कारण पूरे कानून को गलत नहीं ठहराया जा सकता।

एक और दुखद सच्चाई विधवाओं की है। भारत में करोड़ों विधवाएँ आज भी गरीबी, उपेक्षा, संपत्ति से वंचित किए जाने और सामाजिक तिरस्कार का जीवन जी रही हैं। वृंदावन जैसे शहर आज भी हजारों बेसहारा विधवाओं की पीड़ा के मौन गवाह हैं। उनका दर्द कभी वायरल नहीं होता, क्योंकि ख़ामोश पीड़ा टीआरपी नहीं देती।

एक सनसनीखेज़ हत्या एक सप्ताह तक सुर्खियाँ बना सकती है। लेकिन वह भारत की करोड़ों महिलाओं के हिस्से में आज भी दर्ज असमानता, हिंसा और भेदभाव की सदी पुरानी कहानी को नहीं बदल सकती।

Thursday, July 9, 2026

 ज़िंदाबाद असहमति,

सवाल पूछना जरूरी है!

आलोचना लोकतंत्र का पोषण है

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बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा कि सरकार की आलोचना और शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र का मूल अधिकार है, अपराध नहीं। अदालत ने केवल विरोध के आधार पर एफआईआर और निर्वासन को असंवैधानिक बताया। फैसले ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों की रक्षा पर जोर दिया, हालांकि ऐसे संरक्षण का लाभ अभी सभी असहमत नागरिकों को समान रूप से नहीं मिल रहा।

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

11 जुलाई, 2026

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ज़रा एक पल के लिए ऐसे भारत की कल्पना कीजिए, जहाँ हर नागरिक सरकार की हर बात पर "जी हुज़ूर" कहे। संसद की बहसें कुछ मिनटों में खत्म हो जाएँ। टीवी चैनलों पर बहस की जगह केवल सरकारी प्रेस नोट पढ़े जाएँ। अख़बारों के संपादकों का काम सिर्फ़ अल्पविराम और पूर्णविराम ठीक करना रह जाए। सोशल मीडिया पर हर तरफ़ एक ही नारा गूँजे; "वाह सरकार, कमाल कर दिया!"

सब कुछ शांत दिखाई देगा। कोई विवाद नहीं, कोई बहस नहीं, कोई सवाल नहीं। लेकिन उसी ख़ामोशी में लोकतंत्र धीरे-धीरे पिछले दरवाज़े से बाहर निकल जाएगा।

ख़ुशकिस्मती से भारत कभी अंधी आज्ञाकारिता पर नहीं बना। भारत बहस, तर्क और मतभेद की ज़मीन पर खड़ा हुआ है।

यूरोप में ज्ञानोदय की हवा चलने से बहुत पहले भारत में जंगलों, आश्रमों, मंदिरों, बौद्ध विहारों और गाँव की चौपालों में विचारों की खुली बहस होती थी। यहाँ तलवारें कम, विचार ज़्यादा टकराते थे।

गौतम बुद्ध ने कर्मकांड, ऊँच-नीच और अंधविश्वास पर सवाल उठाए। महावीर ने अहिंसा और समानता का रास्ता दिखाया। चार्वाक ने वेदों की सत्ता तक को चुनौती दे दी। उन्होंने कहा कि बिना प्रमाण किसी बात को मत मानो। उनके अपने ग्रंथ भले न बचे हों, लेकिन उनके विरोधियों ने भी उनके विचारों को दर्ज किया। यही किसी आत्मविश्वासी सभ्यता की सबसे बड़ी पहचान है कि वह अपने विरोधी की आवाज़ भी मिटाती नहीं।

बाद में कबीर ने मंदिर और मस्जिद दोनों में फैले पाखंड पर बराबर चोट की। रैदास ने जाति के घमंड को ललकारा। गुरु नानक ने इंसानों की बराबरी का संदेश दिया। मीराबाई ने राजसत्ता के आगे अपनी अंतरात्मा नहीं बेची। तुकाराम ने सामाजिक अन्याय के खिलाफ़ आवाज़ उठाई।

आधुनिक भारत में राजा राममोहन राय ने सती प्रथा का विरोध किया। ज्योतिराव और सावित्रीबाई फुले ने लड़कियों और वंचित समाज की शिक्षा का बिगुल बजाया। पेरियार ने अंधविश्वास और जातीय वर्चस्व पर करारा हमला किया। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने सदियों पुरानी भेदभाव की दीवारों को चुनौती दी और हमें ऐसा संविधान दिया जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की रक्षा करता है।

इनमें से कोई भी अपने समय की सत्ता का लाड़ला नहीं था। कई लोगों का मज़ाक उड़ाया गया। उन्हें समाज से अलग किया गया। जेल भेजा गया। देशद्रोही, विधर्मी या ख़तरनाक तक कहा गया। लेकिन इतिहास ने आख़िरकार सम्मान उन्हीं लोगों को दिया जिन्होंने सवाल पूछे, न कि उन्हें जिन्होंने सवाल दबाए।

भारत की आज़ादी की लड़ाई भी असहमति की मिसाल है। भगत सिंह ने कहा कि क्रांति विचारों से आती है। सुभाष चंद्र बोस ने अंग्रेज़ी हुकूमत को सीधी चुनौती दी। टीपू सुल्तान और छत्रपति शिवाजी महाराज ने विदेशी और दमनकारी सत्ता के सामने झुकने से इनकार किया। इन सबका संदेश एक था; अन्याय के सामने ख़ामोश रहना सबसे बड़ी ग़लती है।

आज लोकतंत्र उसी विरासत को आगे बढ़ाता है। सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन संविधान स्थायी है। इसी कारण संविधान का अनुच्छेद 19 हर नागरिक को अभिव्यक्ति की आज़ादी देता है। लोकतंत्र में नागरिक प्रजा नहीं होता और सरकार कोई ऐसी संस्था नहीं, जिससे सवाल न पूछा जा सके।

सर्वोच्च न्यायालय भी बार-बार यही बात दोहराता रहा है। केदारनाथ सिंह मामले में अदालत ने साफ़ कहा कि सरकार की आलोचना तब तक देशद्रोह नहीं है, जब तक वह हिंसा भड़काने की कोशिश न करे। श्रेय सिंघल मामले में अदालत ने इंटरनेट पर अभिव्यक्ति को दबाने वाले कानून को रद्द करते हुए कहा कि केवल चर्चा करना या किसी विचार का समर्थन करना अपराध नहीं हो सकता। हाल के वर्षों में भी सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि असहमति लोकतंत्र का सेफ़्टी वाल्व है। यदि यह वाल्व बंद कर दिया जाए तो एक दिन पूरा तंत्र फट सकता है।

यह बात हर सरकारी दफ़्तर की दीवार पर लिखी जानी चाहिए।

फिर भी हर कुछ साल बाद कुछ लोग यह खोज निकालते हैं कि सरकार से सवाल पूछना देशविरोध है। मानो सवाल पूछने से देश कमज़ोर हो जाता है और बिना सोचे-समझे ताली बजाने से देश मज़बूत हो जाता है।

अगर यही तर्क सही है, तो सबसे अच्छा डॉक्टर वह होगा जो कभी बीमारी न बताए। सबसे अच्छा पत्रकार वह होगा जो कभी बुरी ख़बर न छापे। और सबसे अच्छा न्यायाधीश वह होगा जो हर मुक़दमे में सरकार के पक्ष में फ़ैसला सुना दे।

सच्ची देशभक्ति ताली बजाने में नहीं, बल्कि चौकन्ना रहने में है। जो नागरिक ग़लत नीतियों पर सवाल उठाते हैं, वे अक्सर लोकतंत्र की रक्षा कर रहे होते हैं। लोकतंत्र आलोचना से बेहतर होता है, जबकि तानाशाही सिर्फ़ तारीफ़ पर पलती है।

भारत में व्यंग्य और हास्य भी हमेशा सत्ता को आईना दिखाने का ज़रिया रहे हैं। पुराने राजाओं के दरबार में विदूषक वह सच कह देता था, जिसे मंत्री भी कहने से डरते थे। जब विदूषक ख़ामोश हो जाए, तब राजा को हर ताली सच्ची लगने लगती है।

भारत की सबसे बड़ी ताक़त एक जैसी सोच नहीं, बल्कि विविधता है। यहाँ आस्तिक भी रहे, नास्तिक भी। संत भी हुए, संशयवादी भी। कवि भी हुए, क्रांतिकारी भी। तीन हज़ार साल से हम बहस करते आए हैं, फिर भी एक सभ्यता बने हुए हैं। यही हमारी असली पहचान है।

शांतिपूर्ण असहमति को दबाने से देश मज़बूत नहीं होता। केवल इतना होता है कि ग़लतियाँ समय पर दिखाई नहीं देतीं। आत्मविश्वास से भरी सरकार सवालों का जवाब तथ्यों से देती है। असुरक्षित सरकार कानून का डर दिखाती है।

इतिहास का फ़ैसला हमेशा दिलचस्प रहा है। हर पीढ़ी पहले अपने असहमत लोगों को गालियाँ देती है, फिर कुछ दशक बाद उन्हीं की मूर्तियाँ बनवाती है।

शायद समझदारी इसी में है कि मूर्ति बनाने से पहले उनकी बात सुन ली जाए।

असहमति ज़िंदाबाद।

क्योंकि असहमति लोकतंत्र की दुश्मन नहीं, उसकी सबसे पुरानी, सबसे बहादुर और सबसे वफ़ादार साथी है।

याद रहे:  " कमजोर लोकतंत्र शक्तिशाली तानाशाही से बेहतर होता है।"

Wednesday, July 8, 2026

 


करोड़ों पौधे, फिर भी सूनी धरती! आखिर हर साल हरियाली जाती कहाँ है?

12 जुलाई को आगरा में 61.88 लाख पौधे लगाने का लक्ष्य,

पर्यावरणविदों ने मांगा स्वतंत्र सामाजिक और वैज्ञानिक ऑडिट

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ब्रज खंडेलवाल द्वारा

10 जुलाई 2026

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बारिश की पहली फुहार पड़ते ही सरकारी दफ्तरों में हलचल बढ़ जाती है। पौधों से भरे ट्रक निकल पड़ते हैं। अफसर हाथ में फावड़ा लेकर कैमरों के सामने मुस्कुराते हैं। नेता पौधे लगाते हैं। रिकॉर्ड बनते हैं। प्रेस विज्ञप्तियां जारी होती हैं। हर साल करोड़ों पौधे लगाने के नए दावे किए जाते हैं।

लेकिन कुछ महीने बाद वही धरती फिर सूनी दिखाई देती है। धूप पहले से ज्यादा चुभती है। सड़कों पर छांव कम होती जाती है। तब एक सवाल हर बार हवा में तैरता है, अगर हर साल करोड़ों पौधे लगाए जा रहे हैं, तो हरियाली आखिर गायब कहां हो रही है? क्या पेड़ धरती पर उग रहे हैं या सिर्फ सरकारी फाइलों में?

उत्तर प्रदेश सरकार ने 12 जुलाई को महावृक्षारोपण अभियान के तहत 35 करोड़ से अधिक पौधे लगाने का लक्ष्य रखा है। लगभग 30 सरकारी विभाग इसमें भाग लेंगे। उपमुख्यमंत्री ने प्रदेश के सभी जिलों में 150 हाईटेक नर्सरियां स्थापित करने की घोषणा की है, जिन पर करीब 150 करोड़ रुपये खर्च होंगे। सरकार का दावा है कि इस अभियान से नया गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनेगा।

आगरा भी इस मुहिम का बड़ा हिस्सा है। जिलाधिकारी मनीष बंसल ने सभी विभागों को इसे जन आंदोलन बनाने के निर्देश दिए हैं। 12 जुलाई को सुबह सात बजे से शाम छह बजे तक पूरे जिले में वृक्षारोपण होगा। स्कूलों, कॉलेजों, ग्राम पंचायतों और कॉलोनियों में "एक स्कूल-एक गांव" थीम पर पौधे लगाए जाएंगे। स्वयंसेवी संस्थाएं, एनएसएस, रोटरी क्लब, लायंस क्लब, महिला समूह और हजारों विद्यार्थी भी इसमें शामिल होंगे।

इस वर्ष आगरा को 61 लाख 88 हजार पौधे लगाने का लक्ष्य मिला है। इनमें वन विभाग 19.68 लाख और अन्य विभाग 42.20 लाख पौधे लगाएंगे। इससे पहले 5 जून, विश्व पर्यावरण दिवस पर भी लगभग 7.94 लाख पौधे लगाने का दावा किया गया था।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक आगरा में 2018 में 20 लाख, 2019 में 28 लाख, 2020 में 38 लाख और 2021 में 45 लाख पौधे लगाए गए। वन विभाग का दावा है कि इनमें लगभग 70 प्रतिशत पौधे जीवित हैं।

यहीं से सवाल शुरू होता है।

अगर इतने पौधे सचमुच जीवित हैं, तो आगरा पहले से ज्यादा हरा-भरा क्यों नहीं दिखता? शहर का तापमान लगातार क्यों बढ़ रहा है? सड़कों के किनारे छायादार पेड़ क्यों कम होते जा रहे हैं? हर मानसून के बाद नया अभियान शुरू करने की जरूरत आखिर क्यों पड़ती है?

रिवर कनेक्ट कैंपेन से जुड़े पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि पेड़ जमीन पर कम और सरकारी कागजों में ज्यादा दिखाई देते हैं। उनका कहना है कि वृक्षारोपण की सफलता पौधे लगाने से नहीं, बल्कि तीन-चार साल बाद उनके जीवित रहने से मापी जानी चाहिए।

कुछ वर्ष पूर्व यमुना किनारे हुई घटना आज भी लोगों को याद है। तत्कालीन महापौर नवीन जैन ने नदी की तलहटी  में लगभग 12 हजार पौधे लगवाए थे। अगस्त में यमुना का जलस्तर बढ़ा और सभी पौधे बह गए। करोड़ों रुपये की मेहनत कुछ दिनों में पानी में समा गई। इस मामले की जांच आज तक पूरी नहीं हो सकी।

रिवर कनेक्ट कैंपेन की पद्मिनी अय्यर कहती हैं कि पौधे लगाना आसान है, लेकिन उन्हें बचाना मुश्किल। तीन वर्षों तक नियमित सिंचाई, सुरक्षा, खाद और निगरानी के बिना अधिकांश पौधे शुरुआती दौर में ही नष्ट हो जाते हैं। पौधे लगाने के बाद उनकी देखभाल अक्सर भगवान भरोसे छोड़ दी जाती है।

वरिष्ठ पर्यावरणविद् डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य कहते हैं कि ताज ट्रेपेजियम जोन में विकास के नाम पर हरियाली लगातार घटती गई है। यमुना एक्सप्रेसवे, आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे, रिंग रोड, फ्लाईओवर, राष्ट्रीय राजमार्गों का चौड़ीकरण और नई कॉलोनियों ने हजारों पेड़ों की बलि ले ली। इसका असर केवल पर्यावरण पर नहीं, बल्कि ताजमहल की सुरक्षा पर भी पड़ रहा है। राजस्थान की ओर से आने वाली धूल भरी हवाओं को रोकने वाली प्राकृतिक हरित पट्टी कमजोर होती जा रही है।

विडंबना यह है कि ताज ट्रेपेजियम जोन का गठन ही ताजमहल और पर्यावरण की रक्षा के लिए किया गया था। 1996 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद टीटीजेड में प्रदूषण रोकने, उद्योगों को स्थानांतरित करने और बड़े पैमाने पर ग्रीन बेल्ट विकसित करने की योजना बनी। राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (NEERI) ने भी हरित क्षेत्र बढ़ाने की सिफारिश की थी। उस समय उम्मीद जगी थी कि आगरा फिर से हरियाली की चादर ओढ़ेगा।

लेकिन तीन दशक बाद तस्वीर निराशाजनक है। टीटीजेड में वन और हरित आवरण घटकर लगभग छह प्रतिशत या उससे भी कम रह गया है, जबकि राष्ट्रीय लक्ष्य 33 प्रतिशत है। 2021 की रिपोर्ट के अनुसार 2017 से 2019 के बीच वन क्षेत्र सिकुड़कर केवल 657.71 वर्ग किलोमीटर रह गया। कई तालाब और जलाशय सूख गए या प्रदूषण की चपेट में आ गए।

2015 में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को पेड़ लगाने के बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावों पर फटकार भी लगाई थी। दूसरी ओर अवैध पेड़ कटाई लगातार जारी रही। कई मामलों में अदालतों ने प्रति पेड़ 25 हजार रुपये तक का जुर्माना लगाया। इसके बावजूद विकास परियोजनाओं ने हरियाली को लगातार निगल लिया। इसी वर्ष राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने भी टीटीजेड में पर्यावरणीय उल्लंघनों पर नोटिस जारी किया। हवा की गुणवत्ता में अपेक्षित सुधार नहीं आया। नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और सूक्ष्म धूल कणों का स्तर बढ़ता गया। कई पर्यावरण विशेषज्ञ अब टीटीजेड प्राधिकरण की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठा रहे हैं।

वृंदावन के पर्यावरण कार्यकर्ता जगन्नाथ पोद्दार कहते हैं कि कभी पूरे ब्रज में बारह बड़े वन हुआ करते थे। आज उनकी पहचान केवल धार्मिक ग्रंथों और स्थानों के नाम तक सीमित रह गई है। जंगलों की जगह अब सीमेंट और कंक्रीट का जंगल खड़ा हो गया है।

पर्यावरण प्रेमी एक और अहम सवाल उठाते हैं। जब हर साल एक्सप्रेसवे, नई सड़कें, हवाई अड्डे, टाउनशिप, मॉल और औद्योगिक परियोजनाएं हजारों एकड़ जमीन घेर रही हैं, तब हर साल करोड़ों नए पौधे लगाने के लिए इतनी खाली जमीन आखिर आती कहां से है?

एक और मुश्किल बंदरों की है। शहर और गांवों में लगाए गए हजारों पौधे बंदर उखाड़ देते हैं। कई जगह पशु भी पौधों को नुकसान पहुंचाते हैं। पौधों के चारों ओर सुरक्षा जाली, नियमित सिंचाई और निगरानी के बिना उनकी जिंदगी ज्यादा लंबी नहीं होती।

ब्रज मंडल के पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने अब तक हुए सभी वृक्षारोपण अभियानों का स्वतंत्र सामाजिक और वैज्ञानिक ऑडिट कराने की मांग की है। उनका कहना है कि केवल पौधे लगाने की संख्या गिनना काफी नहीं है। हर पौधे को जियो-टैग किया जाए, उसकी तीन साल तक निगरानी हो और जीवित पौधों की सार्वजनिक रिपोर्ट जारी की जाए। तभी जनता को असली तस्वीर मालूम होगी।

पेड़ लगाना आसान है। पेड़ बनाना मुश्किल। एक पौधे को विशाल वृक्ष बनने में वर्षों लगते हैं। उसे पानी, सुरक्षा और देखभाल चाहिए। यही जिम्मेदारी सबसे ज्यादा नदारद दिखाई देती है।

इस मानसून भी लाखों पौधे धरती में रोपे जाएंगे। कैमरे फिर चमकेंगे। रिकॉर्ड फिर बनेंगे। भाषण फिर होंगे। लेकिन असली परीक्षा अगले मानसून में होगी।

तब देश फिर वही सवाल पूछेगा; क्या इस बार पौधे सचमुच पेड़ बनेंगे, या हरियाली एक बार फिर सरकारी फाइलों की हरी स्याही तक ही महदूद रह जाएगी?

Tuesday, July 7, 2026

 अंजीर का पत्ता: क्या हम अपने इतिहास से शर्मिंदा हैं?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

8 जुलाई 2026

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देश इस समय महंगाई, बेरोजगारी, प्रदूषण और बुनियादी ढांचे जैसी बड़ी चुनौतियों से जूझ रहा है। लेकिन इसी बीच  की कक्षा 9 की कला शिक्षा की पुस्तक मधुरिमा ने एक ऐसा विवाद खड़ा कर दिया, जिसने शिक्षा, इतिहास और संस्कृति पर नई बहस छेड़ दी।

मामला मोहनजोदड़ो की विश्वप्रसिद्ध “डांसिंग गर्ल” कांस्य प्रतिमा का है। यह साढ़े चार हजार वर्ष पुरानी कलाकृति भारतीय पुरातत्व की सबसे महत्वपूर्ण धरोहरों में से एक है। वर्षों से यह अपने मूल स्वरूप में पाठ्यपुस्तकों में प्रकाशित होती रही, लेकिन इस बार इसके धड़ पर डिजिटल छाया डालकर उसे ढक दिया गया। इतिहासकारों और शिक्षाविदों ने इसे ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ बताया। बढ़ते विवाद के बाद एनसीईआरटी ने मूल चित्र बहाल करने का फैसला लिया।

इतिहासकार  ने कहा, “यह एक काल्पनिक कलाकृति बनाने जैसा है। माइकलएंजेलो की डेविड प्रतिमा पर गिरजाघर द्वारा अंजीर का पत्ता चिपकाने जैसा।” यह टिप्पणी केवल एक उपमा नहीं थी। उसने पूरे विवाद का सार सामने रख दिया।

यह केवल एक तस्वीर का विवाद नहीं, बल्कि उस सोच का सवाल है जो इतिहास को उसकी असल शक्ल में देखने से हिचकती है। अगर किसी ऐतिहासिक कलाकृति को आज के नैतिक चश्मे से बदलना शुरू कर दिया जाए, तो कल किसी मूर्ति का हाथ, किसी चित्र का चेहरा या किसी शिलालेख की पंक्तियां भी बदली जा सकती हैं। तब इतिहास तथ्य नहीं रहेगा, बल्कि हमारी सुविधानुसार गढ़ी गई कहानी बन जाएगा।

दुनिया का अनुभव भी यही बताता है। यूरोप में कभी अनेक मूर्तियों और चित्रों को नैतिकता के नाम पर ढक दिया गया था। बाद में विद्वानों ने माना कि इससे कला और इतिहास दोनों के साथ अन्याय हुआ। संग्रहालयों ने मूल स्वरूप को फिर से अपनाया और यह स्वीकार किया कि इतिहास को बदलने के बजाय उसे समझाना ही बेहतर रास्ता है।

स्कूल की किताबों में बच्चों की उम्र और संवेदनशीलता का ध्यान रखना निश्चित रूप से ज़रूरी है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि प्रमाणिक ऐतिहासिक वस्तुओं को ही बदल दिया जाए। अगर किसी कलाकृति के बारे में अतिरिक्त व्याख्या की आवश्यकता है, तो वह पाठ, टिप्पणी या शिक्षक के माध्यम से दी जा सकती है। शिक्षा का उद्देश्य सच से परिचित कराना है, सच पर पर्दा डालना नहीं।

एक प्रमुख अखबार ने इस पूरे घटनाक्रम को “इतिहास पर फ़ोटोशॉप” कहा। यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि डिजिटल संपादन केवल तस्वीर नहीं बदलता, बल्कि देखने वाले की समझ भी बदल देता है। विद्यार्थी वही सच मानते हैं जो उनकी पाठ्यपुस्तक में छपा होता है। इसलिए पाठ्यपुस्तकों में तथ्य और प्रमाणिकता की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।

भारतीय सभ्यता ने मानव शरीर को कभी शर्म का विषय नहीं माना।  और  के मंदिर,  और  की भित्तिचित्र कला और मूर्तियां इसी सोच की गवाह हैं। इनमें शरीर को वासना नहीं, बल्कि जीवन, सौंदर्य, सृजन और प्रकृति के प्रतीक के रूप में देखा गया। यही हमारी सांस्कृतिक विरासत की सबसे बड़ी खूबी रही है।

विडंबना यह है कि हम दुनिया भर में योग, आयुर्वेद और अपनी प्राचीन सभ्यता पर फ़ख्र करते हैं, लेकिन उसी विरासत की कलात्मक अभिव्यक्तियों को देखकर असहज हो जाते हैं। यह विरोधाभास हमारी सांस्कृतिक समझ पर भी सवाल खड़ा करता है।

एक हिस्टोरियन ने सही  कहा, “अगर नृत्यांगना को अपनी असली शक्ल में नहीं दिखाया जा सकता, तो भारतीय कला का अध्ययन कैसे होगा?” यह प्रश्न केवल एक प्रतिमा का नहीं, बल्कि पूरे इतिहास बोध का है।

पाठ्यपुस्तकें केवल परीक्षा पास कराने का साधन नहीं होतीं। वे आने वाली पीढ़ियों की सोच, समझ और दृष्टि का निर्माण करती हैं। अधूरा या संशोधित इतिहास अंततः अधूरी समझ ही पैदा करता है। हमारी सभ्यता हजारों वर्षों तक इसलिए जीवित रही क्योंकि उसमें आत्मविश्वास था, जिज्ञासा थी और सच का सामना करने का साहस था।

इसलिए इतिहास को अंजीर के पत्ते से ढकने के बजाय उसकी मूल गरिमा के साथ प्रस्तुत करना चाहिए। संवेदनशीलता आवश्यक है, लेकिन सत्य उससे भी अधिक आवश्यक है। सच से आँखें चुराने वाली शिक्षा कभी आत्मविश्वासी समाज का निर्माण नहीं कर सकती।

Monday, July 6, 2026

 जब खबर बिक गई, और सच हार गया!

सत्ता बाजार के आगे घुटने टेकती  पत्रकारिता 

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

5 जुलाई 2026

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मीडिया की दुनिया में अब सबसे बड़ी खबर क्या है?

यह कि खबर अब खबर नहीं रही।

वह एक उत्पाद बन गई है। बिकती है। पैक होकर आती है। सजती है। चमकती है। और फिर दर्शकों के सामने परोस दी जाती है। सच कहीं पीछे छूट जाता है। उसकी जगह ले लेते हैं प्रचार, सनसनी और कारोबार।

कभी पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कही जाती थी। पत्रकार सत्ता की आंखों में आंखें डालकर सवाल पूछते थे। जेल जाते थे। मुकदमे झेलते थे। धमकियां सहते थे। लेकिन कलम नहीं झुकाते थे।

आज तस्वीर बदल गई है। खबर और प्रचार के बीच की दीवार गिर चुकी है। जनसंपर्क यानी पीआर और पत्रकारिता अब कई जगह एक ही सिक्के के दो पहलू दिखाई देते हैं। सत्ता जो कहना चाहती है, वही सुर्खियां बन जाती हैं। जो सवाल पूछता है, उसे अक्सर किनारे कर दिया जाता है।

आज न्यूज़रूम का सबसे ताकतवर आदमी संपादक नहीं, विज्ञापनदाता है। वही तय करता है कि कौन-सी खबर चलेगी और कौन-सी दब जाएगी। अगर किसी खबर से बड़े कारोबारी या राजनीतिक हित प्रभावित होते हों, तो कई बार वह खबर पैदा होने से पहले ही दम तोड़ देती है।

भारत में मीडिया का बड़ा हिस्सा अब कुछ गिने-चुने हाथों में सिमट चुका है। हिंदी के चार बड़े अखबार अधिकांश पाठकों तक पहुंचते हैं। कई बड़े टीवी नेटवर्क भी विशाल कॉरपोरेट घरानों के नियंत्रण में हैं। ऐसे माहौल में पूरी तरह स्वतंत्र पत्रकारिता करना आसान नहीं रह जाता। मालिक का कारोबार और संपादक की कलम हमेशा एक ही दिशा में नहीं चल सकते।

इधर पीआर एजेंसियों ने भी पत्रकारिता का चेहरा बदल दिया है। तैयार प्रेस विज्ञप्तियां, चमकदार तस्वीरें, पहले से लिखे बयान और वीडियो सीधे न्यूज़रूम में पहुंच जाते हैं। समय की कमी और लागत बचाने की मजबूरी में कई संस्थान इन्हें लगभग ज्यों का त्यों खबर बना देते हैं।

नतीजा सामने है। किसान की तकलीफ पीछे छूट जाती है। बेरोज़गार युवा की कहानी जगह नहीं पाती। प्रदूषण, जल संकट, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे छोटे कोने में सिमट जाते हैं। लेकिन किसी उत्पाद की लॉन्चिंग, किसी फ़िल्मी सितारे की पार्टी या सरकारी कार्यक्रम को घंटों का प्रसारण मिल जाता है।

खोजी पत्रकारिता कभी इस पेशे की पहचान थी। एक ख़बर सरकारें गिरा देती थी। बड़े-बड़े घोटाले उजागर होते थे। आज ऐसे उदाहरण कम दिखाई देते हैं। इसकी एक वजह डर भी है। मुकदमे, कानूनी दबाव, आर्थिक संकट और नौकरी जाने का भय। प्रेस स्वतंत्रता से जुड़े अंतरराष्ट्रीय सूचकांक भी यही संकेत देते हैं कि स्वतंत्र पत्रकारिता पहले से अधिक कठिन होती जा रही है।

टीवी चैनलों की बहसें देखिए। हर शाम वही चेहरे। वही चीख-पुकार। वही तयशुदा संवाद। एंकर कई बार सवाल पूछने वाले पत्रकार कम और किसी पक्ष के वकील ज़्यादा लगते हैं। बहस कम होती है, शोर ज़्यादा होता है। दर्शक जानकारी लेकर नहीं, उलझन लेकर उठता है।

आज तर्क की जगह तमाशा बिकता है। तथ्य से ज़्यादा तेज़ आवाज़ मायने रखती है। वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों से ज़्यादा जगह कई बार ज्योतिषियों, स्वयंभू बाबाओं और सनसनी फैलाने वालों को मिलती है। सोशल मीडिया की रफ्तार ने भी इस बीमारी को बढ़ाया है। पहले खबर की पुष्टि होती थी, अब पहले वायरल होना ज़रूरी समझा जाता है।

प्रेस की आज़ादी का मतलब कभी सत्ता से सवाल पूछने की आज़ादी था। आज कई जगह इसका मतलब बदलता दिखाई देता है। कुछ मीडिया संस्थान सरकारों और बड़े कॉरपोरेट घरानों के साथ इतने करीब हो गए हैं कि आलोचना उन्हें नागवार गुजरती है। सत्ता की प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवाल कम और तारीफ ज़्यादा सुनाई देती है। कई नेता अब कठिन सवालों से बचते हुए सीधे सोशल मीडिया के ज़रिए जनता तक अपना संदेश पहुंचा देते हैं। संवाद की जगह एकतरफा प्रसारण ने ले ली है।

यह संकट केवल भारत का नहीं है। दुनिया के कई लोकतांत्रिक देशों में मीडिया पर लोगों का भरोसा लगातार घट रहा है। लोगों को लगता है कि खबरें निष्पक्ष कम और झुकाव वाली ज़्यादा हो गई हैं। 

हर साल पत्रकारिता के कॉलेज हजारों नए छात्र तैयार कर रहे हैं। लेकिन अच्छी पत्रकारिता केवल डिग्री से नहीं आती। उसके लिए भाषा पर पकड़ चाहिए। इतिहास और समाज की समझ चाहिए। सबसे बढ़कर ईमानदारी चाहिए। अफ़सोस, क्लिकों की दौड़, कम वेतन और नौकरी की असुरक्षा ने नए पत्रकारों पर भी गहरा असर डाला है। बहुत से युवाओं के लिए पत्रकारिता अब केवल पीआर या डिजिटल इन्फ्लुएंसर बनने की सीढ़ी बनकर रह गई है।

इसका सबसे बड़ा नुकसान आम नागरिक उठाता है। जब उसे पूरी और सही जानकारी नहीं मिलती, तब अफ़वाहें फैलती हैं। समाज खेमों में बंटता है। लोग एक-दूसरे को सुनना छोड़ देते हैं। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत, यानी जागरूक नागरिक, धीरे-धीरे भ्रमित नागरिक में बदलने लगता है।

पत्रकारिता का काम सरकार गिराना नहीं है। उसका काम सरकार से सवाल पूछना है। उसका काम किसी दल का विरोध या समर्थन करना नहीं, बल्कि जनता के हित की हिफाज़त करना है। पत्रकार अगर दरबारी बन जाएगा, तो जनता की आवाज़ कौन बनेगा?

सच बोलना कभी आसान नहीं रहा। लेकिन इतिहास गवाह है कि वही समाज आगे बढ़ते हैं, जहां पत्रकार सवाल पूछने से नहीं डरते। जहां कलम बिकती नहीं, झुकती नहीं और सत्ता के दरबार में सलाम करने के बजाय जनता के दरवाज़े पर खड़ी रहती है।

जिस दिन खबर फिर से सच की तरफ लौटेगी, उसी दिन पत्रकारिता भी अपनी खोई हुई इज़्ज़त वापस पा लेगी। वरना अख़बार छपते रहेंगे, चैनल चलते रहेंगे, मोबाइल पर नोटिफिकेशन बजते रहेंगे, लेकिन सच धीरे-धीरे हमारी आंखों के सामने दम तोड़ देगा। और तब सबसे बड़ा नुकसान किसी पत्रकार का नहीं, पूरे लोकतंत्र का होगा।

Friday, July 3, 2026

 


शादी का न्योता, वंदे भारत का सफर और बदलते भारत की नई रेल कहानी

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पटरियों पर दौड़ता नया हिंदुस्तान, मुस्कुराता मध्यवर्ग और मजबूत होती राष्ट्रीय एकता

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बृज खंडेलवाल द्वारा

4 जुलाई 2026

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एक ज़माना था, जब शादी का कार्ड मिलते ही सबसे पहले रेल यात्रा की चिंता शुरू हो जाती थी। टिकट मिलेगा या नहीं? ट्रेन समय पर चलेगी या नहीं? भीड़ कितनी होगी? रात कैसे कटेगी? बच्चे संभलेंगे या नहीं?बिस्तरबंद, संदूकों, सुराही, खाने में पूरी सब्जी, नमकीन, डकार के लिए चूर्ण! फुल टेंशन।

आज तस्वीर बदल रही है।

इस सप्ताह चेन्नई में हमारे परिवार की एक शादी है। लेकिन यह सिर्फ एक शादी नहीं, बदलते भारत की एक खूबसूरत राष्ट्रीय एकता की  कहानी भी है। रिश्तेदार देश के अलग-अलग शहरों से आ रहे हैं। कोई बेंगलुरु से, कोई कोयंबटूर से, लड़के वाले दिल्ली से,  रिश्तेदार हैदराबाद से और कोलकाता से भी। हम दोनों, मैं और मेरी पत्नी, मैसूर से वंदे भारत एक्सप्रेस में सवार हुए और पांच घंटे में बैंगलोर होकर चेन्नई पहुंचे।

सफर शुरू होते ही लगा कि मंज़िल से पहले ही जश्न शुरू हो गया है।

कोच चमचमा रहा था। सीटें आरामदेह थीं। झटके नाममात्र के थे। न खाने की फिक्र, न पानी की चिंता। गर्मागर्म नाश्ता और चाय अपनी सीट पर ही मिल गए। साफ-सुथरे शौचालय, शांत माहौल और बड़ी खिड़कियों से बाहर भागते खेत, पहाड़ और गांव।

चेन्नई कब आ गया, पता ही नहीं चला।

स्टेशन पर उतरे तो ऐसा नहीं लगा कि कई घंटे की यात्रा करके आए हैं। हम सीधे शादी की रौनक में शामिल होने के लिए तैयार थे।

यही सबसे बड़ा बदलाव है।

एक समय रेल यात्रा अपने आप में इम्तिहान होती थी। लोग घर से पूड़ी-सब्ज़ी, अचार, पानी की बोतलें और दवाइयों का थैला लेकर चलते थे। पूरी रात सामान की रखवाली करनी पड़ती थी। शादी में पहुंचते-पहुंचते आधी थकान चेहरे पर साफ दिखाई देती थी।

आज वंदे भारत ने सफर की पूरी तासीर बदल दी है।

अब यात्रा बोझ नहीं, छुट्टियों और खुशियों का हिस्सा बन गई है।

भारत का नया आकांक्षी मध्यवर्ग यही चाहता था। वह हवाई यात्रा जितना आराम चाहता है, लेकिन परिवार के साथ रेल यात्रा का अपनापन भी नहीं छोड़ना चाहता। वंदे भारत ने दोनों के बीच का रास्ता निकाल दिया है।

ट्रेन के भीतर भी भारत की एक छोटी-सी तस्वीर दिखाई देती है। कोई लैपटॉप पर काम कर रहा है। बच्चे खिड़की से बाहर झांक रहे हैं। बुजुर्ग आराम से अखबार पढ़ रहे हैं। अलग-अलग भाषाएं सुनाई देती हैं, लेकिन मुस्कान की भाषा सबकी एक होती है। मोबाइल प्रेम इतना बढ़ गया है, की पहले जैसे आपस में अजनबी बात नहीं करते! 


भारतीय रेल केवल लोहे की पटरियां और इंजन नहीं है। यह देश की धड़कन है। यह गांवों को शहरों से, पहाड़ों को समुद्र से और दिलों को दिलों से जोड़ती है।

आज भारतीय रेल दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्कों में शामिल है। करीब 68 हजार किलोमीटर लंबे नेटवर्क पर रोज़ लगभग 13 हजार यात्री ट्रेनें दौड़ती हैं। हर दिन 2 करोड़ 30 लाख से अधिक लोग रेल से सफर करते हैं। यानी कई देशों की पूरी आबादी से भी ज़्यादा लोग रोज़ भारतीय रेल पर भरोसा करते हैं।

साल 2019 में पहली वंदे भारत एक्सप्रेस नई दिल्ली और वाराणसी के बीच शुरू हुई थी। आज 2026 तक देश के अलग-अलग हिस्सों में 160 से अधिक वंदे भारत सेवाएं चल रही हैं। इन ट्रेनों का निर्माण चेन्नई की इंटीग्रल कोच फैक्टरी में 'मेक इन इंडिया' अभियान के तहत हुआ है। यह केवल एक ट्रेन नहीं, बल्कि आत्मविश्वास से भरे नए भारत की पहचान बन चुकी है।

समय की बरबादी और सिरदर्दियों से तो बचते ही हैं, इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि रिश्ते और भी करीब आ गए हैं।

अब मैसूर का परिवार आराम से चेन्नई की शादी में शामिल हो सकता है। बेंगलुरु का बेटा सुबह निकलकर दोपहर तक घर पहुंच सकता है। बुजुर्ग बिना ज़्यादा थके बच्चों और पोते-पोतियों से मिलने जा सकते हैं।

रेल अब केवल यात्रियों को नहीं, उम्मीदों को भी मंज़िल तक पहुंचा रही है।

यह भी सच है कि भारतीय रेल की असली ताकत केवल वंदे भारत नहीं है। लाखों लोगों के लिए आज भी साधारण मेल, एक्सप्रेस और पैसेंजर ट्रेनें जीवनरेखा हैं। किसान, मज़दूर, छात्र, व्यापारी और तीर्थयात्री, सबके लिए रेल बराबरी का सफर उपलब्ध कराती है।

इसी बराबरी में भारत की असली ताकत छिपी है।

रेल हमें केवल एक शहर से दूसरे शहर नहीं ले जाती। वह हमें एक-दूसरे के और करीब भी ले आती है। रास्ते में मिलने वाले लोग, बदलते नज़ारे, अलग-अलग बोलियां और साझा मुस्कानें हमें याद दिलाती हैं कि विविधता के बावजूद हम एक ही देश की संतान हैं।

इस बार चेन्नई की शादी में हमारे परिवार को जोड़ने का काम केवल रिश्तों ने नहीं किया। वंदे भारत ने भी उतनी ही अहम भूमिका निभाई।

कभी-कभी राष्ट्र निर्माण बड़े-बड़े भाषणों से नहीं होता। वह तब होता है, जब दादा-दादी बिना थके शादी में पहुंच जाएं। जब बच्चे सफर का आनंद लें। जब रिश्तेदार समय पर मिलें। जब यात्रा शिकायत नहीं, खुशगवार याद बन जाए।

भारतीय रेल पिछले 170 वर्षों से देश को जोड़ती आई है। वंदे भारत उस लंबी यात्रा का नया पड़ाव है। यह केवल तेज़ रफ्तार ट्रेन नहीं, बल्कि उस नए भारत की तस्वीर है जो अपने नागरिकों को सुविधा, सम्मान और बेहतर जीवन देना चाहता है।

मैसूर से चेन्नई तक के इस सफर में हमने सिर्फ दूरी तय नहीं की। हमने बदलते भारत की रफ्तार को अपनी आंखों से देखा, महसूस किया और जिया।

Thursday, July 2, 2026

 


सोडा वाटर की फिज़ क्यों फुस्स हो गई?

क्या वेलफेयर की मिठास ने भारत के जनआंदोलनों की आग ठंडी कर दी है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

3 जुलाई 2026

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कभी भारत में आंदोलन खड़ा करना सोडा वाटर की बोतल खोलने जैसा था। ढक्कन खुला नहीं कि झाग आसमान छूने लगता था। एक नारा लगता था और हजारों लोग सड़कों पर उतर आते थे। छात्र, किसान, मजदूर, कर्मचारी। हर तरफ उबाल था। सत्ता की पेशानी पर पसीना आ जाता था।


आज भी गुस्सा है। शिकायतें भी हैं। महंगाई है। बेरोजगारी है। किसानों की परेशानियां हैं। लेकिन फिर भी पूरे देश को हिला देने वाले जनआंदोलन पहले जैसे क्यों नहीं दिखाई देते?


क्या जनता बदल गई है? या राजनीति का मिज़ाज बदल गया है? या फिर सरकार ने नाराजगी की आग पर वेलफेयर का पानी डाल दिया है?


यही सवाल आज की भारतीय राजनीति की सबसे दिलचस्प पहेली है।


इतिहास कहता है कि क्रांतियां सिर्फ भूख से नहीं होतीं। वे टूटती उम्मीदों से जन्म लेती हैं। फ्रांसीसी चिंतक एलेक्सिस डी टॉकविल ने बहुत पहले कहा था कि सबसे बड़ा विस्फोट तब होता है, जब लोगों की उम्मीदें तेजी से बढ़ें, लेकिन व्यवस्था उनका साथ न दे। जेम्स सी. डेविस और सैमुअल पी. हंटिंगटन ने भी इसी सोच को आगे बढ़ाया।


भारत का स्वतंत्रता संग्राम हो, सत्तर के दशक का जेपी आंदोलन हो, गुजरात का नव निर्माण आंदोलन हो, रेलवे की ऐतिहासिक हड़ताल हो या 2011 का अन्ना आंदोलन, इन सबकी जड़ में गहरा मोहभंग था। लोगों को लगने लगा था कि सत्ता सुन नहीं रही। जब उम्मीद दम तोड़ देती है, तब इंकलाब जन्म लेता है।


लेकिन 2014 के बाद कहानी का रुख बदलता दिखाई देता है।


सरकार ने विकास के साथ कल्याणकारी योजनाओं का ऐसा ताना-बाना बुना, जिसे कुछ अर्थशास्त्री "सॉफ्ट कैपिटलिज्म" कहते हैं। यानी बाजार भी चले और गरीब का चूल्हा भी जले।


जनधन खाते खुले। आधार जुड़ा। मोबाइल हाथ में आया। डीबीटी के जरिए पैसा सीधे बैंक खातों में पहुंचने लगा। उज्ज्वला का गैस सिलेंडर मिला। पीएम किसान की मदद आई। मुफ्त राशन, पेंशन, छात्रवृत्ति और दूसरी योजनाओं का लाभ सीधे लोगों तक पहुंचने लगा। बिचौलियों की दुकान धीरे-धीरे सिमटने लगी।


यह बदलाव केवल जेब में नहीं, दिमाग में भी हुआ।

जिस गरीब ने पहली बार बैंक में अपना नाम देखा, जिसके घर बिजली आई, नल से पानी आया, राशन की चिंता घटी या इलाज का भरोसा मिला, उसके भीतर व्यवस्था के प्रति पूरी मायूसी की जगह एक उम्मीद ने जन्म लिया।


क्रांतियां उम्मीद से नहीं, निराशा से पैदा होती हैं।

यही शायद सबसे बड़ा बदलाव है।

पिछले एक दशक में करोड़ों लोग औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से जुड़े। गांवों तक सड़कें पहुंचीं। डिजिटल भुगतान ने रेहड़ी वाले तक को क्यूआर कोड पकड़ा दिया। मोबाइल इंटरनेट ने गांव और शहर के बीच की कई दीवारें गिरा दीं। स्टार्टअप और स्वरोजगार ने युवाओं के सामने नए सपने रख दिए।


अब लोगों की बातचीत भी बदल गई है।

पहले सवाल होता था, "सरकार कब जाएगी?"

अब सवाल है, "बेटे को नौकरी कब मिलेगी?" "बेटी की पढ़ाई कैसे पूरी होगी?" "अपना घर कब बनेगा?" "दुकान कैसे बढ़ेगी?"

यानी सामूहिक गुस्से की जगह निजी उम्मीदों ने ले ली।


लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं कि भारत में विरोध खत्म हो गया है।

किसान आंदोलन ने दिखा दिया कि जब मुद्दा गहरा हो, तो लाखों लोग आज भी एकजुट हो सकते हैं। नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शन हुए। कई राज्यों में स्थानीय आंदोलनों ने सरकारों को मुश्किल में डाला। लोकतंत्र में असहमति अब भी जिंदा है।


फिर भी एक फर्क साफ दिखाई देता है। आज के आंदोलन अक्सर किसी खास मुद्दे या इलाके तक सीमित रह जाते हैं। वे पूरे देश में वैसी आग नहीं लगा पाते, जैसी पहले लगती थी।

इसके पीछे सिर्फ वेलफेयर योजनाएं ही जिम्मेदार नहीं हैं। मजबूत सरकारी तंत्र, सोशल मीडिया पर बिखरती बहस, कमजोर विपक्ष, बदलती चुनावी राजनीति और युवाओं की नई महत्वाकांक्षाएं भी इस बदलाव की अहम वजह हैं।


सच यह है कि समाज बदल रहा है।

जिस नागरिक के पास बैंक खाता, गैस कनेक्शन, राशन की गारंटी, स्वास्थ्य बीमा और डिजिटल पहचान है, वह व्यवस्था को आग लगाने से पहले दस बार सोचता है। वह क्रांति से ज्यादा सुधार चाहता है। उसे सड़क पर संघर्ष से ज्यादा अपने बच्चों का भविष्य दिखाई देता है।


लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।

बेरोजगारी आज भी बड़ा सवाल है। आय की खाई अब भी चौड़ी है। किसान और युवा अब भी परेशान हैं। अगर उम्मीदें टूटने लगीं, अवसर सिकुड़ गए और विकास की रफ्तार थम गई, तो वही दबा हुआ लावा फिर बाहर भी आ सकता है। इतिहास यही सिखाता है।


इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत में जनआंदोलनों का दौर खत्म हो गया है। इतना जरूर कहा जा सकता है कि उनकी शक्ल बदल गई है। राजनीति का तापमान बदल गया है। विरोध की भाषा बदल गई है।


सोडा वाटर की बोतल अब भी बंद है। उसके भीतर दबाव भी है। फर्क सिर्फ इतना है कि ढक्कन अब पहले जितनी आसानी से नहीं खुलता।


भविष्य किस करवट बैठेगा, यह आने वाला वक्त बताएगा। लेकिन फिलहाल इतना साफ दिखता है कि जिस समाज के पास उम्मीदें बची हों, वह हर सुबह क्रांति का बिगुल नहीं बजाता। वह अपने बच्चों के लिए बेहतर कल बनाने निकल पड़ता है।


Wednesday, July 1, 2026

 पेठे की मिठास, पेड़े की महक... 

ब्रज का स्वाद अब भी दुनिया का दिल जीत रहा है!

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

2 जुलाई 2026

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मुगल बादशाह जहांगीर ने  चाँदी की कटोरी में रखी ठंडी खीर का एक चम्मच उठाया। फिर गरमागरम गुलाब जामुन का छोटा-सा टुकड़ा उसमें डुबोया। एक कौर लिया और मुस्कुरा उठे। कहते हैं, शाही रसोइयों की यही सबसे बड़ी दाद थी। 

कहते हैं, ताजमहल बन रहा था। शाहजहां ने चाशनी में पके पेठे का स्वाद चखा और ऐसे मुरीद हुए कि आगरा का पेठा हमेशा के लिए शाही पहचान बन गया। खासतौर पर पंछी! 

इतिहास इन किस्सों की  तस्दीक करे या न करे, लेकिन इतना तय है कि आगरा की मिठाइयों का रिश्ता सिर्फ़ स्वाद से नहीं, तहज़ीब, विरासत और जज़्बात से भी रहा है।

आज वही मिठास एक नए इम्तिहान से गुज़र रही है। एक तरफ़ बदलती जीवनशैली, चॉकलेट और बेकरी उत्पादों की बढ़ती घुसपैठ है। दूसरी तरफ़ सरकारी नियम, लगातार निरीक्षण और काग़ज़ी अनुपालन का बोझ। 

फिर भी आगरा, मथुरा, वृंदावन और हाथरस के हलवाई हार मानने को तैयार नहीं हैं। वे परंपरा को बचाते हुए नए स्वाद गढ़ रहे हैं।

ब्रज मंडल सदियों से मिठाइयों का इलाक़ा रहा है। मथुरा और वृंदावन अपने दूध, खोए और पेड़ों, खुरचन के लिए मशहूर हैं। हाथरस की रबड़ी और सोन पपड़ी की अलग पहचान है। आगरा की पहचान देसी घी की मिठाइयों, गुलाब जामुन, बूंदी के लड्डुओं, बर्फियों और दुनिया भर में मशहूर पेठे से है। यहाँ शादी हो, जन्मदिन हो, मंदिर का भोग हो या किसी मेहमान का इस्तकबाल, या फिर मृत्यु भोज, मिठाई के बिना बात अधूरी मानी जाती है। हलवे के नाम पर सबसे ज्यादा डिमांड सीजन में गाजर का हलवा, बाकी टाइम मूंग की दाल का  देशी घी वाला हलवा, की रहती है। गर्मी में रस गुल्ले, रस मलाई, सर्दी में पिस्ते की बर्फी, खूब बिकती हैं।

ख़ऊओं की नगरी मथुरा के चौबेजी कहते हैं, "ब्रज के ठाकुरजी भी मानो मिठास के सबसे बड़े रसिक हैं। कहीं बूंदी के लड्डू चढ़ते हैं, कहीं पेड़ा, कहीं माखन-मिश्री और कहीं तरह-तरह की बर्फियाँ, मोहन थाल, ठौर, मीठी मठरी, खुरमा, बालू शाही। यही धार्मिक परंपरा इस कारोबार को पीढ़ियों से सहारा देती आई है। जलेबी, इमरती, माल पुओं की तो शान निराली है। माखन का समोसा, परमल भरमा, खोए की गुजिया, रबड़ी आम नहीं चखा तो ब्रज दर्शन बेकार।"

मथुरा-वृंदावन की सबसे प्रसिद्ध और पहचान बन चुकी मिठाई मथुरा का पेड़ा है। यह खोया (मावा), चीनी और इलायची से तैयार किया जाता है। इसका हल्का दानेदार, मुलायम और मुंह में घुल जाने वाला स्वाद इसे खास बनाता है। श्रीकृष्ण भक्ति परंपरा से जुड़े इस पेड़े का मंदिरों में प्रसाद के रूप में भी विशेष महत्व है।

मथुरा के प्रसिद्ध मिठाई विक्रेताओं में बृजवासी स्वीट्स सबसे अधिक चर्चित है। इसके अलावा राधिका स्वीट्स, शंकर मिठाई वाला और श्रीजी पेड़ा भंडार भी अपनी गुणवत्ता के लिए जाने जाते हैं।

पोद्दारजी बताते हैं, "मथुरा की अन्य लोकप्रिय मिठाइयों में खुरचन, रबड़ी और मालपुआ प्रमुख हैं। खुरचन गाढ़े दूध की परतों से बनाई जाने वाली अनोखी मिठाई है, जबकि रबड़ी और मालपुआ का स्वाद एक-दूसरे के साथ और भी लाजवाब लगता है।

इसके अलावा बूंदी लड्डू, बेसन लड्डू, मेवा लड्डू, विभिन्न प्रकार की बर्फियां, जलेबी, बालूशाही, रेवड़ी और गजक भी यहां खूब पसंद की जाती हैं। ब्रज की मिठाइयों में दूध, मावा और घी का भरपूर उपयोग होता है, जो भगवान श्रीकृष्ण की गोपाल संस्कृति और ब्रज की समृद्ध दुग्ध परंपरा का प्रतीक है।"

अगले माह सावन की आहट के साथ घेवर का मौसम शुरू होने वाला है। लेकिन इस बार सिर्फ़ पारंपरिक घेवर नहीं, बल्कि केसर, चॉकलेट, ब्लूबेरी, पान, ड्राई फ्रूट और फ्यूज़न फ्लेवर वाले घेवर भी बाज़ार में उतर रहे हैं। यही नहीं, आगरा के पुराने हलवाई काजू अनारकली, पान पेठा, चॉकलेट पेठा, ड्राई फ्रूट बर्फी और कई नई प्रयोगधर्मी मिठाइयाँ तैयार कर रहे हैं।

करीब तीन सौ साल पुराने भगत हलवाई जैसे प्रतिष्ठानों ने साबित किया है कि परंपरा का मतलब ठहर जाना नहीं होता। पुराने स्वाद को बचाते हुए नई पीढ़ी की पसंद के हिसाब से मिठाइयों में नए रंग, नए आकार और नए फ्लेवर जोड़े जा सकते हैं। गोपाल दास, ब्रज भोग, जीएमबी, डबल हाथरस, मोर मुकुट, सत्तो , देवीराम, हीरालाल और कई अन्य प्रतिष्ठान भी इसी राह पर आगे बढ़ रहे हैं। यह फ्यूज़न सिर्फ़ फैशन नहीं, बल्कि बदलते बाज़ार की ज़रूरत बन चुका है।

मगर तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। आगरा और मथुरा का अधिकांश मिठाई उद्योग आज भी असंगठित है। हज़ारों छोटी दुकानों और पारिवारिक कारोबारों पर इसकी नींव टिकी है। पिछले कुछ वर्षों में मशीनें आई हैं, पैकेजिंग सुधरी है और सफ़ाई के मानकों पर भी काम हुआ है। फिर भी अधिकतर काम आज भी हाथों से होता है। यही इसकी पहचान भी है और चुनौती भी।

खाद्य सुरक्षा के लिए निरीक्षण और निगरानी ज़रूरी हैं। मिलावट करने वालों पर सख़्त कार्रवाई भी होनी चाहिए। लेकिन ईमानदार हलवाइयों का कहना है कि कई बार अलग-अलग विभागों की लगातार छापेमारी, नोटिस और काग़ज़ी औपचारिकताएँ कारोबार पर बेवजह का दबाव बना देती हैं। उनका तर्क है कि सरकार का ध्यान उद्योग को बेहतर बनाने पर होना चाहिए, न कि सिर्फ़ दंडात्मक कार्रवाई पर।

एक नई चिंता मिठाइयों पर स्वास्थ्य संबंधी चेतावनी छापने की संभावित योजना को लेकर भी है। मधुमेह के बढ़ते मामलों के कारण चीनी की मात्रा पर सख़्त नियम बनाने की चर्चा चल रही है। कुछ हलवाई इसे ज़रूरी बहस मानते हैं, लेकिन कई का कहना है कि भारतीय भोजन की परंपरा में थोड़ा-सा मीठा हमेशा से शामिल रहा है। उनके अनुसार स्थानीय दूध, घी, गुड़ और सूखे मेवों से बनी पारंपरिक मिठाइयों की तुलना चॉकलेट, मफ़िन या अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों से नहीं की जानी चाहिए।

हलवाई यह आरोप भी लगाते हैं कि बड़े चॉकलेट और कन्फेक्शनरी ब्रांड भारतीय मिठाइयों को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं ताकि उनके उत्पादों की बिक्री बढ़े। इस दावे का स्वतंत्र प्रमाण भले न हो, लेकिन इतना सच है कि बदलती उपभोक्ता आदतों ने पारंपरिक मिठाई कारोबार पर दबाव ज़रूर बढ़ाया है।

फिर भी उम्मीद की वजहें कम नहीं हैं। आगरा आने वाला शायद ही कोई पर्यटक पेठा खरीदे बिना लौटता हो। मथुरा का पेड़ा आज भी श्रद्धा और स्वाद, दोनों का प्रतीक है। ऑनलाइन ऑर्डर, आकर्षक पैकेजिंग, वैक्यूम सील तकनीक और लंबी शेल्फ लाइफ़ ने देश-विदेश तक पहुँचने के नए रास्ते खोल दिए हैं।

ज़रूरत इस बात की है कि सरकार और उद्योग एक-दूसरे के विरोधी नहीं, साझेदार बनें। सफ़ाई, गुणवत्ता और प्रशिक्षण पर निवेश हो। छोटे हलवाइयों को आधुनिक तकनीक और आसान ऋण मिले। साथ ही ब्रज की इस मीठी विरासत को भौगोलिक पहचान, पर्यटन और सांस्कृतिक धरोहर से भी जोड़ा जाए।

आगरा की मिठाइयाँ केवल चीनी और घी का मेल नहीं हैं। इनमें इतिहास की खुशबू है, ब्रज की भक्ति है, मुग़ल रसोई की झलक है और हर भारतीय त्योहार की रौनक बसती है। अगर इस विरासत को समझदारी से सँभाला गया, तो इसकी मिठास आने वाली पीढ़ियों की ज़ुबान पर भी उसी तरह घुलती रहेगी, जैसे कभी बादशाहों की खीर में डूबा एक गुलाब जामुन।