जब खबर बिक गई, और सच हार गया!
सत्ता बाजार के आगे घुटने टेकती पत्रकारिता
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बृज खंडेलवाल द्वारा
5 जुलाई 2026
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मीडिया की दुनिया में अब सबसे बड़ी खबर क्या है?
यह कि खबर अब खबर नहीं रही।
वह एक उत्पाद बन गई है। बिकती है। पैक होकर आती है। सजती है। चमकती है। और फिर दर्शकों के सामने परोस दी जाती है। सच कहीं पीछे छूट जाता है। उसकी जगह ले लेते हैं प्रचार, सनसनी और कारोबार।
कभी पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कही जाती थी। पत्रकार सत्ता की आंखों में आंखें डालकर सवाल पूछते थे। जेल जाते थे। मुकदमे झेलते थे। धमकियां सहते थे। लेकिन कलम नहीं झुकाते थे।
आज तस्वीर बदल गई है। खबर और प्रचार के बीच की दीवार गिर चुकी है। जनसंपर्क यानी पीआर और पत्रकारिता अब कई जगह एक ही सिक्के के दो पहलू दिखाई देते हैं। सत्ता जो कहना चाहती है, वही सुर्खियां बन जाती हैं। जो सवाल पूछता है, उसे अक्सर किनारे कर दिया जाता है।
आज न्यूज़रूम का सबसे ताकतवर आदमी संपादक नहीं, विज्ञापनदाता है। वही तय करता है कि कौन-सी खबर चलेगी और कौन-सी दब जाएगी। अगर किसी खबर से बड़े कारोबारी या राजनीतिक हित प्रभावित होते हों, तो कई बार वह खबर पैदा होने से पहले ही दम तोड़ देती है।
भारत में मीडिया का बड़ा हिस्सा अब कुछ गिने-चुने हाथों में सिमट चुका है। हिंदी के चार बड़े अखबार अधिकांश पाठकों तक पहुंचते हैं। कई बड़े टीवी नेटवर्क भी विशाल कॉरपोरेट घरानों के नियंत्रण में हैं। ऐसे माहौल में पूरी तरह स्वतंत्र पत्रकारिता करना आसान नहीं रह जाता। मालिक का कारोबार और संपादक की कलम हमेशा एक ही दिशा में नहीं चल सकते।
इधर पीआर एजेंसियों ने भी पत्रकारिता का चेहरा बदल दिया है। तैयार प्रेस विज्ञप्तियां, चमकदार तस्वीरें, पहले से लिखे बयान और वीडियो सीधे न्यूज़रूम में पहुंच जाते हैं। समय की कमी और लागत बचाने की मजबूरी में कई संस्थान इन्हें लगभग ज्यों का त्यों खबर बना देते हैं।
नतीजा सामने है। किसान की तकलीफ पीछे छूट जाती है। बेरोज़गार युवा की कहानी जगह नहीं पाती। प्रदूषण, जल संकट, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे छोटे कोने में सिमट जाते हैं। लेकिन किसी उत्पाद की लॉन्चिंग, किसी फ़िल्मी सितारे की पार्टी या सरकारी कार्यक्रम को घंटों का प्रसारण मिल जाता है।
खोजी पत्रकारिता कभी इस पेशे की पहचान थी। एक ख़बर सरकारें गिरा देती थी। बड़े-बड़े घोटाले उजागर होते थे। आज ऐसे उदाहरण कम दिखाई देते हैं। इसकी एक वजह डर भी है। मुकदमे, कानूनी दबाव, आर्थिक संकट और नौकरी जाने का भय। प्रेस स्वतंत्रता से जुड़े अंतरराष्ट्रीय सूचकांक भी यही संकेत देते हैं कि स्वतंत्र पत्रकारिता पहले से अधिक कठिन होती जा रही है।
टीवी चैनलों की बहसें देखिए। हर शाम वही चेहरे। वही चीख-पुकार। वही तयशुदा संवाद। एंकर कई बार सवाल पूछने वाले पत्रकार कम और किसी पक्ष के वकील ज़्यादा लगते हैं। बहस कम होती है, शोर ज़्यादा होता है। दर्शक जानकारी लेकर नहीं, उलझन लेकर उठता है।
आज तर्क की जगह तमाशा बिकता है। तथ्य से ज़्यादा तेज़ आवाज़ मायने रखती है। वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों से ज़्यादा जगह कई बार ज्योतिषियों, स्वयंभू बाबाओं और सनसनी फैलाने वालों को मिलती है। सोशल मीडिया की रफ्तार ने भी इस बीमारी को बढ़ाया है। पहले खबर की पुष्टि होती थी, अब पहले वायरल होना ज़रूरी समझा जाता है।
प्रेस की आज़ादी का मतलब कभी सत्ता से सवाल पूछने की आज़ादी था। आज कई जगह इसका मतलब बदलता दिखाई देता है। कुछ मीडिया संस्थान सरकारों और बड़े कॉरपोरेट घरानों के साथ इतने करीब हो गए हैं कि आलोचना उन्हें नागवार गुजरती है। सत्ता की प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवाल कम और तारीफ ज़्यादा सुनाई देती है। कई नेता अब कठिन सवालों से बचते हुए सीधे सोशल मीडिया के ज़रिए जनता तक अपना संदेश पहुंचा देते हैं। संवाद की जगह एकतरफा प्रसारण ने ले ली है।
यह संकट केवल भारत का नहीं है। दुनिया के कई लोकतांत्रिक देशों में मीडिया पर लोगों का भरोसा लगातार घट रहा है। लोगों को लगता है कि खबरें निष्पक्ष कम और झुकाव वाली ज़्यादा हो गई हैं।
हर साल पत्रकारिता के कॉलेज हजारों नए छात्र तैयार कर रहे हैं। लेकिन अच्छी पत्रकारिता केवल डिग्री से नहीं आती। उसके लिए भाषा पर पकड़ चाहिए। इतिहास और समाज की समझ चाहिए। सबसे बढ़कर ईमानदारी चाहिए। अफ़सोस, क्लिकों की दौड़, कम वेतन और नौकरी की असुरक्षा ने नए पत्रकारों पर भी गहरा असर डाला है। बहुत से युवाओं के लिए पत्रकारिता अब केवल पीआर या डिजिटल इन्फ्लुएंसर बनने की सीढ़ी बनकर रह गई है।
इसका सबसे बड़ा नुकसान आम नागरिक उठाता है। जब उसे पूरी और सही जानकारी नहीं मिलती, तब अफ़वाहें फैलती हैं। समाज खेमों में बंटता है। लोग एक-दूसरे को सुनना छोड़ देते हैं। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत, यानी जागरूक नागरिक, धीरे-धीरे भ्रमित नागरिक में बदलने लगता है।
पत्रकारिता का काम सरकार गिराना नहीं है। उसका काम सरकार से सवाल पूछना है। उसका काम किसी दल का विरोध या समर्थन करना नहीं, बल्कि जनता के हित की हिफाज़त करना है। पत्रकार अगर दरबारी बन जाएगा, तो जनता की आवाज़ कौन बनेगा?
सच बोलना कभी आसान नहीं रहा। लेकिन इतिहास गवाह है कि वही समाज आगे बढ़ते हैं, जहां पत्रकार सवाल पूछने से नहीं डरते। जहां कलम बिकती नहीं, झुकती नहीं और सत्ता के दरबार में सलाम करने के बजाय जनता के दरवाज़े पर खड़ी रहती है।
जिस दिन खबर फिर से सच की तरफ लौटेगी, उसी दिन पत्रकारिता भी अपनी खोई हुई इज़्ज़त वापस पा लेगी। वरना अख़बार छपते रहेंगे, चैनल चलते रहेंगे, मोबाइल पर नोटिफिकेशन बजते रहेंगे, लेकिन सच धीरे-धीरे हमारी आंखों के सामने दम तोड़ देगा। और तब सबसे बड़ा नुकसान किसी पत्रकार का नहीं, पूरे लोकतंत्र का होगा।
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