Tuesday, July 28, 2026

 


जब कॉकरोचों ने हिला दिया सत्ता का सिंहासन: जेन ज़ी ने कर दिखाया, जो विपक्ष नहीं कर सका

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

29 जुलाई 2026

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साल 2026 का सबसे बड़ा राजनीतिक धमाका संसद में नहीं हुआ। वह एक मीम से शुरू हुआ।

कुछ छात्रों को "कॉकरोच" कहा गया। उन्होंने बुरा मानने के बजाय उसी नाम को अपना झंडा बना लिया। फिर वे जंतर-मंतर पहुंचे, डटे रहे और आखिरकार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। महीनों तक संसद में हंगामा करने वाला पूरा विपक्ष जो नहीं कर सका, वह काम कुछ हजार युवाओं ने मोबाइल फोन, मीम और मुस्कान के सहारे कर दिखाया।

कहावत है, "जहाँ चाह, वहाँ राह।" इस बार राह इंस्टाग्राम से होकर निकली।

कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी), पहले मज़ाक लगती थी। लेकिन मज़ाक ही आंदोलन बन गया। युवाओं ने कहा, "अगर हमें कॉकरोच कहते हो, तो याद रखो, एक को कुचलोगे, सौ और निकल आएँगे।"

फिर आया नीट-यूजी पेपर लीक।

परीक्षा रद्द हुई। करीब बीस लाख छात्रों को दोबारा परीक्षा की चिंता सताने लगी। कई छात्रों की आत्महत्या की खबरों ने पूरे देश को झकझोर दिया। वर्षों से जमा गुस्सा, पेपर लीक, महँगी कोचिंग, बेरोज़गारी और सुस्त व्यवस्था, अब ज्वालामुखी बन चुका था।

चिंगारी मिली और आग फैल गई।

सीजेपी ने वही भाषा बोली जो आज का युवा समझता है। प्रेस कॉन्फ्रेंस की जगह इंस्टाग्राम रील्स थीं। लंबे भाषणों की जगह मीम थे। गुस्से को हँसी में बदलकर उन्होंने व्यवस्था पर सबसे तीखा वार किया।

जंतर-मंतर धीरे-धीरे धरना स्थल नहीं, युवा गणराज्य बन गया। गीत गूंजे, पोस्टर बने, बहस हुई, कविताएँ पढ़ी गईं। माता-पिता भी साथ आए। शिक्षकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने समर्थन दिया। सोनम वांगचुक का 26 दिन का अनशन आंदोलन को नैतिक ताकत दे गया। पुलिस की लाठी और आँसू गैस ने भी आंदोलन की आग बुझाने के बजाय और हवा दे दी।

इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत उसकी सादगी थी।

सिर्फ एक मांग थी: जवाबदेही।

व्यवस्था की नाकामी की लंबी बहसों में सरकारें अक्सर बच निकलती हैं। लेकिन जब उंगली सीधे एक जिम्मेदार व्यक्ति की ओर उठे, तब बचना आसान नहीं होता।

आखिरकार सरकार ने हालात भाँप लिए। संसद लगातार ठप थी। देशभर में छात्रों का समर्थन बढ़ रहा था। तस्वीरें सोशल मीडिया पर फैल रही थीं। टकराव लंबा खिंचता तो नुकसान और बढ़ता।

धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दिया। सरकार ने जांच, मुआवजे और किसी तरह की प्रताड़ना न होने का भरोसा दिया। तत्काल संकट टल गया।

दिलचस्प बात यह रही कि विपक्ष इस पूरी लड़ाई में अगली कतार में नहीं, पीछे की सीट पर बैठा दिखाई दिया।

वर्षों से विपक्ष शिक्षा, बेरोज़गारी और संस्थाओं की विफलता पर सरकार को घेरता रहा है। लेकिन जब असली जनआंदोलन उठा, तब उसकी भूमिका दर्शक जैसी रही। वह आंदोलन का नेतृत्व नहीं कर पाया, केवल समर्थन देने पहुँचा।

यहीं उसकी सबसे बड़ी कमजोरी सामने आई।

आज का विपक्ष विरोध तो करता है, लेकिन भरोसा नहीं जगा पाता।

इंडिया गठबंधन की सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि उसे जोड़ने वाला धागा कोई साझा विचार नहीं, बल्कि केवल भाजपा विरोध है। चुनाव आते ही सीटों पर झगड़े शुरू हो जाते हैं। राज्यों में साथी दल एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी बन जाते हैं। "एक अनार, सौ बीमार" जैसी हालत हो जाती है।

नेतृत्व का सवाल भी अब तक अनसुलझा है।

राहुल गांधी कांग्रेस का चेहरा हैं, लेकिन ममता बनर्जी, अखिलेश यादव और दूसरे क्षेत्रीय नेता भी अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन छोड़ने को तैयार नहीं। जहाँ कई नाविक हों, वहाँ नाव अक्सर भँवर में फँस जाती है।

संगठन भी विपक्ष की कमजोर कड़ी है।

भाजपा ने दशकों तक बूथ स्तर तक अपना संगठन खड़ा किया। दूसरी ओर कांग्रेस सहित कई विपक्षी दल स्थानीय कार्यकर्ताओं, अनुशासन और जमीनी नेटवर्क की कमी से जूझ रहे हैं। कई राज्यों में गुटबाजी अलग सिरदर्द है।

वंशवाद भी विपक्ष के गले की हड्डी बना हुआ है।

अधिकांश बड़े विपक्षी दल अब भी परिवारों के इर्द-गिर्द घूमते हैं। नई पीढ़ी के नेताओं को आगे बढ़ने का अवसर सीमित दिखाई देता है। इसके उलट भाजपा खुद को कार्यकर्ता आधारित संगठन के रूप में पेश करने में सफल रही है। राजनीति में धारणा भी आधी लड़ाई जीत लेती है।

विपक्ष की एक और समस्या है कि उसके पास आलोचना तो बहुत है, लेकिन विकल्प कम हैं।

महँगाई, बेरोज़गारी, पेपर लीक और संस्थागत संकट जैसे मुद्दे वास्तविक हैं। लेकिन मतदाता केवल शिकायत नहीं, समाधान भी सुनना चाहता है। केवल सरकार को कोसने से चुनाव नहीं जीते जाते।

जन टिप्पणीकार प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी का मानना है कि लगातार चुनावी हार ने विपक्ष को गहरी निराशा में धकेल दिया है। उसका पूरा ध्यान केवल मोदी सरकार को हटाने पर केंद्रित हो गया है। कॉकरोच आंदोलन उसे एक सुनहरा अवसर लगा। लेकिन राजनीति में बाजी उसी की होती है जो समय रहते चाल बदल ले।

यहीं नरेंद्र मोदी ने अपनी राजनीतिक चतुराई दिखाई।

सरकार ने टकराव को लंबा नहीं खींचा। प्रदर्शनकारियों की मुख्य माँगें मान लीं। मंत्री ने इस्तीफा दिया। बातचीत हुई। आंदोलन का तत्काल कारण समाप्त हो गया।

इसे कहते हैं "साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।"

सरकार ने एक मंत्री खोया, लेकिन बड़ा राजनीतिक संकट टाल दिया। विपक्ष के हाथ का सबसे तेज़ हथियार भी कुंद हो गया। संसद में शोर चलता रहा, लेकिन जनता का ध्यान दूसरी ओर मुड़ चुका था।

इसका मतलब यह नहीं कि समस्याएँ खत्म हो गई हैं। परीक्षा प्रणाली में सुधार की ज़रूरत अब भी है। युवाओं की बेरोज़गारी और शिक्षा व्यवस्था पर सवाल भी बने हुए हैं। छात्रों का भरोसा वापस जीतना आसान नहीं होगा।

लेकिन फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि मोदी इस मुश्किल इम्तिहान से निकलने में कामयाब रहे हैं।

कॉकरोच जनता पार्टी ने साबित कर दिया कि आज का युवा केवल वोटर नहीं, एजेंडा तय करने वाली ताकत भी बन सकता है।

और विपक्ष के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है:

अगर कुछ छात्रों ने मीम और मोबाइल के दम पर वह कर दिखाया, जो अनुभवी नेता वर्षों में नहीं कर सके, तो असली आत्ममंथन किसे करना चाहिए: सरकार को या विपक्ष को?

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