Tuesday, April 21, 2026

 हवा का रुख बदल रहा!

2026 की सियासत में किसकी बाज़ी, किसकी मात?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

22 अप्रैल 2026

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हवा का मिज़ाज बदल रहा है। रंग भी। गलियों से लेकर गलीचों तक, चौपालों से लेकर चाय की दुकानों तक, एक हल्की-सी केसरिया आभा तैरती नजर आ रही है। सवाल यह नहीं कि हवा चल रही है या नहीं। सवाल यह है कि यह हवा किस दिशा में बह रही है, और किसे अपने साथ उड़ा ले जाएगी।

2026 के विधानसभा चुनाव अब सिर्फ चुनाव नहीं रहे। यह एक दौर का इम्तिहान बन गए हैं। असम, वेस्ट बंगाल, तमिल नाडु और केरलम जैसे अहम राज्यों में जो कुछ हो रहा है, वह आने वाले भारत की तस्वीर गढ़ रहा है। यहां जंग सिर्फ कुर्सी की नहीं है, बल्कि सोच, सियासत और समाज के बदलते रंगों की है।

एक तरफ नेशनल डेमोक्रेटिक एलायंस है, जिसकी बागडोर नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के हाथ में है। दूसरी तरफ विपक्ष है, जो अपने-अपने इलाकों में मजबूत तो है, मगर एकजुट नहीं। जैसे कोई बारात हो जिसमें बाजा तो बज रहा हो, मगर बाराती कायदे से न नाच रहे हैं, न गा रहे हैं।

NDA ने इस बार अपना दांव सोच-समझकर चला है। विकास, वेलफेयर, राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक पहचान का ऐसा कॉकटेल तैयार किया गया है, जो गांव के किसान से लेकर शहर के युवा तक, सबको छूता है। यह सिर्फ भाषणों की सियासत नहीं, बल्कि एक नैरेटिव की सियासत है। और सियासत में नैरेटिव वही जीतता है, जो दिल और दिमाग दोनों पर असर करे। महिला आरक्षण, परिसीमन, उत्तर दक्षिण खाई, सबका विकास बनाम क्षेत्रीय पहचान, भाषा, आदि का क्या असर पड़ेगा, ये मत गणना के बाद पता चलेगा।

असम की तस्वीर सबसे साफ नजर आती है। हिमांता बिस्वा सरमा ने यहां सियासत को जमीन से जोड़ा है। अवैध घुसपैठ, जमीन अतिक्रमण और सांस्कृतिक अस्मिता जैसे मुद्दों पर उनकी सख्ती ने एक खास संदेश दिया है। विकास योजनाओं के साथ यह सख्त रवैया NDA को यहां मजबूत बनाता दिख रहा है। ऐसा लगता है कि तीसरी बार सत्ता में वापसी की पटकथा लगभग लिखी जा चुकी है। विपक्ष यहां जैसे धुंध में रास्ता खोज रहा है, मगर मंज़िल अभी दूर है।

वेस्ट बंगाल में कहानी थोड़ी अलग है। ममता बनर्जी की पकड़ अब भी मजबूत है, मगर वक्त के साथ एंटी-इन्कम्बेंसी की हल्की दरारें दिखने लगी हैं। भारतीय जनता पार्टी यहां 2021 की जमीन पर नई फसल उगाने की कोशिश में है। मुद्दे भी बदल गए हैं। अब बहस सिर्फ ध्रुवीकरण की नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार, महिला सुरक्षा और बेरोजगारी की है। SIR के बाद अगर मतदाता बिना खौफ के वोट डालता है, तो नतीजे चौंका सकते हैं। BJP यहां दरवाजे तक पहुंच चुकी है। बस एक धक्का और।

तमिल नाडु में सियासत का रंग सबसे ज्यादा दिलचस्प है। द्रविड़ राजनीति के बीच अब नई कहानी लिखी जा रही है। द्रविड़ मुनेत्र काझागम के खिलाफ माहौल तो बन रहा है, मगर अभिनेता विजय की एंट्री ने खेल को त्रिकोणीय बना दिया है। तीन कोनों की इस लड़ाई में अक्सर वही जीतता है, जिसकी रणनीति सबसे मजबूत हो। यहां NDA को विपक्ष के बिखराव का सीधा फायदा मिलता दिख रहा है। सियासत में एक कहावत है, “जब नाव में छेद ज्यादा हों, तो डूबना तय होता है।” कोयंबटूर के गोपाल कृष्णन के मुताबिक 150 सीटें NDA को मिल सकती हैं, पिछली बार की गलतियों से सबक सीखा है, फील्डिंग बढ़िया सजाई है। 

केरलम में तस्वीर धीमी है, मगर बदलाव की आहट साफ सुनाई देती है। पारंपरिक तौर पर LDF और UDF के बीच सिमटी राजनीति में अब बीजेपी धीरे-धीरे अपनी जगह बना रही है। पिनाराई विजयन सरकार के खिलाफ हल्की नाराजगी NDA के लिए एक खिड़की खोलती है। यहां एक-दो सीटें भी बड़ी कहानी लिख सकती हैं। सियासत में कभी-कभी छोटी चिंगारी ही बड़ा शोला बन जाती है।

कुल मिलाकर तस्वीर यही कहती है कि NDA इस वक्त “फुल स्विंग” में है। मजबूत नेतृत्व, स्पष्ट संदेश और जमीनी संगठन उसकी सबसे बड़ी ताकत हैं। नरेंद्र मोदी का चेहरा अब भी सबसे बड़ा चुनावी ब्रांड बना हुआ है। उनके नाम पर वोट पड़ता है, यह बात अब किसी से छुपी नहीं।

विपक्ष की सबसे बड़ी परेशानी यह है कि वह रिएक्शन में खेल रहा है। उसके पास मुद्दे हैं, मगर एकजुट कहानी नहीं। जैसे शतरंज में सारे मोहरे हों, मगर खिलाड़ी की चाल ही उलझी हुई हो। राजनीति में सिर्फ विरोध काफी नहीं होता, विकल्प भी देना पड़ता है। और यही वह जगह है जहां विपक्ष लड़खड़ाता नजर आता है।

अब सबकी नजरें 4 मई पर टिकी हैं। यह तारीख सिर्फ नतीजों की नहीं होगी, बल्कि दिशा की भी होगी। यह तय करेगी कि देश की सियासत किस ओर मुड़ रही है।

एक बात साफ है। अब सियासत सिर्फ वादों की बाजीगरी नहीं रही। जनता अब सवाल पूछती है। हिसाब मांगती है। और जवाब भी चाहती है। यही लोकतंत्र की असली रूह है। और शायद यही वजह है कि इस बार हवा का रंग सिर्फ बदल नहीं रहा, बल्कि एक नई कहानी लिखने को बेचैन दिख रहा है।

Monday, April 20, 2026

 ताज के साए में बगावत की कलम: जब आगरा ने रानी लक्ष्मीबाई की लड़ाई को आवाज दी

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

22 अप्रैल 2026

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कभी सोचा है, आगरा सिर्फ संगमरमर की चमक नहीं, इतिहास की स्याही भी है? वही आगरा, जहाँ एक विदेशी कलम ने भारतीय स्वाभिमान की कहानी लिखी।

साल 1854 में, आगरा में बसे एक ऑस्ट्रेलियाई वकील और लेखक John Lang को एक असाधारण तलबनामा मिला। यह कोई आम खत नहीं था। झाँसी की रानी Rani Lakshmibai ने फारसी में, सुनहरे कागज पर लिखकर उन्हें बुलाया था। मामला संगीन था। East India Company “Doctrine of Lapse” के नाम पर झाँसी को हड़पना चाहती थी।

महाराजा Gangadhar Rao के निधन के बाद, रानी के दत्तक पुत्र दामोदर राव को वारिस मानने से कंपनी ने इनकार कर दिया। कानून का खेल था, मगर दांव पर एक रियासत की अस्मिता थी। रानी ने सुना था कि जॉन लैंग ने पहले लाला ज्योति प्रसाद का मुकदमा जीतकर कंपनी को मात दी है। यही भरोसा उन्हें आगरा तक खींच लाया।

रानी ने लैंग के लिए खास पालकी और सेवक भेजे। आगरा से झाँसी तक का सफर आसान नहीं था। रास्ता ग्वालियर से होकर जाता था। दो दिन की थकान, लेकिन मंजिल पर एक इतिहास इंतजार कर रहा था। झाँसी पहुंचकर लैंग ने रानी से मुलाकात की। यह सिर्फ वकील और मुवक्किल की भेंट नहीं थी। यह हक और हुकूमत का आमना-सामना था।

अपनी किताब Wanderings in India में लैंग ने इस मुलाकात का जीवंत चित्र खींचा है। उन्होंने रानी के आत्मविश्वास, उनके दरबार और छोटे दामोदर राव का जिक्र किया। वही मशहूर जज्बा, जिसे इतिहास ने अमर कर दिया :  “मैं अपनी झाँसी नहीं दूंगी।” यह सिर्फ एक वाक्य नहीं, आने वाले तूफान की दस्तक थी।

लैंग ने रानी की ओर से एक मजबूत पिटीशन तैयार की। उन्होंने तर्क दिए, कानून रखा, न्याय की गुहार लगाई। मगर कंपनी की अदालतें पहले ही फैसला लिख चुकी थीं। मुकदमा हार गया। लेकिन कहानी जीत गई। यह घटना Indian Rebellion of 1857 के  गदर या संग्राम से पहले की एक महत्वपूर्ण प्रस्तावना बन गई।

आगरा में जॉन लैंग का जीवन भी कम दिलचस्प नहीं था। 1842 में कलकत्ता आने के बाद उन्हें वह शहर रास नहीं आया। वे उत्तर भारत की ओर बढ़े ,  अंबाला, मेरठ और फिर आगरा। यहीं उन्होंने अपनी पहचान बनाई। वे हिंदी-उर्दू और फारसी में दक्ष थे। भारतीय मुवक्किलों के लिए वे अक्सर कंपनी के खिलाफ खड़े होते थे।

1845 में उन्होंने The Mofussilite नाम का अखबार शुरू किया। “मुफस्सिल” यानी छोटे शहरों की आवाज। यह अखबार अंग्रेजी हुकूमत पर तीखे व्यंग्य और सच्चाई के तीर चलाता था। कलकत्ता से शुरू हुआ यह सफर अंबाला, मेरठ होते हुए आखिरकार आगरा आकर ठहर गया। 1853 से 1859 तक यह आगरा से प्रकाशित होता रहा।

लैंग की कलम तलवार से तेज थी। वे कंपनी की नीतियों, अन्याय और भ्रष्टाचार को बेनकाब करते थे। नतीजा यह हुआ कि अंग्रेज अफसर उन्हें आंख की किरकिरी मानने लगे। लेकिन भारतीय समाज में उनकी इज्जत बढ़ती गई। वे एक विदेशी होकर भी हिंदुस्तान की आवाज बन गए।

जॉन लैंग की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। वे कभी ऑस्ट्रेलिया नहीं लौटे। करीब 22 साल भारत में रहे। महान लेखक Charles Dickens की पत्रिका Household Words में भी उन्होंने लेख लिखे। उन्हें हिमालय की वादियां इतनी भा गईं कि उन्होंने अपने अंतिम दिन लैंडौर, मसूरी के पास बिताए।

20 अगस्त 1864 को, मात्र 48 वर्ष की उम्र में उनका निधन हुआ। उन्हें मसूरी के कैमल्स बैक कब्रिस्तान में दफनाया गया। वक्त के साथ उनकी याद धुंधली पड़ गई थी, लेकिन 1964 में मशहूर लेखक Ruskin Bond ने उनकी कब्र को खोज निकाला। जैसे इतिहास ने फिर करवट ली, और लैंग की कहानी दोबारा जीवित हो उठी।

यह रिश्ता यहीं नहीं रुका। 2014 में, जब प्रधान मंत्री Narendra Modi ऑस्ट्रेलिया की संसद में बोले, तो उन्होंने जॉन लैंग का जिक्र किया। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री Tony Abbott को 1854 की उस पिटीशन की प्रति भेंट की, जो लैंग ने रानी लक्ष्मीबाई के लिए तैयार की थी। यह सिर्फ एक दस्तावेज नहीं, दो देशों के बीच साझा इतिहास की कड़ी थी।

आगरा को हम अक्सर ताजमहल तक सीमित कर देते हैं। लेकिन यह शहर सिर्फ इमारतों का नहीं, इरादों का भी है। जॉन लैंग जैसे “मुफस्सिलाइट” ने यहां रहकर अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई। उनकी वकालत, उनकी पत्रकारिता और रानी लक्ष्मीबाई से उनका जुड़ाव,  यह सब मिलकर आजादी की कहानी में एक अनसुना, मगर जरूरी अध्याय जोड़ते हैं।

यह कहानी याद दिलाती है कि सच और साहस की कोई सरहद नहीं होती। कभी-कभी, सबसे मजबूत आवाज दूर देश से आती है, और दिलों में घर कर जाती है।


 स्वच्छता मिशन की कामयाबी पर सवाल?

कब सीखेंगे "सफाई सबकी ज़िम्मेदारी है"

आगरा के हालात बदले हैं, पर मंजिल अभी दूर है

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

21 अप्रैल, 2026

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कभी आगरा में कदम रखते ही नाक सिकुड़ जाती थी। हवा में बदबू का एक ऐसा साया था, जो हर गली, हर मोड़ पर पीछा करता था। नालियां जैसे सड़ांध की दास्तान सुनाती थीं।

बड़े नाले, मंटोला, भैरों, नदी में खुलते हैं  और यमुना, जो कभी शाही अक्स का आईना थी, को एक बीमार, सुस्त दरिया में तब्दील कर दिया हैं।।

कुछ वर्षों पहले तक, कूड़े के पहाड़ शहर की तक़दीर पर तंज कसते खड़े रहते थे। लगता था, ये गंदगी कभी नहीं हटेगी। शहर जैसे अपने ही बोझ तले दबा हुआ था।

आज वही आगरा कुछ और दिखता है। हवा में एक अजीब सी साफ़गोई है। सड़कें झाड़ू की लय में पहले की अपेक्षा साफ दिखती हैं। और कुबेरपुर का कूड़ा घर, जो कभी शहर की शर्म था, अब सुधरा दिखता है, कूड़े से खाद बनने लगी है। यमुना किनारा रोड पर भैंसों के विचरण पर प्रभावी रोक ने मदद की है। आगरा नगर निगम ने इस क्षेत्र में अच्छा कार्य किया है। लेकिन यह बदलाव यूं ही नहीं आया। यह एक लंबे संघर्ष की कहानी है, जिसे स्वच्छ भारत मिशन ने आकार दिया।

आगरा कोई मामूली शहर नहीं। यह दुनिया का एक अब्बल टूरिस्ट डेस्टिनेशन है, जहां हर साल लाखों सैलानी आते हैं। करीब 44 लाख की आबादी वाला यह शहर दोहरी ज़िम्मेदारी उठाता है। एक तरफ अपने बाशिंदों के लिए साफ़ रहना, दूसरी तरफ दुनिया के सामने अपनी सूरत पेश करना।

साल 2014 से 2019 तक की शुरुआत इज़्ज़त से जुड़ी थी। घर-घर शौचालय बने। मोहल्लों में सामुदायिक टॉयलेट खड़े हुए। खुले में शौच की मजबूरी धीरे-धीरे कम हुई। 2019 तक आगरा ने खुद को खुले में शौच से मुक्त घोषित कर दिया। यह एक बड़ी कामयाबी थी, मगर मंज़िल नहीं। एक वक्त था जब यमुना आरती स्थल के सामने ही लोग खुले में बेशर्मी से निपटते थे, अब सफाई कर्मी अलर्ट रहते हैं।

आगरा शहर की असल जंग तो कूड़े के साथ थी। कुबेरपुर इसका सबसे बड़ा ज़ख्म था। करीब 19 लाख मीट्रिक टन कूड़ा वहां सालों से सड़ रहा था। बायोमाइनिंग और बायोरेमेडिएशन के जरिए उस ज़मीन को वापस हासिल किया गया। आज वहीं दस एकड़ में मियावाकी जंगल लहलहा रहा है। पास ही  प्रोसेसिंग प्लांट लगे हैं। यानी जो कचरा कभी मुसीबत था, वही अब उपयोगी उत्पाद बन रहा है।

शहर का ढांचा भी बदला। हर वार्ड में डोर-टू-डोर कलेक्शन शुरू हुआ। बड़े-बड़े मटेरियल रिकवरी सेंटर रोज़ सैकड़ों टन कचरा छांटते हैं। सीवर और ट्रीटमेंट प्लांट के लिए “वन सिटी, वन ऑपरेटर” मॉडल लागू हुआ। सिस्टम में एक तरह की रवानी आई।

आंकड़े भी गवाही देते हैं। 2024-25 के स्वच्छ सर्वेक्षण में आगरा ने 12,500 में से 11,532 अंक हासिल किए। शहर को 5-स्टार गार्बेज फ्री का दर्जा मिला।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।

चमकती सड़कों से हटकर जब आप पुराने शहर की तंग गलियों में जाते हैं, तो तस्वीर  धुंधली हो जाती है। कागज़ों में भले 100% कचरा अलग-अलग करने का दावा हो, हकीकत में गीला-सूखा कचरा अक्सर एक साथ ही फेंका जाता है। प्रोसेसिंग प्लांट हैं, मगर उनकी पूरी क्षमता का इस्तेमाल हमेशा नहीं हो पाता।

और यमुना अब भी चुपचाप सब देख रही है। गंदा पानी आज भी उसमें गिरता है। किनारे साफ़ हैं, मगर दरिया अब भी बीमार है। यह एक अधूरी कहानी का सबसे दर्दनाक हिस्सा है।

सार्वजनिक शौचालय बने जरूर, मगर कई जगह उनकी हालत ठीक नहीं। झुग्गी बस्तियों में सफाई का इंतज़ाम डगमगाता रहता है। सफाई कर्मचारी, जो इस पूरी व्यवस्था की रीढ़ हैं, उन्हें अक्सर सुरक्षा के पूरे साधन नहीं मिलते। तनख्वाह में देरी भी एक आम शिकायत है।

सबसे बड़ा मसला शायद सिस्टम नहीं, लोगों का रवैया है। सफाई को आज भी ज़्यादातर लोग सरकारी काम समझते हैं, अपना नहीं। घर के अंदर चमक-दमक, मगर कचरा चुपचाप बाहर सड़क पर सरका देना; यह दोहरी सोच अब भी ज़िंदा है। मोहल्लों में बैठकर शिकायतें तो खूब होती हैं, मगर जब हाथ बंटाने की बात आए, तो खामोशी छा जाती है। जागरूकता की बातें सुनने में अच्छी लगती हैं, मगर अमल के वक्त लोग किनारा कर लेते हैं। यह बेपरवाही, यह उदासीनता, पूरी मेहनत पर पानी फेर देती है।

यह तस्वीर सिर्फ आगरा की नहीं, पूरे मुल्क की झलक है। 2014 के बाद देश में कचरा प्रोसेसिंग 16% से बढ़कर 80% से ऊपर पहुंची। यह छोटी बात नहीं।

मगर दूसरी पारी, 2021 से 2026, थोड़ी मुश्किल दिख रही है। पूरे देश में कचरे का सही बंटवारा अभी भी 60% से नीचे है। और आने वाले साल में बजट में कटौती की बात एक नया सवाल खड़ा करती है। क्या यह मिशन अपनी रफ्तार बनाए रख पाएगा?

शुरुआत में गांधी जी के चश्मे वाला प्रतीक लोगों को जोड़ता था। एक जज़्बा था। मगर अब खतरा यह है कि अगर सिर्फ ढांचा बने और आदतें न बदलें, तो लोग इस मुहिम से दूर हो सकते हैं।

आगे का रास्ता साफ़ है, मगर आसान नहीं। अब जरूरत बड़े अभियानों की नहीं, रोज़ की आदतों की है।

हर वार्ड में कचरे का निपटान हो, तो लैंडफिल पर दबाव कम होगा। सफाई कर्मचारियों को इज़्ज़त, सुरक्षा और वक्त पर मेहनताना मिले, तो व्यवस्था मजबूत होगी। फंडिंग ऐसे हो, जिसमें नतीजों को अहमियत मिले, सिर्फ गिनती को नहीं।

सबसे अहम बात, सफाई सरकार का काम नहीं, लोगों की आदत बने।

आगरा ने साबित किया है कि बदलाव मुमकिन है।  मगर असली इम्तिहान अब है।

2014 का आगरा और आज का आगरा।  फर्क तो दिखता है। मगर आज का आगरा और एक पूरी तरह से स्वस्थ, टिकाऊ शहर; इस फासले को पाटना अभी बाकी है।

शहर एक दिन में साफ़ नहीं होता। यह रोज़ के छोटे-छोटे अमल से चमकता है। अगर ये सिलसिला टूटा, तो बदबू फिर लौट आएगी।

और इस बार, जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की नहीं होगी। यह हर उस हाथ की होगी, जिसने कचरा फेंका और मुंह फेर लिया।


Sunday, April 19, 2026

 क्या भारत में चुनाव जीतने का असली पासपोर्ट आज भी जाति का प्रमाणपत्र है?

क्यों जाति गणना ?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

20, अप्रैल 2026

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क्या सचमुच भारत में चुनाव जीतने के लिए जाति का प्रमाण पत्र ही असली पासपोर्ट है। सवाल चुभता है, पर जवाब बहुतों को मालूम है। सच यह है कि हाँ, आज भी काफी हद तक यही हकीकत है। लोकतंत्र का मैदान खुला है, पर खेल के नियम अब भी पुरानी पहचानें तय करती हैं।

हमारे संविधान ने उम्मीद का दरवाजा खोला था। मंशा साफ थी। सदियों के अन्याय को तोड़ना था, बराबरी की राह बनानी थी। आरक्षण को एक अस्थायी सहारे की तरह सोचा गया था। जैसे टूटी टांग पर प्लास्टर। ठीक होते ही हट जाना चाहिए। संविधान सभा की बहसों में यह भावना बार बार झलकी। अनुच्छेद 15(4) और 16(4) ने पिछड़ों को आगे लाने का रास्ता दिया। पर समय सीमा तय नहीं हुई। शायद भरोसा था कि समाज खुद बदल जाएगा। सर्वोच्च न्यायालय ने भी कई बार संकेत दिया कि यह व्यवस्था हमेशा के लिए नहीं हो सकती। पर राजनीति ने इस भरोसे को धीरे धीरे अपनी जरूरत के हिसाब से ढाल लिया।

राजनीति की भाषा आदर्शों से नहीं, अंकों से चलती है। यहाँ दर्द भी गिना जाता है, उम्मीद भी तौली जाती है। जो एक पुल होना था, वह मोर्चा बन गया। जो एक उपचार था, वह पहचान बन गया। पढ़ा लिखा शहरी मतदाता भी इस जाल से बाहर नहीं निकल पाया। फर्क बस इतना है कि अब जाति की गणित और ज्यादा परिष्कृत हो गई है। डेटा शीट में दर्ज है। एक्सेल फाइल में सजी है। भावनाएं भी अब कैलकुलेट होती हैं।

शुरुआत में सोच कुछ और थी। सुधारकों ने इसे एक तेज सर्जरी की तरह देखा। एक ऐसा वार जो बराबरी का रास्ता साफ कर दे। लक्ष्य था कि जाति धीरे धीरे अप्रासंगिक हो जाए। पर जमीन पर आते ही कहानी बदल गई। राजनीति ने इस औजार को हथियार बना दिया। वोट बैंक की फैक्ट्री चल पड़ी। पहचानें संगठित हुईं। गुस्सा दिशा पा गया।

राम मनोहर लोहिया ने पिछड़ों की राजनीति को विचार दिया। उनका नारा पिछड़ा पावे सौ में साठ केवल शब्द नहीं था। यह सामाजिक संतुलन का खाका था। पर जैसे ही यह जमीन पर उतरा, वोट की भाषा में बदल गया। आदर्श पीछे छूट गए। गणित आगे आ गया।

फिर आया वह मोड़ जिसने देश की राजनीति की धुरी ही बदल दी। वी.पी. सिंह की सरकार ने 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू कीं। अन्य पिछड़ा वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण मिला। देश सड़कों पर उतर आया। विरोध हुआ। आत्मदाह तक हुए। सरकार गिरी। पर एक नया राजनीतिक युग जन्म ले चुका था। उत्तर भारत की राजनीति ने नई करवट ली। क्षेत्रीय दल उभरे। जाति अब सिर्फ पहचान नहीं रही, सत्ता की सीढ़ी बन गई।

इसी सीढ़ी पर चढ़कर मायावती ने 2007 में उत्तर प्रदेश में इतिहास रचा। दलित, ब्राह्मण, मुस्लिम, कई धाराएं एक साथ आईं। 206 सीटों का बहुमत मिला। संदेश साफ था। जाति को जोड़कर भी सत्ता पाई जा सकती है। यह राजनीति का नया व्याकरण था।

दक्षिण भारत में कहानी का रंग अलग दिखता है, पर धागा वही है। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने गैर ब्राह्मण राजनीति को संस्थागत रूप दिया। तमिलनाडु में 69 प्रतिशत आरक्षण दशकों पुराने सामाजिक समझौते की तरह है। सत्ता का चक्र वहीं घूमता है। कर्नाटक में लिंगायत और वोक्कालिगा समीकरण ने दशकों तक राजनीति की चाबी थामे रखी। एच.डी. देवेगौड़ा का उदय इसी गणित का नतीजा था।

आज चुनाव विचारों से कम, आंकड़ों से ज्यादा तय होते हैं। हर पार्टी के पास जाति का पूरा नक्शा है। किस सीट पर कौन भारी है, किसे टिकट देना है, किसे क्या वादा करना है। उत्तर प्रदेश इसका सबसे खुला उदाहरण है। यादव बहुल इलाके, दलित बहुल क्षेत्र, हर जगह अलग रणनीति। विचारधारा अक्सर परदे के पीछे चली जाती है। मंच पर जाति खड़ी रहती है।

कम्युनिस्टों ने वर्ग संघर्ष का सपना देखा था। लगा था कि आर्थिक बराबरी आएगी तो जाति खुद मिट जाएगी। पर बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में उनके आंदोलन भी जातियों में बंट गए। केरल और पश्चिम बंगाल में कुछ सफलता मिली, पर जाति की छाया पूरी तरह कभी नहीं हटी। भारतीय समाज में जाति रोजमर्रा का सच है। शादी से लेकर जमीन तक, रिश्तों से लेकर अवसर तक, हर जगह इसकी मौजूदगी है। वर्ग की लड़ाई, ठोस लाभ के सामने कमजोर पड़ गई।

आज की तस्वीर साफ है। शिक्षा बढ़ी है। शहर फैले हैं। नौकरियों का स्वरूप बदला है। पर जाति अब भी जिंदा है। क्योंकि यह सीधे लाभ से जुड़ी है। डिग्री के साथ साथ जाति का प्रमाण पत्र अब भी जरूरी है। राजनीति के लिए यह सोने की खान है। हर चुनाव से पहले नई मांगें उठती हैं। नए वादे किए जाते हैं। नया ध्रुवीकरण होता है।

कहानी यहीं नहीं रुकती। एक ही जाति के भीतर भी असमानता है। कुछ उप समूह सारे लाभ ले जाते हैं। बाकी पीछे छूट जाते हैं। यह एक चक्र है जो खुद को पोषित करता है। जाति वोट देती है। वोट सत्ता देता है। सत्ता जाति को बनाए रखती है।

अब सवाल यह नहीं कि आरक्षण सही है या गलत। सवाल यह है कि क्या यह साधन रहा या लक्ष्य बन बैठा। क्या हम मंजिल तक पहुंचे या रास्ते में ही डेरा डाल दिया।

जाति की गणना की मांग इसी उलझन से निकली है। 2023 में बिहार के सर्वेक्षण ने तस्वीर का एक हिस्सा दिखाया। पिछड़े और अति पिछड़े मिलाकर करीब 63 प्रतिशत निकले। अब केंद्र भी अगली जनगणना में जाति आंकड़े शामिल करने की तैयारी में है। यह डेटा नीति बनाने में मदद कर सकता है। पर खतरा भी उतना ही बड़ा है। अगर इसे केवल नए आरक्षण की मांग और नए विभाजन के लिए इस्तेमाल किया गया, तो दरार और गहरी होगी।

भारतीय लोकतंत्र आज भी एक नई भाषा की तलाश में है। एक ऐसा भरोसा जो जाति से ऊपर उठ सके। जब तक वह भाषा नहीं मिलती, मतपत्र पर जाति की स्याही सबसे गहरी रहेगी। यह स्याही आसानी से नहीं धुलेगी। पर इसे धोए बिना तस्वीर साफ भी नहीं होगी।

सवाल फिर वही खड़ा है। पासपोर्ट बदलना है या सिर्फ कवर। जवाब हमें ही लिखना है।

Saturday, April 18, 2026

 हेरिटेज डे हर साल 18 अप्रैल को मनाया जाता है। इसे International Day for Monuments and Sites भी कहते हैं। इसका उद्देश्य दुनिया भर की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और प्राकृतिक धरोहरों ;  स्मारकों, पुरातत्व स्थलों और साइटों ,  के संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाना है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हमारी विरासत कितनी मूल्यवान है, लेकिन कितनी नाजुक और कमजोर भी। खासकर 2026 में, जब थीम living heritage और आपातकालीन संरक्षण पर केंद्रित है, तो यह और भी प्रासंगिक हो जाता है।

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हेरिटेज डे: संगमरमर से आगे, आगरा की रूह पुकारती है

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

18 अप्रैल 2026

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आगरा की दास्तान संगमरमर से शुरू नहीं होती। और न ही वहीं खत्म होती है।  

यह कहानी तंग गलियों में सांस लेती है, मंदिरों की घंटियों में गूंजती है, हुनरमंदों की उंगलियों में चमकती है और बाजारों की भीड़ में जीवंत हो उठती है। हेरिटेज डे पर वक्त आ गया है कि इस शहर से पर्दा उठाया जाए। आगरा कोई एक स्मारक का शहर नहीं है, बल्कि सदियों की तहज़ीब का जीवंत संगम है।  

दुनिया इसे अक्सर एक ही तस्वीर में कैद कर लेती है ; सफेद संगमरमर की वह अनुपम इमारत, ताज महल, मोहब्बत की निशानी और भारत की पहचान। कोई मुसाफिर पूछे तो जवाब फौरन आता है: “ताज महल।” दिल्ली से सैलानी आते हैं, सेल्फी लेते हैं और लौट जाते हैं। इस तरह सदियों का शहर एक लम्हे में सिमट जाता है। एक ठहराव बन जाता है, कोई पूरी कहानी नहीं।  

यह तंग नज़र एक गहरी सच्चाई को छुपाती है। आगरा सिर्फ मुगल राजधानी नहीं था। यह एक सांस्कृतिक संगम था; जहाँ फ़ारसी नज़ाकत हिंदुस्तानी रूह से मिली, इबादत हुनर से टकराई और ताकत शायरी बन गई। जो बना, वह सिर्फ इमारतें नहीं थीं ; एक पूरी तहज़ीब थी, जो आज भी जीवित है, लेकिन अक्सर अनसुनी रह जाती है।


ताजगंज की तंग गलियों में जाइए। ज़रा कान लगाकर सुनिए ,  पत्थर पर चलती छैनी की धीमी, लयबद्ध आवाज़ आएगी। यह है पच्चीकारी (पार्चिन कारी या pietra dura)  पत्थरों में सांस भरने का जादुई हुनर। शाहजहाँ के ज़माने में जन्मा यह फन सब्र और सटीकता की इबादत है। लैपिस लाजुली, कार्नेलियन, मलाकाइट, जेड और अन्य बारीक पत्थरों को तराशा जाता है, जड़ा जाता है और इतनी महीन चमक दी जाती है कि वे फूलों और लताओं की तरह जीवंत लगने लगते हैं।  

यह फैक्ट्री का काम नहीं। यह खानदानी विरासत है। बाप-बेटे, मां-बेटी, पीढ़ी दर पीढ़ी यह हुनर संभाला जाता है। कारखाने मदरसों में बदल जाते हैं, जहां वक़्त ठहर सा जाता है। लेकिन चुनौतियां कम नहीं। नई पीढ़ी तेज़ कमाई की ओर खिंच रही है। पुराना हुनर फीका पड़ रहा है। फिर भी कई कारीगर डटे हुए हैं, क्योंकि उनके लिए विरासत सिर्फ याद नहीं ,  रोज़ी-रोटी और आत्मसम्मान है।

इसी तरह करघों पर कालीन बुनते हैं। फ़ारसी नक्शे हिंदुस्तानी रंगों में ढलते हैं। हर गांठ अतीत को वर्तमान से जोड़ती है। साथ ही ज़री-ज़र्दोज़ी, संगमरमर की नक्काशी और अन्य शिल्प भी जीवित हैं।


अगर स्मारक जमी हुई तारीख़ हैं, तो आगरा के बाजार उसके जीवंत रंगमंच हैं। सदर बाजार में कदम रखिए  हवा में कबाब और मुगलई व्यंजनों की खुशबू, सौदेबाज़ी की आवाज़ें और हंसी की गूंज। फिर किनारी बाजार की तंग गलियों में खो जाइए ,  रंग-बिरंगे कपड़े, छनकती ज्वेलरी, मसालों की महक और चमड़े के जूतों की दुकानें।  

यहां विरासत दिखाई नहीं जाती ;  जी जाती है। दुकानदार दो ग्राहकों के बीच इतिहास सुना देते हैं। कारीगर अपने हुनर का राज़ खोल देते हैं। ये बाजार म्यूज़ियम नहीं, दिल की धड़कन हैं।


आगरा की रूह सिर्फ रौनक में नहीं, इबादत में भी बसी है। मनकामेश्वर मंदिर (Rawatpara, आगरा किला के पास) में घंटियां सदियों की दुआएं दोहराती हैं। यह शहर के चार प्राचीन शिव मंदिरों में से एक है, जिसकी कथा द्वापर युग से जुड़ी है ,  भगवान शिव ने यहां विश्राम किया था, जब कृष्ण मथुरा में जन्मे थे। भक्त शिव से मनोकामनाएं मांगते हैं।

करीब 70 किमी दूर यमुना किनारे बटेश्वर मंदिर समूह है ,  100 से अधिक शिव मंदिरों का प्राचीन परिसर (कई अब भी खड़े हैं), जो गुरजरा-प्रतिहार काल से जुड़ा है और ASI द्वारा पत्थर दर पत्थर पुनर्स्थापित किया गया है। यह जगह शांति और आस्था का अनूठा संगम है।

और फिर राधा स्वामी समाधि (सोमी बाग) ; संगमरमर में ढली एक शांत, आधुनिक आस्था। खामोशी यहां शब्दों से ज़्यादा बोलती है। यहां विरासत सिर्फ देखी नहीं जाती, महसूस की जाती है।


लेकिन सच्चाई थोड़ी कड़वी है। आगरा की कहानी अधूरी सुनाई जाती है। एक स्मारक चमकता है, बाकी साए में रह जाते हैं। ताज के संरक्षण के नियम ज़रूरी हैं, लेकिन इन्होंने आसपास की सांसें भी थाम ली हैं। ताजगंज के कारखाने सिमट गए, होटल ठहर गए, स्थानीय कारीगरों के मौके कम हो गए। शाम ढलते ही शहर जैसे सो जाता है।

सबसे बड़ा खतरा अपनापन का खत्म होना है। कई स्थानीय लोग इन धरोहरों को अब “अपना” नहीं मानते। जब रिश्ता टूटता है, तो हिफाजत भी कमज़ोर पड़ती है। विरासत बोझ बन जाती है, नेमत नहीं रहती। पर्यटन के दबाव से हुनर प्रभावित हो रहा है ;  बाजार कमजोर, कच्चा माल महंगा, स्वास्थ्य जोखिम और युवा पीढ़ी का पलायन।


इस हेरिटेज डे पर आगरा को नई कहानी चाहिए। छोटे-छोटे कदम बड़े बदलाव ला सकते हैं:

- कारीगरी के ट्रेल्स और वर्कशॉप्स बनें, जहां सैलानी खुद पच्चीकारी सीख सकें।

- आध्यात्मिक सर्किट विकसित हों — मनकामेश्वर, बटेश्वर, यमुना घाट और सोमी बाग एक धागे में पिरोए जाएं।

- शाम के बाजार सांस्कृतिक मेलों में बदलें, जहां हुनर, खानपान और कहानियां एक साथ जी सकें।

- स्कूलों में स्थानीय इतिहास पढ़ाया जाए। युवा अपनी कहानियां दर्ज करें। समुदाय खुद संरक्षण की कमान संभाले।

- सैलानियों को भी बदलना होगा — जल्दबाजी कम, गहराई ज़्यादा। स्थानीय हुनर, खानपान (पेठा, दालमोठ) और उत्पाद (चमड़े के जूते, हैंडीक्राफ्ट्स, फाउंड्री, ग्लास) खरीदें।

आगरा के उद्योग भी विरासत का हिस्सा हैं ; चमड़े और जूते का विश्व प्रसिद्ध कारोबार, पेठा-दालमोठ, हैंडीक्राफ्ट्स, फाउंड्री और ग्लास वर्क। ये सब मिलकर आगरा को पूरा बनाते हैं।

आगरा एक कहानी नहीं ;  कई किस्सों का शहर है। यह झुके हुए कारीगर का सब्र है, मंदिर की घंटी की गूंज है, बाजार की पुकार है। यह शोर भी है, सुकून भी है। यह सिलसिला है, जो सदियों से चल रहा है।

इस हेरिटेज डे पर सवाल सीधा है:  

क्या हम सिर्फ दिखावे के पीछे भागते रहेंगे? या पूरी तस्वीर देखेंगे?  

क्योंकि आगरा ध्यान नहीं मांगता। समझ मांगता है।  

जब आप इसे समझ लेते हैं, तो आगरा सिर्फ देखा नहीं जाता ;  दिल में बस जाता है।

यह शहर पत्थर से ज़्यादा अपनी कहानियों, हुनर, खानपान और रूह से बना है। इसे पूरा देखिए, पूरा जीिए। विरासत सेल्फी नहीं, एक गहरा रिश्ता है।

Friday, April 17, 2026

 उत्तर भारत की लुप्त हो रही छत संस्कृति:

वो गर्मी की रातें!

छतों का आसमान: जब रातें इश्क़ लिखती थीं और मोहल्ले एक जान हो जाते थे

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बृज खंडेलवाल द्वारा

19 अप्रैल 2026

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शाम ढलती नहीं थी। बस ऊपर खिसक जाती थी। घर की धड़कन सीढ़ियाँ चढ़कर छत पर आ बैठती थीं।

दिन भर की लू बदन को झुलसा देती। दीवारें तवे की तरह तपतीं। हवा भी जैसे रूठ जाती। मगर जैसे ही सूरज थककर ढलता, आसमान बैंगनी चादर ओढ़ लेता। और उसी पल, उम्मीद का एक दरवाज़ा खुलता; छत का दरवाज़ा। वो छत सिर्फ छत नहीं थी। वो जिंदगी का खुला कमरा थी।

तैयारियाँ किसी छोटे त्योहार जैसी होतीं। बाल्टियों में पानी भरा जाता। लोटे से छिड़काव शुरू होता। गरम फर्श “छssss” की आवाज़ के साथ ठंडा पड़ता। मिट्टी की सोंधी खुशबू उठती, जैसे धरती ने इत्र लगा लिया हो। बिना बारिश की बरसात।

फिर चारपाइयाँ निकलतीं। डोरी से बुनी, हल्की, मगर भरोसेमंद। उन पर सफेद सूती चादरें बिछतीं। तकियों के नीचे पंखे दबे रहते, एहतियातन। अगर हवा फिर से नाराज़ हो जाए तो?

अँधेरा उतरते ही छत बदल जाती। जगह से एहसास बन जाती। न टीवी। न मोबाइल। बस लोग… और आसमान। बच्चे पीठ के बल लेट जाते। तारे गिनते।

“देखो, वो सप्तऋषि!”

“अरे, वो टूटता तारा!”

हँसी हवा में उछलती। कोई आकाशगंगा जोड़ने में लगा। कोई दुआ माँग रहा। और दादी की आवाज़, धीमी, मगर जादुई, रात को कहानी में बदल देती। जिन्न आते। राजा जाते। भूत हँसते। और हम, नींद और ख्वाब के बीच झूलते रहते।

नीचे कमरों में घुटन थी। ऊपर छत पर राहत। नीचे सन्नाटा था। ऊपर गुफ़्तगू।

सबसे खूबसूरत रिश्ता था, छतों का रिश्ता। दीवारें थीं, मगर बस नाम की। एक छत से दूसरी छत, बस एक आवाज़ की दूरी पर।

“भाभी, ज़रा नमक देना!” “आज क्या बना?” “अरे सुनो तो…”

आवाज़ें उड़तीं। हँसी पार जाती। पूरा मोहल्ला एक साँस में जीता। जैसे हर घर, एक ही घर हो।

खाना भी छत पर ही। सादा, मगर दिल का। और फिर असली सितारे; आम और खरबूजे। घंटों पानी में डूबे फल। ठंडे, मीठे, रस से भरे। फाँकें कटतीं। रस टपकता। हाथ चिपचिपे। दिल खुश।

कोई औपचारिकता नहीं। कोई दूरी नहीं। बस बाँटना… और साथ होना।

कहीं कोने में ट्रांजिस्टर खड़खड़ाता। कभी आकाशवाणी। कभी मोहम्मद रफ़ी। गाना एक घर से उठता, पूरे मोहल्ले का हो जाता। कहीं दूर मंदिर की घंटी। बीच में बच्चों की हँसी। यही था असली संगीत।

हर रात हल्की नहीं होती थी। कुछ रातें भारी भी होतीं। बंटवारे की यादें। बिछड़े घरों की कसक।

कोई नानी आसमान को ताकती रहती। जैसे पुराने घर की छत वहीं कहीं छुपी हो। खुले आकाश में उसे सुकून मिलता। चार दीवारें उसे कैद लगतीं।

मगर ज़्यादातर रातें जिंदा थीं। नंगे पैर दौड़ते बच्चे। जुगनू पकड़ते हाथ। और जवान दिल… उनके लिए छत सबसे प्यारी जगह थी। नीची मुँडेर। ऊँचे अरमान। एक नज़र उधर। एक मुस्कान इधर।

चारपाई ठीक करने का बहाना। आसमान देखने का बहाना। मोहब्बत अपनी राह खुद बना लेती। ज़्यादा जगह नहीं चाहिए होती उसे। बस एक छत… और थोड़ी सी हवा।

सिनेमा ने भी इन छतों के जादू को खूब पकड़ा। Garam Hawa की उदास छतें, जहाँ यादें भी सोती थीं और दर्द भी जागता था। Delhi-6 की जुड़ी छतें, जहाँ दोस्ती और मोहब्बत एक ही हवा में सांस लेते थे। Vicky Donor की हल्की-फुल्की रातें, जहाँ नजरें चुपके से मिलती थीं। और Manmarziyaan के बेचैन दिल, जिन्हें छतों पर खुला आसमान मिलता था। फिल्मों ने जो दिखाया, वो कोई कल्पना नहीं थी। वो हमारे मोहल्लों की रोज़मर्रा की हकीकत थी। वो सिनेमा नहीं था। वो हमारी जिंदगी थी। हर मोहल्ला एक कहानी था। हर छत, एक राज़।

रिटायर्ड मास्साब विश्वास सर कहते हैं, “खाने के बाद सब ऊपर आ जाते थे। नानी पंखा झलतीं। अब्बा किस्से सुनाते। अम्मा लोरी गाती। कहीं से चमेली की खुशबू आती। और कोई आशिक़… चुपके से दिल की बात कह जाता।”

उषा दादी हँसकर जोड़ती हैं, “छत हर घर को थिएटर बना देती थी। जहाँ खुशी भी खेलती, ग़म भी… और रिश्ते भी।”

उन रातों में जादू था। न स्क्रीन की नीली रोशनी। न मशीनों का शोर। बस तारे। कभी टूटते हुए। और सबकी एक साथ निकली आवाज़: “ओह!” दिन की लू, रात में लोरी बन जाती। हवा थपकी देती। नींद आ जाती।

फिर वक्त बदला। छतें खाली होने लगीं। एसी आ गया। दरवाज़े बंद। खिड़कियाँ सील। हवा भी अब मशीन से आने लगी। मुँडेरें ऊँची हो गईं। रिश्ते नीचले। पड़ोसी दिखते नहीं। आवाज़ें सुनाई नहीं देतीं।

और हाँ, बंदरों ने भी कब्ज़ा कर लिया।

छत अब सुकून नहीं, जोखिम लगती है। अब कोई चारपाई नहीं बिछाता।कोई तारे नहीं गिनता। कोई दादी की कहानी नहीं सुनता।

बस स्क्रीन है। और स्क्रीन के पीछे… एक लंबी खामोशी। मगर यादें जिंदा हैं। गरम हवा जब चलती है, कुछ फुसफुसाती है: “याद है वो रातें? जब आसमान अपना था?”


Thursday, April 16, 2026

 भोर की हल्की गुलाबी रोशनी जैसे ही गोवर्धन परिक्रमा मार्ग को छूती है, घंटियों की ध्वनि और “राधे-राधे” की गूंज हवा में तैरती है। पर उसी हवा में एक कड़वी सच्चाई भी घुली होती है,  तीखी बदबू, जो श्रद्धा के इस पवित्र अनुभव को झकझोर देती है। भक्ति और बेबसी यहाँ साथ-साथ चलती हैं।

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ज्यादातर तीर्थ स्थलों की सबसे बड़ी समस्या है: हंगना

पर्याप्त संख्या में जब पब्लिक शौचालय हैं ही नहीं, तो जाएं तो जाएं कहां?

बृज का स्वच्छता संकट: हर साल 10 करोड़ श्रद्धालु, पर न के बराबर उपयोगी शौचालय

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बृज खंडेलवाल द्वारा

18 अप्रैल, 2026

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श्री कृष्ण और राधा रानी के प्रति अटूट आस्था लेकर हर दिन हजारों श्रद्धालु वृंदावन, मथुरा, गोवर्धन, बरसाना, गोकुल और नंदगांव की ओर खिंचे चले आते हैं। त्योहारों पर यह संख्या सैलाब बन जाती है। आस्था का यह समुद्र हर साल और गहरा होता जा रहा है।

आंकड़े भी यही कहानी कहते हैं। 2023 में मथुरा-वृंदावन में लगभग 7.9 करोड़ पर्यटक आए। 2024 में यह आंकड़ा 9 करोड़ पार कर गया। 2025 तक पूरे बृज क्षेत्र में श्रद्धालुओं की संख्या 10 करोड़ से अधिक हो गई। लेकिन इस बढ़ती भीड़ के साथ जो नहीं बढ़ा, वह है बुनियादी स्वच्छता ढांचा। साफ-सुथरे और चालू सार्वजनिक शौचालय आज भी गिनती के हैं, और जो हैं, वे अक्सर बदहाल।

अब यह समस्या केवल असुविधा नहीं रही। यह जन-स्वास्थ्य का गंभीर खतरा बन चुकी है। खुले में शौच से न केवल बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है, बल्कि पवित्र यमुना और घाट भी प्रदूषित हो रहे हैं। आस्था की यह भूमि अब गंदगी के बोझ तले कराह रही है।

गोवर्धन और मानसी गंगा क्षेत्र इसका सबसे सटीक उदाहरण हैं। 21 किलोमीटर की परिक्रमा मार्ग पर लाखों श्रद्धालु दिन-रात चलते हैं। लेकिन शौचालय की सुविधा न के बराबर है। सुबह का दृश्य चौंकाने वाला होता है, लोग खेतों और रास्तों के किनारे मजबूरी में शौच करते दिखते हैं।

गोवर्धन के बुजुर्ग पंडा बिरजो बाबा कहते हैं, “यह दृश्य बहुत अपवित्र है। धर्मशालाओं में कुछ शौचालय हैं, पर उनकी हालत खराब है। प्रशासन केवल तमाशा देख रहा है।”

मानसी गंगा और अन्य पवित्र कुंडों की स्थिति भी बेहतर नहीं। खुले में शौच से इनका जल दूषित हो रहा है। यह प्रदूषण अंततः यमुना तक पहुंचता है, जिससे समस्या और विकराल हो जाती है।

सबसे ज्यादा मार महिलाओं पर पड़ रही है। मथुरा के बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन के पास दीवारों के किनारे खड़ी कतारें इस मजबूरी की गवाही देती हैं। मौजूदा शौचालय इतने गंदे और असुरक्षित हैं कि लोग उनका इस्तेमाल करने से कतराते हैं।

महिलाओं के लिए यह स्थिति और भी भयावह है। या तो शौचालय हैं ही नहीं, या इतने असुरक्षित कि जाना खतरे से खाली नहीं। डॉक्टर चेतावनी देते हैं कि लंबे समय तक शौच रोकने से महिलाओं में यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन (UTI) का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। यह केवल असुविधा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य संकट है।

वृंदावन में वर्षों पहले बने सुलभ शौचालय अब जर्जर हो चुके हैं। सामाजिक कार्यकर्ता जॉय बताते हैं कि रखरखाव की भारी कमी है। सफाई, पानी और निगरानी, तीनों का अभाव है।

बरसाना, नंदगांव और गोकुल जैसे छोटे तीर्थस्थलों की स्थिति तो और भी खराब है। स्थानीय गाइड गोविंद शर्मा कहते हैं, “यहाँ शौचालय ऊँट के मुँह में जीरे के समान हैं। जो हैं भी, उनकी गंदगी सड़कों तक फैलती है।”

व्यापारी वर्ग भी अब खुलकर सामने आ रहा है। वृंदावन के व्यवसायी अंशु गोपाल का कहना है कि सरकार को भव्य परियोजनाओं के बजाय बुनियादी सुविधाओं पर ध्यान देना चाहिए। वहीं राजेंद्र अग्रवाल का मानना है कि केवल नए शौचालय बनाना काफी नहीं, उनका नियमित रखरखाव ज्यादा जरूरी है।

व्यापारी कन्हाई लाल सुझाव देते हैं कि मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण को हर नए निर्माण के साथ शौचालय और सीवर कनेक्शन अनिवार्य करना चाहिए। जब तक यह नियम सख्ती से लागू नहीं होगा, समस्या जस की तस रहेगी।

सच यह है कि बृज में स्वच्छता का संकट केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक प्राथमिकताओं का आईना है। मंदिरों के लिए करोड़ों का दान आता है, भव्य गलियारे बनते हैं, लेकिन शौचालय जैसी बुनियादी जरूरत आज भी हाशिये पर है।

सवाल सीधा है, क्या भक्ति केवल मंदिर की देहरी तक सीमित है? क्या पवित्रता का अर्थ केवल पूजा है, स्वच्छता नहीं?

श्री कृष्ण और राधा की यह पावन भूमि इससे कहीं बेहतर की हकदार है। 10 करोड़ श्रद्धालुओं की आस्था का सम्मान तभी होगा, जब उन्हें सम्मानजनक और स्वच्छ सुविधाएं मिलें।

अब समय आ गया है कि हर मंदिर, हर घाट और हर परिक्रमा मार्ग पर साफ, सुरक्षित और सुलभ शौचालयों का मजबूत नेटवर्क बनाया जाए। क्योंकि जहां स्वच्छता नहीं, वहां पवित्रता अधूरी है।

Wednesday, April 15, 2026

 


लुप्त हुए ट्रंक और कनस्तर: जब घरों में यादें ताला लगाकर रखी जाती थीं

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

17 अप्रैल 2026

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कभी घर सिर्फ ईंट और छत नहीं होते थे, यादों के गोदाम होते थे। उन यादों की रखवाली करते थे: कई भारी-भरकम ट्रंक और  खनखनाते कनस्तर।

दिल की गहराइयों में आज भी वो पुराना  ट्रंक चुपके से साँस लेता है। भारी, जिसके ऊपर पेंट से परिवार का नाम लिखा होता था “शर्मा परिवार, दिल्ली”। उसकी सलवटें, उसकी जंग लगी कुंडियाँ और वो मीठी-सी पुरानी  खुशबू… हर बार ढक्कन खोलते ही बचपन की गर्मियाँ लौट आती थीं। फौजी और रेलवही के गार्ड बाबू अभी भी काले चद्दर के बक्से उपयोग करते हैं।

घर के अंदर बड़े संदूकों में कपूर की सफेद गोलियाँ नीम के पत्तों के साथ सोई रहतीं। गर्मियों के हल्के सूती कपड़े एक तरफ, सर्दियों की ऊनी रजाइयाँ और गद्दे दूसरी तरफ। शादी-ब्याह के मौके पर वो ट्रंक जादू की तरह खुलता;  चादरें, गद्दे, रजाइयाँ निकलतीं और पूरा संयुक्त परिवार एक साथ हँसता-बोलता सज जाता। ट्रंक कभी पढ़ने की मेज बन जाता, कभी सोफा, कभी रेडियो का सिंहासन।

ट्रेन की छुट्टियों में जब पूरा कुनबा स्टेशन पहुँचता, कुली सिर पर होल्डॉल और ट्रंक रखे, कंधे पर बैग, हाथ में सुराही लिए आगे-आगे चलता। सीट न मिलने पर बच्चे ट्रंक पर ही बैठकर खिड़की से बाहर उड़ते बादलों को गिनते। दादी माँ उसी ट्रंक में खोया-पाया, पुरानी चिट्ठियाँ, थैले और हर जुगाड़ संभाल कर रखतीं। हर बच्चे का अपना छोटा ट्रंक;  लड़कियों के अंदर गुड़िया, चूड़ियाँ और गुप्त डायरी।

फिर आता कनस्तर। चमकता हुआ टिन का, जिसमें दादी छिपाकर लड्डू-मठरी रखतीं। चूहे डर के मारे भागते। गेहूँ, आटा, गुड़, चीनी… कई महीनों का वारदाना उसमें सोया रहता। इमरतबान में आम का मीठा आचार और नींबू की खट्टी खुशबू घर भर में फैलती।

आज अलमारी और पहिए वाले सूटकेस आ गए। दिल छोटे हो गए। न ट्रंक की वो गरिमा बची, न कनस्तर की वो मासूमियत। बच्चे अब बिस्तरबंद और होल्डॉल का नाम भी नहीं जानते। 

ट्रंक… लोहे का, हरे या नीले रंग का, ऊपर सफेद पेंट से लिखा नाम। जैसे कोई पहचान पत्र। हर घर में एक नहीं, कई ट्रंक। छोटा, बड़ा, दहेज वाला, बच्चों वाला। खोलते ही  खुशबू उड़ती थी। सर्दियों के स्वेटर, गर्मियों की मलमल, तह करके रखी साड़ियाँ, जैसे मौसम भी उनमें सांस लेता हो।

पुराने ज़माने के सख्त मास्साब रघुनाथ प्रसाद यादों के समंदर में खो जाते हैं: "संयुक्त परिवार की धड़कन थे ये ट्रंक। शादी-ब्याह का मौसम आता, तो वही ट्रंक गद्दे, रजाई, चादरों से भर उठते। मेहमान आते, तो वही ट्रंक मेज बन जाता। रेडियो उस पर सजता, बच्चे उस पर उछलते, और बड़े उस पर बैठकर किस्से बुनते। ट्रंक कोई चीज़ नहीं था, घर का चुपचाप खड़ा बुजुर्ग था।"

सुशीला ताई कहती हैं: "छुट्टियाँ आतीं, तो ट्रंक का असली सफर शुरू होता। ट्रेन की सीट कम पड़ जाए, तो बच्चे उसी पर बैठ जाते। साथ में होल्डोल, कसकर बांधा हुआ बिस्तरबंद, और एक सुराही, जिसका पानी रास्ते भर मीठा लगता था। स्टेशन पर कुली सिर पर ट्रंक, कंधे पर बैग, हाथ में सुराही, और पीछे हमारा भरपूर परिवार, जैसे कोई चलता-फिरता जुलूस हो।"

दादी का ट्रंक तो जैसे खजाना था। खोया-पाया, पुराने खत, टूटे खिलौने, और अचानक जरूरत पड़ने पर निकल आने वाले थैले: सब उसी में। हर सवाल का जवाब, हर कमी का जुगाड़, उसी ट्रंक के भीतर छिपा होता था।

और उधर, रसोई का सम्राट था: कनस्तर। टीन का, मोटा, ढक्कन पर कुंडी लगी हुई। उसमें घी की खुशबू बसती थी, तेल की चमक झलकती थी। चूहों से बचाने का किला था वह। लड्डू, मठरी, सेव, सब उसमें छिपाकर रखे जाते, दादी की गुप्त तिजोरी।

कनस्तर में महीनों का राशन सांस लेता था। गेहूं, आटा, दाल, चीनी, गुड़, सब। इमरतबान में आम और नींबू का अचार धूप में पकता था। कुछ घरों में टेंटी और लिसौड़े का भी स्वाद बसता था। साइकिल पर कनस्तर रखकर चक्की जाना, वह भी एक छोटा सा उत्सव था।

आज घर बड़े हैं, पर जगह छोटी। अलमारी और कपबोर्ड ने ट्रंक को बेदखल कर दिया। पहियों वाले सूटकेस और बैकपैक ने सफर का रोमांस चुरा लिया है। बच्चों को पता भी नहीं कि बिस्तरबंद कैसे कसते हैं, होल्डोल क्या होता है।

और कनस्तर? वह तो जैसे कहानी बन गया। अब सब कुछ छोटे पैकेट में आता है। जरूरत जितनी, खरीद उतनी। न भंडारण, न इंतजार, न वो धैर्य।

कभी-कभी लगता है, उन ट्रंकों में सिर्फ कपड़े नहीं, रिश्ते तह करके रखे जाते थे। कनस्तर में सिर्फ अनाज नहीं, घर की खुशहाली बंद होती थी। आज सब खुला है, सब उपलब्ध है, फिर भी कुछ कमी सी है।

शायद सच यही है: घर सिकुड़ गए, सामान सिमट गया, और दिल भी थोड़े छोटे हो गए।

ट्रंक , कनस्तर और इमरतबान चले गए… और साथ ले गए एक पूरा जमाना, जो अब सिर्फ यादों में धीरे-धीरे खनकता है।

Tuesday, April 14, 2026

 ईरान का आत्मघाती रास्ता: शांति से इनकार और पश्चिम एशिया की तबाही को निमंत्रण

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

16 अप्रैल 2026

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से शिष्टाचार और दया की उम्मीद करना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है। बड़बोला ट्रंप न खुदा से डरता हैं, न विश्व जनमत से। नैतिकता और अंतरराष्ट्रीय कानून का खुला मजाक उड़ा रहा है, विश्व संगठनों का अपमान कर रहा है। ऐसे कपटी और मूर्ख नेता से उलझने से किसी को कोई लाभ नहीं मिलेगा। 

प्रश्न ये है कि ईरान और उसके समर्थक देश आत्मघाती कदम उठाकर खाड़ी देशों और तमाम विकासशील राष्ट्रों को तबाही का न्योता क्यों दे रहे हैं? ऊर्जा संकट से भारत समेत कई देशों की अर्थव्यवस्था को घातक झटके लगेंगे, जबकि इस संघर्ष में पीड़ितों की कोई भूमिका नहीं है।

2026 की तपती सियासत में, जब पूरा क्षेत्र बारूद के ढेर पर बैठा है, तेहरान की सरकार ने सुलह के दरवाजे बंद कर दिए हैं और टकराव जारी रखने की जिद जताई है। शांति की पेशकश आई भी, लेकिन जवाब मिला: खामोशी, तना हुआ लहजा और संघर्ष का इरादा। यह जिद अब सिर्फ राजनीति नहीं रही; यह सीधा आत्मघाती रास्ता बन चुकी है।

ईरान की आर्थिक स्थिति पहले ही डांवाडोल है। मुद्रास्फीति 40 प्रतिशत से ऊपर है, कुछ अनुमानों के अनुसार 42-48 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। रियाल की कीमत जमीन में गड़ चुकी है, एक डॉलर के लिए 10 लाख से 17 लाख रियाल तक। अर्थव्यवस्था सिकुड़ रही है, प्रतिबंधों की मार पड़ रही है और अंदरूनी असंतोष बढ़ रहा है। अगर फारस की खाड़ी में नौसैनिक नाकाबंदी लंबी खिंची, तो ईरान की सांस की नली दब जाएगी।

सच कड़वा है, लेकिन कहना जरूरी है। ईरान अपनी जरूरत का ज्यादातर सामान समुद्री रास्तों से मंगाता है। अगर यह रास्ता बंद हुआ, तो फैक्टरियां ठप पड़ जाएंगी, दवाइयां गायब हो जाएंगी, बिजली व्यवस्था लड़खड़ा जाएगी और जनता बेबस होकर सड़कों पर उतर आएगी। यह सब अचानक नहीं हुआ है। यह सालों की गलत नीतियों का हिसाब है।

ईरान ने अपनी विदेश नीति को जिद में बदल दिया। क्रांतिकारी नारे, परमाणु महत्वाकांक्षा, मिसाइलों का जुनून और प्रॉक्सी युद्ध का खेल: इन सबका नतीजा दुनिया से अलगाव, एकाकीपन और आर्थिक घुटन है। चीन के साथ दोस्ती को सहारा समझा गया, लेकिन यह बैसाखी साबित हुई। तेहरान ने सस्ता तेल बेचा; बदले में कुछ निवेश और थोड़ी राहत मिली, लेकिन भारी निर्भरता बढ़ गई। 80-90 प्रतिशत तेल एक ही खरीदार (चीन) को बेचना मजबूरी है, रणनीति नहीं। चीन ने अपने फायदे देखे, जबकि ईरान ने अपनी स्वतंत्रता गिरवी रख दी।

अब जब हालात बिगड़ रहे हैं, तो वही पुरानी जिद। सवाल उठता है: ईरान ऐसा क्यों कर रहा है? क्या तेहरान को इराक का अंजाम याद नहीं? 1990 के दशक में नाकाबंदी ने इराक को तोड़ दिया था; भूख, बीमारी, बेरोजगारी और समाज का चरमरा जाना। क्या ईरान उसी रास्ते पर चलना चाहता है?

आज ईरान के प्रमुख क्षेत्र पहले ही कमजोर हैं। दुनिया का सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस क्षेत्र; साउथ पार्स, हमलों से क्षतिग्रस्त हो चुका है। तेल निर्यात खतरे में है। उद्योग आयात पर निर्भर हैं। अगर आपूर्ति रुकी, तो उत्पादन ठप पड़ जाएगा। कारखाने बंद, नौकरियां गायब, रियाल और गिरेगा, मुद्रास्फीति आग बन जाएगी और सड़कों पर गुस्सा फूट पड़ेगा।

यह सिर्फ आर्थिक कहानी नहीं है। यह क्षेत्रीय शांति-अमान की भी कहानी है। ईरान के प्रॉक्सी गुट: हिजबुल्लाह, हूती विद्रोही और विभिन्न मिलिशिया, पहले ही दबाव में हैं। पैसा कम हुआ तो बौखलाहट बढ़ेगी। बौखलाहट बढ़ने पर गोलियां चलेंगी। खाड़ी में जहाजों पर खतरा मंडराएगा। दुनिया का करीब 20 प्रतिशत तेल इसी रास्ते से गुजरता है। जरा सी चिंगारी पूरी दुनिया में आग लगा सकती है।

तेहरान की नीति अब अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रही है। दोस्त कम, दुश्मन ज्यादा। और जो दोस्त बचे हैं, वे भी अपने स्वार्थ के। हकीकत यह है कि ईरान के पास अभी भी मौका है। ट्रंप ने समय सीमा बढ़ाई है, लेकिन वक्त तेजी से फिसल रहा है।

जरूरत है जिद छोड़ने की, बातचीत की मेज पर लौटने की, परमाणु मुद्दे पर समझौता करने की, खाड़ी देशों से रिश्ते सुधारने की और सबसे महत्वपूर्ण; अपने लोगों के भविष्य के बारे में सोचने की। मुल्क सिर्फ मिसाइलों और नारों से नहीं चलता। मुल्क चलता है रोजगार से, बिजली से, दवाइयों से और उम्मीद से।

अगर सरकार अब भी आंखें मूंदे रखी, तो अंजाम साफ है; लंबी नाकाबंदी, गिरती अर्थव्यवस्था और अंदरूनी बगावत। इतिहास गवाह है: जो देश समय पर नहीं झुकते, वे टूट जाते हैं।

ईरान के सामने दो रास्ते हैं। पहला: शांति, समझदारी और सुधार का रास्ता। दूसरा: टकराव, एकाकीपन और तबाही का रास्ता। चुनाव उनकी है, लेकिन इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा, खासकर भारत जैसे ऊर्जा आयातक देशों पर। ऊर्जा कीमतों में उछाल से मुद्रास्फीति बढ़ेगी, औद्योगिक उत्पादन प्रभावित होगा और विकासशील अर्थव्यवस्थाएं झटके खाएंगी।

ईरान को समझना चाहिए कि जिद से कोई फायदा नहीं। परमाणु कार्यक्रम की जिद ने उसे अलग-थलग कर दिया है। प्रॉक्सी युद्ध ने संसाधनों को बर्बाद किया है। अब समय है कि तेहरान अपनी जनता की भलाई को प्राथमिकता दे। बातचीत से ही समाधान निकल सकता है; परमाणु संयम, प्रतिबंधों में राहत और क्षेत्रीय स्थिरता।

पश्चिम एशिया की स्थिरता न सिर्फ क्षेत्रीय देशों के लिए, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी है। भारत जैसे देश, जो खाड़ी से तेल आयात करते हैं, इस अस्थिरता का सबसे बड़ा शिकार हो सकते हैं। ईरान को आत्मघाती रास्ते से मुड़ना चाहिए, वरना इतिहास उसे एक और इराक के रूप में याद रखेगा; जिसकी जिद ने पूरे देश को तबाह कर दिया।

शांति की राह चुनना ही एकमात्र समझदारी भरा कदम है। जिद छोड़ो, बात करो, और अपने लोगों को बचाओ। वरना तबाही का निमंत्रण न सिर्फ ईरान को, बल्कि पूरे क्षेत्र को बर्बाद कर देगा। 


 Epstein Files Unmasked: Power, Secrets, and a Story Still Unfolding

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By Brij Khandelwal

April 15, 2026

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Let’s cut to the chase. The story just got stranger.

The U.S. Department of Justice released 3.5 million pages, thousands of photos, and hundreds of videos linked to Jeffrey Epstein. This happened because of the Epstein Files Transparency Act, signed by President Trump in 2025. Public pressure forced the hand. But here’s the catch: large chunks of the documents are blacked out. The message is clear ,  not every truth is meant for our eyes.

Epstein was no loner. He was a master of access, moving between mansions in New York, a compound in Florida, and a private island in the Caribbean. Cameras were hidden. Doors were locked. His private jet, nicknamed the "Lolita Express," carried names you know: Bill Clinton, Donald Trump, Prince Andrew. Were they all involved in crimes? Not necessarily. Some were acquaintances. Some did business with him. But where there’s that much smoke, you can’t ignore the fire.

The accusations are brutal. Epstein is said to have run an industrial-scale operation, targeting underage girls with promises of massage work, modeling gigs, or just quick cash. His partner, Ghislaine Maxwell, acted as the recruiter. She’s now in prison. So how did this horror show go on for decades?

Let’s talk about the missing piece. There is no client list. No ledger of powerful men who paid for abuse. That crushed a lot of hopes. People wanted names. They wanted arrests. Instead, we got redactions. Epstein died in 2019 , officially a suicide. Many still don’t buy it.

Now comes the twist, straight out of a spy thriller. Whispers of Mossad. An FBI informant claimed Epstein was an intelligence asset. Emails linked him to former Israeli Prime Minister Ehud Barak, including one joke: “Clarify I’m not Mossad.” Ghislaine’s father, Robert Maxwell, was an alleged spy who died under mysterious circumstances. Coincidence? Maybe. But there’s no hard proof. Israel and the U.S. deny everything. Netanyahu laughed it off. Sensational? Yes. But it might also be a distraction from the real rot.

The files paint a simpler, uglier picture. Epstein was a cunning parasite who used wealth to buy access and protection. The system let him operate because power shields power. Victims were silenced. Justice was mocked.

Why the slow movement? No new criminal cases have been filed. Redactions block full transparency. The public is angry. Victims are begging for closure. Instead, they’re drowning in paperwork.

This isn’t just one man’s evil. It’s a playbook. Silence buys survival. When elites decide they’re above the law, ordinary people pay the price. Consider this a wake-up call. Unchecked power always crushes the innocent first.


Monday, April 13, 2026

 बड़ा बबाल काटा है है इस अतीत के प्रेत ने!!

एप्सटीन फाइल्स का खुलासा: दौलत, रसूख और खौफ की सच्चाई

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

15 अप्रैल 2026

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बड़ा धमाका हुआ। पर्दे उठे। लेकिन कहानी और उलझ गई।

अमेरिका के न्याय विभाग ने जेफ्री एप्सटीन से जुड़ी लाखों फाइलें जनता के सामने रख दीं। करीब साढ़े तीन मिलियन पन्ने। हजारों तस्वीरें। सैकड़ों वीडियो। कानून बना, दबाव बढ़ा, और आखिरकार सच का दरवाज़ा थोड़ा खुला।

यह काम Epstein Files Transparency Act के तहत हुआ, जिस पर Donald Trump ने 2025 में दस्तखत किए थे। लेकिन सच कहें तो यह दरवाज़ा पूरी तरह नहीं खुला। कई कागज़ अब भी काले स्याह निशानों से ढंके हुए हैं।

कहानी यहीं से दिल दहला देती है।

एप्सटीन कोई आम आदमी नहीं था। वह दौलत, ताकत और रसूख का खिलाड़ी था। उस पर आरोप है कि उसने नाबालिग लड़कियों का शोषण किया। उन्हें झांसा दिया गया। कभी मसाज का लालच, कभी मॉडलिंग का सपना, कभी पैसों की मजबूरी।

इस खेल में उसकी साथी थी Ghislaine Maxwell। वह लड़कियों को फंसाने और तैयार करने में अहम कड़ी बनी। आज वह जेल में है।

फाइलें पढ़कर एक ही सवाल उठता है: यह सब इतने साल कैसे चलता रहा?

एप्सटीन की दुनिया बहुत बड़ी थी। न्यूयॉर्क की हवेली। फ्लोरिडा का घर। कैरिबियन का निजी द्वीप। हर जगह कैमरे, हर जगह बंद दरवाज़े। जैसे कोई जाल बुना गया हो।

उसके प्राइवेट जेट को लोग “लोलिता एक्सप्रेस” कहते थे। फ्लाइट लॉग्स में कई बड़े नाम सामने आए। जैसे Bill Clinton, Donald Trump, और Prince Andrew।

यहाँ एक कानूनी  बात साफ समझ लीजिए। किसी का नाम फाइल में होना मतलब वह गुनहगार है: ऐसा नहीं है। कई लोग सिर्फ जान-पहचान में थे। कुछ बिजनेस मीटिंग्स में मिले। कुछ के नाम सिर्फ सुनी-सुनाई बातों में आए।

फिर भी, धुआं है तो आग की बू आती है।

सबसे बड़ा झटका यह था कि इतनी बड़ी साजिश के बावजूद कोई “क्लाइंट लिस्ट” नहीं मिली। यानी ऐसा कोई पक्का सबूत नहीं मिला कि किसने पैसे देकर नाबालिगों का शोषण किया।

लोगों को उम्मीद थी कि एक लंबी सूची सामने आएगी। नाम उजागर होंगे। गिरफ्तारी होगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।

सवाल फिर वही; क्या सच अभी भी छिपा है?

2019 में एप्सटीन की जेल में मौत हो गई। आधिकारिक तौर पर इसे आत्महत्या बताया गया। मगर शक का साया आज भी मंडरा रहा है।

अब कहानी में एक और मोड़ आता है। थोड़ा फिल्मी, थोड़ा खतरनाक।

कुछ फाइलों में दावा किया गया कि एप्सटीन का संबंध इजरायली खुफिया एजेंसी Mossad से हो सकता है। एक FBI नोट में एक मुखबिर ने शक जताया कि एप्सटीन “मोसाद का एजेंट” था।

उसका नाम Ehud Barak से भी जोड़ा गया। दोनों के बीच मेल और मुलाकातें हुईं। एक मेल में एप्सटीन ने मजाक में लिखा: “साफ कर दो कि मैं मोसाद के लिए काम नहीं करता।”

अब यह मजाक था या इशारा; कोई नहीं जानता।

कहानी यहीं और दिलचस्प हो जाती है।

एप्सटीन की करीबी Ghislaine Maxwell के पिता Robert Maxwell पर भी पहले से मोसाद से जुड़े होने के आरोप लगते रहे थे। उनकी मौत भी रहस्यमयी थी।

तो क्या यह पूरा जाल किसी खुफिया एजेंसी का था?

सीधा जवाब है; कोई ठोस सबूत नहीं मिला।

न अमेरिका ने माना। न इजरायल ने। Benjamin Netanyahu और Naftali Bennett ने इन आरोपों को बेबुनियाद बताया।

असलियत शायद इतनी सनसनीखेज नहीं है।

फाइलें यह दिखाती हैं कि एप्सटीन एक शातिर, लालची और खतरनाक इंसान था। उसने अपने संपर्कों का इस्तेमाल किया। पैसे और ताकत का सहारा लिया। और सालों तक बचता रहा।

यही असली डर है।

इस खुलासे ने एक और सच्चाई सामने रखी; बड़े लोग अक्सर बच निकलते हैं। सिस्टम कई बार आंखें मूंद लेता है। पीड़ितों की आवाज दब जाती है।

आज भी कई सवाल अधूरे हैं।

क्यों कार्रवाई धीमी रही?

क्यों नए केस नहीं खुले?

क्यों कई दस्तावेज अब भी छिपे हैं?

पीड़ित इंसाफ मांग रहे हैं। जनता जवाब चाहती है।

लेकिन फाइलों का यह समंदर इतना बड़ा है कि सच उसमें कहीं डूब सा गया है।

आखिर में बस यही बात बचती है।

यह कहानी सिर्फ एक आदमी की नहीं है। यह सिस्टम की कहानी है। यह उस खामोशी की कहानी है, जो पैसे के सामने झुक जाती है।

और यह एक चेतावनी है: 

जब ताकत बेकाबू हो जाए, तो इंसानियत सबसे पहले कुचली जाती है।

Humour Times

 एप्सटीन फाइल्स: सवालों की बौछार, जवाबों का धुंधलका  

(Humour Times के हाथ लगा वो इंटरव्यू जो कभी हुआ ही नहीं, और शायद होना भी नहीं चाहिए था , क्योंकि सच बोलने वाले 110 साल के जासूस भी अब इस दुनिया में नहीं बचे!)

इंटरव्यूअर: Humour Times (HT) के एडिटर बृज खंडेलवाल 

मेहमान: डॉ. बर्ट्रेंड शॉ, 110 साल के रहस्यमयी जासूस, जो fortunately अब इस दुनिया में नहीं हैं, पर फिर भी इंटरव्यू दे रहे हैं।  

वाह री पत्रकारिता! मरने के बाद भी काम चल रहा है।

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कमरा धुंधला है। बिजली का बिल शायद “Under Review” में है, इसलिए रोशनी भी आधी-अधूरी, ठीक वैसे ही जैसे एप्सटीन फाइल्स।  

सामने बैठे हैं डॉ. बर्ट्रेंड शॉ। 110 साल। आंखें अब भी तेज ,  जैसे सब कुछ देख लिया हो… और जो नहीं देखना चाहते, उसे सुविधानुसार भूल चुके हों।

HT: डॉ. शॉ, ये एप्सटीन फाइल्स… इतना शोर क्यों मचा है भाई?  

शॉ: अरे बेटा, शोर तो ट्रेन मिस होने पर भी होता है। असली सवाल ये है कि ट्रेन जा कहाँ रही थी? फाइलें खुलीं तो सबने ताली बजाई, लेकिन पूरी कहानी अभी भी “Season 2 Coming Soon” में अटकी हुई है।

HT: लेकिन लाखों पन्ने जारी कर दिए गए न? ये तो पारदर्शिता है!  

शॉ: (हँसते हुए) पारदर्शिता? ये तो सरकारी दफ्तर की खिड़की जैसी है , आधा शीशा साफ, आधा काला पेंट, और बीच में बाबूजी चाय पीते हुए “फाइल पेंडिंग” बोल रहे हैं।  

ट्रंप ने कानून बनाया, फाइलें निकालीं… लेकिन जो सबसे जरूरी था, वो शायद “गलती से” अभी भी प्रिंटर में फंस गया।

HT: असल कहानी क्या है?  

शॉ: सीधी और डरावनी। एक आदमी — Jeffrey Epstein। पैसा इतना कि कैलकुलेटर भी थक के “Error 404: Too Much Money” दिखाने लगा। ताकत इतनी कि कानून भी “सर जी, आप आराम से” कहकर सलाम ठोकता था।  

उसने कमजोर लड़कियों को फंसाया, इस्तेमाल किया, और पूरा सिस्टम खड़ा-खड़ा तमाशा देखता रहा, जैसे पड़ोस में किसी की गाड़ी खराब हो गई हो ; “अरे यार, हमें क्या?”

HT: अकेला था या पूरा नेटवर्क?  

शॉ: अकेला आदमी इतना बड़ा खेल नहीं खेल पाता। Ghislaine Maxwell दरवाजा खोलती थी, Epstein अंदर घुसता था, और कानून बाहर खड़ा “मैं छुट्टी पर हूँ” का बोर्ड लगाकर सो जाता था।

HT: बड़े-बड़े नाम क्यों आए ? Clinton, Trump, Prince Andrew?  

शॉ: क्योंकि वो बड़े लोगों के बीच घूमता था न! नाम तो आएंगे ही। लेकिन नाम आना और गुनाह साबित होना, ये दो अलग-अलग Netflix सीरीज हैं।  

एक तो “The Crown” जैसी लगती है, दूसरी “Courtroom Drama” : जो सालों से “Delayed Release” मोड में पड़ी है।

HT: तो “क्लाइंट लिस्ट” वाली बात?  

शॉ: अरे लोग तो शादी की गेस्ट लिस्ट की तरह चाहते थे : कौन आया, कौन नहीं, किसने क्या खाया।  

हकीकत में ऐसी कोई पक्की लिस्ट नहीं मिली। या मिली होगी, लेकिन “फाइल मिसिंग” का पुराना, भरोसेमंद बहाना अभी भी जिंदा और स्वस्थ है।

HT: उसकी मौत… आत्महत्या या साजिश?  

शॉ: (हल्की मुस्कान के साथ) जासूसी दुनिया में “आत्महत्या” सबसे सुविधाजनक शब्द है। 2019 में मरा, CCTV उस दिन छुट्टी पर था, गार्ड सो रहे थे, और कैमरे “Loading…” पर अटक गए।  

कहते हैं जवाब उसके साथ चला गया… या फिर किसी ने “ politely” ले जाया।

HT: क्या वो खुद जासूस था? Mossad वाला कनेक्शन?  

शॉ: (झुककर फुसफुसाते हुए) अफवाहें तो चुनावी वादों जैसी गर्म हैं। Ehud Barak का नाम आता है, Mossad का नाम आता है। लेकिन सबूत? वो अभी भी “Under Construction ; Expected Completion: Never” मोड में हैं।

HT: हनीट्रैप की बातें भी तो चल रही हैं…  

शॉ: हनीट्रैप तो जासूसी में होता है, लेकिन इतना गंदा, इतना अनियंत्रित? एजेंसियां आमतौर पर इतना बड़ा रिस्क नहीं लेतीं। यहां तो रिस्क भी VIP था और स्कैंडल भी red-carpet पर चल रहा था।

HT: Ghislaine Maxwell का परिवार भी संदिग्ध है?  

शॉ: हाँ। पापा Robert Maxwell के पुराने राज, पुराने शक। बेटी ने धागा पकड़ा, लेकिन कोई गांठ बांधना नहीं चाहता। कहीं ऐसा न हो कि धागा खींचते-खींचते पूरा स्वेटर खुल जाए और सब नंगे खड़े रह जाएं।

HT: इजरायल ने क्या कहा?  

शॉ: साफ इनकार। Netanyahu और Bennett ने कहा ; “ये तो साजिश है!”  

राजनीति में सच और बयान अलग-अलग बसों में बैठकर अलग-अलग रूट पर चलते हैं, दिल्ली ट्रैफिक की तरह।

HT: तो आखिर सच्चाई क्या है?  

शॉ: (धीरे से) सच्चाई कई परतों वाली प्याज है। ऊपर अपराधी दिखता है, बीच में सिस्टम की नाकामी, और सबसे नीचे वो तह है जहां फाइलें भी “भाई मैं नहीं जाना” कहकर भाग जाती हैं।

HT: जनता इतनी बेचैन क्यों है?  

शॉ: क्योंकि लोग देख रहे हैं कि पैसा कितना मजबूत ढाल बन जाता है। ताकत कितने सारे दरवाजे खोल देती है। और गरीब की आवाज? वो वाई-फाई सिग्नल की तरह सबसे कमजोर जगह पर गायब हो जाती है।

HT: क्या न्याय मिलेगा?  

शॉ: न्याय बहुत धीमा है। कभी अंधा, कभी छुट्टी पर, कभी “फाइल गुम”।  

पीड़ित लड़ रहे हैं, सच धीरे-धीरे निकल रहा है ; ठीक सरकारी रिपोर्ट की तरह, पांच साल लेट।  

लेकिन पूरा सच? वो अभी भी “Top Secret” की चादर ओढ़कर आराम से सो रहा है।

HT: आखिरी सवाल :  इस पूरे तमाशे से क्या सीख?  

शॉ: (आँखें चमकाते हुए)  

याद रखो बेटा:  

- जाल हमेशा दिखता नहीं, लेकिन फंसाता बहुत पक्का है।  

- शिकार चिल्ला नहीं पाता, क्योंकि माइक अक्सर “म्यूट” होता है।  

- और शिकारी?  

  वो प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुस्कुराते हुए “No Comments” बोलता है।

कमरे में सन्नाटा छा गया।  

घड़ी अब भी टिक-टिक कर रही है।  

और सच?  

वो अभी भी “Loading… 3%” पर अटका हुआ है।  

Humour Times की सलाह:  

अगर कभी एप्सटीन फाइल्स का पूरा संस्करण आए, तो सबसे पहले चेक करना ,  लाइट का बिल भरा हुआ है या नहीं।


Sunday, April 12, 2026

 ट्रंप का अमेरिका या मोदी का भारत:

कौन सा लोकतंत्र बेहतर?

रंग-बिरंगी अफरातफरी बनाम सख्त ढांचा: क्यों भारत की जम्हूरियत ज्यादा नुमाइंदा और बहु-स्तरीय है

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

14 अप्रैल 2026

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हालिया घटनाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भारत का लोकतांत्रिक ढांचा, अपनी अव्यवस्था और उलझनों के बावजूद, अमेरिका की सख्त और कुछ हद तक जड़ प्रणाली से ज्यादा जवाबदेह और नुमाइंदगी करने वाला है। 

अमेरिका जहां कम आबादी, कम विविधता और ज्यादा खुशहाली वाला मुल्क है, वहीं भारत की सियासी बनावट कहीं ज्यादा पेचीदा और जमीनी हकीकत से जुड़ी हुई है।

अमेरिका खुद को दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र कहता है और भारत सबसे बड़ा। लेकिन गौर से देखें तो भारत की जम्हूरियत ज्यादा जिंदा, ज्यादा नुमाइंदा और कई परतों में बंटी हुई दिखती है। अमेरिका की राष्ट्रपति प्रणाली, अपनी तमाम शान और इतिहास के बावजूद, एक शख्स के हाथ में बेहिसाब ताकत समेट कर, उसे  चार साल के लिए  एक तरह से “इलेक्टेड बादशाह” बना देती है।

भारत और अमेरिका, दोनों लोकतंत्र के बड़े उदाहरण हैं, मगर उनकी राहें अलग हैं। भारत ने 1947 में आजादी के बाद ब्रिटिश मॉडल पर आधारित संसदीय प्रणाली अपनाई। यहां प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद संसद से आते हैं और हर वक्त जवाबदेह रहते हैं। अविश्वास प्रस्ताव का खतरा हमेशा सिर पर मंडराता रहता है। साथ ही एक मजबूत और पेशेवर नौकरशाही, जिसे अक्सर “स्टील फ्रेम” कहा जाता है, देश को स्थिरता देती है।

वहीं अमेरिका का संविधान (1787) राष्ट्रपति प्रणाली पर टिका है। वहां राष्ट्रपति सीधे चुना जाता है और चार साल तक सरकार और राज्य दोनों का मुखिया रहता है। संसद और न्यायपालिका उसे रोकने के लिए हैं, मगर रोजमर्रा की जवाबदेही लगभग न के बराबर है।

भारत की वेस्टमिंस्टर शैली की लोकतांत्रिक व्यवस्था भले धीमी, बोझिल और कभी-कभी परेशान करने वाली लगे, लेकिन यही उसकी असली ताकत है। यहां हर फैसले पर सवाल उठते हैं, बहस होती है, और नेता हर पल जनता और संसद के सामने जवाब देने को मजबूर रहता है।

अमेरिका में राष्ट्रपति एक तय चार साल के लिए चुना जाता है। इस दौरान उसके पास पूरी कार्यकारी ताकत होती है। न कोई रोज का सवाल-जवाब, न अविश्वास प्रस्ताव, न संसद के पास सरकार गिराने का कोई सीधा जरिया। नतीजा यह कि अगर कोई जिद्दी या मनमौजी नेता सत्ता में आ जाए, तो पूरा निजाम उसकी मर्जी का गुलाम बन सकता है।

अमेरिका में “चेक्स एंड बैलेंस” की बहुत बात होती है, मगर असलियत में राष्ट्रपति ही बड़े अफसरों और जजों की नियुक्ति करता है। यह “स्पॉइल्स सिस्टम” वफादारों को इनाम देने का जरिया बन जाता है। विपक्ष, सत्ता से बाहर होते ही लगभग बेजान हो जाता है। उसकी आवाज सीमित रह जाती है और वह रोजमर्रा के मसलों पर सरकार को घेर नहीं पाता।

इसके अलावा, अमेरिका की दो-पार्टी प्रणाली भी एक बड़ी कमी है। यह सिस्टम छोटे दलों, क्षेत्रीय आवाजों और अल्पसंख्यक नजरियों को हाशिए पर धकेल देता है। लोकतंत्र दो खेमों की लड़ाई बनकर रह जाता है।

भारत में तस्वीर बिल्कुल अलग है। यहां लोकतंत्र कभी सुकून में नहीं रहता। हर वक्त हलचल, बहस और टकराव चलता रहता है। ब्रिटिश विरासत से मिली नौकरशाही, यानी आईएएस, एक मजबूत ढांचा देती है। यह सिस्टम धीमा जरूर है, मगर नियमों को लागू करता है और जल्दबाजी में फैसले लेने से रोकता है। अदालतें भी अक्सर सरकार के फैसलों पर ब्रेक लगा देती हैं, जिससे कानून की हुकूमत कायम रहती है।

भारत में प्रधानमंत्री की कुर्सी कभी पूरी तरह सुरक्षित नहीं होती। हर वक्त चुनाव का दबाव रहता है। कहीं न कहीं चुनाव चलते रहते हैं; नगरपालिका, विधानसभा या लोकसभा। यहां सियासत में कोई “ऑफ-सीजन” नहीं होता। चुनाव आयोग की स्वायत्तता भी इस सिस्टम को मजबूत बनाती है।

सबसे अहम बात, भारत का बहुदलीय सिस्टम। यहां क्षेत्रीय पार्टियां, जाति आधारित समूह और छोटे-छोटे विचार भी संसद तक पहुंच जाते हैं। गठबंधन सरकारें आम बात हैं। इससे बातचीत, समझौता और सबको साथ लेकर चलने की मजबूरी पैदा होती है।

यहां विपक्ष भी कमजोर नहीं है। वह अविश्वास प्रस्ताव ला सकता है, संसद में बहस छेड़ सकता है और सरकार को हर दिन कटघरे में खड़ा कर सकता है।

जो लोग भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था को “धीमी” या “उलझी हुई” कहते हैं, वही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। यही देरी, यही प्रक्रियाएं और यही ताकत का बंटवारा तानाशाही के रास्ते को रोकता है।

इसके उलट, अमेरिका का तेज और सीधा सिस्टम एक व्यक्ति को चार साल के लिए लगभग बेइंतहा ताकत दे देता है। उसे बीच में रोकने के रास्ते बहुत सीमित हैं।

भारत की जम्हूरियत जिंदा इसलिए है क्योंकि वह कभी आराम नहीं करती। हर वक्त इम्तिहान मोड में रहती है। बार-बार चुनाव, बहुदलीय मुकाबला, आजाद न्यायपालिका और मजबूत नौकरशाही: ये सब मिलकर ताकत को बांटते हैं, जांचते हैं और चुनौती देते हैं।

अमेरिका का सिस्टम आसान और तेज हो सकता है, मगर भारत का लोकतंत्र ज्यादा गहरा, ज्यादा नुमाइंदा और आखिरकार ज्यादा मजबूत नजर आता है।


Saturday, April 11, 2026

 वर्चस्व की लड़ाई: पर्यावरण की तबाही

पश्चिम एशिया की 40 दिन की आग मानसून झेलेगा?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

13 अप्रैल 2026

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फारस की खाड़ी का आसमान अब नीला नहीं रहा। धुएँ से सना, बैंगनी और बोझिल दिखता है। चालीस दिन तक चली जंग ने ज़मीन ही नहीं, फिज़ा को भी ज़ख़्मी कर दिया है।

धुआंधार बमबारी फिलहाल थामी है, मगर ख़तरा ज़िंदा है। अब बारूद नहीं, हवा चल रही है। जानकारों के मुताबिक ज़हरीला धुआँ, सल्फर और बारीक गर्द का एक बड़ा गुबार अरब सागर के ऊपर से भारत की तरफ बढ़ने को बेकरार है। ये सिर्फ जंग का धुंधलका नहीं, ये एक “मौसमी बम” है, जो धीरे-धीरे पाकिस्तान के सिर पर फटने को तैयार है, जिसका खामियाजा भुगतेगा समूचा क्षेत्र।

खाड़ी देशों में हुए हमलों ने तेल रिफाइनरियों, गैस प्लांट्स और इंडस्ट्रियल हब्स को निशाना बनाया। आग भड़की, और आसमान में ज़हर भर गया। तेहरान में “काली बारिश” देखी गई, जहाँ कार्बन और धुआँ पानी के साथ गिरा। ये मंजर खौफनाक है। और अब यही हवा भारत की ओर रुख कर सकती है।

भारत का मानसून कोई मामूली घटना नहीं। ये एक नाज़ुक समूह गान है। ज़मीन की गर्मी और समंदर की नमी की जुगलबंदी बारिश को जन्म देते हैं। लेकिन जंग ने इस तालमेल में खलल डाल दिया है। अब ये सुर बिखर सकते है।

वैज्ञानिक तीन बड़े खतरे गिना रहे हैं, और हर एक खतरा अपने आप में आफ़त है।

पहला है ब्लैक कार्बन। तेल और ईंधन के जलने से निकला ये महीन धुआँ सूरज की गर्मी को सोख लेता है। इससे हवा असामान्य रूप से गर्म हो जाती है। नतीजा? अचानक तेज़ और बेकाबू बारिश। कुछ घंटों में महीनों का पानी गिर सकता है। शहर डूब सकते हैं, गाँव बह सकते हैं। और जो पानी गिरेगा, वो साफ नहीं, बल्कि तेजाबी हो सकता है, जो मिट्टी की उर्वरता छीन लेगा।

दूसरा खतरा है सल्फेट एरोसोल। ये कण सूरज की रोशनी को वापस अंतरिक्ष में भेज देते हैं। इससे ज़मीन ठंडी पड़ जाती है। इसके फलस्वरूप मानसून की ताकत घट सकती है। बारिश में देरी, बीच-बीच में रुकावट,  और कई इलाकों में बिल्कुल गायब भी  हो सकती है। किसान आसमान निहारता रहेगा, खेत प्यासे रह जाएंगे।

तीसरा खतरा सबसे खौफनाक है। अगर ये धुआँ ऊपरी वायुमंडल तक पहुँच गया, तो ये ज्वालामुखी जैसा असर डाल सकता है। सूरज की रोशनी कम हो जाएगी, तापमान गिरेगा, और मानसून कई सालों तक कमजोर पड़ सकता है। यानी एक लंबा सूखा दौर, जो खेती और खाने की सुरक्षा दोनों को हिला देगा।

इतिहास गवाह है। 1991 में कुवैत के तेल कुओं में लगी आग ने दुनिया को झकझोर दिया था। उस धुएँ के असर हिमालय तक महसूस हुए। मगर आज हालात और भी संगीन हैं। इस बार आग ज्यादा बड़ी है, और समय भी बेहद नाज़ुक। मानसून आने ही वाला है।

इस पर एल नीनो का साया भी है। प्रशांत महासागर का ये चक्र अक्सर भारत में कमजोर मानसून लाता है। अब एक अजीब जंग छिड़ गई है। एक तरफ जंग से बना धुआँ बारिश को तेज़ कर सकता है, दूसरी तरफ एल नीनो उसे दबायेगा। नतीजा होगा  कहीं बाढ़, कहीं सूखा। पंजाब में पानी ही पानी, गुजरात में प्यास ही प्यास।

समंदर भी अब बीमार है। खाड़ी में फैले तेल ने पानी की सतह को ढक लिया है। इससे भाप कम उठेगी, बादल कम बनेंगे, और बारिश की ताकत घटेगी। ये एक खतरनाक सिलसिला है। गंदा समंदर, कमजोर बादल, सूखी धरती।

भारत की खेती मानसून पर टिकी है। हर फसल का एक तय वक्त होता है। जब बारिश वक्त पर नहीं आती, तो बीज या तो सूख जाते हैं या बह जाते हैं। किसान की मेहनत मिट्टी में मिल जाती है। राजस्थान, हरियाणा, पंजाब जैसे इलाके सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं।

सच कड़वा है, मगर साफ है। आज की दुनिया में कोई जंग सीमित नहीं रहती। खाड़ी में लगी आग, केरल की बारिश को भी बदल सकती है। हवा की कोई सरहद नहीं होती।

इस साल जब मानसून के पहले बादल उठेंगे, लोग सिर्फ बारिश नहीं, उसकी फितरत भी देखेंगे। क्या ये राहत लाएगा या आफ़त? ये सवाल हर किसान, हर शहरवासी के दिल में होगा।

कुदरत अपना हिसाब चुकाती है, और अक्सर बिल किसी और के नाम भेजती है। युद्ध की इस आग का बिल भगवान न करे,  भारत के किसान को चुकाना पड़े।


Friday, April 10, 2026

 कांड ताज नगरी में, गूंज ज़माने में!

जब मोहब्बत बन जाए मौत: डिजिटल भारत का खौफनाक सच

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बृज खंडेलवाल द्वारा

12 अप्रैल 2026

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प्यार अंधा होता है, यह कहावत पुरानी है। पर अब प्यार खून भी करने लगा है, यह नया सच है।

आगरा की एक घटना ने दिल दहला दिया। एक मां ने अपनी ही मासूम बच्ची को मार डाला। वजह गुस्सा नहीं थी, गरीबी नहीं थी। वजह था एक नया रिश्ता। बच्ची “रास्ते की दीवार” बन गई थी।

सवाल सीधा है। क्या अब रिश्ते बोझ बनते जा रहे हैं?

यह कोई एक घटना नहीं है। देश के अलग-अलग कोनों से ऐसी खबरें लगातार आ रही हैं। मां-बाप, पति-पत्नी, बच्चे, कोई भी सुरक्षित नहीं। कारण एक ही:  "नया प्यार: ये  रिश्ता क्या कहलाता है?"

आज के “क्राइम ऑफ पैशन” पहले जैसे नहीं रहे। पहले गुस्से में खून होता था। अब सोच-समझकर, योजना बनाकर हत्या हो रही है।

पंजाब में एक मां ने अपने दो बच्चों को जहर दे दिया। दिल्ली में एक प्रेमी ने गर्भवती महिला को सरेआम चाकू मार दिया। ग्वालियर में मां ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर बेटे को छत से फेंक दिया। तमिलनाडु में पांच महीने के बच्चे को इसलिए मार दिया गया क्योंकि वह “रिश्ते में बाधा” था।मुजफ्फरनगर में दो बच्चों को जहर देकर खत्म कर दिया गया, ताकि नई जिंदगी शुरू हो सके।

हर कहानी अलग है। पर दर्द एक जैसा है। इन घटनाओं में एक खतरनाक सोच सामने आती है: “जो प्यार के रास्ते में आए, उसे मुक्ति दो।”

मनोवैज्ञानिक कहते हैं, इन हत्याओं में नफरत कम होती है। असल में यह स्वार्थ होता है।

नया रिश्ता इतना बड़ा हो जाता है कि पुराना रिश्ता बोझ लगने लगता है।जब दिल पर हवस हावी हो जाए, तो इंसान अंधा ही नहीं, बेरहम भी हो जाता है।

भारत में शादी को पवित्र माना जाता है। तलाक आज भी बदनामी समझा जाता है। लोग टूटे रिश्ते से बाहर निकलने से डरते हैं। समाज की उंगली से बचने के लिए, लोग कानून तोड़ने लगते हैं।

पहले संयुक्त परिवार होते थे। घर में बड़े-बुजुर्ग होते थे। गलत कदम उठाने से पहले कोई रोकने वाला होता था।

आज परिवार छोटे हो गए हैं। निगरानी खत्म हो गई है। आज़ादी बढ़ी है, पर समझ कम हो गई है।

मोबाइल फोन ने दुनिया को हथेली पर ला दिया। पर साथ ही, रिश्तों को भी खेल बना दिया। आज एक क्लिक में नया रिश्ता बन जाता है।

व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम, डेटिंग ऐप, सब कुछ आसान हो गया है। छिपकर बात करना अब मुश्किल नहीं रहा। झूठ बोलना भी आसान हो गया है।डिजिटल दुनिया ने प्यार को तेज कर दिया है।

जल्दी जुड़ते हैं, जल्दी टूटते हैं। और जब टूटते हैं, तो शोर बहुत होता है।शक बढ़ता है। फोन चेक होते हैं। मैसेज पढ़े जाते हैं। झगड़े बढ़ते हैं।

और कई बार, यह झगड़े खून तक पहुंच जाते हैं। सोशल मीडिया आग में घी डालता है। हर घटना वायरल हो जाती है। लोग बहस करते हैं। न्याय करने लगते हैं।

पर असली सवाल छूट जाता है: हम बदल क्यों रहे हैं?

पचास साल पहले भी अफसाने होते थे। पर छुपकर होते थे। समाज का डर था। इज्जत का सवाल था।

आज डर कम हो गया है। इच्छाएं बढ़ गई हैं। आज लोग “खुशी” चाहते हैं।पर उसके लिए कीमत चुकाने को तैयार नहीं।

जब जिम्मेदारी भारी लगती है, तो लोग गलत रास्ता चुन लेते हैं।

यह केवल कानून का मामला नहीं है।यह समाज का आईना है।

डिजिटल प्लेटफॉर्म दोषी नहीं हैं। वे केवल हमारी सोच को दिखाते हैं।असल समस्या भीतर है। अधूरापन, असंतोष, और अधीरता।

आज का इंसान इंतजार नहीं करना चाहता। समझौता नहीं करना चाहता।जो चाहिए, अभी चाहिए। और अगर कोई बीच में आए, तो उसे हटाने का ख्याल आता है।

यह खतरनाक है। बहुत खतरनाक।जरूरत है सोच बदलने की। रिश्तों को समझने की। अगर रिश्ता नहीं चल रहा, तो उसे खत्म करने का रास्ता है: कानून।

हत्या कोई हल नहीं है। यह केवल जिंदगी बर्बाद करता है। परिवारों को फिर से मजबूत करना होगा। बातचीत बढ़ानी होगी। बच्चों को सिखाना होगा कि प्यार जिम्मेदारी है, खेल नहीं।

समाज को भी बदलना होगा। तलाक को कलंक की तरह देखना बंद करना होगा। जब तक हम यह नहीं समझेंगे, ऐसी घटनाएं रुकेंगी नहीं।

आगरा की वह मासूम बच्ची एक सवाल छोड़ गई है।

क्या हम रिश्तों को निभाना भूल रहे हैं? अगर जवाब “हां” है, तो खतरे की घंटी बज चुकी है।

 नदियों के नाम से नई टाउनशिप्स बनाना: सम्मान या मुसीबतों को न्यौतना

ग्रेटर आगरा प्रोजेक्ट पर कुछ सवाल

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

11 अप्रैल 2026

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सुनहरे सपनों में हकीकत के कांटे!

आगरा के बाहरी इलाके में “ग्रेटर आगरा” के नाम से 10 नदी-थीम टाउनशिप बसने जा रही हैं। सिंधुपुरम, गोमतीपुरम, यमुनापुरम: नाम सुनकर लगता है जैसे कोई काव्य-नगरी बन रही हो। लेकिन 8 अप्रैल 2026 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा एत्मादपुर के रैपुर और रहान कलां में ₹5,142 करोड़ की इस परियोजना का शिलान्यास होते ही कुछ सवाल खड़े हो गए हैं। आगरा विकास प्राधिकरण (ADA) 449 हेक्टेयर में ये टाउनशिप बसाने जा रहा है। दावा है; “दूसरा नोएडा”। एक बड़ा अर्बन क्लस्टर ग्वालियर रोड पर अटल नगर के नाम से विकसित हो रहा है।

रहनकलां क्षेत्र में नई रिहायशी बस्तियों को लेकर संशय है। सवाल है: क्या यह विकास है, या जल्दबाजी में बुना गया खतरनाक ख्वाब? क्या हम नदी के नाम पर शहर बसा रहे हैं या नदी और विरासत को हमेशा के लिए खतरे में डाल रहे हैं?

पीने का पानी गंगा जल पाइपलाइन से डायवर्ट होगा क्या, और लॉन्ग टर्म कनेक्टिविटी प्लान क्या हैं?

आगरा का भूजल स्तर पहले ही 147 प्रतिशत से अधिक दोहन झेल रहा है। यानी जितना पानी धरती प्राकृतिक रूप से रिचार्ज कर सकती है, उससे कहीं ज्यादा खींचा जा रहा है। अब डेढ़ लाख नई आबादी बसने वाली है। हर परिवार औसतन 150-200 लीटर पानी रोज इस्तेमाल करेगा। 5-7 साल में गर्मियों के दौरान बोरवेल सूख जाएंगे। पानी टैंकर माफिया के कब्जे में चला जाएगा। हर गली में रोज झगड़े होंगे। जमीन नीचे धंसने लगेगी, मकानों की नींव दरक जाएगी। यह कोई काल्पनिक डर नहीं; यह कई भारतीय शहरों का देखा हुआ सच है, जहां भूजल संकट ने पूरा इलाका बंजर बना दिया।

यमुना का किनारा: बाढ़ का बुलावा

परियोजना यमुना किनारे से महज 500 मीटर दूर बताई गई  है। पुराने दस्तावेज बताते हैं कि करीब 98 हेक्टेयर जमीन बाढ़ या डूब क्षेत्र में आती है। नदी का बाढ़ मैदान उसका प्राकृतिक सेफ्टी वाल्व होता है। जब उस पर कंक्रीट बिछा दिया जाता है, तो पानी का रास्ता बंद हो जाता है। नतीजा? बारिश में यमुना उफनती है, पानी घरों में घुसता है, सीवर का गंदा पानी उसमें मिल जाता है। हैजा, टाइफाइड और अन्य जलजनित बीमारियां दस्तक देती हैं। यह “अर्बन फ्लडिंग” का क्लासिक फॉर्मूला है, जिसे दुनिया बार-बार दोहरा रही है, और हम सीख नहीं रहे। आगरा की पुरानी बाढ़ की घटनाएं याद दिलाती हैं कि नदी कभी माफ नहीं करती।

ताजमहल: सफेदी से पीली पड़ती विरासत

ताज ट्रेपेजियम जोन पहले ही प्रदूषण से जूझ रहा है। हवा में पार्टिकुलेट मैटर 350 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुंच चुका है, जबकि सुरक्षित मानक मात्र 100 है। अब इस मेगा प्रोजेक्ट से उठने वाली धूल, डीजल वाहनों की कतारें और बढ़ती आबादी ताज को और क्या हालत में ले जाएगी? मार्बल धीरे-धीरे पीला पड़ेगा। चमक फीकी पड़ जाएगी। दुनिया का यह अजूबा थका-हारा दिखने लगेगा। पर्यटन गिरेगा। आगरा की अर्थव्यवस्था, जो मुख्य रूप से ताज पर टिकी है, डगमगाएगी। नदी के नाम पर शहर बसाना और उसी नदी व विरासत को बीमार करना, क्या यही विकास है? क्या हम सात अरब रुपये खर्च करके दुनिया के सबसे खूबसूरत स्मारक को धीरे-धीरे मरने के लिए छोड़ रहे हैं?

हवा और गर्मी: शहर या भट्ठी?

आगरा में हरियाली मात्र 6 प्रतिशत से भी कम है। राष्ट्रीय लक्ष्य 33 प्रतिशत है। पेड़ नहीं तो शहर तंदूर बन जाएगा। “अर्बन हीट आइलैंड” इफेक्ट से तापमान 5-6 डिग्री बढ़ जाएगा। हीट स्ट्रोक के मामले बढ़ेंगे। सबसे पहले बुजुर्ग और गरीब चपेट में आएंगे। हवा पहले ही जहरीली है। नया कंक्रीट, नई धूल, नई गाड़ियां, यह शहर सांस ले पाएगा भी या नहीं? गर्मी की लहरें और प्रदूषण मिलकर जीवन को मुश्किल बना देंगे।

सीवर और गंदगी: यमुना की अंतिम सांस?

आगरा के ज्यादातर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट पहले से नाकाम हैं। 90 से ज्यादा नाले बिना ट्रीटमेंट के सीधे यमुना में गिर रहे हैं। डेढ़ लाख लोगों का अतिरिक्त गंदा पानी कहां जाएगा? नए प्लांट बने भी तो क्या वे ईमानदारी से चलेंगे? या फिर वही पुरानी कहानी, कागज पर साफ, जमीन पर गंदा? यमुना पहले ही मरने की कगार पर है। इस प्रोजेक्ट से उसकी अंतिम सांस भी छिन जाएगी।

कागजी मंजूरी, जमीनी खतरा

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि पूरे प्रोजेक्ट का पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं की गई। पहले शिलान्यास, बाद में अध्ययन। पहले ताली, फिर तफ्तीश। यह उल्टी गाड़ी है। नियम कहते हैं: EIA पहले, जन सुनवाई पहले। यहां सब कुछ उलट-पुलट हो रहा है। राज्य स्तर की SEIAA मंजूरी अक्सर औपचारिकता बनकर रह जाती है। केंद्र की सख्त नजर से बचने के लिए परियोजना को “कैटेगरी B” में रखा जाता है। यही सबसे बड़ा छेद है, जिससे पूरी नाव डूब सकती है।

खेत से कंक्रीट: किसकी कीमत पर विकास?

रैपुर और रहान कलां की जमीन उपजाऊ “खादर” क्षेत्र है। पीढ़ियों से खेती का आधार। इसे कंक्रीट में बदलना सिर्फ जमीन का नहीं, एक पूरी जीवनशैली का नुकसान है। किसान कहां जाएंगे? उनकी फसलें, उनकी आय, उनकी पहचान: सब खत्म। और क्या आगरा को सचमुच इतनी नई जमीन की जरूरत है, जब पुराने प्रोजेक्ट आधे-अधूरे पड़े हैं?

 कल का भूतिया शहर?

पानी नहीं, सीवर नहीं, हवा जहरीली, तो लोग रहेंगे क्यों? भारत में ऐसे कई “मॉडर्न टाउनशिप” पहले से आधे खाली पड़े हैं। धीरे-धीरे वे स्लम बन गए। यह परियोजना भी उसी रास्ते पर जा सकती है, आज का सपना, कल का वीरान मंजर।

नदियों के नाम पर शहर बसाना आसान है। नदियों को बचाना मुश्किल। यमुना पहले ही कराह रही है। ताज पहले ही थक चुका है। तो यह परियोजना इलाज है… या आखिरी चोट?


Thursday, April 9, 2026

 आरोग्य वन

अब हाईवे सिर्फ़ सड़क नहीं, दवा भी देंगे।

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

9 अप्रैल 2026

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9 अप्रैल 2026 को राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण भारत ने ‘आरोग्य वन’ पहल शुरू की। राजमार्गों के किनारे अब औषधीय पेड़ों के जंगल उगेंगे। सफ़र होगा, और साथ में सेहत का पैग़ाम भी मिलेगा।

सड़कें दौड़ती थीं। अब पेड़ भी साथ दौड़ेंगे। हवा में सिर्फ़ धूल नहीं, शिफ़ा की ख़ुशबू भी होगी।

अब ज़रा पीछे चलते हैं।

National Highways Authority of India यानी NHAI, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के तहत एक अहम संस्था है। 1995 में बनी। आज देश के लगभग 1,32,500 किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्गों में से 92,000 किलोमीटर से ज़्यादा इसकी निगरानी में हैं।

पिछले साल 2025-26 में 5,313 किलोमीटर नई सड़कें बनीं। लक्ष्य से 15 फ़ीसदी ज़्यादा। काग़ज़ पर यह तरक़्क़ी है। ज़मीनी हक़ीक़त में? कुछ सवाल भी हैं।

सड़क बनी, तो जंगल कटा। वहां बढ़े, तो धुआँ बढ़ा। रफ़्तार आई, तो ख़ामोशी भागी। यही कसक ‘आरोग्य वन’ की वजह बनी।

विकास की दौड़ में प्रकृति हाँफने लगी थी। अब उसे थोड़ा सहारा दिया जा रहा है।

योजना क्या है? सरल लफ़्ज़ों में, जहाँ हाईवे के किनारे खाली ज़मीन है, वहाँ औषधीय पेड़ लगाए जाएंगे। इसे थीमैटिक मेडिसिनल ट्री प्लांटेशन कहा गया है। नाम थोड़ा भारी है, मंशा सीधी, धरती को फिर से ज़िंदा करना।

पहले चरण में 17 जगहों पर काम शुरू होगा। कुल 62.8 हेक्टेयर ज़मीन पर 67,462 पेड़ लगाए जाएंगे। 11 राज्यों में यह हरियाली फैलेगी; मध्य प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली-एनसीआर, गुजरात, कर्नाटक, ओडिशा, तमिलनाडु, राजस्थान, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश।

योजना छोटी नहीं है। 188 हेक्टेयर ज़मीन चिन्हित हो चुकी है। मानसून 2026 में असली इम्तिहान होगा। बारिश आई, तो पौधे भी मुस्कुराएँगे।

कौन से पेड़ लगेंगे? यह कोई साधारण हरियाली नहीं। यह ‘इलाज वाली हरियाली’ है।

नीम होगा, कड़वा, मगर कारगर।आँवला होगा, खट्टा, मगर फ़ायदेमंद।जामुन होगा, मीठा, मगर शुगर का दुश्मन। इमली, नींबू, गूलर, मौलसरी, हर पेड़ अपनी दास्तान, अपनी दवा।

कुल 36 तरह के पेड़ चुने गए हैं। इलाक़े के मौसम के हिसाब से लगाए जाएंगे। यानी, सिर्फ़ दिखावा नहीं—समझदारी भी। इन पेड़ों से सिर्फ़ इंसान नहीं, परिंदे भी लौटेंगे। मधुमक्खियाँ गुनगुनाएँगी। छोटे जीव फिर से घर बसाएँगे।

हाईवे अब ‘ग्रीन कॉरिडोर’ ही नहीं, ‘लाइफ़ कॉरिडोर’ बन सकते हैं।

कहाँ दिखेंगे ये आरोग्य वन? जहाँ नज़र सबसे ज़्यादा जाती है। टोल प्लाज़ा। इंटरचेंज। वेज़-साइड सुविधाएँ। यानी, सरकार चाहती है कि लोग देखें। देखें, समझें, और शायद थोड़ा बदलें। यह पहल सिर्फ़ पेड़ लगाने की नहीं। यह एक पैग़ाम है; “तरक़्क़ी और तबीयत, दोनों साथ चल सकते हैं।”

मक़सद क्या है? पहले पेड़ लगते थे—बस हरियाली के लिए। अब पेड़ लगेंगे: सोच के साथ। यह पहल आयुर्वेद को भी सलाम करती है। हमारी पुरानी दवा, हमारी पुरानी दास्तान।

आरोग्य वन एक तरह का खुला मदरसा होंगे; जहाँ पेड़ किताब हैं, और छाँव उनका सबक। फ़ायदे भी गिन लीजिए हवा साफ़ होगी। मिट्टी बचेगी।कार्बन घटेगा। लोग सीखेंगे। रोज़गार मिलेगा। गाँव जुड़ेगा। और सबसे अहम, हम अपनी जड़ों से फिर जुड़ेंगे।

Green Highways Policy 2015 पहले से ही हरित गलियारों की बात करती है। ‘आरोग्य वन’ उसी क़दम को आगे बढ़ाता है। थोड़ा और दिल से, थोड़ा और दिमाग़ से।

लेकिन एक सवाल अभी भी हवा में तैर रहा है।

क्या यह पहल ज़मीन पर भी उतनी ही हरी होगी, जितनी काग़ज़ पर है?

पेड़ लगाना आसान है। उन्हें बचाना, असल इम्तिहान है।

अंत में, हाईवे अब सिर्फ़ मंज़िल तक नहीं ले जाएंगे। शायद, बेहतर ज़िंदगी तक भी ले जाएँ। अगर ‘आरोग्य वन’ सच में फलते-फूलते हैं, तो यह पहल मिसाल बन सकती है।

वरना, फाइलों की धूल में एक और सपना दफ़न हो जाएगा। सड़कें बनाना हुनर है। प्रकृति बचाना ज़िम्मेदारी।


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जो डांसते हैं वो ही जीते हैं!

आओ डांस करें और स्वस्थ रहें!

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

11 अप्रैल, 2026

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नाचो… या यूँ कहें, जी लो?

आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में साँस भी हाँफने लगती है। दिल थका-थका सा महसूस होता है। ऑफिस, ट्रैफिक, स्क्रीन, डेडलाइन, सब कुछ शरीर और दिमाग पर बोझ बन जाता है। ऐसे में क्या करें? जवाब बेहद सरल है, नाचो। खुलकर, बेपरवाह, बिना किसी नियम-कानून के। 

विश्व नृत्य दिवस सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि एक याद दिलाने वाला संदेश है कि हमारे जिस्म और रूह दोनों को हरकत की ज़रूरत है। 

कोई महँगा जिम नहीं, कोई भारी मशीनरी नहीं। आपका छोटा सा कमरा ही आपका रंगमंच है। आपका दिल ही संगीत है। बस एक हल्की-फुल्की धुन, थोड़ी जगह और आप तैयार। 

यहां प्रस्तुत है आपके लिए एक छोटा-सा लेकिन बेहद खुशगवार डांस रूटीन । 

इसमें मॉडर्न डांस की आज़ादी है, जहाँ शरीर अपनी मर्ज़ी से बहता है, और क्लासिकल डांस की नफासत है, जहाँ हर हरकत में सुंदरता और अनुशासन है। 

शुरुआत करने वाले लोग आसानी से कर सकते हैं। जो थोड़ा-बहुत जानते हैं, वे इसमें और गहराई डाल सकते हैं। कुल मिलाकर तीन मिनट का यह सफर आपकी ज़िंदगी को नई ताज़गी देगा।

नाच के फायदे, सिर्फ पसीना नहीं, अंदर तक सुकून मिलेगा, शुरू तो करो।

कंटेम्परेरी डांस में बहाव है। जैसे नदी अपनी राह खुद बनाती है। शरीर ढीला पड़ता है, तनाव पिघलने लगता है। क्लासिकल डांस में अनुशासन है। हर कदम नाप-तौल कर उठाया जाता है, हर मुद्रा में तहज़ीब होती है। दोनों जब मिलते हैं तो जादू हो जाता है। 

शरीर मजबूत होता है। संतुलन सुधरता है। मांसपेशियाँ धीरे-धीरे टोन होती हैं बिना जोर-जबर्दस्ती के। दिमाग शांत होता है। एंडोर्फिन हार्मोन का तूफान उठता है और मूड एकदम खिल जाता है; जैसे बारिश के बाद सूरज निकल आए। साँस और हरकत का तालमेल ध्यान की तरह काम करता है। मन के अंदर का शोर कम होता है, शांति फैलती है। 

एक बात हमेशा याद रखें, जल्दबाज़ी मत कीजिए। घुटने नरम रखिए। अगर कहीं दर्द महसूस हो तो तुरंत रुक जाएँ। दर्द दुश्मन नहीं, बस शरीर का एक इशारा है। 

अब आइए, इस तीन मिनट के रूटीन को स्टेप-बाय-स्टेप, आसान भाषा में समझते हैं। कमरा छोटा हो या बड़ा, कोई फर्क नहीं। बस एक शांत, सुखदायक गाना चला लीजिए, जैसे सॉफ्ट इंस्ट्रुमेंटल, लो-फाई बीट या कोई प्यारा ग़ज़ल।

वार्म-अप: शरीर को तैयार करने का अदब (45 सेकंड)

1. सीधे खड़े हो जाएँ। पैर कंधे की चौड़ाई जितने अलग। घुटने हल्के झुके रहें। 

2. गर्दन को धीरे-धीरे दाएँ-बाएँ घुमाएँ। जैसे सुबह उठकर आलस्य में अंगड़ाई ले रहे हों। 4-5 बार प्रत्येक दिशा में। साँस अंदर लेते हुए ऊपर की तरफ और छोड़ते हुए नीचे। 

3. कंधों को कान की तरफ ऊपर खींचें, फिर पीछे की तरफ गोल घुमाते हुए नीचे छोड़ दें। 6 बार। यह कंधों का सारा तनाव निकाल देगा। 

4. दोनों हाथ कमर पर रखें। कमर को धीरे-धीरे गोल-गोल घुमाएँ, पहले दाएँ, फिर बाएँ। जैसे कोई पुरानी घड़ी धीरे-धीरे चल रही हो। कोई ज़ोर नहीं, सिर्फ लय। 4-4 बार प्रत्येक साइड। 

मुख्य रूटीन: आज़ादी और अनुशासन का खूबसूरत मेल (1 मिनट 30 सेकंड)

पहले कंटेम्परेरी हिस्सा, शरीर को लहराने दो:

1. सिर से शुरू करें। रीढ़ की हड्डी को लहर की तरह आगे झुकाएँ। सिर पहले झुके, फिर गर्दन, फिर छाती, फिर कमर। जैसे हवा में पेड़ की डाल हिल रही हो। फिर धीरे-धीरे सीधे हो जाएँ। इसे 6-7 बार दोहराएँ। साँस को पूरी तरह छोड़ते हुए झुकें और अंदर लेते हुए सीधे हों। 

2. अब बॉडी आइसोलेशन। सिर्फ कंधे हिलाएँ, ऊपर-नीचे, बिना बाकी शरीर हिलाए। 8 बार। फिर सिर्फ कूल्हे दाएँ-बाएँ घुमाएँ। बाकी शरीर बिल्कुल स्थिर। यह नियंत्रण सिखाता है और कोर मसल्स को मजबूत करता है। 

अब क्लासिकल हिस्सा, सुंदरता और संतुलन:

1. हाथों को दोनों तरफ फैलाएँ, हथेलियाँ ऊपर की तरफ। फिर उन्हें धीरे-धीरे दिल की तरफ खींचें। गोल-गोल घुमाते हुए फिर फैलाएँ। जैसे कोई पुरानी कहानी हाथों से बयान कर रहे हों। 6-7 बार। नज़र आगे रखें, गर्दन सीधी। 

2. पैरों से हल्का साइड स्टेप। दाएँ पैर को दाईं तरफ ले जाएँ, पंजे पर वजन डालें। फिर बाएँ पैर को जोड़ें। शरीर एकदम सीधा, कमर न झुके। 8 स्टेप्स दाईं तरफ, फिर 8 बाईं तरफ। यह नजाकत और संतुलन सिखाता है। 

अंत: ठहराव का सुकून (45 सेकंड)

1. सीधे खड़े हो जाएँ। आँखें बंद करें। गहरी साँस अंदर लें (4 सेकंड), रोकें (4 सेकंड), धीरे छोड़ें (6 सेकंड)। 

2. दोनों हाथ ऊपर उठाएँ, हथेलियाँ आसमान की तरफ। फिर धीरे-धीरे नीचे लाएँ जैसे कुछ आशीर्वाद ले रहे हों। 

3. अब एक पैर पर खड़े होकर संतुलन बनाएँ। दूसरे पैर को घुटने से मोड़कर रखें। 10 सेकंड। फिर पैर बदलें। यह पूरा शरीर को शांत करता है। 

आदत कैसे बनाएँ, ताकि असर गहरा हो

हफ्ते में सिर्फ तीन-चार दिन काफी हैं। रोज़ 10 मिनट भी करें तो जीवन बदल जाएगा। एक छोटी डायरी रख लें। हर दिन लिखें—“आज कैसा महसूस हुआ?” संगीत बदलते रहें। कभी दोस्त को बुलाकर साथ नाचें—मज़ा दोगुना हो जाएगा। 

शुरुआत में स्टेप्स धीरे करें। धीरे-धीरे स्पीड बढ़ाएँ। हर छोटी प्रगति का जश्न मनाएँ। एक हफ्ते बाद आप खुद महसूस करेंगे कि ऊर्जा बढ़ गई है, नींद अच्छी आती है और चेहरे पर मुस्कान रहती है। 

इस विश्व नृत्य दिवस पर नाच को अपना हमसफर बना लीजिए। दिल से हिलिए, खुलकर मुस्कुराइए। क्योंकि जब आप नाचते हैं, तभी सच में जीते हैं। 

Wednesday, April 8, 2026

 तमाशा

दस नई टाउनशिप्स का नाम नदियों पर रखने से यमुना नहीं बचेगी

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बृज खंडेलवाल द्वारा

10 अप्रैल 2026

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आगरा के चमकदार रियल एस्टेट ब्रोशरों में एक खामोश सा तमाशा सजाया जा रहा है। दस नई टाउनशिप्स: सिंधुपुरम, गंगापुरम, यमुनापुरम, नर्मदापुरम, अपने नामों में पवित्र नदियों की याद संजोए हुए हैं। पहली नज़र में यह एक श्रद्धांजलि लगती है, जैसे हमारी सभ्यता अपने जलस्रोतों को सलाम कर रही हो। कागज़ पर बने नक्शे हरे-भरे दिखते हैं, भाषणों में तरक़्क़ी और पर्यावरण का ज़िक्र होता है। मगर इस चमक के पीछे एक कड़वी हक़ीक़त छुपी है, जो हर दिन और भी गहरी होती जा रही है।

कुछ ही दूरी पर बहती यमुना एक बिल्कुल अलग दास्तान कहती है। वह नदी कम, एक थकी हुई, दम तोड़ती धारा ज़्यादा लगती है। काला पड़ चुका पानी, बदबू, झाग और ठहराव; ये सब मिलकर उस दर्द की तस्वीर बनाते हैं जिसे हम देखना नहीं चाहते। हज़ारों लोग नदी किनारे घरों का ख़्वाब खरीद रहे हैं, लेकिन उसी नदी की साँसें घुट रही हैं। यह विरोधाभास नहीं, एक संगीन विडंबना है।

यही हमारे दौर का सबसे बड़ा फ़रेब है। हम नामों में पवित्रता ढूंढ लेते हैं, मगर ज़मीनी हक़ीक़त से आँख चुरा लेते हैं। यमुना को किसी टाउनशिप के नाम में जगह नहीं चाहिए। उसे साफ़ पानी चाहिए, बहाव चाहिए, और एक ईमानदार कोशिश चाहिए जो उसे ज़िंदा रख सके।

यमुना कोई मामूली नदी नहीं है। यमुनोत्री से लेकर प्रयागराज तक लगभग 1,376 किलोमीटर का सफ़र तय करती यह धारा करोड़ों लोगों के जीवन से जुड़ी है। यह आस्था है, रोज़गार है, विरासत है। लेकिन दिल्ली से गुजरने वाला इसका छोटा सा हिस्सा दुनिया के सबसे प्रदूषित हिस्सों में गिना जाता है। यहाँ पानी में घुली ऑक्सीजन लगभग नदारद है। जलीय जीवन की कोई गुंजाइश नहीं बची।

त्योहारों के समय जो दृश्य सामने आता है, वह दिल दहला देता है। लोग श्रद्धा से डुबकी लगाते हैं, मगर पानी झाग से भरा होता है। यह झाग किसी चमत्कार का नहीं, बल्कि डिटर्जेंट और रसायनों का नतीजा है। एक तरह से हम एक बीमार नदी से जीवन की दुआ मांगते हैं।

सरकारों के पास इसका जवाब अक्सर बजट के आंकड़ों में मिलता है। हज़ारों करोड़ रुपये खर्च किए जाते हैं। योजनाएँ बनती हैं, घोषणाएँ होती हैं, और हर बार उम्मीद जगाई जाती है कि अब हालात बदलेंगे। लेकिन सच यह है कि निवेश और नतीजों के बीच एक गहरी खाई बनी हुई है। पैसा बहता है, मगर नदी साफ़ नहीं होती।

दिल्ली की सफाई योजनाएँ मुख्यतः सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स पर टिकी हैं। इनकी संख्या बढ़ाने, उन्हें आधुनिक बनाने और ड्रेनेज सुधारने की बातें होती हैं। यह सब ज़रूरी है, मगर काफ़ी नहीं। शहर हर दिन भारी मात्रा में सीवेज पैदा करता है, और मौजूदा संयंत्र उस दबाव को झेल नहीं पा रहे। कई प्लांट आधी क्षमता पर चलते हैं। तकनीक पुरानी है, रखरखाव अधूरा है, और व्यवस्था बिखरी हुई है।

और सबसे बड़ी समस्या यह है कि सारा सीवेज इन प्लांट्स तक पहुँचता ही नहीं। टूटे-फूटे सीवर, अवैध कनेक्शन और लापरवाही का आलम यह है कि गंदा पानी सीधे नदी में गिरता है। ऐसे में कितनी भी बड़ी योजना बना ली जाए, उसका असर सीमित ही रहेगा।

गुरुग्राम की कहानी इस संकट को और गहरा करती है। तेज़ी से बढ़ते इस शहर ने विकास तो देखा, मगर बुनियादी ढांचे को उसी गति से नहीं बढ़ाया। नतीजा यह हुआ कि भारी मात्रा में प्रदूषण यमुना तक पहुँचने लगा। सीवेज और औद्योगिक कचरा बिना पर्याप्त उपचार के नदी में जाता है। क़ानून मौजूद हैं, लेकिन उनका पालन कमज़ोर है।

यह पूरा परिदृश्य एक बड़ी प्रशासनिक नाकामी की तरफ़ इशारा करता है। अलग-अलग राज्य अपनी-अपनी सीमाओं में काम करते हैं, जबकि नदी किसी सरहद को नहीं मानती। अगर एक जगह सुधार हो और दूसरी जगह से प्रदूषण जारी रहे, तो पूरी मेहनत बेकार हो जाती है।

अब ज़रूरत है सोच बदलने की। परियोजनाओं के स्तर से आगे बढ़कर एक समग्र व्यवस्था बनानी होगी। छोटे और विकेंद्रीकृत समाधान अपनाने होंगे। स्थानीय स्तर पर ट्रीटमेंट की व्यवस्था करनी होगी। प्राकृतिक तरीकों; जैसे आर्द्रभूमि और हरित बफर ज़ोन, को अपनाना होगा।

इसके साथ ही जवाबदेही तय करनी होगी। जो प्रदूषण फैलाए, उसे इसकी क़ीमत चुकानी पड़े। निगरानी पारदर्शी हो, आंकड़े सार्वजनिक हों, और उल्लंघन पर सख़्त कार्रवाई हो। यह तभी मुमकिन है जब नीयत साफ़ हो और अमल सख़्त।

सबसे अहम बात, एक ऐसा तंत्र बने जो पूरे यमुना बेसिन को एक इकाई की तरह देखे। राज्यों के बीच तालमेल हो, साझा लक्ष्य हों, और नियमों का पालन सुनिश्चित किया जाए।

यमुना का संकट केवल पर्यावरण का मसला नहीं है। यह हमारे शासन, हमारी प्राथमिकताओं और हमारी संवेदनशीलता का आईना है। नदी को नामों से नहीं, काम से बचाया जा सकता है।

हमें यह मानना होगा कि पैसा अकेला हल नहीं है। जब तक नीयत में खोट, व्यवस्था में ढील और सोच में दिखावा रहेगा, तब तक यमुना की हालत नहीं सुधरेगी।

वक़्त अभी हाथ से पूरी तरह निकला नहीं है, लेकिन मोहलत कम है। लोग प्रार्थना कर चुके हैं, नेता वादे कर चुके हैं, और बाज़ार अपने सपने बेच चुका है। अब ज़रूरत है एक सच्ची, ठोस और ईमानदार कोशिश की।

यमुना को बस एक चीज़ चाहिए; जीने का हक़।


Tuesday, April 7, 2026

 समय से नहीं, समय के ऊपर चलते हम?

लेट लतीफी नहीं, अच्छे समय का गायन, भारतीय जीवन की असली टाइमिंग


बृज खंडेलवाल द्वारा 



घड़ी टिक-टिक करती है। हम मुस्कुराते हैं। जितने बजे का कार्यक्रम होता है, उतने बजे हम तैयार होना शुरू करते हैं। टैम से पहुंचकर होस्ट को टेंशन नहीं देने का। अपने यहाँ समय चलता नहीं… बहता है।

पश्चिम के पास जीपीएस है। हमारे पास उससे कहीं आगे की चीज़ है। एक अदृश्य, आत्मिक नेविगेशन सिस्टम। रास्ते में ट्रैफिक हो, बरसात हो, अचानक कोई बारात मिल जाए, या बस मन कहे कि अभी बैठकर चाय पी लो… समय खुद एडजस्ट हो जाता है। कई बार ऐन वक्त कुतिया हंगासी हो जाती है।

हम देर को संदर्भ के साथ पहुँचना कहते हैं। सवाल यह नहीं कि आप लेट हैं। सवाल यह है कि आप खाली तो नहीं आए?

अपनी सोसायटी में समय सीधी रेखा नहीं है। यह गोल है। लचीला है। बिल्कुल भारतीय लोकतंत्र की तरह। सुबह 10 बजे की मीटिंग दो दुनियाओं में एक साथ चलती है। एक में एक बेचारा समय पर पहुँचकर कुर्सियाँ गिन रहा होता है। दूसरी में लोग 10:47 पर प्रवेश करते हैं, पेट भरा हुआ, चेहरे पर शांति, और पहला वाक्य यही… यह मीटिंग व्हाट्सऐप पर हो सकती थी।

पश्चिम का मिनट लोहे की छड़ है।

भारत का मिनट रबर बैंड है।

खींचो, मोड़ो, जी लो।

इतिहास उठाकर देख लीजिए। ताजमहल 22 साल में बना। क्या शाहजहाँ हर देरी पर माथा पकड़कर बैठ गया था? नहीं। उसने चाय पी। इंतजार किया। गुंबद आखिर आ ही गया। आज दुनिया फोटो खिंचवाती है, ठेकेदार का “बस पाँच मिनट” इतिहास बन गया।

रेलवे अंग्रेज लाए थे, टाइम टेबल के साथ। हमने उसे आत्मा दे दी। अब ट्रेनें समय पर नहीं चलतीं, आस्था पर चलती हैं। 6:15 की शताब्दी लेट नहीं है। वह बस इरादे और वास्तविकता के बीच कहीं ध्यान लगा रही है।

और बहाने? अरे वह तो हमारी सांस्कृतिक धरोहर है।

नौसिखिया कहेगा, ट्रैफिक था।

मध्यम स्तर वाला कहानी गढ़ेगा, जुलूस था, शायद त्योहार, शायद राजनीति, सड़कों ने साथ छोड़ दिया।

मास्टर खिलाड़ी आएगा, बैठेगा, पानी मांगेगा, और बोलेगा, ड्राइवर के चचेरे भाई के पड़ोसी की तबीयत… छोड़िए, बहुत मुश्किल सुबह थी। आपने खाना खाया?

असली कला तब है जब आप देर से आएँ और सामने वाला माफी माँगने लगे कि वह गलत जगह इंतजार करता रहा।

हमारे वादे भी सीधे नहीं होते। “मैं पहुँच रहा हूँ” का मतलब है कि इस क्षण मेरी आत्मा पहुँचने की इच्छा रखती है। शरीर का क्या होगा, वह भगवान जाने।

“जल्द मिलते हैं” एक भावना है, योजना नहीं।

“एंड ऑफ डे” किस दिन का अंत है, यह शोध का विषय है।

और शादी? वह तो समय की अंतिम परीक्षा है।

निमंत्रण में 7 बजे लिखा होता है।

सच्चाई में रात 10 बजे भी लोग पूछ रहे होते हैं, दूल्हा आया क्या?

बारात तीन घंटे देर से।

लड़की वाले खुश। तैयारी पूरी हुई।

फेरे तब शुरू जब पंडित और कैटरर की बहस खत्म।

डिनर आधी रात।

डीजे मंगलवार तक।

यह अव्यवस्था नहीं है। यह सामूहिक सहमति है कि समय को इतना गंभीर मत लो।

जो लोग समय पर पहुँचते हैं, उनसे एक छोटा सा सवाल है। इतना समय था आपके पास? 7:30 पर तैयार होकर गाड़ी में बैठे रहे? मोबाइल रिफ्रेश करते रहे? और फिर 8 बजे पहुँचकर मौसम पर चर्चा की?

जो 10 बजे आता है, वह दिन जीकर आता है। उसके पास किस्से होते हैं। वही पार्टी है।

और अगर कोई टोक दे, आपने 6 बजे कहा था…

तो मुस्कुराइए।

कहिए, हाँ, और मैं आ गया।

स्पष्टीकरण मत दीजिए। स्पष्टीकरण अपराधबोध की निशानी है। आप उस सभ्यता के नागरिक हैं जिसने शून्य दिया। आपको पता है कि शून्य और 6 बजे में गहरा रिश्ता है… दोनों ही लचीले हैं।

सच तो यह है कि हम इसी आईएसटी पर चलते हुए दुनिया की सबसे बड़ी लोकतंत्र बन गए। मंगल तक पहुँच गए। अर्थव्यवस्था दौड़ा दी।

हम समय से नहीं बंधे। समय हमसे बंधा है।

और अगर कभी हम सचमुच समय पर हो गए…तो शायद यह सारा जादू खत्म हो जाए। इसलिए हम देर नहीं करते।हम बस समय को थोड़ा और जी लेते हैं।

 


वीआईपी संस्कृति: हमारे 'भव्य' समाजवाद का 'आलीशान' सलाम

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बृज खंडेलवाल द्वारा

9 अप्रैल 2026 

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अहा, असली भारतीय पल! आप लेट हैं। फैशनेबली लेट नहीं। बॉलीवुड हीरो की एंट्री वाली लेट नहीं। नहीं, बल्कि सही मायने में, ट्रैजिकली, “हे भगवान, बॉस मुझे नौकरी से निकाल ही देगा” वाली लेट। पसीना आपकी रीढ़ से टपकता है जैसे किसी दिवालिया कंपनी की तिमाही रिपोर्ट। और फिर: धमाका! सड़क जम जाती है। धीमी नहीं। जाम नहीं। जम जाती है। जैसे आपकी सैलरी का इंक्रीमेंट, जो कभी आता ही नहीं।

क्यों?

क्योंकि कहीं, किसी आम आदमी की औकात से परे, एक वीआईपी... चल रहा है। पहुंच नहीं रहा। सेवा नहीं कर रहा। बस... चल रहा है। जैसे किसी फिल्म का सेट हो, और आप एक्स्ट्रा हों।

सायरन फट पड़ते हैं जैसे दिवाली के वो पटाखे, जो टैक्सपेयर के पैसे से ही नहीं, बल्कि हमारे धैर्य की भी धज्जियाँ उड़ाते हुए स्पॉन्सर किए गए हों। ट्रैफिक पुलिस हवा से प्रकट हो जाती है, परेशान कबूतरों की तरह हाथ लहराती हुई, जो शायद खुद सोच रहे हों कि ये कबूतर क्यों नहीं हैं। बैरिकेड्स, जो चुनावी वादों से भी तेज खड़े हो जाते हैं, आपकी उम्मीदों को और भी धीमा कर देते हैं। और आप? आप वहीं खड़े रहते हैं। हेलमेट हाथ में, उम्मीद जेब में, और गरिमा कब की कहीं और, शायद किसी वीआईपी की गाड़ी के नीचे कुचली जा चुकी है। जैसे कोई बाराती जिसका बैंड वाला, दूल्हे की जगह दुल्हन के साथ ही हवा हो गया हो।

स्वागत है दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में, जहाँ समानता एक खूबसूरत थ्योरी है, और वीआईपी काफिले उसकी रोजाना की 'मौत' के जनाजे।

हमें बताया गया था कि समाजवाद का मतलब 'सब बराबर'। पर किसी ने ये नहीं बताया कि कुछ ‘इक्वल-प्लस’, ‘इक्वल-प्रीमियम’ और ‘इक्वल-विद-लाइफटाइम-फ्री-फास्टैग’ के स्पेशल पैकेज भी आते हैं, जो सिर्फ 'खास' लोगों के लिए होते हैं।

इस महान गणराज्य में, आपका वोट पवित्र है। आपका समय? अरे, वो तो कबाड़ है, जब तक वीआईपी की मर्ज़ी हो।

आप सिग्नल पर रुकते हैं। वे सिग्नल को 'वैकल्पिक' मानकर 'मिटा' देते हैं।

आप कतार में खड़े होते हैं। वे कतार को "महत्वपूर्ण लोगों के लिए, जो आम जनता से 'अलग' हैं, के लिए विशेष प्रवेश" करार दे देते हैं।

आप अपॉइंटमेंट बुक करते हैं। वे पूरे शहर को 'अपने लिए' बुक कर लेते हैं।

मंदिर की लाइन छह घंटे लंबी। भक्त भजन गाते हैं, ध्यान करते हैं, शानदार तरीके से बूढ़े हो रहे हैं। अचानक, 'द ग्रेट एंट्री' होती है। नेताजी, परिवार, विस्तारित परिवार, भावनात्मक समर्थन वाले चचेरे भाई, और एक कन्फ्यूज्ड कुत्ता (शायद वो भी वीआईपी कैटेगरी में हो!)। वे सीधे अंदर चले जाते हैं। भगवान स्पष्ट रूप से वीआईपी ड्यूटी पर हैं, या शायद वीआईपी की पूजा कर रहे हैं।

“हे भक्त, थोड़ा रुकिए। भगवान अभी ‘प्राथमिकता दर्शन’ में व्यस्त हैं, जो सिर्फ वीआईपी के लिए आरक्षित है।”

याद है वो महान लाल बत्ती क्रांति? वो भव्य घोषणा भाजपा सरकार की। वो भावुक राष्ट्रीय डिटॉक्स। “अब कोई लाल बत्ती नहीं!” गर्जा सिस्टम, जैसे कोई नया एड-ब्लॉकर लॉन्च हुआ हो।

और बस, 'पुफ्फ'! वीआईपी संस्कृति गायब हो गई।

...सिवाय, वो गायब नहीं हुई। उसने सिर्फ अवतार बदल लिया। लाल बत्ती ने आध्यात्मिक यात्रा कर ली। उसने मोक्ष प्राप्त किया। वो अब नीली लाइट्स, पायलट कारों, काली फिल्म वाली खिड़कियों और उस अनोखे MEP (मोर इक्वल पर्सन) के ऑरा में प्रकट होती है।

क्योंकि चलिए, ईमानदार बनें। जब आपका अहंकार बत्ती से ज्यादा चमकता हो, तो बत्ती की क्या ज़रूरत?

हम औपनिवेशिक नशे को दोष देते हैं। लेकिन कम से कम ब्रिटिश, अपनी 'राज' वाली दादागिरी में, ब्रांडिंग में ईमानदार थे। उन्होंने इसे “राज” कहा। हम इसे “पब्लिक सर्विस” कहते हैं, जहां पब्लिक सर्विस खुद इंतजार करती है, जब तक कि 'खास' लोग अपनी सर्विस पूरी न कर लें।

1947 में शासक बदल गए। नियम? वो तो बस, 'अपडेट' हो गए।

ताज गायब हो गए। काफिले 'अपग्रेड' हो गए।

पहले साहब कहता था, “मेरे रास्ते से हटो।”

अब 'नेताजी' कहते हैं, “मेरे लोकतंत्र से हटो।”

और सुरक्षा; ओह, वो भव्य, सिनेमाई, स्लो-मोशन सुरक्षा।

जेड-प्लस। जेड-माइनस। जेड-इनफिनिटी। इस रफ्तार से तो उनकी परछाइयां भी जल्दी 'आर्म्ड प्रोटेक्शन' मांगने लगेंगी।

ये आधे नेता ऐसे चलते हैं जैसे राष्ट्र का आखिरी बचा वाई-फाई पासवर्ड उनके पास हो। काली एसयूवी फॉर्मेशन में सरकती हुई निकल जाती हैं। जवान, मासूम पैदल यात्रियों को ऐसे घूरते हैं जिनका सबसे बड़ा अपराध है "दो-पहिया" होना।

खतरे की धारणा? बिल्कुल।

इधर, पब्लिक सर्विसेज ने भी चुपके से वही 'फिलॉसफी' अपना ली है। एयरपोर्ट्स पर वीआईपी लाउंज, जहां समय अलग 'वीआईपी स्पीड' से बहता है। हॉस्पिटल्स में वीआईपी वार्ड, जहां बीमारियां भी सम्मान दिखाती हैं और विनम्रता से इंतजार करती हैं (शायद वीआईपी की मर्ज़ी हो तो)। रेलवे में वीआईपी कोटा, जहां वेटिंग लिस्ट भी खुद को 'हीन' महसूस करती है।

आपकी इमरजेंसी उनकी 'छोटी-मोटी' असुविधा।

उनकी (वीआईपी की) 'छोटी-मोटी' असुविधा? राष्ट्रिय इमरजेंसी!

ये असमानता नहीं। ये तो 'कोरियोग्राफी' है। विशेषाधिकार का खूबसूरती से रिहर्स्ड बैले, जहाँ आम आदमी 'बैकग्राउंड प्रॉप नंबर 47' का रोल प्ले करता है।

और समाधान?

अहा, शाश्वत भारतीय समाधान। कमेटियां। पैनल। घोषणाएं। हैशटैग।

“इक्वालिटी इनिशिएटिव 2.0”

“मिशन समता”

“सबका टाइम, सबका ट्रैफिक”

फोटो ऑप्स होंगे। नेता कैमरे पर सादा भोजन खाएंगे, क्रॉस-लेग्ड 11 मिनट के लिए, बिल्कुल, फिर वापस बुलेटप्रूफ बुफे पर लौटेंगे। उनके बच्चे विदेश में समानता पढ़ेंगे, एसी क्लासरूम में, जबकि आप लाल बत्तियों पर धैर्य की शिक्षा लेंगे, जो सिर्फ और सिर्फ आपके लिए हैं।

तो हम यहीं हैं। इंजन ऑफ। गुस्सा ऑन। लोकतंत्र पॉज।

काफिला दूर गायब हो जाता है। सड़क फिर खुल जाती है, जैसे कुछ हुआ ही न हो। जिंदगी फिर से अपनी गति पकड़ लेती है। आप एक्सीलरेट करते हैं। लेट। फिर से।

और कहीं गहरे अंदर, एक शांत अहसास, किसी सायरन से तेज हॉर्न बजाता है:

हमने सामंतवाद खत्म नहीं किया।

हमने उसे 'अपग्रेड' किया है।

अब अगर माफ़ करेंगे, वही काफिला उल्टी दिशा से लौट रहा लगता है।

शायद समानता दूसरी लेन में फंस गई है, या फिर 'विशेष अनुमति' का इंतजार कर रही है।

Monday, April 6, 2026

 क्या भारत सिर्फ वोट डाल रहा है… या सत्ता का हिसाब भी मांग रहा है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

8 अप्रैल 2026

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पड़ोस में युद्ध की गूंज है। सीमाओं के पार बारूद की गंध है। और इसी बीच भारत के चार राज्य वोट डालने निकल पड़े हैं। सवाल सीधा है, लेकिन जवाब धुंधला। क्या ये चुनाव सिर्फ सरकार चुनने के लिए हैं… या सत्ता का लेखा-जोखा मांगने के लिए?

ऊपरी तस्वीर शांत दिखती है। कोई बड़ा उलटफेर नहीं। अनुमान कहते हैं असम में भाजपा की पकड़ बनी रहेगी। तमिलनाडु में स्टालिन की सरकार टिकी रहेगी। केरल में समीकरण ज्यादा नहीं बदलेंगे। पश्चिम बंगाल में हलचल है, पर भूकंप नहीं। यानी नतीजे शायद चौंकाएं नहीं।

लेकिन चुनाव सिर्फ नतीजों का खेल नहीं होते। वे मन की हलचल का आईना भी होते हैं।

इस बार मतदाता एक आवाज में नहीं बोल रहा। चार दिशाओं से चार अलग सुर उठ रहे हैं। केरल की सोच अलग है। बंगाल की धड़कन अलग। असम की बेचैनी अलग। तमिलनाडु का मिजाज अलग। एक शरीर है लोकतंत्र का, लेकिन दिल चार जगह धड़क रहा है।

केरल में मतदाता आज भी पढ़ता हुआ बूथ तक जाता है। वहां विचारधारा अब भी जिंदा है। लेकिन इस बार उस विचार में एक थकान घुली है। मतदान प्रतिशत में मामूली गिरावट आंकड़ा नहीं, संकेत है। लंबे संघर्ष के बाद आई हुई एक धीमी सांस।

पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र कभी शांत नहीं रहता। यहां वोट देना भी एक प्रदर्शन है। भीड़, नारे, जोश। यहां फुसफुसाहट भी फैसला बन जाती है। हर वोट एक बयान है। हर बूथ एक जंग का मैदान।

असम में मामला और गहरा है। यहां वोट सिर्फ सरकार के लिए नहीं डाला जाता। यहां पहचान दांव पर होती है। कौन अपना, कौन पराया। कागज, नागरिकता, जमीन। वोट यहां अधिकार से ज्यादा अस्तित्व बन जाता है।

तमिलनाडु में राजनीति एक रंगमंच है। चेहरे वही हैं, संवाद भी जाने-पहचाने। लेकिन दर्शकों का मूड बदल रहा है। शहरों में एक ठंडापन है। गांवों में अब भी गर्मी बची है। बीच में खड़ा मतदाता सोच रहा है, क्या कहानी अब भी वही रहेगी?

इन सबके नीचे एक अदृश्य धागा है जो चारों राज्यों को जोड़ता है। थकान। महंगाई। और वादों से उपजी निराशा।

वादे तेज होते जा रहे हैं। लेकिन उनका निभना धीमा पड़ता जा रहा है। रसोई में महंगाई की आंच तेज है। युवाओं के हाथ में डिग्री है, लेकिन नौकरी नहीं। घर के बजट में खामोशी है, लेकिन चिंता बहुत बोलती है।

केरल में कल्याण योजनाएं अब सवालों के घेरे में हैं। भरोसा टूट नहीं रहा, लेकिन घिस जरूर रहा है।

बंगाल में बेरोजगारी और कानून व्यवस्था नारों में बदल चुके हैं। राजनीति यहां सीधी टक्कर में है।

असम में पहचान की बहस हर घर तक पहुंच चुकी है। यह मुद्दा नहीं, रोजमर्रा की सच्चाई है।

तमिलनाडु में कर्ज, अपराध और अधूरे वादों की परतें एक जटिल तस्वीर बनाती हैं।

और तभी राजनीति एक पुराना दरवाजा खटखटाती है। आसमान की ओर देखती है। ज्योतिष की एंट्री होती है। ग्रह-नक्षत्रों की चाल पढ़ी जाती है। राजयोग खोजे जाते हैं। मानो जमीन के सवालों का जवाब आसमान में छिपा हो।

लेकिन सच यह है कि चुनाव न तो पूरी तरह गणित हैं, न पूरी तरह किस्मत। यह मनोविज्ञान है। एक छोटी सी लहर पूरी तस्वीर बदल सकती है। तीन प्रतिशत का झटका सत्ता हिला सकता है। एक वीडियो, एक बयान, एक गलती महीनों की मेहनत पर पानी फेर सकती है।

तो यह चुनाव आखिर है क्या?

जनादेश?

एक और पड़ाव?

या एक खामोश ऑडिट?

शायद यह तीनों का मिश्रण है।

अगर सत्ताधारी गठबंधन नए इलाकों में पैर पसारता है, तो उसकी ताकत बढ़ेगी। अगर क्षेत्रीय दल टिके रहते हैं, तो संदेश साफ होगा कि भारत एक नहीं, कई भारतों का देश है।

यहां हर राज्य अपनी भाषा में वोट करता है।

केरल विचारधारा में बोलता है। बंगाल व्यक्तित्व में। असम पहचान में। तमिलनाडु विरासत में।

और इनके बीच खड़ा है आम मतदाता। न नारों में, न बहसों में। चुप। धैर्यवान। थोड़ा थका हुआ। वह वोट देता है उम्मीद में नहीं, राहत की तलाश में। महंगाई से राहत। अनिश्चितता से राहत। अधूरे वादों के बोझ से राहत।

मतपेटी बंद हो जाएगी। स्याही सूख जाएगी। टीवी स्टूडियो का शोर थम जाएगा।

लेकिन असली सवाल वहीं रहेगा। क्या यह सिर्फ वोट था… या सत्ता के खिलाफ दर्ज एक खामोश हिसाब?

 स्क्रीन का साम्राज्य: लोकतंत्र या एल्गोरिद्म का राज?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

7 अप्रैल 2026

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दरवाज़ा खुला है। भीतर कुर्सी पर सरकार नहीं, एक स्क्रीन बैठी है। उंगली रखिए, पहचान हो जाएगी। क्लिक कीजिए, हक मिल जाएगा। सुविधा इतनी सहज कि सवाल पूछना असभ्यता लगे। मगर असली मालिक कौन है? नागरिक या चुपचाप गणना करता एल्गोरिद्म?

भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने की दौड़ में है। अब यह दौड़ सड़कों और कारखानों से आगे निकलकर सर्वरों और प्लेटफॉर्मों पर आ चुकी है। डिजिटल गवर्नेंस अब महज़ औज़ार नहीं रहा, यह राज्य और नागरिक के बीच नए सामाजिक अनुबंध का शिल्पकार बन गया है। पहचान, भुगतान, शिकायत, सब कुछ एक क्लिक पर। लेकिन जहां रोशनी है, वहीं परछाईं भी लंबी होती है।

डिजिटल गवर्नेंस का अर्थ सीधा है। शासन में डेटा, तकनीक और प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल। लक्ष्य भी साफ है। सेवाएं तेज हों, पारदर्शिता बढ़े, नागरिक की भागीदारी मजबूत हो। भारत ने इसे “डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर” के रूप में गढ़ा है। आधार, यूपीआई, ओएनडीसी जैसे प्लेटफॉर्म ने राज्य की क्षमता को कई गुना बढ़ा दिया। 2024-25 में आधार ने 2700 करोड़ से अधिक प्रमाणीकरण किए। डीबीटी के जरिए 90 करोड़ से अधिक लोगों तक सीधे लाभ पहुंचे। MyGov जैसे मंचों ने नागरिक को नीति-निर्माण में आवाज दी।

यहीं लोकतंत्र का डिजिटल रूप दिखता है। लाइनें खत्म। संवाद शुरू।

अब जरा खाड़ी देशों की तरफ देखिए। यूएई और सऊदी अरब ने डिजिटल गवर्नेंस को दक्षता के हथियार की तरह इस्तेमाल किया है। वहां सब कुछ तेज है, सटीक है, केंद्रीकृत है।

फर्क साफ दिखता है। भारत में खुला, सहभागिता आधारित मॉडल, बहस और फीडबैक के साथ। उधर टॉप-डाउन व्यवस्था, नियंत्रण के साथ सेवा। सऊदी अरब में 2024 तक 87 प्रतिशत सरकारी सेवाएं डिजिटल हो चुकी हैं। यूएई “पुलिस विदाउट पुलिसमैन” जैसे मॉडल पर काम कर रहा है, जहां निगरानी इंसान नहीं, तकनीक करती है।

भारत का रास्ता अलग है। यहां डिजिटल लोकतंत्र की कोशिश है। मगर यह रास्ता अभी असमान है। इंटरनेट पहुंच 72 प्रतिशत है, पर ग्रामीण भारत में यह लगभग 55 प्रतिशत तक सिमटी है। लोकतंत्र डिजिटल है, बराबरी अभी अधूरी है।

इस बदलाव ने रिश्ता बदल दिया है। पहले सरकार दूर थी, नागरिक लाइन में खड़ा था। अब सरकार स्क्रीन पर है, नागरिक ऐप में सिमट गया है। यह सिर्फ सुविधा नहीं, सत्ता का पुनर्वितरण है। नागरिक अब डेटा का स्रोत भी है और निगरानी का विषय भी।

खतरा यहीं छिपा है।

डेटा का केंद्रीकरण बढ़ रहा है। आधार, यूपीआई, स्वास्थ्य और शिक्षा पोर्टल, सब एक-दूसरे से जुड़े हैं। इससे दक्षता बढ़ती है, पर एक विशाल डेटा बैंक भी बनता है। अगर यह डेटा गलत हाथों में गया, तो निजता हवा हो जाएगी।

और जब सिस्टम “ना” कह दे, तो जवाबदेह कौन होगा? कोड, अधिकारी या मंत्री? यह धुंध अभी छंटी नहीं है।

डिजिटल डिवाइड भी कम चुनौती नहीं। शहरों में ऐप, गांवों में अब भी कागज़। एक ही देश में दो तरह की नागरिकता उभरती दिख रही है। एक क्लिक करने वाली, दूसरी इंतजार करने वाली।

समाधान का रास्ता सीधा है, मगर आसान नहीं। संतुलन और सख्त कानूनी सुरक्षा। डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट 2023 एक अहम कदम है। कंसेंट आधारित डेटा उपयोग, डेटा न्यूनतमकरण, डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड। पर असली परीक्षा लागू करने की है। सरकारी एजेंसियों को मिली छूट पर कड़ी निगरानी जरूरी है। नियमित ऑडिट और स्वतंत्र निगरानी संस्थाएं अनिवार्य बनानी होंगी।

डिजिटल समावेशन के बिना यह क्रांति अधूरी रहेगी। भारतनेट का विस्तार, 2030 तक 90 प्रतिशत कनेक्टिविटी, PMGDISHA के जरिए डिजिटल साक्षरता, स्थानीय भाषाओं में एआई सेवाएं, कॉमन सर्विस सेंटर के जरिए सहायक पहुंच। और सबसे अहम, डिजिटल को सुविधा नहीं, अधिकार बनाना होगा।

विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं। हर बड़े डिजिटल प्रोजेक्ट के लिए एल्गोरिद्मिक इम्पैक्ट असेसमेंट जरूरी हो। ओपन सोर्स को बढ़ावा मिले। नागरिक ऑडिट की व्यवस्था बने।

क्योंकि तकनीक तटस्थ नहीं होती। वह जिस हाथ में होती है, उसी की ताकत बनती है।

खाड़ी देशों से सबक साफ है। दक्षता और नियंत्रण का आकर्षण तेज होता है। सब कुछ व्यवस्थित, बिना शोर, बिना बहस। मगर यही खामोशी सबसे बड़ा जोखिम है। वहां डिजिटल गवर्नेंस ने राज्य को मजबूत किया, नागरिक को नहीं।

भारत अगर आंख मूंदकर इस राह पर चला, तो डिजिटल लोकतंत्र चुपचाप डिजिटल अधिनायकवाद में बदल सकता है।

इसलिए असली लड़ाई कोड में है। एल्गोरिद्म में है।

तकनीक को लोकतंत्र के अधीन रखना होगा, लोकतंत्र को तकनीक के हवाले नहीं करना होगा।

विकसित भारत 2047 का सपना सिर्फ तेज सर्वर और स्मार्ट ऐप से पूरा नहीं होगा।

यह पूरा होगा नागरिक अधिकारों की सुरक्षा से, पारदर्शी एल्गोरिद्म से, और समावेशी पहुंच से।

अंतिम सवाल वही है।

क्या हम स्क्रीन को अपना सेवक बनाए रखेंगे, या खुद उसके नागरिक बन जाएंगे?

स्क्रीन चमक रही है।

फैसला अभी भी हमारे हाथ में है।