Thursday, April 16, 2026

 भोर की हल्की गुलाबी रोशनी जैसे ही गोवर्धन परिक्रमा मार्ग को छूती है, घंटियों की ध्वनि और “राधे-राधे” की गूंज हवा में तैरती है। पर उसी हवा में एक कड़वी सच्चाई भी घुली होती है,  तीखी बदबू, जो श्रद्धा के इस पवित्र अनुभव को झकझोर देती है। भक्ति और बेबसी यहाँ साथ-साथ चलती हैं।

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ज्यादातर तीर्थ स्थलों की सबसे बड़ी समस्या है: हंगना

पर्याप्त संख्या में जब पब्लिक शौचालय हैं ही नहीं, तो जाएं तो जाएं कहां?

बृज का स्वच्छता संकट: हर साल 10 करोड़ श्रद्धालु, पर न के बराबर उपयोगी शौचालय

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बृज खंडेलवाल द्वारा

18 अप्रैल, 2026

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श्री कृष्ण और राधा रानी के प्रति अटूट आस्था लेकर हर दिन हजारों श्रद्धालु वृंदावन, मथुरा, गोवर्धन, बरसाना, गोकुल और नंदगांव की ओर खिंचे चले आते हैं। त्योहारों पर यह संख्या सैलाब बन जाती है। आस्था का यह समुद्र हर साल और गहरा होता जा रहा है।

आंकड़े भी यही कहानी कहते हैं। 2023 में मथुरा-वृंदावन में लगभग 7.9 करोड़ पर्यटक आए। 2024 में यह आंकड़ा 9 करोड़ पार कर गया। 2025 तक पूरे बृज क्षेत्र में श्रद्धालुओं की संख्या 10 करोड़ से अधिक हो गई। लेकिन इस बढ़ती भीड़ के साथ जो नहीं बढ़ा, वह है बुनियादी स्वच्छता ढांचा। साफ-सुथरे और चालू सार्वजनिक शौचालय आज भी गिनती के हैं, और जो हैं, वे अक्सर बदहाल।

अब यह समस्या केवल असुविधा नहीं रही। यह जन-स्वास्थ्य का गंभीर खतरा बन चुकी है। खुले में शौच से न केवल बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है, बल्कि पवित्र यमुना और घाट भी प्रदूषित हो रहे हैं। आस्था की यह भूमि अब गंदगी के बोझ तले कराह रही है।

गोवर्धन और मानसी गंगा क्षेत्र इसका सबसे सटीक उदाहरण हैं। 21 किलोमीटर की परिक्रमा मार्ग पर लाखों श्रद्धालु दिन-रात चलते हैं। लेकिन शौचालय की सुविधा न के बराबर है। सुबह का दृश्य चौंकाने वाला होता है, लोग खेतों और रास्तों के किनारे मजबूरी में शौच करते दिखते हैं।

गोवर्धन के बुजुर्ग पंडा बिरजो बाबा कहते हैं, “यह दृश्य बहुत अपवित्र है। धर्मशालाओं में कुछ शौचालय हैं, पर उनकी हालत खराब है। प्रशासन केवल तमाशा देख रहा है।”

मानसी गंगा और अन्य पवित्र कुंडों की स्थिति भी बेहतर नहीं। खुले में शौच से इनका जल दूषित हो रहा है। यह प्रदूषण अंततः यमुना तक पहुंचता है, जिससे समस्या और विकराल हो जाती है।

सबसे ज्यादा मार महिलाओं पर पड़ रही है। मथुरा के बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन के पास दीवारों के किनारे खड़ी कतारें इस मजबूरी की गवाही देती हैं। मौजूदा शौचालय इतने गंदे और असुरक्षित हैं कि लोग उनका इस्तेमाल करने से कतराते हैं।

महिलाओं के लिए यह स्थिति और भी भयावह है। या तो शौचालय हैं ही नहीं, या इतने असुरक्षित कि जाना खतरे से खाली नहीं। डॉक्टर चेतावनी देते हैं कि लंबे समय तक शौच रोकने से महिलाओं में यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन (UTI) का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। यह केवल असुविधा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य संकट है।

वृंदावन में वर्षों पहले बने सुलभ शौचालय अब जर्जर हो चुके हैं। सामाजिक कार्यकर्ता जॉय बताते हैं कि रखरखाव की भारी कमी है। सफाई, पानी और निगरानी, तीनों का अभाव है।

बरसाना, नंदगांव और गोकुल जैसे छोटे तीर्थस्थलों की स्थिति तो और भी खराब है। स्थानीय गाइड गोविंद शर्मा कहते हैं, “यहाँ शौचालय ऊँट के मुँह में जीरे के समान हैं। जो हैं भी, उनकी गंदगी सड़कों तक फैलती है।”

व्यापारी वर्ग भी अब खुलकर सामने आ रहा है। वृंदावन के व्यवसायी अंशु गोपाल का कहना है कि सरकार को भव्य परियोजनाओं के बजाय बुनियादी सुविधाओं पर ध्यान देना चाहिए। वहीं राजेंद्र अग्रवाल का मानना है कि केवल नए शौचालय बनाना काफी नहीं, उनका नियमित रखरखाव ज्यादा जरूरी है।

व्यापारी कन्हाई लाल सुझाव देते हैं कि मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण को हर नए निर्माण के साथ शौचालय और सीवर कनेक्शन अनिवार्य करना चाहिए। जब तक यह नियम सख्ती से लागू नहीं होगा, समस्या जस की तस रहेगी।

सच यह है कि बृज में स्वच्छता का संकट केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक प्राथमिकताओं का आईना है। मंदिरों के लिए करोड़ों का दान आता है, भव्य गलियारे बनते हैं, लेकिन शौचालय जैसी बुनियादी जरूरत आज भी हाशिये पर है।

सवाल सीधा है, क्या भक्ति केवल मंदिर की देहरी तक सीमित है? क्या पवित्रता का अर्थ केवल पूजा है, स्वच्छता नहीं?

श्री कृष्ण और राधा की यह पावन भूमि इससे कहीं बेहतर की हकदार है। 10 करोड़ श्रद्धालुओं की आस्था का सम्मान तभी होगा, जब उन्हें सम्मानजनक और स्वच्छ सुविधाएं मिलें।

अब समय आ गया है कि हर मंदिर, हर घाट और हर परिक्रमा मार्ग पर साफ, सुरक्षित और सुलभ शौचालयों का मजबूत नेटवर्क बनाया जाए। क्योंकि जहां स्वच्छता नहीं, वहां पवित्रता अधूरी है।

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