ग्रीन से ब्राऊन हो रही ब्रज भूमि!
काग़ज़ी जंगलों के साए में सुलगता भारत
__________________________
बृज खंडेलवाल द्वारा
28 अप्रैल 2026
___________________________
श्री कृष्ण राधा की लीलाभूमि हरे से भूरी, काली, क्यों हो रही है? पक्षियों का कलरव बेसुरा क्यों लग रहा है? नदी, तालाब, कुएं गुमसुम क्यों हैं?
सुबह की पहली रोशनी जब यमुना के खामोश सतह पर या सूर सरोवर (कीठम झील) पर उतरती है, तो पानी में अजीब सी बेचैनी की कशिश का एहसास होता है। पक्षियों की आवाज़ें कम हैं, पेड़ों की छाँव पतली है, और हवा में एक अदृश्य घुटन है। दूर से सब हरा दिखता है। पास जाइए तो हरियाली के भीतर एक धीमी तबाही साँस ले रही होती है। यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं। यह इंसानी उदासीनता का दस्तावेज़ है; हरे काग़ज़ पर लिखा हुआ, मगर ज़मीन पर जलता हुआ।
जब पर्यावरणविद् डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य ने इस क्षेत्र से विलायती बबूल हटाने की माँग को लेकर कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया, तो उन्होंने केवल एक पौधे का सवाल नहीं उठाया। उन्होंने उस सुस्त, सुन्न और सुविधाजनक शासन-व्यवस्था को कटघरे में खड़ा किया, जिसने एक विदेशी आक्रामक प्रजाति को हमारी सबसे संवेदनशील आर्द्रभूमियों में जड़ें जमाने दीं। सालों तक सब देखते रहे। कोई हिला नहीं। एक नागरिक अदालत पहुँचा, तब आशा है कहीं फाइलें खुलेगी, सवाल पूछे जाएंगे, और शायद एक्शन भी होगा।
विलायती बबूल, नाम भले विदेशी लगे, इसका असर विनाशकारी है। यह पेड़ नहीं, एक पारिस्थितिक हमलावर है। यह भूजल को बेरहमी से खींचता है, देशी पौधों को दबा देता है, और पक्षियों के घर उजाड़ देता है। जो ज़मीन कभी विविधता से भरी थी, वहाँ अब एकरूपता की वीरानी पसरी है। रामसर सूची में दर्ज यह आर्द्रभूमि किसी बाढ़ या सूखे से नहीं, बल्कि फाइलों में सोती सरकार से मर रही है।
लेकिन यह कहानी सिर्फ एक झील की नहीं। यह उस बड़े छल की कहानी है, जो पिछले दो दशकों से देश को सुनाया जा रहा है; हरियाली का भ्रम, विकास का मुखौटा।
साल 2001 में एक खामोश बदलाव हुआ। “वन” की परिभाषा बदल दी गई। अब कोई भी ज़मीन, जहाँ 10 प्रतिशत पेड़ हों; चाहे वह बाग हो, व्यावसायिक प्लांटेशन हो या सजावटी हरियाली: उसे “वन” माना जाने लगा। बस, यहीं से खेल शुरू हुआ। काग़ज़ों पर जंगल बढ़ने लगे। रिपोर्टें चमकने लगीं। सरकारें, चाहे कांग्रेस की हों या भाजपा की, इन आँकड़ों को ढाल बनाकर पर्यावरण-रक्षक होने का दावा करती रहीं।
ज़मीन पर क्या हुआ? असली जंगल चुपचाप कटते रहे। सड़कें बढ़ीं, रेल लाइनें बिछीं, शहर फैले। और बदले में जो उगा, वह जंगल नहीं था; वह हरियाली का एक सस्ता विकल्प था। नीलगिरी के कतारबद्ध यूकेलिप्टस पेड़, या विलायती बबूल के झुंड, ये जंगल नहीं होते। इनमें न छाया की गहराई होती है, न जीवन की परतें। ये नदियों को नहीं बचाते, हवा को नहीं ठंडा करते, न ही जीव-जंतुओं को घर देते हैं। लेकिन स्प्रेडशीट में ये हरे दिखते हैं। और सरकार को श्रेय मिल जाता है।
इस भ्रम का सबसे खतरनाक पड़ाव 2023 में आया, जब “डीम्ड फॉरेस्ट्स” से कानूनी सुरक्षा हटा दी गई। एक झटके में, वे ज़मीनें जो वर्षों से अदालतों के आदेशों से सुरक्षित थीं, खुली छूट में आ गईं। नतीजा, कटाई तेज़ हुई, हरे गलियारे टूटे, और प्रकृति का संतुलन और डगमगाया।
क्या यह संयोग है कि उत्तर भारत अब हर साल रिकॉर्ड तोड़ गर्मी झेल रहा है? क्या यह महज़ मौसम का खेल है कि बाढ़ और सूखा एक ही भूगोल में बारी-बारी से दस्तक देते हैं? या यह उसी “काग़ज़ी हरियाली” का परिणाम है, जिसने असली जंगलों की जगह ले ली?
जल संकट इस आग में घी का काम कर रहा है। नदियों के कैचमेंट सिकुड़ रहे हैं। बारिश का पानी ज़मीन में उतर नहीं पा रहा। भूजल खाली हो रहा है: तेज़, लगातार। और विलायती बबूल जैसी प्रजातियाँ इस संकट को और गहरा कर रही हैं। उनकी जड़ें धरती के भीतर तक जाकर पानी खींच लेती हैं, जैसे कोई प्यासा आख़िरी बूंद तक चूस ले। शहरों के नल सूख रहे हैं। गाँवों के कुएँ जवाब दे रहे हैं।
लेकिन नीतियाँ? वही पुराना राग: और निर्माण करो, और प्लांटेशन लगाओ, और काग़ज़ हरा करो।
पर्यटन ने इस जख्म को और चौड़ा कर दिया है। जहाँ कभी नियंत्रित, संवेदनशील पर्यटन होता था, वहाँ अब भीड़ का मेला है। मथुरा वृंदावन में पर्यटक वाहनों की संख्या सौ गुना बढ़ चुकी है। प्रकृति के नाम पर व्यापार फल-फूल रहा है। स्थानीय ठेकेदार, आतिथ्य उद्योग और राजनीतिक दलाल, सब इस खामोश लूट में हिस्सेदार हैं। और प्रशासन? वह दर्शक बना बैठा है।
डॉ. भट्टाचार्य की याचिका कोई असंभव माँग नहीं रखती। वह कहती है, विलायती बबूल को वैज्ञानिक तरीके से हटाओ, देशी प्रजातियाँ लगाओ, और एक स्वतंत्र निगरानी तंत्र बनाओ। यह न्यूनतम है। यह बुनियादी है। लेकिन असल सवाल इससे बड़ा है: क्या सरकार सच को स्वीकार करेगी? क्या वह आँकड़ों के इस खेल से बाहर आएगी?
क्योंकि अगर नहीं, तो आने वाली पीढ़ियाँ एक अजीब विरासत पाएँगी। उनके पास रिपोर्टें होंगी, ग्राफ होंगे, उपलब्धियों के दावे होंगे। लेकिन जब वे पेड़ के नीचे खड़े होंगे, तो छाँव नहीं मिलेगी। जब वे नदी के किनारे जाएँगे, तो पानी नहीं मिलेगा।
उनके पास “वन क्षेत्र” होगा; पर जंगल नहीं। और तब शायद वे पूछेंगे, क्या हमने सचमुच विकास किया था, या सिर्फ़ काग़ज़ हरा किया था?
No comments:
Post a Comment