Friday, April 10, 2026

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जब मोहब्बत बन जाए मौत: डिजिटल भारत का खौफनाक सच

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बृज खंडेलवाल द्वारा

12 अप्रैल 2026

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प्यार अंधा होता है, यह कहावत पुरानी है। पर अब प्यार खून भी करने लगा है, यह नया सच है।

आगरा की एक घटना ने दिल दहला दिया। एक मां ने अपनी ही मासूम बच्ची को मार डाला। वजह गुस्सा नहीं थी, गरीबी नहीं थी। वजह था एक नया रिश्ता। बच्ची “रास्ते की दीवार” बन गई थी।

सवाल सीधा है। क्या अब रिश्ते बोझ बनते जा रहे हैं?

यह कोई एक घटना नहीं है। देश के अलग-अलग कोनों से ऐसी खबरें लगातार आ रही हैं। मां-बाप, पति-पत्नी, बच्चे, कोई भी सुरक्षित नहीं। कारण एक ही:  "नया प्यार: ये  रिश्ता क्या कहलाता है?"

आज के “क्राइम ऑफ पैशन” पहले जैसे नहीं रहे। पहले गुस्से में खून होता था। अब सोच-समझकर, योजना बनाकर हत्या हो रही है।

पंजाब में एक मां ने अपने दो बच्चों को जहर दे दिया। दिल्ली में एक प्रेमी ने गर्भवती महिला को सरेआम चाकू मार दिया। ग्वालियर में मां ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर बेटे को छत से फेंक दिया। तमिलनाडु में पांच महीने के बच्चे को इसलिए मार दिया गया क्योंकि वह “रिश्ते में बाधा” था।मुजफ्फरनगर में दो बच्चों को जहर देकर खत्म कर दिया गया, ताकि नई जिंदगी शुरू हो सके।

हर कहानी अलग है। पर दर्द एक जैसा है। इन घटनाओं में एक खतरनाक सोच सामने आती है: “जो प्यार के रास्ते में आए, उसे मुक्ति दो।”

मनोवैज्ञानिक कहते हैं, इन हत्याओं में नफरत कम होती है। असल में यह स्वार्थ होता है।

नया रिश्ता इतना बड़ा हो जाता है कि पुराना रिश्ता बोझ लगने लगता है।जब दिल पर हवस हावी हो जाए, तो इंसान अंधा ही नहीं, बेरहम भी हो जाता है।

भारत में शादी को पवित्र माना जाता है। तलाक आज भी बदनामी समझा जाता है। लोग टूटे रिश्ते से बाहर निकलने से डरते हैं। समाज की उंगली से बचने के लिए, लोग कानून तोड़ने लगते हैं।

पहले संयुक्त परिवार होते थे। घर में बड़े-बुजुर्ग होते थे। गलत कदम उठाने से पहले कोई रोकने वाला होता था।

आज परिवार छोटे हो गए हैं। निगरानी खत्म हो गई है। आज़ादी बढ़ी है, पर समझ कम हो गई है।

मोबाइल फोन ने दुनिया को हथेली पर ला दिया। पर साथ ही, रिश्तों को भी खेल बना दिया। आज एक क्लिक में नया रिश्ता बन जाता है।

व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम, डेटिंग ऐप, सब कुछ आसान हो गया है। छिपकर बात करना अब मुश्किल नहीं रहा। झूठ बोलना भी आसान हो गया है।डिजिटल दुनिया ने प्यार को तेज कर दिया है।

जल्दी जुड़ते हैं, जल्दी टूटते हैं। और जब टूटते हैं, तो शोर बहुत होता है।शक बढ़ता है। फोन चेक होते हैं। मैसेज पढ़े जाते हैं। झगड़े बढ़ते हैं।

और कई बार, यह झगड़े खून तक पहुंच जाते हैं। सोशल मीडिया आग में घी डालता है। हर घटना वायरल हो जाती है। लोग बहस करते हैं। न्याय करने लगते हैं।

पर असली सवाल छूट जाता है: हम बदल क्यों रहे हैं?

पचास साल पहले भी अफसाने होते थे। पर छुपकर होते थे। समाज का डर था। इज्जत का सवाल था।

आज डर कम हो गया है। इच्छाएं बढ़ गई हैं। आज लोग “खुशी” चाहते हैं।पर उसके लिए कीमत चुकाने को तैयार नहीं।

जब जिम्मेदारी भारी लगती है, तो लोग गलत रास्ता चुन लेते हैं।

यह केवल कानून का मामला नहीं है।यह समाज का आईना है।

डिजिटल प्लेटफॉर्म दोषी नहीं हैं। वे केवल हमारी सोच को दिखाते हैं।असल समस्या भीतर है। अधूरापन, असंतोष, और अधीरता।

आज का इंसान इंतजार नहीं करना चाहता। समझौता नहीं करना चाहता।जो चाहिए, अभी चाहिए। और अगर कोई बीच में आए, तो उसे हटाने का ख्याल आता है।

यह खतरनाक है। बहुत खतरनाक।जरूरत है सोच बदलने की। रिश्तों को समझने की। अगर रिश्ता नहीं चल रहा, तो उसे खत्म करने का रास्ता है: कानून।

हत्या कोई हल नहीं है। यह केवल जिंदगी बर्बाद करता है। परिवारों को फिर से मजबूत करना होगा। बातचीत बढ़ानी होगी। बच्चों को सिखाना होगा कि प्यार जिम्मेदारी है, खेल नहीं।

समाज को भी बदलना होगा। तलाक को कलंक की तरह देखना बंद करना होगा। जब तक हम यह नहीं समझेंगे, ऐसी घटनाएं रुकेंगी नहीं।

आगरा की वह मासूम बच्ची एक सवाल छोड़ गई है।

क्या हम रिश्तों को निभाना भूल रहे हैं? अगर जवाब “हां” है, तो खतरे की घंटी बज चुकी है।

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