Sunday, April 5, 2026

 क्या भारत में चुनाव जीतने का असली पासपोर्ट आज भी जाति का प्रमाणपत्र है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

6 अप्रैल 2026

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जी, ऐसा ही है।

दरवाज़ा संविधान ने खोला था, इरादा साफ था। सदियों की अन्याय-भरी सीढ़ियाँ तोड़नी थीं। आरक्षण उस वक़्त एक बैसाखी था, स्थायी बैरिकेड नहीं। लेकिन सियासत ने उसे हथियार बना दिया। वोटों की गिनती ने समाज की दरारों को भरने के बजाय और गहरा कर दिया। जो अस्थायी पुल होना था, वही स्थायी मोर्चा बन गया। आज हाल यह है कि पढ़ा-लिखा मतदाता भी उसी खांचे में खड़ा है, जहां उसके दादा खड़े थे। फर्क बस इतना है कि अब गणित और ज्यादा परिष्कृत हो गया है।

शुरुआत में सोच अलग थी। सुधारकों के लिए आरक्षण एक सर्जिकल स्ट्राइक था। एक झटका, जो बराबरी का रास्ता साफ करे। उनका लक्ष्य जाति को स्थायी पहचान बनाना नहीं था, बल्कि उसे धीरे-धीरे अप्रासंगिक कर देना था। लेकिन राजनीति की गंध अलग होती है। यहां आदर्श नहीं, अंकगणित चलता है। यहां दर्द भी वोट में बदलता है और उम्मीद भी।

फिर आए वे खिलाड़ी, जिन्होंने जाति को स्थायी इंजन बना दिया। कांशी राम, मायावती, मुलायम, अखिलेश आदि  ने जातिगत आक्रोश को अनुशासित वोट बैंक में ढाला। यह सिर्फ सामाजिक आंदोलन नहीं था, यह सटीक चुनावी गणित था। बसपा सुप्रीमो बहन मायावती ने और धार दी। 2007 में उन्होंने जो किया, वह एक केस स्टडी है। दलित, ब्राह्मण, मुस्लिम, सबको जोड़कर सत्ता का समीकरण गढ़ा। 206 सीटें सिर्फ आंकड़ा नहीं थीं, वह संदेश था कि जाति को जोड़कर भी जीता जा सकता है, तोड़कर भी।

शुरुआत डॉ राम मनोहर लोहिया ने पिछड़ों की राजनीति को वैचारिक धार देकर की। उनका 60 प्रतिशत का नारा सिर्फ नारा नहीं था, सामाजिक पुनर्संतुलन का प्रस्ताव था। लेकिन जैसे ही यह जमीन पर उतरा, वह भी वोट की भाषा में अनुवादित हो गया। और फिर आया वह क्षण जिसने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी। मंडल कमीशन की सिफारिशें जब लागू हुईं, तो देश दो खेमों में बंट गया। वीपी सिंह ने इसे लागू किया, सरकार चली गई, लेकिन राजनीति बदल गई। उत्तर भारत में नई जातीय ताकतें उभरीं। समाजवादी पार्टियां, क्षेत्रीय दल, सबने अपने-अपने खांचे बना लिए।

दक्षिण में कहानी अलग दिखती है, पर सार वही है। तमिलनाडु में द्रविड़ मुनेत्र काझागम ने गैर-ब्राह्मण राजनीति को संस्थागत रूप दिया। 69 प्रतिशत आरक्षण सिर्फ नीति नहीं था, एक स्थायी सामाजिक समझौता था। नतीजा यह हुआ कि दशकों से सत्ता उन्हीं खेमों में घूम रही है। कर्नाटक में लिंगायत और वोक्कालिगा समीकरण ने सरकारों की चाबी अपने पास रखी।  देव गौडा का उदय इसी गणित की देन था।

चुनाव अब विचारों से कम, जातीय नक्शों से ज्यादा तय होते हैं। हर पार्टी के पास अपना डेटा है। कौन-सी सीट पर कौन-सी जाति भारी है, किसे टिकट देना है, किसे वादा करना है। उत्तर प्रदेश में यह फार्मूला खुलकर दिखता है। यादव बहुल सीटों पर समाजवादी टिकट, दलित बहुल इलाकों में अलग रणनीति। यह ठंडा, सटीक, बेरहम गणित है। यहां विचारधारा अक्सर बैक सीट पर बैठी रहती है।

कम्युनिस्टों ने एक अलग सपना देखा था। वर्ग संघर्ष का। उन्हें लगा कि आर्थिक बराबरी से जाति मिट जाएगी। लेकिन जमीन ने उनका भ्रम तोड़ दिया। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में आंदोलन खुद जातियों में बंट गए। केरल और बंगाल में कुछ सफलता मिली, लेकिन वहां भी जाति की छाया कभी पूरी तरह नहीं गई। सच्चाई यह है कि आदमी रोजमर्रा की जिंदगी में जाति जीता है। शादी में, जमीन में, रिश्तों में। ऐसे में  वर्ग संघर्ष ठोस आरक्षण के सामने कमजोर पड़ गया।

आज तस्वीर साफ है। शिक्षा बढ़ी, शहर फैले, नौकरियां बदलीं। लेकिन जाति जिंदा है, क्योंकि उसका सीधा रिश्ता लाभ से जुड़ा है। एक डिग्री के साथ भी जाति प्रमाणपत्र चाहिए। राजनीति के लिए यह सोने की खान है। हर चुनाव से पहले नई मांग, नया वादा, नया ध्रुवीकरण। भीतर ही भीतर असमानता भी बढ़ती है। एक ही जाति के भीतर कुछ समूह सारा लाभ समेट लेते हैं, बाकी किनारे खड़े रह जाते हैं।

यह एक चक्र है, जो खुद को लगातार मजबूत करता है। जाति वोट देती है। वोट सत्ता देता है। सत्ता जाति को बचाए रखती है। और फिर वही कहानी दोहराई जाती है। सवाल यह नहीं कि आरक्षण सही है या गलत। सवाल यह है कि क्या हमने उसे लक्ष्य तक पहुंचने का साधन बनाया या रास्ते में ही उसका स्थायी शिविर खड़ा कर लिया।

भारतीय लोकतंत्र अभी भी उस जवाब की तलाश में है। जब तक कोई नई राजनीति, नई भाषा, नया भरोसा नहीं उभरेगा, तब तक यह कोड नहीं टूटेगा। जाति की स्याही अभी सूखी नहीं है। बैलेट पेपर पर उसका नाम अब भी सबसे गाढ़ा लिखा है।

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