एप्सटीन फाइल्स: सवालों की बौछार, जवाबों का धुंधलका
(Humour Times के हाथ लगा वो इंटरव्यू जो कभी हुआ ही नहीं, और शायद होना भी नहीं चाहिए था , क्योंकि सच बोलने वाले 110 साल के जासूस भी अब इस दुनिया में नहीं बचे!)
इंटरव्यूअर: Humour Times (HT) के एडिटर बृज खंडेलवाल
मेहमान: डॉ. बर्ट्रेंड शॉ, 110 साल के रहस्यमयी जासूस, जो fortunately अब इस दुनिया में नहीं हैं, पर फिर भी इंटरव्यू दे रहे हैं।
वाह री पत्रकारिता! मरने के बाद भी काम चल रहा है।
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कमरा धुंधला है। बिजली का बिल शायद “Under Review” में है, इसलिए रोशनी भी आधी-अधूरी, ठीक वैसे ही जैसे एप्सटीन फाइल्स।
सामने बैठे हैं डॉ. बर्ट्रेंड शॉ। 110 साल। आंखें अब भी तेज , जैसे सब कुछ देख लिया हो… और जो नहीं देखना चाहते, उसे सुविधानुसार भूल चुके हों।
HT: डॉ. शॉ, ये एप्सटीन फाइल्स… इतना शोर क्यों मचा है भाई?
शॉ: अरे बेटा, शोर तो ट्रेन मिस होने पर भी होता है। असली सवाल ये है कि ट्रेन जा कहाँ रही थी? फाइलें खुलीं तो सबने ताली बजाई, लेकिन पूरी कहानी अभी भी “Season 2 Coming Soon” में अटकी हुई है।
HT: लेकिन लाखों पन्ने जारी कर दिए गए न? ये तो पारदर्शिता है!
शॉ: (हँसते हुए) पारदर्शिता? ये तो सरकारी दफ्तर की खिड़की जैसी है , आधा शीशा साफ, आधा काला पेंट, और बीच में बाबूजी चाय पीते हुए “फाइल पेंडिंग” बोल रहे हैं।
ट्रंप ने कानून बनाया, फाइलें निकालीं… लेकिन जो सबसे जरूरी था, वो शायद “गलती से” अभी भी प्रिंटर में फंस गया।
HT: असल कहानी क्या है?
शॉ: सीधी और डरावनी। एक आदमी — Jeffrey Epstein। पैसा इतना कि कैलकुलेटर भी थक के “Error 404: Too Much Money” दिखाने लगा। ताकत इतनी कि कानून भी “सर जी, आप आराम से” कहकर सलाम ठोकता था।
उसने कमजोर लड़कियों को फंसाया, इस्तेमाल किया, और पूरा सिस्टम खड़ा-खड़ा तमाशा देखता रहा, जैसे पड़ोस में किसी की गाड़ी खराब हो गई हो ; “अरे यार, हमें क्या?”
HT: अकेला था या पूरा नेटवर्क?
शॉ: अकेला आदमी इतना बड़ा खेल नहीं खेल पाता। Ghislaine Maxwell दरवाजा खोलती थी, Epstein अंदर घुसता था, और कानून बाहर खड़ा “मैं छुट्टी पर हूँ” का बोर्ड लगाकर सो जाता था।
HT: बड़े-बड़े नाम क्यों आए ? Clinton, Trump, Prince Andrew?
शॉ: क्योंकि वो बड़े लोगों के बीच घूमता था न! नाम तो आएंगे ही। लेकिन नाम आना और गुनाह साबित होना, ये दो अलग-अलग Netflix सीरीज हैं।
एक तो “The Crown” जैसी लगती है, दूसरी “Courtroom Drama” : जो सालों से “Delayed Release” मोड में पड़ी है।
HT: तो “क्लाइंट लिस्ट” वाली बात?
शॉ: अरे लोग तो शादी की गेस्ट लिस्ट की तरह चाहते थे : कौन आया, कौन नहीं, किसने क्या खाया।
हकीकत में ऐसी कोई पक्की लिस्ट नहीं मिली। या मिली होगी, लेकिन “फाइल मिसिंग” का पुराना, भरोसेमंद बहाना अभी भी जिंदा और स्वस्थ है।
HT: उसकी मौत… आत्महत्या या साजिश?
शॉ: (हल्की मुस्कान के साथ) जासूसी दुनिया में “आत्महत्या” सबसे सुविधाजनक शब्द है। 2019 में मरा, CCTV उस दिन छुट्टी पर था, गार्ड सो रहे थे, और कैमरे “Loading…” पर अटक गए।
कहते हैं जवाब उसके साथ चला गया… या फिर किसी ने “ politely” ले जाया।
HT: क्या वो खुद जासूस था? Mossad वाला कनेक्शन?
शॉ: (झुककर फुसफुसाते हुए) अफवाहें तो चुनावी वादों जैसी गर्म हैं। Ehud Barak का नाम आता है, Mossad का नाम आता है। लेकिन सबूत? वो अभी भी “Under Construction ; Expected Completion: Never” मोड में हैं।
HT: हनीट्रैप की बातें भी तो चल रही हैं…
शॉ: हनीट्रैप तो जासूसी में होता है, लेकिन इतना गंदा, इतना अनियंत्रित? एजेंसियां आमतौर पर इतना बड़ा रिस्क नहीं लेतीं। यहां तो रिस्क भी VIP था और स्कैंडल भी red-carpet पर चल रहा था।
HT: Ghislaine Maxwell का परिवार भी संदिग्ध है?
शॉ: हाँ। पापा Robert Maxwell के पुराने राज, पुराने शक। बेटी ने धागा पकड़ा, लेकिन कोई गांठ बांधना नहीं चाहता। कहीं ऐसा न हो कि धागा खींचते-खींचते पूरा स्वेटर खुल जाए और सब नंगे खड़े रह जाएं।
HT: इजरायल ने क्या कहा?
शॉ: साफ इनकार। Netanyahu और Bennett ने कहा ; “ये तो साजिश है!”
राजनीति में सच और बयान अलग-अलग बसों में बैठकर अलग-अलग रूट पर चलते हैं, दिल्ली ट्रैफिक की तरह।
HT: तो आखिर सच्चाई क्या है?
शॉ: (धीरे से) सच्चाई कई परतों वाली प्याज है। ऊपर अपराधी दिखता है, बीच में सिस्टम की नाकामी, और सबसे नीचे वो तह है जहां फाइलें भी “भाई मैं नहीं जाना” कहकर भाग जाती हैं।
HT: जनता इतनी बेचैन क्यों है?
शॉ: क्योंकि लोग देख रहे हैं कि पैसा कितना मजबूत ढाल बन जाता है। ताकत कितने सारे दरवाजे खोल देती है। और गरीब की आवाज? वो वाई-फाई सिग्नल की तरह सबसे कमजोर जगह पर गायब हो जाती है।
HT: क्या न्याय मिलेगा?
शॉ: न्याय बहुत धीमा है। कभी अंधा, कभी छुट्टी पर, कभी “फाइल गुम”।
पीड़ित लड़ रहे हैं, सच धीरे-धीरे निकल रहा है ; ठीक सरकारी रिपोर्ट की तरह, पांच साल लेट।
लेकिन पूरा सच? वो अभी भी “Top Secret” की चादर ओढ़कर आराम से सो रहा है।
HT: आखिरी सवाल : इस पूरे तमाशे से क्या सीख?
शॉ: (आँखें चमकाते हुए)
याद रखो बेटा:
- जाल हमेशा दिखता नहीं, लेकिन फंसाता बहुत पक्का है।
- शिकार चिल्ला नहीं पाता, क्योंकि माइक अक्सर “म्यूट” होता है।
- और शिकारी?
वो प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुस्कुराते हुए “No Comments” बोलता है।
कमरे में सन्नाटा छा गया।
घड़ी अब भी टिक-टिक कर रही है।
और सच?
वो अभी भी “Loading… 3%” पर अटका हुआ है।
Humour Times की सलाह:
अगर कभी एप्सटीन फाइल्स का पूरा संस्करण आए, तो सबसे पहले चेक करना , लाइट का बिल भरा हुआ है या नहीं।
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