Tuesday, April 21, 2026

 हवा का रुख बदल रहा!

2026 की सियासत में किसकी बाज़ी, किसकी मात?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

22 अप्रैल 2026

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हवा का मिज़ाज बदल रहा है। रंग भी। गलियों से लेकर गलीचों तक, चौपालों से लेकर चाय की दुकानों तक, एक हल्की-सी केसरिया आभा तैरती नजर आ रही है। सवाल यह नहीं कि हवा चल रही है या नहीं। सवाल यह है कि यह हवा किस दिशा में बह रही है, और किसे अपने साथ उड़ा ले जाएगी।

2026 के विधानसभा चुनाव अब सिर्फ चुनाव नहीं रहे। यह एक दौर का इम्तिहान बन गए हैं। असम, वेस्ट बंगाल, तमिल नाडु और केरलम जैसे अहम राज्यों में जो कुछ हो रहा है, वह आने वाले भारत की तस्वीर गढ़ रहा है। यहां जंग सिर्फ कुर्सी की नहीं है, बल्कि सोच, सियासत और समाज के बदलते रंगों की है।

एक तरफ नेशनल डेमोक्रेटिक एलायंस है, जिसकी बागडोर नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के हाथ में है। दूसरी तरफ विपक्ष है, जो अपने-अपने इलाकों में मजबूत तो है, मगर एकजुट नहीं। जैसे कोई बारात हो जिसमें बाजा तो बज रहा हो, मगर बाराती कायदे से न नाच रहे हैं, न गा रहे हैं।

NDA ने इस बार अपना दांव सोच-समझकर चला है। विकास, वेलफेयर, राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक पहचान का ऐसा कॉकटेल तैयार किया गया है, जो गांव के किसान से लेकर शहर के युवा तक, सबको छूता है। यह सिर्फ भाषणों की सियासत नहीं, बल्कि एक नैरेटिव की सियासत है। और सियासत में नैरेटिव वही जीतता है, जो दिल और दिमाग दोनों पर असर करे। महिला आरक्षण, परिसीमन, उत्तर दक्षिण खाई, सबका विकास बनाम क्षेत्रीय पहचान, भाषा, आदि का क्या असर पड़ेगा, ये मत गणना के बाद पता चलेगा।

असम की तस्वीर सबसे साफ नजर आती है। हिमांता बिस्वा सरमा ने यहां सियासत को जमीन से जोड़ा है। अवैध घुसपैठ, जमीन अतिक्रमण और सांस्कृतिक अस्मिता जैसे मुद्दों पर उनकी सख्ती ने एक खास संदेश दिया है। विकास योजनाओं के साथ यह सख्त रवैया NDA को यहां मजबूत बनाता दिख रहा है। ऐसा लगता है कि तीसरी बार सत्ता में वापसी की पटकथा लगभग लिखी जा चुकी है। विपक्ष यहां जैसे धुंध में रास्ता खोज रहा है, मगर मंज़िल अभी दूर है।

वेस्ट बंगाल में कहानी थोड़ी अलग है। ममता बनर्जी की पकड़ अब भी मजबूत है, मगर वक्त के साथ एंटी-इन्कम्बेंसी की हल्की दरारें दिखने लगी हैं। भारतीय जनता पार्टी यहां 2021 की जमीन पर नई फसल उगाने की कोशिश में है। मुद्दे भी बदल गए हैं। अब बहस सिर्फ ध्रुवीकरण की नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार, महिला सुरक्षा और बेरोजगारी की है। SIR के बाद अगर मतदाता बिना खौफ के वोट डालता है, तो नतीजे चौंका सकते हैं। BJP यहां दरवाजे तक पहुंच चुकी है। बस एक धक्का और।

तमिल नाडु में सियासत का रंग सबसे ज्यादा दिलचस्प है। द्रविड़ राजनीति के बीच अब नई कहानी लिखी जा रही है। द्रविड़ मुनेत्र काझागम के खिलाफ माहौल तो बन रहा है, मगर अभिनेता विजय की एंट्री ने खेल को त्रिकोणीय बना दिया है। तीन कोनों की इस लड़ाई में अक्सर वही जीतता है, जिसकी रणनीति सबसे मजबूत हो। यहां NDA को विपक्ष के बिखराव का सीधा फायदा मिलता दिख रहा है। सियासत में एक कहावत है, “जब नाव में छेद ज्यादा हों, तो डूबना तय होता है।” कोयंबटूर के गोपाल कृष्णन के मुताबिक 150 सीटें NDA को मिल सकती हैं, पिछली बार की गलतियों से सबक सीखा है, फील्डिंग बढ़िया सजाई है। 

केरलम में तस्वीर धीमी है, मगर बदलाव की आहट साफ सुनाई देती है। पारंपरिक तौर पर LDF और UDF के बीच सिमटी राजनीति में अब बीजेपी धीरे-धीरे अपनी जगह बना रही है। पिनाराई विजयन सरकार के खिलाफ हल्की नाराजगी NDA के लिए एक खिड़की खोलती है। यहां एक-दो सीटें भी बड़ी कहानी लिख सकती हैं। सियासत में कभी-कभी छोटी चिंगारी ही बड़ा शोला बन जाती है।

कुल मिलाकर तस्वीर यही कहती है कि NDA इस वक्त “फुल स्विंग” में है। मजबूत नेतृत्व, स्पष्ट संदेश और जमीनी संगठन उसकी सबसे बड़ी ताकत हैं। नरेंद्र मोदी का चेहरा अब भी सबसे बड़ा चुनावी ब्रांड बना हुआ है। उनके नाम पर वोट पड़ता है, यह बात अब किसी से छुपी नहीं।

विपक्ष की सबसे बड़ी परेशानी यह है कि वह रिएक्शन में खेल रहा है। उसके पास मुद्दे हैं, मगर एकजुट कहानी नहीं। जैसे शतरंज में सारे मोहरे हों, मगर खिलाड़ी की चाल ही उलझी हुई हो। राजनीति में सिर्फ विरोध काफी नहीं होता, विकल्प भी देना पड़ता है। और यही वह जगह है जहां विपक्ष लड़खड़ाता नजर आता है।

अब सबकी नजरें 4 मई पर टिकी हैं। यह तारीख सिर्फ नतीजों की नहीं होगी, बल्कि दिशा की भी होगी। यह तय करेगी कि देश की सियासत किस ओर मुड़ रही है।

एक बात साफ है। अब सियासत सिर्फ वादों की बाजीगरी नहीं रही। जनता अब सवाल पूछती है। हिसाब मांगती है। और जवाब भी चाहती है। यही लोकतंत्र की असली रूह है। और शायद यही वजह है कि इस बार हवा का रंग सिर्फ बदल नहीं रहा, बल्कि एक नई कहानी लिखने को बेचैन दिख रहा है।

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