Tuesday, July 21, 2026

 बढ़ती फीस, घटते स्तर

निजी स्कूलों की बढ़ती फीस:

क्या हमें अपनी जेब के हिसाब से तालीम मिल रही है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

23 जुलाई 2026

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साल 1964-65 में मेरे माता-पिता आगरा के सेंट पीटर्स कॉलेज की मासिक फीस सिर्फ 6 से 10 रुपये भरते थे। स्कूल की यूनिफॉर्म साधारण सूती खाकी होती थी और इसके अलावा कोई छिपा हुआ खर्च नहीं था।

आज आगरा के डीपीएस या प्रील्यूड पब्लिक स्कूल जैसे बड़े निजी स्कूल हर महीने 12,000 से 16,000 रुपये तक फीस लेते हैं। यानी साल भर में करीब 1.5 लाख से 4 लाख रुपये का खर्च। यह बढ़ोतरी 1,50,000 प्रतिशत से भी ज्यादा है। इसी दौरान देश में महंगाई लगभग 100 से 120 गुना बढ़ी है।

सवाल यह है कि स्कूलों की फीस बाकी चीजों के मुकाबले इतनी तेज़ी से क्यों बढ़ी? और क्या तालीम की गुणवत्ता भी उतनी ही बेहतर हुई है?

फीस बढ़ने के पीछे कई वजहें हैं। शिक्षकों का वेतन बढ़ा है। स्कूलों की इमारतें आधुनिक हुई हैं। स्मार्ट क्लास, कंप्यूटर, लैब और खेल सुविधाओं पर खर्च बढ़ा है। सरकार के नए नियमों का पालन करना पड़ता है। साथ ही मध्यम वर्ग के परिवार अपने बच्चों को "प्रीमियम" स्कूलों में पढ़ाना चाहते हैं।

आज भारत के लगभग आधे बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं। बड़े स्कूल स्मार्ट क्लासरूम, विज्ञान प्रयोगशालाएं, खेल मैदान, बस सेवा, सह-पाठ्यक्रम गतिविधियां और जेईई तथा नीट जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी कराते हैं।

माता-पिता अब सिर्फ पढ़ाई के लिए नहीं, बल्कि बेहतर माहौल, अच्छे सहपाठियों, सामाजिक रुतबे और कॉलेज में दाखिले की उम्मीद के लिए भी पैसा खर्च कर रहे हैं। पिछले दस वर्षों में शहरों के निजी स्कूलों की फीस करीब 169 प्रतिशत बढ़ी है, जबकि लोगों की आमदनी इतनी तेज़ नहीं बढ़ी।

यहीं से फिक्र शुरू होती है। इसमें कोई शक नहीं कि आज के स्कूल 1960 के दशक की तुलना में कहीं अधिक आधुनिक हैं। भारतीय छात्र बोर्ड परीक्षाओं, जेईई और नीट जैसी कठिन परीक्षाओं में अच्छा प्रदर्शन करते हैं। इसी वजह से भारत बड़ी संख्या में सक्षम इंजीनियर और वैज्ञानिक तैयार करता है।

लेकिन जब बात अंतरराष्ट्रीय स्तर की परीक्षा PISA (Programme for International Student Assessment) की आती है, जो रटने के बजाय सोचने, समझने और वास्तविक जीवन में ज्ञान का इस्तेमाल करने की क्षमता को परखती है, तब भारत का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है।

साल 2009 में, जब भारत ने इस परीक्षा में भाग लिया, तब उसकी रैंकिंग सबसे नीचे रहने वाले देशों में थी। वियतनाम, एस्टोनिया और फिनलैंड जैसे देश भारत से काफी आगे रहे। निजी स्कूलों के छात्र सरकारी स्कूलों से बेहतर थे, लेकिन दुनिया के मानकों तक नहीं पहुंच सके।

उसके बाद भारत ने पीसा में हिस्सा नहीं लिया। लेकिन देश के अपने सर्वे भी यही तस्वीर दिखाते हैं। ASER (Annual Status of Education Report) और NAS (National Achievement Survey), जिसे अब PARAKH राष्ट्रीय सर्वेक्षण कहा जाता है, बताते हैं कि निजी स्कूलों के बहुत से बच्चे भी अपनी कक्षा के स्तर के अनुसार न ठीक से पढ़ पाते हैं और न ही गणित कर पाते हैं।

इसकी एक बड़ी वजह यह है कि हमारे स्कूल अब भी समझ विकसित करने के बजाय रटने पर ज़्यादा ज़ोर देते हैं।

एक सेवानिवृत्त शिक्षक का कहना है कि निजी स्कूलों की बेहतर छवि का एक और राज़ है। इनमें ज़्यादातर दाखिला उन परिवारों के बच्चों को मिलता है, जिनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति पहले से बेहतर होती है। इसलिए अच्छे नतीजों का पूरा श्रेय केवल स्कूलों की पढ़ाई को नहीं दिया जा सकता।

माता-पिता भारी-भरकम फीस इस उम्मीद से भरते हैं कि बच्चों को बेहतरीन तालीम मिलेगी। लेकिन फीस जितनी तेज़ी से बढ़ी है, शिक्षा की गुणवत्ता उतनी नहीं बढ़ी। बड़ी कक्षाएं, शिक्षकों की असमान ट्रेनिंग और परीक्षा-केंद्रित पढ़ाई आज भी आम समस्या हैं।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का मकसद रटने की संस्कृति कम करना और बच्चों में सोचने-समझने, हुनर और व्यवहारिक ज्ञान को बढ़ावा देना है। लेकिन ज़मीन पर इन बदलावों को लागू होने में अभी वक्त लगेगा।

फीस और शिक्षा की गुणवत्ता के बीच बढ़ता यह फ़ासला परिवारों की जेब पर भारी पड़ रहा है। इससे अच्छी शिक्षा सिर्फ़ अमीरों तक सीमित होने का ख़तरा भी बढ़ रहा है। सबसे बड़ी कमी यह है कि स्कूलों से यह साबित करने की कोई ठोस जवाबदेही नहीं मांगी जाती कि बढ़ी हुई फीस से बच्चों की सीखने की क्षमता भी वास्तव में बेहतर हुई है।

अगर 1965 का कोई छात्र आज के स्कूल देखे, तो वह शानदार इमारतों, स्मार्ट क्लासरूम और आधुनिक तकनीक से ज़रूर हैरान होगा। लेकिन शायद वह यह सवाल भी पूछे कि क्या असली तालीम भी उतनी ही आगे बढ़ी है, जितनी फीस बढ़ी है?

जब तक स्कूलों का हिसाब सिर्फ़ चमकदार इमारतों और सुविधाओं से नहीं, बल्कि बच्चों के वास्तविक सीखने के नतीजों से नहीं लिया जाएगा, तब तक माता-पिता शायद अच्छी शिक्षा से ज़्यादा उसकी चमक-दमक की कीमत चुकाते रहेंगे।

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