बृज मंडल की हरियाली कौन निगल रहा है?
फैंसी प्रोजेक्ट बढ़ रहे हैं, पेड़ घट रहे हैं!
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बृज खंडेलवाल द्वारा
25 जुलाई 2026
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ब्रज मंडल या ताज ट्रिपेजियम जोन, पर खतरा फिर मंडरा रहा है। इस बार हमला सिर्फ धुएँ या कारखानों से नहीं है। उसके सबसे पुराने पहरेदार, उसके पेड़, तेजी से गायब हो रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने टीटीज़ेड में 10,700 से अधिक पूर्ण विकसित पेड़ों की कटाई को मंजूरी दे दी है। इन पेड़ों की बलि सड़कों, एक्सप्रेसवे, रेलवे लाइन, एयरपोर्ट विस्तार और दूसरे बड़े प्रोजेक्टों के लिए दी जाएगी। विकास ज़रूरी है, इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन सवाल यह है कि क्या विकास हरियाली की कीमत पर होगा? मथुरा, वृन्दावन, गोवर्धन में पिछले कुछ वर्षों में हजारों पेड़ कट चुके हैं।
टीटीज़ेड का गठन 1990 के दशक में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक एम.सी. मेहता मामले के बाद हुआ था। करीब 10,400 वर्ग किलोमीटर में फैला यह क्षेत्र आगरा, मथुरा, वृंदावन और आसपास के जिलों को समेटता है। इसका उद्देश्य था ताजमहल को प्रदूषण और पर्यावरणीय क्षरण से बचाना। आज वही सुरक्षा कवच धीरे-धीरे टूट रहा है।
हर साल हजारों पेड़ गायब हो रहे हैं। कहीं सड़क चौड़ी हो रही है, कहीं एक्सप्रेसवे बन रहा है। कहीं कॉलोनियाँ उग रही हैं, कहीं व्यावसायिक परिसर। शहर फैल रहे हैं, और हरियाली सिमट रही है। कंक्रीट का जंगल बढ़ रहा है, असली जंगल पीछे हट रहे हैं।
ताजमहल को प्रदूषण से बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 1996 में 10,400 वर्ग किमी क्षेत्र में ताज ट्रेपेजियम ज़ोन (TTZ) बनाया। इसके बावजूद हरित क्षेत्र लगातार घट रहा है। 2017 में छह जिलों का वन क्षेत्र 664 वर्ग किमी था, जो 2019 में घटकर 657.71 वर्ग किमी रह गया। आगरा में भी 9.38 वर्ग किमी वन क्षेत्र कम हुआ। शहरीकरण, निर्माण, पेड़ों की कटाई, अतिक्रमण, प्रदूषण और जल संकट इसके प्रमुख कारण हैं। लाखों पौधे लगाए जा रहे हैं, लेकिन रखरखाव की कमी से उनकी जीवित रहने की दर अपेक्षा से कम है। केवल पौधारोपण नहीं, बल्कि पेड़ों का संरक्षण भी जरूरी है।
सरकारें कहती हैं कि एक पेड़ के बदले दस पौधे लगाए जाएंगे। कागज़ पर यह तर्क अच्छा लगता है। मगर प्रकृति फाइलों से नहीं चलती।
एक पुराना पेड़ बनने में कई दशक लगते हैं। वह कार्बन सोखता है, छाया देता है, हवा साफ करता है, पक्षियों को आश्रय देता है और शहर का तापमान कम करता है। एक छोटा पौधा वर्षों तक उसकी बराबरी नहीं कर सकता। ऊपर से लगाए गए अनेक पौधे देखभाल के अभाव में सूख जाते हैं।
आगरा पहले ही खराब हवा से जूझ रहा है। धूल, वाहनों का धुआँ और लगातार निर्माण गतिविधियाँ प्रदूषण बढ़ा रही हैं। ऐसे में पेड़ों की कटाई शहर की प्राकृतिक ढाल को कमजोर कर देगी। गर्मी और बढ़ेगी, हवा और खराब होगी।
यमुना के बाढ़ क्षेत्र भी इससे प्रभावित होंगे। पेड़ मिट्टी को बचाते हैं, भूजल को रिचार्ज करते हैं और जैव विविधता को सहारा देते हैं। उनके खत्म होने से पूरा पारिस्थितिकी तंत्र कमजोर पड़ता है।
पर्यावरणविद् डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य का कहना है, "विकास का विरोध नहीं है। लेकिन हर परियोजना में पहले यह देखा जाना चाहिए कि कितने पुराने पेड़ों को बचाया जा सकता है। हजारों पेड़ काटना आख़िरी विकल्प होना चाहिए, पहला नहीं।"
वरिष्ठ पर्यावरण कार्यकर्ता डॉ मुकुल पांड्या कहते हैं, "आगरा की हरियाली जितनी तेजी से खत्म हो रही है, उतनी तेजी से लौट नहीं रही। पेड़ सिर्फ सौंदर्य नहीं हैं, वे शहर के फेफड़े हैं।"
वृन्दावन के ग्रीन एक्टिविस्ट जगन नाथ पोद्दार कहते हैं, "सरकारें सड़कों और पुलों का उद्घाटन करती हैं, जंगलों का नहीं। पेड़ों को जीवनदाता नहीं, बाधा समझा जाने लगा है। यही सबसे बड़ी त्रासदी है।"
असल सवाल विकास बनाम पर्यावरण का नहीं है। समझदारी भरे विकास का है। सड़कों का मार्ग बदला जा सकता है। एलिवेटेड कॉरिडोर बनाए जा सकते हैं। पेड़ों का वैज्ञानिक प्रत्यारोपण किया जा सकता है। लगाए गए पौधों की स्वतंत्र निगरानी होनी चाहिए और उनकी जीवित रहने की दर सार्वजनिक की जानी चाहिए।
टीटीज़ेड एक दूरदर्शी सोच का परिणाम था। उसे सिर्फ कागज़ी बाघ बनाकर नहीं छोड़ा जा सकता।
विडंबना देखिए। मोहब्बत की सबसे खूबसूरत निशानी ताजमहल अपने प्राकृतिक रखवालों को खो रहा है। एक सौ साल पुराने पेड़ को काटना आसान है, लेकिन उसे वापस लाने में कई पीढ़ियाँ लग जाती हैं।
ताजमहल को सिर्फ चमकदार पत्थरों की नहीं, साफ हवा, बहती यमुना और जीवित जंगलों की ज़रूरत है। प्रकृति को कुर्बान करके मिलने वाला विकास दरअसल विकास नहीं, आने वाली पीढ़ियों पर थोपा गया कर्ज है।
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