Saturday, September 19, 2026

 


हीडलबर्ग से ब्लैक फॉरेस्ट: जहां जंगल फुसफुसाता है और कोयल वक्त बताती है

_____________________

बृज खंडेलवाल द्वारा

जर्मनी

20 सितंबर, 2026

________________________

शहर अचानक गायब हो गया।

एक पल पहले तक हमारी बस हीडलबर्ग की पुरानी गलियों, नेकर नदी, पहाड़ी पर खड़े लाल बलुआ पत्थर के खंडहरनुमा महल और ओल्ड ब्रिज की खूबसूरत मेहराबों को पीछे छोड़ रही थी। अगले ही पल लगा, जैसे बस जर्मनी के किसी बिल्कुल दूसरे हिस्से में दाखिल हो गई हो।

इमारतें गायब। पेड़ बढ़ते गए। दोनों ओर पहाड़ उठ खड़े हुए। घनी हरी शाखाओं के बीच से धूप छनकर आ रही थी, जैसे उसे भी जंगल में दाखिल होने की इजाज़त लेनी पड़ रही हो।

यह सफर कम और किसी परी-कथा की शुरुआत ज्यादा लग रहा था।

नाम जरूर थोड़ा डरावना है: ब्लैक फॉरेस्ट!

नाम सुनते ही आंखों के सामने घना अंधेरा जंगल, रहस्यमय रास्ते, चुड़ैलें, परियां और पेड़ के पीछे छिपा कोई भेड़िया घूमने लगता है। रोमनों ने इसकी घनी और छायादार हरियाली देखकर इसे Silva Nigra, यानी काला जंगल कहा था। जर्मन इसे श्वार्ज़वाल्ड कहते हैं।

लेकिन यहां पहुंचकर पहला ताज्जुब यही हुआ:

ब्लैक फॉरेस्ट काला कम और हरा ज्यादा है।

हमारी टीचर और गाइड लेडी मार्था ने बताया कि दक्षिण-पश्चिमी जर्मनी का यह विशाल पहाड़ी इलाका देवदार, स्प्रूस और बीच के घने पेड़ों, लहरदार पहाड़ियों, झरनों, झीलों, पुराने गांवों और ढलानदार छतों वाले लकड़ी के मकानों के लिए मशहूर है।

कुछ ही देर पहले हम हीडलबर्ग में थे: विश्वविद्यालयों, किताबों, रोमांस और पुराने यूरोपीय आकर्षण का शहर।

अब मंज़र पूरी तरह बदल चुका था।

गगनचुंबी इमारतों की जगह पहाड़ थे। ट्रैफिक के शोर की जगह पेड़ों की सरसराहट थी।

शेयर बाजार गायब था।

ऑक्सीजन बाजार तेज़ी से फल-फूल रहा था!

बस की खिड़की से बाहर देखते हुए लगा कि यहां प्रकृति को कभी जल्दी नहीं रही। पेड़ धीरे-धीरे बड़े हुए। पहाड़ सदियों से खड़े हैं। नदियां अपनी मर्ज़ी से रास्ता बनाती रही हैं।

जल्दी सिर्फ हमें है।

शहर में मोबाइल फोन बजता है। यहां चिड़ियां जवाब देती हैं।

शहर में हॉर्न चीखते हैं। यहां हवा पेड़ों के कान में कुछ फुसफुसाती है।

ब्लैक फॉरेस्ट ने मुझे दक्षिण भारत की नीलगिरि पहाड़ियों की याद दिला दी। दोनों जगह आधुनिक जिंदगी की वह दुर्लभ नेमत मिलती है, जिसे हमने लगभग भुला दिया है; आंखों के लिए सुकून और दिमाग के लिए खामोशी।

ब्लैक फॉरेस्ट के बड़े हिस्से को प्रकृति को अपनी रफ्तार से चलने देने की सोच के साथ संभाला जाता है। 2014 में बने ब्लैक फॉरेस्ट नेशनल पार्क का मूल विचार भी यही है कि प्रकृति को प्रकृति रहने दिया जाए।

मानो जंगल इंसानों से कह रहा हो: 

“भाई साहब, हमें अकेला छोड़ दीजिए। यह सिस्टम हम आपसे बहुत पहले से चला रहे हैं!”

और शायद जंगल सही भी कहता है।

हम इंसान हर चीज को मैनेज करना चाहते हैं: जंगल, नदियां, ट्रैफिक, बाजार, पड़ोसी और कभी-कभी दूसरों की जिंदगी भी।

जंगल को देखिए।

वह बस बढ़ता है।

ब्लैक फॉरेस्ट सिर्फ पेड़ों का नाम नहीं है। यह झरनों, झीलों, पुराने गांवों, लकड़ी के घरों और सबसे बढ़कर कुकू क्लॉक, यानी कोयल वाली घड़ियों की धरती है।

इन घड़ियों की परंपरा यहां काफी पुरानी है। 18वीं सदी में लंबे और बर्फीले जर्मन सर्दियों के दौरान किसानों और कारीगरों ने इन्हें बनाना शुरू किया। ट्राइबर्ग और उसके आसपास के इलाके आज भी इन घड़ियों के लिए मशहूर हैं।

हर घंटे छोटी-सी चिड़िया बाहर निकलती है और पूरे अनुशासन के साथ घोषणा करती है: 

“कू-कू!”

पद्मिनी अय्यर ने तुरंत टिप्पणी की:

“भारत में ऐसी घड़ी घर में लगा दी जाए तो तीसरे दिन परिवार पूछेगा, इसको बंद करने का बटन कहां है?

लेकिन यहां कोयल संस्कृति है।

हमारी घड़ियां कभी-कभी देर से चलती हैं।

यहां तो कोयल भी वक्त की पाबंद है।

जर्मन अनुशासन ने आखिरकार पक्षियों को भी पकड़ लिया!

यहां घड़ी सिर्फ समय नहीं बताती। वह कहानी सुनाती है और साथ में एक अच्छा-खासा स्मृति-चिह्न भी बेच देती है।"

फिर आया ट्राइबर्ग।

झरने का गिरता पानी, हरी पहाड़ियां और घुमावदार रास्ते ऐसा मंज़र बनाते हैं कि कैमरा खुद जेब से बाहर निकलना चाहता है।

पहले झरना देखिए।

फिर फोटो खींचिए।

फिर फोटो में खुद को देखिए।

और उसके बाद वह ऐतिहासिक वाक्य आता है:

“एक फोटो और!”

हमारी इस यूरोपीय यात्रा में “एक फोटो और” शायद दूसरे नंबर का सबसे ज्यादा इस्तेमाल हुआ वाक्य है।

पहले नंबर पर है:

“अगला टॉयलेट कितनी दूर है?” उसके बाद खाने में क्या मिलेगा?

लेकिन कई दिनों की लगातार सैर के बाद हमारे घुटनों ने भी अपनी राय देना शुरू कर दिया था।

उन्होंने साफ संदेश दिया:

“यात्रा आपकी है, घुटने हमारे हैं!”

सो हम वरिष्ठ यात्रियों ने प्रकृति के साथ एक व्यावहारिक समझौता कर लिया।

जितना आराम से देख सकते हैं, उतना ही काफी है।

हर झरने पर विजय प्राप्त करना जरूरी नहीं।

हर पहाड़ी पर चढ़ना जरूरी नहीं।

कभी-कभी दूर खड़े होकर प्रकृति की खूबसूरती का लुत्फ लेना भी काफी होता है।

उम्र एक बड़ी बात सिखाती है:

हर जगह पहुंचना जरूरी नहीं।

जहां पहुंच जाएं, वहां खुश रहना जरूरी है।

और फिर आया दिन का सबसे अहम अध्याय:

लंच!

ब्लैक फॉरेस्ट के बीच निलेश देसाई ने अपने रेस्तरां में हमारा स्वागत किया। और फिर ऐसा खाना सामने आया कि जर्मनी में अचानक घर की खुशबू महसूस होने लगी।

दही वड़ा।

आलू टिक्की।

कढ़ी।

खिचड़ी।

और साथ में असली ब्लैक फॉरेस्ट केक: चेरी और क्रीम से बना वह मशहूर केक, जिसकी जड़ें इसी इलाके से जुड़ी हैं।

हमने ब्लैक फॉरेस्ट के नाम पर दुनिया भर में बहुत केक खाए हैं।

लेकिन असली ब्लैक फॉरेस्ट के बीच बैठकर ब्लैक फॉरेस्ट केक खाना एक बेहद लज़ीज़ इत्तेफाक था।

जंगल जर्मन था।

खाना हिंदुस्तानी था।

और हमारे पेट को इस सांस्कृतिक मेल-मिलाप से कोई शिकायत नहीं थी।

धन्यवाद, लेडी मार्था!

कहते हैं, प्यार का रास्ता पेट से होकर जाता है।

हमारे मामले में कढ़ी और खिचड़ी ने तो दिल तक जाने के लिए एक्सप्रेसवे पकड़ लिया।

विदेश यात्रा में शाकाहारी पर्यटक के लिए खाना भी अपने आप में एक पर्यटन स्थल बन जाता है।

आप महल देखने निकलते हैं। संग्रहालय देखते हैं। झरने खोजते हैं।

लेकिन आखिर में पेट ही यात्रा का कार्यक्रम तय करने लगता है।

सुबह बस में गीता जी के भजन और “राधे-राधे” की गूंज अभी भी कानों में थी।

एक तरफ ब्रज की राधा थीं।

दूसरी तरफ जर्मनी का श्वार्ज़वाल्ड।

भाषा अलग।

मौसम अलग।

संस्कृति अलग।

लेकिन संगीत और प्रकृति में एक खूबसूरत समानता है:

उन्हें पासपोर्ट नहीं चाहिए।

अमेरिका से आईं गीता जी जिनकी जड़ें बिहार के भागलपुर में हैं,  के भजनों ने हमारी सुबह को आध्यात्मिक रंग दिया था। अब वही बस जंगलों के बीच आगे बढ़ रही थी और प्रकृति जैसे अपनी खामोश इबादत में लगी थी।

कहीं नदी बह रही थी।

कहीं कोयल घंटे का ऐलान कर रही थी।

और हमारे भारतीय पर्यटक दल के भीतर एक बेहद व्यावहारिक सवाल अब भी जिंदा था:

“अगला टॉयलेट कितनी दूर है?”

यही तो यूरोप है;

आध्यात्मिकता, खूबसूरती और सैनिटेशन: तीनों एक साथ!

इस यूरोपीय सफर में एक बात बार-बार सामने आई है।

शहर हमें तेज़ चलना सिखाते हैं।

प्रकृति हमें ठहरना सिखाती है।

और ब्लैक फॉरेस्ट में ऐसा लगा कि सिर्फ हवा को जल्दी थी।

शायद यही इस जंगल का सबसे बड़ा पैगाम है।

हर चीज को जल्दबाज़ी में करना जरूरी नहीं।

कभी-कभी जिंदगी को पेड़ की तरह खड़ा रहने देना चाहिए।

यहां पेड़ भाषण नहीं देते।

पहाड़ अपनी उपलब्धियों की सूची नहीं छापते।

नदी सोशल मीडिया पर सेल्फी नहीं डालती।

वे बस मौजूद हैं।

और आज की शोर-भरी दुनिया में शायद यही सबसे बड़ी दौलत है।

खामोशी भी एक ज़ुबान है।

कुछ ही दिन पहले हम एम्स्टर्डम की नहरों के किनारे थे।

फिर ब्रसेल्स आया।

एक ही दिन में हमारी बस की खिड़की से तीन देश गुजर गए।

हीडलबर्ग ने यूरोप का बौद्धिक और रोमानी चेहरा दिखाया।

अब ब्लैक फॉरेस्ट यूरोप का एक और चेहरा सामने ला रहा था: 

उसकी बेपनाह कुदरती खूबसूरती।

नक्शा लगातार बदल रहा था।

फोटो लगातार बढ़ रही थीं।

सूटकेस में जगह लगातार घट रही थी।

लेकिन यादों का खजाना लगातार भर रहा था।

अब सवाल यह नहीं था:

“यूरोप में और क्या देखना बाकी है?”

सवाल यह था:

“इतनी सारी यादें घर कैसे ले जाएंगे?”

सूटकेस में कपड़ों के लिए जगह भले कम पड़ जाए।

लेकिन दिमाग और दिल में यादों के लिए जगह हमेशा रहती है।

सफर जारी है।

और हमारी कहानी भी।

 


फ्रैंकफर्ट को अलविदा, हाइडलबर्ग को सलाम

पैसे, पढ़ाई और एक चुटकी रोमांस

________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा

फ्रैंकफर्ट–हाइडलबर्ग, जर्मनी

19 सितंबर, 2026

_________________________

एक ही दिन, तीन देश : बिना वीजा, बिना झंझट

हमारी आरामदेह टूरिस्ट बस ने एक ही दिन में फ्रांस, बेल्जियम और नीदरलैंड के किनारे पार किए। रात तक हम जर्मनी के फ्रैंकफर्ट पहुंच चुके थे। न टैंक, न सैनिक , बस कैमरा, नाश्ता, गूगल मैप और उत्सुक भारतीय वरिष्ठ नागरिकों का एक जत्था।

सड़क से यूरोप का असली चेहरा

खिड़की से दौड़ता यूरोप पोस्टकार्ड से अलग दिखता है: कोमल हरियाली, खाने-पीने वाले छोटे गाँव, हवा में मँडराती पवनचक्कियाँ, और बीच-बीच में फैक्ट्रियाँ व गोदाम। रेलवे लाइनों, खेतों और कस्बों की अपनी-अपनी कहानियाँ हैं , महल और गिरजाघर ही सब कुछ नहीं बताते। 

नदीयों का बहता इतिहास

टेम्स, सीन, एम्स्टेल और नेकर , ये नदियाँ शहरों का दूसरा चेहरा दिखाती हैं। सड़क से आप शहर देखते हैं, नदी से उसका मूड: लंदन की गंभीरता, पेरिस की रोमांटिक छाँव, एम्स्टर्डम की सहजता, और हाईडलबर्ग में नेकर के साथ पुराने मकानों की शान। साइकिलें, नावें और पतले-लम्बे मकान , सबको अपनी जगह चाहिए।

बस की छोटी-सी कूटनीति

हमारी बस ने तीन देशों की सीमाएँ पार कर दीं , बिना पूछताछ, बिना पासपोर्ट ड्रामे। पर असली ‘कूटनीति’ अंदर चली: मार्था ने यात्रियों से पलक झपकते ही फोटो-स्टॉप, सत्र और परिचय करवा दिए , “माइक लीजिए और अपने बारे में बताइए।” इतने दिन के सहयात्री अचानक परिचित बन गए।

एम्स्टर्डम से फ्रैंकफर्ट: रंग बदलते हैं

एम्स्टर्डम की नहरों और साइकिलों के बाद फ्रैंकफर्ट आभासी तौर पर अलग दुनिया थी , तेज, व्यवस्थित और पैसे का शहर। यह यूरोप का वित्तीय केंद्र है, जहाँ बैंक और कारोबार का बोलबाला है। फिर भी, इसी शहर में गोएथे का जन्मस्थान है , यानी पैसा और साहित्य साथ-साथ चलते हैं। बहुसांस्कृतिक माहौल के कारण खाने की परवाह करने वाले भारतीयों के लिये फ्रैंकफर्ट का ‘रंगोली’ रेस्टोरेंट किसी राहत से कम नहीं था: भरपेट शाकाहारी भोजन और आखिर में बड़ा कटोरा कस्टर्ड।

जलवायु परिवर्तन का सन्देश

यूरोप में गर्मी अब बड़ी चिंता बनती जा रही है। ऊँची-ऊँची इमारतें, अरबों के बैंक मदद नहीं करेंगे जब छाँव, पेड़ और खुले स्थान ज़रूरी हों। तापमान बैंक बैलेंस की परवाह नहीं करता , यही सबसे सादा सच है।

हाईडलबर्ग का धीरे-धीरे स्वागत

फ्रैंकफर्ट छोड़ते ही वातावरण बदल गया: ऊँची इमारतों की जगह पहाड़ियाँ और हरियाली। बस में सन्नाटा, फिर एक आवाज: “वो रहा हीडलबर्ग!” कैमरे फिर बाहर निकले। शहर ने शोर नहीं, शालीनता से परिचय दिया , हरी पहाड़ियाँ, पत्थर की गलियाँ, नेकर पर पुराना पुल और पहाड़ी पर बैठा हीडलबर्ग का किला। यहां इतिहास किताबों में बंद नहीं है; वह गलियों में चलता, पुलों पर ठहरता और नदी में अपना चेहरा देखता है।

फ्रैंकफर्ट और हाइडलबर्ग ,  दो चेहरे

फ्रैंकफर्ट आधुनिकता, पैसे और गिनती का शहर है; हाइडलबर्ग ज्ञान, इतिहास और थोड़े-से रोमांस का। शायद यही इन दोनों शहरों का जादू है: एक हाथ में बैंक का कैल्कुलेटर, दूसरे में कविता की पंक्ति। और नेकर किनारे खड़ा हाइडलबर्ग धीरे से कहता है: “ज़िन्दगी सिर्फ बैलेंस शीट नहीं है , थोड़ा रोमांस भी ज़रूरी है।” 



फ्रैंकफर्ट को अलविदा, हाइडलबर्ग को सलाम

पैसे, पढ़ाई और एक चुटकी रोमांस

________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा

फ्रैंकफर्ट–हाइडलबर्ग, जर्मनी

19 सितंबर, 2026

_________________________

एक ही दिन, तीन देश : बिना वीजा, बिना झंझट

हमारी आरामदेह टूरिस्ट बस ने एक ही दिन में फ्रांस, बेल्जियम और नीदरलैंड के किनारे पार किए। रात तक हम जर्मनी के फ्रैंकफर्ट पहुंच चुके थे। न टैंक, न सैनिक , बस कैमरा, नाश्ता, गूगल मैप और उत्सुक भारतीय वरिष्ठ नागरिकों का एक जत्था।

सड़क से यूरोप का असली चेहरा

खिड़की से दौड़ता यूरोप पोस्टकार्ड से अलग दिखता है: कोमल हरियाली, खाने-पीने वाले छोटे गाँव, हवा में मँडराती पवनचक्कियाँ, और बीच-बीच में फैक्ट्रियाँ व गोदाम। रेलवे लाइनों, खेतों और कस्बों की अपनी-अपनी कहानियाँ हैं , महल और गिरजाघर ही सब कुछ नहीं बताते। 

नदीयों का बहता इतिहास

टेम्स, सीन, एम्स्टेल और नेकर , ये नदियाँ शहरों का दूसरा चेहरा दिखाती हैं। सड़क से आप शहर देखते हैं, नदी से उसका मूड: लंदन की गंभीरता, पेरिस की रोमांटिक छाँव, एम्स्टर्डम की सहजता, और हाईडलबर्ग में नेकर के साथ पुराने मकानों की शान। साइकिलें, नावें और पतले-लम्बे मकान , सबको अपनी जगह चाहिए।

बस की छोटी-सी कूटनीति

हमारी बस ने तीन देशों की सीमाएँ पार कर दीं , बिना पूछताछ, बिना पासपोर्ट ड्रामे। पर असली ‘कूटनीति’ अंदर चली: मार्था ने यात्रियों से पलक झपकते ही फोटो-स्टॉप, सत्र और परिचय करवा दिए , “माइक लीजिए और अपने बारे में बताइए।” इतने दिन के सहयात्री अचानक परिचित बन गए।

एम्स्टर्डम से फ्रैंकफर्ट: रंग बदलते हैं

एम्स्टर्डम की नहरों और साइकिलों के बाद फ्रैंकफर्ट आभासी तौर पर अलग दुनिया थी , तेज, व्यवस्थित और पैसे का शहर। यह यूरोप का वित्तीय केंद्र है, जहाँ बैंक और कारोबार का बोलबाला है। फिर भी, इसी शहर में गोएथे का जन्मस्थान है , यानी पैसा और साहित्य साथ-साथ चलते हैं। बहुसांस्कृतिक माहौल के कारण खाने की परवाह करने वाले भारतीयों के लिये फ्रैंकफर्ट का ‘रंगोली’ रेस्टोरेंट किसी राहत से कम नहीं था: भरपेट शाकाहारी भोजन और आखिर में बड़ा कटोरा कस्टर्ड।

जलवायु परिवर्तन का सन्देश

यूरोप में गर्मी अब बड़ी चिंता बनती जा रही है। ऊँची-ऊँची इमारतें, अरबों के बैंक मदद नहीं करेंगे जब छाँव, पेड़ और खुले स्थान ज़रूरी हों। तापमान बैंक बैलेंस की परवाह नहीं करता , यही सबसे सादा सच है।

हाईडलबर्ग का धीरे-धीरे स्वागत

फ्रैंकफर्ट छोड़ते ही वातावरण बदल गया: ऊँची इमारतों की जगह पहाड़ियाँ और हरियाली। बस में सन्नाटा, फिर एक आवाज: “वो रहा हीडलबर्ग!” कैमरे फिर बाहर निकले। शहर ने शोर नहीं, शालीनता से परिचय दिया , हरी पहाड़ियाँ, पत्थर की गलियाँ, नेकर पर पुराना पुल और पहाड़ी पर बैठा हीडलबर्ग का किला। यहां इतिहास किताबों में बंद नहीं है; वह गलियों में चलता, पुलों पर ठहरता और नदी में अपना चेहरा देखता है।

फ्रैंकफर्ट और हाइडलबर्ग ,  दो चेहरे

फ्रैंकफर्ट आधुनिकता, पैसे और गिनती का शहर है; हाइडलबर्ग ज्ञान, इतिहास और थोड़े-से रोमांस का। शायद यही इन दोनों शहरों का जादू है: एक हाथ में बैंक का कैल्कुलेटर, दूसरे में कविता की पंक्ति। और नेकर किनारे खड़ा हाइडलबर्ग धीरे से कहता है: “ज़िन्दगी सिर्फ बैलेंस शीट नहीं है , थोड़ा रोमांस भी ज़रूरी है।” 



















Friday, September 18, 2026

 


ब्रसेल्स: छात्र सड़क पर, कॉकरोच मैदान में और टॉयलेट का €2 का टिकट

____________________

बृज खंडेलवाल द्वारा

ब्रसेल्स से

18 सितंबर, 2026

___________________

ब्रसेल्स में छात्र सड़क पर उतर आए। दिल्ली में कॉकरोच राजनीति में उतर आए। और हम भारतीय पर्यटक टॉयलेट की तलाश में उतर गए।

यूरोप में शिक्षा महंगी हो रही है। भारत में शिक्षा पर राजनीति गरम है। और दोनों के बीच एक बेचारा पर्यटक खड़ा है, जिसे सिर्फ एक मुफ्त टॉयलेट चाहिए।

यही है आज का ग्लोबल विलेज!

ब्रसेल्स में छात्र कह रहे हैं, “पढ़ाई हमारा हक है।”

दिल्ली के कॉकरोच कह रहे हैं, “हम भी यहीं हैं!”

और भारतीय पर्यटक पूछ रहा है, “भाई, टॉयलेट किधर है?”

जब छात्र सड़क पर आए

16 सितंबर को फ्रेंच भाषी छात्रों ने ब्रसेल्स में मार्च निकाला। वे बढ़ती यूनिवर्सिटी फीस और पढ़ाई से जुड़े नए नियमों का विरोध कर रहे थे। पुलिस ने करीब 750 प्रदर्शनकारी गिने, जबकि आयोजकों ने संख्या लगभग 2,000 बताई।

यानी विरोध प्रदर्शन में भी आंकड़ों की अपनी राजनीति होती है।

छात्रों की शिकायत वाजिब थी। फीस बढ़ रही है, किराया महंगा है, खाना महंगा है और बस-ट्रेन भी जेब को सलाम ठोककर चलती है।

आयोजकों के अनुसार, आधे से ज्यादा छात्रों को अब करीब €1,200 तक की नामांकन फीस देनी पड़ सकती है। पढ़ाई और रहने का कुल सालाना खर्च €8,100 से €13,600 तक पहुंच सकता है।

इतना खर्च सुनकर भारतीय माता-पिता शायद तुरंत कहें,

“बेटा, सरकारी कॉलेज देख लो।”

छात्रों का पैगाम साफ है। पढ़ाई अमीरों का विशेषाधिकार नहीं बननी चाहिए।

और यह बात उन्होंने सड़क पर आकर कह दी।

दिल्ली ने भी कमाल कर दिया

उधर दिल्ली में आंदोलन का अंदाज ही अलग है।

यहां युवाओं के एक समूह ने Cockroach Janta Party के नाम से शिक्षा और युवा मुद्दों को लेकर आंदोलन खड़ा किया है। जून में इस समूह ने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन किया था।

नाम सुनकर पहले तो लगा कि यह कोई मजाक है।

फिर पता चला कि मजाक ने बाकायदा राजनीति का रूप ले लिया है।

ब्रसेल्स में छात्र पोस्टर लेकर निकले।

दिल्ली में कॉकरोच प्रतीक बन गए।

एक के हाथ में बैनर था।

दूसरे के पास एंटीना।

दोनों ने सिस्टम को संदेश दे दिया।

“हमें नजरअंदाज मत करो।”

लोकतंत्र की खूबसूरती भी यही है। जब इंसान की आवाज नहीं सुनी जाती, तो कभी-कभी कॉकरोच भी बोलने लगते हैं।

ब्रसेल्स के पास भी कम मसले नहीं

छात्र फीस से परेशान हैं। सुरक्षा भी बड़ा सवाल है। नशे से जुड़ी हिंसा और गोलीबारी ने राजधानी की फिक्र बढ़ाई है।

फिर रूसी संपत्तियों का मामला है।

यूरोक्लियर में करीब €200 अरब की रूसी संपत्तियां जमी हुई हैं। इन्हें यूक्रेन के लिए इस्तेमाल करने को लेकर यूरोप में कानूनी और कूटनीतिक बहस चल रही है।

यानी ब्रसेल्स में सवाल छोटे नहीं हैं।

अरबों यूरो के सवाल हैं।

लेकिन आम आदमी की मुश्किलें फिर भी वही हैं।

फीस कैसे भरें?

किराया कैसे दें?

सुरक्षा कैसे मिले?

और...

टॉयलेट कहां मिले?

यूरोप की राजधानी या राजनीति का चौराहा?

ब्रसेल्स की सड़क पर चलते हुए लगता है कि यह सिर्फ बेल्जियम की राजधानी नहीं है।

यह यूरोप का राजनीतिक चौराहा है।

यहीं यूरोपीय आयोग है। यहीं यूरोपीय परिषद है। यूरोपीय संघ की परिषद है। यूरोपीय संसद का हिस्सा है। नाटो का मुख्यालय भी यहीं है।

एक सड़क पर राजनयिक मिल सकता है।

दूसरी पर पत्रकार।

तीसरी पर लॉबिस्ट।

और चौथी पर ऐसा पर्यटक, जो वॉफल खाते-खाते पूछ रहा हो,

“भाई, यहां टॉयलेट फ्री है क्या?”

ब्रसेल्स की आबादी करीब 12 लाख है और यहां लगभग 180 राष्ट्रीयताओं के लोग रहते हैं।

यानी दुनिया यहां बसती है।

और दुनिया की सबसे बड़ी समस्याएं भी शायद यहीं बैठकर चाय पीती हैं।

फिर आया मिनी यूरोप

हमारी टूर लीडर मार्था गोम्स ने हमें समझाया कि ब्रसेल्स सिर्फ यूरोपीय आयोग, नाटो और गंभीर चेहरों का शहर नहीं है।

यह चॉकलेट का शहर भी है।

वॉफल का शहर भी है।

कॉमिक्स, कैफे, संग्रहालय और आर्ट नोव्यू का शहर भी है।

फिर हम पहुंचे मिनी यूरोप।

यहां यूरोप अपने सारे झगड़े भूलकर छोटा हो गया है।

फ्रांस छोटा।

इटली छोटा।

जर्मनी छोटा।

स्पेन छोटा।

और सीमाएं इतनी छोटी कि कोई नेता उन पर भाषण भी पूरा न कर पाए।

पद्मिनी ने इसे बहुत खूबसूरती से कहा,

“यहां यूरोप सीमाओं पर बहस करना बंद कर देता है और एक छोटे से बगीचे में बदल जाता है।”

करीब 350 यूरोपीय स्मारकों के छोटे मॉडल देखकर लगा कि यूरोप को समझने का यह शायद सबसे शांत तरीका है।

न कोई पासपोर्ट।

न इमिग्रेशन।

न सामान की चिंता।

न सीमा पर सवाल।

बस चलते रहिए और यूरोप आपकी जेब में।

फिर मिला ब्रसेल्स का सबसे मशहूर लड़का

लेकिन ब्रसेल्स में घूमते हुए हमारी मुलाकात एक ऐसे लड़के से भी हुई, जो सदियों से एक ही काम कर रहा है।

पेशाब!

यह है मशहूर Manneken Pis, यानी “पेशाब करता छोटा लड़का।”

छोटी-सी कांस्य मूर्ति, लेकिन शोहरत इतनी कि दुनिया भर के पर्यटक उसे देखने पहुंचते हैं।

हम भी पहुंचे।

लड़का निश्चिंत था।

न उसे €2 के टॉयलेट की चिंता थी, न छुट्टे पैसों की।

वह अपनी जगह खड़ा होकर खुलेआम अपना काम कर रहा था।

मैंने सोचा,

“भाई, तुम्हारी किस्मत अच्छी है। यहां कोई टॉयलेट टिकट नहीं मांगता।”

हम भारतीय पर्यटक दूसरी तरफ €1 या €2 देकर पेशाब करने की सुविधा खोज रहे थे और ब्रसेल्स का यह लड़का मुफ्त में अपना काम कर रहा था।

लोकतंत्र में बराबरी कहां है?

एक कांस्य लड़का मुफ्त में।

एक भारतीय पर्यटक €2 में!

Manneken Pis की एक और खासियत है। उसके कपड़े बदलते रहते हैं। दुनिया भर से लोग उसके लिए पोशाकें भेजते हैं। कभी वह सैनिक बनता है, कभी किसी देश का प्रतिनिधि और कभी किसी खास अवसर का मेहमान।

हमारे सामने वह बस ब्रसेल्स का सबसे प्रसिद्ध बच्चा था।

उसने कुछ कहा नहीं।

लेकिन उसका संदेश साफ था।

“भाई, ज्यादा सोचो मत। प्रकृति की पुकार का अपना संविधान होता है।”

और शायद इसी वजह से वह इस शहर की राजनीति से भी ज्यादा लोकप्रिय है।

लेकिन असली यूरोप टॉयलेट में मिला

Manneken Pis देखने के बाद हमें असली यूरोप का सबसे बड़ा सांस्कृतिक झटका मिला।

टॉयलेट।

हां, टॉयलेट!

€1 या €2 देकर पेशाब करने की सुविधा।

भारतीय पर्यटक के लिए यह किसी म्यूजियम की टिकट से कम अनुभव नहीं था।

€2 यानी करीब 220 रुपये।

भारत में इतने में चाय, समोसा और कभी-कभी नाश्ता भी हो जाए।

यहां प्रकृति की पुकार सुनते ही जेब पुकारने लगती है।

“भाई, पहले मुझे देखो!”

पद्मिनी को यह परेशानी दो बार झेलनी पड़ी। उनके पास €100 का नोट था, लेकिन छोटे सिक्के नहीं थे।

टॉयलेट को सिक्के चाहिए।

बैंक नोट नहीं।

यूरोप में बैंकिंग इतनी आधुनिक हो गई है कि कभी-कभी €100 का नोट भी बेकार लगता है।

और तब समझ आया कि असली यूरोपीय संकट रूस की संपत्ति नहीं है।

छुट्टे पैसे हैं।

हमने Manneken Pis को याद किया।

वह मुफ्त में काम कर रहा था।

हम €2 जुटाने में लगे थे।

इतिहास में पहली बार लगा कि एक छोटी-सी मूर्ति ने भारतीय पर्यटक को अर्थशास्त्र का सबसे बड़ा पाठ पढ़ा दिया।

मार्था बनीं हमारी टॉयलेट मंत्री

हमारी टूर लीडर मार्था धीरे-धीरे समूह की अनौपचारिक टॉयलेट मंत्री बन गईं।

उनकी सबसे जरूरी जानकारी कभी-कभी यह नहीं होती थी कि अगला महल कौन-सा है।

सवाल होता था,

“अगला वॉशरूम कहां है?”

महल बाद में देखा जा सकता है।

मूत्राशय लोकतंत्र की तरह इंतजार नहीं करता।

मार्था ने हमें यूरोप के महल दिखाए।

म्यूजियम दिखाए।

स्मारक दिखाए।

लेकिन सबसे बड़ी सेवा यह की कि हमारी किडनी को यूरोप यात्रा पूरी करवाई।

इसे कहते हैं असली टूर मैनेजमेंट।

भारत में मामला थोड़ा अलग है

भारत में पेट्रोल पंप है।

ढाबा है।

होटल है।

सुलभ शौचालय है।

और कुछ भारतीय पुरुषों के पास तो अपनी निजी ‘ओपन एयर व्यवस्था’ भी है।

बस दीवार देखी और काम खत्म।

यूरोप में ऐसा करना भारी पड़ सकता है।

यहां दीवार सरकारी हो सकती है।

कैमरा लगा हो सकता है।

और पुलिस भी लोकतंत्र की तरह हर जगह मौजूद हो सकती है।

इसलिए हमने तय किया कि यूरोप में संस्कृति का सम्मान करेंगे।

दीवारों को दीवार ही रहने देंगे।

ब्रसेल्स का असली सबक

ब्रसेल्स ने हमें कई चेहरे दिखाए।

यूरोपीय क्वार्टर में राजनीति है।

सड़कों पर प्रदर्शन है।

मिनी यूरोप में इतिहास है।

कैफे में चॉकलेट और वॉफल हैं।

Manneken Pis में हास्य है।

और टॉयलेट में अर्थशास्त्र है।

कभी लोकतंत्र पोस्टर लेकर मार्च करता है।

कभी कॉकरोच एंटीना लेकर मैदान में उतरता है।

कभी ब्रसेल्स का छोटा लड़का सदियों से पेशाब करता रहता है।

और कभी एक भारतीय पर्यटक €2 का सिक्का ढूंढता हुआ घूमता है।

ब्रसेल्स शायद यही सिखाता है।

दुनिया चाहे कितनी भी बड़ी समस्या पर बहस करे, आम आदमी की जरूरतें छोटी ही रहती हैं।

उसे पढ़ाई चाहिए।

सुरक्षा चाहिए।

सस्ती जिंदगी चाहिए।

और कभी-कभी...

बस एक मुफ्त टॉयलेट चाहिए।

यूरोप अरबों यूरो की राजनीति करता रहे।

कॉकरोच अपनी पार्टी बनाते रहें।

छात्र अपने पोस्टर उठाते रहें।

Manneken Pis अपनी ड्यूटी निभाता रहे।

हम भारतीय पर्यटक अपना नक्शा संभालकर चलते रहेंगे।

लेकिन अगली बार ब्रसेल्स आने से पहले एक बात जरूर याद रखूंगा।

पासपोर्ट से पहले टॉयलेट का पता पूछना है।

Thursday, September 17, 2026

 जब पेरिस आएंगे पोप, शहर में होगी प्रार्थना, भीड़ और ट्रैफिक की परीक्षा


बृज खंडेलवाल द्वारा

पेरिस, 

18  सितंबर 2026


पेरिस ने राजा देखे हैं, राष्ट्रपति देखे हैं, फिल्मी सितारे देखे हैं और फैशन की दुनिया के बड़े नाम भी देखे हैं। लेकिन अगले सप्ताहांत शहर एक ऐसी हस्ती का स्वागत करने जा रहा है, जिसके साथ ग्लैमर से ज्यादा आस्था जुड़ी है।


पोप लियो चौदहवें पेरिस आ रहे हैं।

2008 के बाद पहली बार कोई पोप फ्रांस की राजधानी में कदम रखेगा। जाहिर है, पेरिस तैयार है। प्रार्थनाएं होंगी, बड़ी भीड़ जुटेगी, सुरक्षा कड़ी होगी और ट्रैफिक ऐसा हो सकता है कि पेरिसवासियों को अपने ही शहर में रास्ता ढूंढना किसी छोटी तीर्थयात्रा से कम न लगे।

पोप लियो चौदहवें शुक्रवार, 25 सितंबर को पेरिस पहुंचेंगे। उनका पहला महत्वपूर्ण कार्यक्रम राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से एलिसे पैलेस में मुलाकात का होगा।

इसके बाद आम लोगों के लिए भी उन्हें देखने का मौका होगा। शाम 4 से 5 बजे के बीच पोप लैटिन क्वार्टर से पोपमोबाइल में गुजरेंगे। यह यात्रा सभी के लिए निःशुल्क और खुली रहेगी।

यानी उस दिन लैटिन क्वार्टर में नजरें ऊपर नहीं, सड़क पर रहेंगी। हो सकता है पेरिस के किसी पर्यटक को पहली बार एहसास हो कि एफिल टावर के अलावा भी यहां देखने लायक बहुत कुछ है।

शुक्रवार की शाम युवाओं के नाम होगी। स्टेड द फ्रांस में पोप के साथ होने वाली युवा प्रार्थना सभा में करीब 75,000 लोगों के पहुंचने की उम्मीद है।

लेकिन शनिवार को तस्वीर और भी बड़ी होगी।

दोपहर 3 बजे खुली जगह पर विशेष प्रार्थना सभा होगी। इसका क्षेत्र प्लास द ला कॉनकॉर्ड से शॉं-ज़े-लीज़े तक फैलेगा। आयोजकों को उम्मीद है कि इसमें पांच लाख तक लोग शामिल हो सकते हैं।

पेरिस में उस दिन एफिल टावर, लूव्र और कैफे ही आकर्षण नहीं होंगे। आधा मिलियन लोग एक ही दिशा में देखते नजर आ सकते हैं।

सुरक्षा और यातायात को लेकर भी बड़े इंतजाम किए जा रहे हैं। प्लास द ला कॉनकॉर्ड और आसपास के इलाकों में मेट्रो बंद रहने और सड़कों पर रोक लगाए जाने की व्यवस्था की जा रही है।

पर्यटकों के लिए सीधी सलाह है, यात्रा की योजना पहले बना लें। वैसे भी पेरिस में एक जगह से दूसरी जगह पहुंचना कभी-कभी अपने आप में एक छोटी परीक्षा होती है। पोप के आने पर यह परीक्षा थोड़ी और कठिन हो सकती है।

पेरिस के बाद पोप लियो चौदहवें लूर्द और मेत्ज़ जाएंगे। इसके बाद उनकी फ्रांस यात्रा समाप्त होगी।

पेरिस दुनिया को एफिल टावर, लूव्र और शॉं-ज़े-लीज़े के लिए आकर्षित करता है। लेकिन अगले सप्ताहांत शहर की पहचान कुछ अलग होगी।

घंटियां बजेंगी। भीड़ जुटेगी। प्रार्थनाएं होंगी।

और कुछ घंटों के लिए शायद तेज रफ्तार वाला पेरिस भी थोड़ा ठहर जाएगा।

पोप आ रहे हैं। पेरिस तैयार है।

 


पेरिस: एफिल टावर चमका, पैरों ने बगावत की और हैंडबैग ने रचा थ्रिलर

_____________________

बृज खंडेलवाल द्वारा

पेरिस, 17 सितंबर 2026

__________________

पेरिस ने हमारा स्वागत नहीं किया। उसने पहले हमारा इम्तिहान लिया।

लंदन से उतरते ही लगा कि हम किसी दूसरे ग्रह पर आ गए हैं। भाषा फ्रेंच थी, इमारतें बेहद सलीकेदार थीं, लोग फैशनेबल दिख रहे थे और ट्रैफिक ऐसा था जैसे सड़क पर कोई मुकाबला चल रहा हो। मौसम ने भी अपना अलग ही मिज़ाज दिखाया। कुल मिलाकर शहर नहीं बदला था, पूरी दुनिया बदल गई थी।

और फिर आया यूरोस्टार।

इंग्लिश चैनल के नीचे से ट्रेन का गुजरना अपने आप में एक कमाल है। हम आराम से बैठे थे और ऊपर कहीं समुद्र बह रहा था। मन में सवाल आया, जब चैनल के ऊपर से उड़ सकते हैं तो नीचे से क्यों न निकल जाएँ? हम सब कुछ देर के लिए शानदार कपड़े पहने हुए सुरंग के चूहे जैसे महसूस कर रहे थे।

पेरिस में दिन बहुत तेज़ी से भागे। सबसे यादगार रहा सीन नदी का क्रूज़। नाव धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी और पेरिस दोनों किनारों पर अपना हुस्न  दिखा रहा था। लगता था जैसे पूरा शहर हमारे लिए चलता-फिरता पोस्टकार्ड बन गया हो।

फिर आया एफिल टावर।

रात के अँधेरे में जब टावर अचानक जगमगाने लगा तो सबकी निगाहें ऊपर थीं और मोबाइल कैमरे नीचे नहीं आ रहे थे। हर घंटे होने वाली पाँच मिनट की रोशनी ने माहौल में जादू घोल दिया। ठंडी हवा ने खूब कोशिश की कि रोमांस में खलल डाले, लेकिन नाकाम रही।

दिलचस्प बात यह थी कि उस समय किसी ने मोबाइल के ज्यादा इस्तेमाल की शिकायत नहीं की। जिस मोबाइल को लेकर हम बच्चों को डाँटते हैं, उसी ने उस रात एफिल टावर को कैद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

एफिल की रोशनी सचमुच कमाल की थी। लोहे की यह बुज़ुर्ग महिला आज भी महफ़िल लूटना जानती है।

फिर पहुँचे वर्साय।

महल की शान देखकर लगा कि पुराने ज़माने के राजा-महाराजा सचमुच अलग ही दुनिया में रहते थे। इतनी शानो-शौकत कि आदमी सोचने लगे, आखिर जनता कब तक यह सब देखती रहती?

म्यूज़ियमों में कला और इतिहास का खजाना मिला। हर तरफ सदियों पुरानी कहानियाँ थीं। और फिर आया डिज़नीलैंड। वहाँ जाकर पता चला कि उम्र चाहे कितनी भी हो, सही माहौल मिले तो बच्चा अंदर से बाहर आने में देर नहीं लगाता।

लेकिन पेरिस ने हमें एक और बड़ा सबक दिया, सुंदर शहरों में सुंदरता देखने के लिए पैर भी चाहिए।

हम चलते रहे। फिर चलते रहे। और चलते ही रहे।

रोज़ के 10,000 कदम कब पार हो गए, पता ही नहीं चला। शाम तक हमारे पैर शिकायत नहीं कर रहे थे। वे बाकायदा राजनयिक छूट (diplomatic immunity) की मांग कर रहे थे।

कुछ पैरों ने तो शायद खतरा भत्ता भी माँगा होगा।

ऐसे में हमारी आरामदेह बस यात्रा किसी शांति समझौते से कम नहीं थी। बस में बैठते ही पैरों और यात्रियों के बीच युद्धविराम हो जाता था।

खाने की चिंता जरूर थी, क्योंकि हम शाकाहारी हैं। लेकिन पेरिस ने यहाँ भी ज्यादा परेशान नहीं किया। अच्छे भारतीय शाकाहारी भोजन ने दिल जीत लिया।

एक शाम शैंपेन के बाद हम पहुँचे शिवम रेस्टोरेंट। जालंधर के एक मेहनती पंजाबी उद्यमी द्वारा चलाया जा रहा यह रेस्तराँ उस रात हमें पेरिस से सीधे पंजाब ले गया।

थाली में सब्ज़ियाँ थीं, स्वाद में घर की याद थी और मन में सुकून। हमें पहली बार लगा कि विदेश में भी कोई समझता है कि सब्ज़ी का मतलब केवल प्लेट सजाना नहीं होता।

मार्था हमेशा की तरह हमारे साथ रहीं। उनका मुस्कुराता चेहरा, मदद का जज़्बा और हर वक्त काम की जानकारी बहुत काम आई। हमारी लोकल गाइड मैग्डलीन ने भी पेरिस की कहानी को और दिलचस्प बना दिया। उन्होंने इमारतों और जगहों के पीछे छिपी कई बातें बताईं।

लेकिन असली थ्रिलर अभी बाकी था।

होटल पहुँचते ही पद्मिनी अय्यर ने ऐसा ऐलान किया कि पूरा खुशहाल पर्यटक दल अचानक आपातकालीन समिति बन गया।

“मेरा हैंडबैग खो गया!”

हैंडबैग में मोबाइल था।

और उससे भी बड़ी आफ़त, पासपोर्ट था।

पैसा खो जाए तो वापस आ सकता है। मोबाइल भी खरीदा जा सकता है। लेकिन पासपोर्ट! वह तो ऐसा कागज़ है जिसके गायब होते ही आदमी को अंतरराष्ट्रीय नौकरशाही के लंबे गलियारों के सपने आने लगते हैं।

सलाहों की बौछार शुरू हो गई।

पुलिस को फोन करो। रास्ता दोबारा देखो। जहाँ-जहाँ गए थे, वहाँ तलाश करो। किसी ने तो यहाँ तक कह दिया कि सीन नदी में भी देख लेना चाहिए।

तभी किसी समझदार ने धीरे से कहा: 

“पहले होटल का कमरा तो देख लीजिए।”

मैं फोन करने लगा और संभावित संकट की योजनाएँ बनाने लगा। मार्था आसपास तलाश करने निकल गईं। होटल की लॉबी कुछ देर के लिए संयुक्त राष्ट्र की आपात बैठक जैसी लगने लगी।

बस फर्क इतना था कि यहाँ राजनयिक कम और सूटकेस ज्यादा थे।

और तभी पद्मिनी दौड़ती हुई वापस आईं।

“मिल गया!”

हैंडबैग कमरे में ही था।

पूरे समय वहीं था।

कपड़ों के ढेर के नीचे चुपचाप पड़ा था। शायद वह भी हमारे साथ लुका-छिपी खेलना चाहता था।

एक पल में अंतरराष्ट्रीय संकट खत्म हो गया।

पुलिस की जरूरत नहीं पड़ी। दूतावास को फोन नहीं करना पड़ा। कोई राजनयिक तार नहीं भेजना पड़ा। संयुक्त राष्ट्र को भी खबर नहीं करनी पड़ी।

एक कपड़े ने पूरी कूटनीति बचा ली।

सच कहें तो पेरिस फिर से सुंदर उसी क्षण लगा।

पीछे मुड़कर देखें तो इस यात्रा में सब कुछ था। सीन का रोमांस था। एफिल टावर की जगमगाहट थी। वर्साय की शानो-शौकत थी। म्यूज़ियमों का इतिहास था। डिज़नीलैंड की बचपन वाली खुशी थी।

आरामदेह बस थी। स्वादिष्ट भारतीय शाकाहारी खाना था। मार्था की मदद थी। मैग्डलीन की जानकारी थी।

और सबसे बढ़कर था: 2026 का हैंडबैग थ्रिलर।

फ्रांस ने हमें कला, इतिहास और वास्तुकला दी।

पेरिस ने हमें रोज़ 10,000 कदम दिए।

हमारे पैरों ने बदले में हमें याद दिलाया कि हर हसीन शहर का अपना हिसाब होता है।

और पद्मिनी ने इस यात्रा की सबसे शानदार सस्पेंस कहानी दे दी।

पेरिस की सीख सीधी है।

एफिल टावर की चमक देखिए। सीन पर तैरिए। वर्साय में हैरत कीजिए। अच्छा खाना खाइए। खूब घूमिए।

लेकिन अगर होटल में कोई सामान गायब हो जाए, तो पुलिस, दूतावास या संयुक्त राष्ट्र को फोन करने से पहले कपड़ों के नीचे जरूर देख लीजिए।

कभी-कभी सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय संकट, एक मुड़े हुए स्वेटर के नीचे पड़ा होता है।




Wednesday, September 16, 2026

 !



लंदन में चंद दिन 

एक ग्लोबल परिवार के साथ

____________________________

स्मारकों से ज्यादा याद रहेंगे लोग, बातचीत और कुछ अनमोल अनुभव

___________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा

15 सितंबर 2026

____________________________

क्या लंदन सिर्फ बिग बेन, बकिंघम पैलेस और टेम्स का नाम है? चंद रोज़ वहां बिताने के बाद लगा कि लंदन की असली कहानी पत्थरों की इमारतों में नहीं, उन लोगों में छिपी है जो इन इमारतों के बीच अपनी जिंदगी जी रहे हैं।

और हमारी अपनी कहानी? वह तो ग्लोबल फैमिली की बस में लिखी जा रही थी। कभी गीतों के साथ, कभी ठहाकों के साथ और कभी इस गंभीर सवाल पर—आज खाना कहां मिलेगा?

हमारी यात्रा का नाम था—ग्लोबल फैमिली। देश के अलग-अलग हिस्सों से आए भारतीय इस परिवार का हिस्सा थे। कुछ साथी ऑस्ट्रेलिया से आए थे, कुछ अमेरिका से। पते अलग थे, पासपोर्ट अलग थे, लेकिन दिल में भारत एक ही था।

यही इस परिवार की खूबसूरती थी। कोई विदेश में वर्षों से रह रहा था, कोई भारत से आया था, लेकिन दो मिनट की बातचीत में ऐसा लगता जैसे बरसों से परिचित हों। भारतीयों की यह खासियत है: पहचान बनाने में समय नहीं लगता। बस एक बार पूछ लीजिए, “आप कहां के हैं?” उसके बाद रिश्तेदारी का इतिहास भी निकल सकता है!

हमारी युवा और उत्साही यात्रा-नेता थीं मार्था गोम्स। उनकी जिम्मेदारी केवल हमें एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाना नहीं था। असली चुनौती थी: इतने सारे भारतीयों को समय पर एक जगह इकट्ठा करना!

कौन बस में आ गया, कौन अभी फोटो खिंचा रहा है, कौन किसी दुकान में फंस गया और कौन भोजन की तलाश में दूसरी दिशा में निकल गया, मार्था सब पर नजर रखती थीं।

उनकी मुस्कान हमेशा तैयार रहती थी। हम चाहे समय पर हों या भारतीय समय के अनुसार थोड़ा आगे-पीछे, मार्था का धैर्य कायम रहा। शायद यात्रा-नेता बनने की पहली योग्यता यही है कि आप दूसरों की देरी पर मुस्कुरा सकें।

उनकी सक्रियता और सहज व्यवहार ने पूरे समूह को जोड़े रखा। वह हमारी यात्रा की ऐसी कड़ी थीं, जिसके टूटने पर पूरा हार बिखर सकता था।

और फिर हमारे बस चालक रविंदर, लोग प्यार से उन्हें रॉबिन बुलाते हैं। 

उनकी आवाज में ऐसी खरखराहट थी कि लगता था रेडियो पर पुराने जमाने का कोई उद्घोषक बोल रहा हो। ऊपर से उनका देसी हास्य! बस सड़क पर चलती थी, लेकिन माहौल कभी-कभी कॉमेडी शो जैसा हो जाता था। लौटते में हिंदी फिल्मी गानों की धुन के साथ बस को भी ठुमके लगवा दिए। एक घंटे ट्रैफिक जाम में फंसे होने पर भी कतई बोर नहीं हुए। 

लंदन की शानदार सड़कों पर बस दौड़ रही थी और रविंदर की टिप्पणियां भारतीय स्वाद देती थीं। उनकी आवाज सुनकर कई बार लगा कि अगर बस चलाना बंद भी कर दें तो उन्हें मंच पर भेजा जा सकता है।

हमारे लिए वह केवल ड्राइवर नहीं थे। वह यात्रा के उन किरदारों में शामिल हो गए, जिनके बिना बाद में पूरी कहानी अधूरी लगती है।

अंताक्षरी में सुर कम, उत्साह ज्यादा

लंबे सफर में अंताक्षरी शुरू हुई।

बस में अचानक संगीत सम्मेलन जैसा माहौल बन गया। फर्क इतना था कि यहां कलाकारों से ज्यादा श्रोता भी गा रहे थे।

एक टोली गाती, दूसरी जवाब देती। किसी का सुर आसमान छूता और किसी की ताल बीच रास्ते में उतर जाती। लेकिन किसी को इसकी परवाह नहीं थी।

पद्मिनी ने ‘रिमझिम गिरे सावन’ गाया तो माहौल में रोमांस और बारिश दोनों आ गए। खिड़की के बाहर लंदन था और बस के अंदर मुंबई का मानसून!

किसी ने सुर बिगाड़ा तो किसी ने ताल। मगर किसी ने उत्साह नहीं बिगाड़ा। यही ग्लोबल फैमिली की असली खूबी थी।

लंदन की राजनीति से बड़ा सवाल: खाना कहां है? अगला भोजन कहां होगा? क्या मिलेगा? शाकाहारी क्या है? दाल है या नहीं? रोटी मिलेगी या केवल सलाद से काम चलाना पड़ेगा?

इन सवालों ने कई बार लंदन के इतिहास और राजनीति को भी पीछे छोड़ दिया।

आखिर पेट भी लोकतंत्र मांगता है। उसे भी अपनी पसंद की सरकार, यानी दाल, सब्जी और रोटी, चाहिए।

मुमताज और रसोई घर में शुद्ध शाकाहारी भोजन मिला तो कई चेहरों पर ऐसी राहत दिखाई दी जैसे किसी ने विदेश में अचानक घर का दरवाजा खोल दिया हो।

दाल का एक चम्मच हजारों किलोमीटर की दूरी कम कर देता है। सब्जी में मसाले पड़ते ही भारत की यादें भी प्लेट में सज जाती हैं।

लंदन, एक शहर, कई दुनिया; हमने लंदन के कई चेहरे देखे। लंदन आई, बिग बेन, वेस्टमिंस्टर एबे, बकिंघम पैलेस, ट्राफलगर स्क्वायर, ऑक्सफोर्ड स्ट्रीट, मैडम तुसाद, आर्ट गैलरी और हाइड पार्क।

हर जगह कैमरे निकले। फोटो खिंचीं। फिर फोटो देखे गए। फिर वही फोटो किसी और को दिखाए गए।

टेम्स तो जैसे यात्रा की स्थायी साथी बन गई। क्रूज पर नदी को करीब से देखा। पुलों को नीचे से देखा। शहर को पानी की नजर से देखा।

और फिर उसी टेम्स के किनारे गंगा आरती । लगा कि भारत की गंगा और ब्रिटेन की टेम्स हजारों किलोमीटर दूर होते हुए भी एक-दूसरे से परिचित हैं। एक ने सभ्यताओं को जन्म दिया, दूसरी ने साम्राज्य को देखा। दोनों ने इतिहास को बहते हुए देखा है।

कोहिनूर: चमक भी, चुभन भी

इतिहास ने भी हमारा पीछा नहीं छोड़ा।

किला देखा और कोहिनूर की कहानी याद आई। वह हीरा आज भी चमकता है, लेकिन उसके पीछे का इतिहास सवाल भी पूछता है।

हीरे की चमक आंखों को अच्छी लगती है। इतिहास की सच्चाई कभी-कभी आंखों में चुभती है।

शायद इतिहास की यही विडंबना है: विजेता ट्रॉफी संभालता है और पराजित उसकी कहानी।

असली लंदन सड़कों पर था

लेकिन सबसे ज्यादा ध्यान खींचा लंदन के आम लोगों ने।

लोग तेज चलते हैं। बहुत तेज। ऐसा लगता है जैसे हर व्यक्ति की जेब में समय की कमी है।

कोई दौड़ रहा था, कोई साइकिल चला रहा था, कोई पैदल जा रहा था। चौड़े फुटपाथों पर लोगों की अपनी दुनिया थी।

यातायात व्यस्त था, मगर शोर कम था। सड़कें भरी थीं, मगर अफरातफरी कम थी।

हमारे लिए यह अनुभव खास था। हॉर्न की आवाज बहुत कम। सड़क पर अचानक कोई वाहन रोककर लंबी बहस करता दिखाई नहीं दिया। मन में आया, अगर भारतीय सड़कें भी इतनी शांत हो जाएं तो कई लोग अपना हॉर्न बेचकर तीर्थयात्रा पर निकल जाएं!

हर तरफ एशियाई चेहरे भी दिखाई देते रहे। दुकान में, बस में, सड़क पर, काम करते हुए।

लंदन सचमुच एक ऐसा शहर लगा जहां दुनिया के अलग-अलग हिस्से आकर एक ही पते पर रहने लगे हैं।

लॉर्ड्स: जहां क्रिकेट सांस लेता है

और फिर आया हमारी यात्रा का सबसे रोमांचक पड़ाव, लॉर्ड्स ग्राउंड।

क्रिकेट प्रेमियों के लिए लॉर्ड्स केवल मैदान नहीं। यह क्रिकेट की तीर्थभूमि है।

यहां खड़े होकर लगा कि बल्ला और गेंद भी इतिहास लिख सकते हैं। फर्क केवल इतना है कि इतिहास की किताबें शांत रहती हैं और क्रिकेट की यादें हर भारतीय के भीतर शोर करती रहती हैं।

हमारे साथ अलिस्टेयर थे। उन्होंने लॉर्ड्स के कई पहलुओं से परिचित कराया और महान खिलाड़ियों के रोचक प्रसंग सुनाए।

जब उन्होंने गांगुली बालकनी दिखाई तो भारतीय क्रिकेट की अनेक यादें ताजा हो गईं।

किसी को वह ऐतिहासिक क्षण याद आया, किसी को भारतीय टीम की जीतें और किसी को शायद गांगुली की वह प्रसिद्ध शर्ट!

लॉर्ड्स में खड़े होकर लगा कि क्रिकेट केवल खेल नहीं है। यह भारत और इंग्लैंड के बीच ऐसी भाषा है जिसे दोनों देश बिना अनुवाद के समझते हैं।

ग्लोबल फैमिली की असली तस्वीर

बस में, भोजन की मेज पर, स्मारकों के बीच और चलते-चलते हमने खूब बातें कीं।

भारत में रहने वालों और विदेशों में बसे भारतीयों के अनुभव सुने। किसकी संतान कहां पढ़ रही है, कौन किस शहर में रहता है, किसे भारत की कौन-सी चीज याद आती है, बातें चलती रहीं।

अचानक महसूस हुआ कि दुनिया ने हमें अलग-अलग देशों में बांट दिया है, लेकिन भारतीय मन को अभी तक कोई सीमा नहीं बांट पाई।

विदेश में रहने वाले भारतीयों को भारतीय भोजन की याद आती है। भारत में रहने वालों को विदेश में बसे अपनों की। कोई मौसम की शिकायत करता है, कोई महंगाई की, कोई राजनीति की।

यानी देश अलग हो सकते हैं, शिकायतों का सॉफ्टवेयर भारतीय ही रहता है।

लंदन ने कुछ सवाल भी छोड़े

लंदन ने हमें बहुत कुछ दिखाया। लेकिन उससे ज्यादा सोचने का मौका दिया।

एक उदार समाज कैसा होता है? अलग-अलग संस्कृतियां एक शहर में कैसे साथ रहती हैं? साफ सड़कें, चौड़े फुटपाथ और सुचारु यातायात आम आदमी की जिंदगी को कितना आसान बनाते हैं?

और सबसे बड़ा सवाल, क्या विकास का मतलब केवल बड़ी-बड़ी इमारतें हैं, या वह रोजमर्रा की जिंदगी को थोड़ा बेहतर बनाने का नाम भी है?

लंदन की सड़कों ने इन सवालों के कुछ जवाब बिना भाषण दिए दे दिए।

हम लंदन से लौटे तो हमारे पास स्मृतियों का एक छोटा-सा खजाना था, टेम्स की लहरें, बिग बेन की घंटियां, लॉर्ड्स का इतिहास, गंगा आरती की गूंज, मार्था की मुस्कान, रविंदर की खरखराती आवाज और बस में गूंजती अंताक्षरी।

और हां, भोजन की मेज पर हुई वे अंतहीन चर्चाएं भी।

आखिर यात्रा में तस्वीरें मोबाइल में रहती हैं, लेकिन कहानियां पेट और दिल दोनों में रहती हैं।

ग्लोबल फैमिली ने हमें फिर याद दिलाया कि दुनिया कितनी भी बड़ी क्यों न हो जाए, भारतीय दिल के लिए परिवार की दूरी हमेशा छोटी रहती है।

लंदन की यात्रा खत्म हुई, लेकिन बातचीत अभी बाकी है।

अब अगला पड़ाव, पेरिस।

और इस बार सफर भी कम दिलचस्प नहीं होगा।

समुद्र के नीचे ट्रेन। यूरोस्टार।

देखना है, पेरिस में एफिल टावर ज्यादा ऊंचा निकलता है या हमारी उम्मीदें!

 


छोटी-सी गलती: "बस पांच मिनट और" ने फ्रांस को झकझोर दिया ;  और भारत को सोचने पर मजबूर कर दिया

___________

पेरिस, बृज खंडेलवाल द्वारा

16 सितंबर 2026

_________________

“बस पाँच मिनट और!”  ये वही फेमस पाँच मिनट हैं जो घर के टाइमर नहीं मानते। पेरिस के एक घर में 14 साल का बेटा मोबाइल से चिपका बैठा है; माँ चिल्लाती है, “खाना ठंडा हो रहा है,” पिता आधे गुस्से में आधा विनती करते हैं, “मोबाइल नीचे कर दे।” बेटा पलटकर कहता है, “पापा, यह आखिरी वीडियो है।” वीडियो आखिरी नहीं होता। खुद-ब-खुद चलने वाले अगले-नेक्स्ट ने पाँच मिनट को पचास में बदल दिया , और खाना तो ठंडा ही हुआ।

यह सीन फ्रांस का है, पर एंडिंग इंडिया में भी वही दिखेगी। पेरिस में ये सवाल जोर पकड़ रहा है: बच्चों को डिजिटल दुनिया में कितनी आज़ादी दें? फ्रांस ने 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर एक सख्त रोक का कानून बनाया ,  जैसी नीयत सही थी, लेकिन अगस्त 2026 में फ्रांस की संवैधानिक परिषद ने कह दिया कि पूरी तरह का बंद करना अभिव्यक्ति और निजता पर ज़रूरत से ज़्यादा चोट है। यानी कहीं अभिव्यक्ति के नाम पर बच्चों को "डिजिटल परदर्शी" बना दिया जाए, तो भी समस्या है।

मैक्रॉन ने हार नहीं मानी: नया प्रस्ताव आया ,  13-15 साल वालों के लिए माता-पिता की सहमति, रात में नोटिफिकेशन बंद, ऑटो-प्ले पर पाबंदी और अजनबियों से संपर्क पर रोक। सरल भाषा में: दरवाजा बंद नहीं करेंगे, पर खिड़कियों पर जाली लगा देंगे।

भारत को भी यह तमाशा दूर से नहीं दिखना चाहिए। हमारे एक अरब से अधिक इंटरनेट उपयोगकर्ताओं में इंस्टाग्राम और यूट्यूब किशोरों की रोज़मर्रा की दुनिया बन चुके हैं। यूट्यूब पढ़ाई का वरदान है; वही यूट्यूब कभी-कभी मिर्च-मसाले वाला जाल भी बन जाता है , एक क्लिक और आप "अनसक्योर एरिया" में। बच्चा फिर वही कहता है, “बस पाँच मिनट…” और पाँच मिनट पता ही नहीं चलता कब परीक्षा के पेपर जितने लंबा हो गया।

2023 का हमारा डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन कानून अच्छी कोशिश है: अभिभावकों की सत्यापन योग्य सहमति, बच्चों पर लक्षित विज्ञापन पर रोक ,  सही कदम हैं। पर असली परीक्षा मैदान पर है। बच्चे जन्मतिथि बदलकर दर्ज कर दें, और पूरा सिस्टम उसी पल का नो-शो कर देता है। ऑनलाइन उम्र छिपाना उतना आसान है जितना परीक्षा में पीछे की सीट से कॉपी देखना ,  और ज़्यादा स्मार्ट।

तो क्या सीधा बैन कर दें, जैसा फ्रांस ने सोचा? भारत और फ्रांस की दुनिया अलग है: ग्राम और शहर का डिजिटल गैप, माता-पिता की डिजिटल अनभिज्ञता, और वही इंटरनेट जो अवसर देता है, उसे काटना सही नहीं होगा। करोड़ों बच्चे ऑनलाइन पढ़ाई, कौशल और नौकरी की जानकारी पा रहे हैं , इन्हें बंद कर देना समस्या का इलाज नहीं, सर्जरी होगी जिसकी सुई गलत जगह लगेगी।

प्रस्तावित रास्ता: प्रतिबंध नहीं, पर ज़िम्मेदारी। मजबूत अभिभावक-सहमति, बेहतर उम्र-प्रमाणीकरण तकनीक, और स्कूलों में डिजिटल साक्षरता पर जोर। सोशल प्लेटफॉर्म्स को भी जवाबदेह बनाइए: ऑटो-प्ले, लगातार नोटिफिकेशन और नशे जैसा डिजाइन—इन फीचर्स पर कड़ाई। बच्चों के लिए "डिजिटल ब्रेक" मोड, रात में नोटिफिकेशन ब्लॉक और शिक्षकों-माता-पिता के लिए आसान टूल्स , छोटे-छोटे सुधार बड़ा फर्क डाल सकते हैं।

मोबाइल अब सिर्फ फोन नहीं रहा। वह जेब में रखा स्कूल भी है, खेल का मैदान भी और कभी-कभी मुसीबत का दरवाज़ा भी। डिजिटल जिन्न बोतल से बाहर आ चुका है; वापस बंद करना मुश्किल है, पर लगाम किसके हाथ में होगी ,  ये फैसला अभी हमारे हाथ में है। सुरक्षा ज़रूरी है, पर वह स्वतंत्रता और निजता की कीमत पर नहीं होनी चाहिए।

फ्रांस रास्ता तलाश रहा है; हम भी सीखें, पर काट-छाँट करने से पहले समझदारी से चुने। आपका बच्चा "बस पाँच मिनट" कहेगा ,  पर कौन तय करेगा कि पास पाँच मिनट हैं या गिरफ़्तार कर देने वाले पचास?

Sunday, September 13, 2026

 क्या ब्रिटेन टूटने की राह पर है?

__________________________

लंदन से बृज खंडेलवाल

14 सितंबर 2026

________________________

ऐसा लगता तो नहीं है! लेकिन आम जनता व्यवस्था से संतुष्ट नहीं है।  अतीत का ग्रेट ब्रिटेन समस्याओं से जूझ रहा है। कॉफी हाउस में बातचीत के दौरान ये मुद्दा उठा। क्या ब्रिटेन का नक्शा आने वाले वर्षों में बदल सकता है? यह सवाल अब राजनीतिक गलियारों से निकलकर गंभीर राष्ट्रीय बहस बन गया है। स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड के नेता ऐसे समय मिलने जा रहे हैं, जब ब्रिटेन की एकता पर दबाव साफ दिखाई दे रहा है।

स्कॉटलैंड में आजादी की मांग कोई नई बात नहीं है। 2014 के जनमत संग्रह में जनता ने ब्रिटेन के साथ रहने का फैसला किया था। लेकिन सवाल पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। कभी अर्थव्यवस्था, कभी लंदन की नीतियां और कभी राजनीतिक असंतोष इस मांग को फिर हवा दे देते हैं।

पत्रकार जेम्स ने बताया , "ब्रिटेन में नई लेबर सरकार के सामने यह बड़ी परीक्षा है। प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम को तय करना होगा कि स्कॉटलैंड की मांगों को कितनी छूट दी जाए। एक कदम इधर बढ़ा तो अलगाववादियों को उम्मीद मिलेगी, और ज्यादा सख्ती हुई तो असंतोष और बढ़ सकता है। यानी आगे कुआं, पीछे खाई।"

ब्रेक्जिट ने भी इस बहस को आसान नहीं छोड़ा है। व्यापार, मुद्रा, सरकारी खर्च और यूरोप से संबंध जैसे सवाल पहले से ज्यादा पेचीदा हो गए हैं। अगर स्कॉटलैंड कभी फिर जनमत संग्रह की ओर बढ़ता है, तो 2014 के मुकाबले इस बार बहस कहीं ज्यादा कठिन होगी।

वेल्स की स्थिति अलग है। वहां स्कॉटलैंड जैसी तेज आजादी की लहर नहीं है। फिर भी राष्ट्रीय पहचान और ज्यादा स्वायत्तता की मांग मौजूद है। अगर स्कॉटलैंड ब्रिटेन से अलग होने की दिशा में बढ़ता है, तो वेल्स में भी नई आवाजें उठ सकती हैं।

सबसे संवेदनशील मामला उत्तरी आयरलैंड का है। गुड फ्राइडे समझौते के तहत, परिस्थितियां अनुकूल होने पर आयरलैंड के एकीकरण के लिए जनमत संग्रह कराया जा सकता है। बदलती जनसंख्या, पहचान की राजनीति और आयरिश सागर में व्यापार की व्यवस्था ने इस मुद्दे को लगातार जिंदा रखा हुआ है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का संयुक्त आयरलैंड के समर्थन में बयान इस बहस को अंतरराष्ट्रीय रंग दे दिया है। हालांकि ब्रिटेन और आयरलैंड की सरकारें इसे मुख्य रूप से वहां के लोगों का फैसला मानती हैं। बाहर से आने वाली राजनीतिक टिप्पणियां आग में घी का काम भी कर सकती हैं।

तीनों देशों के नेताओं की बैठक इसलिए महत्वपूर्ण है। यह केवल बातचीत नहीं, बल्कि बदलते ब्रिटेन की तस्वीर है। लंदन के सामने दो रास्ते हैं, और ज्यादा अधिकार देकर संघ को मजबूत करना या अलगाववादी मांगों का कड़ा मुकाबला करना।

ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था, रक्षा व्यवस्था और साझा संस्थाएं आज भी इन हिस्सों को मजबूती से जोड़ती हैं। लेकिन कोई भी संघ केवल कानून और संस्थाओं से नहीं चलता। आखिरकार जनता का भरोसा और साथ रहने की इच्छा ही उसकी असली नींव होती है।

इतिहास का सबक साफ है। बहुराष्ट्रीय देश समय के साथ बदलते हैं, लेकिन सहमति टूट जाए तो मजबूत दीवारें भी दरकने लगती हैं। लंदन की मौजूदा बहस इसलिए केवल राजनीति की कहानी नहीं, बल्कि ब्रिटेन के भविष्य की घंटी है।

Thursday, September 10, 2026

 कृष्ण के संग कुछ कदम… और जिंदगी का सफर हो जाए आसान!

______________________

बृज खंडेलवाल द्वारा

12 सितंबर 2026

____________________________

क्या जिंदगी के हर सवाल का जवाब किसी मोटे-मोटे ज्ञान की किताब में ही छिपा है? या फिर कभी-कभी जवाब वहीं मिल जाता है, जहां हम देखना भूल जाते हैं; श्रीकृष्ण की सीख में?

आज का कुरुक्षेत्र भी कम दिलचस्प नहीं है। कहीं दफ्तर में तनाव है, कहीं कारोबार में चिंता। कहीं रिश्तों की उलझन है तो कहीं भविष्य का डर। अर्जुन तब रथ पर परेशान था, आज का आदमी मोबाइल हाथ में लेकर परेशान है।

तरुण गर्ग की छोटी-सी किताब ‘कुछ कदम कृष्ण के साथ’ इसी बेचैनी को समझने की कोशिश करती है। किताब श्रीमद्भगवद्गीता के 18 अध्यायों की सीख को आज की जिंदगी से जोड़ती है। भाषा सरल है और अंदाज बातचीत जैसा है।

_________________________

पुस्तक: कुछ कदम कृष्ण के साथ

लेखक: तरुण गर्ग

प्रकाशक: निखिल पब्लिशर्स, आगरा

पृष्ठ: 90

मूल्य: ₹299

___________________________

किताब का कवर ही इसकी कहानी का संकेत दे देता है। एक आधुनिक युवक कृष्ण के साथ चल रहा है। दोनों के बीच बातचीत हो रही है। लगता है जैसे आज का अर्जुन अपनी परेशानियां लेकर कृष्ण के पास पहुंच गया हो।

समय बदल गया है, लेकिन इंसान के सवाल शायद ज्यादा नहीं बदले। नौकरी का दबाव हो या कारोबार की चिंता, परिवार की परेशानी हो या भविष्य का डर;  सवाल आज भी वही हैं।

मैं क्या करूं? सही रास्ता कौन-सा है? मुश्किल समय में खुद को कैसे संभालूं?

यहीं तरुण गर्ग की किताब पाठक का हाथ पकड़ लेती है।

वे गीता को कठिन दार्शनिक भाषा में समझाने नहीं बैठते। न संस्कृत के भारी शब्दों का बोझ डालते हैं, न पाठक को विद्वान बनने की परीक्षा देते हैं। वे सरल सवाल-जवाब और रवि नाम के एक आधुनिक किरदार के जरिए कृष्ण की सीख सामने रखते हैं।

रवि कोई पौराणिक पात्र नहीं है। वह हमारे आसपास का आदमी है। उसके सवाल भी हमारे जैसे हैं। इसलिए पाठक को उससे जुड़ने में ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती।

किताब का मकसद गीता की कोई अंतिम या विद्वत्तापूर्ण व्याख्या करना नहीं है। मकसद सीधा है, गीता को जिंदगी के करीब लाना।

बहुत से लोग गीता का नाम सुनकर ही थोड़ा घबरा जाते हैं। लगता है कि इसे समझने के लिए संस्कृत, दर्शन और धर्मशास्त्र पढ़ना पड़ेगा। गर्ग इस डर की गांठ खोलने की कोशिश करते हैं।

उनका संदेश है कि कृष्ण की बातें केवल मंदिर या पूजा तक सीमित नहीं हैं। उनका संबंध हमारे रोज के फैसलों, व्यवहार और सोच से भी है।

किताब का सबसे महत्वपूर्ण संदेश भी सीधा है, कर्म करते रहिए और परिणाम की चिंता में अपना कर्म मत बिगाड़िए।

आज हर कोई नतीजे के पीछे भाग रहा है। विद्यार्थी अच्छे अंक चाहते हैं। युवा अच्छी नौकरी चाहते हैं। कर्मचारी पदोन्नति चाहते हैं। कारोबारी ज्यादा मुनाफा चाहते हैं।

और सोशल मीडिया ने तो इस दौड़ में पेट्रोल डाल दिया है।

दूसरे की चमकती जिंदगी देखकर हमें अपनी जिंदगी फीकी लगने लगती है। हर किसी को लगता है कि बाकी सब आगे निकल गए और हम पीछे रह गए।

ऐसे समय में गीता का कर्मयोग बहुत काम की बात करता है। अपना काम ईमानदारी से करो। अपनी जिम्मेदारी निभाओ। परिणाम की चिंता में आज का काम मत खराब करो।

तरुण गर्ग खुद कई क्षेत्रों से जुड़े रहे हैं। आगरा के सफल व्यवसायी होने के साथ वे एंकर, अभिनेता, गायक, कवि और पॉडकास्टर भी हैं। शायद इसी वजह से उनकी लेखन शैली में संवाद और मंचीय सहजता दिखाई देती है।

वे पाठक को भाषण नहीं देते। उससे बातचीत करते हैं।

किताब की एक और खूबी इसकी संक्षिप्तता है। केवल 90 पन्नों में गीता के 18 अध्यायों की मूल भावना तक पहुंचाना आसान काम नहीं। लेकिन इसी वजह से यह किताब उन लोगों के लिए उपयोगी हो सकती है, जो गीता पढ़ना चाहते हैं लेकिन उसकी विशालता देखकर शुरुआत ही नहीं कर पाते।

बेशक, इसे गीता पर कोई गहरी दार्शनिक टीका समझना उचित नहीं होगा। गंभीर अध्ययन के लिए इससे कहीं बड़े और विस्तृत ग्रंथ उपलब्ध हैं।

लेकिन यह किताब ऐसा दावा भी नहीं करती।

इसकी ताकत कुछ और है। यह कठिन बात को आसान भाषा में कहती है। और कई बार आसान भाषा ही सीधे दिल तक पहुंचती है।

किताब पढ़ते हुए महसूस होता है कि लेखक कृष्ण को केवल पूजनीय देवता के रूप में नहीं, बल्कि जिंदगी के मार्गदर्शक के रूप में सामने लाना चाहते हैं।

मन भ्रमित हो तो कृष्ण की सीख याद करो।

संकट सामने हो तो कर्म मत छोड़ो।

नतीजा मनमाफिक न मिले तो धैर्य रखो।

सफलता मिले तो अहंकार से बचो।

और जब रास्ता समझ न आए तो थोड़ा अपने भीतर झांको।

आखिर ज्ञान की असली परीक्षा किताब के पन्नों में नहीं होती। वह हमारे व्यवहार में दिखाई देता है।

गुस्से के समय संयम रहे। असफलता के समय हिम्मत रहे। सफलता के समय विनम्रता रहे। मुश्किल समय में कर्तव्य याद रहे।

तभी गीता की सीख जिंदगी में उतरती है।

इस नजर से देखें तो ‘कुछ कदम कृष्ण के साथ’ केवल पढ़ने की किताब नहीं है। यह रुककर सोचने की किताब भी है।

कभी-कभी जिंदगी में लंबे भाषण की जरूरत नहीं होती। कोई बस इतना कह दे; “घबराओ मत, अपना कर्म करते रहो।”

कृष्ण ने अर्जुन से संवाद किया था। तरुण गर्ग ने उसी संवाद को आज के पाठक तक पहुंचाने की कोशिश की है।

इस किताब की सबसे बड़ी खूबी शायद यही है कि इसमें हमें अपने सवाल दिखाई देते हैं। और उन्हीं सवालों के बीच कृष्ण की सीख एक शांत आवाज की तरह सुनाई देती है।

कृष्ण के साथ चलने के लिए शायद हमेशा लंबी यात्रा जरूरी नहीं होती। कभी-कभी कुछ कदम ही काफी होते हैं।

तरुण गर्ग की यह किताब उन्हीं कुछ कदमों का निमंत्रण है।

Wednesday, September 9, 2026

 न भूकंप आया, न सुनामी, फिर दिल्ली में हॉस्टल भरभरा के कैसे गिरा?

__________________

जब इमारतें मौत का जाल बनने लगें, तो शायद अतीत हमें कुछ सिखाना चाहता है

_____________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा

11 सितंबर 2026

_____________________________

आखिर एक इमारत सदियों तक कैसे टिकती है?

अच्छी सामग्री? समझदार इंजीनियरिंग? नियमित रखरखाव? या प्रकृति का सम्मान?

लगता है, इन सबकी जरूरत होती है। बस शायद नगर निगम के प्रमाणपत्र की नहीं।

6 सितंबर को दिल्ली ने फिर याद दिलाया कि शहर जितनी तेजी से बढ़ रहे हैं, नागरिक व्यवस्था उतनी तेजी से मजबूत नहीं हो रही।

दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के पास सत्या निकेतन में पांच मंजिला इमारत ‘होस्टल डेज’ भरभराकर गिर गई। कम से कम सात लोगों की मौत हुई। 

कोई इमारत अचानक एक सुबह उठकर गिरने का फैसला नहीं करती।

पहले दरारें आती हैं। नींव कमजोर होती है। अतिरिक्त मंजिलें जुड़ती हैं। बेसमेंट और गहरा होता है। नालियां बंद होती हैं।

फिर एक दिन गुरुत्वाकर्षण अपना अंतिम नोटिस भेज देता है।


लेकिन सवाल वही है:

सरकार की नींद हादसे के बाद ही क्यों खुलती है?

सत्या निकेतन की घटना कोई अकेली त्रासदी नहीं है। यह देश के बड़े शहरी संकट का हिस्सा है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, 2020 से 2024 के बीच भारत में इमारत गिरने, आग लगने, गड्ढों और मैनहोल में गिरने जैसी घटनाओं में करीब 33,000 लोगों की मौत हुई।

आग से 22,000 से अधिक मौतें हुईं। इमारतों के गिरने से भी हजारों लोग मारे गए। केवल 2024 में ढांचागत गिरावट से करीब 1,525 मौतें हुईं। दिल्ली में पांच वर्षों में इमारत गिरने से 169 मौतें दर्ज हुईं।

ये महज आंकड़े नहीं हैं।

हर संख्या के पीछे एक परिवार था। कोई मां इंतजार कर रही थी। कोई पिता फोन कर रहा था। कोई घर लौटने की राह देख रहा था।


पुरानी इमारतों का रखरखाव नहीं होता। अवैध मंजिलें जुड़ती जाती हैं। बिना पर्याप्त इंजीनियरिंग के बेसमेंट खोदे जाते हैं। नालियां जवाब दे देती हैं। जलभराव नींव पर हमला करता है।

और फिर निर्माण स्थल का सबसे बड़ा हाथी सामने आता है: भ्रष्टाचार।

सरकारी इमारतें जनता के पैसे से बनती हैं। मगर हर रुपया ईंट, सीमेंट, स्टील और सुरक्षा में नहीं बदलता।

कहीं घटिया सामग्री, कहीं फर्जी माप, कहीं बढ़े हुए बिल और कहीं कमजोर निगरानी। नतीजा यह कि इमारत की उम्र उद्घाटन से पहले ही घटने लगती है।

निर्माण में भ्रष्टाचार केवल सरकारी खजाने को नुकसान नहीं पहुंचाता।

वह खतरे भी पैदा करता है।

कमजोर सड़क जल्दी टूटती है। घटिया पुल जोखिम बन जाता है। खराब नाला बस्ती को डुबो देता है। घटिया निर्माण सामान्य इमारत को मौत का जाल बना सकता है।

बाहर कोई बोर्ड नहीं लगा होता—

“कमीशन बचाने के लिए मानक से नीचे बनाया गया है।”

नतीजे वर्षों बाद सामने आते हैं। तब तक फाइलें धूल खा चुकी होती हैं और ठेकेदार अगली परियोजना पकड़ चुका होता है।

इसलिए स्वतंत्र गुणवत्ता जांच, पारदर्शी डिजिटल रिकॉर्ड, तीसरे पक्ष का निरीक्षण और गंभीर लापरवाही पर व्यक्तिगत जवाबदेही जरूरी है।

यह प्रशासनिक सुधार भर नहीं है।

यह जनसुरक्षा का सवाल है।

नतीजा सामने है: 

ऊपर कंक्रीट। नीचे पानी। बीच में भ्रष्टाचार। और पीछे भागता प्रशासन।

लेकिन भारत की पुरानी वास्तुकला हमें एक अलग कहानी सुनाती है।

वह कहानी है; दीर्घायु, जलवायु की समझ और मजबूती की।

आगरा को ही देखिए।

ताजमहल, आगरा किला और फतेहपुर सीकरी ने तपती गर्मी, बारिश, प्रदूषण और सदियों की मार झेली है। उन्होंने बादशाह देखे। आक्रमण देखे। उपेक्षा देखी।

फिर भी खड़े हैं।

उधर कुछ आधुनिक इमारतें कुछ ही वर्षों में टपकने लगती हैं।

और कुछ तो इतना इंतजार भी नहीं करतीं।

सवाल सीधा है:

पुराने कारीगर क्या जानते थे, जिसे आधुनिक निर्माण भूल गया?

बहुत कुछ।

पारंपरिक वास्तुकला केवल दिखावे के लिए नहीं बनाई जाती थी। वह काम करने के लिए बनाई जाती थी।

मोटी दीवारें गर्मी रोकती थीं। आंगन हवा का रास्ता बनाते थे। जालियां धूप को नियंत्रित करती थीं। छज्जे छाया देते थे।

स्थानीय जलवायु के हिसाब से पत्थर, लकड़ी, मिट्टी, चूना और अन्य सामग्री चुनी जाती थी।

चूना-सुरखी जैसे मिश्रण कई परिस्थितियों में नमी और हलचल को कठोर आधुनिक सामग्री से बेहतर ढंग से सहन कर सकते थे। मजबूत चबूतरे और भार वहन करने वाली दीवारें वजन को स्वाभाविक रूप से बांटती थीं।

हिमालय में काठ-कुनी जैसी तकनीक लकड़ी और पत्थर को जोड़कर लचीलापन पैदा करती थी।

आज कंक्रीट, शीशा और एयर-कंडीशनिंग आधुनिकता के प्रतीक बन गए हैं।

तकनीक समस्या नहीं है।

लापरवाही से इस्तेमाल की गई तकनीक समस्या है।

आरसीसी की इमारत बेहद सुरक्षित हो सकती है। लेकिन मिट्टी की जांच, सही नींव, बेहतर जल निकासी, गुणवत्तापूर्ण सामग्री और कठोर निगरानी जरूरी है।

बिना नींव मजबूत किए एक और मंजिल जोड़िए। पुरानी इमारत के नीचे बेसमेंट खोदिए। पानी रिसने दीजिए।

फिर एक दिन भौतिक विज्ञान अपना हिसाब मांग लेगा।

इसीलिए आगरा में हुआ 23वां एआरकेएएसआईए फोरम महत्वपूर्ण था। 24 एशियाई देशों के 600 से अधिक वास्तुकार, शिक्षक, विद्यार्थी और विशेषज्ञ वहां जुटे। विषय था—“Bringing Back Vernacular Wisdom”, यानी स्थानीय वास्तु-बुद्धि की वापसी।

यह केवल सम्मेलन का आकर्षक शीर्षक नहीं होना चाहिए।

पारंपरिक वास्तुकला में गर्मी, पानी, हवा, सामग्री और संरचनात्मक मजबूती की व्यावहारिक समझ छिपी है।

ताजमहल इसलिए केवल पर्यटकों के लिए स्मारक नहीं है।

वह अनुपात, कारीगरी, सामग्री और टिकाऊपन का पाठ है।

देश की अनगिनत हवेलियां, मंदिर, किले और पारंपरिक मकान भी यही कहानी कहते हैं।

वे सदियों से खड़े हैं।

हमारी कई नई इमारतें दशकों का इंतजार भी नहीं कर पातीं।

समाधान अतीत में लौट जाना नहीं है।

समाधान है—पुरानी बुद्धिमत्ता और आधुनिक विज्ञान का मेल।

आंगन आधुनिक कूलिंग का विकल्प बन सकते हैं। स्थानीय सामग्री पर्यावरणीय बोझ घटा सकती है। पारंपरिक छाया व्यवस्था बिजली की खपत कम कर सकती है। आधुनिक इंजीनियरिंग पुराने सिद्धांतों को और मजबूत कर सकती है।

लेकिन तकनीक अकेले खराब शासन को नहीं बचा सकती।

सख्त बिल्डिंग कोड, पुराने भवनों और पीजी हॉस्टलों का अनिवार्य स्ट्रक्चरल ऑडिट, बेहतर अग्नि सुरक्षा, प्रभावी जल निकासी और जवाबदेह नगर निकाय जरूरी हैं।

सबसे जरूरी है सुरक्षित छात्र आवास।

छात्रों को केवल इसलिए अपनी जान जोखिम में नहीं डालनी चाहिए कि शहर में पर्याप्त सरकारी हॉस्टल नहीं हैं।

शहर की सफलता शीशे की इमारतों से नहीं मापी जानी चाहिए।

न फ्लाईओवर से। न स्मार्टफोन ऐप से।

शहर तब सफल है जब उसके नागरिक सुरक्षित चल सकें, सुरक्षित रह सकें और सुरक्षित सो सकें।

विडंबना देखिए।

भारत को हर चीज नए सिरे से आविष्कार करने की जरूरत नहीं है।

कुछ जवाब हमारे आसपास पहले से खड़े हैं।

चुपचाप।

सदियों से।

शायद ताजमहल, आगरा किला और पुरानी हवेलियां हमसे कह रही हैं: 

प्रकृति के साथ बनाइए। लोगों के लिए बनाइए। टिकाऊ बनाइए।

भविष्य शायद अतीत में ही कहीं छिपा बैठा है।

सवाल सिर्फ इतना है: क्या हमारी आधुनिक नगर व्यवस्था अगली इमारत गिरने से पहले उसकी आवाज सुन पाएगी?


 नेता फेल हुए, अब न्यायपालिका का ही सहारा

समाज को आईना दिखाने लगे जज

________________________

राजनीति की जड़ता ने न्यायपालिका को सामाजिक और पर्यावरणीय चौकीदार बना दिया है

____________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा

10 सितंबर 2026

___________________________

अदालतों में आजकल सिर्फ कानून की बातें नहीं होतीं। वहां समाज भी आये दिन कटघरे में खड़ा होता है।

शादी, परिवार, पितृसत्ता, युवा, लिव-इन रिश्ते और महिलाओं की गरिमा पर टिप्पणियां हो रही हैं।

और अब नदियां भी अदालत पहुंच गई हैं।

यमुना से लेकर चंबल और अरावली तक, न्यायपालिका पर्यावरण की प्रहरी बनती दिखाई दे रही है।

ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि सरकारी तंत्र और उसकी इकाइयां सो रही हैं।राजनीति को इन दिनों एक अजीब बीमारी लग गई है: अनुकूलन पक्षाघात।

समाज बदल रहा है। तकनीक बदल रही है। रिश्ते बदल रहे हैं। पर कानून और राजनीति अक्सर वहीं टिके  हैं।


युवा अलग ढंग से सोच रहे हैं। महिलाएं अपने अधिकार मांग रही हैं। लिव-इन रिश्ते अब असामान्य नहीं रहे। डिजिटल दुनिया ने निजता की परिभाषा बदल दी है।


हाल के मामलों में सुप्रीम कोर्ट के जजों ने घरेलू हिंसा, दहेज, वैवाहिक अत्याचार और सामाजिक दबाव पर कड़ी टिप्पणियां की हैं।

एक मामले में सवाल उठा कि पढ़े-लिखे लोग बहू और उसके परिवार को क्यों अपमानित करते हैं।

दूसरे मामले में यह चिंता सामने आई कि सामाजिक बदनामी के डर से माता-पिता अपनी बेटियों को बार-बार हिंसक वैवाहिक घरों में वापस भेज देते हैं।

एक अन्य फैसले में पितृसत्ता को समाज की गहरी बीमारी के रूप में देखा गया।

लिव-इन संबंधों पर भी अदालत ने बदलते सामाजिक यथार्थ को स्वीकार किया।

यह सब स्वागत योग्य है। आखिर जज भी इसी समाज का हिस्सा हैं।

वे रोज उन परिवारों को देखते हैं, जिनकी पीड़ा अखबारों की सुर्खियां नहीं बनती।

वे देखते हैं कि कानून की किताब के बाहर जिंदगी कितनी बेरहम हो सकती है।

लेकिन यहीं से असली सवाल शुरू होता है। जज फैसला सुनाएं या समाज को प्रवचन दें? 'कॉकरोच' विवाद ने खतरे की घंटी बजाई थी। युवा कार्यकर्ताओं को लेकर 'कॉकरोच' और 'पैरासाइट' जैसे शब्दों पर विवाद हुआ।

बाद में संदर्भ और स्पष्टीकरण सामने आए। लेकिन सवाल फिर भी खड़ा है।

न्यायाधीश की एक टिप्पणी आम नागरिक की टिप्पणी नहीं होती। उसके पीछे संस्था की पूरी ताकत खड़ी होती है। जज के मुंह से निकला एक वाक्य अगले दिन राष्ट्रीय बहस बन सकता है। इसलिए न्यायिक भाषा में भी संयम जरूरी है। कानून की ताकत को शब्दों की तल्खी की जरूरत नहीं होती।

न्यायपालिका का पर्यावरण को लेकर बढ़ता हस्तक्षेप इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। नदियां गंदी हैं। जंगल कट रहे हैं। झीलें गायब हो रही हैं। भूजल नीचे जा रहा है।शहर दम घोंट रहे हैं। सरकारी विभाग फाइलें चला रहे हैं। और अदालतें सवाल पूछ रही हैं।

यमुना प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट की सुओ मोटू पहल इसका बड़ा उदाहरण है। मामला केवल एक नदी का नहीं रहा।सवाल साफ पानी और स्वस्थ जीवन के संवैधानिक अधिकार तक पहुंच गया।

चंबल अभयारण्य में अवैध रेत खनन हो या राजस्थान की जोजरी-बांडी-लूणी नदी प्रणाली की दुर्दशा, अदालत ने प्रशासन से जवाब मांगा।

अरावली की पहाड़ियों का सवाल भी केवल पहाड़ों की ऊंचाई का मामला नहीं है। वह भूजल, जंगल, जैव-विविधता और भविष्य की पीढ़ियों का सवाल है।

यानी अदालत अब पूछ रही है:

“सरकार जी, आप कर क्या रहे हैं?”

और शायद यही सवाल जनता वर्षों से पूछ रही है।

न्यायपालिका का हस्तक्षेप जरूरी हो सकता है। कभी-कभी वह जीवनदायी भी होता है। लेकिन क्या अदालतें हमेशा के लिए प्रशासन चलाएंगी? क्या जज प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का काम करेंगे? क्या अदालतें तय करेंगी कि कौन-सी नदी कैसे साफ होगी? क्या हर सरकारी नाकामी का इलाज सुओ मोटू ही होगा?

अदालत सरकार नहीं है। उसे सरकार का काम करने की जरूरत भी नहीं होनी चाहिए।

असली बीमारी कहीं और है । समस्या उस राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था में ज्यादा है, जो समय के साथ बदलने को तैयार नहीं। संसद समय पर कानून नहीं बदलेगी तो अदालत को बोलना पड़ेगा। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड काम नहीं करेगा तो अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ेगा।

नगर निगम नालियां और नदियां बचाने में नाकाम रहेगा तो अदालत का दरवाजा खटखटाया जाएगा।

सरकार महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं करेगी तो न्यायपालिका से उम्मीद की जाएगी।

जब व्यवस्था खाली जगह छोड़ती है, कोई न कोई उसे भरता है।

आज वह जगह न्यायपालिका भर रही है।

लेकिन यह स्थायी व्यवस्था नहीं बन सकती।

लोकतंत्र में सबका अपना काम है

संसद का काम है कानून बनाना।

सरकार का काम है उन्हें लागू करना।

प्रशासन का काम है व्यवस्था चलाना।

नियामक संस्थाओं का काम है नियम लागू करवाना।

नगर निकायों का काम है शहर और जलस्रोत बचाना।

और अदालत का काम है संविधान और नागरिक अधिकारों की रक्षा करना।

अगर हर संस्था दूसरे का काम करने लगे तो लोकतंत्र का संतुलन बिगड़ेगा।

जज समाज का विवेक जरूर बन सकते हैं। लेकिन उन्हें समाज का प्रबंधक बनने की जरूरत नहीं। वे आईना दिखा सकते हैं। आईने को खुद चेहरा बनने की जरूरत नहीं।

न्यायपालिका को चुप कराने की जरूरत नहीं है। हाल के न्यायिक हस्तक्षेपों से घबराने की जरूरत नहीं है। बल्कि उन्हें गंभीरता से समझने की जरूरत है।

अदालतें हमें हमारी कमियां दिखा रही हैं।

सवाल यह नहीं कि जज बोल क्यों रहे हैं।

सवाल यह है कि बाकी लोग चुप क्यों हैं?

न्यायपालिका को चुप कराना समाधान नहीं है।

राजनीति को जगाना समाधान है।

संसद को समाज की बदलती जरूरतों को समझना होगा।

सरकारों को अदालत के आदेश का इंतजार करना बंद करना होगा।

प्रशासन को हर संकट में न्यायिक डंडे की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए।

और राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि चुनाव केवल सत्ता पाने का रास्ता नहीं है।

वह समाज के बदलते सवालों का जवाब देने की जिम्मेदारी भी है।

भारत को कानूनों की कमी नहीं है।

कमी है संस्थागत कल्पनाशीलता की।

कमी है समय पर निर्णय लेने की।

कमी है जवाबदेही की।

कमी है बदलती दुनिया को स्वीकार करने की।

इसलिए आज की अदालतें एक बड़ा संदेश दे रही हैं। जब समाज बदलता है और राजनीति नहीं बदलती, न्यायपालिका आगे आती है।


जब संस्थाएं अपना काम नहीं करतीं, न्यायपालिका दरवाजा खटखटाती है।

यह उसकी ताकत भी है। और हमारे लोकतंत्र की कमजोरी का प्रमाण भी।

अच्छा लोकतंत्र वह नहीं है जिसमें जज बार-बार समाज को बचाने निकलें।

अच्छा लोकतंत्र वह है जिसमें चुनी हुई संस्थाएं अपना काम समय पर करें।

ताकि अदालत को हर बार कहना न पड़े:

“सरकार जी, अब तो जागिए!”


Monday, September 7, 2026

 यूपी 2027: जल्द शुरू होगा सियासी पलायन

टिकट, जातीय समीकरण और राजनीतिक वफादारी का मौसम बदलने लगा है

______________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा

9 सितंबर 2026

____________________________

समय आ गया है।

लखनऊ में एक नया बोर्ड लग जाना चाहिए:

“राजनीतिक मौसम बदल रहा है। पार्टी का झंडा संभालकर रखें।”

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव अभी कई महीने दूर हैं। मगर सियासी पारा तेजी से चढ़ रहा है। नेता हवा का रुख भांप रहे हैं। पार्टियां वोट गिन रही हैं। टिकट के दावेदार दरवाजे खटखटा रहे हैं। और राजनीतिक रणनीतिकार जातीय समीकरणों की नई कुंडली बना रहे हैं।

चुनाव सिर्फ लड़े नहीं जाते; वे बाकायदा इंजीनियर किए जाते हैं।

403 विधानसभा सीटों वाले  प्रदेश में बहुमत का आंकड़ा 202 है। बीजेपी के पास फिलहाल करीब 258 विधायक हैं, जबकि समाजवादी पार्टी के पास लगभग 101 सीटें हैं।

लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव ने तस्वीर में दरार डाल दी थी। बीजेपी 33 सीटों पर सिमट गई, जबकि समाजवादी पार्टी ने 37 और कांग्रेस ने छह सीटें जीतकर विपक्षी गठबंधन को 43 सीटों तक पहुंचा दिया।

अचानक अजेय दिखने वाली सत्ता को चुनौती दिखाई देने लगी।

और जब सत्ता की दीवार में दरार नजर आए, तो दल-बदल उद्योग सबसे पहले सक्रिय होता है।


उत्तर प्रदेश ने दल-बदल की कला में महारत हासिल कर ली है। विचारधारा अक्सर नेता के साथ पार्टी बदल लेती है। खासकर जब टिकट का सवाल हो।

हाल में AIMIM के प्रवक्ता सैयद आसिम वकार कांग्रेस में शामिल हो गए। उन्होंने अपनी पुरानी पार्टी पर बीजेपी की “बी-टीम” की तरह काम करने का आरोप लगाया।

AIMIM यूपी में कोई बड़ी चुनावी ताकत नहीं है। फिर भी यह घटना संकेत देती है कि विपक्ष वोट कटने के खतरे को लेकर सतर्क है।

बिहार का अनुभव अभी ताजा है।

जब मुकाबला कांटे का हो, तब कुछ हजार वोट भी सरकार बना सकते हैं और सरकार गिरा सकते हैं।

यूपी में पार्टी बदलना अब कोई राजनीतिक अपराध नहीं माना जाता। नेता बीजेपी से सपा में जाते हैं। सपा से बसपा में जाते हैं। बसपा से बीजेपी में आते हैं। फिर मौका मिले तो वापस भी लौट आते हैं।

झंडा बदलता है, भाषण वही रहता है।


अयोध्या इस चुनाव का सबसे दिलचस्प राजनीतिक प्रयोगशाला बन सकती है।

राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के कुछ ही महीनों बाद फैजाबाद लोकसभा सीट पर बीजेपी की हार ने पार्टी को चौंका दिया। समाजवादी पार्टी के अवधेश प्रसाद ने बीजेपी के मौजूदा सांसद लल्लू सिंह को 54 हजार से अधिक मतों से हराया।

अब विधानसभा चुनाव में अयोध्या सीट पर सबकी नजर होगी।

मौजूदा विधायक वेद प्रकाश गुप्ता को लेकर पार्टी में मंथन चल रहा है। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी के पवन पांडेय मजबूत चुनौती पेश कर सकते हैं।

बीजेपी के सामने सवाल सीधा है।

क्या राम मंदिर का मुद्दा अकेले चुनाव जिता देगा, या उसके साथ जातीय समीकरण भी जोड़ना पड़ेगा?

यूपी की राजनीति इस सवाल का जवाब हमेशा एक ही देती है:

“दोनों चाहिए।”

बीजेपी: बूथ बचाओ, वोट बढ़ाओ

बीजेपी चुनाव में मजबूत संगठन, सत्ता की मशीनरी, कल्याणकारी योजनाओं और योगी आदित्यनाथ सरकार के कामकाज के सहारे उतरेगी।

उसकी रणनीति भी साफ है: बूथ मजबूत करो, लाभार्थियों तक पहुंचो, गैर-यादव पिछड़ों और गैर-जाटव दलितों को साथ रखो, सवर्ण समर्थन बनाए रखो और सपा के PDA समीकरण को फैलने से रोक दो।

NDA के सहयोगी भी अपनी-अपनी हिस्सेदारी मांगेंगे। अपना दल, निषाद पार्टी, आरएलडी और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी सीटों पर दावा ठोकेंगे।

गठबंधन राजनीति में पुरानी कहावत याद आती है: 

“बहुत ज्यादा रसोइये हों तो खिचड़ी बिगड़ सकती है।”

लेकिन चुनाव में कभी-कभी कम रसोइयों से भी खाना जल जाता है।


अखिलेश यादव के पास इस बार एक महत्वपूर्ण हथियार है; 2024 का प्रदर्शन।

PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण ने लोकसभा चुनाव में सपा को मजबूत किया। अब चुनौती इस सामाजिक गठजोड़ को विधानसभा की 403 सीटों तक पहुंचाने की है।

यह आसान काम नहीं है।

लोकसभा चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों और बड़े नेताओं के नाम पर लड़ा जाता है। विधानसभा चुनाव में बूथ, बिरादरी, उम्मीदवार और स्थानीय समीकरण ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

इसलिए सपा को जमीन पर संगठन मजबूत करना होगा।

सिर्फ सोशल मीडिया से सरकार नहीं बनती।

कांग्रेस को चाहिए सम्मान और सीटें, कांग्रेस ने लोकसभा में छह सीटें जीतकर अपनी सौदेबाजी की ताकत बढ़ा ली है।

अब वह विधानसभा में सम्मानजनक हिस्सेदारी चाहती है। पार्टी के नेताओं ने “बराबरी और सम्मान” के साथ गठबंधन की बात कही है।

लेकिन यहां पेच है।

सपा खुद को यूपी में वरिष्ठ सहयोगी मानती है। कांग्रेस ज्यादा सीटों की मांग कर रही है।

यानी INDIA गठबंधन का सबसे बड़ा दुश्मन शायद बीजेपी नहीं होगा।

सीटों का गणित हो सकता है।

राजनीति में विचारधारा पर भाषण दिए जा सकते हैं। लेकिन टिकट बांटते समय कैलकुलेटर निकल आता है।


बहुजन समाज पार्टी ने गठबंधन की गाड़ी में बैठने से इनकार कर दिया है।

मायावती ने साफ संकेत दिया है कि BSP 2027 का विधानसभा चुनाव अपने दम पर लड़ेगी। उनका तर्क है कि पिछले गठबंधनों में बसपा के वोट तो दूसरे दलों को मिले, लेकिन बदले में पर्याप्त समर्थन नहीं मिला।

बसपा के सामने लक्ष्य बड़ा है: पूर्ण बहुमत।

यह सुनने में महत्वाकांक्षी लगता है। लेकिन बसपा को कम आंकना भी राजनीतिक भूल हो सकती है।

वह कई सीटें न जीते, फिर भी कई सीटों का परिणाम तय कर सकती है।

यही है स्पॉइलर फैक्टर।

कभी-कभी चुनाव जीतने के लिए सीट जीतना जरूरी नहीं होता।

किसी दूसरे को हराने के लिए पर्याप्त वोट लेना भी काफी होता है।

असली मुद्दे दरवाजे पर खड़े हैं

जातीय गणित के पीछे जनता के असली सवाल भी खड़े हैं।

रोजगार, बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाएं, पेपर लीक, महंगाई, किसान, शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था और बुलडोजर राजनीति चुनावी विमर्श का हिस्सा बनेंगे।

युवा मतदाता खास तौर पर महत्वपूर्ण होंगे।

नारे से पेट नहीं भरता। नौकरी की जरूरत होती है।

बीजेपी कल्याणकारी योजनाओं, विकास, कानून-व्यवस्था और हिंदुत्व को सामने रखेगी।

सपा सामाजिक न्याय, बेरोजगारी और शासन के सवाल उठाएगी।

कांग्रेस पुनर्जीवन की कोशिश करेगी।

बसपा पुराने सामाजिक इंजीनियरिंग मॉडल को नए रूप में आजमा सकती है।

छोटी पार्टियां अपनी-अपनी जातीय जेबें तलाशेंगी।

और टिकट के दावेदार?

वे अपनी राजनीतिक तीर्थयात्रा जारी रखेंगे।

टिकट ही असली घोषणापत्र है

दशहरे तक कई राजनीतिक समीकरण साफ होने लगेंगे। दिवाली के बाद टिकटों की मंडी गर्म होगी।

फिर वही दृश्य सामने आएंगे।

नाराज नेता।

बागी उम्मीदवार।

भावुक इस्तीफे।

प्रेस कॉन्फ्रेंस।

और वही अमर संवाद: 

“पार्टी ने मेरे साथ धोखा किया है।”

वोटर चुपचाप सब देखेगा।

उत्तर प्रदेश का चुनाव कभी सिर्फ पार्टियों का चुनाव नहीं रहा। यह जातीय गठबंधनों, उम्मीदवारों, बूथ प्रबंधन, स्थानीय नाराजगी, धनबल, संगठन और राष्ट्रीय मुद्दों का जटिल मिश्रण है।

बीजेपी के पास मशीनरी है।

सपा के पास 2024 की रफ्तार है।

कांग्रेस को पुनर्जीवन चाहिए।

बसपा को पुनरुत्थान।

छोटी पार्टियों को मोलभाव की ताकत।

और वोटर?

आखिरी फैसला उसी का होगा।

उत्तर प्रदेश में सियासी हवा इतनी तेजी से बदलती है कि नेता के हाथ का झंडा भी पीछे रह जाए।

2027 का चुनाव सिर्फ योगी सरकार पर जनमत-संग्रह नहीं होगा।

यह परीक्षा होगी कि किस पार्टी ने नए यूपी के मतदाता को समझा है, और कौन अब भी पुराने चुनाव की रणनीति लेकर बैठा है।


 जब आस्था शोर बन जाए: त्योहारों के प्रदूषण का बढ़ता खतरा

________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा

8 सितंबर 2026

___________________________

त्योहार खुशियाँ लाते हैं। वे लोगों को जोड़ते हैं और रिश्तों में मिठास घोलते हैं। लेकिन जब भक्ति का वॉल्यूम इतना बढ़ जाए कि पूरा मोहल्ला परेशान हो जाए, तो सवाल उठना लाज़िमी है।

कभी त्योहार सादगी, श्रद्धा, लोक संगीत और सामुदायिक भागीदारी से जुड़े थे। मिट्टी की मूर्ति बनती थी और श्रद्धा के साथ उसका विसर्जन होता था। आज तस्वीर काफी बदल गई है।

ऊँचे लाउडस्पीकर, डीजे, बड़े साउंड सिस्टम, रीमिक्स गाने और लंबी शोभायात्राएँ त्योहारों का हिस्सा बनते जा रहे हैं। कई बार भक्ति कम और शोर ज्यादा सुनाई देता है।

त्योहारों का प्रदूषण केवल पानी और मूर्तियों तक सीमित नहीं है। शोर भी अब गंभीर प्रदूषण बन चुका है।

कर्नाटक के कोडागु जिले में पुलिस ने हाल ही में आयोजकों को ध्वनि प्रदूषण संबंधी नियमों का पालन करने की चेतावनी दी है। संदेश साफ है: उत्सव मनाइए, लेकिन कानून की हद में।

कानून भी बिल्कुल स्पष्ट है।

Noise Pollution (Regulation and Control) Rules, 2000, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत बनाए गए हैं। इनमें अलग-अलग क्षेत्रों के लिए ध्वनि की सीमा तय है। लाउडस्पीकर और पब्लिक एड्रेस सिस्टम के इस्तेमाल पर भी नियम लागू होते हैं। सामान्यतः रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक तेज आवाज पर रोक रहती है।

अस्पतालों, स्कूलों और रिहायशी इलाकों में तो और ज्यादा एहतियात जरूरी है। आखिर किसी मरीज की बीमारी, किसी बच्चे की नींद और किसी विद्यार्थी की पढ़ाई पर डीजे की मर्जी क्यों चले?

यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है: कानून है, फिर अमल कहाँ है?

हर त्योहार पर अक्सर वही कहानी दोहराई जाती है। आयोजक अनुमति लेते हैं और नियम मानने का भरोसा देते हैं। फिर डीजे शुरू होता है। आवाज बढ़ती जाती है और पूरा मोहल्ला बिना अपनी मर्जी के कार्यक्रम का हिस्सा बन जाता है।

शिकायत करने पर कभी पुलिस आती है, कभी नहीं। कई बार चेतावनी देकर मामला खत्म हो जाता है। इससे गलत संदेश जाता है कि त्योहारों में नियम थोड़े ढीले चल सकते हैं।

यही सोच असली समस्या है।

प्रशासन की अपनी मुश्किलें भी हैं। एक साथ कई कार्यक्रम होते हैं। पुलिस बल सीमित होता है। ध्वनि मापने के उपकरण भी हर जगह तुरंत उपलब्ध नहीं होते। लेकिन इन परेशानियों का अर्थ यह नहीं कि कानून को ताक पर रख दिया जाए।

गणेश चतुर्थी का इतिहास हमें उत्सव की असली ताकत भी याद दिलाता है। 1893 में बाल गंगाधर तिलक ने गणेश उत्सव को सार्वजनिक रूप दिया। इसका उद्देश्य लोगों को जोड़ना और सामाजिक चेतना पैदा करना था।

आज वही उत्सव कई जगह शक्ति प्रदर्शन की होड़ में बदलता दिखाई देता है। बड़े मंच, बड़े स्पीकर, बड़े जुलूस और उससे भी बड़ा शोर, मानो भक्ति की गहराई डेसिबल से मापी जाने लगी हो।

यह भी भूलना नहीं चाहिए कि विसर्जन के दौरान भीड़, यातायात, पर्यावरण और कानून-व्यवस्था से जुड़ी चुनौतियाँ पैदा होती हैं। उत्सव जब दूसरे नागरिकों के अधिकारों से टकराने लगे, तब आत्ममंथन जरूरी है।

इसका अर्थ त्योहार बंद करना नहीं है। जरूरत त्योहारों की मूल भावना वापस लाने की है।

आयोजकों को अनुमति पहले लेनी चाहिए। तय रास्ते, समय और ध्वनि सीमा का पालन होना चाहिए। डीजे मनोरंजन करे, पड़ोसियों को परेशान न करे।

मरीज को शांति चाहिए। बच्चे को नींद चाहिए। बुजुर्ग को सुकून चाहिए। विद्यार्थी को पढ़ाई के लिए खामोशी चाहिए। इन जरूरतों का सम्मान करना भी धर्म और समाज दोनों की जिम्मेदारी है।

पर्यावरण की चिंता भी उतनी ही जरूरी है। पीओपी की मूर्तियाँ, रासायनिक रंग और प्रदूषित जल विसर्जन हमारी आस्था की कीमत नहीं हो सकते। मिट्टी की मूर्ति, प्राकृतिक रंग और जिम्मेदार विसर्जन उत्सव को सुंदर भी बनाते हैं और टिकाऊ भी।

आखिर भक्ति वह नहीं, जो दूसरों को बेचैन कर दे। धर्म वह नहीं, जो पड़ोसी की नींद हराम कर दे।

गणेश को विघ्न विनाशक कहा जाता है, बाधाओं को दूर करने वाला। उनके प्रति सच्ची श्रद्धा यही होगी कि हमारा उत्सव खुद किसी के लिए नया विघ्न न बने।

आस्था और पर्यावरण साथ चल सकते हैं। आस्था और कानून भी साथ चल सकते हैं। लेकिन आस्था और सार्वजनिक परेशानी का कोई मेल नहीं।

त्योहार हमारी खुशी हैं। उन्हें किसी और की सजा नहीं बनना चाहिए।

त्योहार श्रद्धा के हों, प्रदूषण के नहीं।


Sunday, September 6, 2026

 नेता मौज में, अफसर उदासीन, आगरा का भविष्य अधर में 

ताज की छाया में ठहरा आगरा: T T Z के उद्योगों का उजड़ा हुआ सपना

____________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा 

7 सितंबर 2026

___________________________

कभी आगरा भारत के औद्योगिक नक्शे पर अपनी अलग पहचान रखता था।

यह शहर केवल ताजमहल और पेठे के लिए नहीं जाना जाता था।

यहां भट्टियां जलती थीं, कारखाने चलते थे और हुनर बिकता था। देश विदेश में उद्योगों की पहचान थी। ताज महल से ज्यादा कमाई व्यापार उद्योगों से थी।

आज वही आगरा औद्योगिक विकास की दौड़ में पिछड़ रहा है।

तीन दशक पहले ताज बचाने के लिए उठाए गए कदम जरूरी थे। लेकिन उनकी कीमत आज भी आगरा और पूरे टीटीजेड को चुकानी पड़ रही है।

1990 के दशक में आगरा के उद्योगों पर संकट मंडराया। ताजमहल को प्रदूषण से बचाना राष्ट्रीय प्राथमिकता बन गया। सुप्रीम कोर्ट ने 1993 से सख्त कदम उठाने शुरू किए।

1996 के ऐतिहासिक एम.सी. मेहता फैसले ने तस्वीर बदल दी। कोयला और कोक इस्तेमाल करने वाली इकाइयों को गैस अपनानी थी। या फिर उन्हें टीटीजेड से बाहर जाना था।

ताज ट्रेपेजियम जोन करीब 10,400 वर्ग किलोमीटर में फैला है। इसमें आगरा, फिरोजाबाद, मथुरा, हाथरस और एटा शामिल हैं। राजस्थान का भरतपुर भी इसका हिस्सा है। यह इलाका पर्यावरण की दृष्टि से बेहद संवेदनशील घोषित हुआ।

करीब 292 प्रदूषणकारी इकाइयों पर कार्रवाई हुई। कई बंद हुईं, कई दूसरी जगह चली गईं।

2017 के एक सर्वे ने तस्वीर और साफ कर दी। 1996 तक चल रही करीब 1,168 इकाइयों में केवल 250 बचीं।

बाकी बंद हुईं या दूसरे राज्यों की ओर निकल गईं। कई उद्यमी राजस्थान और मध्य प्रदेश चले गए। निवेश गया, रोजगार गया और औद्योगिक आत्मविश्वास भी कमजोर हुआ।

यहां एक सवाल उठना स्वाभाविक है।

क्या ताज को बचाने के लिए उद्योगों को खत्म करना जरूरी था?

जवाब इतना सीधा नहीं है।

पर्यावरण की हिफाजत जरूरी थी और आज भी है। लेकिन उद्योगों के लिए वैकल्पिक रास्ते तैयार करना भी जरूरी था। यहीं नीति और अमल के बीच बड़ी खाई दिखाई देती है।

आगरा की उद्यमशीलता पर कभी शक नहीं रहा। यहां लोगों ने हमेशा कम साधनों से बड़ा काम किया।

कच्चा माल दूर-दराज के इलाकों से आता रहा। लोहा, कोयला, गैस, शीशे का कच्चा माल बाहर से आया।

चमड़ा दक्षिण भारत से आया और फिर जूते बने। गुजरात और राजस्थान से सिलिका सैंड और सोडा ऐश आया।

लौकी से पेठा बना और पूरी दुनिया तक पहुंचा।

यही आगरा की असली ताकत थी। यहां प्राकृतिक संसाधन कम थे, लेकिन हुनर भरपूर था। फाउंड्री, कांच, जूते और हस्तशिल्प ने पहचान बनाई।

कारीगरों ने मामूली चीजों में भी बड़ी कीमत पैदा की। व्यापारियों ने छोटे कारोबार को बड़े बाजार से जोड़ा।

लेकिन आज वही ऊर्जा ठहराव से जूझ रही है।

आगरा का फुटवियर उद्योग अब भी सबसे मजबूत आधार है। यह सीधे और परोक्ष रूप से लाखों लोगों को रोजगार देता है।अनुमान है कि चार से पांच लाख आजीविकाएं इससे जुड़ी हैं। देश की घरेलू फुटवियर मांग में आगरा की हिस्सेदारी बड़ी है।

निर्यात में भी शहर की पुरानी मजबूत मौजूदगी है।

लेकिन बढ़ती लागत और वैश्विक प्रतिस्पर्धा ने मुश्किलें बढ़ाई हैं।

फिरोजाबाद का कांच उद्योग भी अपनी पुरानी चमक खो चुका है।

तकनीक बदली, लेकिन आधुनिकीकरण की रफ्तार धीमी रही।

कभी कृषि उपकरण और पाइप बनाने वाली फाउंड्रियां भी सिकुड़ गईं।

पारंपरिक उद्योगों के सामने ईंधन और प्रदूषण की पाबंदियां हैं।

नई पीढ़ी को इनमें भविष्य कम दिखाई देता है।

इसका असर केवल कारखानों पर नहीं पड़ा।

रोजगार की तलाश में गांवों से पलायन बढ़ा।

कई युवा दिल्ली-एनसीआर की तरफ निकल गए।

जहां मजदूरी बेहतर मिली, वहीं उन्होंने डेरा डाल लिया।

आगरा में हुनर रहा, लेकिन अवसर कम होते गए।

यह किसी भी शहर के लिए बेहद अफसोसनाक स्थिति है।

सरकारों को भी पूरी तरह कठघरे में खड़ा करना उचित नहीं होगा।

मूल प्रतिबंध सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से आए थे।

वे आज की सरकारों से बहुत पहले के फैसले हैं।

बाद की सरकारों ने गैर-प्रदूषणकारी उद्योगों का वादा किया।

लेकिन योजनाओं का जमीन पर असर असमान रहा।

वर्तमान सरकार ने भी कई पहल की हैं।

फुटवियर और हस्तशिल्प को ओडीओपी में बढ़ावा मिला है।

कौशल प्रशिक्षण से बड़ी संख्या में कारीगर जुड़े हैं।

नई फुटवियर और लेदर नीति भी सामने आई है।

आगरा में इंटीग्रेटेड मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर की योजना बनी है। शास्त्रीपुरम में एसटीपीआई सुविधा भी पूरी हुई है।एक्सप्रेसवे और ग्रेटर आगरा की योजनाएं भी उम्मीद जगाती हैं। फिर भी असली अड़चनें खत्म नहीं हुई हैं।

अछनेरा का प्रस्तावित लेदर पार्क इसका बड़ा उदाहरण है। सालों से यह परियोजना कागजी और कानूनी पेच में फंसी है। जमीन अधिग्रहण और मुआवजे के बाद भी रास्ता साफ नहीं है।

गैस की आपूर्ति भी कई बार उद्योगों के लिए संकट बनी। प्रदूषण नियंत्रण की अपनी चुनौतियां भी बरकरार हैं।

सवाल यह नहीं कि ताज बचे या उद्योग।सवाल यह है कि दोनों साथ क्यों नहीं बच सकते?

दुनिया में स्वच्छ तकनीक के साथ उद्योग चलते हैं। आगरा को भी उसी दिशा में आगे बढ़ना होगा।

भविष्य प्रदूषणकारी भारी उद्योगों में नहीं है। लेकिन स्वच्छ विनिर्माण, आईटी, डिजाइन और सेवाओं में है।

ताज की हिफाजत हमारी जिम्मेदारी है।लेकिन ताज की छाया में पलती युवा पीढ़ी भी हमारी जिम्मेदारी है।

आगरा को केवल पर्यटन शहर बनाकर नहीं छोड़ा जा सकता। यह मेहनती लोगों और उद्यमियों का शहर भी है। उसकी औद्योगिक रूह को फिर से जगाना होगा। तीन दशक का अनुभव एक साफ सबक देता है।

सिर्फ बंद करना आसान है, विकल्प बनाना मुश्किल।

अब विकल्प बनाने का वक्त है।

साफ उद्योगों के लिए जमीन, गैस और बिजली चाहिए। अनुमतियों की प्रक्रिया सरल और पारदर्शी होनी चाहिए। अटकी परियोजनाओं पर तेज फैसला होना चाहिए।

ताज चमकता रहे और कारखाने भी जलें।यमुना साफ रहे और रोजगार भी बढ़े। यही आगरा के लिए सही तरक्की होगी।

वरना इतिहास गवाही देगा कि हमने ताज तो बचा लिया, लेकिन उसके आसपास की औद्योगिक दुनिया को मुरझाने दिया।

Saturday, September 5, 2026

 


हैप्पी टीचर्स डे कहना काफी नहीं!

मास्टरजी की छड़ी गई, बदतमीजी आई!

बेबाक होना अच्छी बात है, बेलगाम होना नहीं।

___________________

जब शिक्षक की आवाज धीमी और बच्चे की आवाज ऊँची हो गई

बढ़ती अनुशासनहीनता पर गंभीर सवाल

_________________________

अनुशासनहीनता की समस्या सड़क पर शुरू नहीं होती।

वह स्कूल की पहली घंटी के साथ शुरू होती है।

____________________

बृज खंडेलवाल द्वारा

5 सितंबर 2026

______________________

कभी स्कूल में मास्टरजी की एक नजर पड़ती थी और पूरी कक्षा शांत हो जाती थी। आज कई शिक्षक कहते हैं, “बच्चो, प्लीज शोर मत करो।” और पीछे से आवाज आती है, “शीला मैम आप हमें ट्रॉमा, स्ट्रेस मत दो!” 

रिटायर्ड मास्साब शर्माजी बता रहे थे, "एक बार एक स्टूडेंट होम असाइनमेंट करके नहीं लाया, पूछने पर बोला: "तो क्या हुआ?" मैंने बात इग्नोर करने में भलाई समझी। लेकिन उसके बाद, हर टोकने के सवाल पर उत्तर मिलने लगा: तो क्या हुआ?  उस दिन अगर सख्त कदम लिया होता तो ये समस्या नहीं झेलनी पड़ती।"

वाह! शिक्षा ने सचमुच लंबी छलांग लगाई है। लेकिन यह मजाक जितना दिलचस्प है, हकीकत उतनी ही चिंताजनक है। पिछले दिनों, देश के अलग-अलग हिस्सों से सामने आए कई मामलों ने कक्षा में घटते अनुशासन और शिक्षकों के प्रति कम होते सम्मान पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

आंध्र प्रदेश में दसवीं के एक छात्र ने बहस के बाद शिक्षक को कक्षा में मुक्का मार दिया। केरल में फुटबॉल मैच के विवाद के बाद छात्रों के एक समूह ने शारीरिक शिक्षा के शिक्षकों पर हमला किया।

उत्तर प्रदेश में छेड़छाड़ के आरोप के बाद एक छात्रा और उसके परिवार ने कोचिंग शिक्षक की सार्वजनिक रूप से पिटाई की। राजस्थान में एक छात्र ने पहले हुई अनुशासनात्मक कार्रवाई से नाराज होकर शिक्षक पर सड़क पर हमला कर दिया।

कन्नूर, केरल में परीक्षा के दौरान दो छात्रों ने शिक्षक को पीट दिया। दिल्ली का 2016 का मामला तो और भी भयावह था। परीक्षा और अनुशासन से जुड़े विवाद के बाद दो छात्रों ने शिक्षक मुकेश कुमार पर चाकू से हमला किया और बाद में उनकी मौत हो गई।

हर मामले की परिस्थितियां अलग थीं। कुछ मामलों में शिक्षकों पर दुर्व्यवहार के आरोप भी लगे, जिनकी निष्पक्ष जांच जरूरी है। लेकिन शिकायत, गुस्सा या असहमति किसी को हिंसा का लाइसेंस नहीं दे सकती।

सवाल यह है कि आखिर हम यहां तक पहुंचे कैसे?


पुराने जमाने में शिक्षक के हाथ में छड़ी होती थी। आज शिक्षक के हाथ में नियमों की मोटी फाइल होती है।

छड़ी चलाना तो दूर, कई बार ऊंची आवाज में बोलना भी जोखिम भरा हो गया है। अभिभावक नाराज हो सकते हैं। प्रशासन सवाल पूछ सकता है। सोशल मीडिया तो पहले से तैयार बैठा है।

“देखिए, शिक्षक ने बच्चे को डांट दिया!”

नतीजा यह है कि कुछ जगह शिक्षक अनुशासन लागू करने से पहले दस बार सोचते हैं। दूसरी तरफ कुछ बच्चे यह समझने लगते हैं कि उन्हें कोई रोक नहीं सकता।

लेकिन यहां एक जरूरी फर्क समझना होगा। शारीरिक दंड शिक्षा का आदर्श तरीका नहीं है। बच्चे को पीटना, अपमानित करना या डराना शिक्षा नहीं, ज्यादती है।

लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि शिक्षक के हाथ पूरी तरह बांध दिए जाएं। कक्षा में नियम होंगे तो नियम तोड़ने पर उचित परिणाम भी होना चाहिए।

“अनुशासन स्वतंत्रता का दुश्मन नहीं, उसकी बुनियाद है।”

समय पर नहीं आए? जवाब देना होगा।

कक्षा में बदतमीजी की? कार्रवाई होगी।

दूसरों को पढ़ने नहीं दिया? अभिभावकों को बुलाया जाएगा।

बार-बार नियम तोड़े? निर्धारित अनुशासनात्मक कदम उठेंगे।

यह सब शिक्षक की निजी सनक से नहीं, बल्कि स्पष्ट और पारदर्शी नियमों के तहत होना चाहिए। वरना नियम दीवार पर टंगे खूबसूरत पोस्टर बनकर रह जाएंगे।


एक और सच्चाई को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जो बच्चे पढ़ना चाहते हैं, उनका भी अधिकार है। कुछ शरारती बच्चों की अराजकता पूरी कक्षा को बंधक नहीं बना सकती।

शिक्षा का अधिकार केवल स्कूल आने का अधिकार नहीं है। उसमें शांत वातावरण में सीखने का अधिकार भी शामिल है।

हम बच्चों से कहते हैं, “अपनी बात खुलकर कहो।”

बहुत अच्छी बात है।

लेकिन साथ में यह भी सिखाना होगा, “दूसरे की बात सुनो।”

हम कहते हैं, “अपने अधिकार पहचानो।”

उन्हें यह भी बताना होगा, “अपने कर्तव्य मत भूलो।”

हम कहते हैं, “सवाल पूछो।”

उन्हें यह भी समझाना होगा कि सवाल और बदतमीजी में फर्क होता है।

यही फर्क आज कई जगह धुंधला पड़ रहा है।

आधुनिकता का मतलब बेलगाम होना नहीं


आत्मविश्वास अच्छी चीज है, अहंकार नहीं। सवाल करना बुद्धिमानी है, हर नियम को ठुकराना नहीं।

जो बच्चा स्कूल में लाइन तोड़ना सामान्य समझता है, वह आगे चलकर ट्रैफिक नियम भी तोड़ सकता है। जो शिक्षक का अपमान करना अपना अधिकार समझता है, वह कल संस्थाओं का सम्मान भी भूल सकता है।

छोटी आदतें ही आगे चलकर बड़े नागरिक चरित्र का निर्माण करती हैं।

मास्टरजी दोस्त नहीं, मार्गदर्शक भी हैं

आज शिक्षा में शिक्षक को बच्चों का “दोस्त” बनाने पर बहुत जोर दिया जाता है। दोस्ताना माहौल अच्छा है, लेकिन शिक्षक की भूमिका केवल दोस्त की नहीं है।

शिक्षक मार्गदर्शक है। वह सिर्फ किताब नहीं पढ़ाता, व्यवहार भी सिखाता है।

स्कूल परीक्षा पास करने की फैक्ट्री नहीं है। वह नागरिक बनाने की वर्कशॉप भी है।

बच्चों में आत्मसंयम, समय की पाबंदी, जिम्मेदारी और दूसरों के प्रति सम्मान पैदा करना भी शिक्षा का हिस्सा है।

माता-पिता की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। घर में हर मांग पूरी करके स्कूल से अनुशासन की उम्मीद करना बेमानी है।

जिस बच्चे को घर में कभी “नहीं” सुनने की आदत नहीं, वह स्कूल में नियम क्यों मानेगा?

फिर आता है मोबाइल और सोशल मीडिया का सवाल।

आज बच्चे ऐसी दुनिया में पल रहे हैं जहां हर मिनट मनोरंजन उपलब्ध है। कुछ सेकंड में वीडियो बदल जाता है। एक क्लिक में नया कंटेंट सामने आ जाता है।

ऐसे माहौल में धैर्य, एकाग्रता और इंतजार जैसे पुराने गुण कमजोर पड़ रहे हैं।

स्कूल को ऐसे समय में और मजबूत अनुशासन चाहिए, कम नहीं।

क्योंकि किताब पढ़ने के लिए धैर्य चाहिए। शिक्षक को सुनने के लिए एकाग्रता चाहिए। परीक्षा के लिए आत्मसंयम चाहिए। और जीवन में सफल होने के लिए इन तीनों की जरूरत पड़ती है।


पुराने मास्टरजी की छड़ी शायद वापस न आए। लेकिन उसकी आत्मा जरूर लौटनी चाहिए।

मर्यादा।

जवाबदेही।

समय की पाबंदी।

नियमों का सम्मान।

और अपने कर्म के परिणाम का बोध।

मास्टरजी को तानाशाह मत बनाइए।

लेकिन उन्हें इतना कमजोर भी मत बनाइए कि बच्चे ही कक्षा के हाकिम बन जाएं।

कक्षा लोकतंत्र की चुनावी रैली नहीं है। वहां शिक्षक नेतृत्व करता है और विद्यार्थी सीखते हैं।

डर से शिक्षा नहीं होती। लेकिन हर कर्म का परिणाम होता है, यह समझाना भी शिक्षा का ही हिस्सा है।

शिक्षक का रौब नहीं, उसकी गरिमा लौटाइए। उसकी आवाज में फिर से वह विश्वास लाइए कि वह बिना डर के अनुशासन कायम कर सकता है।

वरना कल का नागरिक स्कूल से यही सीखकर निकलेगा:

“नियम दूसरों के लिए होते हैं, मेरे लिए नहीं।”

और फिर हम हैरान होंगे कि ट्रैफिक क्यों नहीं सुधरता। कतारें क्यों नहीं बनतीं। सार्वजनिक संपत्ति की कद्र क्यों नहीं होती।

इसलिए इस शिक्षक दिवस पर सिर्फ “हैप्पी टीचर्स डे” कहना काफी नहीं है।

मास्टरजी को सम्मान दीजिए।

बच्चों को अधिकार दीजिए।

लेकिन अनुशासन को भी उसका अधिकार दीजिए।

क्योंकि अच्छे स्कूल केवल अच्छे विद्यार्थी नहीं बनाते।

वे अच्छे नागरिक बनाते हैं।


Thursday, September 3, 2026

 क्या आगरा का ट्रैफिक कभी सुधरेगा?

उपेक्षा, अव्यवस्था और अधूरे मेट्रो निर्माण ने शहर को जाम का अखाड़ा बना दिया है

_________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा

5 सितंबर 2026

_________________________

आगरा की सड़कें अब सफर का रास्ता कम और रोज का रणक्षेत्र ज्यादा लगती हैं। 

कहीं ऑटो चालक नियमों को ठेंगा दिखाते हैं, कहीं गलत दिशा में दौड़ते वाहन जान जोखिम में डालते हैं और कहीं मेट्रो निर्माण ने पहले से परेशान यातायात की कमर तोड़ रखी है। 

शहर में सुरक्षित आवागमन जैसे प्रशासन की प्राथमिकताओं की सूची से ही बाहर हो गया है।

एमजी रोड, शहर की प्रमुख जीवनरेखा, पर बेतरतीब ऑटो संचालन और यातायात नियमों की धज्जियां उड़ने के कारण पाबंदियां लगाई गईं। लेकिन समस्या खत्म नहीं हुई। वह बस दूसरी सड़कों पर स्थानांतरित हो गई। 

अब ऑटो मुख्य मार्गों के अलावा लिंक रोड और हाईवे तक को घेरते दिखाई देते हैं। लो-फ्लोर बसें चलाने से सार्वजनिक परिवहन की समस्या का दिखावटी समाधान जरूर हुआ, लेकिन यातायात की बुनियादी बीमारी जस की तस है।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि सड़क पर नियम तोड़ने वाला दिखाई देता है, लेकिन व्यवस्था की विफलता दिखाई नहीं देती। पुलिस और नगर नियोजन तंत्र दोनों इस अव्यवस्था के लिए जवाबदेह हैं।


आंकड़े इस अराजकता की भयावह तस्वीर पेंट कर रहे हैं। वर्ष 2024 में आगरा जिले में 1,223 सड़क दुर्घटनाएं दर्ज हुईं और 586 लोगों की जान गई। यानी औसतन हर दिन लगभग चार दुर्घटनाएं और एक से अधिक मौत।

गलत दिशा में वाहन चलाना, लाल बत्ती पार करना, तेज रफ्तार, मोबाइल पर बात करना और दोपहिया वाहनों पर तीन सवारियां बैठाना आम बात है। पुलिस चालान काटती है, लेकिन उसका असर कितना है, यह सड़कें रोज बता देती हैं। कार्रवाई अक्सर छिटपुट होती है। ब्लैक स्पॉट पर लगातार निगरानी, लाइसेंस निलंबन और वाहन जब्ती जैसे कठोर कदम विरले ही दिखाई देते हैं।

आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे का अनुभव भी आंखें खोलने वाला है। 2021 से 2025 के मध्य तक 7,000 से अधिक दुर्घटनाओं में आधे से ज्यादा मामलों में चालक की थकान एक प्रमुख कारण रही। सवाल उठता है कि सड़क सुरक्षा को लेकर निगरानी और जागरूकता व्यवस्था आखिर कितनी गंभीर है?


आगरा में मेट्रो निर्माण यातायात सुधार की उम्मीद लेकर आया था। लेकिन निर्माण की धीमी गति, लंबे समय तक खुले पड़े कार्यक्षेत्र, संकरे डायवर्जन और जगह-जगह टूटे मार्गों ने स्थानीय यातायात को बेहाल कर दिया है। शुरू में ही समझदार लोगों ने अंडरग्राउंड मेट्रो रेल नेटवर्क की डिमांड की थी, मगर लागत  कम करने के चक्कर में सारे शहर की यातायात व्यवस्था भंग कर दी।

अब, जहां पांच मिनट में पहुंच जाना चाहिए, वहां 20-25 मिनट लगना अब सामान्य बात है। कई जगह सड़क का एक बड़ा हिस्सा बैरिकेडिंग में घिरा है और बची हुई सड़क पर ऑटो, ई-रिक्शा, दोपहिया, कार और बसें एक-दूसरे को रास्ता देने से कतराते  हैं।

मेट्रो जैसी बड़ी परियोजना के लिए कुछ समय की परेशानी समझी जा सकती है। लेकिन तैयारी और निर्माण की समयसीमा के बीच तालमेल न हो तो असुविधा यातना बन जाती है। निर्माण स्थल की सफाई, बैरिकेडिंग, डायवर्जन की स्पष्ट सूचना और वैकल्पिक मार्गों का बेहतर प्रबंधन जरूरी है। शहर को यह जानने का अधिकार है कि कौन सा काम कब पूरा होगा और देरी क्यों हो रही है।


आगरा की आबादी लगभग 30 लाख तक पहुंच चुकी है। इसके अलावा हर वर्ष करोड़ों पर्यटक ताजमहल और अन्य ऐतिहासिक स्थलों को देखने आते हैं। दशकों पहले की आबादी और यातायात को ध्यान में रखकर बनी सड़कें अब इस बोझ के सामने छोटी पड़ रही हैं।

पीक आवर में कई प्रमुख मार्गों पर वाहन गति लगभग 15 किलोमीटर प्रति घंटा तक गिर जाती है। जाम केवल समय नहीं खाता, ईंधन और उत्पादकता भी निगलता है। एक अनुमान के अनुसार यातायात जाम, अतिरिक्त ईंधन और समय की बर्बादी से शहर को हर साल लगभग 500 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान होता है।

पर्यटक भी इस अनुभव को लेकर अच्छी यादें लेकर नहीं लौटते। ताज देखने आए व्यक्ति को अगर आधा दिन सड़क पर फंसे रहना पड़े, तो विश्व धरोहर शहर की छवि पर भी सवाल उठता है।


जाम के साथ जहरीली हवा का बोनस

यातायात की समस्या केवल समय और धैर्य नहीं निगलती। यह हवा को भी जहरीला बनाती है।

वाहनों से निकलने वाला प्रदूषण शहर के PM2.5 में महत्वपूर्ण योगदान देता है। सड़क की धूल इसका बड़ा हिस्सा हो सकती है, लेकिन यातायात ऐसा स्रोत है जिस पर प्रशासन तत्काल नियंत्रण कर सकता है।

सर्दियों में प्रदूषण का स्तर खतरनाक सीमा तक पहुंच जाता है। चौराहों पर घंटों खड़े वाहन धुआं छोड़ते रहते हैं और पैदल चलने वाले उसी हवा में सांस लेते हैं। बच्चे और बुजुर्ग इसकी सबसे बड़ी कीमत चुकाते हैं।

ताजमहल की सुरक्षा के लिए ताज ट्रेपेजियम जोन बनाया गया था। लेकिन अगर ताज के आसपास का यातायात ही प्रदूषण का बड़ा स्रोत बना रहे, तो केवल कागजी संरक्षण से विरासत नहीं बच सकती।

इलाज मुश्किल नहीं, इच्छाशक्ति चाहिए

आगरा को किसी चमत्कारी यातायात योजना की जरूरत नहीं है। जरूरत है नियमों के लगातार और निष्पक्ष पालन की।

तेज रफ्तार, गलत दिशा, लाल बत्ती तोड़ने और खतरनाक ड्राइविंग पर नियमित कार्रवाई हो। लाइसेंस निलंबन और वाहन जब्ती जैसे कदम वास्तव में लागू हों। सड़कों पर फुटपाथ, स्पष्ट जेब्रा क्रॉसिंग, बेहतर संकेतक और सुरक्षित पैदल मार्ग बनाए जाएं।

सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना होगा। कुछ लो-फ्लोर बसें समस्या का समाधान नहीं हैं। उच्च आवृत्ति वाली विश्वसनीय बस सेवा, व्यवस्थित ऑटो और ई-रिक्शा स्टैंड तथा बेहतर पार्किंग व्यवस्था निजी वाहनों का दबाव कम कर सकती है।


हर सार्वजनिक निर्माण में भी समयसीमा और जवाबदेही तय होनी चाहिए। हर निर्माण स्थल पर स्पष्ट डायवर्जन, पर्याप्त रोशनी, पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित रास्ता और नियमित यातायात प्रबंधन अनिवार्य होना चाहिए।

कैमरा आधारित निगरानी, स्मार्ट सिग्नल, रियल-टाइम ट्रैफिक मॉनिटरिंग और तेज आपातकालीन प्रतिक्रिया व्यवस्था अब विलासिता नहीं, आवश्यकता है।

भारी वाणिज्यिक यातायात को शहर के भीतरी हिस्सों से बाहर रखने के लिए उपलब्ध बाईपास और एक्सप्रेसवे का अधिक प्रभावी इस्तेमाल किया जा सकता है।

आगरा का ट्रैफिक संकट किसी दैवी आपदा का परिणाम नहीं है। यह वर्षों की प्रशासनिक उदासीनता, कमजोर प्रवर्तन, खराब नियोजन और अधूरे समन्वय का नतीजा है।

शहर को जाम से निकालना असंभव नहीं है। सड़कें पर्याप्त हो सकती हैं, यदि व्यवस्था पर्याप्त हो।

सवाल केवल यह है कि जिम्मेदार अधिकारी कब समझेंगे कि ट्रैफिक जाम सिर्फ गाड़ियों को नहीं रोकता। यह शहर की अर्थव्यवस्था, पर्यावरण, पर्यटन और नागरिकों की जिंदगी रोक देता है।

आगरा को ताज का शहर बने रहना है या जाम का। फैसला अब सड़कों पर नहीं, प्रशासनिक इच्छाशक्ति में होगा।

 श्रीकृष्ण: प्रकृति के रक्षक और यमुना के प्रियतम

क्या इस जन्माष्टमी हम कृष्ण को केवल याद ही नहीं, बल्कि उनकी प्रिय यमुना को बचाने का संकल्प भी ले सकते हैं?

_______________________

बृज खंडेलवाल द्वारा 

4 सितंबर 2026

______________________

देशभर में आज जन्माष्टमी की धूम है। मंदिर रोशनी से जगमगा रहे हैं। गलियां सज रही हैं। घंटियां बज रही हैं और भक्त आधी रात को भगवान कृष्ण के जन्म का इंतजार कर रहे हैं।

मथुरा और वृंदावन से लेकर द्वारका, मुंबई, दिल्ली, अहमदाबाद और देश के छोटे-बड़े शहरों तक जन्माष्टमी आस्था का सबसे बड़ा उत्सव बन चुकी है। कहीं रासलीला हो रही है, कहीं झांकियां सज रही हैं और कहीं दही-हांडी के लिए मानव पिरामिड बनाए जा रहे हैं।

लेकिन इस उत्सव के बीच एक सवाल हमें जरूर पूछना चाहिए।

अगर कृष्ण आज हमारे बीच होते, तो नदियों, जंगलों, पहाड़ों और पशुओं की हालत देखकर क्या सोचते?

कृष्ण केवल मंदिरों में विराजमान देवता नहीं थे। उनका बचपन जंगलों, गायों, बछड़ों, पक्षियों, पेड़ों, पहाड़ों और नदियों के बीच बीता। उनका जीवन हमें बताता है कि प्रकृति कोई सामान नहीं है, जिसे मनुष्य अपनी सुविधा के लिए इस्तेमाल करे। प्रकृति हमारे जीवन और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है।

कृष्ण और ब्रज की जीवंत प्रकृति

“वृंदावन कृष्ण की बाल लीलाओं की केवल पृष्ठभूमि नहीं था। वहां पेड़, पक्षी, गाय, नदी और मनुष्य एक ही परिवार का हिस्सा थे।”

यह कहना है आगरा के श्री मथुराधीश मंदिर के गोस्वामी नंदन श्रोत्रिय का।

कृष्ण और कदंब का रिश्ता आज भी ब्रज की कल्पना का हिस्सा है। कहा जाता है कि कदंब के पेड़ की छांव में कृष्ण की बांसुरी गूंजती थी। उनके साथ केवल ग्वाल-बाल और गोपियां ही नहीं थीं। गाय, बछड़े, पक्षी और पूरा प्राकृतिक संसार उनकी दुनिया का हिस्सा थे।

फिर आता है गोवर्धन पर्वत का प्रसंग।

जब ब्रज पर मूसलाधार बारिश का संकट आया, तो कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाकर लोगों और पशुओं को आश्रय दिया। इस कथा को हम धार्मिक दृष्टि से देखें या प्रतीक के रूप में, इसका पर्यावरणीय संदेश बहुत स्पष्ट है।

पर्यावरणविद् डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य के अनुसार, गोवर्धन केवल एक पहाड़ नहीं था। वह जंगल, जल, चारा, भोजन और पूरे समुदाय की सुरक्षा का प्रतीक था।

कृष्ण का संदेश आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है, मनुष्य का जीवन प्रकृति की सुरक्षा पर निर्भर है।

कृष्ण और यमुना का रिश्ता

कृष्ण की कहानी में यमुना का स्थान सबसे खास है।

रिवर कनेक्ट अभियान से जुड़ी पद्मिनी अय्यर कहती हैं, “कृष्ण का यमुना से रिश्ता बहुत गहरा था। वसुदेव उन्हें शिशु अवस्था में यमुना पार कराकर गोकुल ले गए। कृष्ण ने यमुना के किनारे खेला और कालिया नाग का सामना भी यमुना में ही किया।”

कृष्ण की कथा में यमुना केवल पानी की धारा नहीं है। वह एक जीवंत पात्र है।

लेकिन आज यही यमुना मथुरा, वृंदावन और आगरा से गुजरते हुए गंदे नालों, सीवर और प्रदूषण का बोझ ढो रही है। करोड़ों लोग कृष्ण का नाम लेते हैं, लेकिन उनकी प्रिय नदी लगातार मर रही है।

आगरा में यह विडंबना और भी बड़ी है। यमुना विश्व प्रसिद्ध ताजमहल के सामने से गुजरती है। एक ओर दुनिया का सबसे सुंदर स्मारक है और दूसरी ओर उसकी जीवनरेखा प्रदूषण से जूझ रही है।

यमुना भक्त चतुर्भुज तिवारी कहते हैं कि नदी को वह सम्मान नहीं मिल रहा, जिसकी वह हकदार है।

आईएमए अध्यक्ष डॉ. हरेंद्र गुप्ता सवाल करते हैं, “क्या हम कृष्ण के भक्त कहलाकर उनकी प्रिय यमुना को नाले में बदल सकते हैं?”

मथुरा में भव्य जन्माष्टमी

4 सितंबर को जन्माष्टमी मनाई जा रही है और आधी रात के बाद तक कृष्ण जन्मोत्सव चलेगा।

मथुरा में इस बार विशेष उत्साह है। हजारों श्रद्धालु मथुरा-वृंदावन पहुंच रहे हैं। कृष्ण जन्मभूमि पर आधी रात को विशेष पूजा होगी। ब्रज तीर्थ विकास परिषद ने कृष्ण के जीवन और जन्म को दर्शाने वाले 500 ड्रोन का विशेष कार्यक्रम भी तैयार किया है।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 3 सितंबर को मथुरा का दौरा किया। उन्होंने स्वामी हरिदास सभागार और कई विकास परियोजनाओं का उद्घाटन किया। उन्होंने यह भी कहा कि विकास के साथ सांस्कृतिक विरासत की रक्षा जरूरी है।

यह बात ब्रज के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

ब्रज का विकास केवल चौड़ी सड़कों और ज्यादा पर्यटकों से नहीं हो सकता। अगर मथुरा की पहचान कृष्ण हैं, तो उसकी यमुना, कुंड, गोवर्धन, वन, गाय और पुराने घाट भी उसी विरासत का हिस्सा हैं।

कृष्ण के पोस्टरों से सजा कंक्रीट का जंगल ब्रज नहीं हो सकता। ब्रज इतना सुंदर रहना चाहिए कि कृष्ण खुद उसे पहचान सकें।

द्वारका से पूरे भारत तक

दूर गुजरात में द्वारका भी जन्माष्टमी के लिए तैयार है। इस वर्ष पांच दिन के उत्सव में लगभग सात लाख श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है। द्वारकाधीश मंदिर में आधी रात की पूजा के लिए बड़ी संख्या में भक्त जुटेंगे।

मथुरा और द्वारका कृष्ण के जीवन के दो अलग-अलग पड़ाव हैं। एक ओर ब्रज की नदी, जंगल और गांव हैं। दूसरी ओर समुद्र के किनारे बसी द्वारका है।

कृष्ण हमें नदी से लेकर समुद्र तक और गांव से लेकर शहर तक जोड़ते हैं।

महाराष्ट्र में दही-हांडी उत्सव सड़कों को उत्सव के मैदान में बदल देता है। मुंबई के गोविंदा दल मानव पिरामिड बनाकर कृष्ण की माखन चोरी की लीला को रोमांचक रूप देते हैं।

दिल्ली, लखनऊ, बंगाल, गुजरात और देश के अनेक हिस्सों में मंदिरों और सार्वजनिक स्थानों पर विशेष कार्यक्रम हो रहे हैं। कहीं कृष्ण लीला है, कहीं रासलीला और कहीं शास्त्रीय नृत्य।

लेकिन कृष्ण की प्रकृति से जुड़ी विरासत ब्रज में सबसे ज्यादा महसूस होती है।

गायों से कृष्ण का रिश्ता

कृष्ण को गोपाल और गोविंद कहा गया। गाय उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा थीं।

वृंदावन टुडे के मुख्य संपादक और फ्रेंड्स ऑफ वृंदावन के संयोजक जगन्नाथ पोद्दार कहते हैं कि ब्रज में गाय केवल आर्थिक संपत्ति नहीं थी। वह परिवार और धार्मिक जीवन का हिस्सा थी।

आज स्थिति बदल गई है।

हम गाय की पूजा तो करते हैं, लेकिन उसके भोजन और स्वास्थ्य की चिंता कम करते हैं। प्लास्टिक, कचरा और गंदा पानी पशुओं के जीवन को नुकसान पहुंचा रहे हैं।

यह कैसी भक्ति है, जिसमें भगवान का नाम तो है, लेकिन उनकी प्रिय गायों की चिंता नहीं?

गीता का संदेश और आज की दुनिया

भगवद्गीता में जलवायु परिवर्तन या जैव विविधता जैसे आधुनिक शब्द नहीं मिलते। फिर भी कृष्ण का दर्शन मनुष्य और प्रकृति के गहरे संबंध की बात करता है।

गीता में कृष्ण पृथ्वी की सुगंध और सभी जीवों में जीवन को अपनी ही अभिव्यक्ति बताते हैं। एक पत्ता, फूल, फल या जल भी सच्ची श्रद्धा से अर्पित किया जाए तो उसका महत्व है।

गीता का संदेश आज भी साफ है,

प्रकृति को नष्ट करके मनुष्य सुखी नहीं रह सकता।

इस जन्माष्टमी कुछ बदलें

हम हजारों दीप जला सकते हैं। विशाल झांकियां निकाल सकते हैं। भव्य जुलूस कर सकते हैं। पूरी रात “राधे-राधे” और “जय श्रीकृष्ण” का जयघोष कर सकते हैं।

लेकिन अगर यमुना मरती रही, तो हमारी भक्ति अधूरी रहेगी।

ब्रज में कृष्ण की विरासत बचाने का अर्थ है, यमुना को साफ करना, गोवर्धन की प्रकृति बचाना, पुराने कुंडों को पुनर्जीवित करना, पवित्र उपवनों की रक्षा करना और गायों की बेहतर देखभाल करना।

आगरा में इसका अर्थ है ताजमहल के सामने बहती यमुना को फिर जीवित नदी बनाना।

मथुरा और वृंदावन में तीर्थयात्रा के साथ पर्यावरण की जिम्मेदारी जोड़नी होगी।

देशभर के मंदिर भी पहल कर सकते हैं। हर जन्माष्टमी पर एक पेड़ लगाया जा सकता है। कोई तालाब साफ किया जा सकता है। प्लास्टिक कम किया जा सकता है। पशु कल्याण के लिए सहयोग किया जा सकता है।

यही भक्ति को कर्म में बदलना होगा।

कृष्ण हमारे लिए राधा के प्रियतम हैं। वे यशोदा के नटखट कन्हैया हैं। वे गोपाल हैं, गोविंद हैं, कालिया के संहारक हैं और गोवर्धन उठाने वाले हैं। वे अर्जुन के सारथी और गीता के महान उपदेशक भी हैं।

लेकिन आज हमें एक और कृष्ण को याद करना चाहिए, 

पेड़ों के मित्र, गायों के रक्षक, गोवर्धन के संरक्षक और यमुना के प्रियतम कृष्ण।

जन्माष्टमी की भव्यता जरूरी है। यह हमारी संस्कृति और आस्था को जीवित रखती है। लेकिन असली जन्माष्टमी आधी रात के बाद शुरू होनी चाहिए।

अगली सुबह एक साफ नदी हो।

एक हरा-भरा उपवन हो।

एक स्वस्थ गाय हो।

एक सुरक्षित पहाड़ी हो।

और एक ऐसा मनुष्य हो, जो प्रकृति की जिम्मेदारी समझता हो।

अगर कृष्ण हर जीव में हैं, तो प्रकृति की रक्षा केवल पर्यावरण सेवा नहीं है।

वह भक्ति है।

इस जन्माष्टमी कृष्ण को यही सबसे सुंदर शुभकामना हो सकती है, 

जय श्रीकृष्ण!

और यमुना को जीने दो।



Wednesday, September 2, 2026

 यमुना रिवर कनेक्ट : एक नदी को संरक्षित रखने की जिद  

__________________

बृज खंडेलवाल  द्वारा 

4 सितंबर 2026  

_______________________

ताजमहल आगरा की पहचान है, लेकिन यमुना उसकी आत्मा है। पिछले एक दशक से अधिक समय से रिवर कनेक्ट अभियान इसी भूली हुई नदी को शहर की चेतना में वापस लाने की कोशिश कर रहा है।  

2014-15 में शुरू हुई यह नागरिक मुहिम महज सफाई अभियान नहीं थी। इसका असली मकसद था लोगों को यमुना से फिर जोड़ना। इसके लिए आरती हुई, श्रमदान हुए, पदयात्राएं निकलीं, हवन हुए, हस्ताक्षर अभियान चले और कभी-कभी विरोध का तरीका इतना अनोखा रहा कि राष्ट्रीय मीडिया का भी ध्यान खींच गया।  

आरती से आंदोलन तक  

एत्माद-उद-दौला व्यू पॉइंट पर शुरू हुई दैनिक यमुना आरती इस अभियान की सबसे स्थायी पहचान बन गई। 2015 से हर शाम बड़ी संख्या में लोग आरती के लिए जुटने लगे। अभियान के सदस्य गोस्वामी नंदन श्रोत्रिय बताते हैं कि श्रद्धालुओं और कार्यकर्ताओं की संख्या लगातार बढ़ती गई।  

लेकिन यह आरती सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं थी। आरती के बाद यमुना की हालत, प्रदूषण, कचरा, पानी की कमी और सरकारी वादों पर चर्चा होती थी। एनडीटीवी स्वच्छ इंडिया ने भी अभियान की दैनिक आरती और रविवार के सफाई अभियानों को प्रमुखता दी। इन सफाई अभियानों में आमतौर पर 30-40 स्वयंसेवक आते थे और कई बार संख्या सौ से ऊपर पहुंच जाती थी।  

रिवर कनेक्ट का दर्शन साफ था; पहले लोगों को नदी तक वापस लाओ, फिर नदी बचाने की लड़ाई को जन आंदोलन बनाओ।  

जब पानी नहीं था, हुआ रेत स्नान  

मई 2016 में अभियान ने ऐसा प्रदर्शन किया जिसे लंबे समय तक याद रखा गया। कार्यकर्ताओं ने यमुना किनारे रेत स्नान किया। पानी की जगह शरीर पर नदी की सूखी रेत मलकर उन्होंने एक असहज सवाल खड़ा किया: जब नदी में पानी ही नहीं है, तो स्नान कैसे होगा? उन्होंने याद दिलाया कि यमुना का जल संकट हर चुनाव में मुद्दा बनता है, लेकिन चुनाव खत्म होते ही मुद्दा भी गायब हो जाता है।  

गंगा दशहरा पर भी इसी तरह का प्रदर्शन हुआ। आईएएनएस ने इसे “रॉयल सैंड बाथ” के रूप में रिपोर्ट किया। संदेश सीधा था: यमुना को सिर्फ भाषण नहीं, पानी चाहिए।  

कागज की नावों में डूबे सरकारी वादे  

सरकारी वादों पर व्यंग्य करना भी अभियान की खास शैली रही। दिल्ली-आगरा जल परिवहन के वादे की याद दिलाने के लिए कार्यकर्ताओं ने यमुना में कागज और थर्मोकोल की नावें उतारीं।  

द इंडियन एक्सप्रेस ने 2017 में रिपोर्ट किया कि ये नावें ताजमहल की ओर कुछ दूर जाकर डूब गईं। दृश्य अपने आप में पूरा व्यंग्य था: नावें चलाने की तैयारी थी, लेकिन नदी चलने लायक नहीं थी।  

इसी दौरान अभियान ने निर्बाध जलप्रवाह, नदी की सफाई, बाढ़ क्षेत्र की सुरक्षा, राष्ट्रीय नदी नीति और केंद्रीय नदी प्राधिकरण की मांग भी उठाई।  

सफाई से आगे की लड़ाई  

रविवार के सफाई अभियानों में स्वयंसेवकों ने प्लास्टिक, पॉलीथिन, मूर्तियां, कचरा और निर्माण मलबा हटाया। मगर रिवर कनेक्ट ने हमेशा कहा कि नदी किनारे झाड़ू लगाने भर से नदी जीवित नहीं होगी।  

अभियान की असली मांगें कहीं ज्यादा व्यापक हैं: नालों को टैप करना, सीवेज का उपचार, नदी तल की गाद निकालना, ड्रेजिंग, बाढ़ क्षेत्र से अतिक्रमण हटाना और पूरे साल न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह सुनिश्चित करना।  

2023 के विश्व जल दिवस पर सफाई और आरती के साथ इन मांगों को फिर उठाया गया। 2025 में नगर निगम के साथ संयुक्त सफाई अभियानों में स्कूली बच्चे, नागरिक और अधिकारी शामिल हुए। एक बड़े अभियान में करीब 25 ट्रैक्टर-ट्रॉलियां कचरे से भरी गईं।  

झुनझुना दिवस : जब आंदोलन ने व्यंग्य का सहारा लिया  

दिसंबर 2021 में रिवर कनेक्ट ने ‘झुनझुना दिवस’ मनाया। कार्यकर्ताओं ने पांच मिनट तक झुनझुने बजाकर जनप्रतिनिधियों की कथित निष्क्रियता के खिलाफ विरोध जताया।  

बृज खंडेलवाल ने जनप्रतिनिधियों पर यमुना के प्रति उदासीनता का आरोप लगाया। डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य ने व्यंग्य में कहा कि यमुना पहले भी गंदी थी, आज भी गंदी है और जनप्रतिनिधियों की कृपा रही तो आगे भी गंदी रहेगी।  

यह आंदोलन की शैली का नमूना था; जब ज्ञापन बेअसर हों, तो झुनझुना बजाकर सत्ता को जगाओ।  

यमुना केवल नदी नहीं, विरासत है  

रिवर कनेक्ट ने लगातार कहा है कि यमुना का सवाल सिर्फ पर्यावरण का सवाल नहीं है। यह आगरा की विरासत, पर्यटन और अर्थव्यवस्था का भी सवाल है।  

ताजमहल, आगरा किला और कई ऐतिहासिक स्मारक यमुना के किनारे खड़े हैं। द इंडियन एक्सप्रेस ने भी यमुना के प्रदूषण और ताजमहल की सुरक्षा के बीच संबंध को रेखांकित किया है।  

अभियान का सवाल सरल है; अगर ताजमहल के आसपास का संगमरमर बचाया जा सकता है, तो उसके पीछे की नदी क्यों नहीं?  

बारह साल बाद भी मांगें वही  

रिवर कनेक्ट की प्रमुख मांगों में ताजमहल के नीचे बैराज, सालभर न्यूनतम जलप्रवाह, ड्रेजिंग और डी-सिल्टिंग, नालों का टैपिंग, सीवेज ट्रीटमेंट, बाढ़ क्षेत्र से अतिक्रमण हटाना, घाटों का पुनरुद्धार और प्रदूषण फैलाने वालों पर कार्रवाई शामिल हैं।  

इसके साथ अभियान लंबे समय से राष्ट्रीय नदी नीति और केंद्रीय नदी प्राधिकरण की मांग करता रहा है। तर्क है कि नदी प्रशासनिक सीमाओं को नहीं मानती, इसलिए उसका संरक्षण भी विभागों और राज्यों की सीमाओं में बंटा नहीं रह सकता।  

सबसे बड़ी उपलब्धि : नदी को याद रखना  

रिवर कनेक्ट की उपलब्धि सिर्फ हटाए गए कचरे या आयोजित कार्यक्रमों में नहीं है। उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने आगरा को उसकी नदी याद दिलाई।  

दैनिक आरती ने यमुना को सार्वजनिक जीवन में लौटाया। सफाई अभियानों ने नागरिक भागीदारी पैदा की। रेत स्नान ने पानी की त्रासदी दिखाई। कागज की नावों ने सरकारी वादों का मजाक उड़ाया। झुनझुना दिवस ने राजनीतिक उदासीनता पर चोट की।  

सरकारें बदलती रहीं। योजनाएं आती रहीं। समितियां बनती रहीं। घोषणाएं होती रहीं। लेकिन यमुना आज भी पानी और प्रवाह के लिए तरस रही है।  

फिर भी उसकी शामें पूरी तरह अंधेरी नहीं हैं। एत्माद-उद-दौला के किनारे हर शाम जलते दीप एक सवाल उठाते हैं: क्या ताजमहल को बचाकर उसकी नदी को मरने दिया जा सकता है?  

रिवर कनेक्ट का जवाब है: नहीं।  

यमुना को सिर्फ साफ नहीं करना है। उसे फिर से जीवित, अविरल, निर्मल और सम्मानित नदी बनाना है।