Thursday, October 22, 2026

 


भारत के लिए सबक: SIR में तेजी लाएं, UCC जरूरी, मजहबी कट्टरता पर लगाम लगे!

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बृज खंडेलवाल द्वारा

22 अक्टूबर 2026

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यूरोप की सड़कों पर उठता धुआँ क्या भारत के लिए खतरे की घंटी है? पेरिस से लेकर दूसरे यूरोपीय शहरों तक हिंसक विरोध, आगजनी और लूटपाट ने हुक्मरानों की नींद उड़ा दी है। 

आव्रजन, पहचान और समाज में घुलने-मिलने के सवाल भी सियासत के केंद्र में हैं। यूरोप की यह बेचैनी भारत के लिए एक सबक है। समस्याओं को वक्त रहते सुलझाना समझदारी है। उन्हें कालीन के नीचे छिपाना, मुसीबत को न्योता देना है।

जब सरकारें कानून लागू करने, अवैध घुसपैठ रोकने और समाज में भरोसा कायम करने से कतराती हैं, तो छोटी दरारें बड़ी खाई बन जाती हैं।

SIR: वोटर लिस्ट साफ होगी, तभी लोकतंत्र मजबूत होगा

मोदी सरकार की मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR की पहल इसी संदर्भ में अहम है। लोकतंत्र की बुनियाद साफ है। हर पात्र नागरिक को वोट देने का हक मिले। किसी गैर-नागरिक का नाम मतदाता सूची में नहीं होना चाहिए।

अगर विदेशी नागरिक मतदाता सूची में शामिल हो जाते हैं, तो असली नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकार प्रभावित होते हैं। चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं। मतदाता सूची की विश्वसनीयता घटती है। नागरिकता और मतदान के बीच रिश्ता कमजोर पड़ता है।

भारत की लंबी सीमाएँ हैं। कुछ इलाकों में अवैध घुसपैठ की शिकायतें पुरानी हैं। खासकर सीमावर्ती राज्यों में इस सवाल को गंभीरता से देखना जरूरी है। जमीन, रोजगार, सरकारी सुविधाओं और स्थानीय राजनीति पर इसके असर की जाँच होनी चाहिए। आँखें मूँद लेने से समस्या खत्म नहीं होती।

दोहराने की जरूरत नहीं है। SIR में पारदर्शिता होनी चाहिए। लोगों को अपनी नागरिकता और पहचान साबित करने का उचित मौका मिले। गरीबों, बुजुर्गों, मजदूरों और दूर-दराज के इलाकों में रहने वालों को कागजों के नाम पर परेशान नहीं किया जाना चाहिए। गलत नाम हटाने की प्रक्रिया साफ हो। हर प्रभावित व्यक्ति को सुनवाई और अपील का मौका मिले।मकसद साफ होना चाहिए। मतदाता सूची दुरुस्त हो, नागरिकों की पहचान पुख्ता हो और हर पात्र वोटर का हक सुरक्षित रहे। यही लोकतंत्र की असली पहरेदारी है।


अब बात समान नागरिक संहिता यानी UCC की। भारत अनेक धर्मों, भाषाओं और परंपराओं वाला मुल्क है। यही उसकी खूबसूरती है। मगर विविधता के नाम पर भेदभाव को हमेशा ढोते रहना भी जरूरी नहीं।

संविधान का अनुच्छेद 44 राज्य को समान नागरिक संहिता की दिशा में प्रयास करने का निर्देश देता है। सवाल है कि शादी, तलाक, विरासत और पारिवारिक अधिकारों जैसे मामलों में समानता का रास्ता कब साफ होगा?

किसी महिला को सिर्फ उसके मजहब या परिवार की परंपरा के कारण बराबरी से वंचित क्यों रखा जाए? इंसाफ का तराजू सबके लिए एक जैसा होना चाहिए। किसी धर्म या समुदाय को संविधान से ऊपर नहीं माना जा सकता।

एक देश, बराबर अधिकार। न किसी को खास रियायत, न किसी के साथ नाइंसाफी।

यही संवैधानिक रास्ता है। यही आधुनिक भारत की जरूरत भी है।


यूरोप की उथल-पुथल को कुछ विचारक सभ्यताओं के टकराव के रूप में देखते हैं। उनके मुताबिक, एक तरफ आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्य हैं, तो दूसरी तरफ कुछ कट्टरपंथी विचारधाराएँ हैं, जो मजहबी नियमों को सर्वोपरि मानती हैं।

असली सवाल यह है कि कौन संविधान और कानून का सम्मान करता है, और कौन मजहब के नाम पर दूसरों पर अपनी मर्जी थोपना चाहता है।

भारत को हर तरह की मजहबी कट्टरता, सांप्रदायिक नफरत और हिंसक राजनीति के खिलाफ सख्त रुख अपनाना चाहिए। किसी को भी कानून हाथ में लेने, दूसरों को धमकाने या धार्मिक सत्ता को संविधान से ऊपर रखने की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए।

कानून का डंडा सबके लिए बराबर चले। चुनिंदा लोगों पर सख्ती और अपने लोगों को छूट, इस दोहरे रवैये से समाज नहीं जुड़ता।

यूरोप का अनुभव बताता है कि कमजोर सीमा प्रबंधन, एकीकरण की नाकामी और राजनीतिक ढुलमुलपन समय के साथ बड़ी समस्याएँ पैदा कर सकते हैं। भारत को इनसे सबक लेना चाहिए।

सीमाओं की निगरानी मजबूत हो। अवैध घुसपैठ की निष्पक्ष जाँच हो। नागरिकता की पुष्टि कानून के मुताबिक हो। मतदाता सूचियाँ दुरुस्त रहें। समान नागरिक संहिता पर गंभीरता से आगे बढ़ा जाए।

लेकिन सरकार को यह भी याद रखना होगा कि प्रशासनिक कार्रवाई राजनीतिक ध्रुवीकरण का हथियार नहीं बननी चाहिए। हर नागरिक को इज्जत, निष्पक्ष सुनवाई और कानून का संरक्षण मिलना चाहिए।

भारत की ताकत उसकी विविधता में है। जरूरत इस बात की है कि इस विविधता को संविधान के साझा धागे में पिरोया जाए।

यूरोप से मिलने वाला संदेश साफ है। साझा नियमों के बिना सामाजिक एकता नहीं टिकती, और जनता के भरोसे के बिना लोकतंत्र मजबूत नहीं होता।

भारत को तेजी से कदम उठाने होंगे, मगर पूरी समझदारी के साथ। मजबूत सीमाएँ, साफ मतदाता सूचियाँ, समान नागरिक अधिकार और सांप्रदायिकता पर सख्त लगाम एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।


Tuesday, October 20, 2026

 यूरोप की सड़कों पर बगावत: मजहबी असंतोष या एकीकरण की नाकामी?

अमेरिका से यूरोप तक आव्रजन के खिलाफ बढ़ता गुस्सा, दक्षिणपंथी ताकतें सख्त कार्रवाई के लिए बना रहीं दबाव

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बृज खंडेलवाल द्वारा

21 अक्टूबर 2026

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यूरोप की सड़कों पर उठता धुआँ अब सिर्फ महँगाई, बेरोजगारी या बदहाल शिक्षा व्यवस्था का सवाल नहीं रह गया है। फ्रांस से बेल्जियम तक हिंसक प्रदर्शनों में मुस्लिम पृष्ठभूमि के कुछ युवाओं की भागीदारी ने आव्रजन, मजहबी पहचान और सामाजिक एकीकरण पर नई बहस छेड़ दी है। पुलिस पर हमले, आगजनी और लूटपाट ने मेजबान समाज के साथ बढ़ते टकराव की चिंता गहरा दी है। सवाल है कि यूरोप की बहुसांस्कृतिक नीति कहाँ चूकी? क्या यह मजहबी असंतोष का नतीजा है या एकीकरण की नाकामी का? और इस टकराव का समाधान क्या है?

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पश्चिमी सभ्यता की चमक पर अब खरोंचें नजर आने लगी हैं। अमेरिका से ब्रिटेन, फ्रांस, इटली और जर्मनी तक आव्रजन का मुद्दा बारूद के ढेर पर बैठा है। बहस अब सीमाओं और शरणार्थियों तक सीमित नहीं रही। यह मोहल्लों, बाजारों, चुनावी सभाओं और आम बातचीत का हिस्सा बन चुकी है। समाज का एक बड़ा वर्ग चाहता है कि सरकारें सख्त कदम उठाएँ और कानून का इकबाल बुलंद करें।

हाल की यूरोप यात्रा के दौरान मुझे इस बदलते माहौल की झलक खुद देखने को मिली। वेनिस और कुछ दूसरे शहरों में स्थानीय लोगों से बातचीत हुई। उनकी बातों में ऐसी बेचैनी दिखाई दी, जो पर्यटन के चमकदार विज्ञापनों में नजर नहीं आती। आव्रजन उनके लिए महज राजनीतिक मुद्दा नहीं था। इसका रिश्ता रोजगार, मकान, सांस्कृतिक पहचान और अपने समाज के भविष्य से जुड़ गया है।

कुछ जगहों पर बांग्लादेशियों के बारे में बेहद अपमानजनक टिप्पणियाँ भी सुनने को मिलीं। उनके प्रति तिरस्कार और घृणा खुलकर सामने आई। लेकिन इस गुस्से के पीछे छिपी बेचैनी को नजरअंदाज करना भी समझदारी नहीं होगी। 

पश्चिम आज पहचान के संकट से जूझ रहा है। आव्रजन इस टकराव का सबसे दिखाई देने वाला मैदान बन गया है। सवाल उठ रहा है कि क्या सरकारें बदलते सामाजिक हालात को समझने में नाकाम रही हैं? क्या विविधता और समावेश के नारों के बीच एकीकरण की बुनियादी जरूरतें पीछे छूट गईं?

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप ने सीमा सुरक्षा और निर्वासन को अपनी राजनीति का प्रमुख हथियार बनाया है। उनके समर्थकों का तर्क है कि अनियंत्रित आव्रजन राष्ट्रीय संप्रभुता को कमजोर करता है, सार्वजनिक सेवाओं पर दबाव बढ़ाता है और स्थानीय नागरिकों के हित प्रभावित करता है। दूसरी ओर, विरोधियों को डर है कि अंधाधुंध कार्रवाई से परिवार बिछड़ेंगे और निर्दोष लोगों के अधिकार कुचले जाएंगे।

ब्रिटेन में भी ऐसी ही हवा बह रही है। रिफॉर्म यूके और रूपर्ट लोवे की रिस्टोर ब्रिटेन पार्टी आव्रजन को लेकर जनता की नाराजगी को राजनीतिक आवाज दे रही हैं। लोवे सीमाओं पर सख्ती और निर्वासन की व्यापक व्यवस्था के समर्थक हैं। उनके विचारों में मानवाधिकारों और शरणार्थियों से जुड़े मौजूदा कानूनी ढाँचे में बड़े बदलाव की मांग भी शामिल है।

यह राजनीति पश्चिम में बदलते मिजाज का संकेत है। कल तक दक्षिणपंथी चरमपंथियों की मांग समझे जाने वाले विचार आज मुख्यधारा की बहस में जगह बना रहे हैं। जो सरकारें कभी विविधता और समावेश की दुहाई देती थीं, उनसे अब पूछा जा रहा है कि सीमाओं का मतलब क्या है, कानून का पालन कौन कराएगा और नागरिकों की चिंताओं का जवाब कौन देगा?

लेकिन आखिर यह बदलाव क्यों आया?

इसके पीछे कई कारण हैं। मकानों की कमी, महँगी जिंदगी, सार्वजनिक सेवाओं पर बढ़ता दबाव और रोजगार की चिंता ने लोगों को परेशान किया है। कुछ इलाकों में तेजी से बदलती आबादी के कारण भाषा, रीति-रिवाज और सामाजिक तालमेल को लेकर भी बेचैनी पैदा हुई है। आतंकवादी हमलों और धार्मिक कट्टरपंथ की घटनाओं ने इन आशंकाओं को और हवा दी है।

दक्षिणपंथी नेताओं का आरोप है कि सरकारें अपने नागरिकों की परेशानियों से ज्यादा नए आने वालों की जरूरतों पर ध्यान देती हैं। उनके मुताबिक, उदारवादी नीतियों ने ऐसी समस्याएँ पैदा की हैं, जिनका खामियाजा आम लोगों को भुगतना पड़ रहा है।

लेकिन आव्रजन को हर सामाजिक समस्या का जिम्मेदार ठहराना भी गलत होगा। प्रवासी कोई एक जैसा समूह नहीं हैं। 

इसी तरह, आव्रजन की हर आलोचना को नस्लभेद बताकर खारिज करना भी उचित नहीं है। नागरिकों को यह पूछने का पूरा हक है कि उनका देश कितने नए लोगों को बसा सकता है, किस तरह के कामगारों की जरूरत है, शरण के दावों की जाँच कैसे होगी और अवैध रूप से रह रहे लोगों के मामलों का निपटारा कब किया जाएगा।

नए आने वालों से यह अपेक्षा भी जायज है कि वे मेजबान देश के कानूनों, भाषा और बुनियादी लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करें। महिलाओं की समानता, धार्मिक स्वतंत्रता और दूसरे समुदायों के प्रति सहिष्णुता किसी एक मजहब या संस्कृति की जागीर नहीं हैं। ये लोकतांत्रिक समाज की बुनियादी शर्तें हैं।

यूरोप के मौजूदा संकट में मजहबी पहचान का पहलू भी बहस के केंद्र में है। कुछ हिंसक घटनाओं में मुस्लिम पृष्ठभूमि के युवाओं की भागीदारी पर सवाल उठना स्वाभाविक है। लेकिन कुछ लोगों के व्यवहार को पूरे मुस्लिम समुदाय का चरित्र मान लेना गंभीर भूल होगी। हर हिंसक प्रदर्शन को मजहबी असंतोष का नतीजा बताना भी तथ्यों से आगे निकलना होगा। आर्थिक नाराजगी, भेदभाव, कट्टरपंथ और स्थानीय तनाव जैसी वजहें अलग-अलग घटनाओं में भूमिका निभा सकती हैं। निष्कर्ष सबूतों के आधार पर ही निकाले जाने चाहिए।

असली चुनौती जायज शिकायतों और सामूहिक नफरत के बीच स्पष्ट लकीर खींचने की है। सरकारों को न तो हिंसा के सामने घुटने टेकने चाहिए और न ही पूरे समुदायों को शक के कठघरे में खड़ा करना चाहिए। कानून सबके लिए बराबर हो, यही लोकतंत्र की असली कसौटी है।

प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं, "पश्चिमी सरकारों को कानून लागू करने होंगे। अवैध प्रवेश पर नियंत्रण करना होगा। शरण के दावों का समय पर निपटारा करना होगा। जिन लोगों को देश में रहने का कानूनी अधिकार नहीं है, उन्हें लागू कानूनों और जरूरी सुरक्षा प्रावधानों के तहत वापस भेजना होगा। आने वाले साल यूरोप की लोकतांत्रिक सोच और सामाजिक एकता की परीक्षा लेंगे।"

तूफान अभी थमा नहीं है। यह संकट समझदारी भरे सुधारों का रास्ता खोलेगा या समाज में गहरी दरारें पैदा करेगा, इसका फैसला नेताओं के कदम और आम लोगों की सोच करेगी। सरकारों को सख्ती और इंसानियत के बीच संतुलन बनाना होगा। आव्रजन पर नियंत्रण जरूरी हो सकता है, लेकिन नफरत को नीति बनाना किसी समस्या का समाधान नहीं है।

यूरोप अब आँखें मूँदकर नहीं बैठ सकता। उसे अपनी नीतियों की कमियों को स्वीकारना होगा, एकीकरण की प्रक्रिया मजबूत करनी होगी और कानून का राज कायम रखना होगा। मगर अपनी पहचान बचाने की कोशिश में उसे अपनी इंसानियत भी नहीं खोनी चाहिए।


Monday, October 19, 2026

 ट्रंप: धमकियों का बादशाह, यू-टर्न का उस्ताद!

नोबेल पुरस्कार मिलना चाहिए थूक कर चाटने की कला के लिए!

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

20 अक्टूबर 2026

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जब से बड़बोले डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में दोबारा डेरा जमाया है, दुनिया की शामत आई हुई है। लगता है, तीसरा विश्व युद्ध बस ट्रंप की अगली पोस्ट का इंतज़ार कर रहा है। अब तक तीन-चार बार दुनिया बारूद के ढेर पर बैठते-बैठते बची है। ट्रंप की जुबान मिसाइल है, दिमाग मौसम विभाग और फैसले ऐसे कि सुबह का शेर शाम को भीगी बिल्ली बन जाए।

इरादा था चीन की हेकड़ी निकालने का, उत्तर कोरिया के तानाशाह किम को घुटनों पर लाने का, ईरान को मिट्टी में मिलाने का और भारत की किश्ती को मझधार में डुबोने का। जेलेंस्की को दुनिया के सामने बेइज्जत करके यूक्रेन को रूस के सामने नाक रगड़वाने का सपना भी देखा। कनाडा को निगलने और ग्रीनलैंड पर कब्जे की हसरत भी पाल ली। नोबेल शांति पुरस्कार तो ऐसे चाहिए था, मानो दुनिया की सारी जंगें रोकने का ठेका अकेले इन्हीं ने ले रखा हो!

लेकिन  न चीन झुका, न किम सुधरा, न ईरान गायब हुआ, न रूस ने ट्रंप के इशारे पर नाचना शुरू किया। कनाडा अपनी जगह खड़ा है, ग्रीनलैंड बिकने को तैयार नहीं और नोबेल पुरस्कार भी दूर से ठेंगा दिखाता रहा। 

हर बार धमकी का पहाड़ खड़ा होता है, फिर समझौते का चूहा निकलता है। पहले आंखें लाल, फिर तेवर ढीले; पहले दुनिया को सबक सिखाने का ऐलान, फिर खुद सफाई देने की नौबत। 

न पूरब बदला, न पश्चिम। बदली है तो सिर्फ अमेरिका की साख, जिसकी किरकिरी अब दुनिया भर में हो रही है। ट्रंप हर बार इतिहास बनाने निकलते हैं, मगर सुर्खियों में अपनी ही फजीहत का नया अध्याय जोड़ आते हैं। 

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दुनिया को डराते हैं, फिर खुद ही पीछे हट जाते हैं। टैरिफ से रूस तक, अमेरिकी राष्ट्रपति की सियासत में कब क्या होगा, कोई नहीं जानता।

सुबह दुनिया को धमकी, शाम को समझौते की पेशकश! कभी व्यापार युद्ध का ऐलान, कभी दुश्मनों को सबक सिखाने की हुंकार। कभी दोस्तों पर पाबंदियां, तो कभी उन्हीं को राहत। डोनाल्ड ट्रंप की सियासत का यही रंग है। पहले धमाका करो, फिर नुकसान का हिसाब लगाओ। बात बिगड़ने लगे, तो पलटी मारकर उसे अपनी शानदार जीत बता दो!

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने राजनीति में यू-टर्न को एक नई कला बना दिया है। उनकी जुबान पर सख्ती रहती है, लेकिन फैसलों में अक्सर नरमी दिखाई देती है। उनकी धमकियों से दुनिया कांपती है, बाजारों में हलचल मचती है और सरकारें बेचैन हो जाती हैं। लेकिन कुछ समय बाद वही ट्रंप समझौते की मेज पर बैठे नजर आते हैं।

उनका हर ऐलान अंतिम फैसला नहीं होता। हर धमकी कार्रवाई में नहीं बदलती। और हर घोषित जीत वास्तव में जीत हो, यह भी जरूरी नहीं!

2 अप्रैल 2025 को ट्रंप ने दुनिया के सामने अपने टैरिफ अभियान को 'लिबरेशन डे' का नाम दिया। उन्होंने कई देशों पर भारी आयात शुल्क लगाने का ऐलान किया। उनका दावा था कि अमेरिका को दूसरे देशों ने व्यापार में खूब लूटा है। अब हिसाब बराबर करने का समय आ गया है।

ऐलान इतना आक्रामक था कि दुनिया भर के बाजारों में बेचैनी फैल गई। कारोबारियों को डर सताने लगा कि महंगे आयात, जवाबी शुल्क और व्यापार युद्ध से उनका कारोबार चौपट हो सकता है।

लेकिन 9 अप्रैल को कहानी में नया मोड़ आ गया। ट्रंप ने चीन को छोड़कर कई देशों पर लगाए गए नए शुल्कों में 90 दिनों की रोक लगा दी। सामान्य 10 प्रतिशत शुल्क जारी रहा, जबकि चीन के खिलाफ सख्ती और बढ़ाई गई। बाद में बातचीत के दौरान कई फैसलों में फिर बदलाव हुए।

जिस अभियान को ऐतिहासिक आर्थिक क्रांति बताया गया था, उसमें इतनी जल्दी बदलाव क्यों आया? शायद बाजारों की प्रतिक्रिया, कारोबारियों की चिंता और अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर संभावित असर ने हकीकत का आईना दिखा दिया।

भारत के मामले में भी ट्रंप की नीति में उतार-चढ़ाव दिखाई दिया। रूस से तेल खरीदने को लेकर उन्होंने भारत पर दबाव बनाया। भारतीय सामान पर शुल्क बढ़ाए गए और रूस से तेल खरीदने के कारण अतिरिक्त 25 प्रतिशत शुल्क भी लगाया गया।

वाशिंगटन का संदेश साफ था। रूस से तेल खरीदना जारी रखा, तो भारत को आर्थिक कीमत चुकानी पड़ सकती है। ट्रंप की इस सख्ती से भारतीय निर्यातकों की चिंता बढ़ी।

फिर फरवरी 2026 में तस्वीर बदलने लगी। अमेरिका ने भारत के साथ अंतरिम व्यापार समझौते की रूपरेखा घोषित की। इसके तहत रूस से तेल खरीदने से जुड़े अतिरिक्त 25 प्रतिशत शुल्क को हटाने और भारतीय सामान पर जवाबी शुल्क को 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करने की घोषणा की गई।

ट्रंप ने दावा किया कि भारत ने रूसी तेल की खरीद घटाने पर सहमति जताई है। लेकिन व्यापार समझौते के कई पहलुओं पर बातचीत और अनिश्चितता बनी रही।

यहां सवाल समझौते से नहीं, बल्कि उस अंदाज से है जिसमें पहले धमकी दी जाती है और बाद में राहत का ऐलान होता है। 

भारत जैसे बड़े देश के लिए भी यह मामला मामूली नहीं है। अमेरिकी फैसलों का असर निर्यात, रोजगार, निवेश और कारोबार पर पड़ सकता है।

रूस के मामले में तो कहानी और दिलचस्प हो जाती है।  रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर दबाव बनाने के लिए अमेरिका ने सख्त कदमों और भारी शुल्क की धमकियां दीं। भारत समेत कई देशों को चेतावनी मिली कि रूस से ऊर्जा खरीदना महंगा पड़ सकता है।

लेकिन अक्टूबर 2026 में फिर एक नया मोड़ आया। ट्रंप ने राष्ट्रीय हित का हवाला देते हुए संबंधित कानून के तहत अतिरिक्त दंडात्मक शुल्कों से अस्थायी राहत देने का फैसला किया। इससे रूसी ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर तत्काल दबाव कुछ कम हुआ।

इसी दौरान रूसी डीजल की आपूर्ति से जुड़ा अमेरिकी फैसला भी चर्चा में आया। प्रशासन ने ऊर्जा जरूरतों और यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने की कूटनीतिक कोशिशों का हवाला दिया।

अब सवाल उठता है कि जब रूस से ऊर्जा खरीदने पर दूसरों को सजा देने की बात हो रही थी, तो खुद अमेरिका के लिए रूसी ईंधन का रास्ता कैसे खुला?

ट्रंप की परेशानी यही है। उनके ऐलान इतने बड़े होते हैं कि बाद में उनसे पीछे हटना भी बड़ी खबर बन जाता है।

कभी ईरान पर हमले की तैयारी, कभी आखिरी समय पर रोक लगा दी जाती है। 

ट्रंप के यू-टर्न केवल व्यापार तक सीमित नहीं हैं। 2019 में, अपने पहले कार्यकाल के दौरान, उन्होंने अमेरिकी ड्रोन गिराए जाने के बाद ईरान पर जवाबी हमले की मंजूरी दी थी। लेकिन हमला शुरू होने से कुछ मिनट पहले उन्होंने इसे रोक दिया।

ट्रंप ने संभावित जनहानि का हवाला दिया। यह फैसला बड़े युद्ध को टालने के लिहाज से समझदारी भरा हो सकता था।

इसी तरह नाटो को लेकर भी उनका रुख बदला। पहले उन्होंने इस सैन्य गठबंधन को अप्रासंगिक बताया, फिर कहा कि अब वह अप्रासंगिक नहीं रहा। हालांकि, सदस्य देशों से रक्षा खर्च बढ़ाने की मांग जारी रही।

टिकटॉक पर भी उनका रुख समय के साथ बदला। पहले उन्होंने इस पर प्रतिबंध लगाने या इसकी बिक्री के लिए दबाव बनाया। बाद में उन्होंने पूर्ण प्रतिबंध के बजाय समयसीमा बढ़ाने और दूसरे विकल्पों पर विचार करने का रास्ता अपनाया।

जब बार-बार बड़ी-बड़ी घोषणाओं के बाद नीति बदलती है, तो नेतृत्व की तैयारी और फैसलों की गंभीरता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

अमेरिका के दोस्त भी अब पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं। किसी देश की ताकत केवल उसके हथियारों, अर्थव्यवस्था या सेना में नहीं होती। उसकी असली ताकत उसके वादों की साख में भी होती है।

मित्र देश वर्षों की योजना बनाते हैं। वे व्यापार समझौते करते हैं, रक्षा सहयोग बढ़ाते हैं और निवेश के फैसले लेते हैं। अगर अमेरिकी नीति कभी सख्त और कभी नरम होती रहे, तो दूसरे देशों के लिए भरोसे के साथ आगे बढ़ना मुश्किल हो जाता है।

आज शुल्क लगाने की धमकी, कल राहत का ऐलान। आज प्रतिबंधों की बात, कल राष्ट्रीय हित का हवाला देकर छूट। ऐसी सियासत में मित्र देश भी हर घोषणा को अंतिम फैसला मानने से पहले कई बार सोचेंगे।

ट्रंप शायद मानते हैं कि अनिश्चितता उनकी सबसे बड़ी ताकत है। इससे विरोधी दबाव में आते हैं और बातचीत की मेज पर झुकने को मजबूर होते हैं। कुछ मौकों पर यह रणनीति काम भी कर सकती है।

लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। बार-बार बदलते फैसले मित्र देशों को नए विकल्प तलाशने के लिए मजबूर कर सकते हैं। अमेरिकी वादों की अहमियत भी घट सकती है।

ट्रंप की राजनीति का एक खास अंदाज है। पहले बयान को इतना आक्रामक बनाओ कि दुनिया का ध्यान खिंच जाए। फिर विरोध और नुकसान सामने आएं, तो समझौते का रास्ता तलाशो। आखिर में पीछे हटने को भी अपनी जीत बताकर पेश कर दो।

यह तरीका सुर्खियां बटोर सकता है। लेकिन क्या इससे दुनिया में भरोसा बढ़ता है? क्या इससे कारोबारियों को स्थिरता मिलती है? और क्या मित्र देशों को अमेरिकी फैसलों पर पूरा यकीन हो पाता है?

ट्रंप की सबसे बड़ी कला शायद यही है कि वह पीछे हटकर भी जीत का दावा कर लेते हैं। लेकिन हर बार दुनिया उनकी इस कला पर तालियां बजाएगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है।

प्रभाव और भरोसा दो अलग चीजें हैं। धमकियों से लोग कुछ समय के लिए झुक सकते हैं, मगर भरोसा केवल स्थिरता और साफ नीयत से बनता है। महाशक्ति का राष्ट्रपति होना बड़ी जिम्मेदारी है। हर बार मुंह की खाने के बाद उसे जीत का नाम देना आसान हो सकता है, लेकिन इतिहास ऐसे दांवों का हिसाब जरूर मांगता है।

Saturday, October 17, 2026

 पत्रकार कौन? 

सुप्रीम कोर्ट ने उठाया अहम सवाल, अब पत्रकारिता को चाहिए पहचान, मर्यादा और जवाबदेही।

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बृज खंडेलवाल द्वारा

17 अक्टूबर 2026

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जब हर हाथ में मोबाइल हो, हर मोबाइल न्यूज़रूम बन जाए और हर सोशल मीडिया वाला खुद को पत्रकार बताने लगे, तो असली पत्रकार की पहचान कौन करेगा? क्या कैमरा उठाना ही काबिलियत है? क्या माइक पकड़कर चिल्लाने से पत्रकारिता आ जाती है? क्या किसी अफसर को धमकाते ही प्रेस की धौंस जमाई जा सकती है? और क्या पत्रकार होने का दावा करते ही खास सुरक्षा और सुविधाओं का पट्टा मिल जाना चाहिए?

सवाल तीखे हैं, मगर वक्त की जरूरत हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने हाल में पत्रकारों की सुरक्षा से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान इसी पेचीदा मुद्दे पर गौर किया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने डिजिटल दौर में पत्रकार की पहचान तय करने की मुश्किलों की ओर इशारा किया।

वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने कहा कि जनहित के मुद्दे उठाने वाले स्वतंत्र पत्रकारों के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए। सरकारी मान्यता न होने से उनकी आवाज कमजोर नहीं पड़नी चाहिए।

दूसरी तरफ, सॉलिसिटर जनरल ने भी जायज सवाल उठाया। आज मोबाइल उठाइए, वीडियो बनाइए और खुद को पत्रकार घोषित कर दीजिए। न डिग्री, न तजुर्बा, न जवाबदेही। बस बन गए पत्रकार!

अदालत ने इस मसले पर विस्तार से विचार करने की जरूरत बताई है। अभी कोई अंतिम परिभाषा तय नहीं हुई है।

लेकिन सवाल अपनी जगह खड़ा है। आखिर पत्रकारिता है क्या?

पत्रकारिता सिर्फ माइक, कैमरा और सोशल मीडिया पोस्ट का खेल नहीं है। इसके लिए जानकारी चाहिए, हुनर चाहिए और तथ्यों की जांच करने का सलीका चाहिए। ईमानदारी, समझ और जनता के प्रति जवाबदेही भी जरूरी हैं।

मोबाइल एक औजार है, योग्यता का प्रमाणपत्र नहीं। ऊंची आवाज हुनर की गारंटी नहीं। और प्रेस कार्ड कोई जादुई छड़ी नहीं, जिसे घुमाते ही सारे नियम खत्म हो जाएं।

अफसोस, आज पत्रकारिता का चेहरा कई जगह बिगड़ता नजर आता है। खबर पीछे छूट रही है, तमाशा आगे निकल रहा है। टीआरपी की दौड़ में सच कई बार दम तोड़ देता है।

जियोस्टार के उपाध्यक्ष उदय शंकर ने भी चिंता जताई है कि पत्रकारिता की पुरानी पहचान खत्म होती जा रही है। न्यूज़रूम अब खबरों की अहमियत से ज्यादा उनकी पहुंच और रेटिंग को तवज्जो देने लगे हैं।

पूर्व संपादक एन. राम भारतीय टीवी समाचार चैनलों की गुणवत्ता पर तीखी टिप्पणी कर चुके हैं। राजदीप सरदेसाई ने भी पत्रकारिता के नैतिक पतन और उसके कारोबारी मॉडल पर सवाल उठाए हैं।

बात कड़वी है, मगर सच से मुंह मोड़ने से क्या फायदा?

पब्लिक कमेंटेटर प्रोफ पारस नाथ चौधरी कहते हैं, "जब खबर की जगह शोर बिकने लगे, सवाल की जगह गाली सुनाई दे और पड़ताल की जगह प्रोपेगेंडा परोसा जाए, तो पेशे की साख पर सवाल उठेंगे ही। पत्रकारिता कोई खुला मेला नहीं, जहां हर ऐरा-गैरा अपनी दुकान सजा ले। मगर यह किसी सरकार की जागीर भी नहीं, जहां सत्ता तय करे कि कौन बोलेगा और कौन चुप रहेगा।"

तो रास्ता क्या है?

भारत को पत्रकारों की पेशेवर पहचान के लिए एक पारदर्शी और भरोसेमंद व्यवस्था बनानी चाहिए। पत्रकारिता या जनसंचार की पढ़ाई, मान्यता प्राप्त संस्थान से डिग्री या डिप्लोमा, काम का अनुभव और किसी मीडिया संस्थान से जुड़ाव उपयोगी आधार हो सकते हैं।

लेकिन डिग्री को ही आखिरी कसौटी बनाना भी गलत होगा। कई अच्छे पत्रकार बिना औपचारिक डिग्री के इस पेशे में आए हैं। उन्होंने अपने काम से पहचान बनाई है। 

प्रिंट मीडिया में लागू पंजीकरण व्यवस्था संस्थानों की पहचान में मदद कर सकती है। लेकिन पंजीकरण भी पत्रकारिता की गुणवत्ता की गारंटी नहीं है। आखिर कागज पर दर्ज नाम और जमीन पर किए गए काम में फर्क होता है।

यूनेस्को का नजरिया इस बहस में अहम है। वह पत्रकारिता के लिए कोई कठोर शैक्षणिक योग्यता, अनिवार्य लाइसेंस या पत्रकारों की तय संख्या निर्धारित नहीं करता। उसका जोर इस बात पर है कि कौन जनहित में जानकारी जुटाता है, तथ्यों की पड़ताल करता है और जनता तक खबर पहुंचाता है।

इसलिए स्वतंत्र पत्रकारों, फ्रीलांसरों, ब्लॉगरों और नागरिक पत्रकारों को एक झटके में खारिज नहीं किया जा सकता। उनका काम, अनुभव और आचरण भी मायने रखते हैं।

खासकर गांवों और दूरदराज के इलाकों में कई पत्रकार बेहद सीमित साधनों के बीच काम करते हैं। न बड़ा दफ्तर, न चमचमाती गाड़ी, न भारी-भरकम पहचान पत्र। फिर भी वे भ्रष्टाचार उजागर करते हैं, सरकारी लापरवाही सामने लाते हैं और उन लोगों की आवाज बनते हैं जिन्हें अक्सर कोई सुनने वाला नहीं मिलता।

कई बार बड़े मीडिया संस्थान जिन खबरों से मुंह फेर लेते हैं, वही खबरें छोटे कस्बों के पत्रकार सामने लाते हैं।

ऐसे पत्रकारों को सिर्फ डिग्री या सरकारी मान्यता के अभाव में खारिज करना अन्याय होगा। असली कसौटी उनका काम, उनकी विश्वसनीयता और उनका आचरण होना चाहिए।

लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि हर किसी को खुली छूट दे दी जाए।

कर्नाटक के एक सीनियर मीडिया प्रशिक्षक बताते हैं, "कुछ लोग पत्रकारिता की आड़ में वसूली करते हैं। व्यापारियों को डराते हैं, अधिकारियों को धमकाते हैं और आम नागरिकों को ब्लैकमेल करते हैं। उनके लिए कैमरा सच दिखाने का जरिया नहीं, दबाव बनाने का हथियार है। ऐसे लोगों से सावधान रहने की जरूरत है। वे पत्रकारिता की इज्जत पर बट्टा लगाते हैं। चंद फर्जी पत्रकार पूरे पेशे को बदनाम कर देते हैं।"

यहां एक बात साफ होनी चाहिए। पत्रकारिता की स्वतंत्रता का मतलब मनमानी नहीं है। अधिकार के साथ जिम्मेदारी भी आती है। सवाल पूछना पत्रकार का हक है, लेकिन किसी को डराकर अपना उल्लू सीधा करना अपराध की श्रेणी में आ सकता है।

इसलिए समाधान सरकारी लाइसेंस बांटने या पत्रकारों पर राजनीतिक शिकंजा कसने में नहीं है। जरूरत ऐसी स्वतंत्र व्यवस्था की है, जो पेशेवर पहचान, रिपोर्टिंग के अधिकार और विशेष सुविधाओं के बीच फर्क समझे। प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया इसमें पहल करे। वकील, डॉक्टर, चार्टर्ड अकाउंटेंट्स, अन्य पेशेवर लोग, कहीं न कहीं पंजीकृत होते हैं, प्रैक्टिस करने का लाइसेंस मिलता है, तो फिर मीडिया के लोगों को ये व्यवस्था लागू नहीं की जा सकती, कुछ तो पेशेवर मापदंड होने ही चाहिए। 

आचार संहिता हो। शिकायतों की निष्पक्ष जांच हो। गलत काम साबित होने पर उचित कार्रवाई हो। लेकिन किसी पत्रकार की पहचान केवल इसलिए न छीनी जाए कि उसकी खबर सरकार या किसी ताकतवर व्यक्ति को पसंद नहीं आई।

आखिर लोकतंत्र में पत्रकार का काम सत्ता की तारीफ में कसीदे पढ़ना नहीं है। उसका काम सवाल पूछना है। जरूरत पड़ने पर असुविधाजनक सच सामने लाना है।

सरकार पत्रकार तय करने बैठेगी, तो कल खबरों की जगह फरमान छपेंगे।

बोलने का अधिकार हर नागरिक को है। जनहित में जानकारी जुटाने और उसे लोगों तक पहुंचाने की आजादी भी जरूरी है। लेकिन विशेष पेशेवर पहचान और उससे जुड़ी सुविधाओं के लिए विश्वसनीय काम, अनुभव और जिम्मेदारी की कसौटी होनी चाहिए।

Friday, October 16, 2026

 मस्क के स्टारलिंक पर भारत की हिचकिचाहट: देर से सही, समझदारी तो है!

यूक्रेन का तजुर्बा बता रहा है कि मुल्क की हिफाजत की चाबी किसी विदेशी कंपनी के हाथ में नहीं दी जा सकती

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बृज खंडेलवाल द्वारा

18 अक्टूबर 2026

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यूक्रेन ने साबित कर दिया है कि एक विदेशी निजी कंपनी के सैटेलाइट नेटवर्क पर निर्भरता राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बन सकती है। युद्ध के बीच स्टारलिंक की सेवा पर अचानक पाबंदी से यूक्रेन के सैन्य संचार और ड्रोन अभियान बाधित हुए। भारत का संयम दुश्मनी नहीं, बल्कि संप्रभुता, आत्मनिर्भरता और सीमांत सुरक्षा की अनिवार्य शर्त है।

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क्या भारत को एलन मस्क के लिए अपने दरवाजे बिना सोचे-समझे खोल देने चाहिए? क्या तेज इंटरनेट की चमक-दमक में हम अपनी हिफाजत, सरहदों की सुरक्षा और मुल्क की खुदमुख्तारी को दांव पर लगा सकते हैं? और अगर कल किसी जंग के दौरान कोई विदेशी कंपनी हमारी संचार व्यवस्था पर पाबंदी लगा दे, तो हम क्या करेंगे?

ये सवाल आज इसलिए अहम हो गए हैं, क्योंकि यूक्रेन में हाल की घटनाओं ने दुनिया को एक कड़ा सबक दिया है। भारत में स्टारलिंक को मंजूरी देने में सरकार की देरी और एहतियात पर सवाल उठाने वालों को अब समझना चाहिए कि हर देरी नाकामी नहीं होती। कभी-कभी जल्दबाजी से बचना ही सबसे बड़ी समझदारी होती है।


एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स का स्टारलिंक सैटेलाइट इंटरनेट आज की दुनिया की एक बड़ी तकनीकी कामयाबी है। आसमान में धरती के करीब चक्कर लगाने वाले हजारों छोटे उपग्रहों की मदद से दूर-दराज के इलाकों में भी इंटरनेट पहुंचाया जा सकता है। जहां मोबाइल नेटवर्क नहीं पहुंचता, वहां भी इसकी मदद से संपर्क कायम रखा जा सकता है।

यूरोपीय मामलों के जानकार प्रोफेसर पी एन चौधरी के मुताबिक, "यूक्रेन की जंग में स्टारलिंक ने बड़ी भूमिका निभाई है। रूसी हमलों के बीच यूक्रेनी सेना ने इसका इस्तेमाल सैनिकों के बीच संपर्क, रसद और ड्रोन चलाने के लिए किया। लेकिन अब इसी निर्भरता ने एक नई चिंता पैदा कर दी है।

अक्टूबर 2026 के मध्य में आई खबरों के मुताबिक, यूक्रेन के सैन्य संचार तंत्र से जुड़े स्टारशील्ड नेटवर्क पर गति संबंधी पाबंदियों के कारण कुछ तेज रफ्तार ड्रोनों के संचालन में मुश्किलें आईं। इससे रूसी ड्रोन और दूसरे हवाई खतरों को रोकने वाले कुछ अभियानों पर भी असर पड़ने की खबरें सामने आईं। बाद में संपर्क व्यवस्था बहाल होने की खबर आई।"

इन पाबंदियों के पीछे किसका फैसला था और पूरा मामला क्या था, इस पर अलग-अलग दावे हैं। एलन मस्क का कहना है कि सैन्य इस्तेमाल वाला स्टारशील्ड अमेरिकी सरकार के नियंत्रण में है और उसके संचालन से जुड़े फैसले अमेरिकी अधिकारी लेते हैं।

लेकिन यहां असली सवाल मस्क या वाशिंगटन के बीच जिम्मेदारी तय करने का नहीं है। सवाल यह है कि जब किसी मुल्क की सेना की ताकत एक विदेशी संचार व्यवस्था पर निर्भर हो जाए, तो उस मुल्क की अपनी आजादी कितनी महफूज रह जाती है?

जंग में कुछ मिनटों का संपर्क टूटना भी भारी पड़ सकता है। ड्रोन रास्ता भटक सकता है, हमला नाकाम हो सकता है और दुश्मन को बढ़त मिल सकती है। यानी जो तकनीक कल तक मददगार थी, वही संकट के समय कमजोरी बन सकती है।


स्टारलिंक जैसी सेवाएं निजी कंपनियां चलाती हैं, लेकिन उनका रिश्ता संबंधित देशों की सरकारों, कानूनों और सुरक्षा नीतियों से भी होता है। जरूरत पड़ने पर सेवाओं पर पाबंदी लग सकती है, कुछ इलाकों में कवरेज रोकी जा सकती है या इस्तेमाल की शर्तें बदली जा सकती हैं।

आज अमेरिका और यूक्रेन के हित एक दिशा में हों, यह जरूरी नहीं कि हर हाल में ऐसा ही रहे। यही बात भारत पर भी लागू होती है।

मान लीजिए, कल चीन या पाकिस्तान के साथ भारत का गंभीर सैन्य टकराव हो जाए। अगर उस समय किसी विदेशी कंपनी ने अपनी सेवा सीमित कर दी, तो क्या होगा? अगर किसी अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक विवाद के कारण भारत को जरूरी संचार सुविधा मिलने में रुकावट आ जाए, तो हमारी सेना क्या करेगी?

क्या हम किसी दूसरे देश की सरकार या किसी कारोबारी की मर्जी पर अपनी सुरक्षा छोड़ सकते हैं?

यह किसी के खिलाफ दुश्मनी नहीं, बल्कि हकीकत को समझने की बात है। अंतरराष्ट्रीय रिश्तों में दोस्ती अहम है, मगर राष्ट्रीय हित सबसे ऊपर होते हैं।

एक रिटायर्ड सैन्य अधिकारी बताते हैं कि भारत ने 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान विदेशी उपग्रह तस्वीरों और संबंधित क्षमताओं तक पहुंच की सीमाओं का अनुभव किया था। ऐसे अनुभवों ने यह समझ मजबूत की कि जरूरी तकनीक के लिए हमेशा दूसरे देशों पर निर्भर रहना खतरनाक हो सकता है।

इसी सोच के तहत भारत ने अपनी उपग्रह और नेविगेशन क्षमताओं को बढ़ाया। स्वदेशी नेविगेशन प्रणाली नाविक इसी दिशा में एक अहम कदम है।

स्टारलिंक के मामले में भी यही सोच अपनाने की जरूरत है।

भारत में इंटरनेट की सुविधा बढ़नी चाहिए। पहाड़ों, द्वीपों, गांवों और सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों को बेहतर संपर्क मिलना चाहिए। आपदा के समय सैटेलाइट इंटरनेट बहुत काम आ सकता है। कारोबार और शिक्षा के लिए भी इसके बड़े फायदे हैं।

लेकिन फायदे गिनाते समय खतरों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

भारत में गेटवे स्थापित करना, आंकड़ों की सुरक्षा के नियम बनाना और सरकारी निगरानी की व्यवस्था करना जरूरी है। लेकिन सिर्फ भारत की जमीन पर स्टेशन बना देने से अंतरिक्ष में घूम रहे उपग्रहों पर भारत का नियंत्रण नहीं हो जाता।

इंटरनेट का कनेक्शन हमारे यहां हो सकता है, मगर उसे चालू या बंद करने का अधिकार किसी और के पास हो, तो यह अधूरी आत्मनिर्भरता है।

विशेषज्ञ टीपी श्रीवास्तव कहते हैं, "भारत को स्टारलिंक का दरवाजा पूरी तरह बंद करने की जरूरत नहीं है। जरूरत है सोच-समझकर आगे बढ़ने की। विदेशी कंपनियों को नियमों के तहत काम करने का मौका मिले। लोगों को बेहतर इंटरनेट मिले और बाजार में मुकाबला बढ़े। मगर साथ ही भारत को अपने उपग्रह, सुरक्षित सैन्य संचार और ड्रोन नियंत्रण प्रणालियां भी मजबूत करनी होंगी।"

सरकार को एक ही कंपनी पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता से बचना चाहिए। फाइबर नेटवर्क, मोबाइल इंटरनेट और स्वदेशी उपग्रह सेवाओं का विस्तार जारी रहना चाहिए। संकट के समय हमारे पास ऐसे विकल्प होने चाहिए जो किसी विदेशी कंपनी के फैसले से ठप न पड़ें।

यूक्रेन का तजुर्बा हमें यही समझाता है कि तकनीक जितनी ताकत देती है, उस पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता उतनी ही बड़ी कमजोरी भी पैदा कर सकती है।

स्टारलिंक आए, कारोबार करे और भारतीयों को बेहतर इंटरनेट दे। लेकिन भारत की सुरक्षा, सरहदों की हिफाजत और फैसले लेने की आजादी की चाबी भारत के ही हाथों में रहनी चाहिए।

क्योंकि इंटरनेट की रफ्तार कुछ देर कम हो जाए, तो गुजारा हो सकता है। लेकिन अगर मुल्क की खुदमुख्तारी ही कमजोर पड़ जाए, तो उसकी कीमत बहुत भारी हो सकती है।

Thursday, October 15, 2026

 कॉकरोचों का राज, बाबाओं का चमत्कार और मीडिया की नौटंकी!  

सच गायब, शोर बेशुमार! सत्ता की चापलूसी, अंधविश्वास का कारोबार और जनता के सवालों पर पर्दा आखिर कब तक?

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बृज खंडेलवाल द्वारा  

17 अक्टूबर 2026  

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रातोंरात भगवान बनने वाले बाबाओं की कमी नहीं है। भविष्य बताने वाले ज्योतिषियों की दुकानें चमक रही हैं। कोई ग्रहों की चाल से देश का भविष्य बताता है, कोई चमत्कार से किस्मत बदलने का दावा करता है। टीवी पर स्वयंभू बुद्धिजीवी ज्ञान बांटते हैं। संस्कृति के ठेकेदार तहजीब का सर्टिफिकेट जारी करते हैं। नारी मुक्ति के नाम पर कुछ लोग अपनी दुकान चलाते हैं। और इन सबके बीच कॉकरोच भी खूब फल-फूल रहे हैं; गंदगी में पलते हैं, खतरा भांपते ही बिल में घुस जाते हैं और मौका मिलते ही फिर बाहर निकल आते हैं।  

सवाल सीधा है। जब पाखंड का बाजार गर्म हो, अंधविश्वास की दुकान सज जाए और दिखावे के सौदागर समाज पर छा जाएं, तो सच की आवाज कौन उठाएगा? जवाब होना चाहिए: मीडिया। लेकिन अफसोस, कई बार मीडिया खुद इस तमाशे का हिस्सा बन जाता है। खबर कम, नौटंकी ज्यादा। सवाल कम, शोर ज्यादा। जनता कभी तालियां बजाती है, कभी माथा पीटती है और कभी रिमोट उठाकर चैनल बदल देती है।  

कभी मीडिया को लोकतंत्र का चौथा खंभा कहा जाता था। उसका काम था सत्ता से सवाल पूछना, जनता की आवाज उठाना और हुक्मरानों को आईना दिखाना। आज कई चैनलों को देखकर लगता है कि आईना तो मौजूद है, लेकिन उसमें सच्चाई दिखाने के बजाय सत्ता की आरती उतारी जा रही है।  

टीवी खोलकर देखिए। एंकर की आवाज आसमान छू रही है। स्टूडियो में बैठे प्रवक्ता एक-दूसरे पर ऐसे टूट पड़ते हैं मानो देश की सारी समस्याओं का हल विरोधी को चुप कराने में छिपा हो। बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रदूषण जैसे मुद्दे कोने में खड़े अपनी बारी का इंतजार करते रहते हैं। उनकी सुनता कौन है? राजनीतिक झगड़े में टीआरपी की मलाई जो मिलती है! जनता को चाहिए रोजगार, मगर टीवी पर मिलता है शोर।  

उदाहरण लें: जब दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण का स्तर खतरनाक स्तर पर पहुंच जाता है और अस्पतालों में सांस के मरीज बढ़ जाते हैं, तो कई चैनल घंटों राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और ‘कौन जिम्मेदार’ के शोर में उलझे रहते हैं। उसी समय कोई बाबा ‘वायु शुद्धि यज्ञ’ या ‘ग्रह दोष निवारण’ का कार्यक्रम चला रहा होता है तो कैमरे तुरंत वहां पहुंच जाते हैं। वैज्ञानिक उपायों और जमीनी रिपोर्टिंग की जगह सनसनी और चमत्कार को प्राथमिकता मिल जाती है।  

पत्रकारिता का मिशन पीछे छूट रहा है और कारोबार आगे निकल रहा है। सवाल पूछने वाले पत्रकार की जगह कई बार ऐसे चेहरे दिखाई देते हैं जो सत्ता के प्रवक्ता होने का भ्रम पैदा करते हैं। मीडिया की आजादी का मतलब केवल अखबार छापना या टीवी चैनल चलाना नहीं है। असली आजादी है बिना डर के सच सामने रखना। लेकिन जब मीडिया का मालिकाना हक कुछ बड़े कारोबारी समूहों तक सिमटने लगे, तब चिंता स्वाभाविक है। बड़े कारोबारियों के अपने हित होते हैं, सत्ता से रिश्ते होते हैं और सरकारी विज्ञापनों का महत्व होता है। ऐसे में संपादक के सामने धर्मसंकट खड़ा हो सकता है।  

इसी माहौल में ‘गोदी मीडिया’ जैसे शब्द लोकप्रिय हुए हैं। यह राजनीतिक कटाक्ष है, लेकिन इसके पीछे निष्पक्षता को लेकर जनता का अविश्वास भी दिखाई देता है। सरकार की तारीफ करना गलत नहीं, उसकी आलोचना करना भी अपने आप में कोई क्रांति नहीं। असली पत्रकारिता तथ्यों के आधार पर दोनों काम करती है। सरकार अच्छा करे तो तारीफ मिले, गलती करे तो सवाल उठें। पत्रकारिता का धर्म किसी की आरती उतारना नहीं, बल्कि जनता के सामने सच रखना है।  

जनसंचार के जानकार प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं, “आज खबर की अहमियत कई बार इस बात से तय होती है कि वह कितनी सनसनी पैदा कर सकती है। किसी अभिनेता का बयान, किसी नेता की तकरार या किसी बाबा का चमत्कार घंटों चल सकता है। लेकिन सरकारी अस्पताल में दवाइयां नहीं हैं, स्कूल में शिक्षक नहीं हैं या गांव में पीने का पानी नहीं है, तो खबर के लिए जगह कम पड़ जाती है।”  

समाज सेविका विद्या झा का कहना है, “बाबाओं, ज्योतिषियों और चमत्कार बेचने वालों के लिए कैमरे हमेशा तैयार रहते हैं। कोई भविष्य बताता है, कोई बीमारी दूर करने का दावा करता है और कोई भक्तों को स्वर्ग का टिकट बेचने का भरोसा देता है। मीडिया का काम इन दावों की जांच करना है, न कि बिना सवाल पूछे उनका प्रचार करना।”  

एक और उदाहरण: कुछ वर्ष पहले एक स्वयंभू बाबा ने दावा किया था कि वह कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों को ‘दिव्य शक्ति’ से ठीक कर सकते हैं। कई चैनलों ने बिना किसी वैज्ञानिक जांच के उनके कार्यक्रमों को घंटों प्रसारित किया। बाद में जब मरीजों की शिकायतें सामने आईं और अदालती प्रक्रिया शुरू हुई, तब मीडिया का रुख बदल गया। लेकिन तब तक हजारों लोग भ्रमित हो चुके थे। चमत्कार का तमाशा बिकता है, इसलिए कैमरा वहीं टिक जाता है। वैज्ञानिक सोच की बात करने वाले पीछे रह जाते हैं।  

डिजिटल दौर में झूठ को सजाकर सच के रूप में बेचना आसान हो गया है। कभी पुराना वीडियो नई घटना बताकर दिखाया जाता है, कभी किसी तस्वीर के साथ मनगढ़ंत कहानी जोड़ दी जाती है। सोशल मीडिया की अफवाह जांच-पड़ताल के बिना ब्रेकिंग न्यूज बन जाती है। फैक्ट-चेक मंचों की जरूरत इसी कारण बढ़ी है। लेकिन जिम्मेदारी केवल दूसरों की खबरों की जांच करना नहीं है। हर मीडिया संस्थान को अपनी खबरों की सच्चाई भी सुनिश्चित करनी चाहिए।  

पैसे लेकर खबर दिखाने या छापने का कारोबार भी कम खतरनाक नहीं है। जब विज्ञापन और खबर के बीच का फर्क मिटने लगे, तो पाठक कैसे पहचाने कि वह पत्रकारिता पढ़ रहा है या किसी का प्रचार? कार्यकर्ता सच्चेंद्र सिंह कहते हैं, “जनता को जानने का पूरा हक है कि उसके सामने रखी सामग्री खबर है या विज्ञापन। पत्रकारिता कोई किराना दुकान नहीं, जहां पैसे देकर मनचाहा सच तौल लिया जाए।”  

पत्रकारों पर मुकदमे, छापे और पूछताछ की खबरें भी बढ़ रही हैं। हर जांच को पत्रकारिता पर हमला कहना उचित नहीं। कानून सबके लिए बराबर होना चाहिए। लेकिन यदि कानून का इस्तेमाल आलोचनात्मक आवाजों को दबाने के लिए होने लगे, तो लोकतंत्र की सेहत बिगड़ती है।  

मीडिया में सामाजिक प्रतिनिधित्व का सवाल भी महत्वपूर्ण है। गांवों में पानी की किल्लत, किसानों की मुश्किलें, मजदूरों का पलायन और अस्पतालों की बदहाली भी बड़ी खबरें हैं। लेकिन इन मुद्दों पर रिपोर्टिंग करने में मेहनत लगती है। गांव जाना पड़ता है, लोगों से मिलना पड़ता है और आंकड़ों की जांच करनी पड़ती है। जबकि स्टूडियो में बैठकर किसी को देशद्रोही या राष्ट्रवादी घोषित करना बेहद आसान है।  

नदियां प्रदूषित हों, शहरों में पानी का संकट बढ़े या जलवायु परिवर्तन से खेती प्रभावित हो, तो इन विषयों पर लगातार रिपोर्टिंग होनी चाहिए। मगर कई बार किसी गंभीर मुद्दे की उम्र अगले राजनीतिक विवाद तक ही रहती है। बंगलौर की युवा पत्रकार मुक्त गुप्ता बताती हैं कि मीडिया की दुनिया में कुछ स्वयंभू बुद्धिजीवी भी खूब चमक रहे हैं। "हर विषय पर ज्ञान बांटने को तैयार। तथ्य हों या न हों, आत्मविश्वास में कोई कमी नहीं।  नारीवाद के नाम पर भी कभी-कभी दिखावे की दुकान सज जाती है। महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई को केवल प्रचार और सोशल मीडिया की लोकप्रियता तक सीमित करना आंदोलन के साथ नाइंसाफी है। "

जनता का भरोसा मीडिया की सबसे बड़ी पूंजी है। आज भी कई पत्रकार जोखिम उठाकर सच सामने लाते हैं। छोटे डिजिटल मंच और स्वतंत्र प्रकाशन भी ऐसे मुद्दों को उठाते हैं जिन्हें बड़े संस्थान नजरअंदाज कर देते हैं। यह उम्मीद की किरण है। लेकिन कुछ ईमानदार पत्रकारों के भरोसे पूरे मीडिया की साख नहीं बच सकती। इसके लिए मालिकाना हक में पारदर्शिता, विज्ञापन और खबर के बीच साफ अंतर, गलतियों का सार्वजनिक सुधार और संपादकीय स्वतंत्रता जरूरी है।  

सनसनी की जगह तथ्य-जांच को महत्व देना होगा। सामाजिक विविधता बढ़ानी होगी। जनहित की खबरों को प्राथमिकता देनी होगी। मीडिया को समझना होगा कि जनता केवल मनोरंजन नहीं चाहती। उसे जानना है कि महंगाई क्यों बढ़ रही है, रोजगार कहां हैं, सरकारी योजनाओं का पैसा कहां खर्च हो रहा है और उसके बच्चों का भविष्य कितना सुरक्षित है।  

इन सवालों से मुंह मोड़कर कोई भी संस्थान लंबे समय तक जनता का भरोसा नहीं जीत सकता। मीडिया सत्ता का दरबारी है या जनता का पहरेदार? यही असली सवाल है। लोकतंत्र में पत्रकार का काम किसी सरकार को गिराना या किसी पार्टी को जिताना नहीं है। उसका धर्म सच तलाशना, सवाल पूछना और जनता तक सही जानकारी पहुंचाना है। सरकार किसी भी दल की हो, पत्रकारिता की कसौटी एक ही रहनी चाहिए।  

और कॉकरोचों से भरे कमरे में केवल झाड़ू दिखाने से काम नहीं चलेगा। गंदगी साफ करनी होगी और रोशनी भी लानी होगी। याद रखिए, लोकतंत्र को खतरा केवल झूठ बोलने वालों से नहीं होता। खतरा उन लोगों से भी होता है जो सच जानते हैं, लेकिन खामोश रहते हैं। क्योंकि जब मीडिया सवाल पूछना छोड़ देता है, तो सत्ता जवाब देना भी जरूरी नहीं समझती। और जब जनता की आवाज दब जाती है, तब लोकतंत्र का चौथा खंभा खड़ा तो रहता है, मगर उसकी आत्मा दम तोड़ने लगती है।

Wednesday, October 14, 2026

 दूर के ढोल सुहाने!

यूरोप की चमक-दमक और खाली जेब!

ज्यादा कमाई, ज्यादा मेहनत, फिर भी महीने के अंत में कंगाली!

यूरोप यात्रा ने सिखाया जिंदगी का असली हिसाब-किताब

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बृज खंडेलवाल द्वारा

16 अक्टूबर 2026

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यूरोप की चमचमाती सड़कें, साफ-सुथरी नदियां, शानदार इमारतें और समय पर दौड़ती ट्रेनें देखकर मन खुश हो जाता है। लगता है, बस यहीं बस जाएं! 

लेकिन जैसे ही जेब से पैसे निकलने शुरू होते हैं, सपनों की दुनिया में महंगाई का भूत नाचने लगता है। खूबसूरती अपनी जगह है, मगर जिंदगी चलाने का खर्चा देखकर अच्छे-अच्छों के पसीने छूट जाते हैं। आखिर यह कैसी तरक्की है, जहां कमाई लाखों में और बचत कौड़ियों में रह जाती है?

मेरी हाल की यूरोप यात्रा ने बहुत कुछ सिखाया। खूबसूरत शहर देखे, नदियों के किनारे घूमे, शानदार सार्वजनिक सुविधाएं देखीं और लोगों का अनुशासन भी। लेकिन साथ ही समझ आया कि यहां जिंदगी जीना कोई मुफ्त का तमाशा नहीं है। यहां तो प्रकृति की पुकार सुनने के लिए भी जेब ढीली करनी पड़ सकती है!

भारत में सार्वजनिक शौचालय अक्सर मुफ्त मिल जाते हैं या कुछ रुपये देकर काम चल जाता है। हां, बदबू ऐसी कि नाक बंद करके भागने का मन करे। कई जगह पानी गायब, सफाई नदारद और दरवाजे का भरोसा भगवान भरोसे! 

लेकिन कम से कम जेब तो सलामत रहती है। यूरोप में सार्वजनिक शौचालयों में एक यूरो, यानी करीब सौ रुपये या उससे ज्यादा, खर्च करने पड़ सकते हैं। सोचिए, पेट खराब हो और जेब खाली हो, तो आदमी जाए तो जाए कहां? यहां तो कुदरत की पुकार भी आर्थिक संकट बन सकती है!

टैक्सी का हाल भी कुछ ऐसा ही है। भारत में पांच किलोमीटर की सवारी सौ-दो सौ रुपये में मिल सकती है, जबकि यूरोप के बड़े शहरों में यही सफर पंद्रह सौ से ढाई हजार रुपये तक पड़ सकता है। बस या मेट्रो का टिकट भी कई बार दो-तीन सौ रुपये का होता है। एक कप कॉफी चार-पांच सौ रुपये की और मामूली दोपहर का भोजन पंद्रह सौ रुपये के आसपास! पत्नी को रेस्तरां में खाना खिलाकर निकलिए, तो रास्ते में हिसाब लगाने लगेंगे कि अगली बार घर पर खिचड़ी बनाना ही बेहतर रहेगा।

सुपरमार्केट में फल-सब्जियां खरीदना भी किसी परीक्षा से कम नहीं। सेब, केला, टमाटर, आलू और प्याज के दाम देखकर भारतीय ग्राहक की आंखें फैल जाती हैं। दूध और ब्रेड भी सस्ते नहीं। आप कुछ जरूरी सामान खरीदने जाते हैं और बिल देखकर लगता है कि गलती से पूरा सुपरमार्केट ही खरीद लिया! सबसे सस्ता टूथ ब्रश 350 रुपए का था, सोचा उंगली से ही कुछ दिन काम चला लें।

मगर सबसे बड़ा झटका मकान का किराया देता है। एम्स्टर्डम में एक छोटे से फ्लैट का किराया महीने का दो लाख रुपये या उससे ज्यादा हो सकता है। पेरिस, बर्लिन और ब्रसेल्स भी कम महंगे नहीं हैं। दूसरी तरफ, आगरा में दस-पंद्रह हजार रुपये में ठीकठाक फ्लैट मिल सकता है। तीन कमरों वाला घर भी यूरोप के बड़े शहरों की तुलना में काफी कम किराये पर उपलब्ध हो सकता है।

जरा हिसाब लगाइए। यूरोप में एक महीने का किराया कभी-कभी आगरा में पूरे साल के किराये से भी ज्यादा बैठता है। मकान मालिक तो मालामाल हो जाए और किरायेदार की जेब में हवा बचे! महीने की शुरुआत में तनख्वाह देखकर खुशी होती होगी, लेकिन किराया, बिजली, खाना और आने-जाने का खर्च कटते ही खुशी काफूर हो जाती होगी।

बेशक, यूरोप में वेतन भारत से काफी ज्यादा है। लेकिन खर्च भी उसी रफ्तार से दौड़ते हैं। ज्यादा कमाई का मतलब हमेशा ज्यादा बचत नहीं होता। आदमी सुबह से शाम तक मेहनत करे, टैक्स भरे, मकान का किराया चुकाए और फिर महीने के आखिर में बैंक खाते को ऐसे देखे, जैसे डॉक्टर मरीज की नब्ज देखता है।

स्वास्थ्य सेवाओं में भी तस्वीर मिली-जुली है। यूरोप में सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था कई देशों में अच्छी है, लेकिन निजी डॉक्टर, विशेषज्ञ और कुछ इलाज काफी महंगे पड़ सकते हैं। भारत में डॉक्टर की फीस और अस्पताल का खर्च तुलनात्मक रूप से कम है। हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था में कमियां जरूर हैं, मगर यहां कम आमदनी वाला व्यक्ति भी अपनी हैसियत के मुताबिक इलाज के विकल्प तलाश सकता है।

अब भारत की एक ऐसी खूबी पर आइए, जिसका हिसाब किसी अर्थशास्त्री की किताब में आसानी से नहीं मिलेगा।

हमारे यहां मंदिरों, गुरुद्वारों और सामाजिक संस्थाओं में रोज लाखों लोगों को भोजन मिलता है। गुरुद्वारे का लंगर हो या मंदिर का भंडारा, भूखे पेट को खाना खिलाने की परंपरा आज भी करोड़ों लोगों के लिए सहारा है। वहां किसी से यह नहीं पूछा जाता कि जेब में कितने रुपये हैं, कौन-सी गाड़ी से आए हैं या बैंक खाते में कितना पैसा है। आओ, बैठो और भोजन करो। इंसानियत का इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा?

यूरोप में भी चैरिटी, फूड बैंक और जरूरतमंदों के लिए सामुदायिक रसोई हैं। लेकिन भारत में धार्मिक संस्थाओं के जरिए मुफ्त भोजन की परंपरा का अपना अलग विस्तार और सामाजिक महत्व है।

पानी का मामला भी दिलचस्प है। भारत में अनेक सार्वजनिक स्थानों, मंदिरों और गुरुद्वारों में पीने का पानी मुफ्त मिल जाता है। यूरोप में नल का पानी कई जगह साफ और पीने योग्य है, लेकिन कैफे में बोतलबंद पानी खरीदने जाएं तो बिल देखकर गला सूख सकता है। पानी पीने आए थे, मगर कीमत देखकर प्यास ही मर गई!

हां, भारत की कमजोरियां भी कम नहीं हैं। गंदे शौचालय, प्रदूषित नदियां, कूड़े के ढेर, ट्रैफिक और बदहाल नागरिक सुविधाएं हमें मुंह चिढ़ाती हैं। यूरोप से हमें शहरों की योजना, नदियों की सफाई, सार्वजनिक परिवहन और नागरिक अनुशासन सीखना चाहिए। खूबसूरत नदियां और साफ सार्वजनिक स्थान अपने आप नहीं बनते। इनके पीछे बेहतर व्यवस्था, पैसा और नागरिक जिम्मेदारी होती है।

लेकिन यूरोप की चमक देखकर अपनी हर चीज को बेकार समझ लेना भी नासमझी होगी। वहां सुविधाएं अच्छी हैं, मगर उनकी कीमत भी चुकानी पड़ती है। भारत में जीवनशैली की कई परतें हैं। कोई पांच सितारा होटल में भोजन करता है, तो कोई सड़क किनारे ढाबे पर। कोई मॉल में खरीदारी करता है, तो कोई साप्ताहिक बाजार में मोलभाव करके खुश होता है। दोनों अपनी हैसियत के मुताबिक जिंदगी का आनंद ले सकते हैं।

मेरी यूरोप यात्रा आंखें खोलने वाली रही। वहां की नदियों, शहरों और व्यवस्थाओं से बहुत कुछ सीखने को मिला। लेकिन लौटकर भारत की कुछ खूबियों की अहमियत भी समझ आई। यहां कम पैसों में गुजारा करने के रास्ते ज्यादा हैं, सामाजिक सहयोग की परंपरा मजबूत है और जिंदगी के कई विकल्प उपलब्ध हैं।

यूरोप हमें सिखाता है कि शहर कैसे सुंदर और व्यवस्थित बनाए जाएं। भारत याद दिलाता है कि जिंदगी का आनंद केवल मोटी तनख्वाह से नहीं मिलता।

आखिर में बात इतनी सी है। चमक-दमक देखकर ही किसी जिंदगी को खुशहाल मत मानिए। कभी-कभी चमकती दुकान के पीछे महंगे बिलों का अंबार होता है। और कभी किसी गुरुद्वारे के लंगर में मिली दाल-रोटी, मुफ्त पानी और जेब में बचे सौ रुपये ही जिंदगी का असली खजाना बन जाते हैं!

Tuesday, October 13, 2026

 त्यौहारी धमाका! बाजारों में रौनक, खरीदारी के नए रिकॉर्ड की आस

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कपड़ों से कारों तक, गहनों से गैजेट्स तक छूट की बहार, आसान किस्तों का सहारा और छोटे शहरों से उठती खरीदारी की लहर

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बृज खंडेलवाल द्वारा

15 अक्टूबर 2026

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जरा दिल्ली, मुंबई  के किसी बड़े बाजार का नजारा देखिए। शाम ढलते ही दुकानों की जगमगाती रोशनी आंखों को चौंधिया रही है। कपड़ों के शोरूम में रंग-बिरंगी साड़ियों, डिजाइनर लहंगों और चमचमाते सूटों की बहार है। गहनों की दुकानों में सोना-चांदी दमक रहे हैं। कहीं हीरे की अंगूठियां ग्राहकों को लुभा रही हैं, तो कहीं सोने की चेन पर नजरें टिक गई हैं।

उधर, सड़क के दूसरी ओर कारों के शोरूम सजे हैं। चमचमाती नई गाड़ियां ऐसे खड़ी हैं, मानो ग्राहकों को अपने साथ घर चलने का न्योता दे रही हों। मोटरसाइकिलों के शोरूम में भी भीड़ कम नहीं है। मोबाइल, टीवी, फ्रिज, वाशिंग मशीन और दूसरे घरेलू सामानों की दुकानों पर छूट के बड़े-बड़े बोर्ड टंगे हैं। मिठाइयों की खुशबू, दुकानदारों की आवाजें और ग्राहकों की चहल-पहल मिलकर ऐसा समां बांध रहे हैं कि मंदी की चर्चा कुछ देर के लिए तो कोने में दुबक जाती है।

अखबारों के फुल पेज विज्ञापन देखकर लग रहा है कि इस त्यौहारी सीजन में खरीदारी के नए रिकॉर्ड बनेंगे।  बाजारों के चेहरे पर चमक देखकर तो यही लगता है। 

व्यापारियों के संगठन कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAIT) का अनुमान है कि नवरात्र से दिवाली तक देश में कारोबार सात लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच सकता है। पिछले साल यह आंकड़ा लगभग 6.05 लाख करोड़ रुपये था। इस बार 15 से 18 प्रतिशत बढ़ोतरी की उम्मीद है।

मगर सवाल यह है कि इस संभावित उछाल के पीछे कौन से पांच कारक काम कर रहे हैं?

महंगाई और खर्चों की मार के बीच भी त्योहारों का आकर्षण कम नहीं हुआ है। कई ग्राहक, जिन्होंने पहले कपड़े, घरेलू सामान या गाड़ी खरीदने का इरादा टाल दिया था, अब खरीदारी के लिए तैयार दिख रहे हैं।

कुछ सर्वेक्षणों के अनुसार, लगभग आधे खरीदार पिछले साल के मुकाबले कम से कम 10 प्रतिशत अधिक खर्च करने की योजना बना रहे हैं। यानी इस बार जेब कुछ ज्यादा ढीली हो सकती है।

कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक सामान, गाड़ियां और जीवनशैली से जुड़ी चीजें खरीदने की मांग बढ़ने की उम्मीद है। दुकानदारों को आस है कि त्योहारों का उत्साह उनके गल्लों में भी बरकत लाएगा।

हालांकि, खरीदने की इच्छा और खरीदने की ताकत में फर्क होता है। बाजार की असली परीक्षा तभी होगी, जब ग्राहक सामान पसंद करने के बाद बिल चुकाने को भी तैयार हों।

इस बार त्योहारों की रौनक लंबे समय तक बाजारों को गुलजार रख सकती है। ओणम से छठ तक फैला त्योहारों का सिलसिला लगभग 80 दिनों का बताया जा रहा है, जबकि पिछले साल यह अवधि करीब 52 दिन थी।

ओणम, गणेश चतुर्थी और नवरात्र के दौरान मिले शुरुआती संकेतों ने कारोबारियों की उम्मीदें बढ़ाई हैं। ऑनलाइन खरीदारी के मंचों पर भी ग्राहकों की आवाजाही बढ़ने की खबरें हैं।

अमेजन के ग्रेट इंडियन फेस्टिवल जैसे बिक्री अभियानों ने भी बाजार में उत्साह बढ़ाया है। शुरुआती आंकड़ों में पिछले साल की तुलना में कुछ श्रेणियों में ऑर्डर दोगुने से अधिक होने की खबरें सामने आई हैं।

लंबा त्योहारों का मौसम दुकानदारों को बिक्री के ज्यादा मौके देता है। ग्राहकों को भी खरीदारी के लिए अधिक समय मिलता है। लेकिन लंबा मौसम अपने आप में ज्यादा बिक्री की गारंटी नहीं है। आखिरकार फैसला ग्राहक की जेब ही करेगी।

कीमतों में राहत मिले तो ग्राहक का दिल भी खरीदारी के लिए मचलने लगता है। जीएसटी में हालिया कटौती और दरों के युक्तिकरण से कुछ श्रेणियों में सामान सस्ता हुआ है। इनमें वाहन और कई उपभोक्ता वस्तुएं शामिल हैं।

इसके साथ ही आसान किस्तों, बैंक ऑफरों और पुराने सामान के बदले नई चीज खरीदने की योजनाओं ने भी ग्राहकों को आकर्षित किया है।

अब नई कार खरीदने के लिए पूरी रकम एक साथ जुटाना जरूरी नहीं। मोबाइल, टीवी और फ्रिज भी किस्तों पर घर लाए जा सकते हैं। खरीदारी के लिए अभी पैसा कम पड़ रहा हो तो कुछ योजनाएं भुगतान को आगे टालने का विकल्प भी देती हैं।

खरीदारी का नक्शा तेजी से बदल रहा है। अब बाजार की धड़कन केवल दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और दूसरे महानगरों में नहीं सुनाई देती। छोटे शहरों और कस्बों में भी ग्राहकों के अरमान कुलांचे भर रहे हैं।

टियर-दो और टियर-तीन शहरों से ऑनलाइन खरीदारी में बड़ी हिस्सेदारी आने की खबरें हैं। कुछ बाजारों में इस कारोबार की बढ़ोतरी 50 प्रतिशत से अधिक बताई गई है। कई रिपोर्टों के अनुसार, त्योहारों के दौरान ऑनलाइन ऑर्डर का 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा छोटे शहरों से आ रहा है।

इन शहरों के ग्राहक भी अब महंगे स्मार्टफोन, आधुनिक घरेलू उपकरण, स्मार्ट घड़ियां और आकर्षक घरेलू सजावट का सामान खरीदना चाहते हैं। छोटे शहरों में बड़े ब्रांडों की पहुंच बढ़ी है और ऑनलाइन खरीदारी ने दूरियों को काफी हद तक मिटा दिया है।

क्विक कॉमर्स यानी कुछ ही मिनटों में सामान पहुंचाने वाली सेवाएं भी इस रौनक में अपना हिस्सा जोड़ रही हैं। मिठाई, फल, सजावट का सामान या कोई जरूरी चीज चाहिए, तो मोबाइल पर उंगली घुमाइए और इंतजार कीजिए।

कुछ जरूरी वस्तुओं की महंगाई में नरमी, शहरों में रोजगार और आमदनी के रुझान तथा घरेलू खर्च की बदलती प्राथमिकताएं भी त्योहारों की खरीदारी को सहारा दे सकती हैं।

कुछ परिवार महंगी यात्राओं पर खर्च घटाकर घर की सजावट, नए कपड़ों, घरेलू उपकरणों और पारिवारिक समारोहों पर पैसा लगाना पसंद कर सकते हैं। हवाई किराये, ईंधन की लागत और अनिश्चितता के बीच घर पर त्योहार मनाना कुछ लोगों को बेहतर विकल्प लग सकता है।

हालांकि, ग्रामीण बाजारों की तस्वीर हर जगह एक जैसी नहीं है। कहीं मांग अच्छी है, तो कहीं मानसून के असर और आमदनी की स्थिति ने खरीदारी को प्रभावित किया है। इसलिए पूरे देश में एक जैसी तेजी की उम्मीद करना जल्दबाजी होगी।

त्योहारों की अच्छी बिक्री का असर केवल दुकानदारों तक सीमित नहीं रहता। ज्यादा खरीदारी से परिवहन, गोदामों, पैकेजिंग, होटल, रेस्तरां, पर्यटन, सजावट और ऑनलाइन सामान पहुंचाने वाली सेवाओं को भी काम मिलता है।

जब कंपनियों की बिक्री बढ़ने की उम्मीद मजबूत होती है, तो उनके मुनाफे को लेकर भी बाजार में आशावाद पैदा हो सकता है। इससे शेयर बाजार की धारणा को सहारा मिल सकता है। हालांकि, शेयर बाजार की चाल पर कई दूसरे आर्थिक और वैश्विक कारक भी असर डालते हैं।

कुल मिलाकर, इस दिवाली बाजार में उत्साह की पांच धाराएं मिलकर बह रही हैं। ग्राहकों का भरोसा, लंबे त्योहार, करों में राहत, आसान किस्तें और छोटे शहरों की बढ़ती ताकत कारोबार को नई ऊंचाई दे सकती हैं।


Monday, October 12, 2026

 लड़ाई समोसा, कचौड़ी की नहीं, न्याय की है!

नारेबाजी की क्रांति या बदलाव की लड़ाई? क्या कैंपस की आवाज़ आधी आबादी की आवाज़ है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

14 अक्टूबर 2026

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क्या होगा जब किसी पार्क में एक नाबालिग लड़की के साथ कथित सामूहिक बलात्कार हो और इंसाफ की मांग का शोर चंद मिनटों में तुकबंदी के मुकाबले में बदल जाए? 

जरूर, पुलिस से जवाब मांगे जाने चाहिए, अफसरों की जवाबदेही तय होनी चाहिए और बेटियों की हिफाजत सुनिश्चित होनी चाहिए। लेकिन दिल्ली में एक गंभीर वारदात के बाद सोशल मीडिया पर कुछ ऐसे नारे छा गए, मानो इंसाफ की लड़ाई नहीं, कोई हास्य कवि सम्मेलन चल रहा हो!

सवाल सीधा है। क्या दिल्ली के नामी कॉलेजों में गूंजते ये नारे देश की आधी आबादी की असली आवाज़ हैं, या फिर चंद खुशहाल घरों की बेटियों का गुस्सा, जिसे सोशल मीडिया ने सिर आंखों पर बिठा लिया है?

21 सितंबर 2026 की शाम दिल्ली के कालकाजी मंदिर के पास आस्था कुंज पार्क में एक 17 वर्षीय लड़की अपना जन्मदिन मना रही थी। वह एक पुरुष मित्र के साथ थी। आरोप है कि तीन लोगों ने खुद को पुलिसकर्मी बताकर उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया। दिल्ली पुलिस ने 12 घंटे के भीतर आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया।

लेकिन पार्क की बदइंतजामी भी सामने आई। कई प्रवेश द्वारों पर सीसीटीवी कैमरे नहीं थे। अंधेरा था और सुरक्षा गार्डों की भी कमी थी। उपराज्यपाल तरनजीत सिंह संधू ने दिल्ली के पार्कों की सुरक्षा जांचने के आदेश दिए। दिल्ली विकास प्राधिकरण ने सूर्यास्त के बाद प्रवेश पर पाबंदी लगाई और निगरानी बेहतर करने का भरोसा दिया।

मगर सवाल है कि आखिर एक लड़की का जन्मदिन खौफनाक हादसे में क्यों बदल गया? बेटियों को अपनी आजादी की कीमत डर और पाबंदियों से क्यों चुकानी पड़े?

घटना के बाद लेडी श्रीराम कॉलेज, मिरांडा हाउस, गार्गी और कमला नेहरू कॉलेज की छात्राएं ‘हम औरतें आजाद हैं’ के बैनर तले सड़कों पर उतरीं।

कुछ नारे असरदार थे, तो कुछ ने गंभीर आंदोलन को कैंटीन की गपशप जैसा बना दिया।

“एक कचौरी, दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा!”

“एक सिगरेट, दो चाय, मर्द जात हाय हाय!”

“मेरे सर में दर्द है, इसका कारण मर्द है!”

और फिर फरमाया गया, “हमारी स्कर्ट नहीं है छोटी, इन मर्दों की सोच है छोटी!”

वाह! तुकबंदी ऐसी कि इंस्टाग्राम पर रीलें बन जाएं। गुस्सा भी जाहिर हो गया और मनोरंजन का इंतजाम भी हो गया।

लेकिन जनाब, जरा ठहरिए! क्या इन नारों से पार्कों की बत्तियां जल उठेंगी? क्या गायब सीसीटीवी कैमरे अपने आप लग जाएंगे? क्या पुलिस की गश्त बढ़ जाएगी? और क्या अदालतों में वर्षों से लटके मुकदमे फटाफट निपटने लगेंगे?

नारे ध्यान खींच सकते हैं, मगर सुरक्षा का इंतजाम नहीं कर सकते।

हालांकि छात्राओं ने कुछ बेहद जरूरी बातें भी उठाईं। “रेपिस्ट को अंदर करो, लड़कियों को नहीं” जैसे नारे ने उस पुरानी सोच पर चोट की, जिसमें अपराधी को पकड़ने के बजाय लड़कियों पर पाबंदियां लगा दी जाती हैं।

एक और संदेश था कि बेटियों की लोकेशन पूछने के बजाय बेटों की नीयत जांचिए।

बिल्कुल सही! बेटी कहां गई, क्या पहना और किससे मिली, इन सवालों की लंबी फेहरिस्त बनाने वाले परिवारों को बेटों के व्यवहार पर भी गौर करना चाहिए।

मगर अफसोस, गंभीर संदेश अक्सर मसालेदार तुकबंदी के शोर में दब जाते हैं।

अब असली सवाल पर आइए। क्या दिल्ली के नामी कॉलेजों में पढ़ने वाली छात्राएं करोड़ों भारतीय महिलाओं की नुमाइंदगी करती हैं?

एक खेत में मजदूरी करने वाली महिला, मुंबई के घरों में बर्तन मांजने वाली कामगार, उत्तर प्रदेश के किसी गांव की बहू और दिल्ली के किसी बड़े कॉलेज की छात्रा, सभी को सुरक्षा और सम्मान चाहिए। लेकिन उनकी जिंदगी की मुश्किलें एक जैसी नहीं हैं।

किसी लड़की के लिए आजादी का मतलब अपनी पसंद के कपड़े पहनना हो सकता है। किसी दूसरी के लिए इसका मतलब स्कूल पूरा करना है। किसी महिला के लिए नौकरी पाना आजादी है, तो किसी के लिए घरेलू हिंसा से छुटकारा।

गरीब महिला के सामने अक्सर रोटी, रोजगार और छत की चिंता खड़ी होती है। उसकी आजादी परिवार की आर्थिक हालत से भी जुड़ी होती है। कई महिलाओं के लिए परिवार ही मुश्किल वक्त का सहारा है।

पब्लिक कमेंटेटर प्रोफ पारस नाथ चौधरी कहते हैं, "इसका मतलब यह नहीं कि पुरानी परंपराओं पर सवाल नहीं उठने चाहिए। लेकिन हर परिवार, हर पुरुष और हर सामाजिक रिश्ता दुश्मन नहीं होता।

भारतीय नारी आंदोलन ने शिक्षा, संपत्ति में अधिकार, घरेलू हिंसा से सुरक्षा और रोजगार के बराबर अवसरों के लिए लंबी लड़ाई लड़ी है। यह संघर्ष केवल नारों से नहीं, बल्कि कानून, सामाजिक सुधार और लगातार मेहनत से आगे बढ़ता है। देश में महिलाओं की रोजगार में भागीदारी बढ़ी है, लेकिन रास्ता अभी लंबा है। गांवों और शहरों, अमीरों और गरीबों के बीच बड़ा फर्क मौजूद है।"

क्या इन महिलाओं की आवाज़ इसलिए कम अहम है, क्योंकि वे सोशल मीडिया पर वायरल नहीं होतीं?

सोशल एक्टिविस्ट पद्मिनी अय्यर कहती हैं, "छात्राओं को विरोध करने का पूरा हक है। गुस्सा जायज है। व्यंग्य और हास्य भी समाज की बुराइयों पर चोट कर सकते हैं। लेकिन आंदोलन की असली परीक्षा अगले दिन होती है, जब कैमरे हट जाते हैं और भीड़ अपने घर लौट जाती है।

पार्कों में रोशनी कौन सुनिश्चित करेगा? सीसीटीवी कैमरों की निगरानी कौन करेगा? पुलिस की गश्त पर नजर कौन रखेगा? पीड़िताओं को कानूनी मदद कौन देगा? अदालतों में मुकदमों की सुनवाई तेज कराने के लिए कौन आवाज उठाएगा?

युवा एडवोकेट, अंकुर के मुताबिक, "बलात्कार के मामलों में सजा की दर को लेकर गंभीर चिंता बनी हुई है, हालांकि आंकड़े अलग-अलग राज्यों, अदालतों और अवधियों के अनुसार बदलते हैं। गिरफ्तारी इंसाफ की पहली सीढ़ी है, आखिरी मंजिल नहीं। निष्पक्ष जांच, मजबूत सबूत और समय पर सुनवाई भी जरूरी हैं।"

सरकार केवल घोषणाएं करके अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। इसी तरह आंदोलनकारी भी नारे लगाकर अपना फर्ज पूरा नहीं मान सकते।

सामाजिक कार्यकर्ता मुक्त गुप्ता कहती हैं, " एक बात याद रखिए। सभी पुरुषों को एक ही तराजू में तौलना भी इंसाफ नहीं है। लड़ाई पुरुषों से नहीं, बल्कि अपराधी सोच, यौन हिंसा, दबंगई और दोषियों को बचाने वाली व्यवस्था से होनी चाहिए। पुरुषों को भी इस लड़ाई में भागीदार बनाना होगा।"

भारत को आंदोलनों की जरूरत है, मगर ऐसे आंदोलनों की जो कॉलेजों की चारदीवारी से निकलकर आम महिलाओं की जिंदगी से जुड़ें।

छात्राएं सुरक्षित पार्कों, बेहतर पुलिस व्यवस्था, तेज सुनवाई और पीड़िताओं की मदद के लिए अभियान चलाएं। मजदूर महिलाओं, ग्रामीण संगठनों, वकीलों, शिक्षकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर काम करें। सोशल मीडिया का इस्तेमाल भी हो, लेकिन वायरल वीडियो ही आंदोलन की मंजिल न बन जाएं।

आस्था कुंज की घटना प्रशासन की नाकामी पर सवाल उठाती है। इसका जवाब यह नहीं हो सकता कि लड़कियां शाम के बाद घरों में बैठी रहें और खतरनाक जगहों की बदइंतजामी जस की तस बनी रहे।

आखिर आंदोलन की कामयाबी लाइक, शेयर और तालियों से नहीं, जिंदगी में आए बदलाव से मापी जानी चाहिए।

एक नारा कॉलेज हिला सकता है। लेकिन असली क्रांति तभी होगी, जब उसका असर सड़क, गांव, दफ्तर और घर तक पहुंचे। जब आम महिला बिना खौफ जी सके, तभी समझिए कि नारेबाजी ने इंसाफ की राह पकड़ी है।


Sunday, October 11, 2026

 कॉकरोच क्रांति का खतरनाक खेल! वोट नहीं मिलते तो सड़कों पर हंगामा, दलीलें खत्म तो गाली गलौज!

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बृज खंडेलवाल द्वारा

13 अक्टूबर 2026

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जब वोटर भाव नहीं देते, तो कुछ नेता सड़क पर उतर आते हैं। जब दलीलें खत्म होती हैं, तो गाली गलौज शुरू हो जाती है। और जब जनता साथ नहीं देती, तो क्रांति का ढोल पीट दिया जाता है।

लीजिए जनाब, स्वागत कीजिए कॉकरोच जनता पार्टी का! इसके सिपहसालार देश की सियासत में इधर उधर रेंग रहे हैं। झोले में न ठोस कार्यक्रम है, न बदलाव का नक्शा। बस शोर शराबा, नफरत और हंगामा खड़ा करने का जुनून है।

ये खुद को जनता के गुस्से का असली नुमाइंदा बताते हैं। दावा करते हैं कि देश उबल रहा है और बस एक चिंगारी की देर है। मगर सवाल है कि इनका एजेंडा क्या है? नेता कौन है? देश को आगे ले जाने का रास्ता क्या है? इन सवालों पर सन्नाटा है। इनके पास नारे हैं, गालियों का गोदाम है और सोशल मीडिया पर वायरल होने वाले मीम्स की दुकान है।

इनका सपना भी दिलचस्प है। नेपाल या बांग्लादेश जैसी सड़क क्रांति भारत में भी हो जाए। हर झगड़े को राष्ट्रीय संकट बना दो और हर संस्था को कटघरे में खड़ा कर दो। फिर उम्मीद करो कि मोदी सरकार बिना चुनाव हारे ही गिर जाए।

वाह रे सियासी शॉर्टकट! जनता के बीच जाने, उसके सवाल सुनने और चुनाव लड़ने की क्या जरूरत है? कैमरे के सामने चिल्लाओ और रातोंरात क्रांतिकारी बन जाओ!

कॉकरोच जनता पार्टी ने कमाल का नुस्खा खोजा है। जनता का भरोसा नहीं जीत सकते, तो उसका गुस्सा भड़काओ। समाधान नहीं दे सकते, तो शक और डर बेचो। चुनाव में विरोधियों को नहीं हरा सकते, तो पूरी व्यवस्था को ही बदनाम कर दो।

लेकिन जनाब, लोकतंत्र कोई कॉकरोच दौड़ नहीं है। यहां मेज के नीचे सबसे तेजी से रेंगने वाला विजेता नहीं बनता। जनता का भरोसा जीतने के लिए जमीन पर उतरना पड़ता है।

भारत की विदेश नीति में बढ़ता आत्मविश्वास भी कुछ लोगों को रास नहीं आता। नई दिल्ली का संदेश साफ है। देश के फैसले राष्ट्रीय हितों के हिसाब से होंगे, किसी विदेशी दबाव में नहीं। अमेरिका हो, रूस हो या यूरोप, भारत सबके साथ अपने हित देखकर रिश्ते बनाना चाहता है।

दुनिया कई ताकतों में बंट रही है। अमेरिका की कुछ नीतियों और एलन मस्क जैसे चर्चित लोगों के विचारों से भारत कई मौकों पर असहमत रहा है। ऐसे माहौल में स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखना जरूरी है।

कॉकरोचों को शायद पता भी नहीं होता कि वे किसकी धुन पर नाच रहे हैं। लेकिन उनकी जहरीली सियासत देश में फूट डालने वाली ताकतों के काम जरूर आ सकती है। हर शोर मासूम नहीं होता और हर क्रांतिकारी नारा बदलाव का पैगाम नहीं लाता।

कॉकरोच टोली को नियम कायदे और संवैधानिक प्रक्रियाएं भारी लगती हैं। उसे हर फैसला तुरंत चाहिए, वह भी शाम की टीवी बहस से पहले।

सुप्रीम कोर्ट वही फैसला दे, जो इन्हें पसंद हो। चुनाव आयोग वही करे, जो इनकी मांग हो। संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति इनके खिलाफ पड़ जाए, तो उसे हटाने की मांग शुरू। बात न बने, तो पूरी व्यवस्था को भ्रष्ट और बेकार घोषित कर दो।

तो क्या अगली बार संसद के फैसले भी हैशटैग से होंगे? क्या जजों के निर्णय ऑनलाइन वोटिंग से तय होंगे? क्या संवैधानिक पदों पर नियुक्तियां जंतर मंतर की नारेबाजी से होंगी?

संविधान पढ़ने की क्या जरूरत, जब व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी हर किसी को लोकतंत्र में पीएचडी बांट रही है!

अदालतों की अपनी प्रक्रिया होती है और संवैधानिक पदों की गरिमा भी जरूरी है। विवादों का फैसला सबूत और कानून के आधार पर होना चाहिए। प्रक्रिया धीमी लग सकती है, लेकिन लोकतंत्र दो मिनट में तैयार होने वाला नूडल नहीं है।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग भी संविधान और कानून के दायरे में परखी जानी चाहिए। विपक्ष को सवाल उठाने और सरकार की आलोचना करने का पूरा हक है। लेकिन सड़क पर भीड़ जुटाकर किसी संवैधानिक पदाधिकारी को हटाने की मांग करना कानूनी प्रक्रिया का विकल्प नहीं हो सकता।

दावा मजबूत है, तो सबूत पेश कीजिए। अदालत का फैसला जरूरी है, तो उसका दरवाजा खटखटाइए। हर विवाद को सड़क का तमाशा बनाने की जरूरत क्या है?

भारत में नियमित चुनाव होते हैं। राजनीतिक दल सरकार की आलोचना कर सकते हैं और जनता से समर्थन मांग सकते हैं। लोकतंत्र का असली मैदान यही है, जहां जनता को अपनी पसंद की सरकार चुनने का अधिकार है।

लेकिन चुनाव जीतना बच्चों का खेल नहीं है। इसके लिए संगठन, भरोसेमंद नेतृत्व और जनता की समस्याओं का समाधान चाहिए। लोगों को रोजगार, अच्छे स्कूल, सस्ता इलाज, साफ हवा, सुरक्षित सड़कें और ईमानदार प्रशासन चाहिए। सिर्फ नारों से पेट नहीं भरता। गालियों से अस्पताल नहीं बनते और मीम्स से नौकरियां पैदा नहीं होतीं।

कॉकरोच टोली को मगर आसान रास्ता पसंद है। एक हंगामेदार प्रदर्शन करो, वीडियो बनाओ, विरोधियों को गालियां दो और टीवी कैमरों का इंतजार करो। कुछ घंटे की शोहरत मिलेगी, फिर अगले दिन नया तमाशा खड़ा कर दो।

लेकिन महंगाई, बेरोजगारी, खराब शिक्षा और लचर स्वास्थ्य सेवाओं पर कौन बात करेगा? कैमरे चले जाएंगे, मगर आम आदमी की मुश्किलें बनी रहेंगी।

मोदी सरकार ने जंतर मंतर पर प्रस्तावित बड़े प्रदर्शन को भारी पुलिस बंदोबस्त के जरिए रोकने का रास्ता चुना। समर्थक इसे कानून व्यवस्था बनाए रखने का कदम मान सकते हैं। आलोचक शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर पाबंदियों को लेकर सवाल उठा सकते हैं।

दोनों पक्षों को एक बात समझनी होगी। कानून व्यवस्था और लोकतांत्रिक आजादी के बीच संतुलन जरूरी है। सरकार हर आलोचक को उपद्रवी नहीं बता सकती। इसी तरह प्रदर्शनकारी भी कानून तोड़ने का खुला लाइसेंस नहीं मांग सकते। संविधान शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार देता है, हिंसा और धमकी की छूट नहीं।

लोकतंत्र में सरकार की जवाबदेही जितनी जरूरी है, विरोध का जिम्मेदार होना भी उतना ही जरूरी है। सत्ता को सवालों से डरना नहीं चाहिए। विपक्ष को भी सवाल पूछने के साथ जवाब देने की तैयारी रखनी चाहिए।

विपक्ष की परेशानी सिर्फ पुलिस की बैरिकेडिंग नहीं है। असली चुनौती जनता के सामने भरोसेमंद विकल्प पेश करना है।

राहुल गांधी और दूसरे विपक्षी नेता नरेंद्र मोदी की रोज आलोचना कर सकते हैं। सरकार की गलतियां उजागर करना उनका अधिकार है। लेकिन केवल आलोचना से सरकार का विकल्प तैयार नहीं होता। जनता जानना चाहती है कि विपक्ष सत्ता में आया, तो करेगा क्या?

नफरत कोई घोषणापत्र नहीं है। तंज कोई रणनीति नहीं है। गाली गलौज नेतृत्व नहीं है और वायरल वीडियो चुनाव जीतने का प्रमाणपत्र नहीं है।

विपक्ष को बताना होगा कि रोजगार कैसे बढ़ेगा, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं कैसे सुधरेंगी, संस्थाओं की रक्षा कैसे होगी और अर्थव्यवस्था किस दिशा में जाएगी। जनता को जवाब चाहिए, राजनीतिक कुश्ती का नया मुकाबला नहीं।

भारत ने युद्ध देखे हैं, आपातकाल झेला है और कई राजनीतिक आंधियां पार की हैं। देश को सतर्क नागरिकों, धैर्य और जिम्मेदार राजनीति की जरूरत है। लोकतंत्र केवल सरकार बनाने का तरीका नहीं है। यह असहमति का सम्मान करने और कानून के सामने सबको जवाबदेह रखने की व्यवस्था भी है।

सबसे बड़ा खतरा तब पैदा होता है, जब राजनीतिक विरोधी एक दूसरे को देश का दुश्मन समझने लगते हैं। नफरत बढ़ती है, तो सबसे पहले आम आदमी पिसता है। निवेश प्रभावित होता है, भरोसा टूटता है और समाज में दरारें गहरी होती हैं।

कॉकरोच टीवी स्टूडियो, धरना स्थलों और सोशल मीडिया पर रेंगते रहेंगे। सुबह देश के पतन की घोषणा करेंगे और शाम को लोकतंत्र का मातम मनाएंगे। हर दिन नया शोर, नया आरोप और नया तमाशा। मगर देश चलाने के लिए केवल तमाशा काफी नहीं है।

उन्हें शोर मचाने दीजिए। लेकिन शोर को जनसमर्थन मत समझिए। गुस्से को समझदारी और हंगामे को सुधार का नाम मत दीजिए। सड़क पर जुटी भीड़ और चुनाव में मिलने वाले वोटों के बीच बड़ा फर्क होता है।

अगर कॉकरोच जनता पार्टी सचमुच जनता की नुमाइंदगी करती है, तो चुनाव मैदान में उतरे। अपना कार्यक्रम बताए, उम्मीदवार खड़े करे और जनता से वोट मांगे। जनता खुद फैसला कर देगी कि इनके नेताओं को सत्ता चाहिए या सिर्फ सुर्खियां।

आखिर लोकतंत्र का सीधा सा उसूल है। आप छत पर चिल्लाइए, गलियारों में रेंगिए या सड़क पर नाचिए। लेकिन एक दिन जनता के सामने जाना ही पड़ेगा।

और उस दिन कॉकरोचों को एक कड़वी हकीकत समझ आएगी। बैलेट बॉक्स नाकाम नेताओं की हताशा फेंकने वाला कूड़ेदान नहीं है। वह जनता की अदालत है, जहां फैसले नारों से नहीं, वोटों से होते हैं।

Saturday, October 10, 2026

 आगरा 2047: यमुना को संवारो, गौरव लौटाओ, विरासत के शहर को खुशहाल बनाओ

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भविष्य की तैयारी आज से शुरू होनी चाहिए  

एक शहर जिसने कभी साम्राज्य की तकदीर लिखी थी, वह आज पर्यटकों की सेल्फी, बदहाल सड़कों और अधूरे वादों के सहारे नहीं जी सकता।  

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बृज खंडेलवाल द्वारा  

12 अक्टूबर 2026  

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कभी सोचा? जब 2047 में भारत अपनी आजादी के सौ साल पूरे करेगा, तब आगरा की पहचान कैसी होगी?  

क्या हमारा शहर सिर्फ ताजमहल देखने आने वाले पर्यटकों की भीड़ तक सिमटकर रह जाएगा? या फिर दुनिया के सामने एक ऐसे ऐतिहासिक शहर की मिसाल बनेगा, जिसने अपनी पुरानी शान को आधुनिक विकास से जोड़ दिया हो?  

आगरा के बारह विधायक, पांच सांसद, अनगिनत नेता, सबको मिलकर फैसला आज करना होगा। आगरा को ऐसा शहर बनाना है, जहां स्वच्छ हवा हो, साफ यमुना हो, सुगम यातायात हो, हरे-भरे पार्क हों और लोगों को रोजगार के बेहतर अवसर मिलें। यहां की ऐतिहासिक विरासत सुरक्षित रहे और आम नागरिक भी सम्मान के साथ जीवन बिता सकें।  

आगरा जिले का क्षेत्रफल लगभग 4,027–4,041 वर्ग किलोमीटर है। नगर निगम क्षेत्र और शहरी विस्तार के अनुमान अलग-अलग स्रोतों में 121 से 188–264 वर्ग किलोमीटर तक बताए जाते हैं। 2011 की जनगणना में शहर की आबादी करीब 15.86 लाख और शहरी समूह (UA) करीब 17.60 लाख थी। आज (2025–26 अनुमान) शहरी/मेट्रो क्षेत्र की आबादी लगभग 25–28 लाख के आसपास बताई जा रही है। विभिन्न अनुमानों में 2030 तक यह 28–32 लाख के करीब पहुंच सकती है। लंबे समय में (2040–50) कुछ अनुमान इससे कहीं ऊंचे आंकड़े  हैं, जबकि यमुना एक्सप्रेसवे किनारे प्रस्तावित न्यू आगरा/अर्बन सेंटर (मास्टर प्लान 2041) अतिरिक्त 12–15 लाख लोगों के आवास की योजना बनाई जा रही  है।  

हर साल ताजमहल अकेले 2024–25 में करीब 69 लाख पर्यटकों (लगभग 62.6 लाख भारतीय + 6.45 लाख विदेशी) को आकर्षित करता है और टिकटेड स्मारकों में शीर्ष पर रहता है। फिर भी शहर बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रहा है। यमुना प्रदूषण, बिगड़ती हवा, जाम, कूड़े के ढेर और अव्यवस्थित निर्माण विकास के दावों पर सवाल उठाते हैं।  

अब वक्त आ गया है कि आगरा के भविष्य की योजना बनाई जाए। वर्ष 2047 दूर जरूर है, लेकिन उसकी तैयारी आज से शुरू करनी होगी।  

शुरुआत यमुना से करें

यमुना आगरा की जीवनरेखा है। लेकिन आज यह नदी शहर की उपेक्षा और प्रशासनिक नाकामी की कहानी कहती है। नालों का गंदा पानी, कूड़ा और प्रदूषण इसकी सांसें रोक रहे हैं। नदी किनारे की जमीन पर भी लगातार दबाव बढ़ रहा है।  

आगरा के विकास की पहली शर्त यमुना का पुनर्जीवन होना चाहिए। शहर के सभी नालों को रोककर उनका पानी शोधित किया जाए। सीवेज शोधन संयंत्रों की क्षमता बढ़े और वे पूरी तरह काम करें। औद्योगिक प्रदूषण पर सख्ती हो। बाढ़ क्षेत्र में अवैध निर्माण रोका जाए।  

रिवर कनेक्ट कैंपेन के सदस्य मांग कर रहे हैं, "यमुना किनारे एक सुव्यवस्थित रिवरफ्रंट विकसित किया जाए। यहां हरित क्षेत्र, पैदल चलने के रास्ते, साइकिल ट्रैक, छायादार स्थान, सार्वजनिक घाट और सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए मंच हों। यमुना में पानी की उपलब्धता और नदी के पुनर्जीवन के लिए आगरा बैराज की मांग पर गंभीरता से आगे बढ़ना चाहिए। लेकिन यह काम केवल राजनीतिक घोषणा या शिलान्यास तक सीमित नहीं रहना चाहिए। बैराज के निर्माण से पहले जल प्रवाह, भूगर्भीय परिस्थितियों, पर्यावरण, गाद, बाढ़ और आसपास के इलाकों पर पड़ने वाले प्रभावों का वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी है। नदी में पर्याप्त स्वच्छ पानी पहुंचाने की व्यवस्था भी होनी चाहिए। इस परियोजना को पूरी यमुना घाटी की योजना से जोड़िए। नदी का प्राकृतिक प्रवाह, पर्यावरणीय जरूरतें और बाढ़ से सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।"

आगरा को बेहतर सार्वजनिक परिवहन की जरूरत है। मेट्रो फेज-1 (कुल लगभग 29.4–29.65 किमी, दो कॉरिडोर) का प्राथमिक हिस्सा पहले से चालू है और पूर्ण संचालन की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यह ताजमहल, आगरा किला, सिकंदरा, आईएसबीटी, मेडिकल कॉलेज और आवासीय क्षेत्रों को जोड़ेगा। शहर की बस सेवा मजबूत हो, इलेक्ट्रिक बसें बढ़ें और मेट्रो का विस्तार यात्रियों की वास्तविक जरूरतों के अनुसार किया जाए। बसों, मेट्रो और दूसरे साधनों के बीच आसान संपर्क होना चाहिए।  

फुटपाथ पैदल चलने वालों के लिए सुरक्षित हों। साइकिल सवारों के लिए अलग ट्रैक बनें। चौराहों पर ट्रैफिक सिग्नल काम करें और जेब्रा क्रॉसिंग पर पैदल यात्रियों को प्राथमिकता मिले। पार्किंग की उचित व्यवस्था हो, ताकि सड़कें वाहनों के कब्जे में न चली जाएं। फ्लाईओवर और चौड़ी सड़कें कुछ समस्याएं सुलझा सकती हैं, लेकिन हर समस्या का इलाज कंक्रीट नहीं है। आधुनिक शहर वही है, जहां बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं और दिव्यांग लोग सुरक्षित ढंग से चल सकें।  

ताजमहल आगरा की पहचान है, लेकिन आगरा की विरासत केवल ताजमहल तक सीमित नहीं है। आगरा किला, फतेहपुर सीकरी, पुराने बाजार, मुगलकालीन इमारतें, पेठा, जूते, संगमरमर की नक्काशी और ब्रज की सांस्कृतिक परंपराएं भी इसकी ताकत हैं।  

इन सबको जोड़कर पर्यटन का व्यापक नेटवर्क तैयार किया जाए। पर्यटकों के लिए साफ-सुथरे रास्ते, बेहतर परिवहन, अच्छी जानकारी, स्थानीय भोजन और नियमित सांस्कृतिक कार्यक्रम उपलब्ध हों। उन्हें कुछ घंटे नहीं, बल्कि दो-तीन दिन आगरा में बिताने के लिए प्रेरित किया जाए। इससे स्थानीय दुकानदारों, शिल्पकारों, गाइडों, कलाकारों और युवाओं को रोजगार मिलेगा। पर्यटन का लाभ बड़े कारोबारियों तक सीमित न रहे। छोटे उद्यमियों को भी अवसर मिलें। आगरा को केवल स्मारकों का शहर नहीं, बल्कि जीवंत संस्कृति और रचनात्मक कारोबार का केंद्र बनाना होगा।  

आगरा की अर्थव्यवस्था पर्यटन के अलावा चमड़ा-जूता उद्योग (देश के बड़े क्लस्टरों में से एक, लाखों लोगों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रोजगार), हस्तशिल्प (संगमरमर इनले आदि) और उभरते सेवा क्षेत्र पर टिकी है। न्यू आगरा अर्बन सेंटर (लगभग 14,480 हेक्टेयर, यमुना एक्सप्रेसवे किनारे, मास्टर प्लान 2041) में गैर-प्रदूषणकारी उद्योग, पर्यटन जोन, आवास (HIG/MIG/LIG/EWS) और लगभग 10 लाख रोजगार के लक्ष्य रखे गए हैं। आवास की कमी और अनियोजित विस्तार को रोकने के लिए पानी-सीवर-स्कूल-अस्पताल-परिवहन की पूर्ण व्यवस्था के बाद ही नए क्षेत्र विकसित होने चाहिए।  

शिक्षा में डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, दयालबाग एजुकेशनल इंस्टीट्यूट (डीम्ड), आगरा कॉलेज तथा मेडिकल-इंजीनियरिंग कॉलेज मौजूद हैं। स्वास्थ्य में सरोजिनी नायडू मेडिकल कॉलेज (सरकारी, ऐतिहासिक) के साथ कई निजी मल्टी-स्पेशलिटी अस्पताल (अपोलो, मैनिपल, फोर्टिस आदि) काम कर रहे हैं। खेल में एकलव्य स्पोर्ट्स स्टेडियम (हॉकी एस्ट्रो टर्फ सहित), सदर स्टेडियम और निजी टर्फ/क्लब सक्रिय हैं। न्यू आगरा योजना में स्पोर्ट्स विलेज, गोल्फ कोर्स आदि का भी उल्लेख है। इंडोर स्टेडियम जैसे प्रस्तावों को जमीन पर उतारना जरूरी है।  

आगरा के भविष्य की योजना में हरियाली, पानी और स्वच्छता को विशेष स्थान मिलना चाहिए। पुराने तालाबों को पुनर्जीवित किया जाए। वर्षा जल संचयन अनिवार्य हो। कूड़े का वैज्ञानिक निपटारा हो और सार्वजनिक स्थानों की नियमित सफाई सुनिश्चित की जाए। शहर के आसपास की खेती की जमीन और प्राकृतिक जलमार्गों को अंधाधुंध निर्माण से बचाना होगा।  

पर्यावरणविद डॉ देवाशीष भट्टाचार्य कहते हैं, "सबसे जरूरी है प्रशासनिक जवाबदेही। हर बड़ी परियोजना का बजट, समयसीमा और प्रगति रिपोर्ट सार्वजनिक हो। प्रदूषण के आंकड़े नागरिकों के सामने रखे जाएं। योजनाएं बनाते समय स्थानीय लोगों, विशेषज्ञों, पर्यावरणविदों और सामाजिक संगठनों की राय ली जाए। काम की सफलता का पैमाना शिलान्यास और उद्घाटन की संख्या नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाला बदलाव होना चाहिए। "

आगरा को किसी दूसरे शहर की नकल करने की जरूरत नहीं है। उसे अपनी ऐतिहासिक पहचान, प्राकृतिक संपदा और सांस्कृतिक ताकत के आधार पर आगे बढ़ना है। इसके लिए 2047 तक का स्पष्ट विकास खाका तैयार हो। पहले पांच साल की प्राथमिकताएं तय हों। फिर हर चरण की समीक्षा की जाए। नगर निगम, विकास प्राधिकरण, जिला प्रशासन, राज्य सरकार और केंद्र के बीच बेहतर तालमेल बने। नागरिकों को भी इस अभियान का भागीदार बनाया जाए।  

ताजमहल ने आगरा को दुनिया में पहचान दिलाई। अब स्वच्छ यमुना, बेहतर जीवन और खुशहाल नागरिक इसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकते हैं।  

सवाल यह नहीं है कि आगरा 2047 तक कितना बदल सकता है। असली सवाल यह है कि बदलाव की शुरुआत कब होगी।  

अगर योजना आज नहीं बनेगी, तो 2047 भी वादों का एक और पड़ाव बनकर रह जाएगा। आगरा का भविष्य इंतजार नहीं कर सकता।

 भारत में जन्मदिनों का मौसम!

 सितंबर-अक्टूबर में क्यों बरसते हैं जन्मदिन?


बृज खंडेलवाल द्वारा

10 अक्टूबर 2026


गाँवों में होली के आसपास बच्चों की किलकारियाँ ज्यादा सुनाई देती हैं, तो शहरों में मानसून के दौरान जन्मदिनों की बहार आती है! आखिर माजरा क्या है? क्या ग्रह-नक्षत्र बच्चों के जन्म की तारीख तय करते हैं, या फिर हमारी शादी-ब्याह की परंपराएँ इसके पीछे हैं? और क्या सरकारी बाबू भी इसमें कोई गुल खिला रहे हैं?


जरा अपने दोस्तों, रिश्तेदारों और दफ्तर के साथियों की जन्मतिथियों पर गौर कीजिए। सितंबर और अक्टूबर आते ही जन्मदिनों की झड़ी लग जाती है। व्हाट्सऐप पर बधाइयों की बाढ़ आ जाती है। केक कटते हैं, मोमबत्तियाँ बुझती हैं और तस्वीरें सोशल मीडिया पर चमकने लगती हैं। लगता है, मानो इन दो महीनों को ही जन्मदिन मनाने का ठेका मिला हो!


सितंबर-अक्टूबर में जन्म लेने वाली मशहूर हस्तियों की फेहरिस्त भी लंबी है। अमिताभ बच्चन, रेखा, शबाना आजमी, करीना कपूर, रणबीर कपूर और प्रभास जैसे फिल्मी सितारे इस सूची में शामिल हैं। राजनीति और सार्वजनिक जीवन की बात करें तो नरेंद्र मोदी, महात्मा गांधी, लाल बहादुर शास्त्री और ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जैसी हस्तियों की जन्मतिथियाँ भी इन्हीं महीनों में पड़ती हैं। लता मंगेशकर और आशा पारेख जैसे नाम भी इस चर्चा को दिलचस्प बनाते हैं। अगर आपका जन्मदिन भी इन महीनों में आता है, तो खुद को इस अनौपचारिक सितारा क्लब का सदस्य समझिए!


लेकिन इस जन्मदिन बहार का राज क्या है? ज्योतिष, संयोग या सामाजिक परंपराएँ?


ज्योतिष वेबसाइट एस्ट्रोसेज के आँकड़ों के अनुसार, उसके उपयोगकर्ताओं में 10 अक्टूबर जन्मदिन की सबसे आम तारीख बताई गई। इस तारीख को 1,40,091 लोगों ने दर्ज किया था। इसके बाद 15 अगस्त का नंबर आया। दस-दस की यह तारीख देखने में भी आकर्षक है। मगर सवाल है कि क्या इसके पीछे सितारों का हाथ है या इंसानी आदतों का?


एक ज्योतिषी ने इसकी वजह दिसंबर की शादियों को बताया। उनका तर्क सीधा है। दिसंबर में शादियाँ हुईं, तो नौ महीने बाद अक्टूबर में बच्चों की आमद बढ़ गई। बात में दम लगता है, लेकिन कहानी इतनी सीधी भी नहीं है।


भारत में जन्मतिथियों का सरकारी रिकॉर्ड हमेशा भरोसेमंद नहीं रहा। कई दशक पहले गाँवों और कस्बों में जन्म की सही तारीख दर्ज करना जरूरी नहीं समझा जाता था। कई माता-पिता सुविधा के लिए पहली, दसवीं या पंद्रहवीं तारीख लिखवा देते थे। स्कूल में दाखिले और कागजी काम के लिए भी ऐसी तारीखें सुविधाजनक थीं। यानी 10 अक्टूबर का जलवा कभी-कभी ज्योतिष का चमत्कार नहीं, बल्कि सरकारी रजिस्टर का कमाल भी हो सकता है!


वैज्ञानिक नजरिए से देखें तो भारत में सितंबर में जन्मों की संख्या अक्सर अधिक रहती है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के 2019-21 के आँकड़ों के मुताबिक, साल के कुल जन्मों में सितंबर की हिस्सेदारी लगभग 9.3 प्रतिशत थी। अगस्त से नवंबर तक के चार महीनों में करीब 37 प्रतिशत जन्म दर्ज हुए।


इसका संबंध हमारे शादी-ब्याह के कैलेंडर से भी है। भारत में नवंबर से फरवरी तक शादियों की धूम रहती है। मौसम सुहाना होता है, शुभ मुहूर्त मिलते हैं और बैंड-बाजे रात भर बजते हैं। इसके नौ-दस महीने बाद बच्चों की किलकारियाँ गूँजने लगती हैं। कह सकते हैं कि सर्दियों की शादियाँ मानसून के बच्चों की राह खोलती हैं!


शहरों में कहानी का एक नया मोड़ भी है। कुछ माता-पिता बच्चों के स्कूल में दाखिले को ध्यान में रखकर जन्म का समय तय करने की कोशिश करते हैं। उम्र की सीमा और दाखिले की तारीखों के कारण परिवारों में हिसाब-किताब चलता है। अब बच्चे केवल प्यार की निशानी नहीं, बल्कि दाखिले के कैलेंडर का हिस्सा भी बनते जा रहे हैं! हालाँकि, हर परिवार ऐसा करता है, यह मानना गलत होगा।


भारत अकेला नहीं है। अमेरिका में भी सितंबर में जन्मदिनों की संख्या अधिक देखी गई है। वहाँ क्रिसमस और नए साल की छुट्टियों के दौरान परिवारों के साथ बिताया गया समय इसकी एक संभावित वजह माना जाता है। भारत में शादी की शहनाई और पश्चिम में क्रिसमस की घंटियाँ, दोनों के बाद नौ महीने का हिसाब दिलचस्प नतीजे दिखा सकता है।


मगर इस हँसी-मजाक के पीछे एक गंभीर मसला भी छिपा है। जन्म का सही रिकॉर्ड न होने से सरकारी योजनाओं, कानूनी दस्तावेजों और जनसंख्या संबंधी अध्ययनों में परेशानी होती है। डिजिटल पंजीकरण और अस्पतालों में रिकॉर्ड रखने की व्यवस्था बेहतर हुई है, लेकिन हर जन्म का सटीक हिसाब रखना आज भी जरूरी है।


तो अगली बार कोई कहे कि उसका जन्मदिन 10 अक्टूबर को है, तो मुस्कराइए। हो सकता है सितारों की मेहरबानी हो, सर्दियों की किसी शादी का असर हो, या फिर पुराने जमाने के किसी बाबू ने तारीख गोल कर दी हो!


कारण जो भी हो, सितंबर भारत के जन्मदिन कैलेंडर का बड़ा खिलाड़ी दिखाई देता है। आखिर प्रकृति, परंपरा और सरकारी कागजों की इस मिली-जुली महफिल में केक तो किसी न किसी का कटना ही है!


Friday, October 9, 2026

 पापी तेल का सवाल है!

महान चक्कर: लड़ कौन रहा है, किससे?
एलिस अगर वंडरलैंड से युद्धभूमि में पहुँच जाए, तो शायद यही पूछे!
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By Ponga Pakhandi

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ज़रा ठहरो! दुनिया में आखिर लड़ कौन रहा है, और किससे? ईरान इजरायल से, रूस यूक्रेन से, अमेरिका रूस को सबक सिखा रहा है, और यूरोप शांति के भाषण दे रहा है। भारत क्रूड साफ कर रहा है। और तेल? वह सबके पहिए में ग्रीस लगा रहा है, ताकि कोई चरमराए नहीं, चाहे ग्लोबल वार्मिंग से दुनिया क्यों न उबल जाए।

एलिस आज वंडरलैंड से निकलकर इस तेल बाजार में पहुंची, तो उसका पहला सवाल था : “भाई, यहाँ दुश्मन कौन है? और दोस्त कौन, जो दुश्मन की कमाई से अपनी दोस्ती का बिल भर रहा है?” उसको बताया गया: रूस के किसी कुएँ से एक बैरल टैंकर पर चढ़ता है। बेचारे को क्या खबर कि उसका अगला सफर इतिहास की सबसे बड़ी नैतिक नौटंकी बनेगा ।

क्रूड का टैंकर पहुँचता है जामनगर। भारत उसे डिस्काउंट पर खरीदता है और कहता है, “यह हमारी रणनीतिक आजादी है।” ट्रंप कहते हैं, “यह तो पुतिन की जेब भरना है।” बैरल मन ही मन बुदबुदाता है, “हुजूर, मैं तो सिर्फ तेल हूँ। आप अपने उसूलों का भाव खुद तय कर लीजिए, मेरा तो बस मार्केट रेट है!”

फिर रिफाइनरी की भट्ठी में बैरल तपता है और बाहर निकलता है, भारतीय डीजल बनकर। रसायन वही, गंध वही, पर कागज़ों में मानो गंगा नहाकर आया हो। हर-हर गंगे, हर-हर लीटर!

यह दुनिया की सबसे अनोखी आध्यात्मिक यात्रा है। रिफाइनरी में तेल शुद्ध होता है, राजनीति में पाप पुण्य बन जाता है। प्रतिबंध गेट के बाहर चप्पल उतारकर खड़े रहते हैं, मुनाफा सबकी जेबों को गरम करके लौटता है।

अब यूरोप का कमाल देखिए। सुबह रूसी तेल पर प्रतिबंध की प्रेस कॉन्फ्रेंस होती है। दोपहर तक भारतीय डीजल के टैंकर उसके दरवाज़े पर होते हैं। शाम को भारत को नैतिकता की क्लास मिलती है, और क्लास की फीस भी डीजल में ही कटती है।

यूरोप सीना ठोककर कहता है, “हम रूसी तेल नहीं खरीदते!” बिल्कुल नहीं जनाब! वे तो भारतीय डीजल खरीदते हैं, जिसने रूस से निकलकर भारत में सभ्यता की तमीज़ सीख ली है, जैसे कोई गाँव का लड़का विदेश से लौटकर अंग्रेज़ी बोलने लगे।

तेल रूसी, मेहनत भारतीय, ग्राहक यूरोपीय, और नैतिकता का सर्टिफिकेट यूरोप ने खुद ही प्रिंट आउट निकल कर बाँट दिए। इसे कहते हैं आत्मनिर्भर पाखंड!

अमेरिका भी क्यों पीछे रहे? उसे गुस्सा आता है कि भारत रूस से तेल क्यों खरीदता है। वह टैरिफ की लाठी उठाता है और सिद्धांतों का पाठ शुरू करता है। लेकिन जब रूसी संवर्धित यूरेनियम के अमेरिकी आयात का ज़िक्र छिड़ता है, तो सिद्धांतों का वॉल्यूम अचानक म्यूट हो जाता है।

आखिर उसूल भी पेट्रोल जैसे हैं: इस्तेमाल से पहले अपनी सुविधा के हिसाब से रिफाइन करने पड़ते हैं!

रुको, कहानी अभी बाकी है!

यूक्रेन को युद्ध के लिए डीजल चाहिए, और डीजल बनता है रूसी तेल से भारत में। यूरोप यूक्रेन को मदद देता है, यूक्रेन उससे ईंधन खरीदता है, ईंधन का पैसा घूमकर रूसी तेल के अगले सौदे तक पहुँचता है, और रूस उसी पैसे से युद्ध चलाता रहता है। फिर यूक्रेन कहता है, “और मदद चाहिए!”

यानी एक हाथ से आग बुझाओ, दूसरे से पेट्रोल खरीदो, और तीसरे हाथ से अगले राहत पैकेज की अर्जी लिखो। वैश्विक कूटनीति में इसे “बहुआयामी संलग्नता” कहते हैं। आम भाषा में इसे बिना ब्रेक की मेरी-गो-राउंड कहा जाता है।
एलिस घबराकर पूछती है, “माफ कीजिए, क्या यहाँ कोई पागलखाना है?”

जवाब मिला, “नहीं बच्ची, वो तो आगरा में है। यहाँ तो अंतरराष्ट्रीय कूटनीति है। यहाँ पागलपन को रणनीति कहते हैं और विरोधाभास को राष्ट्रीय हित!”

रूस की विडंबना भी कम मज़ेदार नहीं। जिस दुश्मन से वह लड़ रहा है, उसकी गाड़ियाँ शायद उसी तेल की बूँदों से चल रही हों जो घूम-फिरकर वापस आई हों। 

खेल समझो बाबू! 

रूस: तेल बेचकर कमाई भी, युद्ध का खर्चा भी। दुश्मन से लड़ाई जारी, बाज़ार से उधारी बंद।
यूक्रेन: रूस से जंग, पर ईंधन की नब्ज़ उसी उलझी सप्लाई चेन में। दुश्मन की जेब पर वार करना है, पर टंकी भी भरवानी है।
यूरोप: मदद यूक्रेन की, प्रतिबंध रूस पर, और ज़रूरत पड़ी तो ईंधन भारतीय रिफाइनरी से। नैतिकता का झंडा ऊँचा, ऊर्जा की ज़रूरत उससे भी ऊँची।
अमेरिका: रूस पर सख्ती, भारत पर दबाव, अपने हितों पर लचीलापन। उसूलों का डंडा दूसरों के लिए, छूट का छाता खुद के लिए!

भारत: सस्ता क्रूड खरीदो, उपयोगी ईंधन बनाओ, रोज़गार और मुनाफा कमाओ। तर्क है: “फैसले राष्ट्रीय हित से होते हैं।” बाकी दुनिया इसे अपने-अपने चश्मे से देखती है, और चश्मे भी शायद उसी तेल के प्लास्टिक से बने हैं।
और तेल का बैरल? कन्फ्यूज़्ड! वह तो बस इतना जानता है कि वह जिस भी घाट पर रुका, वहाँ कोई न कोई उसे अपना बताकर बाकियों को उपदेश देने लगा।

तो आखिर में जीत किसकी हो रही है?
एलिस का आखिरी सवाल: “अगर रूस बेचकर कमाता है, भारत साफ करके कमाता है, यूरोप खरीदकर गाड़ियाँ चलाता है और यूक्रेन उसी से जंग लड़ता है, तो इस कहानी में हार कौन रहा है?”

खैर, हमें क्या? 

यह तेल का चक्कर उस जहाज़ जैसा है जो समुद्र में अपनी जगह टिके रहने के लिए ही ईंधन फूँकता रहता है। इंजन दहाड़ता है, खर्चा बढ़ता है, धुआँ उठता है, पर जहाज़ आगे बढ़ने के बजाय एक ही जगह गोल-गोल घूमता है। फिर भी कप्तान माइक पर घोषणा करते हैं: “सब कुछ नियंत्रण में है!”

यही तो असली वंडरलैंड है। और जब तेल का पैसा गोल-गोल घूम रहा है, तो सवाल सिर्फ एक बचता है: क्या युद्ध भी उसी चक्कर में घूमता रहेगा, या कभी टंकी खाली होगी?

Thursday, October 8, 2026

 मोदी सरकार की एक बेहतरीन कामयाबी

जीएसटी से पहले और आज: 

बदली तस्वीर, क्या आसान हुई व्यापार की राह?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

10 अक्टूबर 2026

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कितना बदला कारोबार का चेहरा?



कल्पना कीजिए, जुलाई 2017 से पहले का भारत। आगरा से दिल्ली जा रहा एक ट्रक रास्ते में बार बार रुकता है। कहीं चुंगी, कहीं प्रवेश कर, तो कहीं कागजों की जांच। घंटों की देरी से माल पहुंचता है और खर्च बढ़ जाता है। आखिरकार इस बोझ का कुछ हिस्सा ग्राहक की जेब से निकलता है।

दुकानदारों की मुश्किलें भी कम नहीं थीं। उत्तर प्रदेश में अलग टैक्स, दिल्ली में अलग नियम और दूसरे राज्यों में अलग हिसाब किताब। कागजात का ढेर, सरकारी दफ्तरों के चक्कर और एक टैक्स के ऊपर दूसरा टैक्स। कारोबार करना आसान नहीं था। टैक्स की दरों में अंतर का फायदा उठाकर कुछ लोग कर चोरी भी करते थे।

फिर आया जीएसटी का दौर।

1 जुलाई 2017 को नरेंद्र मोदी सरकार ने वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी लागू किया। इसका नारा था, ‘एक देश, एक कर’। मकसद साफ था। देश में टैक्स की बिखरी व्यवस्था को एक करना, कारोबार आसान बनाना और कर चोरी के रास्ते बंद करना।

पहले केंद्र सरकार कारखानों में बने सामान पर उत्पाद शुल्क और सेवाओं पर सेवा कर लगाती थी। राज्य सरकारें बिक्री कर, प्रवेश कर और चुंगी जैसे कई कर वसूलती थीं। हर राज्य के नियम अलग होने से व्यापारियों को परेशानी होती थी। कई बार पहले चुकाए गए टैक्स का पूरा फायदा भी नहीं मिलता था। इस तरह एक ही सामान पर बार बार टैक्स का बोझ बढ़ता जाता था।

जीएसटी ने इस व्यवस्था के बड़े हिस्से को एक ढांचे में ला दिया। अब राज्य के भीतर कारोबार पर केंद्र और राज्य का अपना अपना हिस्सा होता है। राज्यों के बीच बिक्री के लिए अलग व्यवस्था है। पहले खरीदे गए सामान पर चुकाए टैक्स का उचित हिसाब मिलने से टैक्स पर टैक्स का बोझ भी कम हुआ।

ऑनलाइन पंजीकरण, टैक्स रिटर्न और भुगतान की सुविधा ने कागजी कामकाज घटाने में मदद की। राज्यों की सीमाओं के पार माल भेजना भी पहले से आसान हुआ।

जीएसटी की एक बड़ी खासियत है कि इसमें लेनदेन का हिसाब रखना पहले से आसान हुआ है। ई वे बिल, ई इनवॉइस और ऑनलाइन रिकॉर्ड से माल की आवाजाही तथा टैक्स भुगतान पर नजर रखना आसान हुआ। टैक्स क्रेडिट के लिए भी खरीद और बिक्री का हिसाब जरूरी है। इससे फर्जी बिलों और टैक्स चोरी को पकड़ने में मदद मिली है।

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं कि कर चोरी पूरी तरह खत्म हो गई। फर्जी बिलिंग और नियमों से बचने के तरीके आज भी सामने आते हैं। लेकिन डिजिटल निगरानी ने ऐसे मामलों पर कार्रवाई के नए रास्ते खोले हैं।

जीएसटी के दायरे में आने वाले कारोबारियों की संख्या भी बढ़ी है। शुरुआती वर्षों में करीब 65 से 67 लाख पंजीकृत करदाता थे। जून 2026 तक यह संख्या लगभग 1.67 करोड़ बताई गई। इसका अर्थ है कि अधिक कारोबार अब टैक्स व्यवस्था के दायरे में आ रहे हैं। इसमें नए कारोबारों के साथ बेहतर पंजीकरण और अनुपालन की भी भूमिका है।

टैक्स संग्रह के आंकड़े भी बढ़ोतरी दिखाते हैं। सितंबर 2026 में सकल जीएसटी संग्रह 2,03,521 करोड़ रुपये रहा। यह पिछले साल के मुकाबले 14.7 प्रतिशत अधिक था। अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच कुल सकल संग्रह 12.46 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। बढ़ते संग्रह में आर्थिक गतिविधियों, बेहतर अनुपालन और कर चोरी रोकने के प्रयासों का योगदान हो सकता है।

जीएसटी लागू होने के बाद छोटे व्यापारियों को तकनीकी दिक्कतों, जटिल नियमों और रिटर्न भरने की परेशानियों का सामना करना पड़ा। कारोबारियों को कई बार समझ नहीं आता था कि कौन सा नियम कब लागू होगा। राज्यों को भी राजस्व में कमी की चिंता थी। केंद्र की मुआवजा व्यवस्था ने शुरुआती वर्षों में राज्यों को राहत दी।

समय के साथ नियमों और ऑनलाइन व्यवस्था में बदलाव किए गए। छोटे कारोबारियों के लिए कुछ आसान योजनाएं बनाई गईं। रिफंड की प्रक्रिया तेज करने और कागजी काम घटाने के प्रयास भी हुए। हालांकि, इन सुविधाओं का लाभ पात्रता और लागू नियमों पर निर्भर करता है।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के सामने अब भी यही चुनौती है कि व्यवस्था को सरल बनाया जाए। छोटे दुकानदारों, कारीगरों, महिला उद्यमियों और ग्रामीण कारोबारियों को अनावश्यक परेशानी से बचाना जरूरी है। ट्रकों को रास्ते में बेवजह रोकने के बजाय जांच ठोस सूचना और नियमों के आधार पर होनी चाहिए।

जीएसटी की कहानी सिर्फ एक नए टैक्स की कहानी नहीं है। इसने देश के अलग अलग बाजारों को जोड़ने और कारोबार के लिए साझा व्यवस्था बनाने में मदद की है। टैक्स संग्रह बढ़ा है और लेनदेन पर निगरानी मजबूत हुई है। लेकिन बढ़ते राजस्व का पूरा श्रेय केवल जीएसटी को देना भी सही नहीं होगा।

यही सबसे बड़ा सवाल है। व्यापारी का समय और पैसा बचना चाहिए। ट्रक कम रुकें, कारोबारियों को कम कागजी झंझट झेलना पड़े और कर चोरी पर लगाम लगे। साथ ही, टैक्स का फायदा आम ग्राहक तक भी पहुंचना चाहिए।

मित्तल साहब की बात गौर करने लायक है। वे कहते हैं, “सुधार तभी सफल माना जाएगा, जब ट्रक समय पर पहुंचे, व्यापारी बेवजह न उलझे और ग्राहक को उचित कीमत पर सामान मिले।”



 


बारह साल बाद भी मंज़िल दूर क्यों?

वादों और डिलीवरी के बीच बढ़ता फासला?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

9 अक्टूबर 2026

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2014 में दो करोड़ नौकरियां हर साल देने का वादा कहां गया?

क्या हमारी नदियां सचमुच साफ हो गईं?

क्या शहर स्मार्ट हो गए या सिर्फ स्मार्ट बोर्ड लग गए?

भ्रष्टाचार कम हुआ या हमने उसके साथ जीना सीख लिया?

और बारह साल बाद आखिर वादे और डिलीवरी के बीच कितनी दूरी तय हुई?

ये किसी विश्वविद्यालय के शोध के सवाल नहीं हैं। ये वे सवाल हैं जो लोग चाय की दुकानों पर, घरों में, दफ्तरों में और रेलवे प्लेटफॉर्म पर पूछते हैं।

2014 में नरेंद्र मोदी बदलाव के बड़े वादे के साथ सत्ता में आए थे। रोजगार, साफ-सुथरा शासन, बेहतर बुनियादी ढांचा, तेज विकास और नया भारत।

इसमें कोई शक नहीं कि इन बारह वर्षों में बहुत कुछ हुआ है। सड़कें बनीं। हवाई अड्डे बढ़े। डिजिटल सेवाओं का विस्तार हुआ। दुनिया में भारत की आवाज पहले से ज्यादा सुनाई देने लगी।

लेकिन राजनीति कोई पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन नहीं है।

एक समय के बाद आम आदमी सीधा सवाल करता है, "ठीक है, लेकिन मेरी जिंदगी में क्या बदला?"

यहीं से कहानी थोड़ी असहज हो जाती है।

स्वच्छ भारत: शौचालय बने, लेकिन आगे क्या हुआ?

स्वच्छ भारत अभियान सरकार की सबसे दिखाई देने वाली योजनाओं में था। लाखों शौचालय बने। यह निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि थी।

लेकिन शौचालय बन जाना और स्वच्छता आ जाना एक बात नहीं है।

कई शौचालय बंद पड़े हैं। कई में पानी नहीं है। कई गांवों को खुले में शौच से मुक्त घोषित कर दिया गया, लेकिन बाद में उनकी सही जांच नहीं हुई। कूड़ा और सीवेज प्रबंधन अब भी कमजोर है।

और एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि मैला ढोने की प्रथा पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।

हमने शौचालय तेजी से बनाए। लेकिन उनके इस्तेमाल और रखरखाव की आदत उतनी तेजी से नहीं बदली।

यही कहानी नमामि गंगे की भी है।

गंगा की सफाई पर हजारों करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बने। योजनाएं बनीं। उद्घाटन हुए। भाषण हुए।

लेकिन सीवेज आज भी नदी में पहुंच रहा है।

नदी दुर्भाग्य से सरकारी प्रेस विज्ञप्तियां नहीं पढ़ती।

उसे सिर्फ यह पता होता है कि पानी में आखिर जा क्या रहा है।

स्मार्ट सिटी और पुराने सवाल

फिर आया स्मार्ट सिटी मिशन।

विचार अच्छा था। आखिर कौन स्मार्ट शहर नहीं चाहता?

लेकिन कई जगह "स्मार्ट सिटी" का मतलब स्मार्ट मोहल्ला बनकर रह गया।

कुछ सड़कें चमका दी गईं। कैमरे लग गए। वाई-फाई आया। कमांड सेंटर बन गए।

उधर आम नागरिक नालियों, कूड़े, ट्रैफिक, टूटी फुटपाथों और कमजोर सार्वजनिक परिवहन से जूझता रहा। आगरा को ही देख लो! 

स्मार्ट सिटी की असली परीक्षा बहुत आसान है।

एक पैदल यात्री से पूछिए।

क्या वह सड़क सुरक्षित तरीके से पार कर सकता है?

एक साइकिल वाले से पूछिए।

क्या वह अपनी जान जोखिम में डाले बिना साइकिल चला सकता है?

एक रोज आने-जाने वाले से पूछिए।

क्या वह दो घंटे ट्रैफिक में फंसे बिना दफ्तर पहुंच सकता है?

अगर जवाब नहीं है तो शहर को अभी स्मार्ट होने में कुछ वक्त लगेगा।

वे सुधार जिनकी चर्चा कोई नहीं करना चाहता

सड़कें और पुल दिखाई देते हैं। संस्थागत सुधार दिखाई नहीं देते।

2006 में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस सुधार के निर्देश दिए थे। लेकिन उनका पूरा पालन अब तक नहीं हुआ। पुलिस में खाली पद, राजनीतिक हस्तक्षेप और हिरासत में अत्याचार जैसे सवाल बने हुए हैं।

शिक्षा व्यवस्था भी बार-बार परीक्षा पेपर लीक और बेरोजगार युवाओं के सवाल से घिरती है।

अदालतों में मुकदमों का बोझ बढ़ता जा रहा है। सरकारी अस्पतालों पर दबाव बना हुआ है।

इन समस्याओं का समाधान किसी भवन का उद्घाटन करके नहीं होता।

संस्थागत सुधार राजनीति का सबसे नीरस काम है।

न रिबन काटना है, न बड़ा पोस्टर लगाना है, न ड्रोन से तस्वीर खिंचवानी है।

लेकिन देश को सही ढंग से चलाने के लिए यही उबाऊ काम सबसे जरूरी है।

और नौकरियों का क्या हुआ?

शायद कोई दूसरा वादा इतना पीछा नहीं करता जितना रोजगार का सवाल।

2014 में देश के युवाओं में बड़ी उम्मीद जगी थी। हर साल करीब दो करोड़ नौकरियों का वादा राजनीतिक चर्चा का हिस्सा बन गया था।

बारह साल बाद भी बेरोजगारी और अधरोजगारी बड़ी चिंता हैं। पढ़े-लिखे युवाओं के लिए रोजगार का संकट और गंभीर है।

यहां आंकड़ों और जिंदगी का फर्क साफ दिखाई देता है।

डिग्री जीडीपी नहीं खाती। नौकरी चाहिए।

एक परिवार आर्थिक विकास की दर देखकर खुश नहीं होता। वह महीने का राशन, गैस सिलेंडर, स्कूल की फीस, बिजली का बिल और मकान का किराया देखता है।

इसीलिए बेरोजगारी और महंगाई बार-बार जनता की सबसे बड़ी चिंताओं में लौट आती हैं।

किसान अब भी इंतजार में

2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का वादा भी पूरा नहीं हुआ।

2020 के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों ने करीब एक साल तक आंदोलन किया। आखिरकार सरकार को कानून वापस लेने पड़े।

उन कानूनों के पक्ष या विपक्ष में अलग-अलग राय हो सकती है। लेकिन उस आंदोलन ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा किया।

क्या बड़े सुधार ऊपर से थोपे जाएंगे और जनता को बाद में समझाए जाएंगे?

लोकतंत्र में यह तरीका हमेशा सफल नहीं होता।

किसान को सहानुभूति के भाषण नहीं चाहिए। उसे भरोसेमंद आय चाहिए। उचित कीमत चाहिए। पानी और बिजली चाहिए। ऐसा बाजार चाहिए जो ज्यादा पैदा करने पर भी उसे सजा न दे।

विकास और पर्यावरण की लड़ाई

भारत को विकास चाहिए। इसमें किसी को आपत्ति नहीं हो सकती।

भारत के कई शहर आज भी दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में हैं। शहरी बाढ़ लगभग मौसमी समस्या बन गई है। ट्रैफिक बढ़ रहा है। तालाब और प्राकृतिक जल निकासी के रास्ते लगातार खत्म हो रहे हैं।

हम टिकाऊ विकास की बात बहुत करते हैं।

कभी-कभी लगता है कि हमें "विकास" शब्द तो याद रहता है, लेकिन "टिकाऊ" भूल जाते हैं।

भ्रष्टाचार का सवाल

कभी भ्रष्टाचार कांग्रेस के खिलाफ भाजपा का सबसे बड़ा हथियार था।

भाजपा एक साफ विकल्प बनकर सत्ता में आई थी।

लेकिन अब भ्रष्टाचार ने भारतीय राजनीति में एक नया शब्द पा लिया है।

"वॉशिंग मशीन।"

कोई नेता सीबीआई, ईडी या आयकर विभाग की जांच में घिरता है। फिर राजनीतिक समीकरण बदलते हैं। नेता पाला बदलता है। और देखते-देखते राजनीतिक माहौल बदल जाता है।

अजीत पवार का राजनीतिक सफर आलोचकों द्वारा अक्सर उदाहरण के रूप में पेश किया जाता है।

कल तक भ्रष्टाचार के आरोप।

आज राजनीतिक साझेदारी।

सवाल सीधा है।

क्या पार्टी बदलते ही आरोप भी धुल जाते हैं?

सच यह है कि भारतीय राजनीति में यह बीमारी नई नहीं है। पार्टियां दशकों से दलबदलुओं को खरीदती, उधार लेती और गले लगाती रही हैं।

लेकिन भाजपा ने कभी खुद को अलग बताया था।

इसीलिए यह आलोचना ज्यादा चुभती है।

अगर कल का कथित भ्रष्ट नेता आज सम्मानित सहयोगी बन जाता है तो कल के भ्रष्टाचार का क्या हुआ?

क्या वह खत्म हो गया?

या नेता ने सिर्फ वॉशिंग मशीन बदल ली?

वह पार्टी जो अलग होने का दावा करती थी

भाजपा की 2014 की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत यही थी कि वह खुद को अलग पार्टी बताती थी।

कम परिवारवाद। कम भ्रष्टाचार। बेहतर शासन। ज्यादा विकास।

आज आलोचक कहते हैं कि पार्टी ने उन्हीं राजनीतिक आदतों में से कुछ अपना ली हैं, जिनके खिलाफ वह कभी खड़ी थी।

सरकारें गिरीं। पार्टियां टूटीं। विधायक पाला बदलते रहे। राजनीतिक वफादारियां रातोंरात बदल गईं।

संविधान वही है।

राजनीतिक फर्नीचर लगातार बदल रहा है।

जब जांच एजेंसियों पर विपक्षी नेताओं के खिलाफ ज्यादा सक्रिय और सत्तापक्ष के नेताओं के प्रति नरम होने के आरोप लगते हैं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।

हर आरोप को सच मान लेना ठीक नहीं।

लेकिन हर आरोप को विपक्ष का प्रचार कहकर खारिज करना भी लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं।

इन सवालों के जवाब जरूरी हैं।

लोकतंत्र सिर्फ चुनावों से नहीं चलता। वह उन संस्थाओं पर भरोसे से चलता है जिन्हें जनता निष्पक्ष मानती है।

दुनिया में भारत की साख बढ़ी है

इस कहानी का दूसरा पहलू भी है।

दुनिया में भारत की स्थिति निश्चित रूप से मजबूत हुई है। बड़े अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन, प्रवासी भारतीयों से संपर्क और बढ़ता कूटनीतिक प्रभाव भारत को नई पहचान दे रहे हैं।

यह महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

लेकिन अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा घरेलू समस्याओं को हमेशा नहीं ढक सकती।

एक देश शानदार सम्मेलन कर सकता है और उसी सम्मेलन स्थल के बाहर टूटी फुटपाथ भी हो सकती है।

वह वैश्विक शक्ति बनने की बात कर सकता है और उसका नागरिक अदालत में वर्षों तक न्याय का इंतजार कर सकता है।

वह डिजिटल इंडिया पर गर्व कर सकता है और उसी समय कोई गांव बुनियादी स्वच्छता के लिए तरस सकता है।

दोनों तस्वीरें एक साथ सच हो सकती हैं।

तो रिपोर्ट कार्ड क्या कहता है?

बारह साल का हिसाब इस सवाल से नहीं लगाया जा सकता कि मोदी सरकार ने कुछ किया या नहीं।

निश्चित रूप से बहुत कुछ किया है।

सही सवाल यह है:

क्या काम का पैमाना उन वादों के पैमाने के बराबर है जो 2014 में किए गए थे?

यहीं संदेह पैदा होता है।

भारत ने शानदार बुनियादी ढांचा बनाया है। लेकिन संस्थाएं अब भी कमजोर हैं।

भारत ज्यादा डिजिटल हुआ है। लेकिन करोड़ों लोगों के लिए अच्छी नौकरी अब भी सपना है।

स्वच्छता की बात होती है। लेकिन नदियां और शहर अब भी प्रदूषित हैं।

भारत की वैश्विक ताकत बढ़ी है। लेकिन घर के बाहर सड़क पार करना अब भी कई जगह जान जोखिम में डालना है।

भ्रष्टाचार खत्म करने की बात होती है। लेकिन राजनीतिक अवसरवाद पूरी ताकत से जिंदा है।

और आम आदमी?

वह अब भी उस "अच्छे दिन" का इंतजार कर रहा है जो नारे से निकलकर रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन जाए।

बारह साल कम समय नहीं होता।

इतने समय में सड़कें बन सकती हैं। हवाई अड्डे बन सकते हैं। बड़े स्मारक खड़े हो सकते हैं।

इतने समय में यह भी पता चल जाता है कि उनकी नींव कितनी मजबूत है।

मोदी सरकार ने जो बनाया है, उसका श्रेय उसे मिलना चाहिए।

जो अधूरा रह गया है, उसके सवाल भी पूछे जाने चाहिए।

यह मोदी विरोध नहीं है।

यह लोकतंत्र है।

असल दूरी दिल्ली से मुंबई की नहीं है। न ही किसी एक्सप्रेसवे की लंबाई से इसे नापा जा सकता है।

असल दूरी है वादे और डिलीवरी के बीच की दूरी।

और बारह साल बाद भी यह सड़क निर्माणाधीन है।

मोदी ने लंबा सफर तय किया है। लेकिन करोड़ों भारतीयों के लिए अभी कई लंबे मील बाकी हैं।





Tuesday, October 6, 2026

 


फ्रांस फिर सड़कों पर

क्रांति के सपने छोटे क्यों हो गए?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

7 अक्टूबर 2026

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पेरिस और ब्रसेल्स की हाल की यात्रा अभी यादों में ताजा है। खूबसूरत इमारतों, साफ सड़कों और कैफे की रौनक के पीछे मुझे कुछ और भी दिखाई दिया था। 

Gen Z के युवाओं से बातचीत में एक बेचैनी महसूस हुई। वे व्यवस्था से पूरी तरह खुश नहीं थे। शिकायतें अलग-अलग थीं, लेकिन भीतर कोई खदबदाहट जरूर थी।

तब अंदाजा नहीं था कि यह बेचैनी इतनी जल्दी सड़कों पर दिखाई देगी।

अब फ्रांस सड़कों पर है।

जो आंदोलन शिक्षकों की कमी, भीड़भरी कक्षाओं और जर्जर स्कूलों से शुरू हुआ था, वह देखते-देखते राष्ट्रीय अशांति का बड़ा चेहरा बन गया है। सैकड़ों स्कूल प्रभावित हैं। हजारों लोग हिरासत में लिए गए हैं। छात्र, शिक्षक और पुलिसकर्मी घायल हुए हैं। 6 अक्टूबर तक 6,100 से अधिक गिरफ्तारियों की रिपोर्ट आ चुकी थी, जिनमें बड़ी संख्या नाबालिगों की है।

फ्रांस में स्कूल की समस्या कोई काल्पनिक कहानी नहीं है। कई जगह शिक्षक नहीं हैं, कक्षाएँ भरी हुई हैं और स्कूल भवनों की हालत खराब है। छात्रों की मांग है कि सरकार उन्हें केवल भाषण नहीं, बेहतर स्कूल दे।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।

पोप लियो चौदहवें 25 से 28 सितंबर तक फ्रांस आए थे। पेरिस में उन्होंने शांति, संवाद और सामाजिक एकता की बात की। फ्रांस के राष्ट्रपति के साथ उनकी बातचीत में मध्य-पूर्व की शांति और संवाद भी प्रमुख विषय थे।

अजीब संयोग था।

एक तरफ पेरिस में शांति और सद्भाव की प्रार्थना हो रही थी। दूसरी तरफ उसी शहर के किशोर स्कूलों के बाहर बैरिकेड लगा रहे थे।

और मुझे भारत का मौजूदा कॉकरोच आंदोलन याद आ गया।

भारत में Gen Z से जुड़ा यह नया राजनीतिक आंदोलन चुनावी व्यवस्था और मतदाता सूची में बदलाव के खिलाफ सड़कों पर है। 2 अक्टूबर को मुंबई और दिल्ली में इसके प्रदर्शन हुए। आंदोलन का नाम ही अपने आप में व्यंग्य है, जिस शब्द से युवाओं को अपमानित किया गया, उन्होंने उसी को अपना झंडा बना लिया।

थाईलैंड में भी युवाओं ने पिछले वर्षों में लोकतंत्र, राजनीतिक सुधार और संस्थागत बदलाव के सवाल उठाए। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में युवा पीढ़ी अपनी आवाज खोज रही है।

लेकिन यहीं एक बड़ा सवाल पैदा होता है।

क्या आज के छात्र आंदोलन वैसे ही हैं जैसे हमारे समय के आंदोलन थे?

मैं अपने छात्र जीवन में गुजरात के 1973-74 के दिनों को कैसे भूल सकता हूँ?

गुजरात में छात्रों का आंदोलन पहले मेस की बढ़ी फीस और महंगाई जैसे सवालों से शुरू हुआ। लेकिन धीरे-धीरे वह भ्रष्टाचार और शासन के खिलाफ व्यापक नवनिर्माण आंदोलन बना। मुख्यमंत्री को इस्तीफा देना पड़ा और विधानसभा भंग हुई। यही आंदोलन आगे चलकर जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन के लिए आधार भी।

जेपी आंदोलन में सपना बड़ा था।

सिर्फ सरकार बदलनी नहीं थी। व्यवस्था बदलनी थी।

हमारी पीढ़ी ने छात्र आंदोलनों में बड़े शब्द सुने थे: संपूर्ण क्रांति, सामाजिक न्याय, भ्रष्टाचार-मुक्त समाज, लोकतंत्र की रक्षा।

दुनिया के दूसरे हिस्सों में हिप्पी आंदोलन भी स्थापित जीवनशैली के खिलाफ विद्रोह था। युद्ध के खिलाफ आवाज थी। उपभोक्तावाद, सत्ता, नैतिकता और पारंपरिक सामाजिक ढांचे पर सवाल थे।

उन आंदोलनों में एक आदर्शवादी उन्माद था।

युवा कहते थे: दुनिया बदलनी है।

आज का युवा ज्यादा व्यावहारिक है।

फ्रांस का छात्र कहता है: मुझे शिक्षक चाहिए। मेरी कक्षा छोटी करो। स्कूल की छत ठीक करो। सुविधाएँ दो।

मांगें जायज हैं।

लेकिन सवाल यह है कि क्या इन मांगों के पीछे कोई बड़ा सामाजिक सपना भी है?

पुराने छात्र व्यवस्था को बदलना चाहते थे। आज के छात्र व्यवस्था से अपनी सुविधा का बेहतर हिस्सा मांग रहे हैं।

यही शायद हमारे समय का सबसे बड़ा फर्क है।

ब्रसेल्स में भी मैंने इसी तरह की बेचैनी देखी। सितंबर में सैकड़ों छात्रों ने बढ़ती फीस और शिक्षा के बढ़ते खर्च के खिलाफ प्रदर्शन किया। आयोजकों के अनुसार, कई छात्रों के लिए फीस करीब 1,200 यूरो तक पहुंच गई है और बड़ी संख्या में छात्र पढ़ाई के साथ काम करने को मजबूर हैं।

यूरोप के युवा पूछ रहे हैं: पढ़ाई इतनी महंगी क्यों हो रही है?

भारत के युवा पूछ रहे हैं: मेरी वोट की गारंटी कौन देगा?

फ्रांस का युवा पूछ रहा है: मेरा शिक्षक कहाँ है?

सवाल अलग हैं। बेचैनी एक है।

लेकिन फ्रांस की कहानी में एक और संवेदनशील परत है।

आव्रजन और राष्ट्रीय पहचान।

फ्रांस में उत्तरी अफ्रीका और दूसरे मुस्लिम देशों से आए लोगों की बड़ी आबादी है। लाखों लोग फ्रांसीसी समाज में पूरी तरह घुले-मिले हैं। लेकिन कुछ इलाकों में गरीबी, बेरोजगारी, सामाजिक अलगाव और सांस्कृतिक दूरी ने तनाव पैदा किया है।

इसी पृष्ठभूमि में पेरिस विश्वविद्यालय के एक फ्रांसीसी छात्र से भारत यात्रा के दौरान मेरी बातचीत हुई। उसने चिंता जताते हुए कहा कि फ्रांस की सबसे बड़ी समस्या ऐसे लोग हैं जिन्हें वह “गैर-जैविक फ्रांसीसी” कहता है और जिनके बारे में उसे लगता है कि वे देश पर कब्जा करना चाहते हैं।

उसकी बात चौंकाने वाली थी।

उसके चेहरे पर डर था।

लेकिन उसकी धारणा को पूरे फ्रांसीसी समाज की राय मान लेना भी गलत होगा। यह एक युवा व्यक्ति की चिंता है, जबकि आव्रजन, समायोजन और राष्ट्रीय पहचान पर फ्रांस में गहरी और विवादित राजनीतिक बहस चल रही है।

इसी तरह कुछ प्रदर्शनों में फिलिस्तीन और हमास के समर्थन से जुड़े नारे सुनाई देने की खबरें और आरोप सामने आए हैं। 

असल आंदोलन की शुरुआत स्कूलों से हुई थी।

टपकती छत से लेकर सांस्कृतिक पहचान तक की यात्रा बहुत लंबी है।

खतरा तब पैदा होता है जब किसी वास्तविक छात्र शिकायत को राजनीतिक या सांप्रदायिक ताकतें अपने एजेंडे के लिए इस्तेमाल करने लगती हैं।

फ्रांस के सामने इसलिए दो अलग लेकिन जुड़े हुए सवाल हैं।

पहला, क्या वह अपने युवाओं को अच्छी शिक्षा, समान अवसर और सम्मान दे पा रहा है?

दूसरा, क्या वह अलग-अलग समुदायों को एक साझा फ्रांसीसी नागरिक पहचान में जोड़ पा रहा है?

इन दोनों सवालों का जवाब केवल पुलिस से नहीं मिलेगा।

फ्रांस स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे का देश होने पर गर्व करता है। लेकिन जब एक बच्चा आधुनिक स्कूल में पढ़े और दूसरा जर्जर भवन में 35 बच्चों के साथ बैठे, तो समानता का नारा थोड़ा खोखला सुनाई देता है।

और जब युवा अपने देश से जुड़ाव महसूस न करे, तब केवल राष्ट्रवाद का भाषण भी काम नहीं करता।

पुरानी पीढ़ी के आंदोलनों में एक बड़ा सपना था।

आज के आंदोलनों में बड़ी मांगों की जगह छोटी-छोटी ठोस मांगें हैं।

शायद यही हमारे समय की त्रासदी है।

हमारे पास पहले सपने बड़े थे, साधन छोटे थे।

आज साधन बड़े हैं, लेकिन सपने छोटे होते जा रहे हैं।

फ्रांस की सड़कों से भारत के कॉकरोच आंदोलन तक, ब्रसेल्स से थाईलैंड तक Gen Z अपनी आवाज तलाश रही है।

अभी यह तय नहीं है कि यह आवाज केवल फीस, शिक्षक, नौकरी और सुविधाओं तक रहेगी या कोई बड़ा सामाजिक सपना भी जन्म लेगा।