फ्रांस फिर सड़कों पर
क्रांति के सपने छोटे क्यों हो गए?
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बृज खंडेलवाल द्वारा
7 अक्टूबर 2026
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पेरिस और ब्रसेल्स की हाल की यात्रा अभी यादों में ताजा है। खूबसूरत इमारतों, साफ सड़कों और कैफे की रौनक के पीछे मुझे कुछ और भी दिखाई दिया था।
Gen Z के युवाओं से बातचीत में एक बेचैनी महसूस हुई। वे व्यवस्था से पूरी तरह खुश नहीं थे। शिकायतें अलग-अलग थीं, लेकिन भीतर कोई खदबदाहट जरूर थी।
तब अंदाजा नहीं था कि यह बेचैनी इतनी जल्दी सड़कों पर दिखाई देगी।
अब फ्रांस सड़कों पर है।
जो आंदोलन शिक्षकों की कमी, भीड़भरी कक्षाओं और जर्जर स्कूलों से शुरू हुआ था, वह देखते-देखते राष्ट्रीय अशांति का बड़ा चेहरा बन गया है। सैकड़ों स्कूल प्रभावित हैं। हजारों लोग हिरासत में लिए गए हैं। छात्र, शिक्षक और पुलिसकर्मी घायल हुए हैं। 6 अक्टूबर तक 6,100 से अधिक गिरफ्तारियों की रिपोर्ट आ चुकी थी, जिनमें बड़ी संख्या नाबालिगों की है।
फ्रांस में स्कूल की समस्या कोई काल्पनिक कहानी नहीं है। कई जगह शिक्षक नहीं हैं, कक्षाएँ भरी हुई हैं और स्कूल भवनों की हालत खराब है। छात्रों की मांग है कि सरकार उन्हें केवल भाषण नहीं, बेहतर स्कूल दे।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
पोप लियो चौदहवें 25 से 28 सितंबर तक फ्रांस आए थे। पेरिस में उन्होंने शांति, संवाद और सामाजिक एकता की बात की। फ्रांस के राष्ट्रपति के साथ उनकी बातचीत में मध्य-पूर्व की शांति और संवाद भी प्रमुख विषय थे।
अजीब संयोग था।
एक तरफ पेरिस में शांति और सद्भाव की प्रार्थना हो रही थी। दूसरी तरफ उसी शहर के किशोर स्कूलों के बाहर बैरिकेड लगा रहे थे।
और मुझे भारत का मौजूदा कॉकरोच आंदोलन याद आ गया।
भारत में Gen Z से जुड़ा यह नया राजनीतिक आंदोलन चुनावी व्यवस्था और मतदाता सूची में बदलाव के खिलाफ सड़कों पर है। 2 अक्टूबर को मुंबई और दिल्ली में इसके प्रदर्शन हुए। आंदोलन का नाम ही अपने आप में व्यंग्य है, जिस शब्द से युवाओं को अपमानित किया गया, उन्होंने उसी को अपना झंडा बना लिया।
थाईलैंड में भी युवाओं ने पिछले वर्षों में लोकतंत्र, राजनीतिक सुधार और संस्थागत बदलाव के सवाल उठाए। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में युवा पीढ़ी अपनी आवाज खोज रही है।
लेकिन यहीं एक बड़ा सवाल पैदा होता है।
क्या आज के छात्र आंदोलन वैसे ही हैं जैसे हमारे समय के आंदोलन थे?
मैं अपने छात्र जीवन में गुजरात के 1973-74 के दिनों को कैसे भूल सकता हूँ?
गुजरात में छात्रों का आंदोलन पहले मेस की बढ़ी फीस और महंगाई जैसे सवालों से शुरू हुआ। लेकिन धीरे-धीरे वह भ्रष्टाचार और शासन के खिलाफ व्यापक नवनिर्माण आंदोलन बना। मुख्यमंत्री को इस्तीफा देना पड़ा और विधानसभा भंग हुई। यही आंदोलन आगे चलकर जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन के लिए आधार भी।
जेपी आंदोलन में सपना बड़ा था।
सिर्फ सरकार बदलनी नहीं थी। व्यवस्था बदलनी थी।
हमारी पीढ़ी ने छात्र आंदोलनों में बड़े शब्द सुने थे: संपूर्ण क्रांति, सामाजिक न्याय, भ्रष्टाचार-मुक्त समाज, लोकतंत्र की रक्षा।
दुनिया के दूसरे हिस्सों में हिप्पी आंदोलन भी स्थापित जीवनशैली के खिलाफ विद्रोह था। युद्ध के खिलाफ आवाज थी। उपभोक्तावाद, सत्ता, नैतिकता और पारंपरिक सामाजिक ढांचे पर सवाल थे।
उन आंदोलनों में एक आदर्शवादी उन्माद था।
युवा कहते थे: दुनिया बदलनी है।
आज का युवा ज्यादा व्यावहारिक है।
फ्रांस का छात्र कहता है: मुझे शिक्षक चाहिए। मेरी कक्षा छोटी करो। स्कूल की छत ठीक करो। सुविधाएँ दो।
मांगें जायज हैं।
लेकिन सवाल यह है कि क्या इन मांगों के पीछे कोई बड़ा सामाजिक सपना भी है?
पुराने छात्र व्यवस्था को बदलना चाहते थे। आज के छात्र व्यवस्था से अपनी सुविधा का बेहतर हिस्सा मांग रहे हैं।
यही शायद हमारे समय का सबसे बड़ा फर्क है।
ब्रसेल्स में भी मैंने इसी तरह की बेचैनी देखी। सितंबर में सैकड़ों छात्रों ने बढ़ती फीस और शिक्षा के बढ़ते खर्च के खिलाफ प्रदर्शन किया। आयोजकों के अनुसार, कई छात्रों के लिए फीस करीब 1,200 यूरो तक पहुंच गई है और बड़ी संख्या में छात्र पढ़ाई के साथ काम करने को मजबूर हैं।
यूरोप के युवा पूछ रहे हैं: पढ़ाई इतनी महंगी क्यों हो रही है?
भारत के युवा पूछ रहे हैं: मेरी वोट की गारंटी कौन देगा?
फ्रांस का युवा पूछ रहा है: मेरा शिक्षक कहाँ है?
सवाल अलग हैं। बेचैनी एक है।
लेकिन फ्रांस की कहानी में एक और संवेदनशील परत है।
आव्रजन और राष्ट्रीय पहचान।
फ्रांस में उत्तरी अफ्रीका और दूसरे मुस्लिम देशों से आए लोगों की बड़ी आबादी है। लाखों लोग फ्रांसीसी समाज में पूरी तरह घुले-मिले हैं। लेकिन कुछ इलाकों में गरीबी, बेरोजगारी, सामाजिक अलगाव और सांस्कृतिक दूरी ने तनाव पैदा किया है।
इसी पृष्ठभूमि में पेरिस विश्वविद्यालय के एक फ्रांसीसी छात्र से भारत यात्रा के दौरान मेरी बातचीत हुई। उसने चिंता जताते हुए कहा कि फ्रांस की सबसे बड़ी समस्या ऐसे लोग हैं जिन्हें वह “गैर-जैविक फ्रांसीसी” कहता है और जिनके बारे में उसे लगता है कि वे देश पर कब्जा करना चाहते हैं।
उसकी बात चौंकाने वाली थी।
उसके चेहरे पर डर था।
लेकिन उसकी धारणा को पूरे फ्रांसीसी समाज की राय मान लेना भी गलत होगा। यह एक युवा व्यक्ति की चिंता है, जबकि आव्रजन, समायोजन और राष्ट्रीय पहचान पर फ्रांस में गहरी और विवादित राजनीतिक बहस चल रही है।
इसी तरह कुछ प्रदर्शनों में फिलिस्तीन और हमास के समर्थन से जुड़े नारे सुनाई देने की खबरें और आरोप सामने आए हैं।
असल आंदोलन की शुरुआत स्कूलों से हुई थी।
टपकती छत से लेकर सांस्कृतिक पहचान तक की यात्रा बहुत लंबी है।
खतरा तब पैदा होता है जब किसी वास्तविक छात्र शिकायत को राजनीतिक या सांप्रदायिक ताकतें अपने एजेंडे के लिए इस्तेमाल करने लगती हैं।
फ्रांस के सामने इसलिए दो अलग लेकिन जुड़े हुए सवाल हैं।
पहला, क्या वह अपने युवाओं को अच्छी शिक्षा, समान अवसर और सम्मान दे पा रहा है?
दूसरा, क्या वह अलग-अलग समुदायों को एक साझा फ्रांसीसी नागरिक पहचान में जोड़ पा रहा है?
इन दोनों सवालों का जवाब केवल पुलिस से नहीं मिलेगा।
फ्रांस स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे का देश होने पर गर्व करता है। लेकिन जब एक बच्चा आधुनिक स्कूल में पढ़े और दूसरा जर्जर भवन में 35 बच्चों के साथ बैठे, तो समानता का नारा थोड़ा खोखला सुनाई देता है।
और जब युवा अपने देश से जुड़ाव महसूस न करे, तब केवल राष्ट्रवाद का भाषण भी काम नहीं करता।
पुरानी पीढ़ी के आंदोलनों में एक बड़ा सपना था।
आज के आंदोलनों में बड़ी मांगों की जगह छोटी-छोटी ठोस मांगें हैं।
शायद यही हमारे समय की त्रासदी है।
हमारे पास पहले सपने बड़े थे, साधन छोटे थे।
आज साधन बड़े हैं, लेकिन सपने छोटे होते जा रहे हैं।
फ्रांस की सड़कों से भारत के कॉकरोच आंदोलन तक, ब्रसेल्स से थाईलैंड तक Gen Z अपनी आवाज तलाश रही है।
अभी यह तय नहीं है कि यह आवाज केवल फीस, शिक्षक, नौकरी और सुविधाओं तक रहेगी या कोई बड़ा सामाजिक सपना भी जन्म लेगा।
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