Saturday, October 3, 2026

 


एयरपोर्ट के न्यू रिच जॉम्बीज़

अंग्रेजी, आईफोन और अकड़ की उड़ान


बृज खंडेलवाल द्वारा




बेंगलुरु एयरपोर्ट पर मैंने एक अजीब बाइपोलर मानसिकता देखी।

लोगों को विमान पकड़ना था, लेकिन कई लोग अचानक अपनी औकात से बहुत ऊपर उड़ने लगे थे।

घर से निकलते समय वही लोग साधारण इंसान होते हैं। पत्नी से कहते हैं, “चाय बना देना।” बच्चे से कहते हैं, “बैग उठा ले।” पड़ोसी से पूछते हैं, “भैया, बाजार जा रहे हो?”

लेकिन एयरपोर्ट का गेट पार करते ही कायापलट!

अचानक आवाज में ऑक्सफोर्ड उतर आता है।

“डियर, प्लीज टेक केयर।”

“ओह माय गॉड!”

“Actually, I was thinking…”

“यू नो, वी ट्रैवल अ लॉट!”

मैंने सोचा, यह एयरपोर्ट है या अंग्रेजी बोलने वालों का पुनर्जन्म केंद्र?

मेरे साथ बेंगलुरु से आगरा की फ्लाइट में ऐसे कई नमूने थे। महंगे चश्मे, चमचमाते जूते, आईफोन, ब्रांडेड बैग और चेहरे पर ऐसा गुरूर, जैसे हवाई जहाज इनके खानदान की जागीर हो।

एक महिला ने बच्चे को दूध का गिलास पकड़ाते हुए कहा, “बेटा, मिल्क हॉट है। केयरफुली पकड़ो।”

फिर पति की तरफ मुड़ीं।

“डियर, स्विट्जरलैंड वाले होटल का नाम क्या था?”

पति ने गर्दन झटका।

“द ग्रैंड... कुछ।”

महिला ने माथे पर हाथ मारा।

“ओह माय गॉड! लिटिल डोगी को बाय कहना भूल गई!”

मोबाइल निकला।

“हेलो मेड? प्लीज टेल हिम फ्रॉम माय साइड... आई मिस हिम!”

कुत्ता घर पर था।

मगर उसकी विदाई अंतरराष्ट्रीय स्तर की थी।

यही है हमारा नया अमीर।

कुत्ता देसी, नौकरानी देसी, दूध देसी, मगर बातचीत इंटरनेशनल।

एयरपोर्ट नवाबों का पहला इम्तिहान

सिक्योरिटी चेक पर इनकी असली परीक्षा शुरू होती है।

लाइन लंबी है।

सब अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं।

लेकिन हमारे एक भाई साहब की आत्मा बेचैन है।

वे बार-बार आगे झांकते हैं।

फिर ट्रे आगे रखते हैं।

फिर पीछे वाले की ट्रे भी अपनी ट्रे के आगे कर देते हैं।

पीछे से आवाज आती है, “भाई साहब, लाइन है।”

वह मुस्कराते हैं।

“ओह, सॉरी!”

सॉरी के साथ आधा कदम और आगे।

यह खास भारतीय कला है।

माफी भी मांगो और गलती भी जारी रखो।

सिक्योरिटी अधिकारी कहता है, “सर, हाथ ऊपर कीजिए।”

सज्जन हाथ ऐसे उठाते हैं जैसे अधिकारी ने उनसे योगासन करवाने की मांग कर दी हो।

चेहरा बता रहा है, “आपको पता है मैं कौन हूं?”

अधिकारी शायद रोज ऐसे सवालों से मिलता है।

वह शांत रहता है।

न्यू रिच जॉम्बी बेचैन हो जाता है।

कुर्सी भी हमारी, हवा भी हमारी

वेटिंग लाउंज में पहुंचते ही दूसरा अभियान शुरू।

एक साहब ने तीन कुर्सियां कब्जे में कर लीं।

एक पर खुद बैठे।

दूसरी पर बैग।

तीसरी पर जैकेट, चश्मा और खाने का डिब्बा।

एक बुजुर्ग महिला खड़ी थीं।

उन्होंने पूछा, “बेटा, यह सीट खाली है?”

साहब ने बैग देखा।

फिर महिला को देखा।

फिर बैग को देखा।

“Actually, my wife is coming.”

बीस मिनट बाद पत्नी आईं।

बैग वाली सीट खाली हुई।

महिला के लिए नहीं।

पत्नी के लिए।

मैंने सोचा, आजकल सीट पर बैठने के लिए इंसान नहीं, सामान होना जरूरी है।

एक दूसरे सज्जन ने तो अपना छोटा बैग सामने वाली कुर्सी पर रख दिया।

किसी ने पूछा, “यह सीट खाली है?”

उन्होंने कहा, “No, occupied.”

मैंने पूछा, “कौन बैठा है?”

उन्होंने कहा, “My stuff.”

अब “मेरा सामान” भी इंसान से ज्यादा अधिकार रखने लगा है।

बोर्डिंग का महाभारत

घोषणा हुई।

“Passengers travelling in Zone 3 may now board.”

Zone 3 वाले उठे।

लेकिन Zone 1 वाले पहले से लाइन में थे।

Zone 2 वाले Zone 1 में घुसे हुए थे।

Zone 5 वाले सबसे आगे खड़े थे।

मैंने एक से पूछा, “आपका जोन क्या है?”

उन्होंने कहा, “Five.”

“फिर यहां?”

“बस ऐसे ही।”

बस ऐसे ही!

भारत की बहुत सी समस्याओं का यही राष्ट्रीय उत्तर है।

स्टाफ ने कहा, “Sir, please wait for your zone.”

जवाब आया, “But I am already here.”

मानो एयरलाइन ने नियम नहीं बनाया, व्यक्तिगत निमंत्रण भेजा था।

एक महिला ने तो स्टाफ से कहा, “Can you please allow us? We are travelling with children.”

स्टाफ ने विनम्रता से कहा, “Ma’am, there are other families also.”

महिला का चेहरा उतर गया।

उन्हें पहली बार पता चला कि दुनिया में और भी परिवार हैं।

विमान में प्रवेश और सोशल मीडिया दरबार

सीट पर पहुंचते ही फोन निकलता है।

पहली सेल्फी।

फिर दूसरी।

फिर खिड़की की फोटो।

फिर सीट की फोटो।

फिर बोर्डिंग पास की फोटो।

फिर कॉफी की फोटो।

फिर परिवार को वीडियो कॉल।

“हेलो मम्मी! हम फ्लाइट में हैं।”

“हां, बेटा, कहां जा रहे हो?”

“आगरा।”

“क्यों?”

“बस, बिजनेस मीटिंग है।”

मैं बगल में बैठा मुस्करा रहा था।

मुझे मालूम था कि आगरा में कोई मीटिंग नहीं थी।

एक नई दुकान का उद्घाटन था।

लेकिन “दुकान” में वह रुतबा कहां?

“बिजनेस मीटिंग” बोलो।

बात में वजन आता है।

न्यू रिच की दुनिया में काम छोटा हो सकता है, नाम बड़ा होना चाहिए।

व्हाट्सऐप पर पड़ोसी को जलाना

एक सज्जन ने वीडियो कॉल पर अपना कैमरा सीट की तरफ घुमाया।

“देख रहे हो? बिजनेस क्लास जैसा है!”

वह इकोनॉमी में थे।

पीछे बैठे यात्री ने पूछा, “भाई साहब, बिजनेस क्लास कहां है?”

उन्होंने कहा, “Actually, this is premium economy.”

टिकट देखकर पता चला कि वह साधारण इकोनॉमी थी।

लेकिन सोशल मीडिया में सत्य का किराया बहुत कम है।

वहां सब कुछ अपग्रेड हो सकता है।

घर की रसोई “मॉडर्न किचन”।

स्कूटर “माई राइड”।

दुकान “बिजनेस हब”।

और मामूली यात्रा “यूरोपियन स्टाइल ट्रैवल”।

उड़ान में भी नवाबी

घोषणा हुई कि इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बंद रखें।

एक साहब फोन पर लगे रहे।

“हेलो... आवाज आ रही है?”

भाई साहब, विमान हवा में था।

आवाज नहीं, शायद धरती भी मुश्किल से आ रही थी।

एयर होस्टेस ने विनम्रता से कहा, “Sir, please switch off the phone.”

साहब ने फोन नीचे किया।

और धीरे से बोले, “You know, I am on an important call.”

मैंने सोचा, देश की अर्थव्यवस्था शायद इसी फोन पर टिकी है।

दस मिनट बाद वही साहब झपकी ले रहे थे।

महत्वपूर्ण कॉल खत्म।

देश बच गया।

अंग्रेजी का कमाल

इन लोगों की अंग्रेजी भी कमाल है।

शब्द गलत हों तो कोई बात नहीं।

उच्चारण गलत हो तो भी कोई बात नहीं।

लेकिन आत्मविश्वास में कोई कमी नहीं।

एक साहब ने एयर होस्टेस से पूछा, “Can I have one veg vegetarian?”

मैंने सोचा, यह शायद शाकाहारी का अंतरराष्ट्रीय संस्करण है।

दूसरे ने कहा, “I want hot water, but little hot.”

तीसरे ने पूछा, “Where is the washroom toilet?”

चौथे ने कहा, “I am feeling very hungry stomach.”

अंग्रेजी अपनी जगह।

भूख अपनी जगह।

व्याकरण को कौन पूछता है?

लैंडिंग का लट्ठमार अध्याय

सबसे बड़ा तमाशा लैंडिंग के बाद होता है।

विमान अभी रनवे पर दौड़ रहा है।

सीट बेल्ट का संकेत अभी जल रहा है।

लेकिन तीन महानुभाव खड़े हो चुके हैं।

एक ने लॉकर खोल दिया।

दूसरा बैग खींच रहा है।

तीसरा फोन पर लाइव वीडियो बना रहा है।

घोषणा हो रही है, “Please remain seated.”

लेकिन शायद उन्होंने सुना, “Please stand immediately.”

एक यात्री ने दूसरे से कहा, “बैठ जाइए।”

जवाब आया, “बस सामान लेना है।”

“विमान अभी रुका नहीं है।”

“अरे, कुछ नहीं होगा।”

यही वाक्य हमारे देश में बहुत से हादसों की शुरुआत है।

कुछ नहीं होगा।

फिर कुछ हो जाता है।

असली बीमारी क्या है?

बेंगलुरु से आगरा तक की इस यात्रा में मुझे लगा कि समस्या अंग्रेजी नहीं है।

समस्या पैसा भी नहीं है।

समस्या महंगे कपड़े या आईफोन भी नहीं हैं।

समस्या है दिखावा और ठहराव की कमी।

पैसा आया तो ठीक है।

नई कार खरीदी तो बहुत अच्छा।

विदेश घूम आए तो और अच्छा।

बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ाया तो शानदार।

लेकिन अगर पैसे के साथ तहजीब नहीं आई, तो मामला अधूरा है।

अगर महंगे चश्मे के पीछे नजर संकरी है, तो चश्मा किस काम का?

अगर आईफोन हाथ में है और दूसरे के लिए सम्मान नहीं है, तो स्मार्टफोन है, स्मार्टनेस नहीं।

अगर अंग्रेजी जुबान पर है और सब्र दिल में नहीं है, तो यह सिर्फ लहजा है, शख्सियत नहीं।

और मजे की बात यह है कि हम सबमें थोड़ा-बहुत न्यू रिच छिपा बैठा है।

बस मौका चाहिए।

एयरपोर्ट वह मौका दे देता है।

वहां आदमी का असली चरित्र ट्रॉली, ट्रे, सीट और बोर्डिंग लाइन में दिखाई देता है।

किसी का पैसा उसकी हैसियत बता सकता है, लेकिन उसका व्यवहार उसकी परवरिश बताता है।

आखिर में मैंने अपना बैग उठाया और आगरा की तरफ चल पड़ा।

मेरे आसपास आईफोन थे।

महंगे चश्मे थे।

ब्रांडेड बैग थे।

फर्राटेदार अंग्रेजी थी।

और बीच-बीच में वही पुरानी भारतीय धक्का-मुक्की भी थी।

मैं मुस्कराया।

हम चांद पर पहुंचने की तैयारी कर रहे हैं।

लेकिन बोर्डिंग लाइन में अपनी बारी का इंतजार अभी नहीं सीख पाए।

शायद अगली उड़ान में एयरलाइन टिकट के साथ एक छोटा-सा पैकेट भी देगी।

उस पर लिखा होगा:

“एक यात्री के लिए एक अदद तहजीब।

उपयोग से पहले खोलें।

दिखावे के लिए नहीं, व्यवहार के लिए इस्तेमाल करें।”

No comments:

Post a Comment