Friday, October 16, 2026

 मस्क के स्टारलिंक पर भारत की हिचकिचाहट: देर से सही, समझदारी तो है!

यूक्रेन का तजुर्बा बता रहा है कि मुल्क की हिफाजत की चाबी किसी विदेशी कंपनी के हाथ में नहीं दी जा सकती

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बृज खंडेलवाल द्वारा

18 अक्टूबर 2026

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यूक्रेन ने साबित कर दिया है कि एक विदेशी निजी कंपनी के सैटेलाइट नेटवर्क पर निर्भरता राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बन सकती है। युद्ध के बीच स्टारलिंक की सेवा पर अचानक पाबंदी से यूक्रेन के सैन्य संचार और ड्रोन अभियान बाधित हुए। भारत का संयम दुश्मनी नहीं, बल्कि संप्रभुता, आत्मनिर्भरता और सीमांत सुरक्षा की अनिवार्य शर्त है।

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क्या भारत को एलन मस्क के लिए अपने दरवाजे बिना सोचे-समझे खोल देने चाहिए? क्या तेज इंटरनेट की चमक-दमक में हम अपनी हिफाजत, सरहदों की सुरक्षा और मुल्क की खुदमुख्तारी को दांव पर लगा सकते हैं? और अगर कल किसी जंग के दौरान कोई विदेशी कंपनी हमारी संचार व्यवस्था पर पाबंदी लगा दे, तो हम क्या करेंगे?

ये सवाल आज इसलिए अहम हो गए हैं, क्योंकि यूक्रेन में हाल की घटनाओं ने दुनिया को एक कड़ा सबक दिया है। भारत में स्टारलिंक को मंजूरी देने में सरकार की देरी और एहतियात पर सवाल उठाने वालों को अब समझना चाहिए कि हर देरी नाकामी नहीं होती। कभी-कभी जल्दबाजी से बचना ही सबसे बड़ी समझदारी होती है।


एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स का स्टारलिंक सैटेलाइट इंटरनेट आज की दुनिया की एक बड़ी तकनीकी कामयाबी है। आसमान में धरती के करीब चक्कर लगाने वाले हजारों छोटे उपग्रहों की मदद से दूर-दराज के इलाकों में भी इंटरनेट पहुंचाया जा सकता है। जहां मोबाइल नेटवर्क नहीं पहुंचता, वहां भी इसकी मदद से संपर्क कायम रखा जा सकता है।

यूरोपीय मामलों के जानकार प्रोफेसर पी एन चौधरी के मुताबिक, "यूक्रेन की जंग में स्टारलिंक ने बड़ी भूमिका निभाई है। रूसी हमलों के बीच यूक्रेनी सेना ने इसका इस्तेमाल सैनिकों के बीच संपर्क, रसद और ड्रोन चलाने के लिए किया। लेकिन अब इसी निर्भरता ने एक नई चिंता पैदा कर दी है।

अक्टूबर 2026 के मध्य में आई खबरों के मुताबिक, यूक्रेन के सैन्य संचार तंत्र से जुड़े स्टारशील्ड नेटवर्क पर गति संबंधी पाबंदियों के कारण कुछ तेज रफ्तार ड्रोनों के संचालन में मुश्किलें आईं। इससे रूसी ड्रोन और दूसरे हवाई खतरों को रोकने वाले कुछ अभियानों पर भी असर पड़ने की खबरें सामने आईं। बाद में संपर्क व्यवस्था बहाल होने की खबर आई।"

इन पाबंदियों के पीछे किसका फैसला था और पूरा मामला क्या था, इस पर अलग-अलग दावे हैं। एलन मस्क का कहना है कि सैन्य इस्तेमाल वाला स्टारशील्ड अमेरिकी सरकार के नियंत्रण में है और उसके संचालन से जुड़े फैसले अमेरिकी अधिकारी लेते हैं।

लेकिन यहां असली सवाल मस्क या वाशिंगटन के बीच जिम्मेदारी तय करने का नहीं है। सवाल यह है कि जब किसी मुल्क की सेना की ताकत एक विदेशी संचार व्यवस्था पर निर्भर हो जाए, तो उस मुल्क की अपनी आजादी कितनी महफूज रह जाती है?

जंग में कुछ मिनटों का संपर्क टूटना भी भारी पड़ सकता है। ड्रोन रास्ता भटक सकता है, हमला नाकाम हो सकता है और दुश्मन को बढ़त मिल सकती है। यानी जो तकनीक कल तक मददगार थी, वही संकट के समय कमजोरी बन सकती है।


स्टारलिंक जैसी सेवाएं निजी कंपनियां चलाती हैं, लेकिन उनका रिश्ता संबंधित देशों की सरकारों, कानूनों और सुरक्षा नीतियों से भी होता है। जरूरत पड़ने पर सेवाओं पर पाबंदी लग सकती है, कुछ इलाकों में कवरेज रोकी जा सकती है या इस्तेमाल की शर्तें बदली जा सकती हैं।

आज अमेरिका और यूक्रेन के हित एक दिशा में हों, यह जरूरी नहीं कि हर हाल में ऐसा ही रहे। यही बात भारत पर भी लागू होती है।

मान लीजिए, कल चीन या पाकिस्तान के साथ भारत का गंभीर सैन्य टकराव हो जाए। अगर उस समय किसी विदेशी कंपनी ने अपनी सेवा सीमित कर दी, तो क्या होगा? अगर किसी अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक विवाद के कारण भारत को जरूरी संचार सुविधा मिलने में रुकावट आ जाए, तो हमारी सेना क्या करेगी?

क्या हम किसी दूसरे देश की सरकार या किसी कारोबारी की मर्जी पर अपनी सुरक्षा छोड़ सकते हैं?

यह किसी के खिलाफ दुश्मनी नहीं, बल्कि हकीकत को समझने की बात है। अंतरराष्ट्रीय रिश्तों में दोस्ती अहम है, मगर राष्ट्रीय हित सबसे ऊपर होते हैं।

एक रिटायर्ड सैन्य अधिकारी बताते हैं कि भारत ने 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान विदेशी उपग्रह तस्वीरों और संबंधित क्षमताओं तक पहुंच की सीमाओं का अनुभव किया था। ऐसे अनुभवों ने यह समझ मजबूत की कि जरूरी तकनीक के लिए हमेशा दूसरे देशों पर निर्भर रहना खतरनाक हो सकता है।

इसी सोच के तहत भारत ने अपनी उपग्रह और नेविगेशन क्षमताओं को बढ़ाया। स्वदेशी नेविगेशन प्रणाली नाविक इसी दिशा में एक अहम कदम है।

स्टारलिंक के मामले में भी यही सोच अपनाने की जरूरत है।

भारत में इंटरनेट की सुविधा बढ़नी चाहिए। पहाड़ों, द्वीपों, गांवों और सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों को बेहतर संपर्क मिलना चाहिए। आपदा के समय सैटेलाइट इंटरनेट बहुत काम आ सकता है। कारोबार और शिक्षा के लिए भी इसके बड़े फायदे हैं।

लेकिन फायदे गिनाते समय खतरों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

भारत में गेटवे स्थापित करना, आंकड़ों की सुरक्षा के नियम बनाना और सरकारी निगरानी की व्यवस्था करना जरूरी है। लेकिन सिर्फ भारत की जमीन पर स्टेशन बना देने से अंतरिक्ष में घूम रहे उपग्रहों पर भारत का नियंत्रण नहीं हो जाता।

इंटरनेट का कनेक्शन हमारे यहां हो सकता है, मगर उसे चालू या बंद करने का अधिकार किसी और के पास हो, तो यह अधूरी आत्मनिर्भरता है।

विशेषज्ञ टीपी श्रीवास्तव कहते हैं, "भारत को स्टारलिंक का दरवाजा पूरी तरह बंद करने की जरूरत नहीं है। जरूरत है सोच-समझकर आगे बढ़ने की। विदेशी कंपनियों को नियमों के तहत काम करने का मौका मिले। लोगों को बेहतर इंटरनेट मिले और बाजार में मुकाबला बढ़े। मगर साथ ही भारत को अपने उपग्रह, सुरक्षित सैन्य संचार और ड्रोन नियंत्रण प्रणालियां भी मजबूत करनी होंगी।"

सरकार को एक ही कंपनी पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता से बचना चाहिए। फाइबर नेटवर्क, मोबाइल इंटरनेट और स्वदेशी उपग्रह सेवाओं का विस्तार जारी रहना चाहिए। संकट के समय हमारे पास ऐसे विकल्प होने चाहिए जो किसी विदेशी कंपनी के फैसले से ठप न पड़ें।

यूक्रेन का तजुर्बा हमें यही समझाता है कि तकनीक जितनी ताकत देती है, उस पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता उतनी ही बड़ी कमजोरी भी पैदा कर सकती है।

स्टारलिंक आए, कारोबार करे और भारतीयों को बेहतर इंटरनेट दे। लेकिन भारत की सुरक्षा, सरहदों की हिफाजत और फैसले लेने की आजादी की चाबी भारत के ही हाथों में रहनी चाहिए।

क्योंकि इंटरनेट की रफ्तार कुछ देर कम हो जाए, तो गुजारा हो सकता है। लेकिन अगर मुल्क की खुदमुख्तारी ही कमजोर पड़ जाए, तो उसकी कीमत बहुत भारी हो सकती है।

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