भारत के लिए सबक: SIR में तेजी लाएं, UCC जरूरी, मजहबी कट्टरता पर लगाम लगे!
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बृज खंडेलवाल द्वारा
22 अक्टूबर 2026
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यूरोप की सड़कों पर उठता धुआँ क्या भारत के लिए खतरे की घंटी है? पेरिस से लेकर दूसरे यूरोपीय शहरों तक हिंसक विरोध, आगजनी और लूटपाट ने हुक्मरानों की नींद उड़ा दी है।
आव्रजन, पहचान और समाज में घुलने-मिलने के सवाल भी सियासत के केंद्र में हैं। यूरोप की यह बेचैनी भारत के लिए एक सबक है। समस्याओं को वक्त रहते सुलझाना समझदारी है। उन्हें कालीन के नीचे छिपाना, मुसीबत को न्योता देना है।
जब सरकारें कानून लागू करने, अवैध घुसपैठ रोकने और समाज में भरोसा कायम करने से कतराती हैं, तो छोटी दरारें बड़ी खाई बन जाती हैं।
SIR: वोटर लिस्ट साफ होगी, तभी लोकतंत्र मजबूत होगा
मोदी सरकार की मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR की पहल इसी संदर्भ में अहम है। लोकतंत्र की बुनियाद साफ है। हर पात्र नागरिक को वोट देने का हक मिले। किसी गैर-नागरिक का नाम मतदाता सूची में नहीं होना चाहिए।
अगर विदेशी नागरिक मतदाता सूची में शामिल हो जाते हैं, तो असली नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकार प्रभावित होते हैं। चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं। मतदाता सूची की विश्वसनीयता घटती है। नागरिकता और मतदान के बीच रिश्ता कमजोर पड़ता है।
भारत की लंबी सीमाएँ हैं। कुछ इलाकों में अवैध घुसपैठ की शिकायतें पुरानी हैं। खासकर सीमावर्ती राज्यों में इस सवाल को गंभीरता से देखना जरूरी है। जमीन, रोजगार, सरकारी सुविधाओं और स्थानीय राजनीति पर इसके असर की जाँच होनी चाहिए। आँखें मूँद लेने से समस्या खत्म नहीं होती।
दोहराने की जरूरत नहीं है। SIR में पारदर्शिता होनी चाहिए। लोगों को अपनी नागरिकता और पहचान साबित करने का उचित मौका मिले। गरीबों, बुजुर्गों, मजदूरों और दूर-दराज के इलाकों में रहने वालों को कागजों के नाम पर परेशान नहीं किया जाना चाहिए। गलत नाम हटाने की प्रक्रिया साफ हो। हर प्रभावित व्यक्ति को सुनवाई और अपील का मौका मिले।मकसद साफ होना चाहिए। मतदाता सूची दुरुस्त हो, नागरिकों की पहचान पुख्ता हो और हर पात्र वोटर का हक सुरक्षित रहे। यही लोकतंत्र की असली पहरेदारी है।
अब बात समान नागरिक संहिता यानी UCC की। भारत अनेक धर्मों, भाषाओं और परंपराओं वाला मुल्क है। यही उसकी खूबसूरती है। मगर विविधता के नाम पर भेदभाव को हमेशा ढोते रहना भी जरूरी नहीं।
संविधान का अनुच्छेद 44 राज्य को समान नागरिक संहिता की दिशा में प्रयास करने का निर्देश देता है। सवाल है कि शादी, तलाक, विरासत और पारिवारिक अधिकारों जैसे मामलों में समानता का रास्ता कब साफ होगा?
किसी महिला को सिर्फ उसके मजहब या परिवार की परंपरा के कारण बराबरी से वंचित क्यों रखा जाए? इंसाफ का तराजू सबके लिए एक जैसा होना चाहिए। किसी धर्म या समुदाय को संविधान से ऊपर नहीं माना जा सकता।
एक देश, बराबर अधिकार। न किसी को खास रियायत, न किसी के साथ नाइंसाफी।
यही संवैधानिक रास्ता है। यही आधुनिक भारत की जरूरत भी है।
यूरोप की उथल-पुथल को कुछ विचारक सभ्यताओं के टकराव के रूप में देखते हैं। उनके मुताबिक, एक तरफ आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्य हैं, तो दूसरी तरफ कुछ कट्टरपंथी विचारधाराएँ हैं, जो मजहबी नियमों को सर्वोपरि मानती हैं।
असली सवाल यह है कि कौन संविधान और कानून का सम्मान करता है, और कौन मजहब के नाम पर दूसरों पर अपनी मर्जी थोपना चाहता है।
भारत को हर तरह की मजहबी कट्टरता, सांप्रदायिक नफरत और हिंसक राजनीति के खिलाफ सख्त रुख अपनाना चाहिए। किसी को भी कानून हाथ में लेने, दूसरों को धमकाने या धार्मिक सत्ता को संविधान से ऊपर रखने की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए।
कानून का डंडा सबके लिए बराबर चले। चुनिंदा लोगों पर सख्ती और अपने लोगों को छूट, इस दोहरे रवैये से समाज नहीं जुड़ता।
यूरोप का अनुभव बताता है कि कमजोर सीमा प्रबंधन, एकीकरण की नाकामी और राजनीतिक ढुलमुलपन समय के साथ बड़ी समस्याएँ पैदा कर सकते हैं। भारत को इनसे सबक लेना चाहिए।
सीमाओं की निगरानी मजबूत हो। अवैध घुसपैठ की निष्पक्ष जाँच हो। नागरिकता की पुष्टि कानून के मुताबिक हो। मतदाता सूचियाँ दुरुस्त रहें। समान नागरिक संहिता पर गंभीरता से आगे बढ़ा जाए।
लेकिन सरकार को यह भी याद रखना होगा कि प्रशासनिक कार्रवाई राजनीतिक ध्रुवीकरण का हथियार नहीं बननी चाहिए। हर नागरिक को इज्जत, निष्पक्ष सुनवाई और कानून का संरक्षण मिलना चाहिए।
भारत की ताकत उसकी विविधता में है। जरूरत इस बात की है कि इस विविधता को संविधान के साझा धागे में पिरोया जाए।
यूरोप से मिलने वाला संदेश साफ है। साझा नियमों के बिना सामाजिक एकता नहीं टिकती, और जनता के भरोसे के बिना लोकतंत्र मजबूत नहीं होता।
भारत को तेजी से कदम उठाने होंगे, मगर पूरी समझदारी के साथ। मजबूत सीमाएँ, साफ मतदाता सूचियाँ, समान नागरिक अधिकार और सांप्रदायिकता पर सख्त लगाम एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।
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