Tuesday, October 20, 2026

 यूरोप की सड़कों पर बगावत: मजहबी असंतोष या एकीकरण की नाकामी?

अमेरिका से यूरोप तक आव्रजन के खिलाफ बढ़ता गुस्सा, दक्षिणपंथी ताकतें सख्त कार्रवाई के लिए बना रहीं दबाव

__________________________

बृज खंडेलवाल द्वारा

21 अक्टूबर 2026

__________________________

यूरोप की सड़कों पर उठता धुआँ अब सिर्फ महँगाई, बेरोजगारी या बदहाल शिक्षा व्यवस्था का सवाल नहीं रह गया है। फ्रांस से बेल्जियम तक हिंसक प्रदर्शनों में मुस्लिम पृष्ठभूमि के कुछ युवाओं की भागीदारी ने आव्रजन, मजहबी पहचान और सामाजिक एकीकरण पर नई बहस छेड़ दी है। पुलिस पर हमले, आगजनी और लूटपाट ने मेजबान समाज के साथ बढ़ते टकराव की चिंता गहरा दी है। सवाल है कि यूरोप की बहुसांस्कृतिक नीति कहाँ चूकी? क्या यह मजहबी असंतोष का नतीजा है या एकीकरण की नाकामी का? और इस टकराव का समाधान क्या है?

_________________________


पश्चिमी सभ्यता की चमक पर अब खरोंचें नजर आने लगी हैं। अमेरिका से ब्रिटेन, फ्रांस, इटली और जर्मनी तक आव्रजन का मुद्दा बारूद के ढेर पर बैठा है। बहस अब सीमाओं और शरणार्थियों तक सीमित नहीं रही। यह मोहल्लों, बाजारों, चुनावी सभाओं और आम बातचीत का हिस्सा बन चुकी है। समाज का एक बड़ा वर्ग चाहता है कि सरकारें सख्त कदम उठाएँ और कानून का इकबाल बुलंद करें।

हाल की यूरोप यात्रा के दौरान मुझे इस बदलते माहौल की झलक खुद देखने को मिली। वेनिस और कुछ दूसरे शहरों में स्थानीय लोगों से बातचीत हुई। उनकी बातों में ऐसी बेचैनी दिखाई दी, जो पर्यटन के चमकदार विज्ञापनों में नजर नहीं आती। आव्रजन उनके लिए महज राजनीतिक मुद्दा नहीं था। इसका रिश्ता रोजगार, मकान, सांस्कृतिक पहचान और अपने समाज के भविष्य से जुड़ गया है।

कुछ जगहों पर बांग्लादेशियों के बारे में बेहद अपमानजनक टिप्पणियाँ भी सुनने को मिलीं। उनके प्रति तिरस्कार और घृणा खुलकर सामने आई। लेकिन इस गुस्से के पीछे छिपी बेचैनी को नजरअंदाज करना भी समझदारी नहीं होगी। 

पश्चिम आज पहचान के संकट से जूझ रहा है। आव्रजन इस टकराव का सबसे दिखाई देने वाला मैदान बन गया है। सवाल उठ रहा है कि क्या सरकारें बदलते सामाजिक हालात को समझने में नाकाम रही हैं? क्या विविधता और समावेश के नारों के बीच एकीकरण की बुनियादी जरूरतें पीछे छूट गईं?

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप ने सीमा सुरक्षा और निर्वासन को अपनी राजनीति का प्रमुख हथियार बनाया है। उनके समर्थकों का तर्क है कि अनियंत्रित आव्रजन राष्ट्रीय संप्रभुता को कमजोर करता है, सार्वजनिक सेवाओं पर दबाव बढ़ाता है और स्थानीय नागरिकों के हित प्रभावित करता है। दूसरी ओर, विरोधियों को डर है कि अंधाधुंध कार्रवाई से परिवार बिछड़ेंगे और निर्दोष लोगों के अधिकार कुचले जाएंगे।

ब्रिटेन में भी ऐसी ही हवा बह रही है। रिफॉर्म यूके और रूपर्ट लोवे की रिस्टोर ब्रिटेन पार्टी आव्रजन को लेकर जनता की नाराजगी को राजनीतिक आवाज दे रही हैं। लोवे सीमाओं पर सख्ती और निर्वासन की व्यापक व्यवस्था के समर्थक हैं। उनके विचारों में मानवाधिकारों और शरणार्थियों से जुड़े मौजूदा कानूनी ढाँचे में बड़े बदलाव की मांग भी शामिल है।

यह राजनीति पश्चिम में बदलते मिजाज का संकेत है। कल तक दक्षिणपंथी चरमपंथियों की मांग समझे जाने वाले विचार आज मुख्यधारा की बहस में जगह बना रहे हैं। जो सरकारें कभी विविधता और समावेश की दुहाई देती थीं, उनसे अब पूछा जा रहा है कि सीमाओं का मतलब क्या है, कानून का पालन कौन कराएगा और नागरिकों की चिंताओं का जवाब कौन देगा?

लेकिन आखिर यह बदलाव क्यों आया?

इसके पीछे कई कारण हैं। मकानों की कमी, महँगी जिंदगी, सार्वजनिक सेवाओं पर बढ़ता दबाव और रोजगार की चिंता ने लोगों को परेशान किया है। कुछ इलाकों में तेजी से बदलती आबादी के कारण भाषा, रीति-रिवाज और सामाजिक तालमेल को लेकर भी बेचैनी पैदा हुई है। आतंकवादी हमलों और धार्मिक कट्टरपंथ की घटनाओं ने इन आशंकाओं को और हवा दी है।

दक्षिणपंथी नेताओं का आरोप है कि सरकारें अपने नागरिकों की परेशानियों से ज्यादा नए आने वालों की जरूरतों पर ध्यान देती हैं। उनके मुताबिक, उदारवादी नीतियों ने ऐसी समस्याएँ पैदा की हैं, जिनका खामियाजा आम लोगों को भुगतना पड़ रहा है।

लेकिन आव्रजन को हर सामाजिक समस्या का जिम्मेदार ठहराना भी गलत होगा। प्रवासी कोई एक जैसा समूह नहीं हैं। 

इसी तरह, आव्रजन की हर आलोचना को नस्लभेद बताकर खारिज करना भी उचित नहीं है। नागरिकों को यह पूछने का पूरा हक है कि उनका देश कितने नए लोगों को बसा सकता है, किस तरह के कामगारों की जरूरत है, शरण के दावों की जाँच कैसे होगी और अवैध रूप से रह रहे लोगों के मामलों का निपटारा कब किया जाएगा।

नए आने वालों से यह अपेक्षा भी जायज है कि वे मेजबान देश के कानूनों, भाषा और बुनियादी लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करें। महिलाओं की समानता, धार्मिक स्वतंत्रता और दूसरे समुदायों के प्रति सहिष्णुता किसी एक मजहब या संस्कृति की जागीर नहीं हैं। ये लोकतांत्रिक समाज की बुनियादी शर्तें हैं।

यूरोप के मौजूदा संकट में मजहबी पहचान का पहलू भी बहस के केंद्र में है। कुछ हिंसक घटनाओं में मुस्लिम पृष्ठभूमि के युवाओं की भागीदारी पर सवाल उठना स्वाभाविक है। लेकिन कुछ लोगों के व्यवहार को पूरे मुस्लिम समुदाय का चरित्र मान लेना गंभीर भूल होगी। हर हिंसक प्रदर्शन को मजहबी असंतोष का नतीजा बताना भी तथ्यों से आगे निकलना होगा। आर्थिक नाराजगी, भेदभाव, कट्टरपंथ और स्थानीय तनाव जैसी वजहें अलग-अलग घटनाओं में भूमिका निभा सकती हैं। निष्कर्ष सबूतों के आधार पर ही निकाले जाने चाहिए।

असली चुनौती जायज शिकायतों और सामूहिक नफरत के बीच स्पष्ट लकीर खींचने की है। सरकारों को न तो हिंसा के सामने घुटने टेकने चाहिए और न ही पूरे समुदायों को शक के कठघरे में खड़ा करना चाहिए। कानून सबके लिए बराबर हो, यही लोकतंत्र की असली कसौटी है।

प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं, "पश्चिमी सरकारों को कानून लागू करने होंगे। अवैध प्रवेश पर नियंत्रण करना होगा। शरण के दावों का समय पर निपटारा करना होगा। जिन लोगों को देश में रहने का कानूनी अधिकार नहीं है, उन्हें लागू कानूनों और जरूरी सुरक्षा प्रावधानों के तहत वापस भेजना होगा। आने वाले साल यूरोप की लोकतांत्रिक सोच और सामाजिक एकता की परीक्षा लेंगे।"

तूफान अभी थमा नहीं है। यह संकट समझदारी भरे सुधारों का रास्ता खोलेगा या समाज में गहरी दरारें पैदा करेगा, इसका फैसला नेताओं के कदम और आम लोगों की सोच करेगी। सरकारों को सख्ती और इंसानियत के बीच संतुलन बनाना होगा। आव्रजन पर नियंत्रण जरूरी हो सकता है, लेकिन नफरत को नीति बनाना किसी समस्या का समाधान नहीं है।

यूरोप अब आँखें मूँदकर नहीं बैठ सकता। उसे अपनी नीतियों की कमियों को स्वीकारना होगा, एकीकरण की प्रक्रिया मजबूत करनी होगी और कानून का राज कायम रखना होगा। मगर अपनी पहचान बचाने की कोशिश में उसे अपनी इंसानियत भी नहीं खोनी चाहिए।


No comments:

Post a Comment