Monday, November 2, 2026

 यमुना दम तोड़ रही है, वादों की नदी बह रही है!

यूपी विधानसभा चुनाव में योगी आदित्यनाथ से आगरा पूछेगा: यमुना और शहर से किए वादों का हिसाब कहाँ है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

3 नवंबर 2026

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उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों की आहट के साथ एक सवाल उठना लाजिमी है। क्या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से आगरा की जनता पूछेगी कि यमुना को साफ करने और शहर की समस्याएँ दूर करने के उनके वादों का क्या हुआ? क्या यमुना को निर्मल बनाने, पर्याप्त पानी दिलाने और आगरा में बैराज बनाने की घोषणाएँ जमीन पर उतरीं? या फिर ये वादे सरकारी फाइलों और चुनावी भाषणों में गुम हो गए?

आखिर आगरा कब तक इंतजार करेगा? ताजमहल के पीछे बहती यमुना कब नदी बनेगी, नाला नहीं? क्या चुनावी मंचों पर विकास की गंगा बहाने वाले नेता यमुना की बदहाली का जवाब भी देंगे?

भारत विकास की नई ऊँचाइयाँ छूने का दावा करता है। दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने के सपने देखता है। मगर अपनी नदियों की हालत भी देखिए! कहीं नाले बह रहे हैं, कहीं जहरीला पानी जमा है। कहीं कारखानों का कचरा है, तो कहीं सरकारी महकमों की बेरुखी। विकास की चमक के पीछे पर्यावरण की बदसूरत तस्वीर छिपी है।

ब्रज मंडल की यमुना इस संकट का सबसे शर्मनाक उदाहरण है। जिस नदी को हम माँ कहते हैं, उसी को नालों का खुला दरिया बना दिया है।

दिल्ली पहुँचते ही यमुना का दम घुटने लगता है!

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की 2025 की निगरानी रिपोर्ट नदी की असलियत बयान करती है। दिल्ली में प्रवेश करते समय पल्ला के पास यमुना की हालत अपेक्षाकृत बेहतर रहती है। पानी में घुली ऑक्सीजन का स्तर पाँच मिलीग्राम प्रति लीटर से ऊपर रहता है। लेकिन दिल्ली में दाखिल होते ही नदी की सांस फूलने लगती है।

ISBT, ITO, निजामुद्दीन और ओखला पहुँचते-पहुँचते पानी की हालत बेहद खराब हो जाती है। कई जगह ऑक्सीजन 0.3 मिलीग्राम प्रति लीटर तक गिर जाती है। जैविक प्रदूषण मापने वाला BOD स्तर 40 से 70 मिलीग्राम प्रति लीटर तक पहुँच जाता है। जबकि नहाने योग्य पानी के लिए यह तीन मिलीग्राम से कम होना चाहिए।

पानी में मल-मूत्र से जुड़े जीवाणुओं की संख्या लाखों से करोड़ों तक पहुँच जाती है। सुरक्षित सीमा मात्र 2,500 है। मथुरा और वृंदावन पहुँचने पर भी हालात नहीं सुधरते। यहाँ BOD आठ से पंद्रह मिलीग्राम प्रति लीटर तक दर्ज किया गया है। दिल्ली का प्रदूषण आखिर कब तक ब्रज की आस्था और सेहत को डुबोता रहेगा?

रोजाना हजारों लीटर गंदगी, सफाई के दावे!

दिल्ली हर दिन लगभग 3,596 मिलियन लीटर गंदा पानी पैदा करती है। शहर में 37 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) हैं। इनकी कुल क्षमता लगभग 3,474 MLD बताई जाती है। मगर क्षमता और वास्तविक सफाई में बड़ा फर्क है।

करीब 2,955 MLD पानी ही ट्रीट हो पाता है। लगभग 641 MLD गंदा पानी बिना पर्याप्त सफाई के नालों में बह जाता है। यही नाले आगे चलकर यमुना में जहर घोलते हैं।

मध्य 2025 के आकलन में केवल 23 प्लांट निर्धारित मानकों पर खरे उतरे। 14 प्लांट नियमों का पालन नहीं कर पाए। ऊपर से दिल्ली रोजाना 11 हजार टन से अधिक ठोस कचरा पैदा करती है। उसका पूरा निस्तारण नहीं होता। प्लास्टिक और गंदगी आखिरकार नदी तक पहुँचती है।

देशभर में गंदे पानी का कारोबार!

यह बीमारी केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है। भारत रोजाना लगभग 70 से 72 अरब लीटर गंदा पानी पैदा करता है। लेकिन इसका उपचार मुश्किल से 28 प्रतिशत हो पाता है। बाकी पानी नदियों, तालाबों और जलस्रोतों पर बोझ बनता है।

नमामि गंगे योजना के तहत हजारों करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। वर्ष 2026 के मध्य तक 4,200 MLD से अधिक नई या सुधारी गई क्षमता का दावा किया गया। सैकड़ों परियोजनाएँ पूरी हुईं। कुछ इलाकों में औद्योगिक प्रदूषण पर लगाम भी लगी।

लेकिन कागजों पर बनी क्षमता और जमीन पर चलने वाली सफाई में अंतर है। कई प्लांट नियमित नहीं चलते। सीवर नेटवर्क अधूरे हैं। गंदा पानी चोरी-छिपे नदियों में छोड़ दिया जाता है। आखिर निगरानी करने वाले विभाग किस मर्ज की दवा हैं?

ताजमहल भी भुगत रहा है यमुना की सजा!

ब्रज में यमुना की बदहाली केवल पर्यावरण का मामला नहीं है। यह हमारी विरासत, संस्कृति और पर्यटन पर भी चोट है।

आगरा में ठहरे हुए प्रदूषित पानी के कारण कीड़ों के झुंड पनपते हैं। Goeldichironomus नामक कीड़े ताजमहल के आसपास मंडराते हैं। उनकी बीट से संगमरमर पर हरे और काले धब्बे पड़ते हैं। वर्ष 2026 में भी ताजमहल के उत्तरी हिस्से पर ऐसे दाग दोबारा दिखाई दिए।

सड़ते जैविक कचरे से निकलने वाली हाइड्रोजन सल्फाइड गैस भी संगमरमर को नुकसान पहुँचाती है। एक अध्ययन में ताजमहल के पास यमुना की तलछट में प्रति किलोग्राम 800 तक माइक्रोप्लास्टिक कण मिले।

दुनिया ताजमहल की खूबसूरती देखने आती है। मगर उसके पीछे बहती यमुना की बदहाली देखकर क्या संदेश लेकर जाती होगी?

पानी नहीं होगा तो नदी कैसे बचेगी?

पर्यावरणविद डॉ देवाशीष भट्टाचार्य कहते हैं कि यमुना की सबसे बड़ी समस्या केवल गंदगी नहीं है। नदी में पर्याप्त पानी भी नहीं है। वजीराबाद बैराज के नीचे साल के अधिकांश समय नदी लगभग सूखी रहती है। राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान ने न्यूनतम 23 क्यूमेक पानी की सिफारिश की है। मगर वास्तविक प्रवाह इससे काफी कम रहता है।

पानी कम होगा तो गंदगी कैसे बहेगी? ऑक्सीजन कैसे बढ़ेगी? नदी अपने आपको साफ कैसे करेगी? ये प्रश्न करते हैं, डॉ हरेन्द्र गुप्ता, अध्यक्ष इंडियन मेडिकल एसोसिएशन, आगरा। पर्याप्त ताजा पानी नदी की जिंदगी है। उसके बिना सफाई के सारे प्रयास आधे-अधूरे रहेंगे।

सरकारें बदलती हैं, मगर घोषणाओं का सिलसिला नहीं बदलता। अक्टूबर 2026 में लगभग 9,000 करोड़ रुपये की परियोजनाएँ शुरू की गईं। लक्ष्य रखा गया कि 2029 तक यमुना साफ हो जाएगी।


यमुना को बचाने के लिए हर नाले का पानी साफ करना होगा। नदी में पर्याप्त ताजा पानी छोड़ना होगा। प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों और विभागों पर कार्रवाई करनी होगी। सभी राज्यों और एजेंसियों के बीच तालमेल बनाना होगा।

हर प्लांट की ऑनलाइन निगरानी हो। नियम तोड़ने वालों पर स्वतः जुर्माना लगे। अफसरों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। आखिर जनता के पैसे का हिसाब कौन देगा?

चुनाव आएँगे, सवाल भी उठेंगे!

रिवर कनेक्ट कैंपेन से जुड़ीं पद्मिनी अय्यर कहती हैं, "आगरा को केवल चमकते चौराहे और सजावटी रिवरफ्रंट नहीं चाहिए। शहर को जीवित यमुना चाहिए। उसे बैराज, पर्याप्त जलप्रवाह, गंदे नालों से मुक्ति और नदी की सफाई चाहिए।"

योगी सरकार से सवाल पूछना जनता का लोकतांत्रिक अधिकार है। चुनावी सभाओं में विकास की उपलब्धियाँ गिनाई जाएँगी। मगर यमुना की हालत भी उस विकास का हिस्सा है। आगरा को उम्मीद है कि इस बार घोषणाओं के बजाय ठोस काम का हिसाब मिलेगा।

विकास का मतलब केवल चौड़ी सड़कें, चमकती इमारतें और ऊँचे पुल नहीं हैं। असली तरक्की तब होगी, जब हमारी नदियाँ साफ बहेंगी और ताजमहल के पीछे यमुना बदबू नहीं, खूबसूरती बिखेरेगी।

अब बहुत हो चुका! वादों की नदी बहाना बंद कीजिए। यमुना में पानी बहाइए। सीवेज रोकिए, प्रदूषण पर लगाम लगाइए और जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह बनाइए।

क्योंकि नदी मरती है तो केवल पानी नहीं मरता, पूरी सभ्यता दम तोड़ती है!