Sunday, October 25, 2026

 लोकतंत्र या दंगल? सियासत में मुद्दे गायब, गालियों का जलवा!

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संसद में बहस होनी थी, अखाड़े में कुश्ती शुरू हो गई! जनता पूछ रही है, हुजूर, देश चलाना है या जुबानी पटखनी देनी है?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

28 अक्टूबर, 2026

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विपक्षी नेताओं को क्या हो गया है? लोकतंत्र में सवाल उठते हैं, दलीलें दी जाती हैं और सरकारों को कठघरे में खड़ा किया जाता है। मगर भारतीय सियासत का नया तमाशा देखिए! यहां मुद्दों की जगह मुहावरों ने ले ली है। नीतियों की जगह निजी हमले हैं। बहस की जगह बदजुबानी का बाजार गर्म है। ऐसा लगता है कि संसद और चुनावी मंचों के बीच कहीं कोई कुश्ती का अखाड़ा खुल गया है। फर्क बस इतना है कि पहलवानों की जगह नेता हैं और तालियां बजाने वालों में जनता के साथ टीवी कैमरे भी शामिल हैं।

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच ताजा जुबानी जंग इसी गिरावट की एक मिसाल है। पटना में 25 अक्टूबर को खड़गे की टिप्पणी ने सियासी गलियारों में हंगामा खड़ा कर दिया। सभा में किसी ने कहा कि मोदी सत्ता नहीं छोड़ेंगे। जवाब में खड़गे ने कहा, “मोदी का बाप भी जाएगा।”

बस, फिर क्या था! सियासत का पारा चढ़ गया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इसे मर्यादा का उल्लंघन बताया। भाजपा नेताओं ने इसे गुंडों जैसी भाषा करार दिया। अब सवाल यह है कि सत्ता स्थायी नहीं होती, यह बताने के लिए दिवंगत पिता को मैदान में उतारना कितना जरूरी था? क्या लोकतंत्र में दलीलों का अकाल पड़ गया है कि रिश्तेदारों को भी चुनावी प्रचार में घसीटना पड़े?

सियासत में गाली का कारोबार नया नहीं है। मगर पुराने तमाशे को नई पैकिंग में बेचने से वह सिद्धांत नहीं बन जाता। आइए, इस सियासी दंगल के कुछ चर्चित पहलवानों की चालें देखें।

मुद्दों का जनाजा!

पहला नमूना प्रधानमंत्री की दिवंगत मां हीराबेन को निशाना बनाने वाली टिप्पणियां हैं। 2025 के बिहार चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस और राजद की वोट अधिकार यात्रा से जुड़े मंचों पर मोदी और उनकी मां को लेकर आपत्तिजनक भाषा इस्तेमाल किए जाने के आरोप लगे। विवाद बढ़ा तो सफाई और राजनीतिक पलटवार का दौर शुरू हुआ।

लेकिन सवाल सीधा है। किसी नेता की मां को अपमानित करके बेरोजगार नौजवान को नौकरी मिल जाएगी? महंगाई घट जाएगी? किसान की आमदनी बढ़ जाएगी? मां का अपमान जवाबदेही नहीं है। यह भावनाओं से तालियां बटोरने की कोशिश है। राजनीति में विरोध कीजिए, मगर परिवार को चुनावी पोस्टर मत बनाइए।

दूसरा नमूना है ऐसे जुमले, जो किसी नेता की पूरी राजनीति को एक ठप्पे में बंद कर देते हैं। मोदी के लिए कभी 'मौत का सौदागर' जैसे शब्द इस्तेमाल हुए। ऐसे नारे टीवी पर खूब चलते हैं, सोशल मीडिया पर दौड़ते हैं और समर्थकों की महफिल में वाहवाही लूटते हैं।

मगर सुरक्षा नीति, अर्थव्यवस्था या सरकारी फैसलों पर ठोस बहस कहां है? किसी को खलनायक घोषित कर देना आसान है। उसके मुकाबले बेहतर नीति पेश करना मुश्किल। गाली मुफ्त है, विकल्प तैयार करने में मेहनत लगती है!

तीसरा नमूना 'चायवाला' कहकर मोदी की पृष्ठभूमि का मजाक उड़ाना है। मेहनत करके रोजी कमाना हमारे समाज में शर्म की बात कब से हो गई? करोड़ों लोग चाय बेचते हैं, रेहड़ी लगाते हैं और पसीना बहाकर परिवार पालते हैं। उनकी मेहनत का मजाक उड़ाने वाले आखिर किस भारत की तस्वीर पेश करना चाहते हैं?

प्रधानमंत्री के कामकाज की आलोचना जरूर होनी चाहिए। रोजगार, महंगाई और विकास के आंकड़ों पर सवाल उठने चाहिए। मगर चाय बेचने के पुराने अनुभव को ताना बनाना, बहस नहीं, वर्गीय अहंकार की झलक है।

चौथा नमूना राहुल गांधी की शैली में दिखाई देता है। अगस्त 2026 में उन्होंने मोदी की कूटनीति पर तंज कसते हुए विदेशी नेताओं से गले मिलने की शैली का मजाक उड़ाया और मंच पर गले लगने का नाटकीय अभिनय किया।

राजनीति में व्यंग्य की जगह है। मगर व्यंग्य का निशाना नीतियां और उनके नतीजे हों, तो बात बने। विदेश नीति को सिर्फ गले मिलने तक सीमित कर देना उतना ही अधूरा है, जितना क्रिकेट का विश्लेषण केवल खिलाड़ियों की जर्सी देखकर करना।

नेता प्रतिपक्ष का काम सरकार से तीखे सवाल पूछना है। मगर हर गंभीर मुद्दे को कॉमेडी शो बना देने से जवाबदेही मजबूत नहीं होती। जनता को पंचलाइन से ज्यादा नतीजे चाहिए।


पांचवां मुद्दा है 'वोट चोरी' के आरोपों का। विपक्ष ने मतदाता सूची, फर्जी पते, दोहराए गए नामों और सामूहिक पंजीकरण जैसे मामलों पर सवाल उठाए हैं। ऐसे आरोपों की जांच जरूरी है। चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी हो, तो उसे सामने लाना लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है।

लेकिन बड़े आरोपों के साथ पुख्ता सबूत भी चाहिए। हर संदेह अपने आप साजिश का प्रमाण नहीं बन जाता। शिकायतों की जांच हो, दस्तावेज सामने आएं और जिम्मेदार संस्थाएं जवाब दें। नारेबाजी से चुनाव सुधार नहीं होता। भरोसा तथ्यों से बनता है, माइक की आवाज से नहीं।

आईना दोनों तरफ है!

यहां भाजपा को भी दूध का धुला मान लेने की जरूरत नहीं। पप्पू को पप्पू किसने बनाया? सत्तापक्ष की बयानबाजी, विरोधियों के लिए निजी ताने और संस्थाओं को लेकर उठते विवाद भी लोकतांत्रिक माहौल को प्रभावित करते हैं। सत्ता में बैठे लोगों की जिम्मेदारी कम नहीं, बल्कि ज्यादा है। आखिर जवाबदेही का पहला तकाजा है कि आलोचना सुनने का हौसला भी हो।

सामाजिक कार्यकर्ता पद्मिनी अय्यर का सवाल गौर करने लायक है। बेरोजगारी, केंद्र-राज्य संबंध, संस्थाओं की स्वतंत्रता और सामाजिक सद्भाव जैसे मुद्दों पर गंभीर बहस कम क्यों होती है? हर दिन नया अपमान सुर्खियां बटोरता है, जबकि जनता की परेशानियां अगले दिन फिर कतार में खड़ी मिलती हैं।

बिहार के राजनैतिक समीक्षक  टी. पी. श्रीवास्तव की बात भी मौजूं है। असहमति आजाद समाज की ताकत है, लेकिन तिरस्कार उसका जहर। जब मंचों पर परिवारों को घसीटा जाता है, पृष्ठभूमि पर तंज कसे जाते हैं और चुनावी प्रक्रिया पर बिना पर्याप्त प्रमाण के बड़े आरोप लगाए जाते हैं, तो विवेकपूर्ण बहस कमजोर पड़ जाती है।"

लोकतंत्र कोई दंगल नहीं, जहां विरोधी को चित करना ही जीत हो। यहां जीत तब है, जब जनता की जिंदगी बेहतर बने। विपक्ष सवाल पूछे, सरकार जवाब दे और दोनों अपने दावों के सबूत पेश करें।

पब्लिक कमेंटेटर प्रोफ पारस नाथ चौधरी फरमाते हैं, "नेताओं को याद रखना चाहिए कि जनता टिकट लेकर तमाशा देखने नहीं आई है। उसे रोजगार, अच्छी सड़कें, साफ हवा, बेहतर अस्पताल और सुरक्षित भविष्य चाहिए। वह संसद में नीतियों की कुश्ती देखना चाहती है, नेताओं के अहंकार की नहीं।"

आखिर में सवाल वही है: लोकतंत्र चलेगा या जुबानी दंगल? अगर नेताओं ने अपनी जुबान पर लगाम नहीं लगाई, तो अखाड़े में तालियां भले बजती रहें, मगर हार जनता की होगी।


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