पापी तेल का सवाल है!
महान चक्कर: लड़ कौन रहा है, किससे?
एलिस अगर वंडरलैंड से युद्धभूमि में पहुँच जाए, तो शायद यही पूछे!
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By Ponga Pakhandi
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ज़रा ठहरो! दुनिया में आखिर लड़ कौन रहा है, और किससे? ईरान इजरायल से, रूस यूक्रेन से, अमेरिका रूस को सबक सिखा रहा है, और यूरोप शांति के भाषण दे रहा है। भारत क्रूड साफ कर रहा है। और तेल? वह सबके पहिए में ग्रीस लगा रहा है, ताकि कोई चरमराए नहीं, चाहे ग्लोबल वार्मिंग से दुनिया क्यों न उबल जाए।
एलिस आज वंडरलैंड से निकलकर इस तेल बाजार में पहुंची, तो उसका पहला सवाल था : “भाई, यहाँ दुश्मन कौन है? और दोस्त कौन, जो दुश्मन की कमाई से अपनी दोस्ती का बिल भर रहा है?” उसको बताया गया: रूस के किसी कुएँ से एक बैरल टैंकर पर चढ़ता है। बेचारे को क्या खबर कि उसका अगला सफर इतिहास की सबसे बड़ी नैतिक नौटंकी बनेगा ।
क्रूड का टैंकर पहुँचता है जामनगर। भारत उसे डिस्काउंट पर खरीदता है और कहता है, “यह हमारी रणनीतिक आजादी है।” ट्रंप कहते हैं, “यह तो पुतिन की जेब भरना है।” बैरल मन ही मन बुदबुदाता है, “हुजूर, मैं तो सिर्फ तेल हूँ। आप अपने उसूलों का भाव खुद तय कर लीजिए, मेरा तो बस मार्केट रेट है!”
फिर रिफाइनरी की भट्ठी में बैरल तपता है और बाहर निकलता है, भारतीय डीजल बनकर। रसायन वही, गंध वही, पर कागज़ों में मानो गंगा नहाकर आया हो। हर-हर गंगे, हर-हर लीटर!
यह दुनिया की सबसे अनोखी आध्यात्मिक यात्रा है। रिफाइनरी में तेल शुद्ध होता है, राजनीति में पाप पुण्य बन जाता है। प्रतिबंध गेट के बाहर चप्पल उतारकर खड़े रहते हैं, मुनाफा सबकी जेबों को गरम करके लौटता है।
अब यूरोप का कमाल देखिए। सुबह रूसी तेल पर प्रतिबंध की प्रेस कॉन्फ्रेंस होती है। दोपहर तक भारतीय डीजल के टैंकर उसके दरवाज़े पर होते हैं। शाम को भारत को नैतिकता की क्लास मिलती है, और क्लास की फीस भी डीजल में ही कटती है।
यूरोप सीना ठोककर कहता है, “हम रूसी तेल नहीं खरीदते!” बिल्कुल नहीं जनाब! वे तो भारतीय डीजल खरीदते हैं, जिसने रूस से निकलकर भारत में सभ्यता की तमीज़ सीख ली है, जैसे कोई गाँव का लड़का विदेश से लौटकर अंग्रेज़ी बोलने लगे।
तेल रूसी, मेहनत भारतीय, ग्राहक यूरोपीय, और नैतिकता का सर्टिफिकेट यूरोप ने खुद ही प्रिंट आउट निकल कर बाँट दिए। इसे कहते हैं आत्मनिर्भर पाखंड!
अमेरिका भी क्यों पीछे रहे? उसे गुस्सा आता है कि भारत रूस से तेल क्यों खरीदता है। वह टैरिफ की लाठी उठाता है और सिद्धांतों का पाठ शुरू करता है। लेकिन जब रूसी संवर्धित यूरेनियम के अमेरिकी आयात का ज़िक्र छिड़ता है, तो सिद्धांतों का वॉल्यूम अचानक म्यूट हो जाता है।
आखिर उसूल भी पेट्रोल जैसे हैं: इस्तेमाल से पहले अपनी सुविधा के हिसाब से रिफाइन करने पड़ते हैं!
रुको, कहानी अभी बाकी है!
यूक्रेन को युद्ध के लिए डीजल चाहिए, और डीजल बनता है रूसी तेल से भारत में। यूरोप यूक्रेन को मदद देता है, यूक्रेन उससे ईंधन खरीदता है, ईंधन का पैसा घूमकर रूसी तेल के अगले सौदे तक पहुँचता है, और रूस उसी पैसे से युद्ध चलाता रहता है। फिर यूक्रेन कहता है, “और मदद चाहिए!”
यानी एक हाथ से आग बुझाओ, दूसरे से पेट्रोल खरीदो, और तीसरे हाथ से अगले राहत पैकेज की अर्जी लिखो। वैश्विक कूटनीति में इसे “बहुआयामी संलग्नता” कहते हैं। आम भाषा में इसे बिना ब्रेक की मेरी-गो-राउंड कहा जाता है।
एलिस घबराकर पूछती है, “माफ कीजिए, क्या यहाँ कोई पागलखाना है?”
जवाब मिला, “नहीं बच्ची, वो तो आगरा में है। यहाँ तो अंतरराष्ट्रीय कूटनीति है। यहाँ पागलपन को रणनीति कहते हैं और विरोधाभास को राष्ट्रीय हित!”
रूस की विडंबना भी कम मज़ेदार नहीं। जिस दुश्मन से वह लड़ रहा है, उसकी गाड़ियाँ शायद उसी तेल की बूँदों से चल रही हों जो घूम-फिरकर वापस आई हों।
खेल समझो बाबू!
रूस: तेल बेचकर कमाई भी, युद्ध का खर्चा भी। दुश्मन से लड़ाई जारी, बाज़ार से उधारी बंद।
यूक्रेन: रूस से जंग, पर ईंधन की नब्ज़ उसी उलझी सप्लाई चेन में। दुश्मन की जेब पर वार करना है, पर टंकी भी भरवानी है।
यूरोप: मदद यूक्रेन की, प्रतिबंध रूस पर, और ज़रूरत पड़ी तो ईंधन भारतीय रिफाइनरी से। नैतिकता का झंडा ऊँचा, ऊर्जा की ज़रूरत उससे भी ऊँची।
अमेरिका: रूस पर सख्ती, भारत पर दबाव, अपने हितों पर लचीलापन। उसूलों का डंडा दूसरों के लिए, छूट का छाता खुद के लिए!
भारत: सस्ता क्रूड खरीदो, उपयोगी ईंधन बनाओ, रोज़गार और मुनाफा कमाओ। तर्क है: “फैसले राष्ट्रीय हित से होते हैं।” बाकी दुनिया इसे अपने-अपने चश्मे से देखती है, और चश्मे भी शायद उसी तेल के प्लास्टिक से बने हैं।
और तेल का बैरल? कन्फ्यूज़्ड! वह तो बस इतना जानता है कि वह जिस भी घाट पर रुका, वहाँ कोई न कोई उसे अपना बताकर बाकियों को उपदेश देने लगा।
तो आखिर में जीत किसकी हो रही है?
एलिस का आखिरी सवाल: “अगर रूस बेचकर कमाता है, भारत साफ करके कमाता है, यूरोप खरीदकर गाड़ियाँ चलाता है और यूक्रेन उसी से जंग लड़ता है, तो इस कहानी में हार कौन रहा है?”
खैर, हमें क्या?
यह तेल का चक्कर उस जहाज़ जैसा है जो समुद्र में अपनी जगह टिके रहने के लिए ही ईंधन फूँकता रहता है। इंजन दहाड़ता है, खर्चा बढ़ता है, धुआँ उठता है, पर जहाज़ आगे बढ़ने के बजाय एक ही जगह गोल-गोल घूमता है। फिर भी कप्तान माइक पर घोषणा करते हैं: “सब कुछ नियंत्रण में है!”
यही तो असली वंडरलैंड है। और जब तेल का पैसा गोल-गोल घूम रहा है, तो सवाल सिर्फ एक बचता है: क्या युद्ध भी उसी चक्कर में घूमता रहेगा, या कभी टंकी खाली होगी?
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