ट्रंप: धमकियों का बादशाह, यू-टर्न का उस्ताद!
नोबेल पुरस्कार मिलना चाहिए थूक कर चाटने की कला के लिए!
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बृज खंडेलवाल द्वारा
20 अक्टूबर 2026
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जब से बड़बोले डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में दोबारा डेरा जमाया है, दुनिया की शामत आई हुई है। लगता है, तीसरा विश्व युद्ध बस ट्रंप की अगली पोस्ट का इंतज़ार कर रहा है। अब तक तीन-चार बार दुनिया बारूद के ढेर पर बैठते-बैठते बची है। ट्रंप की जुबान मिसाइल है, दिमाग मौसम विभाग और फैसले ऐसे कि सुबह का शेर शाम को भीगी बिल्ली बन जाए।
इरादा था चीन की हेकड़ी निकालने का, उत्तर कोरिया के तानाशाह किम को घुटनों पर लाने का, ईरान को मिट्टी में मिलाने का और भारत की किश्ती को मझधार में डुबोने का। जेलेंस्की को दुनिया के सामने बेइज्जत करके यूक्रेन को रूस के सामने नाक रगड़वाने का सपना भी देखा। कनाडा को निगलने और ग्रीनलैंड पर कब्जे की हसरत भी पाल ली। नोबेल शांति पुरस्कार तो ऐसे चाहिए था, मानो दुनिया की सारी जंगें रोकने का ठेका अकेले इन्हीं ने ले रखा हो!
लेकिन न चीन झुका, न किम सुधरा, न ईरान गायब हुआ, न रूस ने ट्रंप के इशारे पर नाचना शुरू किया। कनाडा अपनी जगह खड़ा है, ग्रीनलैंड बिकने को तैयार नहीं और नोबेल पुरस्कार भी दूर से ठेंगा दिखाता रहा।
हर बार धमकी का पहाड़ खड़ा होता है, फिर समझौते का चूहा निकलता है। पहले आंखें लाल, फिर तेवर ढीले; पहले दुनिया को सबक सिखाने का ऐलान, फिर खुद सफाई देने की नौबत।
न पूरब बदला, न पश्चिम। बदली है तो सिर्फ अमेरिका की साख, जिसकी किरकिरी अब दुनिया भर में हो रही है। ट्रंप हर बार इतिहास बनाने निकलते हैं, मगर सुर्खियों में अपनी ही फजीहत का नया अध्याय जोड़ आते हैं।
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दुनिया को डराते हैं, फिर खुद ही पीछे हट जाते हैं। टैरिफ से रूस तक, अमेरिकी राष्ट्रपति की सियासत में कब क्या होगा, कोई नहीं जानता।
सुबह दुनिया को धमकी, शाम को समझौते की पेशकश! कभी व्यापार युद्ध का ऐलान, कभी दुश्मनों को सबक सिखाने की हुंकार। कभी दोस्तों पर पाबंदियां, तो कभी उन्हीं को राहत। डोनाल्ड ट्रंप की सियासत का यही रंग है। पहले धमाका करो, फिर नुकसान का हिसाब लगाओ। बात बिगड़ने लगे, तो पलटी मारकर उसे अपनी शानदार जीत बता दो!
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने राजनीति में यू-टर्न को एक नई कला बना दिया है। उनकी जुबान पर सख्ती रहती है, लेकिन फैसलों में अक्सर नरमी दिखाई देती है। उनकी धमकियों से दुनिया कांपती है, बाजारों में हलचल मचती है और सरकारें बेचैन हो जाती हैं। लेकिन कुछ समय बाद वही ट्रंप समझौते की मेज पर बैठे नजर आते हैं।
उनका हर ऐलान अंतिम फैसला नहीं होता। हर धमकी कार्रवाई में नहीं बदलती। और हर घोषित जीत वास्तव में जीत हो, यह भी जरूरी नहीं!
2 अप्रैल 2025 को ट्रंप ने दुनिया के सामने अपने टैरिफ अभियान को 'लिबरेशन डे' का नाम दिया। उन्होंने कई देशों पर भारी आयात शुल्क लगाने का ऐलान किया। उनका दावा था कि अमेरिका को दूसरे देशों ने व्यापार में खूब लूटा है। अब हिसाब बराबर करने का समय आ गया है।
ऐलान इतना आक्रामक था कि दुनिया भर के बाजारों में बेचैनी फैल गई। कारोबारियों को डर सताने लगा कि महंगे आयात, जवाबी शुल्क और व्यापार युद्ध से उनका कारोबार चौपट हो सकता है।
लेकिन 9 अप्रैल को कहानी में नया मोड़ आ गया। ट्रंप ने चीन को छोड़कर कई देशों पर लगाए गए नए शुल्कों में 90 दिनों की रोक लगा दी। सामान्य 10 प्रतिशत शुल्क जारी रहा, जबकि चीन के खिलाफ सख्ती और बढ़ाई गई। बाद में बातचीत के दौरान कई फैसलों में फिर बदलाव हुए।
जिस अभियान को ऐतिहासिक आर्थिक क्रांति बताया गया था, उसमें इतनी जल्दी बदलाव क्यों आया? शायद बाजारों की प्रतिक्रिया, कारोबारियों की चिंता और अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर संभावित असर ने हकीकत का आईना दिखा दिया।
भारत के मामले में भी ट्रंप की नीति में उतार-चढ़ाव दिखाई दिया। रूस से तेल खरीदने को लेकर उन्होंने भारत पर दबाव बनाया। भारतीय सामान पर शुल्क बढ़ाए गए और रूस से तेल खरीदने के कारण अतिरिक्त 25 प्रतिशत शुल्क भी लगाया गया।
वाशिंगटन का संदेश साफ था। रूस से तेल खरीदना जारी रखा, तो भारत को आर्थिक कीमत चुकानी पड़ सकती है। ट्रंप की इस सख्ती से भारतीय निर्यातकों की चिंता बढ़ी।
फिर फरवरी 2026 में तस्वीर बदलने लगी। अमेरिका ने भारत के साथ अंतरिम व्यापार समझौते की रूपरेखा घोषित की। इसके तहत रूस से तेल खरीदने से जुड़े अतिरिक्त 25 प्रतिशत शुल्क को हटाने और भारतीय सामान पर जवाबी शुल्क को 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करने की घोषणा की गई।
ट्रंप ने दावा किया कि भारत ने रूसी तेल की खरीद घटाने पर सहमति जताई है। लेकिन व्यापार समझौते के कई पहलुओं पर बातचीत और अनिश्चितता बनी रही।
यहां सवाल समझौते से नहीं, बल्कि उस अंदाज से है जिसमें पहले धमकी दी जाती है और बाद में राहत का ऐलान होता है।
भारत जैसे बड़े देश के लिए भी यह मामला मामूली नहीं है। अमेरिकी फैसलों का असर निर्यात, रोजगार, निवेश और कारोबार पर पड़ सकता है।
रूस के मामले में तो कहानी और दिलचस्प हो जाती है। रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर दबाव बनाने के लिए अमेरिका ने सख्त कदमों और भारी शुल्क की धमकियां दीं। भारत समेत कई देशों को चेतावनी मिली कि रूस से ऊर्जा खरीदना महंगा पड़ सकता है।
लेकिन अक्टूबर 2026 में फिर एक नया मोड़ आया। ट्रंप ने राष्ट्रीय हित का हवाला देते हुए संबंधित कानून के तहत अतिरिक्त दंडात्मक शुल्कों से अस्थायी राहत देने का फैसला किया। इससे रूसी ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर तत्काल दबाव कुछ कम हुआ।
इसी दौरान रूसी डीजल की आपूर्ति से जुड़ा अमेरिकी फैसला भी चर्चा में आया। प्रशासन ने ऊर्जा जरूरतों और यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने की कूटनीतिक कोशिशों का हवाला दिया।
अब सवाल उठता है कि जब रूस से ऊर्जा खरीदने पर दूसरों को सजा देने की बात हो रही थी, तो खुद अमेरिका के लिए रूसी ईंधन का रास्ता कैसे खुला?
ट्रंप की परेशानी यही है। उनके ऐलान इतने बड़े होते हैं कि बाद में उनसे पीछे हटना भी बड़ी खबर बन जाता है।
कभी ईरान पर हमले की तैयारी, कभी आखिरी समय पर रोक लगा दी जाती है।
ट्रंप के यू-टर्न केवल व्यापार तक सीमित नहीं हैं। 2019 में, अपने पहले कार्यकाल के दौरान, उन्होंने अमेरिकी ड्रोन गिराए जाने के बाद ईरान पर जवाबी हमले की मंजूरी दी थी। लेकिन हमला शुरू होने से कुछ मिनट पहले उन्होंने इसे रोक दिया।
ट्रंप ने संभावित जनहानि का हवाला दिया। यह फैसला बड़े युद्ध को टालने के लिहाज से समझदारी भरा हो सकता था।
इसी तरह नाटो को लेकर भी उनका रुख बदला। पहले उन्होंने इस सैन्य गठबंधन को अप्रासंगिक बताया, फिर कहा कि अब वह अप्रासंगिक नहीं रहा। हालांकि, सदस्य देशों से रक्षा खर्च बढ़ाने की मांग जारी रही।
टिकटॉक पर भी उनका रुख समय के साथ बदला। पहले उन्होंने इस पर प्रतिबंध लगाने या इसकी बिक्री के लिए दबाव बनाया। बाद में उन्होंने पूर्ण प्रतिबंध के बजाय समयसीमा बढ़ाने और दूसरे विकल्पों पर विचार करने का रास्ता अपनाया।
जब बार-बार बड़ी-बड़ी घोषणाओं के बाद नीति बदलती है, तो नेतृत्व की तैयारी और फैसलों की गंभीरता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
अमेरिका के दोस्त भी अब पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं। किसी देश की ताकत केवल उसके हथियारों, अर्थव्यवस्था या सेना में नहीं होती। उसकी असली ताकत उसके वादों की साख में भी होती है।
मित्र देश वर्षों की योजना बनाते हैं। वे व्यापार समझौते करते हैं, रक्षा सहयोग बढ़ाते हैं और निवेश के फैसले लेते हैं। अगर अमेरिकी नीति कभी सख्त और कभी नरम होती रहे, तो दूसरे देशों के लिए भरोसे के साथ आगे बढ़ना मुश्किल हो जाता है।
आज शुल्क लगाने की धमकी, कल राहत का ऐलान। आज प्रतिबंधों की बात, कल राष्ट्रीय हित का हवाला देकर छूट। ऐसी सियासत में मित्र देश भी हर घोषणा को अंतिम फैसला मानने से पहले कई बार सोचेंगे।
ट्रंप शायद मानते हैं कि अनिश्चितता उनकी सबसे बड़ी ताकत है। इससे विरोधी दबाव में आते हैं और बातचीत की मेज पर झुकने को मजबूर होते हैं। कुछ मौकों पर यह रणनीति काम भी कर सकती है।
लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। बार-बार बदलते फैसले मित्र देशों को नए विकल्प तलाशने के लिए मजबूर कर सकते हैं। अमेरिकी वादों की अहमियत भी घट सकती है।
ट्रंप की राजनीति का एक खास अंदाज है। पहले बयान को इतना आक्रामक बनाओ कि दुनिया का ध्यान खिंच जाए। फिर विरोध और नुकसान सामने आएं, तो समझौते का रास्ता तलाशो। आखिर में पीछे हटने को भी अपनी जीत बताकर पेश कर दो।
यह तरीका सुर्खियां बटोर सकता है। लेकिन क्या इससे दुनिया में भरोसा बढ़ता है? क्या इससे कारोबारियों को स्थिरता मिलती है? और क्या मित्र देशों को अमेरिकी फैसलों पर पूरा यकीन हो पाता है?
ट्रंप की सबसे बड़ी कला शायद यही है कि वह पीछे हटकर भी जीत का दावा कर लेते हैं। लेकिन हर बार दुनिया उनकी इस कला पर तालियां बजाएगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है।
प्रभाव और भरोसा दो अलग चीजें हैं। धमकियों से लोग कुछ समय के लिए झुक सकते हैं, मगर भरोसा केवल स्थिरता और साफ नीयत से बनता है। महाशक्ति का राष्ट्रपति होना बड़ी जिम्मेदारी है। हर बार मुंह की खाने के बाद उसे जीत का नाम देना आसान हो सकता है, लेकिन इतिहास ऐसे दांवों का हिसाब जरूर मांगता है।
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