Thursday, October 15, 2026

 कॉकरोचों का राज, बाबाओं का चमत्कार और मीडिया की नौटंकी!  

सच गायब, शोर बेशुमार! सत्ता की चापलूसी, अंधविश्वास का कारोबार और जनता के सवालों पर पर्दा आखिर कब तक?

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बृज खंडेलवाल द्वारा  

17 अक्टूबर 2026  

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रातोंरात भगवान बनने वाले बाबाओं की कमी नहीं है। भविष्य बताने वाले ज्योतिषियों की दुकानें चमक रही हैं। कोई ग्रहों की चाल से देश का भविष्य बताता है, कोई चमत्कार से किस्मत बदलने का दावा करता है। टीवी पर स्वयंभू बुद्धिजीवी ज्ञान बांटते हैं। संस्कृति के ठेकेदार तहजीब का सर्टिफिकेट जारी करते हैं। नारी मुक्ति के नाम पर कुछ लोग अपनी दुकान चलाते हैं। और इन सबके बीच कॉकरोच भी खूब फल-फूल रहे हैं; गंदगी में पलते हैं, खतरा भांपते ही बिल में घुस जाते हैं और मौका मिलते ही फिर बाहर निकल आते हैं।  

सवाल सीधा है। जब पाखंड का बाजार गर्म हो, अंधविश्वास की दुकान सज जाए और दिखावे के सौदागर समाज पर छा जाएं, तो सच की आवाज कौन उठाएगा? जवाब होना चाहिए: मीडिया। लेकिन अफसोस, कई बार मीडिया खुद इस तमाशे का हिस्सा बन जाता है। खबर कम, नौटंकी ज्यादा। सवाल कम, शोर ज्यादा। जनता कभी तालियां बजाती है, कभी माथा पीटती है और कभी रिमोट उठाकर चैनल बदल देती है।  

कभी मीडिया को लोकतंत्र का चौथा खंभा कहा जाता था। उसका काम था सत्ता से सवाल पूछना, जनता की आवाज उठाना और हुक्मरानों को आईना दिखाना। आज कई चैनलों को देखकर लगता है कि आईना तो मौजूद है, लेकिन उसमें सच्चाई दिखाने के बजाय सत्ता की आरती उतारी जा रही है।  

टीवी खोलकर देखिए। एंकर की आवाज आसमान छू रही है। स्टूडियो में बैठे प्रवक्ता एक-दूसरे पर ऐसे टूट पड़ते हैं मानो देश की सारी समस्याओं का हल विरोधी को चुप कराने में छिपा हो। बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रदूषण जैसे मुद्दे कोने में खड़े अपनी बारी का इंतजार करते रहते हैं। उनकी सुनता कौन है? राजनीतिक झगड़े में टीआरपी की मलाई जो मिलती है! जनता को चाहिए रोजगार, मगर टीवी पर मिलता है शोर।  

उदाहरण लें: जब दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण का स्तर खतरनाक स्तर पर पहुंच जाता है और अस्पतालों में सांस के मरीज बढ़ जाते हैं, तो कई चैनल घंटों राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और ‘कौन जिम्मेदार’ के शोर में उलझे रहते हैं। उसी समय कोई बाबा ‘वायु शुद्धि यज्ञ’ या ‘ग्रह दोष निवारण’ का कार्यक्रम चला रहा होता है तो कैमरे तुरंत वहां पहुंच जाते हैं। वैज्ञानिक उपायों और जमीनी रिपोर्टिंग की जगह सनसनी और चमत्कार को प्राथमिकता मिल जाती है।  

पत्रकारिता का मिशन पीछे छूट रहा है और कारोबार आगे निकल रहा है। सवाल पूछने वाले पत्रकार की जगह कई बार ऐसे चेहरे दिखाई देते हैं जो सत्ता के प्रवक्ता होने का भ्रम पैदा करते हैं। मीडिया की आजादी का मतलब केवल अखबार छापना या टीवी चैनल चलाना नहीं है। असली आजादी है बिना डर के सच सामने रखना। लेकिन जब मीडिया का मालिकाना हक कुछ बड़े कारोबारी समूहों तक सिमटने लगे, तब चिंता स्वाभाविक है। बड़े कारोबारियों के अपने हित होते हैं, सत्ता से रिश्ते होते हैं और सरकारी विज्ञापनों का महत्व होता है। ऐसे में संपादक के सामने धर्मसंकट खड़ा हो सकता है।  

इसी माहौल में ‘गोदी मीडिया’ जैसे शब्द लोकप्रिय हुए हैं। यह राजनीतिक कटाक्ष है, लेकिन इसके पीछे निष्पक्षता को लेकर जनता का अविश्वास भी दिखाई देता है। सरकार की तारीफ करना गलत नहीं, उसकी आलोचना करना भी अपने आप में कोई क्रांति नहीं। असली पत्रकारिता तथ्यों के आधार पर दोनों काम करती है। सरकार अच्छा करे तो तारीफ मिले, गलती करे तो सवाल उठें। पत्रकारिता का धर्म किसी की आरती उतारना नहीं, बल्कि जनता के सामने सच रखना है।  

जनसंचार के जानकार प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं, “आज खबर की अहमियत कई बार इस बात से तय होती है कि वह कितनी सनसनी पैदा कर सकती है। किसी अभिनेता का बयान, किसी नेता की तकरार या किसी बाबा का चमत्कार घंटों चल सकता है। लेकिन सरकारी अस्पताल में दवाइयां नहीं हैं, स्कूल में शिक्षक नहीं हैं या गांव में पीने का पानी नहीं है, तो खबर के लिए जगह कम पड़ जाती है।”  

समाज सेविका विद्या झा का कहना है, “बाबाओं, ज्योतिषियों और चमत्कार बेचने वालों के लिए कैमरे हमेशा तैयार रहते हैं। कोई भविष्य बताता है, कोई बीमारी दूर करने का दावा करता है और कोई भक्तों को स्वर्ग का टिकट बेचने का भरोसा देता है। मीडिया का काम इन दावों की जांच करना है, न कि बिना सवाल पूछे उनका प्रचार करना।”  

एक और उदाहरण: कुछ वर्ष पहले एक स्वयंभू बाबा ने दावा किया था कि वह कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों को ‘दिव्य शक्ति’ से ठीक कर सकते हैं। कई चैनलों ने बिना किसी वैज्ञानिक जांच के उनके कार्यक्रमों को घंटों प्रसारित किया। बाद में जब मरीजों की शिकायतें सामने आईं और अदालती प्रक्रिया शुरू हुई, तब मीडिया का रुख बदल गया। लेकिन तब तक हजारों लोग भ्रमित हो चुके थे। चमत्कार का तमाशा बिकता है, इसलिए कैमरा वहीं टिक जाता है। वैज्ञानिक सोच की बात करने वाले पीछे रह जाते हैं।  

डिजिटल दौर में झूठ को सजाकर सच के रूप में बेचना आसान हो गया है। कभी पुराना वीडियो नई घटना बताकर दिखाया जाता है, कभी किसी तस्वीर के साथ मनगढ़ंत कहानी जोड़ दी जाती है। सोशल मीडिया की अफवाह जांच-पड़ताल के बिना ब्रेकिंग न्यूज बन जाती है। फैक्ट-चेक मंचों की जरूरत इसी कारण बढ़ी है। लेकिन जिम्मेदारी केवल दूसरों की खबरों की जांच करना नहीं है। हर मीडिया संस्थान को अपनी खबरों की सच्चाई भी सुनिश्चित करनी चाहिए।  

पैसे लेकर खबर दिखाने या छापने का कारोबार भी कम खतरनाक नहीं है। जब विज्ञापन और खबर के बीच का फर्क मिटने लगे, तो पाठक कैसे पहचाने कि वह पत्रकारिता पढ़ रहा है या किसी का प्रचार? कार्यकर्ता सच्चेंद्र सिंह कहते हैं, “जनता को जानने का पूरा हक है कि उसके सामने रखी सामग्री खबर है या विज्ञापन। पत्रकारिता कोई किराना दुकान नहीं, जहां पैसे देकर मनचाहा सच तौल लिया जाए।”  

पत्रकारों पर मुकदमे, छापे और पूछताछ की खबरें भी बढ़ रही हैं। हर जांच को पत्रकारिता पर हमला कहना उचित नहीं। कानून सबके लिए बराबर होना चाहिए। लेकिन यदि कानून का इस्तेमाल आलोचनात्मक आवाजों को दबाने के लिए होने लगे, तो लोकतंत्र की सेहत बिगड़ती है।  

मीडिया में सामाजिक प्रतिनिधित्व का सवाल भी महत्वपूर्ण है। गांवों में पानी की किल्लत, किसानों की मुश्किलें, मजदूरों का पलायन और अस्पतालों की बदहाली भी बड़ी खबरें हैं। लेकिन इन मुद्दों पर रिपोर्टिंग करने में मेहनत लगती है। गांव जाना पड़ता है, लोगों से मिलना पड़ता है और आंकड़ों की जांच करनी पड़ती है। जबकि स्टूडियो में बैठकर किसी को देशद्रोही या राष्ट्रवादी घोषित करना बेहद आसान है।  

नदियां प्रदूषित हों, शहरों में पानी का संकट बढ़े या जलवायु परिवर्तन से खेती प्रभावित हो, तो इन विषयों पर लगातार रिपोर्टिंग होनी चाहिए। मगर कई बार किसी गंभीर मुद्दे की उम्र अगले राजनीतिक विवाद तक ही रहती है। बंगलौर की युवा पत्रकार मुक्त गुप्ता बताती हैं कि मीडिया की दुनिया में कुछ स्वयंभू बुद्धिजीवी भी खूब चमक रहे हैं। "हर विषय पर ज्ञान बांटने को तैयार। तथ्य हों या न हों, आत्मविश्वास में कोई कमी नहीं।  नारीवाद के नाम पर भी कभी-कभी दिखावे की दुकान सज जाती है। महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई को केवल प्रचार और सोशल मीडिया की लोकप्रियता तक सीमित करना आंदोलन के साथ नाइंसाफी है। "

जनता का भरोसा मीडिया की सबसे बड़ी पूंजी है। आज भी कई पत्रकार जोखिम उठाकर सच सामने लाते हैं। छोटे डिजिटल मंच और स्वतंत्र प्रकाशन भी ऐसे मुद्दों को उठाते हैं जिन्हें बड़े संस्थान नजरअंदाज कर देते हैं। यह उम्मीद की किरण है। लेकिन कुछ ईमानदार पत्रकारों के भरोसे पूरे मीडिया की साख नहीं बच सकती। इसके लिए मालिकाना हक में पारदर्शिता, विज्ञापन और खबर के बीच साफ अंतर, गलतियों का सार्वजनिक सुधार और संपादकीय स्वतंत्रता जरूरी है।  

सनसनी की जगह तथ्य-जांच को महत्व देना होगा। सामाजिक विविधता बढ़ानी होगी। जनहित की खबरों को प्राथमिकता देनी होगी। मीडिया को समझना होगा कि जनता केवल मनोरंजन नहीं चाहती। उसे जानना है कि महंगाई क्यों बढ़ रही है, रोजगार कहां हैं, सरकारी योजनाओं का पैसा कहां खर्च हो रहा है और उसके बच्चों का भविष्य कितना सुरक्षित है।  

इन सवालों से मुंह मोड़कर कोई भी संस्थान लंबे समय तक जनता का भरोसा नहीं जीत सकता। मीडिया सत्ता का दरबारी है या जनता का पहरेदार? यही असली सवाल है। लोकतंत्र में पत्रकार का काम किसी सरकार को गिराना या किसी पार्टी को जिताना नहीं है। उसका धर्म सच तलाशना, सवाल पूछना और जनता तक सही जानकारी पहुंचाना है। सरकार किसी भी दल की हो, पत्रकारिता की कसौटी एक ही रहनी चाहिए।  

और कॉकरोचों से भरे कमरे में केवल झाड़ू दिखाने से काम नहीं चलेगा। गंदगी साफ करनी होगी और रोशनी भी लानी होगी। याद रखिए, लोकतंत्र को खतरा केवल झूठ बोलने वालों से नहीं होता। खतरा उन लोगों से भी होता है जो सच जानते हैं, लेकिन खामोश रहते हैं। क्योंकि जब मीडिया सवाल पूछना छोड़ देता है, तो सत्ता जवाब देना भी जरूरी नहीं समझती। और जब जनता की आवाज दब जाती है, तब लोकतंत्र का चौथा खंभा खड़ा तो रहता है, मगर उसकी आत्मा दम तोड़ने लगती है।

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