Sunday, October 25, 2026

 आगरा को चाहिए यमुना रिवरफ्रंट, बैराज और पानी की भरपूर धार!

साबरमती से लेकर टेम्स और सीन तक, दुनिया ने नदियों को संवारा। आगरा कब जागेगा?

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बृज खंडेलवाल द्वारा

27 अक्टूबर 2026

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यमुना के किनारे बसा आगरा दुनिया के मशहूर शहरों में गिना जाता है। लेकिन विडंबना देखिए, जिस नदी के किनारे ताजमहल खड़ा है, वही यमुना आज बदहाली की मिसाल बन गई है। कहीं गंदगी, कहीं गाद, कहीं सूखी तलहटी और कहीं नालों का गंदा पानी! आखिर कब तक हम इस अनमोल नदी को यूँ ही मरने के लिए छोड़ते रहेंगे?

यमुना को सँवारने का वक्त आ गया है। आगरा को एक शानदार रिवरफ्रंट, मजबूत बैराज, नदी की सफाई और ऊपर से पर्याप्त पानी छोड़ने की ठोस व्यवस्था चाहिए। यह केवल पर्यटन का मामला नहीं है। इसका ताल्लुक शहर की खूबसूरती, पर्यावरण, रोजगार और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से भी है।

दस महीने सूखी नदी, आखिर कब तक?

दिल्ली और हरियाणा की ओर से आने वाले गंदे पानी और ऊपर बने बैराजों से होने वाले जल-विभाजन ने यमुना की हालत बिगाड़ दी है। राजस्थान और हरियाणा की नहरों के लिए पानी की निकासी तथा दूसरे जल-प्रबंधन फैसलों का असर नदी के बहाव पर भी पड़ता है।

नतीजा यह है कि आगरा में साल के बड़े हिस्से में यमुना का बहाव बेहद कम हो जाता है। कई जगह नदी सूखी या किसी पतली धारा जैसी नजर आती है। कभी जो नदी बरसात में उफनती थी, आज उसी की तलहटी पानी के लिए तरसती है।

यह हालात एक बड़ी चुनौती जरूर हैं, लेकिन इनमें सुधार की गुंजाइश भी है। कम बहाव का मतलब यह नहीं कि नदी को उसके हाल पर छोड़ दिया जाए। जरूरत है सही योजना, वैज्ञानिक अध्ययन और पक्के इरादे की।

आगरा को ऐसा रिवरफ्रंट चाहिए, जो नदी को सजाने के साथ उसे जीवित भी करे।

साबरमती ने दिखाई राह, आगरा क्यों पीछे रहे?

अहमदाबाद की साबरमती नदी के किनारे बने रिवरफ्रंट ने शहर को नई पहचान दी है। नदी के किनारे सैरगाह, पार्क, पैदल चलने के रास्ते और सार्वजनिक मनोरंजन के स्थान विकसित किए गए। इससे शहरवासियों को खुली जगह मिली और पर्यटन को भी नया आकर्षण मिला।

आगरा भी ऐसा कर सकता है। लेकिन साबरमती की नकल करना ही मकसद नहीं होना चाहिए। हमें उसकी उपलब्धियों से सीखना होगा और उसकी पर्यावरण संबंधी कमियों से भी सबक लेना होगा।

यमुना के किनारे व्यवस्थित सैरगाह, हरित क्षेत्र, साइकिल ट्रैक, बैठने की जगहें और सांस्कृतिक गतिविधियों के केंद्र बनाए जा सकते हैं। नदी में पर्याप्त गहराई और सुरक्षित जलस्तर होने पर नौका विहार तथा छोटी पर्यटक नौकाओं की संभावनाएँ भी तलाशी जा सकती हैं।

कल्पना कीजिए, शाम ढल रही हो, ताजमहल की संगमरमरी दीवारों पर सुनहरी रोशनी बिखर रही हो और यमुना की लहरों से उसका अक्स झिलमिला रहा हो। पर्यटक नाव से ताज का दीदार करें और स्थानीय लोगों को रोजगार के नए अवसर मिलें।

क्या यह नजारा आगरा की पहचान को नई ऊँचाई नहीं दे सकता?

यूरोप की नदियों से मिला बड़ा सबक

हाल ही में यूरोप की यात्रा के दौरान मुझे कई नदियों को करीब से देखने और उनका अध्ययन करने का अवसर मिला। लंदन की टेम्स और पेरिस की सीन से लेकर वेनिस की जलधाराओं और दूसरे यूरोपीय शहरों की नदियों तक, एक बात साफ नजर आई।

नदियों को शहरों से काटकर नहीं, शहरों की जिंदगी से जोड़कर रखा गया है।

टेम्स नदी के किनारे लंदन आई और सांस्कृतिक गतिविधियों से भरा साउथ बैंक क्षेत्र पर्यटकों को आकर्षित करता है। सीन नदी के किनारे बने रास्ते, कैफे, ऐतिहासिक पुल और खुले सार्वजनिक स्थान पेरिस की खूबसूरती में चार चाँद लगाते हैं।

इन शहरों ने नदियों के किनारों को केवल कंक्रीट की दीवारों और पत्थरों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने जल-प्रबंधन, सुरक्षा, सार्वजनिक सुविधाओं, पर्यटन और नदी की सफाई को साथ लेकर चलने की कोशिश की है।

यूरोप में भी समस्याएँ हैं। बाढ़ का खतरा, प्रदूषण और नदी के प्राकृतिक स्वरूप को लेकर बहस वहाँ भी होती है। लेकिन इन शहरों ने यह समझ लिया है कि नदी केवल पानी की धारा नहीं, बल्कि शहर की सांस्कृतिक और आर्थिक धड़कन भी है।

आगरा के पास तो ताजमहल जैसा विश्वविख्यात आकर्षण है। अगर यमुना को साफ-सुथरा और जीवंत बनाया जाए, तो नदी और ताज का रिश्ता पर्यटन की नई कहानी लिख सकता है।

आगरा को चाहिए बैराज और पर्याप्त पानी

रिवरफ्रंट का सपना तभी पूरा होगा, जब यमुना में पानी भी होगा। केवल किनारों पर पत्थर बिछाने, दीवारें खड़ी करने और रोशनी लगाने से नदी जीवित नहीं हो जाती।

आगरा में प्रस्तावित बैराज की जरूरत पर गंभीरता से आगे बढ़ना चाहिए। इसके लिए तकनीकी, पर्यावरणीय और आर्थिक पहलुओं का अध्ययन करके समयबद्ध कार्ययोजना बनाई जाए। बैराज का उद्देश्य नदी में उपयुक्त जलस्तर बनाए रखने, पानी के बेहतर प्रबंधन और शहर की जरूरतों को ध्यान में रखकर तय किया जाना चाहिए।

साथ ही, ऊपरी बैराजों से यमुना में पर्याप्त पानी छोड़े जाने की व्यवस्था होनी चाहिए। इसके लिए संबंधित राज्यों और जल-प्रबंधन एजेंसियों के बीच तालमेल जरूरी है। पानी का बँटवारा करते समय नदी के पर्यावरणीय प्रवाह को भी उसका जायज हिस्सा मिलना चाहिए।

यह माँग किसी एक शहर की जिद नहीं है। नदी का बहाव बनाए रखना पूरे यमुना तंत्र की सेहत के लिए जरूरी है।

यमुना की बदहाली दूर करने के लिए गाद निकालने और तल की सफाई की जरूरत का वैज्ञानिक आकलन होना चाहिए। जहाँ जरूरी हो, वहाँ ड्रेजिंग और डिसिल्टिंग कराई जाए।  नदी की प्राकृतिक बनावट, भूजल रिचार्ज और जलीय जीवन पर पड़ने वाले असर को ध्यान में रखना जरूरी है।

सबसे अहम सवाल गंदे पानी का है। जब तक नालों का सीवेज नदी में गिरता रहेगा, तब तक कोई भी रिवरफ्रंट स्थायी कामयाबी हासिल नहीं कर सकता। सीवेज को रोकने, उसका शोधन करने और गंदे पानी की निगरानी की पुख्ता व्यवस्था बनानी होगी।

नदी के किनारे हरियाली और ऐसे खुले क्षेत्र भी विकसित किए जाएँ, जहाँ जमीन की पानी सोखने की क्षमता बनी रहे। विकास का मतलब नदी को पूरी तरह कंक्रीट के शिकंजे में जकड़ना नहीं होना चाहिए।

आगरा को अब घोषणाओं से आगे बढ़ना होगा। राज्य सरकार, स्थानीय प्रशासन और संबंधित केंद्रीय एजेंसियों को मिलकर स्पष्ट समयसीमा तय करनी चाहिए।

रिवरफ्रंट की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार हो। बैराज और पर्याप्त जल-प्रवाह पर ठोस निर्णय लिया जाए। गाद की सफाई, सीवेज नियंत्रण और नदी के किनारे सार्वजनिक सुविधाओं का काम चरणबद्ध ढंग से शुरू हो। परियोजना की निगरानी में स्थानीय नागरिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों को भी शामिल किया जाए।

आगरा की यमुना केवल एक नदी नहीं है। यह ब्रज की संस्कृति, शहर के इतिहास और ताजमहल की खूबसूरती से जुड़ी हुई है। इसे गंदे नाले की तरह छोड़ देना हमारी सामूहिक लापरवाही होगी।

सवाल सीधा है: जब साबरमती, टेम्स और सीन के किनारे शहर अपनी नई पहचान बना सकते हैं, तो ताजमहल की यमुना क्यों नहीं?

आगरा को रिवरफ्रंट चाहिए, बैराज चाहिए, ऊपर से पर्याप्त पानी चाहिए और यमुना को प्रदूषण से मुक्ति चाहिए। अब वक्त आ गया है कि सरकार कागजी योजनाओं से बाहर निकले और नदी को उसका हक दिलाने के लिए काम शुरू करे।


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