ट्रैफिक प्रबंधन कोई रॉकेट साइंस नहीं है!
आगरा की सड़कें जाम, दिमाग भी जाम!
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गड्ढे, अतिक्रमण, बेतरतीब पार्किंग और बदहाल ट्रैफिक व्यवस्था ने सफर को बना दिया है सजा। मगर बीमारी सिर्फ सड़कों में नहीं, हमारी सोच में भी है!
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बृज खंडेलवाल द्वारा
2 नवंबर 2026
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आगरा चल रहा है या रेंग रहा है? यह सवाल उस हर आदमी से पूछिए, जो यमुना किनारा रोड, एमजी रोड, भगवान टॉकीज या फतेहाबाद रोड पर जाम में फंसा है। दस मिनट का सफर एक घंटे में पूरा होता है। हॉर्न चीखते हैं, लोग झल्लाते हैं और गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच जाता है। फिर सारा इल्जाम ट्रैफिक पुलिस के सिर!
लेकिन क्या हर जाम के लिए पुलिस ही जिम्मेदार है? क्या बीमारी सिर्फ सड़कों में है? या हमारी सोच भी इसकी बड़ी वजह है? सच यह है कि आगरा का ट्रैफिक संकट सिर्फ खराब सड़कों और बढ़ती गाड़ियों का नतीजा नहीं है। यह हमारी बिगड़ती नागरिक समझ और बेतहाशा जल्दबाजी का आईना भी है।
सड़क पर जाम है, मगर असली जाम तो दिमाग में है भाई जान! यमुना आरती स्थल के पास, दो रोज पहले, पीछे रोंग साइड पर दनदनाते मोबाइक वाले ने मुझे गिरा दिया। विरोध करने पर बोला, रोड पर क्यों चलते हैं बुड्ढे लोग, घर बैठो! यानी चोरी और सीना जोरी, यही है जंगल का कानून!
आगरा की सड़कों पर निकलते ही अनुशासन की पोल खुल जाती है। किसी को रुकना मंजूर नहीं। कोई किसी को रास्ता नहीं देना चाहता। हर आदमी सबसे आगे निकलने की फिराक में है। गलत दिशा में गाड़ी चलाना, मनमाने यू-टर्न लेना, लेन बदलकर आगे निकलना और लाल बत्ती तोड़ना आम बात है। जेब्रा क्रॉसिंग पर पैदल चलने वालों को रास्ता देना तो जैसे शान के खिलाफ है। साइकिल सवार और राहगीर भगवान भरोसे हैं।
हॉर्न बजाना राष्ट्रीय शौक बन गया है। आगे सड़क बंद है, फिर भी हॉर्न बजता रहेगा। मानो आवाज से गाड़ियां अपने आप उड़ने लगेंगी!
मूल मंत्र बन गया है, पहले मैं निकलूं, बाकी दुनिया भाड़ में जाए!
माता-पिता भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। बच्चे बिना हेलमेट गाड़ी चलाएं, गलत दिशा में दौड़ाएं या सिग्नल तोड़ें, तो कई घरों में इसे शरारत समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। गाड़ियों की हालत भी देखिए। खराब ब्रेक, बंद लाइटें और बिना रखरखाव के वाहन सड़कों पर दौड़ते हैं। फिर हादसे होते हैं और हम किस्मत को कोसते हैं।
आगरा की ट्रैफिक समस्या के कई चेहरे हैं।
पहला गुनहगार है अवैध पार्किंग और अतिक्रमण। भगवान टॉकीज, रामबाग, बिजलीघर, सिकंदरा, शाहगंज, लोहामंडी और आईएसबीटी जैसे इलाकों में सड़कें पार्किंग स्थल बन चुकी हैं। दुकानदार, रेहड़ी वाले, ऑटो और ई-रिक्शा सड़क घेर लेते हैं। राह चलने वालों के लिए जगह बचती ही नहीं।
दूसरा संकट है मेट्रो और दूसरी निर्माण परियोजनाएं। एमजी रोड सहित कई प्रमुख रास्तों पर बैरिकेडिंग और खुदाई ने सड़कें सिकोड़ दी हैं। स्मार्ट सिटी, पाइपलाइन और मरम्मत के काम भी यातायात को प्रभावित करते हैं।
तीसरी वजह है पर्यटन का दबाव। ताजमहल, आगरा किला और दूसरे स्मारकों पर आने वाली पर्यटक बसें, टैक्सियां और निजी गाड़ियां सड़कों पर भीड़ बढ़ाती हैं। अंतरराष्ट्रीय पर्यटन नगरी में यातायात प्रबंधन का हाल देखकर शर्म आती है।
चौथी समस्या है कमजोर सार्वजनिक परिवहन। अच्छी बस सेवा नहीं होगी, तो हर परिवार अपनी गाड़ी निकालेगा। नतीजा, सड़क पर वाहनों की भीड़ बढ़ती जाएगी।
पांचवीं वजह हैं गड्ढे और बार-बार खुदाई। सड़क कभी पानी की पाइपलाइन के लिए खोदी जाती है, कभी मरम्मत के नाम पर। आज सड़क बनी, कल फिर खुद गई। सरकारी विभागों में तालमेल का हाल भी किसी से छिपा नहीं है।
छठी मुसीबत है स्कूलों की छुट्टी। दोपहर दो से चार बजे के बीच स्कूल बसों और अभिभावकों की गाड़ियां सड़कों पर उतरती हैं। कई इलाकों में जाम लगना तय है।
सातवीं समस्या है बेतरतीब मिला-जुला यातायात। कार, बाइक, बस, ऑटो, ई-रिक्शा, साइकिल और पैदल यात्री एक ही सड़क पर अपनी-अपनी मर्जी चलाते हैं।
आठवीं वजह हैं बसों और ऑटो के मनमाने ठहराव। आईएसबीटी और ट्रांसपोर्ट नगर के आसपास सड़कें इनके लिए निजी अड्डे बन जाती हैं।
नौवीं समस्या है पुराने शहर की तंग सड़कें। कटरा नील, पुरानी मंडी और नई की मंडी जैसे इलाकों की सड़कें आज के वाहन दबाव के लिए बनी ही नहीं थीं।
दसवीं आफत है त्योहारों की खरीदारी। रक्षाबंधन, दिवाली और दूसरे पर्वों पर बाजारों में भीड़ बढ़ती है। पहले से बेहाल सड़कें पूरी तरह दम तोड़ देती हैं।
इन कारणों का मेल जाम को कई गुना बढ़ा देता है। निर्माण कार्य सड़कें संकरी करते हैं, अतिक्रमण बची जगह निगल जाता है और कमजोर निगरानी अवैध पार्किंग को बढ़ावा देती है।
चालान से नहीं बदलेगी तकदीर
सवाल है, प्रशासन आखिर कर क्या रहा है? समय-समय पर चालान अभियान चलते हैं। कुछ दिन लोग डरते हैं, फिर पुराना ढर्रा लौट आता है। यह इलाज नहीं, महज दिखावा है।
आगरा को एक ठोस और दूरगामी ट्रैफिक योजना चाहिए। जहां जरूरी हो, एकतरफा यातायात लागू किया जाए। भीड़भाड़ वाले बाजारों में पीक आवर के दौरान निजी वाहनों का प्रवेश सीमित हो। पार्किंग के लिए अलग जगह बने। अवैध कब्जों पर बिना भेदभाव कार्रवाई हो।
स्कूलों की छुट्टी का समय अलग-अलग किया जा सकता है। पर्यटक बसों के लिए तय पार्किंग और शटल सेवा हो। ई-रिक्शा के लिए निर्धारित मार्ग और ठहराव तय हों।
ट्रैफिक सिग्नल दुरुस्त हों। जेब्रा क्रॉसिंग पर पैदल यात्रियों को प्राथमिकता मिले। साइकिल सवारों के लिए सुरक्षित जगह बने। गलत दिशा में वाहन चलाने और खतरनाक यू-टर्न लेने वालों पर सख्ती हो।
सड़क खोदने वाले विभागों में तालमेल जरूरी है। एक विभाग सड़क बनाए और दूसरा अगले दिन खोद दे, यह कैसी व्यवस्था है? निर्माण एजेंसियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
असली सुधार घर से शुरू होगा
लेकिन एक बात साफ है। चौड़ी सड़कें बना देने से समस्या खत्म नहीं होगी। अगर नागरिकों का रवैया नहीं बदला, तो नई सड़क भी जल्द पार्किंग स्थल बन जाएगी।
नागरिक अनुशासन पुलिस के डंडे से पैदा नहीं होता। इसकी शुरुआत घर और स्कूल से होती है। माता-पिता बच्चों को नियम सिखाएं। दुकानदार सड़क को अपनी जागीर न समझें। वाहन चालक पैदल यात्रियों का सम्मान करें।
आगरा कोई मामूली शहर नहीं है। यह इतिहास, संस्कृति और दुनिया के सात अजूबों में शामिल ताजमहल की पहचान वाला शहर है। यहां आने वाले पर्यटक शहर की खूबसूरती याद रखें, ट्रैफिक की बदहाली नहीं।
आखिर ट्रैफिक सुधार के लिए हर बार फ्लाईओवर, बुलडोजर और करोड़ों रुपये की जरूरत नहीं होती। कभी-कभी जरूरत सिर्फ समझदारी, सब्र और दूसरों के अधिकारों का सम्मान करने की होती है।
सड़क सबकी है, तो उस पर चलने का सलीका भी सबको सीखना होगा।
वरना आगरा की सड़कें यूं ही जाम रहेंगी। गाड़ियां आगे निकलने के लिए लड़ती रहेंगी और शहर अपनी ही बदइंतजामी में फंसा रहेगा।
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