Thursday, September 3, 2026

 श्रीकृष्ण: प्रकृति के रक्षक और यमुना के प्रियतम

क्या इस जन्माष्टमी हम कृष्ण को केवल याद ही नहीं, बल्कि उनकी प्रिय यमुना को बचाने का संकल्प भी ले सकते हैं?

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

4 सितंबर 2026

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देशभर में आज जन्माष्टमी की धूम है। मंदिर रोशनी से जगमगा रहे हैं। गलियां सज रही हैं। घंटियां बज रही हैं और भक्त आधी रात को भगवान कृष्ण के जन्म का इंतजार कर रहे हैं।

मथुरा और वृंदावन से लेकर द्वारका, मुंबई, दिल्ली, अहमदाबाद और देश के छोटे-बड़े शहरों तक जन्माष्टमी आस्था का सबसे बड़ा उत्सव बन चुकी है। कहीं रासलीला हो रही है, कहीं झांकियां सज रही हैं और कहीं दही-हांडी के लिए मानव पिरामिड बनाए जा रहे हैं।

लेकिन इस उत्सव के बीच एक सवाल हमें जरूर पूछना चाहिए।

अगर कृष्ण आज हमारे बीच होते, तो नदियों, जंगलों, पहाड़ों और पशुओं की हालत देखकर क्या सोचते?

कृष्ण केवल मंदिरों में विराजमान देवता नहीं थे। उनका बचपन जंगलों, गायों, बछड़ों, पक्षियों, पेड़ों, पहाड़ों और नदियों के बीच बीता। उनका जीवन हमें बताता है कि प्रकृति कोई सामान नहीं है, जिसे मनुष्य अपनी सुविधा के लिए इस्तेमाल करे। प्रकृति हमारे जीवन और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है।

कृष्ण और ब्रज की जीवंत प्रकृति

“वृंदावन कृष्ण की बाल लीलाओं की केवल पृष्ठभूमि नहीं था। वहां पेड़, पक्षी, गाय, नदी और मनुष्य एक ही परिवार का हिस्सा थे।”

यह कहना है आगरा के श्री मथुराधीश मंदिर के गोस्वामी नंदन श्रोत्रिय का।

कृष्ण और कदंब का रिश्ता आज भी ब्रज की कल्पना का हिस्सा है। कहा जाता है कि कदंब के पेड़ की छांव में कृष्ण की बांसुरी गूंजती थी। उनके साथ केवल ग्वाल-बाल और गोपियां ही नहीं थीं। गाय, बछड़े, पक्षी और पूरा प्राकृतिक संसार उनकी दुनिया का हिस्सा थे।

फिर आता है गोवर्धन पर्वत का प्रसंग।

जब ब्रज पर मूसलाधार बारिश का संकट आया, तो कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाकर लोगों और पशुओं को आश्रय दिया। इस कथा को हम धार्मिक दृष्टि से देखें या प्रतीक के रूप में, इसका पर्यावरणीय संदेश बहुत स्पष्ट है।

पर्यावरणविद् डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य के अनुसार, गोवर्धन केवल एक पहाड़ नहीं था। वह जंगल, जल, चारा, भोजन और पूरे समुदाय की सुरक्षा का प्रतीक था।

कृष्ण का संदेश आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है, मनुष्य का जीवन प्रकृति की सुरक्षा पर निर्भर है।

कृष्ण और यमुना का रिश्ता

कृष्ण की कहानी में यमुना का स्थान सबसे खास है।

रिवर कनेक्ट अभियान से जुड़ी पद्मिनी अय्यर कहती हैं, “कृष्ण का यमुना से रिश्ता बहुत गहरा था। वसुदेव उन्हें शिशु अवस्था में यमुना पार कराकर गोकुल ले गए। कृष्ण ने यमुना के किनारे खेला और कालिया नाग का सामना भी यमुना में ही किया।”

कृष्ण की कथा में यमुना केवल पानी की धारा नहीं है। वह एक जीवंत पात्र है।

लेकिन आज यही यमुना मथुरा, वृंदावन और आगरा से गुजरते हुए गंदे नालों, सीवर और प्रदूषण का बोझ ढो रही है। करोड़ों लोग कृष्ण का नाम लेते हैं, लेकिन उनकी प्रिय नदी लगातार मर रही है।

आगरा में यह विडंबना और भी बड़ी है। यमुना विश्व प्रसिद्ध ताजमहल के सामने से गुजरती है। एक ओर दुनिया का सबसे सुंदर स्मारक है और दूसरी ओर उसकी जीवनरेखा प्रदूषण से जूझ रही है।

यमुना भक्त चतुर्भुज तिवारी कहते हैं कि नदी को वह सम्मान नहीं मिल रहा, जिसकी वह हकदार है।

आईएमए अध्यक्ष डॉ. हरेंद्र गुप्ता सवाल करते हैं, “क्या हम कृष्ण के भक्त कहलाकर उनकी प्रिय यमुना को नाले में बदल सकते हैं?”

मथुरा में भव्य जन्माष्टमी

4 सितंबर को जन्माष्टमी मनाई जा रही है और आधी रात के बाद तक कृष्ण जन्मोत्सव चलेगा।

मथुरा में इस बार विशेष उत्साह है। हजारों श्रद्धालु मथुरा-वृंदावन पहुंच रहे हैं। कृष्ण जन्मभूमि पर आधी रात को विशेष पूजा होगी। ब्रज तीर्थ विकास परिषद ने कृष्ण के जीवन और जन्म को दर्शाने वाले 500 ड्रोन का विशेष कार्यक्रम भी तैयार किया है।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 3 सितंबर को मथुरा का दौरा किया। उन्होंने स्वामी हरिदास सभागार और कई विकास परियोजनाओं का उद्घाटन किया। उन्होंने यह भी कहा कि विकास के साथ सांस्कृतिक विरासत की रक्षा जरूरी है।

यह बात ब्रज के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

ब्रज का विकास केवल चौड़ी सड़कों और ज्यादा पर्यटकों से नहीं हो सकता। अगर मथुरा की पहचान कृष्ण हैं, तो उसकी यमुना, कुंड, गोवर्धन, वन, गाय और पुराने घाट भी उसी विरासत का हिस्सा हैं।

कृष्ण के पोस्टरों से सजा कंक्रीट का जंगल ब्रज नहीं हो सकता। ब्रज इतना सुंदर रहना चाहिए कि कृष्ण खुद उसे पहचान सकें।

द्वारका से पूरे भारत तक

दूर गुजरात में द्वारका भी जन्माष्टमी के लिए तैयार है। इस वर्ष पांच दिन के उत्सव में लगभग सात लाख श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है। द्वारकाधीश मंदिर में आधी रात की पूजा के लिए बड़ी संख्या में भक्त जुटेंगे।

मथुरा और द्वारका कृष्ण के जीवन के दो अलग-अलग पड़ाव हैं। एक ओर ब्रज की नदी, जंगल और गांव हैं। दूसरी ओर समुद्र के किनारे बसी द्वारका है।

कृष्ण हमें नदी से लेकर समुद्र तक और गांव से लेकर शहर तक जोड़ते हैं।

महाराष्ट्र में दही-हांडी उत्सव सड़कों को उत्सव के मैदान में बदल देता है। मुंबई के गोविंदा दल मानव पिरामिड बनाकर कृष्ण की माखन चोरी की लीला को रोमांचक रूप देते हैं।

दिल्ली, लखनऊ, बंगाल, गुजरात और देश के अनेक हिस्सों में मंदिरों और सार्वजनिक स्थानों पर विशेष कार्यक्रम हो रहे हैं। कहीं कृष्ण लीला है, कहीं रासलीला और कहीं शास्त्रीय नृत्य।

लेकिन कृष्ण की प्रकृति से जुड़ी विरासत ब्रज में सबसे ज्यादा महसूस होती है।

गायों से कृष्ण का रिश्ता

कृष्ण को गोपाल और गोविंद कहा गया। गाय उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा थीं।

वृंदावन टुडे के मुख्य संपादक और फ्रेंड्स ऑफ वृंदावन के संयोजक जगन्नाथ पोद्दार कहते हैं कि ब्रज में गाय केवल आर्थिक संपत्ति नहीं थी। वह परिवार और धार्मिक जीवन का हिस्सा थी।

आज स्थिति बदल गई है।

हम गाय की पूजा तो करते हैं, लेकिन उसके भोजन और स्वास्थ्य की चिंता कम करते हैं। प्लास्टिक, कचरा और गंदा पानी पशुओं के जीवन को नुकसान पहुंचा रहे हैं।

यह कैसी भक्ति है, जिसमें भगवान का नाम तो है, लेकिन उनकी प्रिय गायों की चिंता नहीं?

गीता का संदेश और आज की दुनिया

भगवद्गीता में जलवायु परिवर्तन या जैव विविधता जैसे आधुनिक शब्द नहीं मिलते। फिर भी कृष्ण का दर्शन मनुष्य और प्रकृति के गहरे संबंध की बात करता है।

गीता में कृष्ण पृथ्वी की सुगंध और सभी जीवों में जीवन को अपनी ही अभिव्यक्ति बताते हैं। एक पत्ता, फूल, फल या जल भी सच्ची श्रद्धा से अर्पित किया जाए तो उसका महत्व है।

गीता का संदेश आज भी साफ है,

प्रकृति को नष्ट करके मनुष्य सुखी नहीं रह सकता।

इस जन्माष्टमी कुछ बदलें

हम हजारों दीप जला सकते हैं। विशाल झांकियां निकाल सकते हैं। भव्य जुलूस कर सकते हैं। पूरी रात “राधे-राधे” और “जय श्रीकृष्ण” का जयघोष कर सकते हैं।

लेकिन अगर यमुना मरती रही, तो हमारी भक्ति अधूरी रहेगी।

ब्रज में कृष्ण की विरासत बचाने का अर्थ है, यमुना को साफ करना, गोवर्धन की प्रकृति बचाना, पुराने कुंडों को पुनर्जीवित करना, पवित्र उपवनों की रक्षा करना और गायों की बेहतर देखभाल करना।

आगरा में इसका अर्थ है ताजमहल के सामने बहती यमुना को फिर जीवित नदी बनाना।

मथुरा और वृंदावन में तीर्थयात्रा के साथ पर्यावरण की जिम्मेदारी जोड़नी होगी।

देशभर के मंदिर भी पहल कर सकते हैं। हर जन्माष्टमी पर एक पेड़ लगाया जा सकता है। कोई तालाब साफ किया जा सकता है। प्लास्टिक कम किया जा सकता है। पशु कल्याण के लिए सहयोग किया जा सकता है।

यही भक्ति को कर्म में बदलना होगा।

कृष्ण हमारे लिए राधा के प्रियतम हैं। वे यशोदा के नटखट कन्हैया हैं। वे गोपाल हैं, गोविंद हैं, कालिया के संहारक हैं और गोवर्धन उठाने वाले हैं। वे अर्जुन के सारथी और गीता के महान उपदेशक भी हैं।

लेकिन आज हमें एक और कृष्ण को याद करना चाहिए, 

पेड़ों के मित्र, गायों के रक्षक, गोवर्धन के संरक्षक और यमुना के प्रियतम कृष्ण।

जन्माष्टमी की भव्यता जरूरी है। यह हमारी संस्कृति और आस्था को जीवित रखती है। लेकिन असली जन्माष्टमी आधी रात के बाद शुरू होनी चाहिए।

अगली सुबह एक साफ नदी हो।

एक हरा-भरा उपवन हो।

एक स्वस्थ गाय हो।

एक सुरक्षित पहाड़ी हो।

और एक ऐसा मनुष्य हो, जो प्रकृति की जिम्मेदारी समझता हो।

अगर कृष्ण हर जीव में हैं, तो प्रकृति की रक्षा केवल पर्यावरण सेवा नहीं है।

वह भक्ति है।

इस जन्माष्टमी कृष्ण को यही सबसे सुंदर शुभकामना हो सकती है, 

जय श्रीकृष्ण!

और यमुना को जीने दो।



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