छोटी-सी गलती: "बस पांच मिनट और" ने फ्रांस को झकझोर दिया ; और भारत को सोचने पर मजबूर कर दिया
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पेरिस, बृज खंडेलवाल द्वारा
16 सितंबर 2026
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“बस पाँच मिनट और!” ये वही फेमस पाँच मिनट हैं जो घर के टाइमर नहीं मानते। पेरिस के एक घर में 14 साल का बेटा मोबाइल से चिपका बैठा है; माँ चिल्लाती है, “खाना ठंडा हो रहा है,” पिता आधे गुस्से में आधा विनती करते हैं, “मोबाइल नीचे कर दे।” बेटा पलटकर कहता है, “पापा, यह आखिरी वीडियो है।” वीडियो आखिरी नहीं होता। खुद-ब-खुद चलने वाले अगले-नेक्स्ट ने पाँच मिनट को पचास में बदल दिया , और खाना तो ठंडा ही हुआ।
यह सीन फ्रांस का है, पर एंडिंग इंडिया में भी वही दिखेगी। पेरिस में ये सवाल जोर पकड़ रहा है: बच्चों को डिजिटल दुनिया में कितनी आज़ादी दें? फ्रांस ने 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर एक सख्त रोक का कानून बनाया , जैसी नीयत सही थी, लेकिन अगस्त 2026 में फ्रांस की संवैधानिक परिषद ने कह दिया कि पूरी तरह का बंद करना अभिव्यक्ति और निजता पर ज़रूरत से ज़्यादा चोट है। यानी कहीं अभिव्यक्ति के नाम पर बच्चों को "डिजिटल परदर्शी" बना दिया जाए, तो भी समस्या है।
मैक्रॉन ने हार नहीं मानी: नया प्रस्ताव आया , 13-15 साल वालों के लिए माता-पिता की सहमति, रात में नोटिफिकेशन बंद, ऑटो-प्ले पर पाबंदी और अजनबियों से संपर्क पर रोक। सरल भाषा में: दरवाजा बंद नहीं करेंगे, पर खिड़कियों पर जाली लगा देंगे।
भारत को भी यह तमाशा दूर से नहीं दिखना चाहिए। हमारे एक अरब से अधिक इंटरनेट उपयोगकर्ताओं में इंस्टाग्राम और यूट्यूब किशोरों की रोज़मर्रा की दुनिया बन चुके हैं। यूट्यूब पढ़ाई का वरदान है; वही यूट्यूब कभी-कभी मिर्च-मसाले वाला जाल भी बन जाता है , एक क्लिक और आप "अनसक्योर एरिया" में। बच्चा फिर वही कहता है, “बस पाँच मिनट…” और पाँच मिनट पता ही नहीं चलता कब परीक्षा के पेपर जितने लंबा हो गया।
2023 का हमारा डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन कानून अच्छी कोशिश है: अभिभावकों की सत्यापन योग्य सहमति, बच्चों पर लक्षित विज्ञापन पर रोक , सही कदम हैं। पर असली परीक्षा मैदान पर है। बच्चे जन्मतिथि बदलकर दर्ज कर दें, और पूरा सिस्टम उसी पल का नो-शो कर देता है। ऑनलाइन उम्र छिपाना उतना आसान है जितना परीक्षा में पीछे की सीट से कॉपी देखना , और ज़्यादा स्मार्ट।
तो क्या सीधा बैन कर दें, जैसा फ्रांस ने सोचा? भारत और फ्रांस की दुनिया अलग है: ग्राम और शहर का डिजिटल गैप, माता-पिता की डिजिटल अनभिज्ञता, और वही इंटरनेट जो अवसर देता है, उसे काटना सही नहीं होगा। करोड़ों बच्चे ऑनलाइन पढ़ाई, कौशल और नौकरी की जानकारी पा रहे हैं , इन्हें बंद कर देना समस्या का इलाज नहीं, सर्जरी होगी जिसकी सुई गलत जगह लगेगी।
प्रस्तावित रास्ता: प्रतिबंध नहीं, पर ज़िम्मेदारी। मजबूत अभिभावक-सहमति, बेहतर उम्र-प्रमाणीकरण तकनीक, और स्कूलों में डिजिटल साक्षरता पर जोर। सोशल प्लेटफॉर्म्स को भी जवाबदेह बनाइए: ऑटो-प्ले, लगातार नोटिफिकेशन और नशे जैसा डिजाइन—इन फीचर्स पर कड़ाई। बच्चों के लिए "डिजिटल ब्रेक" मोड, रात में नोटिफिकेशन ब्लॉक और शिक्षकों-माता-पिता के लिए आसान टूल्स , छोटे-छोटे सुधार बड़ा फर्क डाल सकते हैं।
मोबाइल अब सिर्फ फोन नहीं रहा। वह जेब में रखा स्कूल भी है, खेल का मैदान भी और कभी-कभी मुसीबत का दरवाज़ा भी। डिजिटल जिन्न बोतल से बाहर आ चुका है; वापस बंद करना मुश्किल है, पर लगाम किसके हाथ में होगी , ये फैसला अभी हमारे हाथ में है। सुरक्षा ज़रूरी है, पर वह स्वतंत्रता और निजता की कीमत पर नहीं होनी चाहिए।
फ्रांस रास्ता तलाश रहा है; हम भी सीखें, पर काट-छाँट करने से पहले समझदारी से चुने। आपका बच्चा "बस पाँच मिनट" कहेगा , पर कौन तय करेगा कि पास पाँच मिनट हैं या गिरफ़्तार कर देने वाले पचास?
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