Wednesday, September 2, 2026

 यमुना रिवर कनेक्ट : एक नदी को संरक्षित रखने की जिद  

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बृज खंडेलवाल  द्वारा 

4 सितंबर 2026  

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ताजमहल आगरा की पहचान है, लेकिन यमुना उसकी आत्मा है। पिछले एक दशक से अधिक समय से रिवर कनेक्ट अभियान इसी भूली हुई नदी को शहर की चेतना में वापस लाने की कोशिश कर रहा है।  

2014-15 में शुरू हुई यह नागरिक मुहिम महज सफाई अभियान नहीं थी। इसका असली मकसद था लोगों को यमुना से फिर जोड़ना। इसके लिए आरती हुई, श्रमदान हुए, पदयात्राएं निकलीं, हवन हुए, हस्ताक्षर अभियान चले और कभी-कभी विरोध का तरीका इतना अनोखा रहा कि राष्ट्रीय मीडिया का भी ध्यान खींच गया।  

आरती से आंदोलन तक  

एत्माद-उद-दौला व्यू पॉइंट पर शुरू हुई दैनिक यमुना आरती इस अभियान की सबसे स्थायी पहचान बन गई। 2015 से हर शाम बड़ी संख्या में लोग आरती के लिए जुटने लगे। अभियान के सदस्य गोस्वामी नंदन श्रोत्रिय बताते हैं कि श्रद्धालुओं और कार्यकर्ताओं की संख्या लगातार बढ़ती गई।  

लेकिन यह आरती सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं थी। आरती के बाद यमुना की हालत, प्रदूषण, कचरा, पानी की कमी और सरकारी वादों पर चर्चा होती थी। एनडीटीवी स्वच्छ इंडिया ने भी अभियान की दैनिक आरती और रविवार के सफाई अभियानों को प्रमुखता दी। इन सफाई अभियानों में आमतौर पर 30-40 स्वयंसेवक आते थे और कई बार संख्या सौ से ऊपर पहुंच जाती थी।  

रिवर कनेक्ट का दर्शन साफ था; पहले लोगों को नदी तक वापस लाओ, फिर नदी बचाने की लड़ाई को जन आंदोलन बनाओ।  

जब पानी नहीं था, हुआ रेत स्नान  

मई 2016 में अभियान ने ऐसा प्रदर्शन किया जिसे लंबे समय तक याद रखा गया। कार्यकर्ताओं ने यमुना किनारे रेत स्नान किया। पानी की जगह शरीर पर नदी की सूखी रेत मलकर उन्होंने एक असहज सवाल खड़ा किया: जब नदी में पानी ही नहीं है, तो स्नान कैसे होगा? उन्होंने याद दिलाया कि यमुना का जल संकट हर चुनाव में मुद्दा बनता है, लेकिन चुनाव खत्म होते ही मुद्दा भी गायब हो जाता है।  

गंगा दशहरा पर भी इसी तरह का प्रदर्शन हुआ। आईएएनएस ने इसे “रॉयल सैंड बाथ” के रूप में रिपोर्ट किया। संदेश सीधा था: यमुना को सिर्फ भाषण नहीं, पानी चाहिए।  

कागज की नावों में डूबे सरकारी वादे  

सरकारी वादों पर व्यंग्य करना भी अभियान की खास शैली रही। दिल्ली-आगरा जल परिवहन के वादे की याद दिलाने के लिए कार्यकर्ताओं ने यमुना में कागज और थर्मोकोल की नावें उतारीं।  

द इंडियन एक्सप्रेस ने 2017 में रिपोर्ट किया कि ये नावें ताजमहल की ओर कुछ दूर जाकर डूब गईं। दृश्य अपने आप में पूरा व्यंग्य था: नावें चलाने की तैयारी थी, लेकिन नदी चलने लायक नहीं थी।  

इसी दौरान अभियान ने निर्बाध जलप्रवाह, नदी की सफाई, बाढ़ क्षेत्र की सुरक्षा, राष्ट्रीय नदी नीति और केंद्रीय नदी प्राधिकरण की मांग भी उठाई।  

सफाई से आगे की लड़ाई  

रविवार के सफाई अभियानों में स्वयंसेवकों ने प्लास्टिक, पॉलीथिन, मूर्तियां, कचरा और निर्माण मलबा हटाया। मगर रिवर कनेक्ट ने हमेशा कहा कि नदी किनारे झाड़ू लगाने भर से नदी जीवित नहीं होगी।  

अभियान की असली मांगें कहीं ज्यादा व्यापक हैं: नालों को टैप करना, सीवेज का उपचार, नदी तल की गाद निकालना, ड्रेजिंग, बाढ़ क्षेत्र से अतिक्रमण हटाना और पूरे साल न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह सुनिश्चित करना।  

2023 के विश्व जल दिवस पर सफाई और आरती के साथ इन मांगों को फिर उठाया गया। 2025 में नगर निगम के साथ संयुक्त सफाई अभियानों में स्कूली बच्चे, नागरिक और अधिकारी शामिल हुए। एक बड़े अभियान में करीब 25 ट्रैक्टर-ट्रॉलियां कचरे से भरी गईं।  

झुनझुना दिवस : जब आंदोलन ने व्यंग्य का सहारा लिया  

दिसंबर 2021 में रिवर कनेक्ट ने ‘झुनझुना दिवस’ मनाया। कार्यकर्ताओं ने पांच मिनट तक झुनझुने बजाकर जनप्रतिनिधियों की कथित निष्क्रियता के खिलाफ विरोध जताया।  

बृज खंडेलवाल ने जनप्रतिनिधियों पर यमुना के प्रति उदासीनता का आरोप लगाया। डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य ने व्यंग्य में कहा कि यमुना पहले भी गंदी थी, आज भी गंदी है और जनप्रतिनिधियों की कृपा रही तो आगे भी गंदी रहेगी।  

यह आंदोलन की शैली का नमूना था; जब ज्ञापन बेअसर हों, तो झुनझुना बजाकर सत्ता को जगाओ।  

यमुना केवल नदी नहीं, विरासत है  

रिवर कनेक्ट ने लगातार कहा है कि यमुना का सवाल सिर्फ पर्यावरण का सवाल नहीं है। यह आगरा की विरासत, पर्यटन और अर्थव्यवस्था का भी सवाल है।  

ताजमहल, आगरा किला और कई ऐतिहासिक स्मारक यमुना के किनारे खड़े हैं। द इंडियन एक्सप्रेस ने भी यमुना के प्रदूषण और ताजमहल की सुरक्षा के बीच संबंध को रेखांकित किया है।  

अभियान का सवाल सरल है; अगर ताजमहल के आसपास का संगमरमर बचाया जा सकता है, तो उसके पीछे की नदी क्यों नहीं?  

बारह साल बाद भी मांगें वही  

रिवर कनेक्ट की प्रमुख मांगों में ताजमहल के नीचे बैराज, सालभर न्यूनतम जलप्रवाह, ड्रेजिंग और डी-सिल्टिंग, नालों का टैपिंग, सीवेज ट्रीटमेंट, बाढ़ क्षेत्र से अतिक्रमण हटाना, घाटों का पुनरुद्धार और प्रदूषण फैलाने वालों पर कार्रवाई शामिल हैं।  

इसके साथ अभियान लंबे समय से राष्ट्रीय नदी नीति और केंद्रीय नदी प्राधिकरण की मांग करता रहा है। तर्क है कि नदी प्रशासनिक सीमाओं को नहीं मानती, इसलिए उसका संरक्षण भी विभागों और राज्यों की सीमाओं में बंटा नहीं रह सकता।  

सबसे बड़ी उपलब्धि : नदी को याद रखना  

रिवर कनेक्ट की उपलब्धि सिर्फ हटाए गए कचरे या आयोजित कार्यक्रमों में नहीं है। उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने आगरा को उसकी नदी याद दिलाई।  

दैनिक आरती ने यमुना को सार्वजनिक जीवन में लौटाया। सफाई अभियानों ने नागरिक भागीदारी पैदा की। रेत स्नान ने पानी की त्रासदी दिखाई। कागज की नावों ने सरकारी वादों का मजाक उड़ाया। झुनझुना दिवस ने राजनीतिक उदासीनता पर चोट की।  

सरकारें बदलती रहीं। योजनाएं आती रहीं। समितियां बनती रहीं। घोषणाएं होती रहीं। लेकिन यमुना आज भी पानी और प्रवाह के लिए तरस रही है।  

फिर भी उसकी शामें पूरी तरह अंधेरी नहीं हैं। एत्माद-उद-दौला के किनारे हर शाम जलते दीप एक सवाल उठाते हैं: क्या ताजमहल को बचाकर उसकी नदी को मरने दिया जा सकता है?  

रिवर कनेक्ट का जवाब है: नहीं।  

यमुना को सिर्फ साफ नहीं करना है। उसे फिर से जीवित, अविरल, निर्मल और सम्मानित नदी बनाना है।


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