Monday, September 7, 2026

 यूपी 2027: जल्द शुरू होगा सियासी पलायन

टिकट, जातीय समीकरण और राजनीतिक वफादारी का मौसम बदलने लगा है

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बृज खंडेलवाल द्वारा

9 सितंबर 2026

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समय आ गया है।

लखनऊ में एक नया बोर्ड लग जाना चाहिए:

“राजनीतिक मौसम बदल रहा है। पार्टी का झंडा संभालकर रखें।”

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव अभी कई महीने दूर हैं। मगर सियासी पारा तेजी से चढ़ रहा है। नेता हवा का रुख भांप रहे हैं। पार्टियां वोट गिन रही हैं। टिकट के दावेदार दरवाजे खटखटा रहे हैं। और राजनीतिक रणनीतिकार जातीय समीकरणों की नई कुंडली बना रहे हैं।

चुनाव सिर्फ लड़े नहीं जाते; वे बाकायदा इंजीनियर किए जाते हैं।

403 विधानसभा सीटों वाले  प्रदेश में बहुमत का आंकड़ा 202 है। बीजेपी के पास फिलहाल करीब 258 विधायक हैं, जबकि समाजवादी पार्टी के पास लगभग 101 सीटें हैं।

लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव ने तस्वीर में दरार डाल दी थी। बीजेपी 33 सीटों पर सिमट गई, जबकि समाजवादी पार्टी ने 37 और कांग्रेस ने छह सीटें जीतकर विपक्षी गठबंधन को 43 सीटों तक पहुंचा दिया।

अचानक अजेय दिखने वाली सत्ता को चुनौती दिखाई देने लगी।

और जब सत्ता की दीवार में दरार नजर आए, तो दल-बदल उद्योग सबसे पहले सक्रिय होता है।


उत्तर प्रदेश ने दल-बदल की कला में महारत हासिल कर ली है। विचारधारा अक्सर नेता के साथ पार्टी बदल लेती है। खासकर जब टिकट का सवाल हो।

हाल में AIMIM के प्रवक्ता सैयद आसिम वकार कांग्रेस में शामिल हो गए। उन्होंने अपनी पुरानी पार्टी पर बीजेपी की “बी-टीम” की तरह काम करने का आरोप लगाया।

AIMIM यूपी में कोई बड़ी चुनावी ताकत नहीं है। फिर भी यह घटना संकेत देती है कि विपक्ष वोट कटने के खतरे को लेकर सतर्क है।

बिहार का अनुभव अभी ताजा है।

जब मुकाबला कांटे का हो, तब कुछ हजार वोट भी सरकार बना सकते हैं और सरकार गिरा सकते हैं।

यूपी में पार्टी बदलना अब कोई राजनीतिक अपराध नहीं माना जाता। नेता बीजेपी से सपा में जाते हैं। सपा से बसपा में जाते हैं। बसपा से बीजेपी में आते हैं। फिर मौका मिले तो वापस भी लौट आते हैं।

झंडा बदलता है, भाषण वही रहता है।


अयोध्या इस चुनाव का सबसे दिलचस्प राजनीतिक प्रयोगशाला बन सकती है।

राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के कुछ ही महीनों बाद फैजाबाद लोकसभा सीट पर बीजेपी की हार ने पार्टी को चौंका दिया। समाजवादी पार्टी के अवधेश प्रसाद ने बीजेपी के मौजूदा सांसद लल्लू सिंह को 54 हजार से अधिक मतों से हराया।

अब विधानसभा चुनाव में अयोध्या सीट पर सबकी नजर होगी।

मौजूदा विधायक वेद प्रकाश गुप्ता को लेकर पार्टी में मंथन चल रहा है। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी के पवन पांडेय मजबूत चुनौती पेश कर सकते हैं।

बीजेपी के सामने सवाल सीधा है।

क्या राम मंदिर का मुद्दा अकेले चुनाव जिता देगा, या उसके साथ जातीय समीकरण भी जोड़ना पड़ेगा?

यूपी की राजनीति इस सवाल का जवाब हमेशा एक ही देती है:

“दोनों चाहिए।”

बीजेपी: बूथ बचाओ, वोट बढ़ाओ

बीजेपी चुनाव में मजबूत संगठन, सत्ता की मशीनरी, कल्याणकारी योजनाओं और योगी आदित्यनाथ सरकार के कामकाज के सहारे उतरेगी।

उसकी रणनीति भी साफ है: बूथ मजबूत करो, लाभार्थियों तक पहुंचो, गैर-यादव पिछड़ों और गैर-जाटव दलितों को साथ रखो, सवर्ण समर्थन बनाए रखो और सपा के PDA समीकरण को फैलने से रोक दो।

NDA के सहयोगी भी अपनी-अपनी हिस्सेदारी मांगेंगे। अपना दल, निषाद पार्टी, आरएलडी और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी सीटों पर दावा ठोकेंगे।

गठबंधन राजनीति में पुरानी कहावत याद आती है: 

“बहुत ज्यादा रसोइये हों तो खिचड़ी बिगड़ सकती है।”

लेकिन चुनाव में कभी-कभी कम रसोइयों से भी खाना जल जाता है।


अखिलेश यादव के पास इस बार एक महत्वपूर्ण हथियार है; 2024 का प्रदर्शन।

PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण ने लोकसभा चुनाव में सपा को मजबूत किया। अब चुनौती इस सामाजिक गठजोड़ को विधानसभा की 403 सीटों तक पहुंचाने की है।

यह आसान काम नहीं है।

लोकसभा चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों और बड़े नेताओं के नाम पर लड़ा जाता है। विधानसभा चुनाव में बूथ, बिरादरी, उम्मीदवार और स्थानीय समीकरण ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

इसलिए सपा को जमीन पर संगठन मजबूत करना होगा।

सिर्फ सोशल मीडिया से सरकार नहीं बनती।

कांग्रेस को चाहिए सम्मान और सीटें, कांग्रेस ने लोकसभा में छह सीटें जीतकर अपनी सौदेबाजी की ताकत बढ़ा ली है।

अब वह विधानसभा में सम्मानजनक हिस्सेदारी चाहती है। पार्टी के नेताओं ने “बराबरी और सम्मान” के साथ गठबंधन की बात कही है।

लेकिन यहां पेच है।

सपा खुद को यूपी में वरिष्ठ सहयोगी मानती है। कांग्रेस ज्यादा सीटों की मांग कर रही है।

यानी INDIA गठबंधन का सबसे बड़ा दुश्मन शायद बीजेपी नहीं होगा।

सीटों का गणित हो सकता है।

राजनीति में विचारधारा पर भाषण दिए जा सकते हैं। लेकिन टिकट बांटते समय कैलकुलेटर निकल आता है।


बहुजन समाज पार्टी ने गठबंधन की गाड़ी में बैठने से इनकार कर दिया है।

मायावती ने साफ संकेत दिया है कि BSP 2027 का विधानसभा चुनाव अपने दम पर लड़ेगी। उनका तर्क है कि पिछले गठबंधनों में बसपा के वोट तो दूसरे दलों को मिले, लेकिन बदले में पर्याप्त समर्थन नहीं मिला।

बसपा के सामने लक्ष्य बड़ा है: पूर्ण बहुमत।

यह सुनने में महत्वाकांक्षी लगता है। लेकिन बसपा को कम आंकना भी राजनीतिक भूल हो सकती है।

वह कई सीटें न जीते, फिर भी कई सीटों का परिणाम तय कर सकती है।

यही है स्पॉइलर फैक्टर।

कभी-कभी चुनाव जीतने के लिए सीट जीतना जरूरी नहीं होता।

किसी दूसरे को हराने के लिए पर्याप्त वोट लेना भी काफी होता है।

असली मुद्दे दरवाजे पर खड़े हैं

जातीय गणित के पीछे जनता के असली सवाल भी खड़े हैं।

रोजगार, बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाएं, पेपर लीक, महंगाई, किसान, शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था और बुलडोजर राजनीति चुनावी विमर्श का हिस्सा बनेंगे।

युवा मतदाता खास तौर पर महत्वपूर्ण होंगे।

नारे से पेट नहीं भरता। नौकरी की जरूरत होती है।

बीजेपी कल्याणकारी योजनाओं, विकास, कानून-व्यवस्था और हिंदुत्व को सामने रखेगी।

सपा सामाजिक न्याय, बेरोजगारी और शासन के सवाल उठाएगी।

कांग्रेस पुनर्जीवन की कोशिश करेगी।

बसपा पुराने सामाजिक इंजीनियरिंग मॉडल को नए रूप में आजमा सकती है।

छोटी पार्टियां अपनी-अपनी जातीय जेबें तलाशेंगी।

और टिकट के दावेदार?

वे अपनी राजनीतिक तीर्थयात्रा जारी रखेंगे।

टिकट ही असली घोषणापत्र है

दशहरे तक कई राजनीतिक समीकरण साफ होने लगेंगे। दिवाली के बाद टिकटों की मंडी गर्म होगी।

फिर वही दृश्य सामने आएंगे।

नाराज नेता।

बागी उम्मीदवार।

भावुक इस्तीफे।

प्रेस कॉन्फ्रेंस।

और वही अमर संवाद: 

“पार्टी ने मेरे साथ धोखा किया है।”

वोटर चुपचाप सब देखेगा।

उत्तर प्रदेश का चुनाव कभी सिर्फ पार्टियों का चुनाव नहीं रहा। यह जातीय गठबंधनों, उम्मीदवारों, बूथ प्रबंधन, स्थानीय नाराजगी, धनबल, संगठन और राष्ट्रीय मुद्दों का जटिल मिश्रण है।

बीजेपी के पास मशीनरी है।

सपा के पास 2024 की रफ्तार है।

कांग्रेस को पुनर्जीवन चाहिए।

बसपा को पुनरुत्थान।

छोटी पार्टियों को मोलभाव की ताकत।

और वोटर?

आखिरी फैसला उसी का होगा।

उत्तर प्रदेश में सियासी हवा इतनी तेजी से बदलती है कि नेता के हाथ का झंडा भी पीछे रह जाए।

2027 का चुनाव सिर्फ योगी सरकार पर जनमत-संग्रह नहीं होगा।

यह परीक्षा होगी कि किस पार्टी ने नए यूपी के मतदाता को समझा है, और कौन अब भी पुराने चुनाव की रणनीति लेकर बैठा है।


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