गिफ्ट का सूट, जूतों की लूट और पत्रकारों की जलवा-ए-फ़ज़ीहत!
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खरांची से बृज खंडेलवाल द्वारा
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दक्षिण प्रांत के पाजीपुर कस्बे की यह दास्तान पत्रकारिता के इतिहास में सुनहरे अक्षरों से नहीं, बल्कि रेडीमेड सूट के कपड़े पर कढ़ाई करके लिखी जानी चाहिए।
हुआ यूँ कि एक बड़ी रेडीमेड वस्त्र कंपनी ने अपना शानदार शोरूम खोला। उद्घाटन पर पत्रकारों को खास तौर पर दावत दी गई। पत्रकार भी कैमरे, कलम और उम्मीदों की बड़ी-बड़ी जेबें लेकर तशरीफ ले आए।
कार्यक्रम खत्म हुआ तो राज़ खुला।
गिफ्ट में थे सिर्फ आठ सूट।
मगर पत्रकार थे पूरे बाईस।
बस हुज़ूर, फिर क्या था!
प्रेस फ्रीडम खतरे में पड़ गई। पत्रकारिता की अस्मिता पर हमला हो गया। ऐसा संकट आया, मानो किसी ने संपादकीय पन्ने की जगह साबुन का इश्तिहार छाप दिया हो।
कंजूस मालिक ने मासूमियत से पूछा, “कितने आदमी थे?”
एक बुज़ुर्ग पत्रकार का ख़ून खौल उठा। “यह मीडिया की तौहीन है!” दूसरे ने दहाड़ लगाई, “आठ सूट और बाईस आदमी! जनाब, यह कैसा हिसाब है? यह गणित आपने किस मदरसे में पढ़ा?”
देखते ही देखते कांच की बोतलें हवा में उड़ने लगीं। उद्घाटन समारोह कम और आईपीएल का फाइनल ज्यादा लगने लगा। कुछ लोगों को मामूली चोटें भी आईं। अगले दिन शहर में कंपनी के शोरूम से ज्यादा चर्चा सूटों की हो रही थी।
रविवार को लोकल प्रेस क्लब की हंगामी बैठक बुलाई गई।
चेहरे गंभीर थे। आवाजें भारी थीं। माहौल में इंकलाब की खुशबू थी।
फैसला हुआ कि अब कोई पत्रकार गिफ्ट नहीं लेगा। गिफ्टबाजी का बहिष्कार होगा। और अगर कोई गिफ्ट देगा भी, तो प्रेस क्लब के सभी 213 सदस्यों को बराबर मिलेगा।
वाह! पत्रकारिता बच गई।
नैतिकता ने अंगड़ाई ली। उसूलों ने सीना फुलाया। सिद्धांतों ने खड़े होकर सलाम ठोंका।
फिर शादी का मौसम आ गया।
एक नेताजी के बड़े साहबज़ादे की शादी का निमंत्रण आया। प्रेस क्लब के पत्रकारों को बाकायदा कार्ड मिला। खुशियों की लहर दौड़ गई। किसी ने नया कुर्ता निकाला, किसी ने इत्र लगाया, किसी ने बरसों पुराना कैमरा चमकाया।
पंद्रह तारीख की शाम आंधी और बारिश ने बारातघर पर धावा बोल दिया। बिजली गुल। जनरेटर में डीजल खत्म। मोमबत्तियां जल रही थीं और लालटेनें अपनी आखिरी सरकारी नौकरी निभा रही थीं।
नेताजी खुद पत्रकारों की खातिरदारी में लगे थे।
तभी,
भक्क्काटा!
बिजली आ गई।
संगीत शुरू हुआ। जाम छलके। महफ़िल जवान हुई।
और फिर सबकी नजर एक ही दिशा में जम गई।
आठ पत्रकार।
आठों ने एक ही रंग के।
एक ही डिजाइन के।
एक ही कंपनी के सूट पहन रखे थे।
बाकी चौदह पत्रकारों की आंखों में शरारत चमक उठी।
“क्यों उमर भाई, आजकल फैशन में यूनिफॉर्म चल रहा है क्या?”
“ख़ां साहब, कहीं किसी जमींदार के अब्बाजान के मातम में तो नहीं गए थे?”
“सुना है, मुफ्त के कपड़े मिले थे उधर!”
बस जनाब, पार्टी का सारा लुत्फ़ गया तेल लेने।
आठों सूटधारी पत्रकार ऐसे खिसके, जैसे बिजली विभाग का बिल देखकर आम आदमी खिसकता है। कोई पंडाल के पीछे, कोई खाने की मेज के पास, कोई अंधेरे कोने में जाकर अपनी पत्रकारिता तलाशने लगा।
मगर किस्सा यहीं खत्म नहीं हुआ।
उधर, तुमकाडा जिले से खबर आई कि एक पत्रकार के दादाजी की शोकसभा में बड़ी तादाद में मीडिया वाले पहुंचे। मातमपुर्सी खत्म हुई, लोग बाहर निकले, तो जूते-चप्पलों का ऐसा महाभारत सामने था कि ईरान-अमेरिका भी शर्मिंदा हो जाएं।
दर्जनों जूते। एक ही रंग। एक ही ठप्पा। एक ही डिजाइन। एक ही कंपनी।
किसका कौन सा? पहचानने का कोई चांस नहीं।
तभी रैम्बो बाबू ने मंजर देखा। उनसे चुप रहा नहीं गया।
बोले, “क्यों बे! तुम सब जूते वाली फैक्ट्री में आग लगने की खबर कवर करने गए थे न?”
सन्नाटा।
ऐसा सन्नाटा कि अगर कोई पिन गिरती, तो शायद वही अपना जूता पहचान लेती।
फिर सब बगलें झांकने लगे।
आखिर लोकतांत्रिक फैसला हुआ, जिसके पैर में जो फिट हो जाए, वही उसका।
बस, फिर क्या था!
मीडिया वाले एक-एक करके निकल लिए। किसी के पैर में अपना जूता था, किसी के पैर में किसी और का। एक साहब का दायां जूता शायद उनका था, बायां किसी दूसरे अखबार का।
पत्रकारिता की इज्जत पीछे रह गई।
जूते आगे निकल गए।
व्याकुल दुनिया के संपादक ने इस तमाम फ़ज़ीहत पर गहरी सांस लेकर फरमाया:
“सबक सिर्फ इतना है कि मुफ्त का सूट हो या मुफ्त का जूता, मीडिया की पहचान छिपाए नहीं छिपती। कभी सभी के सूट एक जैसे होते हैं, कभी जूते। कभी घरों में एक जैसे शोपीस, बेडशीट, घड़ियां और क्रॉकरी बरामद होती हैं। गिफ्ट देने वाले भी वही घिसे-पिटे सामान बांटते रहते हैं, और बाकी दुनिया तमाशा देखकर ठहाके लगाती रहती है।”
आखिर पत्रकारिता का भी अपना एक उसूल है।
खबर चाहे अलग-अलग हो, मगर गिफ्ट सबको एक जैसा चाहिए
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