तिब्बती भारत में: क्या वे कभी लौटेंगे, या हमेशा के मेहमान बन जाएंगे?
बृज खंडेलवाल द्वारा
20 अगस्त, 2026
एक मातृभूमि रोज़मर्रा की जिंदगी से दूर हो सकती है, लेकिन यादों से नहीं मिटती। भारत में रह रहे हजारों तिब्बतियों के लिए तिब्बत आज भी एक सपना भी है और एक ज़ख्म भी—एक ऐसी धरती, जिसे उनमें से बहुतों ने कभी देखा तक नहीं, फिर भी अपना घर मानते हैं।
तिब्बतियों के बड़े पलायन को छह दशक से अधिक समय बीत चुका है। लेकिन एक कठिन सवाल आज भी पीछा नहीं छोड़ता—क्या तिब्बती कभी अपनी मातृभूमि लौट पाएंगे, या अस्थायी निर्वासन चुपचाप एक स्थायी बसावट में बदल चुका है?
इस सप्ताह कर्नाटक में यह सवाल फिर चर्चा में आया। तिब्बती प्रतिनिधियों ने राज्य के वरिष्ठ राजनीतिक नेताओं से मुलाकात की और अपने समुदाय के लिए अधिक सहयोग तथा तिब्बती मुद्दे पर नए सिरे से ध्यान देने की मांग की।
बेंगलुरु में नवनिर्वाचित तिब्बती सांसद चोपेल ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार से मुलाकात की। उन्होंने कल्याण, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और तिब्बती संस्कृति के संरक्षण के लिए राज्य सरकार से सहायता मांगी। विशेष रूप से दक्षिण भारत की सबसे बड़ी तिब्बती बस्तियों में से एक, बायलाकुप्पे के तिब्बतियों की समस्याएं उठाई गईं।
बताया जाता है कि शिवकुमार ने सहयोग का भरोसा दिया। उन्होंने तिब्बती संस्कृति को अधिक स्थान देने और मैसूरु दशहरा समारोह में तिब्बती समुदाय की भागीदारी बढ़ाने का भी आश्वासन दिया।
मैसूरु में, हुंसूर के निकट गुरुपुरा तिब्बती बस्ती के एक अन्य प्रतिनिधिमंडल ने सांसद यदुवीर वाडियार से मुलाकात की। उन्होंने उनसे संसद और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तिब्बती मुद्दा उठाने का आग्रह किया।
प्रतिनिधिमंडल ने 2 जुलाई को न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के बाहर तिब्बती कार्यकर्ता लोबगा रंगजेन के आत्मदाह का मुद्दा भी उठाया। यह दर्दनाक घटना याद दिलाती है कि तिब्बत का सवाल आज भी जिंदा है और लोगों की भावनाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है।
तिब्बती नेताओं की मांगें केवल राजनीति तक सीमित नहीं थीं। उन्होंने स्कूलों, स्वास्थ्य सेवाओं, कल्याणकारी योजनाओं तथा तिब्बती भाषा, धर्म और संस्कृति के संरक्षण के लिए भी सहायता मांगी।
लेकिन इन तात्कालिक मांगों के पीछे एक और बड़ा सवाल छिपा है—जब निर्वासन पीढ़ियों तक चलने लगे, तो आखिर उसका भविष्य क्या होता है?
भारत में तिब्बती निर्वासन की कहानी 1959 में शुरू हुई। चीन के शासन के खिलाफ विद्रोह के बाद दलाई लामा तिब्बत से निकल आए। हजारों तिब्बती खतरनाक हिमालयी दर्रों को पार करते हुए उनके पीछे भारत पहुंचे। वे अपने घर, परिवार और सदियों पुरानी जीवन-पद्धति पीछे छोड़ आए थे।
तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में भारत ने उन्हें शरण दी। बस्तियां बसाने, मठ बनाने और स्कूल खोलने के लिए जमीन उपलब्ध कराई गई। धीरे-धीरे और बड़ी मुश्किलों के बीच एक उजड़ा हुआ समुदाय फिर से अपनी जिंदगी बनाने लगा।
धर्मशाला तिब्बती निर्वासित समुदाय का आध्यात्मिक और राजनीतिक केंद्र बन गया। वहीं से केंद्रीय तिब्बती प्रशासन आज भी काम करता है। यह संस्था शिक्षा, कल्याण, संस्कृति और विदेशों में रह रहे तिब्बतियों के लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व से जुड़े कार्यों को संभालती है।
समय के साथ भारत के अनेक हिस्सों में तिब्बती बस्तियां बस गईं। कर्नाटक में बायलाकुप्पे, मुंडगोड और गुरुपुरा जैसी बड़ी बस्तियां विकसित हुईं। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में भी महत्वपूर्ण तिब्बती समुदाय बस गए।
पहली पीढ़ी के शरणार्थियों ने भारी कठिनाइयां झेलीं। उन्होंने जमीन साफ की, खेती शुरू की और लगभग शून्य से अपने घर बसाए। मठ फिर खड़े हुए। स्कूलों में तिब्बती भाषा और इतिहास पढ़ाया जाने लगा। हस्तशिल्प, खेती, रेस्तरां और छोटे कारोबारों ने परिवारों को सहारा दिया।
जो शुरुआत में शरणार्थियों के अस्थायी शिविर थे, वे धीरे-धीरे एक संगठित समुदायों के नेटवर्क में बदल गए।
भारत वह पनाहगाह था, जिसकी तिब्बतियों को सख्त जरूरत थी। लेकिन वक्त गुजरने के साथ वही पनाहगाह धीरे-धीरे घर जैसा लगने लगा।
यहीं से असली विरोधाभास शुरू होता है।
भारत में जन्मे अनेक युवा तिब्बतियों ने कभी तिब्बत देखा ही नहीं। वे भारतीय भाषाएं बोलते हैं, भारतीय स्कूलों और विश्वविद्यालयों में पढ़ते हैं तथा भारतीय दोस्तों और पड़ोसियों के बीच बड़े होते हैं। फिर भी उनकी पहचान में तिब्बत की जगह बेहद गहरी है।
तिब्बत उनकी प्रार्थनाओं में बसता है। उनके गीतों, मठों और परिवारों की कहानियों में तिब्बत जिंदा रहता है।
एक युवा तिब्बती शायद ल्हासा की गलियों से ज्यादा मैसूरु की सड़कों को जानता हो। फिर भी तिब्बत की स्मृति उसके अपनेपन और पहचान की भावना को तय करती रहती है।
इस बीच निर्वासित समुदाय भी बदल रहा है। कड़े सीमा नियंत्रण के कारण तिब्बत से नए लोगों का आना काफी कम हो गया है। दूसरी ओर, कई युवा तिब्बती उच्च शिक्षा और बेहतर करियर के लिए अमेरिका, कनाडा, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया जा रहे हैं।
नतीजा एक अजीब और दर्दनाक विडंबना है।
जो समुदाय तिब्बत से कभी वापस लौटने की उम्मीद लेकर निकला था, वह अब दुनिया भर में बिखर गया है। हर नई पीढ़ी के साथ तिब्बत से उसकी भौतिक दूरी और बढ़ती जा रही है।
निकट भविष्य में बड़े पैमाने पर तिब्बतियों की वापसी की संभावना धुंधली दिखाई देती है। तिब्बती आकांक्षाओं और बीजिंग की नीतियों के बीच राजनीतिक मतभेद अभी तक सुलझे नहीं हैं। निर्वासन में रह रहे अनेक तिब्बतियों को चीन के शासन में धर्म, भाषा और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति पर प्रतिबंधों की चिंता है।
फिर भी उम्मीद बड़ी ज़िद्दी चीज़ है।
बुजुर्ग तिब्बतियों के लिए वापसी आज भी एक पवित्र सपना है। युवा पीढ़ी के लिए यह सपना व्यावहारिक सवालों से जुड़ गया है—शिक्षा, रोजगार, नागरिकता, पहचान और अनिश्चित भविष्य।
इस पूरी कहानी में भारत की जगह बहुत खास है। भारत तिब्बत नहीं है। फिर भी अनेक तिब्बतियों के लिए भारत ही एकमात्र घर है, जिसे उन्होंने अपनी आंखों से जाना है।
शायद लंबे निर्वासन की सबसे बड़ी त्रासदी यही है। एक अस्थायी पनाहगाह बिना किसी औपचारिक फैसले के स्थायी घर बन सकता है।
वापसी की प्रार्थना आज भी जारी है। निर्वासित बस्तियों में तिब्बती झंडा अब भी लहराता है। मठ पुरानी परंपराओं को संभाले हुए हैं। बच्चे उस मातृभूमि की भाषा सीख रहे हैं, जो उनकी पहुंच से बहुत दूर है।
लेकिन इतिहास अपनी चाल चलता रहता है।
क्या तिब्बती कभी तिब्बत लौटेंगे? इसका जवाब कोई निश्चित रूप से नहीं दे सकता।
फिलहाल वे स्मृति और हकीकत के बीच जी रहे हैं—एक घर को दिल में संभाले हुए और दूसरे घर में अपनी जिंदगी बनाते हुए।
भारत ने कभी मजबूर और बेघर शरणार्थियों के लिए अपने दरवाजे खोले थे। साठ साल से अधिक समय बाद वे मेहमान अब पड़ोसी, सहकर्मी, विद्यार्थी, भिक्षु, कारोबारी और भारत के व्यापक सामाजिक परिदृश्य का हिस्सा बन चुके हैं।
तिब्बत का सपना आज भी जिंदा है। लेकिन हर गुजरती पीढ़ी के साथ भारत थोड़ा कम निर्वासन और थोड़ा ज्यादा घर बनता जा रहा है।
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