(A Mass communication study)
मोदी के मैजिक मंत्र:
कैसे एक माहिर संचारक (कम्युनिकेटर) विचारों को राष्ट्रीय मिशन में बदल देता है
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बृज खंडेलवाल द्वारा
25 अगस्त, 2026
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देश अपने घरों में बंद था। सड़कें सुनसान थीं, बाजार खामोश थे और कारखानों के पहिए थम गए थे। कोरोना का अदृश्य खौफ लगभग हर घर में दाखिल हो चुका था। किसी को नहीं मालूम था कि यह संकट कब खत्म होगा।
तभी टेलीविजन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आवाज गूंजी।
शाम के पांच बजे ताली बजाइए। घंटी बजाइए। थाली बजाइए। डॉक्टरों, नर्सों, सफाईकर्मियों, पुलिसकर्मियों और कोरोना योद्धाओं का शुक्रिया अदा कीजिए।
कुछ दिन बाद एक और अपील आई।
रात नौ बजे घर की बत्तियां बुझाइए। दरवाजे या बालकनी में खड़े होकर नौ मिनट तक दिया, मोमबत्ती या मोबाइल की रोशनी जलाइए।
निर्देश आसान थे। समय तय था। काम सबके लिए एक था। लाखों लोगों ने उसका पालन किया।
कोई इन प्रतीकों से सहमत था, कोई असहमत। उनके व्यावहारिक असर पर भी बहस हुई। मगर एक बात साफ थी, संप्रेषण बेहद स्पष्ट था।
यही शायद नरेंद्र मोदी की राजनीतिक संचार शैली का सबसे दिलचस्प पहलू है। पिछले एक दशक से ज्यादा समय में उन्होंने कठिन नीतियों, आर्थिक रणनीतियों और राष्ट्रीय लक्ष्यों को छोटे-छोटे सूत्रों, मंत्रों, नारों और याद रह जाने वाले वाक्यों में बदलने की कला विकसित की है।
तीन शब्द। पांच बिंदु। सात संकल्प।
3S, 5T, 5F, पंच प्रण और सप्तधारा।
इनमें वैज्ञानिक स्पष्टता भी है और संचार की समझ भी। ग्रामीण विकास हो, आर्थिक तरक्की हो, युवाओं के कौशल की बात हो, आत्मनिर्भर भारत का सपना हो या 2047 तक विकसित भारत बनाने का लक्ष्य; संदेश में अक्सर लक्ष्य साफ होता है, रास्ता बताया जाता है और नागरिक की भूमिका भी तय की जाती है। कई बार लगता है किसी कॉरपोरेट कंपनी के हेड का प्रेजेंटेशन चल रहा है: यह लक्ष्य है। यह रणनीति है। यह आपकी भूमिका है। और यह समय सीमा है।
रेडियो पर मन की बात हो, संसद में भाषण हो, चुनावी सभा हो या लाल किले से स्वतंत्रता दिवस का संबोधन, मोदी की भाषा में आम तौर पर बहुत कम अस्पष्टता दिखाई देती है।
हंसी-मजाक, दोहरे अर्थ वाले वाक्य और बेवजह की हल्की-फुल्की टिप्पणियां उनकी शैली का मुख्य हिस्सा नहीं हैं। इसके बजाय वे अक्सर ऐसे दिखाई देते हैं जैसे कोई विश्वविद्यालय का प्रोफेसर पूरी तैयारी के साथ कक्षा में आया हो। नोट्स तैयार हैं। विषय स्पष्ट है। और विद्यार्थियों के लिए संदेश भी। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां विद्यार्थी पूरा देश है।
तीन, पांच और सात का जादू
मोदी के शुरुआती सूत्रों में एक था 5T—Talent, Tradition, Tourism, Trade और Technology।
इन पांच शब्दों में भारत की एक पूरी तस्वीर खींच दी गई। परंपरा के साथ तकनीक। पर्यटन के साथ व्यापार। पुरानी सभ्यता के साथ नई अर्थव्यवस्था।
संदेश साफ है: भारत को अपने अतीत और भविष्य में से किसी एक को चुनने की जरूरत नहीं है।
फिर आया 3S: Speed, Skill और Scale।
विकास तेज होना चाहिए। युवाओं के पास कौशल होना चाहिए। काम बड़े पैमाने पर होना चाहिए।
तीन शब्दों में आर्थिक नीति का एक बड़ा खाका सामने आ जाता है।
5F भी इसी शैली का शानदार उदाहरण है: Farm, Fibre, Fabric, Fashion और Foreign।
खेत से फाइबर, फाइबर से कपड़ा, कपड़े से फैशन और फैशन से विदेशी बाजार।
पूरी वैल्यू चेन पांच शब्दों में।
फिर आया एक ऐसा सूत्र जो स्कूल की ब्लैकबोर्ड पर लिखे किसी समीकरण जैसा लगता है:
IT + IT = IT
यानी Indian Talent + Information Technology = India Tomorrow.
लोग समीकरण याद रखते हैं। शायद इसीलिए यह सूत्र भी याद रह गया।
मोदी की भाषा में यही संचार-कला बार-बार दिखाई देती है।
नारे नहीं, याद रखने की तकनीक
Reform, Perform, Transform:
पहले सुधार, फिर बेहतर प्रदर्शन और अंत में बदलाव।
Per Drop More Crop; हर बूंद से ज्यादा फसल।
कृषि, सिंचाई और जल संरक्षण जैसे जटिल विषय को चार शब्दों में समेट दिया गया।
इसी तरह Make in India, Atmanirbhar Bharat, Vocal for Local और Swadeshi एक-दूसरे को मजबूत करते हैं।
एक ही विचार अलग-अलग नारों के जरिए बार-बार सामने आता है।
और यही दोहराव संदेश को सार्वजनिक भाषा का हिस्सा बना देता है।
मोदी की सबसे लोकप्रिय राजनीतिक पंक्तियों में से एक है;
सबका साथ, सबका विकास।
बाद में इसमें दो और शब्द जुड़ गए:
सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास।
साथ, विकास, विश्वास और प्रयास।
चार शब्द, लेकिन एक पूरी राजनीतिक सोच।
यही शैली पार्टी संगठन तक भी पहुंचती है। भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए बताए गए सात मंत्र: सेवाभाव, संतुलन, संयम, समन्वय, सकारात्मकता, संवेदना और संवाद; सिर्फ विचार नहीं हैं। समान ध्वनि वाले शब्दों के कारण वे आसानी से याद भी रहते हैं। यहां भाषा केवल सूचना नहीं देती। भाषा स्मृति बनाती है।
कोविड-19 महामारी ने मोदी की संचार शैली को सबसे नाटकीय तरीके से सामने रखा।
देश डरा हुआ था। अस्पतालों पर दबाव था। कारोबार बंद हो रहे थे। करोड़ों लोगों के रोजगार और भविष्य को लेकर चिंता थी। ऐसे समय में संचार खुद शासन का एक महत्वपूर्ण औजार बन गया।
पहले आया जनता कर्फ्यू।
फिर शाम पांच बजे कोरोना योद्धाओं के सम्मान में ताली, घंटी और थाली बजाने की अपील हुई।
इस प्रतीक पर बहस हुई। आलोचना भी हुई। लेकिन संचार की दृष्टि से इसका एक असर जरूर हुआ।
डॉक्टर, नर्स, सफाईकर्मी और दूसरे फ्रंटलाइन वर्कर अचानक राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में आ गए।
इसके बाद आया 21 दिन का लॉकडाउन।
मोदी ने इसे समझाने के लिए भारतीय सांस्कृतिक स्मृति से एक जाना-पहचाना रूपक निकाला: लक्ष्मण रेखा।
आपका घर आपकी सीमा है।
बेवजह बाहर मत निकलो।
घर में रहो।
संक्रमण की कड़ी तोड़ो।
फिर आया रात नौ बजे, नौ मिनट का संदेश।
बत्तियां बुझाइए।
दीया जलाइए।
मोमबत्ती जलाइए।
मोबाइल की रोशनी जलाइए।
नौ मिनट तक एक साझा प्रतीक बनाइए।
इसके बाद सात बिंदुओं वाली अपील में बुजुर्गों की रक्षा करने, सामाजिक दूरी रखने, प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, आरोग्य सेतु का इस्तेमाल करने, गरीब परिवारों की मदद करने, कर्मचारियों की चिंता करने और कोरोना योद्धाओं का सम्मान करने की बात कही गई।
पूरे अभियान का सबसे महत्वपूर्ण संदेश शायद यही था: सरकार अकेली कोरोना से नहीं लड़ रही है। आप भी इस लड़ाई का हिस्सा हैं।
यही सहभागी संप्रेषण है।
घर में बंद डरा हुआ नागरिक भी किसी काम का हिस्सा बन गया।
संकट के समय एक छोटा-सा साझा काम भी लोगों में सामूहिकता और भरोसे की भावना पैदा कर सकता है।
संकट से 2047 तक
कोरोना के बाद यही संचार शैली तत्काल संकट से निकलकर भारत के दीर्घकालीन सपने तक पहुंची।
2022 में आया पंच प्रण।
2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाना। औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति। अपनी विरासत पर गर्व। एकता को मजबूत करना। नागरिक कर्तव्यों को निभाना।
2047 बहुत दूर का सपना है।
लेकिन पांच संकल्प उसे समझने योग्य बना देते हैं।
इसके बाद डेमोग्राफी, डेमोक्रेसी और डायवर्सिटी यानी जनसांख्यिकी, लोकतंत्र और विविधता का त्रिफलक सामने आया।
दूसरी तरफ भ्रष्टाचार, परिवारवाद और तुष्टीकरण जैसे मुद्दों को भी तीन के ढांचे में पेश किया गया।
फिर आया सप्तधारा का विचार।
विकसित भारत के रास्ते में सात बड़ी धाराएं: मैन्युफैक्चरिंग, कृषि और खाद्य प्रसंस्करण, तकनीक और नवाचार, गति शक्ति और कनेक्टिविटी, रक्षा शक्ति, ग्रीन और ब्लू इकोनॉमी तथा भारत की सॉफ्ट पावर।
यहां प्रतीक और आधुनिकता का अनोखा मेल दिखाई देता है।
प्राचीन भारत में सप्त सिंधु की कल्पना थी।
आज के भारत के सामने सप्तधारा है।
एक तरफ कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम टेक्नोलॉजी, रोबोटिक्स, ग्रीन हाइड्रोजन और आधुनिक लॉजिस्टिक्स हैं। दूसरी तरफ योग, आयुर्वेद, संस्कृति और पर्यटन।
एक पैर सभ्यतागत स्मृति में है।
दूसरा 2047 में।
यह शैली मोदी तक सीमित नहीं
यह संचार शैली अब दूसरे वरिष्ठ मंत्रियों में भी दिखाई देती है।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर का उदाहरण लिया जा सकता है। उन्होंने बदलती दुनिया को 3 Cs: Competition, Conflict और Choke Points, के जरिए समझाया है।
जवाब के लिए 4 Ds: Derisking, Diversification, distortions से निपटना और सुरक्षा का एक मार्जिन बनाए रखना, जैसी शब्दावली सामने आती है। पुरानी सोच थी: Just in Time। नई दुनिया कह रही है: Just in Case। जटिल भू-राजनीति भी कुछ याद रहने वाले शब्दों में बदल जाती है।
मगर नारा शासन नहीं है
यहां एक जरूरी सवाल भी है।
सूत्र और नारे प्रभावशाली हो सकते हैं, लेकिन वे शासन का विकल्प नहीं हैं।
सिर्फ नारे से कारखाना नहीं बनता।
मंत्र से रोजगार पैदा नहीं होता।
दिया जलाने से बीमारी ठीक नहीं होती।
कोई आकर्षक वाक्य नदी को साफ नहीं कर सकता।
अंततः असली परीक्षा काम की है।
नीतियों के परिणामों को आंकना जरूरी है। सरकार के दावों को जांचना जरूरी है। नागरिकों, अर्थशास्त्रियों, पत्रकारों और विपक्षी दलों को सवाल पूछने का पूरा अधिकार है।
राजनीतिक संचार लोगों को जोड़ सकता है।
लेकिन परिणाम ही उसकी अंतिम कसौटी हैं।
फिर भी संचार को कम करके नहीं आंका जा सकता।
1.4 अरब से ज्यादा लोगों के देश में कोई नीति अगर सरकारी फाइलों में बंद रह जाए तो वह जनभागीदारी का अभियान नहीं बन सकती।
पहले लोगों को बात समझनी होगी।
फिर वे उससे जुड़ेंगे।
यहीं मोदी की संचार शक्ति सबसे दिलचस्प बन जाती है।
वे जानते हैं कि लोग तीन शब्द तीस पैराग्राफ से ज्यादा आसानी से याद रखते हैं।
लोग लंबे भाषण से ज्यादा आसानी से कोई ठोस काम याद रखते हैं।
और अस्पष्ट वादे से ज्यादा आसानी से एक तय समय सीमा याद रखते हैं।
भारत के राजनीतिक इतिहास में संक्षिप्त और ताकतवर नारों की परंपरा पुरानी है।
महात्मा गांधी के दौर में "भारत छोड़ो" और "करो या मरो" जैसे छोटे वाक्यों ने विशाल जनसमूह को आंदोलित किया था।
समय बदल गया है।
माइक की जगह टेलीविजन, मोबाइल, यूट्यूब और सोशल मीडिया ने ले ली है।
लेकिन संचार का मूल सिद्धांत आज भी वही है।
लोगों को एक वाक्य दीजिए।
एक उद्देश्य दीजिए।
और उसमें उनकी भूमिका तय कर दीजिए।
मोदी के 3S, 5T, 5F, पंच प्रण, सप्तधारा और Per Drop More Crop जैसे सूत्र इसी आधुनिक संचार परंपरा के अध्ययन का विषय बन सकते हैं।
ये सिर्फ नारे नहीं हैं। ये याद रखने की तकनीक हैं।
इनके जरिए जटिल नीतियों को सरल बनाया जाता है, भावनात्मक जुड़ाव पैदा किया जाता है और लोगों को किसी बड़े राष्ट्रीय अभियान का हिस्सा बनने के लिए प्रेरित किया जाता है।
आखिर असली कमाल केवल आकर्षक नारा गढ़ने में नहीं है।
कमाल है किसी विचार को साझी जिम्मेदारी में बदल देने में।
पानी बचाइए।
स्थानीय सामान खरीदिए।
नई स्किल सीखिए।
बुजुर्गों की रक्षा कीजिए।
गरीब की मदद कीजिए।
कोरोना योद्धाओं का सम्मान कीजिए।
और विकसित भारत बनाने में अपना योगदान दीजिए।
भाषा छोटी है।
मगर लक्ष्य बहुत बड़ा है।
भाषण खत्म होता है।
कैमरे बंद हो जाते हैं।
लेकिन संदेश का सफर शुरू हो जाता है।
वह अखबार की हेडलाइन बनता है। टीवी की पट्टी बनता है। गांव की सभा में दोहराया जाता है। व्हाट्सऐप पर घूमता है। घर की बातचीत में पहुंचता है।
यही है नारे के पीछे का विज्ञान।
एक अच्छा वक्ता लोगों को सोचने के लिए कुछ देता है।
एक माहिर संचारक उन्हें याद रखने और कुछ करने के लिए देता है।
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