इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों की दुकानदारी:
जब शिक्षा से ज्यादा जरूरी हो जाए मुनाफा
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बृज खंडेलवाल द्वारा
24 अगस्त, 2026
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नई इमारत तैयार है। चमचमाता बोर्ड लग गया है। रंगीन ब्रोशर छप चुके हैं।
"एडमिशन शुरू हैं!"
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस। डेटा साइंस। साइबर सिक्योरिटी। मशीन लर्निंग। रोबोटिक्स।
नाम सुनकर लगता है, बस दाखिला लो और भविष्य जेब में डाल लो। मगर कई कॉलेजों के भीतर जाइए। खाली कुर्सियां आपका स्वागत करती मिलेंगी।
यही भारतीय उच्च शिक्षा की सबसे बड़ी विडम्बना है।
कर्नाटक के उच्च शिक्षा मंत्री ने हाल में कहा कि राज्य अब नए सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज नहीं खोलेगा। पहली नजर में यह फैसला पीछे हटने जैसा लग सकता है। असल में, यह देर से आया हुआ एक समझदार फैसला है।
पिछले तीन दशकों में प्रोफेशनल शिक्षा का ऐसा विस्तार हुआ कि हर शहर और कस्बे में कॉलेज कुकुरमुत्तों की तरह उग आए। इंजीनियरिंग, मेडिकल, डेंटल, फार्मेसी, मैनेजमेंट और होम्योपैथी कॉलेजों की बाढ़ आ गई।
शिक्षा धीरे-धीरे कारोबार बन गई।कॉलेज की सीट एक उत्पाद बन गई। छात्र ग्राहक बन गया।
कर्नाटक में हर साल करीब 28 से 30 हजार इंजीनियरिंग सीटें खाली रह जाती हैं। देश भर में इंजीनियरिंग की लगभग 30 से 40 प्रतिशत सीटों पर दाखिला नहीं हो पाता। यानी हर साल तीन से पांच लाख सीटें खाली रह सकती हैं।
तमिलनाडु की तस्वीर भी कम परेशान करने वाली नहीं है। टीएनईए काउंसलिंग के तीसरे दौर के बाद भी करीब 37,943 इंजीनियरिंग सीटें खाली थीं। लगभग 1,57,570 सीटें भर गईं, लेकिन बड़ी संख्या में सीटें फिर भी खाली रह गईं। राज्य में करीब 418 इंजीनियरिंग कॉलेज हैं।
सवाल यह नहीं कि छात्रों ने इंजीनियरिंग छोड़ दी है। असली बात यह है कि छात्र अब हर कॉलेज में दाखिला लेने को तैयार नहीं हैं।
अच्छे और पुराने संस्थानों में आज भी भीड़ है। शहरों के प्रतिष्ठित कॉलेज, जहां पढ़ाई और प्लेसमेंट बेहतर हैं, छात्रों की पहली पसंद बने हुए हैं।
लेकिन छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों के कई निजी कॉलेजों की हालत पतली है। कुछ कॉलेजों में एक भी छात्र नहीं पहुंचा। कुछ को गिनती के विद्यार्थी मिले।
संदेश साफ है। सीटें बढ़ा देने से मांग पैदा नहीं होती।
निजी कॉलेजों ने एक नया नुस्खा खोज लिया है। पुराने कंप्यूटर साइंस कोर्स के नाम के साथ कोई फैशनेबल शब्द जोड़ दीजिए। नया कोर्स तैयार।
एआई एंड मशीन लर्निंग। एआई एंड डेटा साइंस। साइबर सिक्योरिटी।इंटरनेट ऑफ थिंग्स। डेटा एनालिटिक्स। नाम अलग-अलग हैं। कई बार पढ़ाई का बड़ा हिस्सा लगभग एक जैसा होता है।
ब्रोशर नया है, सीटें नई हैं और फीस भी नई।
मुश्किल यह नहीं कि एआई पढ़ाई जा रही है। मुश्किल यह है कि कई जगह एआई सिर्फ एक चमकदार लेबल बन गया है। अच्छी लैब बनाना महंगा है। योग्य शिक्षक रखना महंगा है। रिसर्च कराना महंगा है। ब्रोशर बदलना सस्ता है। मुनाफे की दुनिया अक्सर आसान रास्ता चुनती है।
दूसरी तरफ मैकेनिकल, सिविल और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की सीटें खाली रह रही हैं। यह एक अजीब विरोधाभास है।
देश मैन्युफैक्चरिंग की बात करता है। बड़े-बड़े कारखानों की बात करता है। नई सड़कें, पुल, बिजली, सेमीकंडक्टर और ग्रीन एनर्जी की बातें होती हैं।
मगर युवाओं को एक ही दिशा में धकेला जा रहा है। सॉफ्टवेयर की तरफ।
कल को हमारे पास कोड लिखने वाले बहुत होंगे, लेकिन मशीन बनाने वाले कम। पुल बनाने वाले कम। बिजली और ऊर्जा व्यवस्था संभालने वाले कम।
इसे शिक्षा नीति नहीं, शैक्षिक सट्टेबाजी कहना ज्यादा ठीक होगा।
आईआईआईटी-बेंगलुरु के पूर्व निदेशक एस. सदागोपन की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति ने एक बेहद चिंताजनक तस्वीर पेश की।अनुमान यह था कि इंजीनियरिंग ग्रेजुएट्स में केवल करीब 17 प्रतिशत ही सीधे नौकरी के लिए तैयार माने जा सकते हैं।
जरा सोचिए। मां-बाप लाखों रुपये खर्च करते हैं। बच्चा चार साल पढ़ता है। डिग्री हाथ में आती है। फिर नौकरी का दरवाजा कहता है: अभी आप तैयार नहीं हैं।
समिति ने कंप्यूटर साइंस सीटों में कमी, एक जैसे कोर्सों पर रोक और एआई को अलग-अलग शाखाओं में शामिल करने की सिफारिश की।
बात बिल्कुल वाजिब है।
निजीकरण के समर्थकों ने कहा था कि इससे प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। गुणवत्ता सुधरेगी। दक्षता आएगी। लेकिन शिक्षा के एक बड़े हिस्से में हुआ कुछ और।
अगर एक कॉलेज मुनाफा कमा सकता है, तो दूसरा खोलो। अगर 60 सीटें बिकती हैं, तो 120 कर दो।कंप्यूटर साइंस चल रहा है, तो उसके पांच नए संस्करण निकाल दो। दाखिले कम हों, तो विज्ञापन बढ़ा दो।
मगर बड़ी तस्वीर से आंखें नहीं मूंदी जा सकतीं।
शिक्षा के विस्तार में राजनीतिक रसूख, ट्रस्ट, सोसायटी और कारोबारी हितों की भूमिका लगातार बढ़ती गई।हर सरकार ने कॉलेज खोलने को विकास का तमगा बना दिया। मगर किसी ने ठीक से नहीं पूछा: क्या हमें सचमुच एक और कॉलेज चाहिए?
उत्तर प्रदेश में 2026 में निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों में मांग और सीटों के बीच बड़ा असंतुलन दिखाई दे रहा है। AKTU की UPTAC काउंसलिंग के बाद करीब 74,000 बीटेक सीटें खाली रह गईं, जिनमें अधिकांश निजी कॉलेजों की हैं। लोकप्रिय CSE में भी 22,000 से अधिक सीटें खाली रहीं। छात्र नोएडा, गाजियाबाद और ग्रेटर नोएडा के प्रतिष्ठित कॉलेजों को तरजीह दे रहे हैं। कई निजी संस्थानों में JEE Main के बिना 12वीं के अंकों पर सीधे दाखिले की व्यवस्था करनी पड़ी। जरूरत से ज्यादा सीटें बढ़ने से कई कॉलेज आर्थिक दबाव और भविष्य के संकट से जूझ रहे हैं।
यही कहानी मेडिकल शिक्षा में भी दिखाई देती है। नए मेडिकल कॉलेजों की घोषणाएं बड़ी सुर्खियां बनती हैं। लेकिन मेडिकल कॉलेज केवल एक इमारत का नाम नहीं है।
उसे अनुभवी डॉक्टर चाहिए। शिक्षक चाहिए। लैब चाहिए। अस्पताल चाहिए। मरीज चाहिए। क्लीनिकल ट्रेनिंग चाहिए।
इनके बिना मेडिकल कॉलेज सिर्फ एक बड़ा भवन और चमकदार नामपट्ट बनकर रह सकता है।
होम्योपैथी और दूसरे प्रोफेशनल कोर्सों में भी कई संस्थान सीटें भरने के लिए जूझ रहे हैं। फिर भी नए संस्थान खोलने की होड़ खत्म नहीं होती।
यह कैसी तरक्की है?
जब पुरानी दुकान में ग्राहक नहीं हैं, तब नई दुकान क्यों खोली जा रही है?
हर साल नई इमारतें खड़ी करना बंद कीजिए। मौजूदा कॉलेजों को मजबूत बनाइए। खाली पड़े परिसरों का बेहतर इस्तेमाल कीजिए। उन्हें स्किलिंग और री-स्किलिंग सेंटर बनाइए। अच्छे शिक्षक लाइए। लैब सुधारिए। उद्योगों से सीधा रिश्ता जोड़िए।
और सबसे जरूरी बात; जितनी वास्तविक जरूरत है, उतनी ही सीटें रखिए। देश को 500 कमजोर इंजीनियरिंग कॉलेजों की जरूरत नहीं है। 100 अच्छे संस्थान शायद ज्यादा बेहतर काम कर सकते हैं।
खाली सीटें केवल दाखिले की समस्या नहीं हैं। वे व्यवस्था के खिलाफ छात्रों का खामोश फैसला हैं।
कई वर्षों से उच्च शिक्षा को समाज सेवा का लिबास पहनाकर एक बड़े कारोबार की तरह चलाया जा रहा है।
कॉलेज खोलने वालों को फायदा हुआ। राजनीतिक रसूख बढ़ा। इमारतें बनती गईं। सीटें बढ़ती गईं। मगर बेरोजगार डिग्रीधारियों की फौज भी बढ़ती गई।
समस्या निजी संस्थानों के होने की नहीं है। समस्या यह है कि शिक्षा को केवल मुनाफे की नजर से नहीं देखा जा सकता। कॉलेज इसलिए नहीं चलना चाहिए कि वह सीटें बेच सकता है। सरकार को तय करना होगा कि देश को किस तरह के पेशेवर चाहिए। कितने इंजीनियर चाहिए। कितने डॉक्टर चाहिए। किस इलाके में कॉलेज की जरूरत है।
सिर्फ वोट, जमीन और मुनाफे के लिए कॉलेज नहीं खुलने चाहिए।
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