पहले खुद का इलाज कीजिए, डॉक्टर साहब!
डॉक्टर्स डे पर चिकित्सा जगत के सामने खड़े नैतिक सवाल!!
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बृज खंडेलवाल द्वारा
30 जून 2026
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डॉक्टर को धरती पर भगवान का दूसरा रूप कहा जाता है। बीमार इंसान अपनी ज़िंदगी, अपना भरोसा और अपने परिवार की उम्मीदें डॉक्टर के हाथों में सौंप देता है। डॉक्टर्स डे पर हम उन लाखों चिकित्सकों को सलाम करते हैं जो ईमानदारी, रहमदिली और समर्पण के साथ दिन-रात लोगों की जान बचाते हैं। उनका पेशा सिर्फ़ रोज़गार नहीं, बल्कि इंसानियत की ख़िदमत है।
लेकिन हर बाग़ में कुछ सूखे पेड़ भी होते हैं। डॉक्टरों की दुनिया भी इससे अछूती नहीं रही। एक छोटा मगर बढ़ता हुआ तबका पूरे पेशे की साख पर दाग़ लगा रहा है। सेवा की जगह मुनाफ़ा, हमदर्दी की जगह कारोबार और मरीज़ की जगह ग्राहक दिखाई देने लगा है। सबसे बड़ी दवा भरोसा होता है। वही भरोसा अब दरकने लगा है।
इस बीमारी की शुरुआत मेडिकल कॉलेज के दरवाज़े से ही हो जाती है।
हर साल 22 लाख से ज़्यादा विद्यार्थी नीट परीक्षा देते हैं। लेकिन सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सीटें बहुत कम हैं। जिन छात्रों को सरकारी कॉलेज नहीं मिलते, उनके सामने निजी मेडिकल कॉलेजों की लाखों नहीं, करोड़ों रुपये तक की फीस खड़ी होती है। कई परिवार ज़मीन बेचते हैं, मकान गिरवी रखते हैं या जीवन भर की जमा-पूंजी खर्च कर देते हैं। हज़ारों छात्र मजबूरी में रूस, जॉर्जिया, कज़ाख़स्तान और फ़िलीपींस जैसे देशों का रुख़ करते हैं।
जब डॉक्टर बनने की कीमत ही करोड़ों में चुकानी पड़े, तो कुछ लोगों के मन में बाद में उस रकम की भरपाई करने का लालच पैदा होना कोई हैरानी की बात नहीं। यहीं से चिकित्सा सेवा धीरे-धीरे कारोबार में बदलने लगती है।
देश में मेडिकल कॉलेज और एमबीबीएस सीटें बढ़ी हैं। इसके बावजूद गाँवों और सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की भारी कमी बनी हुई है। बड़े शहरों में विशेषज्ञ डॉक्टर मिल जाते हैं, लेकिन दूर-दराज़ के इलाक़ों में लोग आज भी बुनियादी इलाज के लिए भटकते हैं। कई योग्य डॉक्टर बेहतर वेतन और सुविधाओं के लिए विदेश चले जाते हैं।
सबसे बड़ी कीमत मरीज़ चुकाता है।
मेडिकल लापरवाही के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। ग़लत इलाज, बीमारी की देर से पहचान, ऑपरेशन में चूक और निगरानी की कमी जैसी घटनाएँ आए दिन सामने आती हैं। हर ऐसी घटना के पीछे किसी परिवार का टूटा हुआ सपना, किसी माँ की सूनी गोद या किसी बच्चे का उजड़ा भविष्य छिपा होता है। अधिकांश डॉक्टर ईमानदार हैं, लेकिन कुछ लोगों की लापरवाही पूरे पेशे की साख पर सवाल खड़े कर देती है।
कई निजी नर्सिंग होम भी सवालों के घेरे में हैं। कहीं बेवजह महँगे टेस्ट लिखे जाते हैं, कहीं अनावश्यक ऑपरेशन की सलाह दी जाती है, तो कहीं अस्पताल का बिल बीमारी से भी बड़ा हो जाता है। बीमारी किसी परिवार की मजबूरी होती है, कमाई का मौक़ा नहीं।
एक और गंभीर बीमारी है कमीशन का खेल।
कुछ पैथोलॉजी लैब डॉक्टरों को जाँच लिखने पर कमीशन देती हैं। कुछ दवा कंपनियाँ महँगी ब्रांडेड दवाइयाँ लिखवाने के लिए तरह-तरह के लालच देती हैं। इसका बोझ आख़िरकार मरीज़ की जेब पर पड़ता है। इलाज महँगा होता जाता है और भरोसा सस्ता।
फिर आता है आईसीयू का सबसे दर्दनाक सच।
कई बार ऐसे मरीज़ों को भी लंबे समय तक आईसीयू में रखा जाता है जिनके बचने की उम्मीद लगभग समाप्त हो चुकी होती है। परिवार चमत्कार की आस में घर, ज़मीन और गहने तक बेच देता है। लेकिन अस्पताल का बिल बढ़ता ही जाता है। ऐसे कठिन फ़ैसलों में इंसानियत सबसे आगे होनी चाहिए, मुनाफ़ा नहीं।
इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि पूरा चिकित्सा जगत दोषी है। सच तो यह है कि देश के लाखों डॉक्टर आज भी पूरी निष्ठा और ईमानदारी से सेवा कर रहे हैं। सरकारी अस्पतालों की भीड़ हो या दूर-दराज़ का गाँव, वे सीमित संसाधनों में भी लोगों की जान बचाने में जुटे रहते हैं। यही डॉक्टर इस पेशे का असली चेहरा हैं।
लेकिन कुछ लोगों की ग़लतियों पर पर्दा डालना भी उचित नहीं। समय आ गया है कि चिकित्सा जगत आत्ममंथन करे। अस्पतालों की फ़ीस पारदर्शी हो, मेडिकल लापरवाही पर सख़्त कार्रवाई हो, अनैतिक कमीशन पर पूरी तरह रोक लगे और मेडिकल शिक्षा में नैतिक मूल्यों को उतनी ही अहमियत दी जाए जितनी आधुनिक तकनीक को।
मरीज़ों को भी अपने अधिकारों की जानकारी होनी चाहिए। इलाज का पूरा ब्यौरा साफ़-साफ़ बताया जाए। हर जाँच और हर ख़र्च का कारण समझाया जाए। भरोसा छिपाने से नहीं, पारदर्शिता से पैदा होता है।
इस डॉक्टर्स डे पर हम उन सभी चिकित्सकों को दिल से सलाम करते हैं जो चिकित्सा को सेवा मानते हैं, सौदा नहीं।
सफ़ेद कोट केवल सम्मान का प्रतीक नहीं, ज़िम्मेदारी का भी प्रतीक है।
अस्पताल मंदिर बने रहें, बाज़ार नहीं।
हिप्पोक्रेटिक शपथ का पहला संदेश है: इंसानियत की सेवा। शायद इस डॉक्टर्स डे की सबसे ज़रूरी दवा भी यही है; दूसरों का इलाज करने से पहले, चिकित्सा व्यवस्था को अपना इलाज ख़ुद करना होगा।
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