Friday, June 5, 2026

 


भगवा लहर या सभ्यतागत बदलाव?

असम और बंगाल की जीत ने बदल दी भारतीय राजनीति की दिशा

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

6 जून 2026

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इतिहास हर रोज़ नहीं बदलता। कभी-कभी एक चुनाव ऐसा मोड़ लेकर आता है जो आने वाले दशकों की दिशा तय कर देता है। 2026 के विधानसभा चुनावों में असम और पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की बड़ी जीत को उसके समर्थक ऐसे ही एक मोड़ के रूप में देख रहे हैं।

उनका मानना है कि यह सिर्फ सरकार बदलने की कहानी नहीं है। यह उस लंबे राजनीतिक और सांस्कृतिक सफर का नया पड़ाव है जो सदियों पहले शुरू हुआ था।

भारत ने लगभग आठ सौ वर्षों तक पहले मुस्लिम सल्तनतों और बाद में ब्रिटिश हुकूमत का दौर देखा। आज़ादी के बाद सत्ता भारतीय हाथों में आई, लेकिन राजनीति का केंद्र लंबे समय तक कांग्रेस के इर्द-गिर्द रहा। भाजपा और उसके समर्थकों का आरोप रहा है कि समय के साथ धर्मनिरपेक्षता का मतलब संतुलन नहीं, बल्कि अल्पसंख्यक तुष्टीकरण बन गया। उनका कहना है कि बहुसंख्यक समाज की सांस्कृतिक पहचान को अक्सर संकोच और अपराधबोध के साथ देखने की कोशिश की गई।

असम और बंगाल के नतीजे इस सोच के खिलाफ जनता के फैसले के रूप में पेश किए जा रहे हैं।

पश्चिम बंगाल में भाजपा ने अभूतपूर्व प्रदर्शन करते हुए दो सौ से अधिक सीटें जीत लीं। एक दशक पहले तक राज्य में उसकी मौजूदगी लगभग नगण्य थी। दूसरी ओर, ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस, जो वर्षों से बंगाल की राजनीति पर छाई हुई थी, बुरी तरह सिमट गई।

असम में भी भाजपा ने लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल की। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा के नेतृत्व में पार्टी ने अपना जनाधार और मजबूत किया। यह जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि असम में पहचान, घुसपैठ और स्थानीय संस्कृति जैसे मुद्दे लंबे समय से राजनीतिक बहस के केंद्र में रहे हैं।

इन चुनाव परिणामों ने 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद उभरी उस धारणा को भी कमजोर किया है जिसमें कहा जा रहा था कि भाजपा का प्रभाव घट रहा है। भले ही पार्टी को लोकसभा में पहले से कम सीटें मिली थीं, लेकिन उसके बाद हुए कई राज्यों के चुनावों ने दिखाया कि उसका संगठन और जनाधार अब भी मजबूत है।

भाजपा की सफलता के पीछे केवल सांस्कृतिक मुद्दे ही नहीं हैं। पार्टी ने पिछले वर्षों में गरीबों के लिए आवास, गैस कनेक्शन, शौचालय, स्वास्थ्य बीमा और बुनियादी सुविधाओं की योजनाओं को भी बड़े पैमाने पर आगे बढ़ाया। समर्थकों का तर्क है कि सांस्कृतिक आत्मविश्वास और विकास की राजनीति का यह मेल भाजपा की सबसे बड़ी ताकत बन गया है।

वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी ने बंगाल के परिणाम को "वैचारिक भूकंप" बताया है। उनके अनुसार यह चुनाव दिखाता है कि हिंदू पहचान और सनातन परंपराओं को अब राजनीतिक विमर्श के केंद्र से बाहर नहीं रखा जा सकता। उनका कहना है कि केवल भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही इस विचारधारा का विश्वसनीय प्रतिनिधित्व करते हैं।

हालांकि आलोचक इस दावे से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि लोकतंत्र में किसी भी एक विचारधारा का वर्चस्व स्वस्थ नहीं माना जा सकता। लेकिन यह भी सच है कि आज भारतीय राजनीति में सांस्कृतिक पहचान का सवाल पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।

दक्षिण भारत में भी राजनीतिक बदलाव के संकेत दिखाई दे रहे हैं। तमिलनाडु में द्रविड़ राजनीति को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जबकि केरल में भी पारंपरिक राजनीतिक समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं। भले ही भाजपा अभी वहां सत्ता से दूर हो, लेकिन उसकी मौजूदगी पहले की तुलना में कहीं अधिक दिखाई देने लगी है।

भारत की राजनीति अब पहले जैसी नहीं रही। जाति, वर्ग और क्षेत्रीय समीकरणों के साथ-साथ धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान भी चुनावी फैसलों को प्रभावित कर रही है। यही वजह है कि भाजपा का संदेश देश के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग रूपों में असर डाल रहा है।

बंगाल की जीत का असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ सकता है। यह राज्य लंबे समय से विपक्ष का एक बड़ा गढ़ माना जाता था। यदि भाजपा वहां स्थायी रूप से अपनी जड़ें जमा लेती है, तो विपक्षी गठबंधनों की रणनीति पर गहरा असर पड़ सकता है।

लेकिन इतना तय है कि असम और बंगाल के चुनावों ने एक नया संदेश दिया है। भारत का एक बड़ा वर्ग अब अपनी सांस्कृतिक पहचान को खुलकर राजनीतिक अभिव्यक्ति देने लगा है। भाजपा के समर्थक इसे सभ्यतागत पुनर्जागरण कहते हैं, जबकि आलोचक इसे राजनीतिक ध्रुवीकरण का परिणाम मानते हैं।

सच जो भी हो, भारतीय राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है। और फिलहाल ऐसा लगता है कि भगवा राजनीति केवल चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि एक लंबी वैचारिक यात्रा का हिस्सा बन चुकी है

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