10 जून 2026
बैडमिंटन लंदन में
जब माई लार्ड बैडमिंटन खेलने विलायत गए!!!
बृज खंडेलवाल द्वारा
भारत की न्याय व्यवस्था का पेंडिंग, लंबित मामलों का पहाड़ किसी अजूबे से कम नहीं। पांच करोड़ से अधिक मुकदमे अदालतों की अलमारियों और कंप्यूटरों में धूल फांक रहे हैं।
विचाराधीन कैदी अपनी संभावित सजा से भी ज्यादा समय जेलों में काट देते हैं। किसान, मजदूर, पीड़ित महिलाएं और आम नागरिक एक तारीख से दूसरी तारीख तक भटकते रहते हैं। कई मामलों में न्याय तब मिलता है, जब पीड़ित के बाल सफेद हो चुके होते हैं और अगली पीढ़ी जवान हो जाती है।
लेकिन इस विशाल बोझ तले दबे देश के मुख्य न्यायाधीश लंदन में हैं। बैडमिंटन कोर्ट पर। रैकेट हाथ में, शटलकॉक हवा में, पांच लाख रुपये की पुरस्कार राशि दांव पर, और पूरा आयोजन पूरे शबाब पर।
वही न्यायपालिका, जिसने कभी बेरोजगार युवाओं को "कॉकरोच" कहकर संबोधित किया था, अब न्याय की हथौड़ी छोड़ रैकेट थामे हुए है। अदालतों की फाइलें धूल खाती रहें, लेकिन स्मैश शानदार होने चाहिए।
दृश्य वाकई मनमोहक है। चतुर गुणी जन कहते हैं हमारी महान न्यायपालिका पूरी तरह स्वतंत्र दिखाई देती है: जवाबदेही से, तात्कालिकता से, और कभी-कभी तो भारतीय धरती से भी। लगभग डेढ़ सौ न्यायाधीश और वरिष्ठ वकील लंदन पहुंच गए। किसी न्यायिक सुधार सम्मेलन के लिए नहीं। लंबित मामलों के एवरेस्ट जैसे संकट पर मंथन करने के लिए नहीं। बल्कि शटलकॉक कूटनीति के लिए।
और कानून मंत्री किरेन रिजिजू? उनका काम न्याय व्यवस्था की चरमराती मशीनरी को दुरुस्त करना है। मगर वे भी इस खेल महोत्सव का हिस्सा बने। लंदन पहुंचे, टूर्नामेंट का उद्घाटन किया, और शामें भारत को "विश्वगुरु" बनाने की चर्चाओं में बिताईं। रैलियों, स्वागत समारोहों और सौहार्दपूर्ण मुलाकातों के बीच भविष्य के भारत का खाका भी खींचा गया।
ज़रा कल्पना कीजिए। दिन में बैडमिंटन, रात में नेटवर्किंग। कार्यपालिका और न्यायपालिका विदेशी धरती पर इतने आत्मीय भाव से साथ दिख रही हैं कि शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत भी शायद दर्शक दीर्घा में बैठकर असहज महसूस कर रहा हो।
न्याय भले ही आंखों पर पट्टी बांधता हो, लेकिन वह फिटनेस के मामले में पूरी तरह सजग दिखाई देता है। चुस्त, फुर्तीला और पांच करोड़ लंबित मामलों की मूक पुकारों को अनसुना करने की अद्भुत क्षमता से लैस।
इस भव्य रंगमंच में असली विजेता कौन हैं? शटलकॉक।
और पराजित? वे करोड़ों भारतीय जो अब भी यह भोली उम्मीद लगाए बैठे हैं कि अदालतों में न्याय सिर्फ मिलेगा ही नहीं, समय पर भी मिलेगा।
खेल खत्म। सेट पूरा। और जीत एक बार फिर बैकलॉग के नाम।
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