Thursday, June 18, 2026

 युद्ध तो खत्म, लेकिन पर्यावरण और मानसूनी बारिश गड़बड़ाने का हिसाब कौन चुकाएगा?

जब बम बरसते हैं, तब जलवायु लहूलुहान होती है: युद्ध को पर्यावरण पर हमला माना जाए

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

20 जून 2026

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उनके लिए युद्ध एक खेल था। वो आए, धमाकेदार आतिशबाजी की, बम, मिसाइल, ड्रोन खूब चले, हजारों मरे, रिहाइशें तबाह हुईं, हवा जहरीली हुई, तापमान बढ़ा, समुद्र खौला, जंगल नष्ट हुए। वो तो गए। मानसून की चाल बिगड़ गई। अब भुगतो।

मानसून भारत की धड़कन है। यही हमारे खेतों को सींचता है, नदियों को भरता है, भूजल को पुनर्जीवित करता है और करोड़ों लोगों की रोज़ी-रोटी का आधार बनता है। लेकिन अब यह धड़कन कुछ बेताल-सी लगने लगी है।

मार्च 2026 में उत्तर भारत ने सामान्य से अधिक पश्चिमी विक्षोभ झेले। आमतौर पर मार्च में पाँच से छह पश्चिमी विक्षोभ आते हैं, लेकिन इस बार उनकी संख्या लगभग आठ रही। बेमौसम बारिश हुई। ओलों ने फसलों को पीटा। तापमान ऊपर-नीचे होता रहा। गर्मी की दस्तक बार-बार टलती रही।

अप्रैल, मई और जून के शुरुआती दिनों में भी यह सिलसिला जारी रहा।

मौसम वैज्ञानिक सावधानी बरतते हुए कहते हैं कि किसी एक मौसमीय घटना को सीधे जलवायु परिवर्तन से जोड़ना उचित नहीं होगा। लेकिन वे इस बात पर सहमत हैं कि मानव गतिविधियाँ वायुमंडल के संतुलन को बदल रही हैं। सदियों से चले आ रहे मौसम चक्र अस्थिर हो रहे हैं। चरम मौसमी घटनाएँ बढ़ रही हैं।

सवाल सीधा है। प्रकृति आखिर कितना बोझ और झेले?

दशकों से पर्यावरणविद् जीवाश्म ईंधन, वनों की कटाई और औद्योगिक प्रदूषण के खतरों की चेतावनी देते रहे हैं। लेकिन एक बड़ा प्रदूषक अक्सर हमारी नज़रों से ओझल रहता है: युद्ध।

हर मिसाइल, हर लड़ाकू विमान, हर टैंक और हर ध्वस्त शहर अपने पीछे एक विशाल कार्बन पदचिह्न छोड़ता है। सैन्य अभियान बेहिसाब ईंधन निगलते हैं। विस्फोट जहरीले रसायन छोड़ते हैं। जलती इमारतें और तबाह होता बुनियादी ढाँचा वातावरण में कालिख और ग्रीनहाउस गैसें छोड़ता है। पुनर्निर्माण के लिए सीमेंट, इस्पात और ऊर्जा की भारी खपत होती है।

युद्ध सिर्फ इंसानों को नहीं मारता। वह नदियों को ज़हरीला करता है, जंगलों को उजाड़ता है, मिट्टी को दूषित करता है और जलवायु को अस्थिर बनाता है।

संघर्षों की पर्यावरणीय कीमत सीमाओं में कैद नहीं रहती। धुएँ को पासपोर्ट की ज़रूरत नहीं होती। कार्बन उत्सर्जन वीज़ा लेकर नहीं चलता। प्रदूषण हवाओं के साथ महाद्वीपों को पार कर जाता है।

यह कहना वैज्ञानिक रूप से गलत होगा कि किसी एक युद्ध या सैन्य कार्रवाई ने सीधे भारत के मानसून को प्रभावित किया है। ऐसा कोई ठोस प्रमाण अभी उपलब्ध नहीं है। लेकिन यह भी उतना ही गैर-जिम्मेदाराना होगा कि हम युद्धों के जलवायु पर पड़ने वाले संचयी प्रभावों को नज़रअंदाज़ कर दें।

जलवायु परिवर्तन किसी एक देश, एक सेना या एक युद्ध का नतीजा नहीं है। यह मानव गतिविधियों के लंबे सिलसिले का परिणाम है, जिसमें युद्ध की मशीनरी भी शामिल है।

हैरानी की बात यह है कि सैन्य उत्सर्जन आज भी वैश्विक जलवायु विमर्श के सबसे कम चर्चित मुद्दों में से एक है।

जब उद्योगों को अपने कार्बन उत्सर्जन का हिसाब देना पड़ता है, तो युद्धों की पर्यावरणीय लागत का पूरा ब्योरा क्यों नहीं लिया जाता? जलवायु सम्मेलन कार्बन बजट की बात करते हैं, लेकिन युद्ध बिना किसी जवाबदेही के उसे राख में क्यों बदल देते हैं?

दुनिया को अब एक नए सिद्धांत की ज़रूरत है: युद्धकालीन पर्यावरणीय जवाबदेही।

सैन्य उत्सर्जन का आकलन हो। उनका स्वतंत्र सत्यापन हो। युद्धों में नष्ट होने वाले पारिस्थितिक तंत्रों को मानवता की साझा धरोहर माना जाए। संघर्षों से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान को जलवायु न्याय के वैश्विक एजेंडे में शामिल किया जाए।

शांति केवल राजनीतिक आवश्यकता नहीं है, यह पारिस्थितिक अनिवार्यता भी है।

भारतीय मानसून समुद्र, पर्वत, हवाओं और तापमान के नाज़ुक संतुलन पर टिका है। बढ़ते पश्चिमी विक्षोभ, गर्म होते महासागर और बदलती जेट स्ट्रीम हमें चेतावनी दे रहे हैं कि यह संतुलन बेहद नाज़ुक है।

जब हम एक-दूसरे के खिलाफ युद्ध छेड़ते हैं, तब हम धरती के खिलाफ भी युद्ध छेड़ते हैं।

और वायुमंडल हर वार का हिसाब रखता है।

अगर हमें अपने मानसून, अपने किसानों और अपने भविष्य को बचाना है, तो हमें सुरक्षा की परिभाषा बदलनी होगी। राष्ट्रीय सुरक्षा को पर्यावरणीय सुरक्षा से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

युद्धग्रस्त दुनिया स्थिर जलवायु नहीं बना सकती।

इक्कीसवीं सदी का अगला बड़ा शांति आंदोलन, एक हरित आंदोलन भी होना चाहिए।

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