Friday, May 29, 2026

 ये रस्साकशी कब तक?

तीन भाषा फार्मूला: स्कूल की घंटी से क्यों कांप उठता है भारत?

अब सुप्रीम कोर्ट को करना है फैसला।

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बृज खंडेलवाल द्वारा 

30 मई 2026

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भारत में भाषा केवल बोली नहीं जाती। भाषा यहां छाती ठोककर चलती है। झंडा बन जाती है। राजनीति बन जाती है। और कभी-कभी बारूद भी।

एक मामूली सा स्कूल सर्कुलर फिर तूफान ले आया है।

सीबीएसई ने कहा है कि जुलाई 2026 से कक्षा 9 के बच्चों को तीन भाषाएं पढ़नी होंगी। दो भारतीय भाषाएं जरूरी होंगी। सुनने में बात सीधी लगती है। लेकिन भारत में भाषा का मामला कभी सीधा नहीं होता। यहां तो खीर में भी राजनीति ढूंढ ली जाती है।

बस फिर क्या था। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। अभिभावक परेशान। बच्चे हक्के-बक्के। शिक्षक माथा पकड़कर बैठे हैं। लोग पूछ रहे हैं : गांव के स्कूल में गणित का मास्टर नहीं मिलता, अब तमिल और कन्नड़ कौन पढ़ाएगा? बच्चे बोर्ड परीक्षा की तैयारी करें या भाषा प्रयोगशाला खोलें?

भारत में भाषा की आग नई नहीं है। यह चिंगारी आजादी के साथ ही पैदा हो गई थी। संविधान सभा में सवाल उठा :  देश आखिर बोलेगा क्या?

हिंदी समर्थक चाहते थे कि अंग्रेजी का बोरिया-बिस्तर बांध दिया जाए। दक्षिण भारत डर गया। उन्हें लगा दिल्ली धीरे-धीरे हिंदी का बुलडोजर चला देगी।

आखिर समझौता हुआ। हिंदी राजभाषा बनी। अंग्रेजी को 15 साल की मोहलत मिली। लेकिन, भारत में असली लड़ाई मोहलत खत्म होने पर ही शुरू होती है।

1965 आया।

तमिलनाडु सुलग उठा। छात्र सड़क पर उतर आए। रेल रोकी गईं। नारे गूंजे।आग लगी। लाठियां चलीं। लाशें गिरीं।

दक्षिण भारत को लगा कि हिंदी अब सिर पर बैठाई जा रही है। आंदोलन ऐसा उठा कि कांग्रेस तमिलनाडु में बह गई। द्रविड़ राजनीति का सूरज वहीं से निकला। दिल्ली को पीछे हटना पड़ा। अंग्रेजी बच गई। हिंदी रुक गई। लेकिन शक का कांटा दिल में धंसा रह गया।

इधर, उत्तर भारत की यूनिवर्सिटीज में सोशलिस्टों ने अंग्रेजी हटाओ आंदोलन को आगे बढ़ाया, स्ट्राइक, प्रदर्शन, बोर्ड पुताई, उपद्रव!

इसी तूफान से निकला “तीन भाषा फार्मूला”।

सोच बड़ी सुंदर थी। एक भारत, श्रेष्ठ भारत। हर बच्चा तीन भाषाएं सीखे।मातृभाषा भी। हिंदी भी। अंग्रेजी भी।

सपना ऐसा कि काशी वाला बच्चा तमिल कविता समझे और चेन्नई वाला बच्चा कबीर पढ़े। भाषा दिलों को जोड़े। देश को गोंद की तरह चिपका दे।

लेकिन भारत में नीति और जमीन का रिश्ता अक्सर सास-बहू जैसा रहता है।

कागज पर फार्मूला चमकता रहा।जमीन पर लड़खड़ाता रहा।

तमिलनाडु ने साफ कह दिया :  हमें नहीं चाहिए तीन भाषा फार्मूला। वहां आज भी तमिल और अंग्रेजी की दो भाषा नीति चलती है। दूसरी तरफ हिंदी पट्टी के कई राज्यों ने भी चालाकी दिखाई। दक्षिण भारतीय भाषाएं पढ़ाने की जगह संस्कृत डाल दी। सांप भी मर गया, लाठी भी नहीं टूटी।

यही बात दक्षिण भारत को चुभती है।

एक तमिल बच्चा हिंदी सीखे।

लेकिन उत्तर भारत का बच्चा तमिल क्यों नहीं सीखता?

यही सवाल आज भी राजनीति की हांडी में उबलता रहता है।

भाषा का मामला यहां सीधा कभी नहीं रहा। इसके पीछे सत्ता छिपी रहती है। नौकरी छिपी रहती है।पहचान छिपी रहती है।

नई शिक्षा नीति कहती है कि बहुभाषी बच्चे ज्यादा रचनात्मक होते हैं। कई भाषाएं सीखने से सोचने की क्षमता बढ़ती है। बात गलत भी नहीं है। यूरोप में लोग तीन-चार भाषाएं आराम से बोल लेते हैं।

लेकिन भारत यूरोप नहीं है। यहां गांव के स्कूल में ब्लैकबोर्ड टूटा पड़ा है। कहीं पंखा नहीं। कहीं शिक्षक नहीं।कहीं बच्चे फर्श पर बैठते हैं।

ऐसे में लोग पूछते हैं :  पहले स्कूल तो संभाल लो, फिर भाषाई महल बनाना।

और सबसे बड़ा व्यंग्य देखिए।

नेता मंच से भारतीय भाषाओं का गुणगान करते हैं। लेकिन अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूल में भेजते हैं। घर में हिंदी। भाषण में संस्कृत। और करियर के लिए अंग्रेजी।

यानी मुंह में राम, बगल में अंग्रेजी कॉन्वेंट।

सच्चाई यह है कि भारत में अंग्रेजी आज भी नौकरी का पासपोर्ट है। आईटी कंपनी से लेकर अदालत तक, मेडिकल कॉलेज से लेकर कॉरपोरेट दफ्तर तक, अंग्रेजी का सिक्का चलता है। गरीब आदमी भी जानता है कि टूटी-फूटी अंग्रेजी कई बार अच्छी हिंदी से ज्यादा कमाई करा देती है।

यहीं भाषा राजनीति का असली दर्द छिपा है।

दक्षिण भारत को डर है कि भाषा के नाम पर धीरे-धीरे केंद्रीकरण बढ़ेगा। उत्तर भारत को लगता है कि हिंदी राष्ट्रीय पहचान की डोर है। अंग्रेजी चुपचाप दोनों के सिर पर बैठी मुस्कुरा रही है।

भारत का नक्शा भी भाषा ने बदला है। आंध्र प्रदेश भाषा आंदोलन से बना। महाराष्ट्र और गुजरात भाषाई मांगों से निकले।

भाषा ने सरकारें गिराईं। नेता पैदा किए। और कई बार देश को बांटने की धमकी भी दी।

इसलिए भारत में भाषा केवल विषय नहीं है। यह भावनाओं का ज्वालामुखी है।

अब सुप्रीम कोर्ट फैसला करेगा।

लेकिन अदालत कानून समझा सकती है, दिल नहीं बदल सकती।

तीन भाषा फार्मूला आज भी रस्सी पर चलने जैसा है।

हर सरकार संतुलन बनाती है। हर राज्य शक की नजर से देखता है। हर अभिभावक डरता है कि कहीं प्रयोग का बोझ उसके बच्चे पर न टूट पड़े।

भारत की भाषाएं उसकी सबसे बड़ी ताकत हैं। लेकिन यही उसकी सबसे बड़ी सिरदर्दी भी हैं।

यहां भाषा केवल पढ़ाई नहीं जाती।उसकी पहरेदारी होती है। उसके सहारे राजनीति होती है। 1956 में भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन करना सबसे बड़ी गलती थी। 

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