कब तक 80 प्रतिशत आबादी खुद को कमजोर समझती रहेगी? कब तक बहुसंख्यक होकर भी राजनीतिक रूप से बिखरे रहेंगे? क्या सच में यह देश अपने ही मूल समाज से कटता जा रहा था? और सबसे बड़ा सवाल; क्या ‘सेक्युलरिज्म’ के नाम पर एक खामोश अन्याय चल रहा था? दशकों तक यह सवाल हवा में तैरते रहे, लेकिन जवाब किसी ने नहीं दिया। फिर अचानक कुछ बदल गया। एक खामोशी टूटी। एक गुस्सा फूटा। और जो समाज सदियों से सहनशीलता का प्रतीक था, वही अब सवाल पूछने लगा। क्या यह सिर्फ राजनीति का बदलाव है, या एक सोया हुआ शेर सच में जाग उठा है?
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हिंदू बहुमत: वो सोए हुए शेर जो जाग उठे
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बृज खंडेलवाल द्वारा
5 मई, 2026
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2014 से पहले, भारत में हिंदू बहुसंख्यक एक बेहद अजीब और विरोधाभासी स्थिति में थे। करीब 80 प्रतिशत आबादी होने के बावजूद, यह समाज राजनीतिक रूप से बंटा हुआ, वैचारिक रूप से कमजोर और अपनी सामूहिक ताकत को लेकर उदासीन था।
उस दौर में समाजवादी और कम्युनिस्ट विचारधारा के नेताओं ने ‘सेक्युलरिज्म’ को एक चादर की तरह ओढ़ रखा था। मगर इसके नीचे सच्चाई कुछ और थी। हिंदू समाज को जातियों और क्षेत्रों में उलझाए रखना ही उनकी राजनीति का मूल था।
कांग्रेस और परिवारवादी पार्टियों ने इस बिखराव को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया। उनका गणित सीधा था; अल्पसंख्यकों और चुनिंदा जातियों का गठजोड़ बनाओ, सत्ता पाओ। यह खेल दशकों तक चला। मगर हर खेल की एक सीमा होती है।
धीरे-धीरे यह ‘तुष्टीकरण’ एक चुभन बन गया। एक ऐसा जख्म, जो दिखता नहीं था, मगर दर्द देता था। यही दर्द आगे चलकर विस्फोट बना।
आज़ादी के बाद भारत ने खुद को आधुनिक राष्ट्र बनाने की कोशिश की। 1950 के दशक में जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने हिंदू कोड बिल लागू किया। यह सुधार जरूरी था। इससे महिलाओं को अधिकार मिले, समाज में बदलाव आया।
लेकिन सवाल यहीं खड़ा होता है, क्या यही साहस मुस्लिम पर्सनल लॉ में दिखाया गया? जवाब साफ है; नहीं।
यहां से एक असमानता शुरू हुई। सरकार हिंदुओं के लिए सुधारक बनी, और अल्पसंख्यकों के लिए रक्षक।
संविधान का अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यकों को अपने शिक्षण संस्थान चलाने की आजादी देता है। मगर बहुसंख्यकों को यह अधिकार नहीं मिला।
फिर आया 1991 का पूजा स्थल कानून। इसने 1947 की स्थिति को स्थिर कर दिया। काशी और मथुरा जैसे विवादों के रास्ते कानूनी तौर पर बंद हो गए।
दूसरी ओर, हिंदू मंदिर सरकारी नियंत्रण में आ गए। तिरुपति जैसे मंदिरों की आय सरकार के अधीन हो गई।
यह एक विचित्र स्थिति थी। दुनिया में शायद ही कोई ऐसा देश होगा जहां बहुसंख्यकों के धार्मिक संस्थानों पर सरकार का नियंत्रण हो, और अल्पसंख्यकों के संस्थान पूरी तरह स्वतंत्र हों।
अगर इस पूरी कहानी का ‘टर्निंग पॉइंट’ तलाशना हो, तो वह 1985 का शाहबानो केस था।
एक 62 वर्षीय महिला, जिसे उसके पति ने तीन तलाक देकर छोड़ दिया। सुप्रीम कोर्ट ने उसके पक्ष में फैसला दिया। उसे गुजारा भत्ता मिलना चाहिए।
मगर तब के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने बहुमत होने के बावजूद पीछे कदम खींच लिया। उन्होंने संसद में नया कानून बनाकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट दिया।
यह सिर्फ एक फैसला नहीं था। यह एक संदेश था। यह संदेश साफ था; राजनीति न्याय से बड़ी है।
यहीं से लोगों को समझ आया कि ‘सेक्युलरिज्म’ का अर्थ बराबरी नहीं, बल्कि झुकाव है। यही वह क्षण था जब हिंदू समाज को अपनी राजनीतिक कमजोरी का अहसास हुआ।
1990 में V. P. सिंह ने मंडल आयोग लागू किया। उद्देश्य था पिछड़ों को आरक्षण देना। मगर इसके पीछे राजनीति का गहरा खेल था। यह उस हिंदू एकता को तोड़ने की कोशिश थी जो राम मंदिर आंदोलन से बन रही थी।
देश में उबाल आया। विरोध प्रदर्शन हुए। युवाओं ने आत्मदाह तक किया।
इसके जवाब में लाल कृष्ण आडवाणी ने रथ यात्रा निकाली। सोमनाथ से अयोध्या तक की यह यात्रा सिर्फ एक यात्रा नहीं थी। यह एक प्रतीक थी।
इसने जातियों में बंटे हिंदुओं को एक सूत्र में बांधना शुरू किया।
यहीं से ‘हिंदू वोट’ की अवधारणा जन्मी। जिसे पहले असंभव माना जाता था।
UPA सरकार के समय तुष्टीकरण एक नीति बन गया। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट आई। उसने मुसलमानों की आर्थिक स्थिति को उजागर किया। मगर इसका इस्तेमाल समाधान के लिए नहीं, बल्कि राजनीति के लिए हुआ।
मनमोहन सिंह का बयान: “देश के संसाधनों पर अल्पसंख्यकों का पहला हक है”, एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया।
इसके साथ ही ‘भगवा आतंकवाद’ का नैरेटिव गढ़ा गया। हिंदू संगठनों को आतंकी गतिविधियों से जोड़ने की कोशिश हुई।
बाद में अदालतों में ये दावे कमजोर साबित हुए।
लेकिन तब तक एक धारणा बन चुकी थी, सरकार बहुसंख्यकों के साथ खड़ी नहीं है।
2014 में जो हुआ, वह अचानक नहीं था। यह दशकों की नाराजगी का परिणाम था।
यह किसी एक पार्टी की रणनीति नहीं थी। यह समाज के भीतर पनप रही भावना थी।
हिंदू समाज अब खुद को सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि शक्ति के रूप में देखने लगा।
2026 के पश्चिम बंगाल चुनाव इसका ताजा उदाहरण हैं। जो राज्य कभी वामपंथी और बौद्धिक राजनीति का गढ़ था, वहां भी यह बदलाव दिख रहा है।
यह बदलाव सिर्फ वोट का नहीं है। यह सोच का है।
जो लोग यह मानकर बैठे थे कि बहुसंख्यक समाज हमेशा बंटा रहेगा, उनकी गणना अब गलत साबित हो रही है।
सोए हुए शेर अब जाग चुके हैं।
और जब शेर जागता है, तो जंगल का संतुलन बदलता है।
आज का हिंदू समाज सवाल पूछ रहा है। जवाब मांग रहा है।
वह अब सिर्फ सहनशील नहीं, सजग भी है।
राजनीति अब बदल रही है। वोट बैंक का गणित कमजोर पड़ रहा है।
उसकी जगह एक नई सोच उभर रही है, राष्ट्रवाद की। भारत और भारतीयता की। तमिल राजनीति भी इस से प्रभावित हो रही है।
यह बदलाव स्थायी होगा या अस्थायी, यह भविष्य बताएगा।
लेकिन इतना तय है; अब बहुसंख्यक समाज को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। शेर की दहाड़ गूंज चुकी है। अब सन्नाटा पहले जैसा नहीं रहेगा।
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