Wednesday, May 6, 2026

 न पत्थर का बनेगा, न रबड़ का बनेगा;

वायदों से बना है, हवाई बांध बनेगा

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शिलान्यास पर शिलान्यास, बैराज अब भी लापता !!

ताज के साए में यमुना सूखती रही, फाइलें चलती रहीं, वादे हर बार हुए, लेकिन काम हर बार अटक गया।

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बृज खंडेलवाल द्वारा

7 मई, 2026

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एक बैराज  बनाने के लिए कितने शिलान्यास पत्थर चाहिए?

और कोई दरिया  कितनी देर तक इंतज़ार कर सकता है, इससे पहले कि वह बहना ही भूल जाए?

आगरा में इन सवालों के जवाब गर्मियों की धूल की तरह हवा में तैर रहे हैं। तीन शिलान्यास। बरसों की घोषणाएँ। अनगिनत भरोसे। लेकिन ताजमहल के नीचे यमुना पर अब तक एक भी चालू बैराज नहीं।

नदी आज भी लाचार-सी बह रही है। ताज आज भी खामोश तमाशबीन बना खड़ा है। और वादों और हकीकत के बीच की खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है।

बरसों से यमुना बैराज परियोजना  एक अजीब दोहरी ज़िंदगी जी रही है। कागज़ों में यह फाइलों, प्रस्तावों और सियासी भाषणों में ज़िंदा है। ज़मीन पर इसका कहीं कोई वजूद  नहीं है।

यह उस ट्रेन की तरह है जिसकी अनाउंसमेंट  तो बार-बार होती है, मगर जो कभी प्लेटफॉर्म पर पहुँचती ही नहीं।

यह सिर्फ देरी नहीं है। यह ढीलापन है। सुस्त रफ्तार, जिद्दी ठहराव, और हैरत की बात यह कि सब इसे सामान्य मान बैठे हैं।

भारत रिकॉर्ड समय में एक्सप्रेसवे बना सकता है। जहाँ कभी नदियाँ दूरी बनाती थीं, वहाँ पुल खड़े हो जाते हैं। जहाँ खेत थे, वहाँ एयरपोर्ट उग आते हैं।

लेकिन दुनिया के सबसे मशहूर स्मारक ताजमहल के पास एक अहम और अपेक्षाकृत सीधी नदी परियोजना आज भी न्यूट्रल गियर में अटकी है।

क्यों?

क्योंकि हमारे निज़ाम  को अक्सर काम पूरा करने से ज्यादा रस्म-अदायगी  पसंद है। पहले ऐलान करो। जोरदार तालियाँ बटोर लो। बाद में सफाई देते रहो। और जब सवाल उठें तो कह दो:  “प्रक्रिया चल रही है।”

ताज के पास बैराज से कई उम्मीदें जुड़ी हैं। यमुना को फिर से जिंदा करना। ताज के आसपास का माहौल बेहतर बनाना। भूजल (groundwater) को रिचार्ज करना। पर्यावरणीय दबाव कम करना। शहर को कुछ राहत देना।

जहाँ नदी कई बार किसी सुस्त नाले जैसी लगती है, वहाँ यह कोई शौकिया परियोजना नहीं, बल्कि ज़रूरत है।

लेकिन खयाल से अमल  तक का सफर बेहद ऊबड़-खाबड़ रहा है।फाइलें चलीं। फिर रुक गईं। डिज़ाइन बदले। फिर दोबारा बदले। विभागों ने हामी भरी। फिर एतराज़  जता दिया। और वही पुराना हिंदुस्तानी राग गूँजता रहा; “यह मेरी फाइल नहीं है।” सो, परियोजना इंतज़ार करती रही। और करती रही।

एक दौर में रबर चेक डैम (अस्थायी लचीला बाँध) का प्रस्ताव आया। इसे तेज़ और लचीला हल बताया गया। सुनने में यह मुनासिब लगा। उम्मीद भी जगी।

लेकिन अब इसे चुपचाप किनारे रखकर चिनाई वाले पक्के बाँध  पर जोर दिया जा रहा है।

कागज़ों पर यह तरक्की लगती है। हकीकत में यह घड़ी की सुई फिर शून्य पर ले आई है। नया डिज़ाइन मतलब नई स्टडी। नई स्टडी मतलब नई मंज़ूरियाँ। नई मंज़ूरियाँ मतलब नई देरी। चक्र फिर वहीं से शुरू। जैसे कीचड़ में फँसा पहिया, घूम तो रहा हो मगर आगे न बढ़ रहा हो।

इस बीच यमुना लगातार पीछे हट रही है। कुछ हिस्सों में वह इतनी पतली हो जाती है कि लगता है जैसे अफसर और जनता अलग-अलग नदियाँ देख रहे हों। दाँव पर क्या लगा है, इस पर कोई बहस नहीं।

ताजमहल सिर्फ संगमरमर और यादों का ढांचा नहीं है। यह एक जीवित परिदृश्य (living landscape) है। इसकी खूबसूरती सिर्फ इसकी इमारत में नहीं, बल्कि उसके आसपास की नदी, हवा, रोशनी और पर्यावरणीय संतुलन में भी बसती है।

मरती हुई यमुना सिर्फ बदनुमा दाग नहीं। यह चेतावनी है।

कमज़ोर पड़ती नदी स्थानीय मौसम पर असर डालती है। भूजल को प्रभावित करती है। पूरे इलाके की पारिस्थितिकी  की लय बिगाड़ देती है। और धीरे-धीरे स्मारक के प्राकृतिक परिवेश को भी खतरे में डालती है।

इसीलिए सामाजिक कार्यकर्ता, पर्यावरणविद् और जागरूक नागरिक वर्षों से आवाज़ उठा रहे हैं।

रिवर कनेक्ट कैंपेन जैसे अभियान मुद्दे को जिंदा रखने की कोशिश करते रहे हैं।

आवाज़ें उठीं। रिपोर्टें लिखी गईं। अपीलें की गईं। लेकिन चिंता और प्रतिबद्धता  के बीच कहीं रफ्तार गुम हो जाती है। अब एक नया मोड़ आया है। चिनाई वाले बाँध के फैसले के बाद परियोजना को फिर नई जांचों से गुजरना होगा।

पर्यावरण प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment)। प्रदूषण नियंत्रण मंज़ूरी। भूजल मूल्यांकन। ताज की नज़दीकी के कारण विरासत संरक्षण मंज़ूरी। इनमें से कोई भी गैरज़रूरी नहीं। बल्कि सब बेहद ज़रूरी हैं।

ताज जैसे वैश्विक धरोहर (heritage) के पास कोई भी परियोजना शॉर्टकट नहीं अपना सकती।

मगर असली मसला सुरक्षा उपाय नहीं, उनकी रफ्तार है। भारत में अक्सर सुरक्षा उपाय स्पीड ब्रेकर बन जाते हैं। जो प्रक्रिया समयबद्ध और समन्वित  होनी चाहिए, वह ऐसी रिले रेस बन जाती है जिसमें बैटन बार-बार गिरती रहती है। ऐसी परियोजना को साफ समयसीमा चाहिए।

एक सशक्त प्राधिकरण (authority)।स्पष्ट जवाबदेही। और जनता को नियमित जानकारी।

लेकिन यहाँ यह फाइल किसी धूल भरी मेज़ पर पड़ी भूली हुई याद की तरह विभागों में भटकती रहती है।

असल मसला तकनीकी नहीं। सियासी है। जब ताज सुर्खियों में आता है, यमुना याद आ जाती है। जब खबरें बदलती हैं, फोकस भी बदल जाता है। नतीजा वही पुराना पैटर्न: घोषणा करो। देरी करो। दिलासा दो।दोहराओ। यह गूँजती हुई हुकूमत  है।

और फिर आती है सबसे कड़वी विडंबना । शिलान्यास हो चुके हैं। एक बार नहीं, कई बार। फीते कटे। फोटो खिंचे। भाषण हुए। लेकिन बैराज औपचारिक फावड़ों से नहीं बनता। वह लगातार मेहनत, अनुशासन और फॉलो-थ्रू  से बनता है। वही बेजान मगर असरदार प्रशासनिक मशक्कत , जो सुर्खियाँ भले न बटोरे, मगर नतीजे देती है।

साफ कहें:  यह कोई दिखावटी परियोजना नहीं। एक चालू बैराज जलस्तर स्थिर कर सकता है। ताज के पास नदी की मौजूदगी को बेहतर बना सकता है। भूजल को सहारा दे सकता है।

क्या इससे आगरा की हर पर्यावरणीय समस्या हल हो जाएगी? नहीं।

लेकिन यह एक अहम कदम होगा। और कई बार सही दिशा में उठाया गया छोटा कदम किसी बड़े ख्वाब से ज्यादा मायने रखता है।

इंतज़ार की भी कीमत होती है। हर साल की देरी जनता के भरोसे को थोड़ा और खोखला करती है। यह खामोश संदेश देती है कि अहम परियोजनाएँ भी बिना किसी जवाबदेही के अनंतकाल तक लटक सकती हैं।

और नदी? वह लगातार सिमटती रहती है। चुपचाप। सब्र के साथ।बेरहम ढंग से।

तो आगरा कहाँ खड़ा है? एक और दोराहे पर। शहर को अब नई घोषणा नहीं चाहिए। न नया शिलान्यास।न उम्मीदों में लिपटा कोई और वादा। उसे अमल चाहिए। ऐसी परियोजना चाहिए जो भाषणों से आगे निकले।फोटो-ऑप्स से बचे। सियासी मौसमों से ऊपर उठे। क्योंकि आखिर में यमुना फाइलें नहीं पढ़ती। बैठकों में शामिल नहीं होती। मंज़ूरियों का अनंत इंतज़ार नहीं करती। वह बस बहती है। या फिर रुक जाती है।

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